महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कथं संयुज्यते प्रेत्य इह वा द्विजसत्तम ॥ ५९ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! देहधारी जीव अपने शरीरका त्याग करके जब परलोकमें चला जाता है, तब उसके शुभ और अशुभ कर्म उसको कैसे प्राप्त करते हैं और इहलोक और परलोकमें जीवका उन कर्मोंके फलसे किस प्रकार संयोग होता है? ।। ५९ ।।
ऐहलौकिकमेवेह उताहो पारलौकिकम् ।
क्व च कर्माणि तिष्ठन्ति जन्तोः प्रेतस्य भार्गव ॥ ६० ॥
‘भृगुनन्दन! कर्मोंका फल इसी लोकमें प्राप्त होता है या परलोकमें? प्राणीकी मृत्यु हो जानेपर उसके कर्म कहाँ रहते हैं?’ ।। ६० ।।
मार्कण्डेय उवाच
त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो यथावद् वदतां वर ।
विदितं वेदितव्यं ते स्थित्यर्थं त्वं तु पृच्छसि ॥ ६१ ॥
मार्कण्डेयजी बोले—वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम्हारा यह प्रश्न यथार्थ और युक्तिसंगत है। तुम्हें जाननेयोग्य सभी बातोंका ज्ञान है, तो भी तुम केवल लोक-मर्यादाकी रक्षाके लिये यह प्रश्न उपस्थित करते हो ।। ६१ ।।
अत्र ते कथयिष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ।
यथेहामुत्र च नरः सुखदुःखमुपाश्नुते ॥ ६२ ॥
मनुष्य इहलोक या परलोकमें जिस प्रकार सुख और दुःख भोगता है, इसके विषयमें तुम्हें अपना विचार बताऊँगा। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ६२ ।।
निर्मलानि शरीराणि विशुद्धानि शरीरिणाम् ।
ससर्ज धर्मतन्त्राणि पूर्वोत्पन्नः प्रजापतिः ॥ ६३ ॥
सर्वप्रथम प्रजापति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। उन्होंने जीवोंके लिये निर्मल तथा विशुद्ध शरीर बनाये। साथ ही धर्मका ज्ञान करानेवाले धर्मशास्त्रोंको प्रकट किया ।।
अमोघफलसंकल्पाः सुव्रताः सत्यवादिनः ।
ब्रह्मभूता नराः पुण्याः पुराणाः कुरुसत्तम ॥ ६४ ॥
उस समयके सब मनुष्य उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा सत्यवादी थे। उनका अभीष्ट फलविषयक संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता था। कुरुश्रेष्ठ! वे सभी मनुष्य ब्रह्मस्वरूप, पुण्यात्मा और चिरजीवी थे ।। ६४ ।।
सर्वे देवैः समायान्ति स्वच्छन्देन नभस्तलम् ।
ततश्च पुनरायान्ति सर्वे स्वच्छन्दचारिणः ॥ ६५ ॥
स्वच्छन्दमरणाश्चासन् नराः स्वच्छन्दचारिणः ।
अल्पबाधा निरातङ्काः सिद्धार्था निरुपद्रवाः ॥ ६६ ॥
सभी स्वच्छन्दतापूर्वक आकाशमार्गसे उड़कर देवताओंसे मिलने जाते और स्वच्छन्दचारी होनेके कारण इच्छा होते ही पुनः वहाँसे लौट आते थे। वे अपनी इच्छा होनेपर ही मरते और इच्छाके अनुसार ही जीवित रहते थे। स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र विचरण करते थे। उनके मार्गमें बाधाएँ बहुत कम आती थीं। उन्हें कोई भय नहीं होता था। वे उपद्रवशून्य तथा पूर्णकाम थे ।। ६५-६६ ।।
द्रष्टारो देवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् ।
प्रत्यक्षाः सर्वधर्माणां दान्ता विगतमत्सराः ।। ६७ ।।
देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके समुदायका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन होता था। वे सभी धर्मोंको प्रत्यक्ष करनेवाले, जितेन्द्रिय तथा ईर्ष्यासे रहित होते थे ।। ६७ ।।
आसन् वर्षसहस्त्रीयास्तथा पुत्रसहस्रिणः ।
उनकी आयु हजारों वर्षोंकी होती थी और वे हजार-हजार पुत्र उत्पन्न करते थे ।। ६७ १/२ ।।
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पृथिवीतलचारिणः ।। ६८ ।।
कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविनः ।
लोभमोहाभिभूताश्च त्यक्ता देहैस्ततो नराः ।। ६९ ।।
तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये। वे छल-कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे। उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया। इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा ।। ६८-६९ ।।
अशुभैः कर्मभिः पापास्तिर्यङ्निरयगामिनः ।
संसारेषु विचित्रेषु पच्यमानाः पुनःपुनः ।। ७० ।।
वे पापपरायण हो अपने अशुभ कर्मोंके फलस्वरूप पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें जाने और नरकमें गिरने लगे। विचित्र सांसारिक योनियोंमें बारंबार जन्म लेकर दुःखसे संतप्त होने लगे ।। ७० ।।
मोघेष्टा मोघसंकल्पा मोघज्ञाना विचेतसः ।
सर्वाभिशङ्किनश्चैव संवृत्ताः क्लेशदायिनः ।। ७१ ।।
उनकी कामनाएँ, उनके संकल्प और उनके ज्ञान सभी निष्फल थे। उनकी स्मरण-शक्ति क्षीण हो गयी थी। वे सभी परस्पर संदेह करते हुए एक-दूसरेके लिये क्लेशदायक बन गये ।। ७१ ।।
अशुभैः कर्मभिश्चापि प्रायशः परिचिह्निताः ।
दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानोऽप्रतापिनः ।। ७२ ।।
उनके शरीरमें प्रायः उनके अशुभ कर्मोंके चिह्न (कोढ़ आदि) प्रकट होने लगे। कोई अधम कुलमें जन्म लेते, कोई बहुत-से रोगोंके शिकार बने रहते और कोई दुष्ट स्वभावके हो
जाते थे। उनमेंसे कोई भी प्रतापी नहीं होता था ॥ ७२ ॥ भवन्त्यल्पायुषः पापा रौद्रकर्मफलोदयाः । नाथन्तः सर्वकामानां नास्तिका भिन्नचेतसः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार पापकर्मोंमें प्रवृत्त होनेवाले पापियोंकी आयु उनके कर्मानुसार बहुत कम हो गयी। उनके पापकर्मोंके भयंकर फल प्रकट होने लगे। वे अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंके लिये दूसरोंके सामने हाथ फैलाकर याचना करने लगे। कितने ही नास्तिक और विचलितचित्त हो गये ॥ ७३ ॥ जन्तोः प्रेतस्य कौन्तेय गतिः स्वैरिह कर्मभिः । प्राज्ञस्य हीनबुद्धेश्च कर्मकोशः क्व तिष्ठति ॥ ७४ ॥ क्वस्थस्तत् समुपाश्नाति सुकृतं यदि वेतरत् । इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनयं शृणु ॥ ७५ ॥ कुन्तीनन्दन! इस संसारमें मृत्युके पश्चात् जीवकी गति उनके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही होती है। परंतु मरनेके बाद ज्ञानी और अज्ञानीकी कर्मराशि कहाँ रहती है? कहाँ रहकर वह पुण्य अथवा पापका फल भोगता है? इस दृष्टिसे जो तुमने प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैं सिद्धान्त बता रहा हूँ, सुनो ॥ ७४-७५ ॥ अयमादिशरीरेण देवसृष्टेन मानवः । शुभानामशुभानां च कुरुते संचयं महत् ॥ ७६ ॥ आयुषोऽन्ते प्रहायेदं क्षीणप्रायं कलेवरम् । सम्भवत्येव युगपद् योनौ नास्त्यन्तराभवः ॥ ७७ ॥ यह मनुष्य ईश्वरके रचे हुए पूर्वशरीरके द्वारा (अन्तःकरणमें) शुभ और अशुभ कर्मोंकी बहुत बड़ी राशि संचित कर लेता है। फिर आयु पूरी होनेपर वह इस जरा-जर्जर स्थूल शरीरका त्याग करके उसी क्षण किसी दूसरी योनि (शरीर)-में प्रकट होता है। एक शरीरको छोड़ने और दूसरेको ग्रहण करनेके बीचमें क्षणभरके लिये भी वह असंसारी नहीं होता ॥ ७६-७७ ॥ तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा । फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वाथ जायते ॥ ७८ ॥ कृतान्तविधिसंयुक्तः स जन्तुर्लक्षणैः शुभैः । अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभिः ॥ ७९ ॥ वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है। इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है। यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा
दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है। यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है ॥ ७८-७९ ॥
एषा तावदबुद्धीनां गतिरुक्ता युधिष्ठिर ।
अतः परं ज्ञानवतां निबोध गतिमुत्तमाम् ॥ ८० ॥
युधिष्ठिर! यह तत्त्वज्ञानशून्य मूढ़ मनुष्योंकी स्वर्ग-नरकरूप गति बतायी गयी है। अब इसके बाद विवेकी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाली उत्तम गतिका वर्णन सुनो ॥ ८० ॥
मनुष्यास्तप्ततपसः सर्वागमपरायणाः ।
स्थिरव्रताः सत्यपरा गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ ८१ ॥
सुशीलाः शुक्लजातीयाः क्षान्ता दान्ताः सुतेजसः ।
शुचियोन्यन्तरगताः प्रायशः शुभलक्षणाः ॥ ८२ ॥
ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर, स्थिरतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवामें संलग्न, सुशील, शुक्लाजातीय (सात्त्विक), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। वे शुद्ध योनिमें जन्म लेते और प्रायः शुभ लक्षणोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ८१-८२ ॥
जितेन्द्रियत्वाद् वशिनः शुक्लत्वान्मन्दरोगिणः ।
अल्पाबाधपरित्रासाद् भवन्ति निरुपद्रवाः ॥ ८३ ॥
च्यवन्तं जायमानं च गर्भस्थं चैव सर्वशः ।
स्वमात्मानं परं चैव बुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषा ॥ ८४ ॥
जितेन्द्रिय होनेके कारण वे मनको वशमें रखते हैं और सात्त्विक अन्तःकरणके होनेके कारण नीरोग होते हैं। दुःख और त्रासके क्षीण होनेके कारण वे उपद्रवरहित होते हैं। विवेकी पुरुष गर्भसे गिरते, जन्म लेते अथवा गर्भमें ही रहते समय भी ज्ञानदृष्टिसे अपने-आपका और परमात्माका सर्वथा यथार्थ अनुभव करते हैं ॥ ८३-८४ ॥
ऋषयस्ते महात्मानः प्रत्यक्षागमबुद्धयः ।
कर्मभूमिमिमां प्राप्य पुनर्यान्ति सुरालयम् ॥ ८५ ॥
लौकिक तथा शास्त्रीय ज्ञानको प्रत्यक्ष करनेवाले वे महामना ऋषि इस कर्मभूमिमें आकर फिर देवलोकमें चले जाते हैं ॥ ८५ ॥
किंचिद् दैवाद्धठात् किंचित् किंचिदेव स्वकर्मभिः ।
प्राप्नुवन्ति नरा राजन् मा तेऽस्त्वन्या विचारणा ॥ ८६ ॥
राजन्! विवेकी मनुष्य कर्मोंका कुछ फल प्रारब्धवश प्राप्त करते हैं, कुछ कर्मोंका फल हठात् प्राप्त होता है और कुछ कर्मोंका फल अपने उद्योगसे ही प्राप्त होता है। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ८६ ॥
इमामत्रोपमां चापि निबोध वदतां वर ।
मनुष्यलोके यच्छ्रेयः परं मन्ये युधिष्ठिर ॥ ८७ ॥
इह वैकस्य नामुत्र अमुत्रैकस्य नो इह । इह वामुत्र चैकस्य नामुत्रैकस्य नो इह ॥ ८८ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात समझता हूँ, उसके विषयमें यह उदाहरण सुनो। कोई मनुष्य इस लोकमें ही परम सुख पाता है, परलोकमें नहीं। किसीको परलोकमें ही परम कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस लोकमें नहीं। किसीको इहलोक और परलोक दोनोंमें परम श्रेयकी प्राप्ति होती है; तथा किसीको न तो परलोकमें उत्तम सुख मिलता है और न इस लोकमें ही ॥ ८७-८८ ॥
धनानि येषां विपुलानि सन्ति नित्यं रमन्ते सुविभूषिताङ्गाः । तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको नासौ सदा देहसुखे रतानाम् ॥ ८९ ॥
जिनके पास बहुत धन होता है, वे अपने शरीरको हर तरहसे सजाकर नित्य विषयोंमें रमण करते अर्थात् विषय-सुख भोगते हैं। शत्रुसूदन! सदा अपने शरीरके ही सुखमें आसक्त हुए उन मनुष्योंको केवल इसी लोकमें सुख मिलता है, परलोकमें उनके लिये सुखका सर्वथा अभाव है ॥ ८९ ॥
ये योगयुक्तास्तपसि प्रसक्ताः स्वाध्यायशीला जरयन्ति देहान् । जितेन्द्रियाः प्राणिवधे निवृत्ता- स्तेषामसौ नायमरिघ्न लोकः ॥ ९० ॥
शत्रुसूदन! जो लोग इस लोकमें योगसाधन करते हैं, तपस्यामें संलग्न होते हैं और स्वाध्यायमें तत्पर रहते हैं तथा इस प्रकार प्राणियोंकी हिंसासे दूर रहकर इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए (तपस्याद्वारा) अपने शरीरको दुर्बल कर देते हैं, उनके लिये इस लोकमें सुख नहीं है। वे परलोकमें ही परम कल्याणके भागी होते हैं ॥ ९० ॥
ये धर्ममेव प्रथमं चरन्ति धर्मेण लब्ध्वा च धनानि काले । दारानवाप्य क्रतुभिर्यजन्ते तेषामयं चैव परश्च लोकः ॥ ९१ ॥
जो लोग कर्तव्य-बुद्धिसे पहले धर्मका ही आचरण करते हैं और उस धर्मसे ही (न्याययुक्त) धनका उपार्जन कर यथासमय स्त्रीसे विवाह करके उसके साथ यज्ञ-याग और ईश्वरभक्ति आदिका अनुष्ठान करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद हैं ॥ ९१ ॥
ये नैव विद्यां न तपो न दानं न चापि मूढाः प्रजने यतन्ति ।
न चानुगच्छन्ति सुखानि भोगां- स्तेषामयं नैव परश्च लोकः ॥ ९२ ॥ जो मूढ़ न विद्याके लिये, न तपके लिये और न दानके लिये ही प्रयत्न करते हैं एवं न धर्मपूर्वक संतानोत्पादनके लिये ही यत्नशील होते हैं, वे न तो सुख पाते हैं और न भोग ही भोगते हैं। उनके लिये न तो इस लोकमें सुख है और न परलोकमें ॥ ९२ ॥
सर्वे भवन्तस्त्वतिवीर्यसत्त्वा दिव्यौजसः संहननोपपन्नाः । लोकादमुष्मादवनिं प्रपन्नाः स्वधीतविद्याः सुरकार्यहेतोः ॥ ९३ ॥ राजा युधिष्ठिर! तुम सब लोग बड़े पराक्रमी और धैर्यवान् हो। तुममें अलौकिक ओज भरा है। तुम सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये परलोकसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हो। यही कारण है कि तुमने सभी उत्तम विद्याएँ सीख ली हैं ॥ ९३ ॥
कृत्वैव कर्माणि महान्ति शूरा- स्तपोदमाचारविहारशीलाः । देवानृषीन् प्रेतगणांश्च सर्वान् संतर्पयित्वा विधिना परेण ॥ ९४ ॥ स्वर्गं परं पुण्यकृतो निवासं क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभिः स्वैः । मा भूद् विशङ्का तव कौरवेन्द्र दृष्ट्वाऽऽत्मनः क्लेशमिमं सुखार्हम् ॥ ९५ ॥ तुम सभी शूर-वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार-व्यवहारमें सदा ही तत्पर रहनेवाले हो। अतः (इस संसारमें बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधिसे तृप्त करोगे। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओंके निवास स्थान परम स्वर्गलोकको चले जाओगे। इसीलिये कौरवराज! तुम (अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मनमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान न दो। यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है ॥ ९४-९५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥
तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य
वैशम्पायन उवाच
मार्कण्डेयं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा ।
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय पाण्डुपुत्रोंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे कहा—'मुने! हम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, आप उसका वर्णन कीजिये' ॥ १ ॥
एवमुक्तः स भगवान् मार्कण्डेयो महातपाः ।
उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ २ ॥
उनके ऐसा कहनेपर महातपस्वी, महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् भगवान् मार्कण्डेयने इस प्रकार कहा ॥ २ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हैहयानां कुलकरो राजा परपुरंजयः ।
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगयां व्यचरद् बली ॥ ३ ॥
**मार्कण्डेयजी बोले—**हैहयवंशी क्षत्रियोंकी वंशपरम्पराको बढ़ानेवाला राजा परपुरंजय, जो अभी कुमारावस्थामें था, बड़ा ही सुन्दर और बलवान् था, एक दिन वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गया ॥ ३ ॥
चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके ॥ ४ ॥
तृण और लताओंसे भरे हुए उस वनमें घूमते-घूमते उस राजकुमारने एक मुनिको देखा, जो काले हिंसक पशुके चर्मकी ओढ़नी ओढ़े थोड़ी ही दूरपर बैठे थे ॥ ४ ॥
स तेन निहतोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम् ।
व्यथितः कर्म तत् कृत्वा शोकोपहतचेतनः ॥ ५ ॥
राजकुमारने उन्हें हिंसक पशु ही समझा और उस वनमें अपने बाणोंसे उन्हें मार डाला। अज्ञानवश यह पापकर्म करके वह राजकुमार व्यथित हो शोकसे मूर्च्छित हो गया ॥ ५ ॥
जगाम हैहयानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम् ।
राज्ञां राजीवनेत्रोऽसौ कुमारः पृथिवीपतिः ।
तेषां च तद् यथावृत्तं कथयामास वै तदा ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् होशमें आकर वह सुविख्यात हैहयवंशी राजाओंके पास गया। वहाँ पृथ्वीका पालन करनेवाले उस कमलनयन राजकुमारने उन सबके सामने इस दुर्घटनाका यथावत् समाचार कहा ॥ ६ ॥
तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम् । श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र बभूवुर्दीनमानसाः ॥ ७ ॥ तात! फल-मूलका आहार करनेवाले एक मुनिकी हिंसा हो गयी, यह सुनकर और देखकर वे सभी क्षत्रिय मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए ॥ ७ ॥
कस्यायमिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः । जग्मुश्चारिष्टनेम्नोऽथ तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ॥ ८ ॥ फिर वे सब-के-सब जहाँ-तहाँ यह पता लगाते हुए कि ये मुनि किसके पुत्र हैं, शीघ्र ही कश्यप-नन्दन अरिष्टनेमिके आश्रमपर गये ॥ ८ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं नियतव्रतम् । तस्थुः सर्वे स तु मुनिस्तेषां पूजामथाहरत् ॥ ९ ॥ वहाँ नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके वे सब खड़े हो गये। तब मुनिने उनके लिये अर्घ्य आदि पूजन-सामग्री अर्पित की ॥ ९ ॥
ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सत्क्रियां मुने । त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि नः ॥ १० ॥ यह देखकर उन्होंने उन महात्मासे कहा—‘मुने! हम अपने दूषित कर्मके कारण आपसे सत्कार पानेयोग्य नहीं रह गये हैं। हमसे एक ब्राह्मणकी हत्या हो गयी है’ ॥ १० ॥
तानब्रवीत् स विप्रर्षिः कथं वो ब्राह्मणो हतः । क्व चासौ ब्रूत सहिताः पश्यध्वं मे तपोबलम् ॥ ११ ॥ यह सुनकर उन ब्रह्मर्षिने कहा—‘आपलोगोंसे ब्राह्मणकी हत्या कैसे हुई? और वह मरा हुआ ब्राह्मण कहाँ है? बताइये। फिर सब लोग एक साथ मेरी तपस्याका बल देखियेगा’ ॥ ११ ॥
ते तु तत् सर्वमखिलमाख्यायास्मै यथातथम् । नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः ॥ १२ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर क्षत्रियोंने मुनिके वधका सारा समाचार उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया और उन्हें साथ लेकर सभी उस स्थानपर आये जहाँ मुनिकी हत्या हुई थी। किंतु उन्होंने वहाँ मरे हुए मुनिकी लाश नहीं देखी ॥ १२ ॥
अन्वेषमाणाः सव्रीडाः स्वप्नवद्गतचेतनाः । तानब्रवीत् तत्र मुनिस्तार्क्ष्यः परपुरंजय ॥ १३ ॥ स्यादयं ब्राह्मणः सोऽथ युष्माभिर्यो विनाशितः । पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोबलसमन्वितः ॥ १४ ॥
फिर तो वे लज्जित होकर इधर-उधर उसकी खोज करने लगे। स्वप्नकी भाँति उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। तब मुनिवर अरिष्टनेमिने उनसे कहा—'परपुरंजय! तुम लोगोंने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है? राजाओ! यह मेरा तपोबलसम्पन्न पुत्र है' ।। १३-१४ ।।
ते च दृष्ट्वैव तमृषिं विस्मयं परमं गताः ।
महदाश्चर्यमिति वै ते ब्रुवाणा महीपते ॥ १५ ॥
राजन्! उन महर्षिको जीवित हुआ देख वे सभी क्षत्रिय बड़े विस्मित हुए और कहने लगे 'यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है' ।। १५ ।।
मृतो ह्ययमुपानीतः कथं जीवितमाप्तवान् ।
किमेतत् तपसो वीर्यं येनायं जीवितः पुनः ॥ १६ ॥
'ये मरे हुए मुनि यहाँ कैसे लाये गये और किस प्रकार इन्हें जीवन मिला? क्या यह तपस्याकी ही शक्ति है, जिससे फिर ये जीवित हो गये? ।। १६ ।।
श्रोतुमिच्छामहे विप्र यदि श्रोतव्यमित्युत ।
स तानुवाच नास्माकं मृत्युः प्रभवते नृपाः ॥ १७ ॥
'ब्रह्मन्! हम यह सब रहस्य सुनना चाहते हैं। यदि सुननेयोग्य हो तो कहिये'। तब महर्षिने उन क्षत्रियोंसे कहा—'राजाओ! हम लोगोंपर मृत्युका वश नहीं चलता'।। १७ ।। कारणं वः प्रवक्ष्यामि हेतुयोगसमासतः । (मृत्युः प्रभवने येन नास्माकं नृपसत्तमाः । शुद्धाचारा अनलसाः संध्योपासनतत्पराः ।। शुद्धान्नाः शुद्धसुधना ब्रह्मचर्यव्रतान्विताः ।) सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः । स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। १८ ।। 'इसका क्या कारण है? यह मैं तर्क और युक्तिके साथ संक्षेपसे बता रहा हूँ। श्रेष्ठ नृपतिगण! हमलोगोंपर मृत्युका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता—यह बताते हैं, सुनिये—हम शुद्ध आचार-विचारसे रहते हैं, आलस्यसे रहित हैं, प्रतिदिन संध्योपासनके परायण रहते हैं, शुद्ध अन्न खाते हैं और शुद्ध रीतिसे न्यायपूर्वक धनोपार्जन करते हैं; यही नहीं हमलोग सदा ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें लगे रहते हैं। हमलोग केवल सत्यको ही जानते हैं। कभी झूठमें मन नहीं लगाते और सदा अपने धर्मका पालन करते रहते हैं। इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है।। १८ ।। यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथयामहे । नैषां दुश्चरितं ब्रूमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। १९ ।। अतिथीनन्नपानेन भृत्यानत्यशनेन च । सम्भोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। २० ।। 'ब्राह्मणोंके जो शुभ कर्म हैं, उन्हींकी हम चर्चा करते हैं। उनके दोषोंका बखान नहीं करते हैं। इसलिये हमें मृत्युसे भय नहीं है। हम अतिथियोंको अन्न और जलसे तृप्त करते हैं। हमारे ऊपर जिनके भरण-पोषणका भार है, उन्हें हम पूरा भोजन देते हैं और उन्हें भोजन करानेसे बचा हुआ अन्न हम स्वयं भोजन करते हैं, अतः हमें मृत्युसे भय नहीं है।। १९-२० ।। शान्ता दान्ताः क्षमाशीलास्तीर्थदानपरायणाः । पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः । तेजस्विदेशवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ।। २१ ।। 'हम सदा शम, दम, क्षमा, तीर्थ-सेवन और दानमें तत्पर रहनेवाले हैं तथा पवित्र देशमें निवास करते हैं। इसलिये भी हमें मृत्युसे भय नहीं है। इतना ही नहीं हमलोग तेजस्वी पुरुषोंके देशमें निवास करते हैं अर्थात् सत्पुरुषोंके समीप रहा करते हैं। इस कारणसे भी हमें मृत्युसे भय नहीं होता है।। २१ ।। एतद् वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः । गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद् भयमस्ति वः ।। २२ ।।
‘ईर्ष्यारहित राजाओ! ये सब बातें मैंने तुम्हें संक्षेपसे सुनायी हैं। अब तुम सब लोग एक साथ यहाँसे जाओ, तुम्हें ब्रह्महत्याके पापसे भय नहीं रहा’ ॥ २२ ॥
एवमस्त्विति ते सर्वे प्रतिपूज्य महामुनिम् ।
स्वदेशमगमन् हृष्टा राजानो भरतर्षभ ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंने ‘एवमस्तु’ कहकर महामुनि अरिष्टनेमिका सम्मान एवं पूजन किया और प्रसन्न होकर अपने स्थानको चले गये ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्यकथने चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यवर्णनविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! ब्राह्मणोंका और भी माहात्म्य मुझसे सुनो। पूर्वकालमें वेनके पुत्र राजर्षि पृथुने, जो यहाँ वैन्यके नामसे प्रसिद्ध थे, किसी
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा
मार्कण्डेय उवाच
भूय एव महाभाग्यं ब्राह्मणानां निबोध मे ।
वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षितः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! ब्राह्मणोंका और भी माहात्म्य मुझसे सुनो। पूर्वकालमें वेनके पुत्र राजर्षि पृथुने, जो यहाँ वैन्यके नामसे प्रसिद्ध थे, किसी समय अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ली ॥ १ ॥
तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम् ।
भूयोऽर्थं नानुरुध्यत् स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् ॥ २ ॥
उन दिनों महात्मा अत्रिने धन माँगनेकी इच्छासे उनके पास जानेका विचार किया, यह बात हमारे सुननेमें आयी है; परंतु ऐसा करनेसे उनको अपना धर्मात्मापन प्रकट करना पड़ता। इसलिये फिर उन्होंने धनके लिये अनुरोध नहीं किया ॥ २ ॥
स विचिन्त्य महातेजा वनमेवान्वरोचयत् ।
धर्मपत्नीं समाहूय पुत्रांश्चेदमुवाच ह ॥ ३ ॥
महातेजस्वी अत्रिने मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर (तपस्याके लिये) वनमें ही जानेका निश्चय किया और अपनी धर्मपत्नी तथा पुत्रोंको बुलाकर इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं बहुलं निरुपद्रवम् ।
अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ॥ ४ ॥
‘हमलोग वनमें रहकर (तपद्वारा) धर्मका बहुत अधिक उपद्रवशून्य फल पा सकते हैं। अतः शीघ्र वनमें चलनेका विचार तुम सब लोगोंको रुचिकर होना चाहिये; क्योंकि ग्राम्य-जीवनकी अपेक्षा वनमें रहना अधिक लाभप्रद है’ ॥ ४ ॥
तं भार्या प्रत्युवाचाथ धर्ममेवानुतन्वती ।
वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थयस्व धनं बहु ॥ ५ ॥
अत्रिकी पत्नी भी धर्मका ही अनुसरण करनेवाली थी। उसने यज्ञ-यागादिके रूपमें धर्मके ही विस्तारपर दृष्टि रखकर पतिको उत्तर दिया—‘प्राणनाथ! आप धर्मात्मा राजा वैन्यके पास जाकर अधिक धनकी याचना कीजिये ॥ ५ ॥
स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थितो धनम् ।
तत आदाय विप्रर्षे प्रतिगृह्य धनं बहु ॥ ६ ॥ भृत्यान् सुतान् संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम् । एष वै परमो धर्मो धर्मविद्भिरुदाहृतः ॥ ७ ॥ ‘वे राजर्षि इन दिनों यज्ञ कर रहे हैं, अतः इस अवसरपर यदि आप उनसे माँगेंगे तो वे आपको अधिक धन देंगे। ब्रह्मर्षे! वहाँसे प्रचुर धन लाकर भरण-पोषण करनेयोग्य इन पुत्रोंको बाँट दीजिये; फिर इच्छानुसार वनको चलिये। धर्मज्ञ महात्माओंने यही परम धर्म बताया है’ ॥ ६-७ ॥
अत्रिरुवाच
कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना । वैन्यो धर्मार्थसंयुक्तः सत्यव्रतसमन्वितः ॥ ८ ॥ अत्रि बोले—महाभागे! महात्मा गौतमने मुझसे कहा है कि ‘वेनपुत्र राजा पृथु धर्म और अर्थके साधनमें संलग्न रहते हैं। वे सत्यव्रती हैं’ ॥ ८ ॥ द्वेष्टारः किंतु नः सन्ति वसन्तस्तत्र वै द्विजाः । यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाय्यहम् ॥ ९ ॥ परंतु एक बात विचारणीय है। वहाँ उनके यज्ञमें जितने ब्राह्मण रहते हैं, वे सभी मुझसे द्वेष रखते हैं, यही बात गौतमने भी कही है। इसीलिये मैं वहाँ जानेका विचार नहीं कर रहा हूँ ॥ ९ ॥ तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम् । मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थिकाम् ॥ १० ॥ यदि मैं वहाँ जाकर धर्म, अर्थ और कामसे युत कल्याणमयी वाणी भी बोलूँगा तो वे उसे धर्म और अर्थके विपरीत ही बतायेंगे; निरर्थक सिद्ध करेंगे ॥ १० ॥ गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव । गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥ ११ ॥ तथापि महाप्राज्ञे! मैं वहाँ अवश्य जाऊँगा, मुझे तुम्हारी बात ठीक जँचती है। राजा पृथु मुझे बहुत-सी गौएँ तो देंगे ही, पर्याप्त धन भी देंगे ॥ ११ ॥ एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः । गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ॥ १२ ॥ वाक्यैर्मङ्गलसंयुक्तैः पूजयानोऽब्रवीद् वचः । ऐसा कहकर महातपस्वी अत्रि शीघ्र ही राजा पृथुके यज्ञमें गये। यज्ञमण्डपमें पहुँचकर उन्होंने उस राजाका मांगलिक वचनोंद्वारा स्तवन किया और उनका समादर करते हुए इस प्रकार कहा ॥ १२ १/२ ॥
अत्रिरुवाच
राजन् धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः ॥ १३ ॥ अत्रि बोले— राजन्! तुम इस भूतलके सर्वप्रथम राजा हो; अतः धन्य हो, सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो ॥ १३ ॥
स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित् । तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥ १४ ॥ महर्षिगण तुम्हारी स्तुति करते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नरेश धर्मका ज्ञाता नहीं है। उनकी यह बात सुनकर महातपस्वी गौतम मुनिने कुपित होकर कहा ॥ १४ ॥
गौतम उवाच
मैवमत्रे पुनर्ब्रूया न ते प्रज्ञा समाहिता । अत्र नः प्रथमं स्थाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥ १५ ॥ गौतम बोलें— अत्रे! फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना। तुम्हारी बुद्धि एकाग्र नहीं है। यहाँ हमारे प्रथम प्रजापतिके रूपमें साक्षात् इन्द्र उपस्थित हैं ॥ १५ ॥
अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत । अयमेव विधाता हि यथैवेन्द्रः प्रजापतिः । त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! तब अत्रिने भी गौतमको उत्तर देते हुए कहा— ‘मुने! ये पृथु ही विधाता हैं, ये ही प्रजापति इन्द्रके समान हैं। तुम्हीं मोहसे मोहित हो रहे हो; तुम्हें उत्तम बुद्धि नहीं प्राप्त है’ ॥ १६ ॥
गौतम उवाच
जानामि नाहं मुह्यामि त्वमेवात्र विमुह्यते । स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥ १७ ॥ गौतम बोले— मैं नहीं मोहमें पड़ा हूँ, तुम्हीं यहाँ आकर मोहित हो रहे हो। मैं खूब समझता हूँ, तुम राजासे मिलनेकी इच्छा लेकर ही भरी सभामें स्वार्थवश उनकी स्तुति कर रहे हो ॥ १७ ॥
न वेत्थ परमं धर्मं न चावैषि प्रयोजनम् । बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥ १८ ॥ उत्तम धर्मका तुम्हें बिलकुल ज्ञान नहीं है। तुम धर्मका प्रयोजन भी नहीं समझते हो। मेरी दृष्टिमें तुम मूढ हो, बालक हो; किसी विशेष कारणसे बूढ़े बने हुए हो अर्थात् केवल अवस्थासे बूढ़े हो ॥ १८ ॥
विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ । ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ॥ १९ ॥
मुनियोंके सामने खड़े होकर जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उस समय उन्हें
देखकर जिनका यज्ञमें पहलेसे वरण हो चुका था, वे ब्राह्मण पूछने लगे—'ये दोनों कैसे लड़
रहे हैं? ॥ १९ ॥
प्रवेशः केन दत्तोऽयमुभयोर्वैन्यसंसदि ।
उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण धिष्ठितौ ॥ २० ॥
ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित् ।
विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदयत् ॥ २१ ॥
‘किसने इन दोनोंको महाराज पृथुके यज्ञमण्डपमें घुसने दिया है? ये दोनों जोर-जोरसे
बातें करते और झगड़ते यहाँ किस कामसे खड़े हैं?' उस समय परम धर्मात्मा एवं सम्पूर्ण
धर्मोंके ज्ञाता कणादने सब सदस्योंको बताया कि ये दोनों किसी विषयको लेकर परस्पर
विवाद कर रहे हैं और उसीके निर्णयके लिये यहाँ आये हैं' ॥
अथाब्रवीत् सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान् ।
आवयोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजसत्तमाः ॥ २२ ॥
वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान् ।
श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन् द्रुतम् ॥ २३ ॥
सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै ।
स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः ।
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥ २४ ॥
तब गौतमने सदस्यरूपसे बैठे हुए उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा—'श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हम
दोनोंके प्रश्नको आपलोग सुनें। अत्रिने राजा पृथुको विधाता कहा है। इस बातको लेकर हम
दोनोंमें महान् संशय एवं विवाद उपस्थित हो गया है।' यह सुनकर वे महात्मा मुनि उक्त
संशयका निवारण करनेके लिये तुरंत ही धर्मज्ञ सनत्कुमारजीके पास दौड़े गये। उन
महातपस्वीने इनकी सब बातें यथार्थरूपसे सुनकर उनसे यह धर्म एवं अर्थयुक्त वचन कहा
— ॥ २२-२४ ॥
सनत्कुमार उवाच
ब्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह ।
संयुक्तौ दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ २५ ॥
राजा वै प्रथितो धर्मः प्रजानां पतिरेव च ।
स एव शक्रः शुक्रश्च स धाता च बृहस्पतिः ॥ २६ ॥
सनत्कुमार बोले—ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे संयुक्त हो जायँ तो वे दोनों
मिलकर शत्रुओंको उसी प्रकार दग्ध कर डालते हैं, जैसे अग्नि और वायु परस्पर सहयोगी
होकर कितने ही वनोंको भस्म कर डालते हैं। राजा धर्मरूपसे विख्यात है। वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है॥ २५-२६॥
प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति॥ २७॥
पुरायोनिर्य्युधाजिच्च अभिया मुदितो भवः।
स्वर्णेता सहजिद् बभ्रुरिति राजाभिधीयते॥ २८॥
सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः।
अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन्॥ २९॥
जिस राजाकी प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि (प्रथम कारण), युधाजित् (संग्रामविजयी), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला), मुदित (प्रसन्न), भव (ईश्वर), स्वर्णेता (स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित् (तत्काल विजय करनेवाला) तथा बभ्रु (विष्णु)—इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है। राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है। अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था॥ २७—२९॥
आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा।
तथैव नृपतिर्भूमावधर्मान्नुदते भृशम्॥ ३०॥
जैसे देवलोकमें सूर्य अपने तेजसे सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है, उसी प्रकार राजा इस पृथ्वीपर रहकर अधर्मोंको सर्वथा हटा देता है॥ ३०॥
ततो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात्।
उत्तरः सिद्ध्यते पक्षो येन राजेति भाषितम्॥ ३१॥
अतः शास्त्र-प्रमाणपर दृष्टिपात करनेसे राजाकी प्रधानता सूचित होती है। इसलिये जिसने राजाको प्रजापति बतलाया है, उसीका पक्ष उत्कृष्ट सिद्ध होता है॥ ३१॥
मार्कण्डेय उवाच
ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः।
तमत्रिमब्रवीत् प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः॥ ३२॥
यस्मात् पूर्वं मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवीः।
सर्वदेवैश्च विप्रर्षे सम्मितं श्रेष्ठमेव च॥ ३३॥
तस्मात् तेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च।
दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम्॥ ३४॥
दशकोटीर्हिरण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश।
एतद् ददामि विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे॥ ३५॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**तदनन्तर एक पक्षकी उत्कृष्टता सिद्ध हो जानेपर महामना राजा पृथु बड़े प्रसन्न हुए और जिन्होंने उनकी पहले स्तुति की थी, उन अत्रिमुनिसे इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मर्षे! आपने यहाँ मुझे मनुष्योंमें प्रथम (भूपाल), श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा सम्पूर्ण देवताओंके समान बताया है, इसलिये मैं आपको प्रचुरमात्रामें नाना प्रकारके रत्न और धन दूँगा, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सहस्रों युवती दासियाँ अर्पित करूँगा तथा दस करोड़ स्वर्णमुद्रा और दस भार सोना भी दूँगा। विप्रर्षे! ये सब वस्तुएँ आपको अभी दे रहा हूँ, मैं समझता हूँ, आप सर्वज्ञ हैं’॥ ३२—३५॥
तदत्रिन्यायतः सर्वं प्रतिगृह्याभिसत्कृतः।
प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव माहतपाः॥ ३६॥
तब महान् तपस्वी और तेजस्वी अत्रि मुनि राजासे समादृत हो न्यायपूर्वक मिले हुए उस सम्पूर्ण धनको लेकर अपने घरको चले गये॥ ३६॥
प्रदाय च धनं प्रीतः पुत्रेभ्यः प्रयतात्मवान्।
तपः समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत॥ ३७॥
फिर मनपर संयम रखनेवाले वे महामुनि पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन बाँटकर तपस्याका शुभ संकल्प मनमें लेकर वनमें ही चले गये॥ ३७॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८५॥
तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद
षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद
मार्कण्डेय उवाच
अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरंजय ।
पृष्ट्या मुनिना वीर शृणु तार्क्ष्येण धीमता ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**शत्रुओंकी राजधानी-पर विजय पानेवाले पाण्डुनन्दन! इसी विषयमें परम बुद्धिमान् तार्क्ष्य मुनिने सरस्वतीदेवीसे कुछ प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें सरस्वतीदेवीने जो कुछ कहा था, वह तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
तार्क्ष्य उवाच
किं नु श्रेयः पुरुषस्येह भद्रे
कथं कुर्वन् न च्यवते स्वधर्मात् ।
आचक्ष्व मे चारुसर्वाङ्गि कुर्यां
त्वया शिष्टो न च्यवेयं स्वधर्मात् ॥ २ ॥
**तार्क्ष्यने पूछा—**भद्रे! इस संसारमें मनुष्यका कल्याण करनेवाली वस्तु क्या है? किस प्रकार आचरण करनेवाला पुरुष अपने धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता है? सर्वांगसुन्दरी देवि! तुम मुझसे इसका वर्णन करो। मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा। मुझे विश्वास है कि तुमसे उपदेश ग्रहण करके मैं अपने धर्मसे गिर नहीं सकता ॥ २ ॥
कथं वाग्निं जुहुयां पूजये वा
कस्मिन् काले केन धर्मो न नश्येत् ।
एतत् सर्वं सुभगे प्रब्रवीहि
यथा लोकान् विरजाः संचरेयम् ॥ ३ ॥
मैं कैसे और किस समय अग्निमें हवन अथवा उसका पूजन करूँ? क्या करनेसे धर्मका नाश नहीं होता है? सुभगे! तुम ये सारी बातें मुझसे बताओ। जिससे मैं रजोगुणरहित होकर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करूँ ॥ ३ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं पृष्टा प्रीतियुक्तेन तेन
शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमबुद्धियुक्तम् ।
तार्क्ष्यं विप्रं धर्मयुक्तं हितं च
सरस्वती वाक्यमिदं बभाषे ॥ ४ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! उनके इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछनेपर सरस्वतीदेवीने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्यको धर्मात्मा, उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं श्रवणके लिये उत्सुक देखकर उनसे यह हितकर वचन कहा— ॥ ४ ॥
सरस्वत्युवाच
यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं
स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः ।
स वै पारं देवलोकस्य गन्ता
सहामरैः प्राप्नुयात् प्रीतियोगम् ॥ ५ ॥
**सरस्वती बोली—**मुने! जो प्रमाद छोड़कर पवित्र भावसे नित्य स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गोंसे प्राप्त होनेयोग्य सगुण ब्रह्मको जान लेता है, वह देवलोकसे उठकर ब्रह्मलोकमें जाता है और देवताओंके साथ प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर लेता है ॥ ५ ॥
तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः
सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः ।
अकर्दमा मीनवत्यः सुतीर्था
हिरण्मयैरावृताः पुण्डरीकैः ॥ ६ ॥
वहाँ सुन्दर, विशाल, शोकरहित, अत्यन्त पवित्र तथा सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित छोटे-छोटे सरोवर हैं। उनमें कीचड़का नाम नहीं है। उनमें मछलियाँ निवास करती हैं। उन सरोवरोंमें उतरनेके लिये मनोहर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं और वे सभी सरोवर सुवर्णमय कमल-पुष्पोंसे आच्छादित रहते हैं ॥ ६ ॥
तासां तीरेष्वासते पुण्यभाजो
महीयमानाः पृथगप्सरोभिः ।
सुपुण्यगन्धाभिरलंकृताभि-
र्हिरण्यवर्णाभिरतीव हृष्टाः ॥ ७ ॥
उनके तटोंपर पूजनीय पुण्यात्मा पुरुष पृथक्-पृथक् अप्सराओंके साथ सानन्द प्रतिष्ठित होते हैं। वे अप्सराएँ अत्यन्त पवित्र सुगन्धसे सुवासित, विविध आभूषणोंसे विभूषित तथा स्वर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होती हैं ॥ ७ ॥
परं लोकं गोप्रदास्त्वाप्नुवन्ति
दत्त्वानड्वाहं सूर्यलोकं व्रजन्ति ।
वासो दत्त्वा चान्द्रमसं तु लोकं
दत्त्वा हिरण्यममरत्वमेति ॥ ८ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्य उत्तम लोकमें जाते हैं। छकड़े ढोनेवाले बलवान् बैलोंका दान करनेसे दाताओंको सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। वस्त्रदानसे चन्द्रलोक और सुवर्णदानसे
अमरत्वकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ धेनुं दत्त्वा सुप्रभां सुप्रदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद् वर्षाण्यासते देवलोके ॥ ९ ॥ जो अच्छे रंगकी हो, सुगमतासे दूध दुहा लेती हो, सुन्दर बछड़े देनेवाली हो और बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका जो लोग दान करते हैं, वे गौके शरीरमें जितने रोएँ हों, उतने वर्षतक देवलोकमें निवास करते हैं ॥ ९ ॥ अनड्वाहं सुव्रतं यो ददाति हलस्य वोढारमनन्तवीर्यम् । धुरन्धरं बलवन्तं युवानं प्राप्नोति लोकान् दश धेनुदस्य ॥ १० ॥ जो मनुष्य अच्छे स्वभाववाले, अत्यन्त शक्तिशाली, हल खींचनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान् और तरुण अवस्थावाले बैलका दान करता है, वह धेनुदान करनेवाले पुरुषसे दसगुने पुण्यलोक प्राप्त करता है ॥ १० ॥ ददाति यो वै कपिलां सचैलां कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । तैस्तैर्गुणैः कामदुहाथ भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ॥ ११ ॥ जो काँसेकी दोहनी, वस्त्र, उत्तरकालिक दक्षिणाद्रव्यके साथ कपिला गौका दान करता है, उसकी दी हुई वह गौ उन-उन गुणोंके साथ कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँच जाती है ॥ ११ ॥ यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- स्तावत् फलं भवति गोप्रदाने । पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व- मासप्तमं तारयते परत्र ॥ १२ ॥ उस धेनुके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता गोदानके पुण्य-फलका उपभोग करता है। साथ ही वह गौ परलोकमें दाताके पुत्रों, पौत्रों एवं सात पीढ़ींतकके समूचे कुलका उद्धार करती है ॥ १२ ॥ सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥ १३ ॥