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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( ४० ) विदूषकः — भोदि ! किं एत्थ तुम्हाणं तवोवणे ईरिसो आआरो भवति ! किमत्र युष्माकं तपोवने ईदृश आचारो¹ जेण अदिही आअदो वाआ्मत्तेण वि ण संभावीअदि । येनातिथिरागतो वाङ्मात्रेणापि न सम्भाव्यते ? चेटी — (नायिकां दृष्ट्वा, आत्मगतम्) अणुरज्जदि व्विअ एत्थ एदाए दिट्ठी । भोदु एवं दाव भणिस्सं । अनुरज्यत इवात्रैतस्या दृष्टिः । भवत्वेवं तावद्भणिष्यामि । (प्रकाशम् ) भद्दिदारिए ! जुत्तं भणादि बह्मणो । उइदो भर्तृदारिके ! युक्तं भणति ब्राह्मणः । उचितः क्खु दे अदिहिजणसक्कारो । ता किं ईरिसे महाणुभावे खलु ते ऽतिथिजनसत्कारः । तत्किमीदृशे महानुभावे पडिवत्तिमूढा चिट्ठसि ? ²प्रतिपत्तिमूढा तिष्ठसि ? अहवो चिट्ठ तुमं । अहं एव्व जधाणुरूबं करिस्सं । अथवा तिष्ठ त्वम् । अहमेव यथानुरूपं करिष्यामि । ( नायकमुद्दिश्य ) साअदं अज्जअस्स । ᵌस्वागतमार्यस्य ! आसणपडिग्गहेण अलंकरेदु अज्जो इमं पदेसं । आसनपरिग्रहेणालंकरोत्वार्य इमं प्रदेशम् । विदूषकः — भो वअस्स ! सोहणं एसा भणादि । भो वयस्य ! शोभनमेषा भणति ।

( ४१ ) विदूषक — श्रीमती जी, क्या यहां आप के तपोवन में यही रीति है कि आए हुए अतिथि का शब्दों से भी सत्कार नहीं किया जाता ? चेटी — (नायक को देखकर, अपने आप) इस की दृष्टि तो मानों इसी पर अनुरक्त है। अच्छा तो फिर ऐसे कहती हूं। (प्रकट) राजकुमारी, यह ब्राह्मण ठीक ही कहता है। अतिथि का सत्कार करना आपके लिए उचित ही है। तो फिर ऐसे महानु- भाव के विषय में आप किंकर्तव्य विमूढ़ सी क्यों खड़ी है ? अथवा तू ठहर। मैं ही यथोचित करती हूं। (नायक से) आर्य, आप का स्वागत है। आसन ग्रहण करके इस स्थान को अलंकृत कीजिये। विदूषक — मित्र ! यह ठीक कहती है।

  1. आचारः = रीति, रिवाज।
  2. प्रतिपत्तिम्मूढा = जो यह नहीं जानती कि क्या करना चाहिए। अथवा, उचित व्यवहार क्या है ?
  3. ‘स्वागतं’ के साथ प्रायः चतुर्थी आती है।

( ४२ ) ' उवविसिअ मुहुत्तअं वीसमम्ह । उपविश्य, मुहूर्तं विश्राम्यावः । नायकः — युक्तमाह भवान् । (उभावुपविशतः) नायिका— (चेटीमुद्दिश्य) अइ परिहाससीले ! मा एव्वं करेहि । जइ कदावि कोवि अयि परिहासशीले ! मैवं कुरु । यदि कदापि कोऽपि तावसो पेक्खदि तदो मं ¹अविणीदेत्ति सभाविस्सदि तापसः प्रेक्षते ततो मामविनीतेति सम्भावयिष्यति [ततः प्रविशति तापसः] तापसः — आज्ञापितोऽस्मि कुलपतिना² कौशिकेन यथा— ‘वत्स शाण्डिल्य ! पितुराज्ञया सिद्धराजमित्रावसुर्भ- विष्यद्विद्याधरचक्रवर्तिनं कुमारजीमूतवाहनमिहैव मलय- पर्वते क्वापि वर्तमानं भगिन्या मलयवत्या वरहेतोर्द्रष्टु- मद्य गतः । तञ्च प्रतीक्षमाणाया मलयवत्याः कदा- चिन्मध्यन्दिनसवनवेलातिक्रामेत् । तदेनामाहूयागच्छ’ इति । तद्यावद्गौरीगृहमेव गच्छामि । (परिक्रम्य भूमिं निरूप्य सविस्मयम् ) अये ! कस्य पुनरियं पांशुले भूप्रदेशे प्रकाशचक्रमू³चिन्हा पदपंक्तिः ? (अग्रतो जीमूतवाहनं निरूप्य ) नूनमस्यैवेयं महानुभावस्य। तथाहि—

( ४३ ) यहां बैठ कर थोड़ा आराम (ही) कर लें। नायक—तुम ने ठीक ही कहा है (दोनों बैठ जाते हैं।) नायिका—(चेटी से) अरी परिहासशील ! ऐसा मत कर। यदि कदाचित् कोई तपस्वी देख ले तो मुझे निर्लज्ज ही समझेगा। [एक तपस्वी का प्रवेश] तपस्वी—कुलपति कौशिक ने मुझे आज्ञा दी है कि “वत्स शाण्डिल्य, पिता की आज्ञा से सिद्धराज मित्रवसु विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती सम्राट् जीमूतवाहन को, जो यहीं मलय पर्वत पर ही कहीं है, अपनी बहिन मलयवती लिए वर निश्चित करने के लिए आज ही देखने गए हैं। उसकी प्रतीक्षा करते हुए मलयवती को कदाचित् दोपहर के स्नान का समय बीत जाए ; अतः उसे बुला लाओ।” इसलिए गौरी मन्दिर को ही जाता हूं। (घूमकर, पृथ्वी को देख कर, आश्चर्य के साथ) अरे, इस धूलियुक्त प्रदेश पर किस के पैरों के चिह्न हैं जिनमें चक्र स्पष्ट दिखाई दे रहा है। (आगे जीमूतवाहन को देख कर) निश्चय ही ये पदचिह्न इसी महानुभाव के हैं। क्योंकि—

  1. अविनीता = जो विनीत नहीं;, निर्लज्ज, उद्दण्ड।
  2. ‘कुलपति’ = कुलपति उस ऋषि को कहते हैं जो १०,००० छात्रों को पढ़ाता है। वही उनके भोजन तथा वस्त्र आदि का भी प्रबन्ध करता है। अथवा, ऋषि-श्रेष्ठ, ऋषि-गुरु।
  3. कहते हैं जिसके पैरों की लकीरों में चक्र का चिन्ह हो वह चक्रवर्ती बनता है।

( ११ )

उष्णीषः स्फुट एष मूर्धनि विभात्यूर्णोयमन्तर्भ्रुवो- ¹श्चक्षुस्तामरसानुकारि हरिणा वक्षःस्थलं स्पर्धते । चक्राङ्कं च यथा पदद्वयमिदं मन्ये तथा कोऽप्ययं नो विद्याधर चक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यति ॥१८॥ अथवा कृतं ² संदेहेन । व्यक्तमनेनैव जीमूतवाहनेन भवितव्यम् । (मलयवतीं निरूप्य) अये ! इयमपि राजपुत्री (उभौ विलोक्य) चिरात्खलु युक्तकारी विधिः स्याद्यदि युगलमिदमन्योऽन्यानुरूपं घटयेत् । (उपसृत्य, नायकमृद्दिय) स्वस्ति भवते ! नायकः— भगवन् ! जीमूतवाहनोऽभिवादयते । (उत्थातुमिच्छति) तापसः — अलमल मभ्युत्थानेन । ननु “³ सर्वस्याभ्यागतो गुरुः” इति भवानेवास्माकं पूज्यः । तद्यथासुखं स्थीयताम् । नायिका—अज्ज पणाममि । आर्य प्रणमामि ।


श्लोक नं० १८, अन्वयः — मूर्धनि एष उष्णीषः स्फुटः । अन्तर्भ्रुवोः इयम् ऊर्णा विभाति । तामरसानुकारि चक्षुः । वक्षःस्थलं हरिणा स्पर्धते । यथा च इदं पदद्वयं चक्राङ्कम् , तथा मन्ये अयं कोऽपि विद्याधरचक्रवर्तिपदवीमप्राप्य नो विश्राम्यति ॥

मस्तक पर यह उष्णीष (मुकुट) का सा चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहा है। भौंहों के बीच ऊर्णा (भौरी) का सा चिह्न शोभायमान है। लाल कमल के समान इस के नेत्र हैं। छाती शेर का मुकाबला करती है। और क्योंकि इस के दोनों पैरों में चक्र का चिह्न है। इससे मेरा विचार है कि यह—जो भी कोई यह है— विद्याधरों के चक्रवर्ती पद को प्राप्त किए बिना आराम नहीं करेगा ॥ अथवा, सन्देह से क्या ? स्पष्ट ही यह जीमूतवाहन ही होगा । (मलयवती को देखकर) अरे, यह राजकुमारी भी (यहाँ) ? [दोनों को देख कर] यदि विधाता एक दूसरे के योग्य इस जोड़ी को मिला दे तो (समझो कि) बड़ी देर बाद उसने कोई ठीक- काम किया है। (पास जाकर, नायक से) आप का कल्याण हो । नायक — भगवन् मैं जीमूतवाहन आपको प्रणाम करता हूँ। (उठना चाहता है) । तापस — नहीं नहीं, उठिए मत । “अतिथि सब का पूज्य होता है”, इसलिए आप ही हमारे पूजनीय हैं। अतः सुखपूर्वक बैठे रहिए । नायिका — आर्य ! मैं प्रणाम करती हूँ । १. लाल कमल । २. कृतं के साथ तृतीया आती है । ३. पूरा श्लोक इस प्रकार है:— गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥ पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु.॥

( ४६ ) तापसः— (नायिकां निर्दिश्य) वत्से ! अनुरूपभर्तृगामिनी भूयाः । राजपुत्रि ! त्वामाह कुलपतिः कौशिक : यथा- “अतिक्रामति मध्यन्दिनसवनवेला तत्त्वरितमागम्य- तामिति । नायिका— जं गुरुजणो आणवेदि । (आत्मगतम्) यद्गुरुजन आज्ञापयति । एक्कत्तो गुरुवअणं अण्णत्तो दइअदंसणसुहं त्ति । एकतो गुरुवचनमन्यतो दयितदर्शनसुखमिति । गमणागमणविमूढं अज्जवि दोला एदि मे हिअअम् । १६ ।। गमनागमनविमूढमद्यापि दोलायते¹ मे हृदयम् ॥ ( उत्थाय निःश्वस्य सलज्जं सानुरागं च नायकं पश्यन्ती तापससहिता निष्क्रान्ता ) नायकः— (सोत्कण्ठं निःश्वस्य नायिकां पश्यन्) अनया जघनाभोगभरमन्थरयानया । अन्यतोऽपि व्रजन्त्या मे हृदये निहितं पदम् ॥२०॥ विदूषकः—भो दिट्ठं जं पेक्खिदव्वं । ता दाणिं मज्झण्हसूर- भो दृष्टं यत्प्रेक्षितव्यम् । तदिदानीं मध्याह्नसूर्य- सन्दाव दिउणिदो विअ मे जठरग्गी धमधमाअदि संतापद्विगुणित इव मे जठराग्निर्धमधमायते² । श्लोक न० : १६, अन्वयः— एकतः गुरुवचनम्, अन्यतो दयितदर्शन- सुखम्, इति गमनागमनविमूढं मे हृदयम् अद्यापि दोलायते ॥ श्लोक न०: २०, अन्वयः—जघनाभोगभरमन्थरयानया अनया अन्यतोऽपि व्रजन्त्या मे हृदये पदं निहितम् ॥

( ४७ ) तापस— (नायिका से) बच्ची, (ईश्वर करे) तू योग्य पति को प्राप्त करे । राजपुत्रि, कुलपति कौशिक ने तुम्हें कहा है कि 'दोपहर के स्नान पूजा का समय बीता जा रहा है, अतः शीघ्र आ जाओ' । नायिका— जैसी गुरुजनों की आज्ञा । (मन में) — एक ओर गुरु जी की आज्ञा है और दूसरी ओर प्रियतम के दर्शनों का सुख । इस प्रकार जाने अथवा न जाने के विषय में अनिश्चित मेरा मन अब भी डांवांडोल है ॥ [उठकर तथा गहरी सांस लेकर लज्जा और प्रेम से नायक को देखती हुई तपस्वी के साथ चली जाती है] नायक (उत्कण्ठापूर्वक गहरी सांस लेकर जाती हुई नायिका को देखते हुए) — विशाल नितम्बों के भार से मन्द गति वाली इस सुन्दरी ने अन्यत्र जाते हुए भी मेरे मन में पैर जमा लिया है ॥ विदूषक— अरे जो देखने योग्य वस्तु थी वह आप ने देख ली है । तो अब दोपहर के सूर्य की गर्मी से मानों दुगनी हुई मेरी पेट की अग्नि प्रज्वलित हो रही है । अतः आओ हम चलें, ताकि


  1. दोलायते = दोला इव आचरति । क्वि प्रत्यय ।
  2. धम धम का शब्द करती है । धूँ धूँ कर रही है। अर्थात् अति प्रज्वलित हो रही है ।

( ४८ ) ता एहि णिक्कमम्ह जेण वम्हणो अदिही भविअ तदेहि निष्क्रामावः येन ब्राह्मणोऽतिथिर्भूत्वा मुणिजणसक्कासादो लद्धेहिं मुनिजनसकाशाल्लब्धैः कन्दमूलफलेहि वि दाव पाणाधारणं करिस्सं । कन्दमूलफलैरपि तावत्प्राणधारणं करिष्ये । नायकः— (ऊर्ध्वमवलोक्य) अये ! मध्यमध्यास्ते नभस्तलस्य भगवान्सहस्रदीधितिः । तथाहि — 1 तापात्तत्क्षणघृष्टचन्दनरसापाण्डू कपोलौ वहन् संसिक्तैर्निजकर्णतालपवनैः संवीज्यमानाननः । संप्रत्येष विशेषसिक्तहृदयो हस्तोज्झितैः शीकरैः 2 गाढायल्लकदुःसहामिव दशां धत्ते गजानां पतिः ॥२१॥ तदेहावामपि गच्छावः । (इति निष्क्रान्तौ) [ इति प्रथमोऽङ्कः ] ────────── श्लोक न०:२१, अन्वयः - तापात् तत्क्षणघृष्टचन्दनरसापाण्डू कपोलौ वहन्, संसक्तैः निजकर्णताल पवनैः संवीज्यमानाननः, हस्तोज्झितैः शीकरैः विशेषसिक्तहृदयः, एष गजानां पतिः संप्रति गाढायल्लकदुःसहमिवदशां धत्ते ॥

( ४६ ) मैं ब्राह्मण अतिथि बनकर मुनियों के पास से प्राप्त कन्द मूल फलों से (ही) अपने प्राण धारण करूँ। नायक — (ऊपर देख कर) अरे, भगवान् सूर्य आकाश के मध्य (शिखर पर) पहुंच गए हैं। यतः— गरमी के कारण, उसी समय (गण्डस्थल से) घिसे हुए चन्दन के रस से पीले कपोलों को धारण किए हुए, अच्छी तरह से भीगे हुए अपने विशाल कानों की हवा से अपने मुख पर पंखा करता हुआ, सूंड से फेंकी गई पानी की बूंदों से छाती को भली प्रकार सींचता हुआ यह हाथियों का राजा तीव्र उत्कण्ठा से उत्पन्न विरही की (दशा के समान) असह्य दशा को धारण कर रहा है। अतः आओ, हम भी चलें। (दोनों का प्रस्थान) प्रथम अङ्क समाप्त।

  1. गण्डस्थल के साथ रगड़ने से घिसे हुए।
  2. गाढं तीव्रम्। आयल्लकम् = उत्कण्ठा। तेन दुःसहा, तामिव विरहिजनदशामिव दशाम् (अवस्थां) धत्ते (बिभर्ति, धारयति)।

द्वितीयोऽङ्कः। [ततः प्रविशति चेटी] चेटी-आणत्तम्हि भट्ठिदारिए मलयवदीए जहा- आज्ञप्तास्मि भर्तृदारिकया मलयवत्या यथा - 'हञ्जे मणोहरिए ! अज्ज चिराअदि भाअरो मे 'हञ्जे मनोहरिके ! अद्य चिरायति भ्राता मे अज्जोमित्तावसू। ता गदुअ जाणेहि दाव किं आअदो आर्यो मित्रावसुः। तद् गत्वा जानीहि तावत् किमागतो णा वेति । न वेति । (परिक्रामति) (नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) का उण एसा तुरिदतुरिदं इदो एव्व आअच्छदि ? का ¹पुनरेषा त्वरितत्वरितमित एव आगच्छति ? (निरूप्य) कहं चदुरिआ ? कथं चतुरिका ? [ततः प्रविशति चतुरिका] मनोहरिका-(उपसृत्य) हला चदुरिए ! किं णिमित्तं उण मं हला चतुरिके ! किं निमित्तं पुनर्मां परिहरित्र एव्वं तुरिदाए गच्छीअदि ? परिहृत्य एवं त्वरितया गम्यते ? चतुरिका-हला मणोहरिए ! आणत्तम्हि भट्ठिदारिए मलयवदीए- हला मनोहरिके ! आज्ञप्तास्मि भर्तृ दारिकया मलयवत्या-

दूसरा अङ्कः । [चेटी का प्रवेश] चेटी — राजकुमारी मलयवती ने मुझे आज्ञा दी है कि 'सखी, मनोहरिके ! आज मेरे भाई श्री मित्रावसु ने देर कर दी है। अतः जाकर पता लगा कि वह आ गए हैं कि नहीं। (घूमती है) (नेपथ्य की ओर देख कर) परन्तु यह कौन जल्दी जल्दी इधर ही आ रही है ? (अच्छी तरह देख कर) क्या चतुरिका है ? [चतुरिका का प्रवेश] मनोहरिका— (पास जाकर) अरी चतुरिके ! क्या कारण है कि मुझे छोड़ कर जल्दी से चली जा रही हो । चतुरिका—मनोहरिके ! राजकुमारी मलयवती ने मुझे आज्ञा दी है कि-

  1. यहां 'पुनः' 'परन्तु' के अर्थ में प्रयुक्त है । ( ५१ )

२. द्वितीय अङ्क: मलयवती-जीमूतवाहन परिणय

( ५२ ) हज्जे चतुरिए ! कुसुमावचअ—परिसमणिस्सहं मे सरीरं । हञ्जे चतुरिके ! कुसुमावचय—परिश्रमनिःसहं मे शरीरम् । सरदादवजणिदो विअ मे संदावो अधिअदरं वाधेदि । शरदातपजनित इव मे संतापो¹ऽधिकतरं बाधते । ता गच्छ तुमं, बालकदलीपत्तपरिक्खवे चंदनलदाघरए तद् गच्छ त्वं बालकद्लीपत्रपरिक्षिप्ते चन्दनलतागृहे चंदमणिसिलायलं सज्जीकरेहि 'त्ति । अणुचिट्ठिदंअ मए चन्द्रमणिशिलातलं सज्जीकुरु' इति । अनुष्ठितञ्च मया जधा आणत्तं । ता जाव गदुआ भट्टिदारिआए णिवेदेमि । यथाऽऽज्ञप्तम् । तद्यावद् गत्वा भर्तृदारिकायै निवेदयामि । मनोहरिका—जइ एवं ता लहुं गदुअ णिवेदेहि, जेण से यद्येवं तल्लघु² गत्वा निवेदय येनास्या- तहिं गदाए उवसमिदि संदावो । स्तत्र गताया उपशाम्यति संतापः । चतुरिका— (विहस्यात्मगतम् ) ण ईरिसो से संदावो जो नेदृशोऽस्याः संतापो य एव्वं उवसमिसदि । विवित्तरमणीअं चंदणलदाघरअं एवमुपशमिष्यति । विविक्तरमणीयं चन्दनलतागृहं पेक्खन्तीए अधिअदरो संदावो हुविस्सदि त्ति तक्केमि । प्रेक्षमाणाया अधिकतरः संतापो भविष्यतीति तर्कयामि ! (प्रकाशम् ) ता गच्छ तुमं । तद् गच्छ त्वम् ।

( ५३- ) ! "सखि चतुरिके ! फूलों के चुनने के परिश्रम से मेरा शरीर बहुत थक गया है। शरद् ऋतु की धूप से मानों उत्पन्न हुई गरमी मुझे बहुत कष्ट दे रही है। अतः तू जा और कोमल केले के पत्तों से ढके हुए चन्दनलतागृह में चन्द्रमणि शिला के तल को तैयार कर।" और जैसी (उनकी) आज्ञा थी मैं ने कर दिया है। तो जाकर राजकुमारी को (इसकी) सूचना देती हूँ। मनोहरिका - यदि ऐसा है तो जल्दी जाकर बता ताकि वहां जाकर उस का कष्ट शान्त हो। चतुरिका - (हंस कर, मन ही मन) उसका सन्ताप ऐसा नहीं जो इस प्रकार शान्त हो जाएगा ! मेरा तो विचार है कि एकान्त और रमणीय चन्दनलता गृह को देखने से इसका सन्ताप और भी बढ़ेगा। (प्रकट) अच्छा तू जा।

  1. गरमी, दुःख, कष्ट।
  2. लघु = जल्दी, शीघ्र !

( २४ ) अहम्पि 'सज्जीकिदं मणिसिलाअलं' त्ति गदुअ अहमपि 'सज्जीकृतं मणिशिलातलमिति गत्वा भट्टिदारिआए णिवेदेमि । (इति निष्क्रान्ते) भर्तृदारिकायै निवेदयामि । [प्रवेशकः] [ततः प्रविशति सोत्कण्ठा मलयवती चेटी च] मलयवती — (निःश्वस्यात्मगतम्) हिअअ ! तथा णाम तदा तस्सिं जणे लज्जाए मं परम्मुही- हृदय ! तथा नाम तदा तस्मिञ्जने लज्जया मां पराङ्मुखी- कदुअ दाणिं अप्पणा तहिं एव्वं गदं सि त्ति अहो ! कृत्वेदानीमात्मना तत्रैव गतमसीत्यहो ! दे अत्तंभरित्तणं । ते आत्मम्भरित्वम् । (प्रकाशम्) हञ्जे चतुरिए ! आदेसेहि मे भअवदीए आअदणस्स मग्गं । हञ्जे चतुरिके ! आदिश मे भगवत्या आयतनस्य मार्गम् । चेटी — (आत्मगतम्) चन्दणलदाघरअं पत्थिदा भणादि भअवदीए आअदणस्स मग्गं चन्दनलतागृहं प्रस्थिता भणति 'भगवत्या आयतनस्य मार्गम् । (प्रकाशम्) णं चन्दणलदाघरअं भट्टिदारिआ पत्थिदा । ननु चन्दनलतागृहं भर्तृदारिका प्रस्थिता ।

( ५५ ) मैं भी जाकर राजकुमारी को सूचना देती हूँ कि चन्द्रमणि शिलातल तैयार है। (दोनों चली जाती हैं) [प्रवेशक समाप्त] [उत्कण्ठित मलयवती और चेटी का प्रवेश] मलयवती— (गहरी सांस लेकर, मन ही मन) हे हृदय ! उस समय उस (प्रिय से) लज्जावश मुझे पराङ्मुख करके अब तू स्वयं वहीं (उसके पास) चला गया है। अहो, तेरी स्वार्थपरता ! (प्रकट) सखि चतुरिका ! भगवती (गौरी) के मन्दिर का मार्ग दिखा। चेटी —(मन ही मन) चली तो थी चन्दनलतागृह को, पर कहती है 'देवी के मन्दिर का मार्ग' । (प्रकट) राजकुमारी, आप तो चन्दनलतागृह की ओर चली थीं ।

( ५६ ) नायिका — (सलज्जम्) । हञ्जे सुट्ठु सुमराविदं, ता एहि तहिं जेव गच्छम्ह । हञ्जे ! सुष्ठु स्मारितम् । तदेहि तत्रैव गच्छावः । चेटी — एदु एदु भट्ठिदारिआ । [अग्रतो गच्छति] एतु एतु भर्तृदारिका । नायिका — (अन्यतो गच्छति) चेटी — (पृष्ठतो दृष्ट्वा सोद्वेगमात्मगतम् ) अहो ! से सुण्णहिअअत्तणं ! कहं तं ज्जेव देवी भवणं अहो ! अस्याः शून्यहृदयत्वम् ! कथं तदेव देवी भवनं पत्थिदा । (प्रकाशम्) भट्ठिदारिए ! णं इदो चंदणलदाघरअं । प्रस्थिता । भर्तृदारिके ! नन्वितश्चन्दनलतागृहम् । ता इदो एहि । तदित एहि । नायिका — (१सविलक्षस्मितं तथा करोति) चेटी — भट्ठिदारिए ! इदं चंदणलदाघरअं । ता पविसिअ भर्तृदारिके ! इदं चन्दनलतागृहम् । तत्प्रविश्य चंदमणिसिलादले उपविसिअ समस्ससदु भट्ठिदारिआ । चन्द्रमणिशिलातले उपविश्य समाश्वसितु भर्तृदारिका । [उभे उपविशतः] नायिका — (निःश्वस्य, आत्मगतम् ) भअवं कुसुमाउह ! जेण तुमं रूवसोहाए णिज्जिदोसि, भगवन् कुसुमायुध² ! येन त्वं रूपशोभया निर्जितोऽसि ,

( ५७ )

नायिका— (लज्जा के साथ) सखी, तू ने खूब याद दिलाया। तो आ वहीं चलें। चेटी — राजकुमारी जी, आइए। (आगे चलती है) नायिका — (दूसरी दिशा में जाती है) चेटी — (पीछे देख कर, दुःख के साथ, मन ही मन)—आंह, इसकी बेसुधी ! क्या उसी देवी के मन्दिर को (ही) चल पड़ी है ? (प्रकट) राजकुमारी, चन्दनलतागृह तो इधर है। अतः, इधर आइए। नायिका—(लज्जित हो कर, मुस्कराते, हुए, वैसा ही करती है) चेटी— राजकुमारी ! यह चन्दनलतागृह है। इसमें प्रवेश करके, चन्द्रमणि शिलातल पर बैठकर, शान्त होइए। (दोनों बैठ जाती हैं) नायिका — (गहरी सांस लेकर, मन ही मन) भगवान् काम देव ! जिस (जीमूतवाहन) ने आपको अपने रूप की शोभा से जीत लिया


  1. घबराहट, हैरानी अथवा लज्जा के साथ।
  2. कुसुमायुध- फूलों के शस्त्रों वाला। कामदेव के पांच बाण बताए हैं जो फूलों के हैं - अरविन्द, अशोक, चूत, नवमल्लिका और नीलोत्पल।

( २८ ) तस्स तुए ण किम्पि किदं। मम उण अणवराद्धाएवि तस्य त्वया न किमपि कृतम्। मम पुनरपराद्धाया अपि, अबलेत्ति करित्र पहरंतो कहं ण लज्जेसि ? अबलेति कृत्वा प्रहरन् कथं न लज्जसे ? (आत्मानं निर्वर्ण्य, मदनावस्थां नाटयन्ती प्रकाशम् ) हञ्जे ! कीस उण घणपल्लवणिरुद्धसूरकिरणं तं एव्व हञ्जे ! किं पुनर्धनपल्लवनिरुद्धसूर्य्यकिरणं तदेव चंदणलदाघरअं ण मे अज्जवि संदाबदुक्खं अवणोदि । चन्दनलतागृहं न मे ऽद्यापि संतापदुःखमपनयति । चेटी-- जाणामि अहं एत्थ संदावस्स कारणं, किं जानम्यहमत्र संतापस्य कारणम्; किं उणअसंभावणीअं ति भट्टिदारिआ ण तं पडिवज्जिस्सदि । पुनरसम्भावनीयमिति भर्तृदारिका न ¹तत्प्रतिपत्स्यते । नायिका- (आत्मगतम् ) लखिअदा विअ अहं एदाए, तह वि पुच्छिस्सं। (प्रकाशम्) लक्षितेवाहमेतया, तथापि पृच्छामि । हञ्जे ! किं तं जं ण पडिवज्जिअदि । ता कहेहि दाव किं हञ्जे ! किं तद्यन्न प्रतिपद्यते । तत्कथय तावत्किं तं कारणं । तत्कारणम् । चेटी- एसो दे हिअअट्ठिदो वरो । एष ते हृदयस्थितो वरः ।

( ५६ ) है, उसका तो आप ने कुछ भी नहीं बिगाड़ा। परन्तु मुझ निरपराध पर अबला जानकर प्रहार करते हुए क्या आप को शर्म नहीं आती ? (अपने आप को देखकर, काम अवस्था का अभिनय करती हुई; प्रकट) सखी, घने पत्तों से सूर्य की किरणों को रोकने वाला (यह) वही चन्दनलतागृह आज मेरे गरमी के क्लेश को दूर क्यों नहीं करता ? चेटी- मैं इस सन्ताप का कारण जानती हूँ । परन्तु राजकुमारी आप तो उसे असम्भव कह कर विश्वास नहीं करेंगी । नायिका- (मन ही मन) इसने मुझे भांप ही लिया है । फिर भी पूछती हूँ। (प्रकट) सखी, वह क्या है जिसे मैं स्वीकार नहीं करूंगी ?¹ तो कह वह क्या कारण है ? चेटी- यह आप के हृदय में स्थित वर !

  1. मानना, स्वीकार करना ।