महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रधानविधिमुत्तमम् ॥ ११९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मार्कण्डेयजीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी युधिष्ठिर बोले—'भगवन्! अब मैं (दानकी) उत्तम एवं प्रधान विधि सुनना चाहता हूँ' ॥ ११९ ॥
मार्कण्डेय उवाच
यत् त्वमिच्छसि राजेन्द्र दानधर्मं युधिष्ठिर । इष्टं चेदं सदा मह्यं राजन् गौरवतस्तथा ॥ १२० ॥ **मार्कण्डेयजीने कहा—**महाराज युधिष्ठिर! तुम मुझसे जिस दान-धर्मको सुनना चाहते हो वह गौरवयुक्त होनेके कारण मुझे सदा ही प्रिय है ॥ १२० ॥ शृणु दानरहस्यानि श्रुतिस्मृत्युदितानि च । छायायां करिणः श्राद्धं तत् कर्णपरिवीजिते । दश कल्पायुतानीह न क्षीयेत युधिष्ठिर ॥ १२१ ॥ श्रुतियों और स्मृतियोंमें जो दानके रहस्य बताये गये हैं, उनका वर्णन सुनो—युधिष्ठिर! गुरुवारको अमावस्याके योगमें पीपलके वृक्षकी छायाको गजच्छाया-पर्व कहते हैं। गजच्छायामें जहाँ पीपलके पत्तोंकी हवा लगती हो, उस प्रदेशमें जलके समीप जो श्राद्ध किया जाता है, वह एक लाख कल्पों तक नष्ट नहीं होता ॥ १२१ ॥ जीवनाय समाक्लिन्नं वसु दत्त्वा महीयते । वैश्यं तु वासयेद् यस्तु सर्वयज्ञैः स इष्टवान् ॥ १२२ ॥ जो जीविकाके लिये राँधा हुआ अन्नका दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो आश्रयकी खोज करनेवाले राहगीर-अतिथिको ठहरनेके लिये जगह दे वह सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेता है ॥ प्रतिस्रोतश्चित्रवाहाः पर्जन्योऽन्नानुसंचरन् । महाधुरि यथा नावा महापापैः प्रमुच्यते ॥ १२३ ॥ विप्लवे विप्रदत्तानि दधिमस्त्वक्षयाणि च । पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीका प्रवाह जहाँ पश्चिमकी ओर मुड़ गया हो, वह प्रतिस्रोत तीर्थ कहलाता है, उसमें किया हुआ उत्तम अश्वोंका दान अक्षय पुण्यको देनेवाला होता है। अन्नके लिये विचरनेवाले अतिथिरूपी इन्द्रको यदि भोजनसे संतुष्ट किया जाय तो वह भी अक्षयपुण्यका जनक होता है। नदियोंके महान् प्रवाहमें ग्रहणके समय ब्राह्मणोंको दिये हुए दधिमण्ड तथा पूर्वोक्त पदार्थ भी अक्षय पुण्यकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। इसी प्रकार नदियोंके महान् प्रवाहमें स्नान करनेवाला पुरुष बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १२३ ॥
पर्वसु द्विगुणं दानमृतौ दशगुणं भवेत् ॥ १२४ ॥
अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च । चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ॥ १२५ ॥ पर्वके अवसरपर दिया हुआ दान दुगुना तथा ऋतु आरम्भ होनेके समय दिया हुआ दान दस गुना पुण्यदायक होता है। उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन, विषुव-योग (तुला और मेषकी संक्रान्ति)-में, मिथुन, कन्या, धनु और मीनकी संक्रान्तियोंमें तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर दिया हुआ दान अक्षय बताया गया है ॥ १२४-१२५ ॥
ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्वयनादिषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो- र्विषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ॥ १२६ ॥ विद्वान् पुरुष ऋतु प्रारम्भ होनेके दिन दिये हुए दानको दस गुना तथा अयन आदिके दिन सौ गुना बताते हैं। इसी प्रकार ग्रहणके दिन दिये हुए दानका फल सहस्रगुना होता है और विषुवयोगमें दान करनेसे मनुष्य उसके अक्षय पुण्य-फलका उपभोग करता है ॥ १२६ ॥
नाभूमिदो भूमिमश्नाति राजन् नायानदो यानमारुह्य याति । यान् यान् कामान् ब्राह्मणेभ्यो ददाति तांस्तान् कामान् जायमानः स भुङ्क्ते ॥ १२७ ॥ राजन्! जिसने भूमिदान नहीं किया है, वह परलोकमें पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। जिसने सवारीका दान नहीं किया है, वह सवारीपर चढ़कर नहीं जा सकता। इस जन्ममें मनुष्य जिन-जिन पदार्थोंका ब्राह्मणोंको दान करता है, भावी जन्ममें वह उन-उन पदार्थोंको उपभोगके लिये पाता है ॥ १२७ ॥
अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काञ्चनं गाश्च महीं च दद्यात् ॥ १२८ ॥ सुवर्ण अग्निकी प्रथम संतान है। भूमि भगवान् विष्णुकी पत्नी है तथा गौएँ भगवान् सूर्यकी कन्याएँ हैं, अतः जो कोई सुवर्ण, गौ और पृथ्वीका दान करता है, उसके द्वारा तीनों लोकोंका दान सम्पन्न हो जाता है ॥
परं हि दानान्न बभूव शाश्वतं भव्यं त्रिलोके भवते कुतः पुनः । तस्मात् प्रधानं परमं हि दानं
वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धयः ॥ १२९ ॥
त्रिलोकीमें दानसे बढ़कर शाश्वत पुण्यदायक कर्म दूसरा पहले कभी नहीं हुआ, अब कैसे हो सकता है? इसीलिये उत्तम बुद्धिवाले पुरुष संसारमें दानको ही सर्वोत्कृष्ट पुण्यकर्म बताते हैं ॥ १२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें दानमाहात्म्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥
* यहाँ जो पिता आदि गुरुजन, सेवक और स्त्रियोंको दिया दान व्यर्थ कहा है, इसका अभिप्राय यह है कि माता-पिता आदि गुरुजनोंकी सेवा करना तथा स्त्री और नौकरोंका पालन-पोषण करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है। अतः उनको देना तो अपने कर्तव्यका ही पालन है, इसलिये वह उनको देना दानकी श्रेणीमें नहीं है।
२०१-
एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः
उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तथा ।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ ।
मार्कण्डेयं तपोवृद्धं दीर्घायुषमकल्मषम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय मुनिके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गप्राप्ति होनेका वृत्तान्त (तथा दानमाहात्म्य) सुनकर राजा युधिष्ठिरने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेयसे इस प्रकार पूछा— ॥ १-२ ॥
विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवराक्षसाः ।
राजवंशाश्च विविधा ऋषिवंशाश्च शाश्वताः ॥ ३ ॥
'धर्मज्ञ मुने! आप देवता, दानव तथा राक्षसोंको भी अच्छी तरह जानते हैं। आपको नाना प्रकारके राजवंशों तथा ऋषियोंकी सनातन वंशपरम्पराका भी ज्ञान है ॥ ३ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदस्मिंल्लोके द्विजोत्तम ।
कथां वेत्सि मुने दिव्यां मनुष्योरगरक्षसाम् ॥ ४ ॥
देवगन्धर्वयक्षाणां किन्नराप्सरसां तथा ।
'द्विजश्रेष्ठ! इस लोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो आपसे अज्ञात हो। मुने! आप मनुष्य, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा अप्सराओंकी भी दिव्य कथाएँ जानते हैं ॥ ४ ॥
इदमिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
कुवलाश्व इति ख्यात इक्ष्वाकुरपराजितः ।
कथं नामविपर्यासाद् धुन्धुमारत्वमागतः ॥ ६ ॥
'विप्रवर! अब मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि इक्ष्वाकुवंशमें जो कुवलाश्व नामसे विख्यात विजयी राजा हो गये हैं, वे क्यों नाम बदलकर 'धुन्धुमार' कहलाने लगे? ॥ ५-६ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन ज्ञातुं भार्गवसत्तम ।
विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमतः ॥ ७ ॥
‘भृगुश्रेष्ठ! बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके इस नाम-परिवर्तनका यथार्थ कारण मैं जानना चाहता हूँ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरेणैवमुक्तो मार्कण्डेयो महामुनिः ।
धौन्धुमारमुपाख्यानं कथयामास भारत ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भारत! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर महामुनि मार्कण्डेयने धुन्धुमारकी कथा प्रारम्भ की ॥ ८ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु राजन् युधिष्ठिर ।
धर्मिष्ठमिदमाख्यानं धुन्धुमारस्य तच्छृणु ॥ ९ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— राजा युधिष्ठिर! सुनो। धुन्धुमारका आख्यान धर्ममय है। अब इसका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ९ ॥
यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः ।
धुन्धुमारत्वमगमत् तच्छृणुष्व महीपते ॥ १० ॥
महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार धुन्धुमार नामसे विख्यात हुए, वह सब श्रवण करो ॥ १० ॥
महर्षिर्विश्रुतस्तात उत्तङ्क इति भारत ।
मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव ॥ ११ ॥
भरतनन्दन! कुरुकुलरत्न! महर्षि उत्तङ्कका नाम बहुत प्रसिद्ध है। तात! मरुके रमणीय प्रदेशमें उनका आश्रम है ॥ ११ ॥
उत्तङ्कस्तु महाराज तपोऽतप्यत् सुदुश्चरम् ।
आरिराधयिषुर्विष्णुं बहून् वर्षगणान् विभुः ॥ १२ ॥
महाराज! प्रभावशाली उत्तङ्कने भगवान् विष्णुकी आराधनाकी इच्छासे बहुत वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी ॥ १२ ॥
तस्य प्रीतः स भगवान् साक्षाद् दर्शनमेयिवान् ।
दृष्ट्वैव चर्षिः प्रह्वस्तं तुष्टाव विविधैः स्तवैः ॥ १३ ॥
उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनका दर्शन पाते ही महर्षि नम्रतासे झुक गये और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥
उत्तङ्क उवाच
त्वया देव प्रजाः सर्वाः ससुरासुरमानवाः ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ १४ ॥
**उत्तङ्क बोले—**देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि सारी प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है। समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि भी आपने ही की है ॥ १४ ॥
ब्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते ।
शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ ॥ १५ ॥
निःश्वासः पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत ।
बाहवस्ते दिशः सर्वाः कुक्षिश्चापि महार्णवः ॥ १६ ॥
ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिर्मधुसूदन ।
पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्याोषधयस्तथा ॥ १७ ॥
महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं ॥ १५—१७ ॥
इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः ।
प्रह्वास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः ॥ १८ ॥
भगवन्! इन्द्र, सोम, अग्नि, वरुण देवता, असुर और बड़े-बड़े नाग—ये सब आपके सामने नतमस्तक हो नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर आपकी स्तुति करते हुए आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं ॥ १८ ॥
त्वया व्याप्तानि सर्वाणि भूतानि भुवनेश्वर ।
योगिनः सुमहावीर्याः स्तुवन्ति त्वां महर्षयः ॥ १९ ॥
भुवनेश्वर! आपने सम्पूर्ण भूतोंको व्याप्त कर रखा है। महान् शक्तिशाली योगी और महर्षि आपका स्तवन करते हैं ॥ १९ ॥
त्वयि तुष्टे जगत् स्वास्थ्यं त्वयि क्रुद्धे महत् भयम् ।
भयानामपनेतासि त्वमेकः पुरुषोत्तम ॥ २० ॥
पुरुषोत्तम! आपके संतुष्ट होनेपर ही संसार स्वस्थ एवं सुखी होता है और आपके कुपित होनेपर इसे महान् भयका सामना करना पड़ता है। एकमात्र आप ही सम्पूर्ण भयका निवारण करनेवाले हैं ॥ २० ॥
देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावहः ।
त्रिभिर्विक्रमणैर्देव त्रयो लोकास्त्वया हृताः ॥ २१ ॥
देव! आप देवताओं, मनुष्यों तथा सम्पूर्ण भूतोंको सुख पहुँचानेवाले हैं। आपने तीन पगोंद्वारा ही (बलिके हाथसे) तीनों लोक (दानद्वारा) हरण कर लिये थे ॥ २१ ॥
असुराणां समृद्धानां विनाशश्च त्वया कृतः ।
तव विक्रमणैर्देव निर्वाणमगमन् परम् ॥ २२ ॥
आपने समृद्धिशाली असुरोंका संहार किया है। आपके ही पराक्रमसे देवता परम सुख-शान्तिके भागी हुए हैं ॥ २२ ॥
पराभूताश्च दैत्येन्द्रास्त्वयि क्रुद्धे महाद्युते ।
त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वशः ॥ २३ ॥
आराधयित्वा त्वां देवाः सुखमेधन्ति सर्वशः ।
महाद्युते! आपके रुष्ट होनेसे ही दैत्यराज देवताओंके सामने पराजित हो जाते हैं। आप इस जगत्के सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। प्रभो! आपकी आराधना करके ही सम्पूर्ण देवता सुख एवं समृद्धि-लाभ करते हैं ॥ २३ १/२ ॥
एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तङ्केन महात्मना ॥ २४ ॥
उत्तङ्कमब्रवीद् विष्णुः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु ।
महात्मा उत्तङ्कके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक भगवान् विष्णुने उनसे कहा—‘सहर्ष! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो’ ॥ २४ १/२ ॥
उत्तङ्क उवाच
पर्याप्तो मे वरो ह्येष यदहं दृष्टवान् हरिम् ॥ २५ ॥ पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगतः प्रभुम् । उत्तङ्कने कहा— भगवन्! समस्त संसारकी सृष्टि करनेवाले दिव्य सनातन पुरुष आप सर्वशक्तिमान् श्रीहरिका जो मुझे दर्शन मिला, यही मेरे लिये सबसे महान् वर है ॥ २५ १/२ ॥
विष्णुरुवाच
प्रीतस्तेऽहमलौल्येन भक्त्या तव च सत्तम ॥ २६ ॥ अवश्यं हि त्वया ब्रह्मन् मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज । भगवान् विष्णु बोले— सज्जनशिरोमणे! मैं तुम्हारी लोभशून्यता एवं उत्तम भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन्! तुम्हें मुझसे कोई वर अवश्य लेना चाहिये ॥ २६ १/२ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं स छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा ॥ २७ ॥ उत्तङ्कः प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम । मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् विष्णुके द्वारा वर लेनेके लिये आग्रह होनेपर उत्तङ्कने हाथ जोड़कर इस प्रकार वर माँगा ॥ २७ १/२ ॥ यदि मे भगवन् प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण ॥ २८ ॥ धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा । अभ्यासश्च भवेद् भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥ २९ ॥ ‘भगवन्! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे’ ॥ २८-२९ ॥
श्रीभगवानुवाच
सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात् तव द्विज । प्रतिभास्यति योगश्च येन युक्तो दिवौकसाम् ॥ ३० ॥ त्रयाणामपि लोकानां महत् कार्यं करिष्यसि । श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! मेरी कृपासे यह सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो जायगा। इसके सिवा तुम्हारे हृदयमें उस योगविद्याका प्रकाश होगा जिससे युक्त होकर तुम देवताओं तथा तीनों लोकोंका महान् कार्य सिद्ध कर सकोगे ॥ ३० १/२ ॥ उत्सादनार्थं लोकानां धुन्धुर्नाम महासुरः ॥ ३१ ॥ तपस्यति तपो घोरं शृणु यस्तं हनिष्यति ।
विप्रवर! धुन्धु नामसे प्रसिद्ध एक महान् असुर है, जो तीनों लोकोंका संहार करनेके लिये घोर तपस्या कर रहा है। जो वीर उस महान् असुरका वध करेगा, उसका परिचय देता हूँ, सुनो ॥ ३१ १/२ ॥
राजा हि वीर्यवांस्तात इक्ष्वाकुरपराजितः ॥ ३२ ॥
बृहदश्व इति ख्यातो भविष्यति महीपतिः ।
तस्य पुत्रः शुचिर्दान्तः कुवलाश्व इति श्रुतः ॥ ३३ ॥
तात! इक्ष्वाकुकुलमें बृहदश्व नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी और किसीसे पराजित न होनेवाले राजा उत्पन्न होंगे। उनका पवित्र और जितेन्द्रिय पुत्र कुवलाश्वके नामसे विख्यात होगा ॥ ३२-३३ ॥
स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तमः ।
शासनात् तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ।
एवमुक्त्वा तु तं विप्रं विष्णुरन्तरधीयत ॥ ३४ ॥
ब्रह्मर्षे! तुम्हारे आदेशसे वे नृपश्रेष्ठ कुवलाश्व ही मेरे योगबलका आश्रय लेकर धुन्धु राक्षसका वध करेंगे और लोकमें धुन्धुमार नामसे विख्यात होंगे। उत्तङ्कसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥
२०२-
द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह
मार्कण्डेय उवाच
इक्ष्वाकौ संस्थिते राजन् शशादः पृथिवीमिमाम् ।
प्राप्तः परमधर्मात्मा सोऽयोध्यायां नृपोऽभवत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! महाराज इक्ष्वाकुके देहावसानके पश्चात् उनके परम धर्मात्मा पुत्र शशाद इस पृथ्वीपर राज्य करने लगे। वे अयोध्यामें रहते थे ॥ १ ॥
शशादस्य तु दायादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् ।
अनेनाश्चापि काकुत्स्थः पृथुश्चानेनसः सुतः ॥ २ ॥
शशादके पुत्र पराक्रमी ककुत्स्थ हुए। ककुत्स्थके पुत्र अनेना और अनेनाके पृथु हुए ॥ २ ॥
विश्वगश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादद्रिश्च जज्ञिवान् ।
अद्रेश्च युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ ३ ॥
पृथुके विश्वगश्व और उनके पुत्र अद्रि हुए। अद्रिके पुत्रका नाम युवनाश्व था। युवनाश्वका पुत्र श्राव नामसे विख्यात हुआ ॥ ३ ॥
तस्य श्रावस्तको ज्ञेयः श्रावस्ती येन निर्मिता ।
श्रावस्तकस्य दायादो बृहदश्वो महाबलः ॥ ४ ॥
श्रावका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसने श्रावस्तीपुरी बसायी थी। श्रावस्तके ही पुत्र महाबली बृहदश्व थे ॥ ४ ॥
बृहदश्वस्य दायादः कुवलाश्व इति स्मृतः ।
कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः ॥ ५ ॥
बृहदश्वके ही पुत्रका नाम कुवलाश्व था। कुवलाश्वके इक्कीस हजार पुत्र हुए ॥ ५ ॥
सर्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदाः ।
कुवलाश्वश्च पितृतो गुणैरभ्यधिकोऽभवत् ॥ ६ ॥
वे सब-के-सब सम्पूर्ण विद्याओंमें पारंगत, बलवान् और दुर्धर्ष वीर थे। कुवलाश्व उत्तम गुणोंमें अपने पितासे बढ़कर निकले ॥ ६ ॥
समये तं पिता राज्ये बृहदश्वोऽभ्यषेचयत् ।
कुवलाश्वं महाराज शूरमुत्तमधार्मिकम् ॥ ७ ॥
महाराज! राजा बृहदश्वने यथासमय अपने उत्तम धर्मात्मा शूरवीर पुत्र कुवलाश्वको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ।। ७ ।।
पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बृहदश्वो महीपतिः । जगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहा ॥ ८ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले बुद्धिमान् राजा बृहदश्व राजलक्ष्मीका भार पुत्रपर छोड़कर स्वयं तपस्याके लिये तपोवनमें चले गये ।। ८ ।।
अथ शुश्राव राजर्षिं तमुत्तङ्को नराधिप । वनं सम्प्रस्थितं राजन् बृहदश्वं द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर द्विजश्रेष्ठ उत्तङ्कने यह सुना कि राजर्षि बृहदश्व वनको चले जा रहे हैं ।। ९ ।।
तमुत्तङ्को महातेजाः सर्वास्त्रविदुषां वरम् । न्यवारयदमेयात्मा समासाद्य नरोत्तमम् ॥ १० ॥
वे नरश्रेष्ठ नरेश सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वानोंमें सर्वोत्तम थे। विशाल हृदयवाले महातेजस्वी उत्तङ्कने उनके पास जाकर उन्हें वनमें जानेसे रोका और इस प्रकार कहा ।। १० ।।
उत्तङ्क उवाच
भवता रक्षणं कार्यं तत् तावत् कर्तुमर्हसि । निरुद्विग्ना वयं राजंस्त्वत्प्रसादाद् भवेमहि ॥ ११ ॥
**उत्तङ्क बोले—**महाराज! प्रजाकी रक्षा करना आपका कर्तव्य है। अतः पहले वही आपको करना चाहिये जिससे आपके कृपाप्रसादसे हमलोग निर्भय हो जायँ ।। ११ ।।
त्वया हि पृथिवी राजन् रक्ष्यमाणा महात्मना । भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ राजन्! आप-जैसे महात्मा राजासे सुरक्षित होकर ही यह पृथ्वी सर्वथा भयशून्य हो जायगी। अतः आप वनमें न जाइये ॥ १२ ॥ पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते । न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥ १३ ॥ क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता। अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ॥ १३ ॥ ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते । प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! पूर्वकालके राजर्षियोंने जिस धर्मका पालन किया है, वह प्रजाजनोंके पालनमें ही सुलभ है। ऐसा धर्म और किसी कार्यमें नहीं दिखायी देता ॥ १४ ॥ रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि । निरुद्विग्नस्तपश्चर्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव ॥ १५ ॥ राजाके लिये प्रजाजनोंका पालन करना ही धर्म है। अतः आपको प्रजावर्गकी रक्षा ही करनी चाहिये। भूपाल! मैं शान्तिपूर्वक तपस्या नहीं कर पा रहा हूँ ॥
ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु । समुद्रो बालुकापूर्ण उज्वालक इति स्मृतः ॥ १६ ॥ मेरे आश्रमके समीप समस्त मरुप्रदेशमें एक बालूसे पूर्ण अर्थात् बालुकामय समुद्र है, उसका नाम है उज्वालक ॥ १६ ॥ बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः । तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः ॥ १७ ॥ मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः । अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रमः ॥ १८ ॥ उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनकी है। वहाँ महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न एक भयंकर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभका पुत्र है। वह क्रूर स्वभाववाला राक्षस धुन्धु नामसे प्रसिद्ध है। राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरतीके भीतर छिपकर रहा करता है ॥ १७-१८ ॥ तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि । शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् ॥ १९ ॥ त्रिदशानां विनाशाय लोकानां चापि पार्थिव । महाराज! उसका नाश करके ही आपको वनमें जाना चाहिये। भूपाल! वह सम्पूर्ण लोकों और देवताओंके विनाशके लिये कठोर तपस्याका आश्रय लेकर (पृथ्वीमें) शयन करता है ॥ १९ १/२ ॥ अवध्यो दैवतानां हि दैत्यानामथ रक्षसाम् ॥ २० ॥ नागानामथ यक्षाणां गन्धर्वाणां च सर्वशः । अवाप्य स वरं राजन् सर्वलोकपितामहात् ॥ २१ ॥ राजन्! वह सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीसे वर पाकर देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और समस्त गन्धर्वोंके लिये अवध्य हो गया है ॥ २०-२१ ॥ तं विनाशय भद्रं ते मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा । प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ॥ २२ ॥ महाराज! आपका कल्याण हो। आप उस दैत्यका विनाश कीजिये। इसके विपरीत आपको कोई विचार नहीं करना चाहिये। उसका वध करके आप सदा बनी रहनेवाली अक्षय एवं महान् कीर्ति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥ क्रूरस्य तस्य स्वपतो बालुकान्तर्हितस्य च । संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥ बालूके भीतर छिपकर रहनेवाला वह क्रूर राक्षस एक वर्षमें एक ही बार साँस लेता है ॥ २३ ॥ यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना ।
तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत् ।। २४ ।। आदित्यपथमाश्रित्य सप्ताहं भूमिकम्पनम् । सविस्फुलिङ्गं सज्ज्वलं धूममिश्रं सुदारुणम् ।। २५ ।। जिस समय वह साँस लेता है, उस समय पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। उसके साँसकी आँधीसे धूलका इतना ऊँचा बवंडर उठता है कि वह सूर्यके मार्गको भी ढक लेता है और सात दिनोंतक वहाँ भूकम्प होता रहता है। आगकी चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धूआँ उठकर अत्यन्त भयंकर दृश्य उपस्थित करते हैं ।। २४-२५ ।। तेन राजन् न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्व आश्रमे । तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया ।। २६ ।। राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रममें रहना कठिन हो गया है। महाराज! सब लोगोंके हितके लिये आप उस राक्षसको नष्ट कीजिये ।। २६ ।। लोकाः स्वस्था भविष्यन्ति तस्मिन् विनिहतेऽसुरे । त्वं हि तस्य विनाशाय पर्याप्त इति मे मतिः ।। २७ ।। उस असुरके मारे जानेपर सब लोग स्वस्थ एवं सुखी हो जायँगे। मेरा विश्वास है कि आप अकेले ही उसका नाश करनेके लिये पर्याप्त हैं ।। २७ ।। तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति । विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ।। २८ ।। यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः । तेजस्तं वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ।। २९ ।। भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेजसे आपके तेजको बढ़ायेंगे। उन्होंने पूर्वकालमें मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान् असुरका वध करनेको उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीरके भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा ।। २८-२९ ।। तत् तेजस्त्वं समाधाय राजेन्द्र भुवि दुःसहम् । तं निष्षूदय राजेन्द्र दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ।। ३० ।। महाराज! अतः आप भगवान्का दुःसह तेज धारण करके पृथ्वीपर रहनेवाले उस भयानक पराक्रमी दैत्यको नष्ट कीजिये ।। ३० ।। न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते । निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ।। ३१ ।। राजन्! धुन्धु महातेजस्वी असुर है। साधारण तेजसे सौ वर्षोंमें भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता ।। ३१ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥
२०३-
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका वध
मार्कण्डेय उवाच
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्कके इस प्रकार आग्रह करनेपर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्वने उनसे हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥
न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति ।
पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥
धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि ।
‘ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। भगवन्! मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डलमें अनुपम वीर है। यह धैर्यवान् और फुर्तीला है ॥ २ १/२ ॥
प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः ।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥
परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रोंके साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रोंको त्याग दिया है’ ॥
तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा ।
स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ।
तब अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनिने ‘तथास्तु’ कहकर राजाको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्वने महात्मा उत्तङ्कको अपना वह पुत्र सौंप दिया और धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा दे उत्तम तपोवनकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५ १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥
एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ।। ७ ।। एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम् । सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ।। ८ ।। तपस्याके धनी मुनीश्वर! ऐसा महाबली दैत्य तो मैंने कभी नहीं सुना था, अतः भगवन्! मैं इसके विषयमें यथार्थ बातें जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये ।। ७-८ ।।
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप । कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ।। ९ ।। मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। यह सारा वृत्तान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ।। ९ ।।
एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ।। १० ।। भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी कालके गालमें चले गये थे ।। १० ।।
प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् । यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ।। ११ ।। सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः । नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ।। १२ ।। उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान्को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं ।। ११-१२ ।।
लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः । नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ।। १३ ।। स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् । नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ।। १४ ।। साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।
महाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर (शेषनागपर) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १३-१४ १/२ ॥
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥
स्वप्रभावाद् दुर्धर्षो महाबलपराक्रमः ।
वे चारों वेदोंके विद्वान् हैं। जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हींके स्वरूप हैं। उनके चार मुख हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। वे अपने प्रभावसे दुर्धर्ष हैं ॥ १५ १/२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ १६ ॥
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ।
ब्रह्माजीके प्रकट होनेके कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवोंने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरिको देखा ॥ १६ १/२ ॥
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥
वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान् है। वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनोंकी है। भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ॥ १७-१८ ॥
दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा ।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १९ ॥
राजन्! वे अपनी कान्ति और तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। शरीरसे वे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित होते थे। उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी ॥ १९ ॥
विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।
वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥
भगवान्को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे। उन दोनोंके द्वारा बार-बार डराये जानेपर
महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया। इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे। जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा ।। २०—२२ ।। दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ । ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ।। २३ ।। उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—‘तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है’ ।। २३ ।। तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ । प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ।। २४ ।। महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे। उन्होंने हँसकर इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् मधुसूदनसे एक साथ कहा— ।। २४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1411)
भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका जाँघोंपर वध
आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम।