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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१०८ * मत्स्यपुराण *


सत्ताईसवाँ अध्याय

देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः।<br>कचादवेत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ॥ १<br>सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्।<br>कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ २<br>एवमुक्तस्तु सह तैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा।<br>तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यद् विपिने स्त्रियः॥ ३<br>क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे।<br>वायुर्भूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्॥ ४<br>ततो जलात् समुत्तीर्य ताः कन्याः सहितास्तदा।<br>वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथा संस्थान्यनेकशः॥ ५<br>तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा।<br>व्यतिक्रममजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः॥ ६<br>ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत।<br>देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ ७शौनकजी कहते हैं— भरतर्षभ! जब कच मृतसंजीवनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा—'पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ* नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा—दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया॥ १—७॥
देवयान्युवाच<br>कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि।<br>समुदाचारहीनाया न ते श्रेयो भविष्यति॥ ८देवयानी बोली— अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा॥ ८॥
शर्मिष्ठोवाच<br>आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम।<br>स्तौति पृच्छति चाभीक्ष्णं नीचस्थः सुविनीतवत्॥ ९<br>याचतस्त्वं च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः।<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥ १०शर्मिष्ठाने कहा— अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते।

* जैसे इन्द्रके वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।

* अध्याय २७ * । १०९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनायुधा सायुधायाः किं त्वं कुप्यसि भिक्षुकि।<br>लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम्॥ ११अरी भिक्षुकि ! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्ध्री तुझे मिल जायगी। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ॥ ९—११ ॥
शौनक उवाच<br><br>सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि।<br>शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्॥ १२<br>हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।<br>अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा॥ १३<br>अथ तं देशमध्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः।<br>श्रान्तयुग्यः श्रन्तरूपो मृगलिप्सुः पिपासितः॥ १४<br>नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके।<br>ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिव॥ १५<br>तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।<br>सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना॥ १६<br>का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।<br>दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा॥ १७<br>कथं च पतिता ह्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते।<br>दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे॥ १८शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी—ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे भी थकावटसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और पूछा—'सुमध्यमे ! तुम कौन हो? तुम्हारा मुख परम मनोहर है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ'॥ १२–१८॥
देवयान्युवाच<br><br>योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया।<br>तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे॥ १९<br>एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः।<br>समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः॥ २०<br>जानामि त्वां च संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।<br>तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि॥ २१देवयानी बोली— जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज ! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये॥ १९–२१॥
शौनक उवाच<br><br>तामथ ब्राह्मणीं स्त्रीं च विज्ञाय नहुषात्मजः।<br>गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात्॥ २२<br>उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः।<br>आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ॥ २३शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने

१९० * मत्स्यपुराण *

गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता।<br>उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुनः॥ २४नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली॥ २२—२४॥
देवयानुवाच<br>त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः।<br>नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः॥ २५**देवयानीने कहा—**घूर्णिके! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी—उस नगरमें पैर नहीं रखूँगी॥ २५॥
शौनक उवाच<br>सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्।<br>दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना॥ २६<br>आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता।<br>शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः॥ २७<br>श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम्।<br>त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने॥ २८<br>दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।<br>बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥ २९<br>आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।<br>मन्ये दुश्चरितं तस्मिंस्तस्येयं निष्कृतिः कृता॥ ३०**शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा—‘महाप्राज्ञ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।’ अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा—‘बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे—अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपमें प्रायश्चित्त किया है’॥ २६—३०॥
देवयानुवाच<br>निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।<br>शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः॥ ३१<br>सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना।<br>एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी॥ ३२<br>वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।<br>स्तुवतो दुहितासि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः॥ ३३<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।<br>इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः।<br>क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना ततः॥ ३४<br>यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः।<br>प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया॥ ३५**देवयानी बोली—**पिताजी! मुझे अपने कर्मोंके फलसे निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है—मैं भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। ‘देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।’ वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी)॥ ३१—३५॥

३१- ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म

  • अध्याय २८ * १११

शुक्र उवाच**शुक्राचार्यने कहा—**देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है॥ ३६-३७ ॥
स्तुवतो दुहिता न त्वं भद्रे न प्रतिगृह्णतः।<br>अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि॥ ३६
वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः।<br>अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥ ३७

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥


अट्ठाईसवाँ अध्याय

शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष

शुक्र उवाच**शुक्राचार्यने कहा—**बेटी देवयानी! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगत्‌पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है; जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्‌को जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी-से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ १—७ ॥
यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ १
यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा।<br>स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते॥ २
यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ ३
यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति।<br>यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ४
यस्तु भावयते धर्मं योऽतिमात्रं तितिक्षति।<br>यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम्॥ ५
यो यजेदश्वमेधेन मासि मासि शतं समाः।<br>यस्तु कुप्येन सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः॥ ६
ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युश्चेतसः।<br>नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥ ७

१९२ * मत्स्यपुराण *


देवयान्युवाच
वेदाहं तात बालापि कार्याणां तु गतागतम्।<br>क्रोधे चैवातिवादे वा कार्यस्यापि बलाबले ॥ ८<br><br>शिष्यस्याशिष्यवृत्तं हि न क्षन्तव्यं बुभूषुणा।<br>असत्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥ ९<br><br>पुंसो ये नाभिनन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।<br>न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु ॥ १०<br><br>ये नैनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।<br>तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ११<br><br>तन्मे मथ्नाति हृदयमग्निकल्पमिवारणिम्।<br>वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ॥ १२<br><br>न ह्यतो दुष्करं मन्ये तात लोकेष्वपि त्रिषु।<br>यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते ॥ १३देवयानी बोली— पिताजी ! यद्यपि मैं अभी (नादान) बालिका हूँ, फिर भी धर्म-अधर्मका अन्तर समझती हूँ। क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है; परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिये। जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताकी प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषोंमें ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है। तात ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको ठीक उसी तरह मथ रहा है, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है। इससे बढ़कर महान् दुःखी बात मैं तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती, जो स्वयं श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई (सातिशय) लक्ष्मीकी उपासना करता है (उस दुःखी मनुष्यका तो मर जाना ही अच्छा है) ॥ ८—१३॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे ययातिचरितेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययातिचरितविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥


उनतीसवाँ अध्याय

शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना

शौनक उवाच
ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह।<br>वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥ १<br><br>नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव।<br>शनैरावर्त्यमानस्तु मूलान्यपि निकृन्तति ॥ २<br><br>यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पश्यति नप्तृषु।<br>पापमाचरितं कर्म त्रिवर्गमतिवर्तते ॥ ३शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये। वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था। शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'राजन् ! जो (लोकमें) अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता। जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे-धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे-धीरे जड़ काट देता है। यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम न अपने ऊपर दिखायी देता है, न पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर ही तो वह इस त्रिवर्गका अतिक्रमण करके आगेकी पीढ़ियोंपर अवश्य प्रकट होता है।

३२- देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना

* अध्याय २९ *१९३
फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवादरे।<br>यदा घातयसे विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा॥ ४<br><br>अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम्।<br>वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम॥ ५<br><br>वृषपर्वन् निबोध त्वं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्।<br>स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्नोमि त्वया सह॥ ६<br><br>अद्यैवमभिजानामि दैत्यं मिथ्याप्रलापिनम्।<br>यतस्त्वमात्मनोदीर्णां दुहितां किमुपेक्षसे॥ ७जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है। राजन्! अङ्गिराका पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण है। वह स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ है तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न था, परंतु तुमने उसका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें धकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूँगा। राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। दैत्यराज! आज मैं तुम-जैसे मिथ्याप्रलापी दैत्यको भलीभाँति समझ सका हूँ। तुम अपनी पुत्रीके उद्धत स्वभावकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?'॥ १—७॥
वृषपर्वावाच<br>नावहं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव।<br>त्वयि सत्यं च धर्मश्च तत् प्रसीदतु मां भवान्॥ ८<br>अद्यास्मानपहाय त्वमितो यास्यसि भार्गव।<br>समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामि नान्यदस्ति परायणम्॥ ९वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! आपने मेरे जानते कभी अनुचित या मिथ्या भाषण नहीं किया। आपमें धर्म और सत्य सदा प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये! भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो मैं (तुरन्त) समुद्रमें प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि हमारे लिये फिर दूसरी कोई गति नहीं है॥ ८-९॥
शुक्र उवाच<br>समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा व्रजतासुराः।<br>दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे॥ १०<br><br>प्रसाद्यतां देवयानीं जीवितं यत्र मे स्थितम्।<br>योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः॥ ११शुक्राचार्यने कहा— असुरो! तुम लोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ, मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानीको प्रसन्न करो; क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा॥ १०-११॥
वृषपर्वावाच<br>यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव।<br>भुवि हस्तिरथाश्वं वा तस्य त्वं मम चेश्वरः॥ १२वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं॥ १२॥
शुक्र उवाच<br>यत्किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर।<br>तस्येश्वरोऽस्मि यद्येतद् देवयानी प्रसाद्यताम्॥ १३शुक्राचार्यने कहा— महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो॥ १३॥
१९४* मत्स्यपुराण *

| शौनक उवाच<br>ततस्तु त्वरितः शुक्रस्तेन राज्ञा समं ययौ।<br>उवाच चैनां सुभगे प्रतिपन्नं वचस्तव॥ १४॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर शुक्राचार्य तुरंत ही राजा वृषपर्वाके साथ अपनी पुत्री देवयानीके पास पहुँचे और उससे बोले—'सुभगे! तुम्हारी बात पूरी हो गयी'॥ १४॥ | | देवयान्युवाच<br>यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव।<br>नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा वदतु मां स्वयम्॥ १५॥ | तब देवयानीने कहा—तात भार्गव! 'आप राजाके धनके स्वामी हैं' मैं इस बातको आपके कहनेसे नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें तो हमें विश्वास होगा॥ १५॥ | | वृषपर्वोवाच<br>यं काममभिजानासि देवयानि शुचिस्मिते।<br>तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम्॥ १६॥ | वृषपर्वा बोले—पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं उसे तुम्हें अवश्य दूँगा (यह तुम विश्वास करो)॥ १६॥ | | देवयान्युवाच<br>दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये।<br>अनुयास्यति मां तत्र यत्र दास्यति मे पिता॥ १७॥ | देवयानीने कहा—मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी बनकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय॥ १७॥ | | वृषपर्वोवाच<br>उत्तिष्ठ धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठां शीघ्रमानय।<br>यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्॥ १८॥ | यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा—धात्रि! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको (यहाँ) शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जिस वस्तुकी कामना हो, उसे वह पूर्ण करे॥ १८॥ | | शौनक उवाच<br>ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्।<br>उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह॥ १९॥<br>यं सा कामयते कामं स कार्योऽत्र त्वयानघे।<br>दासी त्वमभिजातासि देवयान्याः सुशोभने॥ २०॥<br>त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः। | शौनकजी कहते हैं—तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा—'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ। पापरहित राजकुमारी! आज शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों—यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये। सुशोभने! तुम देवयानीकी दासी बनायी गयी हो'॥ १९-२० १/२॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>यं च कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्।<br>मा गान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मत्कृते॥ २१॥ | शर्मिष्ठा बोली—यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती हैं, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे न शुक्राचार्यजी कहीं जायें और न देवयानी ही। मेरे कारण ये अन्यत्र जानेका विचार न करें॥ २१॥ | | शौनक उवाच<br>ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकया तदा।<br>पितुर्निदेशात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २२॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिविकापर आरूढ हो तुरन्त राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी॥ २२॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>अहं कन्यासहस्रेण दासी ते परिचारिका।<br>ध्रुवं त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता॥ २३॥ | शर्मिष्ठा बोली—देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, निश्चय ही वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २३॥ |

* अध्याय ३० * १९५


देवयान्युवाच<br>स्तुवतो दुहिता चाहं याचतः प्रतिगृह्णतः।<br>स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि॥ २४**देवयानीने कहा—**अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं, फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ? ॥ २४ ॥
शर्मिष्ठोवाच<br>येन केनचिदार्त्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्।<br>अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्यति ते पिता॥ २५**शर्मिष्ठा बोली—**जिस-किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। (इसलिये) तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २५॥
शौनक उवाच<br>प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः।<br>देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत्॥ २६**शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा॥ २६॥
देवयान्युवाच<br>प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम।<br>अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते॥ २७**देवयानी बोली—**पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है॥ २७॥
शौनक उवाच<br>एवमुक्तो द्विजश्रेष्ठो दुहित्रा सुमहायशाः।<br>प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः॥ २८**शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया॥ २८॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरितवर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९॥


तीसवाँ अध्याय

सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वनविहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह

शौनक उवाच<br>अथ दीर्घेण कालेन देवयानी नृपोत्तम।<br>वनं तदैव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी॥ १<br>तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा।<br>तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा॥ २<br>ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम्।<br>क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधु माधवम्॥ ३<br>खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् फलानि विविधानि च।<br>पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया॥ ४**शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी। उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनमें उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सब वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय दैवेच्छासे नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये

१९६ * मत्स्यपुराण *


| तमेव देशं सम्प्राप्तो जललिप्सुः प्रतर्षितः।<br>ददर्श देवयानीं च शर्मिष्ठां ताश्च योषितः ॥ ५<br>पिबन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूषिताः ।<br>उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम् ॥ ६<br>रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् ।<br>शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥ ७ | उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंको भी देखा। वे सभी पीनेयोग्य रसका पान कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ परम सुन्दर आसनपर बैठी हुई देखा। उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठा उसकी चरणसेवा कर रही थी॥ ५—७॥ | | ययातिरुवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते ।<br>गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यतो ह्यहम् ॥ ८ | ययातिने पूछा— दो हजार * कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें॥ ८॥ | | देवयान्युवाच<br>आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप ।<br>शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् ॥ ९<br>इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी।<br>दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः ॥ १० | देवयानी बोली— महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी साथ जायगी ॥ ९-१०॥ | | ययातिरुवाच<br>कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी।<br>असुरेन्द्रसुता सुभ्रूः परं कौतूहलं हि मे ॥ ११ | ययाति बोले— सुन्दरि! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ११ ॥ | | देवयान्युवाच<br>सर्वमेव नरव्याघ्र विधानमनुवर्तते ।<br>विधिना विहितं ज्ञात्वा मा विचित्रं मनः कृथाः ॥ १२<br>राजवद् रूपवेशौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च ।<br>किं नामा त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ॥ १३ | देवयानी बोली— नरश्रेष्ठ! सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये। आपके रूप और वेश राजाके समान हैं और आप विशुद्ध संस्कृत भाषा बोल रहे हैं। मुझे बताइये, आपका क्या नाम है, आप कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ॥ १२-१३॥ | | ययातिरुवाच<br>ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः ।<br>राजांहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ॥ १४ | ययातिने कहा— मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है ॥१४॥ | | देवयान्युवाच<br>केन चार्थेन नृपते ह्येनं देशं समागतः ।<br>जिघृक्षुर्वारि यत् किञ्चिदथवा मृगलिप्सया ॥ १५ | देवयानीने कहा— महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं ? ॥ १५ ॥ | | ययातिरुवाच<br>मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमिहागतः ।<br>बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ | ययातिने कहा— भद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ, अतः अब आप मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥ |


* यहाँ किन्हीं श्लोकोंमें देवयानीकी दो हजार और किन्हींमें एक हजार सखियोंका उल्लेख हुआ है। यथावसर दोनों ही ठीक हैं।

३३- ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना

* अध्याय ३० * । ११७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवान्युवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्त्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह।<br>त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखे भर्ता च मे भव ॥ १७**देवयानीने कहा—**सखे! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे पति हो जायँ ॥ १७॥
ययातिरुवाच<br>विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वदर्होऽस्मि भामिनि।<br>अविवाह्याः स्म राजानो देवयानि पितुस्तव ॥ १८**ययाति बोले—**शुक्रनन्दिनी देवयानि! आपका भला हो। भामिनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं॥ १८ ॥
देवान्युवाच<br>सृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं ब्रह्मणि संश्रितम्।<br>ऋषिश्च ऋषिपुत्रश्च नाहुषाद्य भजस्व माम् ॥ १९**देवयानीने कहा—**नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं; अतः आज मुझसे विवाह कीजिये ॥ १९॥
ययातिरुवाच<br>एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वरानने।<br>पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां वै ब्राह्मणो वरः ॥ २०**ययाति बोले—**वरानने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है, परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सभी वर्णोंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
देवान्युवाच<br>पाणिग्रहो नाहुषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा।<br>त्वमेनमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ॥ २१<br>कथं तु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत्।<br>गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्युषिणा त्वया ॥ २२**देवयानीने कहा—**नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपने ही मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपका ही मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ। मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप-जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा कोई कैसे कर सकता है? ॥ २१-२२ ॥
ययातिरुवाच<br>क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्रः पुरुषेण विजानता ॥ २३**ययाति बोले—**देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प अथवा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ॥ २३ ॥
देवान्युवाच<br>कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ॥ २४**देवयानीने कहा—**पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ॥ २४ ॥
ययातिरुवाच<br>दशेदाशीविषस्त्वेकं शस्त्रेणैकश्च वध्यते।<br>हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २५<br>दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम।<br>अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६**ययाति बोले—**भद्रे! सर्प एकको ही डँसता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर सकता है। भीरु! इसीलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा॥ २५-२६॥
देवान्युवाच<br>दत्तां वहस्व पित्रा मां त्वं हि राजन् वृतो मया।<br>अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७**देवयानीने कहा—**राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं, उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे; अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। (राजन्! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ। धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुष-नन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है।) ॥ २७ ॥

१९८ * मत्स्यपुराण * शौनक उवाच त्वरितं देवयान्याथ प्रेषिता पितुरात्मनः। सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ २८ श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः। दृष्ट्वैवमागतं विप्रं ययातिः पृथिवीपतिः ॥ २९ ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः। तं चाप्यभ्यवदत् काव्यः साम्ना परमवल्गुना ॥ ३० देवयान्युवाच राजायं नहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत्। नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ॥ ३१ शुक्र उवाच वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया। गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज ॥ ३२ ययातिरुवाच अधर्मो मां स्पृशेदेवं पापमस्याश्च भार्गव। वर्णसंकरतो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥ ३३ शुक्र उवाच अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वरं वरय चेप्सितम्। अस्मिन् विवाहे त्वं श्लाघ्यो रहःपापं नुदामि ते ॥ ३४ वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं शुचिस्मिताम्। अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ॥ ३५ इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी। सम्पूज्या सततं राजन् न चैनां शयने ह्वय ॥ ३६ शौनक उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्। जगाम स्वपुरं हृष्टः सोऽनुज्ञातो महात्मना ॥ ३७ शौनकजी कहते हैं - राजन् ! इस प्रकार देवयानीने तुरन्त धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये। तब शुक्राचार्यने भी राजाको परम मधुर वाणीसे सान्त्वना प्रदान की ॥ २८-३० ॥ देवयानी बोली- तात ! आपको (हाथ जोड़कर) नमस्कार है। ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था। आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें। मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी ॥ ३१ ॥ शुक्राचार्यने कहा - वीर नहुषनन्दन ! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है, अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ३२ ॥ ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन् ! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ॥ ३३ ॥ शुक्राचार्यने कहा - राजन् ! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो। विवाहको लेकर तुम प्रशंसाके पात्र बन जाओगे। मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ। तुम सुन्दर मुसकानवाली देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो। महाराज ! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न सुलाना ॥ ३४-३६ ॥ (तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे (देवयानीको) अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी।) शौनकजी कहते हैं - शतानीक ! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की (और शास्त्रोक्त विधिसे मङ्गलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया)। पुनः उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको चले गये ॥ ३७ ॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

* अध्याय ३१ *१९९

एकतीसवाँ अध्याय

ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म

शौनक उवाचशौनकजी कहते हैं—
ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम्।<br>प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत्॥ १<br><br>देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः।<br>अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्॥ २<br><br>वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठामासुरायणीम्।<br>वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसंवृताम्॥ ३<br><br>देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः।<br>विजहार बहून्ब्दान् देववन्मुदितो भृशम्॥ ४<br><br>ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवयानी वराङ्गना।<br>लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारश्च व्यजायत॥ ५<br><br>गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा कमलेक्षणा॥ ६<br><br>चिन्तयामास धर्मज्ञा ऋतुप्राप्तौ च भामिनी।<br>ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न कश्चिन्मे पतिर्वृतः॥ ७<br><br>किं प्राप्तं किं च कर्तव्यं कथं कृत्वा सुखं भवेत्।<br>देवयानी प्रसूतासौ वृथाहं प्राप्तयौवना॥ ८<br><br>यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम्।<br>राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः।<br>अपीदानीं स धर्मात्मा रहो मे दर्शनं व्रजेत्॥ ९शतानीक! ययातिकी राजधानी महेन्द्रपुरी (अमरावती)-के समान थी। उन्होंने वहाँ आकर देवयानीको अन्तःपुरमें स्थान दिया तथा उसीकी अनुमतिसे अशोकवाटिकाके समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको उसकी एक हजार दासियोंके साथ ठहराया और उन सबके लिये अन्न, वस्त्र तथा पेय आदिकी अलग-अलग व्यवस्था कर दी। (देवयानी ययातिके साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिकामें आती और शर्मिष्ठाके साथ वन-विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजाके साथ महलमें चली जाती थी। इस तरह वह बहुत समयतक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही।) नहुषकुमार राजा ययातिने देवयानीके साथ बहुत वर्षोंतक देवताओंकी भाँति विहार किया। वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे। ऋतुकाल आनेपर सुन्दरी देवयानीने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्रको जन्म दिया। इधर एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर युवावस्थाको प्राप्त हुई वृषपर्वाकी पुत्री कमलनयनी शर्मिष्ठाने अपनेको रजस्वलावस्थामें देखा और चिन्तामग्न हो मन-ही-मन कहने लगी—'मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया, किंतु अभीतक मैंने पतिका वरण नहीं किया। यह कैसी परिस्थिति आ गयी। अब क्या करना चाहिये अथवा क्या करनेसे सुख होगा। देवयानी तो पुत्रवती हो गयी, किंतु मुझे जो युवावस्था प्राप्त हुई है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ। मेरे याचना करनेपर राजा मुझे पुत्ररूप फल दे सकते हैं, इस बातका मुझे पूरा विश्वास है; परंतु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्तमें दर्शन देंगे?॥ १—९॥
शौनक उवाच<br><br>अथ निष्क्रम्य राजासौ तस्मिन् काले यदृच्छया।<br>अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्राप्य विस्मितः॥ १०<br><br>तमेकं रहसि दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी।<br>प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत्॥ ११शौनकजी कहते हैं— शतानीक! शर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देखा। तब उसने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही— ॥ १०-११ ॥

३४- राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना

१२० * मत्स्यपुराण *


शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, वायु, यम अथवा वरुण ही क्यों न हों, आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव मैं यहाँ सर्वथा सुरक्षित हूँ।) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये—मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये॥ १२-१३॥
सोमश्चेन्द्रश्च वायुश्च यमश्च वरुणश्च वा।<br>तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति॥ १२<br>रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा।<br>सा त्वां याचे प्रसाद्येह रन्तुमेहि नराधिप॥ १३
ययातिरुवाचययातिने कहा—शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो; परंतु क्या करूँ, जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना'॥ १४-१५॥
वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम्।<br>रूपं तु ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम्॥ १४<br>मामब्रवीत् तदा शुक्रो देवयानीं यदावहम्।<br>नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी॥ १५
शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियोंके प्रति, विवाहके समय, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकारके असत्य पापशून्य बताये गये हैं। महाराज! गवाही देते समय किसीके पूछनेपर जो अन्यथा (असत्य) भाषण करते हैं, वे मिथ्यावादी कहलाते हैं; परंतु जहाँ दो व्यक्तियोंके (जैसे देवयानीका तथा मेरा) कल्याणका प्रसङ्ग उपस्थित हो, वहाँ एकका (अर्थात् मेरा) कल्याण न करना असत्य भाषण है, जो वक्ताकी (अर्थात् आपकी) हानि कर सकता है॥ १६-१७॥
न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति<br>न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले।<br>प्राणात्यये सर्वधनापहारे<br>पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६<br>पृष्टास्तु साक्ष्ये प्रवदन्ति चान्यथा<br>भवन्ति मिथ्यावचना नरेन्द्र ते।<br>एकार्थतायां तु समाहितायां<br>मिथ्यावदन्नं ह्यनृतं हिनस्ति॥ १७
ययातिरुवाचययाति बोले—देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है। यदि वह झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है; अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं गलत काम नहीं कर सकता॥ १८॥
राजा प्रमाणं भूतानां स विनश्येन्मृषा वदन्।<br>अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे॥ १८
शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—राजन्! अपना पति और सखीका पति—दोनों बराबर माने गये हैं। मेरी सखीने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया॥ १९॥
समावेतौ मतौ राजन् पतिः सख्याश्च यः पतिः।<br>समं विवाह इत्याहुः सख्या मेऽसि पतिर्यतः॥ १९
ययातिरुवाचययाति बोले—याचकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जायँ, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथकी याचना करती हो; अतः बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ॥ २०॥
दातव्यं याचमानस्य हीति मे व्रतमाहितम्।<br>त्वं च याचसि कामं मां ब्रूहि किं करवाणि तत्॥ २०
शर्मिष्ठोवाचशर्मिष्ठाने कहा—राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये। मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ। महाराज! तीन व्यक्ति धनके अधिकारी नहीं होते—पत्नी, दास और पुत्र। उनकी सम्पत्ति भी उसीकी होती है, जहाँ ये
अधर्मात् त्राहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय।<br>त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम्॥ २१<br>त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।<br>यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम्॥ २२*

*यह श्लोक स्वल्पान्तरसे मनुस्मृति ८। ४१६, नारदस्मृति ५। ३९, महाभारत १। ८२। २२ आदिमें भी है। मेधातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट, राघवानन्द आदि मनुके सभी व्याख्याता इस श्लोकका तात्पर्य धनके व्ययमें अभिभावककी सहमति लेनेमें ही चरितार्थ मानते हैं। नीलकण्ठकी व्याख्या केवल प्रस्तुत प्रसङ्गसे ही सम्बद्ध है।

* अध्याय ३१ * १२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी।<br>सा चाहं च त्वया राजन् भजनीये भजस्व माम्॥ २३<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तस्तया राजा तथ्यमित्यभिजज्ञिवान्।<br>पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रतिपादयन्॥ २४<br>स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च।<br>अन्योन्यं चाभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम्॥ २५<br>तस्मिन् समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>लेभे गर्भं प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात्॥ २६<br>प्रजज्ञे च ततः काले राज्ञी राजीवलोचना।<br>कुमारं देवगर्भाभमादित्यसमतेजसम्॥ २७जाते—जिसके अधिकारमें रहते हैं; अर्थात् पत्नीके धनपर पतिका, सेवकके धनपर स्वामीका और पुत्रके धनपर पिताका अधिकार होता है। मैं देवयानीकी सेविका हूँ और देवयानी आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं—दोनों ही आपके सेवन अपनाने योग्य हैं। इसलिये आप मुझे भी अङ्गीकार कीजिये॥ २१—२३॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—शर्मिष्ठाके ऐसा कहनेपर राजाने उसकी बातोंको ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठाका सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया। फिर शर्मिष्ठाके साथ सहवास करके एक-दूसरेका आदर-सत्कार करनेके पश्चात् दोनों जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने स्थानपर चले गये। सुन्दर भौंहोंवाली वृषपर्वा-कुमारी शर्मिष्ठाने उस सहवासमें नृपश्रेष्ठ ययातिसे प्रथम गर्भ धारण किया। शतानीक! तदनन्तर समय आनेपर कमलके समान नेत्रोंवाली शर्मिष्ठाने देवबालक-जैसे सुन्दर एवं सूर्यके समान तेजस्वी एक कुमारको उत्पन्न किया॥ २४—२७॥

॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित नामक एकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३१॥


बत्तीसवाँ अध्याय

देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>श्रुत्वा कुमारं जातं सा देवयानी शुचिस्मिता।<br>चिन्तयाविष्टदुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत॥ १<br>ततोऽभिगम्य शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>किमर्थं वृजिनं सुभ्रु कृतं ते कामलुब्धया॥ २<br><br>शर्मिष्ठोवाच<br>ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् धर्मात्मा वेदपारगः।<br>स मया तु वरः कामं याचितो धर्मसंहतम्॥ ३<br>नाहमन्यायात् काममाचरामि शुचिस्मिते।<br>तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते॥ ४शौनकजी कहते हैं— भारत! पवित्र मुसकानवाली देवयानीने जब सुना कि शर्मिष्ठाके पुत्र हुआ है, तब वह दुःखसे पीड़ित हो शर्मिष्ठाके व्यवहारको लेकर बड़ी चिन्तामें पड़ गयी। वह शर्मिष्ठाके पास गयी और इस प्रकार बोली—'सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठे! तुमने काम-लोलुप होकर यह कैसा पाप कर डाला है?'॥ १-२॥<br><br>शर्मिष्ठा बोली— सखी! कोई धर्मात्मा ऋषि आये थे, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। मैंने उन वरदायक ऋषिसे धर्मानुसार कामकी याचना की। शुचिस्मिते! मैं न्यायविरुद्ध कामका आचरण नहीं करती। उन ऋषिसे ही मुझे संतान पैदा हुई है, यह तुमसे सत्य कहती हूँ॥ ३-४॥

३५- वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति

१२२* मत्स्यपुराण *

| देवयान्युवाच<br>यद्येतदेवं शर्मिष्ठे न मन्युर्विद्यते मम।<br>अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठाच्छ्रेष्ठाच्च वै द्विजात्॥ ५<br>शोभनं भीरु सत्यं चेत् कथं स ज्ञायते द्विजः।<br>गोत्रनामाभिजनतः श्रोतुमिच्छामि तं द्विजम्॥ ६ | देवयानीने कहा—शर्मिष्ठे! यदि ऐसी बात है, तुमने यदि ज्येष्ठ और श्रेष्ठ द्विजसे संतान प्राप्त की है तो तुम्हारे ऊपर मेरा क्रोध नहीं रहा। भीरु! यदि ऐसी बात है तो बहुत अच्छा हुआ। क्या उन द्विजके गोत्र, नाम और कुलका कुछ परिचय मिला है? मैं उनको जानना चाहती हूँ॥ ५-६॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>ओजसा तेजसा चैव दीप्यमानं रविं यथा।<br>तं दृष्ट्वा मम सम्प्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छुचिस्मिते॥ ७ | शर्मिष्ठा बोली—शुचिस्मिते! वे अपने तप और तेजसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर मुझे कुछ पूछनेका साहस ही न हुआ॥ ७॥ | | शौनक उवाच<br>अन्योन्यमेवमुक्त्वा च सम्प्रहस्य च ते मिथः।<br>जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यभिजानती॥ ८<br>ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपः।<br>यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ॥ ९<br>तस्मादेव तु राजर्षेः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>द्रुह्युं चानुं च पूरुं च त्रीन् कुमारानजीजनत्॥ १०<br>ततःकाले च कस्मिंश्चिद् देवयानी शुचिस्मिता।<br>ययातिसहिता राजन्नगाम हरितं वनम्॥ ११<br>ददर्श च तदा तत्र कुमारान् देवरूपिणः।<br>क्रीडमानान् सुविस्रब्धान् विस्मिता चेदमब्रवीत्॥ १२ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! वे दोनों आपसमें इस प्रकार बातें करके हँस पड़ीं। देवयानीको प्रतीत हुआ कि शर्मिष्ठा ठीक कहती है, अतः वह चुपचाप महलमें चली गयी। राजा ययातिने देवयानीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे—यदु और तुर्वसु। वे दोनों दूसरे इन्द्र और विष्णुकी भाँति प्रतीत होते थे। उन्हीं राजर्षिसे वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने तीन पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम थे—द्रुह्यु, अनु और पूरु। राजन्! तदनन्तर किसी समय पवित्र मुसकानवाली देवयानी ययातिके साथ एकान्त वनमें गयी। वहाँ उसने देवताओंके समान सुन्दर रूपवाले कुछ बालकोंको निर्भय होकर क्रीडा करते देखा। उन्हें देखकर वह आश्चर्यचकित हो इस प्रकार बोली॥ ८—१२॥ | | देवयान्युवाच<br>कस्यैते दारका राजन् देवपुत्रोपमाः शुभाः।<br>वर्चसा रूपतश्चैव दृश्यन्ते सदृशास्तव॥ १३<br>एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान् पर्यपृच्छत।<br>किं नामधेयगोत्रे वः पुत्रका ब्राह्मणः पिता॥ १४<br>विब्रूत मे यथातथ्यं श्रोतुकामास्म्यतो ह्यहम्।<br>तेऽदर्शयन् प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम्॥ १५<br>शर्मिष्ठां मातरं चैव तस्या ऊचुः कुमारकाः। | देवयानीने पूछा—राजन्! ये देवबालकोंके तुल्य शुभ लक्षणसम्पन्न कुमार किसके हैं? तेज और रूपमें तो ये मुझे आपके ही समान जान पड़ते हैं। राजासे इस प्रकार पूछकर उसने फिर उन कुमारोंसे प्रश्न किया—'बच्चो! तुमलोग किस गोत्रमें उत्पन्न हुए हो? तुम्हारे ब्राह्मण पिताका क्या नाम है? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ। मैं तुम्हारे पिताका नाम सुनना चाहती हूँ।' (देवयानीके इस प्रकार पूछनेपर) उन बालकोंने पिताका परिचय देते हुए तर्जनी अँगुलीसे उन्हीं नृपश्रेष्ठ ययातिको दिखा दिया और शर्मिष्ठाको अपनी माता बताया॥ १३—१५½॥ | | शौनक उवाच<br>इत्युक्त्वा सहितास्तेन राजानमुपचक्रमुः॥ १६<br>नाभ्यनन्दत तान् राजा देवयान्यास्तदान्तिके।<br>रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्बालकास्तदा॥ १७<br>दृष्ट्वा तेषां तु बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति।<br>बुद्ध्वा च तत्त्वतो देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्॥ १८ | शौनकजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सब बालक एक साथ राजाके समीप आ गये, परंतु उस समय देवयानीके निकट राजाने उनका अभिनन्दन नहीं किया—इन्हें गोदमें नहीं उठाया। तब बालक रोते हुए शर्मिष्ठाके पास चले गये। (उनकी बातें सुनकर राजा ययाति लज्जित-से हो गये।) उन बालकोंका राजाके प्रति विशेष प्रेम देखकर देवयानी सारा रहस्य समझ गयी और शर्मिष्ठासे इस प्रकार बोली—॥ १६—१८॥ |

* अध्याय ३२ *१२३

| देवयान्युवाच | देवयानी बोली — शर्मिष्ठे ! तुमने मेरे अधीन होकर भी मुझे अप्रिय लगनेवाला बर्ताव क्यों किया ? तुम फिर उसी असुर-धर्मपर उतर आयी। क्या मुझसे नहीं डरती ? ॥ १९ ॥ | | मदधीना सती कस्मादकार्षीर्विप्रियं मम।<br>तमेवासुरधर्मं त्वमास्थिता न बिभेषि किम् ॥ १९ | | | शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठा बोली — मनोहर मुसकानवाली सखी ! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामीका परिचय दिया था, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्मके अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती। जब तुमने राजाका पतिरूपमें वरण किया था, उसी समय मैंने भी कर लिया। शोभने ! तुम ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ हो, ब्राह्मणपुत्री हो, अतः मेरे लिये माननीय एवं पूजनीय हो; परंतु ये राजर्षि मेरे लिये तुमसे भी अधिक पूजनीय हैं। क्या यह बात तुम नहीं जानती ? (शुभे ! तुम्हारे पिता और मेरे गुरु (शुक्राचार्यजी)-ने हम दोनोंको एक ही साथ महाराजकी सेवामें समर्पित किया है। तुम्हारे पति और पूजनीय महाराज ययाति भी मुझे पालन करने योग्य मानकर मेरा पोषण करते हैं।) ॥ २०–२२ ॥ | | यदुक्तमृषिरित्येव तत् सत्यं चारुहासिनि।<br>न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते ॥ २०<br><br>यदा त्वया वृतो राजा वृत एव तदा मया।<br>सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ॥ २१<br><br>पूज्यासि मम मान्या च श्रेष्ठा ज्येष्ठा च ब्राह्मणी।<br>त्वत्तो हि मे पूज्यतरो राजर्षिः किं न वेत्सि तत् ॥ २२ | | | शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं — शर्मिष्ठाका यह वचन सुनकर देवयानीने कहा—'राजन्! अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी। आपने मेरा अत्यन्त अप्रिय किया है।' ऐसा कहकर तरुणी देवयानी आँखोंमें आँसू भरकर सहसा उठी और तुरन्त ही शुक्राचार्यजीके पास जानेके लिये वहाँसे चल दी। यह देख उस समय राजा ययाति व्यथित हो गये। वे व्याकुल हो देवयानीको समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किंतु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह राजासे कुछ न बोलकर केवल नेत्रोंसे आँसू बहाये जाती थी। कुछ ही देरमें वह कवि-पुत्र शुक्राचार्यके पास पहुँची। पिताको देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययातिने भी शुक्राचार्यकी वन्दना की ॥ २३–२७ ॥ | | श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>राजन् नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे त्वया कृतम् ॥ २३<br><br>सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम्।<br>तूर्णं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४<br><br>अनुवव्राज सम्भ्रान्तः पृष्टतः सान्त्वयन् नृपः।<br>न्यवर्तत न सा चैव क्रोधसंरक्तलोचना ॥ २५<br><br>अविब्रुवन्ती किंचिच्च राजानं साश्रुलोचना।<br>अचिरादेव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६<br><br>सा तु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता।<br>अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ २७ | | | देवयान्युवाच | देवयानीने कहा — पिताजी ! अधर्मने धर्मको जीत लिया। नीचकी उन्नति हुई और उच्चकी अवनति। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मुझे लाँघकर आगे बढ़ गयी। इन महाराज ययातिसे ही उसके तीन पुत्र हुए हैं, किंतु तात ! मुझ भाग्यहीनाके दो ही पुत्र हुए हैं। यह मैं आपसे ठीक बता रही हूँ। भृगुश्रेष्ठ ! ये महाराज धर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध हैं, किंतु इन्होंने मर्यादाका उल्लङ्घन किया है। कवि-नन्दन ! यह मैं आपसे यथार्थ कह रही हूँ ॥ २८–३० ॥ | | अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम्।<br>शर्मिष्ठा यातिवृत्तास्ति दुहिता वृषपर्वणः ॥ २८<br><br>त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञानेन ययातिना।<br>दुर्भागाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥ २९<br><br>धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह।<br>अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत् कथयामि ते ॥ ३० | |

३६- इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना

१२४* मत्स्यपुराण *

| शुक्र उवाच<br>धर्मज्ञस्त्वं महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम्।<br>तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया॥ ३१ | शुक्राचार्यने (ययातिसे) कहा— महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है। इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी॥ ३१॥ | | ययातिरुवाच<br>ऋतुं यो याच्यमानाया न ददाति पुमान् वृतः।<br>भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन् स चेह ब्रह्मवादिभिः॥ ३२<br><br>ऋतुकामां स्त्रियं यस्तु गम्यां रहसि याचितः।<br>नोपैति यो हि धर्मेण ब्रह्महेत्युच्यते बुधैः॥ ३३<br><br>इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह।<br>अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान्॥ ३४ | ययाति बोले— भगवन्! दानवराजकी पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी, अतः मैंने धर्मसम्मत मानकर यह कार्य किया, किसी दूसरे विचारसे नहीं। ब्रह्मन्! जो पुरुष न्याययुक्त ऋतुकी याचना करनेवाली स्त्रीको ऋतुदान नहीं देता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा भ्रूण (गर्भ)-की हत्या करनेवाला कहा जाता है। जो न्यायसम्मत कामनासे युक्त गम्या स्त्रीके द्वारा एकान्तमें प्रार्थना करनेपर उसके साथ समागम नहीं करता, वह धर्मशास्त्रके विद्वानोंद्वारा गर्भ या ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला बताया जाता है। (ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह अवश्य दे दूँगा। आपके ही द्वारा मुझे सौंपी हुई शर्मिष्ठा इस जगत्में दूसरे किसी पुरुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी; अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना धर्म समझकर मैंने वैसा किया है। आप इसके लिये मुझे क्षमा करें।) भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं सब कारणोंका विचार करके अधर्मके भयसे उद्विग्न हो मैं शर्मिष्ठाके पास गया था॥ ३२-३४॥ | | शुक्र उवाच<br>न त्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव।<br>मिथ्याचरणधर्मेषु चौर्यं भवति नाहूष॥ ३५ | शुक्राचार्यने कहा— राजन्! तुम्हें इस विषयमें मेरे आदेशका भी ध्यान रखना चाहता था; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। नहुषनन्दन! धर्ममें मिथ्या आचरण करनेवाले पुरुषको चोरीका पाप लगता है॥ ३५॥ | | शौनक उवाच<br>क्रोधेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा।<br>पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत॥ ३६ | शौनकजी कहते हैं— क्रोधमें भरे हुए शुक्राचार्यके शाप देनेपर नहुष-पुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था (यौवन)-का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये॥ ३६॥ | | ययातिरुवाच<br>अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह।<br>प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं मा विशेत माम्॥ ३७ | ययाति बोले— भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानीके साथ युवावस्थामें रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ, अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीरमें प्रवेश न करे॥ ३७॥ | | शुक्र उवाच<br>नाहं मृषा वदाम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप।<br>जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन् संक्रामय यदिच्छसि॥ ३८ | शुक्राचार्यने कहा— भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता। बूढ़े तो तुम हो ही गये, किंतु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल सकते हो॥ ३८॥ | | ययातिरुवाच<br>राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा।<br>यो दद्यान्मे वयः शुक्र तद् भवाननुमन्यताम्॥ ३९ | ययाति बोले— ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका भागी होनेके साथ ही मेरे राज्यका भी भागी हो। शुक्राचार्यजी! आप इसका अनुमोदन करें॥ ३९॥ |

* अध्याय ३३ *१२५

| शुक्र उवाच | शुक्राचार्यने कहा— नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे। उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा। साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा॥ ४०-४१॥ | | संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज।<br>मामनुध्याय तत्त्वेन न च पापमवाप्स्यसि॥ ४०<br>वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति।<br>आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च॥ ४१ | |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिचरित नामक बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना

SanskritHindi
शौनक उवाच<br>जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि।<br>पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रवीद् वचः॥ १शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययाति बुढ़ापा लेकर वहाँसे अपने नगरमें आये और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदुसे इस प्रकार बोले—॥ १॥
ययातिरुवाच<br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २<br>त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयान्हम्॥ ३<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु त्वदीयं यौवनं त्वहम्।<br>दत्त्वा सम्प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ ४ययातिने कहा— तात! कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, मेरे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये, किंतु मैं अभी जवानीके भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। यदो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा विषयोंका उपभोग करूँ। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी देकर बुढ़ापेके साथ अपना दोष वापस ले लूँगा॥ २-४॥
यदुरुवाच<br>सितश्मश्रुधरो दीनो जरसा शिथिलीकृतः।<br>बलीसंततगात्रश्च दुर्दर्शो दुर्बलः कृशः॥ ५<br>अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवने।<br>सहोपजीविभिश्चैव तज्जरां नाभिकामये॥ ६<br>सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप।<br>जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रमन्यं वृणीष्व वै॥ ७यदु बोले— महाराज! मैं उस बुढ़ापेको लेनेकी इच्छा नहीं करता, जिसके आनेपर दाढ़ी-मूँछके बाल सफेद हो जाते हैं, जीवनका आनन्द चला जाता है। वृद्धावस्था सर्वथा शिथिल कर देती है। सारे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और मनुष्य इतना दुर्बल तथा कृशकाय हो जाता है कि उसकी ओर देखते नहीं बनता। बुढ़ापेमें काम-काज करनेकी शक्ति नहीं रहती, युवतियाँ तथा जीविका पानेवाले सेवक भी तिरस्कार करते हैं, अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता। धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत-से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेनेके लिये आप अपने किसी दूसरे पुत्रको चुन लीजिये॥ ५-७॥

३७- ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना

१२६ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>पापान्मातुलसम्बन्धाद् दुष्प्रजा ते भविष्यति॥ ८<br>तुर्वसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन चरेयं वै विषयांस्तव पुत्रक॥ ९<br>पूर्Readणे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम्।<br>तथैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ १०ययातिने कहा— तात! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न (औरस पुत्र) होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते हो, इसलिये इस पापके कारण तुम्हारी संतान मामाके अनुचित सम्बन्धद्वारा उत्पन्न होकर दुष्प्रजा कहलायेगी। (अब उन्होंने तुर्वसुको बुलाकर कहा—) 'तुर्वसो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो। बेटा! मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर मैं तुम्हें जवानी लौटा दूँगा और बुढ़ापेसहित अपने दोषको वापस ले लूँगा'॥ ८—१०॥
तुर्वसुरुवाच<br>न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम्।<br>बलरूपान्तकरणीं बुद्धिमानविनाशिनीम्॥ ११तुर्वसु बोले— तात! काम-भोगका नाश करनेवाली वृद्धावस्था मुझे नहीं चाहिये। वह बल तथा रूपका अन्त कर देती है और बुद्धि एवं मान-प्रतिष्ठाका भी नाश करनेवाली है॥ ११॥
ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>तस्मात् प्रजासमुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति॥ १२<br>संकीर्णाश्चोधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च।<br>पिशिताशिषु लोकेषु नूनं राजा भविष्यसि॥ १३<br>गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिरतेषु च।<br>पशुधर्मिषु म्लेच्छेषु पापेषु प्रभविष्यसि॥ १४ययातिने कहा— तुर्वसो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते हो, इसलिये तुम्हारी संतति नष्ट हो जायगी। मूढ़! जिनके आचार और धर्म वर्णसंकरोंके समान हैं, जो प्रतिलोम—संकर जातियोंमें गिने जाते हैं तथा जो कच्चा मांस खानेवाले एवं चाण्डाल आदिकी श्रेणीमें हैं, ऐसे (यवनादिसे अधिष्ठित आट्टादि देशोंके) लोगोंके तुम राजा होगे। जो गुरु-पत्नियोंमें आसक्त हैं, जो पशु-पक्षी आदिका-सा आचरण करनेवाले हैं तथा जिनके सारे आचार-विचार भी पशुओंके समान हैं, तुम उन पापात्मा म्लेच्छोंके राजा होगे॥ १२—१४॥
शौनक उवाच<br>एवं स तुर्वसुं शप्त्वा ययातिः सुतमात्मनः।<br>शर्मिष्ठायाः सुतं ज्येष्ठं द्रुह्युं वचनमब्रवीत्॥ १५शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययातिने इस प्रकार अपने पुत्र तुर्वसुको शाप देकर शर्मिष्ठाके ज्येष्ठ पुत्र द्रुह्युसे यह बात कही—॥ १५॥
ययातिरुवाच<br>द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम्।<br>जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं प्रयच्छताम्॥ १६<br>पूर्Readणे वर्षसहस्रे तु ते प्रदास्यामि यौवनम्।<br>स्वं चादास्यामि भूयोऽहं पाप्मानं जरया सह॥ १७ययातिने कहा— द्रुह्यो! कान्ति तथा रूपका नाश करनेवाली यह वृद्धावस्था तुम ले लो और एक हजार वर्षोंके लिये अपनी जवानी मुझे दे दो। हजार वर्ष पूर्ण हो जानेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी तुम्हें दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष फिर ले लूँगा॥ १६-१७॥
द्रुह्युरुवाच<br>न राज्यं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रियम्।<br>न रागश्चास्य भवति तज्जरां ते न कामये॥ १८द्रुह्यु बोले— पिताजी! बूढ़ा मनुष्य न तो राज्य-सुखका अनुभव कर सकता है, न घोड़े और रथपर ही चढ़ सकता है। वह स्त्रीका भी उपभोग नहीं कर सकता। उसके हृदयमें राग-प्रेम उत्पन्न ही नहीं होता; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता॥ १८॥
ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>तद् द्रुह्यो वै प्रियः कामो न ते सम्पत्स्यते क्वचित्॥ १९ययातिने कहा— द्रुह्यो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी जवानी मुझे नहीं दे रहे हो, इसलिये तुम्हारा प्रिय मनोरथ कभी नहीं सिद्ध होगा।

३८- ययाति और अष्टकका संवाद

* अध्याय ३३ *१२७
नौरूपप्लवसंचारो यत्र नित्यं भविष्यति।<br>अराजभोजशब्दं त्वं तत्र प्राप्स्यसि सान्वयः॥ २०<br><br>ययातिरुवाच<br>अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>एकं वर्षसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते॥ २१<br><br>अनुरुवाच<br>जीर्णः शिशुरिवादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा।<br>न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये॥ २२<br><br>ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>जरादोषस्त्वयोक्तो यस्तस्मात् त्वं प्रतिपद्यसे॥ २३<br><br>प्रजाश्च यौवनं प्राप्ता विनश्यन्ति ह्यनो तव।<br>अग्निप्रस्कन्दनगतस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि॥ २४॥<br><br>ययातिरुवाच<br>पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>त्वं मे प्रियतरः पुत्रस्त्वं वरीयान् भविष्यसि॥ २५<br><br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २६<br><br>किञ्चित्कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव।<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रतिदास्यामि यौवनम्।<br>स्वं चैव प्रतिपत्स्येऽहं पाप्मानं जरया सह॥ २७<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा।<br>यथात्थ त्वं महाराज तत् करिष्यामि ते वचः॥ २८<br><br>प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मानं जरया सह।<br>गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान् यथेप्सितान्॥ २९(जहाँ घोड़े जुते हुए उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, पीठकों, पालकियों, गदहों, बकरों, बैलों और शिबिका आदिकी भी गति नहीं है) जहाँ प्रतिदिन (केवल) नावपर ही बैठकर घूमना-फिरना होगा, ऐसे (पञ्चनदके निचले) प्रदेशमें तुम अपनी संतानोंके साथ चले जाओगे और वहाँ तुम्हारे वंशके लोग राजा नहीं, भोज कहलायेंगे॥ १९-२०॥<br><br>तदनन्तर ययातिने अनुसे कहा—अनो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष-पाप ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा एक हजार वर्षतक सुखसे चलते-फिरते आनन्द भोगूँगा॥ २१॥<br><br>अनु बोले—पिताजी! बूढ़ा मनुष्य बच्चोंकी तरह असमयमें भोजन करता है, अपवित्र रहता है तथा समयपर अग्निहोत्र आदि कर्म नहीं करता, अतः वैसी वृद्धावस्थाको मैं नहीं लेना चाहता॥ २२॥<br><br>ययातिने कहा—अनो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहे हो और बुढ़ापेके दोष बतला रहे हो, अतः तुम वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करोगे और तुम्हारी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तुम भी बूढ़े-जैसे होकर अग्निहोत्रका त्याग कर दोगे॥ २३-२४॥<br><br>तत्पश्चात् ययातिने पूरुसे कहा—पूरो! तुम मेरे अत्यधिक प्रिय पुत्र हो। गुणोंमें तुम श्रेष्ठ होओगे। तात! मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, सब अङ्गोंमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और सिरके बाल सफेद हो गये। बुढ़ापेके ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं। कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरो! (तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोष-पापको ले लो और) मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयोंका उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा॥ २५-२७॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा—'महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा। (गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन मनुष्योंके लिये पुण्य, स्वर्ग तथा आयु प्रदान करनेवाला है। गुरुके ही प्रसादसे इन्द्रने तीनों लोकोंका शासन किया है। गुरुस्वरूप पिताकी अनुमति प्राप्त करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है।) राजन्! मैं बुढ़ापेके साथ आपका दोष ग्रहण कर लूँगा। आप मुझसे जवानी ले लें और इच्छानुसार विषयोंका उपभोग करें।