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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१४४-

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चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन

वैशम्पायन उवाच

क्रोशमात्रं प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
पद्भ्यामनुचिता गन्तुं द्रौपदी समुपाविशत् ॥ १ ॥
श्रान्ता दुःखपरीता च वातवर्षेण तेन च ।
सौकुमार्याच्च पाञ्चाली सम्मुमोह तपस्विनी ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महात्मा पाण्डव अभी कोसभर ही गये होंगे कि पांचालराजकुमारी तपस्विनी द्रौपदी सुकुमारताके कारण थककर बैठ गयी। वह पैदल चलनेयोग्य कदापि नहीं थी। उस भयानक वायु और वर्षासे पीड़ित हो दुःखमग्न होकर वह मूर्छित होने लगी थी ॥ १-२ ॥

सा कम्पमाना मोहेन बाहुभ्यामसितेक्षणा ।
वृत्ताभ्यामनुरूपाभ्यामूरू समवलम्बत ॥ ३ ॥
घबराहटसे काँपती हुई कजरारे नेत्रोंवाली कृष्णाने अपने गोल-गोल और सुन्दर हाथोंसे दोनों जाँघोंको थाम लिया ॥ ३ ॥

आलम्बमाना सहितावूरू गजकरोपमौ ।
पपात सहसा भूमौ वेपन्ती कदली यथा ॥ ४ ॥
तां पतन्तीं वरारोहां भज्यमानां लतामिव ।
नकुलः समभिद्रुत्य परिजग्राह वीर्यवान् ॥ ५ ॥
हाथीकी सूँड़के समान चढ़ाव-उतारवाली परस्पर सटी हुई जाँघोंका सहारा ले केलेके वृक्षकी भाँति काँपती हुई वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी। सुन्दर अंगोंवाली द्रौपदीको टूटी हुई लताकी भाँति गिरती देख बलशाली नकुलने दौड़कर थाम लिया ॥ ४-५ ॥

नकुल उवाच

राजन् पञ्चालराजस्य सुतेयमसितेक्षणा ।
श्रान्ता निपतिता भूमौ तामवेक्षस्व भारत ॥ ६ ॥
**तत्पश्चात् नकुलने कहा—**भरतकुलभूषण महाराज! यह श्याम नेत्रवाली पांचालराजकुमारी द्रौपदी थककर धरतीपर गिर पड़ी है, आप आकर इसे देखिये ॥ ६ ॥

अदुःखार्हा परं दुःखं प्राप्तेयं मृदुगामिनी ।
आश्वासय महाराज तामिमां श्रमकर्शिताम् ॥ ७ ॥

राजन्! यह मन्दगतिसे चलनेवाली देवी दुःख सहन करनेके योग्य नहीं है; तो भी इसपर महान् दुःख आ पड़ा है। रास्तेके परिश्रमसे यह दुर्बल हो गयी है। आप आकर इसे सान्त्वना दें ।। ७ ।।

वैशम्पायन उवाच

राजा तु वचनात् तस्य भृशं दुःखसमन्वितः । भीमश्च सहदेवश्च सहसा समुपाद्रवन् ।। ८ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नकुलकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुखी हो गये और भीम तथा सहदेवके साथ सहसा वहाँ दौड़े आये ।। ८ ।। तामवेक्ष्य तु कौन्तेयो विवर्णवदनां कृशाम् । अङ्कमानीय धर्मात्मा पर्यदेवयदातुरः ।। ९ ।। धर्मात्मा कुन्तीनन्दनने देखा—द्रौपदीके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और उसका शरीर कृश हो गया है। तब वे उसे अंकमें लेकर शोकातुर हो विलाप करने लगे ।। ९ ।।

युधिष्ठिर उवाच

कथं वेश्मसु गुप्तेषु स्वास्तीर्णशयनोचिता । भूमौ निपतिता शेते सुखार्हा वरवर्णिनी ।। १० ।। युधिष्ठिर बोले—अहो! जो सुरक्षित सदनोंमें सुसज्जित सुकोमल शय्यापर शयन करनेयोग्य है, वह सुख भोगनेकी अधिकारिणी परम सुन्दरी कृष्णा आज पृथ्वीपर कैसे सो रही है? ।। १० ।।

सुकुमारौ कथं पादौ मुखं च कमलप्रभम् ।
मत्कृतेऽद्य वरार्हायाः श्यामतां समुपागतम् ॥ ११ ॥
जो सुखके श्रेष्ठ साधनोंका उपभोग करनेयोग्य है, उसी द्रौपदीके ये दोनों सुकुमार चरण और कमलकी कान्तिसे सुशोभित मुख आज मेरे कारण कैसे काले पड़ गये हैं? ॥ ११ ॥
किमिदं द्यूतकामेन मया कृतमबुद्धिना ।
आदाय कृष्णां चरता वने मृगगणायुते ॥ १२ ॥
मुझ मूर्खने द्यूतक्रीड़ाकी कामनामें फँसकर यह क्या कर डाला? अहो! सहस्रों मृगसमूहोंसे भरे हुए इस भयानक वनमें द्रौपदीको साथ लेकर हमें विचरना पड़ा है ॥ १२ ॥
सुखं प्राप्स्यसि कल्याणि पाण्डवान् प्राप्य वै पतीन् ।
इति द्रुपदराजेन पित्रा दत्ताऽऽयतेक्षणा ॥ १३ ॥
तत् सर्वमनवाप्येयं श्रमशोकाध्वकर्शिता ।
शेते निपतिता भूमौ पापस्य मम कर्मभिः ॥ १४ ॥
इसके पिता राजा द्रुपदने इस विशाललोचना द्रौपदीको यह कहकर हमें प्रदान किया था कि ‘कल्याणि! तुम पाण्डवोंको पतिरूपमें पाकर सुखी होगी।’ परंतु मुझ पापीकी

करतूतोंसे वह सब न पाकर यह परिश्रम, शोक और मार्गके कष्टसे कृश होकर आज पृथ्वीपर पड़ी सो रही है ॥ १३-१४ ॥

वैशम्पायन उवाच

तथा लालप्यमाने तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । धौम्यप्रभृतयः सर्वे तत्राजग्मुर्द्विजोत्तमाः ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय धौम्य आदि समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहाँ आ पहुँचे ॥ १५ ॥

ते समाश्वासयामासुराशीर्भिश्वाप्यपूजयन् । रक्षोघ्नांश्च तथा मन्त्रान्जेपुश्चक्रुश्च ते क्रियाः ॥ १६ ॥ उन्होंने महाराजको आश्वासन दिया और अनेक प्रकारके आशीर्वाद देकर उन्हें सम्मानित किया। तत्पश्चात् वे राक्षसोंका विनाश करनेवाले मन्त्रोंका जप तथा शान्तिकर्म करने लगे ॥ १६ ॥

पठ्यमानेषु मन्त्रेषु शान्त्यर्थं परमर्षिभिः । स्पृश्यमाना करैः शीतैः पाण्डवैश्च मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥ महर्षियोंद्वारा शान्तिके लिये मन्त्रपाठ होते समय पाण्डवोंने अपने शीतल हाथोंसे बार-बार द्रौपदीके अंगोंको सहलाया ॥ १७ ॥

सेव्यमाना च शीतेन जलमिश्रेण वायुना । पाञ्चाली सुखमासाद्य लेभे चेतः शनैः शनैः ॥ १८ ॥ जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल वायुने भी उसे सुख पहुँचाया। इस प्रकार कुछ आराम मिलनेपर पांचालराजकुमारी द्रौपदीको धीरे-धीरे चेत हुआ ॥ १८ ॥

परिगृह्य च तां दीनां कृष्णाजिनसंस्तरे । पार्था विश्रामयामासुर्लब्धसंज्ञां तपस्विनीम् ॥ १९ ॥ तस्या यमौ रक्ततलौ पादौ पूजितलक्षणौ । कराभ्यां किणजाताभ्यां शनकैः संववाहतुः ॥ २० ॥ होशमें आनेपर दीनावस्थामें पड़ी हुई तपस्विनी द्रौपदीको पकड़कर पाण्डवोंने मृगचर्मके बिस्तरपर सुलाया और उसे विश्राम कराया। नकुल और सहदेवने धनुषकी रगड़के चिह्नसे सुशोभित दोनों हाथोंद्वारा उसके लाल तलवोंसे युक्त और उत्तम लक्षणोंसे अलंकृत दोनों चरणोंको धीरे-धीरे दबाया ॥ १९-२० ॥

पर्याश्वासयदप्येनां धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच च कुरुश्रेष्ठो भीमसेनमिदं वचः ॥ २१ ॥ फिर कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने भी द्रौपदीको बहुत आश्वासन दिया और भीमसेनसे इस प्रकार कहा— ॥

बहवः पर्वता भीम विषमा हिमदुर्गमाः । तेषु कृष्णा महाबाहो कथं नु विचरिष्यति ॥ २२ ॥ ‘महाबाहु भीम! यहाँ बहुत-से ऊँचे-नीचे पर्वत हैं, जिनपर चलना बर्फके कारण अत्यन्त कठिन है। उनपर द्रौपदी कैसे जा सकेगी?’ ॥ २२ ॥

भीमसेन उवाच

त्वां राजन् राजपुत्रीं च यमौ च पुरुषर्षभ । स्वयं नेष्यामि राजेन्द्र मा विषादे मनः कृथाः ॥ २३ ॥ **भीमसेनने कहा—**पुरुषरत्न! महाराज! आप मनमें खेद न करें। मैं स्वयं राजकुमारी द्रौपदी, नकुल-सहदेव और आपको भी ले चलूँगा ॥ २३ ॥ हैडिम्बश्च महावीर्यो विहगो मद्बलोपमः । वहेदनघ सर्वान्नो वचनात् ते घटोत्कचः ॥ २४ ॥ हिडिम्बाका पुत्र घटोत्कच भी महान् पराक्रमी है। वह मेरे ही समान बलवान् है और आकाशमें चल-फिर सकता है। अनघ! आपकी आज्ञा होनेपर वह हम सबको अपनी पीठपर बिठाकर ले चलेगा ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

अनुज्ञातो धर्मराज्ञा पुत्रं सस्मार राक्षसम् । घटोत्कचस्तु धर्मात्मा स्मृतमात्रः पितुस्तदा ॥ २५ ॥ कृताञ्जलिरुपातिष्ठदभिवाद्याथ पाण्डवान् । ब्राह्मणांश्च महाबाहुः स च तैरभिनन्दितः ॥ २६ ॥ उवाच भीमसेनं स पितरं भीमविक्रमम् । स्मृतोऽस्मि भवता शीघ्रं शुश्रूषुरहमागतः ॥ २७ ॥ आज्ञापय महाबाहो सर्वं कर्तास्म्यसंशयम् । तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्तु राक्षसं परिषस्वजे ॥ २८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञा पाकर भीमसेनने अपने राक्षसपुत्रका स्मरण किया। पिताके स्मरण करते ही धर्मात्मा घटोत्कच हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुआ। उस महाबाहु वीरने पाण्डवों तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके उनके द्वारा सम्मानित हो अपने भयंकर पराक्रमी पिता भीमसेनसे कहा—‘महाबाहो! आपने मेरा स्मरण किया है और मैं शीघ्र ही सेवाकी भावनासे आया हूँ, आज्ञा कीजिये; मैं आपका सब कार्य अवश्य ही पूर्ण करूँगा।’ यह सुनकर भीमसेनने राक्षस घटोत्कचको हृदयसे लगा लिया ॥ २५—२८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥

घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन

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पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

धर्मज्ञो बलवान् शूरः सत्यो राक्षसपुङ्गवः ।
भक्तोऽस्मानौरसः पुत्रो भीम गृह्णातु मा चिरम् ॥ १ ॥
तव भीम सुतेनाहमतिभीमपराक्रम ।
अक्षतः सह पाञ्चाल्या गच्छेयं गन्धमादनम् ॥ २ ॥

**युधिष्ठिर बोले—**अत्यन्त भयानक पराक्रम दिखानेवाले भीम! तुम्हारा औरस पुत्र राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच धर्मज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सत्यवादी तथा हमलोगोंका भक्त है। यह हमें शीघ्र उठा ले चले। जिससे भीमसेन! तुम्हारे पुत्र घटोत्कचद्वारा शरीरसे किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही मैं द्रौपदीसहित गन्धमादन पर्वतपर पहुँच जाऊँ ॥ १-२ ॥

वैशम्पायन उवाच

भ्रातुर्वचनमाज्ञाय भीमसेनो घटोत्कचम् ।
आदिदेश नरव्याघ्रस्तनयं शत्रुकर्शनम् ॥ ३ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भाईकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके नरश्रेष्ठ भीमसेनने अपने पुत्र शत्रुसूदन घटोत्कचको इस प्रकार आज्ञा दी ॥ ३ ॥

भीमसेन उवाच

हैडिम्बेय परिश्रान्ता तव मातापराजित ।
त्वं च कामगमस्तात बलवान् वह तां खग ॥ ४ ॥

**भीमसेन बोले—**अपराजित और आकाशचारी हिडिम्बानन्दन! तुम्हारी माता द्रौपदी बहुत थक गयी है। तुम बलवान् एवं इच्छानुसार सर्वत्र जानेमें समर्थ हो; अतः इसे (आकाशमार्गसे) ले चलो ॥ ४ ॥

स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहायसा ।
गच्छ नीचिकया गत्या यथा चैनां न पीडयेः ॥ ५ ॥

बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। इसे कंधेपर बैठाकर हम लोगोंके बीच रहते हुए आकाशमार्गसे इस प्रकार धीरे-धीरे ले चलो, जिससे इसे तनिक भी कष्ट न हो ॥ ५ ॥

घटोत्कच उवाच

धर्मराजं च धौम्यं च कृष्णां च यमजौ तथा । एकोऽप्यहमलं वोढुं किमुताद्य सहायवान् ॥ ६ ॥ अन्ये च शतशः शूरा विहङ्गाः कामरूपिणः । सर्वान् वो ब्राह्मणैः सार्धं वक्ष्यन्ति सहितानघ ॥ ७ ॥ घटोत्कच बोला—अनघ! मैं अकेला रहूँ तो भी धर्मराज युधिष्ठिर, पुरोहित धौम्य, माता द्रौपदी और चाचा नकुल-सहदेवको भी वहन कर सकता हूँ; फिर आज तो मेरे और भी बहुत-से संगी-साथी मौजूद हैं। इस दशामें आप लोगोंको ले चलना कौन बड़ी बात है? मेरे सिवा दूसरे भी सैकड़ों शूरवीर, आकाशचारी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मेरे साथ हैं। वे ब्राह्मणोंसहित आप सब लोगोंको एक साथ वहन करेंगे ॥ ६-७ ॥

एवमुक्त्वा ततः कृष्णामुवाह स घटोत्कचः । पाण्डूनां मध्यगो वीरः पाण्डवानपि चापरे ॥ ८ ॥ ऐसा कहकर वीर घटोत्कच तो द्रौपदीको लेकर पाण्डवोंके बीचमें चलने लगा और दूसरे राक्षस पाण्डवोंको भी (अपने-अपने कंधेपर बिठाकर) ले चले ॥ ८ ॥ लोमशः सिद्धमार्गेण जगामानुपमद्युतिः । स्वेनैव स प्रभावेण द्वितीय इव भास्करः ॥ ९ ॥

अनुपम तेजस्वी महर्षि लोमश अपने ही प्रभावसे दूसरे सूर्यकी भाँति सिद्धमार्ग अर्थात् आकाशमार्गसे चलने लगे ॥ ९ ॥

ब्राह्मणांश्चापि तान् सर्वान् समुपादाय राक्षसाः ।
नियोगाद् राक्षसेन्द्रस्य जग्मुर्भीमपराक्रमाः ॥ १० ॥
राक्षसराज घटोत्कचकी आज्ञासे अन्य सब ब्राह्मणोंको भी अपने-अपने कंधेपर चढ़ाकर वे भयंकर पराक्रमी राक्षस साथ-साथ चलने लगे ॥ १० ॥

एवं सुरमणीयानि वनान्युपवनानि च ।
आलोकयन्तस्ते जग्मुर्विशालां बदरीं प्रति ॥ ११ ॥
इस प्रकार अत्यन्त रमणीय वन और उपवनोंका अवलोकन करते हुए वे सब लोग विशाला बदरी (बदरिकाश्रम तीर्थ)-की ओर प्रस्थित हुए ॥ ११ ॥

ते त्वाशुगतिभिर्वीरा राक्षसैस्तैर्महाजवैः ।
उह्यमाना ययुः शीघ्रं दीर्घमध्वानमल्पवत् ॥ १२ ॥
उन महावेगशाली और तीव्र गतिसे चलनेवाले राक्षसोंपर सवार हो वीर पाण्डवोंने उस विशाल मार्गको इतनी शीघ्रतासे तय कर लिया मानो वह बहुत छोटा हो ॥ १२ ॥

देशान् म्लेच्छजनाकीर्णान् नानारत्नाकरायुतान् ।
ददृशुर्गिरिपादांश्च नानाधातुसमाचितान् ॥ १३ ॥
विद्याधरसमाकीर्णान् युतान् वानरकिन्नरैः ।
तथा किंपुरुषैश्चैव गन्धर्वैश्च समन्ततः ॥ १४ ॥
उस यात्रामें उन्होंने म्लेच्छोंसे भरे हुए बहुत-से ऐसे देश देखे जो नाना प्रकारकी रत्नोंकी खानोंसे युक्त थे। वहाँ उन्हें नाना प्रकारके धातुओंसे व्याप्त कितने ही शाखापर्वत दृष्टिगोचर हुए। उन पर्वतीय शिखरोंपर बहुत-से विद्याधर, वानर, किन्नर, किम्पुरुष और गन्धर्व चारों ओर निवास करते थे ॥ १३-१४ ॥

मयूरैश्चमरैश्चैव वानरै रुरुभिस्तथा ।
वराह्र्गवयैश्चैव महिषैश्च समावृतान् ॥ १५ ॥
मोर, चमरी गाय, बंदर, रुरुमृग, सूअर, गवय* और भैंस आदि पशु वहाँ विचर रहे थे ॥ १५ ॥

नदीजालसमाकीर्णान् नानापक्षियुतान् बहून् ।
नानाविधमृगैर्जुष्टान् वानरैश्चोपशोभितान् ॥ १६ ॥
वहाँ सब ओर बहुत-सी नदियाँ बह रही थीं। अनेक प्रकारके असंख्य पक्षी विचर रहे थे। वह स्थान नाना प्रकारके मृगोंसे सेवित और वानरोंसे सुशोभित था ॥ १६ ॥

समदेश्वापि विहगैः पादपैरन्वितास्तथा ।
तेऽवतीर्य बहून् देशानुत्तमर्द्धिसमन्वितान् ॥ १७ ॥
ददृशुर्विविधाश्चर्यं कैलासं पर्वतोत्तमम् ।

तस्याभ्याशे तु ददृशुर्नरनारायणाश्रमम् ॥ १८ ॥ उपेतं पादपैर्दिव्यैः सदापुष्पफलोपगैः । ददृशुस्तां च बदरीं वृत्तस्कन्धां मनोरमाम् ॥ १९ ॥ स्निग्धामविरलच्छायां श्रिया परमया युताम् । पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतं मृदुभिः शुभाम् ॥ २० ॥ वह पर्वतीय प्रदेश मतवाले विहंगों और अगणित वृक्षोंसे युक्त था। पाण्डवोंने उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न बहुत-से देशोंको लाँघकर भाँति-भाँतिके आश्चर्यजनक दृश्योंसे सुशोभित पर्वतश्रेष्ठ कैलासका दर्शन किया। उसीके निकट उन्हें भगवान् नर-नारायणका आश्रम दिखायी दिया, जो नित्य फल-फूल देनेवाले दिव्य वृक्षोंसे अलंकृत था। वहीं वह विशाल एवं मनोरम बदरी भी दिखायी दी, जिसका स्कन्ध (तना) गोल था। वह वृक्ष बहुत ही चिकना, घनी छायासे युक्त और उत्तम शोभासे सम्पन्न था। उस शुभ वृक्षके सघन कोमल पत्ते भी बहुत चिकने थे ॥ १७–२० ॥

विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् । फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् ॥ २१ ॥ मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् । मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ॥ २२ ॥ उसकी डालियाँ बहुत बड़ी और बहुत दूरतक फैली हुई थीं। वह वृक्ष अत्यन्त कान्तिसे सम्पन्न था। उसमें अत्यन्त स्वादिष्ट दिव्य फल अधिक मात्रामें लगे हुए थे। उन फलोंसे मधुकी धारा बहती रहती थी। उस दिव्य वृक्षके नीचे महर्षियोंका समुदाय निवास करता था। वह वृक्ष सदा मदोन्मत्त एवं आनन्दविभोर पक्षियोंसे परिपूर्ण रहता था ॥ २१-२२ ॥

अदंशमशके देशे बहुमूलफलोदके । नीलशाद्वलसंच्छन्ने देवगन्धर्वसेविते ॥ २३ ॥ सुसमीकृतभूभागे स्वभावविहिते शुभे । जातां हिममृदुस्पर्शे देशेऽपहतकण्टके ॥ २४ ॥ उस प्रदेशमें डाँस और मच्छरोंका नाम नहीं था। फल-मूल और जलकी बहुतायत थी। वहाँकी भूमि हरी-हरी घाससे ढकी हुई थी। देवता और गन्धर्व वहाँ वास करते थे। उस प्रदेशका भूभाग स्वभावतः समतल और मंगलमय था। उस हिमाच्छादित भूमिकी स्पर्श अत्यन्त मृदु था। उस देशमें काँटोंका कहीं नाम नहीं था। ऐसे पावन प्रदेशमें वह विशाल बदरी वृक्ष उत्पन्न हुआ था ॥ २३-२४ ॥

तामुपेत्य महात्मानः सह तैर्ब्राह्मणर्षभैः । अवतेरुस्ततः सर्वे राक्षसस्कन्धतः शनैः ॥ २५ ॥ उसके पास पहुँचकर ये सब महात्मा पाण्डव उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ राक्षसोंके कंधोंसे धीरे-धीरे उतरे ॥ २५ ॥

ततस्तमाश्रमं रम्यं नरनारायणाश्रितम् । ददृशुः पाण्डवा राजन् सहिता द्विजपुङ्गवैः ॥ २६ ॥ राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित पाण्डवोंने एक साथ भगवान् नर-नारायणके उस रमणीय स्थानका दर्शन किया ॥ २६ ॥

तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवेः करैः । क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम् ॥ २७ ॥ जो अन्धकार एवं तमोगुणसे रहित तथा पुण्यमय था। (वृक्षोंकी सघनताके कारण) सूर्यकी किरणें उसका स्पर्श नहीं कर पाती थीं। वह आश्रम भूख, प्यास, सर्दी और गरमी आदि दोषोंसे रहित और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाला था ॥ २७ ॥

महर्षिगणसम्बाधं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समन्वितम् । दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मबहिष्कृतैः ॥ २८ ॥ महाराज! वह पावन तीर्थ महर्षियोंके समुदायसे भरा हुआ और ब्राह्मी श्रीसे सुशोभित था। धर्महीन मनुष्योंका वहाँ प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था ॥ २८ ॥

बलिहोमार्चितं दिव्यं सुसम्मृष्टानुलेपनम् । दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम् ॥ २९ ॥ वह दिव्य आश्रम देव-पूजा और होमसे अर्चित था। उसे झाड़-बुहारकर अच्छी तरह लीपा गया था। दिव्य पुष्पोंके उपहार सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २९ ॥

विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः । महद्भिस्तोयकलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् ॥ ३० ॥ विशाल अग्निहोत्रगृहों और स्रुक्, स्रुवा आदि सुन्दर यज्ञपात्रोंसे व्याप्त वह पावन आश्रम जलसे भरे हुए बड़े-बड़े कलशों और बर्तनोंसे सुशोभित था ॥ ३० ॥

शरण्यं सर्वभूतानां ब्रह्मघोषनिनादितम् । दिव्यमाश्रयणीयं तमाश्रमं श्रमनाशनम् ॥ ३१ ॥ वह सब प्राणियोंके शरण लेनेयोग्य था। वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी। वह दिव्य आश्रम सबके रहनेयोग्य और थकावटको दूर करनेवाला था ॥

श्रिया युतमनिर्देश्यं देवचर्योपशोभितम् । फलमूलाशनैर्दान्तैश्चारुकृष्णाजिनाम्बरैः ॥ ३२ ॥ सूर्यवैश्वानरसमैस्तपसा भावितात्मभिः । महर्षिभिर्मोक्षपरैर्यतिभिर्नियतेन्द्रियैः ॥ ३३ ॥ ब्रह्मभूतैर्महाभागैरुपेतं ब्रह्मवादिभिः । सोऽभ्यगच्छन्महातेजास्तानृषीन् प्रयतः शुचिः ॥ ३४ ॥ भ्रातृभिः सहितो धीमान् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् ॥ ३५ ॥

अभ्यगच्छन्त सुप्रीताः सर्व एव महर्षयः । आशीर्वादन् प्रयुञ्जानाः स्वाध्यायनिरता भृशम् ॥ ३६ ॥ प्रीतास्ते तस्य सत्कारं विधिना पावकोपमाः । उपजह्रुश्च सलिलं पुष्पमूलफलं शुचि ॥ ३७ ॥ वह शोभासम्पन्न आश्रम अवर्णनीय था। देवोचित कार्योंका अनुष्ठान उसकी शोभा बढ़ाता था। उस आश्रममें फल-मूल खाकर रहनेवाले, कृष्णमृगचर्मधारी, जितेन्द्रिय, अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी और तपःपूत अन्तःकरणवाले महर्षि, मोक्षपरायण, इन्द्रिय-संयमी संन्यासी तथा महान् सौभाग्यशाली ब्रह्मवादी ब्रह्मभूत महात्मा निवास करते थे। महातेजस्वी, बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर पवित्र और एकाग्रचित्त होकर भाइयोंके साथ उन आश्रमवासी महर्षियोंके पास गये। युधिष्ठिरको आश्रममें आया देख वे दिव्यज्ञानसम्पन्न सब महर्षि अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे मिले और उन्हें अनेक प्रकारके आशीर्वाद देने लगे। सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले उन अग्नितुल्य तेजस्वी महात्माओंने प्रसन्न होकर युधिष्ठिरका विधिपूर्वक सत्कार किया और उनके लिये पवित्र फल-मूल, पुष्प और जल आदि सामग्री प्रस्तुत की ॥ ३२–३७ ॥ स तैः प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः । प्रयतः प्रतिगृह्याथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥ महर्षियोंद्वारा प्रेमपूर्वक प्रस्तुत किये हुए उस आतिथ्य-सत्कारको शुद्ध हृदयसे ग्रहण करके धर्मराज युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३८ ॥ तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् । प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णया ॥ ३९ ॥ विवेश शोभया युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ । ब्राह्मणैर्वेदवेदाङ्गपारगैश्च सहस्रशः ॥ ४० ॥ उन्होंने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ इन्द्रभवनके समान मनोरम और दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण उस स्वर्ग-सदृश शोभाशाली पुण्यमय नर-नारायण आश्रममें प्रवेश किया। अनघ! उनके साथ ही वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् सहस्रों ब्राह्मण भी प्रविष्ट हुए ॥ ३९-४० ॥ तत्रापश्यत धर्मात्मा देवदेवर्षिपूजितम् । नरनारायणस्थानं भागीरथ्योपशोभितम् ॥ ४१ ॥ धर्मात्मा युधिष्ठिरने वहाँ भगवान् नर-नारायणका स्थान देखा, जो देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित तथा भागीरथी* गंगासे सुशोभित था ॥ ४१ ॥ पश्यन्तस्ते नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः । मधुस्रवफलं दिव्यं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ ४२ ॥ तदुपैत्य महात्मानस्तेऽवसन् ब्राह्मणैः सह । मुदा युक्ता महात्मानो रेमिरे तत्र ते तदा ॥ ४३ ॥

नरश्रेष्ठ पाण्डव उस स्थानका दर्शन करते हुए वहाँ सब ओर सुखपूर्वक घूमने-फिरने लगे। ब्रह्मर्षियों-द्वारा सेवित जो अपने फलोंसे मधुकी धारा बहानेवाला दिव्य वृक्ष था, उसके निकट जाकर महात्मा पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ वहाँ निवास करने लगे। उस समय वे सब महात्मा बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ।। ४२-४३ ।।

आलोकयन्तो मैनाकं नानाद्विजगणायुतम् ।
हिरण्यशिखरं चैव तच्च बिन्दुसरः शिवम् ।। ४४ ।।
तस्मिन् विहरमाणाश्च पाण्डवाः सह कृष्णया ।
मनोज्ञे काननवरे सर्वर्तुकुसुसोज्ज्वले ।। ४५ ।।
वहाँ सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके पक्षियोंसे युक्त मैनाक पर्वत था। वहीं शीतल जलसे सुशोभित बिन्दुसर नामक तालाब था। वह सब देखते हुए पाण्डव द्रौपदीके साथ उस मनोहर उत्तम वनमें विचरने लगे, जो सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित हो रहा था ।। ४४-४५ ।।

पादपैः पुष्पविकचैः फलभारावनामिभिः ।
शोभिते सर्वतो रम्यैः पुंस्कोकिलगणायुतैः ।। ४६ ।।
उस वनमें सब ओर सुरम्य वृक्ष दिखायी देते थे, जो विकसित फूलोंसे युक्त थे। उनकी शाखाएँ फलोंके बोझसे झुकी हुई थीं। कोकिल पक्षियोंसे युक्त बहुसंख्यक वृक्षोंके कारण उस वनकी बड़ी शोभा होती थी ।। ४६ ।।

स्निग्धपत्रैरविरलैः शीतच्छायैर्मनोरमैः ।
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च ।। ४७ ।।
उपर्युक्त वृक्षोंके पत्ते चिकने और सघन थे। उनकी छाया शीतल थी। वे मनको बड़े ही रमणीय लगते थे। उस वनमें कितने ही विचित्र सरोवर भी थे, जो स्वच्छ जलसे भरे हुए थे ।। ४७ ।।

कमलैः सोत्पलैश्चैव भ्राजमानानि सर्वशः ।
पश्यन्तश्चारुरूपाणि रेमिरे तत्र पाण्डवाः ।। ४८ ।।
खिले हुए उत्पल और कमल सब ओरसे उनकी शोभाका विस्तार करते थे। उन मनोहर सरोवरोंका दर्शन करते हुए पाण्डव वहाँ सानन्द विचरने लगे ।। ४८ ।।

पुण्यगन्धःसुखस्पर्शो ववौ तत्र समीरणः ।
ह्लादयन् पाण्डवान् सर्वान् द्रौपद्या सहितान् प्रभो ।। ४९ ।।
जनमेजय! गन्धमादन पर्वतपर पवित्र सुगन्धसे वासित सुखदायिनी वायु चल रही थी, जो द्रौपदीसहित पाण्डवोंको आनन्द-निमग्न किये देती थी ।। ४९ ।।

भागीरथीं सुतीर्थां च शीतां विमलपङ्कजाम् ।
मणिप्रवालप्रस्तारां पादपैरुपशोभिताम् ।। ५० ।।
दिव्यपुष्पसमाकीर्णां मनःप्रीतिविवर्धिनीम् ।

वीक्षमाणा महात्मानो विशालां बदरीमनु ।। ५१ ।।

तस्मिन् देवर्षिचरिते देशे परमदुर्गमे ।

भागीरथीपुण्यजले तर्पयांचक्रिरे तदा ।। ५२ ।।

देवानृषींश्च कौन्तेयाः परं शौचमास्थिताः ।

तत्र ते तर्पयन्तश्च जपन्तश्च कुरूद्वहाः ।। ५३ ।।

ब्राह्मणैः सहिता वीरा ह्यवसन् पुरुषर्षभाः ।

कृष्णायास्तत्र पश्यन्तः क्रीडितान्यमरप्रभाः ।

विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ।। ५४ ।।

पूर्वोक्त विशाल बदरीवृक्षके समीप उत्तम तीर्थोंसे सुशोभित शीतल जलवाली भागीरथी

गंगा बह रही थी, उसमें सुन्दर कमल खिले हुए थे। उसके घाट मणियों और मूँगोंसे आबद्ध

थे। अनेक प्रकारके वृक्ष उसके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित

हो हृदयके हर्षोल्लासकी वृद्धि कर रही थी। उसका दर्शन करके महात्मा पाण्डवोंने उस

अत्यन्त दुर्गम देवर्षिसेवित प्रदेशमें भागीरथीके पवित्र जलमें स्थित हो परम पवित्रताके

साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया। इस प्रकार प्रतिदिन तर्पण और जप

आदि करते हुए वे पुरुषश्रेष्ठ कुरुकुल-शिरोमणि वीर पाण्डव वहाँ ब्राह्मणोंके साथ रहने

लगे। देवताओंके समान कान्तिमान् नरश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ द्रौपदीकी विचित्र क्रीड़ाएँ देखते

हुए सुखपूर्वक रमण करने लगे ।। ५०-५४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे

पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें

गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४५ ।।

  • गौके समान एक प्रकारका जंगली पशु, जिसके गलकंबल नहीं होता।

  • हिमालयपर गिरनेके बाद भागीरथी गंगा अनेक धाराओंमें विभक्त होकर बहने लगीं। उनकी सीधी धारा तो

गंगोत्तरीसे देवप्रयाग होती हुई हरिद्वार आयी है और अन्य धाराएँ अन्य मार्गोंसे प्रवाहित होकर पुनः गंगामें ही मिल गयी

हैं। उन्हींकी जो धारा कैलास और बदरिकाश्रमके मार्गसे बहती आयी है, उसका नाम अलकनन्दा है। वह देवप्रयागमें

आकर सीधी धारामें मिल गयी है। इस प्रकार यद्यपि नर-नारायणका स्थान अलकनन्दाके ही तटपर है, तथापि वह मूलतः

भागीरथीसे अभिन्न ही है; इसीलिये यहाँ मूलमें 'भागीरथी' नामसे ही उसका उल्लेख किया गया है।

१४६-

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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान्‌जीसे भेंट

वैशम्पायन उवाच

तत्र ते पुरुषव्याघ्राः परमं शौचमास्थिताः ।
षड्रात्रमवसन् वीरा धनंजयदिदृक्षवः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वे पुरुषसिंह वीर पाण्डव अर्जुनके दर्शनके लिये उत्सुक हो वहाँ परम पवित्रताके साथ छः रात रहे ॥ १ ॥

अध्याय (पृष्ठ 990)

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द्रौपदीका भीमसेनको सौगन्धिक पुष्प भेंट करके वैसे ही और पुष्प लानेका आग्रह

ततः पूर्वोत्तरे वायुः प्लवमानो यदृच्छया।

सहस्रपत्रमर्काभं दिव्यं पद्ममुपाहरत् ॥ २ ॥ तदनन्तर ईशानकोणकी ओरसे अकस्मात् वायु चली। उसने सूर्यके समान तेजस्वी एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर वहाँ डाल दिया ॥ २ ॥ तदवैक्षत पाञ्चाली दिव्यगन्धं मनोरमम् । अनिलेनाहृतं भूमौ पतितं जलजं शुचि ॥ ३ ॥ तच्छुभा शुभमासाद्य सौगन्धिकमनुत्तमम् । अतीव मुदिता राजन् भीमसेनमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥ जनमेजय! वह कमल बड़ा मनोरम था, उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी। शुभलक्षणा द्रौपदीने उसे देखा और वायुके द्वारा लाकर पृथ्वीपर डाले हुए उस पवित्र, शुभ एवं परम उत्तम सौगन्धिक कमलके पास पहुँचकर अत्यन्त प्रसन्न हो भीमसेनसे इस प्रकार कहा — ॥ ३-४ ॥ पश्य दिव्यं सुरुचिरं भीम पुष्पमनुत्तमम् । गन्धसंस्थानसम्पन्नं मनसो मम नन्दनम् ॥ ५ ॥ इदं च धर्मराजाय प्रदास्यामि परंतप । हरेदं मम कामाय काम्यके पुनराश्रमे ॥ ६ ॥ ‘भीम! देखो तो, यह दिव्य पुष्प कितना अच्छा और कैसा सुन्दर है! मानो सुगन्ध ही इसका स्वरूप है। यह मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहा है। परंतप! मैं इसे धर्मराजको भेंट करूँगी। तुम मेरी इच्छाकी पूर्तिके लिये काम्यकवनके आश्रममें इसे ले चलो’ ॥ ५-६ ॥ यदि तेऽहं प्रिया पार्थ बहूनीमान्युपाहर । तान्यहं नेतुमिच्छामि काम्यकं पुनराश्रमम् ॥ ७ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! यदि मेरे ऊपर तुम्हारा (विशेष) प्रेम है, तो मेरे लिये ऐसे ही बहुत-से फूल ले आओ। मैं इन्हें काम्यक वनमें अपने आश्रमपर ले चलना चाहती हूँ’ ॥ ७ ॥ एवमुक्त्वा शुभापाङ्गी भीमसेनमनिन्दिता । जगाम पुष्पमादाय धर्मराजाय तत् तदा ॥ ८ ॥ उस समय मनोहर नेत्रप्रान्तवाली अनिन्द्य सुन्दरी (सती-साध्वी) द्रौपदी भीमसेनसे ऐसा कहकर और वह पुष्प लेकर धर्मराज युधिष्ठिरको देनेके लिये चली गयी ॥ ८ ॥ अभिप्रायं तु विज्ञाय महिष्याः पुरुषर्षभः । प्रियायाः प्रियकामः स प्रायाद् भीमो महाबलः ॥ ९ ॥ पुरुषशिरोमणि महाबली भीम अपनी प्यारी रानीके मनोभावको जानकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये ॥ ९ ॥

वातं तमेवाभिमुखो यतस्तत् पुष्पमागतम् । आजिहीर्षुर्जगामाशु स पुष्पाण्यपराण्यपि ॥ १० ॥ वे उसी तरहके और भी फूल ले आनेकी अभिलाषासे तुरंत पूर्वोक्त वायुकी ओर मुख करके उसी ईशान कोणमें आगे बढ़े, जिधरसे वह फूल आया था ॥ १० ॥

रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् । मृगराडिव संक्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ११ ॥ उन्होंने हाथमें वह अपना धनुष ले लिया जिसके पृष्ठभागमें सुवर्ण जड़ा हुआ था। साथ ही विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण भी तरकसमें रख लिये। फिर क्रोधमें भरे हुए सिंह तथा मदकी धारा बहानेवाले मतवाले गजराजकी भाँति निर्भय होकर आगे बढ़े ॥ ११ ॥

ददृशुः सर्वभूतानि महाबाणधनुर्धरम् । न ग्लानिर्न च वैक्लव्यं न भयं न च सम्भ्रमः ॥ १२ ॥ कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः । महान् धनुष-बाण लेकर जाते हुए भीमसेनको उस समय सब प्राणियोंने देखा। उन वायुपुत्र कुन्ती-कुमारको कभी ग्लानि, विकलता, भय अथवा घबराहट नहीं होती थी ॥ १२-१३ ॥

द्रौपद्याः प्रियमन्विच्छन् स बाहुबलमाश्रितः ॥ १३ ॥ व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ।

स ते द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् ॥ १४ ॥ गिरिं चचारारिहरः किन्नराचरितं शुभम् । नानावर्णधरैश्चित्रं धातुद्रुममृगाण्डजैः ॥ १५ ॥ द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने बाहुबलका भरोसा करके भय और मोहसे रहित बलवान् भीमसेन सामनेके शैल-शिखरपर चढ़ गये। वह पर्वत वृक्षों, लताओं और झाड़ियोंसे आच्छादित था। उसकी शिलाएँ नीले रंगकी थीं। वहाँ किन्नरलोग भ्रमण करते थे। शत्रुसंहारी भीमसेन उस सुन्दर पर्वतपर विचरने लगे। बहुरंगे धातुओं, वृक्षों, मृगों और पक्षियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी ॥ १३—१५ ॥ सर्वभूषणसम्पूर्णं भूमेर्भुजमिवोच्छ्रितम् । सर्वत्र रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु ॥ १६ ॥ सक्तचक्षुरभिप्रायान् हृदयेनानुचिन्तयन् । पुंस्कोकिलनिनादेषु षट्पदाचरितेषु च ॥ १७ ॥ बद्धश्रोत्रमनश्चक्षुर्जगामामितविक्रमः । वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवीके समस्त आभूषणोंसे विभूषित ऊँचे उठी हुई भुजा हो। गन्धमादनके शिखर सब ओरसे रमणीय थे। वहाँ कोयल पक्षियोंकी शब्दध्वनि हो रही थी और झुंड-के-झुंड भौंरे मँडरा रहे थे। भीमसेन उन्हींमें आँखें गड़ाये मन-ही-मन अभिलषित कार्यका चिन्तन करते जाते थे। अमितपराक्रमी भीमके कान, नेत्र और मन उन्हीं शिखरोंमें अटके रहे अर्थात् उनके कान वहाँके विचित्र शब्दोंको सुननेमें लग गये; आँखें वहाँके अद्भुत दृश्योंको निहारने लगीं और मन वहाँकी अलौकिक विशेषताके विषयमें सोचने लगा और वे अपने गन्तव्य स्थानकी ओर अग्रसर होते चले गये ॥ १६-१७ १ ३ ॥ आजिघ्रन् स महातेजाः सर्वर्तुकुसुमोद्भवम् ॥ १८ ॥ गन्धमुद्धतमुद्दामो वने मत्त इव द्विपः । वीज्यमानः सुपुण्येन नानाकुसुमगन्धिना ॥ १९ ॥ पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवायुना । ह्रियमाणश्रमः पित्रा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २० ॥ वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार सभी ऋतुओंके फूलोंके उत्कट सुगन्धका आस्वादन करते हुए वनमें उद्दामगतिसे विचरनेवाले मदोन्मत्त गजराजकी भाँति चले जा रहे थे। नाना प्रकारके कुसुमोंसे सुवासित गन्धमादनकी परम पवित्र वायु उन्हें पंखा झल रही थी। जैसे पिताको पुत्रका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है, वैसा ही सुख भीमसेनको उस पर्वतीय वायुके स्पर्शसे मिल रहा था। उनके पिता पवनदेव उनकी सारी थकावट हर लेते थे। उस समय हर्षातिरेकसे भीमके शरीरमें रोमांच हो रहा था ॥ १८—२० ॥ स यक्षगन्धर्वसुरब्रह्मर्षिगणसेवितम् ।

विलोकयामास तदा पुष्पहेतोररिंदमः ॥ २१ ॥

शत्रुदमन भीमसेनने उस समय (पूर्वोक्त पुष्पकी प्राप्तिके लिये एक बार) यक्ष, गन्धर्व,

देवता और ब्रह्मर्षियोंसे सेवित उस विशाल पर्वतपर (सब ओर) दृष्टिपात किया ।। २१ ।।

विषमच्छदैरचितैरनुलिप्त इवाङ्गुलैः ।

वलिभिर्धातुविच्छेदैः काञ्चनाञ्जनराजतैः ।

सपक्षमिव नृत्यन्तं पार्श्वलग्नेः पयोधरैः ॥ २२ ॥

उस समय अनेक धातुओंसे रँगे हुए सप्तपर्ण (छितवन) के पत्तोंद्वारा उनके ललाटमें

विभिन्न धातुओंके काले, पीले और सफेद रंग लग गये थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था

मानो अँगुलियोंद्वारा त्रिपुण्ड्र चन्दन लगाया गया हो। उस पर्वत-शिखरके उभय पार्श्वमें लगे

हुए मेघोंसे उसकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो वह पुनः पंखधारी होकर नृत्य कर रहा

है ।। २२ ।।

मुक्ताहारैरिव चितं च्युतैः प्रस्रवणोदकैः ।

अभिरामदरीकुञ्जनिर्झरोदककन्दरम् ॥ २३ ॥

निरन्तर झरनेवाले झरनोंके जल उस पहाड़के कण्ठदेशमें अवलम्बित मोतियोंके हार-

से प्रतीत हो रहे थे। उस पर्वतकी गुफा, कुंज, निर्झर, सलिल और कन्दराएँ सभी मनोहर

थे ।। २३ ।।

अप्सरोनूपुररवैः प्रनृत्तवरबर्हिणम् ।

दिग्वारणविषाणाग्रैर्घृष्टोपलशिलातलम् ॥ २४ ॥

वहाँ अप्सराओंके नूपुरोंकी मधुर ध्वनिके साथ सुन्दर मोर नाच रहे थे। उस पर्वतके

एक-एक रत्न और शिलाखण्डपर दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़‌का चिह्न अंकित था ।। २४ ।।

स्रस्तांशुकमिवाक्षोभ्यैर्निम्नगा निःसृतैर्जलैः ।

सशष्पकवलैः स्वस्थैरदूरपरिवर्तिभिः ॥ २५ ॥

भयानभिज्ञैर्हरिणैः कौतूहलनिरीक्षितः ।

चालयन्नुरुवेगेन लताजालान्यनेकशः ॥ २६ ॥

आक्रीडमानो हृष्टात्मा श्रीमान् वायुसुतो ययौ ।

प्रियामनोरथं कर्तुमुद्यतश्चारुलोचनः ॥ २७ ॥

निम्नगामिनी नदियोंसे निकला हुआ क्षोभरहित जल नीचेकी ओर इस प्रकार बह रहा

था, मानो उस पर्वतका वस्त्र खिसककर गिरा जाता हो। भयसे अपरिचित और स्वस्थ

हरिण मुँहमें हरे घासका कौर लिये पास ही खड़े होकर भीमसेनकी ओर कौतूहलभरी

दृष्टिसे देख रहे थे। उस समय मनोहर नेत्रोंवाले शोभाशाली वायुपुत्र भीम अपने महान् वेगसे

अनेक लतासमूहोंको विचलित करते हुए हर्षपूर्ण हृदयसे खेल-सा करते जा रहे थे। वे

अपनी प्रिया द्रौपदीका प्रिय मनोरथ पूर्ण करनेको सर्वथा उद्यत थे ।। २५-२७ ।।

प्रांशुः कनकवर्णाभः सिंहसंहननो युवा ।