महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नामक वनके सदृश मनोहर उपवनोंसे घिरी हुई द्वारकापुरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो आकाशमें तारिकाओंसे व्याप्त स्वर्गपुरी शोभा पा रही हो।
भाति रैवतकः शैलो रम्यसानुर्महाजिरः ।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां द्वारकायां विभूषणम् ॥
रमणीय द्वारकापुरीकी पूर्वदिशामें महाकाय रैवतक पर्वत, जो उस पुरीका आभूषणरूप था, सुशोभित हो रहा था। उसके शिखर बड़े मनोहर थे।
दक्षिणस्यां लतावेष्टः पञ्चवर्णो विराजते ।
इन्द्रकेतुप्रतीकाशः पश्चिमां दिशमाश्रितः ॥
सुकक्षो राजतः शैलश्चित्रपुष्पमहावनः ।
उत्तरस्यां दिशि तथा वेणुमन्तो विराजते ॥
मन्दराद्रिप्रतीकाशः पाण्डरः पाण्डवर्षभ ।
पुरीके दक्षिण भागमें लतावेष्ट नामक पर्वत शोभा पा रहा था, जो पाँच रंगका होनेके कारण इन्द्रध्वज-सा प्रतीत होता था। पश्चिमदिशामें सुकक्ष नामक रजत-पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित महान् वन शोभा पा रहा था। पाण्डवश्रेष्ठ! इसी प्रकार उत्तरदिशामें मन्दराचलके सदृश श्वेत वर्णवाला वेणुमन्त पर्वत शोभायमान था।
चित्रकम्बलवर्णाभं पाञ्चजन्यवनं तथा ॥
सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति ।
रैवतक पर्वतके पास चित्रकम्बलके-से वर्णवाले पांचजन्यवन तथा सर्वर्तुकवनकी भी बड़ी शोभा होती थी।
लतावेष्टं समन्तात् तु मेरुप्रभवनं महत् ॥
भाति तालवनं चैव पुष्पकं पुण्डरीकवत् ।
लतावेष्ट पर्वतके चारों ओर मेरुप्रभ नामक महान् वन, तालवन तथा कमलोंसे सुशोभित पुष्पकवन शोभा पा रहे हैं।
सुकक्षं परिवार्यैनं चित्रपुष्पं महावनम् ॥
शतपत्रवनं चैव करवीरकुसुम्भि च ।
सुकक्ष पर्वतको चारों ओरसे घेरकर चित्रपुष्प नामक महावन, शतपत्रवन, करवीरवन और कुसुम्भिवन सुशोभित होते हैं।
भाति चैत्ररथं चैव नन्दनं च महावनम् ॥
रमणं भावनं चैव वेणुमन्तं समन्ततः ।
वेणुमन्त पर्वतके सब ओर चैत्ररथ, नन्दन, रमण और भावन नामक महान् वन शोभा पाते हैं।
भाति पुष्करिणी रम्या पूर्वस्यां दिशि भारत ॥
धनुः शतपरीणाहा केशवस्य महात्मनः ।
भारत! महात्मा केशवकी उस पुरीमें पूर्वदिशाकी ओर एक रमणीय पुष्करिणी शोभा पाती है, जिसका विस्तार सौ धनुष है।
महापुरीं द्वारवतीं पञ्चाशद्भिर्मुखैर्युताम् ।
प्रविशे द्वारकां रम्यां भासयन्तीं समन्ततः ॥
पचास दरवाजोंसे सुशोभित और सब ओरसे प्रकाशमान उस सुरम्य महापुरी द्वारकामें श्रीकृष्णने प्रवेश किया।
अप्रमेयां महोत्सेधां महागाधपरिप्लवाम् ।
प्रासादवरसम्पन्नां श्वेतप्रासादशालिनीम् ॥
वह कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था। उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी। वह पुरी चारों ओर अत्यन्त अगाध जलराशिसे घिरी हुई थी। सुन्दर-सुन्दर महलोंसे भरी हुई द्वारका श्वेत अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी।
तीक्ष्णयन्त्रशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैः समन्विताम् ।
आयसैश्च महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
तीखे यन्त्र, शतघ्नी, विभिन्न यन्त्रोंके समुदाय और लोहेके बने हुए बड़े-बड़े चक्रोंसे सुरक्षित द्वारकापुरीको भगवान्ने देखा।
अष्टौ रथसहस्राणि प्राकारे किङ्किणीकिनः ।
समुच्छ्रितपताकानि यथा देवपुरे तथा ॥
देवपुरीकी भाँति उसकी चहारदीवारीके निकट क्षुद्रघण्टिकाओंसे सुशोभित आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें पताकाएँ फहराती रहती थीं।
अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम् ।
द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन है एवं लम्बाई बारह योजन है अर्थात् वह कुल ९६ योजन विस्तृत है। उसका उपनिवेश (समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात् १९२ योजन विस्तृत है। वह पुरी सब प्रकारसे अविचल है। श्रीकृष्णने उस पुरीको देखा।
अष्टमार्गां महाकक्ष्यां महाषोडशचत्वराम् ।
एवं मार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम् ॥
उसमें जानेके लिये आठ मार्ग हैं, बड़ी-बड़ी ड्योढ़ियाँ हैं और सोलह बड़े-बड़े चौराहे हैं। इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिष्कृत द्वारकापुरी साक्षात् शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी है।
व्यूहानामान्तरा मार्गाः सप्त चैव महापथाः ।
तत्र सा विहिता साक्षान्नगरी विश्वकर्मणा ॥
व्यूहोंके बीच-बीचमें मार्ग बने हैं, सात बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। साक्षात् विश्वकर्माने इस द्वारकानगरीका निर्माण किया है।
काञ्चनैर्मणिसोपानैरुपैता जनहर्षिणी।
गीतघोषमहाघोषैः प्रासादप्रवरैः शुभा॥
सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे सुशोभित यह नगरी जन-जनको हर्ष प्रदान करनेवाली है। यहाँ गीतके मधुर स्वर तथा अन्य प्रकारके घोष गूँजते रहते हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंके कारण वह पुरी परम सुन्दर प्रतीत होती है।
तस्मिन् पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम्।
वेश्मानि जहृषे दृष्ट्वा भगवान् पाकशासनः॥
नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकामें यशस्वी दशार्हवंशियोंके महल देखकर भगवान् पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई।
समुच्छ्रितपताकानि पारिप्लवनिभानि च।
काञ्चनाभानि भास्वन्ति मेरुकूटनिभानि च॥
उन महलोंके ऊपर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मनोहर भवन मेघोंके समान जान पड़ते थे और सुवर्णमय होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान थे। वे मेरुपर्वतके उत्तुंग शिखरोंके समान आकाशको चूम रहे थे।
सुधापाण्डरशृङ्गैश्च शातकुम्भपरिच्छदैः।
रत्नसानुगुहाशृङ्गैः सर्वरत्नविभूषितैः॥
उन गृहोंके शिखर चूनेसे लिपे-पुते और सफेद थे। उनकी छतें सुवर्णकी बनी हुई थीं। वहाँके शिखर, गुफा और शृंग—सभी रत्नमय थे। उस पुरीके भवन सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे।
सहर्म्यैः सार्धचन्द्रैश्च सनिर्यूहैः सपञ्जरैः।
सयन्त्रगृहसम्बाधैः सधातुभिरिवाद्रिभिः॥
(भगवान्ने देखा) वहाँ बड़े-बड़े महल, अटारी तथा छज्जे हैं और उन छज्जोंमें लटकते हुए पक्षियोंके पिंजड़े शोभा पाते हैं। कितने ही यन्त्रगृह वहाँके महलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटिल होनेके कारण द्वारकाके भवन विविध धातुओंसे विभूषित पर्वतोंके समान शोभा धारण करते हैं
मणिकाञ्चनभौमैश्च सुधामृष्टतलैस्तथा।
जाम्बूनदमयैर्द्वारैर्वैदूर्यविकृतार्गलैः॥
कुछ गृह तो मणिके बने हैं, कुछ सुवर्णसे तैयार किये गये हैं और कुछ पार्थिव पदार्थों (ईंट, पत्थर आदि) द्वारा निर्मित हुए हैं। उन सबके निम्नभाग चूनेसे स्वच्छ किये गये हैं। उनके दरवाजे (चौखट-किंवाड़े) जाम्बूनद सुवर्णके बने हैं और अर्गलाएँ (सिटकनियाँ) वैदूर्यमणिसे तैयार की गयी हैं।
सर्वर्तुसुखसंस्पर्शैर्महाधनपरिच्छदैः।
रम्यसानुगुहाशृङ्गैर्विचित्रैरिव पर्वतैः॥
उन गृहोंका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुख देनेवाला है। वे सभी बहुमूल्य सामानोंसे भरे हैं। उनकी समतल भूमि, गुफा और शिखर सभी अत्यन्त मनोहर हैं। इससे उन भवनोंकी शोभा विचित्र पर्वतोंके समान जान पड़ती है। पञ्चवर्णसुवर्णैश्च पुष्पवृष्टिसमप्रभैः । तुल्यपर्जन्यनिर्घोषैर्नानावर्णैरिवाम्बुदैः ॥ उन गृहोंमें पाँच रंगोंके सुवर्ण मढ़े गये हैं। उनसे जो बहुरंगी आभा फैलती है, वह फुलझड़ी-सी जान पड़ती है। उन गृहोंसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द होते रहते हैं। वे देखनेमें अनेक वर्णोंके बादलोंके समान जान पड़ते हैं। महेन्द्रशिखरप्रख्यैर्विहितैर्विश्वकर्मणा । आलिखद्भिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरैः ॥ विश्वकर्माके बनाये हुए वे (ऊँचे और विशाल) भवन महेन्द्र पर्वतके शिखरोंकी शोभा धारण करते हैं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो वे आकाशमें रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चन्द्रमा और सूर्यसे भी बढ़कर है। तैर्दाशार्हमहाभागैर्बभासे भवनह्रदैः । चण्डनागाकुलैर्घोरैर्ह्रदैर्भोगवती यथा ॥ जैसे भोगवती गङ्गा प्रचण्ड नागगणोंसे भरे हुए भयंकर कुण्डोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी दशार्हकुलके महान् सौभाग्यशाली पुरुषोंसे भरे हुए उपर्युक्त भवनरूपी ह्रदोंके द्वारा शोभा पा रही है। कृष्णध्वजोपवाह्यैश्च दाशार्हायुधरोहितैः । वृष्णिमत्तमयूरैश्च स्त्रीसहस्रप्रभाकुलैः ॥ वासुदेवेन्द्रपर्जन्यैर्गृहमेघैरलङ्कृता । ददृशे द्वारकातीव मेघैर्द्यौरिव संवृता । जैसे आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित होता है, उसी प्रकार द्वारकापुरी मनोहर भवनरूपी मेघोंसे अलंकृत दिखायी देती है। ये भगवान् श्रीकृष्ण ही वहाँ इन्द्र एवं पर्जन्य (प्रमुख मेघ)-के समान हैं। वृष्णिवंशी युवक मतवाले मयूरोंके समान उन भवनरूपी मेघोंको देखकर हर्षसे नाच उठते हैं। सहस्रों स्त्रियोंकी कान्ति विद्युत्की प्रभाके समान उनमें व्याप्त है। जैसे मेघ कृष्णध्वज (अग्नि या सूर्यकिरण)-के उपबाह्य (आधेय अथवा कार्य) हैं, उसी प्रकार द्वारकाके भवन भी कृष्णध्वजसे विभूषित उपबाह्य (वाहनों)-से सम्पन्न हैं। यदुवंशियोंके विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उन मेघसदृश महलोंमें इन्द्रधनुषकी बहुरंगी छटा छिटकाते हैं। साक्षाद् भगवतो वेश्म विहितं विश्वकर्मणा ।। ददृशुर्देवदेवस्य चतुर्योजनमायतम् । तावदेव च विस्तीर्णमप्रमेयं महाधनैः ।।
प्रासादवरसम्पन्नं युक्तं जगति पर्वतैः ।
भारत! देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका भवन, जिसे साक्षात् विश्वकर्माने अपने हाथों बनाया है, चार योजन लम्बा और उतना ही चौड़ा दिखायी देता है। उसमें कितनी बहुमूल्य सामग्रियाँ लगी हैं! इसका अनुमान लगाना असम्भव है। उस विशाल भवनके भीतर सुन्दर-सुन्दर महल और अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। वह प्रासाद जगत्के सभी पर्वतीय दृश्योंसे युक्त है। श्रीकृष्ण, बलराम और इन्द्रने उस द्वारकाको देखा।
यं चकार महाबाहुस्त्वष्टा वासवचोदितः ।।
प्रासादं पद्मनाभस्य सर्वतो योजनायतम् ।
मेरोरिव गिरेः शृङ्गमूच्छ्रितं काञ्चनायुतम् ।
रुक्मिण्याः प्रवरो वासो विहितः सुमहात्मना ।।
महाबाहु विश्वकर्माने इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् पद्मनाभके लिये जिस मनोहर प्रासादका निर्माण किया है, उसका विस्तार सब ओरसे एक-एक योजनका है। उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया है, जिससे वह मेरुपर्वतके उत्तुंग शृंगकी शोभा धारण कर रहा है। वह प्रासाद महात्मा विश्वकर्माने महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया है। यह उनका सर्वोत्तम निवास है।
सत्यभामा पुनर्वेश्म सदा वसति पाण्डरम् ।
विचित्रमणिसोपानं यं विदुः शीतवानिति ।।
श्रीकृष्णकी दूसरी पटरानी सत्यभामा सदा श्वेत-रंगके प्रासादमें निवास करती हैं, जिसमें विचित्र मणियोंके सोपान बनाये गये हैं। उसमें प्रवेश करनेपर लोगोंको (ग्रीष्म-ऋतुमें
भी) शीतलताका अनुभव होता है।
विमलादित्यवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतम्।
व्यक्तबद्धं वनोद्देशे चतुर्दिशि महाध्वजम्॥
निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती हैं। एक सुन्दर उद्यानमें उस भवनका निर्माण किया गया है। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहराती रहती हैं।
स च प्रासादमुख्योऽत्र जाम्बवत्या विभूषितः।
प्रभया भूषणैश्चित्रैस्त्रैलोक्यमिव भासयन्॥
यस्तु पाण्डरवर्णभस्तयोरन्तरमाश्रितः।
विश्वकर्माकरोदेनं कैलासशिखरोपमम्॥
इसके सिवा वह प्रमुख प्रासाद, जो रुक्मिणी तथा सत्यभामाके महलोंके बीचमें पड़ता है और जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली रहती है, जाम्बवतीदेवीद्वारा विभूषित किया गया है। वह अपनी दिव्य प्रभा और विचित्र सजावटसे मानो तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा है। उसे भी विश्वकर्माने ही बनाया है। जाम्बवतीका वह विशाल भवन कैलास-शिखरके समान सुशोभित होता है।
जाम्बूनदप्रदीप्ताग्रः प्रदीप्तज्वलनोपमः।
सागरप्रतिमोऽतिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुतः॥
तस्मिन् गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी।
सुकेशी नाम विख्याता केशवेन निवेशिता॥
जिसका दरवाजा जाम्बूनद सुवर्णके समान उद्दीप्त होता है, जो देखनेमें प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता है। विशालतामें समुद्रसे जिसकी उपमा दी जाती है, जो मेरुके नामसे विख्यात है, उस महान् प्रासादमें गान्धारराजकी कुलीन कन्या सुकेशीको भगवान् श्रीकृष्णने ठहराया है।
पद्मकूट इति ख्यातः पद्मवर्णो महाप्रभः।
सुप्रभाया महाबाहो निवासः परमार्चितः॥
महाबाहो! पद्मकूट नामसे विख्यात जो कमलके समान कान्तिवाला प्रासाद है, वह महारानी सुप्रभाका परम पूजित निवासस्थान है।
यस्तु सूर्यप्रभो नाम प्रासादवर उच्यते।
लक्ष्मणायाः कुरुश्रेष्ठ स दत्तः शार्ङ्गधन्वना॥
कुरुश्रेष्ठ! जिस उत्तम प्रासादकी प्रभा सूर्यके समान है, उसे शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णने महारानी लक्ष्मणाको दे रखा है।
वैडूर्यवरवर्णाभः प्रासादो हरितप्रभः।
यं विदुः सर्वभूतानि हरिरित्येव भारत।
वासः स मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितः ।। महिष्या वासुदेवस्य भूषणं सर्ववेश्मनाम् । भारत! वैदूर्यमणिके समान कान्तिमान् हरे रंगका महल, जिसे देखकर सब प्राणियोंको ‘श्रीहरि’ ही हैं, ऐसा अनुभव होता है, वह मित्रविन्दाका निवासस्थान है। उसकी देवगण भी सराहना करते हैं। भगवान् वासुदेवकी रानी मित्रविन्दाका यह भवन अन्य सब महलोंका आभूषणरूप है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितः सर्वशिल्पिभिः ।। अतीव रम्यः सोऽप्यत्र प्रहसन्निव तिष्ठति । सुदत्तायाः सुवासस्तु पूजितः सर्वशिल्पिभिः ।। महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः । युधिष्ठिर! द्वारकामें जो दूसरा प्रमुख प्रासाद है, उसे सम्पूर्ण शिल्पियोंने मिलकर बनाया है। वह अत्यन्त रमणीय भवन हँसता-सा खड़ा है। सभी शिल्पी उसके निर्माण-कौशलकी सराहना करते हैं। उस प्रासादका नाम है केतुमान्। वह भगवान् वासुदेवकी महारानी सुदत्तादेवीका सुन्दर निवासस्थान है। प्रासादो विरजो नाम विरजस्को महात्मनः ।। उपस्थानगृहं तात केशवस्य महात्मनः । वहीं ‘विरज’ नामसे प्रसिद्ध एक प्रासाद है, जो निर्मल एवं रजोगुणके प्रभावसे शून्य है। वह परमात्मा श्रीकृष्णका उपस्थानगृह (खास रहनेका स्थान) है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र यं त्वष्टा व्यदधात् स्वयम् ।। योजनायतविष्कम्भं सर्वरत्नमयं विभोः । इसी प्रकार वहाँ एक और भी प्रमुख प्रासाद है, जिसे स्वयं विश्वकर्माने बनाया है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है। भगवान्का वह भवन सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्मित हुआ है। तेषां तु विहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः । सदने वासुदेवस्य मार्गसंजनना ध्वजाः ।। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सुन्दर सदनमें जो मार्गदर्शक ध्वज हैं, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये हैं। उन सबपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। घण्टाजालानि तत्रैव सर्वेषां च निवेशने । आहृत्य यदुसिंहेन वैजयन्त्यचलो महान् ।। द्वारकापुरीमें सभीके घरोंमें घंटा लगाया गया है। यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ लाकर वैजयन्ती पताकाओंसे युक्त पर्वत स्थापित किया है। हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्रद्युम्नसरो महत् । षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनविस्तृतम् ।।
वहाँ हंसकूट पर्वतका शिखर है, जो साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा है। वहीं इन्द्रद्युम्नसरोवर भी है, जिसका विस्तार बहुत बड़ा है। सकिन्नरमहानादं तदप्यमिततेजसः । पश्यतां सर्वभूतानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ वहाँ सब भूतोंके देखते-देखते किन्नरोंके संगीतका महान् शब्द होता रहता है। वह भी अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका ही लीलास्थल है। उसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। आदित्यपथगं यत् तन्मेरोः शिखरमुत्तमम् । जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ तदप्युत्पाट्य कृच्छ्रेण स्वं निवेशनमाहृतम् । भ्राजमानं पुरा तत्र सर्वौषधिविभूषितम् ॥ मेरुपर्वतका जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ जाम्बूनदमय दिव्य और त्रिभुवनविख्यात उत्तम शिखर है, उसे उखाड़कर भगवान् श्रीकृष्ण कठिनाई उठाकर भी अपने महलमें ले आये हैं। सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत वह मेरुशिखर द्वारकामें पूर्ववत् प्रकाशित है। यमिन्द्रभवनाच्छौरिराजहार परंतपः । पारिजातः स तत्रैव केशवेन निवेशितः ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिसे इन्द्रभवनसे हर ले आये थे, वह पारिजातवृक्ष भी उन्होंने द्वारकामें ही लगा रखा है। विहिता वासुदेवेन ब्रह्मस्थलमहाद्रुमाः ॥ शालतालाश्वकर्णाश्चशतशाखाश्च रोहिणाः । भल्लातककपित्थाश्च चन्द्रवृक्षाश्च चम्पकाः ॥ खर्जूराः केतकाश्चैव समन्तात् परिरोपिताः । भगवान् वासुदेवने ब्रह्मलोकके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी लाकर द्वारकामें लगाया है। साल, ताल, अश्वकर्ण (कनेर), सौ शाखाओंसे सुशोभित वटवृक्ष, भल्लातक (भिलावा), कपित्थ (कैथ), चन्द्र (बड़ी इलायचीके) वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक (केवड़ा)—ये वृक्ष वहाँ सब ओर लगाये गये थे। पद्माकुलजलोपेता रक्ताः सौगन्धिकोत्पलाः ॥ मणिमौक्तिकवालूकाः पुष्करिण्यः सरांसि च । तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ॥ द्वारकामें जो पुष्करिणियाँ और सरोवर हैं, वे कमलपुष्पोंसे सुशोभित स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। उनकी आभा लाल रंगकी है। उनमें सुगन्धयुक्त उत्पल खिले हुए हैं। उनमें स्थित बालूके कण मणियों और मोतियोंके चूर्ण-जैसे जान पड़ते हैं। वहाँ लगाये हुए बड़े-बड़े वृक्ष उन सरोवरोंके सुन्दर तटोंकी शोभा बढ़ाते हैं। ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा ।
आहृत्य यदुसिंहेन तेऽपि तत्र निवेशिताः ॥ जो वृक्ष हिमालयपर उगते हैं तथा जो नन्दनवनमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी यदुप्रवर श्रीकृष्णने वहाँ लाकर लगाया है। रक्तपीतारुणप्रख्याः सितपुष्पाश्च पादपाः । सर्वर्तुफलपूर्णास्ते तेषु काननसंधिषु ॥ कोई वृक्ष लाल रंगके हैं, कोई पीत वर्णके हैं और कोई अरुण कान्तिसे सुशोभित हैं तथा बहुत-से वृक्ष ऐसे हैं, जिनमें श्वेत रंगके पुष्प शोभा पाते हैं। द्वारकाके उपवनोंमें लगे हुए पूर्वोक्त सभी वृक्ष सम्पूर्ण ऋतुओंके फलोंसे परिपूर्ण हैं। सहस्रपत्रपद्माश्च मन्दराश्च सहस्रशः । अशोकाः कर्णिकाराश्च तिलका नागमल्लिकाः ॥ कुरवा नागपुष्पाश्च चम्पकास्तृणगुल्मकाः । सप्तपर्णाः कदम्बाश्च नीपाः कुरबकास्तथा ॥ केतक्यः केसराश्चैव हिन्तालतलताटकाः । तालाः प्रियङ्गुवकुलाः पिण्डिका बीजपूरकाः ॥ द्राक्षामलकखर्जूरा मृद्वीका जम्बुकास्तथा । आम्राः पनसवृक्षाश्च अङ्कोलास्तिलतिन्दुकाः ॥ लिकुचाम्रातकाश्चैव क्षीरिका कण्टकी तथा । नालिकेरेङ्गुदाश्चैव उत्क्रोशकवनानि च ॥ वनानि च कदल्याश्च जातिमल्लिकपाटलाः । भल्लातककपित्थाश्च तैतभा बन्धुजीवकाः ॥ प्रवाला शोककाश्मर्यः प्राचीनाश्चैव सर्वशः । प्रियङ्गुबदरीभिश्च यवैः स्पन्दनचन्दनैः ॥ शमीबिल्वपलाशैश्च पाटलावटपिप्पलैः । उदुम्बरैश्च द्विदलैः पालाशैः पारिभद्रकैः ॥ इन्द्रवृक्षार्जुनैश्चैव अश्वत्थैश्चिरिबिल्वकैः । सौभञ्जनकवृक्षैश्च भल्लटैरृक्षसाह्वयैः ॥ सर्जैस्ताम्बूलवल्लीभिर्लवङ्गैः क्रमुकैस्तथा । वंशैश्च विविधैस्तत्र समन्तात् परिरोपितैः ॥ सहस्रदल कमल, सहस्रों मन्दार, अशोक, कर्णिकार, तिलक, नागमल्लिका, कुरव (कटसरैया), नागपुष्प, चम्पक, तृण, गुल्म, सप्तपर्ण (छितवन), कदम्ब, नीप, कुरबक, केतकी, केसर, हिंताल, तल, ताटक, ताल, प्रियंगु, वकुल (मौलसिरी), पिण्डिका, बीजपूर (बिजौरा), दाख, आँवला, खजूर, मुनक्का, जामुन, आम, कटहल, अंकोल, तिल, तिन्दुक, लिकुच (लीची), आमड़ा, क्षीरिका (काकोली नामकी जड़ी या पिंडखजूर), करटकी (बेर),
नारियल, इंगुद (हिंगोट), उत्क्रोशक़वन, कदलीवन, जाति (चमेली), मल्लिका (मोतिया), पाटल, भल्लातक, कपित्थ, तैतभ, बन्धुजीव (दुपहरिया), प्रवाल, अशोक और काश्मरी (गाँभारी) आदि सब प्रकारके प्राचीन वृक्ष, प्रियंगुलता, बेर, जौ, स्पन्दन, चन्दन, शमी, बिल्व, पलाश, पाटला, बड़, पीपल, गूलर, द्विदल, पालाश, पारिभद्रक, इन्द्रवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, अश्वत्थ, चिरिबिल्व, सौभंजन, भल्लट, अश्वपुष्प, सर्ज, ताम्बूललता, लवंग, सुपारी तथा नाना प्रकारके बाँस—ये सब द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णभवनके चारों ओर लगाये हैं।
ये च नन्दनजा वृक्षा ये च चैत्ररथे वने ।
सर्वे ते यदुनाथेन समन्तात् परिरोपिताः ॥
नन्दनवनमें और चैत्ररथवनमें जो-जो वृक्ष होते हैं, वे सभी यदुपति भगवान् श्रीकृष्णने लाकर यहाँ सब ओर लगाये हैं।
कुमुदोत्पलपूर्णाश्च वाप्यः कूपाः सहस्रशः ।
समाकुलमहावाप्यः पीता लोहितवालुकाः ॥
भगवान् श्रीकृष्णके गृहोद्यानमें कुमुद और कमलोंसे भरी हुई कितनी ही छोटी बावलियाँ हैं। सहस्रों कुएँ बने हुए हैं। जलसे भरी हुई बड़ी-बड़ी वापिकाएँ भी तैयार करायी गयी हैं, जो देखनेमें पीत वर्णकी हैं और जिनकी बालुकाएँ लाल हैं।
तस्मिन् गृहवने नद्यः प्रसन्नसलिला हृदाः ।
फुल्लोत्पलजलोपेता नानाद्रुमसमाकुलाः ॥
उनके गृहोद्यानमें स्वच्छ जलसे भरे हुए कुण्डवाली कितनी ही कृत्रिम नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं, जो प्रफुल्ल उत्पलयुक्त जलसे परिपूर्ण हैं तथा जिन्हें दोनों ओरसे अनेक प्रकारके वृक्षोंने घेर रखा है।
तस्मिन् गृहवने नद्यो मणिशर्करवालुकाः ।
मत्तबर्हिणसङ्घाश्च कोकिलाश्च मदोद्धताः ॥
उस भवनके उद्यानकी सीमामें मणिमय कंकड़ और बालुकाओंसे सुशोभित नदियाँ निकाली गयी हैं, जहाँ मतवाले मयूरोंके झुंड विचरते हैं और मदोन्मत्त कोकिलाएँ कुहू-कुहू किया करती हैं।
बभूवुः परमोपेताः सर्वे जगतिपर्वताः ।
तत्रैव गजयूथानि तत्र गोमहिषास्तथा ॥
निवासाश्च कृतास्तत्र वराहमृगपक्षिणाम् ।
उस गृहोद्यानमें जगत्के सभी श्रेष्ठ पर्वत अंशतः संगृहीत हुए हैं। वहाँ हाथियोंके यूथ तथा गाय-भैंसोंके झुंड रहते हैं। वहीं जंगली सूअर, मृग और पक्षियोंके रहनेयोग्य निवासस्थान भी बनाये गये हैं।
विश्वकर्मकृतः शैलः प्राकारस्तस्य वेश्मनः ॥
व्यक्तं किष्कुशतोद्यामः सुधाकरसमप्रभः ।
विश्वकर्माद्वारा निर्मित पर्वतमाला ही उस विशाल भवनकी चहारदीवारी है। उसकी ऊँचाई सौ हाथकी है और वह चन्द्रमाके समान अपनी श्वेत छटा छिटकाती रहती है। तेन ते च महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।। परिक्षिप्तानि हर्म्यस्य वनान्युपवनानि च । पूर्वोक्त बड़े-बड़े पर्वत, सरिताएँ, सरोवर और प्रासादके समीपवर्ती वन-उपवन इस चहारदीवारीसे घिरे हुए हैं। एवं तच्छिल्पिवर्येण विहितं विश्वकर्मणा ।। प्रविशन्नेव गोविन्दो ददर्श परितो मुहुः । इस प्रकार शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माद्वारा बनाये हुए द्वारकानगरमें प्रवेश करते समय भगवान् श्रीकृष्णने बारंबार सब ओर दृष्टिपात किया। इन्द्रः सहामरैः श्रीमांस्तत्र तत्रावलोकयत् । देवताओंके साथ श्रीमान् इन्द्रने वहाँ द्वारकाको सब ओर दृष्टि दौड़ाते हुए देखा। एवमालोक्यांचक्रुर्द्वारकामृभास्त्रयः । उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशाः ।। इस प्रकार उपेन्द्र (श्रीकृष्ण), बलराम तथा महायशस्वी इन्द्र इन तीनों श्रेष्ठ महापुरुषोंने द्वारकापुरीकी शोभा देखी। ततस्तं पाण्डरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन् गरुत्मतः ।। प्रीतः शङ्खमुपादध्मौ विद्धिषां रोमहर्षणम् । तदनन्तर गरुडके ऊपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक श्वेतवर्णवाले अपने उस पांचजन्य शंखको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला है। तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चुक्षुभे भृशम् ।। ररास च नभः सर्वं तच्चित्रमभवत् तदा । उस घोर शंखध्वनिसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सारा आकाशमण्डल गूँजने लगा। उस समय वहाँ यह अद्भुत बात हुई। पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्धकाः ।। विशोकाः समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात् । पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुडका दर्शन कर कुकुर और अन्धकवंशी यादव शोकरहित हो गये। शङ्खचक्रगदापाणिं सुपर्णशिरसि स्थितम् ।। दृष्ट्वा जहृषिरे कृष्णं भास्करोदयतेजसम् । भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे। वे गरुडके ऊपर बैठे थे। उनका तेज सूर्योदयके समान नूतन चेतना और उत्साह पैदा करनेवाला था। उन्हें देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ।
ततस्तूर्यप्रणादश्च भेरीणां च महास्वनः ॥ सिंहनादश्च सञ्जज्ञे सर्वेषां पुरवासिनाम् । तदनन्तर तुरही और भेरियाँ बज उठीं। उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी। समस्त पुरवासी भी सिंहनाद कर उठे।
ततस्ते सर्वदाशार्हाः सर्वे च कुकुरान्धकाः ॥ प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् । उस समय दाशार्ह, कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये।
वासुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशंखरवैः सह ॥ उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम् । राजा उग्रसेन भगवान् वासुदेवको आगे करके वेणुनाद और शंखध्वनिके साथ उनके महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये।
आनन्दितुं पर्यचरन् स्वेषु वेश्मसु देवकी ॥ रोहिणी च यथोद्देशमाहुकस्य च याः स्त्रियः । देवकी, रोहिणी तथा उग्रसेनकी स्त्रियाँ अपने-अपने महलोंमें भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन करनेके लिये यथास्थान खड़ी थीं। पास आनेपर उन सबने उनका यथावत् सत्कार किया।
हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयः ॥ एवमुक्तः स ह स्त्रीभिरीक्षितो मधुसूदनः । वे आशीर्वाद देती हुई इस प्रकार बोलीं—‘समस्त ब्राह्मणद्वेषी असुर मारे गये; अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सर्वत्र विजयी हो रहे हैं।’ स्त्रियोंने भगवान् मधुसूदनसे ऐसा कहकर उनकी ओर देखा।
ततः शौरिः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्ययात् ॥ चकाराथ यथोद्देशमीश्वरो मणिपर्वतम् । तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुडके द्वारा ही अपने महलमें गये। वहाँ उन परमेश्वरने एक उपयुक्त स्थानमें मणिपर्वतको स्थापित कर दिया।
ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदनः ॥ निधाय पुण्डरीकाक्षः पितुर्दर्शनलालसः । इसके बाद कमलनयन मधुसूदनने सभाभवनमें धन और रत्नोंको रखकर मन-ही-मन पिताके दर्शनकी अभिलाषा की।
ततः सान्दीपनिं पूर्वमुपस्पृष्ट्वा महायशाः ॥ ववन्दे पृथुताम्राक्षः प्रीयमाणो महाभुजः ।
फिर विशाल एवं कुछ लाल नेत्रोंवाले उन महायशस्वी महाबाहुने पहले मन-ही-मन गुरु सान्दीपनिके चरणोंका स्पर्श किया। तथाश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दगतचेतसम् ।। ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः । तत्पश्चात् भाई बलरामजीके साथ जाकर श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय पिता वसुदेवके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आये और उनका हृदय आनन्दके समुद्रके निमग्न हो गया। रामकृष्णौ समाश्लिष्य सर्वे चान्धकवृष्णयः ।। अन्धक और वृष्णिवंशके सब लोगोंने बलराम और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। तं तु कृष्णः समाहृत्य रत्नौघधनसंचयम् ।। व्यभजत् सर्ववृष्णिभ्य आध्वमिति चाब्रवीत् । भगवान् श्रीकृष्णने रत्न और धनकी उस राशिको एकत्र करके अलग-अलग बाँट दिया और सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंसे कहा—‘यह सब आपलोग ग्रहण करें’। यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान् यदुनन्दनः ।। सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः । ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च ।। व्यभजत् तानि तेभ्योऽथ सर्वेभ्यो यदुनन्दनः । तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने यदुवंशियोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, उन सबसे क्रमशः मिलकर सब यादवोंको नाम ले-लेकर बुलाया और उन सबको वे सभी रत्नमय धन पृथक्-पृथक् बाँट दिये। सा केशवमहामात्रैर्महेन्द्रप्रमुखैः सह ।। शुशुभे वृष्णिशार्दूलैः सिंहैरिव गिरेर्गुहा । जैसे पर्वतकी कन्दरा सिंहोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी उस समय भगवान् श्रीकृष्ण, देवराज इन्द्र तथा वृष्णिवंशी वीर पुरुषसिंहोंसे अत्यन्त शोभा पा रही थी। अथासनगतान् सर्वानुवाच विबुधाधिपः ।। शुभया हर्षयन् वाचा महेन्द्रस्तान् महायशाः । कुकुरान्धकमुख्यांश्च तं च राजानमाहुकम् ।। जब सभी यदुवंशी अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये, उस समय देवताओंके स्वामी महायशस्वी महेन्द्र अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा कुकुर और अन्धक आदि यादवों तथा राजा उग्रसेनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले।
इन्द्र उवाच
यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः ।
यत् कृतं वासुदेवेन तद् वक्ष्यामि समासतः ॥
इन्द्रने कहा— यदुवंशी वीरो! परमात्मा श्रीकृष्णका मनुष्य-योनिमें जिस उद्देश्यको लेकर अवतार हुआ है और भगवान् वासुदेवने इस समय जो महान् पुरुषार्थ किया है, वह सब मैं संक्षेपमें बताऊँगा।
अयं शतसहस्राणि दानवानामरंदिमः ।
निहत्य पुण्डरीकाक्षः पातालविवरं ययौ ॥
यच्च नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः ।
तदिदं शौरिणा वित्तं प्रापितं भवतामिह ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन श्रीहरिने एक लाख दानवोंका संहार करके उस पाताल-विवरमें प्रवेश किया था, जहाँ पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि दैत्य भी नहीं पहुँच सके थे। भगवान् आपलोगोंके लिये यह धन वहींसे लाये हैं।
सपाशं मुरमाक्रम्य पाञ्चजन्यं च धीमता ।
शिलासङ्घानतिक्रम्य निशुम्भः सगणो हतः ।
बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पाशसहित मुर नामक दैत्यको कुचलकर पंचजन नामवाले राक्षसोंका विनाश किया और शिला-समूहोंको लाँघकर सेवकगणोंसहित निशुम्भको मौतके घाट उतार दिया।
हयग्रीवश्च विक्रान्तो निहतो दानवो बली ॥
मथितश्च मृधे भौमः कुण्डले चाहृते पुनः ।
प्राप्तं च दिवि देवेषु केशवेन महद् यशः ॥
तत्पश्चात् इन्होंने बलवान् एवं पराक्रमी दानव हयग्रीवपर आक्रमण करके उसे मार गिराया और भौमासुरका भी युद्धमें संहार कर डाला। इसके बाद केशवने माता अदितिके कुण्डल प्राप्त करके उन्हें यथास्थान पहुँचाया और स्वर्गलोक तथा देवताओंमें अपने महान् यशका विस्तार किया।
वीतशोकभयाबाधाः कृष्णबाहुबलाश्रयाः ।
यजन्तु विविधैः सोमैर्मखैरन्धकवृष्णयः ॥
अन्धक और वृष्णिवंशके लोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेकर शोक, भय और बाधाओंसे मुक्त हैं। अब ये सभी नाना प्रकारके यज्ञों तथा सोमरसद्वारा भगवान्का यजन करें।
पुनर्बाणवधे शौरिमादित्या वसुभिः सह ।
मन्मुखा हि गमिष्यन्ति साध्याश्च मधुसूदनम् ॥
अब पुनः बाणासुरके वधका अवसर उपस्थित होनेपर मैं तथा सब देवता, वसु और साध्यगण मधुसूदन श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित होंगे।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान् । सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! समस्त कुकुर और अन्धकवंशके लोगोंसे ऐसा कहकर सबसे विदा ले देवराज इन्द्रने बलराम, श्रीकृष्ण और वसुदेवको हृदयसे लगाया। प्रद्युम्नसाम्बनिश्ठाननिरुद्धं च सारणम् । बभ्रुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा ॥ सत्कृत्य सारणाक्रूरौ पुनराभाष्य सात्यकिम् । सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम् ॥ प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सारण, बभ्रु, झल्लि, गद, भानु, चारुदेष्ण, सारण और अक्रूरका भी सत्कार करके वृत्रासुरनिषूदन इन्द्रने पुनः सात्यकिसे वार्तालाप किया। इसके बाद वृष्णि और कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनको गले लगाया। भोजं च कृतवर्माणमन्यांश्चान्धकवृष्णिषु । आमन्त्र्य देवप्रवरो वासवो वासवानुजम् ॥ तत्पश्चात् भोज, कृतवर्मा तथा अन्य अन्धकवंशी एवं वृष्णिवंशियोंका आलिंगन करके देवराजने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णसे विदा ली। ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभुः । पश्यतां सर्वभूतानामारुरोह शचीपतिः ॥ तदनन्तर शचीपति भगवान् इन्द्र सब प्राणियोंके देखते-देखते श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम् । मुखाडम्बरनिर्घोषैः पूरयन्नमिवासकृत् ॥ वह श्रेष्ठ गजराज अपनी गम्भीर गर्जनासे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोकको बारंबार निनादित-सा कर रहा था। हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम् । मनोहरकुथास्तीर्णं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ उसकी पीठपर सोनेके खंभोंसे युक्त बहुत बड़ा हौदा कसा हुआ था। उसके दाँतोंमें सोना मढ़ा गया था। उसके ऊपर मनोहर झूल पड़ी हुई थी। वह सब प्रकारके रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित था। अनेकशतरत्नाभिः पताकाभिरलङ्कृतम् । नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम् ॥ सैकड़ों रत्नोंसे अलंकृत पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसके मस्तकसे निरन्तर मदकी धारा इस प्रकार बहती रहती थी, मानो मेघ पानी बरसा रहा हो। दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थितः ।
प्रबभौ मन्दराग्रस्थः प्रतपन् भानुमानिव ॥
वह विशालकाय दिग्गज सोनेकी माला धारण किये हुए था। उसपर बैठे हुए देवराज इन्द्र मन्दराचलके शिखरपर तपते हुए सूर्यदेवकी भाँति उद्भासित हो रहे थे।
ततो वज्रमयं भीमं प्रगृह्य परमाङ्कुशम् ।
ययौ बलवता सार्धं पावकेन शचीपतिः ॥
तदनन्तर शचीपति इन्द्र वज्रमय भयंकर एवं विशाल अंकुश लेकर बलवान् अग्निदेवके साथ स्वर्गलोकको चल दिये।
तं करेणुगजव्रातैर्विमानैश्च मरुद्गणाः ।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः कुबेरवरुणग्रहाः ॥
उनके पीछे हाथी-हथिनियोंके समुदायों और विमानोंद्वारा मरुद्गण, कुबेर तथा वरुण आदि देवता भी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े।
स वायुपथमास्थाय वैश्वानरपथं गतः ।
प्राप्य सूर्यपथं देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
इन्द्रदेव पहले वायुपथमें पहुँचकर वैश्वानरपथ (तेजोमय लोक)-में जा पहुँचे। तत्पश्चात् सूर्यदेवके मार्गमें जाकर वहाँ अन्तर्धान हो गये।
ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः ।
नन्दगोपस्य महिषी यशोदा लोकविश्रुता ॥
रेवती च महाभागा रुक्मिणी च पतिव्रता ।
सत्या जाम्बवती चोभे गान्धारी शिंशुमापि वा ॥
विशोका लक्ष्मणा साध्वी सुमित्रा केतुमा तथा ।
वासुदेवमहिष्योऽन्याः श्रिया सार्धं ययुस्तदा ॥
विभूतिं द्रष्टुमनसः केशवस्य वराङ्गनाः ।
प्रीयमाणाः सभां जग्मुरालोकयितुमच्युतम् ॥
तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ, राजा उग्रसेनकी रानियाँ, नन्दगोपकी विश्वविख्यात रानी यशोदा, महाभागा रेवती (बलभद्र-पत्नी) तथा पतिव्रता रुक्मिणी, सत्या, जाम्बवती, गान्धारराजकन्या शिंशुमा, विशोका, लक्ष्मणा, साध्वी सुमित्रा, केतुमा तथा भगवान् वासुदेवकी अन्य रानियाँ—वे सब-की-सब श्रीजीके साथ भगवान् केशवकी विभूति एवं नवागत सुन्दरी रानियोंको देखनेके लिये और श्रीअच्युतका दर्शन करनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ सभाभवनमें गयीं।
देवकी सर्वदेवीनां रोहिणी च पुरस्कृता ।
ददृशुर्देवमासीनं कृष्णं हलभृता सह ॥
देवकी तथा रोहिणीजी सब रानियोंके आगे चल रही थीं। सबने वहाँ जाकर श्रीबलरामजीके साथ बैठे हुए श्रीकृष्णको देखा।
तौ तु पूर्वमुपक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च । अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ ॥ देवकीं सप्तदेवीनां यथाश्रेष्ठं च मातरः । उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने उठकर पहले रोहिणीजीको प्रणाम किया। फिर देवकीजीकी तथा सात देवियोंमेंसे श्रेष्ठताके क्रमसे अन्य सभी माताओंकी चरणवन्दना की। ववन्दे सह रामेण भगवान् वासवानुजः ॥ अथासनवरं प्राप्य वृष्णिदारपुरस्कृता ॥ उभावङ्कगतौ चक्रे देवकी रामकेशवौ । बलरामसहित भगवान् उपेन्द्रने जब इस प्रकार मातृचरणोंमें प्रणाम किया, तब वृष्णिकुलकी महिलाओंमें अग्रणी माता देवकीजीने एक श्रेष्ठ आसनपर बैठकर बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंको गोदमें ले लिया। सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभे तदा ॥ देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च । वृषभके सदृश विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उस समय माता देवकीकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदितिकी होती है। ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि ॥ जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत । इसी समय यशोदाजीकी पुत्री क्षणभरमें वहाँ आ पहुँची। भारत! उसके श्रीअंग दिव्य प्रभासे प्रज्वलित-से हो रहे थे। एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां तां कामरूपिणीम् ॥ यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः । उस कामरूपिणी कन्याका नाम था 'एकानंगा'। जिसके निमित्तसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध किया था। ततः स भगवान् समस्तामुपाक्रम्य भामिनीम् ॥ मूर्ध्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना । दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ तब भगवान् बलरामने आगे बढ़कर उस मानिनी बहिनको बायें हाथसे पकड़ लिया और वात्सल्य-स्नेहसे उसका मस्तक सूँघा। तदनन्तर श्रीकृष्णने भी उस कन्याको दाहिने हाथसे पकड़ लिया। ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः ॥ रुक्मपद्मशयां पद्मां श्रीमिवोत्तमनागयोः । लोगोंने उस सभामें बलराम और श्रीकृष्णकी इस बहिनको देखा; मानो दो श्रेष्ठ गजराजोंके बीचमें सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान भगवती लक्ष्मी हों।
अथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि ।। वृष्णयोऽवाकिरन् प्रीताः संकर्षणजनार्दनौ । तत्पश्चात् वृष्णिवंशी पुरुषोंने प्रसन्न होकर बलराम और श्रीकृष्णपर लाजा (खील), फूल और घीसे युक्त अक्षतकी वर्षा की। सबालाः सहवृद्धाश्च सजातिकुलबान्धवाः ।। उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम् । उस समय बालक, वृद्ध, ज्ञाति, कुल और बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त वृष्णिवंशी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् मधुसूदनके समीप बैठ गये। पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः ।। विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः । इसके बाद पुरवासियोंकी प्रीति बढ़ानेवाले पुरुषसिंह महाबाहु मधुसूदनने सबसे पूजित हो अपने महलमें प्रवेश किया। रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम् । अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत । सर्वासां च यदुश्रेष्ठः सर्वकालविहारवान् ।। वहाँ सदा प्रसन्न रहनेवाले श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके साथ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। भारत! तत्पश्चात् सदा लीला-विहार करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण क्रमशः सत्यभामा तथा जाम्बवती आदि सभी देवियोंके निवास-स्थानोंमें गये। जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः स्वं निवेशनम् । फिर अन्तमें श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके महलमें पधारे। एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः ।। एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः । तात! महाबाहु युधिष्ठिर! शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजयगाथा कही गयी है। इसीके लिये महात्मा श्रीकृष्णका मनुष्योंमें अवतार हुआ बताया जाता है।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण-माहात्म्यका उपसंहार]
भीष्म उवाच
द्वारकायां ततः कृष्णः स्वदारेषु दिवानिशम् । सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशाः ॥
भीष्मजी कहते हैं—महाराज युधिष्ठिर! तदनन्तर महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी रानियोंके साथ दिन-रात सुखका अनुभव करते हुए द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक रहने लगे।
पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां हितं तदा । सवासवैः सुरैः सर्वैर्दुष्करं भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने अपने पौत्र अनिरुद्धको निमित्त बनाकर देवताओंका जो हित-साधन किया, वह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त दुष्कर था।
बाणो नामाभवद् राजा बलेर्ज्येष्ठसुतो बली । वीर्यवान् भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान् ॥
भरतकुलभूषण! बाण नामक एक राजा हुआ था, जो बलिका ज्येष्ठ पुत्र था। वह महान् बलवान् और पराक्रमी होनेके साथ ही सहस्र भुजाओंसे सुशोभित था।
ततश्चक्रे तपस्तीव्रं सत्येन मनसा नृप । रुद्रमाराधयामास स च बाणः समा बहूः ॥
राजन्! बाणासुरने सच्चे मनसे बड़ी कठोर तपस्या की। उसने बहुत वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की।
तस्मै बहुवरा दत्ताः शङ्करेण महात्मना । तस्माल्लब्ध्वा वरान् बाणो दुर्लभान् ससुरैरपि ॥ स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली ।
महात्मा शंकरने उसे अनेक वरदान दिये। भगवान् शंकरसे देवदुर्लभ वरदान पाकर बाणासुर अनुपम बलशाली हो गया और शोणितपुरमें राज्य करने लगा।
त्रासिताश्च सुराः सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ॥ विजित्य विबुधान् सर्वान् सेन्द्रान् बाणः समा बहूः । अशासत महद् राज्यं कुबेर इव भारत ॥
भरतवंशी पाण्डुनन्दन! बाणासुरने सब देवताओंको आतंकित कर रखा था। उसने इन्द्र आदि सब देवताओंको जीतकर कुबेरकी भाँति दीर्घकालतक इस भूतलपर महान् राज्यका शासन किया।
ऋद्ध्यर्थं कुरुते यत्नं तस्य चैवोशना कविः ।
ज्ञानी विद्वान् शुक्राचार्य उसकी समृद्धि बढ़ानेके लिये प्रयत्न करते रहते थे।
ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता तथा ।।
रूपेणाप्रतिमा लोके मेनकायाः सुता यथा ।
राजन्! बाणासुरके एक पुत्री थी, जिसका नाम उषा था। संसारमें उसके रूपकी तुलना करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह मेनका अप्सराकी पुत्री-सी प्रतीत होती थी।
अथोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युतिः ।।
प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्नः प्रमुमोद ह ।
कुन्तीनन्दन! महान् तेजस्वी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध किसी उपायसे उषातक पहुँचकर छिपे रहकर उसके साथ आनन्दका उपभोग करने लगे।
अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ।।
तं गुह्यनिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निं सुतया सह ।
गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात् ।।
युधिष्ठिर! महातेजस्वी बाणासुरने गुप्तरूपसे छिपे हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धका अपनी पुत्रीके साथ रहना जान लिया और उन्हें अपनी पुत्रीसहित बलपूर्वक कारागारमें ठूँस देनेके लिये बंदी बना लिया।
सुकुमारः सुखार्होऽथ तदा दुःखमवाप सः ।
बाणेन खेदितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ।।
राजन्! वे सुकुमार एवं सुख भोगनेके योग्य थे, तो भी उन्हें उस समय दुःख उठाना पड़ा। बाणासुरके द्वारा भाँति-भाँतिके कष्ट दिये जानेपर अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गये।
एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुङ्गवः ।
द्वारकां प्राप्य कौन्तेय कृष्णं दृष्ट्वा वचोऽब्रवीत् ।।
कुन्तीकुमार! इसी समय मुनिप्रवर नारदजी द्वारकामें आकर श्रीकृष्णसे मिले और इस प्रकार बोले।
नारद उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन ।
त्वत्पौत्रो बाध्यमानोऽथ बाणेनामिततेजसा ।।
कृच्छ्रं प्राप्तोऽनिरुद्धो वै शेते कारागृहे सदा ।
**नारदजीने कहा—**महाबाहु श्रीकृष्ण! आप यदुवंशियोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। इस समय अमित-तेजस्वी बाणासुर आपके पौत्र अनिरुद्धको बहुत कष्ट दे रहा है। वे संकटमें पड़े हैं और सदा कारागारमें निवास कर रहे हैं।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ ।।