भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

६१४ मीमांसादर्शनम् [ सू० नन्वासां फलश्रुतीनां पर्णमयीन्यायेनार्थवादत्वस्य सम्बन्धग्रन्थेऽभिहितत्वान्न फलसमर्प- कत्वं युक्तमित्याशङ्कयाह — अप्रकरणगतेति । अयमाशयः पारार्थ्ये निर्ज्ञाते फलश्रुतेरर्थवादत्वं भवति प्रकरणाच्च यदाङ्क्ते चक्षुरेव एव भ्रातृव्यस्य अङ्क्त इत्यञ्जनस्य पारार्थ्यं निर्ज्ञातम् । यस्य खादिरः स्त्रुवा भवति छन्दसामेव रसेनानवद्यतीति च क्रत्वर्थव्यभिचारि- स्त्रुवादिद्वारा खादिरत्वादेः । न चात्मज्ञानं प्रकरणगतम्, न चात्मनो द्वारभूतस्यैकान्तिकः स्वाभाविकः क्रतुसम्बन्धोऽस्ति । शरीरसम्बन्धोपाधिकत्वात्कर्तृत्वस्याशरीररूपात्मज्ञाने तदभावादिति । न च संसारिरूपात्मज्ञानस्य मोक्षसाधनत्वे तस्मिन्सति कर्म्मसु प्रवृत्त्ययोगात् । वृहट्टीकायां ननु निःश्रेयसज्ञानात् बन्धहेतोर्न कर्म्मणः । इत्याशङ्क्य— नैकस्मादपि तत् किं तु ज्ञानकर्म्मसमुच्चयादित्युकम् । तद्विरुद्धयेतेत्याशङ्कयाह—न चेति । सत्यपि ज्ञाने नित्यनैमित्तिककर्म्मानुष्ठानं विना पूर्व्वकृतदुरितक्षयायोगादकरणनिमित्तानागतप्रत्यवायपरिहारायोगाच्च तत्फलोपभोगार्थं बन्धप्रसक्तेर्मोक्षायोगात्कर्म्मनाशार्थत्वेन च ( ज्ञानविध्यनुपलब्धेर्ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुनेत्यादिस्मृतेश्चोपचारिकत्वेनोपपत्तेः सम्बन्धग्रन्थे ज्ञानस्य कर्मनाशकत्व- निषेधान्न१ ) ज्ञानस्य मोक्षसाधनतया विधानेन कर्मणो मोक्षसम्बन्धो बाध्यते । न चासंसारिरूपात्मज्ञानपरिपाकात् प्राक्कर्त्तृभोक्तृत्वाभिमानान्निवृत्तौ कर्मसु प्रवृत्त्यनुपपत्तिरिति विधानशब्देन सूचितम् । परिपक्वेन ज्ञानेनात्मनः कर्म्मसम्बन्धः कर्तृत्वं बाध्यते । विधानावस्थायाङ्कर्तृत्वाभिमाननिवृत्तौ नियोज्यत्वासम्भवाद्धिधानानुपपत्तिरित्याशयः। एतदेव विवृणोति — प्रत्याक्षमेति । नन्वेवमपि— 'मोक्षार्थी न प्रवर्त्तत तत्र काम्यनिषिद्धयोः । नित्यनैमित्तिके कुर्यात्प्रत्यवायजिहासया ॥' इत्यनेन न्यायेन काम्यनिषिद्धवर्जनात्तत्फलोपभोगार्थं शरीरानुत्पत्तेर्नित्यनैमित्तिका- नुष्ठानाच्च तदकरणनिमित्तप्रत्यवायफलोपभोगार्थं शरीरानुत्पत्तेर्ज्ञानवाक्यानां चौपचारिक- व्याख्यानोपपत्तेः कर्म्मणा ज्ञानं बाध्यताम्, तुल्यबलत्वाद्वा विकल्पोऽस्तु, विरोधपरिहाराय चाङ्गाङ्गीभावः कल्प्यतां न तु निरपेक्षविहितयोः समुच्चयो युक्त इत्याशङ्क्याह—न चेति । अयमाशयः अवान्तरकार्येैक्ये सति बाधो विकल्पो वा स्यात्, इह तु कर्म्मणा पूर्वं- कृतपापनाशावश्यविहिताकरणनिमित्तपापपरिहारप्रयोजनत्वान्निर्गुणात्मज्ञानस्य च तत्त्व- प्रकाशनप्रयोजनत्वान्नावान्तरकार्यैक्यमस्ति । न च बन्धहेतुकर्म्मक्षयान्मोक्षसिद्धेस्तत्त्व- प्रकाशनानर्थक्यं शङ्कयम् । सत्यपि पूर्व्वकृतकर्मक्षये कर्तृत्वभोक्तृत्वाभिमानान्निवृत्तौ निर्व्या- १. अयं पा० १ पु० नास्ति ।

२७-२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६१५ पारत्वानुपपत्तेरवश्यं कस्यचिद् बन्धहेतोः कर्म्मणः प्रसङ्गात्तं निवृत्त्यर्थं कर्तृत्वभोक्तृत्वो- भिमाननिवृत्तेरपेक्षितायास्तत्त्वप्रकाशनं विनानुपपत्तेः । एतदेवाभिप्रेत्य बृहट्टीकायामुक्तम् । 'नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् । ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन च पाचयन् ॥ वैराग्यात्पक्वविज्ञानः कैवल्यं भजते नरः ।' इति । अतोऽवान्तरकार्यभेदान्न तावद् बाधविकल्पौ जीवानादिनिमित्तवतश्च कर्म्मस्वधिकारात्, मुमुक्षोश्च ज्ञानाधिकारादधिकारिभेदलक्षणाद्भिन्नमार्गत्वान्नाङ्गाङ्गिभावः सम्भवतीति पारिशेष्यात्समुच्चय एव युक्त इति । नन्वात्मज्ञानवच्छब्दज्ञानस्यापि फलसम्बन्धः कस्मान्नेष्यते अत आह—शब्देति । यच्चादिमत्त्वाच्च धर्म्मत्वम्, नैतज्ज्ञानप्रयोगयोरित्यनेनादिमद्व्याकरणाधीनस्य ज्ञानस्य तत्पूर्वकस्य वा प्रयोगस्यानादिना वेदेन फलसाधनत्वं वक्तुं न शक्यमित्युक्तम् । तदप्यनु- भाषणपूर्वकं परिहरति — यत्त्विति । व्याकरणपरम्परानादित्वं वा अनादिवेदविषयत्वा- न्यथानुपपत्त्या कर्तुःस्मृत्या च पौरुषेयत्वावगतिरवसीयत इत्याह—तस्मादिति । यत्तु व्याकृता सम्प्रदायेन वाणी नित्यैव वैदिकील्युक्तम् । तन्निराकरोति — न चेति । वैदिक्या वाचो ह्युच्चारणार्थत्वाद्यवच्छेदायोद्यत इत्येतावद्वक्तव्यम् । अव्याकृतत्वाप्रसक्तेस्तु व्याकृत्वोक्तिर्निष्फला स्यादित्यर्थः । 'अग्रघाः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । श्रोत्रियाश्च यजमानाश्च विज्ञेयाः पङ्क्तिपावनाः ॥' इति च मनुप्रोक्तवेदत्वस्य पूर्वोक्तत्वात्, यश्च मीमांसतेऽध्वरमिति च यज्ञमीमांसनस्य पश्चादुक्तत्वाद्यश्च व्याकुरुते वाचमिति व्याकरणस्य पङ्क्तिपावनत्वापादकत्वाभिधानं प्रकृति- प्रत्ययान्वाख्यानरूपव्याकरणविषयं, न तु स्वरवर्णमात्रा कर्माविप्लुतिरूपवैदिकशब्द- व्याकरणविषयम् । नाप्युद्दिश्यमानोपादीयमानगुणप्रधानादिरूपवचनव्यक्तिव्याकरणविषय- मित्यवधारणात् । तस्य च वेदपूर्वत्वान्नित्यानित्यसंयोगपरिहाराय नित्यत्वं व्याकरणस्या- ध्यवसीयत इत्याह— यदपि चेति । तदशक्तिश्चानुरूपत्वादिति सूत्रं भाष्यकृताऽथ यदुक्तमित्यादिभाष्येण गव्यादिशब्दस्य शक्त्या विना कथमर्थप्रतिपादकतेति शङ्कानिराकरणार्थत्वेन व्याख्यातम् । तच्च ययाप्रकृति- सारूप्यद्वारेणापभ्रंशाः प्राकृतामेव शक्तिमाविर्भावयन्तोऽर्थप्रतिपत्तावुपयोगं गच्छन्ति, तथा तदशक्तिश्चानुरूपत्वदित्यत्र वर्णयिष्यते इत्यनेनैव प्रतिपादनप्रकारविशेषाभिधानार्थतया व्याख्यातत्वान्नेह व्याख्यातम् । एकदेशत्वाच्च विभक्तिव्यत्यये स्यादिति सूत्रान्तरमप्यत एवेत्यादिभाष्येणैवं गव्यादिशब्ददर्शनादिति दार्ष्टान्तिके योजनाद् गव्यादिशब्दस्य साधु- शब्दानुस्मारेणार्थप्रतिपादकत्वे दृष्टान्ताभिधानार्थतया व्याख्यातमिति प्रतीतेः स्पष्टत्वान्न व्याख्यातम् ॥ २७–२९ ॥ ॥ इति नवमं व्याकरणाधिकरणम् ॥

६१६ मीमांसादर्शनम् [ सू० भा० प्र० -- गावी, गोणी आदि एक अर्थ को कहने वाले अनेक शब्दों में एक साधु है, और अन्य असाधु हैं। इस प्रसङ्ग में यह विचार्य है कि कौन शब्द साधु है एवं कौन शब्द असाधु है—इसकी जानकारी किस प्रकार हो सकती है। इसी आशङ्का के उत्तर में “तत्र तत्त्वम्” इत्यादि कहा गया है। कौन शब्द साधु है और कौन शब्द असाधु है— इसका ज्ञान व्याकरण शास्त्र के अनुशीलनजनित संस्कार विशेष से होता है। सूत्र में अभियोग विशेष से साधु शब्द के ज्ञान का निर्देश किया गया है। अभियोग शब्द का अर्थ पटुत्व और विशेष शब्द का अर्थ लक्षण होता है। शब्द अनन्त है, अतः प्रत्येक शब्द को लेकर साधुत्व और असाधुत्व की अवगति नहीं की जा सकती है। सभी शब्दों के स्वरूप को असन्दिग्ध रूप में जानने का कोई लौकिक साधन भी नहीं है। किन्तु व्याक- रणशास्त्र में ऐसे नियमों का उल्लेख किया गया है, जिससे एक पद का ज्ञान होने से उसके समान अनेक पदों का ज्ञान सम्भव होता है। इसलिए व्याकरण शास्त्र के द्वारा सभी शब्दों को अधीन किया जा सकता है, अतः व्याकरण का प्रामाण्य सभी के द्वारा अवश्य ही ग्राह्य है। व्याकरण का प्रामाण्य होने से इस शास्त्र में जिन शब्दों को साधु के रूप में निर्देश किया गया है—वे ही साधु शब्द के रूप में ग्राह्य हैं, अन्य असाधु या अप- भ्रंश के रूप में त्याज्य हैं, अर्थात् यज्ञादि में व्यवहार के योग्य नहीं हैं, अतः शब्द का साधुत्व सिद्ध नहीं है यह बात नहीं है। इस प्रसङ्ग में वार्त्तिककार ने कहा है कि शब्द का साधुत्व प्रत्यक्ष आदि छ प्रमाणों के आधार पर जाना जाता है। व्याकरण न श्रुतिमूलक है और न स्मृति ही है, अतः, व्याकरण प्रमाण नहीं है, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि शब्द के प्रयोग की व्यवस्था करना ही व्याकरण स्मृति का प्रयोजन है। इसीलिए कहा गया है—ब्राह्मण म्लेच्छ शब्द=(अव्यक्त) नहीं कहे, अपशब्द का प्रयोग नहीं करे, यह अपशब्द ही म्लेच्छ= अव्यक्त या असमीचीन उच्चारण है; इस प्रकार अपशब्द के प्रयोग का निषेध किया गया है। “तस्माद् ब्राह्मणो न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छोह वा यदेष अपशब्दः”। अथ ते असुराः हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः परावभूदुः” वे असुरगण “हे अरयः” हे अरिगण इसके स्थान पर “हे अलयः” इस प्रकार का उच्चारण करने से पराजित हुए। इस प्रकार के अर्थवाद वाक्य के रहने से श्रुति ने स्पष्ट ही कहा है कि व्याकरण के अनुसार साधु शब्दों का प्रयोग करना उचित है। “तस्मादियं व्याकृता वागुच्यते” (तै० सं० ६।४।७।३) इसीलिए व्याकृत अर्थात् प्रकृति और प्रत्यय आदि से युक्त पद का प्रयोग कराया गया है—इत्यादि श्रुति में स्पष्ट कहा गया है। अतः, व्याकरण का प्रामाण्य श्रुति से सिद्ध है। व्याकरण साधु शब्द के प्रयोग का विधान करती है-यह स्मृति में भी कहा गया है। सभी स्मृतियों में केवल यज्ञ आदि कर्मों का ही प्रतिपादन रहे—ऐसा कोई नियम नहीं है। इसलिए व्याकरण भी स्मृति है और वेदमूलक है। वेद में व्याकरणावगत साधु शब्द के प्रयोग की सूचना होने से व्याकरण के प्रामाण्य में कोई बाधा नहीं है।

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६१७ 'तत्र' शब्द में । 'तत्त्वम्' = "तस्य भावः" अर्थात् उसका साधुमात्र = साधुत्व । "अभि- योगविशेषात् स्यात्" अभियोग विशेष निवन्धन ही होना चाहिए । कौन शब्द साधु है, इसका ज्ञान व्याकरणशास्त्र के अनुशीलन से उत्पन्न संस्कार-विशेष से ही उत्पन्न होता है । आशय यह है कि साधु और असाधु शब्दों में वस्तुतः कौन शब्द साधु है और कौन शब्द असाधु है-यह शिष्टों के उपदेश से ही अवगत किया जाता है । इस समय लक्षण सूत्र के आधार पर साधु शब्दों की अवगति सम्भव है । अतः, शिष्टगण ही साधु और असाधु के वस्तुतः निर्णायक हैं । जिसके आधार पर व्याकरण सूत्रों की रचना की गई है ॥ २७ ॥ भा० प्र०—गो शब्द के उच्चारण की इच्छा रहते हुए भी असामर्थ्य के कारण गावी शब्द का उच्चारण हो जाता है । यद्यपि इसके द्वारा सास्नादि गलकम्बलयुक्त अर्थ ही विवक्षित रहता है । आशय यह है कि शुद्ध शब्द का उच्चारण रहने पर भी सादृश्यवश से अर्थ की प्रतीति होती है । इसीलिए "अश्मकैः आगच्छतानि" इत्यादि वाक्यों के सुनने पर "अश्मकेभ्यः आगच्छामि" अर्थात् अश्मक देश से आया हूँ-यह अर्थ अवगत होता है । "अश्मकेभ्यः" इस पञ्चमी विभक्ति के बहुवचन के स्थान पर 'अश्मकैः' यह तृतीया विभक्ति के बहुवचन का प्रयोग किया गया है । इस स्थल में विभक्ति का व्यतिक्रम होने पर अर्थ का ज्ञान न होना चाहिए, किन्तु सादृश्य के कारण अर्थ का ज्ञान हो जाता है । अतः किसी समय गो शब्द के उच्चारण की इच्छा रहने पर भी असावधानी या असामर्थ्य से गावी शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु, अर्थ के ज्ञान में किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं होती है । अतः, गो शब्द साधु है और अन्य शब्द असाधु है । साधु शब्द का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि यज्ञादि में असाधु शब्द का प्रयोग करने पर प्रायश्चित्त का उपदेश दिया गया है । "एकदेशत्वात्" एकदेशता के कारण अर्थात् किसी प्रकार विकृत होने पर भी अन्य अविकृत अंश का ही एक देश होने से 'च' तथा और "विभक्तिव्यत्यये स्यात्" विभक्ति का व्यत्यय होने पर भी अर्थ का ज्ञान होता है ॥ २८ ॥ भा० प्र० गो शब्द के शुद्ध रूप में उच्चारण का सामर्थ्य न रहने से त्रुटि शब्द की विच्युति से गो शब्द विकृत होकर गावी, गोणी आदि के रूप में शब्द उच्चारित होता है । अतः गो शब्द के अनुरूप होने से चेष्टा आदि के द्वारा गलकम्बल आदि अर्थ का बोध होता है । क्योंकि किसी वृद्ध के कथन के अनुसार गामानय के उच्चारण की जगह पर गावीमानय यह उच्चारण होने पर भी सास्नादियुक्त गौ को लाते हुए देखकर गावी का अर्थ भी गौ ही है-अनुरूप होने से यह अवगत करता है । 'तदशक्तिः' = उसकी अर्थात् गो इस शब्द के उच्चारण की 'अशक्तिः' = असमर्थता, अक्षमता, 'च' = एवम् 'अनुरूपत्वात्' = अनुरूप अर्थात् गो शब्द के अनुरूप होने से गो अर्थ का ही बोधक है ॥ २९ ॥

६१८ मीमांसादर्शनम् [ सू० अथ नवममाकृत्यधिकरणम्। [ ९ ] प्रयोगचोदनाभावादर्थैकत्वमविभागात् ॥ ३० ॥ पू० शा० भा०—अथ गौरित्येवमादयः शब्दाः किमाकृतेः प्रमाणम्, उत व्यक्ते- रिति सन्देहः । तदुपोद्घातत्वेन लोकवेदाधिकरणम् उच्यते—इदं तावत् परीक्ष्यताम् । किं य एव लौकिकाः१ शब्दाः त एव वैदिका उतान्य इति । यदा त एव, तदाऽपि किं त एवैषामर्था ये लोके, उतान्य इति संशयः । तत्रान्ये लौकिकाः२ शब्दाः अन्ये वैदिका, अन्ये चैषामर्था इति ब्रूमः । कुतः ? व्यपदेशभेदाद्, रूपभेदाच्च । इमे लौकिका; इमे वैदिका इति व्यपदेशभेदः३ । 'अग्निर्वृत्राणि जङ्घनत' इत्यन्यदिदं रूपं लौकिकादग्निशब्दात् । शब्दान्यत्वाच्च न त एवार्थाः । अपि च समामनन्ति, 'उत्ताना४ वै देवगवा वहन्ति' । आप श्रौ. ११।७।६ । इति । ये देवानां गावः त उत्ताना वहन्तीत्युक्ते गम्यत एव य उत्ताना वहन्ति, ते गोशब्देनोच्यन्त इति । तस्मादन्यो वैदिकगोशब्दस्यार्थः । तथा देवेभ्यो वनस्पते हवींषि हिरण्यपर्ण प्रदिवस्ते अर्थम्' इति, हिरण्यपर्णो५ वै देवो वनस्पति- र्वेदे । 'एतद् वै दैव्यं मधु, यद् घृतम् इति वेदे घृते मधुशब्दः । तस्मादमीषा- मन्येऽर्था इति प्राप्ते । ब्रूमः । य एव लौकिकाः शब्दा त एव६ वैदिकाः त एवैषामर्था७ इति । कुतः ? प्रयोगचोदनाभावात् । एवं प्रयोगचोदना सम्भवति, यदि त एव शब्दाः त एवार्थाः, इतरथा शब्दान्यत्वेऽर्थो न प्रतीयेत । तस्मादेकशब्दत्वमिति । उच्यते । प्रयोजनमिदम् । हेतुर्व्यपदिश्यतामिति ? ततो हेतुरुच्यते । अवि- भागादिति । न तेषामेषां च विभागमुपलभामहे । अत८ एवैकशब्दत्वम् । तांश्च९ तांश्चार्थानवगच्छामः१० । अतो नान्यत्वं च वदामः । यच्चोक्तं य उत्ताना वहन्ति ते देवगवाः, यद् घृतम्, तन्मधु, यो हिरण्यपर्णः, स वनस्पतिरिति । नास्ति११ वचनं यदुत्तानानां वहतां गोत्वं ब्रूयात् । ये गावस्त १ ब. लौकिकास्त एव वैदिकाः । २ ब. तत्रान्ये लौकिका अन्येचैषामर्था । ३ व. इति व्यपदेशः । ४ ब. उत्तानानि ५ क. हिरण्यपर्णो देववनस्पतिः । ६ ब. एव च । ७ ब. एव चैषा । ८ ब. अत एक शब्दत्वं । ९ ब. तांश्चार्था । १० व. अवगच्छामः यच्चोक्तं । ११ ब. तन्नास्ति ।

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६१९ उत्ताना वहन्तीत्येवं तत्। यदि चानेन वचनेन गोत्वं विधीयते, उत्ताना वहन्ती- त्यनुवादः स्यात्। न चोत्ताना वहन्तः प्रसिद्धाः केचित्। ते नियोगतो विधा- तव्याः। तेषु विधीयमानेषु न शक्यं गोत्वं विधातुम्। भिद्येते हि तथा वाक्यम्। यदि चान्ये वैदिकाः तत उत्तानादीनामर्थो न गम्येत। तत्र नतरां शक्येताऽ- विज्ञातलक्षणं गोत्वं विज्ञातुम्¹। न चोत्तानवहनवचनमप्यनर्थकम्, स्तुत्यर्थेनाऽर्थ- वद्भवष्यतीति। एवं घृतस्य मधुत्वम्, हिरण्यपर्णता च वनस्पतेः। तस्मात्त एव शब्दाः अर्थाश्च॥ यदि² लौकिकाः त एवार्थाः तदा सन्देहः³—किमाकृतिः शब्दार्थः, अथ व्यक्तिरिति। का पुनराकृतिः? का व्यक्तिरिति? द्रव्यगुणकर्मणां सामान्य- मात्रमाकृतिः। असाधारणविशेषा व्यक्तिः। कुतः संशयः। गौरित्युक्ते सामान्यप्रत्ययाद्, व्यक्तौ च क्रियासम्बन्धात्⁴। तदुच्यते व्यक्तिः शब्दार्थ इति। कुतः? प्रयोगचोदनाभावात्। आलम्भन-प्रोक्षण-विशसनादीनां प्रयोग- चोदना आकृत्यर्थे न सम्भवेयुः। यत्रोच्चारणानर्थक्यम्, तत्र व्यक्त्यर्थः। अतोऽन्यत्राऽऽकृतिवचन इति चेत्? उक्तम् 'अन्यायश्चानेकशब्दम्' इति। कथं सामान्यावगतिरिति चेत्? व्यक्तिपदार्थकस्यानकृतिश्छिन्नभूता भविष्यति— य एवमाकृतिकः⁵, स गौरिति⁶। यथा यस्य दण्डोऽस्ति, स दण्डीति। न च दण्डवचनो दण्डिशब्दः, एवमिहापि॥ ३०॥ भा० वि०—विषयसंशयौ दर्शयति—गौरित्येवमादय इति। आदिशब्देन गुणक्रियाशब्दानां आख्यातानां च सङ्ग्रहः येषु जातिव्यक्तिवाच्यत्वसन्देहः तेषा- मेव ह्युदाहरणत्वम्। स च जातिगुणक्रियाशब्देष्वेव, नोपसर्गनिपातयोः। यदृच्छासर्वनामशब्दादिषु चेत्यभिप्रायः। अत्र च गौरश्व इत्यादीनां वाचकत्वेन साधुत्वे निरूपिते तेषामेव वाच्यविशेषनिरूपणमनेन क्रियत इति प्रासङ्गिकतया अवान्तरसङ्गतिं सूचयितुं गौरित्येवमादय इत्युक्तम्। प्रमाणम् ज्ञापका वाचका इति यावत्। एवमाकृत्यधिकरणोयं सन्देहमुपन्यस्य, इदानीं तदुपोद्घाततया विचारान्तरमवतारयति—उच्यत इति। यत एतत् स्वावसरे वक्ष्यतेऽतस्तिष्ठतु। इदं तावत्परीक्ष्यतामित्यर्थः। परीक्षामभिनयति—य एवेति। शब्दाभेदेऽप्यर्थ- भेदाभेदविषयं विचारमाह—यदेत्यादिना। अत्र च व्यपदेशभेदात् प्रत्यभिज्ञानाच्च १ व. विधातुं। २. यदा। ३ ब. संशयः। ४ ब. संभवात्। ५ क. एवमाकृतिः। ६ ब. गौरितियस्यदंडो।

६२० मीमांसादर्शनम् [ सू० प्रथमस्संशयः । लिङ्गदर्शनप्रत्यभिज्ञानाभ्यां द्वितीय इति द्रष्टव्यम् । प्रयोजनं तु पूर्वपक्षे लोकवेदयोः पदपदार्थान्यत्वे लौकिकानां पदानां वृद्धव्यवहारो- पात्तार्थवत्त्वेऽपि वैदिकानामव्युत्पन्नतवेनानर्थक्यात् निर्विषयत्वेनाकृत्यधिकरण- नारम्भः । सिद्धान्ते तु लोकवेदयोः पदपदार्थभेदेऽपि सति वैदिकानां पृथग्व्युत्पत्त्यन- पेक्षतयार्थवत्त्वेन सविषयत्वादारम्भः । तत्र पूर्वपक्षमाह—तत्र लौकिका इति । प्रश्नपूर्वकं हेतुद्वयमाह—कुत इत्यादिना । व्यपदेशभेदं विवृणोति—इम इति । केषां शब्दानां वैदिकानां लौकिकानां च इत्यादाविति भावः । रूपभेदं विवृणोति-- अग्निरिति । नियतस्वरो हि वैदिकोऽग्निशब्दः अनियतस्वरश्च लौकिक इति रूपभेदाद् भेद इत्याशयः । एवं शब्दान्यत्वे हेतुद्वयमुक्त्वा अर्थान्यत्वे लिङ्गदर्शनमप्याह--अपि चामनन्तीति । ननु कथमस्य वाक्यस्यार्थान्यत्वे लिङ्गत्वम् ? लोकसिद्धानां गवां देवसम्बन्धनि- मित्तोत्तानवहनप्रतिपादकत्वादस्यात आह—ये देवानामिति । यद्यपि स्वरसतो देवगतानामुद्देश्यत्वमुत्तानवहनस्य च विधेयत्वमवगम्यते, तथापि समासान्निष्कृष्य गोमात्रस्योद्देश्यत्वायोगाद्देवगवानां चाप्रसिद्धत्वादविशेषात् 'यद्वृत्तयोगः प्राथम्यं' इति न्यायेन प्रथमोपात्तोत्तानवहनोद्देशेन गोशब्दवाच्यताविधिरवगम्यत इति अर्थान्यत्वे लिङ्गत्वमित्यर्थः । लिङ्गदर्शनफलमाह—तस्मादिति । अर्थान्यत्वे लिङ्गन्तरमाह—तथेति । वनस्पतेः हिरण्यपर्णेति समानाधिकरणनिर्देशालौकि- कस्य च वनस्पतेर्हिरण्यपर्णत्वस्यानुपलब्धिविरोधेन वक्तुमशक्यत्वादलौकिकस्यैव वस्त्वन्तरस्य वनस्पतिशब्दवाच्यत्वमवसीयत इत्यर्थः । लिङ्गान्तरमाह—तथेति । ततश्चैषामन्यार्थत्वे सति तन्न्यायेन शब्दान्तराणामप्यन्यार्थत्वे सिद्धिरित्यभि- सन्धायोपसंहरति—तस्मादिति । सिद्धान्तमवतार्यं प्रतिजानीते—एवमित्यादिना । प्रश्नपूर्वकं सौत्रं हेतुभागमवतारयति—कुत इति । तमेव हेतुमन्वयमुखेन व्याचष्टे—एवं हीति । अनेनैकत्वे सति प्रयोगचोदनाया भावात् संभवादिति सूत्रावयवो व्याख्यातः । सम्प्रत्यकारप्रश्लेषेण तमेव व्याकुर्वन् व्यतिरेकमाह—इतरथेति । अस्यैव व्याख्या- शब्दान्यत्व इति । भेदे सत्यपूर्वत्वेन सर्ववैदिकपदानामनवगतसम्बन्धत्वेनावबोध- कत्वात् क्रियाकारकसंसर्गात्मकः प्रयोगरूपोऽर्थो न प्रतीयेत । अतश्च प्रयोगचोदना अभाव एव स्यादित्यर्थ—अर्थकत्वमिति । फलपरे सूत्रावयवेऽर्थपदं शब्दस्याप्युप- लक्षणार्थमिति व्याचष्टे—तस्मादिति । अविभागादिति सूत्रावयवव्यावर्त्यशङ्का- माह—नन्विति । अभेद एव वेदप्रामाण्यसिद्धिः न भेदे इत्येवं रूपं प्रयोजनं वेदप्रामाण्यवादिंन प्रत्येव वक्तुं युक्तम् न हैतुकं प्रति । तं प्रति हेतुर्ेव व्यपदिश्य- ताम् इत्यर्थः । उत्तरत्वेन सूत्रमादत्ते—तत इति । शब्दभेदे तावद्धेतुं व्याचष्टे—

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपाद। ६२१ न तेषामिति । स एवायं गोशब्द इति प्रत्यभिज्ञानुरूपस्य प्रत्ययस्य लौकिकवैदिक- शब्देषु भावादित्यर्थः । न च व्यपदेशभेदाद् भेदः, व्यपदेशस्य वाक्यतत्समूह- विषयत्वेन पदविषयत्वाभावादेव तद्भेदस्य पदभेदकत्वासंभवादिति भावः । प्रत्यभिज्ञाफलमाह-अत इति । अर्थभेदेऽपि योजयति-तांश्चेति । शब्दवदर्थेऽप्यै- क्यप्रत्यभिज्ञा तुल्येत्यर्थः । चकारेण शब्दैक्यादप्यर्थैक्यमिति सूचितम् । एकत्वाव- गतिफलमाह-अत इति । लिङ्गदर्शनान्यनुवदति-यच्चेति । तत्रोत्तानवाक्यं तावन्नोत्तानवहनानुवादेन गोशब्दवाच्यत्वविधिपरम् । अपि तर्हि गवानुवादेन देवसम्बन्धनिमित्तोत्तानवहनात्मकधर्मविशेषविधिपरमिति परिहरति-नास्तीति । अथ गोशब्दवाच्यत्वविधिपरत्वे दोषस्तत्राह-यदि चेति । भवतु को दोष- स्तत्राह-न चेति । प्रसिद्धविषयश्चानुवाद इति भावः । अननुवाद्यत्वे फलितमाह--तत इति । नियोगतः अवश्यमस्तु तर्ह्य'भयविधमत्राह-तेष्विति । अपि च यदि सर्वेषां वैदिकपदार्थानामन्यत्वम्, तत उत्तानादिशब्दानामपि लोकप्रसिद्धार्थासंभवान्न तदनुवादेनाप्रसिद्धं गोशब्दवाच्यत्वं शक्यं विधातु- मित्यह--यदि चान्य इति । अवगतेऽप्युत्तानादिपदार्थे तस्याननुवाद्यत्वान्न गोशब्दवाच्यत्वं विधेयम् अनवगते तु न तरामित्यर्थः । ननु उत्तानवहनात्मकधर्मविधानमप्यनर्थकमनुपयोगादिति चोदयति - नन्विति । प्रसिद्धानामेव गवां यज्ञार्थतया विनियुक्तत्वेऽपि देवसम्बन्धिनां स्वर्गलोक- प्रापकत्वश्रवणादुत्तानवाहकत्वं स्तुत्यर्थतया संकीर्त्यत इति परिहरति- स्तुत्यर्थेनेति । लौकिकस्य च घृतस्य देवसंबन्धान्मधुत्वेऽपि रसवीर्यविपाकापादका- देवसंबन्धात् पूर्वं मधुत्वाभावेन मधुपर्कसाधनत्वाभावप्रसङ्गाद्वैदिकस्यापि मधु- शब्दस्य लौकिक एवार्थ इति स्तुत्यर्थ एव घृते मधुशब्द इत्याह-एवमिति । वनस्पतिशब्दस्यापि यज्ञाङ्गवाचिनो लौकिकार्थत्वासंभवाल्लोकसिद्धस्यैव हिरण्य- पर्णत्वं स्तुत्यर्थं सङ्कीर्त्यत इत्याह-हिरण्यपर्णता चेति । एवं व्यपदेशभेद- लिङ्गदर्शनयोरन्यथासिद्धत्वे सिद्धं प्रत्यभिज्ञाबलाच्छब्दार्थैक्यमिति निगमयति- तस्मादिति । एवमुपोद्घाततया लौकिकवैदिकपदतदर्थभेदं व्युत्पाद्य, प्रकृतमेव विचारं प्रस्तौति-यदेति । यदा लोकवेदयोश्शब्दार्थाभेदेने वेदेऽपि लोकव्युत्पन्नाच्छब्दात् व्यक्त्याकृतिरूपोऽर्थः प्रतिपन्नः, तदा किं व्यक्तिर्वाच्या तत्संबन्धादाकृतिप्रत्ययः, अथ वाकृतिर्वाच्या, तत्सम्बन्धाद्व्याक्तिप्रत्यय इति संशय इत्यर्थः । प्रयोजनं तु सामान्यविशेषविशिष्टयोरेकविषयत्वादबाधः पूर्वपक्षे सिद्धान्ते तु बाधक इत्यवधेयम् । विषयावधारणसिध्यर्थं प्रश्नपूर्वमाकृतिव्यक्त्योः स्वरूपं निरूपयति- का पुनरित्यादिना । समानानां भावस्सामान्यम् अनुगतं रूपमाकृतिरित्यनेन संस्थानस्याकृतित्वं निराकृतम् । द्रव्यगुणकर्मणां सामान्यमिति सत्ताख्यं

सूत्रावयवो योज्यः ।

६२२ मीमांसादर्शनम् [ सू० महासामान्यमुक्तम् । द्रव्याणां गुणानां कर्मणां च सामान्यमिति सम्बन्धात् द्रव्यत्व- गुणत्वकर्मत्वानि दर्शितानि । मात्रशब्दः एतदवान्तरसकलसामान्यव्यावृत्त्यर्थः । असाधारणा विशेषा यस्यां सा व्यक्तिरिति बहुव्रीहिः । विशेषणशब्देन खण्डमुण्ड- त्वादयः शाबलेयत्वादयश्च गृह्यन्ते । न च तेषां साधारणत्वादसाधारणत्वासंभवः । साधारणरूपाणामेव तेषामेकद्वित्र्यादिभेदेन क्वचित्क्वचिदुपलब्धानामेकत्र च संहतानां किञ्चिदुत्कर्षापकर्षमात्रेण सर्वत्रासाधारण्योपपत्तेरिति भावः । एवं विषयस्वरूपं निरूप्येदानीं व्यक्तेरेव कार्ययोग्यत्वात् कार्यानन्वयित एव च पदार्थ- त्वावसायान्न संशयावकाश इति आक्षिपति- कुत इति । यथा कार्यानन्वयितया व्यक्तेरेव पदार्थत्वं तथानुवृत्ततया शब्दशक्तिविषयत्वयोग्यत्वादाकृतेरेव पदार्थत्वं प्रतीयत इति तुल्यत्वात् सन्देहोपपत्तिरिति परिहरति- गौरित्युक्त इति । यद्वा गौरित्युक्ते व्यक्त्याकृत्योस्सामान्यप्रत्ययातुल्यप्रत्ययात् प्रत्ययसाम्यादित्यर्थः, व्यक्तौ चकारादाकृतौ चालम्भनस्पर्शनश्येनसदृशयचनादिक्रियासम्भवेन तुल्यत्वात् संशय इति । एवं सन्देहे पूर्वपक्षं प्रतिजानीते-तदुच्यत इत्यादिना । प्रश्नपूर्वकं प्रयोगचोदनाभावादिति सूत्रमावृत्यापि योजयति-कुत इत्यादिना । आलम्भ- प्रोक्षणादीनां प्रयोगः-अनुष्ठानम्, तस्य चोदना तासामाकृत्यर्थत्वेऽभावप्रसङ्गा- न्नित्यत्वेनामूर्तत्वेन चाकृतेरालम्भनाद्यगोचरत्वादिति सूत्रार्थोऽनेन दर्शितः अर्थै- कत्वमिति सूत्रावयवव्याख्यानाय शङ्कामाह- यत्रेति । साधुप्रयोगचोदनासु व्यक्त्यर्थत्वं विनानुष्ठानासम्भवादुच्चारणानर्थक्यम्, तत्र व्यक्त्यर्थः शब्दः । अन्यत्र तु प्रथमप्रतीतेः जातिवचन इत्युभयं वाच्यं कस्मान्नाश्रीयत इत्यर्थः । अन्यायश्चानेकशब्दत्वमिति न्यायेनान्यायश्चानेकार्थत्वमित्यप्युक्तमेव । तत्राप्य- नेकादृष्टशक्तिकल्पनाविशेषादतोऽर्थैकत्वमेव युक्तमिति सूत्रावयवं व्याव्रर्त्यां शङ्कामाह- कथमिति । यदि व्यक्तिरेव पदार्थः कथं तर्ह्याकृतिप्रत्यय इत्यर्थः । अत्राविभागाद् व्यक्त्या सह सम्बन्धात् सामान्यप्रत्यय इति सूत्रव्याख्यानरूपो परिहारोऽध्याहर्तव्यः । ननु व्यक्तेश्शब्दार्थत्वे कथं व्यक्त्यन्तरे प्रयोग इत्यत्राह- व्यक्तिपदार्थस्येति । आकृत्युपलक्षितासु सर्वासु व्यक्तिषु प्रयोगमभिनयति- य एवमाकृतिक इति । नन्वेवमाकृतेरपि पदार्थोपलक्षणत्वात् पदवाच्यत्वमेवेति, नेत्याह- यथेति । यथा दण्डिपदार्थविशेषणभूतोऽपि दण्डो न दण्डिपदाभिधेयः । एवं व्यक्त्युप- लक्षणभूताकृतिरपि न व्यक्तिपदाभिधेयेति, व्यक्तेरेव पदार्थत्वमित्यर्थः । यद्वा यदि व्यक्तिश्शब्दार्थः, कथं सामान्यावगतिरिति पृष्टः पूर्वपक्षवादी सामान्यविशिष्टव्यक्त्यभिधानपक्षं परिगृह्णाति- व्यक्तिपदार्थस्येति । अत्र चा- विभागादभिधेयभूतविशिष्टान्तर्गतत्वाद्विशेषणस्य सामान्यस्य प्रत्यय इति सूत्रावयवो योज्यः ।

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६२३ ननु य एवमाकृतिस्स गौरिति प्रतीतावाकृतेः पूर्वं भानात्, तस्या एव शब्दार्थत्वम्, न तद्विशिष्टव्यक्तेरित्यत आह— यथेति । न हि सत्यामपि न तद्वचनो गोशब्दः, किन्तु विशिष्टवचन इत्यर्थः । तथा चात्र केवला, विशिष्टा वा व्यक्तिश्शब्दार्थ इति पूर्वपक्षौ द्वावभिमती इत्यवधेयम् ॥ ३० ॥ अथ नवममाकृत्यधिकरणम् त० वा०—इह नाख्यातोपसर्गनिपातानां मध्यान्नामानि परिगृह्यन्ते । तेषा- मपि जाति-गुण-क्रिया-द्रव्य-यदृच्छा-सर्वनामशब्दानां मध्याज्जातिशब्दाश्चि- न्त्यन्ते । तेषामप्येकं गोशब्दमुदाहृत्य विचार्यते किं पुनरयमाकृतेर्वाचकः, अथ व्यक्तेरिति । ततः । ( लोकवेदाधिकरणम् ) एतत्सान्त्यासिकं कृत्वा वक्ष्यमाणं तु सांप्रतम् । उपायफलसिद्ध्यर्थमिदं तावद्विचाय्यते ॥ ९२३ किं य एव लौकिकाः शब्दाः त एव वैदिकाः त एव चैषामर्था उतान्य इति । आह— ( शङ्का ) किं लोकवेदशब्दानामेकत्वप्रतिपादने । प्रयोजनं यतः पूर्वं तावत्तत्प्रतिपाद्यते ॥ ९२४ उच्यते— ( समाधानम् ) फलमस्य विचारस्य वैदिकेषु भविष्यति । लोके च निर्णयोपायस्तेनैकत्वाय यत्यते ॥ ९२५ यदि शब्दार्थानामनन्यत्वं लोकवेदयोर्भवेत् । तत् एतस्या व्यक्त्याकृत्यभि- धानचिन्ताया वृद्धव्यवहारस्थानेकप्रयोगानुसरणद्वारेणाभिधेयानभिधेयत्वनिर्णयः शक्यते कर्तुम् । प्रयोजनं तु लोकस्य न किंचिदपि सिध्यति । आकृतिव्यक्तिवाच्यत्वपरमार्थनिरूपणात् ॥ ९२६ संमूर्च्छितानेकार्थसंनिधाने हि शब्द प्रयुक्तः कियत्यप्यर्थजाते प्रत्ययं करोति । तेन चाविविक्ताभिधेयगम्यमानांशेनापि समस्तधर्मोपेतेन कार्यसिद्धौ क्रियमाणायां प्रयुक्तः । यद्युच्यमानया कार्य यदि वा जातिगम्यया । समस्तं क्रियते व्यक्त्या को विवेकधियो गुणः ॥ ९२७ यद्युच्येतेहापि वेदवत्सामान्यविशेषलक्षणबाधसिद्धिरेव प्रयोजनमिति ।

६२४ मीमांसादर्शनम् [ सू० तदुच्यते— सर्वं हि दधिदानादि लोके कर्मार्थलक्षणम् । तद्वशात्क्रियमाणे तु न चिन्त्ये श्रुतिलक्षणे ॥ ९२८ तेन लोके विचारोऽयं जायते निष्प्रयोजनः । स्यात्प्रयोजनवान्वेदे ज्ञानोपायस्तु दुर्लभः ॥ ९२९ तेन शब्दार्थभिन्नत्वे व्यक्त्याकृतिविचारणा । वाच्यावाच्यविवेकाय न कर्त्तव्या कथंचन ॥ ९३० अभेदे सति लोकस्थैः कृतः शब्दार्थनिर्णयः । तस्मिन्ननुपयुक्तोऽपि फलं वेदेषु दास्यति ॥ ९३१ तेन लौकिकवैदिकशब्दार्थैकत्वे सत्याकृत्यधिकरणमुपपत्तिमत्त्वात्प्रयोजन- वत्त्वाच्चाऽऽरब्धव्यम् । भेदपक्षे त्वनारम्भमित्यवधृत्य भेदपक्षस्तावत्प्रतिपाद्यते । नियतानियतस्वरच्छान्दसप्रकृतिप्रत्ययलोपागमवर्णविकारसद्भावासद्भावकृत रूपभेदान्, अध्यायानध्ययनोपनीतानुपनीतत्रैवर्णिकचातुर्वर्ण्यप्रयोज्याप्रयोज्यत्वगुरुशुश्रूषारा - धितगुरुसंप्रदाययदृच्छाप्रयुक्तवाक्यतदर्थान्यत्ववद्यदि पदपदार्थान्यत्वं लोकवेदयोः, ततो लौकिकानामेव व्यवहारोपनिपातादर्थवत्ता । वेदे त्वानर्थक्यान्न चोदना- लक्षणो धर्मः । स्वरेण रूपभेदं मन्यते । अध्यायानध्ययनतया वृत्रहननाद्यर्थयोगेन चाविदिग्धवाक्यवदुत्तानवहनवाक्यभङ्गः । सर्वेषां च वैदिकानामन्यत्वान्न ततोऽपि पौर्वापर्येणार्थावगतिः । ग्राह्यत्वादिधर्मभेदनियतानियतपदवाक्यरचनाद्वारा व्यप- देशरूपभेदाभ्यां सर्वशब्दानांमर्थानां लौकिकानां वैदिकानां च भेद इति प्राप्ते । अभिधीयते — प्रयोगचोदनाभावादेकत्वं तेषु गम्यते । तस्मात्सिद्धिः फलत्वाच्चेदविभागाद्भविष्यति ॥ ९३२ भेदे सत्यपूर्वात्सर्ववैदिकपदानामनवगतसम्बन्धत्वेनार्थशून्यत्वात्क्रियाकारक- संसर्गात्मकप्रयोगचोदनानामभाव एव स्यात् । एकत्वे सति सद्भावादिति वा हेतुवर्णना । अर्थैकत्वं प्रधानत्वाद्वस्त्वभेदोऽथ वोच्यते ॥ ९३३ शब्दार्थैकत्वमिति वक्तव्येऽर्थैकत्ववचनं फलादेव शब्दैकत्वोक्तिसिद्धिं मत्वैवमुक्तम् । अथ वा वस्तुमात्रपर्यायत्वादुभयसाधारण्याभिप्रायेणैवार्थैकत्वोक्तिः । प्रयोग- चोदनाभावप्रसङ्गः परपक्षे, स्वपक्षे वा तद्भावसिद्धिर्वेदवादिनैव सह विवादेऽव-

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६२५ कल्पते, नान्येनेत्यत आह—प्रयोजनमिदं १ तत्प्रमाणमभिधीयतामिति । तदुच्यते । प्रत्यभिज्ञारूपप्रत्ययविभागाज्जायमानोभयप्रमेयरूपाविभागाद्वा वाक्यतत्समूहमात्र- निबन्धनापन्नपदवर्णविषयत्वव्यपदेशाविभागाद्वा, तथोच्चारयितॄणां स्थानकरण- प्रयत्नाविभागाद्वा, लक्षणविदां वा बहुतरानुगमनाविभागादिति हेत्वर्थविकल्पाः । प्रत्यक्षप्रत्यभिज्ञानाच्छब्दैकत्वं प्रतिष्ठितम् । एकशब्दोत्थितज्ञानग्राह्यत्वाच्चैकवाक्यता ॥ ९३४ यथाश्रुतगवादीनां याऽपि वाच्यान्तरे श्रुतिः । अर्थैकत्वाविरोधेन गुणमात्रान्यता परा ॥ ९३५ यथा हि वामना गावो नराश्चिपिटनासिकाः । कर्णप्रावरणाश्चान्ये नरार्थत्वाच्च न च्युताः ॥ ९३६ एवं सत्येव गोत्वादौ धर्मो यदि विलक्षणः । नैतावताऽर्थभेदोऽस्ति विशेषानभिधानतः ॥ ९३७ न च या एव देवानां गावः ता एवाऽवश्यं सर्वत्र वैदिकस्य गोशब्दस्य वाच्या भवन्ति । मनुष्यगवीषु दक्षिणादिसाधनेषु सुतरां प्रयुज्यमानत्वात् । एवं हिरण्यपर्णत्वं मेरौ यदि वनस्पतेः । देवलोके ततः शब्दः किमर्थान्तरवाच्ययम् ॥ ९३८ यच्चैतद्घृतमस्माकं देवानां मध्विदं यदि । रसवीर्यादिभिस्तत्र न शब्दार्थोऽन्यथा भवेत् ॥ ९३९ न च सर्वाप्रसिद्धत्वे गम्यैतैकोऽपि कश्चन । तेनासिद्धैरसिद्धानां नास्त्यन्यत्वनिरूपणम् ॥ ९४० अतोऽवश्यमेतेषामेव गवादीनां देवसम्बद्धानामुत्तानवहनप्रतिपादनमिति वक्तव्यम् । अथ वा भूमिष्ठानामेव सतां केनापि गुणवादेन पृथिवीगोलक-त्रैलोक्यभ्रमणा- दिना वा पुराणोक्तेन दृष्टिवशाद्यथैव वयमुपरि देवान्पश्यामः । एवमधो द्युपरि- वर्तनादयमपि लोको देवैरुपरि दृश्यत इति, उत्तानवहनदृष्टिः । तस्माल्लोकवेद- योरभिन्नाः शब्दार्था२ इति सिद्धे । आकृत्यधिकरणस्य पूर्वपक्षः विचार्यते किमाकृतिः शब्दार्थः, अथ व्यक्तिरिति । द्वौ च पक्षावुप न्यस्तौ भाष्यकारेण यद्यपि । १ क. प्रयोजनमतत्प्रमाण । २. क. व्याकृत्या । ४०

६२६ मीमांसादर्शनम् [ सू० अत्र वार्त्तिकमतं व्याख्यातारस्तथाऽप्यत्र कुर्युः पक्षान्तराण्यपि ॥ ९४१ नियोगेन विकल्पेन द्वे वा सह समुच्चिते । सम्बन्धः समुदायो वा विशिष्टा वैकयेतरा ॥ ९४२ एते पक्षाः पुनर्योज्या व्यतिकीर्णाः परस्परम् । लिङ्ग-कारकसङ्ख्याभिः संहतासंहतात्मभिः ॥ ९४३ पुनर्जात्यादिपक्षाणां तादृश्येवात्र योजना । प्रथमं तावदष्टपक्ष्येवं दर्शयितव्या—गोशब्दस्यार्थः किमाकृतिरेव, व्यक्तिरेव, उताऽऽकृतिर्वा व्यक्तिर्वा, अथाऽऽकृतिश्च व्यक्तिश्च, किमुभयोः सम्बन्ध, उत समु- दायः, किमाकृतिविशिष्टा व्यक्तिः, उत व्यक्तिविशिष्टाऽऽकृतिरिति । तथा किमाकृ- त्यैव विशिष्टः सम्बन्धः, किं व्यक्त्यैव, आकृत्या वा व्यक्त्या वा, अथ समुदाये- नाप्याकृतिविशिष्टया, व्यक्त्या, अथ व्यक्तिविशिष्टयाऽऽकृत्या, अथ परस्परवि- शिष्टाभ्यां द्वाभ्यामिति । तथा किमाकृत्यैव विशिष्टः समुदाय इत्याद्यपि पूर्ववदेव सम्बन्धविशिष्टसमुदायपक्षमात्रातिरिक्तं योजनीयम् । एवं किमाकृत्यैव विशिष्टः सम्बन्ध एव, उत व्यक्त्यैव, अथवाऽऽकृत्या वा, व्यक्त्या वा, अथ समुदायेन किमन्यतरविशिष्टयाऽन्यतरया, अथोभाभ्यामित्येवं समुदायविशेषणत्वपक्षाः पूर्ववदेव योज्याः । एवं किं सम्बन्धेनैव विशिष्टाऽऽकृतिः, अथ समुदायेनैवाथ विकल्पमानाभ्या- मुत समुच्चिताभ्याम् । तथैतद्विशिष्टा किमाकृतिरेवाथ व्यक्तिरेव, अथ विकल्पिते किं समुच्चिते किमिति । तथा किमाकृतिविशिष्टसम्बन्धविशिष्टा व्यक्तिरेव, अथ व्यक्तिविशिष्टसम्बन्धविशिष्टाऽऽकृतिरेवाथ विकल्प उत समुच्चयः । एवं समुदाये- नापि योज्यम् । तथा सम्बन्धविशिष्टव्यक्तिविशिष्टाकृतिरेवाथं संबन्धविशिष्टाकृतिविशिष्टा व्यक्तिरेवाथ विकल्पोऽथ समुच्चयः । एवं समुदायविशिष्टपक्षाः कल्पयितव्याः । तथा किं जात्यैव विशिष्टेन सम्बन्धेन विशिष्टा व्यक्तिः, अथ व्यक्त्यैव विशिष्टेन सम्बन्धेन विशिष्टा जातिरथ विकल्पोऽथ समुच्चयः । एवं समुदायेनापि विशिष्टता योज्या । तथा किं सम्बन्धेनैव विशिष्टया जात्यैव विशिष्टा व्यक्तिरुतैवं- विधया व्यक्त्यैव विशिष्टा जातिरथ विफल्पोऽथ समुच्चयः । एवं समुदायेनैव विशिष्ट्येत्यपि योजयितव्यम् । एवं जातिलिङ्गयोर्जाति- कारकयोर्जातिसंख्ययोश्च प्रत्येकं जातिव्यक्तिपक्षविकल्पितसमुच्चितपक्षोत्थानं दर्शयित्वा व्यक्तेर्लिङ्गादीनां च दर्शयितव्यम् । तथा लिङ्गसंख्यां लिङ्गकारक-

३० . ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६२७ संख्या कारकयुगलान्यपि विकल्प्य प्रत्येकद्वित्रिलिङ्गादिसहितैकजातिव्यक्तिविक- ल्पास्त्रियोगपञ्चयोगाश्चात्र दर्शयितव्याः । एवं शब्दस्वरूपस्य पुनर्जात्यादिभिः सह । एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्कैः सह विकल्पना ॥ ९४४ एते चात्यन्तनिष्कृष्टाः पक्षा यद्यपि न स्थिताः । बुद्ध्या तथापि भिद्यन्ते जातिद्रव्यगुणादिवत् ॥ ९४५ सर्वत्रेन्द्रियलिङ्गाभ्यां भेदः स्तोकोऽवगम्यते । शब्देन तु सुसूक्ष्मोऽपि वस्तुभागो विभज्यते ॥ ९४६ पदात्प्रभृति चैवं या प्रज्ञा ज्ञातुर्विजृम्भते । पुष्पिता सा पदार्थेषु वाक्यार्थेषु फलिष्यति ॥ ९४७ भाष्योक्तपक्षद्वयस्य समर्थनम् अत्र चाऽऽकृतिरेवेति दृढः पक्षोऽयमेकतः । इतरे त्वन्यतः सर्वे व्यक्तिपक्षानुयायिनः ॥ ९४८ व्यक्तौ निराकृतायां च समस्तानां निराक्रिया । सुलभेति न सर्वेऽमी भाष्यकारेण दर्शिताः ॥ ९४९ न चैतस्मान्न सन्त्येव१ न चैते निष्प्रयोजनाः । विकल्पिता हि जिज्ञासोः प्रज्ञाविकसनक्षमाः ॥ ९५० दर्शितेष्वपि सर्वेषु विचारः क्रियते द्वयोः । का शब्देनाऽऽकृतिव्यक्त्योरुच्यते काऽनुगम्यते ॥ ९५१ ततश्च—विचारमुखसिद्धयर्थं स्वरूपं तावदेतयोः । प्रश्नपूर्वमुपन्यस्य याथात्म्येन निरूप्यते ॥ ९५२ पुनरुक्ति-समाधाने ननु प्रथमपाद एवाऽऽकृतेर्निरूपणादिदानीं प्रश्नोत्तरे मन्दप्रयोजने ? उच्यते—सत्यमेवाऽऽकृतिः पूर्वं प्रत्यक्षेण निरूपिता । संस्थानाशङ्कया त्वत्र सामान्यात्मा निरूप्यते ॥ ९५३ संस्थानाकृत्योर्भेदप्रतिपादनम् द्रव्यगुणकर्मणां सामान्यमात्रमाकृतिरिति । १ क. सत्येव ।

६२८ मीमांसादर्शनम् [ सू० द्रव्यादीनां च सामान्यं परापरविभागवत् । वस्तुत्वं प्रथमं तत्र द्रव्यत्वाद्यपरं तथा ॥ ९५४ पुनर्वायुत्वतेजस्त्वजलत्वात्मत्वभिन्नता । पृथिवीत्वाद् घटत्वं च तद्व्यक्तिषु समाप्यते ॥ ९५५ वृक्षत्वात्परतश्चेष्टं शिंशपात्वादि केवलम् । शरीरत्वाच्च गो-वाजि-हस्ति-पुंस्त्वादि गम्यते¹ ॥ ९५६ वाजिकत्वादि चाश्वत्वात्कर्क्यादिस्तु गुणो मतः । हस्तित्वाद्वद्रमद्रादिदिङ्नागकुलजातयः² ॥ ९५७ पुंस्त्वाद् ब्राह्मणकौण्डिन्यकठत्वादिसमाप्यते । तथा गुणत्वकर्मत्वरूपता जन्मतादि यत् ॥ ९५८ ततः शुक्लादि तद्व्यक्तिगुणेषु प्रतितिष्ठति । शब्दान्तरादिभिः षड्भिः प्रमाणैः कर्मभेदः कर्मणामपि यागत्वहोमत्वादिविभागतः ॥ ९५९ अपर्यायस्मृतेरुक्तं धातुभिः प्रविभज्यते । पुनर्विधानसंख्याख्या गुणप्रकरणान्तरैः ॥ ९६० तार्किकमतजैमिनिमतयोरुपन्यासः अन्ये तु भेदमाचार्याः कर्मणामेव मन्वते । अपि वाऽव्यतिरेकात्स्याद्देशादेरेकरूपता ॥ ९६१ रूपशब्दाविभागाच्च वक्ष्येतद्धि³ जैमिनिः । एवं प्रपञ्चितं सर्वमर्थसामान्यमाकृतिः ॥ ९६२ न संस्थानं कुतो ह्येतदात्मादिगुणकर्मसु । सर्वेषु हि पार्थिवेषु गवादिघटादिषु संस्थानं भवेत् । अग्नितोयवाय्वाका- शादीनां तु पार्थिवद्रव्यपरिग्रहवशादाकारानुवृत्तिः कल्प्येत, न स्वातन्त्र्येण । दिक्कालात्ममनसां तु गुणकर्मणां च न कथंचिदपि संस्थानं संभवति । सामान्य- मात्रं तु सर्वस्वविशेषानुवृत्तिरूपं संभाव्यते । तस्मादेतदेवाभिधेयाकृतिकलक्षणम्, नावयवरचनासंस्थानाकृतित्वमवकल्पते । संस्थानस्य च नाशित्वात्प्रतिव्यक्ति च भेदतः । सामान्यव्यवहारित्वं नाऽऽकृतित्वेऽवकल्पते ॥ ९६३ १ क. ( टिप्पणियां ) कथ्यते । २ क. दिग्नाग । ३. जै० सू० ( ६-३-४ ) इत्यत्रेति शेषः ।

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६३१ अथ संस्थानसामान्यमाकृतित्वेन गृह्यते । अश्वादिष्वपि तुल्यत्वाद्भवेदाकृतिसंकरः ॥ ९६४ न चावान्तरसंख्यानं सर्वगोपिण्डवृत्ति यत् । अश्वादिभ्यो निवृत्तं च गोशब्दा लम्बनं भवेत् ॥ ९६५ तस्य ह्युपलक्षणालोच्यमानं न जातेरन्यल्लभ्यते, ततश्च जातिरेव सामा- न्यमिति न्यायेनाऽऽपद्यते । तेन प्रथमपादे रुचक-स्वास्तिक-वर्धमानकोदाहरणात्सं- स्थानाकृत्यभिधानाच्छङ्काक्ष्यादर्शनवदासीदित्येताभ्यां प्रश्नोत्तराभ्यां व्यावय्र्त्यते । अतश्च द्रव्यगुणकर्मणां यावत्किंचित्प्राग्व्यक्तिभ्यः सामान्यम्, तत्सर्वमाकृतिरेवेत्य- भिप्रत्य मात्रशब्दः प्रयुक्तः । असाधारणविशेषा व्यक्तिरिति । केचिदाहुः—असाधारणा विशेषा एव व्यक्तिः । विशेषव्यतिरिक्तव्यक्त्य- भावादिति । तन्निरासः तत्तु नैवं विशेषेभ्यो व्यक्तिरन्यैव हीष्यते । खण्डमुण्डादयः सर्वे विशेषत्वेन संमताः ॥ ९६६ ते चान्यत्रापि दृश्यन्ते तथा जात्यन्तरेष्वपि । शावलेयादिभेदोऽस्ति तदपत्यान्तरेष्वपि ॥ ९६७ खण्डमुण्डादयस्तावदन्या अपि व्यक्तयो भवन्त्येव, गवयमहिषादिव्यक्तयश्च । शाबलेयोऽपि यथैकः तथाऽन्योऽपि यः शबलापत्यत्वेन गम्यते, स सर्वः शाबलेयः । एतच्चोभयवर्णनिमित्तम्, यादृच्छिकं वा, नामाऽन्यत्रापि विनियोगवशाद्वर्तत एव । तदपत्ये च शाबलेय इत्यसाधारणव्यपदेशानुपपत्तिः । विशेषव्यक्तिशब्दयोर्बहु- वचनैकवचनान्तयोः सामानाधिकरण्यप्रयोगवचनभेदाददोषः । अत्र शंकासमाधाने तस्मादसाधारणा विशेषा यस्यां सा व्यक्तिरित्येवं व्याख्येयम् । स्वमतोपन्यासः ननु पूर्वोक्तेन न्यायेन खण्डादीनामपि बहुव्यक्तिसाधारण्याद्व्यक्तिव्यतिरिक्तानां चान्येषां केवलैकैकव्यक्तिगतानां विशेषाणामसंभवाद्वहुव्रीहिरप्यनुपपन्नः । उच्यते । नैव विशेषाणां प्रत्येकमसाधारणत्वमाश्रित्य व्यक्तिविशेषणत्वेनोपादानम् । कथं तर्हि साधारणरूपाणामप्येकद्वित्रादिभेदेन क्वचिदुपलब्धानाम्, यदेकत्र पिण्डी- कृतानां ग्रहणम्, तदपेक्षमसाधारणविशेषत्वाभिधानम् । प्रविप्रकीर्णा हि ये दृष्टा दृश्यन्ते संहताः पुनः । पिण्डासाधारणत्वेन तैर्व्यक्तिरुपलक्ष्यते ॥ ९६८

६३० मीमांसादर्शनम् [ सू० न चैकस्यां व्यक्तौ ये समुदिता दृष्टाः त एव व्यक्त्यन्तरेऽप्यन्यूनतानतिरिक्ता दृश्यन्ते । य एवादृष्टपूर्वस्तस्मिन्समुदाये संप्रति दृश्यते, स एवासाधारणतामापाद- यति । अनन्तभेदास्वपि व्यक्तिषु नात्यन्तापूर्वविशेषणोपलक्षणोपादानं किंचिदु- त्कर्षापकर्षमात्रेण च सर्वत्रासाधारणोपलक्षणलाभात्परसामान्यापेक्षया च सर्वाण्ये- वावान्तरसामान्यानि विशेषव्यपदेशं प्राप्नुवन्ति । संघातावस्थायां च व्यक्तिविशे- षणत्वात्तेषु विशेषशब्दः । एतच्च व्यक्तेर्विशेषाणामन्यत्वमुपरिष्टाद्भाष्यकारोऽपि वक्ष्यत्येव, 'योऽर्थः सामान्यस्य विशेषाणां चाऽऽश्रयः, सा व्यक्तिरिति । भर्तृहरिणा वाक्यपदीयेऽभिहितस्यार्थस्यानुवादः तत्र 'केचिद् गोत्वादिषु विशेषत्वमङ्गीकृत्य सामान्यवाचिना शब्देनाऽनाभिधे- यत्वाद्यदेव महासामान्यं सत्ता-वस्तु-भावशब्दाभिधेयम्, तदेव शब्दस्वरूपव्यवच्छिन्नं वा गोसत्ताख्यमाकृत्यभिधानपक्षे वाच्यमिति मन्यन्ते । यथाऽऽहुः—अस्त्यर्थः सर्वशब्दानामिति प्रत्याय्यलक्षणम् । अपूर्वदेवतास्वर्गैः सममाहुर्गवादिषु ॥ इति ९६९ (वा. का. श्लो.) तन्निरासः तत्तु कक्ष्याविभागेन² सामान्यानां निरूपणात् । अयुक्तं न गवादीनां तत्र वाचकशक्तता ॥ ९७० प्रतिनियतार्थविषया हि शब्दानां वाचकशक्तिरर्थापत्त्या गम्यते । तत्रानन्ता- वान्तरसामान्यवचनानां द्रव्य-गुण-कर्मशब्दानामेव तावदसंकीर्णार्थत्वात्सत्तार्थत्व- मनुपपन्नम्, किमुत दूरान्तरितार्थगवादिशब्दानाम् । सत्तामेते वदन्तश्च न शुद्धां सविशेषणाम् । वदन्तीत्यभिधातुं हि शक्यं द्वेधाऽप्यसंभवात् ॥ ९७१ शुद्धवचनत्वे तावत्सर्वेषामेकार्थप्रत्यायनात्पर्यायत्वप्रसङ्गः । पुनरुक्तवाच्चा- स्तिशब्दप्रयोगानुपपत्तिः । गौनास्तीति प्रयोगश्च विरोधान्नावकल्पते । न हि सत्तैव नास्तीति कथंचित्संप्रतीयते ॥ ९७२ १. कक्ष्याशब्दः कोष्ठवाचां, द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वान्येकस्यां सत्तावान्तरसामान्यकक्ष्यायां पृथिवीत्वादीनि द्रव्यत्वावान्तरसामान्यकक्ष्यायां रूपत्वादीनि गुणत्वावान्तरसामान्य- कक्ष्यायां च वर्तन्त इति कक्ष्याविभागो ज्ञेयः । २. जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यति इति निरुक्तोक्ताः षड् भावविकारा ज्ञेयाः । अत्र च योऽस्तिशब्देन द्वितीयो भावविकार उच्यते स एव सत्तेत्येतद्युज्यत इत्यर्थः ।

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६३१ देशकालद्यपेक्षायामपि नैव सत्तायां नास्तित्वमभिधातुं युक्तम्, विभुत्व- नित्यत्वाभ्यां सर्वदेशकालव्यापित्वात् । रूढिशब्दश्च नैवायं लोकदृष्ट्या प्रतीयते । तेन द्रव्यादिसामान्यं सत्तेत्येतन्न युज्यते ॥ ९७३ य एव ह्यस्तिशब्देन द्वितीयो भावविकार १ उच्यते । जायमानविपरिणा- माद्यवस्थसर्ववस्तुषु विनश्यत्तापर्यन्तेषु वस्वाकृतिप्रतिपत्तिर्दृश्यते । तेन यदि नाम महासामान्यमभिधेयं प्रतिज्ञायते, ततो वस्त्वर्थः सर्वशब्दानामिति प्रत्याय्यलक्षण- मिति कामं वक्तव्यम्, न अस्त्यर्थ इति । न चावयवार्थपरित्यागेन सच्छब्द-सत्ता- शब्दौ वर्तेते इति भवच्छब्दवदेवास्तीति सद्भावः सत्तेति, न तु वैशेषिकपरिभाषया यतो द्रव्यगुणकर्मसु सदिति प्रतीतिः सा वैशेषिकाभिमतसत्तासामान्यस्योपन्यास- निरासौ सत्तेति । एवंलक्षणा जातिः प्रतिपत्तव्या । सेयमव्ययशब्देन वस्तुपर्यायवाचिना । भवत्साधारणार्थेन प्रसिद्धिरुपपादिता ॥ ९७४ अस्तित्वमस्तितेत्येवं दृश्येते प्रत्ययौ यतः । स वस्तुवचनः शब्द आख्यातप्रतिरूपकः ॥ ९७५ अप्रातिपादिकत्वाद्वि नाऽऽख्यातात्तत्त्वतौ स्मृतौ । अस्तिक्षीरा समासश्च तेन सद्वाचिनेष्यते ॥ ९७६ अस्तिक्षीरा गौरिति तिङन्तसमासत्वेनानुपसंख्यानादवश्यंभाविप्रत्ययलक्षण- द्वारसुबन्तत्वयोग्याव्ययपदेन सह क्षीराशब्दस्यान्यपदार्थे बहुव्रीहिरभ्युपगन्तव्यः । तत्र चायं सदर्थवचनः, सक्षीरा गौरिति प्रत्ययोत्पादात् । ततश्च वस्तुनि सति च प्रयुज्यमानमस्तिशब्दमुपलभ्य तदर्थानुसरणप्रत्यासन्नं सच्छब्दं च देवात्तल्लिति च स्वार्थिकं देवतेतितिवत्तलमिहाप्यस्तिधातुवाच्यार्थविशिष्टकर्तृप्रतीतिमनङ्गीकृत्य शुद्धधात्वर्थमात्रवचनावेव सच्छब्दसत्ताशब्दौ गृहीत्वैवं तार्किकैः कल्पितं सच्छब्द- वाच्या सत्ता महासामान्यमिति । तदुक्तान्तगमनेऽनादराच्च २ पदवाक्यविद्भिरप्यु- पेक्षितं प्रसिद्धमिवेमामवस्थां प्राप्तं गवादिशब्दवाच्यत्वेनापि संभाव्यते । १. क. गोत्वादिविशेषव्यवच्छिन्नं (इत्यधिकम्) २. तदुक्तेति-यावद्यावद्विवादाय मुक्तं दीयते मनः । अनवस्थादिदोषेण तावत्तावद्विहन्यते । इत्यनेन न्यायेन चिरनिखाततडागादिगतशैवालवच्छुष्कतर्कस्याप्रतिष्ठितत्वेन निराकृतस्यापि पुनःपुनरुद्भवेन समापयितुमशक्यत्वात्तार्किकोक्तस्यान्तगमने—समापने अनादरादभियुक्तैरुपेक्षितत्वात्प्रसिद्धं सदिमां युक्तायुक्तविचारावस्थां प्राप्तमित्यर्थः ।

६३२ मीमांसादर्शनम् [ सू० न त्वर्थाद्गम्यमानस्य वस्तुत्वस्यापि वाच्यता । धर्मान्तरत्ववृत्तेस्तु१ सत्तायाः कुत एव सा ॥ ९७७ वस्तुशब्दो हि रूढित्वाद् व्यक्तिजात्यन्तराश्रितम् । सामान्यं यद् ब्रवीत्येतद् गम्यतेऽर्थर्गवादिभिः ॥ ९७८ शुद्धाभिधानपक्षस्य दुष्टत्वात्तैर्विशेषितम् । वक्ष्यमाणेन निरासहेतुना अस्य पक्षस्य निराकरणम् महासामान्यमिष्टं चेद्वाच्यं तदपि दुर्लभम् ॥ ९७९ यदेवाऽऽकृतिविशिष्टव्यक्त्यभिधानपक्षे, व्यक्तिविशिष्टाकृतिपक्षे वा निराकरण- कारणम्, तदत्रापि सुलभम्, विशेषणस्य पूर्वतराभिधानप्रसङ्गात् । गोसत्तां चापि गोशब्दो यदि नाम ब्रवीत्ययम् । गोजात्या वा विशिष्टां तां वदेद् व्यक्तिभिरेव वा ॥ ९८० तत्र—गोत्वजातिविशिष्टा चेत्सत्ताऽनेनाभिधीयते । उक्ताद्विशेषणादेव तत्सिद्धेः सा किमुच्यते ॥ ९८१ विशेषणमनभिधाय तद्विशिष्टविशेष्याभिधानासम्भवाद्विशेषणस्य च विशे- ष्येणाऽत्यन्तसम्बन्धात्पूर्वतराभिहितविशेषणभूतगोत्वसम्बन्धादेव सत्तावगमसिद्धेर्न तत्राभिधानशक्तिकल्पनायामर्थापत्तिरप्यन्यथाऽप्युपपद्यमानफलत्वप्रतिहता सती न प्रवर्तते । तथा व्यक्तिविशिष्टसत्ताभिधानेऽप्येष एव निराकरणहेतुः । अनित्यसम्बन्ध- ज्ञानानन्तशब्दशक्तिव्यक्त्यभिधानपूर्वकैकसत्ताभिधानकल्पनायाश्च केवलव्यक्त्य- भिधानपक्षवदनुपपत्तिः । हरिणोक्तस्य दृष्टान्तस्य प्रतिक्षेपः यत्तु अपूर्वदेवतास्वर्गैः सममाहुरिति । तत्राभिधीयते— नैवापूर्वादिशब्दानां सत्ता वाच्येत्यवस्थितम् । विशेषानेव तेऽप्याहुरर्थापत्त्यादिकल्पितान् ॥ ९८२ केचिच्छ्रुतार्थापत्त्या, केचिद्वाक्यशेषवाक्यान्तरपर्युपस्थापितार्थाविशेषवचना एव सन्तोऽत्यन्ताव्यभिचारिस्वार्थद्वारेण२ सत्तापदार्थो व्यभिचरतीति, लक्षणयैव तेभ्यः सत्ताप्रतीतिः । १. धर्मान्तरेति—जात्याख्याद्धर्माद्धर्मान्तरत्वेन—द्वितीयभावविकारत्वेन वर्तमानत्वा- दित्यर्थः । २ क. सत्तां गमयन्तोऽनभिधायकत्वेनावधार्यन्ते न इत्यधिकम् ।

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६३३ कार्यसामर्थ्यमिन्द्रादिनिर्मिश्रसुखसंगतिः । सामान्येनाऽप्यपूर्वादि सत्तातोऽन्यत्तु लभ्यते ॥ ९८३ अपूर्व-देवतास्वर्गादिशब्दानामर्थान्तरपरत्वम् न सत्तावाचित्वमित्युपपादनम् सर्वपदार्थानामेव कार्यार्थापत्तिगम्यानि सामर्थ्यानि सन्ति, यागादिजनितं च पुंसां फलप्राप्तिसामर्थ्यमपूर्वशब्दवाच्यं यागानुष्ठानात्पूर्वमभूतम्, अनुष्ठानोत्तर- कालं चापूर्वं जायत इति यौगिकत्वादेवापूर्वशब्दाभिधानं सर्वत्र लभ्यते । तथा दीव्यन्ति, द्योतन्ते वा चन्द्रादित्याग्निग्रहनक्षत्रतारकादिरूपेण वायवश्च सतत- गत्या स्तूयन्ते सर्वैर्मन्त्रैरिति देवाः सुज्ञानशब्दसम्बन्धा विशेषरूपैरेवेति, न सत्तागोचरत्वं प्रतिपद्यन्ते । तथा स्वर्गशब्देनापि नक्षत्रदेशो वा वैदिकप्रवाद- पौराणिक-याज्ञिकदर्शनेनोच्यते । यथा हि वेदे 'ये हि जना पुण्यकृतः स्वर्गं लोकं यन्ति तेषामेतानि ज्योतींषि नक्षत्राणि, तथा चैष ज्योतिष्मन्तं पुण्यलोकं जयति' इति । यदि वेतिहासपुराणोपपन्नं मेरुपृष्ठम् । अथ वाऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां विभक्तं केवलमेव सुखं यत्संवत्सरादिष्वनुभूयमानं दुःखसाधनशीतोष्णक्षुत्पिपासादिसमस्तद्वन्द्वरहितार्थपत्तिसिद्धदेशान्तरानुभवनीयम्। तच्च यद्यपि तादृशमदृष्टपूर्वम्, तथाऽपि मिश्रानुभवादेव विवेकेनोद्धृत्य स्वर्ग- शब्दार्थत्वेन ज्ञायमानं सत्तां गमयतीति, न तदभिधानमपेक्ष्यते । तेनाऽपूर्वादिशब्दार्थाः समाः सत्यं गवादिभिः । स्वशब्दाभिहिताः सन्तः सत्तां लक्षयितुं क्षमाः ॥ ९८४ संशयस्योपसंहारः अतश्च नैव गोशब्दो गोसत्तामभिधास्यति । गोत्वाख्याकृतिवाच्यत्वसन्देहात्तु विचार्यते ॥ ९८५ कुतः संशय इत्येतत्कार्ययोग्यार्थनिर्णयात् । व्यक्तिमात्रपदार्थत्वं मन्यमानेन चोद्यते ॥ ९८६ उच्यते कार्ययोगित्वाद् गम्यते व्यक्तिवाच्यता । शब्दशक्त्यनुरोधात्तु नाऽऽकृतेर्व्यतिरिच्यते ॥ ९८७ शक्ति-कार्यसंवादादेव शब्दार्थगोचरात् । किं समञ्जसमित्येवं नाऽविचार्याऽवधार्यते ॥ ९८८ पूर्वपक्षः किं तावत्प्राप्तम्— प्रयोगचोदनाभावाद् व्यक्तिर्वाच्या न तूभयम् । अर्थैकत्वं यतो युक्तमविभागाद् द्वयोगतिः ॥ ९८९