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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

उसका पुण्यमय कुल संसारसागरसे तर जाता है। वह अपने सब पापोंका नाश कर देता है और सहस्र गोदानका फल प्राप्त करके अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ७ ॥

शोणस्य ज्योतिरथ्यायाः संगमे नियतः शुचिः ।
तर्पयित्वा पितॄन् देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ८ ॥
शोण और ज्योतिरथ्याके संगममें स्नान करके जितेन्द्रिय एवं पवित्र पुरुष यदि देवताओं और पितरोंका तर्पण करे तो वह अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ ८ ॥

शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभवे कुरुनन्दन ।
वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ९ ॥
कुरुनन्दन! शोण और नर्मदाके उत्पत्तिस्थान वंशगुल्मतीर्थमें स्नान करके तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ९ ॥

ऋषभं तीर्थमासाद्य कोसलायां नराधिप ।
वाजपेयमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १० ॥
गोसहस्रफलं विन्द्यात् कुलं चैव समुद्धरेत् ।
नरेश्वर! कोसला (अयोध्या)-में ऋषभतीर्थमें जाकर स्नानपूर्वक तीन रात उपवास करनेवाला मानव वाजपेययज्ञका फल पाता है। इतना ही नहीं, वह सहस्र गोदानका फल पाता और अपने कुलका भी उद्धार कर देता है ॥ १० १/२ ॥

कोसलां तु समासाद्य कालतीर्थमुपस्पृशेत् ॥ ११ ॥
वृषभैकादशफलं लभते नात्र संशयः ।
पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १२ ॥
गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नृप ।
कोसला नगरी (अयोध्या)-में जाकर कालतीर्थमें स्नान करे। ऐसा करनेसे ग्यारह वृषभ-दानका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है। पुष्पवतीमें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ११-१२ १/२ ॥

ततो बदरिकातीर्थं स्नात्वा भरतसत्तम ॥ १३ ॥
दीर्घमायुरवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।
भरतकुलभूषण! तदनन्तर बदरिकातीर्थमें स्नान करके मनुष्य दीर्घायु पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥

अथ चम्पां समासाद्य भागीरथ्यां कृतोदकः ॥ १४ ॥
दण्डाख्यमभिगम्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ।
तत्पश्चात् चम्पामें जाकर भागीरथीमें तर्पण करे और दण्ड नामक तीर्थमें जाकर सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १४ १/२ ॥

लपेटिकां ततो गच्छेत् पुण्यां पुण्योपशोभिताम् ॥ १५ ॥

वाजपेयमवाप्नोति देवैः सर्वैश्च पूज्यते ।
तदनन्तर पुण्यशोभिता पुण्यमयी लपेटिकामें जाकर स्नान करे। ऐसा करनेसे तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होता है ।। १५ १/२ ।।
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् ।। १६ ।।
रामतीर्थे नरः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ।
इसके बाद परशुरामसेवित महेन्द्रपर्वतपर जाकर वहाँके रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।। १६ १/२ ।।
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन ।। १७ ।।
तत्र स्नात्वा कुरुश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ।
कुरुश्रेष्ठ कुरुनन्दन! वहीं मतंगका केदार है, उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। १७ १/२ ।।
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत् ।। १८ ।।
अश्वमेधमवाप्नोति पूजयित्वा वृषध्वजम् ।
श्रीपर्वतपर जाकर वहाँकी नदीके तटपर स्नान करे। वहाँ भगवान् शंकरकी पूजा करके मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ।। १८ १/२ ।।
श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः ।। १९ ।।
न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह ।
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ।। २० ।।
अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ।
ऋषभं पर्वतं गत्वा पाण्ड्ये देवतपूजितम् ।
वाजपेयमवाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ।। २१ ।।
श्रीपर्वतपर देवी पार्वतीके साथ महातेजस्वी महादेवजी बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं। देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी वहाँ रहते हैं। वहाँ देवकुण्डमें स्नान करके पवित्र हो जितात्मा पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम सिद्धि लाभ करता है। पाण्ड्यदेशमें देवपूजित ऋषभ पर्वतपर जाकर तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें आनन्दित होता है ।। १९—२१ ।।
ततो गच्छेत कावेरीं वृतामप्सरसां गणैः ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ।। २२ ।।
राजन्! तदनन्तर अप्सराओंसे आवृत कावेरी नदीकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ।। २२ ।।
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् ।
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। २३ ।।

राजेन्द्र! तत्पश्चात् समुद्रके तटपर विद्यमान कन्यातीर्थ (कन्याकुमारी)-में जाकर स्नान करे। उस तीर्थमें स्नान करते ही मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २३ ॥

अथ गोकर्णमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
समुद्रमध्ये राजेन्द्र सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ २४ ॥
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
भूतयक्षपिशाचाश्च किंनराः समहोरगाः ॥ २५ ॥
सिद्धचारणगन्धर्वमानुषाः पन्नगास्तथा ।
सरितः सागराः शैला उपासन्त उमापतिम् ॥ २६ ॥
महाराज! इसके बाद समुद्रके मध्यमें विद्यमान त्रिभुवनविख्यात अखिल लोकवन्दित गोकर्णतीर्थमें जाकर स्नान करे। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन महर्षि, भूत, यक्ष, पिशाच, किन्नर, महानाग, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, नदी, समुद्र और पर्वत—ये सभी उमावल्लभ भगवान् शंकरकी उपासना करते हैं ॥ २४—२६ ॥

तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ॥ २७ ॥
वहाँ भगवान् शिवकी पूजा करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥

उष्य द्वादशरात्रं तु पूतात्मा च भवेन्नरः ।
तत एव च गायत्र्याः स्थानं त्रैलोक्यपूजितम् ॥ २८ ॥
वहाँ बारह रात निवास करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण पवित्र हो जाता है। वहीं गायत्रीका त्रिलोक-पूजित स्थान है ॥ २८ ॥

त्रिरात्रमुषितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।
निदर्शनं च प्रत्यक्षं ब्राह्मणानां नराधिप ॥ २९ ॥
वहाँ तीन रात निवास करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका फल प्राप्त करता है। नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पहचानके लिये वहाँ प्रत्यक्ष उदाहरण है ॥ २९ ॥

गायत्रीं पठते यस्तु योनिसंकरजस्तथा ।
गाथा च गाथिका चापि तस्य सम्पद्यते नृप ॥ ३० ॥
राजन्! जो वर्णसंकर योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह यदि गायत्रीमन्त्रका पाठ करता है तो उसके मुखसे वह गाथा या गीतकी तरह स्वर और वर्णोंके नियमसे रहित होकर निकलती है; अर्थात् वह गायत्रीका उच्चारण ठीक नहीं कर सकता ॥ ३० ॥

अब्राह्मणस्य सावित्रीं पठतस्तु प्रणश्यति ।
जो सर्वथा ब्राह्मण नहीं है, ऐसा मनुष्य यदि वहाँ गायत्रीमन्त्रका पाठ करे तो वहाँ वह मन्त्र लुप्त हो जाता है; अर्थात् उसे भूल जाता है ॥ ३० १/२ ॥

संवर्तस्य तु विप्रर्षेर्वापीमासाद्य दुर्लभाम् ॥ ३१ ॥

रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजापते । राजन्! वहाँ ब्रह्मर्षि संवर्तकी दुर्लभ बावली है। उसमें स्नान करके मनुष्य सुन्दररूपका भागी और सौभाग्यशाली होता है ।। ३१ १/२ ।। ततो वेणां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।। ३२ ।। मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः । तदनन्तर वेणा नदीके तटपर जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य (मृत्युके पश्चात्) मोर और हंसोंसे जुता हुआ विमानको प्राप्त करता है ।। ३२ १/२ ।। ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् ।। ३३ ।। गवां मेधमवाप्नोति वासुकेर्लोकमुत्तमम् । वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।। ३४ ।। तत्पश्चात् सदा सिद्ध पुरुषोंसे सेवित गोदावरीके तटपर जाकर स्नान करनेसे तीर्थयात्री गोमेधयज्ञका फल पाता और वासुकिके लोकमें जाता है। वेणासंगममें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है ।। वरदासंगमे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । ब्रह्मस्थानं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।। ३५ ।। गोसहस्रफलं विन्द्यात् स्वर्गलोकं च गच्छति । वरदासंगमतीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। ब्रह्मस्थानमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ३५ १/२ ।। कुशप्लवनमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।। ३६ ।। त्रिरात्रमुषितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् । कुशप्लवनतीर्थमें जाकर स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात निवास करनेवाला पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ।। ३६ १/२ ।। ततो देवह्रदेऽरण्ये कृष्णवेणाजलोद्भवे ।। ३७ ।। जातिस्मरह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः । तदनन्तर कृष्णवेणाके जलसे उत्पन्न हुए रमणीय देवकुण्डमें, जिसे जातिस्मर ह्रद कहते हैं, स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्तिवाला) होता है ।। ३७ १/२ ।। यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः ।। ३८ ।। अग्निष्टोमफलं विन्द्याद् गमनादेव भारत । सर्वदेवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।। ३९ ।।

वहीं सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवराज इन्द्र स्वर्गके सिंहासनपर आसीन हुए थे। भरतनन्दन! वहाँ जानेमात्रसे यात्री अग्निष्टोमयज्ञका फल पा लेता है। तत्पश्चात् सर्वदेवह्रदमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ३८-३९ ॥

ततो वापीं महापुण्यां पयोष्णीं सरितां वराम्।
पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४० ॥
तदनन्तर परम पुण्यमयी वापी और सरिताओंमें श्रेष्ठ पयोष्णीमें जाकर स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहे, ऐसा करनेसे तीर्थसेवीको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ४० ॥

दण्डकारण्यमासाद्य पुण्यं राजन्युपस्पृशेत् ।
गोसहस्रफलं तस्य स्नातमात्रस्य भारत ॥ ४१ ॥
राजन्! भरतनन्दन! जो दण्डकारण्यमें जाकर स्नान करता है, उसे स्नान करनेमात्रसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥

शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः ।
न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः ॥ ४२ ॥
शरभंग मुनि तथा महात्मा शुकके आश्रमपर जानेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ४२ ॥

ततः शूर्पार कं गच्छेज्जामदग्न्यनिषेवितम् ।
रामतीर्थे नरः स्नात्वा विन्द्याद् बहुसुवर्णकम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर परशुरामसेवित शूर्पार कतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥

सप्तगोदावरे स्नात्वा नियतो नियताशनः ।
महत् पुण्यमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥ ४४ ॥
सप्तगोदावरतीर्थमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करनेवाला पुरुष महान् पुण्यलाभ करता और देवलोकमें जाता है ॥ ४४ ॥

ततो देवपथं गत्वा नियतो नियताशनः ।
देवसत्रस्य यत् पुण्यं तदेवाप्नोति मानवः ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् नियमपालनके साथ-साथ नियमित आहार ग्रहण करनेवाला मानव देवपथमें जाकर देवसत्रका जो पुण्य है, उसे पा लेता है ॥ ४५ ॥

तुङ्गकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
वेदानध्यापयत् तत्र ऋषिः सारस्वतः पुरा ॥ ४६ ॥
तुंगकारण्यमें जाकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियोंको अपने वशमें रखे। प्राचीनकालमें वहाँ सारस्वत ऋषिने अन्य ऋषियोंको वेदोंका अध्ययन कराया था ॥ ४६ ॥

तत्र वेदेषु नष्टेषु मुनेरङ्गिरसः सुतः ।

ऋषीणामुत्तरीयेषु सूपविष्टो यथासुखम् ॥ ४७ ॥ एक समय उन ऋषियोंको सारा वेद भूल गया। इस प्रकार वेदोंके नष्ट होने (भूल जाने)-पर अंगिरा मुनिका पुत्र ऋषियोंके उत्तरीय वस्त्रों (चादरों)-में छिपकर सुखपूर्वक बैठ गया (और विधिपूर्वक ॐकारका उच्चारण करने लगा) ॥ ४७ ॥ ओङ्कारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह । येन यत् पूर्वमभ्यस्तं तत् सर्वं समुपस्थितम् ॥ ४८ ॥ नियमके अनुसार ॐकारका ठीक-ठीक उच्चारण होनेपर, जिसने पूर्वकालमें जिस वेदका अध्ययन एवं अभ्यास किया था, उसे वह सब स्मरण हो आया ॥ ४८ ॥ ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः । हर्निरायणस्तत्र महादेवस्तथैव च ॥ ४९ ॥ उस समय वहाँ बहुत-से ऋषि, देवता, वरुण, अग्नि, प्रजापति, भगवान् नारायण और महादेवजी भी उपस्थित हुए ॥ ४९ ॥ पितामहश्च भगवान् देवैः सह महाद्युतिः । भृगुं नियोजयामास याजनार्थं महाद्युतिम् ॥ ५० ॥ महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने देवताओंके साथ जाकर परम कान्तिमान् भृगुको यज्ञ करानेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५० ॥ ततः स चक्रे भगवानृषीणां विधिवत् तदा । सर्वेषां पुनराधानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ५१ ॥ आज्यभागेन तत्राग्निं तर्पयित्वा यथाविधि । देवाः स्वभवनं याता ऋषयश्च यथाक्रमम् ॥ ५२ ॥ तदनन्तर भगवान् भृगुने वहाँ सब ऋषियोंके यहाँ शास्त्रीय विधिके अनुसार पुनः भलीभाँति अग्निस्थापन कराया। उस समय आज्यभागके द्वारा विधिपूर्वक अग्निको तृप्त करके सब देवता और ऋषि क्रमशः अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ५१-५२ ॥ तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम । पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ॥ ५३ ॥ नृपश्रेष्ठ! उस तुंगकारण्यमें प्रवेश करते ही स्त्री या पुरुष सबके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ५३ ॥ तत्र मासं वसेद् धीरो नियतो नियताशनः । ब्रह्मलोकं व्रजेद् राजन् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५४ ॥ धीर पुरुषको चाहिये कि वह नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए एक मासतक वहाँ रहे। राजन् ऐसा करनेवाला तीर्थयात्री ब्रह्मलोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५४ ॥ मेधाविकं समासाद्य पितॄन् देवांश्च तर्पयेत् ।

अग्निष्टोममवाप्नोति स्मृतिं मेधां च विन्दति ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् मेधाविकीतीर्थमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करे; ऐसा करनेवाला पुरुष अग्निष्टोमयागका फल पाता और स्मृति एवं बुद्धिको प्राप्त कर लेता है ॥

अत्र कालञ्जरं नाम पर्वतं लोकविश्रुतम् । तत्र देवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५६ ॥ इस तीर्थमें कालंजर नामक लोकविख्यात पर्वत है, वहाँ देवह्रद नामक तीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५६ ॥

योः स्नातः साधयेत् तत्र गिरौ कालञ्जरे नृप । स्वर्गलोके महीयेत नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ५७ ॥ राजन्! जो कालंजर पर्वतपर स्नान करके वहाँ साधन करता है, वह मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ५७ ॥

ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूट विशाम्पते । मन्दाकिनीं समासाद्य सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ५८ ॥ तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः । अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् ॥ ५९ ॥ राजन्! तदनन्तर पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटमें सब पापोंका नाश करनेवाली मन्दाकिनीके तटपर पहुँचकर उसमें स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें लग जाय। इससे वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ५८-५९ ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञ भर्तृस्थानमनुत्तमम् । यत्र नित्यं महासेनो गुहः संनिहितो नृप ॥ ६० ॥ तत्र गत्वा नृपश्रेष्ठ गमनादेव सिध्यति । धर्मज्ञ नरेश! तत्पश्चात् तीर्थयात्री परम उत्तम भर्तृस्थानकी यात्रा करे, जहाँ महासेन कार्तिकेयजी निवास करते हैं। नृपश्रेष्ठ! वहाँ जानेमात्रसे सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६०१/२ ॥

कोटितीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ६१ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य ज्येष्ठस्थानं व्रजेन्नरः । अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी ॥ ६२ ॥ कोटितीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है। उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री मानव ज्येष्ठस्थानको जाय। वहाँ महादेवजीका दर्शन-पूजन करनेसे वह चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥

तत्र कूपे महाराज विश्रुता भरतर्षभ । समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्ठिर ॥ ६३ ॥ भरतकुलभूषण महाराज युधिष्ठिर! वहाँ एक कूप है जिसमें चारों समुद्र निवास करते हैं ॥ ६३ ॥

तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र पितृदेवार्चने रतः । नियतात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥ राजेन्द्र! उसमें स्नान करके देवताओं और पितरोंके पूजनमें तत्पर रहनेवाला जितात्मा पुरुष पवित्र हो परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ६४ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र शृङ्गवेरपुरं महत् । यत्र तीर्णो महाराज रामो दाशरथिः पुरा ॥ ६५ ॥ राजेन्द्र! वहाँसे महान् शृङ्गवेरपुरकी यात्रा करे। महाराज! पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने वहीं गङ्गा पार की थी ॥ ६५ ॥ तस्मिंस्तीर्थे महाबाहो स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते । गङ्गायां तु नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥ विधूतपाप्मा भवति वाजपेयं च विन्दति । महाबाहो! उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्र हो गङ्गाजीमें स्नान करके मनुष्य पापरहित होता तथा वाजपेययज्ञका फल पाता है ॥ ६६ ½ ॥ ततो मुञ्जवटं गच्छेत् स्थानं देवस्य धीमतः ॥ ६७ ॥ अभिगम्य महादेवमभिवाद्य च भारत । प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ६८ ॥ तस्मिंस्तीर्थे तु जाह्नव्यां स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते । तदनन्तर तीर्थयात्री परम बुद्धिमान् महादेवजीके मुंजवट नामक तीर्थको जाय। भरतनन्दन उस तीर्थमें महादेवजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके परिक्रमा करनेसे मनुष्य गणपतिपद प्राप्त कर लेता है। उक्त तीर्थमें जाकर गंगामें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६७-६८ ½ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागमृषिसंस्तुतम् ॥ ६९ ॥ तत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः । लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसम्मताः ॥ ७० ॥ सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः । अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ७१ ॥ तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्चक्रचरास्तथा । सरितः सागराश्चैव गन्धर्वाप्सरसोऽपि च ॥ ७२ ॥ हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः । तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि येषां मध्येन जाह्नवी ॥ ७३ ॥ वेगेन समतिक्रान्ता सर्वतीर्थपुरस्कृता । तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ७४ ॥

यमुना गङ्गया सार्धं संगता लोकपावनी । गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् ॥ ७५ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् महर्षियोंद्वारा प्रशंसित प्रयागतीर्थमें जाय। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिशा, दिक्पाल, लोकपाल, साध्य, लोकसम्मानित पितर, सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि निर्मल ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण, सिद्ध, सूर्य, नदी, समुद्र, गन्धर्व, अप्सरा तथा ब्रह्माजीसहित भगवान् विष्णु निवास करते हैं। वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं जिनके बीचसे सब तीर्थोंसे सम्पन्न गंगा वेगपूर्वक बहती हैं। त्रिभुवनविख्यात सूर्यपुत्री लोकपावनी यमुनादेवी वहाँ गंगाजीके साथ मिली हैं। गंगा और यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका जघन माना गया है ॥ ६९—७५ ॥ प्रयागं जघनस्थानमुपस्थमृषयो विदुः । प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरौ तथा ॥ ७६ ॥ तीर्थं भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापतेः । तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर ॥ ७७ ॥ प्रजापतिमुपासन्ते ऋषयश्च तपोधनाः । यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रधरा नृपाः ॥ ७८ ॥ ततः पुण्यतमं नाम त्रिषु लोकेषु भारत । प्रयागं सर्वतीर्थेभ्यः प्रवदन्त्यधिकं विभो ॥ ७९ ॥ गमनात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि । मृत्युकालभयाच्चापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८० ॥ ऋषियोंने प्रयागको जघनस्थानीय उपस्थ बताया है। प्रतिष्ठानपुर (झूसी)-सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवतीतीर्थ यह ब्रह्माजीकी वेदी है। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें वेद और यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं और प्रजापतिकी उपासना करते हैं। तपोधन ऋषि, देवता तथा चक्रधर नृपतिगण वहाँ यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन करते हैं। भरतनन्दन! इसीलिये तीनों लोकोंमें प्रयागको सब तीर्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ एवं पुण्यतम बताते हैं। उस तीर्थमें जानेसे अथवा उसका नाम लेनेमात्रसे भी मनुष्य मृत्युकालके भय और पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ७६—८० ॥ तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते । पुण्यं स फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ८१ ॥ वहाँके विश्वविख्यात संगममें जो स्नान करता है वह राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त कर लेता है ॥ ८१ ॥ एषा यजनभूमिर्हि देवानाभिसंस्कृता । तत्र दत्तं सूक्ष्ममपि महद् भवति भारत ॥ ८२ ॥

भरतनन्दन! यह देवताओंकी संस्कार की हुई यज्ञभूमि है। यहाँ दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान महान् होता है ।। ८२ ।।
न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि ।
मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमरणं प्रति ।। ८३ ।।
तात! तुम्हें किसी वैदिक वचनसे या लौकिक वचनसे भी प्रयागमें मरनेका विचार नहीं त्यागना चाहिये ।। ८३ ।।
दश तीर्थसहस्राणि षष्टिः कोट्यस्तथापराः ।
येषां सांनिध्यमत्रैव कीर्तितं करुनन्दन ।। ८४ ।।
चतुर्विद्ये च यत् पुण्यं सत्यवादिषु चैव यत् ।
स्नात एव तदाप्नोति गङ्गायमुनसंगमे ।। ८५ ।।
कुरुनन्दन! साठ करोड़ दस हजार तीर्थोंका निवास केवल इस प्रयागमें ही बताया गया है। चारों विद्याओंके ज्ञानसे जो पुण्य होता है तथा सत्य बोलनेवाले व्यक्तियोंको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है वह सब गंगा-यमुनाके संगममें स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है ।। ८४-८५ ।।
तत्र भोगवती नाम वासुकेस्तीर्थमुत्तमम् ।
तत्राभिषेकं यः कुर्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।। ८६ ।।
प्रयागमें भोगवती नामसे प्रसिद्ध वासुकि नागका उत्तम तीर्थ है। जो वहाँ स्नान करता है, उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।। ८६ ।।
तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
दशाश्वमेधिकं चैव गङ्गायां कुरुनन्दन ।। ८७ ।।
कुरुनन्दन! वहीं त्रिलोकविख्यात हंसप्रपतन नामक तीर्थ है और गंगाके तटपर दशाश्वमेधिक तीर्थ है ।। ८७ ।।
कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र तत्रावगाहिता ।
विशेषो वै कनखले प्रयागे परमं महत् ।। ८८ ।।
गंगामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय वह कुरुक्षेत्रके समान पुण्यदायिनी है। कनखलमें गंगाका स्नान विशेष माहात्म्य रखता है और प्रयागमें गंगा-स्नानका माहात्म्य सबकी अपेक्षा बहुत अधिक है ।। ८८ ।।
यद्यकार्यशतं कृत्वा कृतं गङ्गाभिषेचनम् ।
सर्वं तत् तस्य गङ्गाम्भो दहत्यग्निरिवेन्धनम् ।। ८९ ।।
सर्वं कृतयुगे पुण्यं त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् ।
द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गङ्गा कलियुगे स्मृता ।। ९० ।।
पुष्करे तु तपस्तप्येद् दानं दद्यान्महालये ।
मलये त्वग्निमारोहेद् भृगुतुङ्गे त्वनाशनम् ।। ९१ ।।

जैसे अग्नि ईंधनको जला देती है, उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगास्नान किया जाय तो उसका जल उन सब पापोंको भस्म कर देता है। सत्ययुगमें सभी तीर्थ पुण्यदायक होते हैं। त्रेतामें पुष्करका महत्त्व है। द्वापरमें कुरुक्षेत्र विशेष पुण्यदायक है और कलियुगमें गंगाकी अधिक महिमा बतायी गयी है। पुष्करमें तप करे, महालयमें दान दे, मलय पर्वतमें अग्निपर आरूढ हो और भृगुतुंगमें उपवास करे ।। ८९-९१ ।।

पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गङ्गायां मध्यमेषु च । स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्तसप्तावरांस्तथा ॥ ९२ ॥ पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा तथा प्रयाग आदि मध्यवर्ती तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य अपने आगे-पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ९२ ॥

पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति । अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥ ९३ ॥ गंगाजीका नाम लिया जाय तो वह सारे पापोंको धो-बहाकर पवित्र कर देती है। दर्शन करनेपर कल्याण प्रदान करती है तथा स्नान और जलपान करनेपर वह मनुष्यकी सात पीढ़ियोंको पावन बना देती है ॥ ९३ ॥

यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गायाः स्पृशते जलम् । तावत् स पुरुषो राजन् स्वर्गलोके महीयते ॥ ९४ ॥ राजन्! मनुष्यकी हड्डी जबतक गंगाजलका स्पर्श करती है, तबतक वह पुरुष स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ९४ ॥

यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च । उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक् ॥ ९५ ॥ जितने पुण्य तीर्थ हैं और जितने पुण्य मन्दिर हैं, उन सबकी उपासना (सेवन)-से पुण्यलाभ करके मनुष्य देवलोकका भागी होता है ॥ ९५ ॥

न गङ्गासदृशं तीर्थं न देवः केशवात् परः । ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः ॥ ९६ ॥ गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं, भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई देवता नहीं और ब्राह्मणोंसे उत्तम कोई वर्ण नहीं है; ऐसा ब्रह्माजीका कथन है ॥ ९६ ॥

यत्र गङ्गा महाराज स देशस्तत् तपोवनम् । सिद्धिक्षेत्रं च तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥ ९७ ॥ महाराज! जहाँ गंगा बहती हैं वही उत्तम देश है; और वही तपोवन है। गंगाके तटवर्ती स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये ॥ ९७ ॥

इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च । सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ॥ ९८ ॥

इस सत्य सिद्धान्तको ब्राह्मण आदि द्विजों, साधु पुरुषों, पुत्र, सुहृदों, शिष्यवर्ग तथा अपने अनुगत मनुष्योंके कानमें कहना चाहिये ॥ ९८ ॥ इदं धन्यमिदं मेध्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् । इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥ ९९ ॥ यह गंगा-माहात्म्य धन्य, पवित्र, स्वर्गप्रद और परम उत्तम है। यह पुण्यदायक, रमणीय, पावन, उत्तम, धर्मसंगत और श्रेष्ठ है ॥ ९९ ॥ महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् । अधीत्य द्विजमध्ये च निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ १०० ॥ यह महर्षियोंका गोपनीय रहस्य है। सब पापोंका नाश करनेवाला है। द्विजमण्डलीमें इस गंगा-माहात्म्यका पाठ करके मनुष्य निर्मल हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाता है ॥ १०० ॥ श्रीमत् स्वर्ग्यं तथा पुण्यं सपत्नशमनं शिवम् । मेधाजननमन्यं वै तीर्थवंशानुकीर्तनम् ॥ १०१ ॥ यह तीर्थसमूहोंकी महिमाका वर्णन परम उत्तम, सम्पत्तिदायक, स्वर्गप्रद, पुण्यकारक, शत्रुओंका निवारण करनेवाला, कल्याणकारक तथा मेधाशक्तिको उत्पन्न करनेवाला है ॥ १०१ ॥ अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् । महीं विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥ इस तीर्थ-माहात्म्यका पाठ करनेसे पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त होता है, धनहीनको धन मिलता है, राजा इस पृथ्वीपर विजय पाता है और वैश्यको व्यापारमें धन मिलता है ॥ १०२ ॥ शूद्रो यथेप्सितान् कामान् ब्राह्मणः पारगः पठन् । यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थपुण्यं नरः शुचिः ॥ १०३ ॥ जातीः स स्मरते बह्वीर्नाकपृष्ठे च मोदते । गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमानि च ॥ १०४ ॥ शूद्र मनोवांछित वस्तुएँ पाता है और ब्राह्मण इसका पाठ करे तो वह समस्त शास्त्रोंका पारंगत विद्वान होता है। जो मनुष्य तीर्थोंके इस पुण्य माहात्म्यको प्रतिदिन सुनता है वह पवित्र हो पहलेके अनेक जन्मोंकी बातें याद कर लेता है और देहत्यागके पश्चात् स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। भीष्म! मैंने यहाँ गम्य और अगम्य सभी प्रकारके तीर्थोंका वर्णन किया है ॥ मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया । एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ १०५ ॥ ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्नातानि सुकृतैषिभिः । एवं त्वमपि कौरव्य विधिनानेन सुव्रत ॥ १०६ ॥

व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् । भावितैः करणैः पूर्वमास्तिकाच्छ्रुतिदर्शनात् ॥ १०७ ॥ प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रानुदर्शिभिः । नाव्रती नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः ॥ १०८ ॥ स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः । त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना ॥ १०९ ॥ पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः । पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणा नृप ॥ ११० ॥ तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः । अवाप्स्यसि त्वं लोकान् वै वसूनां वासवोपम । कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ॥ १११ ॥

सम्पूर्ण तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मनुष्य जहाँ जाना सम्भव न हो उन अगम्य तीर्थोंमें मनसे यात्रा करे, अर्थात् मनसे उन तीर्थोंका चिन्तन करे। वसुगण, साध्यगण, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार तथा देवोपम महर्षियोंने भी पुण्य लाभकी इच्छासे उन तीर्थोंमें स्नान किया है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुनन्दन! इसी प्रकार तुम भी विधिपूर्वक शौच-सन्तोषादि नियमोंका पालन करते और पुण्यसे पुण्यको बढ़ाते हुए उन तीर्थोंकी यात्रा करो। आस्तिकता और वेदोंके अनुशीलनसे पहले अपने इन्द्रियोंको पवित्र करके शास्त्रज्ञ साधु पुरुष ही उन तीर्थोंको प्राप्त करते हैं। कुरुनन्दन! जो ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन नहीं करता, जिसने अपने चित्तको वशमें नहीं किया, जो अपवित्र आचार-विचारवाला और चोर है, जिसकी बुद्धि वक्र है, ऐसा मनुष्य श्रद्धा न होनेके कारण तीर्थोंमें स्नान नहीं करता। तुम धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा नित्य सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हो। धर्मज्ञ! तुमने पिता-पितामह-प्रपितामह, ब्रह्मा आदि देवता तथा महर्षिगण इन सबको सदा स्वधर्मपालनसे संतुष्ट किया है, अतः इन्द्रके समान तेजस्वी नरेश! तुम वसुओंके लोकमें जाओगे। भीष्म! तुम्हें इस पृथ्वीपर विशाल एवं अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी ॥ १०५—१११ ॥

नारद उवाच

एवमुक्त्वाभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषिः । प्रीतः प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीयत ॥ ११२ ॥ नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भीष्मजीकी अनुमति ले संतुष्ट हुए भगवान् पुलस्त्य मुनि प्रसन्नमनसे वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ११२ ॥ भीष्मश्च कुरुशार्दूल शास्त्रतत्त्वार्थदर्शिवान् । पुलस्त्यवचनाच्चैव पृथिवीं परिचक्रमे ॥ ११३ ॥

कुरुश्रेष्ठ! शास्त्रके तात्त्विक अर्थको जाननेवाले भीष्मने महर्षि पुलस्त्यके वचनसे (तीर्थयात्राके लिये) सारी पृथ्वीकी परिक्रमा की॥ ११३ ॥ एवमेषा महाभाग प्रतिष्ठाने प्रतिष्ठिता । तीर्थयात्रा महापुण्या सर्वपापप्रमोचनी ॥ ११४ ॥ महाभाग! इस प्रकार यह सब पापोंको दूर करनेवाली महापुण्यमयी तीर्थयात्रा प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग)-में प्रतिष्ठित है॥ ११४॥ अनेन विधिना यस्तु पृथिवीं संचरिष्यति । अश्वमेधशतस्याग्र्यं फलं प्रेत्य स भोक्ष्यति ॥ ११५ ॥ जो इस विधिसे (तीर्थयात्राके उद्देश्यसे) सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करेगा, वह सौ अश्वमेधयज्ञोंसे भी उत्तम पुण्यफल पाकर देहत्यागके पश्चात् उसका उपभोग करेगा॥ ११५॥ ततश्चाष्टगुणं पार्थ प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् । भीष्मः कुरूणां प्रवरो यथापूर्वमवाप्तवान् ॥ ११६ ॥ कुन्तीनन्दन! कुरुप्रवर भीष्मने पहले जिस प्रकार तीर्थयात्राजनित पुण्य प्राप्त किया था, उससे भी आठगुने उत्तम धर्मकी उपलब्धि तुम्हें होगी॥ ११६॥ नेता च त्वमृषीन् यस्मात् तेन तेऽष्टगुणं फलम् । रक्षोगणविकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारत । न गतानि मनुष्येन्द्रैस्त्वामृते कुरुनन्दन ॥ ११७ ॥ तुम अपने साथ इन सब ऋषियोंको ले जाओगे, इसीलिये तुम्हें आठगुना पुण्यफल प्राप्त होगा। भरतकुल-भूषण कुरुनन्दन! इन सभी तीर्थोंमें राक्षसोंके समुदाय फैले हुए हैं। तुम्हारे सिवा, दूसरे नरेशोंने वहाँकी यात्रा नहीं की है॥ ११७॥ इदं देवर्षिचरितं सर्वतीर्थाभिसंवृतम् । यः पठेत् कल्यमुत्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ११८ ॥ जो मनुष्य सबेरे उठकर देवर्षि पुलस्त्यद्वारा वर्णित सम्पूर्ण तीर्थोंके माहात्म्यसे संयुक्त इस प्रसंगका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ऋषिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ कश्यपः । आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥ ११९ ॥ असितो देवलश्चैव मार्कण्डेयोऽथ गालवः । भरद्वाजो वसिष्ठश्च मुनिरुद्दालकस्तथा ॥ १२० ॥ शौनकः सह पुत्रेण व्यासश्च तपतां वरः । दुर्वासाश्च मुनिश्रेष्ठो जाबालिश्च महातपाः ॥ १२१ ॥ एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः । एभिः सह महाराज तीर्थान्येतान्यनुव्रज ॥ १२२ ॥

महाराज! ऋषिप्रवर वाल्मीकि, कश्यप, आत्रेय, कुण्डजठर, विश्वामित्र, गौतम, असित, देवल, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, वसिष्ठ, उद्दालक मुनि, शौनक तथा पुत्रसहित तपोधनप्रवर व्यास, मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा और महातपस्वी जाबालि—ये सभी महर्षि जो तपस्याके धनी हैं, तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इन सबके साथ उक्त तीर्थोंमें जाओ॥ ११९—१२२॥

एष ते लोमशो नाम महर्षिरमितद्युतिः।
समेष्यति महाराज तेन सार्धमनुव्रज॥ १२३॥
महाराज! ये अमिततेजस्वी महर्षि लोमश तुम्हारे पास आनेवाले हैं, उन्हें साथ लेकर यात्रा करो॥ १२३॥

मयापि सह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुक्रमात्।
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषः॥ १२४॥
धर्मज्ञ! इस यात्रामें मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा। प्राचीन राजा महाभिषके समान तुम भी क्रमशः इन तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए महान् यश प्राप्त करोगे॥ १२४॥

यथा ययातिर्धर्मात्मा यथा राजा पुरूरवाः।
तथा त्वं राजशार्दूल स्वेन धर्मेण शोभसे॥ १२५॥
यथा भगीरथो राजा यथा रामश्च विश्रुतः।
तथा त्वं सर्वराजभ्यो भ्राजसे रश्मिवानिव॥ १२६॥
नृपश्रेष्ठ! जैसे धर्मात्मा ययाति तथा राजा पुरूरवा थे वैसे ही तुम भी अपने धर्मसे सुशोभित हो रहे हो। जैसे राजा भगीरथ तथा विख्यात महाराज श्रीराम हो गये हैं, उसी प्रकार तुम भी सूर्यकी भाँति सब राजाओंसे अधिक शोभा पा रहे हो॥ १२५-१२६॥

यथा मनुर्यथैक्ष्वाकुर्यथा पूरुर्महायशाः।
यथा वैन्यो महाराज तथा त्वमपि विश्रुतः॥ १२७॥
यथा च वृत्रहा सर्वान् सपत्नान् निर्दहन् पुरा।
त्रैलोक्यं पालयामास देवराड् विगतज्वरः॥ १२८॥
तथा शत्रुक्षयं कृत्वा त्वं प्रजाः पालयिष्यसि।
स्वधर्मविजितामुर्वीं प्राप्य राजीवलोचन॥ १२९॥
ख्यातिं यास्यसि धर्मेण कार्तवीर्यार्जुनो यथा॥ १३०॥
महाराज! जैसे मनु, जैसे इक्ष्वाकु, जैसे महायशस्वी पूरु और जैसे वेननन्दन पृथु हो गये हैं वैसी ही तुम्हारी भी ख्याति है। पूर्वकालमें वृत्रासुरविनाशक देवराज इन्द्रने जैसे सब शत्रुओंका संहार करते हुए निश्चिन्त होकर तीनों लोकोंका पालन किया था, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका नाश करके प्रजाका पालन करोगे। कमलनयन नरेश! तुम अपने धर्मसे जीती हुई पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त करके स्वधर्मपालनद्वारा कार्तवीर्य अर्जुनके समान विख्यात होओगे॥ १२७—१३०॥

वैशम्पायन उवाच

एवमाश्वास्य राजानं नारदो भगवानृषिः ।
अनुज्ञाप्य महाराज तत्रैवान्तरधीयत ।। १३१ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! देवर्षि नारद इस प्रकार राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देकर उनकी आज्ञा ले वहीं अन्तर्धान हो गये ।। १३१ ।।
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा तमेवार्थं विचिन्तयन् ।
तीर्थयात्राश्रितं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदयत् ।। १३२ ।।
धर्मात्मा युधिष्ठिरने भी इसी विषयका चिन्तन करते हुए अपने पास रहनेवाले महर्षियोंसे तीर्थयात्रासम्बन्धी महान् पुण्यके विषयमें निवेदन किया ।। १३२ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां नारदवाक्ये पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ।। ८५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें महर्षि पुलस्त्यकी तीर्थयात्राके सम्बन्धमें नारदवाक्यविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 648)

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षडशीतितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना

वैशम्पायन उवाच

भ्रातॄणां मतमाज्ञाय नारदस्य च धीमतः ।
पितामहसमं धौम्यं प्राह राजा युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने भाइयों तथा परम बुद्धिमान् देवर्षि नारदकी सम्मति जानकर राजा युधिष्ठिरने पितामहके समान प्रभावशाली पुरोहित धौम्यजीसे कहा— ॥ १ ॥

मया स पुरुषव्याघ्रो जिष्णुः सत्यपराक्रमः ।
अस्त्रहेतोर्महाबाहुरमितात्मा विवासितः ॥ २ ॥
‘ब्रह्मन्! मैंने अस्त्रप्राप्तिके लिये विजयी सत्य-पराक्रमी, महामना एवं प्रतापी पुरुषसिंह महाबाहु अर्जुनको निर्वासित कर रखा है ॥ २ ॥

स हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधनः ।
कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः ॥ ३ ॥
‘वह वीर मुझमें अनुराग रखनेवाला, सामर्थ्यशाली, तपस्याका धनी, पुण्यात्मा और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति प्रभावशाली है ॥ ३ ॥

अहं ह्येतावुभौ ब्रह्मन् कृष्णावरिविघातिनौ ।
अभिजानामि विक्रान्तौ तथा व्यासः प्रतापवान् ॥ ४ ॥
‘विप्रवर! मैं इन दोनों कृष्णनामधारी वीरोंको शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ और महापराक्रमी समझता हूँ। महाप्रतापी वेदव्यासजीकी भी यही धारणा है ॥ ४ ॥

त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनंजयौ ।
नारदोऽपि तथा वेद योऽप्यशंसत् सदा मम ॥ ५ ॥
‘कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन तीन युगोंसे सदा साथ रहते आये हैं। नारदजी भी इन दोनोंको इसी रूपमें जानते हैं; और सदा मुझसे इस बातकी चर्चा करते रहते हैं ॥ ५ ॥

तथाहमपि जानामि नरनारायणावृषी ।
शक्तोऽयमित्यतो मत्वा मया स प्रेषितोऽर्जुनः ॥ ६ ॥
इन्द्रादनवरः शक्रं सुरसूनुः सुराधिपम् ।
द्रष्टुमस्त्राणि चादातुमिन्द्रादिति विवासितः ॥ ७ ॥

भीष्मद्रोणावतिरथौ कृपो द्रौणिश्च दुर्जयः । धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण वृता युधि महारथाः ॥ ८ ॥ ‘मैं भी ऐसा ही समझता हूँ कि श्रीकृष्ण और अर्जुन सुप्रसिद्ध नर-नारायण ऋषि हैं। अर्जुनको शक्तिशाली समझकर ही मैंने उसे दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये भेजा है। देवपुत्र अर्जुन इन्द्रसे कम नहीं हैं। यह जानकर ही मैंने उसे देवराज इन्द्रका दर्शन करने और उनसे दिव्यास्त्रोंको प्राप्त करनेके लिये भेजा है। भीष्म और द्रोण अतिरथी वीर हैं। कृपाचार्य तथा अश्वत्थामाको भी जीतना कठिन है। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने इन सभी महारथियोंको युद्धके लिये वरण कर लिया है ॥ ६—८ ॥

सर्वे वेदविदः शूराः सर्वास्त्रविदुषस्तथा । योद्धुकामाश्च पार्थेन सततं ये महाबलाः । स च दिव्यास्त्रवित् कर्णः सूतपुत्रो महारथः ॥ ९ ॥ ‘वे सब-के-सब वेदज्ञ, शूरवीर, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, महाबली और सदा अर्जुनके साथ युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले हैं। वह सूतपुत्र महारथी कर्ण भी दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता है ॥ ९ ॥

योऽस्त्रवेगानिलबलः शरार्चिस्तलनिःस्वनः । रजोधूमोऽस्त्रसम्पातो धार्तराष्ट्रानिलोद्धतः ॥ १० ॥ निसृष्ट इव कालेन युगान्ते ज्वलनो महान् । मम सैन्यमयं कक्षं प्रधक्ष्यति न संशयः ॥ ११ ॥ ‘कालने उसे प्रलयकालीन संवर्तक नामक महान् अग्निके समान उत्पन्न किया है। अस्त्रोंका वेग ही उसका वायुतुल्य बल है। बाण ही उसकी ज्वाला हैं। हथेलीसे होनेवाली आवाज ही उस दाहक अग्निका शब्द है। युद्धमें उठनेवाली धूल ही उस कर्णरूपी अग्निका धूम है। अस्त्रोंकी वर्षा ही उसकी लपटोंका लगना है। धृतराष्ट्र-पुत्ररूपी वायुका सहारा पाकर वह और भी उद्धत एवं प्रज्वलित हो उठा है। इसमें संदेह नहीं कि वह मेरी सेनाको सूखे तिनकोंकी राशिके समान भस्म कर डालेगा ॥ १०-११ ॥

तं स कृष्णानिलोद्धूतो दिव्यास्त्रज्वलनो महान् । श्वेतवाजिबलाकाभृद् गाण्डीवेन्द्रायुधोल्बणः ॥ १२ ॥ संरब्धः शरधाराभिः सुदीप्तं कर्णपावकम् । अर्जुनोदीरितो मेघः शमयिष्यति संयुगे ॥ १३ ॥ स साक्षादेव सर्वाणि शक्रात् परपुरंजयः । दिव्यान्यस्त्राणि बीभत्सुस्ततश्च प्रतिपत्स्यते ॥ १४ ॥ ‘उस आगको युद्धमें अर्जुन नामक महामेघ ही बुझा सकेगा। श्रीकृष्णरूपी वायुका सहारा पाकर ही वह मेघ उठेगा। दिव्यास्त्रोंका प्रकाश ही उसमें बिजलीकी चमक होगी। रथके श्वेत घोड़े ही उसके निकट उड़नेवाली बकपंक्तियोंकी भाँति सुशोभित होंगे। गाण्डीव

धनुष ही इन्द्रधनुषके समान दुःसह दृश्य उपस्थित करनेवाला होगा। वह क्रोधमें भरकर बाणरूपी जलकी धारासे कर्णरूपी प्रज्वलित अग्निको निश्चय ही शान्त कर देगा। शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाला अर्जुन साक्षात् इन्द्रसे सारे दिव्यास्त्र प्राप्त करेगा ।। १२—१४ ।।

अलं स तेषां सर्वेषामिति मे धीयते मतिः ।
नास्ति त्वतिकृतार्थानां रणेऽरीणां प्रतिक्रिया ।। १५ ।।
‘धृतराष्ट्र-पक्षके उक्त सभी महारथियोंको जीतनेके लिये वह अकेला ही पर्याप्त होगा; ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। अन्यथा अत्यन्त कृतार्थताका अनुभव करनेवाले शत्रुओंको दबानेका और कोई उपाय नहीं है ।।

ते वयं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रमरिंदमम् ।
द्रष्टारो न हि बीभत्सुर्भारमुद्यम्य सीदति ।। १६ ।।
‘अतः हम शत्रुहन्ता पाण्डुनन्दन अर्जुनको अवश्य ही सब दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके आया हुआ देखेंगे; क्योंकि वह वीर किसी कार्य-भारको उठाकर उसे पूर्ण किये बिना कभी श्रान्त नहीं होता ।। १६ ।।

वयं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन् द्विपदां वर ।
अवधानं न गच्छामः काम्यके सह कृष्णया ।। १७ ।।
‘नरश्रेष्ठ! इस काम्यकवनमें वीर अर्जुनके बिना द्रौपदीसहित हम सब पाण्डवोंका मन बिलकुल नहीं लग रहा है ।। १७ ।।

भवानन्यद् वनं साधु बह्वन्नं फलवच्छुचि ।
आख्यातु रमणीयं च सेवितं पुण्यकर्मभिः ।। १८ ।।
‘इसलिये आप हमें किसी ऐसे रमणीय वनका पता बतायें जो बहुत अच्छा, पवित्र, प्रचुर अन्न और फलसे सम्पन्न तथा पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा सेवित हो ।। १८ ।।

यत्र कंचिद् वयं कालं वसन्तः सत्यविक्रमम् ।
प्रतीक्षामोऽर्जुनं वीरं वृष्टिकामा इवाम्बुदम् ।। १९ ।।
‘यहाँ हमलोग कुछ काल रहकर सत्यपराक्रमी वीर अर्जुनके आगमनकी उसी प्रकार प्रतीक्षा करें, जैसे वृष्टिकी इच्छा रखनेवाले किसान बादलोंकी राह देखते हैं ।। १९ ।।

विविधानाश्रमान् कांश्चिद् द्विजातिभ्यः प्रतिश्रुतान् ।
सरांसि सरितश्चैव रमणीयांश्च पर्वतान् ।। २० ।।
आचक्ष्व न हि मे ब्रह्मन् रोचते तमृतेऽर्जुनम् ।
वनेऽस्मिन् काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति ।। २१ ।।
‘ब्रह्मन्! आप दूसरे ब्राह्मणोंसे सुने हुए नाना प्रकारके कतिपय आश्रमों, सरोवरों, सरिताओं तथा रमणीय पर्वतोंका पता बताइये। अर्जुनके बिना अब काम्यकवनमें रहना हमें अच्छा नहीं लगता; इसलिये अब दूसरी दिशाको चलेंगे’ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यकी तीर्थयात्राविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥