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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७१

श्रीमार्कण्डेय उवाच | श्रीमार्कण्डेयजी बोले—मनुष्यको चाहिये कि वह अष्टाक्षरेण देवेशं नरसिंहमनामयम्। | अष्टाक्षर मन्त्रसे निरामय देवेश्वर भगवान् नरसिंहका गन्धपुष्पादिभिर्नित्यमर्चयेदच्युतं नरः॥ ३ | गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंद्वारा प्रतिदिन पूजन करे। राजन्! राजन्नष्टाक्षरो मन्त्रः सर्वपापहरः परः। | यह अष्टाक्षर मन्त्र समस्त पापोंको हर लेनेवाला, समस्त समस्तयज्ञफलदः सर्वशान्तिकरः शुभः॥ ४ | यज्ञोंका फल देनेवाला, सब प्रकारकी शान्ति प्रदान ॐ नमो नारायणाय। | करनेवाला एवं परम शुभ है। मन्त्र यों है—'ॐ नमो गन्धपुष्पादिसकलमनेनैव निवेदयेत्। | नारायणाय।' इसी मन्त्रसे गन्ध आदि समस्त सामग्रियोंको अनेनाभ्यर्चितो देवः प्रीतो भवति तत्क्षणात्॥ ५ | अर्पित करे। इस मन्त्रसे पूजा करनेपर भगवान् विष्णु किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तस्य बहुभिर्व्रतैः। | तत्काल प्रसन्न होते हैं। मनुष्यके लिये अन्य बहुत-से ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः॥ ६ | मन्त्रों और व्रतोंकी क्या आवश्यकता है। केवल 'ॐ इमं मन्त्रं जपेद्यस्तु शुचिर्भूत्वा समाहितः। | नमो नारायणाय'—यह मन्त्र ही समस्त मनोरथोंको सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्॥ ७ | सिद्ध करनेवाला है। जो स्नानादिसे पवित्र होकर एकाग्रचित्तसे सर्वतीर्थफलं ह्येतत् सर्वतीर्थवरं नृप। | इस मन्त्रका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो हरेरर्चनमव्यग्रं सर्वयज्ञफलं नृप॥ ८ | भगवान् विष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता है॥ ३-७॥ तस्मात्कुरु नृपश्रेष्ठ प्रतिमादिषु चार्चनम्। | नरेश्वर! शान्तभावसे भगवान् विष्णुका पूजन करना दानानि विप्रमुख्येभ्यः प्रयच्छ विधिना नृप। | ही सब तीर्थों और यज्ञोंका फल है तथा सम्पूर्ण तीर्थोंसे एवं कृते नृपश्रेष्ठ नरसिंहप्रसादतः। | बढ़कर पवित्र है। अतः नरेश्वर! तुम प्रतिमा आदिमें प्राप्नोति वैष्णवं तेजो यत्काङ्क्षन्ति मुमुक्षवः॥ ९ | विधिपूर्वक भगवान्‌का पूजन करो और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको पुरा पुरंदरो राजन् स्त्रीत्वं प्राप्तोऽपधर्मतः। | दान दो। नृपश्रेष्ठ! यों करनेसे भक्त पुरुष उस तेजोमय तृणबिन्दुमुनेः शापान्मुक्तो ह्यष्टाक्षराज्जपात्॥ १० | वैष्णवधामको प्राप्त होते हैं, जिसकी मुमुक्षुलोग सदा सहस्रानीक उवाच | अभिलाषा किया करते हैं। राजन्! पूर्वकालमें इन्द्र एतत्कथय भूदेव देवेन्द्रस्याघमोचनम्। | धर्मके विपरीत आचरण करके तृणबिन्दु मुनिके शापसे कोऽपधर्मः कथं स्त्रीत्वं प्राप्तो मे वद कारणम्॥ ११ | स्त्री-योनिको प्राप्त हो गये थे; परंतु इस अष्टाक्षर श्रीमार्कण्डेय उवाच | मन्त्रका जप करनेसे वे पुनः उस योनिसे मुक्त हो राजेन्द्र महदाख्यानं शृणु कौतूहलान्वितम्। | गये॥ ८-१०॥ विष्णुभक्तिप्रजननं शृण्वतां पठतामिदम्॥ १२ | सहस्रानीक बोले—भूमिदेव! देवराज इन्द्रको जो पुरा पुरंदरस्यैव देवराज्यं प्रकुर्वतः। | पाप एवं शापसे छुटकारा मिला, उस प्रसङ्गका वर्णन वैराग्यस्यापि जननं सम्भूतं बाह्यवस्तुषु॥ १३ | कीजिये। उन्होंने कौन-सा अधर्म किया था और किस इन्द्रस्तदाभूद्विषमस्वभावो | कारण स्त्रीयोनिको प्राप्त हुए—वह सब भी बताइये॥ ११॥ राज्येषु भोगेष्वपि सोऽप्यचिन्तयत्। | श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—राजेन्द्र! सुनो, यह ध्रुवं विरागीकृतमानसानां | उपाख्यान बहुत बड़ा तथा कौतूहलसे भरा हुआ है। जो स्वर्गस्य राज्यं न च किंचिदेव॥ १४ | लोग इसे सुनते और पढ़ते हैं उनके हृदयमें यह | आख्यान विष्णुभक्ति उत्पन्न करता है॥ १२॥ | पूर्वकालकी बात है, एक समय देवलोकका राज्य | भोगते हुए इन्द्रके लिये उनका वह राज्य ही बाह्य वस्तुओंमें | वैराग्यका कारण बन गया। उस समय इन्द्रका स्वभाव | राज्य-कार्यों और भोगोंके प्रति विषम (वैराग्यपूर्ण) हो | गया। वे सोचने लगे—'यह निश्चित है कि विरक्त हृदयवाले

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२७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

२७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ राज्यस्य सारं विषयेषु भोगो | पुरुषोंकी दृष्टिमें स्वर्गका राज्य कुछ भी महत्त्व नहीं भोगस्य चान्ते न च किंचिदस्ति। | रखता। राज्यका सार है—विषयोंका भोग तथा भोगके विमृश्य चैतन्मुनयोऽप्यजस्रं | अन्तमें कुछ भी नहीं रह जाता। यही सोचकर मुनिगण मोक्षाधिकारं परिचिन्तयन्ति ॥ १५ | सदा ही मोक्षाधिकारके विषयमें ही विचार करते हैं। सदैव भोगाय तपःप्रवृत्ति- | लोगोंकी सदा भोगके लिये ही तपमें प्रवृत्ति हुआ करती र्भोगावसाने हि तपो विनष्टम्। | है और भोगके अन्तमें तप नष्ट हो जाता है। परंतु जो मैत्र्यादिसंयोगपराङ्मुखानां | लोग मैत्री आदिके द्वारा विषय-सम्पर्कसे विमुख हो गये विमुक्तिभाजां न तपो न भोगः ॥ १६ | हैं, उन मोक्षभागी पुरुषोंको न तपकी आवश्यकता होती विमृश्य चैतत् स सुराधिनाथो | है न योगकी।' इन सब बातोंका विचार करके देवराज विमानमारुह्य सकिङ्किणीकम्। | इन्द्र क्षुद्रघण्टिकाओंकी ध्वनिसे युक्त विमानपर आरूढ़ नूनं हराराधनकारणेन | हो भगवान् शंकरकी आराधनाके लिये कैलासपर्वतपर कैलासमभ्येति विमुक्तिकामः ॥ १७ | चले आये। उस समय उनके मनमें एकमात्र मोक्षकी स एकदा मानसमागतः सन् | कामना रह गयी थी ॥ १३—१७ ॥ संवीक्ष्य तां यक्षपतेश्च कान्ताम्। | कैलासपर रहते समय इन्द्र एक दिन घूमते हुए समर्चयन्तीं गिरिजांघ्रियुग्मं | मानससरोवरके तटपर आये। वहाँ उन्होंने पार्वतीजीके ध्वजामिवानङ्गमहारथस्य ॥ १८ | युगलचरणारविन्दोंका पूजन करती हुई यक्षराज कुबेरकी प्रधानजाम्बूनदशुद्धवर्णां | प्राणवल्लभा चित्रसेनाको देखा। जो कामदेवके महान् कर्णान्तसंलग्नमनोज्ञनेत्राम् । | रथकी ध्वजा-सी जान पड़ती थी। उत्तम 'जाम्बूनद' सुसूक्ष्मवस्त्रान्तरदृश्यगात्रां | नामक सुवर्णके समान उसके अङ्गोंकी दिव्य कान्ति नीहारमध्यादिव चन्द्ररेखाम् ॥ १९ | थी। आँखें बड़ी-बड़ी और मनोहर थीं, जो कानके तां वीक्ष्य वीक्षणसहस्रभरेण कामं | पासतक पहुँच गयी थीं। महीन साड़ीके भीतरसे उसके कामाङ्गमोहितमतिर्न ययौ तदानीम्। | मनोहर अङ्ग इस प्रकार झलक रहे थे, मानो कुहासेके दूराध्वगं स्वगृहमेत्य सुसंचितार्थ- | भीतरसे चन्द्रलेखा दृष्टिगोचर हो रही हो। अपने हजार स्तस्थौ तदा सुरपतिर्विषयाभिलाषी ॥ २० | नेत्रोंसे उस देवीको इच्छानुसार निहारते ही इन्द्रका हृदय पूर्वं वरं स्यात् सुकुलेऽपि जन्म | कामसे मोहित हो गया। उस समय वे दूरके रास्तेपर ततो हि सर्वाङ्गशरीररूपम्। | स्थित अपने आश्रमपर नहीं गये और सम्पूर्ण मनोरथोंको ततो धनं दुर्लभमेव पश्चा- | मनमें लिये देवराज इन्द्र विषयाभिलाषी हो खड़े हो द्धनाधिपत्यं सुकृतेन लभ्यम् ॥ २१ | गये। वे सोचने लगे—'पहले तो उत्तम कुलमें जन्म पा स्वर्गाधिपत्यं च मया प्रलब्धं | जाना ही बहुत बड़ी बात है, उसके बाद सर्वाङ्ग-सौन्दर्य तथापि भोगाय न चास्ति भाग्यम्। | और उसपर भी धन तो सर्वथा ही दुर्लभ है। इन सबके यः स्वं परित्यज्य विमुक्तिकाम- | बाद धनाधिप (कुबेर) होना तो पुण्यसे ही सम्भव है। स्तिष्ठामि मे दुर्मतिरस्ति चित्ते ॥ २२ | मैंने इन सबसे बड़े स्वर्गके आधिपत्यको प्राप्त किया | है, फिर भी मेरे भाग्यमें भोग भोगना नहीं बदा है। | मेरे चित्तमें ऐसी दुर्बुद्धि आ गयी है कि मैं स्वर्गका | सुखभोग छोड़कर यहाँ मुक्तिकी इच्छासे आ पड़ा हूँ। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७३ मोक्षोऽमुना यद्यपि मोहनीयो मोक्षेऽपि किं कारणमस्ति राज्ये। क्षेत्रं सुपक्वं परिहृत्य द्वारे किं नाम चारण्यकृषिं करोति ॥ २३ संसारदुःखोपहता नरा ये कर्तुं समर्था न च किंचिदेव। अकर्मिणो भाग्यविवर्जिताश्च वाञ्छन्ति ते मोक्षपथं विमूढाः ॥ २४ एतद्विमृश्य बहुधा मतिमान् प्रवीरो रूपेण मोहितमना धनदाङ्गनायाः। सर्वाधिराकुलमतिः परिमुक्तधैर्यः सस्मार मारममराधिपचक्रवर्ती ॥ २५ समागतोऽसौ परिमन्दमन्दं कामोऽतिकामाकुलचित्तवृत्तिः । पुरा महेशेन कृताङ्गनाशो धैर्याल्लयं गच्छति को विशङ्कः ॥ २६ आदिश्यतां नाथ यदस्ति कार्यं को नाम ते सम्प्रति शत्रुभूतः। शीघ्रं समादेशय मा विलम्बं तस्यापदं सम्प्रति भो दिशामि ॥ २७ श्रुत्वा तदा तस्य वचोऽभिरामं मनोगतं तत्परमं तुतोष। निष्पन्नमर्थं सहसैव मत्वा जगाद वाक्यं स विहस्य वीरः ॥ २८ रुद्रोऽपि येनार्धशरीरमात्र- श्चक्रेऽप्यनङ्गत्वमुपागतेन । सोढुं समर्थोऽथ परोऽपि लोके को नाम ते मार शराभिघातम् ॥ २९ एकाग्रचित्ता गिरिजार्चनेऽपि या मोहयत्येव ममात्र चित्तम्। एतामनङ्गायतलोचनाख्यां मदङ्गसङ्गैकरसां विधेहि ॥ ३० स एवमुक्तः सुरवल्लभेन स्वकार्यभावाधिकगौरवेण । संधाय बाणं कुसुमायुधोऽपि सस्मार मारः परिमोहनं सुधीः ॥ ३१ मोक्ष-सुख तो इस राज्य-भोगद्वारा मोह लिया जा सकता है, परंतु क्या मोक्ष भी राज्य-प्राप्तिका कारण हो सकता है? भला, अपने द्वारपर पके अन्नसे युक्त खेतको छोड़कर कोई जंगलमें खेती करने क्यों जायगा? जो सांसारिक दुःखसे मारे-मारे फिरते हैं और कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं रखते, वे ही अकर्मण्य, भाग्यहीन एवं मूढजन मोक्षमार्गकी इच्छा करते हैं' ॥ १८-२४॥ इन सब बातोंपर बारंबार विचार करके देवेश्वरोंके चक्रवर्ती सम्राट् बुद्धिमान् वीरवर इन्द्र कुबेरपत्नी चित्रसेनाके रूपपर मोहित हो गये। समस्त मानसिक वेदनाओंसे व्याकुल हो, धैर्य खोकर वे कामदेवका स्मरण करने लगे। इन्द्रके स्मरण करनेपर अत्यन्त कामनाओंसे व्याप्त चित्तवृत्तिवाला कामदेव बहुत धीरे- धीरे डरता हुआ वहाँ आया; क्योंकि वहीं पूर्वकालमें शंकरजीने उसके शरीरको जलाकर भस्म कर दिया था। क्यों न हो, प्राणसंकटके स्थानपर धीरतापूर्वक और निर्भय होकर कौन जा सकता है? कामदेवने आकर कहा-'नाथ! मुझसे जो कार्य लेना हो, आज्ञा कीजिये; बताइये तो सही, इस समय कौन आपका शत्रु बना हुआ है? शीघ्र बताइये, विलम्ब न कीजिये; मैं अभी उसे आपत्तिमें डालता हूँ' ॥ २५-२७॥ उस समय कामदेवके उस मनोभिराम वचनको सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करके इन्द्र बहुत संतुष्ट हुए। अपने मनोरथको सहसा सिद्ध होते जान वीरवर इन्द्रने हँसकर कहा-'कामदेव ! अनङ्ग बन जानेपर भी तुमने जब शंकरजीको भी आधे शरीरका बना दिया, तब संसारमें दूसरा कौन तुम्हारे उस शराघातको सह सकता है? अनङ्ग! जो गिरिजापूजनमें एकाग्रचित्त होनेपर भी मेरे मनको निश्चय ही मोहे लेती है, उस विशाल नयनोंवाली सुन्दरीको तुम एकमात्र मेरे अङ्ग-सङ्गकी सरस भावनासे युक्त कर दो' ॥ २८-३०॥ अपने कार्यको अधिक महत्त्व देनेवाले सुरराज इन्द्रके यों कहनेपर उत्तम बुद्धिवाले कामदेवने भी अपने पुष्पमय धनुषपर बाण रखकर मोहन-मन्त्रका स्मरण किया।

२७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

२७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ सम्मोहिता पुष्पशरेण बाला तब कामदेवद्वारा पुष्पबाणसे मोहित की हुई वह बाला कामेन कामं मदविह्वलाङ्गी। अपने सम्पूर्ण अङ्गमें मदके उद्रेकसे विह्वल हो गयी विहाय पूजां हसते सुरेशं और पूजा छोड़ इन्द्रकी ओर देखकर मुस्काने लगी। कः कामकोदण्डरवं सहेत॥ ३२ भला, कामदेवके धनुषकी टंकार कौन सह सकता विलोलनेत्रे अयि कासि बाले है॥ ३१-३२॥ सुराधिपो वाक्यमिदं जगाद। इन्द्र उसको अपनी ओर निहारते देखकर यह वचन सम्मोहयन्तीव मनांसि पुंसां बोले—'चञ्चल नेत्रोंवाली बाले! तुम कौन हो, जो पुरुषोंके कस्येह कान्ता वद पुण्यभाजः॥ ३३ मनको इस प्रकार मोहे लेती हो? बताओ तो, तुम किस उक्तापि बाला मदविह्वलाङ्गी पुण्यात्माकी पत्नी हो?' इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर उसके रोमाञ्चसंस्वेदसकम्पगात्रा । अङ्ग मदसे विह्वल हो उठे। शरीरमें रोमाञ्च, स्वेद और कृताकुला कामशिलीमुखेन कम्प होने लगे। वह कामबाणसे व्याकुल हो गद्गद- सगद्गदं वाक्यमुवाच मन्दम्॥ ३४ कण्ठसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोली—'नाथ! मैं धनाधिप कान्ता धनेशस्य च यक्षकन्या कुबेरकी पत्नी एक यक्षकन्या हूँ। पार्वतीजीके चरणोंकी प्राप्ता च गौरीचरणार्चनाय। पूजा करनेके लिये यहाँ आयी थी। आप अपना कार्य प्रब्रूहि कार्यं च तवास्ति नाथ बताइये; आप कौन हैं? जो साक्षात् कामदेवके समान रूप कस्त्वं वदेतिष्ठसि कामरूपः॥ ३५ धारण किये यहाँ खड़े हैं?'॥ ३३—३५॥ इन्द्र उवाच इन्द्र बोले—प्रिये! मैं स्वर्गका राजा इन्द्र हूँ। तुम मेरे सा त्वं समागच्छ भजस्व मां चिरा- पास आओ और मुझे अपनाओ तथा चिरकालतक मेरे न्मदङ्गसङ्गोत्सुकतां व्रजाशु। अङ्ग-सङ्गके लिये शीघ्र ही उत्सुकता धारण करो। देखो, त्वया विना जीवितमप्यनल्पं तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन और स्वर्गका विशाल राज्य स्वर्गस्य राज्यं मम निष्फलं स्यात्॥ ३६ भी व्यर्थ हो जायगा॥ ३६॥ उक्ता च सैवं मधुरं च तेन इन्द्रने मधुर वाणीमें जब इस प्रकार कहा, तब उसका कंदर्पसंतापितचारुदेहा । सुन्दर शरीर कामवेदनासे पीडित होने लगा और वह विमानमारुह्य चलत्पताकं फहराती हुई पताकाओंसे सुशोभित विमानपर आरूढ हो सुरेशकण्ठग्रहणं चकार॥ ३७ देवराजके कण्ठसे लग गयी। तब स्वर्गके राजा इन्द्र शीघ्र जगाम शीघ्रं स हि नाकनाथः ही उसके साथ मन्दराचलकी उन कन्दराओंमें चले गये, साकं तया मन्दरकन्दरासु। जहाँका मार्ग देवता और असुर—दोनोंकी ही दृष्टिमें नहीं अदृष्टदेवासुरसंचरासु आया था और जो विचित्र रत्नोंकी प्रभासे प्रकाशित थीं। विचित्ररत्नाङ्कुरभासुरासु ॥ ३८ आश्चर्य है कि देवताओंके राज्यके प्रति आदर न रखते रेमे तया साकमुदारवीर्य- हुए भी वे उदारपराक्रमी इन्द्र उस सुन्दरी यक्ष-बालाके श्चित्रं सुरैश्वर्यगतादरोऽपि। साथ वहाँ रमण करने लगे तथा कामके वशीभूत हो परम स्वयं च यस्या लघुपुष्पशय्यां चतुर इन्द्रने अपने हाथों चित्रसेनाके लिये शीघ्रतापूर्वक चकार चातुर्यनिधिः सकामः॥ ३९ छोटी-सी पुष्पशय्या तैयार की। कामोपभोगमें परम चतुर जातः कृतार्थोऽमरवृन्दनाथः देवराज इन्द्र चित्रसेनाके समागमसे कृतार्थताका अनुभव सकामभोगेषु सदा विदग्धः। करने लगे। स्नेहरससे अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाला वह मोक्षाधिकं स्नेहरसातिमृष्टं परस्त्रीके आलिङ्गन और समागमका सुख उन्हें मोक्षसे भी पराङ्गनालिङ्गनसङ्गसौख्यम् ॥ ४० बढ़कर जान पड़ा॥ ३७—४०॥ 1113 Narsingpuran_Section_11_1_Back In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७५


अथागता यक्षपतेः समीपं | इधर, इन्द्र जब चित्रसेनाको लेकर मन्दराचलपर चले नार्योऽनुवव्र्ज्यैव च चित्रसेनाम्। | आये, तब उसकी सङ्गिनी स्त्रियाँ उसे साथ लिये बिना ससम्भ्रमाः सम्भ्रमखिन्नगात्राः | ही यक्षराज कुबेरके समीप वेगपूर्वक आयीं। वे दुस्साहससे सगद्गदं प्रोचुरसाहसज्ञाः ॥ ४१ | अनभिज्ञ थीं, अतः घबराहटके कारण उनके सारे शरीरमें नूनं समाकर्णय यक्षनाथ | व्यथा हो रही थी। वे गद्गद कण्ठसे बोलीं—‘यक्षपते! विमानमारोप्य जगाम कश्चित्। | निश्चय ही आप हमारी यह बात सुनें—आपकी भार्या संवीक्षमाणः ककुभोऽपि कान्तां | चित्रसेनाको किसी अज्ञात पुरुषने पकड़कर विमानपर विगृह्य वेगादिह सोऽपि तस्करः ॥ ४२ | बिठा लिया और चारों ओर सशङ्कदृष्टिसे देखता हुआ वह वचो निशम्याथ धनाधिनाथो | चोर बड़े वेगसे कहीं चला गया है' ॥ ४१-४२ ॥ विषोपमं जातमषीनिभाननः। | विषके समान दुस्सह प्रतीत होनेवाली इस बातको जगाद भूयो न च किंचिदेव | सुननेसे धनाधिप कुबेरका मुँह काला पड़ गया। वे बभूव वै वृक्ष इवाग्निदग्धः ॥ ४३ | अग्निसे जले हुए वृक्षके समान हो गये। उस समय विज्ञापितार्थो वरकन्यकाभि- | उनके मुखसे कोई बात नहीं निकली। इसी समय र्यश्चित्रसेनासहचारिणीभिः । | चित्रसेनाकी सहचरी श्रेष्ठ यक्ष-कन्याओंसे यह समाचार मोहापनोदाय मतिं दधानः | जानकर कुबेरका मन्त्री कण्ठकुब्ज भी अपने स्वामीका स कण्ठकुब्जोऽपि समाजगाम ॥ ४४ | मोह दूर करनेके विचारसे वहाँ आया। उसका आगमन श्रुत्वाऽऽगतं वीक्ष्य स राजराज | सुन राजराज कुबेरने आँखें खोलकर उसकी ओर देखा उन्मीलिताक्षो वचनं जगाद। | और लंबी साँस खींचते हुए अपने चित्तको यथासम्भव विनिःश्वसन् गाढसकम्पगात्रः | शीघ्र सँभालकर वे दीनभावसे बोले। उस समय उनका स्वस्थं मनोऽप्याशु विधाय दीनः ॥ ४५ | शरीर अत्यन्त कम्पित हो रहा था ॥ ४३-४५ ॥ तद्यौवनं यद्युवतीविनोदो | वे कहने लगे—'वही यौवन सफल है, जिससे धनं तु चैतत्स्वजनोपयोगि। | युवतीका मनोरञ्जन हो सके; धन भी वही सार्थक है, तज्जीवितं यत्क्रियते सुधर्म- | जो आत्मीय जनोंके उपयोगमें आ सके। जीवन वह स्तदाधिपत्यं यदि नष्टविग्रहम् ॥ ४६ | सफल है, जिससे सद्धर्म किया जाय और प्रभुत्व वही धिङ्मे धनं जीवितमत्यनल्पं | सार्थक है, जिसमें युद्ध और कलहके मूल नष्ट हो गये राज्यं बृहतसम्प्रति गुह्यकानाम्। | हों। इस समय मेरे इस विपुल धनको, गुह्यकोंके इस विशामि चाग्निं न च वेद कश्चित् | विशाल राज्यको और मेरे इस जीवनको भी धिक्कार पराभवोऽस्तीति च को मृतानाम् ॥ ४७ | है! अभीतक मेरे इस अपमानको कोई नहीं जानता; पार्श्वे स्थितस्यापि च जीवतो मे | अतः इसी समय अग्निमें जल मरूँगा। पीछे यदि इस गता तडागं गिरिजार्चनाय। | समाचारको लोग जान भी लें तो क्या? मृत पुरुषोंका हृता च केनापि वयं न विद्मो | क्या अपमान होगा? हा! वह मानसरोवरके तटपर ध्रुवं न तस्यास्ति भयं च मृत्योः ॥ ४८ | गिरिजा-पूजनके लिये गयी थी। यहाँ निकट ही था और जगाद वाक्यं स च कण्ठकुब्जो | जीवित भी रहा; तो भी किसीने उसे हर लिया। हम मोहापनोदाय विभोः स मन्त्री। | नहीं जानते वह कौन है। मैं समझता हूँ, अवश्य ही उस आकर्ण्यतां नाथ न चास्ति योग्यः | दुष्टको मृत्युका भय नहीं है' ॥ ४६-४८ ॥ कान्तावियोगे निजदेहघातः ॥ ४९ | स्वामीकी यह बात सुनकर उनका मोह दूर | करनेके लिये कुबेरके उस मन्त्री कण्ठकुब्जने | यह वचन कहा—'नाथ! सुनिये, स्त्रीके वियोगमें | शरीर-त्याग करना आपके लिये उचित नहीं है।


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२७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

२७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

एका पुरा रामवधूर्हता च निशाचरेणापि मृतो न सोऽपि। अनेकशः सन्ति तवात्र नार्यः को नाम चित्ते क्रियते विषादः॥ ५० विमुच्य शोकं कुरु विक्रमे मतिं धैर्यं समालम्ब्य यक्षराज। भृशं न जल्पन्ति रुदन्ति साधवः पराभवं बाह्यकृतं सहन्ते॥ ५१ कृतं हि कार्यं गुरु दर्शयन्ति सहायवान् वित्तप कातरोऽसि किम्। सहायकार्यं कुरुते हि सम्प्रति स्वयं हि यस्यावरजो विभीषणः॥ ५२ धनद उवाच विभीषणो मे प्रतिपक्षभूतो दायादभावं न विमुञ्चतीति। ध्रुवं प्रसन्ना न भवन्ति दुर्जनाः कृतोपकारा हरिवज्रनिष्ठुराः॥ ५३ न चोपकारैर्न गुणैर्न सौहृदैः प्रसादमायाति मनो हि गोत्रिणः। उवाच वाक्यं स च कण्ठकुब्जो युक्तं त्वयोक्तं च धनाधिनाथ॥ ५४ परस्परं घ्नन्ति च ते विरुद्धा- स्तथापि लोके न पराभवोऽस्ति। पराभवं नान्यकृतं सहन्ते नोष्णं जलं ज्वालयते तृणानि॥ ५५ तस्मात्समागच्छ धनाधिनाथ पार्श्वं च वेगेन विभीषणस्य। स्वबाहुवीर्यार्जितवित्तभोगिनां स्वबन्धुवर्गेषु हि को विरोधः॥ ५६ इत्युक्तः स तदा तेन कण्ठकुब्जेन मन्त्रिणा। विभीषणस्य सामीप्यं जगामाशु विचारयन्॥ ५७ ततो लङ्काधिपः श्रुत्वा बान्धवं पूर्वजं तदा। प्राप्तं प्रत्याजगामाशु विनयेन समन्वितः॥ ५८ ततो विभीषणो दृष्ट्वा तदा दीनं च बान्धवम्। संप्ततमानसो भूप जगादेदं वचो महत्॥ ५९


[हिन्दी अनुवाद]

पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी एकमात्र पत्नी सीताको भी निशाचर रावणने हर लिया था, परंतु श्रीरामचन्द्रजीने प्राण नहीं त्यागा। आपके यहाँ तो अनेक स्त्रियाँ हैं, फिर आप मनमें यह कैसा विषाद ला रहे हैं? यक्षराज! शोक त्यागकर पराक्रममें मन लगाइये; धैर्य धारण कीजिये। साधु पुरुष बहुत बातें नहीं बनाते और न बैठकर रोते ही हैं; वे दूसरोंके द्वारा परोक्षमें किये हुए अपने अपमानको उस समय चुपचाप सह लेते हैं। वित्तपते! महापुरुष समय आनेपर महान् कार्य कर दिखाते हैं। आपके तो अनेक सहायक हैं, आप क्यों कातर हो रहे हैं? इस समय तो आपके छोटे भाई विभीषण स्वयं ही आपकी सहायता कर रहे हैं॥ ४९—५२॥

**कुबेर बोले—**विभीषण तो मेरे विपक्षी ही बने हुए हैं, वे अब भी मेरे साथ कौटुम्बिक विरोधका त्याग नहीं करते। यह निश्चित बात है कि दुर्जन पुरुष उपकार करनेपर भी प्रसन्न नहीं होते, वे इन्द्रके वज्रके सदृश कठोर होते हैं। सगोत्रका मन उपकारोंसे, गुणोंसे अथवा मैत्रीसे भी प्रायः प्रसन्न नहीं होता॥ ५३१/२॥

यह सुनकर कण्ठकुब्जने कहा—'धनाधिनाथ! आपने ठीक कहा है। विरोध होनेपर सगोत्र पुरुष अवश्य ही परस्पर घात-प्रतिघात करते हैं, तथापि लोकमें उनका पराभव नहीं देखा जाता; क्योंकि कुटुम्बीजन दूसरेके द्वारा किये हुए अपने बन्धुजनके अपमानको नहीं सह सकते। जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे तप्त हुआ जल अपने भीतरके तृणोंको नहीं जलाता, उसी प्रकार दूसरोंसे अपमानित कुटुम्बी जन अपने पार्श्ववर्ती बन्धुओंको नहीं सताते। इसलिये धनाधिप! आप बहुत शीघ्र विभीषणके पास चलिये। जो लोग अपने बाहुबलसे उपार्जित धनका उपभोग करते हैं, उन्हें भाई-बन्धुओंके साथ क्या विरोध हो सकता है'॥ ५४—५६॥

अपने मन्त्री कण्ठकुब्जके इस प्रकार कहनेपर कुबेर मन-ही-मन उसपर विचार करते हुए शीघ्र ही विभीषणके पास गये। लङ्कापति विभीषणने जब अपने ज्येष्ठ भ्राताका आगमन सुना, तब उन्होंने बड़ी विनयके साथ उनकी अगवानी की। राजन्! फिर विभीषणने अपने भाईको जब दीनदशामें देखा, तब उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर उनसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही॥ ५७—५९॥

अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७७

विभीषण उवाच | विभीषण बोले—'यक्षराज! आप दीन क्यों हो कथं दीनोऽसि यक्षेश किं कष्टं तव चेतसि। | रहे हैं? आपके मनमें क्या कष्ट है? इस समय आप निवेदयाधुनास्माकं निश्चयान्मार्जयामि तत्॥ ६० | उस कष्टको मुझे बताइये। मैं निश्चय ही उसका मार्जन तदैकान्तं समासाद्य कथयामास वेदनाम्। | करूँगा।' तब कुबेरने एकान्तमें जाकर विभीषणसे अपनी | मनोवेदना बतलायी॥ ६०१/२॥ धनद उवाच | कुबेर बोले—भाई! कुछ दिनोंसे मैं अपनी मनोरमा गृहीता किं स्वयं याता निहता केनचिद्द्विषा॥ ६१ | भार्या चित्रसेनाको नहीं देख रहा हूँ। न जाने उसे किसीने भ्रातः कान्तां न पश्यामि चित्रसेनां मनोरमाम्। | पकड़ लिया या वह स्वयं किसीके साथ चली गयी एतद्वन्धो महत्कष्टं मम नारीसमुद्भवम्॥ ६२ | अथवा किसी शत्रुने उसे मार डाला। बन्धो! मुझे अपनी प्राणान् वै घातयिष्यामि अनासाद्य च वल्लभाम्। | स्त्रीके वियोगका महान् कष्ट हो रहा है। यदि वह प्राणवल्लभा | न मिली तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा॥ ६१-६२१/२॥ विभीषण उवाच | विभीषण बोले—'प्रभो! आपकी भार्या जहाँ- आनयिष्यामि ते कान्तां यत्र तत्र स्थितां विभो॥ ६३ | कहीं भी होगी, मैं उसे ला दूँगा। नाथ! इस समय कः समर्थोऽधुनास्माकं हर्तुं नाथ तृणस्य च। | संसारमें किसकी सामर्थ्य है जो हमारा तृण भी चुरा ततो विभीषणस्तत्र नाडीजङ्घां निशाचरीम्॥ ६४ | सके।' यह कहकर विभीषणने नाना प्रकारकी मायाके भृशं संजल्पयामास नानामायागरीयसीम्। | ज्ञानमें बढ़ी-चढ़ी 'नाडीजङ्घा' नामकी निशाचरीसे धनदस्य च या कान्ता चित्रसेनाभिधानतः॥ ६५ | बहुत कुछ कहा और बताया—"कुबेरकी जो 'चित्रसेना' सा च केन हृता लोके मानसे सरसि स्थिता। | नामकी पत्नी है, वह एक दिन जब मानससरोवरके तां च जानीहि संवीक्ष्य देवराजादिवेश्मसु॥ ६६ | तटपर थी, तभी वहाँसे किसीने उसे हर लिया। तुम ततो निशाचरी भूप कृत्वा मायामयं वपुः। | इन्द्र आदि लोकपालोंके भवनोंमें देखकर उसका पता जगाम त्रिदिवं शीघ्रं देवराजादिवेश्मसु॥ ६७ | लगाओ"॥ ६३-६६॥ यया दृष्ट्या क्षणं दृष्टो मोहं यास्यति चोपलः। | भूप! तब वह निशाचरी मायामय शरीर धारणकर यस्याः समं ध्रुवं रूपं विद्यते न चराचरे॥ ६८ | इन्द्रादि देवताओंके भवनोंमें खोज करनेके लिये शीघ्र ही एतस्मिन्नेव काले च देवराजोऽपि भूपते। | स्वर्गलोकमें गयी। उस निशाचरीने ऐसा सुन्दर रूप सम्प्राप्तो मन्दराच्छीघ्रं प्रेरितश्चित्रसेनया॥ ६९ | बनाया था, जिसकी एक ही दृष्टि पड़नेसे पत्थर भी ग्रहीतुं दिव्यपुष्पाणि नन्दनप्रभवाणि च। | मोहित हो सकता था। अवश्य ही उस समय वैसा तत्र पश्यन् स तां तन्वीं निजस्थाने समागताम्॥ ७० | मोहन रूप चराचर जगत्में कहीं नहीं था। भूपते! इसी अतीवरूपसम्पन्नां गीतगानपरायणाम्। | समय देवराज इन्द्र भी चित्रसेनाके भेजनेसे उतावलीके तां वीक्ष्य देवराजोऽपि स कामवशगोऽभवत्॥ ७१ | साथ नन्दनवनके दिव्य पुष्प लेनेके लिये मन्दराचलसे ततः सम्प्रेरयामास देववैद्यौ सुराधिपः। | स्वर्गलोकमें आये थे। वहाँ अपने स्थानपर आयी हुई तस्याः पार्श्वे समानेतुं ध्रुवं चान्तःपुरे तदा॥ ७२ | उस अत्यन्त रूपवती रमणीको जो मधुर गान गा रही थी, देववैद्यौ तदाऽऽगत्य जल्पतश्चाग्रतः स्थितौ। | देख देवराज भी कामके वशीभूत हो गये। तब देवेन्द्रने आगच्छ भव तन्वङ्गि देवराजसमीपगा॥ ७३ | उसे जैसे भी हो, अपने अन्तःपुरमें बुला लानेके लिये | देववैद्य अश्विनीकुमारोंको उसके पास भेजा। दोनों | अश्विनीकुमार उसके सामने जाकर खड़े हुए और कहने | लगे—"कृशाङ्गि! आओ, देवराज इन्द्रके निकट चलो।"

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२७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

२७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ [संस्कृत-मूल] इत्युक्त्वा सा तदा ताभ्यां जगाद मधुराक्षरम्। नाडीजङ्घोवाच देवराजः स्वयं यन्मे पार्श्वं चात्रागमिष्यति॥ ७४ तस्य वाच्यं च कर्तव्यं नान्यथा सर्वथा मया। तौ तदा वासवं गत्वा ऊचतुर्वचनं शुभम्॥ ७५ वासव उवाच समादेशय तन्वङ्गि किं कर्तव्यं मयाधुना। सर्वदा दासभूतस्ते याचसे तद्ददाम्यहम्॥ ७६ तन्वङ्ग्युवाच याचितं यदि मे नाथ दास्यसीति न संशयः। ततोऽहं वशगा देव भविष्यामि न संशयः॥ ७७ अद्य त्वं दर्शयास्माकं सर्वः कान्तापरिग्रहः। मम रूपसमा रामा कान्ता ते चास्ति वा न वा॥ ७८ तया चोक्ते च वचने स भूयो वासवोऽवदत्। दर्शयिष्यामि सर्वं ते देवि कान्तापरिग्रहम्॥ ७९ स सर्वं दर्शयामास वासवोऽन्तःपुरं तदा। ततो जगाद भूयः सा किंचिद्गूढं मम स्थितम्॥ ८० विमुच्यैकां च युवतीं सर्वं ते दर्शितं मया। इन्द्र उवाच सा रामा मन्दरे चास्ति अविज्ञाता सुरासुरैः॥ ८१ तां च ते दर्शयिष्यामि नाख्येयं कस्यचित्त्वया। ततः स देवराजोऽपि तया सार्धं च भूपते॥ ८२ गच्छन्नेवाम्बरे भूप मन्दरं प्रति भूधरम्। तस्य वै गच्छमानस्य विमानेनार्कवर्चसा॥ ८३ दर्शनं नारदस्यापि तस्य जातं तदाम्बरे। तं वीक्ष्य नारदं वीरो लज्जमानोऽपि वासवः॥ ८४ नमस्कृत्य जगादोच्चैः क्व यास्यसि महामुने। ततः कृताशीः स मुनिरवदत्त्रिदिवेश्वरम्॥ ८५ गच्छामि मानसे स्नातुं देवराज सुखी भव। नाडीजङ्घेऽस्ति कुशलं राक्षसानां महात्मनाम्॥ ८६ [हिन्दी-अनुवाद] उन दोनोंके द्वारा यों कही जानेपर उस सुन्दरीने मधुर वाणीमें उत्तर दिया॥ ६७—७३१/२॥ नाडीजङ्घा बोली— यदि देवराज इन्द्र स्वयं ही मेरे पास आयेंगे तो मैं उनकी बात मान सकती हूँ; अन्यथा बिलकुल नहीं॥ ७४१/२॥ तब अश्विनीकुमारोंने इन्द्रके पास जाकर उसका शुभ संदेश कहा॥ ७५॥ तब इन्द्र स्वयं आकर बोले— कृशाङ्गि! आज्ञा दो, मैं इस समय तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ? मैं सदाके लिये तुम्हारा दास हो गया हूँ; तुम जो कुछ माँगोगी, वह सब दूँगा॥ ७६॥ कृशाङ्गीने कहा— नाथ! यदि आप मेरी माँगी हुई वस्तु अवश्य दे देंगे, तो निःसंदेह मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी। आज आप अपनी समस्त भार्याओंको मुझे दिखाइये; देखूँ, आपकी कोई भी स्त्री मेरे रूपके सदृश है या नहीं?॥ ७७-७८॥ उसके यों कहनेपर इन्द्रने पुनः कहा—‘देवि! चलो, मैं तुम्हें अपनी समस्त भार्याओंको दिखाऊँगा।’ यह कहकर इन्द्रने उसी समय उसे अपना सारा अन्तःपुर दिखाया। तब उस सुन्दरीने पुनः कहा—‘अभी मुझसे कुछ छिपाया गया है। केवल एक युवतीको छोड़कर और सब कुछ आपने दिखा दिया'॥ ७९-८०१/२॥ इन्द्रने कहा— ‘वह रमणी मन्दराचलपर है। देवता और असुर—किसीको भी उसका पता नहीं है। मैं उसे भी तुम्हें दिखा दूँगा, परंतु यह रहस्य किसीपर प्रकट न करना।’ भूपाल! यह कहकर देवराज इन्द्र उसके साथ आकाशमार्गसे मन्दराचलकी ओर चले। जिस समय वे सूर्यके समान कान्तिमान् विमानसे चले जा रहे थे, उसी समय उन्हें आकाशमें देवर्षि नारदका दर्शन हुआ। नारदजीको देखकर वीरवर इन्द्र यद्यपि लज्जित हुए, तथापि उन्हें नमस्कार करके पूछा—‘महामुने! आप कहाँ जायेंगे?'॥ ८१—८४१/२॥ तब मुनिवर नारदजीने आशीर्वाद देते हुए स्वर्गाधिपति इन्द्रसे कहा—‘देवराज! आप सुखी हों, मैं इस समय मानसरोवरपर स्नान करने जा रहा हूँ।' [फिर उन्होंने नाडीजङ्घाको पहचानकर कहा—] 'नाडीजङ्घे! कहो तो महात्मा राक्षसोंका कुशल तो है न?

अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७९

विभीषणोऽपि ते भ्राता सुखी तिष्ठति सर्वदा । | तुम्हारे भाई विभीषण तो सुखपूर्वक हैं न ?' नारदजीकी एवमुक्ता च मुनिना सा कृष्णावदनाभवत् ॥ ८७ | यह बात सुनते ही उसका मुख भयसे काला पड़ गया। विस्मितो देवराजोऽपि छलितो दुष्टयानया । | देवराज इन्द्र भी बहुत आश्चर्यमें पड़े और मन-ही- नारदोऽपि गतः स्नातुं कैलासे मानसं सरः ॥ ८८ | मन कहने लगे—'इस दुष्टाने मुझे छल लिया।' नारदजी | भी वहाँसे कैलास पर्वतके निकट मानससरोवरमें स्नान इन्द्रस्तां हन्तुकामोऽपि आगच्छन्मन्दराचलम् । | करनेके लिये चले गये। तब इन्द्र भी उस राक्षसीका यत्राश्रमोऽस्ति वै नूनं तृणबिन्दोर्महात्मनः ॥ ८९ | वध करनेके लिये मन्दराचलपर, जहाँ महात्मा तृणबिन्दु का | आश्रम था, आये और वहाँ थोड़ी देरतक विश्राम करके क्षणं विश्रम्य तत्रैव धृत्वा केशेषु राक्षसीम् । | वे उस नाडीजङ्घा राक्षसीके केश पकड़कर उसे मारना हन्तुमिच्छति देवेशो नाडीजङ्घां निशाचरीम् ॥ ९० | ही चाहते थे कि इतनेमें महात्मा तृणबिन्दु अपने आश्रमसे तावत्तत्र समायातस्तृणबिन्दुन्निजाश्रमात् । | निकलकर वहाँ आ गये ॥ ८५—९०१/२ ॥ धृता क्रन्दति सा राजन्निन्द्रेणापि निशाचरी ॥ ९१ | राजन् ! इधर इन्द्रके द्वारा पकड़ी जानेपर वह राक्षसी | भी करुण विलाप करने लगी—'हा! मैं मारी जा रही मा मां रक्षति पुण्यात्मा हन्यमानां च साम्प्रतम् । | हूँ; इस समय कोई भी पुण्यात्मा पुरुष मुझ दीनाको तदाऽऽगत्य मुनिश्रेष्ठस्तृणबिन्दुर्महातपाः ॥ ९२ | नहीं बचा रहा है' ॥ ९११/२ ॥ जगाद पुरतः स्थित्वा मुञ्चेमां महिलां वने । | उसी समय महातपस्वी तृणबिन्दु मुनि वहाँ आ जल्पत्येवं मुनौ तस्मिन् महेन्द्रेण निशाचरी ॥ ९३ | पहुँचे और इन्द्रके सामने खड़े हो बोले—'हमारे तपोवनमें | इस महिलाको न मारो, छोड़ दो' ॥ ९२१/२ ॥ वज्रेण निहता भूयः कोपयुक्तेन चेतसा । | भूप ! तृणबिन्दु मुनि यों कह ही रहे थे कि महेन्द्रने स चुकोप मुनिश्रेष्ठः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ९४ | क्रुद्ध होकर वज्रसे उस राक्षसीको मार ही तो डाला। यदेषा युवती दुष्टा निहता मे तपोवने । | तब वे मुनिवर इन्द्रकी ओर बार-बार देखते हुए बहुत ततस्त्वं मम शापेन निश्चयात् स्त्री भविष्यसि ॥ ९५ | ही कुपित हुए और बोले—'रे दुष्ट ! तूने मेरे तपोवनमें | इस युवतीका वध किया है, इसलिये तू मेरे शापसे इन्द्र उवाच | निश्चय ही स्त्री हो जायगा' ॥ ९३—९५ ॥ एषा नाथ महादुष्टा राक्षसी निहता मया । | इन्द्र बोले—नाथ! मैं देवताओंका स्वामी इन्द्र हूँ अहं स्वामी सुराणां च शापं मा देहि मेऽधुना ॥ ९६ | और यह स्त्री महादुष्टा राक्षसी थी; इसलिये मैंने इसका | वध किया है। आप इस समय मुझे शाप न दें ॥ ९६ ॥ मुनिरुवाच | मुनि बोले—अवश्य ही मेरे तपोवनमें भी दुष्ट और नूनं तपोवनेऽस्माकं दुष्टास्तिष्ठन्ति साधवः । | साधु पुरुष भी रहते हैं, परंतु वे मेरी तपस्याके प्रभावसे ममात्र तपसो भावान्न निघ्नन्ति परस्परम् ॥ ९७ | परस्पर किसीका वध नहीं करते। (तूने मेरे तपोवनकी | मर्यादा भङ्ग की है, अतः तू शापके ही योग्य है।) ॥ ९७ ॥ इत्युक्तो हि तदा चेन्द्रः प्राप्तः स्त्रीत्वं न संशयः । | भूप ! मुनिके यों कहनेपर इन्द्र निःसंदेह स्त्रीयोनिको प्राप्त जगाम त्रिदिवं भूप हतशक्तिपराक्रमः ॥ ९८ | हो गये और पराक्रम तथा शक्ति खोकर स्वर्गको लौट आये। | उन्होंने सदा ही लज्जा और दुःखसे खिन्न रहनेके कारण नासीनो हि भवत्येव सर्वदा देवसंसदि । | देवताओंकी सभामें बैठना ही छोड़ दिया। इधर देवता भी देवा दुःखं समापन्ना दृष्ट्वा स्त्रीत्वं गतं हरिम् ॥ ९९ | इन्द्रको स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हुआ देखकर बहुत दुःखी

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२८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

२८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ ततो देवगणाः सर्वे वासवेन समन्विताः। हुए। तत्पश्चात् सभी देवता और दीना शची इन्द्रको साथ जग्मुश्च ब्रह्मसदनं तथा दीना शची तदा॥ १०० लेकर ब्रह्माजीके धामको गये। जबतक ब्रह्माजी समाधिसे ब्रह्मा भग्नसमाधिश्च यावत् तत्रैव संस्थिताः। विरत हुए, तबतक वे सभी वहीं ठहरे रहे और इन्द्रके देवा ऊचुश्च ते सर्वे वासवेन समन्विताः॥ १०१ साथ ही सब देवता ब्रह्माजीसे बोले॥ ९८-१०१॥ तृणबिन्दोर्मुनेः शापाद्यातः स्त्रीत्वं सुराधिपः। 'ब्रह्मन्! सुरराज इन्द्र तृणबिन्दु मुनिके शापसे स्त्रीयोनिको स मुनिः कोपवान् ब्रह्मन्नैव गच्छत्यनुग्रहम्॥ १०२ प्राप्त हो गये हैं; वे मुनि बड़े क्रोधी हैं, किसी प्रकार पितामह उवाच अनुग्रह नहीं करते'॥ १०२॥ ब्रह्माजी बोले—इसमें उन महात्मा तृणबिन्दु मुनिका न मुनेरपराधः स्यात्तृणबिन्दोर्महात्मनः। कोई अपराध नहीं है। इन्द्र स्त्रीवधरूपी अपने ही स्वकर्मणोपयातोऽसौ स्त्रीत्वं स्त्रीवधकारणात्॥ १०३ कर्मसे स्त्रीभावको प्राप्त हुए हैं। देवताओ! देवराज इन्द्रने भी मदमत्त होकर बड़ा ही अन्याय किया है, जो चकार दुर्नयं देवा देवराजोऽपि दुर्मदः। कुबेरकी पत्नी चित्रसेनाका गुप्तरूपसे अपहरण कर लिया। जहार चित्रसेनां च सुगुप्तां धनदाङ्गनाम्॥ १०४ यही नहीं, इन्होंने तृणबिन्दुके तपोवनमें एक युवतीका तथा जघान युवतीं तृणबिन्दोस्तपोवने। वध किया है, अतः अपने इस निन्द्य कर्मके परिणामस्वरूप तेन कर्मविपाकेन स्त्रीभावं वासवो गतः॥ १०५ ही ये इन्द्र स्त्रीभावको प्राप्त हुए हैं॥ १०३-१०५॥ देवा ऊचुः देवगण बोले—नाथ इन्होंने दुर्बुद्धिसे प्रेरित होकर जो शंकरप्रिय कुबेरका अपमान किया है, उसके लिये यदसौ कृतवाञ्शम्भोरुर्नयं नाथ दुर्मतिः। हम सब लोग शचीके साथ कुबेरको प्रसन्न करनेका यत्न तत्सर्वं साधयिष्यामो वयं शच्या समन्विताः॥ १०६ करेंगे। विभो! कुबेरकी पत्नी चित्रसेना मन्दराचलपर कान्ता धनाधिनाथस्य गूढा तिष्ठति या विभो। गुप्तरूपसे रहती है, हम सभी लोग सम्मति करके उसे तां च तस्मै प्रदास्यामः सर्वे कृत्वा परां मतिम्॥ १०७ कुबेरको अर्पित कर देंगे। देवराज इन्द्र भी प्रति त्रयोदशी त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां देवराजः शचीयुतः। और चतुर्दशीको नन्दनवनमें शचीको साथ लेकर यक्ष नन्दने चार्चनं कर्ता सर्वदा यक्षरक्षसाम्॥ १०८ और राक्षसोंकी पूजा करेंगे॥ १०६-१०८॥ तत्पश्चात् शची अपने प्रियतमको कष्टमें डालनेवाली ततः शची तदा गूढं चित्रसेनां विगृह्य च। चित्रसेनाको गुप्तरूपसे ले जाकर यक्षराज कुबेरके भवनमें मुमोच यक्षभवनं प्रियकष्टानुवर्तिनीम्॥ १०९ छोड़ आयीं। इसी समय कुबेरका दूत असमयमें ही एतस्मिन्नन्तरे दूतोऽकाले लङ्कां समागतः। लङ्कामें पहुँचा और कुबेरसे चित्रसेनाके लौट आनेका धनेशं कथयामास चित्रसेनासमागमम्॥ ११० समाचार सुनाया—'हे धनाधिप! आपकी प्रिय पत्नी चित्रसेना शचीके साथ घर लौट आयी है। वह शची- शच्या साकं समायाता तव कान्ता धनाधिप। जैसी अनुपम सखीको पाकर कृतार्थ हो चुकी है।' तब सखीं स्वामतुलां प्राप्य चरितार्था बभूव सा॥ १११ कुबेर भी कृतकृत्य होकर अपने घरको लौट आये। धनेशोऽपि कृतार्थोऽभूज्जगाम निजवेश्मनि। इसके बाद देवगण पुनः ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे॥ १०९-११११/२॥ देवा ऊचुः देवगण बोले—ब्रह्मन्! आपकी कृपासे सर्वमेतत्कृतं ब्रह्मन् प्रसादात्ते न संशयः॥ ११२ यह सारा काम तो हो गया—इसमें संदेह नहीं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६३] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २८१ पतिहीना यथा नारी नाथहीनं यथा बलम्। गोकुलं कृष्णहीनं तु तथेन्द्रेणामरावती ॥ ११३ जपः क्रिया तपो दानं ज्ञानं तीर्थं च वै प्रभो। वासवस्य समाख्याहि यतः स्त्रीत्वाद्दिमुच्यते ॥ ११४ ब्रह्मोवाच निहन्तुं न मुनेः शापं समर्थोऽहं न शङ्करः। तीर्थं चान्यन्न पश्यामि मुक्त्वैकं विष्णुपूजनम् ॥ ११५ अष्टाक्षरेण मन्त्रेण पूजनं च तथा जपम्। करोतु विधिवच्छक्रः स्त्रीत्वाद्येन च मुच्यते ॥ ११६ एकाग्रमनसा शक्र स्नात्वा श्रद्धासमन्वितः। ॐ नमो नारायणायेति जप त्वमात्मशुद्धये ॥ ११७ लक्षद्वये कृते जाप्ये स्त्रीभावान्मुच्यसे हरे। इति श्रुत्वा तथाकार्षीद्ब्रह्मोक्तं वचनं हरिः। स्त्रीभावाच्च विनिर्मुक्तस्तदा विष्णोः प्रसादतः ॥ ११८ मार्कण्डेय उवाच इति ते कथितं सर्वं विष्णुमाहात्म्यमुत्तमम्। मया भृगुनियुक्तेन कुरु सर्वमतन्द्रितः ॥ ११९ शृण्वन्ति ये विष्णुकथामकल्मषा वीर्यं हि विष्णोऽखिलकारणस्य। ते मुक्तपापाः परदारगामिनो विशन्ति विष्णोः परमं पदं ध्रुवम् ॥ १२० सूत उवाच इति सम्बोधितस्तेन मार्कण्डेयेन पार्थिवः। नरसिंहं समाराध्य प्राप्तवान् वैष्णवं पदम् ॥ १२१ एतत्ते कथितं सर्वं भरद्वाज मुने मया। सहस्रानीकचरितं किमन्यत् कथयामि ते ॥ १२२ कथामिमां यस्तु शृणोति मानवः पुरातनीं सर्वविमुक्तिदां च। सम्प्राप्य स ज्ञानमतीव निर्मलं तेनैव विष्णुं प्रतिपद्यते जनः ॥ १२३ परंतु अब जैसे पतिके बिना नारी, सेनापतिके बिना सेना और श्रीकृष्णके बिना व्रजकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार इन्द्रके बिना अमरावती सुशोभित नहीं होती। प्रभो! अब इन्द्रके लिये कोई जप, क्रिया, तप, दान, ज्ञान और तीर्थ-सेवन आदि उपाय बताइये, जिससे स्त्रीभावसे इनका उद्धार हो सके ॥ ११२-११४॥ ब्रह्माजी बोले—उस मुनिके शापको अन्यथा करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न भगवान् शङ्कर ही। इसके लिये एकमात्र भगवान् विष्णुके पूजनको छोड़कर दूसरा कोई उपाय भी सफल नहीं दीख पड़ता। बस, इन्द्र अष्टाक्षर-मन्त्रके द्वारा भगवान् विष्णुका विधिपूर्वक पूजन करें और उस मन्त्रका जप करते रहें; इससे वे स्त्रीभावसे मुक्त हो सकते हैं। इन्द्र! स्नान करके, श्रद्धायुक्त हो, आत्मशुद्धि-के लिये एकाग्रचित्तसे 'ॐ नमो नारायणाय' —इस मन्त्रका जप करो। देवेन्द्र! इस मन्त्रका दो लाख जप हो जानेपर तुम स्त्री-योनिसे मुक्त हो सकते हो। यह सुनकर इन्द्रने ब्रह्माजीकी आज्ञाका यथावत् पालन किया, तब वे भगवान् विष्णुकी कृपासे स्त्रीभावसे छुटकारा पा गये ॥ ११५-११८॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार मैंने भृगुजीकी आज्ञासे तुम्हारे समक्ष परम उत्तम भगवान् विष्णुके माहात्म्यको पूर्णरूपसे सुना दिया। अब तुम आलस्य त्यागकर भगवान् विष्णुकी आराधना करो। जो लोग अखिल जगत्के कारणभूत भगवान् विष्णुके पराक्रमसे सम्बन्ध रखनेवाली उनकी कथाको सुनते हैं, वे यदि परस्त्रीगामी रहे हों तो भी पापहीन एवं कल्मषरहित होकर निश्चय ही भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं ॥ ११९-१२०॥ सूतजी कहते हैं—मुनिवर मार्कण्डेयजीके द्वारा इस तरह सम्यक् प्रकारसे उपदिष्ट होकर राजा सहस्रानीक भगवान् नृसिंहकी आराधना करके विष्णुके अविनाशी पदको प्राप्त हो गये। भरद्वाज मुने! इस प्रकार मैंने आपको यह सम्पूर्ण सहस्रानीक-चरित्र सुनाया; इसके बाद आपसे और क्या कहूँ? ॥ १२१-१२२॥ जो मानव सब प्रकारसे मोक्ष देनेवाली इस प्राचीन कथाका श्रवण करता है, वह अत्यन्त निर्मल ज्ञान प्राप्त करके उसीके द्वारा भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है ॥ १२३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरितेऽष्टाक्षरमन्त्रकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत 'अष्टाक्षर-मन्त्रकी महिमाका कथन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४

२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४ चौंसठवाँ अध्याय भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान


[मूल संस्कृत श्लोक]

श्रीभरद्वाज उवाच सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे। सांख्यं केचित्प्रशंसन्ति योगमन्ये प्रचक्षते॥ १ ज्ञानं केचित्प्रशंसन्ति समलोष्टाश्मकाञ्चनाः। क्षमां केचित्प्रशंसन्ति तथैव च दयार्जवम्॥ २ केचिद्दानं प्रशंसन्ति केचिदाहुः परं शुभम्। सम्यग्ज्ञानं परं केचित्केचिद्वैराग्यमुत्तमम्॥ ३ अग्निष्टोमादिकर्माणि तथा केचित्परं विदुः। आत्मध्यानं परं केचित्सांख्यतत्त्वार्थवेदिनः॥ ४ धर्मार्थकाममोक्षाणां चतुर्णामिह केवलम्। उपायः पदभेदेन बहुधैवं प्रचक्ष्यते॥ ५ एवं चावस्थिते लोके कृत्याकृत्यविधौ नराः। व्यामोहमेव गच्छन्ति विमुक्ताः पापकर्मभिः॥ ६ यदेतेषु परं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः। वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मम सर्वार्थसाधकम्॥ ७ सूत उवाच श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम्। अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्॥ ८ पुण्डरीकस्य संवादं देवर्षेर्नारदस्य च। ब्राह्मणः श्रुतसम्पन्नः पुण्डरीको महामतिः॥ ९ आश्रमे प्रथमे तिष्ठन् गुरूणां वशगः सदा। जितेन्द्रियो जितक्रोधः संध्योपासनधिष्ठितः॥ १० वेदवेदाङ्गनिपुणः शास्त्रेषु च विचक्षणः। समिद्भिः साधुयत्नेन सायं प्रातर्हुताशनम्॥ ११


[हिन्दी अनुवाद]

श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! कुछ लोग 'सत्य' को ही पुरुषार्थका साधक बताकर उसकी प्रशंसा करते हैं, दूसरे लोग 'तपस्या' और 'पवित्रता' को उत्तम बताते हैं। कुछ लोग 'सांख्य' और कुछ लोग 'योग' की प्रशंसा करते हैं। ढेले, पत्थर और सोनेको समान समझनेवाले कुछ अन्य लोग 'ज्ञान' को ही पुरुषार्थ-साधनके लिये उत्तम मानते हैं। कुछ लोग 'क्षमा' की प्रशंसा करते हैं तो कुछ लोग 'दया' और 'सरलता' की। कुछ लोग ऐसे हैं, जो 'दान' को उत्तम बताते हैं, कुछ लोग और ही किसी उपायको शुभ कहते हैं। दूसरे लोग 'सम्यग्ज्ञान' को उत्तम मानते हैं और अन्य जन 'वैराग्य' को श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ याज्ञिक लोग 'अग्निष्टोम' आदि यज्ञोंको ही सबसे बढ़कर मानते हैं। सांख्यतत्त्वका मर्म जाननेवाले कुछ लोग 'आत्माके ध्यान' को श्रेष्ठ मानते हैं। इस प्रकार यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंका उपाय ही नाम-भेदसे नाना प्रकारका बताया जाता है। ऐसी स्थितिमें जगत्में पापकर्मसे विमुक्त पुरुष भी कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें कुछ निश्चय न हो सकनेके कारण मोहमें ही पड़े रहते हैं। सर्वज्ञ! इन उपर्युक्त 'सत्य' आदि उपायोंमें जो सबसे उत्तम उपाय हो और महात्माओंद्धारा अवश्यकर्तव्य हो, सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उस उपायका आप हमसे वर्णन करें॥ १–७॥ सूतजी कहते हैं—संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले इस अत्यन्त गूढ उपायको लोग सुनें। इस विषयमें महात्माजन देवर्षि नारद और भक्तवर पुण्डरीकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं॥ ८१/२॥ महामति पुण्डरीकजी एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे सदा गुरुजनोंके वशमें रहते हुए ब्रह्मचर्य आश्रमके नियमोंका पालन करते थे। उन्होंने अपनी इन्द्रियों और क्रोधको जीत लिया था तथा वे नियमानुसार संध्योपासन किया करते थे। वेद और वेदाङ्गोंमें वे निष्णात थे तथा अन्य शास्त्रोंके भी पण्डित थे। वे प्रतिदिन समिधा एकत्रकर सायं और प्रातःकाल अत्यन्त यत्नपूर्वक अग्निकी उपासना


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अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८३


ध्यात्वा यज्ञपतिं विष्णुं सम्यगाराधयन् विभुम्। | किया करते थे। साक्षात् ब्रह्मपुत्र नारदजीके समान वे सर्वव्यापी तपःस्वाध्यायनिरतः साक्षाद्ब्रह्मसुतो यथा॥ १२ | यज्ञपति भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक आराधना करते हुए | उनका ध्यान किया करते थे और सदा तपस्या तथा स्वाध्यायमें उदकेन्धनपुष्पार्थैरसकृत्तर्पयन् गुरून्। | ही लगे रहते थे। जल, ईंधन और फूल आदि आवश्यक मातापितृभ्यां शुश्रूषुर्भिक्षाहारी जनप्रियः॥ १३ | सामान लाकर वे सदा ही गुरुजनोंको संतुष्ट रखते और | उनकी अपने माता-पिताके समान शुश्रूषा किया करते थे। ब्रह्मविद्यामधीयानः प्राणायामपरायणः। | भिक्षा माँगकर भोजन करते थे और अपने सद्व्यवहारोंके तस्य सर्वार्थभूतस्य संसारेऽत्यन्तनिःस्पृहा॥ १४ | कारण लोगोंके परम प्रिय हो गये थे। वे सदा ब्रह्मविद्याका | अध्ययन और प्राणायामका अभ्यास करते रहते थे। महाराज! बुद्धिरासीन्महाराज संसारार्णवतारणी। | समस्त पदार्थोंको वे अपना स्वरूप ही समझते थे; अतः पितरं मातरं चैव भ्रातॄनथ पितामहान्॥ १५ | संसारके विषयोंमें उनकी बुद्धि अत्यन्त निःस्पृह हो भवसागरसे | पार उतारनेवाली हो गयी थी॥ ९-१४ १/२॥ पितृव्यान्मातुलांश्चैव सखीन् सम्बन्धिबान्धवान्। | भरद्वाजजी! उनका वैराग्य यहाँतक बढ़ गया कि वे महान् परित्यज्य महोदारस्तृणानीव यथासुखम्॥ १६ | उदार पुण्डरीकजी पिता, माता, भाई, पितामह, चाचा, मामा, | मित्र, सम्बन्धी तथा बान्धवजनोंको तृणके समान त्यागकर, विचचार महीमेतां शाकमूलफलाशनः। | शाक और मूल-फलादिका आहार करते हुए इस पृथ्वीपर अनित्यं यौवनं रूपमायुष्यं द्रव्यसंचयम्॥ १७ | आनन्दपूर्वक विचरने लगे। उन्होंने यौवन, रूप, आयु और | धन-संग्रहकी अनित्यताका विचार करके समस्त त्रिभुवनको इति संचिन्तयानेन त्रैलोक्यं लोष्ठवत् स्मृतम्। | मिट्टीके ढेलेके समान तुच्छ समझ लिया था और अपने पुराणोदितमार्गेण सर्वतीर्थानि वै मुने॥ १८ | मनमें यह निश्चय करके कि 'मैं पुराणोक्त मार्गसे यथासमय | सभी तीर्थोंकी यात्रा करूँगा', वे महाबाहु, महातेजस्वी और गमिष्यामि यथाकालमिति निश्चितमानसः। | महाव्रती पुण्डरीकजी गङ्गा, यमुना, गोमती, गण्डकी, शतद्रू, गङ्गां च यमुनां चैव गोमतीमथ गण्डकीम्॥ १९ | पयोष्णी, सरयू और सरस्वतीके तटपर, प्रयागमें, नर्मदा | आदि महानदियों तथा नदोंके तटपर, गयामें तथा विन्ध्याचल शतद्रूं च पयोष्णीं च सरयूं च सरस्वतीम्। | और हिमालयके तीर्थोंमें एवं इनके अतिरिक्त अन्यान्य प्रयागं नर्मदां चैव महानद्यो नदानपि॥ २० | तीर्थोंमें भी यथासमय विधिपूर्वक भ्रमण करते रहे। इसी | तरह घूमते हुए, पुण्यकर्मोंके अधीन हो वे तपस्वी वीर महाभाग गयां च विन्ध्यतीर्थानि हिमवत् प्रभवाणि च। | पुण्डरीक शालग्रामक्षेत्रमें जा पहुँचे॥ १५-२२ १/२॥ अन्यानि च महातेजास्तीर्थानि स महाव्रतः॥ २१ | वह तीर्थ तत्त्वज्ञानी तपस्वी ऋषियोंद्वारा सेवित था। | वहाँ मुनियोंके सुरम्य आश्रम थे, जो पुराणोंमें प्रसिद्ध संचचार महाबाहुर्यथाकालं यथाविधि। | हैं। वह तीर्थ चक्रनदीसे भूषित है और वहाँके कदाचित् प्राप्तवान् वीरः शालग्रामं तपोधनः॥ २२ | शिलाखण्ड भगवान्‌के चक्रसे चिह्नित हैं। वह तीर्थ | जितना ही सुरम्य था, उतना ही एकान्त। उसका विस्तार पुण्डरीको महाभागः पुण्यकर्मवशानुगः। | बड़ा था और वहाँ चित्त स्वतः प्रसन्न रहता था। वहाँपर आसेव्यमानमृषिभिस्तत्त्वविद्भिस्तपोधनैः ॥ २३ | कुछ चक्रसे चिह्नित प्राणी रहते थे, जिनका दर्शन | बहुत ही पावन था। वहाँ पुण्यतीर्थके यात्री यथेष्ट मुनीनामा श्रमं रम्यं पुराणेषु च विश्रुतम्। | विचरते रहते थे। उस महापवित्र शालग्रामक्षेत्रमें महामति भूषितं चक्रनद्या च चक्राङ्कितशिलातलम्॥ २४ | पुण्डरीकजी प्रसन्नचित्त हो तीर्थ-सेवन करने लगे। रम्यं विविक्तं विस्तीर्णं सदा चित्तप्रसादकम्। केचिच्चक्राङ्कितास्तस्मिन् प्राणिनः पुण्यदर्शनाः॥ २५ विचरन्ति यथाकामं पुण्यतीर्थप्रसङ्गिनः। तस्मिन् क्षेत्रे महापुण्ये शालग्रामे महामतिः॥ २६


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२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४

२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ पुण्डरीकः प्रसन्नात्मा तीर्थानि समसेवत। | वे नियमपूर्वक वहाँ देवह्रद तीर्थमें, पूर्वजन्मकी स्मृति स्नात्वा देवह्रदे तीर्थे सरस्वत्यां च सुव्रतः॥ २७ | दिलानेवाली सरस्वतीके जलमें, चक्र-कुण्डमें और जातिस्मर्यां चक्रकुण्डे चक्रनद्यामृतेष्वपि। | चक्र-नदी (नारायणी)-के जलमें भी स्नान करके उसी तथान्यान्यपि तीर्थानि तस्मिन्नेव चचार सः॥ २८ | क्षेत्रके अन्तर्गत अन्यान्य तीर्थोंमें भ्रमण करते रहते | थे॥ २३-२८॥ ततः क्षेत्रप्रभावेण तीर्थानां चैव तेजसा। | तदनन्तर उस क्षेत्रके प्रभावसे और वहाँके तीर्थोंके मनः प्रसादमगमत्तस्य तस्मिन्महात्मनः॥ २९ | तेजसे उन महात्माका चित्त वहाँ बहुत ही शुद्ध एवं प्रसन्न सोऽपि तीर्थे विशुद्धात्मा ध्यानयोगपरायणः। | हो गया। इस प्रकार शुद्धचित्त एवं ध्यानयोगमें तत्पर हो, वहाँ तत्रैव सिद्धिमाकाङ्क्षन् समाराध्य जगत्पतिम्॥ ३० | ही सिद्धिकी इच्छासे परमभक्तियुक्त हो, वे शास्त्रोक्त विधिसे शास्त्रोक्तेन विधानेन भक्त्या परमया युतः। | जगत्पति भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। अपनी उवास चिरमेकाकी निर्द्वन्द्वः संयतेन्द्रियः॥ ३१ | इन्द्रियोंको वशमें करके निर्द्वन्द्व रहते हुए उन्होंने अकेले ही | बहुत दिनोंतक वहाँ निवास किया। वे शाक और मूल- शाकमूलफलाहारः संतुष्टः समदर्शनः। | फलादिका आहार करते और सदा संतुष्ट रहते थे। उनकी यमैश्च नियमैश्चैव तथा चासनबन्धनैः॥ ३२ | सर्वत्र समान दृष्टि थी। वे यम, नियम, आसन-बन्ध, तीव्र प्राणायामैः सुतीक्ष्णैश्च प्रत्याहारैश्च संततैः। | प्राणायाम, निरन्तर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधिके धारणाभिस्तथा ध्यानैः समाधिभिरतन्द्रितः॥ ३३ | द्वारा निरालस्यभावसे भलीभाँति योगाभ्यास करते रहे। इस | प्रकार समस्त पुरुषार्थोंके ज्ञाता निष्पाप महामना पुण्डरीकजीने योगाभ्यासं तदा सम्यक् चक्रे विगतकल्मषः। | देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुमें चित्त लगाकर उनकी आराधना आराध्य देवदेवेशं तद्गतेनान्तरात्मना॥ ३४ | की और उन्हींमें मन लगाये हुए वे उनके परम अनुग्रहकी पुण्डरीको महाभागः पुरुषार्थविशारदः। | आकाङ्क्षासे भजन करने लगे॥ २९-३५॥ | राजेन्द्र! महात्मा पुण्डरीकको उस शालग्रामक्षेत्रमें प्रसादं परमाकाङ्क्षन् विष्णोस्तद्गतमानसः॥ ३५ | निवास करते बहुत समय बीत गया। तब एक दिन तस्य तस्मिन्निवसतः शालग्रामे महात्मनः। | साक्षात् सूर्यके समान महातेजस्वी, वैष्णवहितकारी, पुण्डरीकस्य राजेन्द्र कालोऽगच्छन्महांस्ततः॥ ३६ | परमार्थवेत्ता एवं विष्णुभक्तिपरायण देवर्षि नारदजी तपोनिधि मुने कदाचित्तं देशं नारदः परमार्थवित्। | पुण्डरीक मुनिको देखनेकी इच्छासे उस क्षेत्रमें गये। | समस्त आगमोंके ज्ञाता, महाबुद्धिमान्, महाप्राज्ञ, पूर्णतेजस्वी जगाम सुमहातेजाः साक्षादादित्यसंनिभः॥ ३७ | एवं प्रभापुञ्जसे उपलक्षित नारदजीको वहाँ आया देख तं द्रष्टुकामो देवर्षिः पुण्डरीकं तपोनिधिम्। | पुण्डरीकके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विनीतभावसे विष्णुभक्तिपरीतात्मा वैष्णवानां हिते रतः॥ ३८ | हाथ जोड़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन किया, फिर यथोचितरूपसे स दृष्ट्वा नारदं प्राप्तं सर्वतेजःप्रभान्वितम्। | उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् परम कान्तिमान् महामतिं महाप्राज्ञं सर्वागमविशारदम्॥ ३९ | विप्रवर पुण्डरीकजी मन-ही-मन यह सोचने लगे कि प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना। | 'ये अद्भुत दिव्य शरीरवाले, मनोरमवेषधारी, तेजस्वी अर्घं दत्त्वा यथायोग्यं प्रणाममकरोत् ततः॥ ४० | महापुरुष कौन हैं? अहो! इनका मुखमण्डल कितना | प्रसन्न है! इनके मस्तकपर जटा-जूट सुशोभित हो रहा कोऽयमत्यद्भुताकारस्तेजस्वी हृद्यवेषधृक्। | है। इन्होंने हाथमें वीणा ले रखी है। इस रूपमें ये साक्षात् आतोद्यहस्तः सुमुखो जटामण्डलभूषणः॥ ४१ | सूर्य ही तो नहीं हैं? अथवा अग्निदेव, इन्द्र और विवस्वानथ वा वह्निरिन्द्रो वरुण एव वा। | वरुणमेंसे तो कोई नहीं हैं?' यों सोचते हुए किसी इति संचिन्तयन् विप्रः पप्रच्छ परमद्युतिः॥ ४२ | निश्चयपर न पहुँचनेके कारण उन्होंने पूछा॥ ३६-४२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८५


पुण्डरीक उवाच को भवानिह सम्प्राप्तः कुतो वा परमद्युते। त्वद्दर्शनं ह्यपुण्यानां प्रायेण भुवि दुर्लभम्॥ ४३

नारद उवाच नारदोऽहमनुप्राप्तस्त्वद्दर्शनकुतूहलात् । पुण्डरीक हरेर्भक्तस्त्वादृशः सततं द्विज॥ ४४ स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तम। पुनाति भगवद्भक्तश्चाण्डालोऽपि यदृच्छया॥ ४५ दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः। इत्युक्तो नारदेनासौ भक्तिपर्याकुलात्मना॥ ४६ प्रोवाच मधुरं विप्रस्तद्दर्शनसुविस्मितः।

पुण्डरीक उवाच धन्योऽहं देहिनामद्य सुपूज्योऽहं सुरैरपि॥ ४७ कृतार्थाः पितरो मेऽद्य सम्प्राप्तं जन्मनः फलम्। अनुगृह्णीष्व देवर्षे त्वद्भक्तस्य विशेषतः॥ ४८ किं किं करोम्यहं विद्वन् भ्राम्यमाणः स्वकर्मभिः। कर्तव्यं परमं गुह्यमुपदेष्टुं त्वमर्हसि॥ ४९ त्वं गतिः सर्वलोकानां वैष्णवानां विशेषतः।

नारद उवाच अनेकानीह शास्त्राणि कर्माणि च तथा द्विज॥ ५० धर्ममार्गाश्च बहवस्तथैव प्राणिनः स्मृताः। वैलक्षण्यं च जगतस्तस्मादेव द्विजोत्तम॥ ५१


पुण्डरीकजी बोले—परम कान्तिमान् दिव्य पुरुष ! आप कौन हैं और कहाँसे पधारे हैं? इस पृथ्वीपर जिन्होंने कभी पुण्य नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये आपका दर्शन प्रायः दुर्लभ ही है॥ ४३॥

नारदजी बोले—पुण्डरीक ! मैं नारद हूँ। तुम्हारे दर्शनकी उत्कण्ठासे ही यहाँ आया हूँ। तुम-जैसा निरन्तर भगवद्भक्तिपरायण पुरुष दुर्लभ है। द्विजोत्तम ! भगवद्भक्त पुरुष यदि जातिका चण्डाल हो तो भी वह स्मरणमात्रसे, वार्तालापसे अथवा सम्मानित होकर, अथवा स्वेच्छासे ही लोगोंको पवित्र कर देता है; फिर तुम्हारे-जैसे भक्त ब्राह्मणके सत्सङ्गकी पावनताके विषयमें तो कहना ही क्या है। द्विज ! मैं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवदेव भगवान् वासुदेवका दास हूँ॥ ४४-४५१/२॥

नारदजीके इस प्रकार अपना परिचय देनेपर उनके दर्शनसे अत्यन्त विस्मित हुए विप्रवर पुण्डरीकजी प्रेम-भक्तिसे विह्वलचित्त होकर मधुर वाणीमें बोले॥ ४६१/२॥

पुण्डरीकजीने कहा—आज मैं समस्त देहधारियोंमें धन्य हूँ, देवताओंन्द्वारा भी सम्माननीय हूँ। आज मेरे पितर कृतार्थ हो गये। मेरा जन्म सफल हो गया। देवर्षे! मैं आपका भक्त हूँ; आप मुझपर अब विशेषरूपसे अनुग्रह करें। विद्वन्! मैं अपने पूर्वजन्मकृत कर्मोंसे प्रेरित हो संसारमें भटक रहा हूँ। बताइये, इससे छुटकारा पानेके लिये मैं क्या-क्या करूँ? मेरे लिये जो परम कर्तव्य हो, वह गोपनीय हो तो भी आप मुझे उसका उपदेश कीजिये। मुने! यों तो आप समस्त लोकोंको ही सहारा देनेवाले हैं, परंतु वैष्णवोंके लिये तो आप विशेषरूपसे शरणदाता हैं॥ ४७-४९१/२॥

नारदजी बोले—द्विज ! इस जगत्में अनेक शास्त्र और अनेक प्रकारके कर्म हैं। इसी तरह यहाँ अनेकों प्राणी हैं और उनके लिये धर्मके मार्ग भी बहुत हैं। द्विजोत्तम ! इसीसे इस जगत्में विचित्रता दिखायी देती है॥ ५०-५१॥


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[ अध्याय ६४

२८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४

अव्यक्ताज्जायते सर्वं सर्वात्मकमिदं जगत्। इत्येवं प्राहुरपरे तत्रैव लयमेव च॥ ५२ आत्मानो बहवः प्रोक्ता नित्याः सर्वगतास्तथा। अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठ तत्त्वालोकनतत्परैः॥ ५३ एवमाद्यनुसंचिन्त्य यथामति यथाश्रुतम्। वदन्ति ऋषयः सर्वे नानामतविशारदाः॥ ५४ शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् कथयामि तवानघ। परमार्थमिदं गुह्यं घोरसंसारमोचनम्॥ ५५ अनागतमतीतं च विप्रकृष्टमतीव यत्। न गृह्णाति नृणां दृष्टिर्वर्तमानार्थनिश्चिता ॥ ५६ शृणुष्वावहितं तात कथयामि तवानघ। यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वं पृच्छतो मम सुव्रत ॥ ५७ कदाचिद्ब्रह्मलोकस्य पद्मयोनिं पितामहम्। प्रणिपत्य यथान्यायं पृष्टवानहमव्ययम् ॥ ५८

कुछ लोगोंका मत है कि यह सम्पूर्ण जगत् सर्वथा अव्यक्तसे उत्पन्न होता है और समय आनेपर उसीमें लीन भी हो जाता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ! कुछ अन्य तत्त्वदर्शी पुरुष आत्माको अनेक, नित्य एवं सर्वत्र व्यापक मानते हैं। अनघ! ब्रह्मन्! इन सब बातोंपर विचार करके नाना मतोंका ज्ञान रखनेवाले समस्त ऋषिगण अपनी बुद्धि और विद्याके अनुसार जिस सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं, उसे सावधान होकर सुनो; वह सब मैं तुमसे बतलाता हूँ। यह बताया जानेवाला गोप्य परमार्थतत्त्व इस घोरतर संसारसे मुक्ति दिलानेवाला है। मनुष्योंकी दृष्टि प्रायः वर्तमान विषयोंको ही निश्चितरूपसे ग्रहण करती है; वह सुदूरवर्ती भूत और भविष्यको नहीं ग्रहण कर सकती। उत्तम व्रतके पालक एवं पापशून्य तात पुण्डरीक! इस विषयमें श्रीब्रह्माजीने पहले मेरे प्रश्न करनेपर मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो। एक समयकी बात है, ब्रह्मलोकमें विराजमान अविनाशी कमलयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके मैंने उनसे यथोचित-रूपसे प्रश्न किया॥ ५२-५८॥

नारद उवाच किं तज्ज्ञानं परं देव कश्च योगः परस्तथा। एतन्मे तत्त्वतः सर्वं त्वमाचक्ष्व पितामह ॥ ५९

नारदजी बोले- देव! लोकपितामह! सबसे उत्तम ज्ञान और सबसे उत्कृष्ट योग कौन-सा है? इस विषयमें सारी बातें आप मुझे ठीक-ठीक बतायें॥ ५९॥

ब्रह्मोवाच यः परः प्रकृतेः प्रोक्तः पुरुषः पञ्चविंशकः। स एव सर्वभूतानां नर इत्यभिधीयते॥ ६० नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः। तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणः स्मृतः ॥ ६१ नारायणाज्जगत्सर्वं सर्गकाले प्रजायते। तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ॥ ६२ नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परम्। नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः॥ ६३

ब्रह्माजी बोले- जो तेईस विकारोंके कारणभूत चौबीसवें तत्त्व प्रकृतिसे भिन्न पचीसवाँ तत्त्व है, वही सम्पूर्ण प्राणिशरीरोंमें 'नर' (पुरुष या आत्मा) कहलाता है। सम्पूर्ण तत्त्व नरसे उत्पन्न हैं, इसलिये 'नार' कहलाते हैं। ये नार जिनके अयन (आश्रय) हैं, अर्थात् जो इनमें व्यापक हैं, वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं। सृष्टिकालमें सम्पूर्ण जगत् भगवान् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयके समय फिर उन्हींमें लीन हो जाता है। नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तत्त्व हैं, नारायण ही

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अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८७ परादपि परश्चासौ तस्मान्नातिपरं मुने। परमज्योति और नारायण ही परम आत्मा हैं। मुने! वे यच्च किंचिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ॥ ६४ भगवान् नारायण परसे भी पर हैं। उनसे बढ़कर या उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। इस जगत्में जो कुछ देखा अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः। या सुना जाता है, सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके एवं विदित्वा तं देवाः साकारं व्याहरन्मुहुः ॥ ६५ भगवान् नारायण स्थित हैं। इस प्रकार उन्हें साकार वस्तुओंमें व्यापक जानकर ही देवताओंने बार-बार उनको 'साकार' नमो नारायणायेति ध्यात्वा चानन्यमानसाः। कहा है तथा 'ॐ नमो नारायणाय'-इस मन्त्रका ध्यान (मानसिक जप) करते हुए अनन्यभावसे उनमें मन किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ॥ ६६ लगाया है। जो अनन्यचित्त हो सदा भगवान् नारायणका ध्यान करता है, उसको दान, तीर्थसेवन, तपस्या और यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः। यज्ञोंसे क्या काम है? भगवान् नारायणका ध्यान ही एतज्ज्ञानं वरं नातो योगश्चैव परतस्तथा ॥ ६७ सर्वोत्तम ज्ञान है तथा इससे बढ़कर दूसरा कोई योग भी नहीं है। परस्परविरुद्ध अर्थको व्यक्त करनेवाले दूसरे- परस्परविरुद्धार्थैः किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। दूसरे शास्त्रोंके विस्तारसे क्या लाभ ? जिस प्रकार एक बहवोऽपि यथा मार्गा विशन्त्येकं महत्पुरम् ॥ ६८ ही बड़े नगरमें बहुत-से मार्गोंका प्रवेश होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके सम्पूर्ण ज्ञान उन परमेश्वर तथा ज्ञानानि सर्वाणि प्रविशन्ति तमीश्वरम्। नारायणमें प्रवेश करते हैं ॥ ६०-६८१/२ ॥ स हि सर्वगतो देवः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः ॥ ६९ वे भगवान् विष्णु अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त हैं, सूक्ष्म तत्त्व हैं, सदा रहनेवाले सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण हैं; परंतु उनका न तो आदि है न अन्त ही। जगदादिरनाद्यन्तः स्वयम्भूद्भूतभावनः। स्वयं वे किसी दूसरेसे उत्पन्न नहीं हैं, अतएव 'स्वयम्भू' विष्णुर्विभुरचिन्त्यात्मा नित्यः सदसदात्मकः ॥ ७० हैं, किंतु इन सम्पूर्ण भूतप्राणियोंको स्वयं ही प्रकट करते हैं। वे विभु, अचिन्त्य, नित्य और कार्य-कारणस्वरूप हैं। वासुदेवो जगद्वासः पुराणः कविरव्ययः। सम्पूर्ण जगत्का उनमें ही निवास है, इसलिये वे 'वासुदेव' यस्मात्प्राप्तं स्थितिं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ७१ कहे गये हैं। वे पुराणपुरुष, त्रिकालदर्शी और अविकारी हैं। यह सम्पूर्ण चराचरमय त्रिभुवन उन्हीं भगवान्के द्वारा तस्मात् स भगवान्देवो विष्णुरित्यभिधीयते। व्याप्त होनेसे स्थित है, इसलिये वे 'विष्णु' कहलाते हैं। यस्माद्वा सर्वभूतानां तत्त्वादीनां युगक्षये ॥ ७२ अथवा युगका क्षय होनेपर महत्तत्त्व आदि समस्त भूतोंका उन्हीं सृष्टिके आश्रयभूत परमात्मामें निवास होता है, इसलिये तस्मिन्निवासः संसर्गे वासुदेवस्ततस्तु सः। वे 'वासुदेव' कहे गये हैं। कुछ लोग उनको पुरुष (आत्मा) तमाहुः पुरुषं केचित्केचिदीश्वरमव्ययम् ॥ ७३ कहते हैं और कुछ लोग अविनाशी ईश्वर बताते हैं। कुछ अन्य लोग उन्हें केवल 'विज्ञानस्वरूप' मानते हैं, कितने विज्ञानमात्रं केचिच्च केचिद्ब्रह्म परं तथा। ही उन्हें परब्रह्म कहते हैं। कुछ विचारक उन्हें आदि- केचित्कालमनाद्यन्तं केचिज्जीवं सनातनम् ॥ ७४ अन्तरहित 'काल' कहते हैं और कुछ मनुष्य उनको 'सनातन जीव' मानते हैं। कुछ लोग 'परमात्मा' कहते केचिच्च परमात्मानं केचिच्चैवमनामयम्। हैं, कुछ उन्हें एक 'निरामय तत्त्व' मानते हैं, कुछ विद्वान् उन्हें 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं और कुछ उन्हें तेईस केचित्क्षेत्रज्ञमित्याहुः केचित्षड्विंशकं तथा ॥ ७५ विकारोंके कारण चौबीसवें तत्त्व प्रकृति और पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे भिन्न 'छब्बीसवाँ तत्त्व' (पुरुषोत्तम) अङ्गुष्ठमात्रं केचिच्च केचित्पद्मरजोपमम्। मानते हैं। कुछ लोग आत्माको अँगूठेके बराबर बताते एते चान्ये च मुनिभिः संज्ञाभेदाः पृथग्विधाः ॥ ७६ हैं और कुछ विद्वान् कमल-पुष्पकी धूलिके एक In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४

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२८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ [मूल संस्कृत श्लोक] शास्त्रेषु कथिता विष्णोर्लोकव्यामोहकारकाः। एकं यदि भवेच्छास्त्रं ज्ञानं निस्संशयं भवेत् ॥ ७७ बहुत्वादिह शास्त्राणां ज्ञानतत्त्वं सुदुर्लभम्। आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ ७८ इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा। त्यक्त्वा व्यामोहकान् सर्वान् तस्माच्छास्त्रार्थविस्तरान् ॥ ७९ अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमतन्द्रितः। एवं ज्ञात्वा तु सततं देवदेवं तमव्ययम् ॥ ८० क्षिप्रं यास्यसि तत्रैव सायुज्यं नात्र संशयः। श्रुत्वेदं ब्रह्मणा प्रोक्तं ज्ञानयोगं सुदुर्लभम् ॥ ८१ ततोऽहमासं विप्रेन्द्र नारायणपरायणः। नमो नारायणायेति ये विदुर्ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ८२ अन्तकाले जपन्तस्ते यान्ति विष्णोः परं पदम्। तस्मान्नारायणस्तात परमात्मा सनातनः ॥ ८३ अनन्यमनसा नित्यं ध्येयस्तत्त्वविचिन्तकैः। नारायणो जगद्व्यापी परमात्मा सनातनः ॥ ८४ जगतां सृष्टिसंहारपरिपालनतत्परः। श्रवणात्पठनाच्चैव निदिध्यासनतत्परैः ॥ ८५ आराध्यः सर्वथा ब्रह्मन् पुरुषेण हितैषिणा। निःस्पृहा नित्यसंतुष्टा ज्ञानिनः संयतेन्द्रियाः ॥ ८६ निर्ममा निरहंकारा रागद्वेषविवर्जिताः। अपक्षपतिताः शान्ताः सर्वसंकल्पवर्जिताः ॥ ८७ ध्यानयोगपरा ब्रह्मन् ते पश्यन्ति जगत्पतिम्। त्यक्तत्रया महात्मानो वासुदेवं हरिं गुरुम् ॥ ८८ कीर्तयन्ति जगन्नाथं ते पश्यन्ति जगत्पतिम्। तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र नारायणपरो भव ॥ ८९ [हिन्दी अनुवाद] कणके बराबर 'अणु' मानते हैं। ऊपर भगवान् विष्णुके जिन नामोंका उल्लेख किया गया है, ये तथा अन्य भी बहुत-से भिन्न-भिन्न नाम मुनियोंद्वारा शास्त्रोंमें कहे गये हैं, जो साधारण लोगोंमें भेद-भ्रमका उत्पादन कर उन्हें मोहमें डालनेवाले हैं। यदि एक ही शास्त्र होता तो सबको संदेहरहित निश्चयात्मक ज्ञान होता। किंतु यहाँ तो बहुतेरे शास्त्र हैं और सबका अलग-अलग सिद्धान्त है; अतः ज्ञानका तत्त्व बड़ा ही दुर्ज्ञेय हो गया है। परंतु मैंने सम्पूर्ण शास्त्रोंका मथन करके विचार किया तो एक यही बात सब सिद्धान्तोंके साररूपसे ज्ञात हुई कि सदा 'भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।' इसलिये मोहमें डालनेवाले सम्पूर्ण शास्त्र-विस्तारोंका त्याग करके एकचित्त होकर उत्साहपूर्वक भगवान् नारायणका ध्यान करो। इस प्रकार सतत चिन्तनके द्वारा उन अविनाशी देवदेव नारायणका तत्त्व जानकर तुम शीघ्र ही उनमें सायुज्य-मुक्ति प्राप्त कर लोगे, इसमें संदेह नहीं है॥ ६९-८०१/२॥ विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माजीके कहे हुए इस परम दुर्लभ ज्ञानयोगको सुनकर मैं तभीसे भगवान् नारायणकी परिचर्यामें लग गया। जो लोग 'ॐ नमो नारायणाय'- इस सनातन ब्रह्मस्वरूप मन्त्रको जानते हैं, वे अन्तकालमें इसका जप करते हुए विष्णुके परमधामको प्राप्त कर लेते हैं। अतः तात! तत्त्व-विचार करनेवाले पुरुषोंको सदा ही सनातन परमात्मा नारायणका अनन्यचित्तसे ध्यान करना चाहिये। भगवान् नारायण जगद्व्यापी सनातन परमेश्वर हैं। ये भिन्न-भिन्न रूपसे सम्पूर्ण लोकोंके सृष्टि, पालन तथा संहार-कार्यमें लगे रहते हैं। इनके नाम, गुण एवं लीलाओंका श्रवण और कीर्तन करते हुए उनके ध्यानमें संलग्न हो उनकी आराधना करनी चाहिये। ब्रह्मन्! अपना हित चाहनेवाले पुरुषके लिये सर्वथा भगवान् नारायणकी आराधना ही कर्तव्य है। विप्रवर! जो लोग निःस्पृह, नित्य- संतुष्ट, ज्ञानी, जितेन्द्रिय और ममता-अहंता, राग-द्वेष आदि विकारोंसे रहित हैं तथा जो पक्षपातशून्य, शान्त एवं सब प्रकारके संकल्पोंसे वर्जित हैं, वे भगवान्के ध्यानयोगमें तत्पर हो उन जगदीश्वरका साक्षात्कार कर लेते हैं। जो महात्मा त्रिभुवनसे नाता तोड़कर जगद्गुरु जगन्नाथ भगवान् वासुदेवका कीर्तन करते हैं, वे उन जगत्पत्तिका दर्शन पा जाते हैं। इसलिये विप्रवर! तुम भी भगवान् नारायणकी समाराधनामें तत्पर हो जाओ ॥ ८१-८९॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८९ तदन्यः को महोदारः प्रार्थितं दातुमीश्वरः । हेलया कीर्तितो यो वै स्वं पदं दिशति द्विज ॥ ९० अपि कार्यस्त्वया चैव जपः स्वाध्याय एव च। तमेवोद्दिश्य देवेशं कुरु नित्यमतन्द्रितः ॥ ९१ किं तत्र बहुभिर्मन्त्रैः किं तत्र बहुभिर्व्रतैः। नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ ९२ चीरवासा जटाधारी त्रिदण्डी मुण्ड एव वा। भूषितो वा द्विजश्रेष्ठ न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ९३ ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचाररताः सदा। तेऽपि यान्ति परं स्थानं नरा नारायणाश्रयाः ॥ ९४ जन्मान्तरसहस्रेषु यस्य स्याद्बुद्धिरीदृशी। दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः ॥ ९५ प्रयाति विष्णुसालोक्यं पुरुषो नात्र संशयः। किं पुनस्तद्गतप्राणः पुरुषः संयतेन्द्रियः ॥ ९६ द्विज! जो अवहेलनापूर्वक नाम लेनेपर भी भक्तको अपना परमधाम दे देते हैं, उन भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा महान् उदार है, जो माँगी हुई वस्तुको देनेमें समर्थ हो ? तुम्हें जप अथवा स्वाध्याय-जो कुछ भी करना हो, उसे उन देवेश्वर भगवान् नारायणके उद्देश्यसे ही सदा आलस्य त्यागकर करते रहो। बहुत-से मन्त्र और व्रतोंसे क्या काम ? 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। द्विजश्रेष्ठ ! कोई चीर वस्त्र पहननेवाला, जटा धारण करनेवाला, त्रिदण्डी, सदा माथा मुँड़ाये रहनेवाला अथवा तरह-तरहके उपकरणोंसे विभूषित ही क्यों न हो, उसके ये बाह्य चिह्न धर्मके कारण नहीं हो सकते; किंतु जो मनुष्य भगवान् नारायणकी शरणमें जा चुके हैं, वे पहले निर्दयी, दुष्ट और सदा पापरत रहे हों तो भी भगवान्‌के परमधामको पधारते हैं। हजारों जन्मोंमें भी जिसकी ऐसी बुद्धि हो जाय कि 'मैं देवदेव, शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् वासुदेवका दास हूँ', वह मनुष्य निःसंदेह भगवान् विष्णुके सालोक्यको प्राप्त होता है; फिर जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर सदा भगवान्‌में ही अपने प्राणोंको लगाये रहता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ९०-९६ ॥ सूत उवाच इत्युक्त्वा देवदेवर्षिस्तत्रैवान्तरधीयत । परोपकारनिरतस्त्रैलोक्यस्यैकभूषणः ॥ ९७ पुण्डरीकोऽपि धर्मात्मा नारायणपरायणः । नमोऽस्तु केशवायेति पुनः पुनरुदीरयन् ॥ ९८ प्रसीदस्व महायोगिन्नित्यमुच्चार्य सर्वदा। हृत्पुण्डरीके गोविन्दं प्रतिष्ठाप्य जनार्दनम् ॥ ९९ तपःसिद्धिकरेऽरण्ये शालग्रामे तपोधनः । उवास चिरमेकाकी पुरुषार्थविचक्षणः ॥ १०० स्वप्नेऽपि केशवादन्यन्न पश्यति महातपाः । निद्रापि तस्य नैवासीत्पुरुषार्थविरोधिनी ॥ १०१ तपसा ब्रह्मचर्येण शौचेन च विशेषतः । जन्मजन्मान्तरारूढसंस्कारेण च स द्विजः ॥ १०२ प्रसादाद्देवदेवस्य सर्वलोकैकसाक्षिणः । अवाप परमां सिद्धिं वैष्णवीं वीतकल्मषः ॥ १०३ सूतजी कहते हैं—सदा दूसरोंके ही उपकारमें लगे रहनेवाले त्रिभुवनभूषण देवर्षि नारदजी उपर्युक्त बातें बताकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। अब धर्मात्मा पुण्डरीक भी एकमात्र भगवान् नारायणके भजनमें तत्पर हो बार-बार इस प्रकार उच्चारण करने लगे—'भगवान् केशवको नमस्कार है; हे महायोगिन् ! आप मुझपर प्रसन्न हों।' निरन्तर यों कहते हुए पुरुषार्थ-साधनमें कुशल वे तपस्वी पुण्डरीकजी अपने हृदय-कमलके आसनपर जनार्दन भगवान् गोविन्दको स्थापितकर तपस्याकी सिद्धि करनेवाले उस 'शालग्राम' नामक तपोवनमें बहुत कालतक अकेले ही रहे। महातपस्वी पुण्डरीक स्वप्नमें भी भगवान् केशवके सिवा दूसरा कुछ नहीं देखते थे। उनकी नींद भी उन्हें पुरुषार्थ-साधनमें बाधा नहीं देती थी। उन पापरहित द्विजवर पुण्डरीकने तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा विशेषतः शौचाचारके पालनसे और जन्म-जन्मान्तरोंकी साधनासे सुदृढ़ हुए भगवद्भक्तिसाधक संस्कारसे सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र साक्षी देवदेव भगवान् विष्णुकी कृपाद्वारा परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि प्राप्त कर ली। उनके निकट

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४ सिंहव्याघ्रास्तथान्येऽपिमृगाः प्राणिविहिंसकाः। सिंह, व्याघ्र तथा दूसरे-दूसरे हिंसक जीव आपसके विरोधं सहजं हित्वा समेतास्तस्य संनिधौ। स्वाभाविक वैर-विरोधको त्याग एक साथ मिलकर निवसन्ति द्विजश्रेष्ठ प्रशान्तेन्द्रियवृत्तयः ॥ १०४ रहते थे। द्विजवर भरद्वाजजी! उनके समीप उन हिंसक जन्तुओंकी इन्द्रियवृत्तियाँ अत्यन्त शान्त रहती थीं॥ ९७-१०४॥ ततः कदाचिद्भगवान् पुण्डरीकस्य धीमतः। तत्पश्चात् एक दिन बुद्धिमान् पुण्डरीकजीके समक्ष प्रादुरासीज्जगन्नाथः पुण्डरीकायतेक्षणः ॥ १०५ जगदीश्वर भगवान् नारायण प्रकट हुए। उनके नेत्र कमल- दलके समान विशाल थे। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः स्रगुज्ज्वलः। गदा सुशोभित थी। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः कौस्तुभेन विभूषितः ॥ १०६ दिव्य पुष्पोंकी माला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्न और लक्ष्मीका निवास था। वे कौस्तुभमणिसे विभूषित थे। कज्जलगिरिके समान आरुह्य गरुडं श्रीमानञ्जनाचलसंनिभः। श्यामवर्ण एवं पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु सुनहली मेरुशृङ्गमिवारूढः कालमेघस्तडिद्युतिः ॥ १०७ कान्तिवाले गरुडपर आरूढ़ हो इस प्रकार सुशोभित होते थे, मानो मेरुगिरिके शिखरपर बिजलीकी कान्तिसे युक्त श्याममेघ शोभा पा रहा हो। भगवान्‌के ऊपर रजतमय राजतेनातपत्रेण मुक्तादामविलम्बिना। श्वेत छत्र तना था, जिसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं। विराजमानो देवेशश्चामरव्यजनादिभिः ॥ १०८ उस समय उस छत्रसे तथा चँवर-व्यजन आदिसे उन देवेश्वरकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १०५-१०८॥ तं दृष्ट्वा देवदेवेशं पुण्डरीकः कृताञ्जलिः। उन देवदेवेश्वर भगवान् नारायणका प्रत्यक्ष दर्शन पपात शिरसा भूमौ साध्वसावनतो द्विजः ॥ १०९ पाकर पुण्डरीकने दोनों हाथ जोड़ लिये। आदरमिश्रित भयसे उनका मस्तक झुक गया। उन्होंने धरतीपर माथा टेक दिया-साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वे विह्वल होकर उन पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां समाकुलः। भगवान् हृषीकेशकी ओर आँखें फाड़-फाड़कर इस प्रकार जगाम महतीं तृप्तिं पुण्डरीकस्तदानघः ॥ ११० देखने लगे, मानो उन्हें पी जायँगे। जिनके दर्शनके लिये वे चिरकालसे प्रार्थना कर रहे थे, उन भगवान्‌को आज तमेवालोकयन् वीरश्चिरप्रार्थितदर्शनः। सामने पाकर उन्हींकी ओर निर्निमेष नयनोंसे देखते हुए ततस्तमाह भगवान् पद्मनाभस्त्रिविक्रमः ॥ १११ पापरहित धीरचित्त पुण्डरीकजीको आज बड़ी ही तृप्ति हुई। तब तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लेनेवाले भगवान् पद्मनाभने पुण्डरीकसे कहा- ॥ १०९-१११॥ प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पुण्डरीक महामते। 'वत्स पुण्डरीक ! तुम्हारा कल्याण हो। महामते ! मैं वरं वृणीष्व दास्यामि यत्ते मनसि वर्तते ॥ ११२ तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसीको वरके रूपमें माँग लो; उसे मैं अवश्य दूँगा'॥ ११२॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं- देवदेव नारायणके कहे हुए इस एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदेवेन भाषितम्। वचनको सुनकर महामति पुण्डरीकने उनसे यों निवेदन इदं विज्ञापयामास पुण्डरीको महामतिः ॥ ११३ किया ॥ ११३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth