मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
तृतीयोऽङ्कः १६७
वृक्षवाटिकापरिसरे सन्धिं कृत्वा प्रविष्टोऽस्मि मध्यमकम। तद्याव- दिदानीं चतुःशालकमपि दूषयामि। भोः !
कामं नीचमिदं वदन्तु पुरुषाः स्वप्ने च यद्वर्द्धते, विश्वस्तेषु च वञ्चनापरिभवश्चौर्यं न शौर्यं हि तत् । स्वाधीना वचनीयतापि हि वरं बद्धो न सेवाञ्जलिः, मार्गो ह्येष नरेन्द्रसौप्तिकवधे पूर्वं कृतो द्रौणिना ॥ ११ ॥
से 'वीर' शब्द का पूर्वनिपात होने से 'वीरैक' ऐसा ही होना चाहिये ? इसका समा- धान यह है कि 'विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' ( पा सू. २।१।५७ ) के बहुलग्रहण से 'एक' शब्द का भी पूर्वनिपात हो सकता है । अतः यह रूप भी कथञ्चित् शुद्ध ही समझना चाहिये । तत्त्वबोधिनी में--एकेषु = मुख्येषु वीरयते = पराक्रमते-यह व्युत्पत्ति दी है । जिस प्रकार दुष्ट भी सन्तान की रक्षा माता करती है उसी प्रकार रात्रि भी अन्धेरे के द्वारा चोर की रक्षा करती है । अतः उपमा अलंकार है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ १० ॥
अर्थ--फुलवारी की चहारदीवार में सेंध फोड़ कर मध्यमक = बीच के महल में घुस आया हूँ । अब चतुःशालक = चौसाल में भी सेंध फोड़ता हूँ ।
अन्वयः--स्वप्ने, विश्वस्तेषु, च, वञ्चनापरिभवः, चौर्यम, च, यत् वर्द्धते, इदम्, पुरुषाः, कामम्, नीचम्, वदन्तु, हि, तत्, शौर्यम्, न, ( अस्ति ), स्वाधीना, वचनीयता, अपि, हि, वरम्, बद्धः, सेवाञ्जलिः, न, ( वरम् ), हि, एषः, मार्गः, पूर्वम्, द्रौणिना, नरेन्द्रसौप्तिकवधे, कृतः ॥ ११ ॥
शब्दार्थ--स्वप्ने = सोने पर, नींद के समय में, च = और, विश्वस्तेषु = विश्वास किये हुये लोगों में, वञ्चनापरिभवः = ठगाई के द्वारा अपमान, और चौर्यम् = चोरी, यत् वर्द्धते = जो अधिक होती है, इदम् = इसको, पुरुषाः = सज्जन लोग, कामम् = अपनी इच्छानुसार, नीचम् = निकृष्ट, वदन्तु = कहें, हि = क्योंकि, तत् = वह चोरी करना, शौर्यम् = बहादुरी का कार्य, न = नहीं है (क्योंकि शूर तो सामने आक्रमण करते हैं ।) तथापि, स्वाधीना = अपने अधीन, वचनीयता = चोरी आदि की निन्दा, अपि = भी, वरम् = अच्छी है, परन्तु,, बद्धः = बांधी गई, जोड़ी गई, सेवाञ्जलिः = धनिकों की सेवा के लिये अञ्जलिपुट, न = नहीं, वरम् = ठीक है । हि = क्योंकि, एषः = यह मेरे द्वारा किया जाने वाला, मार्गः = चोरी करना रूपी मार्ग, तो, पूर्वम् = बहुत पहले ही, द्रौणिना = द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने, नरेन्द्रसौप्तिकवधे = राजा ( युधिष्ठिर ) के सोये हुये सैनिकों या पुत्रों के वध के लिये, कृतः = अवलम्बित किया था । ( अतः ब्राह्मण होकर मेरा यह कार्य निन्दित नहीं है ) ॥ ११ ॥
| १६८ | मृच्छकटिकम् |
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अर्थ—अरे—
सोये हुये और विश्वस्त लोगों में ठगना रूपी अपमान और चोरी जो बढती है=अधिक होती है, इसे सज्जन लोग, भले ही, चाहे जितना नीच कर्म कहें, क्योंकि यह चोरी करना शूर का कार्य नहीं है तथापि अपने अधीन रहने वाली यह चोरी करने की निन्दा भी अच्छी है किन्तु (धनिकों के सामने) नौकरी के लिये हाथ जोड़ना अच्छा नहीं है। मैं जो कर रहा हूँ यह रास्ता पहले द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने राजा युधिष्ठिर के सोते हुये सैनिकों या सन्तानों के वध के लिये बनाया था। (अतः मुझ ब्राह्मण के लिये भी चोरी निन्दित नहीं मानी जानी चाहिये) ॥११॥
**टीका—**चौर्यस्य दुष्टत्वे सर्वेषामैकमत्येपि आत्मनस्तदाचरणे युक्तिमुद्भावयन्नाह—काममिति। स्वप्ने=निद्रावस्थायाम्, न तु जागरणावस्थायामिति भावः, विश्वस्तेषु = विश्रब्धेषु, च, वञ्चनापरिभवः = प्रतारणाद्वारा अवमानना, चौर्यम्=चौरकार्यम्, च, यद् वर्धते=प्रसरति, इदम्=वञ्चनं चौर्यञ्च, पुरुषाः=साधवः, कामम्=यथेष्टम्, नीचम् = निकृष्टम्, वदन्तु = कथयन्तु, अत्र मे कापि विप्रतिपत्तिर्नास्ति । हि=यतः, तत्=वञ्चनं चौर्यञ्च, शौर्यम्=शूरकर्म, शूरभावो वा, न, भवतीति भावः; शूराः हि साक्षात् स्वबलेन परधनादिकं हरन्ति, अत्र तु न तथेति बोध्यम्; परन्तु मम तु तथा मतं नास्तीत्यत आह—स्वाधीना = स्ववशा, वचनीयता = चौर्यादिपरीवादोऽपि, हि=निश्चयेन, वरम्=मनाक्प्रियम्, किन्तु, बद्धः=रचितः, सेवाञ्जलिः=धनिकजनसेवार्थं करपुटयोजनं न वरमिति शेषः, हि=यतः, एषः=मयाऽनुसृतः, मार्गः=चौर्यरूपः पन्थाः, पूर्वम्=पुरा, प्रथमं वा, द्रौणिना=द्रोणपुत्रेण अश्वत्थाम्ना, नरेन्द्रसौप्तिकानाम्=निद्रितसैन्यानाम्, वधे=वधार्थे, इयम् निमित्तसप्तमी, कृतः=अवलम्बितः अतः ब्राह्मणो भूत्वा न अहमेव प्रथमं करोमीति भावः। पुरा किल पितृवधामर्षोद्दीपितः द्रौणिः कुरुक्षेत्रसंग्रामावसानरजन्यां पाण्डवशिविरे त्रिपुरारि रक्षणं विधाय हतावशिष्टान् सुप्तसुप्तान् पाण्डवयोधान् कौशलेन शूलिनं परितोष्य तदनुमतिमनुप्राप्य शिविरं च प्रविश्य निजघान-इति भारतीयसौप्तिकपर्वकथाऽत्रानुसन्धेया। अत्र चौर्ये प्रस्तुते अप्रस्तुतस्य वञ्चनापरिभवस्यापि एकवाक्यान्तर्गतया समावेशात् दीपकोऽलङ्कारः, कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासश्चेत्युभयोः संसृष्टिः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥११॥
**विमर्श—**यहाँ अन्वय पर ध्यान देना चाहिये क्योंकि श्लोक में दो चकार प्रयुक्त हैं इन्हें इस प्रकार जोड़ना चाहिये—(१) स्वप्ने विश्वस्तेषु च (२) वञ्चनापरिभवः चौर्यं च--इन दोनों का ही 'वर्द्धते' के साथ सम्बन्ध है। नरेन्द्रसौप्तिकवधे--यहाँ महाभारत की कथा देखनी चाहिये। जब कौरवों की हार
तृतीयोऽङ्कः १६६
तत् कस्मिन्नुद्देशे सन्धिमुत्पादयामि ? ।
देशः को नु जलावसेकशिथिलो यस्मिन्न शब्दो भवेत् भित्तीनाञ्च न दर्शनान्तरगतः सन्धिः करालो भवेत् । क्षारक्षीणतया च लोष्टककृशं जीर्णं क्व हर्म्यं भवेत् कस्मिन् स्त्रीजनदर्शनञ्च न भवेत् स्यादर्थसिद्धिश्च मे ॥ १२ ॥
होती जा रही थी। द्रोणाचार्य का वध हो चुका था तो एक रात अश्वत्थामा पाण्डवों के शिविर में घुस आये और वहाँ सोये युधिष्ठिर के पुत्रों और सैनिकों को मार डाला। शर्विलक का आशय यह है कि जब अश्वत्थामा जैसे ब्राह्मण ने चोरी से वध जैसा दुष्कर्म कर दिया तो मुझ ब्राह्मण का भी चोरी करना गर्हित नहीं है। दूसरों की सेवा करने की अपेक्षा चोरी करना ठीक है। यहाँ चौर्य प्रस्तुत है वञ्चनापरिभव अप्रस्तुत है, दोनों का एक वाक्य में समावेश होने से अप्रस्तुत-प्रशंसा अलंकार है। और कारण से कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है। दोनों की संसृष्टि है। शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ ११ ॥
अन्वयः--कः, नु, देशः, जलावसेकशिथिलः, ( भवेत् ), यस्मिन्, शब्दः, न, भवेत्, यस्मिन्, च, भित्तीनाम्, करालः, सन्धिः, दर्शनान्तरगतः, न, भवेत्, क्व, च, हर्म्यम्, क्षारक्षीणतया, लोष्टककृशम्, जीर्णम् च, भवेत्, कस्मिन्, च, स्त्रीदर्शनम्, न, भवेत्, मे, अर्थसिद्धिः, च, स्यात् ॥ १२ ॥
शब्दार्थ--कः नु=कौन सा, देशः=स्थान, जलावसेकशिथिलः=निरन्तर पानी गिरते रहने से कमजोर, भवेत्=हो गया होगा, यस्मिन्=जिस स्थान पर, शब्दः=आवाज, न=नहीं, भवेत्=न हो, यस्मिन् च=और जहाँ पर, भित्तीनाम्=दीवालों की, करालः=बड़ी, सन्धिः=सेंध, दर्शनान्तरगतः=दिखाई देने योग्य, न=नहीं, भवेत्=हो, क्व च=और कहाँ पर, हर्म्यम्=महल ( की दीवाल ), क्षारक्षीणतया=लोनख लग जाने से कमजोर होने के कारण, लोष्टककृशम्=कमजोर ईंटों वाला, जीर्णम्=गला हुआ, भवेत्=हो, कस्मिन् च=और कहाँ पर, स्त्रीदर्शनम्=स्त्री का दर्शन, न=नहीं, भवेत्=हो, मे=मेरी, अर्थसिद्धिः=प्रयोजन की सिद्धि, स्यात्=हो जाय ॥ १२ ॥
अर्थ--तो किस स्थान पर सेंध लगाऊँ ?
कौन सा स्थान निरन्तर पानी गिरते रहने के कारण कमजोर हो गया होगा जहाँ ( सेंध लगाते समय ) आवाज नहीं होगी, जहाँ दीवालों की बड़ी सेंध किसी को दिखाई नहीं देगी। और कहाँ पर महल ( की दीवाल ) लोनख लग जाने से कमजोर ईंटों वाला और जीर्ण हो गया होगा। और कहाँ पर स्त्री नहीं दिखाई देगी तथा मेरे मनोरथ की सिद्धि हो जायगी ॥ १२ ॥
| २०० | मृच्छकटिकम् |
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( भित्तिं परामृश्य ) नित्यादित्य-दर्शनोदकसेचनेन दूषितेयं भूमिः क्षार-क्षीणा; मूषिकोत्करश्चेह । हन्त ! सिद्धोऽयमर्थः । प्रथममेतत् स्कन्दपुत्राणां सिद्धिलक्षणम् । अत्र कर्मप्रारम्भे कीदृशमिदानीं सन्धिमुत्पादयामि । इह खलु भगवता कनकशक्तिना चतुर्विधः सन्ध्युपायो दर्शितः । तद्यथा-- पक्वेष्टकानामाकर्षणम्, आमेष्टकानां छेदनम्, पिण्डमयानां सेचनम्, काष्ठमयानां पाटनमिति । तदत्र पक्वेष्टके इष्टिकाकर्षणम् । तत्र--
**टीका--**सन्धिच्छेदनयोग्यं स्थानं कुत्र विद्यत इति विचारयन्नाह देश इति । कः नु देशः=किं हि स्थानम्, जलावसेकशथिलः=अनवरतजलपपतनेनार्द्रप्रायः, सुच्छेद्य इत्यर्थः, भवेत्=स्यात्, यस्मिन्=यस्मिन् स्थाने सन्धिच्छेदने कृते सति, शब्दः=जागरणकारको ध्वनिः, न भवेत्=न जायेत, यस्मिन् च, भित्तीनाम्=कुड्यानाम्, करालः=विशालः, प्रवेशयोग्यः, सन्धिः=सुरङ्गा, दर्शनान्तरगतः=दृष्टिगोचरः, रक्षिणाम् अन्येषां चेति शेषः, न, भवेत्=न स्यात् क्व च=कस्मिंश्च देशे, हर्म्यम्=अट्टालिका, भवनं वा क्षारक्षीणतया=ऊषत्वात् क्षयप्राप्ततया, जीर्णम्=जरायत्तम्, लोष्टककृशम्=कृशानि=दुर्बलानि लोष्टकानि यत्र तादृशम् "वाऽऽहिताग्न्यादिषु' इति सूत्रेण कृशशब्दपरनिपातः, भवेत्=स्यात्, कस्मिन् च=कुत्र च, स्त्रीदर्शनम्=रमणीजनसाक्षात्कारः, न भवेत्, मे=शर्विलकस्य, अर्थसिद्धिश्च=मनोरथसफलता च, भवेत्--जायेत् । अत्र शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ १२ ॥
**विमर्श—**इस श्लोक में सेंध लगाने के सर्वाधिक उपयोगी स्थान का उल्लेख है । स्त्रीदर्शनम् चौरशास्त्र के अनुसार स्त्री का प्रथम दर्शन विघ्नकारक होता है । वास्तव में स्त्रियों की निद्रा गम्भीर नहीं होती है क्योंकि उनके साथ बच्चे वगैरह सोते हैं अतः उनका अचानक जागना सम्भव है । यहाँ शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥१२॥
अर्थ--( दीवान को हाथ से छूकर ) प्रतिदिन सूरज की धूप लगने और पानी गिरने के कारण दोषयुक्त यह जमीन लोनख लगने से कमजोर है, और यहाँ चूहों द्वारा खोदी हुई मिट्टी का ढेर है । वाह ! काम बन गया । कात्तिकेय के पुत्रों ( चोरों ) की सिद्धि का यह पहला लक्षण ( अनायास सेंध फोड़ने का उपाय मिलना ) है । यहाँ कार्य प्रारम्भ करने पर किस प्रकार की सेंध लगाऊँ ? वास्तव में भगवान् कनक शक्ति ने सेंध फोड़ने के चार प्रकार के उपाय बताये हैं । वे इस प्रकार हैं— ( १ ) पकी हुई ईंटों ( के मकान से ईंटों ) को बाहर निकाल लेना, ( २ ) कच्ची ईंटों ( के मकान की ईंटों ) का काटना, ( ३ ) मिट्टी के लोंदों ( पिण्डों से बनी हुई दीवालों ) का सींचना ( पानी द्वारा गला देना ), ( ४ ) लकड़ी से बनी हुई दीवाल को उखाड़ देना । तो यहाँ पकी हुई ईंटों के मकान में ईंटों का बाहर निकालना ( उचित उपाय है ) । उसमें--
तृतीयोऽङ्कः २०१
पद्मव्याकोशं भास्करं बालचन्द्रं
वापी, विस्तीर्णं स्वस्तिकं पूर्णकुम्भम्।
तत् कस्मिन् देशे दर्शयाम्यात्मशिल्पं
दृष्ट्वा श्वो यं यद्विस्मयं यान्ति पौराः ॥ १३ ॥
टीका— परामृश्य = हस्तेन स्पृष्ट्वेत्यर्थः, नित्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन = सततातपजलसम्पर्केण भूमिः शीर्णा भवतीति भावः, मूषिकोत्करः = मूषिकाणाम्, उत्करः = उद्धृतरजःसमुदायः, हन्त = हर्षसूचनेऽव्ययम्, स्कन्दपुत्राणाम् = स्वामिकार्तिकेयनयानां चौराणामित्यर्थः, सिद्धेः = कार्यसाफल्यस्य, लक्षणम् = चिह्नम्, सूचकमिति भावः, कर्मणः = चौर्यकार्यस्य, प्रारम्भे = आरम्भावस्थासरे, कनकशक्तिना = एतन्नाम्ना प्रसिद्धेन चौर्यशास्त्रप्रवर्तकेन, पक्वानाम् = अग्न्यादिना पाकतामुपगतानाम्, आमानाम् = अपक्वानाम्, पाटनम् = उत्पाटनम्, पक्वेष्टके = पक्वेष्टकामये भवने।
विमर्श— नित्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन—इसकी व्याख्या में मतभेद है। (१) प्रतिदिन सूर्यदर्शन के समय अर्पित किये गये जल के सींचने से, (२) रोज सबेरे सूर्य दिखलाई पड़ने पर दिये गये जल से। (३) प्रतिदिन सूर्य की धूप लगने और पानी गिरने से। इन अर्थों में तीसरा अर्थ अधिक तर्कसंगत है क्योंकि जहाँ रोज पानी गिरता है और धूप लगती रहती है वहाँ लोनख (क्षार) होना देखा जाता है। साथ ही सूर्य की पूजा आदि के लिये जल दिया जाना चोर को कैसे ज्ञात हो सकता है। अतः—धूप लगना और पानी गिरना—यही अर्थ उचित है। कनकशक्ति—चौर्यशास्त्र के प्रवर्तक आचार्य का नाम।
अन्वयः— पद्मव्याकोशम्, भास्करम्, बालचन्द्रम्, वापी, विस्तीर्णम्, स्वस्तिकम्, पूर्णकुम्भम्, (एषु सप्तविधेषु सत्सु) तत्, कस्मिन्, देशे, आत्मशिल्पम्, दर्शयामि, यत्, यम्, दृष्ट्वा, श्वः, पौराः, विस्मयम्, यान्ति ॥ १३ ॥
शब्दार्थः— (सन्धि के निम्न सात प्रकार हैं उनमें) पद्मव्याकोशम् = विकसित कमल के समान, भास्करम् = सूर्य-मण्डल के समान, बालचन्द्रम् = द्वितीयातिथि के बाल चन्द्रमा के समान, वापी = बावड़ी, विस्तीर्णम् = विस्तृत, स्वस्तिकम् = 卐 इस प्रकार के चिह्न के समान, पूर्णकुम्भम् = पूर्णघट के समान, (सात प्रकार की सेंध होती है) कस्मिन् देशे = किस स्थान पर, आत्मशिल्पम् = अपनी सेंध लगाने की कला को, दर्शयामि = प्रदर्शित करूँ ? यत् = जो कि, यम् = जिसे, दृष्ट्वा = देखकर, श्वः = कल, पौराः = नगरवासी, विस्मयम् = आश्चर्य को, यान्ति = प्राप्त करेंगे ॥ १३ ॥
अर्थ— (१) खिला हुआ कमल, (२) सूर्य, (३) बालचन्द्र (द्वितीया का चन्द्रमा), (४) बावड़ी (५) तिरछी या विशाल, (६) स्वस्तिक 卐 चिह्न, (७) पूर्णकुम्भ—अर्थात् इनके समान सात प्रकार की सेंध होती है। किस स्थान पर अपनी कला का प्रदर्शन करूँ, जिससे सबेरे उसको देखकर पुरवासी आश्चर्य करने लग जायँ ॥ १३ ॥
२०२ मृच्छकटिकम्
तदत्र पक्वेष्टके पूर्णकुम्भ एव शोभते; तमुत्पादयामि ।
अन्यासु भित्तिषु मया निशि पाटितासु क्षारक्षतासु विषमासु च कल्पनासु । दृष्ट्वा प्रभातसमये प्रतिवेशिवर्गो दोषांश्च मे वदति कर्मणि कौशलञ्च ॥ १४॥
टीका--चौरशास्त्र-प्रतिपादित-सप्तविधसन्धीनामन्यतमं विधातुं तेषां स्वरूपं दर्शयन्नाह पद्मव्याकोशमिति । पद्मव्याकोशम्=पद्मवत् = कमलवत् व्याकोशम्=प्रफुल्लम्, विकसित-कमलतुल्यमष्टदलतुल्यमिति भावः, भास्करम्=सूर्यमण्डलाकृतिम्, बालचन्द्रम्=नवोदितद्वितीयाचन्द्रोपमम्, वापी=दीर्घिकासदृशम्, विस्तीर्णम्=तिर्यक् लम्बमानम्, स्वस्तिकम्=स्वस्तिनामकचिह्नतुल्यम्, पूर्णकुम्भम्=पूर्णघटसदृशम्--इति सप्तविधाः सन्धयः सन्ति, तत्=तस्मात्, कस्मिन् देशे=कस्मिन् स्थाने, आत्मशिल्पम्=स्वकलाचातुर्यम्, दर्शयामि = प्रदर्शयानि, यत्=यस्मात्, यम्=कला शिल्पम्, श्वः=आगामिनि दिने प्रातः, दृष्ट्वा=विलोक्य, पौराः=पुरवासिनः, विस्मयम्=आश्चर्यम्, यान्ति=यास्यन्तीति भावः । "वाणाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ" इति लक्षणाद् वैश्वदेवी वृत्तम् ॥ १३ ॥
विमर्श--वापी विस्तीर्णम् -- इन्हें दो नाम समझना चाहिये क्योंकि "इष्टिकाभित्तौ संस्कारवशेन पद्मव्याकोशादिसंज्ञाः सप्तसन्धयः' यह चौरदर्शन में कहा गया है। अतः सात संख्या पूरी करने के लिये वापी=वापी के समानाकार और विस्तीर्णम्=तिरछी लम्बी-ये दो अलग-२ समझने चाहिये-ऐसा व्याख्याकारों ने लिखा है। परन्तु पद्मव्याकोशम्, भास्करम्, आदि द्वितीयान्त पदों के साथ 'वापी' इस प्रथमान्त पद की संगति कैसे होगी--यह विचारणीय है। कुछ व्याख्याकारों ने 'इति सप्तसन्धयः' ऐसा लिखा है, वहाँ भी द्वितीयान्त पदों की अनुपपत्ति है। इसमें वैश्वदेवी छन्द है ॥ १३ ॥
अर्थ--तो यहाँ पकी ईंटों वाले मकान में पूर्णकुम्भ ही शोभित होता है। उसी प्रकार की सेन्ध लगाता हूँ।
अन्वयः--मया, निशि, अन्यासु, क्षारक्षतासु, भित्तिषु, विषमासु, कल्पनासु, पाटितासु, प्रभातसमये, प्रतिवेशिवर्गः, दृष्ट्वा, मे, दोषान्, कर्मणि, कौशलम्, च, वदति ॥ १४ ॥
शब्दार्थ--मया=मुझ शर्विलक के द्वारा, निशि=रात में, अन्यासु=दूसरी, क्षारक्षतासु=लोनख के प्रभाव से गली हुयी, भित्तिषु=दीवालों पर, विषमासु=कठिन, अद्भुत, कल्पनासु=कल्पनाओं के, पाटितासु=बनायी जाने पर, फोड़ी जाने पर, प्रभातसमये=सबेरे के समय, प्रतिवेशिवर्गः=पड़ोसी लोग, दृष्ट्वा=देखकर, मे=मुझ
तृतीयोऽङ्कः
२०३
नमो वरदाय कुमारकार्तिकेयाय, नमःकनकशक्तये ब्रह्मण्यदेवाय देवव्रताय, नमो भास्करनन्दिने, नमो योगाचार्याय, यस्याहं प्रथमः शिष्यः। तेन च परितुष्टेन योगरोचना मे दत्ता।
अनया हि समालब्धं न मां द्रक्ष्यन्ति रक्षिणः।
शस्त्रञ्च पतितं गात्रे रुजं नोत्पादयिष्यति ॥ १५ ॥
शर्विलक के, दोषान्=दोषों को, च=और, कर्मणि=सेन्ध लगाने के काम में, कौशलम्=कुशलता को, वदति=कहेंगे ॥ १४ ॥
अर्थ— मुझ शर्विलक के द्वारा रात में दूसरी लोनख लगी हुई दीवारों पर विचित्र कल्पनाओं के चित्र उभारने पर अर्थात् काटने पर सवेरे पड़ोसी लोग देख कर मेरे दोषों को और सेन्ध आदि कार्यों में चतुरता को कहेंगे ॥ १४ ॥
टीका— सन्धिनिर्माणे स्वनैपुण्यप्रख्यापनमुखेन भावि-लोकालोच्यमाह—अन्यासु इति। मया=शर्विलकेन, निशि=रात्रौ, अन्यासु=अपरासु, क्षारक्षतासु=लावणिक-प्रभावदूषितासु, भित्तिषु=कुड्येषु, विषमासु=असाधारणासु, विचित्रासु, कल्पनासु=उत्प्रेक्षासु, पाटितासु=विदारितासु, स्वकीयोद्भूतकल्पनाशक्तिबलेन विचित्ररूपेण विदारितासु सतीषु, प्रभातसमये = प्रातः काले, प्रतिवेशिवर्गः = प्रतिवेशिजनाः, दृष्ट्वा=विलोक्य, मे=मम शर्विलकस्य, दोषान्=दूषणानि, कर्मणि=चौरकर्मणि, सन्धिकर्मणि वा, कौशलम् = पाटवम्, च, वदति=कथयिष्यति, वर्तमानसामीप्ये लट्, तुल्ययोगितालङ्कारः, वसन्ततिलकं वृत्तम् ॥ १४ ॥
विमर्श— कल्पनासु पाटितासु—कल्पनाओं के अनुसार सेन्ध आदि के रूप में काट देने पर। यहाँ दोष एवं कौशल का कथन क्रिया में एकधर्माभिसम्बन्ध कहने के कारण तुल्ययोगिता अलंकार है। वसन्ततिलका छन्द है ॥ १४ ॥
अर्थ— वरदानी कुमार कार्तिकेय (शंकर के पुत्र) को नमस्कार है। कनक-शक्ति, ब्रह्मण्यदेव, देवव्रत को नमस्कार है भास्कर नन्दी को नमस्कार है, योगाचार्य को नमस्कार है जिनका मैं प्रथम शिष्य हूँ। प्रसन्न उन गुरुजी ने मुझे योगरोचना दी है।
विमर्श— कुमार कार्तिकेय=परमेष्ठी गुरु देवव्रत नामक परापर गुरु, भास्कर-नन्दी=सूर्य को आनन्द देनेवाले, इस नाम के परमगुरु, योगाचार्य—कुमार कार्तिकेय के प्रधान शिष्य और शर्विलक के साक्षात् गुरु। (१) योगरचना=उपायों का सम्भार (२) अथवा योगेन=युक्ति से रचना=रचितद्रव्यविशेष, (३) योगस्य=औषधस्य, रचना = कल्पना, (४) योगेन = मन्त्रेण रचना = लेपविशेषनिर्माण-कौशलम्। कहीं कहीं योगरचना भी पाठ है। रोचना=तिलक द्रव्यविशेष।
अन्वयः— हि, अनया, समालब्धम्, माम्, रक्षिणः, न, द्रक्ष्यन्ति, गात्रे, च, पतितम्, शस्त्रम्, रुजम्, न उत्पादयिष्यति ॥ १५ ॥
| २०४ | मृच्छकटिकम् |
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( तथा करोति ) धिक् कष्टम्, प्रमाणसूत्रं मे विस्मृतम् । ( विचिन्त्य ) 'आम्, इदं यज्ञोपवीतं प्रमाणसूत्रं भविष्यति । यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम्, विशेषतोऽस्मद्विधस्य । कुतः—
एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्ग- मेतेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान् ।
शब्दार्थ—हि = क्योंकि, अथवा निश्चय ही, अनया = इस योगरोचना से, समालब्धम्=लेप किये हुये, माम्=मुझे, रक्षिणः=सिपाही लोग, न=नहीं, द्रक्ष्यन्ति=देख पायेंगे, च=और, गात्रे=शरीर पर, पतितम्=गिरा हुआ, शस्त्रम्=शस्त्र, रुजम्=रोग, चोट, न=नहीं, उत्पादयिष्यति=पैदा कर पायेगा ।। १५ ।।
अर्थ—इस योग-रोचना का लेप किये हुये मुझको सिपाही नहीं देख पायेंगे और शरीर पर लगा हुआ शस्त्र घाव आदि नहीं पैदा कर सकेगा ।। १५ ।।
टीका—योगरोचनायाः माहात्म्यं वर्णयन्नाह—अनया=पूर्वोक्तया योगरोचनया, समालब्धम्=समालिप्तम्, माम्=शर्विलकम्, रक्षिणः=रक्षापुरुषाः, न=नैव, द्रक्ष्यन्ति=अवलोकयिष्यन्ति, गात्रे=शरीरे, च, पतितम्=क्षिप्तम्, लग्नम् वा, शस्त्रम्=आयुधम्, रुजम्=पीडाम्, आघातं वा, न=नैव, उत्पादयिष्यति=जनयिष्यति ।। १५ ।।
विमर्शः—समालब्धम्—सम्+आ+√लभ्+क्त । शस्त्रम्—√शस्+ष्ट्रन्=त्र । इसमें समुच्चय अलङ्कार और अनुष्टुप् छन्द है ।। १५ ।।
अर्थ—( लेप करता है । ) हाय कष्ट है, अपना नापने वाला सूत्र ( डोरी ) तो भूल गया । ( सोच कर ) हाँ, यह यज्ञोपवीत नापने वाला सूत्र बन जायगा क्योंकि ब्राह्मण के लिये यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) बड़े काम की चीज है, और विशेष रूप से हम जैसे ( चोर ) लोगों के लिये । क्योंकि -
अन्वयः—( अस्मद्विधः चौरः ) भित्तिषु, एतेन, कर्ममार्गम्, मापयति, एतेन, भूषणसम्प्रयोगान्, मोचयति, यन्त्रदृढे, कपाटे, ( एतेन ) उद्घाटनम्, भवति, कीटभुजगैः दष्टस्य, परिवेष्टनम्, च भवति ।। १६ ।।
शब्दार्थ—( अस्मद्विधः चौरः=हमारे जैसा चोर ) भित्तिषु=दीवालों पर, एतेन=इस जनेऊ से, कर्ममार्गम्=चोरी करने के रास्ता अर्थात् सेंध को, मापयति=नापता है, एतेन=इससे, भूषणसम्प्रयोगान् = गहनों के जोड़ों को, मोचयति=खोलता है, ढीला करता है, ( एतेन=इस जनेऊ से ) यन्त्रदृढे=सांकड़ आदि से बन्द किये गये, कपाटे = किवाड़ में, उद्घाटनम् = खोलना, भवति=होता है, कीटभुजगैः = कीड़ा एवं साँप द्वारा, दष्टस्य=डंसे हुये, काटे गये व्यक्ति का, परिवेष्टनम्=लपेटना, भवति=होता है ।। १६ ।।
अर्थ—( हमारे जैसा चोर ) इससे दीवारों पर सेंध को नापता है, कसे हुये
तृतीयोऽङ्कः २०१
उद्घाटको भवति यन्त्रदृढे कपाटे दष्टस्य कीटभुजगैः परिवेष्टनञ्च ॥ १६ ॥
मापयित्वा कर्म्म समारभे । ( तथा कृत्वा अवलोक्य च ) एकलोष्ठावशे- षोऽयं सन्धिः । धिक् कष्टम् । अहिना दष्टोऽस्मि । (यज्ञोपवीतेनाङ्गुलीं बद्ध्वा विषवेगं नाटयति । चिकित्सां कृत्वा ) स्वस्थोऽस्मि । ( पुनः कर्म्म कृत्वा दृष्ट्वा च ) अये ! ज्वलति प्रदीपः । तथाहि--
शिखा प्रदीपस्य सुवर्णपिञ्जरा महीतले सन्धिमुखेन निर्गता । विभाति पर्यन्ततमःसमावृता सुवर्णरेखेव कषे निवेशिता ॥ १७ ॥
गहनों के जोड़ों को इससे खोलता है, सांकड़ या किल्ली आदि से बन्द किये गये दरवाजे का खोलना इससे होता है और कीड़ा तथा साँप से काटे गये व्यक्ति का ( विषप्रवाह रोकने के लिये ) लपेटना होता है ।। १६ ।।
टीका--चौरब्राह्मणस्य यज्ञोपवीतादुपकारे वैशिष्ट्यं दर्शयति-एतेनेति । अस्मद्विधः चौरः, भित्तिषु=कुड्येषु, एतेन=यज्ञोपवीतसूत्रेण, कर्ममार्गम्=चौर्य- कार्यपथम्, सन्धिमिति यावत्, मापयति = दीर्घत्वविस्तारयोः परिमितं करोति, एतेन=यज्ञोपवीतसूत्रेणैव, भूषणसम्प्रयोगान्=अलङ्काराणां दृढबन्धनानि, मोचयति= निःसारणाय शिथिलीकरोति, यन्त्रदृढे=अर्गलादिना सम्यग् दृढीकृते तेन अङ्गुष्ठादि- प्रवेशायोग्ये, कपाटे=द्वारावरके काष्ठखण्डे, उद्घाटनम्=उन्मोचनम्, भवति, कीट- भुजगैः=वृश्चिकादिभिः कीटैः सर्पश्च, दष्टस्य=सञ्जातदशनस्य, पुरुषस्य, परि- वेष्टनम्=परितः बन्धनम्, च, भवति, अत्र समुच्चयः तुल्ययोगिता चालङ्कारौ । वसन्ततिलकं वृत्तम् ।। १६ ।।
विमर्श--यहाँ यज्ञोपवीत के उत्कर्ष के प्रति बहुत कारणों का निर्देश होने से समुच्चय अलंकार है । तथा 'भवति' इसमें उद्घाटन तथा परिवेष्टन के अन्वय से तुल्ययोगिता अलंकार भी हैं । वसन्ततिलका छन्द है ।। १६ ।।
अर्थ--नाप कर सेन्ध लगाना प्रारम्भ करता हूँ । ( सेंध लगाकर और देखकर ) अब इस सेंध का एक ही ईंटा निकालना बाकी बचा है । हाय कष्ट है ! साँप ने काट लिया । ( जनेऊ से अंगुली को बांध कर विष के वेग=बढ़ने का अभिनय करता है, चिकित्सा करके ) अब स्वस्थ=ठीक हो गया हूँ । ( फिर सेंध कार्य करके और देख कर ) अरे दीपक जल रहा । जैसा कि--
अन्वयः--सुवर्णपिञ्जरा, सन्धिमुखेन, महीतले, निर्गता, पर्यन्ततमःसमावृता, प्रदीपस्य, शिखा, कषे, निवेशिता, सुवर्णस्य, रेखा, इव विभाति ॥ १७ ॥
२०६
मृच्छकटिकम्
(पुनः कर्म कृत्वा) समाप्तोऽयं सन्धिः। भवतु; प्रविशामि। अथवा न तावत् प्रविशामि, प्रतिपुरुषं निवेशयामि। (तथा कृत्वा।) अये! न कश्चित्। नमः कार्त्तिकेयाय। (प्रविश्य दृष्ट्वा च) अरे! पुरुषद्वयं सुप्तम्। भवतु, आत्मरक्षार्थं द्वारमुद्घाटयामि। कथं जीर्णत्वाद् गृहस्य विरौति कपाटम्। तद् यावत् सलिलमन्वेषयामि। क्व नु खलु सलिलं भविष्यति? (इतस्ततो दृष्ट्वा सलिलं गृहीत्वा क्षिपन् सशङ्कम् ) मा तावत् भूमौ पतत्
शब्दार्थ—सुवर्णपिञ्जरा=सोने के समान पिङ्गल वर्ण वाली, सन्धिमुखेन=सेंध के रास्ते से, छिद्र से, महीतले=भूतल पर, निर्गता=निकली हुई, पर्यन्ततमस्समावृता=चारो ओर अन्धकार से घिरी हुई, प्रदीपस्य=दीपक की, शिखा=कान्ति, रोशनी, कषे=कसौटी पर, निवेशिता=खींची गई, कसी गई, सुवर्णस्य=सोने की, रेखा=लकीर के, इव=समान, विभाति=शोभित हो रही है ॥ १७ ॥
अर्थ—सोने के समान पिङ्गलवर्णवाली, सेंध के रास्ते से पृथ्वी पर निकलने वाली, चारो ओर अन्धकार से घिरी हुई, दीपक की कान्ति=रोशनी, कसौटी पर खींची गई सोने की रेखा के समान शोभित हो रही है ॥ १७ ॥
टीका—सन्धिमार्गविनिर्गतं दीपप्रभासौन्दर्यं वर्णयन्नाह—शिखेति। सुवर्णपिञ्जरा=स्वर्णवत् पिङ्गलवर्णा, सन्धिमुखेन=सन्धिविवरेण, महीतले=भूतले, बाह्यप्रदेशे इत्यर्थः, निर्गता=निःसृता, पर्यन्ततमःसमावृता=पर्यन्तेषु=प्रान्तप्रदेशेषु चतुष्पाश्र्वेषु, परिवेष्टिता, प्रदीपस्य=दीपकस्य, शिखा=कान्तिः, प्रकाश इति भावः, कषे=परीक्षणपाषाणे, निवेशिता=कषिता, अर्पिता, सुवर्णस्य=कनकस्य, रेखा=लेखा, इव=यथा, विभाति=शोभते, उपमालंकारः, वंशस्थं वृत्तम् ॥ १७ ॥
विमर्श—सन्धिमुखेन निर्गता—भीतर जलने वाले दीपक की जो रोशनी सेंध के माध्यम से बाहर पृथ्वी पर पतली रेखा के समान दिखाई दे रही है उस की वैसी ही शोभा है जैसी कसौटी पर खींची गई सोने की रेखा की। इस प्रकार शिखा और रेखा का साम्य होने से उपमा अलंकार है। पिञ्जरा—पीला लाल मिश्रित रंग। वंशस्थ छन्द है ॥ १७ ॥
अर्थ—(फिर सेंध फोड़कर) अब सेंध बन चुकी है। अच्छा, अब प्रवेश करता हूँ। अथवा पहले स्वयं प्रवेश नहीं करता हूँ, नकली पुरुष को प्रवेश कराता हूँ। (वैसा करके) अरे! कोई नहीं है। कार्त्तिकेय को नमस्कार है। (प्रवेश करके और देखकर) अरे, दो लोग सो रहे हैं। अच्छा अपनी रक्षा के लिये दरवाजा खोलता हूँ। क्यों, घर पुराना होने के कारण किवाड़ा आवाज कर रहा है। तो तब तक पानी खोजता हूँ। (इधर उधर देखकर पानी लेकर गिराता हुआ शङ्कित होते हुये) जमीन पर गिरता हुआ (यह पानी) आवाज पैदा न
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शब्दमुत्पादयेत् । ( पृष्ठेन प्रतीक्ष्य कपाटमुद्घाट्य । ) भवतु, एवं तावदिदानीं परीक्षे किं लक्ष्यसुप्तम् उत परमार्थसुप्तमिदं द्वयम् ? ( त्रासयित्वा परीक्ष्य च ) अये ! परमार्थसुप्तेनानेन भवितव्यम् । तथाहि—
निःश्वासोऽस्य न शङ्कितः सुविशदः तुल्यान्तरं वर्त्तते
दृष्टिर्गाढनिमीलिता न विकला नाभ्यन्तरे चञ्चला ।
गात्रं स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलं शय्याप्रमाणाधिकं
दीपञ्चापि न मर्षयेदभिमुखं स्याल्लक्ष्यसुप्तं यदि ॥ १८ ॥
करे। तो ऐसा करूँ। ( पीठ से सहारे से किवाड़ को हटाकर अथवा पीछे देखकर और खोलकर ) अच्छा, अब इस प्रकार से परीक्षा लेता हूँ कि ये दोनों क्या छल से सोये हुये हैं अथवा वास्तव में सोये हुये हैं ? ( डराकर और परीक्षा करके ) अरे ये दोनों वास्तव में सोये हुये हैं, जैसा कि—
अन्वयः— अस्य, निःश्वासः, शङ्कितः, न, ( अपि तु ) सुविशदः, तुल्यान्तरम्, वर्तते, दृष्टिः, गाढनिमीलिता, ( अस्ति ), विकला, न, अभ्यन्तरे, चञ्चला, न, वर्तते, गात्रम्, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम्, शय्याप्रमाणाधिकम्, च, ( वर्तते, ) यदि, लक्ष्यसुप्तम्, स्यात्, तदा, अभिमुखम्, दीपम्, च, अपि, न, मर्षयेत् ॥ १८ ॥
शब्दार्थ— अस्य = सोये हुये पुरुषद्वय का, निःश्वासः = सांस लेना, शङ्कितः = शङ्कायुक्त, न = नहीं ( अर्थात् स्वाभाविक गति से चलने वाला है ) सुविशदः = साफ साफ, तुल्यान्तरम् = समान अन्तर वाली, वर्तते = है, दृष्टिः = आँखें, गाढनिमीलिता = अच्छी प्रकार से बन्द है, न विकला = व्याकुल नहीं है, और, न चञ्चला = न तो चञ्चल = फड़कने वाली ही है, गात्रम् = शरीर, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम् = शरीर की सन्धियों = जोड़ों के ढीले होने से शिथिल, शय्याप्रमाणाधिकम् = पलंग की लम्बाई चौड़ाई से अधिक है, यदि लक्ष्यसुप्तम् = यदि बहाने से सोया हुआ होता, तदा = तब तो, अभिमुखम् = सामने जलते हुये, दीपम् = दीपक को, अपि = भी, न = नहीं, मर्षयेत् = सहन कर पाता ॥ १८ ॥
अर्थ— दोनों व्यक्तियों का सांस लेना शंकायुक्त नहीं है, साफ साफ है और उनमें समान अन्तर है। आँख अच्छी प्रकार बन्द है, न तो व्याकुल है और न भीतर चञ्चल है। शरीर के जोड़ों ( सन्धियों ) के ढीले हो जाने से शिथिल और पलंग के परिमाण की अपेक्षा अधिक अर्थात् पलंग से बाहर शरीर है। और यदि बहाने से सोये हुये होते तो सामने जलते हुये दीपक को भी सहन नहीं कर पाते। ( अतः वास्तव में ही सोये हैं ।) ॥ १८ ॥
टीका— पुरुषद्वयस्य परमार्थसुप्ततां साधयितुं परमार्थसुप्तिलक्षणानि वर्णयति—निःश्वास इति । अस्य = पुरुषद्वयस्य, निःश्वासः = नासिकारन्ध्रविनिर्गतः
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( समन्तादवलोक्य । ) अये ! कथं मृदङ्गः, अयं दर्दुरः, अयं पणवः, इयमपि वीणा, एते वंशाः, अमी पुस्तकाः । कथं नाट्याचार्यस्य गृहमिदम् । अथवा, भवनप्रत्ययात् प्रविष्टोऽस्मि । तत् किं परमार्थदरिद्रोऽयम् ? उत राजभयाच्चोरभयाद्वा भूमिष्ठं द्रव्यं धारयति ? । तन्ममापि नाम शर्विलकस्य भूमिष्ठं द्रव्यम् ? । भवतु, बीजं प्रक्षिपामि । (तथा कृत्वा ।) निक्षिप्तं बीजं न क्वचित् स्फारीभवति । अये ! परमार्थदरिद्रोऽयम् । भवतु, गच्छामि ।
विदूषकः---( उत्स्वप्नायते । ). भो वअस्स ! सन्धी विअ दिस्सदि, चोरं विअ पक्खामि; ता गेण्हदु भवं एदं सुवण्णभण्डअं । ( भो वयस्य ! सन्धिरिव दृश्यते, चौरमिव पश्यामि, तद् गृह्णातु भवानिदं सुवर्णभाण्डम् । )
प्राणवायुः, शक्तिः=शङ्काग्रस्तः, न=नैव, अपि तु, सुविशदः=सुस्पष्टः, तुल्यान्तरम्=तुल्यम्=समानम् अन्तरं यथा स्यात् तथा, वर्तते=विद्यते, दृष्टिः=नेत्रम्, गाढनिमीलिता=सुदृढरूपेण मुद्रिता, विकला=व्याकुला, न=नैव, आभ्यन्तरे=नेत्राभ्यन्तरे, चञ्चला=चपला, न = नैव, वर्तते, तेन नेयं कपटनिद्राग्रस्ततेति भावः । गात्रम्=शरीरम्, स्रस्तशरीरसन्धिशिथिलम्=शिथिलावयवतया पतितम् तथा, शय्याप्रमाणाधिकम्=पर्यङ्कस्य प्रमाणादधिकम्=अतिरिक्तम्, वर्तते; यदि=चेत्, लक्ष्यसुप्तम्=कपटनिद्रितम्, स्यात्=भवेत्, तदा, अभिमुखम्=समक्षम्, दीपम्=प्रज्वलितदीपकम्, च, न=नैव, मर्षयेत्=सहेत । स्वभावोक्तिरलङ्कारः शार्दूलविक्रीडितं च वृत्तम् ॥१८॥
विमर्श---इस में सोते हुये व्यक्ति की स्वाभाविक स्थिति का अतीव सुन्दर वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलङ्कार है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ १८ ॥
अर्थ---( चारो ओर देख कर ) अरे ! क्या मृदङ्ग है ? यह दर्दुर ( एक वाद्य-विशेष ), यह पणव, यह वीणा भी है, ये बांसुरियां हैं, ये पुस्तकें हैं । तो क्या किसी नाच गाना सिखाने वाले का घर है ? अथवा ( विशाल ) भवन का विश्वास करके घुसा हूँ । तो क्या यह वास्तव में दरिद्र है । अथवा राजा के भय से या चोर के भय से धन को जमीन में गाड़ कर रखा है । तो क्या मुझ शर्विलक के लिये भी जमीन में गाड़ा हुआ धन ( अप्राप्य ) है ? अच्छा, तो बीज फेंकता हूँ । ( बीज फेंक कर ) फेंका हुआ बीज कहीं नहीं फैल रहा है । अरे ! यह तो वास्तव में दरिद्र है । अच्छा तो यहाँ से चलता हूँ ।
विदूषकः---( स्वप्न में बड़बड़ाता है ) अरे मित्र ! सेंध जैसी दिखाई दे रही हैं । चोर जैसा देख रहा हूँ । तो इस स्वर्णभाण्ड ( गहनों के डिब्बे ) को आप ले लें ।
टीका---मृदङ्गः=वाद्ययन्त्रविशेषः । एतल्लक्षणन्तु---
चर्मणा नद्धवदनो मध्ये चैव पृथुर्भवेत् । मृत्तिकानिर्मितश्चैव मृदङ्गः परिकीर्तितः ॥
तृतीयोऽङ्कः २०९
शर्विलकः— किं नु खलु अयमिह मां प्रविष्टं ज्ञात्वा दरिद्रोऽस्मीत्युपहसति ? तत् किं व्यापादयामि ? उत लघुत्वादुत्स्वप्नायते । (दृष्ट्वा ।) अये, जर्जर-स्नानशाटीनिबद्धं दीपप्रभयोद्दीपितं सत्यमेवैतदलङ्कणभण्डम् । भवतु, गृह्णामि । अथवा, न युक्तं तुल्यावस्थं कुलपुत्रजनं पीडयितुम् । तद् गच्छामि ।
विदूषकः— भो वअस्स ! साविदोसि गोबम्हणकामाए, जइ एदं सुवण्णभण्डअं ण गेण्हसि । ( भो वयस्य ! शापितोऽसि गोब्राह्मणकाम्यया, यदि एतत् सुवर्णभाण्डं न गृह्णासि । )
पणवः=पटहभेदो वाद्ययन्त्रविशेषः, कथमिति जिज्ञासायाम्, भवनप्रत्ययात् = होचितविभूतिविश्वासात्; गृहस्यास्य बहिराडम्बरमालोक्य मयैतद्विश्वस्तं यदेतद्धनिकगृहमिति । तथा चात्र ममाभीष्टसिद्धिर्भविष्यतीति भावः । पुस्तकाः=पुस्तकानि, पुस्तकशब्द उभयलिङ्गः । राजभयात्=राजकर्तृकाहरणभीतेः, चोरभयात्=चोरकर्तृकापहरणभीतेः, भूमिष्ठम्=भूमितलनिखातम्, धारयति=स्वामित्वेनाधिकरोति, बीजम्=भूमितलनिहितधनस्य सदसद्भावज्ञापकं पदार्थ-विशेषम् मन्त्रविशेषं वा, स्फारीभवति=प्रसरति; निखातधने सति भूतले समन्त्रबीजे निक्षिप्ते तस्य बहुलीभावः स्यादिति चौरशास्त्रप्रसिद्धिः, परन्तु अत्र तु न तथेति वास्तविकदरिद्रत्वं निश्चितम् । उत्स्वप्नायते=उत्कृष्टः=सत्यत्वेन प्रशस्यः स्वप्नो यस्य सः=उत्स्वप्नः, तद्वदाचरतीति क्यङि उत्स्वप्नायते, शयान एव किञ्चित् जल्पतीति भावः ।
अर्थ—शर्विलक— तो क्या यह सचमुच मुझे यहाँ आया हुआ देखकर "मैं दरिद्र हूँ" ऐसा (सूचित करता हुआ) मेरी हँसी उड़ा रहा है । तो क्या मार डालूँ ? अथवा दुर्बल मनवाला होने से बड़बड़ा रहा है । (देख कर) अरे, सचमुच ही पुरानी नहाने वाली साड़ी में बँधा हुआ, दीपक की कान्ति से चमकने वाला सोने के गहनों का डिब्बा है । अच्छा तो ले लेता हूँ । अथवा अपने समान दशा वाले कुलपुत्र को दुखी करना ठीक नहीं है । अतः चलता हूँ ।
विदूषक— मित्र ! तुम्हें गाय और ब्राह्मण की शपथ है यदि इस सुवर्णभाण्ड को नहीं लेते हो ।
टीका— उपहसति=उपहासं करोति, अत्र धनादिप्राप्तिभ्रान्त्या व्यर्थमेव प्रविष्ट इति उपहसतीति भावः, व्यापादयामि=हन्मि, जर्जरस्नानशाटीनिबद्धम्=जर्जरा या स्नानशाटी=अभ्यङ्गशाटिका, तया परिवेष्टितम्, दीपप्रभया=प्रदीपप्रकाशेन, उद्दीपितम् = देदीप्यमानं जातम्, तुल्यावस्थम् = तुल्या = समाना निर्धनतारूपा अवस्था=दशा यस्य तं तादृशम्, कुलपुत्रजनम् = सत्कुले उत्पन्नम्, पीडयितुम्=बाधितुम्; गोब्राह्मणकाम्यया=गवां ब्राह्मणानाञ्च काम्यया=अभिलाषेण,
१४ मृ०
२१० मृच्छकटिकम्
शर्विलकः—अनतिक्रमणीया भगवती गोकाम्या ब्राह्मणकाम्या च । तद् गृह्णामि । अथवा, ज्वलति प्रदीपः । अस्ति च मया प्रदीपनिवार्पणार्थमाग्नेयः कीटो धार्यते । तं तावत् प्रवेशयामि, तस्यायं देशकालः । एष मुक्तो मया कीटो यात्वेव अस्य दीपस्य उपरि मण्डलैविविचत्रैर्विचरितुम् । एष पक्षद्वयानिलैन निर्वापितो भद्रपीठेने । धिक् कृतमन्धकारम् । अथवा, मयापि अस्मद्ब्राह्मणकुले न धिक् कृतमन्धकारम् ? अहं हि चतुर्वेदविदोऽप्रतिग्राह-कस्य पुत्रः शर्विलको नाम ब्राह्मणो गणिकामदनिकार्यमकार्यमनुतिष्ठामि । इदानीं करोमि ब्राह्मणस्य प्रणयम् । ( इति जिघृक्षति । )
विदूषकः—भो वअस्स ! सीदलो दे अग्गहत्थो । ( भो वयस्य ! शीतलस्ते अग्रहस्तः । )
शर्विलकः—धिक् प्रमादः । सलिलसम्पर्कात् शीतलो मे अग्रहस्तः । भवतु, कक्षयोर्हस्तं प्रक्षिपामि । ( नाट्येन सव्यहस्तमुष्णीकृत्य गृह्णाति । )
विदूषकः—गहिदं ? । ( गृहीतम् ? )
गोब्राह्मणानामभिलाषाऽपूरणे यत् पातकं स्यात् तादृशमेवेदानीं मम हस्तात् सुवर्ण-भाण्डग्रहणे सति भविष्येति भावः ।
**अर्थ—शर्विलक—**भगवती गाय की अभिलाषा और ब्राह्मण की अभिलाषा अनुल्लङ्घनीय होती है । अतः ( सुवर्णभाण्ड ) ले लेता हूँ । किन्तु दीपक जल रहा है । दीप बुझाने के लिये मेरे पास आग्नेय कीड़ा है । तो इसे भेजता हूँ । इसे छांड़ने के लिये यही उचित स्थान और समय है । मेरे द्वारा छोड़ा गया यह कीड़ा इस दीपक के ऊपर विचित्र रूप से मंडराने के लिये उड़े । इस भद्रपीठ ( कीड़े ) ने अपने दोनों पंखों की हवा से ( यह दीपक ) बुझा दिया है । धिक्कार है, अन्धकार हो गया । अथवा मुझ ब्राह्मण ने भी क्या अपने ब्राह्मणकुल में अँधेरा नहीं कर डाला ? ( अर्थात् अवश्य कर डाला । ) मैं चारों वेद जानने वाले, दान न लेने वाले का पुत्र शर्विलक नामक ब्राह्मण वेश्या मदनिका के लिये यह अनुचित कार्य करता हूँ । अब ब्राह्मण का प्रणय ( पूरा ) करता हूँ, ( स्वर्णभाण्ड ले लेता हूँ । ) ( ऐसा कह कर ले लेना चाहता है । )
**विदूषक—**मित्र ! तुम्हारी अँगुलियाँ ठण्डी हैं ।
**शर्विलक—**ओह ! प्रमाद ( हो गया ), पानी छूने के कारण हाथ ठण्डा पड़ गया है । अच्छा, कांख में दोनों हाथ रखता हूँ । ( अभिनय के साथ दाहिना हाथ गरम करके ले लेता है । )
**विदूषक—**ले लिया ?
तृतीयोऽङ्कः २११
शर्विलकः— अनतिक्रमणीयोऽयं ब्राह्मणप्रणयः । तद् गृहीतम् ।
विदूषकः— दाणीं विक्किणिद-पण्णो विअ वाणिओ, अहं सुहं सुविस्सं ।
( इदानीं विक्रीतपण्य इव वाणिजः अहं सुखं स्वप्स्यामि )
शर्विलकः— महाब्राह्मण ! स्वपिहि वर्षशतम् । कष्टम्, एवं मदनिका-गणिकार्थे ब्राह्मणकुलं तमसि पातितम् । अथवा, आत्मा पातितः !
धिगस्तु खलु दारिद्र्यमनिवेदितपौरुषम् ।
यदेतद्गर्हितं कर्म निन्दामि च करोमि च ॥ १६ ॥
शर्विलक— ब्राह्मण का आग्रह टाला नहीं जा सकता, अतः ले लिया ।
विदूषक— अब बेचने योग्य सामान को बेच कर निश्चिन्त हुये बनिया के समान सुख से सोऊँगा ।
शर्विलक— महाब्राह्मण ! सौ वर्ष सोओ । कष्ट है, वेश्या मदनिका के लिये ब्राह्मणकुल को अन्धकार में इस प्रकार गिरा दिया है । अथवा आत्मा ( अपने आप ) को ही गिरा दिया है ।
टीका— अनतिक्रमणीया = अनुल्लङ्घनीया, भगवती=शक्तिमयी, अस्ति च, अयं प्रारम्भसूचकोऽनर्थकः शब्द इति बोध्यम्, सार्थकत्वे अन्वयोपपादनासम्भवात्; आग्नेयः=अग्निदेवताकः, अग्निशमनकारक इति भावः । देशकालः=आदेशस्य समयः द्वन्द्वे तु एकवचनं पुंस्त्वं च चिन्त्यम, विचरितुम् = सङ्क्रमितुम्, पक्षद्वया-निलेन=पक्षद्वयजनितपवनेन, भद्रपीठेन = तन्नामकेन, अप्रतिग्राहकस्य = अगृहीतुः, अकार्यम्=चौर्यम्, प्रणयम् = प्रार्थनाम्, जिघृक्षति = ग्रहीतुम् इच्छति, अग्रहस्तः= कराग्रभागः सव्यहस्तम्=दक्षिणहस्तम्, विक्रीतपण्यः=विक्रीतं पण्यं=विक्रेयं वस्तु येन सः।
अन्वयः— अनिवेदितपौरुषम्, दारिद्र्यम्, धिक्, अस्तु, खलु, यत्, एतत्, गर्हितम्, कर्म, निन्दामि, च, करोमि, च ॥ १६ ॥
शब्दार्थ— अनिवेदितपौरुषम्=अप्रदर्शितपौरुषवाली, दारिद्र्यम्=गरीबी को, धिक्=धिक्कार, अस्तु=हो, खलु=निश्चयेन, यत्=क्योंकि, एतत्=इस, गर्हितम्=निन्दित, कर्म=चोरी की, निन्दामि=बुराई भी करता हूँ, च=और, करोमि=कर भी रहा हूँ ॥ १६ ॥
अर्थ— जिसमें पौरुष प्रदर्शित नहीं हो पाता ऐसी गरीबी को निश्चित ही धिक्कार है । क्योंकि इस निन्दित चोरी की बुराई भी कर रहा हूँ और (उसे ही) कर भी रहा हूँ ॥ १६ ॥
टीका— एतादृशदुष्कृतिनिदानतया दारिद्र्यमेव निन्दन्नाह —धिगस्त्विति । अनिवेदितम्=अप्रदर्शितम्, अकथितं वा पौरुषम्=पुरुषकारः यत्र तादृशम्, अनिवेदित-
२१२ || मृच्छकटिकम्
तद्यावत् मदनिकाया निष्क्रयणार्थं वसन्तसेनागृहं गच्छामि । ( परिक्रम्य अवलोक्य च ) अये ! पदशब्द इव । मा नाम रक्षिणः । भवतु, स्तम्भीभूत्वा तिष्ठामि । अथवा ममापि नाम शर्विलकस्य रक्षिणः ? योऽहम्—
मार्जारः क्रमणे, मृगः प्रसरणे, श्येनो ग्रहालुञ्चने सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने श्वा, सर्पणे पन्नगः । माया रूप-शरीर-वेश-रचने, वाग् देशभाषान्तरे, दीपो रात्रिषु, सङ्कटेषु डुडुभो, वाजी स्थले, नौर्जले ॥ २० ॥
पौरुषम्--इति पाठे अगणितपौरुषम्, दारिद्र्यम् = निर्धनत्वम्, खलु = निश्चयेन, धिक्=धिक्कृतम्, अस्तु = भवतु, यत्=यस्मात् ( अहं दरिद्रः ) एतत्=क्रियमाणं परधनापहरणस्वरूपम्, कर्म=चौर्यम्, निन्दामि = अपवदामि, करोमि च=सम्पादयामि च । अत्र काव्यलिङ्गं दीपकञ्च अलङ्कारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १९ ॥
विमर्श—अनिवेदितपौरुषम्=इसके स्थान पर 'अनिर्वेदितपौरुषम्' यह भी पाठ मिलता है । 'प्रकरणनिश्चययोः निर्वेदः--इसके अनुसार अनिश्चितम्=अगणितम् पौरुषम् यत्र तादृशम् --अर्थात् जहाँ पौरुष की गणना ही नहीं हो पाती है । मूलपाठ के अनुसार जहाँ पौरुष का कथन ही नहीं हो पाता है । दोनों का तात्पर्य एक है । यहाँ उत्तरार्ध के हेतुरूपेण उपन्यस्त होने से काव्यलिङ्ग और एक कर्ता का दो क्रियाओं में सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार है । पथ्यावक्त्र छन्द है ।। १६ ।।
अर्थ—तो अब मदनिका को ( दासीत्व से ) मुक्त कराने के लिये वसन्तसेना के घर चलता हूँ ।
( घूम कर और देख कर )
अरे, पैर की आवाज सी ( सुनाई दे रही है । ) कहीं पहरेदार न आ जायें । अच्छा, कुछ देर खम्भा के समान चुपचाप खड़ा होता हूँ । अथवा मुझ शर्विलक के लिये भी पहरेदार ( भय की चीज हैं ) ?
अन्वयः—यः, अहम्--इति गद्यस्थेनान्वयः, क्रमणे, मार्जारः; प्रसरणे, मृगः; ग्रहालुञ्चने, श्येनः; सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने, श्वा; सर्पणे, पन्नगः; रूप-शरीरवेश-रचने, माया; देशभाषान्तरे, वाक्; रात्रिषु, दीपः; सङ्कटेषु, डुडुभः; स्थले, वाजी; जले, नौः ( अस्मि ) ॥ २० ॥
शब्दार्थ—( यः अहम्=जो मैं ), क्रमणे = उछलने में, मार्जारः = बिलाव; प्रसरणे=शीघ्र भागने में, मृगः=हिरन; ग्रहालुञ्चने=पकड़ने और झपटने में, श्येनः=बाज; सुप्तासुप्तमनुष्यवीर्यतुलने=सोये हुये अथवा न सोये ( =जागते हुये ) मनुष्य
तृतीयोऽङ्कः २१३
की शक्ति की जानकारी करने में, श्वा=कुत्ता; सर्पणे=सरकने में, पन्नगः=सांप; रूप-शरीर-वेशरचने=आकार, शरीर और वेशभूषा इनको बदलने में, माया=इन्द्रजाल; देशभाषान्तरे=विभिन्न स्थानों की भाषा बोलने में, वाक्=सरस्वती; रात्रिषु=रातों में, दीपः=दीपक; सङ्कटेषु=सङ्कट के समय में, डुडुभः=भेड़िया; स्थले=पृथ्वी पर, वाजी=घोड़ा; और, जले=पानी में, नौः=नाव हूँ ॥ २० ॥
**अर्थ—**जो मैं—उछलने में बिलाव, शीघ्र दौड़ने में हिरन, झपटकर पकड़ने और छीनने में बाज, सोते हुये और जागते हुये दोनों प्रकार के पुरुषों की शक्ति का पता लगाने में कुत्ता, सरकने में साँप, विभिन्न प्रकार के आकार, शरीर और वेशभूषा बनाने में इन्द्रजाल-विद्या, भिन्न-भिन्न स्थानों की भाषा बोलने में सरस्वती, रातों में दीपक, सङ्कटों में भेड़िया, जमीन पर घोड़ा और पानी में नौका हूँ ॥ २० ॥
**टीका—**सर्वत्र सर्वदा असीमप्रभावशालित्वमुपपादयितुं स्वशक्तिं वर्णयन्नाह—मार्जार इति। अत्र सर्वत्र वाक्येषु गद्यस्थेन 'योऽहम्' इत्यनेनान्वयः कार्यः। **क्रमणे=**उत्प्लवने आक्रमणे वा, **मार्जारः=**विडालः; **प्रसरणे=**त्वरितधावने, **मृगः=**हरिण; **ग्रहालुञ्चने=ग्रहः=**ग्रहणम्, **आलुञ्चनम्=**आच्छिद्य हरणञ्च इति ग्रहालुञ्चनम् तस्मिन्, **श्येनः=**दूरात् आगत्य लक्ष्यग्राही तदाख्यपक्षिविशेषः; **सुप्तासुप्तमनुष्य-वीर्यतुलने=**सुप्तस्य निद्रितस्य, असुप्तस्य=जागरितस्य च मानवस्य यत् **वीर्यम्=**शक्तिः, **तत्तुलने=**परिज्ञाने, **श्वा=**कुक्कुरः; **सर्पणे=**द्रुतवक्रगमने, **पन्नगः=**सर्पः, **रूपस्य=**सितकृष्णादिवर्णस्य, **शरीरस्य=**देहस्य, **वेशस्य=**परिच्छदस्य च सम्पादने, **माया=**चातुर्यमयी विद्या, इन्द्रजालमिति यावत्; **देशभाषान्तरे=**देशभाषाविशेषे, नानादेशीयभाषाकथने इत्यर्थः **वाक्=**सरस्वती; **रात्रिषु=**निशासु, **दीपः=**प्रदीपः, सङ्कटेषु = विपत्तिषु, दुर्गमस्थलेषु वा, **डुडुभः=**तदाख्यपशुविशेषः, (अश्वतरः इति केचित्, वृक इत्यपरे); **स्थले=**भूमौ, **वाजी=**अश्वः; **जले=**नद्यादौ, **नौ =**तरणिः अस्मि इति भावः। अत्र एकस्मिन् शर्विलके तादात्म्येन मार्जाराद्यारोपात् मालारूपकमलंकारः, शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ २० ॥
**विमर्श—**शर्विलक ने अपने अनुपम गुणों एवं शक्ति का वर्णन किया है। जहाँ जैसा बन जाने पर काम हो सकता है वहाँ वैसा बन कर काम चलाना उसके लिये अतिसरल है। **ग्रहालुञ्चने... ग्रहे=**ग्रहणे अर्थात् दूर से आकर झपट कर पकड़ने और **आलुञ्चने=**छीन कर लेने में, बाज पक्षी, सङ्कटेषु डुडुभः—संकट का अर्थ विपत्ति तथा दुर्गम स्थल हैं। दुर्गम स्थल अर्थ अधिक अच्छा है। वृक खच्चर और भेड़िया को कहा जाता है। दोनों को तात्पर्यानुसार समझना चाहिये।
| २१४ | मृच्छकटिकम् |
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अपि च—
भुजग इव गतौ, गिरिः स्थिरत्वे, पतगपतेः परिसर्पणे च तुल्यः । शश इव भुवनावलोकनेऽहं वृक इव च ग्रहणे बले च सिंहः ॥ २१ ॥
इसमें एक शर्विलक में ही तादात्म्य से मार्जार आदि का आरोप होने से मालारूपक अलङ्कार समझना चाहिये । एक शर्विलक का ही मार्जार आदि अनेक रूपों में उल्लेख होने से उल्लेख अलंकार की शंका की जा सकती है । परन्तु यहाँ शर्विलक में मार्जारत्व आदि वास्तविकरूप में नहीं है । अतः उल्लेख मानना सम्भव नहीं है । शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २० ॥
अन्वयः— अहम्, गतौ, भुजगः, इव, स्थिरत्वे, गिरिः, परिसर्पणे, पतगपतेः, तुल्यः, भुवनावलोकने, शशः, इव, ग्रहणे, वृकः, इव, बले, च, सिंहः, अस्मि ॥ २१ ॥
शब्दार्थ— अहम् = मैं शर्विलक, गतौ = टेढ़ी मेढ़ी चाल में, भुजगः = साँप, इव = के समान, स्थिरत्वे = अचल रहने में, गिरिः = पहाड़, परिसर्पणे = शीघ्र चलने में, पतगपतेः = पक्षिराजगरुड के, तुल्यः = समान, भुवनावलोकने = एक समय में ही सारे संसार को देख लेने में, शशः = खरगोश, ग्रहणे = झपटकर पकड़ने में, वृकः = भेड़िया, च = और, बले = शक्ति, में, सिंहः = शेर, अस्मि = हूँ ॥ २१ ॥
अर्थ— मैं (शर्विलक) वक्र चलने में साँप के समान, अडिग रहने में पर्वत, शीघ्र चलने में पक्षिराज गरुड के समान, एक साथ सारे संसार को देख लेने में खरगोश के समान, (झपटकर) पकड़ने में भेड़िया के समान और बल में सिंह हूँ ॥ २१ ॥
टीका— पूर्वोक्तमेव स्वसामर्थ्यं पुनः वर्णयति—भुजग इति । अहम् = शर्विलकः गतौ = वक्रादिगमने, भुजगः = सर्पः, इव = यथा; स्थिरत्वे = अचलत्वे, गिरिः = पर्वतः, इव, परिसर्पणे = शीघ्रगमने, पतगपतेः = पक्षिराजगरुडस्य, तुल्यः = समानः, भुवनावलोकने = जगतः दर्शने, चतुर्दिक्दर्शने इति भावः, शशः = शशक इव, ग्रहणे = आक्रम्य लक्ष्यग्रहणे, वृकः = ईहामृगः, इव, बले = सत्त्वे, च, सिंह = मृगेन्द्रः इव, अस्मि = वर्ते । अत्र उपमेयभूतस्य एकस्य शर्विलकस्य विषयविशेषेषु भुजग-गिरिपतगपत्यादिभिः बहुभिरुपमानैः साम्यकथनात् मालोपमालङ्कारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ २१ ॥
विमर्श— पूर्वोक्त श्लोक के समान ही इसमें भी शर्विलक अपनी विशेषता बताता है । यहाँ उपमेय एक शर्विलक का भुजग, गिरि, पतगपति आदि बहुत से उपमानों के साथ साम्य कहने के कारण मालोपमा अलंकार है । कुछ ने उल्लेख अलकार माना है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २१ ॥
तृतीयोऽङ्कः २१५
( प्रविश्य । )
रदनिका—हद्धी ! हद्धी ! बाहिर-दुआर-सालाए पसुत्तो वड्ढमाणओ, सोवि एत्थ ण दीसइ । भोदु, अज्जमित्तेअं सद्द्दावेमि । ( हा धिक् हा धिक् ! बहिर्द्वारशालायां प्रसुप्तो बर्द्धमानकः, सोऽप्यत्र न दृश्यते । भवतु, आर्यमैत्रेयं शब्दापयामि । )
शर्विलकः—( रदनिकां हन्तुमिच्छति । निरूप्य ) कथं स्त्री ! भवतु, गच्छामि । ( इति निष्क्रान्तः । )
रदनिका—( गत्वा सत्रासम् ) हद्धी ! हद्धी ! अम्हाणं गेहे सन्धि कप्पिअ चोरो णिक्कमदि । भोदु, मित्तेअं गदुअ पबोधेमि । ( विदूषकमुपगम्य ) अज्जमित्तेअ ! उट्ठेहि उट्ठेहि; अम्हाणं गेहे सन्धिं कपिअ चोरो णिक्कन्तो । ( हा धिक् हा धिक् ! अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चोरो निष्क्रामति । भवतु, मैत्रेयं गत्वा प्रबोधयामि । आर्यमैत्रेय ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, अस्माकं गेहे सन्धि कल्पयित्वा चौरो निष्क्रान्तः । )
विदूषकः—( उत्थाय ) आः दासीए धीए ! किं भणासि 'चोरं कप्पिअ सन्धी णिक्कन्तो ?' । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि 'चोरं कल्पयित्वा सन्धिनिष्क्रान्तः ?' )
रदनिका—हदास ! अलं परिहासेण । किं ण पेक्खसि एणं ? । ( हताश ! अलं परिहासेन । किं न प्रेक्षसे एनम् ? )
विदूषकः—आः दासीए धीए ! किं भणासि दुदीअं विअ दुआरअं उग्-घाणिदं त्ति । वअस्स ! चारुदत्त ! उट्ठेहि, उट्ठेहि ! अम्हाणं गेहे सन्धि दइअ चोरो णिक्कन्तो । ( आः दास्याः पुत्रि ! किं भणसि द्वितीय-
( प्रवेश करके )
**अर्थ—रदनिका—**हाय ! हाय ! बाहर दरवाजे की कोठरी में वर्द्धमानक सोया हुआ था, वह भी नहीं दिखाई दे रहा है । अच्छा, आर्य मैत्रेय को बुलाती हूँ ।
शर्विलक—( रदनिका को मार डालना चाहता है । देख कर ) ओह, यह तो स्त्री है । अच्छा ( यहाँ से ) जाता हूँ । ( इस प्रकार चला जाता है । )
रदनिका—( घूम कर, भय के साथ ) हाय, हाय, हमारे घर में सेंध लगा कर चोर भागा जा रहा है । अच्छा, जाकर मैत्रेय को जगाती हूँ । ( विदूषक के समीप जाकर ) आर्य मैत्रेय । उठो, उठो, हम लोगों के घर में सेंध लगा कर चोर निकल गया ।
विदूषक—( उठ कर ) अरी दासी की पुत्री, क्या कह रही हो 'चोर कों फड़ कर सेंध निकल गई ।'
**रदनिका—**अरे मूर्ख ! हँसी मत करो । क्या इसे नहीं देख रहे हो ?
**विदूषक—**अरी दासी की पुत्री क्या कह रही हो 'दूसरा दरवाजा सा खोल
२१६ मृच्छकटिकम्
मिव द्वारकम् उद्घाटितमिति । भो वयस्य ! चारुदत्त ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ । अस्माकं गेहे सन्धिं दत्त्वा चौरो निष्क्रान्तः । )
चारुदत्त :—भवतु । भोः ! अलं परिहासेन ।
विदूषक:—भो ! ण परिहासो । पेक्खदु भवं । ( भोः ! न परिहासः प्रेक्षतां भवान् । )
चारुदत्त :—कस्मिन्नुद्देशे ? ।
विदूषक:—भो ! एसो । ( भोः एषः । )
चारुदत्त :—( विलोक्य । ) अहो ! दर्शनीयोऽयं सन्धिः ।
उपरितलनिपातितेष्टकोऽयं
शिरसि तनुर्विपुलश्च मध्यदेशे !
असदृशजन-सम्प्रयोगभीरो-
र्हृदयमिव स्फुटितं महागृहस्य ॥ २२ ॥
दिया' । हे मित्र चारुदत्त उठिये, उठिये । हम लोगों के घर में चोर सेंध लगाकर निकल गया ।
चारुदत्त-—अच्छा, अरे मित्र हँसी मत करो ।
विदूषक--अरे ! हँसी नहीं है, क्या आप नहीं देख रहे हैं ?
चारुदत्त--किस जगह ?
विदूषक--अरे, यह है ।
चारुदत्त--( देख कर ) ओह ! यह सेंध तो दर्शनीय है ।
टीका-—शब्दापथापि = आह्वयामि, कथमिति आश्चर्यं, सत्रासम् = सन्धिं विलोक्य चौरसमागमभीत्येति भावः, कल्पयित्वा = सम्पादयित्वा, निष्क्रामति = पलायते, चौरं कल्पयित्वेत्यादिकं विदूषककथनं सम्भ्रममूलकमेव, हताश इति मूर्खत्वे, उद्देशे = प्रदेशे, स्थाने दर्शनीयः = अवलोकनीयः, निर्माणनैपुण्यातिशय-दर्शनादिति भावः ।
अन्वयः-—उपरितल-निपातितेष्टकः, शिरसि, तनुः, मध्यदेशे, च, विपुलः, अयम् ( सन्धिः ) असदृशजनसम्प्रयोगभीरोः, महागृहस्य, स्फुटितम्, हृदयम्, इव, ( दृश्यते ) ॥ २२ ॥
शब्दार्थः-—उपरितलनिपातितेष्टकः=ऊपर से हटा दी गई हैं ईंटें जिससे ऐसी, शिरसि=सिर पर, ऊपर, तनुः=छोटी, मध्यदेशे=बीचवाले भाग में, विपुलः=चौड़ीं, अयम्=यह सेन्ध, असदृशजन-सम्प्रयोगभीरोः=अनुचित व्यक्ति चोर आदि के आजाने से भयभीत, महागृहस्य = विशाल भवन के, स्फुटितम् = फटे हुये, विदीर्ण, हृदयमिव=हृदय के समान, दृश्यते=दिखाई दे रही है ।। २२ ।।