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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

बूढ़ेलोग बालकोंका अन्त्येष्टि-संस्कार नहीं करते थे (उनके सामने ऐसा अवसर ही नहीं आता था)। वैश्यलोग क्षत्रियोंकी परिचर्या करते थे और क्षत्रियलोग भी वैश्योंको कष्ट नहीं होने देते थे। पुरुष अपनी पत्नियोंकी अवहेलना नहीं करते थे और पत्नियाँ भी पतियोंकी अवहेलना नहीं करती थीं। श्रीरामचन्द्रजीके राज्य-शासन करते समय लोकमें खेतीकी उपज कम नहीं होती थी। लोग सहस्र पुत्रोंसे युक्त होकर सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे। श्रीरामके राज्य-शासनकालमें सब प्राणी नीरोग थे।

ऋषीणां देवतानां च मनुष्याणां तथैव च ।
पृथिव्यां सहवासोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥
सर्वे ह्यासंस्तृप्तरूपास्तदा तस्मिन् विशाम्पते ।
धर्मेण पृथिवीं सर्वामनुशासति भूमिपे ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें इस पृथ्वीपर ऋषि, देवता और मनुष्य साथ-साथ रहते थे। राजन्! भूमिपाल श्रीरघुनाथजी जिन दिनों सारी पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय उनके राज्यमें सब लोग पूर्णतः तृप्तिका अनुभव करते थे।

तपस्येवाभवन् सर्वे सर्वे धर्ममनुव्रताः ।
पृथिव्यां धार्मिके तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ॥
धर्मात्मा राजा रामके राज्यमें पृथ्वीपर सब लोग तपस्यामें ही लगे रहते थे और सब-के-सब धर्मानुरागी थे।

नाधर्मिष्ठो नरः कश्चिद् बभूव प्राणिनां क्वचित् ।
प्राणापानौ समावास्तां रामे राज्यं प्रशासति ॥
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कोई भी मनुष्य अधर्ममें प्रवृत्त नहीं होता था। सबके प्राण और अपान समवृत्तिमें स्थित थे।

गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।
श्यामो युवा लोहिताक्षो मातङ्गानामिवर्षभः ॥
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाबलः ।
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ॥
राज्यं भोगं च सम्प्राप्य शशास पृथिवीमिमाम् ।
जो पुराणवेत्ता विद्वान् हैं, वे इस विषयमें निम्नांकित गाथा गाया करते हैं—'भगवान् श्रीरामकी अंगकान्ति श्याम है, युवावस्था है, उनके नेत्रोंमें कुछ-कुछ लाली है। वे गजराज-जैसे पराक्रमी हैं। उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी हैं। मुख बहुत सुन्दर है। कंधे सिंहके समान हैं और वे महान् बलशाली हैं। उन्होंने राज्य और भोग पाकर ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका शासन किया।

रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः ॥
रामभूतं जगदिदं रामे राज्यं प्रशासति ।

ऋग्यजुःसामहीनाश्च न तदासन् द्विजातयः ॥
प्रजाजनोंमें 'राम राम राम' इस प्रकार केवल रामकी ही चर्चा होती थी। रामके राज्य-शासनकालमें यह सारा जगत् राममय हो रहा था। उस समयके द्विज ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके ज्ञानसे शून्य नहीं थे।
उषित्वा दण्डके कार्यं त्रिदशानां चकार सः ।
पूर्वापकारिणं संख्ये पौलस्त्यं मनुजर्षभः ॥
देवगन्धर्वनागानामरिं स निजघान ह ।
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥
एवमेव महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥
इस प्रकार मनुष्योंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें निवास करके देवताओंका कार्य सिद्ध किया और पहलेके अपराधी पुलस्त्यनन्दन रावणको, जो देवताओं, गन्धर्वों और नागोंका शत्रु था, युद्धमें मार गिराया। इक्ष्वाकुकुलका अभ्युदय करनेवाले महाबाहु श्रीराम महान् पराक्रमी, सर्वगुणसम्पन्न और अपने तेजसे देदीप्यमान थे।
रावणं सगणं हत्वा दिवमाक्रमताभिभूः ।
इति दाशरथेः ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥
वे इसी प्रकार सेवकोंसहित रावणका वध करके राज्यपालनके पश्चात् साकेतलोकमें पधारे। इस प्रकार परमात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अवतारका वर्णन किया गया।

(कृष्णावतारः)

ततः कृष्णो महाबाहुर्भीतानामभयङ्करः ।
अष्टाविंशे युगे राजन् जज्ञे श्रीवत्सलक्षणः ॥
राजन्! तदनन्तर अब अट्ठाईसवें द्वापरमें भय-भीतोंको अभय देनेवाले श्रीवत्सविभूषित महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णके रूपमें श्रीविष्णुका अवतार हुआ है।
पेशलश्च वदान्यश्च लोके बहुमतो नृषु ।
स्मृतिमान् देशकालज्ञः शङ्खचक्रगदासिधृक् ॥
ये इस लोकमें परम सुन्दर, उदार, मनुष्योंमें अत्यन्त सम्मानित, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, देशकालके ज्ञाता एवं शंख, चक्र, गदा और खड्ग आदि आयुध धारण करनेवाले हैं।
वासुदेव इति ख्यातो लोकानां हितकृत् सदा ।
वृष्णीनां च कुले जातो भूमेः प्रियचिकीर्षया ॥
वासुदेवके नामसे इनकी प्रसिद्धि है। ये सदा सब लोगोंके हितमें संलग्न रहते हैं। भूदेवीका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे इन्होंने वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण किया है।
स नृणामभयं दाता मधुहेति स विश्रुतः ।
शकटार्जुनरामाणां किल स्थानान्यसूदयत् ॥
ये ही मनुष्योंको अभयदान करनेवाले हैं। इन्हींकी मधुसूदन नामसे प्रसिद्धि है। इन्होंने ही शकटासुर, यमलार्जुन और पूतनाके मर्मस्थानोंमें आघात करके उनका संहार किया है।
कंसादीन् निजघानाजौ दैत्यान् मानुषविग्रहान् ।
अयं लोकहितार्थाय प्रादुर्भावो महात्मनः ॥
मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए कंस आदि दैत्योंको युद्धमें मार गिराया। परमात्माका यह अवतार भी लोकहितके लिये ही हुआ है।

(कल्क्यवतारः) कल्की विष्णुयशा नाम भूयश्चोत्पत्स्यते हरिः ।
कलेर्युगान्ते सम्प्राप्ते धर्मे शिथिलतां गते ।।
पाखण्डिनां गणानां हि वधार्थं भरतर्षभः ।
धर्मस्य च विवृद्ध्यर्थं विप्राणां हितकाम्यया ।।
कलियुगके अन्तमें जब धर्म शिथिल हो जायगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पाखण्डियोंके वध तथा धर्मकी वृद्धिके लिये और ब्राह्मणोंके हितकी कामनासे पुनः अवतार लेंगे। उनके उस अवतारका नाम होगा ‘कल्कि विष्णुयशा’।
एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगणैर्युताः ।
प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ।।
भगवान्‌के ये तथा और भी बहुत-से दिव्य अवतार देवगणोंके साथ होते हैं, जिनका ब्रह्मवादी पुरुष पुराणोंमें वर्णन करते हैं।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[श्रीकृष्णका प्राकट्य तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन]
वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तोऽथ कौन्तेयस्ततः पौरवनन्दनः ।
आबभाषे पुनर्भीष्मं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीके इस प्रकार कहनेपर पूरुवंशको आनन्दित करनेवाले कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उनसे कहा।

युधिष्ठिर उवाच

भूय एव मनुष्येन्द्र उपेन्द्रस्य यशस्विनः ।
जन्म वृष्णिषु विज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥
**युधिष्ठिर बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र! मैं यशस्वी भगवान् विष्णुके वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण करनेका वृत्तान्त पुनः (विस्तारपूर्वक) जानना चाहता हूँ।

यथैव भगवाञ्जातः क्षिताविह जनार्दनः ।
माधवेषु महाबुद्धिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
पितामह! परम बुद्धिमान् भगवान् जनार्दन इस पृथ्वीपर मधुवंशमें जिस प्रकार उत्पन्न हुए, वह सब प्रसंग मुझसे कहिये।

यदर्थं च महातेजा गास्तु गोवृभेक्षणः ।
ररक्ष कंसस्य वधाल्लोकानामभिरक्षिता ॥
बैलके समान विशाल नेत्रोंवाले लोकरक्षक महा-तेजस्वी श्रीकृष्णने किसलिये कंसका वध करके गौओंकी रक्षा की?

क्रीडता चैव यद् बाल्ये गोविन्देन विचेष्टितम् ।
तदा मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! उस समय बाल्यावस्थामें बालकोचित क्रीड़ाएँ करते समय भगवान् गोविन्दने क्या-क्या लीलाएँ कीं? यह सब मुझे बताइये।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्ततो भीष्मः केशवस्य महात्मनः ।
माधवेषु तदा जन्म कथयामास वीर्यवान् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर महापराक्रमी भीष्मने मधुवंशमें भगवान् केशवके अवतार लेनेकी कथा कहनी प्रारम्भ की।

भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथातथम् ।
यतो नारायणस्येह जन्म वृष्णिषु कौरव ॥

**भीष्मजी बोले—**कुरुरत्न युधिष्ठिर! अब मैं वृष्णिवंशमें भगवान् नारायणके अवतार-ग्रहणका यथावत् वृत्तान्त कहूँगा। अजातशत्रो जातस्तु यथैष भुवि भूमिपः । कीर्त्यमानं मया तात निबोध भरतर्षभ ।। भरतकुलभूषण तात अजातशत्रो! वसुधाकी रक्षा करनेवाले ये भगवान् यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए? यह मैं बतला रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। सागराः समकम्पन्त मुदा चेलुश्च पर्वताः । जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ।। भगवान्‌के जन्मके समय आनन्दोद्रेकके कारण समुद्रमें उत्ताल तरंगें उठने लगीं, पर्वत हिलने लगे और बुझी हुई अग्नियाँ भी सहसा प्रज्वलित हो उठीं। शिवाः सम्प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रजः । ज्योतींषि सम्प्रकाशन्ते जायमाने जनार्दने ।। भगवान् जनार्दनके जन्मकालमें शीतल, मन्द एवं सुखद वायु चलने लगी। धरतीकी धूल शान्त हो गयी और नक्षत्र प्रकाशित होने लगे। देवदुन्दुभयश्चापि सस्वनुर्भृशमम्बरे । अभ्यवर्षंस्तदाऽऽगम्य देवताः पुष्पवृष्टिभिः ।। आकाशमें देवलोकके नगाड़े जोर-जोरसे बजने लगे और देवगण आ-आकर वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरस्तुवन् मधुसूदनम् । उपतस्थुस्तदा प्रीताः प्रादुर्भावे महर्षयः ।। वे मंगलमयी वाणीद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे। भगवान्‌के अवतारका समय जान महर्षिगण भी अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आ पहुँचे। ततस्तानभिसम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन् । उपानृत्यन्नुपजगुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। नारद आदि देवर्षियोंको उपस्थित देख गन्धर्व और अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं। उपतस्थे च गोविन्दं सहस्राक्षः शचीपतिः । अभ्यभाषत तेजस्वी महर्षीन् पूजयंस्तदा ।। उस समय सहस्र नेत्रोंवाले शचीवल्लभ तेजस्वी इन्द्र भगवान् गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हुए और महर्षियोंका आदर करते हुए बोले।

इन्द्र उवाच कृत्यानि देवकार्याणि कृत्वा लोकहिताय च । स्वलोकं लोककृद् देव पुनर्गच्छ स्वतेजसा ।।

**इन्द्रने कहा—**देव! आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं। देवताओंके जो कर्तव्य कार्य हैं, उन सबको सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये सिद्ध करके आप अपने तेजसहित पुनः परमधामको पधारिये।

भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा मुनिभिः सार्धं जगाम त्रिदिवेश्वरः ।
**भीष्मजी कहते हैं—**ऐसा कहकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र देवर्षियोंके साथ अपने लोकको चले गये।
वसुदेवस्ततो जातं बालमादित्यसंनिभम् ।
नन्दगोपकुले राजन् भयात् प्राच्छादयद्धरिम् ।।
राजन्! तदनन्तर वसुदेवजीने कंसके भयसे सूर्यके समान तेजस्वी अपने नवजात बालक श्रीहरिको नन्दगोपके घरमें छिपा दिया।

नन्दगोपकुले कृष्ण उवास बहुलाः समाः ।
ततः कदाचित् सुप्तं तं शकटस्य त्वधः शिशुम् ।।
यशोदा सम्परित्यज्य जगाम यमुनां नदीम् ।

श्रीकृष्ण बहुत वर्षोंतक नन्दगोपके ही घरमें रहे। एक दिन वहाँ शिशु श्रीकृष्ण एक छकड़ेके नीचे सोये थे। माता यशोदा उन्हें वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर चली गयीं। शिशुलीलां ततः कुर्वन् स्वहस्तचरणौ क्षिपन् ।। रुरोद मधुरं कृष्णः पादावूर्ध्वं प्रसारयन् । पादाङ्गुष्ठेन शकटं धारयन्नथ केशवः ।। तत्राथैकेन पादेन पातयित्वा तथा शिशुः । उस समय श्रीकृष्ण शिशुलीलाका प्रदर्शन करते हुए अपने हाथ-पैर फेंक-फेंककर मधुर स्वरमें रोने लगे। पैरोंको ऊपर फेंकते समय भगवान् केशवने अपने पैरके अंगूठेसे छकड़ेको धक्का दे दिया और इस प्रकार एक ही पाँवसे छकड़ेको उलटकर गिरा दिया। न्युब्जः पयोधराकाङ्क्षी चकार च रुरोद च ।। पातितं शकटं दृष्ट्वा भिन्नभाण्डघटीघटम् । जनास्ते शिशुना तेन विस्मयं परमं ययुः ।। उसके बाद वे स्वयं औंधे मुँह हो गये और माताका स्तन पीनेकी इच्छासे जोर-जोरसे रोने लगे। शिशुके ही पदाघातसे छकड़ा उलटकर गिर गया तथा उसपर रखे हुए सभी मटके और घड़े आदि बर्तन चकनाचूर हो गये। यह देखकर सब लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रत्यक्षं शूरसेनानां दृश्यते महदद्भुतम् । पूतना चापि निहता महाकाया महास्तनी ।। पश्यतां सर्वदेवानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! शूरसेनदेश (मथुरामण्डल)-के निवासियोंको यह अत्यन्त अद्भुत घटना प्रत्यक्ष दिखायी दी तथा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने (आकाशमें स्थित) सब देवताओंके देखते-देखते महाकाय एवं विशाल स्तनोंवाली पूतनाको भी पहले मार डाला था। ततः काले महाराज संसक्तौ रामकेशवौ ।। विष्णुः सङ्कर्षणश्चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् । महाराज! तदनन्तर संकर्षण और विष्णुके स्वरूप बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई कुछ कालके अनन्तर एक साथ ही घुटनोंके बल रेंगने लगे। अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ।। विसर्पयेतां सर्वत्र सर्पभोगभुजौ तदा । जैसे चन्द्रमा और सूर्य एक-दूसरेकी किरणोंसे बँधकर आकाशमें एक साथ विचरते हों, उसी प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण सर्वत्र एक साथ चलते-फिरते थे। उनकी भुजाएँ सर्पके शरीरकी भाँति सुशोभित होती थीं। रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ रामकृष्णौ तदा नृप ।। क्वचिच्च जानुभिर्घृष्टौ क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पिबन्तौ दधिकुल्याश्च मथ्यमाने च भारत ।।

नरेश्वर! बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंके अंग धूलि-धूसरित होकर बड़ी शोभा पाते। भारत! कभी वे दोनों भाई घुटनोंके बल चलते थे, जिससे उनमें घट्टे पड़ गये थे। कभी वे वनमें खेला करते और कभी मथते समय दहीकी घोल लेकर पीया करते थे। ततः स बालो गोविन्दो नवनीतं तदा क्षये । ग्रसमानस्तु तत्रायं गोपीभिर्ददृशेऽथ वै ॥ एक दिन बालक श्रीकृष्ण एकान्त गृहमें छिपकर माखन खा रहे थे। उस समय वहाँ उन्हें कुछ गोपियोंने देख लिया। दाम्नाथोलूखले कृष्णो गोपस्त्रीभिश्च बन्धितः । तदाथ शिशुना तेन राजंस्तावर्जुनावुभौ ॥ समूलविटपौ भग्नौ तदद्भुतमिवाभवत् । तब उन यशोदा आदि गोपांगनाओंने एक रस्सीसे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। राजन्! उस समय उन्होंने उस ऊखलको यमलार्जुन वृक्षोंके बीचमें अड़ाकर उन्हें जड़ और शाखाओंसहित तोड़ डाला। वह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई। तत्रासुरौ महाकायौ गतप्राणौ बभूवतुः ॥ उन वृक्षोंपर दो विशालकाय असुर रहा करते थे। वे भी वृक्षोंके टूटनेके साथ ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे। ततस्तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसङ्कर्षणावुभौ । तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥ तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम बाल्यावस्थाकी सीमाको पार करके उस व्रजमण्डलमें ही सात वर्षकी अवस्थावाले हो गये। नीलपीताम्बरधरौ पतिश्वेतानुलेपनौ । बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षधरावुभौ ॥ बलराम नीले रंगके और श्रीकृष्ण पीले रंगके वस्त्र धारण करते थे। एकके श्रीअंगोंपर पीले रंगका अंगराग लगता था और दूसरेके श्वेत रंगका। दोनों भाई काकपक्ष (सिरके पिछले भागमें बड़े-बड़े केश) धारण किये बछड़े चराने लगे। पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ । शुशुभाते वनगतावुदीर्णाविव पन्नगौ ॥ उन दोनोंकी मुखच्छवि बड़ी मनोहारिणी थी। वे वनमें जाकर श्रवण-सुखद पर्णवाद्य (पत्तोंके बाजे—पिपिहरी आदि) बजाया करते थे। वहाँ दो तरुण नागकुमारोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी। मयूर्राङ्गकर्णौ तौ पल्लवापीडधारिणौ । वनमालापरिक्षिप्तौ सालपोताविवोद्गतौ ॥

वे अपने कानोंमें मोरके पंख लगा लेते, मस्तकपर पल्लवोंके मुकुट धारण करते और गलेमें वनमाला डाल लेते थे। उस समय शालके नये पौधोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी।

अरविन्दकृतापीड़ौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ । शिक्यतुम्बधरौ वीरौ गोपवेणुप्रवादकौ ॥ वे कभी कमलके फूलोंके शिरोभूषण धारण करते और कभी बछड़ोंकी रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति धारण कर लेते थे। वीरवर श्रीकृष्ण और बलराम छींके और तुम्बी लिये वनमें घूमते और गोपजनोचित वेणु बजाया करते थे।

क्वचिद् वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद् वने । पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ ॥ वे दोनों भाई कहीं ठहर जाते, कहीं वनमें एक-दूसरेके साथ खेलने लगते और कहीं पत्तोंकी शय्या बिछाकर सो जाते तथा नींद लेने लगते थे।

तौ वत्सान् पालयन्तौ हि शोभयन्तौ महद् वनम् । चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म राजन्नेवं तदा शुभौ ॥ राजन्! इस प्रकार वे मंगलमय बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी रक्षा करते तथा उस महान् वनकी शोभा बढ़ाते हुए सब ओर घूमते और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे।

ततो वृन्दावनं गत्वा वसुदेवसुतावुभौ । गोव्रजं तत्र कौन्तेय चारयन्तौ विजह्रतुः ॥ कुन्तीनन्दन! तदनन्तर वे दोनों वसुदेवपुत्र वृन्दावनमें जाकर गौएँ चराते हुए लीला-विहार करने लगे।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना]

भीष्म उवाच

ततः कदाचिद् गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना । चचार तद् वनं रम्यं रम्यरूपो वराननः ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन मनोहर रूप और सुन्दर मुखवाले भगवान् गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षणको साथ लिये बिना ही रमणीय वृन्दावनमें चले गये और वहाँ इधर-उधर भ्रमण करने लगे।

काकपक्षरः श्रीमाञ्छ्यामः पद्मानिभेक्षणः । श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥ उन्होंने काकपक्ष धारण कर रखा था। वे परम शोभायमान, श्याम-वर्ण तथा कमलके समान सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित थे। जैसे चन्द्रमा कलंकसे युक्त होकर शोभा पाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे शोभा पा रहा था।

रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा । श्वेतगन्धेन लिप्ताङ्गो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ राजता बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना । क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडन् क्वचिन्नृत्यन् क्वचिद्धसन् ॥ गोपवेषः स मधुरं गायन् वेणुं च वादयन् । प्रह्लादनार्थं तु गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥ गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान् प्रभुः । बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ॥ तासु कृष्णो मुदं लेभे क्रीडया भरतर्षभ । स कदाचिद् वने तस्मिन् गोभिः सह परिव्रजन् ॥ उन्होंने रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति पहन रखा था। उनके श्रीअंगोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। विभिन्न अंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप किया गया था। उनके मस्तकपर काले-घुँघराले केश सुशोभित थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता था, जो मन्द-मन्द वायुके झोंकोंसे लहरा रहा था। भगवान् कहीं गीत गाते, कहीं क्रीड़ा करते, कहीं नाचते और कहीं हँसते थे। इस प्रकार गोपालोचित वेष धारण किये मधुर गीत गाते और वेणु बजाते हुए तरुण श्रीकृष्ण गौओंको आनन्दित करनेके लिये कभी-कभी वनमें घूमते थे। अत्यन्त कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण वर्षाके समय गोकुलमें वहाँके अतिशय रमणीय प्रदेशों तथा

वनश्रेणियोंमें विचरण करते थे। भरतश्रेष्ठ! उन वनश्रेणियोंमें भाँति-भाँतिके खेल करके श्यामसुन्दर बड़े प्रसन्न होते थे। एक दिन वे गौओंके साथ वनमें घूम रहे थे। भाण्डीरं नाम दृष्ट्वाथ न्यग्रोधं केशवो महान्। तच्छायायां निवासाय मतिं चक्रे तदा प्रभुः॥ घूमते-घूमते महात्मा भगवान् केशवने भाण्डीर नामक वटवृक्ष देखा और उसकी छायामें बैठनेका विचार किया। स तत्र वयसा तुल्यैः वत्सपालैः सहानघ। रेमे स दिवसान् कृष्णः पुरा स्वर्गपुरे तथा॥ निष्पाप युधिष्ठिर! वहाँ श्रीकृष्ण समान अवस्थावाले दूसरे गोपबालकोंके साथ बछड़े चराते थे, दिनभर खेल-कूद करते थे और पहले दिव्य धाममें जिस प्रकार वे आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वनमें आनन्दपूर्वक दिन बिताते थे। तं क्रीडमानं गोपालाः कृष्णं भाण्डीरवासिनः। रमयन्ति स्म बहवो मान्यैः क्रीडनकैस्तदा॥ अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः। गोपालाः कृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म वनप्रियाः॥ भाण्डीरवनमें निवास करनेवाले बहुत-से ग्वाले वहाँ क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्णको अच्छे-अच्छे खिलौनोंद्वारा प्रसन्न रखते थे। दूसरे प्रसन्नचित्त रहनेवाले गोप, जिन्हें वनमें घूमना प्रिय था, सदा श्रीकृष्णकी महिमाका गान किया करते थे। तेषां संगायतामेव वादयामास केशवः। पर्णवाद्यान्तरे वेणुं तुम्बं वीणां च तत्र वै॥ एवं क्रीडान्तरैः कृष्णो गोपालैर्विजहार सः। जब वे गीत गाते, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण पत्तोंके बाजोंके बीच-बीचमें वेणु, तुम्बी और वीणा बजाया करते थे। इस प्रकार विभिन्न लीलाओंद्वारा श्रीकृष्ण गोपबालकोंके साथ खेलते थे। तेन बालेन कौन्तेय कृतं लोकहितं तदा॥ पश्यतां सर्वभूतानां वासुदेवेन भारत। भरतनन्दन! उस समय बालक श्रीकृष्णने सम्पूर्ण भूतोंके देखते-देखते लोकहितके अनेक कार्य किये। ह्रदे नीपवने तत्र क्रीडितं नागमूर्धनि॥ कालियं शासयित्वा तु सर्वलोकस्य पश्यतः। विजहार ततः कृष्णो बलदेवसहायवान्॥ वृन्दावनमें कदम्बवनके पास जो ह्रद (कुण्ड) था, उसमें प्रवेश करके उन्होंने कालियनागके मस्तक-पर नृत्यक्रीड़ा की थी। फिर सब लोगोंके सामने ही कालियनागको

अन्यत्र जानेका आदेश देकर वे बलदेवजीके साथ वनमें इधर-उधर विचरण करने लगे।

धेनुको दारुणो दैत्यो राजन् रासभविग्रहः ।
तदा तालवने राजन् बलदेवेन वै हतः ।।
राजन्! तालवनमें धेनुक नामक भयंकर दैत्य निवास करता था, जो गधेका रूप धारण करके रहता था। उस समय वह बलदेवजीके हाथसे मारा गया।
ततः कदाचित् कौन्तेय रामकृष्णौ वनं गतौ ।
चारयन्तौ प्रवृद्धानि गोधनानि शुभाननौ ।।
कुन्तीनन्दन! तदनन्तर किसी समय सुन्दर मुखवाले बलराम और श्रीकृष्ण अपने बढ़े हुए गोधनको चरानेके लिये वनमें गये।
विहरन्तौ मुदा युक्तौ वीक्षमाणौ वनानि वै ।
क्ष्वेलयन्तौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान् ।।
वहाँ वनकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई घूमते, खेलते, गीत गाते और विभिन्न वृक्षोंकी खोज करते हुए बड़े प्रसन्न होते थे।
नामभिर्व्याहरन्तौ च वत्सान् गाश्च परंतपौ ।
चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ।।
शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों अजेय वीर वहाँ गौओं और बछड़ोंको नाम ले-लेकर बुलाते और लोकप्रचलित बालोचित क्रीड़ाएँ करते रहते थे।
तौ देवौ मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ ।

तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥ वे दोनों देववन्दित देवता थे तो भी मानवी दीक्षा ग्रहण करनेके कारण मानव-जातिके अनुरूप गुणोंवाली क्रीड़ाएँ करते हुए वनमें विचरते थे।

ततः कृष्णो महातेजास्तदा गत्वा तु गोव्रजम् । गिरियज्ञं तमैवैष प्रकृतं गोपदारकैः ॥ बुभुजे पायसं शौरिरीश्वरः सर्वभूतकृत् । तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीकृष्ण गौओंके व्रजमें जाकर गोपबालकोंद्वारा किये जानेवाले गिरियज्ञमें सम्मिलित हो वहाँ सर्वभूतस्रष्टा ईश्वरके रूपमें अपनेको प्रकट करके (गिरिराजके लिये समर्पित) खीरको स्वयं ही खाने लगे।

तं दृष्ट्वा गोपकाः सर्वे कृष्णमेव समर्चयन् ॥ पूज्यमानस्ततो गोपैर्दिव्यं वपुर्धारयत् । उन्हें देखकर सब गोप भगवद्बुद्धिसे श्रीकृष्णके उस स्वरूपकी ही पूजा करने लगे। गोपालोंद्वारा पूजित श्रीकृष्णने दिव्य रूप धारण कर लिया।

धृतो गोवर्धनो नाम सप्ताहं पर्वतस्तदा ॥ शिशुना वासुदेवेन गवार्थमरिमर्दन । शत्रुमर्दन युधिष्ठिर! (जब इन्द्र वर्षा कर रहे थे, उस समय) बालक वासुदेवने गौओंकी रक्षाके लिये एक सप्ताहतक गोवर्धन पर्वतको अपने हाथपर उठा रखा था।

क्रीडमानस्तदा कृष्णः कृतवान् कर्म दुष्करम् ॥ तदद्भुतमिवात्रासीत् सर्वलोकस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय श्रीकृष्णने खेल-खेलमें ही अत्यन्त दुष्कर कर्म कर डाला, जो सब लोगोंके लिये अत्यन्त अद्भुत-सा था।

देवदेवः क्षितिं गत्वा कृष्णं दृष्ट्वा मुदान्वितः ॥ गोविन्द इति तं ह्युक्त्वा ह्यभ्यषिञ्चत् पुरंदरः । इत्युक्त्वाऽऽश्लिष्य गोविन्दं पुरुहूतोऽभ्ययाद् दिवम् । देवाधिदेव इन्द्रने भूतलपर जाकर जब श्रीकृष्णको (गोवर्धन धारण किये) देखा, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीकृष्णको 'गोविन्द' नाम देकर उनका ('गवेन्द्र' पदपर) अभिषेक किया। देवराज इन्द्र गोविन्दको हृदयसे लगाकर उनकी अनुमति ले स्वर्गलोकको चले गये।

अथारिष्ट इति ख्यातं दैत्यं वृषभविग्रहम् । जघान तरसा कृष्णः पशूनां हितकाम्यया ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णने पशुओंके हितकी कामनासे वृषभरूपधारी अरिष्ट नामक दैत्यको वेगपूर्वक मार गिराया।

केशिनं नाम दैतेयं राजन् वै हयविग्रहम् ।

तथा वनगतं पार्थ गजायुतबलं हयम् ॥
प्रहितं भोजपुत्रेण जघान पुरुषोत्तमः ।
राजन्! व्रजमें केशी नामका एक दैत्य रहता था, जिसका शरीर घोड़ेके समान था। उसमें दस हजार हाथियोंका बल था। कुन्तीनन्दन! उस अश्वरूपधारी दैत्यको भोजकुलोत्पन्न कंसने भेजा था। वृन्दावनमें आनेपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उसे भी अरिष्टासुरकी भाँति मार दिया।
आन्ध्रं मल्लं च चाणूरं निजघान महासुरम् ॥
कंसके दरबारमें एक आन्ध्रदेशीय मल्ल था, जिसका नाम था चाणूर। वह एक महान् असुर था। श्रीकृष्णने उसे भी मार डाला।
सुनामानममित्रघ्नं सर्वसैन्यपुरस्कृतम् ।
बालरूपेण गोविन्दो निजघान च भारत ॥
भरतनन्दन! (कंसका भाई) शत्रुनाशक सुनामा कंसकी सारी सेनाका अगुआ—सेनापति था। गोविन्द अभी बालक थे, तो भी उन्होंने सुनामाको मार दिया।
बलदेवेन चायत्तः समाजे मुष्टिको हतः ।
भारत! (दंगल देखनेके लिये जुटे हुए) जनसमाजमें युद्धके लिये तैयार खड़े हुए मुष्टिक नामक पहलवानको बलरामजीने अखाड़ेमें ही मार दिया।
त्रासितश्च तदा कंसः स हि कृष्णेन भारत ॥
युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्णने कंसके मनमें भारी भय उत्पन्न कर दिया।
ऐरावतं युयुत्सन्तं मातङ्गानामिवर्षभम् ।
कृष्णः कुवलयापीडं हतवांस्तस्य पश्यतः ॥
हाथियोंमें श्रेष्ठ कुवलयापीडको, जो ऐरावतकुलमें उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्णको कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्णने कंसके देखते-देखते ही मार गिराया।

हत्वा कंसममित्रघ्नः सर्वेषां पश्यतां तदा ।
अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रोः पादमवन्दत ॥

फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने सब लोगोंके सामने ही कंसको मारकर उग्रसेनको राजपदपर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी-वसुदेवके चरणोंमें प्रणाम किया।
एवमादीनि कर्माणि कृतवान् वै जनार्दनः ।
उवास कतिचित् तत्र दिनानि सहलायुधः ॥

इस प्रकार जनार्दनने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनोंतक बलरामजीके साथ वे मथुरामें ही रहे।
ततस्तौ जग्मतुस्तात गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।
गुरुशुश्रूषया युक्तौ धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ ॥

तात युधिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपतिके यहाँ (उज्जयिनीपुरीमें) विद्याध्ययनके लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा-परायण हो सदा धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहे।
व्रतमुग्रं महात्मानौ विचरन्तावतिष्ठताम् ।
अहोरात्रचतुष्षष्ट्या षडङ्गं वेदमवापतुः ॥

वे दोनों महात्मा कठोर व्रतका पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लिया।
लेख्यं च गणितं चोभौ प्राप्तुतां यदुनन्दनौ ।
गान्धर्ववेदं वैद्यं च सकलं समवापतुः ॥

इतना ही नहीं, उन यदुकुलकुमारोंने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वेदको भी उतने ही समयके भीतर जान लिया। हस्तिशिक्षामश्वशिक्षां द्वादशाहेन चापतुः । तावुभौ जग्मतुर्वीरौ गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।। धनुर्वेदचिकीर्षार्थं धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ । गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षाको तो उन्होंने कुल बारह दिनोंमें ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखनेके लिये पुनः सान्दीपनि मुनिके पास गये। ताविष्वास्त्रवराचार्यमभिगम्य प्रणम्य च ।। तेन तौ सत्कृतौ राजन् विचरन्ताववन्तिषु । राजन्! धनुर्वेदके श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपतिके पास जाकर उन दोनोंने प्रणाम किया। सान्दीपनिने उन्हें सत्कारपूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्तीमें विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पञ्चाशद्भिरहोरात्रैर्दशाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् ।। सरहस्यं धनुर्वेदं सकलं ताववापतुः । पचास दिन-रातमें ही उन दोनोंने दस अंगोंसे युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्यसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया। दृष्ट्वा कृतास्त्रौ विप्रेन्द्रो गुर्वर्थे तावचोदयत् ।। अयाचतार्थं गोविन्दं ततः सान्दीपनिर्विभुः । उन दोनों भाइयोंको अस्त्र-विद्यामें निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनिने उन्हें गुरुदक्षिणा देनेकी आज्ञा दी। सान्दीपनिजी सब विषयोंमें विद्वान् थे। उन्होंने श्रीकृष्णसे अपने अभीष्ट मनोरथकी याचना इस प्रकार की।

सान्दीपनिरुवाच

मम पुत्रः समुद्रेऽस्मिंस्तिमिना चापवाहितः ।। पुत्रमानय भद्रं ते भक्षितं तिमिना मम । **सान्दीपनिजी बोले—**मेरा पुत्र इस समुद्रमें नहा रहा था, उस समय 'तिमि' नामक जलजन्तु उसे पकड़कर भीतर ले गया और उसके शरीरको खा गया। तुम दोनोंका भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्रको जीवित करके यहाँ ला दो।

भीष्म उवाच

आर्ताय गुरवे तत्र प्रतिशुश्राव दुष्करम् ।। अशक्यं त्रिषु लोकेषु कर्तुमन्येन केनचित् । **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्रशोकसे आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थी, तीनों लोकोंमें दूसरे किसी पुरुषके लिये इस

कार्यका साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्णने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली।
यश्च सान्दीपनेः पुत्रं जघान भरतर्षभ ।।
सोऽसुरः समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातितः ।
भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपानिके पुत्रको मारा था, उस असुरको उन दोनों भाइयोंने युद्ध करके समुद्रमें मार गिराया।
ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रसादादमितौजसः ।।
दीर्घकालं गतः प्रेतं पुनरासीच्छरीरवान् ।
तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके कृपाप्रसादसे सान्दीपानिका पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोकमें जा चुका था, पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा।
तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ।।
सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत ।
वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ।
ऐश्वर्याणि च सर्वाणि गवाश्वं च धनानि च ।।
सर्वं तदुपजह्राते गुरवे रामकेशवौ ।
ततस्तं पुत्रमादाय ददौ च गुरवे प्रभुः ।।
बलराम और श्रीकृष्णने अपने गुरुको सब प्रकारके ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात् गुरुपुत्रको लेकर भगवान्ने गुरुजीको सौंप दिया।
तं दृष्ट्वा पुत्रमायान्तं सान्दीपनिपुरे जनाः ।
अशक्यमेतत् सर्वेषामचिन्त्यमिति मेनिरे ।।
कश्च नारायणादन्यश्चिन्तयेदिदमद्भुतम् ।
उस पुत्रको आया देख सान्दीपानिके नगरके लोग यह मान गये कि श्रीकृष्णके द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगोंके लिये असम्भव और अचिन्त्य है। भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्यको सोच भी सके (करना तो दूरकी बात है)।
गदापरिघयुद्धेषु सर्वास्त्रेषु च केशवः ।।
परमां मुख्यतां प्राप्तः सर्वलोकेषु विश्रुतः ।
भगवान् श्रीकृष्णने गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया। वे समस्त लोकोंमें विख्यात हो गये।
भोजराजतनूजोऽपि कंसस्तात युधिष्ठिर ।।
अस्त्रज्ञाने बले वीर्ये कार्तवीर्यसमोऽभवत् ।
तात युधिष्ठिर! भोजराजकुमार कंस भी अस्त्रज्ञान, बल और पराक्रममें कार्तवीर्य अर्जुनकी समानता करता था।

तस्य भोजपतेः पुत्राद् भोजराज्यविवर्धनात् ।। उद्विजन्ते स्म राजानः सुपर्णादिव पन्नगाः । भोजवंशके राज्यकी वृद्धि करनेवाले भोजराजकुमार कंससे भूमण्डलके सब राजा उसी प्रकार उद्विग्न रहते थे, जैसे गरुड़से सर्प। चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनः ।। शतं शतसहस्राणि पादातास्तस्य भारत । भरतनन्दन! उसके यहाँ धनुष, खड्ग और चमचमाते हुए भाले लेकर विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले एक करोड़ पैदल सैनिक थे। अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम् ।। अभवन् भोजराजस्य जाम्बूनदमयध्वजाः । भोजराजके रथी सैनिक, जिनके रथोंपर सुवर्णमय ध्वज फहराते रहते थे तथा जो शूरवीर होनेके साथ ही युद्धमें कभी पीठ दिखलानेवाले नहीं थे, आठ लाखकी संख्यामें थे। स्फुरत्काञ्चनकक्ष्यास्तु गजास्तस्य युधिष्ठिर ।। तावन्त्येव सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले हाथीसवार भी आठ ही लाख थे। उनके हाथियोंकी पीठपर सुवर्णके चमकीले हौदे कसे होते थे। ते च पर्वतसङ्काशाश्चित्रध्वजपताकिनः ।। बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजाः । भोजराजके वे पर्वताकार गजराज विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होते थे और सदा संतुष्ट रहते थे। स्वलङ्कृतानां शीघ्राणां करेणूनां युधिष्ठिर । अभवद् भोजराजस्य द्विस्तावद्धि महद् बलम् ।। युधिष्ठिर! भोजराज कंसके यहाँ आभूषणोंसे सजी हुई शीघ्रगामिनी हथिनियोंकी विशाल सेना गजराजोंकी अपेक्षा दूनी थी। षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै । अपरस्तु महाव्यूहः किशोराणां युधिष्ठिर ।। आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्षः केनचिद् बलात् । स च षोडशसाहस्रः कंसभ्रातृपुरस्सरः ।। उसके यहाँ सोलह हजार घोड़े ऐसे थे, जिनका रंग पलासके फूलकी भाँति लाल था। राजन्! किशोर-अवस्थाके घोड़ोंका एक दूसरा दल भी मौजूद था, जिसकी संख्या सोलह हजार थी। इन अश्वोंके सवार भी बहुत अच्छे थे। इस अश्वसेनाको कोई भी बलपूर्वक दबा नहीं सकता था। कंसका भाई सुनामा इन सबका सरदार था। सुनामा सदृशस्तेन स कंसं पर्यपालयत् ।

वह भी कंसके ही समान बलवान् था एवं सदा कंसकी रक्षाके लिये तत्पर रहता था।
य आसन् सर्ववर्णास्तु हयास्तस्य युधिष्ठिर ।।
स गणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस्र उच्यते ।
युधिष्ठिर! कंसके यहाँ घोड़ोंका एक और भी बहुत बड़ा दल था, जिसमें सभी रंगके घोड़े थे। उस दलका नाम था मिश्रक। मिश्रकोंकी संख्या साठ हजार बतलायी जाती है।
कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम् ।।
मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्वतवशानुगाम् ।
(कंसके साथ होनेवाला महान् समर एक भयंकर नदीके समान था।) कंसका रोष ही उस नदीका महान् वेग था। ऊँचे-ऊँचे ध्वज तटवर्ती वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। मतवाले हाथी बड़े-बड़े ग्राहोंके समान थे। वह नदी यमराजकी आज्ञाके अधीन होकर चलती थी।
शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम् ।।
गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम् ।
अस्त्र-शस्त्रोंके समूह उसमें फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। सवारोंका वेग उसमें महान् जलप्रवाह-सा प्रतीत होता था। गदा और परिघ पाठीन नामक मछलियोंके सदृश जान पड़ते थे। नाना प्रकारके कवच सेवारके समान थे।
रथनागमहावर्ता नानारुधिरकर्दमाम् ।।
चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्रदाम् ।
रथ और हाथी उसमें बड़ी-बड़ी भँवरोंका दृश्य उपस्थित करते थे। नाना प्रकारका रक्त ही कीचड़का काम करता था। विचित्र धनुष उठती हुई लहरोंके समान जान पड़ते थे। रथ और अश्वोंका समूह ह्रदके समान था।
महामृधनदीं घोरां योधावर्तननिःस्वनाम् ।।
को वा नारायणादन्यः कंसहन्ता युधिष्ठिर ।
योद्धाओंके इधर-उधर दौड़ने या बोलनेसे जो शब्द होता था, वही उस भयानक समर-सरिताका कलकल नाद था। युधिष्ठिर! भगवान् नारायणके सिवा ऐसे कंसको कौन मार सकता था?
एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत ।।
व्यधमद् भोजपुत्रस्य महाभ्राणीव मारुतः ।
भारत! जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार इन भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रके रथमें बैठकर कंसकी उपर्युक्त सारी सेनाओंका संहार कर डाला।
तं सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम् ।।
मानयामास मानार्हा देवकीं ससुहृद्गणाम् ।
सभामें विराजमान कंसको मन्त्रियों और परिवारके साथ मारकर श्रीकृष्णने सुहृदोंसहित सम्माननीय माता देवकीका समादर किया।