लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५१ तो अब अदेङ् गुणः (२५) सूत्र का यह अर्थ हुआ—ह्रस्व अकार, दीर्घ एकार तथा दीर्घ ओकार गुण-सञ्ज्ञक होते हैं । अब अग्रिम-सूत्र में गुण-सञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् – (२७) आद् गुणः ।६।१।८७।। अवर्णादचि परे पूर्व-परयोरेको गुण आदेशः स्यात् । उपेन्द्रः । गङ्गो- दकम् ॥ अर्थः—अवर्ण से अच् परे होने पर पूर्व+पर के स्थान पर एक गुण आदेश हो जाता है । व्याख्या—अष्टाध्यायी के छठे अध्याय के प्रथम-पाद में एकः पूर्व-परयोः (६.१.८१) यह अधिकार-सूत्र है, इस का अधिकार एत्येधत्यूठ्सु (६.१.१०८) सूत्र के पूर्व तक जाता है। इस अधिकार' में 'पूर्व पर दोनों के स्थान पर एक आदेश होता है'। यह आद् गुणः (२७) सूत्र भी इसी अधिकार में पढ़ा गया है । आत् ।१।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधि- कृत है) । गुणः ।१।१। अर्थः – (आत्) अवर्ण से (अचि) अच् परे होने पर (पूर्व- परयोः) पूर्व और पर के स्थान पर (एकः) एक (गुणः) गुण आदेश होता है । अवर्ण से अवर्ण परे होने पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) तथा अवर्ण से 'ए, ओ, ऐ, औ' परे होने पर वृद्धिरेचि (३३) सूत्र इस गुण का बाध कर लेते हैं, अतः अवर्ण से इकार, उकार, ऋकार तथा लृकार परे होने पर ही गुण प्रवृत्त होता है । उदाहरण यथा—उपेन्द्रः (विष्णु) । 'उप + इन्द्र' यहां पकारोत्तर अवर्ण से परे 'इन्द्र' का आदि अच् 'इ' विद्यमान है, अतः पूर्व = अवर्ण तथा पर = इवर्ण दोनों के स्थान पर प्रकृत आद् गुणः (२७) सूत्र द्वारा एक गुण प्राप्त होता है । अदेङ् गुणः (२५) सूत्र के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन गुण हैं । अब इन तीनों में से कौन सा गुण 'अ+इ' के स्थान पर किया जाये ? इस शङ्का के उत्पन्न होने पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र से स्थान-कृत आनन्तर्य द्वारा 'अ+इ' के स्थान पर 'ए' गुण हो जाता है १. इस अधिकार के २१ सूत्र लघुसिद्धान्तकौमुदी में प्रयुक्त किये गये हैं। तथाहि— १. अन्तादिवच्च (४१); २. आद् गुणः (२७); ३. वृद्धिरेचि (३३); ४. एत्येधत्यूठ्सु (३४); ५. आटश्च (१६७); ६. उपसर्गादृति धातौ (३७); ७. ओतोम्शसोः (२१४); ८. एङि पर-रूपम् (३८); ९. ओमाङोश्च (४०); १०. उस्यपदान्तात् (४६२); ११. अतो गुणे (२७४); १२. अकः सवर्णे दीर्घः (४२); १३. प्रथमयोः पूर्व-सवर्णः (१२६); १४. तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७); १५. नादिचि (१२७); १६. दीर्घाज्जसि च (१६२); १७. अमि पूर्वः (१३५); १८. सम्प्रसारणाच्च (२५८); १६. एङः पदान्तादति (४३); २०. ङसि-ङसोश्च (१७३); २१. ऋत उत् (२०८); इन सूत्रों को सदा ध्यान में रखना चाहिये।
५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
['अ+इ' का स्थान 'कण्ठ+तालु' है, गुणों में कण्ठ+तालु स्थान वाला 'ए' ही है]। उप् 'ए' न्द्र = 'उपेन्द्र' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। गङ्गोदकम् (गङ्गा का जल)। गङ्गा + उदक' यहां गकारोत्तर 'आ' अवर्ण है, इस से परे 'उदक' का आदि 'उ' अच् विद्यमान है। 'आ+उ' का स्थान 'कण्ठ+ ओष्ठ' है। तीनों गुणों में 'कण्ठ+ओष्ठ स्थान ओ' का ही है, अतः पूर्व = आ और पर = उ इन दोनों के स्थान पर² आद् गुण (२७) द्वारा 'ओ' यह एक गुण आदेश हो कर- गङ्ग् 'ओ' दक = 'गङ्गोदकम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अवर्ण से ऋ, ऌ परे वाले उदाहरणों में उरण्रपर (२६) सूत्र का उपयोग किया जाता है, वह सूत्र 'रँ' प्रत्याहार के आधीन है अतः प्रथम रँ' प्रत्याहार की सिद्धि के लिये 'इत्' संज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (२८) उपदेशेऽजनुनासिक इत् ।१।३।२॥ उपदेशेऽनुनासिकोऽज् इत्संज्ञः स्यात् । प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणि- नीयाः । 'लँण्' (प्रत्याहारसूत्र ६) सूत्रस्थावर्णेन सहोच्चार्यमाणो रेफो रलयो र्सज्ञा ॥ अर्थ — जो अच् उपदेश अवस्था में अनुनासिक हो, उस की इत् संज्ञा होती है। प्रतिज्ञेति — पाणिनि के वर्ण प्रतिज्ञा अर्थात् गुरु-परम्परा के उपदेश से अनुनासिक धर्म वाले हैं। लँण् इति — 'लँण्' सूत्र में स्थित लकारोत्तर अवर्ण (अन्त्य) के साथ युक्त हुआ रेफ (आदि) र् और ल् वर्णों की संज्ञा होता है। व्याख्या—उपदेशे ।७।१। अच् ।१।१। अनुनासिकः ।१।१। इत् ।१।१। अर्थ — (उपदेशे) उपदेश अवस्था में (अनुनासिकः) अनुनासिक (अच्) अच् (इत्) इत्- संज्ञक होता है। महामुनि पाणिनि ने अपने व्याकरण में अनुनासिक अचों पर (ँ) इस प्रकार का चिह्न किया था³, परन्तु अब वह अनुनासिक-पाठ परिभ्रष्ट हो गया है।
१ जब समासादि में सन्धि हो चुकती है तब विभक्ति की उत्पत्ति हुआ करती है— यह हम पीछे लिख चुके हैं, सर्वत्र नहीं लिखेंगे। २ यद्यपि 'गङ्गा+उदक' में 'आ+उ' स्थानी के त्रिमात्र होने से आदेश 'ओ' भी सदृशतम त्रिमात्र होना चाहिये तथापि अदेङ् गुण (२५) में एङ् के तपर होने से द्विमात्र 'ओ' ही गुण एङ् हो जाता है। यह पूर्व-सूत्र में सङ्केतित कर आये हैं। ३ जैसे 'एधँ वृद्धौ, गम्ऌँ गतौ, यजँ देवपूजा-सङ्गतिकरण-दानेषु' इन में अनुनासिक के चिह्न होने से ये अच् पाणिनि को 'इत्' अभीष्ट हैं। अनुदात्तेत् होने से एध् धातु आत्मनेपदी और स्वरितेत् होने से यज् धातु उभयपदी है। 'गम्ऌँ' धातु में लृकार न अनुदात्त है और न स्वरित अतः अवशिष्ट उदात्त है, उदात्तेत् होने से गम् धातु परस्मैपदी है। इत्-संज्ञा किसी प्रयोजन के लिये होती है। प्रयोजना-
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५३ अतः अब अनुनासिक जानने की व्यवस्था इस प्रकार समझनी चाहिये—प्रतिज्ञाऽनुना- सिक्याः पाणिनीयाः। पाणिनीयाः = पाणिनिना प्रोक्ता वर्णाः, प्रतिज्ञा = गुरुपरम्परी- पदेशेन आनुनासिकाः = अनुनासिक-धर्मवन्तः सन्तीति शेषः। अर्थः—पाणिनि मे कहे गये वर्ण गुरु-परम्परा के उपदेशानुसार अनुनासिक धर्म वाले जानने चाहियें। तात्पर्य यह है कि अनुनासिक के विषय में अब तक आ रही गुरु-परम्परा का आश्रय करना ही युक्त है; गुरुपरम्परा में जो जो अनुनासिक चला आ रहा है उसे अनुनासिक और जो अनुनासिक नहीं माना जा रहा उसे अनुनासिक न मानना ही ठीक है। इस सूत्र में लँण् इस छठे प्रत्याहारसूत्र में लकारोत्तर अकार की इत् सञ्ज्ञा हो जाती है; क्योंकि गुरु-परम्परा में लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः ऐसा प्रवाद चला आ रहा है अतः यह अनुनासिक 'लँण्' इस रूप में है। इस अन्त्य इत् = अकार के साथ हयवरट् (प्रत्याहार० ५) सूत्र का 'र्' [देखो—हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः] मिलाने से र्+अँ = 'रँ' प्रत्याहार बन जाता है, इस 'रँ' प्रत्याहार के अन्तर्गत 'र्' और 'ल्' ये दो वर्ण आते हैं। टकार हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्-सञ्ज्ञक है अतः मध्यवर्ती होने पर भी इस का ग्रहण नहीं होता। अब इस 'रँ' प्रत्याहार का अग्रिम-सूत्र में उपयोग बतलाते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(२६) उरण् रपरः ।१।१।५०॥ 'ऋ इति त्रिंशतः सञ्ज्ञा' इत्युक्तम्; तत्स्थाने योऽण् स रँपरः सन्नेव प्रवर्त्तते। कृष्णर्द्धिः। तवल्कारः॥ अर्थः—'ऋ' यह तीस की सञ्ज्ञा है; यह हम पीछे [अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः (११) सूत्र पर] कह चुके हैं। उस तीस प्रकार वाले 'ऋ' के स्थान पर यदि अण् आदेश करना हो तो वह 'रँ' प्रत्याहार परे वाला ही प्रवृत्त होता है। व्याख्या—उः ।६।१। ('ऋ' शब्द के षष्ठी के एकवचन में 'पितुः' के समान 'उः' प्रयोग बनता है)। अण् ।१।१। रँपरः ।१।१। समासः—रँः परो यस्माद् असौ रँपरः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(उः) 'ऋ' वर्ण के स्थान पर (अण्) अण् अर्थात् अ, इ, उ (रँपरः) 'रँ' प्रत्याहार परे वाले होते हैं। अणुदित् सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) सूत्र पर 'ऋ' की तीस सञ्ज्ञाओं का प्रतिपादन कर चुके हैं; उस 'ऋ' के स्थान पर यदि अण् (अ इ उ) आदेश होगा तो वह 'रँ' प्रत्याहार परे वाला अर्थात् उस से परे र् और ल् वर्ण भी होंगे। यथा—अर्, अल्, आर्, आल्, इर्, इल्, उर्, उल् इत्यादि। उदाहरण यथा— भाव में अच् उच्चारणार्थक ही माना जाता है। कुछ लोग सुखोच्चारण को भी एक प्रयोजन मान कर वहां पर भी इत्संज्ञा की प्रवृत्ति स्वीकार करते हैं। हम ने इस व्याख्या में गुरुपरम्परागत इन अनुनासिक चिह्नों को यथावत् अङ्कित करने का प्रथम प्रयास किया है। आशा है विद्यार्थियों को इस से सुविधा होगी।
५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् कृष्णर्द्धि (कृष्ण की समृद्धि) । 'कृष्ण + ऋद्धि' यहां णकारोत्तर अवर्ण से परे ऋकार = अच् के विद्यमान होने से आद् गुण (२७) सूत्र द्वारा पूर्व + पर के स्थान पर एक गुण प्राप्त होता है । 'अ + ऋ' का स्थान 'कण्ठ + मूर्धा' है। तीनों गुणों में 'कण्ठ' स्थान तो सब का मिलता है पर मूर्धा-स्थान किसी का नहीं मिलता । अब यदि पूर्व + पर के स्थान पर 'अ' गुण करें तो प्रकृतसूत्रद्वारा उस से परे 'रँ' प्रत्याहार प्राप्त हो जाता है । 'रँ' प्रत्याहार में र् और ल् दो वर्ण आते हैं, स्थानेऽन्तरतम (१७) द्वारा 'ऋ' के स्थान पर अण् करने पर उस से परे 'र्' और 'ॡ' के स्थान पर अण् करने पर उस से परे 'ल्' भी साथ में प्रवृत्त हो जाता है । यहां पूर्व + पर के स्थान पर एकादेश होने से 'ऋ' के स्थान पर अण् (अ) करना है, अतः उस से परे 'र्' भी हो जाता है । इस प्रकार 'अर्' का स्थान 'कण्ठ + मूर्धा' होने से स्थानीय और आदेश तुल्य हो जाते हैं । तो अब अर्' एकादेश करने से— कृष्ण् 'अर्' द्धि = 'कृष्णर्द्धि ' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । तवल्कार (तेरा लृकार) । तव + लृकार यहां आद् गुण (२७) से गुण एकादेश प्राप्त होने पर उरण्रपर. (२६) से रँ' प्रत्याहार भी पर प्राप्त होता है । अब स्थानेऽन्तरतम. (१७) सूत्र से कण्ठ + दन्त स्थान वाले 'अ + ॡ' के स्थान पर तादृश सपर अण् होकर तव् 'अल्' कार = 'तवल्कार' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । अभ्यास (४) (१) निम्नलिखित रूपों में सन्धिविच्छेद कर उस सूत्रों द्वारा सिद्ध करें— १ गजेन्द्र । २ परीक्षोत्सव । ३ वसन्तर्तु । ४ रमेश । ५ सूर्यो- दय । ६ गणेश । ७ देवर्षि । ८ ममल्कार । ९ हितोपदेश । १० तथेति । ११. अत्यन्तोर्ध्वम् । १२ परमोत्तम । १३ नेति । १४ यथेच्छम् । १५ उमेश । १६ महर्षि । १७ यज्ञोपवीतम् । १८ महेष्वास । १६ विक्लेन्द्रिय । २० तवोत्साह । २१ वेदर्क । २२. दयोदयोज्ज्वल । २३ उत्तमर्ण । २४ प्रेक्षते । २५ गुडाकेश । (२) अधोलिखित प्रयोगों में उपपत्ति-पूर्वक सूत्रों द्वारा सन्धि करें— १ महा + ईश । २ कण्ठ + उच्चारण । ३ राम + इतिहास । १ जलतुम्ब्बिकान्यायेन रेफस्योर्ध्वगमनम्—जैसे जल में तुम्बी (शुष्क लौकी) डालने पर वह ऊपर ही ऊपर आ जाती है वैसे देवनागरी लिपि में हल् अर्थात् व्यञ्जन के परे रहते रेफ का भी सदा ऊर्ध्वगमन होता है । जैसे—अर् + थ = अर्थ । आर् + य = आर्य । ध्यान रहे कि यह रेफ अपने से आगे सस्वर व्यञ्जन के सिर पर ही चढ़ता है चाहे वह व्यञ्जन उस शब्द में कितनी भी दूर क्या न हो । यथा— मूर् + च्छना = मूर्च्छना । कार् + त्स्न्य = कात्स्न्र्य । कहा भी है— तुम्ब्बिकातृणकाष्ठं च तैलं जलमुपागतम् । स्वभावादूर्ध्वमायाति रेफस्यैतादृशी गतिः ॥
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ५५ ४. न + उपलब्धिः । ५. भाष्यकार + दृष्टि । ६. परम + उपकारक । ७. स्वच्छ + उदक । ८. नतत + उक्षन । ६. तव + लृदन्तः । १०. ग्रीष्म
- ऋतु । ११. सप्त + ऋषि । १२. मम + लृवर्णः । १३. अधम + ऋण । १४. आ + उदकान्तात् । १५. पाप + ऋद्धि । ( ३ ) उरण्रपरः मे अण् किस णकार मे गृहीत होता है और क्यों ? ( ४ ) 'ऋ' की तीन सञ्ज्ञाओं का उल्लेख करें । ( ५ ) 'र्' प्रत्याहार की तसूत्र सिद्धि लिख कर तदन्तर्गत वर्णों को लिखते हुए 'र्' प्रत्याहार को स्वीकार करने का प्रयोजन भी स्पष्ट करें । ( ६ ) अनुनासिक जानने की आजकल क्या व्यवस्था है ? सविस्तर लिखें । ( ७ ) तपर करने का प्रयोजन सोदाहरण स्पष्ट करें । ( ८ ) आद् गुणः सूत्र किस २ सूत्र का अपवाद है; सोदाहरण लिखें । —: : ० : : — [लघु०] विधि-सूत्रम् —( ३० ) लोपः शाकल्यस्य ।८।३।१९॥ अवर्ण-पूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्लोपो वाऽशि परे ॥ अर्थः —अश् प्रत्याहार परे होने पर अवर्ण पूर्व वाले पदान्त यकार वकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है । व्याख्या —अ-पूर्वयोः ।६।२। (भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि से 'अ-पूर्वस्य' अंश की अनुवृत्ति आकर वचन-विपरिणाम हो जाता है) । व्योः ।६।२। (व्योर्लघु- प्रयत्नतरः शाकटायनस्य से) । पदान्तयोः ।६।२। (पदस्य यह पीछे से अधिकार चला आ रहा है । 'व्योः' का विशेषण होने से इस से तदन्त-विधि हो कर वचन-विपरिणाम से द्विवचन हो जाता है) । लोपः ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। अशि ।७।१। (भो-भगो- अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि से) । समासः—अः = अवर्णः पूर्वो याभ्यां तौ = अ-पूर्वो, तयोः = अपूर्वयोः, बहुव्रीहि-समासः । व् च य् च = व्यौ, तयोः = व्योः, इतरेतर-द्वन्द्वः । अर्थः---(अ-पूर्वयोः) अवर्ण पूर्व वाले (पदान्तयोः) पदान्त (व्योः) वकार यकार का (अशि) अश् परे होने पर (लोपः) लोप हो जाता है । (शाकल्यस्य) यह कार्य शाकल्याचार्य का है । यह लोप शाकल्याचार्य —जो पाणिनि से पूर्व व्याकरण के एक महान् आचार्य हो चुके हैं—के मत में होता है; पाणिनि के मत में नहीं । हमें दोनों आचार्य प्रमाण हैं अतः विकल्प से लोप होगा । उदाहरण यथा— 'हरे + इह', 'विष्णो + इह' यहां 'हरे' और 'विष्णो' पद सम्बोधन के एकवच- नान्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) के अनुसार पद-सञ्ज्ञक हैं । इन दोनों में एचो- ऽयवायावः (२२) सूत्र से क्रमशः एकार को अय् और ओकार को अव् आदेश हो कर— 'हर् अय् + इह' 'विष्ण् अव् + इह' बन जाते हैं । अब पुनः दोनों रूपों में 'इह' के आदि इकार = अश् के परे होने पर पदान्त यकार वकार का प्रकृतसूत्र (३०) द्वारा विकल्प से लोप हो कर लोपपक्ष में—'हर् अ + इह; विष्ण् अ + इह' तथा लोप के अभाव में—'हरय् + इह; विष्णव् + इह' बना । अब लोप-पक्ष के रूपों में आद् गुणः
५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (२७) सूत्र द्वारा 'अ+इ' के स्थान पर 'ए' तथा 'अ+उ' के स्थान पर 'ओ' गुण एकादेश प्राप्त होता है । इस पर इस के निवारणार्थ अग्रिम-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] अधिकार-सूत्रम्—(३१) पूर्वत्रासिद्धम् ।८।२।१॥ सपाद-सप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रमसिद्धम् । हर इह, हरयिह । विष्ण इह, विष्णविह ॥ अर्थ —सवा सात अध्यायों के प्रति त्रिपादी-सूत्र असिद्ध होते हैं और त्रिपादी सूत्रों में भी पूर्वशास्त्र के प्रति पर-शास्त्र असिद्ध होता है । व्याख्या—अष्टाध्यायी में आठ अध्याय और प्रत्येक अध्याय में चार चार पाद हैं, यह सब पीछे संज्ञा-प्रकरण में विस्तार पूर्वक स्पष्ट कर चुके हैं । सात अध्याय सम्पूर्ण और आठवें अध्याय के प्रथम-पाद के व्यतीत होने पर आठवें अध्याय के दूसरे पाद का यह प्रथम-सूत्र है । यह अधिकार-सूत्र है । अधिकारसूत्र स्वयं कुछ नहीं किया करते किन्तु अग्रिम-सूत्रों में अनुवृत्ति के लिये हुआ करते हैं । उन की अवधि (हद्द) निश्चित हुआ करती है । इस सूत्र का अधिकार यहां से लेकर अ अ (८।४।६७) सूत्र अर्थात् अष्टाध्यायी के अन्तिमसूत्र तक जाता है । इस प्रकार आठवें अध्याय का दूसरा, तीसरा तथा चौथा पाद इस के अधिकार में आता है । यह सूत्र इन तीनों पादों के सूत्रों में जा कर अनुवृत्ति करता है कि तू (पूर्वत्र इत्यव्ययपदम्) पूर्व-शास्त्र में (असिद्धम् ।१।२।) असिद्ध है, अर्थात् पूर्व की दृष्टि में तेरा कोई अस्तित्त्व ही नहीं । इस से यह होता है कि इन तीन पादों के सूत्र पूर्व-घटित सवा सात अध्यायों की दृष्टि में तथा इन तीन पादों में भी पूर्व के प्रति पर-सूत्र असिद्ध हो जाता है । यथा—आद् गुणः (२७) सवा सात अध्यायों के अन्तर्गत-सूत्र है [यह छठे अध्याय के प्रथम पाद का ८४ वा सूत्र है]। इसकी दृष्टि में आठवें अध्याय के तीसरे पाद में वर्त्तमान लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र असिद्ध है, अतः आद् गुणः (२७) सूत्र लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र द्वारा किये गये यकार-वकार के लोप को नहीं देखता, इसे तो अब भी यकार-वकार सामने पड़े हुए दीख रहे हैं । अवर्ण से परे यकार-वकार के दिखाई देने से अच् परे न होने के कारण आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश नहीं होता—हर इह, विष्ण इह—ऐसे ही अवस्थित रहते हैं । इस प्रकार—लोप-पक्ष में 'हर इह, विष्ण इह' तथा लोपाभावपक्ष में 'हरयिह, विष्णविह' रूप सिद्ध होते हैं ।¹ अभ्यास (५) (१) कौमुदीस्थ लम्बा-चौड़ा अर्थ पूर्वत्रासिद्धम् सूत्र का कैसे हो जाता है ? (२) सूत्र में विकल्प वाचक पद के न होने पर भी लोपः शाकल्यस्य सूत्र कैसे वैकल्पिक लोप किया करता है ? १ त्रिपाद्यां में पूर्व के प्रति पर-शास्त्र की असिद्धि में उदाहरण यथा—किम्मुक्तम् । यहां पर मोऽनुस्वारः (८।३।२३) इस पूर्व त्रिपादी सूत्र के प्रति मयो ञ्ञो वो वा (८।३।३३) इस पर-त्रिपादी-सूत्र के असिद्ध होने से (अर्थात् व् की जगह उ = अच् होने से) म् को अनुस्वार नहीं होता ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् । ५७ (३) हरये, विष्णवे रूपों में लोपः शाकल्यस्य की प्रवृत्ति क्यों न हो ? (४) 'हरय् + इह', 'विष्णव् + इह' यहां लोपः शाकल्यस्य से प्राप्त यकार वकार के लोप का यणः प्रतिषेधो वाच्यः से निषेध क्यों नहीं होता ? (५) निम्न-लिखित रूपों में सन्धिच्छेद कर सूत्र-समन्वय-पूर्वक सिद्धि करें— १. गुरा आयाते । २. प्रभ इदानीम् । ३. शौर आगच्छ । ४. भानो अपि । ५. रथा उदिते । ६. न धातु-लोप आर्धधातुके । ७. श्रिया उत्कण्ठितः । ८. तयागच्छन्ति । ६. विधा उदिते । १०. वन ऋषयः । ६) अधो-लिखित रूपों में सूत्र-समन्वय-पूर्वक सन्धि करें— वनऋषयः १. पुत्रौ + आगच्छतः । २. तस्मै + अदात् । ३. ते + इच्छन्ति । ४. गृहे + आसीत् । ५. एते + आगताः । ६. विश्वे + उपासते । ७. दूती + अनार्ये । ८. स्थले + इदानीम् । ६. वाली + आयाती । १०. कस्मै + अयच्छत् । ११. आसने + आस्ते । १२. द्वौ + अपि । —:: o ::— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम् — (३२) वृद्धिरादैच् ।१।१।१॥ आदैच्च वृद्धि-सञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थः—'आ, ऐ, औ—ये तीन वर्ण वृद्धि-सञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या - वृद्धिः ।१।१। आत् ।१।१। ऐच् ।१।१। अर्थः — (आत्, ऐच्) दीर्घ आकार, दीर्घ ऐकार तथा दीर्घ औकार (वृद्धिः) वृद्धि-सञ्ज्ञक होते हैं । 'आदैच्' यहां पर तपर किया गया है । यह तपर 'आ' के लिये नहीं किन्तु 'ऐच्' के लिये किया गया है; क्योंकि 'आ' तो अण्-प्रत्याहार के अन्तर्गत न होने से अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः (११) सूत्र द्वारा स्वतः ही सवर्णों का ग्रहण नहीं कराता, पुनः उसके लिए निषेध कैसा ? अतः यहां ऐच् के ग्रहण से प्लुत-सवर्णों का ग्रहण न हो अथवा 'देव + ऐश्वर्यं' में त्रिमात्रस्थानी तथा 'गङ्गा + ओघ' में चतुर्मात्र स्थानी होने से ऐ-औ भी कहीं त्रिमात्र चतुर्मात्र न हों, किन्तु द्विमात्र ही हों; इसलिये तपर किया गया है। इस से—दीर्घ आकार, दीर्घ ऐकार, तथा दीर्घ औकार इन तीन वर्णों की 'वृद्धि' सञ्ज्ञा होती है । अब अग्रिम-सूत्र में इस सञ्ज्ञा का फल दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (३३) वृद्धिरेचि ।६।१।८८॥ आदेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । गुणापवादः । कृष्णैकत्वम् । गङ्गौघः । देवैश्वर्यम् । कृष्णोत्कण्ठ्यम् ॥ अर्थः—अवर्ण से एच् परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर एक वृद्धि आदेश हो जाता है । गुणेति—यह सूत्र आद् गुणः (२७) सूत्र का अपवाद है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से) । एचि ।७।१। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। अर्थः—(आत्) अवर्ण से (एचि) एच् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक
५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (वृद्धि) वृद्धि आदेश हो जाता है। यह सूत्र आद् गुण (२७) सूत्र का अपवाद है। बहुत विषय वाला उत्सर्ग और थोड़े विषय वाला अपवाद हुआ करता है। आद् गुण (२७) सूत्र बहुत विषय वाला है, क्योंकि इस का अवर्ण से परे अच्-मात्र विषय है। वृद्धि- रेचि (३३) सूत्र थोड़े विषय वाला है, क्योंकि इस का अवर्ण से परे अच्-प्रत्याहार के अन्तर्गत केवल एच् ही विषय है। उत्सर्ग और अपवाद दोनों प्रकार के सूत्र महा- मुनि पाणिनि ने बनाये हैं, अत हमें कोई ऐसा हल ढूंढना है जिस से दोनो प्रकार के सूत्र सार्थक हो जायें, कोई अनर्थक न हो। अब यदि अपवाद के विषय में भी उत्सर्ग प्रवृत्त करते हैं तो अपवाद-सूत्र निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि तब इन्हें प्रवृत्त होने के लिये कोई स्थान ही नहीं मिल सकता। और उत्सर्ग के विषय में अपवाद प्रवृत्त करते हैं तो उतने मात्र में प्रवृत्त होकर अपवाद सार्थक हो जाता है और शेष बचे हुए में उत्सर्ग भी प्रवृत्त हो सकता है, इस प्रकार दोनो सार्थक हो जाते हैं। इस से यह सिद्ध हुआ कि उत्सर्ग के विषय में ही अपवाद प्रवृत्त करना युक्त है। तो अब आद् गुण (२७) के विषय में वृद्धिरेचि (३३) सूत्र प्रवृत्त होकर एच् के स्थानों को उस से छीन लेगा, शेष बचे हुए स्थानों में ही वह प्रवृत्त होगा। उदाहरण यथा- कृष्णैकत्वम् (कृष्ण की एकता)। कृष्ण+एकत्व' यहां णकारोत्तर अवर्ण से परे 'एकत्व' शब्द का आदि एकार = एच् वर्त्तमान है। अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व-अ और पर = ए के स्थान पर एक वृद्धि आदेश प्राप्त होता है। 'अ+ए' का स्थान 'कण्ठ+तालु' है, इधर वृद्धि-सञ्ज्ञकों में ऐ' का स्थान 'कण्ठ+तालु है अतः स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार 'अ+ए' के स्थान पर ऐ' यह एक वृद्धि आदेश हो कर - कृष्ण् 'ऐ' कत्व = 'कृष्णैकत्वम्' प्रयोग सिद्ध होता है। गङ्गौघ (गङ्गा का प्रवाह)। 'गङ्गा+ओघ' यहां पूर्व = आ और पर = ओ का 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान है, अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व+पर के स्थान पर 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान वाला 'औ' यह एक वृद्धि आदेश हो कर-गङ्ग 'औ' घ= 'गङ्गौघ' प्रयोग सिद्ध होता है। देवैश्वर्यम् (देवताओं का ऐश्वर्य)। 'देव+ऐश्वर्य' यहां पूर्व = अ और पर = ऐ का 'कण्ठ+तालु' स्थान है, अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व+पर के स्थान पर 'कण्ठ+तालु' स्थान वाला ऐ' यह एक वृद्धि आदेश होकर-देव् 'ऐ' श्वर्य = 'देवैश्वर्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। कृष्णौत्कण्ठ्यम् (कृष्ण की उत्कण्ठा)। 'कृष्ण+औत्कण्ठ्य' यहां पूर्व = अ और पर = औ का 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान है, अतः वृद्धिरेचि (३३) सूत्र द्वारा पूर्व+पर के स्थान पर 'कण्ठ+ओष्ठ' स्थान वाला औ' यह एक वृद्धि आदेश होकर - कृष्ण् 'औ' त्कण्ठ्य = 'कृष्णौत्कण्ठ्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अभ्यास (६) (१) निम्नलिखित रूपों में सूत्रार्थ-समन्वय-पूर्वक सन्धि करें-
१. पञ्च + एते । २. जन + एकता । ३. तण्डुल + ओदन । ४. राम
- औत्सुक्य । ५. नृप + ऐश्वर्य । ६. महा + औषध । ७. एक + एक । ८. राजा + एषः । ९. महा + औदार्य । १०. वीर + एक । ११. महा
- एनः । १२. दर्शन + औत्सुक्य । १३. अस्य + औचिती । १४. सुख
- औपयिक । १५. दीर्घ + एरण्ड । (२) निम्न-लिखित प्रयोगों में सूत्रार्थ-समन्वय-पूर्वक सन्धिविच्छेद करें - १. अत्रैकमत्यम् । २. पूर्वैः । ३. मृत्योद्धत्यम् । ४. पण्डितौकः । ५. बालैषा । ६. चित्तैकाग्र्यम् । ७. तथैव । ८. महौजमः । ६. नवैवम् । १०. नत्यैतिह्यम् । ११. ममोदासीन्यम् । १२. कर्म्मोर्ध्वदेहिकम् । १३. दीर्घैकारः । १४. ज्ञानौषधिः । १५. महौष्ण्यम् । १६. प्लुतैकारः । १७. स्थूलैणः । १८. मैवम् । १६. बिम्बौष्ठी । २०. स्थूलौतुः¹ । (३) उत्सर्ग और अपवाद किसे कहते हैं ? अपवाद के विषय में उत्सर्ग की प्रवृत्ति क्यों नहीं हुआ करती ? (४) वृद्धिरेचि सूत्र गुण का अपवाद है; इस वचन की व्याख्या करो । (५) वृद्धिरादैच् सूत्र में तपर करने का क्या प्रयोजन है ? ————: ० :———— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (३४) एत्येधत्यूठ्सु ।६।१।८६॥ अवर्णादेजाद्योरेत्येधत्योरूठि च परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । पररूप- गुणापवादः । उपैति । उपैधते । प्रष्ठौहः । एजाद्योः किम् ? उपेतः । मा भवान् प्रेदिधत् ॥ अर्थः—अवर्ण से परे यदि एच्-प्रत्याहार आदि वाली 'इण्' तथा 'एध्' धातु हो अथवा ऊठ् हो तो पूर्व + पर के स्थान पर एक वृद्धि आदेश हो जाता है । पर- रूपेति — यह सूत्र एङि पररूपम् (३८) तथा आद् गुणः (२७) सूत्रों का अपवाद है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से) । एजाद्योः ।७।२। (वृद्धिरेचि सूत्र से 'एचि' पद की अनुवृत्ति आती है । यह पद 'एति' और 'एधति' का ही विशेषण बन सकता है, असम्भव होने से 'ऊठ्' का नहीं; अतः वचन-विपरिणाम से द्विवचन और यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे से तदादि-विधि होकर 'एजाद्योः' ऐसा बन जाता है) । एत्येधत्यूठ्सु ।७।३। (एति + एधति + ऊठ्सु) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत हैं) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः---(आत्) अवर्ण से (एजाद्योः) एजादि (एत्येधत्यूठ्सु) इण् और एध् धातु परे होने पर अथवा ऊठ् परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश होता है । उदाहरण यथा— उपैति (पास जाता है) । 'उप + एति' ['एति' यह पद इण् गतौ (अदा०) १. 'बिम्बोष्ठी' और 'स्थूलोतुः' भी होता है । ओत्वोष्ठयोः समासे वा वार्त्तिक से वैकल्पिक पररूप हो जाता है । पररूप के अभाव में वृद्धि समझनी चाहिये ।
६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है] यहां पकारोत्तर अवर्ण से परे एजादि 'इण्' धातु वर्त्तमान है, अत इस सूत्र से पूर्व = अ और पर = ए के स्थान पर 'ऐ' यह एक वृद्धि आदेश हो कर—उप् 'ऐ' ति = उपैति' प्रयोग सिद्ध होता है। उपैधते (पास बढ़ता है)। 'उप+एधते' ['एधत' यह पद एधँ वृद्धौ (भ्वा०) धातु के लँट् लकार के प्रथमपुरुष का एकवचन है] यहां अवर्ण से परे एजादि एध् धातु वर्त्तमान है अत पूर्व=अ और पर = ए के स्थान पर एक 'ऐ' वृद्धि आदेश हो कर—उप् 'ऐ' धते = 'उपैधते' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रष्ठौह (प्रष्ठवाहः का')। 'प्रष्ठ+ऊह' (यहा ऊठ्' है। कैसा है ? यह हलन्त-पुंल्लिङ्ग में 'विश्ववाह्' शब्द पर स्पष्ट होगा) यहा अवर्ण स ऊठ् परे है अत पूर्व = अ और पर = ऊ दोना के स्थान पर 'औ' यह वृद्धि एकादेश हो कर—प्रष्ठ् 'औ' ह—'प्रष्ठौह' प्रयोग सिद्ध होता है। यह सूत्र ऊठ् के विषय मे गुण का तथा इण् और एध् के विषय म आगे वक्ष्य- माण एङि पररूपम् (३८) सूत्र द्वारा विधीयमान पररूप का अपवाद है। अब यहा यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस सूत्र में इण् और एध् धातु को एजादि क्यो कहा गया है ? अर्थात् यदि एजादि न कहते, तो कौन सी हानि हो जाती ? इस का उत्तर यह है कि एजादि न कहने से 'उपेन' और 'प्रेदिधत्' प्रयोगो मे भी वृद्धि हो जाती, जो नितान्त अनिष्ट है। तथाहि—उपेन (समीप पहुँचा, युक्त अथवा वे दोनों पास जाते हैं)। 'उप+इत' ('इत' यह पद इण् गतौ धातु का क्तान्त रूप है अथवा लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का द्विवचन है) यहा अवर्ण से परे 'इण्' धातु तो है पर वह एजादि नही, अत. वृद्धि न हो कर आद् गुण (२७) सूत्र से 'ए' यह गुण एकादेश ही होगा। इस स—उप् 'ए'त = 'उपेन' यह दृष्ट रूप सिद्ध हो जायेगा। 'मा भवान् प्रेदिधत्' (आप अधिक न वढावें) ['इदिधत्' यह णिजन्त एध् धातु के लुङ् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है। यहा न माड्योगे (४४१) सूत्र मे 'आट्' आगम का निषेध हो जाता है, इसी बात को जतलाने के लिये यहा 'मा' पद का प्रयोग किया गया है] यहा अवर्ण से परे 'एध्' धातु तो वर्त्तमान है, पर वह एजादि नही, अत इस सूत्र से वृद्धि न हो आद् गुणः (२७) सूत्र द्वारा गुण हो जायेगा। इस मे—प्र् 'ए' दिधत्='प्रेदिधन्' यह इष्ट रूप सिद्ध हो जायेगा। य दोनो उक्त सूत्र के प्रत्युदाहरण है। विपरीत उदाहरणो को प्रत्युदाहरण कहते है, अर्थात् 'यदि सूत्रो मे यह न कहते तो यह अशुद्ध हो जाता' इस प्रकार जो प्रयोग दर्शाये जाते है उन्हे प्रत्युदाहरण कहते हैं। सूत्र में 'एति' और 'एधति' से 'इण्' और 'एध्' धातु का ही ग्रहण समझना १ उद्दण्डता दूर करने के लिये जिस के गले म युग या भारी काष्ठ बान्ध देते है उस बछडे या बैल को 'प्रष्ठवाह्' कहते है। यहा प्रष्ठवाह् शब्द के षष्ठी के एक- वचनान्त का प्रयोग है। प्रष्ठवाड् युगपार्श्वग, प्रष्ठोही बालगभिणी—इत्यमर ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६१ चाहिये। जैसे वर्णों से स्वार्थ में 'कार' प्रत्यय लगाया जाता है (अकार, इकार, उकार, ककार आदि) वैसे धातुओं के निर्देश करने में भी 'इ' (इक्) या 'ति' (शित्प्) लगाये जाते हैं। यथा- गमि व गच्छति, एधि व एधते, चलि व चलति आदि। इन सब का तात्पर्य गम्, एध्, चल् आदि मूल धातुओं से ही होता है। [लघु०] वा०- (४) अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् ॥ अक्षौहिणी सेना ॥ अर्थः- 'अक्ष' शब्द के अन्त्य अवर्ण से 'ऊहिनी' शब्द का आदि ऊकार परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। ऐसा अधिक-वचन करना चाहिये। व्याख्या- (अक्षात् ।५।१।) 'अक्ष' शब्द से (ऊहिन्याम् ।७।१।) 'ऊहिनी' शब्द परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है; ऐसा (उपसङ्ख्यानं कर्त्तव्यम्) अधिक-वचन करना चाहिये। ध्यान रहे कि इस प्रकरण में 'आत्' और 'अचि' की अनुवृत्ति होने से सर्वत्र पूर्व में अवर्ण और पर में अच् का ग्रहण होता है। उदाहरण यथा - 'अक्षौहिणी'। 'अक्ष + ऊहिनी' (अक्षाणाम् ऊहिनीति षष्ठीतत्पुरुष-समासः) यहां 'अ + ऊ' का स्थान 'कण्ठ + ओष्ठ' होने से तादृश-स्थान वाला 'औ' वृद्धि एकादेश हो - अक्ष् 'औ' हिनी = 'अक्षौहिणी' बना। अब पूर्व-पदात् सञ्ज्ञायामगः (८.४.३) सूत्र से नकार को णकार आदेश करने से 'अक्षौहिणी' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां गुण की प्राप्ति में वृद्धि कही गई है अतः यह वार्त्तिक गुण का अपवाद है। [लघु०] वा०- (५) प्राद् ऊहोढोढ्येपैष्येषु ॥ प्रौहः। प्रौढः। प्रौढिः। प्रैषः। प्रैष्यः॥ अर्थः- 'प्र' शब्द के अन्त्य अवर्ण से ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य शब्दों का आदि अच् परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। व्याख्या-प्रात् ।५।१। ऊहोढोढ्येपैष्येषु ।७।३। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से)। समासः-ऊहश्च ऊढश्च ऊढिश्च एषश्च एष्यश्च तेषु = ऊहोढोढ्येपैष्येषु। इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः- (प्रात्) 'प्र' शब्द से (ऊहोढोढ्येपैष्येषु) ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य शब्द परे १. 'अक्षौहिणी' विशेष परिमाण वाली सेना कहाती है। इस का परिमाण यथा- अक्षौहिण्याः प्रमाणं तु खाङ्गाष्टैकद्विकैर्गजैः। रथैरैतैर्हयैस्त्रिघ्नैः पञ्चघ्नैश्च पदातिभिः ॥ २१८७० हाथी ⎫ · २१८७० रथ ⎪ अक्षौहिणी ६५६१० घोड़े (रथवाहकों से अतिरिक्त) ⎬ सेना · १०९३५० पैदल ⎭
६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एव) एक (वृद्धि) वृद्धि आदेश हो । उदाहरण यथा - प्र+ऊह = प्र् 'औ' ह = 'प्रौहः' । [ उत्तम तर्क वा उत्तम तर्क करने वाला ] प्र+ऊढ = प्र् 'औ' ढ = 'प्रौढः' । [ बढ़ा हुआ वा अधेड़ ] प्र+ऊढि = प्र् 'औ' ढि = 'प्रौढिः' । [ प्रौढ़ता व शेखी ] प्र+एष = प्र् 'ऐ' ष = 'प्रैषः' । [ प्रेरणा, घञन्तोऽत्र इष्-धातु ] प्र+एष्य = प्र् 'ऐ' ष्य = 'प्रैष्यः' । [ प्रेरणीय, सेवक, ण्यदन्तोऽत्र इष्-धातु ] प्रैष, प्रैष्य यहां एङि पररूपम् (३८) से पररूपम् प्राप्त था शेष स्थानों पर आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण प्राप्त था । यह वार्त्तिक इन दोनों का अपवाद है । [लघु०] वा०- (६) ऋते च तृतीया-समासे ॥ सुखेन ऋतः = सुखार्तः । तृतीयेति किम् ? परमर्तः ॥ अर्थ - तृतीया-समास में अवर्ण से ऋत शब्द का आदि ऋवर्ण परे होने पर पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है । व्याख्या-आत् ।५।१। (आद् गुण सूत्र से) । ऋते ।३।१। च इत्यव्ययपदम् । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । तृतीया-समासे ।७।१। अर्थ - (तृतीया समासे) तृतीया-तत्पुरुष-समास में (आत्) अवर्ण से (ऋते) 'ऋत' शब्द परे होने पर (च) भी (पूर्व परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा - 'सुखेन ऋतः' यह लौकिक-विग्रह है । अलौकिक-विग्रह अर्थात् 'सुख टा ऋत सुँ' में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र द्वारा टा और सुँ का लुक् हो जाने पर 'सुख+ऋत' ऐसा बनता है । अब इस वार्त्तिक से पूर्व-अवर्ण और पर = ऋवर्ण के स्थान पर वृद्धि करनी है । 'अ+ऋ' का स्थान 'कण्ठ+मूर्धा' है । कण्ठ+मूर्धा' स्थान वाला वृद्धि-संज्ञकों में कोई नहीं, सब का 'कण्ठ' स्थान ही तुल्य है । अब यदि 'आ' यह वृद्धि एकादेश करें तो उरण्रपरः (२६) सूत्र से रपर होकर 'आर्' हो जाने से 'कण्ठ+मूर्धा' स्थान तुल्य हो जायेगा । तो ऐसा करने से—सुख् 'आर्' त् = 'सुखार्तः' प्रयोग हो कर विभक्ति लाने से 'सुखार्तः' सिद्ध हो जाता है । इस का अर्थ— सुख से प्राप्त हुआ अर्थात् सुखी है । अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि अवर्ण से 'ऋत' परे होने पर वृद्धि का विधान समास में तो करना ही चाहिये, क्योंकि 'सुखेन+ऋतः' यहां लौकिक- विग्रह में वृद्धि न हो कर गुण एकादेश होने से 'सुखेतर्तः' प्रयोग बन सके । परन्तु 'तृतीया का ही समास हो अन्य विभक्तियों का न हो' इस कथन का क्या प्रयोजन है? क्यों समास मात्र में ही वृद्धि का विधान न कर दिया जाये ? इस का उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि यदि 'तृतीया' न कहेंगे, समास-मात्र में ही वृद्धि विधान करेंगे तो 'परमश्चासौ ऋतः = परम+ऋतः' यहां गुण न हो कर वृद्धि हो जायेगी, क्योंकि समास
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६३ तो यहां भी है। अब यहां कर्मधारय-समास में गुण हो कर 'परमर्तः' यह इष्ट प्रयोग सिद्ध हो जाता है। 'परमर्तः' का अर्थ 'मुक्त' है। [लघु०] वा०- (७) प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम् ऋणे ॥ प्रार्णम् । वत्सतरार्णम् इत्यादि ॥ अर्थः-प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण तथा दश इन छः शब्दों के अन्त्य अवर्ण से परे 'ऋण' शब्द का आदि ऋवर्ण होने पर पूर्व+पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है। व्याख्या- प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम् ।६।३। (यहां पञ्चमी-विभक्ति के स्थान पर षष्ठी-विभक्ति समझनी चाहिये)। ऋणे ।७।१। पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से)। अर्थः-(प्र- वत्सतर-कम्बल-वसनाणर्-दशानाम्) प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण तथा दश इन शब्दों से (ऋणे) ऋण शब्द परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है। उदाहरण यथा- (१) प्र+ऋण = प्र् 'आर्' ण = 'प्रार्णम्' [अधिक व उत्तम ऋण] । (२) वत्सतर+ऋण = वत्सतर् 'आर्' ण = 'वत्सतरार्णम्' [बछड़े के लिये ऋण] । (३) कम्बल+ऋण = कम्बल् 'आर्' ण = 'कम्बलार्णम्' [कम्बल का ऋण] । (४) वसन+ऋण = वसन् 'आर्' ण = 'वसनार्णम्' [कपडे का ऋण] । (५) ऋण+ऋण = ऋण् 'आर्' ण = 'ऋणार्णम्' [ऋण चुकाने के लिये ऋण] । (६) दश+ऋण = दश् 'आर्' ण = 'दशार्णः' [दश प्रकार के जल वाला देश-विशेष] । ध्यान रहे कि अन्तिम उदाहरण में बहुव्रीहि-समास है। इस में 'दशन्' के नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से लोप हो जाता है। यह वार्त्तिक भी गुण एकादेश का अपवाद है। अभ्यास (७) (१) निम्नस्थ रूपों में उत्सर्गनिर्देशपूर्वक ससूत्र सन्धि करें- १. विश्वौहः। २. प्रौहः। ३. भारीहः। ४. अवैति। ५. अभ्युपैति। ६. ऋणार्णम्। ७. उपैता (तृच्)। ८. अवैधते। ९. प्रौढिः। १०. अक्षौहिणी। ११. प्रैति। १२. ममैधते। १३. दशार्णः। १४. प्रेष्यः। १५. प्रैथे। १६. दुःखार्तः। (२) एत्येधत्यूठ्सु सूत्र में 'एजादि' ग्रहण क्यों किया जाता है? (३) ऋते च तृतीया-समासे में तृतीया-ग्रहण का क्या प्रयोजन है? (४) 'अक्षौहिणी' सेना का परिमाण बताओ। (५) एति और एधति में 'ति' ग्रहण का क्या प्रयोजन है? (६) 'उपसङ्ख्यान' शब्द का क्या अर्थ होता है? (७) एत्येधत्यूठ्सु, प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु, अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् ये सूत्र या वार्त्तिक किन २ के अपवाद हैं? सोदाहरण समझाइये।
६४ || भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् — (३५) उपसर्गाः क्रिया-योगे ।१।४।५८॥ प्रादयः क्रिया-योगे उपसर्ग-सञ्ज्ञाः स्युः । १ प्र । २ परा । ३ अप । ४ सम् । ५ अनु । ६ अव । ७ निस्¹ । ८ निर् । ९ दुस् । १० दुर् । ११ वि । १२ आङ् । १३ नि । १४ अधि । १५ अपि । १६ अति । १७ सु । १८ उद् । १९ अभि । २० प्रति । २१ परि । २२ उप—एते प्रादयः ॥ अर्थ — क्रिया-योग में प्रादि 'उपसर्ग' सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—प्रादयः ।१।३। (इसी सूत्र का अंश, जिसे योग-विभाग करके भाष्य- कार ने अलग किया है) । उपसर्गाः ।१।३। क्रिया-योगे ।७।१। समास —'प्र'शब्द आदि- र्येषान्ते प्रादयः । तद् गुण-संविज्ञान-बहुव्रीहि समास [इस समास का विवेचन (१३३) सूत्र पर देखें] । क्रियया योगः =क्रिया-योगः, तस्मिन् क्रिया-योगे । तृतीया-तत्पुरुष- समास । अर्थ — (क्रिया-योगे) क्रिया के साथ अन्वित होने पर (प्रादयः) 'प्र' आदि २२ शब्द (उपसर्गाः) उपसर्ग-सञ्ज्ञक होते हैं । यह सूत्र प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधिकार में पढ़ा गया है, अतः इन की निपात-सञ्ज्ञा भी साथ ही समझ लेनी चाहिये । निपात-सञ्ज्ञा का प्रयोजन 'अव्यय' बनाना है [देखें —स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७)] । प्रादि कौन २ से हैं ? इस का ज्ञान गण-पाठ से होता है । मूल में प्रादि- गण दे दिया गया है । गण-पाठ महामुनि पाणिनि ने रचा है । प्रादि-गण पर विशेष विचार आगे यत्र तत्र बहुत किया जायेगा । नोट — प्रादि-गण में 'उद्' के स्थान पर 'उत्' पाठ प्रायः सब लघुकौमुदियों तथा सिद्धान्तकौमुदियों में देखा जाता है पर वह अशुद्ध है, क्योंकि उदश्चरः सकर्म- कात् (७३६), उदि कूले रुजिवहोः (३.२.३१), उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) इत्यादि पाणिनि-सूत्रों से इस के दकारान्त होने का ही निश्चय होता है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् —(३६) भूवादयो धातवः ।१।३।१॥ क्रिया-वाचिनो भ्वादयो धातु-सञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थ —क्रिया के वाचक 'भू' आदि धातु-सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—भूवादयः ।१।३। धातवः ।१।३। समास —भूश्च वाश्च भूवौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । वा गति-गन्धनयोः इत्यादादिको धातुः । आदिश्च आदिश्च =आदी । भूवौ आदी येषां ते भूवादयः, बहुव्रीहि-समास । प्रथम आदि-शब्द प्रभृति-वचन, द्वितीय
१ कई लोग यहां शङ्का किया करते हैं कि निस् और निर् में तथा दुस् और दुर् में किसी एक का ही पाठ उपसर्गों में करना चाहिये दोनों का नहीं, क्योंकि सान्त भी सर्वत्र ससजुषो रुः (८.२.६६) से रेफान्त ही हो जाया करते हैं । इस का समाधान यह है कि निस्, दुस् में जो सकार को रुँ होता है, उससे असिद्ध होने से प्राप्त कार्य नहीं हो पाते, जैसे —'निरयते, दुरयते' में उपसर्गादयतौ (८.२.१९) से लत्व नहीं होता, क्योंकि उस की दृष्टि में 'र्' असिद्ध है । 'निर्, दुर्' में लत्व हो जाता है—'निलयते, दुलयते' । इस लिये इन्हें भिन्न २ पढ़ा गया है ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६५ वादि-शब्दः प्रकार-वचनः । भू-प्रभृतयो वा-सदृशा इत्यर्थः । वा—धातुना सादृश्यं क्रिया- वाचकत्वेनैव बोध्यम् । अर्थः—(भू-वादयः) क्रिया-वाची भ्वादि (धातवः) धातु- संज्ञक हों । क्रिया काम को कहते हैं । खाना, पीना, उठना, बैठना, करना आदि क्रियाएं हैं । क्रिया अर्थ वाले भ्वादि [यहां केवल भ्वादि-गण ही नहीं समझना चाहिये, अपितु समग्र धातु-पाठ का ग्रहण करना चाहिये] धातु-संज्ञक होते हैं । यहां यदि क्रिया-वाची नहीं कहते तो 'याः पश्यति' (जिन स्त्रियों को देखता है) यहां 'या+शस्' में आतो धातोः (१६७) से आकार का अनिष्ट लोप प्राप्त होता है, क्योंकि भ्वादियों में 'या' का पाठ देखा जाता है । अब क्रिया-वाची कहने से यह दोष नहीं आता; क्योंकि यहां 'या' का अर्थ क्रिया नहीं अपितु 'जो' है । यह टावन्त सर्वनाम है । अब अग्रिम-सूत्र में उपसर्ग और धातु-संज्ञा का फल बतलाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३७) उपसर्गाद् ऋति धातौ ।६।१।८८॥ अवर्णान्तादुपसर्गाद् ऋकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेशः स्यात् । प्रार्च्छति ॥ अर्थः —अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुणः से । 'उपसर्गात्' का विशेषण होने से तदन्त- विधि हो जाती है) । उपसर्गात् ।५।१। ऋति ।७।१। ('धातौ' का विशेषण होने के कारण यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा इस में तदादि-विधि हो जाती है) । धातौ ।७।१। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है)। वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः (आत् = अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (उपसर्गात्) उपसर्ग से (ऋति= ऋकारादौ) ऋकारादि (धातौ) धातु परे होने पर (पूर्व-परयोः) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा— प्रार्च्छति (जाता है) । 'प्र+ऋच्छति' यहां 'ऋच्छ्' (भ्वा० वा तुदा०) यह गमनक्रिया-वाची होने से भूवादयो धातवः (३६) के अनुसार धातु-संज्ञक है; इस के साथ योग होने के कारण उपसर्गाः क्रिया-योगे (३५) सूत्र द्वारा 'प्र' की उपसर्ग-संज्ञा हो जाती है । तो अब 'प्र' इस अवर्णान्त उपसर्ग से 'ऋच्छ्' यह ऋकारादि धातु परे वर्त्तमान है, अतः उरण्रपरः (२६) की सहायता से उपसर्गादृति धातौ (३७) द्वारा पूर्व=अ और पर=ऋ के स्थान पर 'आर्' यह एक वृद्धि आदेश हो कर—प् र् 'आर्' च्छति='प्रार्च्छति' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यह सूत्र भी आद् गुणः (२७) द्वारा प्राप्त गुण एकादेश का अपवाद समझना चाहिये । अभ्यास (८) (१) प्रादि-गण में कितने अजन्त और कितने हलन्त शब्द हैं ? (२) प्रादि-गण में 'उत्' अथवा 'उद्' कौन सा पाठ युक्त है; सप्रमाण लिखें ? (३) 'निस्-निर्' 'दुस्-दुर्' ये दो २ क्यों पढ़े गये हैं ? ल० प्र० (५)
६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(४) भूवादयो धातव सूत्र में वकार का आगमन कैसे और क्यो हो जाता है ? (५) अधोलिखित रूपो मे सोपपत्तिक सूत्र-निर्देश करते हुए सन्धि करें— १ प्र+ऋञ्जते । २ कन्या+ऋञ्जते । ३ परा+ऋध्नोति । ४ बाला+ऋध्नोति । ५ प्र+ऋणोति । ६ न+ऋणोति । ७ उप+ऋच्छन् । ८ पिता+ऋच्छति ।¹ ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३८) एङि पररूपम् ।६।१।९४॥ आदुपसर्गादेङादौ धातौ परे पररूपमेकादेश स्यात्। प्रेजते । उपोषति ॥ अर्थ—अवर्णान्त उपसर्ग से एङादि धातु परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर पररूप एकादेश हो जाता है । व्याख्या—आत् ।१।१। (आद् गुण से । 'उपसर्गात्' का विशेषण होने से तदन्त- विधि हो जाती है)। उपसर्गात् ।५।१। धातौ ।७।१। (उपसर्गादृति धातौ से)। एङि ।७।१। ('धातौ' का विशेषण होने मे यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादि विधि हो जाती है)। पूर्व-परयो ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयो यह अधिकृत है । 'एक' के स्थान पर 'एकम्', 'पररूपम्' का विशेषण होने से किया गया है । अथवा 'आदेश' होने से 'एक' ही रहता है)। पर-रूपम् ।१।१। अर्थ—(आत् = अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (उपसर्गात्) उपसर्ग से (एङि = एङादौ) एङादि (धातौ) धातु परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+ पर के स्थान पर (एकम्) एक (पररूपम्) पररूप आदेश हो जाता है । 'पररूप' से तात्पर्य 'पर' मे है, 'रूप' ग्रहण स्पष्ट प्रतिपत्ति (बोध) के लिये है। उदाहरण यथा— प्रेजते (अत्यन्त चमकता है)। 'प्र+एजते' (एजृँ दीप्तौ धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है²) यहा 'प्र' यह अवर्णान्त उपसर्ग और 'एजते' यह एङादि धातु है । अत पूर्व (अ) और पर (ए) के स्थान पर एक पररूप 'ए' आदेश करने से—प्र् 'ए' जते = 'प्रेजते' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । उपोषति (जलाता है) । 'उप+ओषति' (उष दाहे धातु के लँट् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है) यहा 'उप' यह अवर्णान्त उपसर्ग और 'ओषति' यह एङादि धातु है । अत पूर्व (अ) और पर (ओ) के स्थान पर एक पररूप 'ओ' आदेश करने से—उप् 'ओ' षति='उपोषति' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । यह सूत्र वृद्धिरेचि (३३) सूत्र का अपवाद है । ध्यान रहे कि एति ओर एधति के विषय मे इस का भी अपवाद एत्येधत्यूठ्सु (३४) सूत्र है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६) अचोऽन्त्यादि टि ।१।१।६४॥ अचां मध्ये योऽन्त्य स आदिर्यस्य तट्टिसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थ—अचों मे जो अन्त्य अच्, वह है आदि म जिस के, उस शब्द-समुदाय की टि-सञ्ज्ञा होती है ।
१. यहा सावधानी से सन्धि करनी चाहिये, गुण के उदाहरण भी मिश्रित हैं । २ एजृँ कम्पने परस्मैपदी है अत उस का यहा प्रयोग नही ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६७ व्याख्या—अचः ।६।१। [यहां यतश्च निर्धारणम् (२.३.४१) सूत्र द्वारा निर्धा- रण में षष्ठी-विभक्ति होती है। यथा—'नृणां ब्राह्मणः श्रेष्ठः'। किञ्च यहां जाति में एकवचन हुआ समझना चाहिये]। अन्त्यादि ।१।१। टि ।१।१। समासः—अन्ते भवो- ऽन्त्यः, अन्त्य आदिर्यस्य शब्द-स्वरूपस्य तत् अन्त्यादि, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः— (अचः) अचों के मध्य में (अन्त्यादि) जो अन्त्य अच्, वह है आदि में जिस के ऐसा शब्द- स्वरूप (टि) 'टि' सञ्ज्ञक होता है। यथा—'मनस्' यहां अचों में अन्त्य अच् नका- रोत्तर अकार है, वह जिस के आदि में है ऐसा शब्द-स्वरूप 'अस्' है; अतः इस की इस सूत्र से 'टि' सञ्ज्ञा हो जानी है। एवम्—'पतत्' यहां 'अत्' की, 'आताम्' यहां 'आम्' की, 'ध्वम्' यहां 'अम्' की तथा 'अग्निचित्' यहां 'इत्' की 'टि' सञ्ज्ञा समझनी चाहिये। जहां अन्त्य अच् से परे अन्य कोई वर्ण नहीं होता; वहां केवल उस अन्त्य अच् की ही 'टि' सञ्ज्ञा हो जाती है। यथा—'कुल' यहां अचों में अन्त्य अच् लका- रोत्तर अकार है, यह किसी के आदि में नहीं, यथा देवदत्तस्यैकः पुत्रः स एव ज्येष्ठः स एव कनिष्ठः इस न्यायानुसार अपने ही आदि और अपने ही अन्त में वर्त्तमान है अतः यहां केवल 'अ' की ही 'टि' सञ्ज्ञा होती है [इस विषय का स्पष्टीकरण आद्य- न्तवदेकस्मिन् (२७८) सूत्र की व्याख्या समझने के बाद ही हो सकता है]। अब अग्रिम वार्त्तिक में 'टि' सञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] वा० — (८) शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् ॥ तच्च टेः । शकन्धुः । कर्कन्धुः । कुलटा । मनीषा । आकृतिगणोऽयम् । मार्तण्डः ॥ अर्थः—शकन्धु आदि शब्दों में (उन की सिद्धि के अनुरूप) पररूप कहना चाहिये। (तत्) वह पररूप (टेः) टि (च) और अच् के स्थान पर समझना चाहिये। व्याख्या—शकन्ध्वादिषु ।७।३। पररूपम् ।१।१। वाच्यम् ।१।१। अर्थः— (शकन्ध्वादिषु) शकन्धु आदि शब्दों में (पररूपम्) पररूप (वाच्यम्) कहना चाहिये। शकन्धु आदि बने बनाए अर्थात् पर-रूप कार्य किये हुए शब्द एक गण में मुनिवर कात्यायन ने पढ़े हैं। इस गण का प्रथम शब्द 'शकन्धु' होने से इस गण का नाम शकन्ध्वादिगण है¹। अब इस वार्त्तिक द्वारा कात्यायन जी कहते हैं कि इन में पर-रूप कर लेना चाहिये; इस पर प्रश्न उत्पन्न होता है कि किस के स्थान पर पर-रूप करें ? इस का उत्तर सुतरां यह मिल जाता है कि योग के अनुसार इन को विभक्त कर उन उन के स्थान पर पर-रूप किया जाये, जिन के स्थान पर पर-रूप करने से गणपठित शब्द सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकरण में यह वार्त्तिक पढ़ा गया है उस प्रकरण में 'आत्' और 'अचि' पदों की अनुवृत्ति आ रही है; तथा वह एकः पूर्व-परयोः (६.१.८४) १. इसी प्रकार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिये; यथा—प्रादि-गण, सर्वादि-गण आदि। गणों के पाठ से लाघव होता है; अन्यथा सभी शब्दों को सूत्रों में पढ़ना पड़ेगा। कात्यायनीयगणपाठ भी अद्यत्वे पाणिनीयगणपाठ में मिश्रित मिलता है।
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के' अधिकार के अन्तर्गत है। अतः प्रकरण-वशात् तो यही प्राप्त होता है कि—'पूर्व अवर्ण और पर अच् के स्थान पर एक पर-रूप आदेश हो'। अब यदि प्रकरणानुसार इन के स्थान पर पररूप एकादेश करते हैं तो और तो सब गण-पठित शब्द सिद्ध हो जाते हैं, केवल 'मनीषा' और 'पतञ्जलि' शब्द सिद्ध नहीं होते, क्योंकि यहां 'मनस्+ ईषा' और 'पतत्+अञ्जलि' इस प्रकार छेद होने से अवर्ण नहीं मिलता। अब यदि प्रकरणागत 'अवर्ण' की बजाय 'टि' कर दें [टि और अच् के स्थान पर पररूप एका- देश हो] तो सब शब्द जैसे गण में पढ़े गये हैं वैसे के वैसे सिद्ध हो जाते हैं, कोई दोष नहीं आता। अतः इन शकन्ध्वादिषु में पूर्व=टि और पर= अच् के स्थान पर पर- रूप एकादेश करना ही युक्त है। ग्रन्थकार ने अपने मन में यह सब विचार कर इसी लिये तच्च टेः कहा है। शकन्ध्वादि गण-पठित शब्द यथा— (१) शकन्धु (शकानाम् = देशविशेषाणाम् अन्धु = कूप शकन्धु । गवेषणी- योऽस्य प्रयोग )। 'शक्+अन्धु' यहां ककारोत्तर अकार की अचोऽन्त्यादि टि (३६) सूत्र से 'टि' सञ्ज्ञा हो जाती है। इस टि और 'अन्धु' शब्द के आदि अकार के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर विभक्ति लाने से—शक् 'अ' न्धु— 'शकन्धु' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (२) कर्कन्धु (कर्काणाम् = राजविशेषाणाम् अन्धु = कूप, कर्कन्धु¹ । अन्वे- षणीयोऽस्य प्रयोग ) । 'कर्क + अन्धु' यहां भी पूर्ववत् ककारोत्तर अकार = टि और 'अन्धु' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से—कर्क 'अ' न्धु = 'कर्कन्धु' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। (३) कुलटा (व्यभिचारिणी स्त्री) । 'कुल +अटा' यहां लकारोत्तर अकार = टि और 'अटा' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से—कुल् 'अ' टा = 'कुलटा'² प्रयोग सिद्ध हो जाता है।
१ बेर के वृक्ष का नाम 'कर्कन्धू' है। यह कर्कोपपद डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो०) धातु से औणादिक 'कू' प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इस का निपातन अन्दू- दुम्मू-जम्बू-कफेलू-कर्कन्धू-धिधिए. (६३) इस उणादि सूत्र में किया गया है, कर्कम् = कण्टकं दधातीति कर्कन्धू । यह शब्द पुल्लिंग और स्त्रीलिङ्ग दोनो प्रकार का होता है। 'कर्कन्धु' ऐसा ह्रस्वोवर्णान्त शब्द भी कही २ बेरवाची मिलता है। वहां उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में 'बहुल' ग्रहण के सामर्थ्य से 'कू' प्रत्यय की बजाय 'कु' प्रत्यय समझना चाहिये। बेर-वाची इस 'कर्कन्धु' शब्द का शकन्ध्वा- दिषो में पाठ करना व्यर्थ है, क्योकि वहां 'डुधाञ्' धातु है 'अन्धु' शब्द नहीं। अतः वहा पररूप करने की कोई आवश्यकता ही नहीं। इस में क्षीरस्वामी तथा हेमचन्द्राचार्य आदि का बेरवाचक कर्कन्धुशब्द में पररूप दर्शाना चिन्त्य ही है। २ अट गतौ (भ्वा०) इत्यस्माद् नन्दि-ग्रहि-पचादिभ्यो ल्युणिन्यच (७८६) इति कर्त्तर्यचि अजाद्यतष्टाप् (१२४५) इति टापि अटेति सिध्यति । अटतीत्यटा ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६६ (४) मनीषा (बुद्धि) । 'मनस् + ईषा' यहां अचोऽन्त्यादि टि (३६) से 'अस्' की 'टि' संज्ञा है। इस टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पररूप आदेश करने से— मन् 'ई' पा = 'मनीषा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। ग्रन्थकार ने यहां सम्पूर्ण शकन्ध्वादि-गण नहीं लिखा । निम्न-लिखित शब्द भी इसी गण में आते हैं— (५) हलीषा (हलस्य ईषा = दण्डः, हलीषा । हल का दण्ड) । 'हल + ईषा' यहां लकारोत्तर अकार = टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पर-रूप आदेश करने से— हल् 'ई' पा = 'हलीषा' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। 'मनीषा' की देखादेखी 'हलीषा' का 'हलस् + ईषा' छेद करना भूल है। (६) लाङ्गलीषा (लाङ्गलस्य = हलस्य ईषा = दण्डः = लाङ्गलीषा, हल का दण्ड)। 'लाङ्गल + ईषा' यहां लकारोत्तर अवर्ण = टि और 'ईषा' शब्द के आदि ईकार के स्थान पर 'ई' यह एक पररूप आदेश हो कर— लाङ्गल 'ई' पा = 'लाङ्गलीषा' प्रयोग सिद्ध होता है । (७) पतञ्जलिः (व्याकरणमहाभाष्यकार भगवान् पतञ्जलि) । 'पतत् + अञ्जलि' यहां 'अत्' की 'टि' संज्ञा है। इस टि और 'अञ्जलि' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश हो कर— पत् 'अ' ञ्जलि = 'पतञ्जलिः'² प्रयोग सिद्ध होता है । (८) सारङ्गः (चातक वा हरिण) । 'सार + अङ्ग' यहां रेफोत्तर अवर्ण = टि और 'अङ्ग' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह एक पररूप आदेश करने से —सार् 'अ' ङ्ग = 'सारङ्गः' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि चातक और हरिण अर्थ में ही इस का शकन्ध्वादियों में पाठ है, अन्य अर्थ में शकन्ध्वादियों में पाठ न होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्णदीर्घ हो कर 'साराङ्गः' बन जाता है। अत एव गणपाठ में सारङ्गः पशु-पक्षिणोः ऐसा उल्लेख किया गया है । (६) सीमन्तः (सीमन्तोऽन्तः = सीमन्तः) । 'सीम + अन्त'³ यहां मकारोत्तर अवर्ण = टि और 'अन्त' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह पररूप एकादेश कुलानामता = कुलटा । कुलान्यटतीति विग्रहे तु कर्मण्यणि टिड्ढाणञ्० (१२४७) इति ङीपि कुलाटीति स्यात् । १. ईष गतौ (भ्वा०) इत्यस्माद् भावे गुरोश्च हलः (८६८) इति अ-प्रत्ययः । स्त्रियामित्यधिकारात् ततष्टाप्, मनस ईषा = गतिः, मनीषा । बुद्धेर्मनीषेत्युच्यते । २. पतन् अञ्जलिर्यस्मिन् नमस्कार्यत्वाद् असौ पतञ्जलिः, बहुव्रीहि-समासः । तपस्य- न्त्या गोपीनाम्याः स्त्रिया अञ्जलेः सर्परूपेण पतितोऽयं पतञ्जलिरिति पौराणिक- संवादे तु 'अञ्जलेः पतन्' इति विग्रहः; तत्र च मयूर-व्यंसकादित्वात् समासः । ३. यहां समास में विभक्ति-लोप होने से पदत्व के कारण न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो जाता है ।
७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
करने से—सीमन् अ' न्त = 'सीमन्त' प्रयोग सिद्ध हो जाता है । केशों की सीमा के अन्त अर्थात् मांग को 'सीमन्त' कहते हैं । स्त्रिया जब कङ्घी द्वारा बाल सवारती हैं तो बालों के मध्य जो रेखा सी हो जाती है उसे सीमन्त या मांग कहते हैं । सीमन्तः केशवेशे (गणपाठ) — 'मांग' से भिन्न अर्थ मे इस का शकन्ध्वादि-गण में पाठ न होने के कारण अकः सवर्णे दीर्घ (४२) से सवर्ण दीर्घ हो कर सीमान्त' (भूमि आदि की सीमा का अन्त) प्रयोग बनेगा । आकृति-गणोऽयम् । आकृत्या = स्वरूपेण = कार्य-दर्शनेन गण्यते = परिचीयत इति आकृति-गण । अर्थ — (अयम्) यह शक्न्धु आदि शब्दा का समूह (आकृति-गण ) आकृति से गिना जाता है । इस का भाव यह है कि शकन्ध्वादि जितने शब्द गण मे पढ़े गये हैं, ये इतने ही हैं, ऐसा नही समझना चाहिये । किन्तु जिस २ शब्द मे पर- रूप-कार्य हुआ दीखे पर कोई विधायक वचन न हो उसे शकन्ध्वादि-गण मे गिन लेना चाहिये' । यथा—'मार्तण्ड' शब्द लोक मे प्रसिद्ध है, इस मे पररूप हुआ मिलता है, अत इसे भी शकन्ध्वादिगण के अन्तर्गत समझना चाहिये । इस की साधन-प्रक्रिया यथा— 'मृतञ्चाऽदोऽण्डम्' इस कर्मधारय-समास मे विभक्तियों का लुक् हो कर 'मृत+अण्ड' हो जाता है। अब तकारोत्तर अवर्ण तथा 'अण्ड' शब्द के आदि अकार के स्थान पर 'अ' यह पररूप एकादेश करने से मृत् 'अ' ण्ड = 'मृतण्ड' बन जाता है । मृतण्डे भव = मार्तण्ड,२ यहा तत्र भवः (१०८६) से अण्, तद्धितेष्वचामादे (६३८) से आदि-वृद्धि तथा यस्येति च (२३६) से अकार का लोप हो जाता है । केचिदत्र—मृत्तोऽण्डो यस्य स = मृतण्ड, मृतण्डस्य अपत्यम् = मार्तण्ड, तस्यापत्यम् (१००१) इत्यण् इत्येव विगृह्णन्ति । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४०) ओमाङोश्च ।६।१।९२॥ ओमि आङि चात् परे पररूपमेकादेश स्यात् । शिवायोन्नमः । 'शिव
- एहि' इति स्थिते— अर्थ —अवर्ण से ओम् अथवा आङ् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर एक पर रूप आदेश हो जाता है । व्याख्या—आत् ।५।१। (आद् गुण मे) । ओमाङो ।७।२। च इत्यव्ययपदम् । पूर्व-परयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः पूर्व-परयो. यह अधिकृत है) । पर-रूपम् ।१।१। (एङि पररूपम् से) । समास —ओम् च आङ् च =ओमाङौ, तयो =ओमाङो, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ —(आत्) अवर्ण से (ओमाङो) ओम् अथवा आङ् परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (पररूपम्) पररूप (एक ) एकादेश हो जाता १. इस गण के आकृति-गण होने में प्रोपाभ्या समर्थाभ्याम् (१ ३ ४२) [सम्+ अर्थाभ्याम्], व्यवहृपणो समर्थयो. (२ ३ ५७) [सम् +अर्थयो ] इत्यादि पाणिनि के निर्देश प्रमाण हैं । २ मार्त्तण्ड =मरे हुए अण्डे मे होने वाला=सूर्य, इस की क्या मार्कण्डेय-पुराण के १०५वें अध्याय मे देखें ।