लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ४६७ प्रयोग सिद्ध होता है । इसीप्रकार आगे भी अजादि विभक्तियों में प्रक्रिया होती है । ‘विद्वस् + भ्याम्’ यहां वसुस्रंसु० (२६२) से पदान्त सकार को दकार होकर —विद्वद्भ्याम् । इसीप्रकार अन्य हलादि विभक्तियों में भी । हे विद्वस् + स् । यहां नुँम्, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप करने से—हे विद्वन् । सम्बुद्धि परे होने से सान्तमहतः० (३४२) से दीर्घ न होगा । विद्वस् (विद्वान्) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० विद्वान् विद्वांसौ विद्वांसः | प० विदुषः विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः द्वि० विद्वांसम् ,, विदुषः | ष० ,, विदुषोः विदुषाम् तृ० विदुषा विद्वद्भ्याम् विद्वद्भिः | स० विदुषि ,, विद्वत्सु च० विदुषे ,, विद्वद्भ्यः | सं० हे विद्वन्! हे विद्वांसौ! हे विद्वांसः! इसीप्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप होते हैं— शब्द अर्थ प्रत्यय शस् का रूप १. ऊषिवस् रह चुका क्वसुँ ऊषुपः१ २. तस्थिवस् ठहर चुका ,, तस्थुषः ३. सेदिवस् गमन कर चुका ,, सेदुषः ४. प्रसेदिवस् प्रसन्न हो चुका ,, प्रसेदुषः ५. निपेदिवस् बैठ चुका ,, निपेदुषः ६. निपेतिवस् गिर चुका ,, निपेतुषः ७. ददिवस् दे चुका ,, ददुषः ८. शुश्रुवस् सुन चुका ,, शुश्रुवुषः२ ९. उपेयिवस् प्राप्त कर चुका ,, उपेयुषः १०. अनाश्वस् भोजन न कर चुका ,, अनाशुषः ११. दाश्वस् दे चुका ,, दाशुषः १२. अधिजिग्मिवस् प्राप्त कर चुका ,, अधिजिग्मुषः इस सूत्र में ‘वस्’ धातु ही इष्ट है आदेश वा प्रत्यय नहीं । अतः यहां आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से ही षत्व करना चाहिये । १. इन में यथासम्भव प्राप्त इट् आगम भसञ्ज्ञकों में प्रवृत्त नहीं होता । अकृतव्यूहाः पाणिनीयाः (५०) अर्थात् इस व्याकरण शास्त्र में निमित्त को विनाशोन्मुख देख कर तत्प्रयुक्त कार्य नहीं करना चाहिये । जब ‘वसुँ’ प्रत्यय, भसञ्ज्ञकों में वकार को सम्प्रसारण हो जाने से वलादि ही नहीं रहता तब तत्प्रयुक्त कार्य वलादि- लक्षण इट् आगम भी नही होता । २. शुश्रुवस् + अस् (शस्) में सम्प्रसारण और पूर्वरूप हो कर ‘शुश्रुउस् + अस्’ इस दशा में अचि श्नु० (१६६) से धातु के उकार को उवँङ् हो जाता है ।
४६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ईयसुन्प्रत्ययान्तों के रूप भी प्राय 'विद्वस्' शब्द की तरह होते हैं। केवल शसादियों में सम्प्रसारणकार्य तथा भ्याम् आदि मे दत्त्व नहीं होता। निदर्शनार्थ 'श्रेयस्' (दोनों में अधिक अच्छा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांस प० श्रेयस श्रेयोभ्याम् श्रेयोभ्यः द्वि० श्रेयांसम् " श्रेयस प० ,, श्रेयसो. श्रेयसाम् तृ० श्रेयसा श्रेयोभ्याम्‡ श्रेयोभि स० श्रेयसि " श्रेयस्सु, -स्सु† च० श्रेयसे " श्रेयोभ्य स० हे श्रेयन् ! श्रेयांसौ ! श्रेयांसः !- ‡ ससजुषो रुः (१०५), हशि च (१०७) । † वा शरि (१०४) । इसीप्रकार निम्नस्थ ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्दों के रूप बनते हैं— १ अणीयस् = दोनों में अधिक सूक्ष्म | १५ नेदीयस् = दोनों में अधिक निकट २ अल्पीयस् = दोनों में अधिक थोड़ा | १६ पटीयस् = दोनों में अधिक चतुर ३, ऋजीयस् = दोनों में अधिक सरल | १७ पापीयम् – दोनों में अधिक पापी ४. कनीयम् = { दोनों में अधिक युवा | १८ प्रथीयरू = दोनों मे अधिक विस्तृत { दोनों मे अधिक छोटा | १६ प्रेयस् = दोनो में अधिक प्रिय ५ क्रशीयस् = दोनों में अधिक कृश | २०, बलीयस् = दोनों में अधिक बलवान् ६ क्षेपीयस् = दोनों में अधिक तेज | २१ भूयम् = दोनो में अधिक मात्रा वाला ७ क्षोदीयस् = दोनों में अधिक क्षुद्र | २२ महीयस् = दोनों में अधिक बड़ा ८ गरीयस् = दोनों में अधिक भारी | २३. म्रदीयम् = दोनों में अधिक मृदु ६. जवीयस् = दोनों में अधिक वेगवान् | २४ यवीयम् = दोनों में अधिक युवा १०. ज्यायस् = { दोनों में अधिक प्रशस्य | २५ लघीयम् = दोनों में अधिक छोटा { दोनों में अधिक वृद्ध | २६. वरीयस् = दोनों में अधिक विशाल ११ दवीयस् = दोनों में अधिक दूर | २७. साधीयस् = दोनों में अधिक अच्छा १२ द्रढीयस् = दोनों में अधिक दृढ | २८. स्थवीयस् = दोनों में अधिक स्थूल १३ द्राघीयम् = दोनों में अधिक दीर्घ | २६. स्थेयस् = दोनों में अधिक स्थिर १४ धनीयम् = दोनों में अधिक धनी | ३०. ह्रसीयस् = दोनों में अधिक छोटा नोट–जब ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में आते हैं तब उगिदचश्च (१२४६), से ङीप् प्रत्यय होकर – श्रेयसी, अल्पीयसी, कनीयसी, प्रभृति शब्द बन जाते हैं। वसुं- प्रत्ययान्तों में भी स्त्रीत्व में ङीप् होता है परन्तु सम्प्रसारण विशेष होता है। यथा— विदुषी, स्तुषी आदि । इन सब का उच्चारण नदीशब्दवत् समझना चाहिये। नपुंसक में वस्वन्तों को पदान्त मे दत्व होगा - विद्वत्, विदुषी, विद्वांसि आदि। [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५४) पुंसोऽसुङ् ।७।१।८६॥ सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुसोऽसुङ् स्यात् । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसौ । पुंसः । पुम्भ्याम् । पुंसु ॥ अर्थ.—सर्वनामस्थान की विवक्षा हो तो 'पुस्' को असुङ् आदेश होता है। व्याख्या—सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । पुमः ।६।१।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६६ असुँङ् ।१।१। 'सर्वनामस्थाने' में परसप्तमी मानने से 'परमपुमान्' यहां अनिष्ट स्वर प्राप्त होता है । अतः विषय-सप्तमी मान कर 'विवक्षिते' का अध्याहार कर लेते हैं। अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान विवक्षित होने पर (पुंसः) पुंस् शब्द के स्थान पर (असुंङ्) असुंङ् आदेश हो जाता है । सर्वनामस्थान (सुं, औ, जस्, अम्, औट्) लाने से पूर्व उस के लाने की इच्छा- मात्र होने पर ही असुंङ् आदेश हो जाता है। असुंङ् डित् है, अतः वह ङिच्च (४६) द्वारा 'पुंस्' के अन्त्य अल्-सकार के स्थान पर होता है । पुंस् (पुरुष)। पूञ् पवने(भ्वा० उभ०) धातु से पूजो डुम्सुन्¹(उणा० ६१८) द्वारा 'डुम्सुन्' प्रत्यय हो कर उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में बहुलग्रहणसामर्थ्य से आदिर्निटुडवः(४६२) द्वारा डु की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु चुटू (१२६) से केवल डकार की ही इत्सञ्ज्ञा होकर उस का तथा उँन् अनुबन्ध का लोप करने से—पू+ उम्स् । डित्त्वकरणसामर्थ्य से टि का भी लोप हो कर—प्+उम्स्=पुम्स् । अब नश्चापदान्तस्य झलि (७८) द्वारा अपदान्त मकार को अनुस्वार करने पर 'पुंस्' शब्द निष्पन्न होता है । अब 'सुं' सर्वनामस्थान करने की इच्छामात्र में, प्रत्यय करने से पूर्व हीं पुंसो- ऽसुंङ् (३५४) द्वारा सकार को असुंङ् आदेश होने पर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः से अनुस्वार भी अपने पूर्वस्वरूप मकार में परिणत हुआ—पुमस् । अब सुंप्रत्यय लाने पर उगिदचांम्०(२८६) से नुँम्, अनुबन्धलोप, सान्तमहत ० (३४२) से दीर्घ, सुंलोप तथा संयोगान्तलोप होकर—'पुमान्' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्बुद्धि में केवल सान्तमहतः०(३४२) से दीर्घ नहीं होता शेष सब प्रक्रिया सुंप्रत्ययवत् जानें—हे पुमन् ! । पुंस्+औ=पुमस्+औ । नुँम्, दीर्घ तथा अनुस्वार होकर—पुमांसौ । इसी प्रकार अन्य सर्वनामस्थान प्रत्ययों में भी जान लें । अब आगे शसादि विभक्तियों की विवक्षा में असुँङ् न होगा । पुंस्+अस् (शस्) = पुंसः । पुंस्+भ्याम् । यहां संयोगान्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्त² सकार का लोप होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार अनुस्वार पुनः मकाररूप में परिणत हो जाता है—पुम्+भ्याम् । अब मोऽनुस्वारः (७७) से पदान्त मकार को १. 'पातेर्डुम्सुन्' इति पाठान्तरम् । सूतेः सस्य पः ह्रस्वो म्सुंप्रत्यय इति स्त्रियामिति सूत्रे भाष्य उक्तम् । न्यासे तु—'पुनातेर्मक्सुँन् ह्रस्वश्चे'ति पठितम् । उपेयप्रति- पत्त्यर्था उपाया अव्यवस्थिता इति तत्त्वम् । २. अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय) की गणना अट्- प्रत्याहार तथा शर्प्रत्याहार में भाष्यकार ने स्वीकार की है । इस से अनुस्वार को हल् मान कर हलोऽनन्तराः संयोगः(१३) से संयोगसञ्ज्ञा हो जाती है ।
४७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अनुस्वार तथा वा पदान्तस्य (८०) द्वारा उसे विकल्प करके परसवर्ण—मकार करने मे—'पुम्भ्याम्, पुभ्याम्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। पुस् + सुप् । संयोगान्तलोप, अनुस्वार की मकाररूप मे परिणति तथा मोऽनु- स्वार (७१) से अनुस्वार होकर 'पुंसु'। यहा यय् परे न रहने से वा पदान्तस्य (८०) प्रवृत्त नही होता'। 'पुम्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० पुमान् पुमांसौ पुमांस प० पुस पुम्भ्याम् पुम्क्य द्वि० पुमासम् ,, पुंसः प० ,, पुंसो पुंसाम् तृ० पुंसा पुम्भ्याम्† पुम्भि स० पुंसि ,, पुंसु च० पुंस ,, पुम्भ्य सं० हे पुमन् ! हे पुमांसौ ! हे पुमास ! † भ्याम्, भिस् और भ्यस् मे अनुस्वारपक्षीय रूप भी न भूलें। [लघु०] ऋदुशनस्० (२०५) इत्यनङ् । उशना । उशनसौ ॥ व्याख्या—उशनस् (शुक्राचार्य)। शुक्रो दैत्यगुरु काव्य उशना भार्गव कवि — इत्यमर' । वश कान्तौ (अदा० प०) धातु से वशे कनसिं (उणा० ६७८) द्वारा 'कनसिं' प्रत्यय तथा ग्रहिज्या० (६३४) से सम्प्रसारण और सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप होकर 'उशनम्' शब्द निष्पन्न होता है। उशनस् + सुँ । यहा ऋदुशनस्० (२०५) सूत्र से सकार को अनङ् आदेश होकर अङ् अनुबन्ध के लुप्त हो जाने पर—उशन अनू + सु । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—उशनन् + सु । सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से नान्त की उपधा को दीर्घ हो—उशनान् + सु्। हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) सूत्र से सुंलोप तथा न लोप ० (१८०) से नकार का भी लोप होकर—'उशना' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार उशनम् + औ = उशनसौ । इत्यादि । हे उशनम् + स् । यहां अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२८) अस्य सम्बुद्धौ वाऽनङ् नलोपश्च वा वाच्यः॥ हे उशन ! , हे उशनन् ! , हे उशनः ! । हे उशनसौ ! । उशनोभ्याम् । उशन सु, उशनस्सु ॥ अर्थ—सम्बुद्धि परे होने पर उशनस् शब्द के सकार को विकल्प से अनङ् आदेश हो तथा नकार का लोप भी विकल्प से हो। १. जनश्रुति है कि अनुभूतिस्वरूपाचार्य के मुख से एक वार पण्डितसभा मे 'पुंसु' के स्थान पर 'पुक्षु' प्रयोग उच्चरित हो गया । पण्डितो ने इस पर उन का बहुत उपहास किया । इस उपहास से खिन्न होकर उन्होंने 'पुंक्षु' प्रयोग की साधुता के लिये सरस्वती देवी की कृपा से अपना नया व्याकरण (सारस्वतव्याकरण) रचा। इस मे उन्होंने असम्भवे पुंसः कक् सौ सूत्र बना कर सप्तमीबहुवचन के परे रहते पुस् के अन्त में क्क् का आगम कर सयोगमध्यगत सकार का किसी तरह लोप कर 'पुंक्षु' की सिद्धि दर्शाई है।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७१ व्याख्या—सम्बुद्धि में 'हे उशनस् + स्' यहां प्रकृतवार्त्तिक से उशनस् के सकार को विकल्प कर के अनँङ् आदेश हो कर अनँङ्पक्ष में अनुबन्धलोप, पररूप, सुंलोप तथा नकार का वैकल्पिक लोप करने से—'हे उशन, हे उशनन्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। अनँङ् के अभाव में सुंलोप, रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर—'हे उशनः' यह एक रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार कुल मिला कर सम्बुद्धि में तीन रूप बनते हैं— अनँङ्पक्षे (नकारलोपे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (१) हे उशन ! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ " (नकारलोपाऽभावे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (२) हे उशनन्! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ अनँङोऽभावे $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (३) हे उशनः! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ काशिका में यहां एक सुन्दर प्राचीन श्लोक दिया हुआ है— सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम् । माध्यन्दिनिर्वष्टि गुणं त्विगन्ते नपुंसके व्याघ्रपदां वरिष्ठः॥ नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि इस वार्त्तिक का उल्लेख महाभाष्य में कहीं नहीं आया। कौमुदीकार ने काशिका का भावानुवाद प्रस्तुत किया प्रतीत होता है। अत एव कई लोग इसे प्रमाण नहीं मानते। उशनस् + भ्याम्। यहां पदान्त में ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुणः (२७) से गुण होकर—उशनोभ्याम्। उशनस् + सुप्। यहां पदान्त में रुँत्व, खरवसानयोः० (६३) से विसर्ग आदेश हो विसर्जनीयस्य सः(१०३) सूत्र से सकार के प्राप्त होने पर उस के अपवाद वा शरि (१०४) सूत्र से वैकल्पिक विसर्ग आदेश करने से—'उशनःसु, उशनस्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा उशना उशनसौ उशनसः द्वितीया उशनसम् " " तृतीया उशनसा उशनोभ्याम् उशनोभिः चतुर्थी उशनसे " उशनोभ्यः पञ्चमी उशनसः " " षष्ठी " उशनसोः उशनसाम् सप्तमी उशनसि " उशनःसु, उशनस्सु सम्बोधन हे उशन, उशनन्, उशनः! हे उशनसौ ! हे उशनसः ! [लघु०] अनेहा । अनेहसौ । हे अनेहः ! ॥ व्याख्या—अनेहस् = (समय)। कालो दिष्टोऽप्यनेहापि — इत्यमरः। 'नञ्' उपपद वाली हन हिंसा-गत्योः (अदा० प०) धातु से नञि हन एह च (उणा० ६६३) सूत्र द्वारा 'असि' प्रत्यय तथा हन् को 'एह' आदेश होकर नञ्कार्य करने से—'अनेहस्' १. शेखरकार तथा बालमनोरमाकार का अनेहस् शब्द को असुँन्नन्त लिखना ठीक नहीं, क्योंकि तब उगिदचाम्० (२८६) द्वारा नुँम् प्रसक्त होगा।
४७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां शब्द निष्पन्न होता है। इसकी प्रक्रिया भी 'उशनस्' शब्दवत् होती है केवल सम्बुद्धि मे इस का एक रूप बनता है। रूपमाला यथा— प्र० अनेहा† अनेहसौ अनेहस | प० अनेहस अनेहोभ्याम् अनेहोभ्य द्वि० अनेहसम् ,, , | ष० ,, अनेहसो अनेहसाम् तृ० अनेहसा अनेहोभ्याम्‡ अनेहोभि | स० अनेहसि ,, अनेह सु-स्सु* च० अनेहस ,, अनेहोभ्य | स० हे अनेह । @ अनेहसौ। अनेहस । †ऋदुशनस्० (२०५) से अनङ्, अनुबन्धलोप, पररूप, नान्त की उपधा को दीर्घ, सुँलोप तथा नलोप होकर— 'अनेहा' सिद्ध होता है। ‡ससजुषो रुँ (१०५), हशि च (१०७), आव्गुण (२७) । *रुँत्व विसर्ग होकर वा शरि (१०४) प्रवृत्त हो जाता है । @सुँलोप, रुँत्व तथा अवसान मे रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया तथा रूपमाला वाला केवल एक ही शब्द है— पुरुदमस् । इस का वेद मे ही प्रयोग देखा जाता है । इस का अर्थ 'इन्द्र' आदि है। 'बहुत कर्मों वाला' इस अर्थ मे यह विशेषणवाची होने से त्रिलिङ्गी है। इसे वैदिक समझ कर ही कौमुदीकार ने सम्भवत इस का उल्लेख नही किया । [लघु०] वेधा । वेधसौ ।'हे वेध '। वेधोभ्याम् ॥ व्याख्या—वेधस् = (ब्रह्मा) । स्रष्टा प्रजापतिर्वेधा इत्यमरः । विपूर्वकं डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो० उभ०) धातु से विधाञो वेध च (उणा० ६६४) इस औणा- दिकसूत्र द्वारा 'असिँ' प्रत्यय तथा सोपसर्ग 'धा' को 'वेध्' आदेश होकर 'वेधस्' शब्द निष्पन्न होता है । वेधस् + सुँ । असन्तस्य चाधातो (३४३) मे दीर्घ, हल्ङ्याब्भ्यो ०(१७६) से सुँलोप तथा प्रकृति के सकार को रुँत्व विसर्ग करने से—वेधा । अन्य विभक्तियो मे 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया जानें । रूपमाला यथा— प्र० वेधा वेधसौ वेधस | प० वेधस वेधोभ्याम् वेधोग्य द्वि० वेधसम् ,, ,, | ष० ,, वेधसो वेधसाम् तृ० वेधसा वेधोभ्याम्† वेधोभि | स० वेधसि ,, वेध सु,-स्सु च० वेधसे ,, वेधोग्य | स० हे वेध । * वेधसौ । वेधस । †रुँत्व, उत्व तथा गुण हो जाता है । *सुँलोप, रुँत्व तथा विसर्ग होते हैं । इसीप्रकार—१. वनौकस् (बन्दर), २ दिवौकस् (देवता), ३ हिरण्यरेतस् (सूर्य वा अग्नि), ४ चन्द्रमस् (चन्द्रमा), ५. सुमनस् (देवता), ६ प्रचेतस् (वरुण), ७ सुमेधस् (अच्छी बुद्धि वाला), ८ नृचक्षस् (मनुष्यों पर दृष्टि रखने वाला । अथर्व०), ९ जातवेदस् (अग्नि), १० अङ्गिरस् (एक ऋषि) ११. विश्ववेदस् (सब कुछ जानने वाला), १२ पुरोधस् (पुरोहित), १३ वयाधस् (तरुण, जवान) १४.
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७३ दुर्वासस् (एक ऋषि), १५. विमनस् (दुःखी पुरुष), १६. विडौजस् (इन्द्र) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं।¹ अदस् (वह-दूरवर्त्ती पदार्थ जिसका अङ्गुली से निर्देश नहीं किया जा सकता)। न दस्यते = उत्क्षिप्यतेऽङ्गुलिर्यत्र-इस विग्रह में नञ्पूर्वक दस् धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'अदस्' शब्द निष्पन्न होता है। त्यदादियों के अन्तर्गत होने के कारण इस की सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) द्वारा सर्वनामसंज्ञा होती है। यह शब्द त्रिलिङ्गी है। यहां पुंलिङ्ग में इस की सुबन्त-प्रक्रिया का निरूपण करते है— [लघु०] विधि-सूत्रम्- (३५५) अदस औ सुँलोपश्च ॥७।२।१०७॥ अदस औत् स्यात् सौ परे सुँलोपश्च। तदोः० (३१०) इति सः। असौ। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। वृद्धिः॥ अर्थः-सुँ परे होने पर अदस् शब्द के अन्त्य सकार को औकार तथा सुं का लोप हो जाता है। व्याख्या-सौ ।७।१। (तदोः सः सावनन्त्ययोः से)। अदसः ।६।१। औ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। सुंलोपः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। समासः--सोर्लोपः = सुलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः- (सौ) सुँ परे होने पर (अदसः) अदस् शब्द के स्थान पर (औ) 'औ' आदेश होता है (च) तथा (सुंलोपः) सुँ का भी लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह औकार आदेश अन्त्य अल् सकार के स्थान पर होगा। 'अदस औ' इस अंश में यह सूत्र त्यदादीनामः (१६३) सूत्र का अपवाद है। अदस् + सुँ। यहां त्यदादीनामः (१६३) के प्राप्त होने पर अदस औ सुँलो- पश्च (३५५) सूत्र से सकार को औकार तथा सुं का लोप होकर - अद+औ। वृद्धि- रेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने से- 'अदौ'। अब प्रत्ययलक्षण द्वारा लुप्त हुए सुँ- प्रत्यय को मान कर तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) सूत्र से दकार को सकार करने पर- 'असौ' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि 'अदौ' इस अवस्था में अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) सूत्र भी प्राप्त होता है परन्तु तदोः सः० (७.२.१०६) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध होने से वह प्रवृत्त नहीं होता। अदस् + औ। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से सकार को अकार तथा अतो १. यहां यह ज्ञातव्य है कि असन्त शब्द में 'अस्' यदि धातु का अवयव होगा तो अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) सूत्र में 'अधातोः' कथन के कारण उस असन्त की उपधा को दीर्घ न होगा। यथा-सुपूर्वक वस् आच्छादने (अदा० आ०) धातु से क्विन् प्रत्यय करने पर 'सुवस्' (अच्छी तरह ढांपने वाला) शब्द निष्पन्न होता है। यह शब्द असन्त तो है पर इस के अन्त में 'अस्' यह 'वस्' धातु का अवयव है अतः 'सुवस्+स्' में उपधादीर्घ न होगा, सुंलोप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से- सुवः, सुवसौ, सुवसः - आदि रूप बनेगे। इसी प्रकार पिण्ड- ग्रस्, पिण्डग्लस् (पिण्ड खाने वाला) आदि शब्दों के रूप समझने चाहियें।
गुणे (२७४) से पररूप कर—'अद्+औ'। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर—'अदौ'। इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(३५६) अदसोऽसेर्दादु दो मः ॥८।२।८०॥ अदसोऽमान्तस्य दात् परस्य उदूतो स्तो दस्य मश्च। आन्तरतम्याद् ह्रस्वस्य-उ, दीर्घस्य-ऊ। अमू। जस शी (१५२)। गुण ॥ अर्थ --जिस के अन्त में सकार न हो ऐसे अदस् शब्द के दकार से पर वर्ण को उकार और ऊकार हो जाता है तथा दकार को मकार भी होता है। व्याख्या—अदस ।६।१। असे ।६।१। दात् ।५।१। उ ।१।१। द ।६।१। मः ।१।१। (मकारादकार उच्चारणार्थं) । समास—नास्ति सि = सकार (सकाराद् इकार उच्चारणार्थ ) यस्मिन् स =असि, तस्य =असे । नञ्बहुव्रीहिसमास. । यह 'अदस' का विशेषण है। अदस् शब्द के अन्त में सकार होता है अत यहां असकारान्त अदस् शब्द का ग्रहण अभिप्रेत है। उश्च ऊश्च=उ, समाहारद्वन्द्व । अर्थ -(असे.) असान्त अर्थात् जिस के अन्त में सकार विद्यमान नही ऐस (अदस ) अदस् शब्द के (दात्) दकार स पर वर्ण के स्थान पर (उ) उकार या ऊकार आदेश हो जाता है तथा (द ) दकार के स्थान पर (म ) म् आदेश भी हो जाता है। असान्त अदस् शब्द के दकार से परे वाला वर्ण प्राय ह्रस्व या दीर्घ हुआ करता है¹। स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ह्रस्व वर्ण के स्थान पर ह्रस्व उकार तथा दीर्घ वर्ण के स्थान पर दीर्घ ऊकार होगा²। 'अदौ' यहां असान्त अदस् शब्द के दकार से परे दीर्घ ओकार विद्यमान है। अत प्रकृतसूत्र से ओकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + अस् (जस्) । यहा त्यदादीनाम (१६३) से सकार को अकार, अतो गुणे (२७४) से पररूप, जसः शी (१५२) से जस् को शी तथा आदगुण (२७) सूत्र से गुण होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) से प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५७) एत ईद् बहुवचने ॥८।२।८१॥ अदसो दात्परस्य एत ईद्, दस्य च मो बहुह्वर्थोक्तौ। अमी। पूर्वत्रा- १. कही-कही 'हल्' भी पाया जाता है, जैस—अदद्र्यङ्, अमुमुयङ्। यहा दकार से परे 'र्' है। २. आन्तर्य अर्थात् सादृश्य चार प्रकार का होता है—यह हम पीछे स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र पर लिख चुके हैं। यहाँ प्रमाणकृत (मात्राकृत) आन्तर्य द्वारा ह्रस्व के स्थान पर ह्रस्व तथा दीर्घ के स्थान पर दीर्घ आदेश होता है। दकार से परे यदि हल् हो तो उसे भी ह्रस्व उकार आदेश होता है।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७५ सिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चाद् उत्व-मत्वे । अमुम् । अमू । अमून् । मुत्वे कृते घिसञ्ज्ञायां नाभावः ॥ अर्थः— अदस् शब्द के दकार से परे एकार को ईकार तथा दकार को मकार हो जाता है बहुत अर्थों की उक्ति में । व्याख्या—अदसः ।६।१। दात् ।५।१। (अदसोऽसेर्दादु० से) । एतः ।६।१। ईत् ।१।१। दः ।६।१। मः ।१।१। (अदसोऽसेः० से) । बहुवचने ।७।१। समासः—बहूनां वचनम्—उक्तिः=बहुवचनम्, तस्मिन्=बहुवचने । षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अर्थः— (बहुवचने) बहुत्व की विवक्षा में (अदसः) अदस् शब्द के अवयव (दात्) दकार से परे (एतः) 'ए' के स्थान पर (ईत्) 'ई' आदेश हो जाता है तथा (दः) उस दकार के स्थान पर भी (मः) 'म्' आदेश हो जाता है । 'अदे' यहां प्रकृतसूत्र से एकार को ईकार तथा दकार को मकार होकर— 'अमी' प्रयोग सिद्ध होता है । अदस् + अम् । यहां त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—'अद + अम्' । अब यहां अमि पूर्वः (६.१.१०३) से पूर्वरूप तथा अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) से उत्व- मत्व युगपत् प्राप्त होते हैं । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा उत्वमत्वविधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' बन जाता है । तदनन्तर उत्व-मत्व हो 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध होता है । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चादुत्वमत्वे । अर्थात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र से—अदसोऽसेः० (३५६) तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम अमि पूर्वः (१३५) आदि सूत्रों द्वारा विभक्तिकार्य होगा तदनन्तर उन सूत्रों की प्रवृत्ति होगी । परन्तु अब इस पर यह विचार उपस्थित होता है कि क्या पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से कार्य असिद्ध किया जाता है या शास्त्र असिद्ध ? यदि किये हुए कार्य को असिद्ध मानेंगे तो प्रथम कार्य का विद्यमान होना आवश्यक होगा; क्योंकि यदि कार्य ही विद्यमान न रहेगा तो पुनः वह असिद्ध कैसे हो १. यहां 'बहुवचन' शब्द से पारिभाषिक बहुवचन—जस्, शस् आदि का ग्रहण नहीं करना चाहिये । क्योंकि वैसा अर्थ करने से 'अदेभ्यः=अमीभ्यः, अदेभिः= अमीभिः' आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर भी 'अदे=अमी' यहां प्रयोगसिद्धि न हो सकेगी । क्योंकि 'अदे' में एकार स्वयं बहुवचन है इस से परे अन्य कोई बहुवचन नहीं है । अतः यहां 'बहुवचने' पद को यौगिक स्वीकार कर 'बहुतों की उक्ति अर्थात् बहुत्व की विवक्षा में' ऐसा अर्थ करना उचित है । इस अर्थ से 'अदे' आदि सब स्थानों पर बहुत्व की विवक्षा वर्तमान रहने से कोई दोष प्राप्त नहीं होता । इस सूत्र पर भाष्यकार ने लिखा है—नेदं पारिभाषिकस्य बहुवचन- स्य ग्रहणम् । किन्तर्हि ? अन्वर्थग्रहणमेतत् । बहूनामर्थानां वचनम्=बहुवचनम् ।
सकेगा ? अतः कार्यासिद्धपक्ष में प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र के बल से भावी असिद्ध कार्य कर चुकने पर पश्चात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से वह पूर्व की दृष्टि में असिद्ध होगा अन्यथा नहीं। इस पक्ष में 'अद + अम्' यहां प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (३१) द्वारा पूर्वरूप की अपेक्षा पर होने से उत्व-मत्व होकर—'अमु + अम्' बन जायगा। तदनन्तर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा मुकार्य को पूर्वरूप की दृष्टि में असिद्ध माना जायगा। अब इस मुकार्य के असिद्ध मान जाने पर भी पूर्वरूप नहीं हो सकेगा, क्योंकि- देवदत्तस्य हन्तरि हते देवदत्तस्य पुनरुन्मज्जनं न भवति अर्थात् देव- दत्त के हन्ता के मारे जाने पर भी देवदत्त की पुनरुत्पत्ति नहीं हो सकती। इस न्याया- नुसार 'द' के हन्ता 'मु' के असिद्ध होने पर भी पुनः 'द' नहीं आ सकेगा, क्योंकि उस का तो विनाश हो चुका है। इस प्रकार 'द' के न आने से अक् नहीं मिलेगा तब अमि पूर्वः (१३५) द्वारा पूर्वरूप न हो सकेगा। अतः यह पक्ष ठीक नहीं। अब यदि शास्त्रासिद्धपक्ष स्वीकार करते हैं तो इस पक्ष में दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा परशास्त्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। इस से पूर्वके सवासप्त अध्यायों के सूत्रों की दृष्टि में वह सूत्र नहीं रहता, उस के न रहने से विप्रतिषेध नहीं हो सकता, क्योंकि विप्रतिषेध वहां होता है जहां अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाश सूत्र परस्पर की दृष्टि में भावात्मक होते हुए एक स्थान पर प्राप्त हों। यहां पूर्व की दृष्टि में पर सूत्र अभावात्मक होने से वर्तमान नहीं रहता अतः प्रथम पूर्वसूत्र प्रवृत्त होता है और तदनन्तर असिद्ध सूत्र। इस प्रकार इस पक्ष के स्वीकार करने में 'अद + अम्' यहां पर अदसोऽसे ० तथा अमि पूर्वं इन दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा अमि पूर्वं (६।१।१०२) की दृष्टि में अदसोऽसे० (८।२।८०) सूत्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। अतः प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' हो जाने पर पश्चात् उत्व-मत्व करने से 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार कोई दोष उत्पन्न नहीं होता। अतः पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र में शास्त्रासिद्धपक्ष ही स्वीकार करना चाहिये, कार्यासिद्ध नहीं। अत एव ग्रन्थकार ने भी पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र की वृत्ति में इसी पक्ष का अनुमोदन किया है—'सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रम् असिद्धम्” । विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र पर भी यही स्वीकार किया है—"पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्यस्यासिद्धत्वाद् रुत्वमेव”। भाष्यकार भी इसी पक्ष के पक्षपाती हैं—पूर्वत्रासिद्धे नास्ति विप्रतिषेधोऽभावादुत्तरस्य। इस विषय पर अन्य विस्तृत विचार व्याकरण के उच्चग्रन्थों में देखें। अदस् + अस् (शस्)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + अस्। अब अदसोऽसे ० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिवत्कार्य—पूर्वसवर्णदीर्घ और शस् के सकार को नकार करने से—'अदान्'। अब अदसोऽसे ० (३५६) से दकारोत्तर आकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर 'अमूंन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + आ (टा)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + आ। अब यहां
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७७ यद्यपि अदसोऽसेः० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिकार्य अर्थात् टाङसिँ- ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से टा को इन आदेश प्राप्त होता है तथापि न मु ने (३५८) सूत्र के आरम्भसामर्थ्य से¹ वह नहीं होता; अतः अदसोऽसेः० (३५६) से दकारोत्तर अकार को उकार तथा दकार को मकार हो जाता है अमु+आ। अब यहां 'मु'- भाव के असिद्ध होने से शेषो घ्यसखि (१७०) द्वारा घिसञ्ज्ञा नहीं हो सकती, और बिना घिसञ्ज्ञा के आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) सूत्र से टा को ना नहीं हो सकता; पर हमें 'ना' करना अभीष्ट है। अतः 'मु' भाव को सिद्ध करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है – [लघु०] निषेध-सूत्रम्— (३५८) न मु ने ॥८।२।३॥ 'ना'भावे कर्तव्ये कृते च 'मु'भावो नाऽसिद्धः। अमुना। अमूभ्याम् ३। अमीभिः। अमुष्मै। अमीभ्यः २। अमुष्मात्। अमुष्य। अमुयोः २। अमी- षाम्। अमुष्मिन्। अमीषु ॥ अर्थः—'ना' आदेश करना हो या कर चुके हों तो 'मु' आदेश असिद्ध नहीं होता । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। मु। १।१। ने ।७।१। असिद्धम् ।१।१। (पूर्वत्रा- सिद्धम् से)। समासः—म् च उश्च = मु। समाहारद्वन्द्वः । 'ने' यह ना-शब्द के सप्तमी का एकवचन है—ना+ङि=ना+इ=ने। यहां परसप्तमी या विषयसप्तमी समझनी चाहिये । अर्थः—(ने) 'ना' के विषय में अथवा 'ना' परे होने पर (मु) 'मु' आदेश (असिद्धम्) असिद्ध (न) नहीं होता । 'अमु+आ' यहां ना के विषय में 'मु' आदेश असिद्ध न हुआ तो घिसञ्ज्ञा होकर आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) से टा को ना करने पर—'अमुना' प्रयोग सिद्ध हुआ। सूचना—ध्यान रहे कि 'अमुना' में 'ना' के परे होने पर 'मु' आदेश के असिद्ध होने से सुपि च (१४१) द्वारा दीर्घ प्राप्त होता है। वह भी न मु ने (३५८) से 'मु' आदेश के सिद्ध हो जाने पर नहीं होता। इसीलिये तो 'ने' में दो प्रकार की सप्तमी स्वीकार कर के 'ना करने में या ना परे होने पर' ऐसा अर्थ किया गया है। अदस्+भ्याम्। त्यदाद्यत्व और पररूप करने पर सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है—अदाभ्याम्। अब अदसोऽसेः० (३५६) से ऊत्व-मत्व करने से— 'अमूभ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस्+भिस्। त्यदाद्यत्व और पररूप कर 'अद+भिस्'। इस अवस्था में १. यदि यहाँ टा को इन कर दें तो न मु ने (३५८) सूत्र बनाने का कुछ प्रयोजन नहीं रहता। अतः इस का बनाना तभी सार्थक किया जा सकता है जब 'इन' आदेश न होकर 'मु' हो जाये। यही इस का आरम्भसामर्थ्य है।
अतो भिस ऐस् (१४२) प्राप्त होता है, परन्तु उस का नेदमदसोरको (२७६) से निषेध हो जाना है । अब बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एकारादेश कर एत ईद् बहुवचने (३५७) से एकार को ईकार तथा दकार को मकार करने से—'अमीभि' प्रयोग सिद्ध होता है । अदम् + ए(ङे) । त्यदाद्यत्व, पररूप, सर्वनाम्न स्मै (१५३) से ङे को स्मै, मुत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) स षत्व होकर—अमुष्मै । अदस् + भ्यस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व मत्व होकर—अमीभ्य । अदम् + अस् (ङसिँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा ङसिङ्यो स्मात्स्मिनौ (१५४) से 'स्मात्' आदेश उत्व-मत्व तथा षत्व होकर —अमुष्मात् । अदस् + थस (ङस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाङसिङसामिनात्स्या (१४०) से स्य आदेश, उत्व मत्व तथा षत्व होकर—अमुष्य । अदस् + ओस । त्यदाद्यत्व पररूप, ओसि च (१४७) मे एत्व, एचोऽयवा- याव (२२) मे अय आदेश होकर —अदयो । अब उत्व-मत्व होकर—अमुयो । अदस् + आम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, आमि सर्वनाम्न सुँट् (१५५) से सुँट् आगम, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) मे ईत्व-मत्व और षत्व करने से—'अमीषाम्' प्रयोग सिद्ध होना है । अदम् + इ (ङि) । त्यदाद्यत्व, पररूप, ङसिङ्यो स्मात्स्मिनो (१५४) मे ङि को स्मिन्, मु आदेश तथा षत्व करने पर—अमुष्मिन् । अदस + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व-मत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व करने पर—अमीषु । अदस् (वह) शब्द की पुंलिङ्ग मे रूपमाला यथा— प्र० असौ अमू अमी | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्य द्वि० अमुम् ,, अमून् | ष० अमुष्य अमुयो अमीषाम् तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभि | स ० अमुष्मिन् ,, अमीषु च० अमुष्मै ,, अमीभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता । (यहां सकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इति हलन्ता पुंलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ —यहा हलन्त पुंलिङ्ग शब्द समाप्त होते हैं । अभ्यास (४६) (१) (क) 'विद्वान्' मे वसुंस्त्रसुं० द्वारा दत्व क्यो नहीं होता ? (ख) 'विद्वांसौ' मे अनुस्वार को परसवर्ण क्यो नही होता ? (ग) 'अनेहम्' को असुंमन्त मानने मे क्या दोष है ?
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७६ (२) व्याख्या करें— (क) सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम् । (ख) आन्तरतम्याद् ह्रस्वस्य उः, दीर्घस्य ऊः । (ग) अकृतव्यूहाः पाणिनीयाः । (घ) अदस औ सुलोपश्च, अदसोऽसेर्दादु दो मः, वसोः सम्प्रसारणम् । (३) पुंसु, वेधोभ्याम्, अमी, विद्वद्ऋचाम्, अमुना, श्रेयांसौ, अमू, तस्थुषः, अमु- ष्मिन्, विद्वन्—इन रूपों की ससूत्र साधनप्रक्रिया लिखें । (४) एत ईद् बहुवचने सूत्र की व्याख्या करते हुए—बहुवचनपद पारिभाषिक नहीं यौगिक है—इसे स्पष्ट करें । (५) अनुस्वार का पाठ हल्प्रत्याहार में नहीं आता तो पुनः 'पुंस् + भ्याम्' में कैसे संयोगसञ्ज्ञा होकर संयोगान्तलोप हो जाता है ? (६) इन शब्दों का प्रथमैकवचन सिद्ध कर रूपमाला लिखें— वनीकस्, उशनस्, अनेहस्, पुंस्, वेधस्, श्रेयस्, अदस् । (७) पूर्वत्रासिद्धम् द्वारा कार्यासिद्ध और शास्त्रासिद्ध पक्षों में से किस पक्ष का प्रतिपादन होता है—सोदाहरण व्याख्या करें । (८) न मु ने की व्याख्या करते हुए 'कर्त्तव्ये कृते च' कथन को स्पष्ट करें । (९) पुंस् और विद्वस् शब्दों की प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशपुरःसर निष्पत्ति लिखें । (१०) पुंसोऽसुँङ् सूत्र पर—'सर्वनामस्थान परे होने पर' ऐसा न कहकर 'सर्व- नामस्थाने विवक्षिते' ऐसा क्यों कहा गया है ? (११) असान्त अदस् शब्द के दकार से परे हल् वर्ण को क्या आदेश होता है ? सप्रमाण समझाएं । (१२) अ त्वसन्तस्य चाधातोः में 'अधातोः' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (१३) निम्नस्थ शब्दों का सम्बुद्धि में रूप सिद्ध करें— पुंस्, उशनस्, वेधस्, विद्वस्, अनेहस् । ———: : ० : : ——— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यां हलन्त-पुंल्लिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥
अथ हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् अब क्रमप्राप्त हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण का आरम्भ किया जाता है। इस प्रकरण में भी सब शब्द प्रत्याहारक्रम से कहे गये हैं। अब प्रथम हयवरट् (प्रत्याहारसूत्र ५) के क्रमानुसार हकारान्त शब्द कहे जाते हैं— [लघु०] विधि सूत्रम् — (३५६) नहो धः ।८।२।३४॥ नहो हस्य धः स्याज्झलि पदान्ते च ॥ अर्थ—नह् के हकार को धकार हो जाता है झल् परे होने पर या पदान्त में। व्याख्या—झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । नहः ।६।१। धः ।१।१। धकारादकार उच्चारणार्थः। अर्थ—(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (नहः) नह् धातु के स्थान पर (धः) ध् आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह आदेश नह् धातु के अन्त्य अल् हकार के स्थान पर होगा। यह 'हो ढः' (२५१) सूत्र का अपवाद है। इस सूत्र का उपयोग 'उपानह्' शब्द में किया जाता है अतः प्रथम 'उपानह्' शब्द की निष्पत्ति की जाती है। [लघु०] विधि सूत्रम्—(३६०) नहि-वृति-वृषि-व्यधि-रुचि-सहि-तनिषु क्वौ ।६।३।११५॥ नह्याद्यन्तेषु पूर्वपदस्य दीर्घः। उपानत्, उपानद् । उपानहौ । उपानत्सु ॥ अर्थ—नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, और तन्—ये क्विबन्त धातु परे हों तो पूर्वपद को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—नहि वृति वृषि व्यधि रुचि-सहि-तनिषु ।७।३। क्वौ ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। यह सूत्र उत्तरपदाधिकार में पढ़ा गया है अतः 'पूर्वस्य' का 'पदस्य' विशेषण उपलब्ध हो जाता है। यद्यपि 'क्वौ' ग्रहण से क्विप् और क्विन् दोनों का ग्रहण हो सकता है तथापि नह् आदि धातुओं से क्विन् का विधान न होने से अवशिष्ट क्विप् का ही ग्रहण होता है। अर्थ—(क्वौ) क्विबन्ते परे होने पर (नहि-वृति वृषि व्यधि-रुचि-सहितनिषु) जो नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, और तन् धातु, इन के परे होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (पदस्य) पद के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) तथा अचश्च (१.२.२८) परिभाषाओं द्वारा यह दीर्घ पूर्वपद के अन्त्य अच् के स्थान पर होता है। क्विप् परे होने पर जो नह्, वृत् आदि धातु, उन के परे होने पर—इसका अभिप्राय—क्विबन्त नह्, वृत् आदि धातु परे होने पर—ऐसा समझना चाहिये। अत एव वृत्ति में यही लिखा है।
'उप' पूर्वक णहँ बन्धने (दिवा० उभय०) धातु से सम्पदादिभ्यः क्विँप् (वा० ५१) वार्त्तिक द्वारा कर्म में क्विँप् प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप, प्रत्ययलक्षणद्वारा पुनः उसे मान कर नहि-वृति-वृषि० (३६०) सूत्र से पूर्वपद के अन्त्य अच् को दीर्घ तथा अन्त में प्रादिसमास करने से 'उपानह्' शब्द निष्पन्न होता है । उप = समीपे नह्यते = बध्यत इत्युपानत्। जूते को उपानह् कहते हैं। अय पादुका पादूरुपानत् स्त्री— इत्यमरः। उपानह् का बहुधा द्विवचन में प्रयोग होता है। दक्षिण पाद के जूते को 'पूर्वा उपानत्' तथा वाएं पाद के जूते को 'अपरा उपानत्' कहते हैं (व्या० च०)। विशेषण लगा कर ही इस का स्त्रीत्व प्रकट किया जा सकता है। यथा—इयम् उपानत्, इमे उपानहौ आदि। उपानह् शब्द के कुछ प्रयोग यथा—उपानद्-गूढ-पादस्य ननु चर्मावृतेव भूः (हितोप० १.१४४)। श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम् (हितोप० ३.५८)। उपानह् + स् (सुँ) । अपृक्त सकार का लोप होकर नहो धः (३५६) द्वारा पदान्त हकार को धकार¹, जश्त्व से दकार और चर्व से वैकल्पिक तकार करने पर— 'उपानत्, उपानद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। उपानह् + भ्याम् । यहां पदान्त में नहो धः (३५६) से हकार को धकार पुनः जश्त्व से दकार करने पर 'उपानद्भ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। उपानह् + सु (सुप्)। नहो धः (३५६) से धकार, जश्त्व से दकार तथा खरि च (७४) से तकार होकर 'उपानत्सु' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० उपानत्-द् उपानहौ उपानहः | प० उपानहः उपानद्भ्याम् उपानद्भ्यः द्वि० उपानहम् ,, ,, | ष० ,, उपानहोः उपानहाम् तृ० उपानहा उपानद्भ्याम् उपानद्भिः | स० उपानहि ,, उपानत्सु च० उपानहे ,, उपानद्भ्यः | सं० हे उपानत्-द्! हे उपानहौ! उपानहः! धक्तव्य—ग्रन्थकार का नहि-वृति० (३६०) सूत्र यहां लिखना उचित प्रतीत नहीं होता, इसे नहो धः (३५६) से पूर्व लिखना चाहिये था। नहि-वृति० (३६०) सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—१. वृत्—नीवृत् (पुं० स्त्री०) =जनपदे, देश । २. वृष्—प्रावृष् (स्त्री०) = वर्षा ऋतु । ३. व्यध्— हृदयावित् (त्रि०) =हृदय को वींधने वाला । ४. रुच्—नीरुच् (त्रि०) =निरन्तर चमकने वाला। ५. सह्—ऋतीषह् (त्रि०) =दुःखों या शत्रुओं को सहने वाला। ६. तन्—परीतत् (त्रि०) =चारों ओर फैलने वाला । [लघु०] क्विबन्तत्वात् कुत्वेन घः । उष्णिक्, उष्णिग् । उष्णहिौ । उष्णिग्भ्याम् ॥ व्याख्या—उष्णिह् (छन्दोविशेष)। 'उष्णिह्' शब्द ऋत्विगद्दधृक्स्रग्दिगुष्णिग्० १. धकार करने का प्रयोजन 'नहः' आदि में झषस्तथोर्धोऽधः (५४६) की प्रवृत्ति कराना है अन्यथा 'नहो दः' सूत्र ही बनाते । ल० प्र० (३१)
४८२ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(३०१) सूत्रद्वारा 'उद्' पूर्वक 'स्निह्' (दिवा० प०) धातु से क्विबन्त निपातन किया जाता है। उष्णिह् + सुँ । सुँलोप, क्विबन्त होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा हकार को घकार, जश्त्व से घकार को गकार तथा वैकल्पिक चर्त्व से गकार को ककार होकर—'उष्णिक्, उष्णिग्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० उष्णिक्, ग् उष्णिहौ उष्णिहः | प० उष्णिहः उष्णिग्भ्याम् उष्णिग्भ्यः द्वि० उष्णिहम् ,, ,, | प० ,, उष्णिहोः उष्णिहाम् तृ० उष्णिहा उष्णिग्भ्याम्* उष्णिग्भिः | स० उष्णिहि ,, उध्रिक्षु† च० उष्णिहे ,, उष्णिग्भ्यः | सं० हे उष्णिक्, ग्! उष्णिहौ! उष्णिहः! * क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४), झलां जशोऽन्ते (६७)। † कुत्व, जश्त्व, षत्व, खरि च (७४) से चर्त्व। (यहां हकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —•०•— [लघु०] द्योः । दिवौ । दिवः । द्युभ्याम् ॥ व्याख्या—'दिव्' (आकाश वा स्वर्ग) शब्द विशुद्ध अवस्था में नित्यस्त्रीलिङ्ग होता है। पुल्ँलिङ्ग आदि में इसका प्रयोग बहुव्रीहिसमासवश हुआ करता है। इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया हलन्तपुल्लिङ्गान्तर्गत 'सुदिव्' शब्दवत् होती है। रूपमाला यथा – प्र० द्यौ† दिवौ दिवः | प० दिवः द्युभ्याम् द्युभ्यः द्वि० दिवम् ,, ,, | प० ,, दिवोः दिवाम् तृ० दिवा द्युभ्याम्‡ द्युभिः | स० दिवि ,, द्युषु च० दिवे ,, द्युभ्यः | सं० हे द्यौ ! हे दिवौ ! हे दिवः ! †दिव औत् (२६४) । ‡दिव उत् (२६५) । (यहां वकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— [लघु०] गीः । गिरौ । गिरः । एवम्—पूः ॥ व्याख्या—गिर् = वाणी । गृ निगरणे (तुदा० प०) धातु से क्विप्, उस का सर्वापहार लोप, ऋत इद्धातो (६६०) से इत्व तथा उरण्रपरः (२६) से रपर करने पर 'गिर्' शब्द निष्पन्न होता है। गिर्+स् (सुँ) । सुँलोप होकर क्विबन्ता धातुत्वं न जहाति इस कथन से धातु होने से पदान्त मे र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ होकर 'गीर्' बना। अब रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'गीः' प्रयोग सिद्ध होता है। गिर्+औ = गिरौ। यहां पदान्त न होने से उपधादीर्घ नहीं होता। गिर्+भ्याम्। यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदत्व होने से र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ हो जाता है—गीर्भ्याम् ।
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८३
गिर्+सुप्। यहां पदान्त में उपधादीर्घ होकर इण्—रेफ से परे प्रत्यय के अवयव सकार को षकार (१५०) हो जाता है—गीर्षु। ध्यान रहे कि यहां रोः सुपि (२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता। समग्र रूपमाला यथा— प्र० गीः गिरौ गिरः | प० गिरः गीर्भ्याम् गीर्भ्यः द्वि० गिरम् ,, ,, | ष० ,, गिरोः गिराम् तृ० गिरा गीर्भ्याम् गीर्भिः | स० गिरि ,, गीर्षु च० गिरे ,, गीर्भ्यः | सं० हे गीः ! हे गिरौ ! हे गिरः! इसी प्रकार—पुर्=(नगर)। पृ पालनपूरणयोः (जुहो० प०) धातु से क्विँप्, उसका सर्वापहारलोप, उदोष्ठ्यपूर्वस्य (६११) से उत्व तथा उरण्रपरः (२६) से रपर करने पर 'पुर्' शब्द निष्पन्न होता है। इस की भी सम्पूर्ण प्रक्रिया 'गिर्' शब्द की तरह होती है। रूपमाला यथा— प्र० पूः¹ पुरौ पुरः | प० पुरः पूर्भ्याम् पूर्भ्यः द्वि० पुरम् ,, ,, | ष० ,, पुरोः पुराम् तृ० पुरा पूर्भ्याम् पूर्भिः | स० पुरि ,, पूर्षु च० पुरे ,, पूर्भ्यः | सं० हे पूः ! हे पुरौ ! हे पुरः ! इसी प्रकार—धुर् (गाड़ी का अग्रिम भाग) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं। [लघु०] चतस्रः। चतसृणाम्॥ व्याख्या—चतुर्=(चार)। स्त्रीलिङ्ग में विभक्ति परे होने पर चतुर् शब्द को त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ (२२४) सूत्र से 'चतसृ' आदेश हो जाता है।² चतसृ+अस् (जस्)। ऋतो ङि० (२०४) से गुण प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि र ऋतः (२२५) से रेफ आदेश करने पर—'चतस्रः' प्रयोग सिद्ध होता है। चतसृ+अस् (शस्)। यहां सर्वनामस्थान परे न होने से पूर्वोक्त गुण प्राप्त नहीं होता। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि र ऋतः (२२५) द्वारा रेफ आदेश हो जाता है—चतस्रः। चतसृ+आम्। अचि र ऋतः (२२५) का बाध कर नुमचिर० (वा० १६) की सहायता से पूर्वविप्रतिषेध से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट् का आगम हो जाता है—चतसृ+नाम्। अब नामि (१४६) से प्राप्त दीर्घ का न तिसृ-चतसृ (२२६) से निषेध हो जाता है, पुनः ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) से णत्व होकर 'चतसृणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। चतसृ (स्त्रीलिङ्ग में चतुर्) शब्द की रूपमाला यथा— १. इसका भ्रामक रूप इस उक्ति में प्रसिद्ध है—का पूर्वः (का, पूः=नगरी, वः= युष्माकम् । तुम्हारी कौन-सी नगरी है ?)। २. यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि चतसृशब्द से ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से प्राप्त ङीप् का न षट्स्वस्रादिभ्यः (२३३) से निषेध हो जाता है।
४८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० * * चतस्रः | प० * * चतसृभ्यः द्वि० * * " | ष० * * चतसृणाम् तृ० * * चतसृभिः | स० * * चतसृषु च० * * चतसृभ्यः | —— ० —— (यहां रेफान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] का। के। काः। सर्वावत्॥ व्याख्या किम्(कौन)। 'किम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप कह चुके हैं। अब स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध किये जाते हैं। विभक्ति परे होने पर सर्वत्र किमः कः (२७१) द्वारा 'किम्' को 'क' सर्वादेश हो जाता है। पुनः स्त्रीत्व की विवक्षा में अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप् (आ) प्रत्यय होकर सवर्णदीर्घ करने से 'का' शब्द निष्पन्न होता है सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से इस की सर्वनामसंज्ञा होने से सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है। 'का' (स्त्रीलिङ्ग में किम् शब्द) की रूपमाला यथा — प्र० का के काः | प० कस्याः काभ्याम् काभ्यः द्वि० काम् " " | ष० ,,† कयोः* कासाम्‡ तृ० कया* काभ्याम् काभिः | स० कस्याम्† ,,* कासु च० कस्यै† " काभ्यः | सम्बोधन प्राय नहीं होता। *आङि चापः (२१८)। † सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०)। ‡ आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५)। [लघु०] विधि सूत्रम्—(३६१) यः सौ ॥७।२।११०॥ इदमो दस्य यः। इयम्। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। टाप्। दश्च (२७५) इति मः। इमे। इमाः। इमाम्। अनया। हलि लोपः (२७७) आभ्याम्। आभिः। अस्यै। अस्याः। अनयोः। आसाम्। अस्याम्। आसु॥ अर्थ—सुँ परे होने पर इदम् के दकार को यकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—इदमः ६।१। (इदमो मः से)। दः ६।१। (दश्च से)। यः १।१। सौ ७।१। अर्थ—(इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है (सौ) सुँ परे होने पर। यह सूत्र केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रवृत्त होता है। क्योंकि पुँल्लिङ्ग में सुँ परे होने पर इदोऽय् पुंसि (२७३) सूत्र से इदम् को अय् आदेश हो जाने से दकार नहीं मिल सकता। नपुंसक में भी सुँ का लुक् हो जाने से प्रत्ययलक्षण न होने से इस अव- काश नहीं मिलता। 'इदम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप सिद्ध किये जा चुके हैं, अब स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध करते हैं—
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८५ इदम् + स् (सुँ) । यहां प्रकृतसूत्र से दकार को यकार हो कर हल्ङ्याब्भ्यः० .(१७६) से सुँ का लोप हो जाता है—इयम्। ध्यान रहे कि यहां इदमो मः (२७२) के निषेध के कारण त्यदाद्यत्व नहीं होता। इदम् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप्, अनुबन्ध- लोप कर सवर्णदीर्घ करने से—इदा+औ। अब दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार, औङ आपः (२१६) से औकार को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण करने पर— इमे । इदम् + अस् (जस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ तथा दश्च (२७५) से दकार को मकार होकर—इमा + अस् । अब दीर्घाज्जसि च (१६२) से पूर्वसवर्ण- दीर्घ का निषेध होकर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा सकार को रुँत्व विसर्ग करने से—इमाः। इदम् + अम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ, दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप होकर—इमाम्। इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ तथा दकार को मकार होकर पूर्वसवर्णदीर्घ करने से—इमास् = इमाः। नोट—जस् में सवर्णदीर्घ और शस् में पूर्वसवर्णदीर्घ यह ज्ञातव्य है। इदम् + आ (टा) = इद + आ = इदा + आ । अब यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र से इद् भाग को अन् आदेश, आङि चापः (२१८) से प्रकृति के आकार को एकार तथा एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश करने पर—अनया । इदम् + भ्याम् = इद + भ्याम् = इदा + भ्याम् । हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप होकर—आभ्याम् । इसी प्रकार—आभिः। इदम् + ए (ङे) = इद + ए = इदा + ए । अब सर्वनामसञ्ज्ञा होकर प्रथम नित्य होने से सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) सूत्र से स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व हो जाता है—इद + स्या ए। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि और हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप करने से—अस्यै। इदम् + अस् (ङसिँ वा ङस्) = इद + अस् = इदा + अस्। यहां भी पूर्ववत् सर्वनामसञ्ज्ञा, स्याट् आगम तथा आप् को ह्रस्व होकर—इद + स्या अस् । अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप होकर— अस्यास् = अस्याः । इदम् + ओस् = इद + ओस् = इदा + ओस् । अनाप्यकः (२७६) से इद् को अन् आदेश, आङि चापः (२१८) से आप् की एकार तथा एकार को अय् आदेश करने पर—अनयोः। इदम् + आम् = इद + आम् = इदा + आम् । सर्वनामसञ्ज्ञा होकर आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) से सुँट् का आगम तथा हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप हो जाता है—आसाम् ।
४८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इदम् + ङि (डि) = इद + ङि = इदा + ङि । यहां डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम्, सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व, हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप तथा सवर्णदीर्घ करने पर— अस्याम् । इदम् + सुप् = इद + सु = इदा + सु = आसु [ हलि लोपः (२७७) ] । 'इदम्' (यह) शब्द की स्त्रीलिङ्ग में रूपमाला यथा — प्र० इयम् इमे इमा | प० अस्या आभ्याम् आभ्यः द्वि० इमाम् " " | ष० " अनयोः आसाम् तृ० अनया आभ्याम् आभिः | स० अस्याम् " आसु च० अस्यै " आभ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता । नोट—अन्वादेश में द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों के परे होने पर द्वितीया- टौस्स्वेनः (२८०) से इदम् को एन आदेश हो जाता है । तब टाप् प्रत्यय होकर विभक्ति कार्य करने से—एनाम्, एने, एनाः, एनया, एनयोः—रूप बन जाते हैं। (यहां मकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) [लघु०] त्यदाद्यत्वम् । टाप्—स्या, त्ये, त्याः । एव तद्, एतद् ॥ व्याख्या—त्यद् (वह) । 'त्यद्' शब्द के पुंल्लिङ्ग में रूप दर्शाए जा चुके हैं। अब स्त्रीलिङ्ग में रूप दर्शाए जाते हैं— त्यद् + स् (सुँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ, तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) से तकार को सकार तथा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप होकर—स्या । त्यद् + औ = त्य + औ = त्या + औ । औङ आपः (२१६) से शी आदेश तथा अनुबन्धलोप कर गुण करने से—त्ये । आगे सर्वत्र त्यदाद्यत्व पररूप और टाप् होकर 'त्या' रूप बन जाता है । तब इस की प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है । रूपमाला यथा— प्र० स्या त्ये त्याः | प० त्यस्याः त्याभ्याम् त्याभ्यः द्वि० त्याम् " " | ष० " त्ययोः त्यासाम् तृ० त्यया त्याभ्याम् त्याभिः | स० त्यस्याम् " त्यासु च० त्यस्यै " त्याभ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता । तद् (वह) । 'तद्' शब्द की भी प्रक्रिया 'त्यद्' शब्द के समान होती है। तद् + सुँ । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ होकर—'ता + स्' । अब तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) से तकार को सकार तथा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सुँ का लोप होकर— सा । 'तद्' शब्द की स्त्रीलिङ्ग में रूपमाला यथा— प्र० सा ते ताः | प० तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः द्वि० ताम् " " | ष० " तयोः तासाम् तृ० तया ताभ्याम् ताभिः | स० तस्याम् " तासु च० तस्यै " ताभ्यः | सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।