मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
त्रयोदशोऽध्यायः 卐 उपपीठविधानम् १२१ ✵ वेदिभद्रम् ✵ उच्छ्रये भानुभागे तु द्व्यंशेनोपानमीरितम्। पद्ममंशं तदूर्ध्वेऽर्धं क्षेपणं पञ्चभागिकम्॥६॥ ग्रीवमर्धेन कम्पं स्याद् भागैकेनाम्बुजं भवेत्। शेषांशं वाजनं कम्पमष्टाङ्गमुपपीठकम्॥७॥ ( वेदिभद्र उपपीठ दो प्रकार के होते हैं—आठ अङ्ग वाले एवं छः अङ्ग वाले। इनका वर्णन इस प्रकार है— ) उपपीठ की ऊँचाई को बारह भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग से उपान, एक भाग से पद्म, उसके ऊपर आधे भाग से क्षेपण, पाँच भाग से ग्रीव, आधे से कम्प, एक भाग से अम्बुज तथा शेष भाग से वाजन एवं कम्प का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार उपपीठ के आठ अङ्ग होते हैं॥६-७॥ षडङ्गं वा विधातव्यमूर्ध्वाधस्ताद् विनाम्बुजम्। वेदिभद्रं द्विधा प्रोक्तं सर्वहर्म
१२२ मयमतम् पादुकं पङ्कजं चैवमालिङ्गान्तरितं तथा। प्रत्यूर्ध्वं वाजनं कण्ठमुत्तराब्जकपोतकम् ॥१३॥ आलिङ्गान्तरितं चोर्ध्वे प्रतिश्चैवोर्ध्ववाजनम् । द्विविधं प्रतिभद्रं स्यादेकभागाधिकं ततः ॥१४॥ प्रतिभद्र दो प्रकार के होते हैं। (प्रथम प्रकार ऊपर वर्णित है।) दूसरे प्रकार में एक भाग अधिक होता है। (इसके अट्ठाईस भाग किये जाते हैं।) इसमें दो भाग से पादुक, तीन से पङ्कज, एक से आलिङ्ग, एक से अन्तरित, दो से प्रति, एक से ऊर्ध्व वाजन, आठ से कण्ठ, एक से उत्तर, एक से अब्ज, तीन से कपोत, एक से आलिङ्ग, एक से अन्तरित, दो से प्रति एवं एक भाग से ऊर्ध्ववाजन का निर्माण किया जाता है।।१२-१४।। ॐ सुभद्रम् ॐ त्रिःसप्तांशे तदुत्सेधे द्वाभ्यां जन्म तथाम्बुजम् । अर्धेन कण्ठमर्धेन पद्माद्व्यंशेन वाजनम् ॥१५॥ अर्धेनाब्जं तथा कम्पं कण्ठमष्टांशमीरितम् । अंशेनोत्तरमर्धेन पद्मं गोपानकं त्रिभिः ॥१६॥ भागार्धमूर्ध्वकम्पं स्यादेतन्नाम्ना सुभद्रकम् । इस उपपीठ में ऊँचाई के इक्कीस भाग किये जाते हैं। दो भाग से जन्म, दो से अम्बुज, आधे से कण्ठ, आधे से पद्म, दो से वाजन, आधे से अब्ज, आधे से कम्प, आठ से कण्ठ, एक से उत्तर, आधे से पद्म, तीन से गोपानक एवं आधे से ऊर्ध्व कम्प निर्मित होते हैं। (इनसे युक्त उपपीठ) की संज्ञा सुभद्रक होती है।।१५-१६।। जन्म द्व्यंशं त्र्यंशेन पद्ममंशेन कन्धरम् ॥१७॥ द्वाभ्यां वाजनमेकेन कम्पमष्टांशकैर्गलम् । अंशेन कम्पकं द्वाभ्यां वाजनं कम्पमंशकम् ॥१८॥ सुभद्रं द्विविधं प्रोक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम् । (सुभद्र उपपीठ का दूसरा भेद इस प्रकार है। इसमें भी ऊँचाई के इक्कीस भाग किये जाते हैं।) इसमें दो भाग से जन्म, तीन से पद्म, एक से कन्धर, दो से वाजन, एक से कम्प, आठ से गल, एक से कम्प, दो से वाजन एवं एक से कम्प निर्मित होता है। इस प्रकार सभी (उपर्युक्त) अलङ्करणों से युक्त सुभद्र उपपीठ दो प्रकार के होते हैं।।१७-१८।।
त्रयोदशोऽध्यायः 卐 उपपीठविधानम् १२३ सिंहैर्भमकरैर्व्यालैर्भूतैः पत्रैरलंकृतम् ॥१९॥ प्रतिवक्रं झषाढ्यं स्याद् बालेनारूढमस्तकम्। अर्पितानर्पिते हर्म्ये सर्वत्र परिकल्पयेत् ॥२०॥ अर्पित (भवन का भागविशेष) से युक्त एवं अर्पित से रहित सभी प्रकार के भवनों में सिंह, गज, मकर, व्याल, भूत (प्राणी), पत्र एवं जिसके मस्तक पर बाल मीन सवार हो, ऐसा मत्स्य अलङ्करणरूप में अंकित करना चाहिये॥१९-२०॥ अङ्गमङ्गं प्रति प्राज्ञैर्वृद्धिर्हानिस्तथोच्यते। तथा मसूरकाणां तु युञ्जीयादुपपीठके ॥२१॥ उपपीठ के प्रत्येक अङ्ग को वृद्धिक्रम से अथवा हीन-क्रम से निर्मित करना चाहिये एवं उसी प्रकार उपपीठ को अधिष्ठान से जोड़ना चाहिये॥२१॥ आत्ताधिष्ठानतुङ्गाद् द्विगुणमथ समं सार्धमर्धं त्रिपादं पञ्चांशद्व्यंशकं वानलसमभजिते द्व्येकमात्रोपपीठम्। सप्रत्यङ्गं समं चेत्तदपि च महता वाजनेनोपयुक्तं सर्वस्निग्धान्यधस्ताद् दृढतरमतिना योजितव्यं बलार्थम् ॥२२॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे उपपीठविधानो नाम त्रयोदशोऽध्यायः उपपीठ अधिष्ठान की ऊँचाई से दुगुना, डेढ़ गुना, बराबर, आधा, तीन चौथाई, २/५, दो तिहाई या आधी होना चाहिये। यदि अपने सभी अङ्गों के साथ उपपीठ अधिष्ठान के बराबर हो तो भी उसका वाजन बड़ा होना चाहिये। उपपीठ को दृढ़ बनाने के लिये बुद्धिमान स्थपति को उसके सभी अङ्गों को उचित माप में रखना चाहिये॥२२॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी उपपीठ (श्लोक १-५) उपपीठ की संरचना भवन के अधिष्ठान के नीचे की जाती है। इसके विषय में अनेक ग्रन्थों में वर्णन प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है— (क) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. ७७) में उपपीठ की रचना का उद्देश्य शोभा एवं रक्षा कहा गया है—
१२४ मयमतम् उपपीठक्रियायोगः शोभारक्षणवर्धकः। तस्मात्तत्कल्पनं शस्तं निर्माणे बहुरूपके।।१।। इसे अधिष्ठान के नीचे एवं अधिष्ठान के ऊपर ( स्तम्भ के नीचे ) एवं अन्यत्र निर्मित किया जाता है— स्थलभेदात्क्रियाभेदादधिष्ठानस्य चोर्ध्वके।।२।। प्रमाणभेद से यह उत्तम, मध्यम एवं अधम होता है एवं जाति-भेद ( शैलीभेद ) से सात प्रकार का होता है। इनमें प्रस्तरनिर्मित उपपीठ प्रतिभद्र, वाजिभद्र एवं मञ्चभद्र हैं, काष्ठनिर्मित उपपीठ सूर्यभद्र एवं चन्द्रभद्र तथा धातुनिर्मित उपपीठ गन्धर्वभद्र एवं देवेशभद्र हैं— प्रतिभद्रं वाजिभद्रं मञ्चभद्रन्तु शैलजम्। सूर्यभद्रं चन्द्रभद्रं दारुकार्ये प्रयोजयेत्।।४।। गन्धर्वभद्रं देवेशभद्रं लोहक्रियार्हकम्। सप्तस्वपि च शैलीषु योज्यमेतत्प्रकीर्तितम्।।५।। (ख) शिल्परत्न ( पूर्व भाग-१८ ) में अधिष्ठान के नीचे उपपीठ की रचना का उद्देश्य रक्षा, भवन की ऊँचाई एवं शोभा वर्णित है— अधिष्ठानस्य चाधस्तादुपपीठं प्रयोजितम्। रक्षार्थमुन्नत्यर्थं वा शोभार्थं च प्रकल्पयेत्।।२५।। वहाँ उसके प्रमाण का भी विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। (ग) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( ५ ) में भी इसके निर्माण का पूर्वोक्त उद्देश्य वर्णित है। इसे अधिष्ठान से एक हाथ चौड़ा एवं आठ अङ्गुल मोटा कहा गया है— रक्षाशोभोच्छ्रयार्थं सकलनिलयमासूरतोऽधः समन्तात्। कुर्यादेकहस्तप्रविततमुपपीठं गजाद्यङ्गुलाढ्यम्।।२।। इसकी ऊँचाई अधिष्ठान के बराबर या छः, सात, आठ या नौ अंश कम होनी चाहिये— गेहाधिष्ठानोच्चतुल्यो रसाद्यष्टाङ्गांशांशैरूनितो वा यथेष्टम्। मर्त्यागारस्योपपीठोच्छ्रयः स्यात्तत्तद्भागैः पादुकाद्यं विधेयम्।।३।। उपपीठ-निर्माण के विषय में मानसार ( १३ ) एवं ईशानशिवगुरुदेवपद्धति ( क्रिया- ३०.६८ ) में भी वर्णन प्राप्त होता है।
अथ चतुर्दशोऽध्यायः ( अधिष्ठानविधानम् ) ✵ अधिष्ठानवस्तुनिर्माणम् ✵ तैतिलानां द्विजातीनां वर्णानां गृहकर्मणि। तद्योग्यं द्विविधं वस्तु जाङ्गलानूपभेदतः ॥१॥ अधिष्ठान का निर्माण—देवों, ब्राह्मणों एवं अन्य वर्ण वालों के गृह-निर्माण के अनुरूप दो प्रकार की भूमि—जाङ्गल ( सूखी ) एवं अनूप ( स्निग्ध ) होती है। घनशर्करया युक्तमत्यन्तं खनने खरम्। सितांशतनुतोयाढ्यं जाङ्गलं भूतलं भवेत् ॥२॥ जाङ्गल भूमि अत्यन्त कंकरीली होती है एवं खोदने में कड़ी होती है। इसमें खुदाई के पश्चात् अत्यन्त स्वच्छ, चन्द्रमा के सदृश जल प्राप्त होता है॥२॥ खननं क्रियमाणस्य वस्तुनश्च बलं यथा। रूढोत्पलकृशेर्वारुसंयुक्तं तनुवालुकम् ॥३॥ अनूपमिति विख्यातं खात्वैव जलदर्शनम्। भवन की योजना के अनुरूप खुदाई करने पर नील कमल एवं ककड़ी से युक्त महीन बालू प्राप्त होते हैं। ऐसी भूमि को अनूप कहते हैं। इसमें खुदाई करते ही जल दिखाई पड़ने लगता है॥३॥ इष्टकोपलमृद्भिश्च वालुकैरपि चिक्रणैः ॥४॥ शर्कराभिः क्रमाच्छ्वभ्रं निश्छिद्रं पूरयेत् स्थिरम्। घनीकृत्येभपादैश्च काष्ठखण्डैर्बृहत्तरैः ॥५॥ ( जलदर्शन के पश्चात् ) गड्ढे को ईंटों, प्रस्तर, मिट्टी, चिकने बालू एवं कङ्कड़ से भरना चाहिये। इन्हें इस प्रकार भरना चाहिये, जिससे कि खोदा गया गड्ढा छेदरहित एवं दृढ़ हो जाय। इसे गजपाद से एवं बड़े काष्ठखण्डों से ( कूट-पीट कर ) सघन बना देना चाहिये॥४-५॥
१२६ मयमतम् तत्खाते सलिलेनैव पूरितेऽक्षयता शुभा। समत्वं सलिलेनैव साधयित्वा विचक्षणः ॥६॥ गर्भं प्रक्षिप्य तं नीत्या होमं तत्र निधापयेत्। उस गर्त को ( कङ्कड़ आदि से भरने के बाद शेष बचे गड्ढे को ) जल से भरना चाहिये। जल के क्षीण न होने पर शुभ होता है। बुद्धिमान ( स्थपति ) को जल से ही भूमि के समान होने ( समतल होने ) की परीक्षा करने के पश्चात् गर्त में गर्भ-न्यास करना चाहिये। इसके पश्चात् नियमपूर्वक वास्तु-होम करना चाहिये॥६॥ स्तम्भद्वित्रिगुणव्यासं तदर्धं बहलान्वितम् ॥७॥ उपानोपरि पद्मं चोपोपानं च तदूर्ध्वतः। यथाशोभांशमानेन कुर्यात्तत्र विचक्षणः ॥८॥ उस स्थान पर स्तम्भ का दुगुना या तीन गुना व्यास वाला एवं उसका आधा मोटाई वाला बहल से युक्त उपान स्थापित करना चाहिये। उसके ऊपर बुद्धिमान ( स्थपति ) को उपान के अनुरूप प्रमाण का पद्म तथा उपोपान निर्मित करना चाहिये॥७-८॥ उन्नतां प्रकृतिं भूमिं कृत्वा हस्तप्रमाणतः। घनीकृत्य तदूर्ध्वस्थमुपानं जन्म चोच्यते ॥९॥ भूमि को एक हाथ के प्रमाण से ऊँचा बनाकर एवं सघन कर उसके ऊपर जिस उपान को स्थापित किया जाता है, उसे जन्म कहते हैं॥९॥ तदूर्ध्वस्थमधिष्ठानं सोपपीठं तु केवलम्। सस्तम्भं वा सकुड्यं वा जङ्घावर्गं तदूर्ध्वगम् ॥१०॥ उसके ऊपर उपपीठ से युक्त अधिष्ठान स्थापित करना चाहिये एवं उसके ऊपर स्तम्भ, भित्ति अथवा जङ्घा निर्मित होनी चाहिये॥१०॥ भूमिदेश इति ख्याता कपोतोर्ध्वगता प्रतिः। प्रासादादीनि वास्तूनि चाधितिष्ठन्ति यद्धि तत् ॥११॥ जिस पर प्रासाद आदि भवन स्थित रहते हैं एवं जिससे कपोत ( भवन का एक भाग ) के ऊपर प्रति ( भवन का अङ्ग ) निर्मित होता है, उसे भूमिदेश कहते हैं॥११॥ ✺ अधिष्ठानोन्मानम् ✺ अधिष्ठानं तदुन्मानं जातिभूमिवशाद् द्विधा। तैतिलानां चतुर्हस्तं त्रिहस्तार्धं द्विजन्मनाम् ॥१२॥ अधिष्ठान की ऊँचाई का प्रमाण—अधिष्ठान की ऊँचाई का प्रमाण भूमि
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १२७ ( तल ) के एवं जाति के अनुसार दो प्रकार का होता है। देवालय में यह चार हाथ का एवं ब्राह्मणगृह में साढ़े तीन हाथ का होता है॥१२॥ नृपाणां त्रिकरं सार्धद्विहस्तं यौवराजकम्। द्विहस्तं वणिजामेकहस्तं शूद्रस्य कीर्त्यते॥१३॥ राजा के भवन में तीन हाथ, युवराज के भवन में ढाई हाथ, वैश्यों के भवन में दो हाथ एवं शूद्र के भवन में एक हाथ का अधिष्ठान कहा गया है॥१३॥ एतज्जातिवशाद् भूमिवशात्तैव कथ्यते। दण्डात् षण्मात्रहान्या तु द्वादशाद्यात्रिभूमिकम्॥१४॥ अधिष्ठान की ऊँचाई का यह प्रमाण जाति के अनुसार वर्णित है। भूमि ( तल ) के अनुसार अधिष्ठान का माप इस प्रकार है—बारह भूमि से प्रारम्भ कर छः-छः अंश प्रत्येक भूमि में कम करते हुये तीन भूमिपर्यन्त भवन में अधिष्ठान ( की ऊँचाई ) एक दण्ड होना चाहिये॥१४॥ त्रितलस्योत्तमस्येष्टं पादेनो नं द्विहस्तकम्। क्षुद्राणामनया नीत्या विधातव्यं विचक्षणैः॥१५॥ तीन तल के भवन में उत्तम अधिष्ठान प्रशस्त होता है। उसका माप चतुर्थांश कम दो हांथ होता है। इससे छोटे अधिष्ठान का प्रयोग छोटे भवनों में विद्वानों द्वारा वर्णित नीति के अनुसार करना चाहिये॥१५॥ तत्तत्पादोदयार्धेन षडष्टांशोनमानतः। अधिष्ठानस्य चोत्सेधं वास्तुवस्तुनि भूवशात्॥१६॥ यह मान भवन के स्तम्भ के आधे प्रमाण से छः या आठ भाग कम होना चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई का प्रमाण भवन के तल के अनुसार रखना चाहिये॥१६॥ यदुपानस्य निष्क्रान्तं तत् त्र्यंशेन विभाजयेत्। त्यक्त्वैकांशं बहिस्तत्र जगतीं कारयेद् बुधः॥१७॥ उपान के निष्क्रान्त के तीन भाग करने चाहिये। उसके एक भाग को छोड़ कर जगती ( अधिष्ठान ) का निर्माण करना चाहिये॥१७॥ तद्वत् कुमुदपट्टं च तद्वत् कण्ठस्य वेशनम्। आत्तोत्सेधांशमानं तु भागमानेन वक्ष्यते॥१८॥ इसी प्रकार कुमुदपट्ट एवं कण्ठ का भी निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार अधिष्ठान की ऊँचाई पर्यन्त प्रत्येक भाग का प्रमाण वर्णित है॥१८॥
१२८ मयमतम् ✵ पादबन्धम् ✵ अष्टसप्तशशिबन्धभागिकश्चन्द्रबन्धशशिभागिकैः क्रमात्। वप्रकं कुमुदकम्पकन्धरं कम्पवाजनमधोर्ध्वकम्पकम् ॥१९॥ पादबन्ध अधिष्ठान—पादबन्ध के भागों के नाम एवं प्रमाण इस प्रकार हैं— वप्र आठ भाग, कुमुद सात भाग, कम्प एक भाग, कन्धर तीन भाग, कम्प एक भाग, वाजन तीन भाग तथा एक भाग में अधोकम्प एवं ऊर्ध्वकम्प।।१९।। पादबन्धमुदितं तदुच्छ्रये भानुभिर्द्विगुणितांशके कृते। देवविप्रनृपवैश्यशूद्रकेष्वेवमुक्तमृषिभिः पुरातनैः ॥२०॥ इस प्रकार ऊँचाई में चौबीस भागों में बाँटे गये पादबन्ध का वर्णन प्राचीन ऋषियों द्वारा किया गया है, जो देवों, ब्राह्मणों, राजाओं ( क्षत्रियों ) वैश्यों एवं शूद्रों के भवन के अनुकूल है।।२०।। ✵ उरगबन्धम् ✵ चन्द्रदृक्शशिशिवांशकै रसैर्धातुभिश्च समभागिकैः क्रमात्। वाजनं प्रतिमुखं त्रियस्त्रकं दृक् च वृत्तकुमुदं तु वप्रकम् ॥२१॥ त्रिःषडंशसमभागिके तले नागवक्त्रसदृशं प्रतिद्वयम्। देवविप्रनृपमन्दिरेषु तद्योग्यकं ह्युरगबन्धकं भवेत् ॥२२॥ उरगबन्ध अधिष्ठान—ऊँचाई में अठारह भागों में विभाजित उरगबन्ध अधिष्ठान के दो प्रति नाग-मुख के सदृश होते हैं। इसमें वाजन एक भाग, प्रतिमुख दो भाग, त्रियस्त्रक एक भाग, दृक् तीन भाग, वृत्तकुमुद छः भाग एवं वप्रक पाँच भाग से निर्मित होता है। यह देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के भवनों के योग्य होता है।।२१-२२।। ✵ प्रतिक्रमम् ✵ अंशाध्यर्धार्धभागैर्मु निरसशशिभिश्चन्द्रदृक्छैवभागैः क्षुद्रोपानाब्जकम्पं जगतिकुमुदकं धारया युक्तमूर्ध्वे। आलिङ्गान्तादिकं तत्प्रतिमुखमथ तद्वाजनं पद्मयुक्तं त्रिःसप्तांशे तलोच्चे करिहरिमकरव्यालरूपादिभूष्यम् ॥२३॥ प्रतिक्रम अधिष्ठान—प्रतिक्रम अधिष्ठान की ऊँचाई के इक्कीस भाग करने चाहिये। एक भाग से क्षुद्रोपान, डेढ़ भाग से अब्ज, आधे भाग से कम्प, सात भाग से जगती, छः भाग से धारायुक्त कुमुद, एक भाग से आलिङ्गान्त, एक भाग से आलिङ्गादि, दो भाग से प्रतिमुख एवं एक भाग से पद्मयुक्त वाजन का निर्माण करना चाहिये। अधिष्ठान पर गज, सिंह, मकर एवं व्याल आदि का आभूषण के रूप में अंकन करना चाहिये।।२३।।
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १२९ प्रतिक्रमं तत् सुरमन्दिरोचितं विचित्रितं पत्रलतादिरूपकैः । द्विजन्मभूमीश्वरयोर्मतं गृहे शुभप्रभं पुष्टिकरं जयावहम् ॥२४॥ इस प्रकार सुसज्जित प्रतिक्रम अधिष्ठान देवालय के लिये प्रशस्त होता है। जब इस पर पत्र एवं लतादिकों का अंकन किया जाता है, तब वह ब्राह्मण एवं राजाओं के गृह के अनुरूप होता है; साथ ही उन्हें शुभ, समृद्धि तथा विजय प्रदान करता है॥२४॥ ✵ पद्मकेसरम् ✵ एकद्वयेकेन षड्भिः शशिशिवशशिभिर्वेदचन्द्रैकभागै- र्द्व्यंशैकेनांशनेत्रैः शिवशशिसमभागेन जन्माब्जकं च । वप्रं पद्मं गलाब्जं कुमुदमुपरि पद्मं च कम्पं गलं तत् कम्पं पद्मं च पट्टीकमलमुपरिकम्पं च षड्विंशदंशे ॥२५॥ पद्मकेसर अधिष्ठान—पद्मकेसर अधिष्ठान के छब्बीस भाग (ऊँचाई में) किये जाते हैं। इसमें जन्म एक भाग, अब्जक दो भाग, वप्र एक भाग, पद्म छः भाग, गल एक भाग, अब्ज एक भाग, कुमुद एक भाग, पद्म चार भाग, कम्प एक भाग, गल एक भाग, कम्प दो भाग, पद्म एक भाग, पट्टी दो भाग, कमल एक भाग एवं कम्प एक भाग होता है॥२५॥ पद्मकेसरमेतदुदाहृतं कम्पवाजनपङ्कजकैर्युतम् । कुम्भवप्रयुतञ्च सकन्धरं शम्भुधामनि तत्प्रविधीयते ॥२६॥ यह अधिष्ठान पद्मकेसर है। इस पद्मकेसर अधिष्ठान में कम्पवाजन, पङ्कज, कुम्भ, वप्र और कन्धर जब युक्त हो जाते हैं तो यह शम्भु-मन्दिर के अनुकूल हो जाता है॥२६॥ ✵ पुष्पपुष्कलम् ✵ भागेष्वेकार्धकार्धैस्तदुपरि चतुरंशैस्तथार्धांशकार्धै- र्द्व्यर्द्धांशार्धद्विभागैस्तदुपरि च तथार्धांशकार्धेन जन्मम् । वप्रं कञ्जं गलाब्जं तदुपरि कुमुदं पङ्कजं कम्पकण्ठं कम्पं पद्मं महावाजनमुपरिदलं कम्पकं पङ्कजाढ्यम् ॥२७॥ पुष्पपुष्कलमेतदुदाहृतं कल्पितं नवपङ्क्तिभिरुच्छ्रये । शिल्पिभिः प्रस्रवैरपि पूजितामूर्ध्वमध्यममुखे विमानके ॥२८॥ पुष्पपुष्कल अधिष्ठान—पुष्पपुष्कल अधिष्ठान की ऊँचाई को उन्नीस भागों में मय०-९
१३० मयमतम् बाँटना चाहिये। इसमें एक भाग से जन्म, पाँच से वप्र, एक से कञ्ज, आधे से गल, आधे से अब्ज, चार से कुमुद, आधे से पङ्कज, आधे से कम्प, दो से कण्ठ, आधे से कम्प, आधे से पद्म, दो से महावाजन, आधे से दल तथा आधे से पङ्कजयुक्त कम्प निर्मित होते हैं। इस प्रकार अनेक पद्म-पुष्पों से युक्त अधिष्ठान पुष्पपुष्कल कहलाता है। शिल्पियों के अनुसार यह अधिष्ठान मध्यम एवं बड़े विमानों (मन्दिरों) कें अधिक अनुकूल होता है।।२७-२८।। ⁕ श्रीबन्धम् ⁕ द्वाभ्यामेकेन सप्तांशकशशिशिववेदैकचन्द्राग्निभागै- रेकेनैकेन वेदैः शिवशशिनयनैकेन मोहामराब्जम्। हृत्पद्मं कैरवाब्जं गलधरगलकम्पं दलं तत्कपोतं चालिङ्गान्तादिकं तत्प्रतिमुखमथ तद्वाजनं पङ्कजाढ्यम् ॥२९॥ श्रीबन्धं स्यादेतदुच्चे चतुर्व्वस्वंशे कुर्याच्छान्तधीर्वर्द्धकिस्तत् । देवेशानां मन्दिरेष्वेवमुक्तं श्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यं ददाति ॥३०॥ श्रीबन्ध अधिष्ठान—श्रीबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई के बत्तीस भाग किये जाते हैं। इसमें दो भाग से अधिष्ठान का निचला भाग, एक से अब्ज, सात से हृत्, एक से पद्म, एक से कैरव, चार से अब्ज, एक से गल, एक से अधर, तीन से गल, एक से कम्प, एक से दल, चार से कपोत, एक से आलिङ्गादि, एक से आलिङ्गान्त, दो से प्रतिमुख एवं एक से पङ्कजयुक्त वाजन निर्मित होते हैं। इसकी स्थापना कुशल वर्धकि द्वारा करानी चाहिये। यह अधिष्ठान देवालयों एवं राजभवनों के लिये अनुकूल होता है तथा श्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग प्रदान करता है।।२९-३०।। ⁕ मञ्चबन्धम् ⁕ तुङ्गे षड्विंशदंशे खुरमथ जगतीकैरवं कम्पकण्ठं कम्पं पद्मं कपोतं तदुपरि च तथा निम्नमन्तादिवक्त्रम्। कम्पं भागेन षड्भिः शरशशिगुणचन्द्रैकबन्थांशकांशै- र्द्वाभ्यामेकेन कुर्यादमरनरपतेर्मन्दिरे मञ्चबन्धम् ॥३१॥ मञ्चबन्ध अधिष्ठान—मञ्चबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई के छब्बीस भाग करने चाहिये। एक भाग से खुर, छः से जगती, पाँच से कैरव, एक से कम्प, तीन से कण्ठ, एक से कम्प, एक से पद्म, तीन से कपोत, एक-एक भाग से ऊपर-नीचे के सदृश निर्माण, एक-एक भाग से अन्तवक्त्र एवं आदिवक्त्र तथा एक भाग से कम्प निर्मित होना चाहिये। यह अधिष्ठान राजगृह के अनुकूल होता है।।३१।।
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३१ ✵ श्रीकान्तम् ✵ आलिङ्गयुक्तमथ चान्तरितप्रतीभ्यां तद्वाजनेन च वियुक्तकमेतदेव। श्रीकान्तनामकमसूरकमष्टकोणं वृत्तं तु वा कुमुदम्बरमार्गिणां तत्॥३२॥ श्रीकान्त अधिष्ठान—जब अधिष्ठान आलिङ्ग एवं अन्तरित प्रति से युक्त हो एवं वाजन से रहित हो तो उसे श्रीकान्त कहते हैं। इसका कुमुद अष्टकोण अथवा वृत्ताकार हो सकता है एवं यह अम्बरमार्गियों के अनुकूल होता है॥३२॥ ✵ श्रेणीबन्धम् ✵ एकद्व्येकर्तुवेदैः शशिनयनशिवद्व्येकदृक्चन्द्रसार्धा- र्धशैलैर्जन्माब्जकम्पं जगतिकुमुदकं कम्पकण्ठं च कम्पम्। पद्मं पट्टं च कण्ठं तदुपरि च तथा वाजनाब्जं च पट्टं श्रेणीबन्धं सुराणामुदितमिदमलं तुङ्गषड्विंशदंशे ॥३३
१३२ मयमतम् पद्मं पट्टं च कण्ठं तदुपरि च तथा कम्पपद्मं च पट्टी- पट्टं तद्वप्रबन्धं तदपि च सहितं सद्द्विकैर्विंशदंशैः ॥३५॥ वप्रबन्ध अधिष्ठान—वप्रबन्ध अधिष्ठान की ऊँचाई को बाईस भागों में बाँटा जाता है। इसमें दो भाग से उपान, एक से कञ्ज, एक से कम्प, पाँच से वप्र, चार से कुम्भ, एक से पद्म, एक से पट्ट, दो से कण्ठ, एक से कम्प, एक से पद्म, दो से पट्टी तथा एक से पट्ट निर्मित होता है। इसे वप्रबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।।३५।। ✺ कपोतबन्धम् ✺ तदेव वृत्तं कुमुदं तु वाजने कपोतयुक्तं हि कपोतबन्धकम्। कपोतबन्ध अधिष्ठान—वाजन पर जब कुमुद वृत्ताकार हो एवं कपोत निर्मित तो उसे कपोतबन्ध अधिष्ठान कहते हैं। ✺ प्रतिबन्धम् ✺ तदेव वेदैः प्रतिवाजनं प्रतित्रिकास्रयुक्तं प्रतिबन्धमुच्यते ॥३६॥ प्रतिबन्ध अधिष्ठान—जब प्रति एवं वाजन चार भाग में निर्मित हों एवं प्रति त्रिकास्रयुक्त ( तीन कोणों वाला ) हो तो उसे प्रतिबन्ध अधिष्ठान कहते हैं।।३६।। ✺ कलशाधिष्ठानम् ✺ एकद्व्येकाग्निभागैः शशियुगलशिवद्व्येकचन्द्रेशदृग्भि- श्चन्द्रैकैकाक्षिश्चन्द्रैः खुरकमलमथो कम्पकण्ठं च कम्पम्। पद्मं पट्टाब्जनिम्नं कमलमुपरि कुम्भं दलं निम्नमन्ताद् या स्याच्चोर्ध्वे प्रतिर्वाजनमथ कलशाख्येन भागास्त्रिरष्टौ ॥३७॥ कलश अधिष्ठान—इस अधिष्ठान को ऊँचाई में चौबीस भागों में बाँटा जाता है। इसमें एक भाग से खुर, दो से कमल, एक से कम्प, तीन से कण्ठ, एक से कम्प, दो से पद्म, एक से पट्ट, दो से अब्ज, एक से निम्न, दो से प्रति एवं एक से वाजन निर्मित होता है। इसे कलश अधिष्ठान कहते हैं।।३७।। ✺ अधिष्ठानसामान्यलक्षणम् ✺ एतानि भेदैस्तु चतुर्दशैव प्रोक्तानि तज्ज्ञैस्तु मसूरकाणि। सर्वाणि नास्यङ्घ्रियुतानि युक्त्यादृढीकृताङ्गानि मयोदितानि ॥३८॥ अधिष्ठान के सामान्य लक्षण—इस प्रकार चौदह प्रकार के अधिष्ठानों का लक्षणसहित वर्णन विद्वानों द्वारा किया गया है। सभी को छोटे पादों एवं सजावटी खिड़कियों से युक्त करना चाहिये। इनके सभी अङ्गों को, जिनका वर्णन ऋषि मय ने किया है, दृढ़ता-पूर्वक स्थापित करना चाहिये।।३८।।
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३३ भागेनार्धत्रिपादाङ्घ्रिभिरथ युगलाध्यर्धचन्द्रार्धपादै- र्मात्रैर्वृद्धिश्च हानिर्दृढतरमतिना योजितव्या बलार्थम्। शोभार्थं भागमङ्घ्र प्रतिवरमथनीचाल्पहर्म्ये तलाना- मेवं प्रोक्तं यमीन्द्रैरविकलमतिभिस्तन्त्रविद्भिः पुराणैः ॥३९॥ अधिष्ठान को अधिक दृढ़ बनाने के लिये बुद्धिमान (स्थपति) को एक भाग या आधा, त्रिपाद (पौन भाग) या चतुर्थांश, डेढ़ भाग अथवा एक भाग का चतुर्थांश जोड़ना या घटाना चाहिये। इस माप का निर्णय भवन के अनुसार उसके उत्तम (बड़ा), मध्यम अथवा छोटे आकार के अनुसार करना चाहिये। यह भवन की शोभा के लिये होता है। यह मत संयमी, निर्मल बुद्धि, तन्त्र एवं पुराण के ज्ञाता विद्वानों का है।।३९।। ✵ अधिष्ठानपर्यायनामानि ✵ मसूरकमधिष्ठानं वास्वाधारं धरातलम्। तलं कुट्टिममाद्यङ्गं पर्यायवचनानि हि ॥४०॥ अधिष्ठान के पर्यायवाची शब्द—मसूरक, अधिष्ठान, वास्वाधार, धरातल, तल, कुट्टिम तथा आद्यङ्ग अधिष्ठान के पर्यायवाची हैं।।४०।। ✵ निर्गममानम् ✵ यावज्जगतिनिष्क्रान्तं तावत् कुमुदनिर्गमम्। अम्बुजानां तु सर्वेषामुत्सेधसमनिर्गमम् ॥४१॥ निर्गम का प्रमाण—जितना जगती का निष्क्रान्त निर्मित हो, उतना ही कुमुद का निर्गम निर्मित करना चाहिये। सभी अम्बुजों की ऊँचाई निर्गम के बराबर रखनी चाहिये।।४१।। दलाग्रतीव्रमुत्सेधात् पादं पादार्धमेव वा। वेत्राणामपि सर्देषां चतुर्भागैकनिर्गमम् ॥४२॥ दल (पत्तियों की पंक्ति) के अग्र भाग पंक्ति की ऊँचाई का चतुर्थांश या चतुर्थांश का आधा होना चाहिये। सभी वेत्रों का निर्गम चौथाई होना चाहिये।।४२।। तत्समं वा त्रिपादं वा महावाजननिर्गमम्।
१३४ मयमतम् बल के अनुसार अधिष्ठान के सभी भागों का प्रवेश एवं निर्गम रखना चाहिये ।। ४३ ।। ✺ अधिष्ठानप्रतिच्छेदविधिः ✺ प्रतिच्छेदं न कर्तव्यं सर्वत्रैवं विचक्षणैः ।। ४४ ।। द्वारार्थं यत् प्रतिच्छेदं सम्पद्द्वारं च नेत्यलम्। पादबन्धमधिष्ठानं छेदनीयं यथोचितम् ।।४५।। अधिष्ठान में खण्ड करने की विधि—बुद्धिमान (स्थपति) को अधिष्ठान में कहीं भी प्रतिच्छेद (खण्ड) नहीं करना चाहिये। द्वार के लिये किया गया प्रतिच्छेद सम्पत्तिकारक नहीं होता है। पादबन्ध एवं अधिष्ठान में आवश्यकतानुसार प्रतिच्छेद करना चाहिये ।।४४-४५।। जन्मादिपञ्चवर्गे तु तत्तत्तुङ्गावसानके । सपटिकाङ्गेऽधिष्ठानेऽप्यन्यस्मिन्नेवमूह्यताम् । यद् यत्रैवोचितं प्राज्ञास्तत् तत्रैव प्रयोजयेत् ।।४६।। जन्म आदि पाँच वर्गों में उनकी ऊँचाई के अन्त में, सपट्टिकाङ्ग में, अधिष्ठान में एवं अन्य अङ्गों में प्रतिच्छेद हो सकता है। जहाँ-जहाँ उचित हो, बुद्धिमान (स्थपति) को वहाँ प्रयोग करना चाहिये ।।४६।। स्तम्भोच्चार्धं वा मसूरोच्चमानं तत् षट्सप्ताष्टांशकं भागहीनम् । वस्वाधारोच्चं भवेत् सर्ववस्तुष्वेवं पूर्वं शम्भुना सम्यगुक्तम् ।।४७।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे अधिष्ठानविधानो नाम चतुर्दशोऽध्यायः अधिष्ठान की ऊँचाई स्तम्भ के ऊँचाई की आधी, छः, सात या आठ भाग कम होनी चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई सभी भवनों में उनके अनुसार रखनी चाहिये। इस मत का प्रतिपादन शम्भु ने अच्छी प्रकार से किया है ।।४७।। व्याख्यात्मक टिप्पणी भूमि के प्रकार (श्लोक १) भूमि के जाङ्गल एवं अनूप भेद की चर्चा अर्थशास्त्र (२.२४.५) मे भी प्राप्त होती है। शिल्परत्न (१०.१-३) में दो प्रकार की स्निग्धा एवं अस्निग्धा भूमि की चर्चा की गई है—
: त्कम्पं!
Wait, let's look between क्रमाद् and विरचयेत्:
There is no space, it's क्रमाद्विरचयेत्कम्पं or क्रमाद्विरचयेत् कम्पं?
Wait, look:
त्रिद्व्यग्न्यश्विमितैः [space] क्रमाद्विरचयेत्कम्पं [space] गलं [space] पट्टिकाम्
Wait, look at त्रिद्व्यग्न्यश्विमितैः:
Is there a visarga after तै?
Yes, two small dots: :
Then क्रमाद्विरचयेत्कम्पं
Then गलं
Then पट्टिकाम्.
Wait, let's check line 26:
प्रत्युद्यन्मकरास्यकादिरुचिरां सिंहादिभिश्चोज्ज्वलाम्।। (२.१३)
Let's scan line 26:
1, 2, 3: प्रत-युद्-यन् (---) = Magaṇa
4, 5, 6: म-क-रा (UU-) = Sagaṇa
7, 8, 9: स्य-का-दि (U-U) = Jagaṇa
10, 11, 12: रु-चि-रां (UU-) = Sagaṇa
13, 14, 15: सिं
१३६ मयमतम् भागाभ्यां गलपादुकान् विरचयेदधर्शातः पट्टिकाम् क्षुद्रां सार्धधरांशकेन महतीं स्वांशोल्लसद्वाजनाम् ।। (वही-२.१४) मञ्जरी का मत भी यही है। (ङ) अधिष्ठान-निर्माण में तीसरा माप इस प्रकार रक्खा जाता है। इसकी ऊँचाई के बारह भाग होते हैं, जिसमें जगती, कुमुद, पट्टिका, अन्तरि, वाजन एवं प्रति निर्मित होते हैं— मासूरेंडशौर्दिनेशांशिनि सति जगतीकैरवे श्रत्युपायै- स्तच्छिष्टैः पट्टिकामन्तरमपि रचयेद् वाजनं च प्रतिं च । प्रत्युत्पन्नक्रमाख्ये क्रम इति कथितः पट्टिकान्तं तथातः खण्डान् सार्धैकतो वाजनमपि सदलैकांशतः पादबन्धे ।। (वही-२.१५) (घ) मनुष्यालयचन्द्रिका में चौदह प्रमाण-भेद एवं इनके भी चौरासी भेद प्राप्त होते हैं, जो मयमत (१४.२८) के अनुकूल है। प्रमाण इस प्रकार है— मासूरमानानि चतुर्दशैव भवन्ति तेभ्यः पृथगूनिताश्च । रसाद्रिनागाङ्कदशेशभागाश्चतुर्युताशीतिमितिानि सन्ति ।। (५.१५) (ङ) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (२७ अ.) में अधिष्ठान प्रकल्पन का उद्देश्य भवन की ऊँचाई, रक्षा, शोभा एवं दृढता कही गई है। इसकी ऊँचाई आवश्यकतानुसार एक हाथ, दो हाथ, तीन हाथ या एक दण्ड रखनी चाहिये— औन्नत्यार्थं च रक्षार्थं शोभार्थं च बलार्थकम्। एकहस्तं द्विहस्तं वा त्रिहस्तं वा विशेषतः ।। एकदण्डप्रमाणं वा कारयेत् स्थलयोग्यकम्। (२७.३-४) इसके आठ भेद कहे गये हैं—मञ्चभद्र, बोधिभद्र, वाजिभद्र, कुमुदभद्र, मञ्चबन्ध, बोधिबन्ध, वाजिबन्ध एवं कुमुदबन्ध— मञ्चभद्रं बोधिभद्रं वाजिभद्रं च कौमुदम्। बन्धस्वरूपमन्यच्च स्थापयेत्स्थपतिः क्रमात्।। (२७.७) (च) वास्तुविद्या (९ अ.) में पाद-मान के प्रकरण में मानभेद की दृष्टि से बारह प्रकार के अधिष्ठानों की चर्चा की गई है। (छ) शिल्परत्न (पूर्वभाग, १९ अ.) में अधिष्ठान की चर्चा विस्तार से प्राप्त होती है। श्रीकुमार (शिल्परत्नाकर) के अनुसार मय ने चौदह प्रकार के अधिष्ठान का एवं पराशर ने दो प्रकार के अधिष्ठान का वर्णन किया है। अन्य शिल्पविज्ञों ने तीन प्रकार के अधिष्ठान—मञ्चक, पादबन्ध एवं प्रतिबन्ध का वर्णन किया है, जो इस प्रकार है—
चतुर्दशोऽध्यायः 卐 अधिष्ठानविधानम् १३७ मञ्चकान्यधमान्याहुः पादबन्धाभिधानि वै। मध्यमान्युत्तमानि स्युः प्रतिबन्धान्यसंशयः।। (१९.२) इसके पाँच वर्ग हैं—उपान, जगती, कुम्भ, कन्धर एवं प्रस्तर— उपानं जगती कुम्भं कन्धरं प्रस्तरं तथा। पञ्चवर्गमिति ख्यातमाद्यङ्गानां विशेषतः।। (१९.३) मञ्चक, पादबन्ध एवं प्रतिबन्ध का सामान्य लक्षण इस प्रकार है— कुमुदेन विना कार्यं यत्तन्मञ्चकमुच्यते। पादबन्धतलानां तु वस्वस्रं कुमुदं भवेत्।। सर्वेषां प्रतिबन्धानां कुमुदं वृत्तमुच्यते। (१९.५) अधिष्ठान की एवं उपपीठ की रचना मृत्तिका, ईंट, शिला अथवा काष्ठ से भवनादि की आवश्यकता देखते हुये करनी चाहिये— अधिष्ठानं चोपपीठं मृदा चेष्टकयापि वा। शिलाभिर्वा विधातव्यं दारुणा वा यथाबलम्।। (वही-१८.२०) (ज) मानसार (अ. १४) में अधिष्ठानों के भेद एवं अनके अङ्गों का विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। इनमें उरगबन्ध, प्रतिक्रम, कुमुदबन्ध, श्रीबन्ध, मञ्चबन्ध, श्रेणीबन्ध, पद्मबन्ध, कुम्भबन्ध, वप्रबन्ध, वज्रबन्ध, श्रीभोग, रत्नबन्ध, पट्टबन्ध, कुक्षिबन्ध, कम्पबन्ध, एवं श्रीकान्त आदि अधिष्ठानों का वर्णन किया गया है। अधिष्ठानप्रतिच्छेद (श्लोक ४४-४५) अधिष्ठान के छेदन के विषय में अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार उल्लेख प्राप्त होता है— (क) शिल्परत्न (पूर्वभाग-१९.१२९-१३१) द्वारार्थं वा स्थलार्थं वा जलमार्गार्थमेव वा। जन्मादिपञ्चवर्गेषु तत्तदङ्गावसानके।। छेदनं नैव दोषाय पादबन्धतलेऽखिले। प्रतेशच्छेदं न कर्तव्यं प्रतिबन्धकुले कदाचन।। जन्मच्छेदं न कर्तव्यं यत्र-कुत्रापि सर्वतः। विपदामास्पदं ह्येतत्तस्मान्नैव कारयेत्।। (ख) ईशानशिवगुरुदेवपद्धति (क्रिया.-३१.१०१-२) सर्वत्र प्रत्युपरि द्वारं कुर्याद् विचक्षणः। प्रतिच्छेदेन तु द्वारं न कुर्वीत कदाचन।।
अथ पञ्चदशोऽध्यायः ( पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् ) ☀ स्तम्बलक्षणम् ☀ पादायामं सविस्तारमाकारं भूषणादिकम् । लक्षणान्तरतः सम्यग् वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् ॥१॥ स्तम्भ के लक्षण—मैं ( मय ऋषि ) अन्य लक्षणों के साथ स्तम्भों की लम्बाई, चौड़ाई, आकृति एवं उनके अलङ्करण आदि का संक्षेप में सम्यक् रूप से क्रमशः वर्णन कर रहा हूँ॥१॥ स्थाणुः स्थूणश्च पादश्च जङ्घा च चरणोऽङ्घ्रिकः । स्तम्भश्च तलिपः कम्पः पर्यायवचनानि हि ॥२॥ स्थाणु, स्थूण, पाद, जङ्घा, चरण, अङ्घ्रिक, स्तम्भ, तलिप एवं कम्प ( स्तम्भ के ) पर्यायवाची शब्द हैं॥२॥ ☀ स्तम्भमानम् ☀ सवितस्त्यष्टहस्तोच्चं द्वादशक्ष्माद्यपादकम् । तत्तद्वितस्तिहीनेन त्रिकरं चान्त्यभूमिके ॥३॥ स्तम्भ का प्रमाण—बारह तल के भवन में भूतल पर बनने वाले स्तम्भ की ऊँचाई आठ हाथ एक बित्ता ( साढ़े आठ हाथ ) होनी चाहिये। प्रत्येक तल पर एक- एक बित्ता कम करते हुये सबसे ऊपर के तल पर तीन हाथ ऊँचाई होनी चाहिये॥३॥ आत्तोत्सेधांशमानेन पादोच्चं वा विधीयते । आत्ताधिष्ठानतुङ्गस्य द्विगुणं पादतुङ्गकम् ॥४॥ अथवा स्तम्भ की ऊँचाई का मापन दिये गये माप से ( दूसरे ढंग से ) करना चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई का दुगुना माप स्तम्भ का रखना चाहिये॥४॥ द्विगुणादधिकोत्सेधः स्तम्भः प्रोक्तः स्वयम्भुवा । अष्टविंशतिमात्रैस्तु मूलभूस्तम्भवस्तृतम् ॥५॥ ( बारह तल के भवन में ) स्वयम्भू के अनुसार स्तम्भ की ऊँचाई अधिष्ठान
पञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १३९ के दुगुने से अधिक होनी चाहिये। भूतल के स्तम्भ का विस्तार अट्ठाईस मात्रा ( अङ्गुल-माप ) होना चाहिये॥५॥ तत्तद्व्यङ्गुलभिन्नेन षण्मात्रं चान्त्यभूमिके। पादोच्चे पङ्क्तिनन्दाष्टभागैऽशं पादविस्तृतम् ॥६॥ प्रत्येक तल में उपर्युक्त माप से दो-दो अङ्गुल कम करते हुये ऊपर के तल में स्तम्भ की चौडाई का माप प्राप्त होता है। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई का दसवाँ, नवाँ या आठवाँ भाग उसकी चौड़ाई का माप होना चाहिये।।६।। तदर्धं वा त्रिभागोनं चतुर्भागोनमेव वा। कुड्यस्तम्भस्य विस्तारस्तेन द्वित्रिचतुर्गुणः ॥७॥ पञ्चषड्गुण एवं स्याद् भित्तिविष्कम्भ इष्यते। जन्मोर्ध्वे स्तम्भविक्षेपहोमाः स्तम्भविधौ विदुः ॥८॥ अथवा स्तम्भ का विस्तार आधा, तीन भाग कम अथवा चतुर्थांश कम रखना चाहिये। भित्ति-स्तम्भ के विस्तार से भित्ति-विष्कम्भ का विस्तार दुगुना, तीन गुना, चार गुना, पाँच गुना या छः गुना रखना चाहिये। स्तम्भ-स्थापन-विधि के ज्ञाता अधिष्ठान के ऊपर स्तम्भ के स्थापन के समय होम करने का विधान बतलाते हैं।।७-८।। ✹ स्तम्भभेदाः ✹ प्रतिस्तम्भः प्रतेरूर्ध्वे चोत्तराधो हितायतिः । जन्मोर्ध्वे स्तम्भनिक्षेपः स्तम्भायामत्रिभागभाक् ॥९॥ स्तम्भ के भेद—प्रतिस्तम्भ को प्रति के ऊपर एवं उत्तर ( भित्ति ) के नीचे निर्मित किया जाता है। जन्म ( अधिष्ठान का एक भाग ) के ऊपर स्तम्भ को स्थापित किया जाता है एवं उसकी चौड़ाई उसकी ऊँचाई के तीसरे भाग के बराबर होती है।।९।। गाम्भीर्यमवटं कृत्वा तदुपज्ञतलं कुरु। पादुकाद्युत्तरान्तःस्थो निखातस्तम्भ इष्यते ॥१०॥ ( निखातस्तम्भ के लिये ) गहरा गर्त बनाकर उसके ऊपर तल का निर्माण किया जाता है ( पुनः स्तम्भ-स्थापन होता है )। पादुक से लेकर उत्तर-भित्ति के मध्य में स्थित इस स्तम्भ को निखातस्तम्भ कहते हैं।।१०।। अधिष्ठानोत्तरान्तःस्थो झषालस्तम्भ उच्यते। तद्द्व्यासादर्कभागाद्यं षड्भागोनाग्रविस्तरः ॥११॥ अधिष्ठान से प्रारम्भ होकर उत्तरभित्ति के मध्य में स्थित स्तम्भ को झषाल स्तम्भ
१४० मयमतम् कहते हैं। यह स्तम्भ मूल की अपेक्षा ऊर्ध्व भाग में छः-बारह भाग कम चौड़ा होता है।।११।। मूलभूतस्तम्भतुङ्गस्य द्वादशाद्याः षडंशयुक्। ऊर्ध्वोर्ध्वस्तम्भतुङ्गं स्यादेवं तद्विस्तरक्रमः ।।१२।। ( बारह मञ्जिल के भवन में ) भूतल में स्तम्भ की चौड़ाई उसकी ऊँचाई का छठवाँ भाग होना चाहिये। ऊपर के तलों में भी स्तम्भों की ऊँचाई एवं चौड़ाई में यही अनुपात होना चाहिये।।१२।। अग्राकारं युगास्रं तु कुम्भमण्डिसमन्वितम्। ब्रह्मकान्तं तदष्टास्रं विष्णुकान्तमिहोच्यते ।।१३।। मूल से लेकर ऊपर तक चौकोर तथा कुम्भ एवं मण्डि से युक्त स्तम्भ को ब्रह्मकान्त कहा जाता है तथा आठ कोण वाले स्तम्भ को विष्णुकान्त कहते हैं।।१३।। षडस्रमिन्द्रकान्तं स्यात् सौम्यं तत् षोडशास्रकम्। कर्णमात्रेण तन्मूले चतुरस्रमितोर्ध्वतः ।।१४।। अष्टास्रं वा द्विरष्टास्रवृत्तं पूर्वास्रमीरितम्। कुम्भमण्डियुतं वाऽपि रुद्रकान्तं सुवृत्तकम् ।।१५।। षट्कोण वाला स्तम्भ इन्द्रकान्त संज्ञक होता है। सोलह कोण वाला स्तम्भ सौम्य कहलाता है। ( कोण वाले स्तम्भों में ) मूल में चौकोर होता है। इसके पश्चात् अष्टकोण, षोडशकोण अथवा वृत्ताकार होता है। इसकी संज्ञा पूर्वास्र होती है। वृत्ताकार स्तम्भ यदि कुम्भ एवं मण्डि से युक्त हो तो उसकी संज्ञा रुद्रकान्त होती है। विस्तारद्विगुणं मध्येऽष्टास्रयुक्तं युगास्रकम्। वियुक्तं कुम्भमण्डिभ्यां मध्येऽष्टास्रं तदुच्यते ।।१६।। यदि स्तम्भ की लम्बाई विस्तार से दुगुनी हो, मध्य में अष्टकोण एवं ऊपर तथा नीचे चौकोर हो तथा कुम्भ एवं मण्डि से रहित हो तो उसे 'मध्ये अष्टास्र' कहा जाता है।।१६।। चतुरस्रास्रवृत्ताभं रुद्रच्छन्दं समांशतः। दण्डाध्यर्धं द्विदण्डेनोत्तुङ्गद्विगुणविस्तृतम् ।।१७।। पद्मासनं तु कर्तव्यं मूले पद्मासनं भवेत्। यथेष्टाकृतिसंयुक्तमूर्ध्वतो वा समण्डितम् ।।१८।। रुद्रच्छन्द संज्ञक स्तम्भ ( मूल से क्रमशः ऊपर की ओर ) चतुष्कोण, अष्टकोण