भारतकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
४४८* मत्स्यपुराण *
एष तारामयः स्तम्भो नास्तमेति न वोदयम्।<br>नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह ॥ २५<br>तन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूता दिवि स्थिताः।<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम् ॥ २६<br>परियान्ति सुरश्रेष्ठं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि।<br>आग्नीध्रकाश्यपानां तु तेषां स परमो ध्रुवः ॥ २७<br>एक एव भ्रमत्येष मेरोरन्तरमूर्धनि।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय आकर्षंस्तमधोमुखः ॥ २८<br>मेरुमालोकयन्नेव प्रतियाति प्रदक्षिणम् ॥ २९ताराओं‌द्वारा निर्मित यह स्तम्भ नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और तारागणोंके साथ न अस्त होता है न उदय, अपितु ये सभी आकाशमें चक्रकी तरह उसके मुखकी ओर देखते हुए स्थित हैं। ये ध्रुवसे अधिकृत होकर आकाशस्थित मेढ़ीभूत सुरश्रेष्ठ ध्रुवकी ही प्रदक्षिणा करते हैं। उन आग्नीध्र तथा कश्यपके वंशमें ध्रुव ही सर्वश्रेष्ठ हैं। ये ध्रुव अकेले ही मेरुके अन्तर्वर्ती शिखरपर ज्योतिष्चक्रको साथ लेकर उसे खींचते हुए भ्रमण करते हैं। उस समय उनका मुख नीचेकी ओर रहता है। इस प्रकार वे मेरुको प्रकाशित करते हुए उसकी प्रदक्षिणा करते हैं ॥ २०—२९ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ध्रुवप्रशंसा नाम सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें ध्रुव-प्रशंसा नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२७ ॥


एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय

देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन

ऋषय ऊचुः <br><br> यदेतद् भवता प्रोक्तं श्रुतं सर्वमशेषतः।<br>कथं देवगृहाणि स्युः कथं ज्योतींषि वर्णय ॥ १<br><br>सूत उवाच<br><br>एतत् सर्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>यथा देवगृहाणि स्युः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ॥ २<br>अग्रेर्वृष्टौ रजन्यां वै ब्रह्मणाव्यक्तयोनिना।<br>अव्याकृतमिदं त्वासीन्नैशेन तमसाऽऽवृतम् ॥ ३<br>चतुर्भूतावशिष्टेऽस्मिन् ब्रह्मणा समधिष्ठिते।<br>स्वयम्भूर्भगवान्वांस्तत्र लोकतत्त्वार्थसाधकः ॥ ४<br>खद्योतरूपी विचरन्नाविर्भावं व्यचिन्तयत्।<br>ज्ञात्वाग्निं कल्पकालादावपः पृथ्वीं च संश्रिताः ॥ ५<br>स सम्भृत्य प्रकाशार्थं त्रिधा तुल्योऽभवत् पुनः।<br>पाचको यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवः सोऽग्निरुच्यते ॥ ६ऋषियोंने पूछा— सूतजी! आपने जो यह सारा विषय पूर्णरूपसे वर्णन किया है, उसे तो हमलोगोंंने सुना, परंतु देव-गृह कैसे होते हैं? (यह जाननेकी विशेष उत्कण्ठा हो रही है।) अतः आप पुनः (पूर्वकथित) ज्योतिष्चक्रका कुछ और विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥<br><br>सूतजी कहते हैं— ऋषियो! अब मैं जिस प्रकार देव-गृह एवं सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके गृह होते हैं तथा जैसी सूर्य और चन्द्रमाकी गति होती है, वह सब बतला रहा हूँ। (ब्रह्माकी) रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल अव्यक्तयोनि ब्रह्माने देखा कि जगत्‌की कोई वस्तु दीख नहीं रही है। सारा जगत् रात्रिके अन्धकारसे आच्छन्न है। (कहीं प्रकाशका चिह्नमात्र भी अवशेष नहीं है।) ब्रह्माद्वारा अधिष्ठित इस जगत्‌में केवल चार पदार्थ अवशिष्ट थे, तब लोकोंके तत्त्वार्थको सिद्ध करनेवाले स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा खद्योत (जुगनू)-के रूपमें विचरण करते हुए प्रकाशको आविर्भूत करनेके लिये विचार करने लगे। (उस समय उन्हें स्मरण हुआ कि) कल्पकालके आदिमें अग्नि-तत्त्व जल और पृथ्वीमें सम्मिलित हो गया था। यह जानकर उन्होंने तीनोंको एकत्र कर प्रकाश करनेके लिये तीन भागोंमें विभक्त कर दिया। इस प्रकार इस लोकमें जो पाचक नामक अग्नि है,
* अध्याय १२८ *४४९

| यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निश्च स स्मृतः।<br>वैद्युतो जाठरः सौम्यो वैद्युतश्चाप्यनिन्धनः॥ ७<br>तेजोभिश्चाप्यते कश्चित् कश्चिदेवाप्यनिन्धनः।<br>काष्ठेन्धनस्तु निर्मथ्यः सोऽद्भिः शाम्यति पावकः॥ ८<br>अर्चिष्मान्पचनोऽग्निस्तु निष्प्रभः सौम्यलक्षणः।<br>यश्चासौ मण्डले शुक्ले निरूष्मा न प्रकाशते॥ ९<br>प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे।<br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्मादग्निः प्रकाशते॥ १० | उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं। जो अग्नि सूर्यमें स्थित होकर ताप पैदा करती है, वह शुचि अग्नि कहलाती है। उदरमें स्थित अग्नि विद्युत्से उत्पन्न हुई मानी जाती है। उसे सौम्य कहते हैं। इस वैद्युताग्निका इन्धन जल है। कोई अग्नि अपने तेजसे ही बढ़ती है और कोई बिना इन्धनके भी उद्दीप्त होती है। काष्ठरूपी इन्धनसे जलनेवाली अग्निका नाम निर्मन्थ्य है। यह अग्नि जलके संयोगसे शान्त हो जाती है। पचमान अग्नि ज्वालाओंसे संयुक्त रहता है और प्रभाहीन रहना सौम्य अग्निका लक्षण है। जो श्वेत मण्डलमें स्थित रहकर ऊष्मारहित हो प्रकाशित नहीं होती, सूर्यकी वह कान्ति सूर्यके अस्त हो जानेपर अपने चतुर्थांशसे अग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसी कारण रातमें अग्निका प्रकाश अधिक होता है॥ २-१०॥ | | उदिते तु पुनः सूर्ये ऊष्माग्नेस्तु समाविशत्।<br>पादेन तेजसश्चाग्नेस्तस्मात् संतपते दिवा॥ ११<br>प्राकाश्यं च तथौष्ण्यं च सौर्याग्नेये तु तेजसी।<br>परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥ १२<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यस्मिंस्तु दक्षिणे।<br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्ये रात्रिराविशते ह्यपः॥ १३<br>तस्मात् ताम्रा भवन्त्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात्।<br>अस्तं गते पुनः सूर्ये अहो वै प्रविशत्यपः॥ १४<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला ह्यापो दृश्यन्ति भासुराः।<br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे॥ १५<br>उदयास्तमये चात्र ह्यहोरात्रं विशत्यपः।<br>यश्चासौ तपते सूर्यः सोऽपः पिबति रश्मिभिः॥ १६<br>सहस्त्रपादस्त्वेषोऽग्नी रक्तकुम्भनिभस्तु सः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्त्रेण समन्ततः॥ १७<br>अपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च।<br>तस्य रश्मिसहस्त्रेण शीतवर्षोष्णनिःस्रवः॥ १८ | पुनः सूर्योदय होनेपर अग्निकी ऊष्मा अपने तेजके चतुर्थांशसे सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है, इस कारण दिनमें सूर्य पूर्णरूपसे तपते हैं। प्रकाशता, उष्णता, सूर्य और अग्निका तेज—इन सबके परस्पर अनुप्रवेश करनेके कारण दिन-रातकी पूर्ति होती है। पृथ्वीके उत्तरवर्ती तथा दक्षिणवर्ती अर्धभागमें सूर्यके उदय होनेपर रात्रि पुनः जलमें प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार दिनके समय रात्रिके जलमें प्रवेश करनेके कारण दिनमें जल लाल रंगका दीख पड़ता है। पुनः सूर्यके अस्त हो जानेपर दिन जलमें प्रवेश करता है। इसी कारण जल रातमें उज्ज्वल और चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमसे भूमिके दक्षिणोत्तर अर्धभागमें सूर्यके उदय एवं अस्तके समय दिन और रात क्रमशः जलमें प्रवेश करते हैं। जो ये सूर्य तप रहे हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जलको सोखते हैं। सूर्यमें स्थित अग्निका रंग लाल रंगके घड़ेके समान है। उसमें हजारों किरणें हैं। वह अपनी सहस्रों नाड़ियोंसे नदी, समुद्र, ह्रद और कुएँसे जलको ग्रहण करता है। सूर्यकी उन्हीं हजारों किरणोंसे शीत, वर्षा और गरमीका प्रादुर्भाव होता है॥ ११-१८॥ | | तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः। | उन सहस्रों किरणोंमें विचित्र आकृतिवाली चार सौ नाड़ियाँ जलकी वर्षा करनेवाली हैं। उनमें |


* प्रकारान्तरसे इन अग्नियोंका बहुत कुछ उल्लेख अ० ५१ में भी हो चुका है। यहाँ १२६-२८तकके तीन अध्यायोंमें ग्रहोंके स्वरूप तथा उनके रथ, आयुध आदिका परिचय बहुत सुन्दर रूपमें कराया गया है। पहले ९४वें अध्यायमें भी इन ग्रहोंका स्वरूपनिरूपण हुआ है।

१३०- दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना

४५० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चन्दनाश्चैव मेध्याश्च केतनाश्चेतनास्तथा ॥ १९<br>अमृता जीवनाः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः ।<br>हिमोद्भवाश्च ताभ्योऽन्या रश्मयस्त्रिंशतः स्मृताः ।<br>चन्द्रताराग्रहैः सर्वैः पीता भानोर्गभस्तयः ॥ २०<br>एता मध्यास्तथान्याश्च ह्रादिन्यो हिमसर्जनाः ।<br>शुक्लाश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतश्च याः ॥ २१<br>शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिंशत्या घर्मसर्जनाः ।<br>सम्बिभ्रति हि ताः सर्वा मनुष्यान् देवताः पितॄन् ॥ २२<br>मनुष्यानौषधीभिश्च स्वधया च पितॄनपि ।<br>अमृतेन सुरान् सर्वान् सततं परितर्पयन् ॥ २३<br>वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शनैः संतपते त्रिभिः ।<br>वर्षासु च शरद्येवं चतुर्भिः सम्प्रवर्षति ॥ २४<br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गस्त्रिभिः पुनः ।<br>औषधीषु बलं धत्ते सुधां च स्वधया पुनः ॥ २५<br>सूर्योऽमरत्वममृते त्रयस्त्रिषु नियच्छति ।<br>एवं रश्मिसहस्रं तु सौरं लोकर्थिसार्थकम् ॥ २६<br>भिद्यते ऋतुमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम् ।<br>इत्येवं मण्डलं शुक्लं भास्वरं लोकसंज्ञितम् ॥ २७<br>नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठा योनिरैव च ।<br>ऋक्षचन्द्रग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ॥ २८चन्दना, मेध्या, केतना, चेतना, अमृता और जीवना—ये सभी किरणें विशेषरूपसे वृष्टि करनेवाली हैं। सूर्यकी तीन सौ किरणें हिमसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं। उन्हें चन्द्रमा, तारा और सभी ग्रह पीते रहते हैं। ये मध्य नाड़ियाँ कहलाती हैं। इनके अतिरिक्त अन्य ह्रादिनी आदि नाड़ियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। शुक्ला, ककुभ, गौ और विश्वभृत् नामकी जो नाड़ियाँ हैं, वे सभी शुक्ला नामसे कही जाती हैं। इनकी भी संख्या तीन सौ हैं। ये धूपको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सभी मनुष्यों, देवताओं और पितरोंका भरण-पोषण करती हैं। ये किरणें ओषधियों (एवं अन्नों) द्वारा सभी मनुष्योंको, स्वधाद्वारा पितरोंको और अमृतके माध्यमसे देवताओंको सदा तृप्त करती रहती हैं। सूर्य वसन्त और ग्रीष्म-ऋतुमें शनैः-शनैः अपनी तीन सौ किरणोंसे ताप उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार वर्षा और शरद्-ऋतुमें चार सौ किरणोंके माध्यमसे वर्षा करते हैं। पुनः हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें तीन सौ किरणोंद्वारा बर्फ गिराते हैं। यही सूर्य ओषधियोंमें बल, स्वधामें सुधा और अमृतमें अमरत्वका आधान करते हैं अर्थात् तीनों पदार्थोंमें तीन तरहके गुण उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार सूर्यकी ये हजारों किरणें लोगोंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हैं। ऋतुओंके क्रमानुसार जलकी शीतलता और उष्णतामें परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार उदीप्त एवं श्वेत वर्णवाला वह लोकसंज्ञक मण्डल नक्षत्र, ग्रह और सोमकी प्रतिष्ठा एवं योनि है। इन सभी चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंको सूर्यसे उत्पन्न हुआ जानना चाहिये॥ १९—२८॥
सुषुम्ना सूर्यरश्मिर्या क्षीणं शशिनमेधते ।<br>हरिकेशः पुरस्तात्तु यो वै नक्षत्रयोनिकृत् ॥ २९<br>दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम् ।<br>विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः ॥ ३०<br>संवर्धनस्तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य च ।<br>षष्ठस्तु ह्याश्वभू रश्मिर्योनिः सा हि बृहस्पतेः ॥ ३१<br>शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते सुराट् ।<br>न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता ॥ ३२<br>क्षेत्राण्येतानि वै सूर्यमापतन्ति गभस्तिभिः ।<br>क्षेत्राणि तेषामादत्ते सूर्यो नक्षत्रता ततः ॥ ३३सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह क्षीण हुए चन्द्रमाको पुनः बढ़ाती है। पूर्वदिशामें जो हरिकेश नामकी किरण है, वह नक्षत्रोंकी जननी है। दक्षिण दिशामें स्थित विश्वकर्मा नामकी किरण बुधको तृप्त करती है। पश्चिम दिशामें जो विश्वावसु नामक किरण है, उसे शुक्रकी योनि (उत्पत्तिस्थान) कहा जाता है। जो संवर्धन किरण है, वह लोहित (मंगल)-की योनि है। छठी किरणको अश्वभू कहते हैं, वह बृहस्पतिकी योनि है। पुनः सुराट् नामक किरण शनैश्चरकी वृद्धि करती है। चूँकि ये (चन्द्र, नक्षत्र और ग्रह) कभी नष्ट नहीं होते, इसीलिये इनकी नक्षत्रता मानी गयी है। उपर्युक्त नक्षत्रोंके क्षेत्र सूर्यपर आकर गिरते हैं और सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उन क्षेत्रोंको ग्रहण करते हैं, इसीसे उनकी नक्षत्रता सिद्ध होती
* अध्याय १२८ *४५१

| अस्माल्लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतात्मनाम्।<br>तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव शुक्लिकाः॥ ३४<br><br>दिव्यानां पार्थिवानां च वंशानां चैव सर्वशः।<br>तपनस्तेजसो योगादादित्य इति गद्यते॥ ३५<br><br>सुवतिः स्पन्दनार्थे च धातुरेष निगद्यते।<br>सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता स्मृतः॥ ३६<br><br>बह्वर्थश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।<br>शुक्लत्वे ह्यमृतत्वे च शीतत्वेऽपि विमान्यते॥ ३७ | है। इस लोकसे परलोकमें जानेवाले पुण्यात्माओंका उद्धार करनेके कारण ये किरणें तारका नामसे प्रसिद्ध हैं तथा शुक्ल-वर्णकी होनेके कारण शुक्ला भी कही जाती हैं। दिव्य (स्वर्गीय) एवं पार्थिव (भौमिक) सभी प्रकारके वंशोंके तेजके संयोगसे सम्पन्न होनेके कारण सूर्यको 'तपन' कहा जाता है। 'सवति (सूते) अर्थात् 'सु' धातु 'उत्पत्ति अथवा चेतनाभाव' के अर्थमें प्रयुक्त होती है। * इसलिये (भूमि-) जल-तेजके उत्पादक होनेके कारण सूर्य सविता कहलाते हैं। इसी प्रकार 'चदि आह्लादने' यह बह्वर्थक धातु आह्लादित करनेके अर्थमें भी प्रयुक्त होती है। इसका शुक्लत्व, अमृतत्व और शीतत्व आदि अन्य अनेकों अर्थोंमें प्रयोग किया जाता है। (इसी धातुसे चन्द्र या चन्द्रमा शब्द निष्पन्न हुआ है।)॥ २९-३७॥ | | सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।<br>जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ३८<br>वसन्ति कर्मदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वशः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋषिसूर्यग्रहादयः॥ ३९<br>तानि देवगृहाणि स्युः स्थानाख्यानि भवन्ति हि।<br>सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥ ४०<br>शौक्रं शुक्लोऽविशत्स्थानं षोडशारं प्रभास्वरम्।<br>बृहस्पतिर्बृहत्त्वं च लोहितं चापि लोहितः॥ ४१<br>शनैश्चरोऽविशत् स्थानमेवं शानैश्वरं तथा।<br>बुधोऽपि वै बुधस्थानं भानुं स्वर्भानुरेव च॥ ४२<br>नक्षत्राणि च सर्वाणि नाक्षत्राण्याविशन्ति च।<br>ज्योतींषि सुकृतामेते ज्ञेया देवगृहास्तु वै॥ ४३<br>स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै॥ ४४<br>अभिमाने न तिष्ठन्ति तानि देवाः पुनः पुनः।<br>अतीतास्तु सहातीतैर्भाव्या भव्यैः सुरैः सह॥ ४५<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च सुरैः सार्धं तु स्थानिनः। | सूर्य और चन्द्रमाके दिव्य मण्डल गगनतलमें उद्भासित होते हैं। वे सुन्दर श्वेत रंगवाले, जल और तेजसे सम्पन्न एवं कुम्भ-सदृश गोलाकार हैं। उनमें सभी मन्वन्तरोंके ऋषि एवं सूर्यादि ग्रह कर्मदेवताके रूपसे निवास करते हैं। ये ही उनके स्थान हैं, इसीसे उन्हें देव-गृह कहा जाता है। वे देव-गृह उन्हीं देवोंके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। सूर्य सौर नामक स्थानमें तथा चन्द्रमा सौम्य स्थानमें प्रवेश करते हैं। शुक्र शौक्र स्थानमें प्रवेश करते हैं, जो सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त कान्तिमान् है। इसी प्रकार बृहस्पति बृहत्त्व स्थानमें, मंगल लोहित स्थानमें, शनैश्चर शानैश्वर स्थानमें, बुध बुधस्थानमें और राहु भानुस्थानमें प्रवेश करते हैं। सभी नक्षत्र नाक्षत्र स्थानमें प्रवेश करते हैं। इस प्रकार इन सभी ज्योतियोंको उन पुण्यात्माओंके देव-गृह जानने चाहिये। ये सभी स्थान प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। सभी मन्वन्तरोंमें वे ही देवस्थान होते हैं। सभी देवता पुनः-पुनः उन्हीं अपने-अपने स्थानोंमें निवास करते हैं। अतीतकालीन स्थानीय देवता अतीतोंके साथ, भविष्यत्कालीन स्थानीय देवता भावी देवताओंके साथ और वर्तमानकालीन स्थानीय देवता वर्तमान देवताओंके साथ वर्तमान रहते हैं॥ ३८-४५ ½॥ | | सूर्यो देवो विवस्वांश्च अष्टमस्त्वदितेः सुतः॥ ४६<br><br>द्युतिमान् धर्मयुक्तश्च सोमो देवो वसुः स्मृतः।<br>शुक्रो दैत्यस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ ४७ | अदितिके आठवें पुत्र विवस्वान् सूर्य देवता माने गये हैं। प्रभाशाली एवं धर्मात्मा चन्द्रदेव वसु कहे गये हैं। भृगुनन्दन शुक्रको, जो असुरोंके पुरोहित हैं, कर्मानुसार दैत्य समझना चाहिये। |


* निरुक्त, अमरटीका, धातुवृत्ति, उणादिकोश आदिके अनुसार भी 'षूङ् प्राणि-प्रसवे' धातुसे 'सविता' शब्द बनता है, जिसका अर्थ है-जगत्को उत्पन्न करनेवाला।

१३१- त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार

४५२ * मत्स्यपुराण *

| बृहस्पतिर्बृहत्तेजा देवाचार्योऽङ्गिरःसुतः।<br>बुधो मनोहरश्चैव शशिपुत्रस्तु स स्मृतः॥ ४८<br>शनैश्चरो विरूपश्च संज्ञापुत्रो विवस्वतः।<br>अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहिताधिपः॥ ४९<br>नक्षत्रनाम्यः क्षेत्रेषु दाक्षायण्याः सुताः स्मृताः।<br>स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसंतापनोऽसुरः॥ ५०<br>चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रेष्वभिमानी प्रकीर्तितः।<br>स्थानान्येतानि चोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥ ५१<br>शुक्लमग्निसमं दिव्यं सहस्रांशोर्विवस्वतः।<br>सहस्रांशुत्विषः स्थानमम्मयं तैजसं तथा॥ ५२<br>आप्यस्थानं मनोज्ञस्य रविरश्मिगृहे स्थितम्।<br>शुक्रः षोडशरश्मिस्तु यस्तु देवो ह्यपोमयः॥ ५३<br>लोहितो नवरश्मिस्तु स्थानमाप्यं तु तस्य वै।<br>बृहद्द्वादशरश्मीकं हरिद्राभं तु वेधसः॥ ५४<br>अष्टरश्मिः शनेस्तत्तु कृष्णं वृद्धमयस्मयम्।<br>स्वर्भानोस्तत्त्वायसं स्थानं भूतसंतापनालयम्॥ ५५<br>सुकृतामाश्रयास्तारा रश्मयस्तु हिरण्मयाः।<br>तारणात्तारकाः प्रोक्ताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥ ५६<br>नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>मण्डलं त्रिगुणं चास्य विस्तारो भास्करस्य तु॥ ५७<br>द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>त्रिगुणं मण्डलं चास्य वैपुल्याच्छशिनः स्मृतम्॥ ५८<br>सर्वोपरि निसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः।<br>योजनार्धप्रमाणानि ताभ्योऽन्यानि गणानि तु॥ ५९<br>तुल्यो भूत्वा तु स्वर्भानुस्तदधस्तात् प्रसर्पति।<br>उद्धृत्य पार्थिवीं छायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्॥ ६०<br>ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तृतीयं तु तमोमयम्।<br>आदित्यात् स तु निष्क्रम्य सोमं गच्छति पर्वसु॥ ६१<br>आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु।<br>स्वभासा तुदते यस्मात्स्वर्भानुरिति स स्मृतः॥ ६२ | महर्षि अङ्गिराके पुत्र परम तेजस्वी बृहस्पति देवोंके आचार्य हैं। मनोहर रूपवाले बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं। शनैश्चर कुरूप कहे गये हैं। ये सूर्यके संयोगसे उत्पन्न हुए संज्ञाके पुत्र हैं। लाल रंगके अधिपति मंगल नवयुवक (माने गये) हैं। स्वयं अग्निदेव ही रूपमें विकेशी (भूमि) के* गर्भसे उत्पन्न हुए थे। नक्षत्र नामवाली सत्ताईस नक्षत्राभिमानी देवियाँ दाक्षायणीकी कन्या मानी गयी हैं। राहु सिंहिकाका पुत्र है। यह सभी प्राणियोंको कष्ट देनेवाला राक्षस है। इस प्रकार सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन किया गया। साथ ही उनके स्थान तथा स्थानी देवता भी बतलाये गये। सहस्र किरणधारी सूर्यका स्थान दिव्य, श्वेत वर्णवाला तथा अग्निके समान तेजस्वी है। चन्द्रमाका स्थान तैजस एवं जलमय है। बुधका स्थान जलमय है और वह सूर्यकी किरणरूपी गृहमें स्थित है। शुक्रदेवका स्थान सोलह किरणोंसे युक्त एवं जलमय है। मंगल नौ किरणोंसे युक्त हैं, उनका स्थान जलमय है। बृहस्पतिका स्थान बारह किरणोंसे युक्त है और उसकी कान्ति हल्दीके समान पीली है। शनैश्चरका स्थान आठ किरणोंसे युक्त, प्राचीन, लौहमय एवं काले रंगका है। राहुका स्थान लोहेका बना है, वह प्राणियोंको कष्ट देनेवाला है। ताराएँ सुकृतीजनोंका आश्रय स्थान हैं। इनकी किरणें स्वर्णमयी हैं। जीवोंका निस्तार करनेके कारण ये तारका कहलाती हैं और शुक्लवर्ण होनेके कारण इनका शुक्ला भी नाम है॥ ४६–५६॥<br><br>सूर्यके व्यासका विस्तार नौ हजार योजन है और इनका सम्पूर्ण मण्डल इस (व्यास) से तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बतलाया जाता है। चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल विपुलतामें सूर्य-मण्डलसे तिगुना है। सबके ऊपर तारकाओंके मण्डल हैं। उनका विस्तार आधे योजनका बतलाया जाता है। उनसे नीचे अन्य गणोंके स्थान हैं। राहु उनकी तुलनामें समान होते हुए भी उनके नीचेसे भ्रमण करता है। ब्रह्माद्वारा निर्मित वह तीसरा स्थान तमोमय है। उसे पृथिवीकी छायाको ऊपर उठाकर मण्डलाकार बनाया गया है। राहु पूर्णिमा आदि पर्वोंमें सूर्यमण्डलसे निकलकर चन्द्रमण्डलमें चला जाता है और सूर्य-सम्बन्धी अमावास्या आदि पर्वोंमें पुनः चन्द्रमण्डलसे निकलकर सूर्यमण्डलमें चला आता है। वह अपनी कान्तिसे प्राणियोंको कष्ट पहुँचाता है, इसीलिये उसे स्वर्भानु कहते हैं। |


* सभी पुराणों तथा मूर्त्यष्टक शिवव्याख्यानोंमें विकेशीको भूमि कहा गया है। उनके पुत्र होनेसे ही मङ्गलको भौम कहा जाता है।

* अध्याय १२८ *४५३
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनानां तु स स्मृतः॥ ६३<br>भार्गवात्पादहीनश्च विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौरौवुभौ स्मृतौ॥ ६४<br>विस्तारमण्डलाभ्यां तु पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ ६५<br>बुधेन समरूपाणि विस्तारान्मण्डलात्तु वै।<br>तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ६६व्यास और बाह्यवृत्त—दोनोंके योजन-परिमाणमें शुक्रका परिमाण चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर बतलाया जाता है। बृहस्पतिका परिमाण शुक्रके परिमाणसे एक चतुर्थांश कम जानना चाहिये। शनि और मंगल—ये दोनों प्रमाणमें बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम बतलाये गये हैं। बुध इन दोनों ग्रहोंसे विस्तार और मण्डलमें चौथाई कम हैं। आकाशमण्डलमें तारा, नक्षत्र आदि जितने शरीरधारी हैं, वे सभी विस्तार और मण्डलके हिसाबसे बुधके समकक्ष हैं। तारा और नक्षत्र परस्पर एक-दूसरेसे कम हैं॥५७—६६॥
शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव च।<br>सर्वोपरि विसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः॥ ६७<br>योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।<br>उपरिष्टात्तु ये तेषां ग्रहा ये क्रूरसात्त्विकाः॥ ६८<br>सौरश्चाङ्गिरसो वक्रो विज्ञेया मन्दचारिणः।<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनश्चान्ये महाग्रहाः॥ ६९<br>सोमः सूर्यो बुधश्चैव भार्गवश्चेति शीघ्रगाः।<br>यावन्ति चैव ऋक्षाणि कोट्यस्तावन्ति तारकाः॥ ७०<br>सर्वेषां तु ग्रहाणां वै सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति।<br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी॥ ७१<br>नक्षत्रमण्डलं चापि सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति।<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधाच्चोर्ध्वं तु भार्गवः॥ ७२<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः।<br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं देवाचार्योपरि स्थितः॥ ७३<br>शनैश्चरात्तथा चोर्ध्वं ज्ञेयं सप्तर्षिमण्डलम्।<br>सप्तर्षिभ्यो ध्रुवश्चोर्ध्वं समस्तं त्रिदिवं ध्रुवे॥ ७४<br>द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च।<br>ग्रहान्तरमथैकैकमूर्ध्वं नक्षत्रमण्डलात्॥ ७५<br>ताराग्रहान्तराणि स्युरुपर्युपर्यधिष्ठितम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च दिवि दिव्येन तेजसा॥ ७६<br>नक्षत्रेषु च युज्यन्ते गच्छन्तो नियतक्रमात्।इस प्रकार उन सभी ज्योतिर्गणोंका मण्डल पाँच, चार, तीन, दो अथवा एक योजनमें विस्तृत है। तारकाओंके मण्डल सबसे ऊपर हैं। उनका प्रमाण आधा योजन है। इनसे कम विस्तारवाला अन्य कोई नहीं है। इनके ऊपर जो क्रूर और सात्त्विक ग्रह स्थित हैं, उन्हें शनैश्चर, बृहस्पति और मंगल समझना चाहिये। ये सभी मन्द गतिवाले हैं। इनके नीचे चन्द्र, सूर्य, बुध और शुक्र—ये चार अन्य महान् ग्रह विचरण करते हैं। ये सभी शीघ्रगामी हैं। जितने नक्षत्र हैं, उतने ही करोड़ तारकाएँ हैं। सूर्य सभी ग्रहोंके निचले भागमें गमन करते हैं। सूर्यके उपरी भागमें चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके चलते हैं। नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। इसी प्रकार नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति और देवाचार्य बृहस्पतिके ऊपर शनैश्चर स्थित हैं। शनैश्चरसे ऊपर सप्तर्षि-मण्डलको जानना चाहिये। सप्तर्षियोंसे ऊपर ध्रुव हैं और ध्रुवसे ऊपर सारा आकाशमण्डल है। नक्षत्रमण्डलसे ऊपर प्रत्येक ग्रह दो लाख योजनोंके अन्तरपर स्थित है। ताराओं और ग्रहोंके अन्तर परस्पर एक-दूसरेके ऊपर स्थित हैं। आकाशमण्डलमें सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगण दिव्य तेजसे युक्त हो निश्चित क्रमानुसार चलते हुए नक्षत्रोंसे मिलते हैं॥ ६७—७६ १/२ ॥
चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रा नीचोच्चगृहमाश्रिताः॥ ७७<br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>परस्परं स्थिता ह्येवं युज्यन्ते च परस्परम्॥ ७८चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र अपने-अपने नीचे-ऊँचे गृहोंमें स्थित होते हैं। इसी क्रमसे इनका समागम और वियोग भी होता है। उस अवसरपर सभी प्राणी इन्हें एक साथ देखते हैं। इस प्रकार स्थित रहकर ये

४५४ * मत्स्यपुराण *

| असंकरेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः।<br>इत्येवं संनिवेशो वै पृथिव्या ज्योतिषां च यः॥ ७९<br>द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां तथैव च।<br>वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै॥ ८०<br>इत्येषोऽर्कवशेनैव संनिवेशस्तु ज्योतिषाम्।<br>आवर्तः सान्तरो मध्ये संक्षिप्तश्च ध्रुवात्तु सः॥ ८१<br>सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इवोच्छ्रितः।<br>लोकसंव्यवहारार्थमीश्वरेण विनिर्मितः॥ ८२<br>कल्पादौ बुद्धिपूर्वं तु स्थापितोऽसौ स्वयम्भुवा।<br>इत्येष संनिवेशो वै सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥ ८३<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिणामोऽस्य यः स्मृतः।<br>तेषां शक्यं न संख्यातुं याथातथ्येन केनचित्।<br>गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा॥ ८४ | परस्पर संयुक्त होते हैं। विद्वान्लोग इनके इस सम्बन्धको अमिश्रित ही मानते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, ज्योतिर्गणों, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष, नदी तथा उनमें निवास करनेवाले प्राणियोंकी स्थिति है। ज्योतिर्गणोंका यह स्थितिक्रम सूर्यके कारण ही है। (मण्डलाकार घूमते समय) उन गणोंके मध्यमें आवर्त-सा दीख पड़ता है। वह बीचमें ध्रुवके आ जानेसे संक्षिप्त हो जाता है। वह चारों ओर ऊँचाईपर गोलाकार फैला रहता है। परमेश्वरने लोकोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये उसे बनाया है। ब्रह्माने कल्पके आदिमें बहुत सोच-विचारकर इसे स्थापित किया है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलकी स्थिति है। प्रधान (प्रकृति)-का यह विश्वरूप परिणाम अत्यन्त अद्भुत है। कोई भी इसकी यथार्थ गणना नहीं कर सकता। मनुष्य अपने चर्मचक्षुओंसे इन ज्योतिर्गणोंके गमनागमनको नहीं देख सकता॥ ७७—८४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे देवगृहवर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें देवगृहवर्णन नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२८॥


एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय

त्रिपुर-निर्माणका वर्णन

ऋषय ऊचुः
कथं जगाम भगवान् पुरारित्वं महेश्वरः।<br>ददाह च कथं देवस्तन्नो विस्तरतो वद॥ १<br>पृच्छामस्त्वां वयं सर्वे बहुमानात् पुनः पुनः।<br>त्रिपुरं तद् यथा दुर्गं मयमायाविनिर्मितम्।<br>देवेनैकेषुणा दग्धं तथा नो वद मानद॥ २ऋषियोंने पूछा— सबको मान देनेवाले सूतजी! भगवान् महेश्वर पुरारि (त्रिपुरके शत्रु) किस कारण हो गये तथा उन देवाधिदेवने उसे कैसे दग्ध किया? यह आप हमलोगोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये। हम सब लोग परम सम्मानपूर्वक आपसे बारंबार पूछ रहे हैं कि मयदानवकी मायाद्वारा विनिर्मित उस त्रिपुर दुर्गको भगवान् शंकरने एक ही बाणसे जिस प्रकार जला दिया था, हमलोगोंसे उस प्रसङ्गका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥
* अध्याय १२९ *४५५

| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् शंकरने जिस प्रकार त्रिपुरको विदीर्ण किया था (उसका वर्णन कर रहा हूँ), सुनिये। मय नामक एक महान् मायावी असुर था। वह विभिन्न प्रकारकी मायाओंका उत्पादक था। वह संग्राममें देवताओंद्वारा पराजित हो गया था, इसलिये घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। द्विजवरो! उसे तपस्या करते देख दो अन्य दैत्य भी अनुग्रहवश उसीके कार्यके उद्देश्यसे उग्र तपस्यामें जुट गये। उनमें एक महाबली विद्युन्माली और दूसरा महापराक्रमी तारक था। ये दोनों मयके तेजसे आकृष्ट होकर उसीके पार्श्वभागमें बैठकर तपस्या कर रहे थे। उस समय तपस्यासे उद्भासित होते हुए वे तीनों ऐसा प्रतीत हो रहे थे, मानो लौकिक रूपमें मूर्तिमान् तीनों अग्नियाँ हों। वे तीनों दानव त्रिलोकीको संतप्त करते हुए तपस्यामें संलग्न थे। वे हेमन्त-ऋतुमें जलमें शयन करते, ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तापते और वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे खुले मैदानमें खड़े रहते थे। इस प्रकार वे सबको परम प्रिय लगनेवाले अपने शरीरको सुखा रहे थे और मात्र फल, मूल, फूल और जलके आहारपर जीवन व्यतीत कर रहे थे अथवा वे कभी-कभी निराहार भी रह जाते थे। उनके वल्कलोंपर कीचड़ जम गया था और वे स्वयं विमल देहधारी होकर भी गंदे सेवारके कीचड़ोंमें निमग्न रहते थे। इस कारण उनके शरीरका मांस गल गया था। वे इतने दुर्बल हो गये थे कि उनके शरीरकी नसें बाहर उभड़ आयी थीं। उनकी तपस्याके प्रभावसे सारा जगत् निष्प्रभ हो गया—काँप उठा। सर्वत्र उदासी छा गयी। सभीके स्वर मन्द पड़ गये। इस प्रकार उन तीनों दानवरूपी अग्नियोंसे त्रिलोकीको जलते देखकर जगद्बन्धु पितामह ब्रह्मा उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ३—११ १/२॥<br><br>तब वे दैत्य अपने पितामहको सहसा सम्मुख उपस्थित देखकर अत्यन्त साहस करके बोले और उनकी स्तुति करने लगे। उस समय ब्रह्माके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे थे। तब उन्होंने तपस्याके प्रभावसे सूर्यके समान प्रभावशाली उन दानवोंसे | | शृणुध्वं त्रिपुरं* देवो यथा दारितवान् भवः।<br>मयो नाम महामायो मायानां जनकोऽसुरः॥ ३<br>निर्जितः स तु संग्रामे तताप परमं तपः।<br>तपस्यन्तं तु तं विप्रा दैत्यावन्यावनुग्रहात्॥ ४<br>तस्यैव कृत्यमुद्दिश्य तेपतुः परमं तपः।<br>विद्युन्माली च बलवांस्तारकाख्यश्च वीर्यवान्॥ ५<br>मयतेजःसमाक्रान्तौ तेपतुर्मयपार्श्वगौ।<br>लोका इव यथा मूर्तास्त्रयस्त्रय इवाग्नयः॥ ६<br>लोकत्रयं तापयन्तस्ते तेपुर्दानवास्तपः।<br>हेमन्ते जलशय्यासु ग्रीष्मे पञ्चतपे तथा॥ ७<br>वर्षासु च तथाऽऽकाशे क्षपयन्तस्तनूः प्रियाः।<br>सेवानाः फलमूलानि पुष्पाणि च जलानि च॥ ८<br>अन्यथाचरिताहाराः पङ्केनाचितवल्कलाः।<br>मग्नाः शैवालपङ्केषु विमलाविमलेषु च॥ ९<br>निर्मांसाश्च ततो जाताः कृशा धमनिसंतताः।<br>तेषां तपःप्रभावेण प्रभावविधुतं यथा॥ १०<br>निष्प्रभं तु जगत् सर्वं मन्दमेवाभिभाषितम्।<br>दह्यमानेषु लोकेषु तैस्त्रिभिर्दानवाग्निभिः॥ ११<br>तेषामग्रे जगद्बन्धुः प्रादुर्भूतः पितामहः।<br>ततः साहसकर्तारः प्राहुस्ते सहसागतम्॥ १२<br>स्वकं पितामहं दैत्यास्तं वै तुष्टुवुरेव च।<br>अथ तान् दानवान् ब्रह्मा तपसा तपनप्रभान्॥ १३ | |


* यह महत्त्वपूर्ण प्रसङ्ग बहुत कुछ स्कन्द ५। ४३, शिव, सौरपु० २९-३० लिङ्गपु० ७३-४, आदि पुराणोंसे मिलता है। वैसे यह अपेक्षाकृत सर्वाधिक विस्तृत है तथा आगेके नर्मदा-माहात्म्यमें इसी ग्रन्थमें पुनः आया है। इसका बीज तै० सं० ६। ३। २। १, शतप० ६। ३। ३। २५ आदिमें प्राप्त होता है और पुष्पदन्तने भी 'शिवमहिम्नःस्तव' १८-१९ आदिके 'रथः क्षोणी यन्ता'.....'त्रिपुरतृण', 'त्रिपुरहर' आदिमें इसकी खूब उत्प्रेक्षा की है।

४५६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उवाच हर्षपूर्णाक्षो हर्षपूर्णमुखस्तदा।<br>वरदोऽहं हि वो वत्सास्तपस्तोषित आगतः॥ १४<br>व्रियतामीप्सितं यच्च साभिलाषं तदुच्यताम्।<br>इत्येवमुच्यमानं तु प्रतिपन्नं पितामहम्॥ १५<br>विश्वकर्मा मयः प्राह प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः।<br>देव दैत्याः पुरा देवैः संग्रामे तारकामये॥ १६<br>निर्जितास्ताडिताश्चैव हताश्चाप्यायुधैरपि।<br>देववैरानुबन्धाच्च धावन्तो भयवेपिताः॥ १७<br>शरणं नैव जानीमः शर्म वा शरणार्थिनः।<br>सोऽहं तपःप्रभावेण तव भक्त्या तथैव च॥ १८<br>इच्छामि कर्तुं तद् दुर्गं यद् देवैरपि दुस्तरम्।<br>तस्मिंश्च त्रिपुरे दुर्गे मत्कृते कृतिनां वर॥ १९<br>भूम्यग्निजलदुर्गाणां शापानां मुनितेजसाम्।<br>देवप्रहरणानां च देवानां च प्रजापते॥ २०<br>अलङ्घनीयं भवतु त्रिपुरं यदि ते प्रियम्।कहा—'बच्चो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुमलोगोंकी जो अभिलाषा हो, उसे कहो और अपना अभीष्ट वर माँग लो।' वर देनेके लिये उत्सुक पितामहको इस प्रकार कहते हुए देखकर असुरोंके शिल्पी मयके नेत्र अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे। तब उसने कहा—'देव! प्राचीनकालमें घटित हुए तारकामय संग्राममें देवताओंने दैत्योंको पराजित कर दिया था। उन्होंने अस्त्रोंके प्रहारसे कुछको तो मौतके घाट उतार दिया था और कुछको बुरी तरहसे घायल कर दिया था। उस समय देवताओंके साथ वैर बँध जानेके कारण हमलोग भयसे कम्पित होकर चारों दिशाओंमें भागते फिरे, परंतु हम शरणार्थियोंको यह ज्ञात न हुआ कि हमारे लिये शरणदाता कौन है तथा हमारा कल्याण कैसे होगा। इसलिये मैं अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपकी भक्तिके बलपर एक ऐसे दुर्गका निर्माण करना चाहता हूँ, जिसका पार करना देवताओंके लिये भी कठिन हो। सुकृती पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मेरे द्वारा निर्मित उस त्रिपुरमें पृथ्वी, जल एवं अग्निसे निर्मित तथा सुरक्षित दुर्गोंका और मुनियोंके प्रभावसे दिये गये शापों, देवताओंके अस्त्रों और देवोंका प्रवेश न हो सके। प्रजापते! यदि आपको अच्छा लगे तो वह त्रिपुर सभीके लिये अलङ्घनीय हो जाय॥ १२—२० $\frac{१}{२}$ ॥
विश्वकर्मा इतीवोक्तः स तदा विश्वकर्मणा॥ २१<br>उवाच प्रहसन् वाक्यं मयं दैत्यगणाधिपम्।<br>सर्वामरत्वं नैवास्ति असद्वृत्तस्य दानव॥ २२<br>तस्माद् दुर्गविधानं हि तृणादपि विधीयताम्।तब असुरोंके विश्वकर्मा (महाशिल्पी) मयद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर विश्व-स्रष्टा ब्रह्मा दैत्यगणोंके अधीश्वर मयसे हँसते हुए बोले—'दानव! (तुझ-जैसे) असदाचारीके लिये सर्वामरत्वका विधान नहीं है, अतः तुम तृणसे ही अपने दुर्गका निर्माण करो।'
पितामहवचः श्रुत्वा तदैव दानवो मयः॥ २३<br>प्राञ्जलिः पुनरप्याह ब्रह्माणं पद्मसंभवम्।<br>यस्तदेकेषुणा दुर्गं सकृन्मुक्तेन निर्दहेत्॥ २४<br>समं स संयुगे हन्यादवध्यं शेषतो भवेत्।उस समय पितामहकी ऐसी बात सुनकर मयदानवने हाथ जोड़कर पुनः पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा—'जो एक ही बारके छोड़े गये एक ही बाणसे उस दुर्गको जला दे, वही युद्धस्थलमें हम सबको मार सके, शेष प्राणियोंसे हमलोग अवध्य हो जायँ।'
एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा मयं देवः पितामहः॥ २५<br>स्वप्ने लब्धो यथार्थो वै तत्रैवादर्शनं ययौ।<br>गते पितामहे दैत्या गता मयरविप्रभाः॥ २६<br>वरदानाद् विरेजुस्ते तपसा च महाबलाः।<br>स मयस्तु महाबुद्धिर्दानवो वृषसत्तमः॥ २७तदनन्तर मयसे 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर भगवान् ब्रह्मा स्वप्नमें प्राप्त हुए धनकी तरह वहीं अन्तर्हित हो गये। पितामहके चले जानेपर सूर्यके समान प्रभावशाली मय आदि दानव भी अपने स्थानको चले गये। वे महाबली दानव तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे अत्यन्त शोभित हो रहे थे। कुछ समयके बाद दानवश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् मय-

१३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना

* अध्याय १२९ *४५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्गं व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा।<br>कथं नाम भवेद् दुर्गं तन्मया त्रिपुरं कृतम्॥ २८<br>वत्स्यते तत्पुरं दिव्यं मत्तो नान्यैर्न संशयः।<br>यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते॥ २९<br>देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्।<br>विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु॥ ३०<br>कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्।<br>पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति॥ ३१<br>पुष्ययोगेण च दिवि समेष्यन्ति परस्परम्।<br>पुष्ययोगेण युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति॥ ३२<br>पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति।<br>आयसं तु क्षितितले रजतं तु नभस्तले॥ ३३<br>राजतस्योपरिष्टात् तु सौवर्णं भविता पुरम्।<br>एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद् भविष्यति।<br>शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद् दुरासदम्॥ ३४<br>अट्टालकैर्यन्त्रशतघ्निभिश्च<br>सचक्रशूलोपलकम्पन्नैश्च ।<br>द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकार-<br>शृङ्गैः सुविराजमानम्॥ ३५<br>सतारकाख्येन मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं तडिमालिनापि।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ३६दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा। मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिये। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥ २९–३१½॥<br><br>इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्य होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रों, चक्र, त्रिशूल, उपल और ध्वजाओं, मन्दराचल और सुमेरु गिरि-सरीखे द्वारों और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो सकेगा॥ ३१–३६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२९॥

४५८ | * मत्स्यपुराण *


एक सौ तीसवाँ अध्याय

दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना

सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार सोच-विचारकर (महाशिल्पी) मयदानव दिव्य उपायोंके प्रभावसे बननेवाले तथा मनके संकल्पानुसार चलनेवाले त्रिपुर नामक दुर्गकी रचना करनेको उद्यत हुआ। उसने सोचा कि इस मार्गमें परकोटा बनेगा, यहाँ अथवा वहाँ गोपुर (नगरका फाटक) रहेगा, यहाँ अट्टालिकाका दरवाजा तथा यहाँ महलका मुख्य द्वार रखना उचित है। इधर विशाल राजमार्ग होना चाहिये, यहाँ दोनों ओर पगडंडियोंसे युक्त सड़कें और गलियाँ होनी चाहिये, यहाँ चबूतरा रखना ठीक है, यह स्थान अन्तःपुरके योग्य है, यहाँ शिव-मन्दिर रखना अच्छा होगा, यहाँ वट-वृक्षसहित तड़ागों, बावलियों और सरोवरोंका निर्माण उचित होगा। यहाँ बगीचे, सभाभवन और वाटिकाएँ रहेंगी तथा यहाँ दानवोंके निकलनेके लिये मनोहर मार्ग रहेगा। इस प्रकार नगर-रचनामें निपुण मयने केवल मनःसंकल्पमात्रसे उस दिव्य त्रिपुर नगरकी रचना कर डाली थी, ऐसा हमने सुना है। मयने जो काले लोहेका पुर निर्मित किया था, उसका अधिपति तारकासुर हुआ। वह उसपर अपना आधिपत्य जमाकर वहाँ निवास करने लगा। दूसरा जो पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रजतमय पुर निर्मित हुआ, उसका स्वामी विद्युन्माली हुआ। यह विद्युत्समूहोंसे युक्त बादलकी तरह जान पड़ता था। मयद्वारा जिस तीसरे स्वर्णमय पुरकी रचना हुई, उसमें सामर्थ्यशाली मय स्वयं गया और उसका अधिपति हुआ। जिस प्रकार तारकासुरके पुरसे विद्युन्मालीका पुर सौ योजनकी दूरीपर था, उसी प्रकार विद्युन्माली और मयके पुरोंमें भी सौ योजनका अन्तर था। मयदानवका विशाल पुर मेरुपर्वतके समान दीख पड़ता था॥ १—१०½॥
इति चिन्तायुतो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम्।<br>चकार त्रिपुरं दुर्गं मनःसंचारचारितम्॥ १
प्राकारोऽनेन मार्गेण इह वामुत्र गोपुरम्।<br>इह चाट्टालकद्वारमिह चाट्टालगोपुरम्॥ २
राजमार्ग इतश्चापि विपुलो भवतामिति।<br>रथ्योपरथ्याः सदृशा इह चत्वर एव च॥ ३
इदमन्तःपुरस्थानं रुद्रायतनमत्र च।<br>सवटानि तडागानि ह्यत्र वाप्यः सरांसि च॥ ४
आरामाश्च सभाश्चात्र उद्यानान्यत्र वा तथा।<br>उपनिर्गमो दानवानां भवत्यत्र मनोहरः॥ ५
इत्येवं मानसं तत्राकल्पयत् पुरकल्पवित्।<br>मयेन तत्पुरं सृष्टं त्रिपुरं त्विति नः श्रुतम्॥ ६
कार्ष्णायसमयं यत्तु मयेन विहितं पुरम्।<br>तारकाख्योऽधिपस्तत्र कृतस्थानाधिपोऽवसत्॥ ७
यत्तु पूर्णेन्दुसंकाशं राजतं निर्मितं पुरम्।<br>विद्युन्माली प्रभुस्तत्र विद्युन्माली त्विवाम्बुदः॥ ८
सुवर्णाधिकृतं यच्च मयेन विहितं पुरम्।<br>स्वयमेव मयस्तत्र गतस्तदधिपः प्रभुः॥ ९
तारकस्य पुरं तत्र शतयोजनमन्तरम्।<br>विद्युन्मालिपुरं चापि शतयोजनकेऽन्तरे॥ १०
* अध्याय १३० *४५९

| मेरुपर्वतसंकाशं मयस्यापि पुरं महत्।<br>पुष्यसंयोगमात्रेण कालेन स मयः पुरा॥ ११<br><br>कृतवांस्त्रिपुरं दैत्यस्त्रिनेत्रः पुष्यकं यथा।<br>येन येन मयो याति प्रकुर्वाणः पुरं पुरात्॥ १२<br><br>प्रशस्तास्तत्र तत्रैव वारुण्या मालया स्वयम्।<br>रुक्मरूप्यायसानां च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३<br><br>रत्नाचितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विषाम्।<br>प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च॥ १४<br><br>सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च।<br>सोद्यानवापीकूपानि सपद्मसरवन्ति च॥ १५<br><br>अशोकवनभूतानि कोकिलारुतवन्ति च।<br>चित्रशालविशालानि चतुःशालोत्तमानि च॥ १६<br><br>सप्ताष्टदशभौमानि सत्कृतानि मयेन च।<br>बहुध्वजपताकानि स्रग्दामालङ्कृतानि च॥ १७<br><br>किङ्किणीजालशब्दानि गन्धवन्ति महान्ति च।<br>सुसंयुक्तोपलिप्तानि पुष्यनैवेद्यवन्ति च॥ १८<br><br>यज्ञधूमान्धकाराणि सम्पूर्णकलशानि च।<br>गगनावरणाभानि हंसपङ्क्तिनिभानि च॥ १९<br><br>पङ्क्तीकृतानि राजन्ते गृहाणि त्रिपुरे पुरे।<br>मुक्ताकलापैर्लम्बद्भिर्हसन्तीव शशिश्रियम्॥ २० | जिस प्रकार पूर्वकालमें त्रिलोचन भगवान् शंकरने पुष्यककी रचना की थी, उसी प्रकार मयदानवने केवल पुष्यनक्षत्रके संयोगसे कालकी व्यवस्था करके त्रिपुरका निर्माण किया। पुरकी रचना करता हुआ मय जिस-जिस मार्गसे एक पुरसे दूसरे पुरमें जाता था, वहाँ-वहाँ वरुणकी दी हुई मालाद्वारा उत्पन्न चमत्कारसे सोने, चाँदी और लोहेके सैकड़ों-हजारों भवन स्वयं ही बनते जाते थे। उन देव-शत्रुओंके पुर रत्नखचित होनेके कारण विशेष शोभा पा रहे थे। वे सैकड़ों महलोंसे युक्त थे। उनमें ऊँचे-ऊँचे कूटागार (छतके ऊपरकी कोठरियाँ) बने थे। उनमें सभी लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे। वे (सुन्दरतामें) सभी लोकोंका अतिक्रमण करनेवाले थे। उनमें उद्यान, बावली, कुआँ और कमलोंसे युक्त सरोवर शोभा पा रहे थे। उनमें अशोक वृक्षके बहुतेरे वन थे, जिनमें कोयलें कूकती रहती थीं। उनमें बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ और उत्तम अटारियाँ बनी थीं। मयने क्रमशः सात, आठ और दस तल्लेवाले भवनोंका बड़ी सुन्दरताके साथ निर्माण किया था। उनपर बहुसंख्यक ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मालाकी लड़ियोंसे अलंकृत थे। उनमें लगी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंके शब्द हो रहे थे। वे उत्कृष्ट गन्धयुक्त पदार्थोंसे सुवासित थे। उन्हें समुचितरूपसे उपलिप्त किया गया था। उनमें पुष्प, नैवेद्य आदि पूजन-सामग्री सँजोयी गयी थी और जलपूर्ण कलश स्थापित थे। वे यज्ञजन्य धुएँसे अन्धकारित हो रहे थे। उस त्रिपुर नामक पुरमें आकाशसरीखे नीले तथा हंसोंकी पङ्क्तिके समान उज्ज्वल भवन कतारोंमें सुशोभित हो रहे थे। उनमें लटकती हुई मोतियोंकी झालरें ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो चन्द्रमाकी शोभाका उपहास कर रही हैं॥ ११-२०॥ | | मल्लिकाजातिपुष्पाद्यैर्गन्धधूपाधिवासितैः ।<br>पञ्चेन्द्रियसुखैर्नित्यं समैः सत्पुरुषैरिव॥ २१ | वे नित्य मल्लिका, चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों तथा गन्ध, धूप आदिसे अधिवासित होनेसे पाँचों इन्द्रियोंके सुखोंसे समन्वित सत्पुरुषोंकी तरह सुशोभित हो रहे थे। | | हैमराजतलौहाद्यमणिरत्नाञ्जनाङ्किताः ।<br>प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिप्राकारसंनिभाः॥ २२ | उस त्रिपुरमें सोने, चाँदी और लोहेके प्राचीर बने हुए थे, जिनमें मणि, रत्न और अंजन (काले पत्थर) जड़े हुए |

१३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

४६० * मत्स्यपुराण *


एकैकस्मिन् पुरे तस्मिन् गोपुराणां शतं शतम्।<br>सपताकाध्वजवतां दृश्यन्ते गिरिशृङ्गवत्॥ २३<br>नूपुरारावरम्याणि त्रिपुरे तत्पुराण्यपि।<br>स्वर्गातिरिक्तश्रीकाणि तत्र कन्यापुराणि च॥ २४<br>आरामैश्च विहारैश्च तडागवटचत्वरैः।<br>सरोभिश्च सरिद्भिश्च वनैश्चोपवनैरपि॥ २५<br>दिव्यभोगोपभोगानि नानारत्नयुतानि च।<br>पुष्पोत्करैश्च सुभगास्त्रिपुरस्योपनिर्गमाः।<br>परिखाशतगम्भीराः कृता मायानिवारणैः॥ २६<br>निशम्य तद्दुर्गविधानमुत्तमं<br>कृतं मयेनाद्भुतवीर्यकर्मणा।<br>दितेः सुता दैववराजवैरिणः<br>सहस्रशः प्रापुरनन्तविक्रमाः॥ २७<br>तदा सुरैर्दर्पितवैरीमर्दनै-<br>र्जनार्दनैः शैलकरीन्द्रसंनिभैः।<br>बभूव पूर्णं त्रिपुरं तथा पुरा<br>यथाम्बरं भूरिजलैर्जलप्रदैः॥ २८थे। वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो पर्वतोंकी चहारदीवारी हो। उस एक-एक पुरमें सैकड़ों गोपुर बने थे, जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे पर्वत-शिखरके समान दीख रहे थे। उस त्रिपुरमें नूपुरोंकी झनकार होती थी, जिससे वे अत्यन्त रमणीय लग रहे थे। उन पुरोंका सौन्दर्य स्वर्गसे भी बढ़कर था। उनमें कन्यापुर भी बने हुए थे। वे बगीचों, विहारस्थलों, तड़ागों, वटवृक्षके नीचे बने चबूतरों, सरोवरों, नदियों, वनों और उपवनोंसे सम्पन्न थे। वे दिव्य भोगकी सामग्रियों और नाना प्रकारके रत्नोंसे परिपूर्ण थे। उस त्रिपुरके बाहर निकलनेवाले मार्गोंपर पुष्प बिखेरे गये थे, जिससे वे बड़े सुन्दर लग रहे थे। उनमें मायाको निवारण करनेवाले उपकरणोंद्वारा सैकड़ों गहरी खाइयाँ बनायी गयी थीं। अद्भुत पराक्रमयुक्त कर्म करनेवाले मयके द्वारा निर्मित उस उत्तम दुर्गकी रचनाका वृत्तान्त सुनकर देवराज इन्द्रके शत्रु अनन्त पराक्रमी हजारों दैत्य वहाँ आ पहुँचे। उस समय वह त्रिपुर गर्वीले शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले, जनताके लिये कष्टदायक तथा पर्वतीय गजेन्द्रोंके समान विशालकाय असुरोंसे उसी प्रकार खचाखच भर गया, जैसे अधिक जलवाले बादलोंसे आकाश आच्छादित हो जाता है॥ २१—२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३०॥


एक सौ इकतीसवाँ अध्याय

त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार

सूत उवाच<br>निर्मिते त्रिपुरे दुर्गे मयेनासुरशिल्पिना।<br>तद् दुर्गं दुर्गतां प्राप बद्धवैरैः सुरासुरैः॥ १<br>सकलत्राः सपुत्राश्च शस्त्रवन्तोऽन्तकोपमाः।<br>मयादिष्टानि विविशुर्गृहाणि हृषिताश्च ते॥ २**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार असुरशिल्पी मयने त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया, परंतु अन्ततोगत्वा परस्पर बँधे हुए वैरवाले देवताओं और असुरोंके लिये वह दुर्ग दुर्गम हो गया। उस समय वे सभी शस्त्रधारी दैत्य जो यमराजके समान भयंकर थे, मयके आदेशसे अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ हर्षपूर्वक उन गृहोंमें

* अध्याय १३१ * । ४६१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सिंहा वनमिवानेके मकरा इव सागरम्।<br>रोषैश्चैवातिपारुष्यैः शरीरमिव संहतैः॥ ३<br>तद्वद् बलिभिरध्यस्तं तत्पुरं देवतारिभिः।<br>त्रिपुरं संकुलं जातं दैत्यकोटिशताकुलम्॥ ४<br>सुतलादपि निष्पत्य पातालाद् दानवालयात्।<br>उपतस्थुः पयोदाभा ये च गिर्युपजीविनः॥ ५<br>यो यं प्रार्थयते कामं सम्प्राप्तस्त्रिपुराश्रयात्।<br>तस्य तस्य मयस्तत्र मायया विदधाति सः॥ ६<br>सचन्द्रेषु प्रदोषेषु साम्बुजेषु सरःसु च।<br>आरामेषु सचूतेषु तपोधनवनेषु च॥ ७<br>स्वङ्गाश्चन्दनदिग्धाङ्गा मातङ्गाः समदा इव।<br>मृष्टाभरणवस्त्राश्च मृष्टस्रगनुलेपनाः॥ ८<br>प्रियाभिः प्रियकामाभिर्भावभावप्रसूतिभिः।<br>नारीभिः सततं रेमुर्मुदिताश्चैव दानवाः॥ ९प्रविष्ट हुए। जैसे अनेकों सिंह वनको, अनेकों मगरमच्छ सागरको और क्रोध एवं अत्यन्त कठोरता परस्पर सम्मिलित होकर शरीरको अपने अधिकारमें कर लेते हैं, वैसे ही उन महाबली देव-शत्रुओंद्धारा वह पुर व्याप्त हो गया। इस प्रकार वह त्रिपुर असंख्य (अरबों) दैत्योंसे भर गया। उस समय सुतल और पाताल (दानवोंके निवासस्थान)-से निकलकर आये हुए दानव तथा (देवताओंके भयसे छिपकर) पर्वतोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले दैत्य भी, जो काले बादलकी-सी कान्तिवाले थे, (शरणार्थीके रूपमें) वहाँ उपस्थित हुए। त्रिपुरमें आश्रय लेनेके कारण जो असुर जिस वस्तुकी कामना करता था, उसकी उस कामनाको मयदानव मायाद्वारा पूर्ण कर देता था। जिनके सुडौल शरीरपर चन्दनका अनुलेप लगा था, जो निर्मल आभूषण, वस्त्र, माला और अङ्गरागसे अलंकृत थे तथा मतवाले गजेन्द्रसरीखे दीख रहे थे, ऐसे दानव चाँदनी रातोंमें एवं सायंकालके समय कमलसे सुशोभित सरोवरोंके तटपर, आमके बगीचों और तपोवनोंमें अपनी पत्नियोंके साथ निरन्तर हर्षपूर्वक विहार करते थे॥ १—९॥
मयेन निर्मिते स्थाने मोदमाना महासुराः।<br>अर्थे धर्मे च कामे च निदधुस्ते मतीः स्वयम्॥ १०<br>तेषां त्रिपुरयुक्तानां त्रिपुरे त्रिदशारिणाम्।<br>व्रजति स्म सुखं कालः स्वर्गस्थानां यथा तथा॥ ११<br>शुश्रूषन्ते पितॄन् पुत्राः पत्न्यश्चापि पतींस्तथा।<br>विमुक्तकलहाश्चापि प्रीतयः प्रचुराभवन्॥ १२<br>नाधर्मस्त्रिपुरस्थानां बाधते वीर्यवानपि।<br>अर्चयन्तो दितेः पुत्रास्त्रिपुरायतने हरम्॥ १३<br>पुण्याहशब्दानुच्चैरुराशीर्वादांश्च वेदगान्।<br>स्वनूपुररवन्मिश्रान् वेणुवीणारवानपि॥ १४<br>हासश्च वरनारीणां चित्तव्याकुलकारकः।<br>त्रिपुरे दानवेन्द्राणां रमतां श्रूयते सदा॥ १५इस प्रकार मयद्वारा निर्मित उस स्थानपर निवास करते हुए वे महासुर आनन्दका उपभोग कर रहे थे। उन्होंने स्वयं ही धर्म, अर्थ और कामके सम्पादनमें अपनी बुद्धि लगायी। त्रिपुरमें निवास करनेवाले उन देव-शत्रुओंका समय ऐसा सुखमय व्यतीत हो रहा था, जैसे स्वर्गवासियोंका व्यतीत होता है। वहाँ पुत्र पितृगणोंकी तथा पत्नियाँ पतियोंकी सेवा करती थीं। वे परस्पर कलह नहीं करते थे। उनमें परम प्रेम था। किसी प्रकारका अधर्म प्रबल होनेपर भी त्रिपुर-निवासियोंको बाधा नहीं पहुँचाता था। वे दैत्य शिव-मन्दिरमें शङ्करजीकी अर्चना करते हुए वेदोक्त माङ्गलिक शब्दों एवं आशीर्वादोंका उच्चारण करते थे। त्रिपुरमें आनन्द मनानेवाले दानवेन्द्रोंके अपने नूपुरकी झनकारसे मिश्रित वेणु एवं वीणाके शब्द तथा सुन्दरी नारियोंके चित्तको व्याकुल कर देनेवाले हास सदा सुनायी पड़ते थे।

४६२ * मत्स्यपुराण *


Sanskrit ShlokasHindi Translation
तेषामर्चयतां देवान् ब्राह्मणांश्च नमस्यताम्।<br>धर्मार्थकामतन्त्राणां महान् कालोऽभ्यवर्तत॥ १६<br><br>अथालक्ष्मीरसूया च तृड्बुभुक्षे तथैव च।<br>कलिश्च कलहश्चैव त्रिपुरं विविशुः सह॥ १७<br><br>संध्याकालं प्रविष्टास्ते त्रिपुरं च भयावहाः।<br>समध्यासुः समं घोराः शरीराणि यथाऽऽमयाः॥ १८<br><br>सर्व एते विशन्तस्तु मयेन त्रिपुरान्तरम्।<br>स्वप्ने भयावहा दृष्टा आविशन्तस्तु दानवान्॥ १९<br><br>उदिते च सहस्रांशौ शुभभासाकरे रवौ।<br>मयः सभामाविवेश भास्कराभ्यामिवाम्बुदः॥ २०<br><br>मेरूकूटनिभे रम्ये आसने स्वर्णमण्डिते।<br>आसीनाः काञ्चनगिरेः शृङ्गे तोयमुचो यथा॥ २१<br><br>पार्श्वयोस्तारकाख्यश्च विद्युन्माली च दानवः।<br>उपविष्टौ मयस्यान्ते हस्तिनः कलभाविव॥ २२इस प्रकार देवताओंकी अर्चना और ब्राह्मणोंको नमस्कार करनेवाले तथा धर्म, अर्थ एवं कामके साधक उन दैत्योंका महान् समय व्यतीत होता गया। तदनन्तर अलक्ष्मी (दरिद्रता), असूया (गुणोंमें दोष निकालना), तृष्णा, बुभुक्षा (भूख), कलि और कलह—ये सब एक साथ मिलकर त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। इन भयदायक दुर्गुणोंने सायंकाल त्रिपुरमें प्रवेश किया था। इन्होंने राक्षसोंपर ऐसा अधिकार जनाया, जैसे भयंकर व्याधियाँ शरीरोंको काबूमें कर लेती हैं। त्रिपुरके भीतर प्रवेश करते हुए इन दुर्गुणोंको मयने स्वप्नमें दानवोंके शरीरमें भयानक रूपसे प्रविष्ट होते हुए देख लिया। तब सहस्र किरणधारी एवं उज्ज्वल प्रकाश करनेवाले सूर्यके उदय होनेपर मयने (तारक और विद्युन्मालीके साथ) दो सूर्योंसे युक्त बादलकी तरह सभाभवनमें प्रवेश किया। वहाँ वे मेरुगिरिके शिखरके समान सुन्दर स्वर्णमण्डित रमणीय आसनपर आसीन हो गये। उस समय वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सुमेरुगिरिके शिखरपर बादल उमड़ आये हों। मयदानवके निकट एक ओर तारकासुर और दूसरी ओर दानवश्रेष्ठ विद्युन्माली बैठे हुए थे, जो हाथीके बच्चेकी तरह दीख रहे थे॥ १६—२२॥
ततः सुरारयः सर्वेऽशेषकोपा रणाजिरे।<br>उपविष्टा दृढं विद्धा दानवा देवशत्रवः॥ २३<br><br>तेष्वासीनेषु सर्वेषु सुखासनगतेषु च।<br>मयो मायाविजनक इत्युवाच स दानवान्॥ २४<br><br>खेचराः खेचरारावा भो भो दाक्षायणीसुताः *।<br>निशामयध्वं स्वप्नोऽयं मया दृष्टो भयावहः॥ २५<br><br>चतस्रः प्रमदास्तत्र त्रयो मर्त्या भयावहाः।<br>कोपानलादीप्तमुखाः प्रविष्टास्त्रिपुरार्दिनः॥ २६तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होनेके कारण जिनके क्रोध शेष रह गये थे, वे सभी देवशत्रु दानव वहाँ आकर यथास्थान बैठ गये। इस प्रकार उन सबके सुखपूर्वक आसनपर बैठ जानेके पश्चात् मायाके उत्पादक मयने उन दानवोंसे इस प्रकार कहा—'अरे दाक्षायणीके पुत्रो! तुमलोग आकाशमें विचरण करनेवाले तथा आकाशचारियोंमें विशेषरूपसे गर्जना करनेवाले हो। मैंने यह एक भयानक स्वप्न देखा है, उसे तुमलोग ध्यानपूर्वक सुनो। मैंने स्वप्नमें चार स्त्रियों और तीन पुरुषोंको पुरमें प्रवेश करते हुए देखा है। उनके रूप भयानक थे तथा

* दक्षकी कन्या दनुको ही यहाँ दाक्षायणी कहा गया है। सभी दानव कश्यपजीके द्वारा उत्पन्न इन्हीं दनुके पुत्र थे। दैत्यगण दितिके पुत्र थे।

* अध्याय १३१ * ४६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रविश्य रुषितास्ते च पुराण्यतुलविक्रमाः ।<br>प्रविष्टाः स्म शरीराणि भूत्वा बहुशरीरिणः ॥ २७<br><br>नगरं त्रिपुरं चेदं तमसा समवस्थितम् ।<br>सगृहं सह युष्माभिः सागराम्भसि मज्जितम् ॥ २८<br><br>उलूकं रुचिरा नारी नग्नाऽऽरूढा खरं तथा।<br>पुरुषः सिन्दुतिलकश्चतुरङ्घ्रिस्त्रिलोचनः ॥ २९<br><br>येन सा प्रमदा नुन्ना अहं चैव विबोधितः।<br>ईदृशी प्रमदा दृष्टा मया चातिभयावहा ॥ ३०<br><br>एष ईदृशिकः स्वप्नो दृष्टो वै दितिनन्दनाः।<br>दृष्टः कथं हि कष्टाय असुराणां भविष्यति ॥ ३१<br><br>यदि वोऽहं क्षमो राजा यदिदं वेत्थ चेद्धितम् ।<br>निबोधध्वं सुमनसो न चासूयितुमर्हथ ॥ ३२<br><br>कामं चेष्र्याँ च कोपं च असूयां संविहाय च।<br>सत्ये दमे च धर्मे च मुनिवादे च तिष्ठत ॥ ३३<br><br>शान्तयश्च प्रयुज्यन्तां पूज्यतां च महेश्वरः ।<br>यदि नामास्य स्वप्नस्य ह्येवं चोपरमो भवेत् ॥ ३४<br><br>कुप्यते नो ध्रुवं रुद्रो देवदेवस्त्रिलोचनः ।<br>भविष्याणि च दृश्यन्ते यतो नस्त्रिपुरेऽसुराः ॥ ३५<br><br>कलहं वर्जयन्तश्च अर्जयन्तस्तथाऽऽर्जवम् ।<br>स्वप्नोदयं प्रतीक्षध्वं कालोदयमथापि च ॥ ३६मुख क्रोधाग्निसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे ऐसा लगता था मानो वे त्रिपुरके विनाशक हैं। वे अतुल पराक्रमशाली प्राणी क्रोधसे भरे हुए थे और पुरोंमें प्रवेश करके अनेकों शरीर धारणकर दानवोंके शरीरोंमें भी घुस गये हैं। यह त्रिपुर नगर अन्धकारसे आच्छन्न हो गया है और गृह तथा तुमलोगोंके साथ ही सागरके जलमें डूब गया है। एक सुन्दरी स्त्री नंगी होकर उलूकपर सवार थी तथा उसके साथ एक पुरुष था, जिसके ललाटमें लाल तिलक लगा था। उसके चार पैर और तीन नेत्र थे। वह गधेपर चढ़ा हुआ था। उसने उस स्त्रीको प्रेरित किया, तब उसने मुझे नींदसे जगा दिया। इस प्रकारकी अत्यन्त भयावनी नारीको मैंने स्वप्नमें देखा है। दितिपुत्रो! मैंने इस प्रकारका स्वप्न देखा है और यह भी देखा है कि यह स्वप्न असुरोंके लिये किस प्रकार कष्टदायक होगा। इसलिये यदि तुमलोग हमें अपना उचितरूपसे राजा मानते हो और यह समझते हो कि इनका कथन हितकारक होगा तो मन लगाकर मेरी बात सुनो। तुमलोग किसीकी असूया (झूठी निन्दा) मत करो। काम, क्रोध, ईर्ष्या, असूया आदि दुर्गुणोंको एकदम छोड़कर सत्य, दम, धर्म और मुनिमार्गका आश्रय लो। शान्तिदायक अनुष्ठानोंका प्रयोग करो और महेश्वरकी पूजा करो। सम्भवतः ऐसा करनेसे स्वप्नकी शान्ति हो जाय। असुरो! (ऐसा प्रतीत हो रहा है कि) त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव भगवान् रुद्र निश्चय ही हमलोगोंपर कुपित हो गये हैं; क्योंकि हमारे त्रिपुरमें भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाएँ अभीसे दीख पड़ रही हैं। अतः तुमलोग कलहका परित्याग तथा सरलताका आश्रय लेकर इस दुःस्वप्नके परिणामस्वरूप आनेवाले कालकी प्रतीक्षा करो'॥ २३—३६॥
श्रुत्वा दाक्षायणीपुत्रा इत्येवं मयभाषितम् ।<br>क्रोधेष्र्यावस्थया युक्ता दृश्यन्ते च विनाशगाः ॥ ३७इस प्रकार मयदानवका भाषण सुनकर सभी दानव क्रोध और ईर्ष्याके वशीभूत हो गये तथा विनाशकी ओर जाते हुए-से दीखने लगे। अलक्ष्मीद्वारा प्रभावित हुए वे
विनाशमुपपश्यन्तो ह्यलक्ष्म्याध्यापितासुराः ।<br>तत्रैव दृष्ट्वा तेऽन्योन्यं संक्रोधापूरितेक्षणाः ॥ ३८असुर अपने भावी विनाशको संनिकट देखते हुए भी परस्पर एक-दूसरेकी ओर देखकर वहीं क्रोधसे भर गये।

४६४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ दैवपरिव्ध्वस्ता दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>हित्वा सत्यं च धर्मं च अकार्याण्युपचक्रमुः॥ ३९उनकी आँखें लाल हो गयीं। तदनन्तर दैव (भाग्य)-से परिच्युत हुए त्रिपुरनिवासी दानव सत्य और धर्मका परित्याग कर निन्द्य कर्मोंमें प्रवृत्त हो गये।
द्विषन्ति ब्राह्मणान् पुण्यान्न चार्चन्ति हि देवताः।<br>गुरुं चैव न मन्यन्ते ह्यन्योन्यं चापि चुक्रुधुः॥ ४०वे पवित्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगे। उन्होंने देवताओंकी अर्चना छोड़ दी। वे गुरुजनोंका मान नहीं करते थे और परस्पर क्रोधपूर्ण व्यवहार करने लगे।
कलहेषु च सज्जन्ते स्वधर्मेषु हसन्ति च।<br>परस्परं च निन्दन्ति अहमित्येव वादिनः॥ ४१वे कलहमें प्रवृत्त होकर अपने धर्मका उपहास करने लगे और 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहते हुए परस्पर एक-दूसरेकी निन्दा करने लगे।
उच्चैर्गुरून् प्रभाषन्ते नाभिभाषन्ति पूजिताः।<br>अकस्मात् साश्रुनयना जायन्ते च समुत्सुकाः॥ ४२वे गुरुजनोंसे कड़े शब्दोंमें बोलते थे। स्वयं सत्कृत होनेपर भी उन्होंने अपनेसे नीची कोटिवालोंसे बोलना भी छोड़ दिया। उनकी आँखोंमें अकस्मात् आँसू उमड़ आते थे और वे उत्कण्ठित-से जो जाते थे।
दधिसक्तून् पयश्चैव कपित्थानि च रात्रिषु।<br>भक्षयन्ति च शेरन्त उच्छिष्टाः संवृतास्तथा॥ ४३वे रातमें दही, सत्तू, दूध और कैथका फल खाने लगे। जूठे मुँह रहकर घिरे हुए स्थानमें शयन करने लगे।
मूत्रं कृत्वोपस्पृशन्ति चाकृत्वा पादधावनम्।<br>संविशन्ति च शय्यासु शौचाचारविवर्जिताः॥ ४४उनका शौचाचार ऐसा विनष्ट हो गया कि वे मूत्र-त्यागकर जलका स्पर्श तो करते, परंतु बिना पैर धोये ही बिछौनोंपर शयन करने लगे।
संकुचन्ति भयाच्चैव मार्जाराणां यथाऽऽखुकः।<br>भार्यां गत्वा न शुध्यन्ति रहोवृत्तिषु निस्त्रपाः॥ ४५वे अकस्मात् भयसे इस प्रकार संकुचित हो जाते थे, जैसे बिलावको देखकर चूहे हो जाते हैं। उन्होंने स्त्री-सहवासके बाद शरीरकी शुद्धि करना छोड़ दिया और गोपनीय कार्योंमें भी निर्लज्ज हो गये।
पुरा सुशीला भूत्वा च दुःशीलत्वमुपागताः।<br>देवांस्तपोधनांश्चैव बाधन्ते त्रिपुरालयाः॥ ४६वे त्रिपुरनिवासी दैत्य पहले सुशील थे, पर अब बड़े क्रूर हो गये तथा देवताओं और तपस्वियोंको कष्ट देने लगे।
मयेन वार्यमाणापि ते विनाशमुपस्थिताः।<br>विप्रियाण्येव विप्राणां कुर्वाणाः कलहैषिणः॥ ४७मयके मना करनेपर भी वे विनाशकी ओर बढ़ने लगे। उनके मनमें कलहकी इच्छा जाग उठी, जिससे वे ब्राह्मणोंका अपकार ही करते थे।
वैभ्राजं नन्दनं चैव तथा चैत्ररथं वनम्।<br>अशोकं च वराशोकं सर्वर्तुकमथापि च॥ ४८<br><br>स्वर्गं च देवतावासं पूर्वदेववशानुगाः।<br>विध्वंसयन्ति संक्रुद्धास्तपोधनवनानि च॥ ४९इस प्रकार जो पहले देवताओंके वशीभूत थे, वे दानवगण सम्प्रति त्रिपुरका आश्रय पानेसे संक्रुद्ध होकर वैभ्राजके नन्दन, चैत्ररथ, अशोक, वराशोक, सर्वर्तुक आदि वनों, देवताओंके निवास-स्थान स्वर्ग तथा तपस्वियोंके वनोंका विध्वंस करने लगे। उस समय देव-मन्दिर और आश्रम नष्ट कर दिये गये। देवताओं और ब्राह्मणोंके उपासक मार

१३४- देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी

* अध्याय १३२ *४६५

| विध्वस्तदेवायतनाश्रमं च<br>सम्भग्नदेवद्विजपूजकं तु।<br>जगद्वभूवामरराजदुष्टै-<br>रभिद्रुतं सस्यमिवालिवृन्दैः॥ ५०॥ | डाले गये। इस प्रकार देवराज इन्द्रके शत्रुओंद्वारा विध्वस्त किया हुआ जगत् ऐसा लगने लगा, जैसे टिड्डीदलोंद्वारा नष्ट की हुई अन्नकी फसल हो॥ ३७—५०॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने दुःस्वप्नदर्शनं नामैकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें दुःस्वप्न-दर्शन नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३१॥


एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय

त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मासहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अशीलेषु प्रदुष्टेषु दानवेषु दुरात्मसु।<br>लोकेषूत्साद्यमानेषु तपोधनवनेषु च॥ १॥<br><br>सिंहनादे व्योमगानां तेषु भीतेषु जन्तुषु।<br>त्रैलोक्ये भयसम्मूढे तमोऽन्धत्वमुपागते॥ २॥<br><br>आदित्या वसवः साध्याः पितरो मरुतां गणाः।<br>भीताः शरणमाजग्मुर्ब्रह्माणं प्रपितामहम्॥ ३॥<br><br>ते तं स्वर्णोत्पलासीनं ब्रह्माणं समुपागताः।<br>नेमुरूचुश्च सहिताः पञ्चास्यं चतुराननम्॥ ४॥<br><br>वरगुप्तास्तवैवेह दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् यथा प्रेष्याननुशाधि ततोऽनघ॥ ५॥<br><br>मेघागमे यथा हंसा मृगाः सिंहभयादिव।<br>दानवानां भयात् तद्वद् भ्रमामो हि पितामह॥ ६॥<br><br>पुत्राणां नामधेयानि कलत्राणां तथैव च।<br>दानवैर्भ्राम्यमाणानां विस्मृतानि ततोऽनघ॥ ७॥<br><br>देववेश्मप्रभङ्गाश्च आश्रमभ्रंशनानि च।<br>दानवैर्लोभमोहान्धैः क्रियन्ते च भ्रमन्ति च॥ ८॥ऋषियो! त्रिपुरनिवासी दानवोंका शील तो भ्रष्ट ही हो गया था, उनमें दुष्टता भी कूट-कूटकर भर गयी थी। उन दुरात्माओंने लोकों एवं तपोवनोंका विनाश करना आरम्भ किया। वे आकाशमें जाकर सिंहनाद करते, जिसे सुनकर सारे जीव-जन्तु भयभीत हो जाते थे। इस प्रकार जब सारी त्रिलोकी भयके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी और सर्वत्र अन्धकार-सा छा गया, तब भयसे डरे हुए आदित्य, वसु, साध्य, पितृ-गण और मरुद्गण—ये सभी संगठित होकर प्रपितामह ब्रह्माकी शरणमें पहुँचे। वहाँ पञ्चमुख ब्रह्मा स्वर्णमय कमलासनपर आसीन थे। ये देवगण उनके निकट जाकर उन्हें नमस्कार कर (दानवोंके अत्याचारका) वर्णन करने लगे—'निष्पाप पितामह! त्रिपुरनिवासी दानव आपके ही वरदानसे सुरक्षित होकर हमलोगोंको सेवकोंकी तरह कष्ट दे रहे हैं, अतः आप उन्हें मना कीजिये। पितामह! जैसे बादलोंके उमड़नेपर हंस और सिंहकी दहाड़से मृग भयभीत होकर भागने लगते हैं, उसी प्रकार दानवोंके भयसे हमलोग इधर-उधर लुक-छिप रहे हैं। पापरहित ब्रह्मन्! यहाँतक कि दानवोंद्वारा खदेड़े जानेके कारण हमलोगोंको अपने पुत्रों तथा पत्नियोंके नामतक भूल गये हैं। लोभ एवं मोहसे अंधे हुए दानवगण देवताओंके निवासस्थानोंको तोड़ते-फोड़ते तथा ऋषियोंके आश्रमोंको विध्वस्त करते हुए
४६६* मत्स्यपुराण *

| यदि न त्रायसे लोकं दानवैर्विद्रुतं द्रुतम्।<br>धर्षेणानेन निर्देवं निर्मनुष्याश्रमं जगत्॥ ९<br>इत्येवं त्रिदशैरुक्तः पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रत्याह त्रिदशान् सेन्द्रानिन्दुत्तुल्याननः प्रभुः॥ १०<br>मयस्य यो वरो दत्तो मया मतिमतां वराः।<br>तस्यान्त एष सम्प्राप्तो यः पुरोक्तो मया सुराः॥ ११<br>तच्च तेषामधिष्ठानं त्रिपुरं त्रिदशर्षभाः।<br>एकेषुपातमोक्षेण हन्तव्यं नेषुवृष्टिभिः॥ १२<br>भवतां च न पश्यामि कमप्यत्र सुरर्षभाः।<br>यस्तु चैकप्रहारेण पुरं हन्यात् सदानवम्॥ १३<br>त्रिपुरं नाल्पवीर्येण शक्यं हन्तुं शरेण तु।<br>एकं मुक्त्वा महादेवं महेशानं प्रजापतिम्॥ १४<br>ते यूयं यदि अन्ये च क्रतुविध्वंसकं हरम्।<br>याचामः सहिता देवं त्रिपुरं स हनिष्यति॥ १५<br>कृतः पुराणां विष्कम्भो योजनानां शतं शतम्।<br>यथा चैकप्रहारेण हन्यते वै भवेन तु।<br>पुष्ययोगेन युक्तानि तानि चैकक्षणेन तु॥ १६<br>ततो देवैश्च सम्प्रोक्तो यास्याम इति दुःखितैः।<br>पितामहश्च तैः सार्धं भवसंसदमागतः॥ १७<br>तं भवं भूतभव्येशं गिरिशं शूलपाणिनम्।<br>पश्यन्ति चोमया सार्धं नन्दिना च महात्मना॥ १८<br>अग्निवर्णमजं देवमग्निकुण्डनिभेक्षणम्।<br>अग्न्यादित्यसहस्राभमग्निवर्णविभूषितम् ॥ १९<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं चन्द्रसौम्यतराननम्।<br>आगम्य तमजं देवमथ तं नीललोहितम्॥ २०<br>स्तुवन्तो वरदं शम्भुं गोपतिं पार्वतीपतिम्॥ २१ | घूम रहे हैं। यदि आप शीघ्र ही दानवोंद्वारा विध्वंस किये जाते हुए लोककी रक्षा नहीं करेंगे तो सारा जगत् देवता, मनुष्य और आश्रमसे रहित हो जायगा'॥ १—९॥<br>जब देवताओंने पद्मयोनि ब्रह्मासे इस प्रकार निवेदन किया, तब चन्द्रमाके समान गौरवर्ण मुखवाले सामर्थ्यशाली ब्रह्माने इन्द्रादि देवताओंसे कहा—'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवगण! मैंने मयको जो वर दिया था, उसका यह अन्त समय आ पहुँचा है, जिसे मैंने पहले ही उन लोगोंसे कह दिया था। श्रेष्ठ देवताओ! उनका निवासस्थान वह त्रिपुर तो एक ही बाणके प्रहारसे नष्ट हो जानेवाला है। उसपर बाण-वृष्टिकी आवश्यकता नहीं है, किंतु श्रेष्ठ देवगण! मैं यहाँ तुमलोगोंमेंसे किसीको भी ऐसा नहीं देख रहा हूँ, जो एक ही बाणके आघातसे दानवोंसहित त्रिपुरको नष्ट कर सके। देवाधिदेव प्रजापति शङ्करके अतिरिक्त अन्य कोई अल्प पराक्रमी वीर एक ही बाणसे त्रिपुरका विनाश नहीं कर सकता। इसलिये यदि तुमलोग तथा अन्यान्य देवगण भी एक साथ होकर दक्ष-यज्ञके विध्वंसक भगवान् शङ्करके पास चलकर उनसे याचना करें तो वे त्रिपुरका विनाश कर देंगे। इन पुरोंका विष्कम्भ सौ-सौ योजनोंका बना हुआ है, अतः पुष्य नक्षत्रके योगमें जब ये तीनों एक साथ सम्मिलित होंगे, उसी क्षण भगवान् शङ्कर एक ही बाणके आघातसे इसका विध्वंस कर सकते हैं।' यह सुनकर दुःखित देवताओंने कहा कि 'हमलोग चलेंगे।' तब ब्रह्मा उन्हें साथ लेकर शङ्करजीकी सभामें आये। वहाँ उन्होंने देखा कि भूत एवं भविष्यके स्वामी तथा गिरिपर शयन करनेवाले त्रिशूलपाणि शङ्कर पार्वतीदेवी तथा महात्मा नन्दीके साथ विराजमान हैं। उन अजन्मा महादेवके शरीरका वर्ण अग्निके समान उद्दीप्त था। उनके नेत्र अग्निकुण्डके सदृश लाल थे। उनके शरीरसे सहस्रों अग्नियों और सूर्योंके समान प्रभा छिटक रही थी। वे अग्निके-से रंगवाली विभूतिसे विभूषित थे। उनके ललाटपर बालचन्द्र शोभा पा रहा था और मुख (पूर्णिमाके) चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर दीख रहा था। तब देवगण उन अजन्मा नीललोहित महादेवके निकट गये और पशुपति, पार्वती-प्राणवल्लभ, वरदायक शम्भुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—॥ १०—२१॥ |

* अध्याय १३२ * ४६७


देवा ऊचुःदेवताओंने कहा—
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च।<br>पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने॥ २२<br><br>महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये।<br>ईशानाय भयघ्नाय नमस्त्वन्धकघातिने॥ २३<br><br>नीलग्रीवाय भीमाय वेधसे वेधसा स्तुते।<br>कुमारशत्रुनिघ्नाय कुमारजनकाय च॥ २४<br><br>विलोहिताय धूम्राय वराय क्रथनाय च।<br>नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यशायिने॥ २५<br><br>उरगाय त्रिनेत्राय हिरण्यवसुरेतसे।<br>अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च॥ २६<br><br>वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे।<br>तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च॥ २७<br><br>विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते।<br>नमोऽस्तु दिव्यरूपाय प्रभवे दिव्यशम्भवे॥ २८<br><br>अभिगम्याय काम्याय स्तुत्यायार्च्याय सर्वदा।<br>भक्तानुकम्पिने नित्यं दिशते यन्मनोगतम्॥ २९भगवन्! आप भव—सृष्टिके उत्पादक और पालक, शर्व—प्रलयकालमें सबके संहारक, रुद्र—समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप, वरद—वरप्रदाता, पशुपति*—समस्त जीवोंके स्वामी, उग्र—बहुत ऊँचे, एकादश रुद्रोंमेंसे एक और कपर्दी—जटाजूटधारी हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव—देवताओंके भी पूज्य, भीम—भयंकर, त्र्यम्बक—त्रिनेत्रधारी, एकादश रुद्रोंमें अन्यतम, शान्त—शान्तस्वरूप, ईशान—नियन्ता, भयघ्न—भयके विनाशक और अन्धकघाती—अन्धकासुरके वधकर्ताको प्रणाम है। नीलग्रीव—ग्रीवामें नील चिह्न धारण करनेवाले, भीम—भयदायक, वेधाः—ब्रह्मस्वरूप, वेधसा स्तुतः—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, कुमारशत्रुनिघ्न—कुमार कार्तिकेयके शत्रुओंको मारनेवाले, कुमारजनक—स्वामी कार्तिकेयके पिता, विलोहित—लाल रंगवाले, धूम्र—धूम्रवर्ण, वर—जगत्‌को ढकनेवाले, क्रथन—प्रलयकारी, नीलशिखण्ड—नीली जटावाले, शूली—त्रिशूलधारी, दिव्यशायी—दिव्य समाधिमें लीन रहनेवाले, उरग—सर्पधारी, त्रिनेत्र—तीन नेत्रोंवाले, हिरण्यवसुरेता—सुवर्ण आदि धनके उद्गम-स्थान, अचिन्त्य—अतर्क्य, अम्बिकाभर्ता—पार्वतीपति, सर्वदेवस्तुत—सम्पूर्ण देवोंद्वारा स्तुत, वृषध्वज—बैल-चिह्नसे युक्त ध्वजावाले, मुण्ड—मुण्डधारी, जटी—जटाधारी, ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यसम्पन्न, सलिले तप्यमान—जलमें तपस्या करनेवाले, ब्रह्मण्य—ब्राह्मण-भक्त, अजित—अजेय, विश्वात्मा—विश्वके आत्मस्वरूप, विश्वसृक्—विश्वके स्रष्टा, विश्वमावृत्य तिष्ठते—संसारमें व्याप्त रहनेवाले, दिव्यरूप—दिव्यरूपवाले, प्रभु—सामर्थ्यशाली, दिव्यशम्भु—अत्यन्त मङ्गलमय, अभिगम्य—शरण लेने योग्य, काम्य—अत्यन्त सुन्दर, स्तुत्य—स्तवन करनेयोग्य, सर्वदा अर्च्य—सदा पूजनीय, भक्तानुकम्पी—भक्तोंपर दया करनेवाले और यन्मनोगतं नित्यं दिशते—मनकी अभिलाषा पूर्ण करनेवालेको अभिवादन है॥ २२—२९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे ब्रह्मादिसर्वदेवकृतमहेश्वरस्तवो नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें ब्रह्मादि-सर्वदेवकृत महेश्वरस्तव नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३२॥


* पाशुपत—शैवागमानुसार जीवमात्र पाशबद्ध होनेसे पशु और पाशयुक्त शिव पशुपति कहे गये हैं।