मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
५६ | मृच्छकटिकम्
शकारः--चिट्ठ, वशन्तशणिए ! चिट्ठ । (तिष्ठ वसन्तसेने ! तिष्ठ ।)
किं याशि, धावशि, पलाअशि, पक्खलन्ती वाशू ! पशीद ण मलिश्शशि, चिट्ठ दाव । कामेण दज्झदि हु हलके मे तवश्शी अङ्गाललाशिपडिदे विअ मंसखण्डे ॥१८॥
अर्थ--[ हम लोगों के ] भय के कारण ( अपनी ) मन्द गति को बदल=छोड़ देनी वाली, नृत्यकला में कुशल अपने ) पैरों को जल्दी-जल्दी फेंकती ( आगे बढ़ाती ) हुई, भय से विह्वल एवं चञ्चल कटाक्षों से ( चारों ओर ) दृष्टिपात करती हुई तुम [ वसन्तसेना ], शिकारी द्वारा पीछा किये जाने से घबड़ायी हुई हिरनी के समान, क्यों भागी जा रही हो ? ॥ १७ ॥
टीका--( अनुगन्तृभ्योऽस्मभ्यम् ) भयेन = भीत्या, परिवर्त्तितसौकुमार्या=परिवर्त्तितम्=द्रुतगमनाय अन्यथाकृतं परित्यक्तमिति यावत्, सौकुमार्यम्=गमन-मार्दवम्, मन्दगमनम्, यया सा शीघ्रगतिकेति भावः, नृत्यप्रयोगे=नृत्यकलायाम् विशदौ=निपुणौ चरणौ=पादौ, क्षिपन्ती=इतस्ततः पातयन्ती, उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-विसृष्ट-दृष्टिः=(१) उद्विग्नाः=अत्यन्तं व्यग्राः, चञ्चलाः=चाञ्चल्ययुक्ताः कटाक्षाः=अपाङ्गदृष्टयः यस्मिन् कर्मणि यथा स्यात् तथा ( क्रियाविशेषणमिदम् ) विसृष्टा=प्रेरिता, दृष्टिः=नेत्रं यया सा, (२) यद्वा उद्विग्नं चंचलं च यथा स्यात् तथा कटाक्षेण विसृष्टा दृष्टिः यया सा, (३) यद्वा-उद्विग्ना च चञ्चला च, कटाक्ष-विसृष्टा च ( एषां द्वन्द्वं कृत्वा ) दृष्टिःयस्याः सा इति बहुव्रीहिः, (४) यद्वा-उद्विग्नचञ्चलकटाक्षरूपेण विसृष्टा दृष्टिर्यया सा इति पृथ्वोधरः । त्वम्=वसन्त-सेना, व्याधानुसारचकिता=व्याधस्य=मृगयालुब्धकस्य अनुसारेण=अनुसरणेन, पश्चाद्-धावनेनेत्यर्थः, चकिता=त्रस्ता, हरिणी इव=मृगी इव, किम्=किमर्थम्, कस्मात् हेतोः, यासि=धावसि । त्वदनुरागाकृष्टेभ्यः मादृशजनेभ्यो भयं नोचितमिति भावः । उपमालंकारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ १७ ॥
विमर्श--नृत्यप्रयोगविशदौ-नृत्य के अभ्यास से पटु अथवा नृत्य के प्रयोग में कुशल । इसमें विवादग्रस्त पद है -उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-विसृष्ट-दृष्टिः । यहाँ (१) उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्ष-इन्हें 'विसृष्ट' क्रिया का विशेषण बनाकर बहुव्रीहि करना चाहिये । (२) उद्विग्न-चञ्चल-कटाक्षरूपेण विसृष्टा दृष्टिः यया सा । (३) उद्विग्ना च चञ्चला च कटाक्ष-विसृष्टा च दृष्टिर्यस्याः सा ।
यहाँ उपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है ॥ १७ ॥
अर्थ--शकार--ठहरो, वसन्तसेने ! ठहरो ।
अन्वयः--प्रस्खलन्ती, किम् यासि, धावसि, पलायसे, ( हे ) वासु ! प्रसीद, न, मरिष्यसि, तावत्, तिष्ठ, अङ्गारराशि-पतितम्, मांसखण्डम्, इव, तपस्वि, मे, हृदयम्, कामेन, दह्यते, खलु ॥ १८ ॥
प्रथमोऽङ्कः ५९
( किं यासि, धावसि, पलायसे, प्रस्खलन्ती वासु ! प्रसीद, न मरिष्यसि, तिष्ठ तावत् । कामेन दह्यते खलु मे हृदयं तपस्वि अङ्गारराशिपतितमिव मांसखण्डम् ॥ १८ ॥ )
चेटः--अज्जुके ! चिट्ठ चिट्ठ। ( आर्यके ! तिष्ठ तिष्ठ । ) उत्ताशिता गच्छशि अन्तिका मे शंपुण्णपुच्छा विअ गिम्हमोरी । ओवग्गदी शामिअभट्टके मे वण्णे गडे कुक्कुडशावके व्व ॥१६॥
शब्दार्थ--प्रस्खलन्ती=लड़खड़ाती हुई, किम्=क्यों, यासि=जा रही हो, धावसि=दौड़ रही हो, पलायसे=भाग रही हो, हे वासु !=हे बाले ! प्रसीद= ( मुझ पर ) खुश हो जाओ, न=नहीं, मरिष्यसि=मरोगी, तावत्=कुछ, तिष्ठ=रुको, ठहर जाओ, अङ्गारराशिपतितम्=अङ्गारों के समुदाय में गिरे हुये, मांसखण्डम्=मांस के टुकड़े के, इव=समान, मे=मेरा, तपस्वि=बेचारा, हृदयम्=हृदय, दिल, कामेनं=कामरूपी अग्नि से, दह्यते=जलाया जा रहा है, खलु=यह निश्चित है ॥ १८ ॥
अर्थः--लड़खड़ाती हुई क्यों जा रही हो, दौड़ रही हो, भाग रही हो । हे बाले ! प्रसन्न हो जाओ, मरोगी नहीं, थोड़ा ठहरो । ( अथवा थोड़ी देर रुको, इससे मर नहीं जाओगी । ) ( जलते हुये ) अंगारों के समुदाय के ऊपर गिरे हुये मांस के टुकड़े के समान मेरा बेचारा ( सीधा साधा ) हृदय ( दिल ) काम ( कामाग्नि ) द्वारा जला डाला जा रहा है, यह निश्चित है ॥ १८ ॥
विमर्शः--शकार इस प्रकरण का प्रतिनायक है । यह राजा का शाला ( रखैल का भाई ) होता है। अतः इसमें अहंकार असीमित होता है। इसका लक्षण यह है
मद-मूर्खताभिमानी दुष्कुलतैश्वर्यसंयुक्तः । सोऽयमनूढाभ्राता राज्ञःश्यालः शकार इत्युक्तः ॥
यह शकारी बोली बोलता है, इसमें 'श' की बहुलता रहती है इस लिये इसका नाम शकार होता है। शकार की बातें--क्रमरहित, व्यर्थ, पुनरुक्त, हतोपम और लोक तथा न्याय से विरुद्ध होती हैं । यह लक्षण आगे कथानक से स्पष्ट है । 'बाला स्याद् वासू-( रार्यस्तु मारिषः ), अमरकोष १।७।६८। इसमें उपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है- ज्ञेयं वसन्ततिलकं त-भ-जा जगौ गः ॥ १८ ॥
अन्वयः--सम्पूर्णपक्षा, ग्रीष्ममयूरी, इव, उत्त्रासिता, (त्वम् ) मम, अन्तिकात्, गच्छसि, वने, गतः, कुक्कुटशावकः, इव, मम, स्वामिभट्टारकः, अववल्गति ॥ १६ ॥
५८ मृच्छकटिकम्
( उत्त्रासिता गच्छसि अन्तिकान्मे सम्पूर्णपक्षेव ग्रीष्ममयूरी ।
अववल्गति स्वामिभट्टारको मे वने गतः कुक्कुटशावक इव ॥ १६ ॥
**शब्दार्थः—**सम्पूर्णपक्षां=समस्त पंखों से परिपूर्ण, ग्रीष्ममयूरी=ग्रीष्मकालीन मोरनी, इव=के तुल्य, उत्त्रासिता=घबड़ायी हुई, ( त्वम्=तुम ), मम=मेरे, अन्तिकात्=समीप से, गच्छसि=जा रही हो; वने=जंगल में, गतः=गये हुये, कुक्कुट-शावकः इव=मुर्गी के बच्चे के समान, मम=मेरा, स्वामि-भट्टारकः=सम्मानित स्वामी ( शकार ), अववल्गति=( तुम्हारे पीछे पीछे ) दौड़ रहा है ॥ १६ ॥
**अर्थ—चेट—**आर्ये ! ठहरो, ठहरो ।
सम्पूर्ण पंखोंवाली, ग्रीष्मऋतु की मोरनी के समान भयभीत हुई ( तुम ) मेरे पास से भागी जा रही हो ? वन में गये हुये मुर्गी के बच्चे के समान मेरा सम्मानित स्वामी ( शकार ) ( तुम्हारे पीछे पीछे ) दौड़ रहा है ॥ १६ ॥
विमर्शः—'अन्तिका' इस प्राकृतपाठ का संस्कतरूप 'अन्तिकात्' है जैसा कि ऊपर लिखा गया है । कुछ व्याख्याकारों ने 'अन्तिका' यह पाठ माना है और 'अन्तिका' भगिनी ज्येष्ठा' ( अमरकोष १।७।१५ ) के अनुसार बड़ी बहन यह अर्थ किया है । और वसन्तसेना को बड़ी बहन के तुल्य माना है । यहाँ विचारणीय यह है कि संस्कृत शब्द का प्राकृत में भी क्या 'अन्तिका' यही रूप रहता है ? सम्पूर्णपक्षा—गर्मी के दिनों में मयूरी के पंख पूरे-पूरे होते हैं, उन्हें कोई तोड़ न ले-इस भयं से वह सदैव सावधान रह कर भागती रहती है, वैसे ही वसन्तसेना के भागने का उल्लेख किया है । यहाँ कवि की एक अनभिज्ञता का परिचय मिलता है क्योंकि मयूरी के पंखों को नहीं अपितु मोर के पंखों को लोग तोड़ते हैं । मोर के ही पंखों की सुन्दरता अनुभव-सिद्ध है । अतः यह लोकानुभवविरुद्ध ही समझना चाहिये ! कुक्कुटशावक इव—यहाँ—मुर्गी के बच्चे के समान—यही अर्थ उचित है क्योंकि बच्चे मुर्गी के ही पीछे दौड़ते हैं मुर्गा के नहीं । यहाँ शकार नीच पात्र की नीच मुर्गी के बच्चे के साथ उपमा देना ठीक ही है । इसमें दो बार सादृश्य-वर्णन होने से उपमा अलंकार है । इन्द्रवज्रा छन्द है । इसका लक्षण—स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ॥
कुछ व्यख्याकारो ने 'अज्जुके' को संस्कृत शब्द माना है और गणिका का पर्याय माना है—"नाट्योक्तौ गणिकाऽज्जुका" ( अमरकोष ७।७।११ ) किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि प्राकृतभाषी चेट संस्कृत शब्द का प्रयोग नहीं करता है । अतः 'अज्जुके' यह प्राकृत शब्द ही समझना चाहिये और इसका संस्कृत 'आर्यके !' यह करना चाहिये । अतः यही पाठ रखा गया है ॥ १६ ॥
५९
प्रथमोऽङ्कः
विटः--वसन्तसेने ! तिष्ठ, तिष्ठ ।
किं यासि बालकदलीव त्रिकम्पमाना रक्तांशुकं पवनलोलदशं वहन्ती ।
रक्तोत्पलप्रकरकुङ्मलमुत्सृजन्ती टङ्कैर्मनःशिलगुहेव विदार्यमाणा ॥२०॥
**विट--**वसन्तसेने ! ठहरो, ठहरो।
**अन्वयः--**बालकदली, इव, विकम्पमाना, पवनलोलदशम्, रक्तांशुकम्, वहन्ती, (त्वम्) टङ्कैः, विदीर्यमाणा, मनःशिलागुहा, इव, रक्तोत्पलप्रकरकुङ्मलम्, उत्सृजन्ती, किम्, यासि ? ॥ २० ॥
**शब्दार्थः--**बालकदली=नवीन ( कोमल ) केला के वृक्ष के इव=समान, विकम्पमाना=काँपती हुई, पवनलोलदशम्=हवा से चञ्चल आंचल वाले, रक्तांशुकम्=लाल रेशमी वस्त्र को, वहन्ती=धारण करती हुई; ( तुम ) टङ्कैः=टांकी द्वारा, विदार्यमाणा=छेदी ( काटी ) जाती हुई, मनःशिल-गुहा=मनसिल की कन्दरा के, इव=तुल्य ( उससे निकलने वाली चिनगारियों के समान ), —रक्तोत्पलप्रकर-कुङ्मलम्=( केशपाश में गुंथे हुये ) लाल कमलों के समुदाय की कलियों को, ( गुहापक्ष में रक्तकमल-समुदाय के तुल्य कलियों=कलीसद्श पत्थर के टुकड़ों को ), उत्सृजन्ती=बिखेरती हुई ( गुहापक्ष में निकालती हुई ), किम्=क्यों, यासि=भागी जा रही हो ? ॥ २० ॥
**अर्थ--**नये कदली वृक्ष के समान ( भय से ) काँपती हुई, वायु द्वारा चञ्चल आँचल वाले लाल रेशमी वस्त्र को धारण करती हुई, ( तुम ; टांकी ( छेनी आदि काटने के औजार ) के द्वारा काटी ( छेदी ) जाती हुई मनःशिला ( मनसिल ) की कन्दरा ( से निकलने वाली लाल लाल चिनगारियों ) के समान ( अपने केशपाश=जूड़े में गुंथे हुये ) रक्त-कमलसमुदाय की कलियों को ( गुहा-पक्ष में रक्त कमल-तुल्य जो लाल पत्थर उसकी कलियों के समान चिनगारियों ) को ( वेग से भागने के कारण बिखराती हुई ) ( गुहापक्ष में—निकालती हुयी ) क्यों जा रही हो ? ॥ २० ॥
**टीका--**बालकदली = नवीनकोमलकदलीवृक्षः, इव = यथा, विकम्पमाना = कम्पिता सती, पवनलोलदशम् = पवनेन = वायुना, लोला = चञ्चला, दशा = प्रान्तभागीय-दीर्घतन्तुसमुदायः, अञ्चलभागः, यस्य तत्, रक्तांशुकम् = रक्तवस्त्रम्, वहन्ती = धारयन्ती, ( त्वम् ), टङ्कैः = पाषाण-विदारणयन्त्रैः, विदार्यमाणा = भिद्यमाना, मनःशिल-गुहा इव = रक्तवर्णधातुविशेषस्य खनिः इव, ( यद्यपि 'मनःशिला' इति स्त्रीलिङ्ग एव साधुस्तथापि महाभारते मनःशिलशब्दोपि दृश्यते इति तथा प्रयुक्तः इति पृथ्वीधर आह ), रक्तोत्पलप्रकर-कुङ्मलम् = रक्तोत्पलानाम् = रक्तकमलानाम्, प्रकरः = समुदायः, तन्निर्मितं माल्यादिकमिति भावः, तस्य कुङ्मलम्=मुकुलम्, गमनतीव्रतया,
| ६० | मृच्छकटिकम् |
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शकारः—चिट्ठ, वसन्तशेणिए ! चिट्ठ । (तिष्ठ, वसन्तसेनिके ! तिष्ठ ।)
मम मअणमणङ्गं मम्महं वड्ढअन्ती
णिशि अ शअणके मे णिद्दअं आक्खिवन्ती ।
पशलशि भअभीदा पक्खलन्ती खलन्ती
मम वशमणुजादा लावणश्शेव कुन्ती ॥ २१ ॥
उत्सृजन्ती=पातयन्ती, किम्=किमर्थम्, यासि=धावासि, व्रजसि। अत्र गुहापक्षे रक्तोत्पलप्रकरवत् कुड्मलान्=कुडमलसदृशप्रस्तरखण्डान्, उत्क्षिपन्तीत्यर्थो बोध्य । यथा विदारणकाले मनःशिलागुहातः रक्तकमलतुल्यः स्फुलिङ्गाः निःसरन्ति तथैव वसन्तसेनाशरीरे सज्जनार्थमुपयुक्तानि पुष्पाणि भयेन तीव्रगमनात् पतन्तीति भावः। अत्रोपमालंकारः, 'उत्सृजन्ती इव' इति व्याख्यायामुत्प्रेक्षापीति बोध्यम् । वसन्त-तिलकं वृत्तम् । लक्षणन्तु पूर्वमुक्तम् ॥ २० ॥
विमर्श—यहाँ वसन्तसेना को नवकदली के समान और उसके वस्त्रों को कदली के लाल फूलों के समान बताया गया है । उसके शरीर पर सजाने के लिये लगे फूल, भागने के कारण गिरने से उसी प्रकार लग रहे हैं जैसे मनसिलपत्थर काटते समय निकलने वाली चिनगारियाँ । मनःशिला शब्द यद्यपि स्त्रीलिङ्ग है तथापि महा भारतादि के अनुसार पुंलिंग मानकर यहाँ का प्रयोग समझना चाहिये । यहाँ उपमा अलंकार स्पष्ट है । उत्सृजन्ती क्रिया के साथ 'इव' का आक्षेप से योग करने पर उत्प्रेक्षा भी सम्भव है । वसन्ततिलका छन्द है—उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः ॥ २० ॥
अन्वयः—मम, मदनम्, अनङ्गम्, मन्मथम्, वर्धयन्ती, निशि, च, शयनके, मम, निद्राम्, आक्षिपन्ती, (साम्प्रतम्), भयभीता, प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती, प्रसरसि, (तथापि), रावणस्य, कुन्ती, इव, मम, वशम्, अनुयाता ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—मम=मेरे [=शकार के] मदनम्, अनङ्गम्, मन्मथम्=काम को, वर्द्धयन्ती=बढ़ाती हुई, च=और, निशि=रात में, शयनके=शय्या (पलंग) पर, मम=मेरी, निद्राम्=नींद को, आक्षिपन्ती=उचाटती हुई, भगाती हुई, (तुम इस समय) भयभीता=भय से डरी हुई, प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती=बार बार लड़खड़ाती हुई, (यद्यपि) प्रसरसि=भागी जा रही हो, (तथापि) रावणस्य=लंकापति रावण के, (वश में आई हुई) कुन्ती इव=पाण्डवों की माता के समान (तुम), मम=मेरे, वशम्=वश, अधिकार में, अनुयाता=आ गयी हो (अतः अब भागना व्यर्थ है)।।२१।।
अर्थ—शकार—रुको, वसन्तसेने ! रुको ।
मेरे, मदन, अनङ्ग, मन्मथ (=काम) को बढ़ाने वाली, और रात्रि में पलंग (शय्या) पर मेरी नींद को उचाटनेवाली=भगाने वाली, (तुम इस समय)
प्रथमोऽङ्कः ६१
( मम मदनमनङ्गं मन्मथं वर्द्धयन्ती, निशि च शयनके मे निद्रामाक्षिपन्ती । प्रसरसि भयभीता प्रस्खलन्ती, स्खलन्ती, मम वशमनुयाता रावणस्येव कुन्ती ॥२१॥
विटः—वसन्तसेने !
किं त्वं पदैर्मम पदानि विशेषयन्ती व्यालीव यासि पतगेन्द्रभयाभिभूता । वेगादहं प्रविसृतः पवनं निरुन्ध्यां त्वन्निग्रहे तु वरगात्रि ! न मे प्रयत्नः ॥ २२ ॥
भय से घबड़ायी हुई बार-बार लड़खड़ाती हुई ( यद्यपि ) भाग रही हो, (तथापि) उसी प्रकार मेरे वश में आगई हो जिस प्रकार रावण के वश में कुन्ती (आगई थी) अतः अब भागने का प्रयास व्यर्थ है ॥ २१ ॥
**टीका—**मम=शकारस्येत्यर्थः, मदनम्, अनङ्गम, मन्मथम्=कामम्, कामवेग-मित्यर्थः, वर्द्धयन्ती=उद्दीपयन्ती, निशि=निशायाम्, शयनके=शय्यायाम्, अधिकरणे ल्युट् ततः स्वार्थे कः, च=तथा, मम=शकारस्य, निद्राम्,=स्वापम्, आक्षिपन्ती=स्वचिन्तनेनापसारयन्ती, साम्प्रतम्, भयभीता=भयत्रस्ता, भीतेत्येनेनैव निर्वाहे भयशब्दोऽपार्थकः, प्रस्खलन्ती-स्खलन्ती=त्वरिततरगमनेन चरणौ स्खलितौ कुर्वन्ती, प्रसरसि=प्रगच्छसि, तथापि, रावणस्य=लङ्काधिपतेः, वशमायाता, कुन्ती इव=युधिष्ठिरादीनां माता इव, मम=शकारस्य, वशम्=अधीनताम्, अनुयाता=आपतिता असि । 'रावणस्येव कुन्ती' त्यत्र हतोपमा, शास्त्रविरुद्धत्वात् । मालिनीवृत्तम्—न-न-मयययु-तेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥ २१ ॥
**विमर्श—**शकार अनर्गल पुनरुक्तियुक्त एवं व्यर्थ की बातें बोलता है । अतः श्लोक असंगत नहीं है । भयभीता —भीता इतना पर्याप्त है, भय शब्द व्यर्थ प्रयुक्त है । रावण त्रेता में हुआ था और कुन्ती द्वापर में । इनका कोई सम्बन्ध नहीं था फिर भी शंकार का वचन होने से दोष नहीं है । 'रावणस्येव कुन्ती' इसमें शास्त्र-विरुद्ध होने से हतोपमा है । इसीलिये कहा गया है—
आगम-लिङ्ग-विहीनं देशकालन्याय-विपरीतम् । व्यर्थैकार्थमपार्थं हि भवति वचनं शकारस्य ॥
इसमें मालिनी छन्द है । लक्षण—न-न-म-य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥२१॥
**अन्वयः—**पतगेन्द्रभयाभिभूता, व्याली, इव, त्वम्, पदैः, मम, पदानि, विशेष-यन्ती, किम्, यासि ? हे वरगात्रि ! वेगात्, प्रविसृतः, अहम्, पवनम्, निरुन्ध्याम् ( न, रुन्ध्याम् ? ) तु, त्वन्निग्रहे, मे, प्रयत्नः, न [ भवति ] ॥ २२ ॥
**शब्दार्थ—**पतगेन्द्रभयाभिभूता=गरुड [ के द्वारा पकड़े जाने ] के भय से घबड़ाई हुई, व्याली=नागिन, इव=के तुल्य ( त्वम्=तुम ) पदैः=पैरों से, मम=
६२ मृच्छकटिकम्
शकारः-भावे ! भावे ! (भाव ! भाव ! )
मुझ विट के, पदानि=पैरों को (पैरों के चिह्नों को), विशेषयन्ती=अतिक्रान्त करती हुई, किम्=किस लिये, यासि ? =जा रही हो ? हे वरगात्रि ! सुन्दर अवयवों वाली, वेगात्=वेगसे, प्रविसृतः=दौड़ा हुआ, अहम्=मैं (विट), पवनम्=हवा को निरुन्ध्याम्=रोक सकता हूँ (न=नहीं, रुन्ध्याम्=रोक सकता हूँ ? अर्थात् अवश्य ही रोक सकता हूँ।) तु=लेकिन, त्वन्निग्रहे=तुम्हें (बलपूर्वक) पकड़ने में, मम=मेरा, प्रयत्नः=प्रयास, न=नहीं है ।। २२ ।।
अर्थ-विट— हे वसन्तसेने ! पक्षिराज गरुड के [द्वारा पकड़ लिये जाने के] भय से भयाकुल नागिन के समान (तुम) (अपने) पैरों से मेरे पैरों (के चिह्नों) का अतिक्रमण करती हुई अर्थात् उन्हें लाँघकर उनके आगे क्यों भागी जा रही हो ? वेग से दौड़ा हुआ मैं क्या पवन को नहीं रोक सकता हूँ ? (अर्थात् अत्यन्त तीव्रगामी पवन को भी रोक=पकड़ सकता हूँ तो तुम्हारी बात ही क्या है,) परन्तु हे सुन्दर अवयवों वाली ! तुम्हें (बलपूर्वक) पकड़ने के लिये मेरा प्रयास नहीं है । (अतः रुक जाओ ।) ।। २२ ।।
**टीका-**पतगेन्द्रभयात्=पतगानाम्=पक्षिणाम् इन्द्रः=राजा गरुडः तस्मात् भयात्=भीतेः, अभिभूता=व्याकुला, व्याली=सर्पिणी, इव=तुल्या, (त्वम्,) पदैः=स्वपदक्षेपैः, मम=विटस्य, पदानि=चरणविक्षेपान्, विशेषयन्ती=अतिशयाना, अतिक्रामन्ती, किम्=किमर्थम्, यासि=पलायसे, एवञ्च वसन्तसेनायाः शीघ्रगामित्वं वक्रत्वञ्च सूच्यते, वेगात्=जवात् यद्वा ‘वेगमाश्रित्य' इति ल्यब्लोपे पञ्चमी, प्रविसृतः=प्रस्थितः, अहम्=विटः, पवनम्=वायुम्, अपीति शेषः, निरुन्ध्याम्=रोद्धुं शक्नुयाम्, न=नैव, रुन्ध्याम् = रोद्धुं शक्नुयाम्, इत्यपि, पाठः अत्र काक्वा, अवश्यमेव रुन्ध्यामिति भावः, तु=किन्तु, हे वरगात्रि ! शोभनावयवे !, त्वन्निग्रहे=बलपूर्वकं त्वद्ग्रहणे, मे=मम, न=नैव, प्रयत्नः=प्रयासः अपितु अनुनयेनैवेति भावः । अत्रोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ।। २२ ।।
**विमर्श—**जैसे गरुड़ द्वारा पकड़े जाने के भय से सर्पिणी शीघ्र और टेढ़े मेढ़े चलती है उसी प्रकार शकार आदि द्वारा पकड़ लिये जाने के भय से वसन्तसेना भी जल्दी-जल्दी और टेढ़े-मेढ़े भाग रही है। निरुन्ध्याम्-विट का आशय यह है कि वेग से जब दौड़ूँगा तो पवन को भी पकड़ कर रोक लूँगा, वसन्तसेने ! तुम्हारी क्या बात है । 'न रुन्ध्याम्' यह पाठ भी मिलता है। इसमें काकु से अर्थ करना पड़ता है—'नहीं पकड़ सकता हूँ ?' अर्थात् अवश्य पकड़ सकता हूँ । किन्तु बलात् पकड़ने की इच्छा नहीं है, अनुनय से ही वश में करना चाहता हूँ । यहाँ उपमा अलङ्कार और वसन्ततिलका छन्द है ।। २२ ।।
प्रथमोऽङ्कः ६३
एशा णाणक-मूशि-काम-काशिका, मच्छ्राशिका लाशिका,
णीण्णाशा, कुलणाशिका, अवशिका, कामस्स मञ्जूशिका।
एशा वेशबहू, शुवेशणिलया वेशङ्गणा वेशिआ,
एशे शे दश णामके मइ कले, अज्जावि मं णेच्छदि ॥ २३ ॥
अन्वयः—एषा—(१) नाणकमोषिकाम-कशिका, (२) मत्स्याशिका, (३) लासिका, (४) निर्नासा (निर्नाशा), (५) कुलनाशिका, (६) अवशिका, (७) कामस्य मञ्जूषिका, एषा (८) वेशवधूः, (६) सुवेशनिलया, (१०) वेशाङ्गना, (११) वेशिका—एतानि, दश, नामानि, अस्याः, मया, कृतानि, (परन्तु इयम्) अद्य, अपि, माम्, न, इच्छति ॥ २३ ॥
शब्दार्थ—एषा = यह वसन्तसेना, नाणकमोषि-काम-कशिका = नाणकं = शिवांक-चिह्नित सिक्कों एवं रत्नादि के चुराने वालों की कामाग्नि को शान्त करने वाली, दूर करने वाली, मत्स्याशिका = मछली खाने वाली, लासिका = नृत्य करने वाली, निर्नासा = नकटी, बेइज्जत, कुलनाशिका = वंश का विनाश करने वाली, अवशिका = (किसी के भी) वश में न रहने वाली, कामस्य = काम (क्रीडा) की, मञ्जूषिका = पिटारी, (है) एषा = यह वसन्तसेना, वेशवधूः = वेश्यालय की वधू, सुवेशनिलया = सुन्दर भवन में रहनेवाली या सुन्दर वस्त्रों तथा घर वाली, वेशाङ्गना = वेश्यालय की स्त्री [अत्यन्त सुन्दरी,] वेशिका = वेश = वेश्यालय है जिसके पास अर्थात् वेश्यालयवाली, एतानि = ये, दश = दस नामानि = नाम, अस्याः = इस वसन्तसेना के, मया = मैने, कृतानि = रखे हैं [तथापि यह] अद्य, = इस समय = आज, अपि = भी, माम् = मुझ [शकार] को, न = नहीं, इच्छति = चाहती है ॥ २३ ॥
अर्थ—शकार—महानुभाव ! महानुभाव !
यह वसन्तसेना उत्तम सिक्के एवं रत्नादि को चुराने वालों के कामभाव को (रत्यादि के द्वारा) शान्त करने वाली, मछली खाने वाली, नाचनेवाली, नाकरहित (=बेइज्जत), कुल का नाश करने वाली, (किसी के भी) वश में न रहने वाली, काम की पेटी, वेश्यालय की वधू, सुन्दर भूषण एवं भवनवाली (अथवा सुन्दर प्रासाद में रहने वाली), वेश्यालय की कामिनी, वेश्यालयवाली (=वेश्या)—ये दश (वास्तव में ग्यारह) नाम इसके मैंने रखे है तो भी यह आज भी मुझे नहीं चाह रही है ॥ २३ ॥
टीका—गद्ये-भाव ! भाव ! इदमादरसूचकं सम्बोधनपदम् । श्लोके-एषा = दृश्यमाना वसन्तसेना, नाणकमोषि-कामकशिका=नाणकानि = शिवादिक्चिह्नाङ्कितानि टङ्ककादि-वित्तानि, बहुमूल्यनिष्कादिकानि वा मुष्णन्ति = चोरयन्ति-इति नाणकमोषिणः, तेषाम्—कामस्य = वासनायाः, कशिका = कशा, कामभावस्य उद्दीपिका, रत्यादिना शमयित्री वा, अतएवोक्तम्—
| ६४ | मृच्छकटिकम |
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( एषा नाणक-मोषि-काम-कशिका, मत्स्याशिका, लासिका,
निर्नासा, कुलनाशिका, अवशिका, कामस्य मञ्जूषिका ।
एषा वेशवधूः, सुवेशनिलया, वेशाङ्गना, वेशिका,
एतान्यस्या दश नामकानि मया कृतानि, अद्यापि मां नेच्छति ॥ २३ ॥
तस्कराः पण्डका मूर्खाः सुख-प्राप्तधनास्तथा ।
लिङ्गिनश्छिन्नकामाद्या आसां प्रायेण वल्लभाः ॥
मत्स्याशिका=मीनभक्षिका, लासिका=लास्यकर्त्री नर्तकीति भावः, निर्नासा=अल्पनासा, निम्ननासेति वा, अपमानितेति भावः, निर्नाशा-इति पाठे निः=निश्चयेन नाशः=पतनम्, नरकादिगमनम् वा यस्याः सा, निम्नाशा-इति पाठे तु निम्ना=तुच्छा, आशा=अभिलाषः यस्याः सा-तुच्छविषयिणीच्छावतीत्यर्थः, कुलनाशिका=कुलस्य=वंशस्य, नाशिका=विनाशिका, अत्र नाशः स्वस्याः कुलस्य स्वासक्तपुरुषाणाञ्च कुलस्येति बोध्यम्, उभयकुलविनाशीकेति भावः, अवशिका=प्रचुरदानादिप्रदानेनापि कस्यापि वशतामनापन्ना, कामस्य=मदनस्य, रत्यादेरित्यर्थः, मञ्जूषिका = पेटिका, मञ्जूषा, अस्तीति शेषः, एषा=वसन्तसेना, वेशवधूः=वेशस्य=वेश्यालयस्य वधूः=स्त्री, सुवेशनिलया=शोभनानां वेशानां-भूषणादीनां वस्त्राणाञ्च, निलयः = आश्रयभूता, तदलंकृतेति भावः, यद्वा-सुवेशः = सुन्दरः वेश्यालयः, आश्रयः = भवनं यस्याः सा, वेशाङ्गना = वेशस्य = वेश्यालयस्य अङ्गना=उत्तमा नारी, नारीबहुत्वेऽपि अस्यामेवोत्तमत्त्वमिति भावः, वेशिका=वेशः=वेश्यालयः अस्ति आश्रयत्वेन यस्याः सा, दश=दशसंख्याकानि, नामकानि=प्रियनामानि, मया-शकारेण, कृतानि =विहितानि, तथापि अद्य=अस्मिन् क्षणे अपि माम्=शकारम्, न=नैव, इच्छति=कामयते । अष्टानां दशानां नाम्नामुच्चारणे देवता अपि प्रसन्ना भवन्ति किन्तु इयं नैव प्रसीदतीति कष्टकरम् । अत्रेदं बोध्यम्-गणनायां एकादश-नामानि सिध्यन्ति, श्लोके च दशैवोल्लिखितानीति विरोधः, किञ्च वेश-वधूः, सु-वेश-निलया, वेशाङ्गना, वेशिका-इत्यत्र चतुर्धा वेशशब्दस्य प्रयोगोऽसमीचीनः इति शंकायामुच्यते यत् शकारस्य वचनमिदमतो नात्र तर्कः औचित्यं वा विचारणीयम् । सार्थकविशेषणतया परिकरालंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ २३ ॥
विमर्श—(१) निर्नासा—इसमें ‘निर्’ यह अल्पार्थक अव्यय है=अल्प नाक वाली, नीचीनाकवाली, नाक का ऊँचा होना प्रतिष्ठा का और नीचा होना अप्रतिष्ठा का सूचक है। (२) निर्नाशा—यह भी पाठ है—निः=निश्चयेन नाशः=पतनम्=नरकादिगमनम् यस्याः सा=वेश्या की नरकयातना पुराणादि में प्रतिपादित है। (३) निम्नाशा—निम्ना=निकृष्टा, आशा=अभिलाषः यस्याः सा-जो तुच्छ से तुच्छ वस्तु की इच्छा कर सकती है।
प्रथमोऽङ्कः ६५
**विटः—**प्रसरसि भयविक्लवा किमर्थं प्रचलितकुण्डलघृष्टगण्डपार्श्वा । विटजननखघट्टितेव वीणा जलधर-गर्जित-भीतसारसीव ॥२४॥
यहाँ गणना करने पर वास्तव में ग्यारह नाम होते हैं परन्तु शकार के वचन असंगत होते हैं-यह मान कर 'दश' समझना चाहिये । इसी प्रकार एषा, एषा-यह दो बार है और 'वेशवधूः, सु-वेश-निलया, वेशाङ्गना वेशिका-इनमें 'वेश' शब्द का चार बार प्रयोग भी उचित नहीं है किन्तु शकार की उक्ति समझकर यहाँ भी दोष नहीं मानना चाहिये । वेशिका-वेशः=वेश्यालयः अस्ति अस्याः इस अर्थ में "अत इनिठनौ" [ पा. सू, ५।२।११५ ] से मत्वर्थीय ठन् = इक प्रत्यय हुआ है । दश नामकानि-यहाँ प्रिय अर्थ में 'क' प्रत्यय है, दश प्यारे नाम रखे हैं। गणेश आदि देवता तक बारह नामों का उच्चारण करने पर प्रसन्न होकर इच्छा पूरी कर देते हैं, परन्तु यह वसन्तसेना वेश्या होकर भी दश नाम उच्चारण किये जाने पर भी मेरे ऊपर प्रसन्न नहीं हो रही है। यह आश्चर्य की बात है। शकार का यह अभिप्राय है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है—सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ २३ ॥
**अन्वयः—**प्रचलित-कुण्डल-घृष्टगण्डपार्श्वा, विट-जन-नखघट्टिता, वीणा, इव, जलधर-गर्जित-भीत-सारसी, इव, भयविक्लवा, ( सती ), किमर्थम्, प्रसरसि ॥२४॥
**शब्दार्थ—**प्रचलित-कुण्डल-घृष्टगण्डपार्श्वा=हिलते हुये कुण्डलों से रगड़े गये ( चिह्नित ) कपोल भाग वाली, ( इसीलिये ) विट-जन-नख-घट्टिता=विट जनों के नाखूनों से ( बजाने ) से घिसी हुई, वीणा इव=वीणा के समान, जलधर-गर्जित-भीत-सारसी इव=मेघों की गर्जना से डरी हुई सारसी के समान, भयविक्लवा=भय से व्याकुल ( होती हुई तुम ), किमर्थम्=किसलिये, प्रसरसि=भागी जा रही हो ? ॥ २४ ॥
**अर्थ—**हिलते हुये कुण्डलों के कारण रगड़ खाये हुये कपोलस्थल वाली, ( अतएव ) विटजनों के नाखूनों के द्वारा ( बजायी जाने के कारण ) घिसी हुई ( चिह्नविशेष से युक्त ) वीणा के समान, ( तथा ) मेघों की गर्जना से डरी हुई सारसी के समान भयातुर ( होती हुई ) तुम क्यों भागी जा रही हो ? ॥ २४ ॥
**टीका—**प्रचलितकुण्डलघृष्ट-गण्डपार्श्वा = प्रचलिताभ्याम् = चञ्चलाभ्याम्, कुण्डलाभ्याम् = कर्णाभूषण-विशेषाभ्याम्, घृष्टौ = घर्षणयुक्तौ गण्डयोः = कपोलयोः पार्श्वौ = कर्णसमीपप्रदेशौ यस्याः सा तादृशी, अत एव, विटजन-नखघट्टिता—विटजनानाम् = विलासप्रियजनानाम्-नखैः=अङ्गुल्यग्रैः घट्टिता=प्राप्तघर्षा, सन्ताडिता वा, वीणा इव=वाद्यविशेष इव, जलधरगर्जित-भीत-सारसी इव = जलधरस्य=
५ मृ०
६६ मृच्छकटिकम्
शकारः—झाणज्झणन्तबहुभूषणशद्दमिश्श
किं दोवदी विअ पलाअशि लामभीदा । एशे हरामि शहशत्ति जधा हनूमे विश्शावसुश्श बहिणिं विअ तं शुभद्दं ॥ २५ ॥
( झणज्झणायमानबहुभूषणशब्दमिश्रं किं द्रौपदीव पलायसे रामभीता ।
एष हरामि सहसेति यथा हनूमान् विश्वावसोर्भगिनीमिव तां सुभद्राम् ॥ २५ ॥ )
मेघस्य, गर्जितेन=गर्जनेन, भीता=भयाक्रान्ता, चासौ सारसी=सारसपक्षिणः प्रेयसी इव, भयविक्लवा=भयेन=भीत्या, विक्लवा = व्याकुला, सती, किम् = किमर्थम्, प्रसरसि=प्रपलायसे । अत्र मनोहरत्वात् शब्दवत्त्वाद् वा वीणातुल्यत्वमुक्तमिति पृथ्वीधरः । मालोपमा अलङ्कारः, तल्लक्षणन्तु —
मालोपमा यदैकस्योपमानं बहु दृश्यते । पुष्पिताग्रा वृत्तम्, तल्लक्षणम् —
आयुजि न-युगरेफतो यकारो युजि तु न-जौ-ज-र-लगाश्च पुष्पिताग्रा ।।२४।।
**विमर्श—**प्रस्तुत श्लोक में वसन्तसेना की उपमा वीणा और सारसी से दी गई है। जैसे मनोहर और ध्वनि करने वाली वीणा बजाने से घर्षित हो जाती है वैसे ही कुण्डलों की रगड़ से वसन्तसेना के कपोलों के ऊपर कान के पास घर्षणचिह्न बन रहें हैं। मेघ के तुल्य इन शकारादि के शब्दों को सुनकर सारसी के तुल्य वसन्तसेना भयभीत होकर भाग रही है। ये दो उपमान होने से मालोपमा अलंकार है। और पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २४ ॥
**अन्वयः—**रामभीता, द्रौपदी, इव, ( त्वम् ) झणज्झणायमानबहुभूषणशब्द-मिश्रम्, किम्, पलायसे, यथा, हनूमान्, विश्वावसोः, ताम्, भगिनीम्, सुभद्राम्, इव, ( त्वाम् ), एषः ( अहम् ), इति, सहसा, हरामि ॥ २५ ॥
**शब्दार्थः—**रामभीता=रामचन्द्र से डरी हुई, द्रौपदी इव=पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी के समान ( त्वम्=तुम ), झणज्झणायमानबहुभूषणशब्दमिश्रम्=झन, झन करने वाले बहुत से आभूषणों की ध्वनि से मिले हुये, किम्=क्यों, पलायसे=भाग रही हो ? ( अर्थात् झन झन करते हुये आभूषणों की ध्वनि को अपने साथ लेती हुयी ध्वनितुल्य गति से क्यों भागी जा रही हो ? ), यथा=जिस प्रकार, हनूमान्=पवनपुत्र द्वारा, विश्वावसोः = विश्वावसु नामक गन्धर्व की, ताम्=उस प्रसिद्ध, भगिनीम् इव=बहिन के समान, ( त्वाम्=तुमको ), एषः=यह ( अहम्=मैं शकार ) इति=इस प्रकार ( बलपूर्वक ) हरामि=हरण करके ले जा. रहा हूँ ॥ २५ ॥
**अर्थ—शकार—**राम से डरी हुई द्रौपदी के समान (तुम) झन झन करते
प्रथमोऽङ्कः ६७
हुये आभूषणों की ध्वनि को मिलाती हुई क्यों भागी जा रही हो ? जिस प्रकार हनुमान ने विश्वावसुनामक गन्धर्व की उस बहिन सुभद्रा का हरण किया था उसी प्रकार यह मैं ( शकार ) तुम्हारा ( बलात् ) हरण कर रहा हूँ ॥ २५ ॥
टीका—रामभीता=रामचन्द्रभीता, द्रौपदी इव = द्रुपदपुत्रीतुल्या, ( त्वम्=वसन्तसेना ) झणज्झणायमानबहुभूषणशब्दमिश्रम्=झणत् झणत्-इति अव्यक्तशब्दं कुर्वताम् = झणज्झणायमानाम्, बहूनां भूषणानाम् = अलङ्काराणाम्, शब्देन=अव्यक्तध्वनिना, मिश्रम् = मिश्रितं यथा स्यात् तथेति क्रियाविशेषणम्, किम्=किमर्थम्, पलायसे=प्रधावसि, अत्र केचित्-झणज्झणमिति बहुभूषणशब्दमिश्रम्=इत्यन्वयं कृत्वा व्याचख्युस्तन्न, प्राकृते एकस्यैव पदस्य प्रयोगात्, मध्ये 'इबि' शब्दप्रश्लेषस्यायुक्तत्वाच्चेति बोध्यम् । यथा=येन प्रकारेण, हनूमान्=पवनपुत्रः, विश्वावसोः=एतन्नामकस्य प्रसिद्धगन्धर्वस्य, ताम्=विश्रुताम्, भगिनीम् इव=स्वसारम् इव, (त्वाम्=वसन्तसेनाम्) एषः=उपस्थितः (अहम्=शकारः), इति=अनेन रूपेण, सहसा=शीघ्रमेव बलपूर्वकम्; हरामि=अपनयामि, अत्र यथा, इव-शब्दद्वयं सादृश्यार्थं प्रयुक्तमिति पुनरुक्तम्, एकेनैव निर्वाहात् । द्रौपदी दुर्योधनभीता, न रामभीता, सुभद्रा श्रीकृष्णस्य भगिनी, न विश्वावसोः । सुभद्रा अर्जुनेनापहारिता न हनूमता — एताः असङ्गतयः शकारवचनत्वान्न दोषप्रदाः, विदूषकस्येव शकारस्यापि हास-कारित्वात् । प्रसिद्धिविरुद्धवर्णनात् हतोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥२५॥
विमर्श—झाणज्झणत्-बहुभूषणशद्दमिश्रम् - इस प्राकृत की संस्कृत छाया अलग-२ प्राप्त होती है—( १ ) झाणत् झणत् बहुभूषणशब्दमिश्रम् ( २ ) झणज्झणमिति भूषणशब्दमिश्रम्, ( ३ ) झणज्झणायमान-बहुभूषणशब्दमिश्रम् । प्रथम एवं तृतीय पाठ वाले विद्वान् इसे क्रियाविशेषण मानते हैं । द्वितीय पाठ वाले विद्वान् 'अलग-अलग पद मानकर — बहुभूषणशब्दमिश्रम् झणज्झणम् इति कुर्वती--ऐसी योजना करते हैं । परन्तु दो पृथक-पृथक् पदों की कल्पना करना और 'कुर्वंती' आदि क्रिया पद का आक्षेप करना कहाँ तक उचित है, यह विचारणीय है । इस श्लोक में 'यथा' और 'इव' दो समानार्थक शब्द होने से पदा-धिक्य दोष है । इसी प्रकार जो उपमायें हैं वे शास्त्र-पुराणादि-विरुद्ध हैं अतः हतोपमा अलंकार है ( १ ) द्रौपदी राम से नहीं, दुर्योधन से भयभीत हुई थी, ( २ ) सुभद्रा विश्वावसु की नहीं, श्रीकृष्ण की बहिन थी, ( २ ) इसका हरण हनुमान ने नहीं, अर्जुन ने किया था । शकार का स्थान यहाँ विदूषक के समान ही प्रतीत होता है । अतः ये असंगतियाँ सामाजिकों के परिहास के लिये की गई हैं । इस प्रकार दोषकोटि में नहीं आती हैं । इसमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ २५ ॥
६८ मृच्छकटिकम्
चेटः—लामेहि अ लाववल्लहं तो खाहिशि मच्छमंशकं ।
एदे हि मच्छमंशकेहिं शुणआ मलंअं ण शेवन्ति ॥ २६ ॥
( रमय च राजवल्लभं ततः खादिष्यसि मत्स्यमांसकम् ।
एताभ्यां मत्स्यमांसाभ्यां श्वानो मृतकं न सेवन्ते ॥ २६ ॥ )
अन्वयः— (हे वसन्तसेने !) राजवल्लभम्, रमय, ततः, च, मत्स्यमांसकम्, खादिष्यसि, एताभ्याम्, मत्स्यमांसाभ्याम्, (सन्तुष्टाः) श्वानः, मृतकम्, न सेवन्ते ॥ २६ ॥
शब्दार्थः— (हे वसन्तसेने), राजवल्लभम् = राजा के प्रिय (शाले) के साथ, रमय = रमण (रतिक्रीडा) करो, च = और, ततः = इससे, मत्स्यमांसम् = मछली तथा मांस, खादिष्यसि = खाओगी, एताभ्याम् = इन (शकार-गृहस्थित), मत्स्यमांसाभ्याम् = मछली और मांस से, (सन्तुष्टाः = तृप्त रहने वाले), श्वानः = कुत्ते, मृतकम् = मृत (प्राणी के मांस) को, न = नहीं, सेवन्ते = खाते हैं ॥२६॥
अर्थ—चेट— (हे वसन्तसेने !) राजा के प्रियशाले (शकार) के साथ रमण करो और इसके कारण मछली तथा मांस खाओगी। इसके घर में विद्यमान मांस और मछलियों (को खाने) से (पूर्ण तृप्त) कुत्ते मरे हुये (प्राणी के मांस) को नहीं खाते हैं ॥ २६ ॥
टीका— (हे वसन्तसेने !) राजवल्लभम् = राज्ञः प्रियसम्बन्धिनं श्यालकं शकारमित्यर्थः, रमय = रमयस्व, रतिक्रीडया सन्तोषयेति भावः, णिजन्तादुभयपदस्य विधानादात्मनेपदमपीति बोध्यम्, ततः = तस्मात् कारणात्, च = तथा, मत्स्यमांसकम् = मीनामिषम्, समाहारद्वन्द्वः, खादिष्यसि = भक्षयिष्यसि; एताभ्याम् = शकारस्य गृहे स्थिताभ्याम्, मत्स्यमांसाभ्याम् = मीनामिषाभ्याम्, सन्तुष्टाः, श्वानः = कुक्कुराः, मृतकम् = शवादिकम्, न = नैव, सेवन्ते = खादन्ति, स्पृशन्तीत्यर्थः। प्रतिपादं चतुर्दशमात्रात्वात् मात्रासमकं छन्दः। उत्तरार्द्धवाक्यार्थेन पूर्वार्द्धवाक्यार्थस्य साधनात् काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥ २६ ॥
विमर्श— यहाँ चेट अपने निम्न स्तर के अनुसार शकार की सम्पन्नता मांस एव मछलियों से सिद्ध करता है। पृथ्वीधर ने इसमें काकु सिद्ध की है—"मृतकं न सेवन्ते। नकारः शिरश्चालने। न सेवन्ते इति न, अपितु सेवन्त एवेत्यर्थः।" इस काकु का औचित्य चिन्तनीय है। मत्स्यमांसकम्— यहाँ समाहारद्वन्द्व है और स्वार्थ में 'क' प्रत्यय है। इसमें सामान्यतया आर्या छन्द है। परन्तु पृथ्वीधर ने मात्रासमक छन्द माना है। इसमें प्रत्येक पाद में १४ मात्रायें होनी चाहिये परन्तु द्वितीय पाद में १५ है अतः 'तो' इसे लघु मानना चाहिये—'तो' इत्योकारो लघुश्छन्दानुरोधात्, इत्याहुः।'
प्रथमोऽङ्कः ६६
विटः—भवति वसन्तसेने !
किं त्वं कटीतटनिवेशितमुद्वहन्ती ताराविचित्ररुचिरं रशनाकलापम्।
वक्त्रेण निर्मथितचूर्णमनः शिलेन त्रस्ताऽद्भुतं नगरदैवतवत् प्रयासि ॥२७॥
एओकारौ हलन्तस्थौ शुद्धौ वाप्यपदान्वितौ।
दीर्घात् परौ लघू स्यातां छन्दोविचितभाषया ॥
पूर्वार्द्ध वाक्य द्वारा जो अर्थ कहा गया है उसकी सिद्धि उत्तरार्द्ध वाक्य से की जा रही है अतः काव्यलिङ्ग अलङ्कार है।॥ २६ ॥
अन्वयः—कटी-तट-निवेशितम्, तारा-विचित्ररुचिरम्, रशना-कलापम्, उद्वहन्ती, निर्मथितचूर्ण-मनःशिलेन, वक्त्रेण, (उपलक्षिता सती) त्रस्ता, त्वम्, नगरदैवतवत्, अद्भुतम्, किम्, प्रयासि ॥ २७ ॥
शब्दार्थ—कटीतटनिवेशितम्=कमर में बांधी हुई, ताराविचित्ररुचिरम्=तारों के तुल्य अथवा मोतियों से अद्भुत एवं मनोहर, रशनाकलापम्=करधनी को, उद्वहन्ती=धारण करती हुई, निर्मथित-चूर्णमनः शिलेन=चूर्ण किये गये मनःशिल (लालवर्ण के पत्थर-विशेष) को तिरस्कृत कर देने वाले (अर्थात् उससे भी अधिक लाल), वक्त्रेण=मुख से, (उपलक्षिता सती=उपलक्षित होती हुई), त्रस्ता=भयभीत, (त्वम्=तुम) नगरदैवतवत्=नगर-रक्षक देवता के समान अद्भुतम्=आश्चर्यजनक रूप से, किम्=क्यों, प्रयासि=भागी जा रही हो ॥ २७ ॥
अर्थ विट—आदरणीय वसन्तसेने !
कमर में बन्धी हुई, ताराओं के समान अथवा मोतियों से अद्भुत और मनोहर करधनी को धारण करती हुई, (अपने मुख की लालिमा द्वारा) चूर्ण किये गये मेनसिल की लालिमा को तिरस्कृत करने वाले मुख से युक्त (अर्थात् क्रोध के कारण अत्यन्त लाल मुख वाली अथवा मैनसिल को लगाने से लाल=गुलाबी रंग के मुखवाली), डरी हुई तुम नगररक्षक देवता के समान, आश्चर्यजनक रूप से क्यों भागी जा रही हो ॥ २७ ॥
टीका— कटीतटनिवेशितम्=श्रोणिप्रदेशे उपनिबद्धम्, ताराविचित्र-रुचिरम्=ताराभिः=तारागणैः इव विचित्रं मुक्ताभिर्वा विचित्रम्, मनोहरञ्च, रशनाकलापम्=मेखलाख्यभूषण-विशेषम्, उद्वहन्ती=धारयन्ती, निर्मथित-चूर्ण-मनः शिलेन=निर्मथिता=तिरस्कृता चूर्ण-मनः शिला येन तादृशेन, यद्वा निर्मंथिता चूर्णशिला यंत्र तेन, यद्वा निर्मथित-चूर्णमनः शिलातुल्येन, वक्त्रेण=मुखेन, (उपलक्षिता सती) त्रस्ता=भयभीता, भयवशात् मुखस्य विवर्णता सञ्जातेति भावः, त्वम् = वसन्तसेना, नगर-दैवतवत्=नगररक्षक-देवता-तुल्यम् अद्भुतम्=आश्चर्यकरम्, किम्=किमर्थम्, प्रयासि=प्रधावसि । यत्र नगरे जायमानं भाविनं वानिष्टं विलोक्य नगर-रक्षकदेवता
८० | मृच्छकटिकम्
शकारः—
अह्मेहि चण्डं अहिशालिअन्ती वण्णे शिआली विअ कुक्कुलेहिं ।
पलाशि शिग्घं तुलिदं शवेगं शवेण्टणं मे हलअं हलन्ती ॥२८॥
(अस्माभिश्चण्डमभिसार्यमाणा वने शृगालीव कुक्कुरैः ।
पलायसे शीघ्रं त्वरितं संवेगं सवृन्तं मे हृदयं हरन्ती ॥ २८ ॥
व्यग्रा सती धावित्वा रक्षां करोति तथैव वसन्तसेना त्वमपि धावित्वाऽत्मानं व्यर्थमेव रक्षसि। अत्र वतिप्रत्ययाश्रितां तद्धितोपमा, वसन्तसेनायां नगरदेवतात्वोत्प्रेक्षणाद् उत्प्रेक्षेति बोध्यम्। वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥२७॥
विमर्श—ताराविचित्ररुचिरम्=तारागणों के समान आश्चर्यजनकरूप से चमकनेवाली, अथवा मुक्ता आदि लगी होने से अद्भुत और मनोहर। निर्मथित-चूर्णमनः शिलेन—यह 'वकत्रेण' का विशेषण है। इसमें निर्मथित शब्द के अनेक अर्थ करके तात्पर्य निकाले जाते हैं—(१) निर्मथित=तिरस्कृत कर दिया है चूर्ण मनः शिला को जिसने, (२) निर्मथित=किसी अन्य पदार्थ में मथी गई=घोट कर मिलाई गई चूर्णीभूत मनः शिला के समान, (३) निर्मथित=लेप की गई है चूर्णमनः-शिला जिसमें, वैसे। यहाँ वसन्तसेना के क्रोधातिशय और सौन्दर्यातिशय का वर्णन है। अतः इन अर्थों की संगति सम्भव है। क्रोध मानने पर लाल और सौन्दर्य मानने पर गुलाबी मुख—यह योजना होती है। त्रस्तादद्भुतम्-इसे एक पद मानकर क्रियाविशेषण लिखा गया है। परन्तु त्रस्ता और अद्भुतम् ये दो पद मानकर अर्थयोजना अधिक संगत है। नगरदैवतवत्—देव एव देवता, स्वार्थ में तल् प्रत्यय, देवता एव दैवतम् यहाँ 'प्रज्ञादिभ्यश्च' [ सूत्र ] से स्वार्थिक अण् प्रत्यय होता है। जिस प्रकार नगर पर आयी हुई विपत्ति के समय उसकी रक्षा के लिये नगररक्षक देवता दौड़ने लगती है उसी प्रकार वसन्त-सेना दौड़ रही है। यहाँ वति प्रत्यय मानकर उपमा है। यदि वसन्तसेना में देवतात्व की उत्प्रेक्षा करें तो उत्प्रेक्षा अलंकार भी है। वसन्ततिलका छन्द है ॥ २७ ॥
**अन्वयः—**वने, कुक्कुरैः, (अभिसार्यमाणा) शृगाली, इव, (अत्र), अस्माभिः, चण्डम्, अभिसार्यमाणा, (त्वम्), मम, हृदयम्, सवृन्तम्, हरन्ती, शीघ्रम्, त्वरितम्, संवेगम्, पलायसे ॥ २८ ॥
**शब्दार्थ—**वने=जंगल में, कुक्कुरैः=कुत्तों द्वारा, (अभिसार्यमाणा=पीछा की जाती हुई), शृगाली इव=शृगाली के समान, (अत्र=यहाँ), अस्माभिः=हम लोगों द्वारा, चण्डम्=भीषणरूप से, अभिसार्यमाणा=पीछा की जाती हुई, (त्वम्=तुम), मम=मेरे (शकार के), हृदयम्=हृदय को, सवृन्तम्=मूल के सहित, हरन्ती=ले जाती हुई, शीघ्रम्, त्वरितम्, संवेगं=बहुत शीघ्रतापूर्वक, पलायसे=भाग रही हो ॥ २८ ॥
प्रथमोऽङ्कः ७१
वसन्त०—पल्लवआ ! पल्लवआ ! परहुदिए ! परहुदिए ! ( पल्लवक ! पल्लवक ! परभृतिके ! परभृतिके ! )
शकारः—-( सभयम् ] भावे ! भावे ! मणुश्शे ! मणुश्शे ! [ भाव ! भाव ! मनुष्या मनुष्याः ]
विटः—न भेतव्यं न भेतव्यम् ।
वसन्त०—माहविए ! माहविए ! । ( माधविके ! माधविके ! )
विटः—( सहासम् ! ) मूर्ख ! परिजनोऽन्विष्यते ।
शकारः—भावे ? भावे ? इत्थिआं अण्णेशदि ? । ( भाव ! भाव ! स्त्रियमन्विष्यति ? )
**अर्थ—शकार —-**वन में कुत्तों द्वारा पीछा की जाती हुई शृगाली (सियारिन) के समान (यहाँ) हम लोगों द्वारा बहुत पीछा की जाती हुई तुम मेरे हृदय को मूल के साथ साथ ले जाती हुई बहुत जल्दी-२ वेगपूर्वक भाग रही हो ॥ २८ ॥
**टीका—-**वने=अरण्ये, कुक्कुरैः=श्वभिः, ( अभिसार्यमाणा=अनुगम्यमाना ), शृगाली=क्रोष्ट्री, शिवा, इव=तुल्या, ( अत्र=अस्मिन् स्थाने ) अस्माभिः=मया मम जनैश्च, अभिसार्यमाणा=अनुगम्यमाना, (त्वम्), मम=केवलस्य शकारस्येति बोधनार्थमेकवचनप्रयोगः इति ज्ञेयम्, हृदयम्=चित्तम्, सवृन्तम्=वृन्तेन सहितम्, हरन्ती=अपनयन्ती, शीघ्रम्, त्वरितम्, सवेगम्=अतीव शीघ्रतया, पलायसे=प्रधावसि । अत्र शकार-वचनत्वात् पुनरुक्तिदोषो न विचारणीयः । अस्माभिरित्यत्र बहुवचनेन विट-चेट-शकारादीनां बहूनां बोधः, सर्वेऽपि वसन्तसेनामनुसरन्ति किन्तु 'मम' इत्येकवचनेन केवलस्य शकारस्य हृदयहरणमिति बोध्यते ॥ २८ ॥
**विमर्श—**यहाँ वसन्तसेना की उपमा शृगाली से और अपने लोगों की उपमा कुत्तों से देना शकार के अनुरूप है। शीघ्रम्, त्वरितम्, सवेगम्, यह पुनरुक्ति भी उसी की है। यहाँ 'अस्माभिः' यह बहुवचन विट चेट तथा शकार इन तीनों के लिये प्रयुक्त करता है परन्तु 'मम हृदयम्' यहाँ वह केवल अपने हृदय-हरण को सूचित करने के लिए एकवचन का प्रयोग करता है। इसमें उपमा अलंकार और उपजाति छन्द है। इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा दोनों के लक्षण मिला दिये जाते हैं तो उपजाति नामक छन्द माना जाता है ॥ २८ ॥
**अर्थ—वसन्तसेना —**पल्लवक ! पल्लवक ! परभृतिके ! परभृतिके !
शकार—- ( भय के साथ ) भाव भाव ! पुरुष, पुरुष ।
विट— मत डरो, मत डरो ।
**वसन्तसेना—**माधविके ! माधविके !
विट—-( हँसते हुये ) मूर्ख ! नौकर खोजा जा रहा है ।
शकार—-भाव ! भाव ! क्या स्त्री को खोज रही है ?
७२ मृच्छकटिकम्
विटः--अथ किम् ।
शकारः--इत्थिआणं शदं मालेमि । शूले हगे ? ( स्त्रीणां शतं मारयामि, शूरोऽहम् । )
वसन्त०--[ शून्यमवलोक्य । ] हद्धी ? हद्धी ? कथं परिअणो वि परि-ब्भट्ठो । एत्थ मए अप्पा सअं ज्जेव रक्खिदव्वो । ( हा धिक्, हा धिक् । कथं परिजनोऽपि परिभ्रष्टः । अत्र मया आत्मा स्वयमेव रक्षितव्यः )
विटः--अन्विष्यताम्, अन्विष्यताम् ।
शकारः--वशन्तशेणिए ? विलव विलव परहुदिअं वा पल्लवअं वा शव्वं वा वशन्तमाशं । मए अहिशालिअन्तीं तुमं के पलित्ताइश्शदि ? । [ वसन्तसेनिके ! विलप विलप परभृतिकां वा, पल्लवकं वा, सर्वं वा वसन्तमासम् । मया अभिसार्यमाणां त्वां कः परित्रास्यते ? ]
किं भीमशेणे जमदग्गिपुत्ते कुन्तीशूदे वा दशकन्धले वा ।
एशे हगे गेण्हिअ केशहत्थे दुश्शाशणश्शाणुकिकिंद कलेमि ॥ २६ ॥
( किं भीमसेनो जमदग्निपुत्रः कुन्तीसुतो वा दशकन्धरो वा ।
एषोऽहं गृहीत्वा केशहस्ते दुःशासनस्यानुकृतिं करोमि ॥ २६ ॥ )
विट--और क्या ।
शकार--स्त्रियाँ तो सैकड़ों मार सकता हूँ, मैं शूर हूँ ।
वसन्तसेना--( सूनसान देख कर ), ओह ! दुर्भाग्य है, ? दुर्भाग्य है ? क्या सेवक भी छूट गये ( खो गये ) यहाँ मुझे अपनी रक्षा स्वयं ही करनी है ।
विट--खोजिये, खोजिये !
शकार--वसन्तसेना ! बुलाओ, बुलाओ, परभृतिका को, पल्लवक को, अथवा सम्पूर्ण वसन्तमास को । मेरे द्वारा पीछा की जाती हुई तुम्हें कौन बचाता है ?
अन्वयः--किम्, भीमसेनः, जमदग्निपुत्रः, वा, कुन्तीसुतः, वा, दशकन्धरः, वा, ( त्वाम् रक्षिष्यति ), केशहस्ते, त्वाम्, गृहीत्वा, एषः, अहम्, दुःशासनस्य, अनु-कृतिम्, करोमि ॥ २६ ॥
शब्दार्थ--किम्=क्या, भीमसेनः=भीमसेन, ( तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? इसी प्रकार सब में जोड़ना चाहिये ) या जमदग्निपुत्रः=परशुराम, अथवा कुन्ती-पुत्रः=अर्जुन, अथवा दशकन्धरः=रावण ( तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? ) केश-हस्ते=केशपुञ्ज में, त्वाम्=तुम्हें, गृहीत्वा=पकड़कर अर्थात् तुम्हारे केशसमुदाय को पकड़ कर, एषः=यह, अहम्=मैं, दुःशासनस्य=दुर्योधन के छोटे भाई दुःशासन का, अनुकृतिम्=अनुकरण, नकल, करोमि=कर रहा हूँ ॥ २६ ॥
प्रथमोऽङ्कः ७३
णं पेक्ख, णं पेक्ख । [ ननु प्रेक्षस्व, ननु प्रेक्षस्व । ]
अशी शुतिक्खे, बलिदे अ मत्थके, कप्पेम शीशं उद मालएम वा ।
अलं तवेदेण पलाइदेण मुमुक्खु जे होदि, ण शे क्खु जीअदि ॥ ३० ॥
( असिः सुतीक्ष्णो बलितश्च मस्तकं कल्पये शीर्षम्, उत मारयामो वा ।
अलं तवैतेन पलायितेन मुमूर्षुर्यो भवति, न स खलु जीवति ॥ ३० ॥ )
**अर्थ—**क्या जमदग्निपुत्र परशुराम, अथवा, भीमसेन अथवा, कुन्तीपुत्र अर्जुनादि अथवा रावण तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? केशपाश में तुम्हें पकड़ कर यह मैं दुःशासन का अनुकरण करता हूँ । ( अथवा क्या जमदग्नि का पुत्र भीमसेन अथवा कुन्ती का पुत्र रावण तुम्हारी रक्षा कर सकता है ? यह मैं तुम्हारे बालों को पकड़ कर दुःशासन का अनुकरण कर रहा हूँ । ) ॥ २६ ॥
**टीका—**किम्=इदं प्रश्ने, जमदग्निपुत्रः=जमदग्निनामकमहर्षेः सुतः=परशुरामः, अथवा भीमसेनः, कुन्तीसुतः=कुन्तीपुत्रः कर्णः अर्जुनो वा, दशकन्धरः=दशाननो वा, त्वां मत्तः रक्षितुं शक्नोति ? अत्र पृथ्वीधरः चतुर्णां पार्थक्येन वर्णनं करोति । परन्तु शकारवचनतया अत्र विशेष्यविशेषणभावं स्वीकृत्य ( १ ) जमदग्निपुत्रः भीमसेनः ( २ ) कुन्तीसुतः दशकन्धरः इत्येवोचितं प्रतिभाति । ईदृश-व्याख्यानेनैव दर्शकानां मनोरञ्जनमिति बोध्यम् । केशहस्ते=केशकलापे, त्वाम्=वसन्तसेनाम्, गृहीत्वा=आकृष्य, एषः=तादृशो विद्यमानः अहम्=शकारः, दुःशासनस्य=दुर्योधनानुजस्य, अनुकृतिम्=अनुकरणम्, करोमि=विदधामि । दुःशासनेन यथा द्रौपद्याः केशादीनामपहरणं विहितम् तथैवाद्याहमपि तव करोमीति भावः । अत्र चतुर्णां पार्थक्येन व्याख्याने न काप्यसङ्गतिः । विशेष्यविशेषणभावे तु—भीमसेनो न जमदग्निपुत्रोऽपितु पाण्डोः, दशकन्धरो न कुन्त्याः सुतोऽपितु अन्यस्येत्यसङ्गतिः, सा च शकारवचनतया परिहरणीया । उपमाऽलङ्कारः । इन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥ २६ ॥
**विमर्श—**इस श्लोक में चार स्वतन्त्र व्यक्तियों का वर्णन है अथवा केवल दो का ? इसके उत्तर में पृथ्वीधर ने चार का माना है। परन्तु भीमसेनः, कुन्तीपुत्रः इनमें असंगति विचारणीय है। शकार की भाषणशैली के अनुसार यहाँ ( १ ) जमदग्निपुत्रः भीमसेनः, ( २ ) कुन्तीसुतः दशकन्धरः—यही अधिक संगत प्रतीत होता है । इसी से शकार की अज्ञानता सूचित होती है क्योकि भीम जमदग्नि के नहीं पाण्डु के पुत्र थे और रावण कुन्ती का पुत्र नहीं था । इसमें एक 'वा' शब्द का आधिक्य है। यहाँ उपमा अलंकार और इन्द्रवज्रा छन्द है ॥ २६ ॥
अन्वयः—( मम ), असिः, सुतीक्ष्णः, ( अस्ति ), तव, मस्तकम्, च वलितम्, ( अस्ति ), ( तव ), शीर्षम्, कल्पये, उत, वा, मारयामि, तव, एतेन, पलायितेन, अलम्, यः, मुमूर्षुः, भवति, सः, खलु, न, जीवति ॥ २६ ॥
शब्दार्थः—( मम=मेरी=शकार की ), असिः=तलवार, सुतीक्ष्णः=बहुत तेज
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बसन्त०-अज्ज ! अबला क्खु अहं । ( आर्य ? अबला खलु अहम् ) ।
विटः-अत एव ध्रियसे ।
शकारः-अदो ज्जेव ण मालीअशि । ( अत एव न मार्यसे । )
धारवाली है, च=और, तव=तुम्हारा, मस्तकम्=मस्तक, वलितम्=झुका हुआ अथवा सुन्दर, (अस्ति=है), (तव=तुम्हारे), शीर्षम्=शिर को, कल्पये=काट डालूँगा, उत वा=अथवा, मारयामि=मार डालूँगा, तव=तुम्हारे, एतेन=इस, पलायितेन=भागने से, अलम्=कोई लाभ नहीं, व्यर्थ है, यः=जो, मुमूर्षुः=मरने वाला, भवति=होता है, सः=वह, न=नहीं, जीवति=जीवित रहता है ॥ २९ ॥
अर्थ-देखो, देखो,
(मेरी) तलवार बहुत तेजधार वाली है, तुम्हारा शिर भी (मेरी ओर) झुका हुआ है, अथवा सुन्दर है; मैं तुम्हारा शिर काट डालूँगा अथवा मार डालूँगा। तुम्हारे इस प्रकार भागने से कोई लाभ नहीं है, व्यर्थ है, जो मरने वाला होता है, वह निश्चित रूप से जीवित नहीं रहता है ॥२६॥
टीका-(मम = शकारस्य), असिः = खड्गः, सुतीक्ष्णः =अतीव निशितः, अस्ति, (तव) मस्तकम् = शिरः, च=तथा, वलितम् = ममाभिमुखमवनतम्, सुन्दरं वा, अस्ति, शीर्षम्=वसन्तसेनायाः शिरः, कल्पये=छिनद्मि, उत वा=अथवा, मारयामि-हन्मि, तव=वसन्तसेनायाः, पलायितेन=धावनेन, अलम्=किमपि साध्यं नास्ति, व्यर्थमिति भावः, 'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति नियमात् तृतीयेति बोध्यम्। कथं व्यर्थमत आह-मुमूर्षुः=आसन्नमरणः, यः=जनो, भवति=वर्तते, सः=जनः, न=नैव, खलु=निश्चयेन, जीवति=प्राणधारणं करोति। अत्र काव्यलिङ्गमलङ्कारः। वंशस्थेन्द्रवज्रयोः सम्मेलनादुपजाति वृत्तम् ॥ २९ ॥
विमर्श-वलितम् इसकी व्याख्या में 'सुन्दरम्, लालितम्, ऐसा लिखा गया गया है। परन्तु प्रसङ्गानुसार इसका अर्थ-अवनतम् झुका हुआ होना-अधिक तर्कसंगत है। वल संचरणे-से 'क्त' प्रत्यय का रूप है। क्योंकि झुके शिर को काटना सरल होता है। और भागते समय सिर आगे की ओर झुक जाता है। शिर काटना और मार डालना-समानार्थक हैं। किन्तु शकार के वचन होने से इसे दोष नहीं मानना चाहिये। कप्पेम इस-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर- 'कल्पये' और 'कृन्तामः दो प्राप्त होते हैं। दोनों का भाव समान है। मुमूर्षुः-मरने वाला, √ मृङ् (प्राणत्यागे) + सन् मुमूर्ष + उ। इसमें काव्यलिङ्ग अथवा अर्थान्तरन्यास अलंकार है। प्रथम और चतुर्थ चरण में वंशस्थ तथा द्वितीय और तृतीय में इन्द्रवज्रा है। दोनों को मिलाने पर उपजाति छन्द हो गया है ॥ २६ ॥
अर्थ वसन्तसेना-आर्य ! मैं तो अबला (बलहीन स्त्री) हूँ !
विट-इसी लिये (अभी तक) जीवित हो।
शकार-इसी लिये तुम्हारा वध नहीं किया जा रहा है।
प्रथमोऽङ्कः ७५
वसन्त० (स्वगतम्।) कधं अणूणओ वि शे भअं उप्पादेदि। भोदु, एव्वं दाव। (प्रकाशम्।) अज्ज ! इमादो किं पि अलङ्करणं तक्कीअदि ? (कथमनुनयोऽप्यस्य भयमुत्पादयति। भवतु एवं तावत्। आर्य ! अस्मात् किमप्यलङ्करणं तर्क्यते ?।)
विटः—शान्तम् पापम्, शान्तं पापम्। भवति वसन्तसेने ! न पुष्पमोषमर्हति उद्यानलता। तत् कृतमलङ्करणैः।
वसन्त०—ता किं क्खु दाणिं ? (तत् किं खलु इदानीम् ?।)
शकारः—हगे देवपुलिशे मणुश्शे वासुदेवके कामइदव्वे। (अहं देवपुरुषो मनुष्यो वासुदेवः कामयितव्यः।)
वसन्त०—(सक्रोधम्) शन्तं शन्तं। अवेहि, अणज्जं मन्तेशि (शान्तं शान्तम्। अपेहि, अनार्यं मंत्रयसि !)
शकारः—(सहस्ततालं विहस्य।) भावे ! भावे ! पेक्ख दाव। अन्तलेण शुशिणिद्धा एशा गणिआदालिआ णं। जेण मं भणादि, एहि शन्तेशि किलिन्तेशि त्ति। हगे ण गामन्तरं ण णगलन्तरं वा गड़े। अज्जुके ! शवामि भावश्श शीशं अत्तणकेहि पादेहि। तव ज्जेव्व पश्चाणुपुश्विक्याए आहडन्तं शन्ते किलिंते ह्नि संवृत्ते। (भाव ! भाव ! प्रेक्षस्व तावत्। अन्तरेण सुस्निग्धा एषा गणिकादारिका ननु। येन मां भणति—एहि, श्रान्तोऽसि, क्लान्तोऽसीति। अहं न ग्रामान्तरं न नगरान्तरं वा गतः। आर्यके ! शपे भावस्य शीर्षम्, आत्मीयाभ्याम् पादाभ्याम्। तवैव पृष्ठानुपृष्ठिकया आहिण्डमानः, श्रान्तः क्लान्तोऽस्मि संवृत्तः।)
वसन्तसेना—(स्वगत) क्यों, इसकी विनय भी भय उत्पन्न करा रही है। अच्छा, मैं ऐसा (करती हूँ)। (प्रकाश) आर्य ? आप मुझसे कोई गहना लेना चाहते हैं ?
**विट—**पाप शान्त हो, पाप शान्त हो। आदरणीय वसन्तसेने ! उद्यान की लता पुष्प तोड़ने योग्य नहीं होती है। (अर्थात् उसके फूल नहीं तोड़े जाते हैं।) अतः गहनों को रहने दो। (इन्हें नहीं लेना है।)
**वसन्तसेना—**तो, इस समय (आपका) क्या प्रयोजन ?
**शकार—**मुझ देवपुरुष, मनुष्य, वासुदेव की कामना करो।
वसन्तसेना—(क्रोध के साथ) शान्त, शान्त अर्थात् चुप रहो, चुप रहो। दूर हट जाओ। तुम अनार्य=अशिष्ट=अनुचित बात कर रहे हो।
शकार—(ताली बजाते हुये हँस कर) भाव ! भाव ! जरा देखो तो। यह वेश्यापुत्री हृदय से (मुझपर) निश्चित ही प्रसन्न है। इसी लिये मुझसे कह रही है—'आओ थक गये हो, खिन्न हो गये हो।' मैं न किसी दूसरे गाँव गया न किसी दूसरे शहर। आर्ये ! मैं अपने पैरों से भाव=विट के शिर की शपथ खाता हूँ। तुम्हारे ही पीछे पीछे घूमता हुआ थका और खिन्न हो गया हूँ।