महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दमयन्त्या ब्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिंदम ।
शोकजं वारि नेत्राभ्यामसुकं प्रास्रवद् बहु ॥ १५ ॥
शत्रुदमन युधिष्ठिर! दमयन्ती जब ये सब बातें कह रही थी, उस समय नलके नेत्रोंसे शोकजनित दुःखपूर्ण आँसुओंकी अजस्र धारा बहती जा रही थी ॥ १५ ॥
अतीव कृष्णसाराभ्यां रक्तान्ताभ्यां जलं तु तत् ।
परिस्रवन् नलो दृष्ट्वा शोकार्तामिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥
उनकी आँखोंकी पुतलियाँ काली थीं और नेत्रके किनारे कुछ-कुछ लाल थे। उनसे निरन्तर अश्रुधारा बहाते हुए नलने दमयन्तीको शोकसे आतुर देख इस प्रकार कहा — ॥ १६ ॥
मम राज्यं प्रणष्टं यन्नाहं तत् कृतवान् स्वयम् ।
कलिना तत् कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम् ॥ १७ ॥
‘भीरु! मेरा जो राज्य नष्ट हो गया और मैंने जो तुम्हें त्याग दिया, वह सब कलियुगकी करतूत थी। मैंने स्वयं कुछ नहीं किया था ॥ १७ ॥
यत् त्वया धर्मकृच्छ्रे तु शापेनाभिहतः पुरा ।
वनस्थया दुःखितया शोचन्त्या मां दिवानिशम् ॥ १८ ॥
स मच्छरीरे त्वच्छापाद् दह्यमानोऽवसत् कलिः ।
त्वच्छापदग्धः सततं सोऽग्नावग्निरिवाहितः ॥ १९ ॥
‘पहले जब तुम वनमें दुखी होकर दिन-रात मेरे लिये शोक करती थी और उस समय धर्मसंकटमें पड़नेपर तुमने जिसे शाप दे दिया था, वही कलियुग मेरे शरीरमें तुम्हारी शापग्निसे दग्ध होता हुआ निवास करता था, जैसे आगमें रखी हुई आग हो; उसी प्रकार वह कलि तुम्हारे शापसे दग्ध हो सदा मेरे भीतर रहता था ॥ १८-१९ ॥
मम च व्यवसायेन तपसा चैव निर्जितः ।
दुःखस्यान्तेन चानेन भवितव्यं हि नौ शुभे ॥ २० ॥
‘शुभे! मेरे व्यवसाय (उद्योग) तथा तपस्यासे कलियुग परास्त हो चुका है। अतः अब हमारे दुःखोंका अन्त हो जाना चाहिये ॥ २० ॥
विमुच्य मां गतः पापस्ततोऽहमिह चागतः ।
त्वदर्थं विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत् प्रयोजनम् ॥ २१ ॥
‘सुन्दरी! पापी कलियुग मुझे छोड़कर चला गया, इसीसे मैं तुम्हारी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर यहाँ आया हूँ। इसके सिवा, मेरे आगमनका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २१ ॥
कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम् ।
उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ॥ २२ ॥
‘भीरु! कोई भी स्त्री कभी अपने अनुरक्त एवं भक्त पतिको त्यागकर दूसरे पुरुषका वरण कैसे कर सकती है? जैसा कि तुम करने जा रही हो ॥ २२ ॥
दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् । भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति ॥ २३ ॥ 'विदर्भनरेशकी आज्ञासे सारी पृथ्वीपर दूत विचरते हैं और यह घोषणा कर रहे हैं कि दमयन्ती द्वितीय पतिका वरण करेगी ॥ २३ ॥
स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मनः । श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भार्ङ्गासुरिरुपस्थितः ॥ २४ ॥ 'दमयन्ती स्वेच्छाचारिणी है और अपनी रुचिके अनुसार किसी अनुरूप पतिका वरण कर सकती है', यह सुनकर ही राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ यहाँ उपस्थित हुए हैं' ॥ २४ ॥
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा नलस्य परिदेवितम् । प्राञ्जलिर्वेपमाना च भीता वचनमब्रवीत् ॥ २५ ॥ दमयन्ती नलका यह विलाप सुनकर काँप उठी और भयभीत हो हाथ जोड़कर यह वचन बोली ॥ २५ ॥
दमयन्त्युवाच न मामर्हसि कल्याण दोषेण परिशङ्कितुम् । मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ॥ २६ ॥ दमयन्तीने कहा—कल्याणमय निषधनरेश! आपको मुझपर दोषारोपण करते हुए मेरे चरित्रपर संदेह नहीं करना चाहिये। (आपके प्रति अनन्य प्रेमके कारण ही) मैंने देवताओंको छोड़कर आपका वरण किया है ॥ २६ ॥
तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥ २७ ॥ आपका पता लगानेके लिये ही चारों ओर ब्राह्मणलोग भेजे गये और वे मेरी कही हुई बातोंको सब दिशाओंमें गाथाके रूपमें गाते फिरे ॥ २७ ॥
ततस्त्वां ब्राह्मणो विद्वान् पर्णादो नाम पार्थिव । अभ्यगच्छत् कोसलायामृतुपर्णनिवेशने ॥ २८ ॥ राजन्! इसी योजनाके अनुसार पर्णाद नामक विद्वान् ब्राह्मण अयोध्यापुरीमें ऋतुपर्णके राजभवनमें गये थे ॥
तेन वाक्ये कृते सम्यक् प्रतिवाक्ये तथाऽऽहृते । उपायोऽयं मया दृष्टो नैषधानयने तव ॥ २९ ॥ उन्होंने वहाँ मेरी बात उपस्थित की और वहाँसे आपके द्वारा प्राप्त हुआ ठीक-ठीक उत्तर वे ले आये। निषधराज! इसके बाद आपको यहाँ बुलानेके लिये मुझे यह उपाय सूझा
(कि एक ही दिनके बाद होनेवाले स्वयंवरका समाचार देकर ऋतुपर्णको बुलाया जाय) ।। २९ ।। त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते । समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ।। ३० ।। नरेश्वर! पृथ्वीनाथ! मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि इस जगत्में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो एक ही दिनमें घोड़े जुते हुए रथकी सवारीसे सौ योजन दूरतक जानेमें समर्थ हो ।। ३० ।। स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते । यथा नासत्कृतं किंचिन्मनसापि चराम्यहम् ।। ३१ ।। महीपते! मैं मनसे भी कभी कोई असदाचरण नहीं करती हूँ और इसी सत्यकी शपथ खाकर आपके इन दोनों चरणोंका स्पर्श करती हूँ ।। ३१ ।। अयं चरति लोकेऽस्मिन् भूतसाक्षी सदागतिः । एष मे मुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ।। ३२ ।। ये सदा गतिशील वायुदेवता इस जगत्में निरन्तर विचरते रहते हैं, अतः ये सम्पूर्ण भूतोंके साक्षी हैं। यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ।। ३२ ।। यथा चरति तिग्मांशुः परेण भुवनं सदा । स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ।। ३३ ।। प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेव समस्त भुवनोंके ऊपर विचरते हैं, (अतः वे भी सबके शुभाशुभ कर्म देखते रहते हैं।) यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ।। ३३ ।। चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् । स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ।। ३४ ।। चित्तके अभिमानी देवता चन्द्रमा समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीरूपसे विचरते हैं। यदि मैंने पाप किया है तो वे मेरे प्राणोंका हरण कर लें ।। ३४ ।। एते देवास्त्रयः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै । विब्रुवन्तु यथा सत्यमेतद् देवास्त्यजन्तु माम् ।। ३५ ।। ये पूर्वोक्त तीन देवता सम्पूर्ण त्रिलोकीको धारण करते हैं। मेरे कथनमें कितनी सच्चाई है, इसे देवतालोग स्वयं स्पष्ट करें। यदि मैं झूठ बोलती हूँ तो देवता मेरा त्याग कर दें ।। ३५ ।। एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभाषत । नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ।। ३६ ।।
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अन्तरिक्षलोकसे वायु-देवताने कहा—‘नल! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इस दमयन्तीने कभी कोई पाप नहीं किया है ।। ३६ ।।
राजञ्छीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः ।
साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन् परिवत्सरान् ।। ३७ ।।
‘राजन्! दमयन्तीने अपने शीलकी उज्ज्वल निधिको सदा सुरक्षित रखा है। हमलोग तीन वर्षोंतक निरन्तर इसके रक्षक और साक्षी रहे हैं ।। ३७ ।।
उपायो विहितश्चायं त्वदर्थमतुलोऽनया ।
न ह्येकाह्ना शतं गन्ता त्वामृतेऽन्यः पुमानिह ।। ३८ ।।
‘तुम्हारी प्राप्तिके लिये दमयन्तीने यह अनुपम उपाय ढूँढ़ निकाला था; क्योंकि इस जगत्में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है, जो एक दिनमें सौ योजन (रथद्वारा) जा सके ।। ३८ ।।
उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते ।
नात्र शङ्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया ।। ३९ ।।
‘राजन्! भीमकुमारी दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो। तुम्हें इसके चरित्रके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये। तुम अपनी पत्नीसे निःशंक होकर मिलो' ।। ३९ ।।
तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ववौ च पवनः शिवः ॥ ४० ॥
वायुदेवके ऐसा कहते समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही थी, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज रही थीं और मंगलमय पवन चलने लगा ॥ ४० ॥
तदद्भुतमयं दृष्ट्वा नलो राजाथ भारत ।
दमयन्त्यां विशङ्कां तामपाकर्षदरिंदमः ॥ ४१ ॥
युधिष्ठिर! यह अद्भुत दृश्य देखकर शत्रुसूदन राजा नलने दमयन्तीके विरुद्ध होनेवाली शंकाको त्याग दिया ॥ ४१ ॥
ततस्तद् वस्त्रमजरं प्रावृणोद् वसुधाधिपः ।
संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं वपुः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर उन भूपालने नागराज कर्कोटकका स्मरण करके उसके दिये हुए अजीर्ण वस्त्रको ओढ़ लिया। उससे उन्हें अपने पूर्वस्वरूपकी प्राप्ति हो गयी ॥ ४२ ॥
स्वरूपिणं तु भर्तारं दृष्ट्वा भीमसुता तदा ।
प्राक्रोशदुच्चैरालिङ्ग्य पुण्यश्लोकमनिन्दिता ॥ ४३ ॥
अपने वास्तविक रूपमें प्रकट हुए अपने पतिदेव पुण्यश्लोक महाराज नलको देखकर सती साध्वी दमयन्ती उनके हृदयसे लगकर उच्च स्वरसे रोने लगी ॥ ४३ ॥
भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा ।
सस्वजे स्वसुतौ चापि यथावत् प्रत्यनन्दत ॥ ४४ ॥
राजा नलका रूप पहलेकी ही भाँति ही प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने भी दमयन्तीको छातीसे लगा लिया और अपने दोनों बालकोंको भी प्यार-दुलार करके प्रसन्न किया ॥ ४४ ॥
ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्त्रं तस्य शुभानना ।
परीता तेन दुःखेन निःशश्वासायतेक्षणा ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् सुन्दर मुख और विशाल नेत्रोंवाली दमयन्ती नलके मुखको अपने वक्षःस्थलपर रखकर दुःखसे व्याकुल हो लंबी साँसे खींचने लगी ॥ ४५ ॥
तथैव मलदिग्धाङ्गीं परिष्वज्य शुचिस्मिताम् ।
सुचिरं पुरुषव्याघ्रस्तस्थौ शोकपरिप्लुतः ॥ ४६ ॥
इसी प्रकार पवित्र मुसकान तथा मैलसे भरे हुए अंगोंवाली दमयन्तीको हृदयसे लगाकर पुरुषसिंह नल बहुत देरतक शोकमग्न खड़े रहे ॥ ४६ ॥
ततः सर्वं यथावृत्तं दमयन्त्या नलस्य च ।
भीमायाकथयत् प्रीत्या वैदर्भ्या जननी नृप ॥ ४७ ॥
‘राजन्! तदनन्तर (दमयन्तीके द्वारा मालूम होनेपर) दमयन्तीकी माताने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक राजा भीमसे नल-दमयन्तीका सारा वृत्तान्त यथावत् कह सुनाया' ॥ ४७ ॥
ततोऽब्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् । दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोषितम् ॥ ४८ ॥ तब महाराज भीमने कहा—'आज नलको सुखपूर्वक यहीं रहने दो। कल सबेरे स्नान आदिसे शुद्ध हुए दमयन्तीसहित नलसे मैं मिलूँगा' ॥ ४८ ॥
ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम् । वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ॥ ४९ ॥ राजन्! तत्पश्चात् वे दोनों दम्पति रातभर वनमें रहनेकी पुरानी घटनाओंको एक-दूसरेसे कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहे ॥ ४९ ॥
गृहे भीमस्य नृपतेः परस्परसुखैषिणौ । वसेतां हृष्टसंकल्पौ वैदर्भी च नलश्च ह ॥ ५० ॥ एक-दूसरेको सुख देनेकी इच्छा रखनेवाले दमयन्ती और नल राजा भीमके महलमें प्रसन्नचित्त होकर रहे ॥ ५० ॥
स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया । सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लब्धवान् परमां मुदम् ॥ ५१ ॥ चौथे वर्षमें अपनी प्यारी पत्नीसे मिलकर सम्पूर्ण कामनाओंसे सफलमनोरथ हो नल अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये ॥ ५१ ॥
दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याप्यायिता भृशम् । अर्धसंजातसस्येव तोयं प्राप्य वसुंधरा ॥ ५२ ॥ जैसे आधी जमी हुई खेतीसे भरी वसुधा वर्षाका जल पाकर उल्लसित हो उठती है, उसी प्रकार दमयन्ती भी अपने पतिको पाकर बहुत संतुष्ट हुई ॥ ५२ ॥
सैवं समेत्य व्यपनीय तन्द्रां शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥ ५३ ॥ जैसे चन्द्रोदयसे रात्रिकी शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार भीमकुमारी दमयन्ती पतिसे मिलकर आलस्यका त्याग करके निश्चिन्त और हर्षोल्लसित हृदयसे पूर्णकाम होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलदमयन्तीसमागमे षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलदमयन्तीसमागमविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 543)
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
नलके प्रकट होनेपर विदर्भनगरमें महान् उत्सवका आयोजन, ऋतुपर्णके साथ नलका वार्तालाप और ऋतुपर्णका नलसे अश्वविद्या सीखकर अयोध्या जाना
बृहदश्व उवाच
अथ तां व्युषितां रात्रिं नलो राजा स्वलंकृतः ।
वैदर्भ्या सहितः काले ददर्श वसुधाधिपम् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर वह रात बीतनेपर राजा नल वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो दमयन्तीके साथ यथासमय राजा भीमसे मिले ॥ १ ॥
ततोऽभिवादयामास प्रयतः श्वशुरं नलः ।
ततोऽनु दमयन्ती च ववन्दे पितरं शुभा ॥ २ ॥
स्नानादिसे पवित्र हुए राजा नलने विनीतभावसे श्वशुरको प्रणाम किया। तत्पश्चात् शुभलक्षणा दमयन्तीने भी पिताकी वन्दना की ॥ २ ॥
तं भीमः प्रतिजग्राह पुत्रवत् परया मुदा ।
यथार्हं पूजयित्वा च समाश्वासयत प्रभुः ॥ ३ ॥
नलेन सहितां तत्र दमयन्तीं पतिव्रताम् ।
राजा भीमने बड़ी प्रसन्नताके साथ नलको पुत्रकी भाँति अपनाया और नलसहित पतिव्रता दमयन्तीका यथायोग्य आदर-सत्कार करके उन्हें आश्वासन दिया ॥ ३ १/२ ॥
तामर्हणां नलो राजा प्रतिगृह्य यथाविधि ॥ ४ ॥
परिचर्यां स्वकां तस्मै यथावत् प्रत्यवेदयत् ।
ततो बभूव नगरे सुमहान् हर्षजः स्वनः ॥ ५ ॥
जनस्य सम्प्रहृष्टस्य नलं दृष्ट्वा तथाऽऽगतम् ।
राजा नलने उस पूजाको विधिपूर्वक स्वीकार करके अपनी ओरसे भी श्वशुरका सेवा-सत्कार किया। तदनन्तर विदर्भनगरमें राजा नलको इस प्रकार आया देख हर्षोल्लासमें भरी हुई जनताका महान् आनन्दजनित कोलाहल होने लगा ॥ ४-५ १/२ ॥
अशोभयच्च नगरं पताकाध्वजमालिनम् ॥ ६ ॥
सिक्ताः सुमृष्टपुष्पाढ्या राजमार्गाः स्वलंकृताः ।
द्वारि द्वारि च पौराणां पुष्पभङ्गः प्रकल्पितः ॥ ७ ॥
विदर्भनरेशने ध्वजा, पताकाओंकी पंक्तियोंसे कुण्डिनपुरको अद्भुत शोभासे सम्पन्न किया। सड़कोंको खूब झाड़-बुहारकर उनपर छिड़काव किया गया था। फूलोंसे उन्हें अच्छी
तरह सजाया गया था। पुरवासियोंके द्वार-द्वारपर सुगंध फैलानेके लिये राशि-राशि फूल बिखेरे गये थे॥ ६-७॥
अर्चितानि च सर्वाणि देवतायतनानि च।
ऋतुपर्णोऽपि शुश्राव बाहुकच्छद्मिनं नलम्॥ ८॥
दमयन्त्या समायुक्तं जहृषे च नराधिपः।
सम्पूर्ण देवमन्दिरोंकी सजावट और देवमूर्तियोंकी पूजा की गयी थी। राजा ऋतुपर्णने भी जब यह सुना कि बाहुकके वेषमें राजा नल ही थे और अब वे दमयन्तीसे मिले हैं, तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥ ८ १/२ ॥
तमानाय्य नलं राजा क्षमयामास पार्थिवम्॥ ९॥
उन्होंने राजा नलको बुलवाकर उनसे क्षमा माँगी॥ ९॥
स च तं क्षमयामास हेतुभिर्बुद्धिसम्मितः।
स सत्कृतो महीपालो नैषधं विस्मिताननः॥ १०॥
उवाच वाक्यं तत्त्वज्ञो नैषधं वदतां वरः।
बुद्धिमान् नलने भी अनेक युक्तियोंद्वारा उनसे क्षमा-याचना की। नलसे आदर-सत्कार पाकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं तत्त्वज्ञ राजा ऋतुपर्ण मुसकराते हुए मुखसे बोले—॥ १० १/२ ॥
दिष्ट्या समेतो दारैः स्वैर्भवानित्यभ्यनन्दत॥ ११॥
'निषधनरेश! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप अपनी बिछुड़ी हुई पत्नीसे मिले।' ऐसा कहकर उन्होंने नलका अभिनन्दन किया॥ ११॥
किंचित् तु नापराधं ते कृतवानस्मि नैषध।
अज्ञातवासे वसतो मद्गृहे वसुधाधिप॥ १२॥
(और पुनः कहा—) 'नैषध! भूपालशिरोमणे! आप मेरे घरपर जब अज्ञातवासकी अवस्थामें रहते थे, उस समय मैंने आपका कोई अपराध तो नहीं किया है?॥ १२॥
यदि वाबुद्धिपूर्वाणि यदि बुद्ध्यापि कानिचित्।
मया कृतान्यकार्याणि तानि त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ १३॥
'उन दिनों यदि मैंने बिना जाने या जान-बूझकर आपके साथ अनुचित बर्ताव किये हों तो उन्हें आप क्षमा कर दें'॥ १३॥
नल उवाच
न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव।
कृतेऽपि च न मे कोपः क्षन्तव्यं हि मया तव॥ १४॥
नलने कहा—'राजन्! आपने मेरा कभी थोड़ासा भी अपराध नहीं किया है और यदि किया भी हो तो उसके लिये मेरे हृदयमें क्रोध नहीं है। मुझे आपके प्रत्येक बर्तावको क्षमा ही करना चाहिये'॥ १४॥
पूर्वं ह्यपि सखा मेऽसि सम्बन्धी च जनाधिप । अत ऊर्ध्वं तु भूयस्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि ॥ १५ ॥ जनेश्वर! आप पहले भी मेरे सखा और सम्बन्धी थे और इसके बाद भी आपको मुझपर अधिक-से-अधिक प्रेम रखना चाहिये ॥ १५ ॥
सर्वकामैः सुविहितैः सुखमस्म्युषितस्त्वयि । न तथा स्वगृहे राजन् यथा तव गृहे सदा ॥ १६ ॥ राजन्! मेरी समस्त कामनाएँ वहाँ अच्छी तरह पूर्ण की गयीं और इसके कारण मैं सदा आपके यहाँ सुखी रहा। महाराज! आपके भवनमें मुझे जैसा आराम मिला, वैसा अपने घरमें भी नहीं मिला ॥ १६ ॥
इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति । तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैषधः ॥ १७ ॥ आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहरके रूपमें पड़ा है। राजन्! यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे आपको देनेकी इच्छा रखता हूँ। ऐसा कहकर निषधराज नलने ऋतुपर्णको अश्वविद्या प्रदान की ॥ १७ ॥
स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा । गृहीत्वा चाश्वहृदयं राजन् भाङ्गासुरिर्नृपः ॥ १८ ॥
निषधाधिपतेश्चापि दत्त्वाक्षहृदयं नृपः ।
सूतमन्यमुपादाय ययौ स्वपुरमेव ह ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर! ऋतुपर्णने भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उनसे अश्वविद्या ग्रहण की। अश्वोंका रहस्य ग्रहण करके और निषधनरेश नलको पुनः द्यूतविद्याका रहस्य समझाकर दूसरा सारथि साथ ले राजा ऋतुपर्ण अपने नगरको चले गये ॥ १८-१९ ॥
ऋतुपर्णे गते राजन् नलो राजा विशाम्पते ।
नगरे कुण्डिने कालं नातिदीर्घमिवावसत् ॥ २० ॥
राजन्! ऋतुपर्णके चले जानेपर राजा नल कुण्डिनपुरमें कुछ समयतक रहे। वह काल उन्हें थोड़े समयके समान ही प्रतीत हुआ ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णस्वदेशगमने सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋतुपर्णका स्वदेशगमनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 547)
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
राजा नलका पुष्करको जूएमें हराना और उसको राजधानीमें भेजकर अपने नगरमें प्रवेश करना
बृहदश्व उवाच
स मासमुष्य कौन्तेय भीममामन्त्र्य नैषधः ।
पुरादल्पपरीवारो जगाम निषधान् प्रति ॥ १ ॥
**बृहदश्व मुनि कहते हैं—**युधिष्ठिर! निषध-नरेश एक मासतक कुण्डिनपुरमें रहकर राजा भीमकी आज्ञा ले थोड़े-से सेवकोंसहित वहाँसे निषधदेशकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
रथेनैकेन शुभ्रेण दन्तिभिः परिशोडशैः ।
पञ्चाशद्भिर्हयैश्चैव षट्शतैश्च पदातिभिः ॥ २ ॥
उनके साथ चारों ओरसे सोलह हाथियोंद्वारा घिरा हुआ एक सुन्दर रथ, पचास घोड़े और छः सौ पैदल सैनिक थे ॥ २ ॥
स कम्पयन्निव महीं त्वरमाणो महीपतिः ।
प्रविवेशाथ संरब्धस्तरसैव महामनाः ॥ ३ ॥
महामना राजा नलने इन सबके द्वारा पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए बड़ी उतावलीके साथ रोषावेशमें भरे वेगपूर्वक निषधदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥
ततः पुष्करमासाद्य वीरसेनसुतो नलः ।
उवाच दीव्याव पुनर्बहुवित्तं मयार्जितम् ॥ ४ ॥
दमयन्ती च यच्चान्यन्मम किंचन विद्यते ।
एष वै मम संन्यासस्तव राज्यं तु पुष्कर ॥ ५ ॥
पुनः प्रवर्त्ततां द्यूतमिति मे निश्चिता मतिः ।
एकपाणेन भद्रं ते प्राणयोश्च पणावहे ॥ ६ ॥
तदनन्तर वीरसेनपुत्र नलने पुष्करके पास जाकर कहा—'अब हम दोनों फिरसे जूआ खेलें। मैंने बहुत धन प्राप्त किया है। दमयन्ती तथा अन्य जो कुछ भी मेरे पास है, यह सब मेरी ओरसे दाँवपर लगाया जायगा और पुष्कर! तुम्हारी ओरसे सारा राज्य ही दाँवपर रखा जायगा। इस एक पणके साथ हम दोनोंमें फिर जूएका खेल प्रारम्भ हो, यह मेरा निश्चित विचार है। तुम्हारा भला हो, यदि ऐसा न कर सको तो हम दोनों अपने प्राणोंकी बाजी लगावें ॥ ४—६ ॥
जित्वा परस्वमाहृत्य राज्यं वा यदि वा वसु ।
प्रतिपाणः प्रदातव्यः परमो धर्म उच्यते ॥ ७ ॥
'जूएके दाँवमें दूसरेका राज्य या धन जीतकर रख लिया जाय तो उसे यदि वह पुनः खेलना चाहे तो प्रतिपण (बदलेका दाव) देना चाहिये, यह परम धर्म कहा गया है ॥ ७ ॥ न चेद् वाञ्छसि त्वं द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्त्तताम् । द्वैरथेनास्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ॥ ८ ॥ 'यदि तुम पासोंसे जूआ खेलना न चाहो तो बाणोंद्वारा युद्धका जूआ प्रारम्भ होना चाहिये। राजन्! द्वैरथयुद्धके द्वारा तुम्हारी अथवा मेरी शान्ति हो जाय ॥ ८ ॥ वंशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथा तथा । येन केनाप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥ ९ ॥ 'यह राज्य हमारी वंशपरम्पराके उपभोगमें आनेवाला है। जिस-किसी उपायसे भी जैसे-तैसे इसका उद्धार करना चाहिये; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥ ९ ॥ द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर । कैतवेनाक्षवत्यां तु युद्धे वा ना ताम्यतां धनुः ॥ १० ॥ 'पुष्कर! आज तुम दोमेंसे एकमें मन लगाओ। छलपूर्वक जूआ खेलो अथवा युद्धके लिये धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ' ॥ १० ॥ नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव । ध्रुवमात्मजयं मत्वा प्रत्याह पृथिवीपतिम् ॥ ११ ॥ निषधराज नलके ऐसा कहनेपर पुष्करने अपनी विजयको अवश्यम्भावी मानकर हँसते हुए उनसे कहा— ॥ ११ ॥ दिष्ट्या त्वयार्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध । दिष्ट्या च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्याः क्षयं गतम् ॥ १२ ॥ 'नैषध! सौभाग्यकी बात है कि तुमने दाँवपर लगानेके लिये धनका उपार्जन कर लिया है। यह भी आनन्दकी बात है कि दमयन्तीके दुष्कर्मोंका क्षय हो गया ॥ १२ ॥ दिष्ट्या च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज । धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता ॥ १३ ॥ मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः । नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध ॥ १४ ॥ 'महाबाहु नरेश! सौभाग्यसे तुम पत्नीसहित अभी जीवित हो। इसी धनको जीत लेनेपर दमयन्ती शृंगार करके निश्चय ही मेरी सेवामें उपस्थित होगी, ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गलोककी अप्सरा देवराज इन्द्रकी सेवामें जाती है। नैषध! मैं प्रतिदिन तुम्हारी याद करता हूँ और तुम्हारी राह भी देखा करता हूँ ॥ १३-१४ ॥ देवनेन मम प्रीतिर्न भवत्यसुहृद्रणैः । जित्वा त्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम् ॥ १५ ॥ कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि ।
‘शत्रुओंके साथ जूआ खेलनेसे मुझे कभी तृप्ति ही नहीं होती। आज श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी दमयन्तीको जीतकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा; क्योंकि वह सदा मेरे हृदयमन्दिरमें निवास करती है’ ।। १५½ ।।
श्रुत्वा तु तस्य वा वाचो बह्वबद्धप्रलापिनः ॥ १६ ॥
इयेष स शिरश्छेत्तुं खड्गेन कुपितो नलः ।
स्मयंस्तु रोषताम्राक्षस्तमुवाच नलो नृपः ॥ १७ ॥
इस प्रकार बहुत-से असम्बद्ध प्रलाप करनेवाले पुष्करकी ये बातें सुनकर राजा नलको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने तलवारसे उसका सिर काट लेनेकी इच्छा की। रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयीं तो भी राजा नलने हँसते हुए उससे कहा— ॥ १६-१७ ॥
पणावः किं व्याहरसे जितो न व्याहरिष्यसि ।
ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च ॥ १८ ॥
एकपाणेन वीरेण नलेन स पराजितः ।
स रत्नकोशनिच्यैः प्राणेन पणितोऽपि च ॥ १९ ॥
‘अब हम दोनों जूआ प्रारम्भ करें, तुम अभी व्यर्थ बकवाद क्यों करते हो? हार जानेपर ऐसी बातें न कर सकोगे।’ तदनन्तर पुष्कर तथा राजा नलमें एक ही दाँव लगानेकी शर्त रखकर जूएका खेल प्रारम्भ हुआ। तब वीर नलने पुष्करको हरा दिया। पुष्करने रत्न, खजाना तथा प्राणोंतककी बाजी लगा दी थी ॥ १८-१९ ॥
जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
मम सर्वमिदं राज्यमव्यग्रं हतकण्टकम् ॥ २० ॥
वैदर्भी न त्वया शक्या राजापसद वीक्षितुम् ।
तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ॥ २१ ॥
पुष्करको परास्त करके राजा नलने हँसते हुए उससे कहा—‘नृपाधम! अब यह शान्त और अकण्टक सारा राज्य मेरे अधिकारमें आ गया। विदर्भकुमारी दमयन्तीकी ओर तू आँख उठाकर देख भी नहीं सकता। मूर्ख! आजसे तू परिवारसहित दमयन्तीका दास हो गया ॥ २०-२१ ॥
न त्वया तत् कृतं कर्म येनाहं विजितः पुरा ।
कलिना तत् कृतं कर्म त्वं च मूढ न बुध्यसे ॥ २२ ॥
‘पहले तेरे द्वारा जो मैं पराजित हो गया था, उसमें तेरा कोई पुरुषार्थ नहीं था। मूढ़! वह सब कलियुगकी करतूत थी, जिसे तू नहीं जानता है ॥ २२ ॥
नाहं परकृतं दोषं त्वय्याधास्ये कथंचन ।
यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवसृजामि ते ॥ २३ ॥
‘दूसरे (कलियुग)-के किये हुए अपराधको मैं किसी तरह तेरे मत्थे नहीं मढूँगा। तू सुखपूर्वक जीवित रह। मैं तेरे प्राण तुझे वापस देता हूँ ॥ २३ ॥
तथैव सर्वसम्भारं स्वमंशं वितरामि ते । तथैव च मम प्रीतिस्त्वयि वीर न संशयः ॥ २४ ॥ ‘तेरा सारा सामान और तेरे हिस्सेका धन भी तुझे लौटाये देता हूँ। वीर! तेरे ऊपर मेरा पूर्ववत् प्रेम बना रहेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥ सौहार्दं चापि मे त्वत्तो न कदाचित् प्रहास्यति । पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरदः शतम् ॥ २५ ॥ ‘तेरे प्रति जो मेरा सौहार्द रहा है, वह कभी मेरे हृदयसे दूर नहीं होगा। पुष्कर! तू मेरा भाई है, जा, सौ वर्षोंतक जीवित रह’ ॥ २५ ॥ एवं नलः सान्त्वयित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः । स्वपुरं प्रेषयामास परिष्वज्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥ इस प्रकार सत्यपराक्रमी राजा नलने अपने भाई पुष्करको सान्त्वना दे बार-बार हृदयसे लगाकर उसकी राजधानीको भेज दिया ॥ २६ ॥ सान्त्वितो नैषधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम् । पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ २७ ॥ कीर्तिरस्तु तवाक्षय्या जीव वर्षशतं सुखी । यो मे वितरसि प्राणानधिष्ठानं च पार्थिव ॥ २८ ॥ राजन्! निषधराजके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर पुष्करने पुण्यश्लोक नलको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—‘पृथ्वीनाथ! आप जो मुझे प्राण और निवासस्थान भी वापस दे रहे हैं, इससे आपकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। आप सौ वर्षोंतक जीयें और सुखी रहें’ ॥ २७-२८ ॥
स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृप । प्रययौ पुष्करो हृष्टःस्वपुरं स्वजनावृतः ॥ २९ ॥ महत्या सेनया सार्धं विनीतैः परिचारकैः । भ्राजमान इवादित्यो वपुषा पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! राजा नलके द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर पुष्कर एक मासतक वहाँ टिका रहा और फिर आत्मीय जनोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानीको चला गया। उसके साथ विशाल सेना और विनयशील सेवक भी थे। वह शरीरसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था ॥ २९-३० ॥
प्रस्थाप्य पुष्करं राजा वित्तवन्तमनामयम् । प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभिताम् ॥ ३१ ॥ पुष्करको धन—वित्तके साथ सकुशल घर भेजकर श्रीमान् राजा नलने अपने अत्यन्त शोभासम्पन्न नगरमें प्रवेश किया ॥ ३१ ॥
प्रविश्य सान्त्वयामास पौरांश्च निषधाधिपः । पौरा जानपदाश्चापि सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ॥ ३२ ॥
प्रवेश करके निषधनरेशने पुरवासियोंको सान्त्वना दी। नगर और जनपदके लोग बड़े प्रसन्न हुए। उनके शरीरमें रोमांच हो आया ॥ ३२ ॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सामात्यप्रमुखा जनाः ।
अद्य स्म निर्वृता राजन् पुरे जनपदेऽपि च ।
उपासितुं पुनः प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम् ॥ ३३ ॥
मन्त्री आदि सब लोगोंने हाथ जोड़कर कहा—'महाराज! आज हम नगर और जनपदके निवासी संतोषसे साँस ले सके हैं। जैसे देवता देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार अब हमें पुनः आपकी उपासना करने—आपके पास बैठनेका शुभ अवसर प्राप्त हुआ है' ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि पुष्करपराभवपूर्वकं राज्यप्रत्यानयने अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें पुष्करको हराकर राजा नलके अपने नगरमें आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 553)
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना
बृहदश्व उवाच
प्रशान्ते तु पुरे हृष्टे सम्प्रवृत्ते महोत्सवे ।
महत्या सेनया राजा दमयन्तीमुपानयत् ॥ १ ॥
**बृहदश्व मुनि कहते हैं—**युधिष्ठिर! जब नगरमें शान्ति छा गयी और सब लोग प्रसन्न हो गये, सर्वत्र महान् उत्सव होने लगा, उस समय राजा नल विशाल सेनाके साथ जाकर दमयन्तीको विदर्भदेशसे बुला लाये ॥ १ ॥
दमयन्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीरहा ।
प्रास्थापयदमेयात्मा भीमो भीमपराक्रमः ॥ २ ॥
दमयन्तीके पिता भयंकर पराक्रमी भीम अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न थे, शत्रुपक्षके वीरोंका हनन करनेमें समर्थ थे। उन्होंने अपनी पुत्री दमयन्तीको बड़े सत्कारके साथ विदा किया ॥ २ ॥
आगतायां तु वैदर्भ्यां सपुत्रायां नलो नृपः ।
वर्तयामास मुदितो देवराडिव नन्दने ॥ ३ ॥
तथा प्रकाशतां यातो जम्बुद्वीपे स राजसु ।
पुनः शशास तद् राज्यं प्रत्याहृत्य महायशाः ॥ ४ ॥
पुत्र और पुत्रीसहित दमयन्तीके आ जानेपर राजा नल सब बर्ताव-व्यवहार बड़े आनन्दसे सम्पन्न करने लगे। जैसे नन्दनवनमें देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंमें प्रकाशमान हो रहे थे। वे महायशस्वी नरेश अपने राज्यको पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे ॥ ३-४ ॥
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवच्चाप्तदक्षिणैः ।
तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद् यक्ष्यसेऽचिरात् ॥ ५ ॥
उन्होंने पर्याप्त दक्षिणासे युक्त विविध प्रकारके यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान्का यजन किया। राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी पुनः अपना राज्य पाकर सुहृदोंसहित शीघ्र ही यज्ञका अनुष्ठान करोगे ॥ ५ ॥
दुःखमेतादृशं प्राप्तो नलः परपुरंजयः ।
देवनेन नरश्रेष्ठ सभार्यो भरतर्षभ ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! पुरुषोत्तम! शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज नल जूआ खेलनेके कारण अपनी पत्नीसहित इस प्रकारके महान् संकटमें पड़ गये थे ॥ ६ ॥ एकाकिनैव सुमहान्नलेन पृथिवीपते । दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाभ्युदयः पुनः ॥ ७ ॥ पृथिवीपते! राजा नलने अकेले ही यह भयंकर और महान् दुःख प्राप्त किया था; उन्हें पुनः अभ्युदयकी प्राप्ति हुई ॥ ७ ॥ त्वं पुनर्भातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव । रमसेऽस्मिन् महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥ पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रौपदीके साथ इस महान् वनमें भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्मके ही चिन्तनमें लगे रहते हो ॥ ८ ॥ ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः । नित्यमन्वास्यसे राजंस्तत्र का परिदेवना ॥ ९ ॥ राजन्! महान् भाग्यशाली वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण सदा तुम्हारे साथ रहते हैं; फिर तुम्हारे लिये इस परिस्थितिमें शोककी क्या बात है? ॥ ९ ॥ कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च । ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् ॥ १० ॥ कर्कोटक नाग, दमयन्ती, नल तथा राजर्षि ऋतुपर्णकी चर्चा कलियुगके दोषका नाश करनेवाली है ॥ १० ॥ इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमच्युत । शक्यमाश्वसितुं श्रुत्वा त्वद्विधेन विशाम्पते ॥ ११ ॥ महाराज! तुम्हारे-जैसे लोगोंको यह कलिनाशक इतिहास सुनकर आश्वासन प्राप्त हो सकता है ॥ ११ ॥ अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा । तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥ १२ ॥ पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं। यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥ श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्वसिहि मा शुचः । व्यसने त्वं महाराज न विषीदितुमर्हसि ॥ १३ ॥ नरेश! इस इतिहासको सुनकर तुम धैर्य धारण करो, शोक न करो, महाराज! तुम्हें संकटमें पड़नेपर विषादग्रस्त नहीं होना चाहिये ॥ १३ ॥ विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते । विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥ १४ ॥
जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ॥ १४ ॥
ये चेदं कथयिष्यन्ति नलस्य चरितं महत् ।
श्रोष्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नालक्ष्मीस्तान् भजिष्यति ॥ १५ ॥
अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति ।
जो राजा नलके इस महान् चरित्रका वर्णन करेंगे अथवा निरन्तर सुनेंगे, उन्हें दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी। उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और वे संसारमें धन्य हो जायँगे ॥ १५½ ॥
इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्वदुत्तमम् ॥ १६ ॥
पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चापि लभते नृषु चाग्र्यताम् ।
आरोग्यप्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशयः ॥ १७ ॥
इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है। साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥
भयात् त्रस्यसि यच्च त्वमाह्वयिष्यति मां पुनः ।
अक्षज्ञ इति तत् तेऽहं नाशयिष्यामि पार्थिव ॥ १८ ॥
राजन्! तुम जो इस भयसे डर रहे हो कि कोई द्यूतविद्याका ज्ञाता मनुष्य पुनः मुझे जूएके लिये बुलायेगा (उस दशामें पुनः पराजयका कष्ट देखना पड़ेगा)। तुम्हारे उस भयको मैं दूर कर दूँगा ॥ १८ ॥
वेदाक्षहृदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम ।
उपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नोऽहं ब्रवीमि ते ॥ १९ ॥
सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन! मैं द्यूतविद्याके सम्पूर्ण हृदय (रहस्य)-को जानता हूँ, तुम उसे ग्रहण कर लो। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें बतलाता हूँ ॥ १९ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो हृष्टमना राजा बृहदश्वमुवाच ह ।
भगवन्नक्षहृदयं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने प्रसन्नचित्त हो बृहदश्वसे कहा—'भगवन्! मैं द्यूतविद्याके रहस्यको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ २० ॥
ततोऽक्षहृदयं प्रादात् पाण्डवाय महात्मने ।
दत्त्वा चाश्वशिरोऽगच्छदुपस्प्रष्टुं महातपाः ॥ २१ ॥
तब महातपस्वी मुनिने महात्मा पाण्डुनन्दनको द्यूतविद्याका रहस्य बताया और उन्हें अश्वविद्याका भी उपदेश देकर वे स्नान आदि करनेके लिये चले गये।।
बृहदश्वे गते पार्थमश्रौषीत् सव्यसाचिनम्।
वर्तमानं तपस्युग्रे वायुभक्षं मनीषिणम्॥ २२॥
ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यः सम्पतद्भ्यस्ततस्ततः।
तीर्थशैलवनेभ्यश्च समेतेभ्यो दृढव्रतः॥ २३॥
इति पार्थो महाबाहुर्दुरापं तप आस्थितः।
न तथा दृष्टपूर्वोऽन्यः कश्चिदुग्रतपा इति॥ २४॥
बृहदश्व मुनिके चले जानेपर दृढव्रती राजा युधिष्ठिरने इधर-उधरके तीर्थों, पर्वतों और वनोंसे आये हुए तपस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे सव्यसाची अर्जुनका यह समाचार सुना कि 'मनीषी अर्जुन वायुका आहार करके कठोर तपस्यामें लगे हैं। महाबाहु कुन्तीकुमार बड़ी दुष्कर तपस्यामें स्थित हैं। ऐसा कठोर तपस्वी आजसे पहले दूसरा कोई नहीं देखा गया है॥ २२—२४॥
यथा धनंजयः पार्थस्तपस्वी नियतव्रतः।
मुनिरेकचरः श्रीमान् धर्मो विग्रहवानिव॥ २५॥
'कुन्तीकुमार धनंजय जिस प्रकार नियम और व्रतका पालन करते हुए तपस्यामें संलग्न हैं, वह अद्भुत है। वे मौनभावसे रहते और अकेले ही विचरते हैं। श्रीमान् अर्जुन धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते हैं'॥
तं श्रुत्वा पाण्डवो राजंस्तप्यमानं महावने।
अन्वशोचत कौन्तेयः प्रियं वै भ्रातरं जयम्॥ २६॥
राजन्! उस महान् वनमें अपने प्रिय भाई अर्जुनको तपस्या करते सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर उनके लिये बार-बार शोक करने लगे॥ २६॥
दह्यमानेन तु हृदा शरणार्थी महावने।
ब्राह्मणान् विविधज्ञानान् पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः॥ २७॥
अर्जुनके वियोगमें संतप्त हृदयवाले वे युधिष्ठिर निर्भय आश्रयकी इच्छा रखते हुए उस महान् वनमें रहते थे और अनेक प्रकारके ज्ञानसे सम्पन्न ब्राह्मणोंसे अपना मनोगत अभिप्राय पूछा करते थे॥ २७॥
(प्रतिगृह्याक्षहृदयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
आसीद्धृष्टमना राजन् भीमसेनादिभिर्युतः॥
राजन्! द्यूतविद्याका रहस्य जानकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर भीमसेन आदिके साथ मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए।।
स्वभ्रातॄन् सहितान् पश्यन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
अपश्यन्नर्जुनं तत्र बभूवाश्रुपरिप्लुतः।