नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( ६६ ) उण्हो क्खु एसो कअलीदलमारुदो । उष्णः खल्वेष कदलीदलमारुतः । चेटी- भद्दिदारिए ! मा इमस्स दोसं कहेहि । भर्तृदारिके ! माऽस्य दोषं कथय । कुणासि घणचन्दणालदापल्लवसंसग्गसीदलं पि इमं । करोषि घनचन्दनलतापल्लवसंसर्गशीतमपीमम् । णीसासेहिं तुमं एव्व कअलीदलमारुअं उण्हं ॥१॥ निःश्वासैस्त्वमेव कदलीदलमारुतमुष्णम् नायिका—(सास्रम्) सहि ! अत्थि कोबि इमस्स संदावस्स उवसमोवाओ ? सखि ! अस्ति कोऽप्यस्य सन्तापस्योपशमोपायः ? चेटी- भद्दिदारिए ! अत्थि, जदि सो एत्थ आअच्छदि । भर्तृदारिके ! अस्ति यदि सोऽत्राऽऽगच्छति [ ततः प्रविशति नायको विदूषकश्च ] श्लोक नं०: १, अन्वयः — घनचन्दनलतापल्लवसंसर्गशीतलम् अपि इमं कदलीदलमारुतं त्वम् एव निःश्वासैः उष्णं करोषि ॥
( ६७ ) पत्ते की हवा गरम है । चेटी - राजकुमारी ! (तो) इस का दोष मत कहो - घने चन्दन के पत्तों के सम्पर्क से शीतल इस केले के पत्ते की हवा को भी आप ही (अपनी) आहों से गरम कर रही हैं। नायिका - (आंसुओं के साथ) सखी, क्या इस सन्ताप को शान्त करने का कोई भी उपाय है ? चेटी - राजकुमारी, है तो, यदि "वह" यहां आ जाए। [नायक तथा विदूषक का प्रवेश]
( ६८ ) नायकः- व्यावृत्यैव सितासितेक्षणरुचा तानाश्रमे शाखिनः कुर्वत्या विटपावसक्तविलसत्कृष्णाजिनौघानिव । यद्दृष्टोऽस्मि तया मुनेरपि पुरस्तेनैव मय्याहते ⁴पुष्पेषो ! भवता मुधैव किमिति क्षिप्यन्त एते शराः ? ॥२॥ विदूषकः- भो वअस्स ! कहिं क्खु गदं दे तं धीरत्तणं ? भो वयस्य ! कुत्र खलु गतं ते तद्धीरत्वम् ? नायकः - वयस्य ! ननु धीर एवास्मि । कुतः ?— नीताः किं न निशाः शशाङ्कधवला नाघ्रातमिन्दीवरं ? किं नोन्मीलितमालतीसुरभयः सोढाः प्रदोषानिलाः ?' झङ्कारः कमलाकरे मधुलिहां किं वा मया न श्रुतो, निर्व्याजं विधुरेष्वधीर इति मां येनाभिधत्से भवान् ? ॥३॥ श्लोक नं० २ः अन्वयः — सितासितेक्षणरुचा आश्रमे तान् शाखिनः विटपावसक्त- विलसत्कृष्णाजिनौघान इव कुर्वत्या तया मुनेरपि पुरा यद् व्यावृत्य एव दृष्टोऽस्मि, तेन एव आहते मयि पुष्पेषो ! भवता मुधा एव एते शराः किमिति क्षिप्यन्ते ॥ श्लोक नं० ३, अन्वयः— किं शशाङ्कधवला निशाः न नीताः ? (किम्) इन्दीवरं न आघ्रातम् ?' किम् उन्मीलितमालतीसुरभयः प्रदोषादिलाः न सोढाः ? किं वा मया कमलाकरे मधुलिहां झङ्कारः न श्रुतः ? येन भवान् निर्व्याजं मां विधुरेषु अधीरः इति अभिधत्ते ॥
( ६६ ) नायकः - आँखों की सफेद तथा काली कान्ति से आश्रम में (स्थित) उन वृक्षों को मानों शाखाओं के लटकते हुए शोभायमान कृष्णमृग के चर्म समूह से युक्त करती हुई उस (मलयवती) ने मुनि के सामने ही जो मुझे घूम कर देखा था, उसी से ही घायल हुए मुझ पर, हे कामदेव ! आप व्यर्थ ही यह तीर क्यों फेंक रहे हैं ? विदूषक. - अरे मित्र ! तेरी वह धीरता कहाँ गई ? नायक - मित्र ! मैं तो सचमुच धीर ही हूं, क्योंकि - क्या चान्द (की चान्दनी) से उजली रातें मै ने नहीं बिताईं ? क्या (नील) कमल फूलों को नहीं सूंघा ? क्या खिले हुये मालती फूलों से सुगन्धित सायंकाल की हवा को सहन नहीं किया ? क्या मैं ने कमल-समूह में भौरों का गुञ्जार नहीं सुना ? . जिससे आप बिना कारण ही मुझे विरह की घड़ियों में अधीर कहते हो ।
- शाखाएँ 2. फैला हुआ; लगा हुआ; लटकता हुआ।
- ओघः = समूह ।
- फूलों के तीरों वाला । (फूलों के नाम पहिले दे चुके हैं)
(७०)
(विचिन्त्य) अथवामृषा नाभिहितं, वयस्यात्रेय ! नन्वधीर एवास्मि ।- स्त्रीहृदयेन न सोढाः क्षिप्ताः कुसुमेषवोऽप्यनङ्गेन$^1$ । येनाद्यैव पुरस्तव वदामि 'धीर' इति स कथमहम् ॥४॥ विदूषकः - (आत्मगतम्) एव्वमधीरत्तणं पडिवज्जंतेण आचक्खिदो महन्तो अणेण एवमधीरत्वं प्रतिपद्यमानेनाऽऽख्यातो महानेन हिअअस्स आवेगो। ता जाव कहिं एव्व एदं अवक्खिवामि । हृदयस्यावेगः$^3$ । तद्यावत्कुत्रैवेनमपक्षिपानि । (प्रकाशम् ) भो वअस्स ! कीस उण अज्ज तुमं लहु एव्व गुरुअणं भो वयस्य ! कथं पुनरद्य त्वं $^4$लघ्वेव गुरुजनं सुस्सूसिअ इह आगदो ? शुश्रूषयित्वेहाऽऽगतः ? नायकः - वयस्य ! स्थाने खल्वेष प्रश्नः । कस्य वा- ऽन्यस्यैतत्कथनीयम् ? अद्य खलु स्वप्ने जानामि- सैव प्रियतमा (अङ्गुल्या निर्दिशन्) अत्र चन्दनलतागृहे
श्लोक नं० ४, अन्वयः- स्त्रीहृदयेन येन (मया) अनङ्गेन क्षिप्ताः कुसुमषवः अपि न सोढाः सः अहम् अद्य एव कथं तव पुरः धीरः इति वदामि ॥
( ७१ ) (सोचकर) अथवा, तुम ने झूठ नहीं कहा । मित्र, आत्रेय ! मैं सचमुच अधीर (कायर) हूँ— स्त्रियों के समान (भीरु) हृदय वाले जिस से कामदेव के द्वारा फेंके गए फूलों के बाण भी नहीं सहे गए, ऐसा मैं अब तेरे सामने कैसे कह सकता हूं कि मैं धीर हूं ? विदूषकः — (मन ही मन) इस प्रकार अधीरता स्वीकार करते हुए इस ने हृदय के महान् आवेग को कह डाला है । अतः किसी और तरफ़ इस का ध्यान लगाता हूँ। (प्रकट) मित्र, आज गुरुजनों की सेवा करके आप इतनी जल्दी कैसे यहां आ गए ? नायक — मित्र, यह प्रश्न सचमुच उचित है । (तुम्हें छोड़कर) यह बात और किस से कहूँगा ? आज मैं ने स्वप्न में देखा कि वही प्रियतमा (अंगुली से इशारा कर के) यहां चन्दनलता गृह में ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
- अङ्गों अथवा शरीर से रहित, कामदेव ।
- मानना, स्वीकार करना ।
- घबराहट, हलचल ।
- लघु = शीघ्र, जल्दी ।
( ७२ ) चन्द्रकान्तमणिशिलायामुपविष्टा प्रणयकुपिता किमपि मामुपालभमानेव रुदती मया दृष्टा । तदिच्छामि स्वमानुभूतदयितासमागम रम्येऽस्मिंश्चन्दनलतागृहे दिवसशेषमतिवाहयितुम् । तदेहि गच्छावः । [परिक्रामतः] चेटी — (कर्णं दत्वा ससम्भ्रमम् ) भट्टिदारिए ! पदसद्दो वित्र सुणीअदि । भर्तृदारिके ! पदशब्द इव श्रूयते । नायिका- (ससम्भ्रममात्मानं पश्यन्ती) हज्जे ! मा ईरिसं आआरं हञ्जे ! मेदृशमाकारं पेक्खिअ कोवि मे हिअअं तुलीअदु । ता उट्ठेहि, इमिणा प्रेक्ष्य कोऽपि मे हृदयं तुलयतु¹ । तदुत्तिष्ठ, अनेन रत्तासोअपादवेण अंतरिदा पेक्खम्ह दाव को एसो त्ति । रक्ताशोकपादपेनान्तरिते प्रेक्षावहे तावत् 'क एष' इति । [तथा कुरुतः] विदूषकः — एदं चंदणलदाघरअं । ता एहि पविसम्ह । इदं चन्दनलतागृहम् । तदेहि प्रविशावः । [नाट्येन प्रविशतः] नायकः- चन्दनलतागृहमिदं सचन्द्रमणिशिलमपि प्रियं न मम चंद्राननया रहितं चंद्रिकया ²मुखमिव निशायाः ॥५॥ श्लोक नं० ५, अन्वयः- चन्द्राननया रहितं सचन्द्रमणिशिलमपि इदं चन्दनलतागृहं चन्द्रिकया (रहितं) निशायाः मुखमिव मम प्रियं न ॥
( ७३ ) चन्द्रकान्तमणि की शिला पर बैठी हुई, प्रेम से क्रुद्ध हुई, मुझे कुछ उलाहना सा देती हुई रो रही है। अतः मैं चाहता हूं कि स्वप्न में अनुभव किए गए प्रिया के मिलाप से रमणीय इस चन्दनलतागृह में बाकी का दिन बिताऊँ। अतः आओ चलें। [घूमते हैं] चेटी— (कान लगा कर, घबराहट से) राजकुमारी, पैरों की आहट सी सुनाई दे रही है। नायिका— (घबराहट से अपनी ओर देखती हुई) सखी, मेरे इस आकार को देखकर कहीं कोई मेरे हृदय पर शक न करे; अतः उठ, इस लाल अशोक वृक्ष के पीछे छिप कर देखें कि यह कौन है। [वैसा ही करती हैं] विदूषक—यह चन्दनलतागृह है। तो आओ भीतर चलें। [दोनों प्रवेश करने का अभिनय करते हैं] नायक— उस चन्द्रमुखी से रहित, चन्द्रमणि शिला से युक्त भी, यह चन्दनलतागृह, चान्दनी से रहित रात्रि के अग्रभाग (सन्ध्या समय) के समान, मुझे प्रिय नहीं।
- शङ्का करनी।
- मुखम् = आरम्भ।
( ७४ ) चेटी—(दृष्ट्वा) भट्टिदारिए ! दिहिट्ठआ वड्ढसि । सो एव्व भर्तृदारिके ! दिष्ट्या वर्धसे । स एव णं दे हिअअवल्लहो जणो । ननु ते हृदयवल्लभो जनः । नायिका—[दृष्ट्वा सहर्षं ससाध्वसञ्च] हञ्जे ! एदं हञ्जे ! एवं पेक्खिअ अदिसाध्वसेण ण सक्कुणोमि इह एव्व आसणे प्रेक्ष्यातिसाध्वसेन न शक्नोमीहैवासने चिट्ठिदुं, कदावि एसो मं पेक्खदि । ता एहि अण्णदो स्थातुं, कदापि एष मां प्रेक्षते । तदेह्यन्यतो गच्छम्ह । (सोत्कण्ठं पदं दत्वा) हञ्जे ! वेवंति मे ऊरुओ । गच्छावः । हञ्जे ! वेपेते मे ऊरू । चेटी—(विहस्य) अइ काअरे ! इह ठिदं तुमं को पेक्खदि ? अयि कातरे ! इह स्थितां त्वां कः प्रेक्षते ? णं विसुमरिदो दे अअं रत्तासोअपादवो, ता इध एव्व ननु विस्मृतस्तेऽयं रक्ताशोकपादपः ? तदिहै- उबविसिअ चिट्ठम्ह । वोपविश्य तिष्ठावः । [तथा कुरुतः] विदूषकः—(निरूप्य) भो वअस्स ! एसा सा चन्दमणिसिला भो वयस्य ! एषा सा चन्द्रमणिशिला । नायकः—(सवाष्पं निःश्वसिति)
( ७५ ) चेटी—(देख कर) राजकुमारी ! प्रसन्नता की बात है; बधाई हो । यह तो वही आपके हृदयवल्लभ (प्राणप्रिय) हैं । नायिका- (देख कर हर्ष तथा घबराहट से साथ) सखी, इसे देखकर घबराहट के कारण मैं इस जगह नहीं ठहर सकती । कहीं यह मुझे देख ले ! तो आओ कहीं और चलती हैं। (उत्कण्ठा के साथ पैर रखकर) सखी, मेरी तो जंघाएं काँप रही हैं । चेटी- (हँसकर) अरी भीरू ! यहां ठहरी तुझे कौन देखता है ? क्या आप सचमुच भूल गईं कि यह लाल अशोक का वृक्ष है ? अतः यहीं बैठकर (इसी जगह) ठहरती हैं । [ वैसा ही करती है ] विदूषक– (अच्छी तरह देखकर) हे मित्र, यही वह चन्द्रमणिशिला है । नायिका– (आँसुओं के साथ, गहरी साँस लेता है)
( ७६ ) भट्टिदारिए ! जाणामि सिविणआलावो विअ, भर्तृदारिके ! जानामि स्वप्नालाप इव, तो अवहिदा दाव सुणाम्ह । तदवहिते तावत् शृणुवः । [उभे आकर्णयन्तः] विदूषकः— (हस्तेन चालयन्) भो वअस्स ! णं भणामि, एसा सा चंदमणिसिलेत्ति । भो वयस्य ! ननु भणामि, एषा सा चन्द्रमणिशिलेति । नायकः— (सवाष्पं निःश्वस्य) सम्यगुपलक्षितम् । (हस्तेन निर्दिश्य) शशिमणिशिला सेयं यस्यां विपाण्डुरमाननं करकिसलये कृत्वा वामे घनश्वसितोद्गमा । चिरयति मयि व्यक्ताकूता मनाक्स्फुरितैर्भ्रुवो- र्विरमितमनोमन्युर्दृष्टा मया रुदती प्रिया ॥६॥ ततस्तस्यामेव चन्द्रमणिशिलायामुपविशावः । [उभावुपविशतः] नायिका. (विचिन्त्य) का उण एसा हुविस्सदि ! का पुनरेषा भविष्यति ? चेटी- भट्टिदारिए ! जधा अम्हे ओवारिदा दाव एदं पेक्खम्ह, भर्तृदारिके ! यथावामपवारिते तावदेनं प्रेक्षावहे, श्लोक नं० ६, अन्वयः— इयं सा शशिमणिशिला यस्यां वामे करकिसलये विपाण्डुरम् आननं कृत्वा, घनश्वसितोद्गमा, मयि चिरायति भ्रुवो मनाक् स्फुरितैः व्यक्ताकूता, विरमितमनोमन्युः रुदती प्रिया मया दृष्टा ॥
( ७७ ) चेटी - राजकुमारी ! मुझे लगता है मानों कोई स्वप्न की बातचीत हो रही है । तो हम सावधान हो कर सुनें । [दोनों सुनती हैं] विदूषक- (हाथ से हिलाते हुए) अरे मित्र, मैं कहता हूँ यह है वही चन्द्रमणिशिला । नायक - (आँसुओं के साथ, गहरी साँस ले कर) ठीक देखा है । (हाथ से इशारा करके) - यह वही चन्द्रमणिशिला है जहाँ पल्लव के समान कोमल बाएँ हाथ पर (अपने) पीले मुख को रखकर गहरी आहें भरती हुई, मेरे देर करने पर भौहों के थोड़ा फड़कने से जिसके (मन) का (प्रणय कोप रूपी) अभिप्राय स्पष्ट था, परन्तु मनोगत क्रोध को रोक कर रोती हुई प्रिया को मैंने देखा था । तब तो इसी चन्द्रमणिशिला पर बैठें । (दोनों बैठते हैं) नायिका - (सोचकर) यह कौन होगी ? चेटी - राजकुमारी, जैसे हम छिप कर उसे देख रही हैं, कहीं तू ही इस
- सति सप्तमी ।
- आकूत = भाव, अभिप्राय ।
- मनाक् = थोड़ा, धीरे से
( ७८ ) मा णाम तुमम्पि एव्वं दिट्ठा । मा नाम त्वमप्येवं दृष्टा । नायिका — जुज्जइ एदं । किं उण पणअकुविदं पिअअणं युज्यते एतत् । किं पुनः प्रणयकुपितं प्रियजनं हिअए करित्र मंतयदि । हृदये कृत्वा मन्त्रयति । चेटी — भद्दिदारिए ! मा ईरिसिं सङ्क करेहि । पुणोवि भर्तृदारिके ! मा ईदृशां शङ्कां कुरुष्व । पुनरपि दाव सुणाह । तावच्छृणुवः । विदूषकः — (आत्मगतम्) अभिरमदि एसो एदाए कधाए, भोदु एदं जेव्व वड्ढाइस्सं । अभिरमते एष एतया कथया, भवतु एतामेव वर्धयिष्यामि । (प्रकाशम्) भो वअस्स ! तदा सा तुए रुदती किं भणिदा ? भो वयस्य ! तदा सा त्वया रुदती किं भणिता ? नायकः — वयस्य ! इदमुक्ता - निष्यन्दत इवानेन मुखचन्द्रोदयेन ते । एतद् वाष्पाम्बुना सिक्तं चन्द्रकान्तशिलातलम् ॥७॥ नायिका—(सरोषम्) चतुरिए ! अत्थि किं अदो वि अवरं सोदव्वं ? चतुरिके ! अस्ति ¹किमतोऽप्यपरं श्रोतव्यम् ?
श्लोक न० ७, अन्वयः—(तव) वाष्पाम्बुना सिक्तम् एतत् चन्द्रकान्त- शिलातलम अनेन ते मुखचन्द्रोदयेन निष्यन्दते इव ॥
( ७६ ) तरह न देखी गई हो ! नायिका — यह ठीक है । फिर यह किस प्रणय-कुपित प्रियजन को मन में रख कर इस तरह बातें कर रहे हैं ? चेटी — राजकुमारी ! ऐसी शङ्का मत करो। अच्छा तो फिर (और) सुनती हैं । विदूषक — (मन ही मन) यह इस प्रसङ्ग से प्रसन्न है । अच्छा, इसे ही (आगे) बढ़ाता हूँ । (प्रकट) हे मित्र, तब आप ने उस रोती हुई (अपनी प्रिया) को क्या कहा ? नायक — मित्र, यह कहा कि— (तुम्हारे) आंसुओं के जल से गीला हुआ हुआ यह चन्द्रमणि- शिलातल तुम्हारे मुख रूपी चन्द्रमा के उदय होने से मानों (पिघल कर) चूने लग पड़ा है । नायिका—(क्रोध से) चतुरिका ! क्या इस¹ से भी अधिक कुछ और सुनना बाकी है ?
- किम् + अतः + अपि + अपरम् ।
( ८० ) (सास्रम्) ता एहि गच्छम्ह । तदेहि, गच्छावः । चेटी-(हस्ते गृहीत्वा) भद्दिदारिए ! एव्वं मा भण, तुमं एव्व सिविणए दिट्ठा, भर्तृदारिके ! एवं मा भण, त्वमेव स्वप्ने दृष्टा, ण एदस्स अण्णस्सिं दिट्ठी अहिरमदि । नैतस्यान्यस्यां दृष्टिरभिरमति । नायका — ण मे हिअञ्जं पतिआअदि, ता कहावसाणं न मे हृदयं प्रत्येति, तत्कथावसानं जाव पडिवालेम्ह । यावत्प्रतिपालयावः¹ । नायकः- वयस्य ! जाने तामेवास्यां शिलायामालिख्य² तया चित्रगतयात्मानं विनोदयामीति । तदित एव गिरितटान्मनःशिलाशकलान्यादाय गच्छ । विदूषकः—जं भवं आणवेदि । (परिक्रम्य, गृहीत्वोपसृत्य) यद्भावानाज्ञापयति । भो वअस्स, तुए एक्को वण्णओ आणत्तो । मए उण इधः भो वयस्य, त्वयैको वर्णक आज्ञप्तः । मया ³पुनरिह सुलहा पञ्चवण्णआ आणीदा । ता आलिहदु भवं । सुलभाः पञ्चवर्णका आनीताः । तदालिखतु भवान् । [⁴उपनयति]
( ८१ ) (आँसुओं के साथ) अतः आओ चलें । चेटी — (हाथ से पकड़ कर) राजकुमारी ! ऐसा मत कहो । तुम्हीं स्वप्न में देखी गई हो । इस की दृष्टि (तुम्हें छोड़) किसी और में आसक्त नहीं है । नायिका — मेरे मन को विश्वास तो नहीं होता । (फिर भी) अच्छा इस प्रसङ्ग की समाप्ति तक प्रतीक्षा करती हूँ । नायक — मित्र ! मेरा विचार है कि उसी (प्रिया) की तस्वीर इस शिला पर बनाकर मैं उसके चित्र से ही अपने मन को बहलाऊँ । अतः इसी पर्वतपार्श्व से लाल गैरिकादि धातु के टुकड़े ले आओ । विदूषक — जैसी आपकी आज्ञा । (घूमकर, लेकर, पास आकर) हे मित्र, आप ने तो (केवल) एक ही रंग की आज्ञा दी थी, परन्तु मैं यहां आसानी से प्राप्त होने वाले पांच रंग (के पत्थर) लाया हूं । सो आप चित्र बनाएँ । [देता है ।]
- प्रतीक्षा करती हूँ ।
- आ + लिख् + ल्यप् ।
- यहां 'पुनः' का प्रयोग 'परन्तु' के अर्थ में है ।
- उप + ढौ = पास ले जाना, भेंट करना, देना ।
( ८२ ) नायकः- वयस्य ! साधु कृतम् (गृहीत्वा शिलायामलिखन् सरोमाञ्चम्)- सखे ! पश्य — ^1 अक्लिष्टविभ्रमशोभाधरस्य नयनोत्सवस्य ^2 शशिन इव । दयितामुखस्य सुखयति रेखाऽपि ^3 प्रथमदृष्टेयम् ॥ ८ ॥ [आलिखति] विदूषकः- (सकौतुकं निर्वर्ण्य) भो वयस्स ! अपच्चक्खे वि भो वयस्य ! अप्रत्यक्षेऽपि णाम रूअं लिहिअदि । अहो अच्छरिअं ! नाम रूपं लिख्यते । अहो आश्चर्यम् ! नायकः- (सस्मितम् ) वयस्य ! प्रिया सन्निहितैवेयं सङ्कल्पस्थापिता पुरः । दृष्ट्वा दृष्ट्वा लिखाम्येनां यदि तत्कोऽत्र विस्मयः ॥६॥ नायिका-(सास्रम् ) चदुरिए! जाणिदं क्खु कहावसाणं । ता एहि, चतुरिके ! ज्ञातं खलु कथावसानम् । तदेहि , मित्तावसुं पेक्खह्म । मित्रावसुं प्रेक्षावहे । श्लोक नं० ८, अन्वयः - अक्लिष्टविभ्रमशोभाधरस्य नयनोत्सवस्य शशिनः प्रथमदृष्टा (रेखा) इव दयितामुखस्य इयं रेखाऽपि (मां) सुखयति । श्लोक नं० ६, अन्वयः - सङ्कल्पस्थापिता इयं प्रिया पुरः सन्निहिता इव । यदि एनां दृष्ट्वा दृष्ट्वा लिखामि, तत् अत्र को विस्मयः ?
( ८३ ) नायक—मित्र ठीक किया है (लेकर, शिला पर चित्र खींचते हुए, रोमाञ्चित होकर) मित्र, देखो— मेघादि से अनावृत्त मुख की शोभा को धारण करने वाले तथा नेत्रों को आनन्दित करने वाले चन्द्रमा को पहिली बार देखी गई रेखा के समान, पके हुए बिम्बफल की तरह शोभायमान अधरोष्ठ वाले तथा नयनों को आनन्दित करने वाले प्रियतमा के मुख की रेखा भी (चित्र में) पहिली बार देखी गई (मुझे) सुख देती है। [ चित्र बनाता है ] विदूषक—(उत्सुकता के साथ देखकर) हे मित्र, (प्रिया का) रूप सामने न होने पर भी (उसका) (इतना पूर्ण तथा सुन्दर) चित्र बनाया जा रहा है ? आह, बड़े आश्चर्य की बात है ! नायक—(मुस्कराते हुए) मित्र, मेरे सङ्कल्पों में सामने ठहरी हुई वह प्रिया मानों समीप ही है। यदि उसे देख देख कर मैं (उसका) चित्र बना रहा हूँ तो इसमें कौनसी आश्चर्य की बात है ? नायिका—(आंसुओं के साथ) चतुरिके ! प्रसङ्ग का अन्त जान लिया। तो आओ, मित्रावसु को देखें।
- इसके दो अर्थ हैं। चन्द्रमा के साथ—चन्द्रबिम्ब के मेघादि से आच्छादित न होने के कारण शोभा धारण करने वाला। दयितामुख के साथ—पके हुए बिम्बफल के समान शोभायमान अधरोष्ठ वाले।
- तथा 3. भी दोनो तरफ लगते हैं।
( ८४ ) चेटी-(सविषादमात्मगतम्)कहं जीवदणिरवेक्खो विअ से आला वो । कथं जीवितनिरपेक्ष¹ इवास्या आलापः । (प्रकाशम् ) भट्टिदारिए ! णं गदा एव्व तहिं मणोहरिआ; ता कदावि भर्तृदारिके ! ननु गतैव तत्र मनोहरिका ; तत्कदापि भट्टा मित्तावसू इध एव्व आअच्छदि भर्ता मित्रावसुरिहैवागच्छति । [ततः प्रविशति मित्रावसुः] मित्रावसुः- आज्ञापितोऽस्मि तातेन, यथा-'वत्स मित्रावसो ! कुमारजीमूतवाहनोऽस्माभिरिहासनवासात्सुपरीक्षितः । कुतोऽस्माद्योग्यो वरः ? तदस्मै वत्सा मलयवती प्रतिपाद्यताम्²' इति । अहन्तु स्नेहपराधीनतयाऽन्य- देव किमप्यवस्थान्तरमनुभवामि । कुतः ? यद्विद्याधरराजवंशतिलकः³ प्राज्ञः सतां सम्मतो रूपेणाप्रतिमः पराक्रमधरो विद्वान् विनीतो युवा । यच्चासूनपि संत्यजेत्करुणया सत्त्वार्थमभ्युद्यत⁴- स्तेनास्मै ददतः स्वसारमतुला⁵ तुष्टिर्विषादश्च मे ॥१०॥ श्लोक न०: १० अन्वयः- अस्मै स्वसारं ददतः मे, यत् विद्याधरराजवंश तिलकः, प्राज्ञः, सतां सम्मतः रूपेण अप्रतिमः, पराक्रमधरः, विद्वान् युवा- तेन अतुला तुष्टिः ; यत् च करुणया सत्त्वार्थम् अभ्युद्यतः असून्अपि सन्त्यजेत्, (तेन) विषादश्च ॥
( ८५ ) चेटी—(दुःख के साथ, मन ही मन) इस की (यह) बात मानों जीवन से कितनी अपेक्षा-रहित (अनादर-युक्त है)¹। (प्रकट) राजकुमारी, वहां तो मनोहारिका गई है । तो शायद राजकुमारी मित्रावसु यहीं आते हों । [ मित्रावसु का प्रवेश ] मित्रावसु– पिता जी ने मुझे आज्ञा दी है कि “पुत्र, मित्रावसु, कुमार जीमूतवाहन को हमने यहां समीप रहने के कारण अच्छी तरह देख भाल लिया है । इस से बढ़कर योग्य वर कहां (मिलेगा) ? अतः इस के साथ प्यारी मलयवती का विवाह कर देन चाहिए । मैं तो स्नेह के वश में होने के कारण किसी और ही अवस्था का अनुभव कर रहा हूँ । क्योंकि— इस (जीमूतवाहन) को अपनी बहिन देते हुए मुझे इस विचार से कि यह विद्याधरों के राजवंश का आभूषण है, बुद्धिमान् , सज्जनों में सम्मानित, रूप में अद्वितीय, पराक्रमी, विद्वान् , नम्र स्वभाव वाला युवक है— अत्यन्त हर्ष हो रहा है; परन्तु दया से जीवों के उपकार के लिए उद्यत वह अपने प्राणों को भी छोड़ सकता है, इस विचार से (मुझे) दुःख भी है ।
- जीवन से अपेक्षारहित, उपेक्षायुक्त; अर्थात् जीवन की परवाह नहीं करती; अथवा जीना ही नहीं चाहती । मानों आत्महत्या करना चाहती हो ।
- दी जानी चाहिए । (विवाह में)। अर्थात् उसका विवाह कर देना चाहिए ।
- शिरोमणि, श्रेष्ठ, आभूषण । 4. उद्यत, तैयार ।
- अद्वितीय, अपूर्व, बहुत, अत्यन्त । यदि पाठ “अतुलां” हो तो वह “स्वसारं” का विशेषण होगा ।