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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० गच्छ लक्ष्मण दुष्टोऽसौ नागतः कपिनायकः । गते तु वर्षाकालेऽहमागमिष्यामि तेऽन्तिकम् ॥ ३६ अनेकैर्वानरैः सार्धमित्युक्त्वासौ तदा गतः । तत्र गच्छ त्वरायुक्तो यत्रास्ते कपिनायकः ॥ ३७ तं दुष्टमग्रतः कृत्वा हरिसैनासमन्वितम् । रमन्तं तारया सार्धं शीघ्रमानय मां प्रति ॥ ३८ नात्रागच्छति सुग्रीवो यद्यसौ प्राप्तभूतिकः । तदा त्वयैवं वक्तव्यः सुग्रीवोऽनृतभाषकः ॥ ३९ वालिहन्ता शरो दुष्ट करे मेऽद्यापि तिष्ठति । स्मृत्वैतदाचर कपे रामवाक्यं हितं तव ॥ ४० इत्युक्तस्तु तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा च लक्ष्मणः । पम्पापुरं जगामाथ सुग्रीवो यत्र तिष्ठति । दृष्ट्वा स तत्र सुग्रीवं कपिराजं बभाष वै ॥ ४१ ताराभोगविषक्तस्त्वं रामकार्यपराङ्मुखः । किं त्वया विस्मृतं सर्वं रामाग्रे समयं कृतम् ॥ ४२ सीतामन्विष्य दास्यामि यत्र क्वापीति दुर्मते । हत्वा तु वालिनं राज्यं येन दत्तं पुरा तव ॥ ४३ त्वामृते कोऽवमन्येत कपीन्द्र पापचेतस । प्रतिश्रुत्य च रामस्य भार्याहीनस्य भूपते ॥ ४४ साहाय्यं ते करोमीति देवाग्निजलासन्निधौ । ये ये च शत्रवो राजंस्ते ते च मम शत्रवः ॥ ४५ मित्राणि यानि ते देव तानि मित्राणि मे सदा । सीतामन्वेषितुं राजन् वानरैर्बहुभिर्वृतः ॥ ४६ सत्यं यास्यामि ते पार्श्वमित्युक्त्वा कोऽन्यथाकरोत् । त्वामृते पापिनं दुष्टं रामदेवस्य संनिधौ ॥ ४७ कारयित्वा तु तेनैवं स्वकार्यं दुष्टवानर । ऋषीणां सत्यवद्वाक्यं त्वयि दृष्टं मयाधुना ॥ ४८ सर्वस्य हि कृतार्थस्य मतिरन्या प्रवर्तते । वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् ॥ ४९ 'लक्ष्मण ! तुम पम्पापुरमें जाओ। देखो, क्या कारण है कि वह दुष्ट वानरराज अभीतक नहीं आया। पहले तो वह यही कहकर गया था कि 'वर्षाकाल बीतनेपर मैं अनेक वानरोंके साथ आपके पास आऊँगा।' अब तुम जहाँ वह वानरराज रहता है, वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ। ताराके साथ रमण करनेवाले उस दुष्ट वानरको आगे करके समस्त वानरसेनाके सहित मेरे पास शीघ्र ले आओ। यदि ऐश्वर्य प्राप्त कर लेनेके कारण मदमें चूर हो सुग्रीव यहाँ न आये तो तुम उस असत्यवादीसे यों कहना— 'अरे दुष्ट ! श्रीरामने कहा है कि जिससे वालिका वध किया गया था, वह बाण आज भी मेरे हाथमें मौजूद है; अतः वानर ! इस बातको याद करके तू श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन कर; इसीमें तेरा भला है' ॥ ३३–४० ॥ श्रीरामचन्द्रजीके ऐसी आज्ञा देनेपर लक्ष्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर उसे शिरोधार्य किया और उनको नमस्कार करके वे पम्पापुरमें गये, जहाँ सुग्रीव रहता था। वहाँ उन्होंने वानरराज सुग्रीवको देखकर कहा—'अरे ! तू श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे मुँह मोड़कर यहाँ ताराके साथ भोग-विलासमें फँसा हुआ है ? रे दुर्बुद्धे ! तूने श्रीरामके सामने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'जहाँ-कहीं भी हो, सीताको ढूँढ़कर मैं आपको अर्पित करूँगा' उसे क्या भूल गया ? अरे पापात्मा वानरराज ! जिन्होंने वालिको मारकर पहले ही तुम्हें राज्य दे दिया, ऐसे परोपकारी मित्रका तेरे सिवा कौन अनादर कर सकता है ? तूने देवता, अग्नि और जलके निकट श्रीरामसे यह प्रतिज्ञा की थी कि 'राजन् ! मैं पत्नीसे वियुक्त हुए आपकी सहायता करूँगा। राजन् ! जो-जो आपके शत्रु हैं, वे-वे मेरे भी शत्रु हैं तथा देव ! जो-जो आपके मित्र हैं, वे-वे मेरे भी सदा ही मित्र हैं। राजन् ! मैं बहुत-से वानरोंके साथ सीताकी खोज करानेके लिये अवश्य ही आपके पास आऊँगा।' भगवान् श्रीरामके निकट यों कहकर तुझ- जैसे दुष्ट पापीके सिवा दूसरा कौन है, जो इसके विपरीत आचरण करता। अरे दुष्ट वानर ! इस प्रकार तूने अपना काम तो उनसे करा लिया और उनका कार्य करना तू भूल गया! इस समय ऋषियोंकी यह यथार्थ बात कि 'अपना काम सिद्ध हो जानेपर सभीकी बुद्धि बदल जाती है, जैसे बछड़ा माताके थनोंमें दूधकी कमी देखकर उसे छोड़ देता है [फिर माताकी परवा नहीं करता]' In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१९


जनवृत्तविदां लोके सर्वज्ञानां महात्मनाम्। न तं पश्यामि लोकेऽस्मिन् कृतं प्रतिकरोति यः ॥ ५० शास्त्रेषु निष्कृतिर्दृष्टा महापातकिनामपि। कृतघ्नस्य कपे दुष्ट न दृष्टा निष्कृतिः पुरा ॥ ५१ कृतघ्नता न कार्या ते त्वत्कृतं समयं स्मर। एह्येह्यागच्छ शरणं काकुत्स्थं हितपालकम् ॥ ५२ यदि नायासि च कपे रामवाक्यमिदं शृणु। नयिष्ये मृत्युसदनं सुग्रीवं वालिनं यथा ॥ ५३ स शरो विद्यतेऽस्माकं येन वाली हतः कपिः। लक्ष्मणेनैवमुक्तोऽसौ सुग्रीवः कपिनायकः ॥ ५४ निर्गत्य तु नमश्चक्रे लक्ष्मणं मन्त्रिणोदितः। उवाच च महात्मानं लक्ष्मणं वानराधिपः ॥ ५५ अज्ञानकृतपापानामस्माकं क्षन्तुमर्हसि। समयः कृतो मया राज्ञा रामेणामिततेजसा ॥ ५६ यस्तदानीं महाभाग तमद्यापि न लङ्घये। यास्यामि निखिलैश्च कपिभिर्नृपनन्दन ॥ ५७ त्वया सह महाबीर रामपार्श्वं न संशयः। मां दृष्ट्वा तत्र काकुत्स्थो यद्वक्ष्यति च मां प्रति ॥ ५८ तत्सर्वं शिरसा गृह्य करिष्यामि न संशयः। सन्ति मे हरयः शूराः सीतान्वेषणकर्मणि ॥ ५९ तान्यहं प्रेषयिष्यामि दिक्षु सर्वासु पार्थिव। इत्युक्तः कपिराजेन सुग्रीवेण स लक्ष्मणः ॥ ६० एहि शीघ्रं गमिष्यामो रामपार्श्वमितोऽधुना। सेना चाहूयतां वीर ऋक्षाणां हरिणामपि ॥ ६१ यां दृष्ट्वा प्रीतिमभ्येति राघवस्ते महामते। इत्युक्तो लक्ष्मणेनाथ सुग्रीवः स तु वीर्यवान् ॥ ६२ पार्श्वस्थं युवराजानमङ्गदं संज्ञयाब्रवीत्। सोऽपि निर्गत्य सेनानीमाह सेनापतिं तदा ॥ ६३ तेनाहूताः समागत्य ऋक्षवानरकोटयः। गुहास्थाश्च गिरिस्थाश्च वृक्षस्थाश्चैव वानराः ॥ ६४ तैः सार्धं पर्वताकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः। सुग्रीवः शीघ्रमागत्य ववन्दे राघवं तदा ॥ ६५ लक्ष्मणोऽपि नमस्कृत्य रामं भ्रातरमब्रवीत्। प्रसादं कुरु सुग्रीवे विनीते चाधुना नृप ॥ ६६


मुझे तुझमें ही ठीक-ठीक घटती-सी दीख रही है। संसारमें जो मनुष्योचित सद्व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले हैं, उन सर्वज्ञ महात्माओंमेंसे मैं किसीको भी ऐसा नहीं देखता, जो लोकमें दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकारको न मानता हो। शास्त्रोंमें महापातकी पुरुषोंके भी उद्धारका उपाय (प्रायश्चित्त) देखा गया है, किंतु दुष्ट वानर ! कृतघ्न पुरुषके उद्धारका उपाय मैंने पहले कभी नहीं देखा है। इसलिये तुझे कभी कृतघ्नता नहीं करनी चाहिये। अपनी की हुई प्रतिज्ञाको याद कर। अब आ, तेरे हितकी रक्षा करनेवाले ककुत्स्थकुलनन्दन भगवान् श्रीरामकी शरणमें चल। वानर ! यदि तू नहीं आना चाहता तो यह श्रीरामका वचन सुन। [उन्होंने कहा है-] 'मैं वालिकी ही भाँति सुग्रीवको भी यमपुर भेज दूँगा। जिससे वानरराज वालि मारा गया है, वह बाण अब भी मेरे पास मौजूद है' ॥ ४१-५३ १/२ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर कपिराज सुग्रीव मन्त्रीकी प्रेरणासे बाहर निकले। उन्होंने लक्ष्मणको प्रणाम किया और उन महात्मासे कहा- 'महाभाग! हमारे अज्ञानवश किये हुए अपराधोंको आप क्षमा करें। मैंने उस समय अमिततेजस्वी राजा रामचन्द्रके साथ जो प्रतिज्ञा की थी, उसका अब भी उल्लङ्घन नहीं करूँगा। महावीर राजकुमार ! मैं अब समस्त वानरोंको साथ लेकर आपके साथ श्रीरामके पास चलूँगा। मुझे वहाँ देखकर श्रीरामचन्द्रजी मुझसे जो कुछ भी कहेंगे, उसे मैं शिरोधार्य करके निस्सन्देह पूर्ण करूँगा। राजन् ! मेरे यहाँ बड़े-बड़े वीर वानर हैं। उन सबको मैं सीताजीकी खोज करनेके लिये समस्त दिशाओंमें भेजूँगा' ॥ ५४-५९ १/२ ॥

वानरराज सुग्रीवके यों कहनेपर लक्ष्मणने कहा- 'आओ! अब यहाँसे शीघ्र ही श्रीरामके पास चलें। वीर! महामते ! वानरों और भालुओंकी सेना भी बुला लो, जिसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुमपर प्रसन्न हों।' लक्ष्मणद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परम पराक्रमी सुग्रीवने पास ही खड़े हुए युवराज अङ्गदसे इशारेमें कुछ कहा। अङ्गदने भी जाकर सेनाका संचालन करनेवाले सेनापतिको प्रेरित किया। सेनापतिके बुलानेसे पर्वत, कन्दरा और वृक्षोंपर रहनेवाले करोड़ों वानर आये। पर्वतोंके समान आकारवाले उन भयंकर पराक्रमी वानरोंके साथ सुग्रीवने उस समय शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। साथ ही लक्ष्मणजीने भी अपने भाईको प्रणाम करके कहा- 'राजन् ! इन विनयशील सुग्रीवपर अब आप कृपा करें' ॥ ६०-६६ ॥

२१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०

२१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० इत्युक्तो राघवस्तेन भ्रात्रा सुग्रीवमब्रवीत्। । भाई लक्ष्मणके इस प्रकार अनुरोध करनेपर आगच्छात्र महावीर सुग्रीव कुशलं तव॥ ६७ । श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे कहा—'महावीर सुग्रीव! यहाँ श्रुत्वैत्थं रामवचनं प्रसन्नं च नराधिपम्। । आओ। कहो, कुशल तो है न?' श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा शिरस्यञ्जलिमाधाय सुग्रीवो राममब्रवीत्॥ ६८ । कथन सुनकर और उन नरेशको प्रसन्न जानकर सुग्रीवने तदा मे कुशलं राजन् सीतादेवी तव प्रभो। । सिरपर अञ्जलि जोड़ उनसे कहा—'राजन्! प्रभो! मेरी अन्विष्य तु यदा दत्ता मया भवति नान्यथा॥ ६९ । कुशल तो तभी होगी, जब मैं सीतादेवीको ढूँढ़कर इत्युक्ते वचने तेन हनूमान्मारुतात्मजः। । आपको अर्पित कर दूँ; नहीं तो नहीं'॥ ६७—६९॥ नत्वा रामं बभाषैनं सुग्रीवं कपिनायकम्॥ ७० । सुग्रीवने जब यह बात कही, तब पवनकुमार हनूमान्‌जी शृणु सुग्रीव मे वाक्यं राजायं दुःखितो भृशम्। । श्रीरामको नमस्कार करके कपिराज सुग्रीवसे बोले— सीतावियोगेन च सदा नाश्नाति च फलादिकम्॥ ७१ । 'सुग्रीव! आप मेरी बात सुनें। ये राजा श्रीरामचन्द्रजी अस्य दुःखेन सततं लक्ष्मणोऽयं सुदुःखितः। । सीताके वियोगसे सदा ही बहुत दुःखी रहते हैं, इसीलिये एतयोस्त्र यावस्था तां श्रुत्वा भरतोऽनुजः॥ ७२ । फल आदिका भी आहार नहीं करते। इन्हींके दुःखसे दुःखी भवति तद्दुःखाद्दुःखं प्राप्नोति तज्जनः। । ये लक्ष्मण भी सदा अत्यन्त दुःखित रहा करते हैं। इन यत एवमतो राजन् सीतान्वेषणमाचर॥ ७३ । दोनोंकी यहाँ जो अवस्था है, उसे सुनकर इनके छोटे इत्युक्ते वचने तत्र वायुपुत्रेण धीमता। । भाई भरत भी दुःखी होते हैं और उनके दुःखसे वहाँके जाम्बवानतितेजस्वी नत्वा रामं पुरःस्थितः॥ ७४ । सभी लोग दुःखमें पड़े रहते हैं। राजन्! चूँकि ऐसी स प्राह कपिराजं तं नीतिमान् नीतिमद्वचः। । स्थिति है, अतः आप बहुत शीघ्र सीताकी खोज यदुक्तं वायुपुत्रेण तत्तथेत्यवगच्छ भोः॥ ७५ । कराइये'॥ ७०—७३॥ यत्र क्वापि स्थिता सीता रामभार्या यशस्विनी। । बुद्धिमान् वायुनन्दनके यों कहनेपर अत्यन्त तेजस्वी पतिव्रता महाभागा वैदेही जनकात्मजा॥ ७६ । जाम्बवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके सामने खड़े हो अद्यापि वृत्तसम्पन्ना इति मे मनसि स्थितम्। । गये। वे नीतिज्ञ थे, अतः कपिराज सुग्रीवसे नीतियुक्त न हि कल्याणचित्तायाः सीतायाः केनचिद्भुवि॥ ७७ । वचन बोले—'सुग्रीव! हनूमान्‌जीने जो कहा है, उसे पराभवोऽस्ति सुग्रीव प्रेषयाद्यैव वानरान्। । आप ठीक ही समझें। श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी भार्या इत्युक्तस्तेन सुग्रीवः प्रीतात्मा कपिनायकः॥ ७८ । विदेहकुलनन्दिनी जनककुमारी महाभागा पतिव्रता सीता पश्चिमायां दिशि तदा प्रेषयामास तान् कपीन्। । जहाँ-कहीं भी होंगी, आज भी सदाचारसे सम्पन्न होंगी— अन्वेष्टुं रामभार्यां तां महाबलपराक्रमः॥ ७९ । यह विचार मेरे मनमें निश्चितरूपसे जमा हुआ है। उत्तरस्यां दिशि तदा नियुतान् वानरानसौ। । सुग्रीव! सदा कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीमें ही मन प्रेषयामास धर्मात्मा सीतान्वेषणकर्मणि॥ ८० । लगाये रहनेवाली सीताजीका इस पृथ्वीपर किसीके द्वारा । भी पराभव नहीं हो सकता। इसलिये आप अभी । वानरोंको भेजें'॥ ७४—७७१/२॥ । जाम्बवान्‌के इस प्रकार कहनेपर महान् बल और । पराक्रमसे युक्त कपिराज सुग्रीवने प्रसन्न हो सीताकी । खोजके लिये बहुत-से वानरोंको पश्चिम दिशामें भेजा । तथा उन धर्मात्माने उत्तर दिशामें भी सीताको ढूँढ़नेके । निमित्त एक लाख वानरोंको उसी समय भेज दिया। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१३


पूर्वस्यां दिशि कपींश्च कपिराजः प्रतापवान् । प्रेषयामास रामस्य सुभार्यान्वेषणाय वै ॥ ८१

इति तान् प्रेषयामास वानरान् वानराधिपः । सुग्रीवो वालिपुत्रं तमङ्गदं प्राह बुद्धिमान् ॥ ८२

त्वं गच्छ दक्षिणं देशं सीतान्वेषणकर्मणि । जाम्बवांश्च हनूमांश्च मैन्दो द्विविद एव च ॥ ८३

नीलाद्याश्चैव हरयो महाबलपराक्रमाः। अनुयास्यन्ति गच्छन्तं त्वामद्य मम शासनात् ॥ ८४

अचिरादेव यूयं तां दृष्ट्वा सीतां यशस्विनीम् । स्थानतो रूपतश्चैव शीलतश्च विशेषतः ॥ ८५

केन नीता च कुत्रास्ते ज्ञात्वात्रागच्छ पुत्रक । इत्युक्तः कपिराजेन पितृव्येण महात्मना ॥ ८६

अङ्गदस्तूर्णमुत्थाय तस्याज्ञां शिरसा दधे । इत्युक्ते दूरतः स्थाप्य वानरानथ जाम्बवान् ॥ ८७

रामं च लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं मारुतात्मजम्। एकतः स्थाप्य तानाह नीतिमान् नीतिमद्वचः ॥ ८८

श्रूयतां वचनं मेऽद्य सीतान्वेषणकर्मणि । श्रुत्वा च तद्गृहाण त्वं रोचते यन्नृपात्मज ॥ ८९

रावणेन जनस्थानान्नीयमाना तपस्विनी। जटायुषा तु सा दृष्टा शक्त्या युद्धं प्रकुर्वता ॥ ९०

भूषणानि च दृष्टानि तया क्षिप्तानि तेन वै। तान्यस्माभिः प्रदृष्टानि सुग्रीवायार्पितानि च ॥ ९१

जटायुवाक्याद्राजेन्द्र सत्यमित्यवधारय । एतस्मात्कारणात्सीता नीता तेनैव रक्षसा ॥ ९२

रावणेन महाबाहो लङ्कायां वर्तते तु सा । त्वां स्मरन्ती तु तत्रस्था त्वद्दुःखेन सुदुःखिता ॥ ९३

रक्षन्ती यत्नतो वृत्तं तत्रापि जनकात्मजा । त्वद्ध्यानेनैव स्वान् प्राणान्धारयन्ती शुभानना ॥ ९४


[हिन्दी अनुवाद]

इसी प्रकार प्रतापी वानरराजने पूर्व दिशामें भी रामकी श्रेष्ठ भार्या सीताका अन्वेषण करनेके लिये बहुत-से वानर भेजे। बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवने इस प्रकार वानरोंको भेज लेनेके बाद वालिकुमार अङ्गदसे कहा—'अङ्गद ! तुम सीताकी खोज करनेके लिये दक्षिण दिशामें जाओ। मेरी आज्ञासे आज तुम्हारे चलते समय तुम्हारे साथ जाम्बवान्, हनूमान्, मैन्द, द्विविद और नील आदि महाबली एवं महापराक्रमी वानर जायँगे। बेटा! तुम सभी लोग बहुत शीघ्र जाकर यशस्विनी सीताका दर्शन करो और यह भी पता लगाओ, 'वे कैसे स्थानमें हैं, किस रूपमें हैं ? विशेषतः उनका आचरण कैसा है ? कौन उन्हें ले गया है ? तथा उसने उन्हें कहाँ रखा है ?'—यह सब जानकर शीघ्र लौट आओ'॥ ७८–८५१/२॥

अपने चाचा महात्मा सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर अङ्गदने तुरंत उठकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। सुग्रीवकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर नीतिज्ञ जाम्बवान्ने सब वानरोंको कुछ दूर खड़ा कर दिया और श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा हनुमान्जीको एक जगह करके उनसे यह नीतियुक्त बात कही—'नृपनन्दन श्रीरामचन्द्रजी ! सीताका अन्वेषण करनेके विषयमें इस समय आप मेरी एक बात सुनें और सुननेके बाद यदि वह अच्छी लगे तो उसे स्वीकार करें। जटायुने तपस्विनी सीताको जनस्थानसे रावणद्वारा ले जायी जाती हुई देखा था तथा उन्होंने उसके साथ यथाशक्ति युद्ध भी किया था। साथ ही, सीताजीने उस समय अपने आभूषण उतार फेंके थे, जिनको जटायुने और हम लोगोंने भी देखा था। उन आभूषणोंको हमने सुग्रीवको अर्पित कर दिया है। इस कारण राजेन्द्र ! जटायुके कथनानुसार आप इस बातको सत्य समझें कि सीताजीको वही दुष्ट राक्षस रावण ले गया है और महाबाहो ! वे इस समय लङ्कामें ही हैं। वहाँ रहकर भी वे आपके ही दुःखसे अत्यन्त दुःखी हो निरन्तर आपका ही स्मरण किया करती हैं। जनकनन्दिनी सीता लङ्कामें रहकर भी अपने सदाचारकी यत्नपूर्वक रक्षा कर रही हैं। वे सुमुखी सीतादेवी आपके ही ध्यानसे अपने प्राणोंको धारण करती हुई


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२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५०

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं यथावत पाठ प्रस्तुत है:

२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५० स्थिता प्रायेण ते देवी सीता दुःखपरायणा। | प्रायः आपके ही वियोग-दुःखमें डूबी रहती हैं। इसलिये हितमेव च ते राजन्नुदधेर्लङ्घने क्षमम्॥ ९५ | राजन्! इस समय आपके हितकी ही बात बता रहा हूँ, वायुपुत्रं हनूमन्तं त्वमत्रादेष्टुमर्हसि। | आप इस कार्यके लिये वायुपुत्र हनूमान्जीको आज्ञा दें; क्योंकि ये ही समुद्र लाँघनेमें समर्थ हैं और सुग्रीव ! आपको त्वं चाप्यर्हसि सुग्रीव प्रेषितुं मारुतात्मजम्॥ ९६ | भी चाहिये कि पवनकुमार हनूमान्जीको ही वहाँ भेजें; तमृते सागरं गन्तुं वानराणां न विद्यते। | क्योंकि वानरोंमें उनके अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो बलं कस्यापि वा वीर इति मे मनसि स्थितम्॥ ९७ | समुद्रके पार जा सके तथा हे वीर! इनके बराबर किसीका बल भी नहीं है। बस, मेरे मनमें यही विचार है। मेरे क्रियतां मद्द्वचः क्षिप्रं हितं पथ्यं च नः सदा। | कथनका शीघ्र पालन किया जाय; क्योंकि यह हमारे लिये उक्ते जाम्बवतैवं तु नीतिस्वल्पाक्षरान्विते॥ ९८ | सदा ही हितकर और लाभकारी होगा' ॥ ८६–९७१/२ ॥ वाक्ये वानरराजोऽसौ शीघ्रमुत्थाय चासनात्। | जाम्बवान्के इस प्रकार थोड़े अक्षरोंमें नीतियुक्त वचन कहनेपर वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही अपने आसनसे वायुपुत्रसमीपं तु तं गत्वा वाक्यमब्रवीत्॥ ९९ | उठे और वायुनन्दन हनूमान्जीके निकट जाकर उनसे बोले- ॥ ९८-९९ ॥ शृणु मद्द्वचनं वीर हनूमन्मारुतात्मज। | "पवनकुमार वीर हनूमान्जी ! तुम मेरी बात सुनो। अयमिक्ष्वाकुतिलको राजा रामः प्रतापवान्॥ १०० | ये प्रतापी राजा श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशके भूषण हैं। पितुरादेशमादाय भ्रातृभार्यासमन्वितः। | ये अपने पिताकी आज्ञा मानकर भाई और पत्नीके सहित प्रविष्टो दण्डकारण्यं साक्षाद्धर्मपरायणः॥ १०१ | दण्डकारण्यमें चले आये थे। सदैव धर्ममें तत्पर रहनेवाले सर्वात्मा सर्वलोकेशो विष्णुर्मानुषरूपवान्। | ये श्रीराम समस्त लोकोंके ईश्वर और सबके आत्मा अस्य भार्या हृता तेन दुष्टेनापि दुरात्मना॥ १०२ | साक्षात् भगवान् विष्णु ही हैं। इस समय मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इनकी धर्मपत्नी सीताको दुष्ट दुरात्मा तद्वियोगजदुःखार्तो विचिन्वंस्तां वने वने। | रावणने हर लिया है। ये प्रतापी वीर राजा उन्हींके त्वया दृष्टो नृपः पूर्वमयं वीरः प्रतापवान्॥ १०३ | वियोगजन्य दुःखसे पीड़ित हो वन-वनमें उन्हींकी खोज करते हुए आ रहे थे, जबकि तुमने इन्हें पहले-पहल एतेन सह संगम्य समयं चापि कारितम्। | देखा था। इनके साथ मिलकर हमने प्रतिज्ञा भी की थी। अनेन निहतः शत्रुमम वालिर्महाबलः॥ १०४ | इन्होंने मेरे शत्रु महाबली वालिका वध किया तथा कपे! अस्य प्रसादेन कपे राज्यं प्राप्तं मयाधुना। | इन्हींकी कृपासे मैंने इस समय अपना राज्य प्राप्त किया मया च तत्प्रतिज्ञातमस्य साहाय्यकर्मणि॥ १०५ | है और मैंने भी इनकी सहायताके लिये प्रतिज्ञा की है। तत्सत्यं कर्तुमिच्छामि त्वद्बलान्मारुतात्मज। | पवननन्दन ! मैं अपनी उस प्रतिज्ञाको तुम्हारे ही बलपर उत्तीर्य सागरं वीर दृष्ट्वा सीतामनिन्दिताम्॥ १०६ | पूर्ण करना चाहता हूँ। वीर! समुद्रके पार जा पतिव्रता सीताको देखकर पुनः समुद्रके इस पार लौट आनेकी भूयस्तर्तुं बलं नास्ति वानराणां त्वया विना। | सामर्थ्य तुम्हारे सिवा वानरोंमेंसे किसीमें भी नहीं है। अतस्त्वमेव जानासि स्वामिकार्यं महामते॥ १०७ | अतः महामते ! तुम्हीं अपने स्वामीके कार्यको ठीक- बलवान्नीतिमांश्चैव दक्षस्त्वं दौत्यकर्मणि। | ठीक जान सकते हो; क्योंकि तुम बलवान्, नीतिज्ञ और दूतकर्ममें दक्ष हो" ॥ १००–१०७१/२ ॥ तेनैवमुक्तो हनुमान् सुग्रीवेण महात्मना॥ १०८ | महात्मा सुग्रीवके यों कहनेपर हनूमान्जी बोले- स्वामिनोऽर्थं न किं कुर्यामीदृशं किं नु भाषसे। | 'आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? भला, अपने स्वामी इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामस्तं पुरतः स्थितम्॥ १०९ | भगवान् श्रीरामका कार्य क्या मैं नहीं करूँगा?' वायुनन्दनके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१५ प्राह वाक्यं महाबाहुर्बाष्पसम्पूर्णलोचनः। इस प्रकार उत्तर देनेपर शत्रुविजयी महाबाहु राम सीताकी सीतां स्मृत्वा सुदुःखार्तः कालयुक्तममित्रजित् ॥ ११० यादसे अत्यन्त दुःखी हो, आँखोंमें आँसू भरकर, सामने बैठे हुए हनुमान्‌जीसे समयोचित वचन बोले—'महामते ! त्वयि भारं समारोप्य समुद्रतरणादिकम्। मैं समुद्रके पार जाने आदिका भार तुम्हारे ही ऊपर सुग्रीवः स्थाप्यते ह्यत्र मया सार्धं महामते ॥ १११ रखकर सुग्रीवको अपने साथ रखता हूँ। हनूमन् ! तुम हनूमंस्तत्र गच्छ त्वं मत्प्रीतौ कृतनिश्चयः। मेरी, इन वानर-बन्धुओंकी और विशेषतः सुग्रीवकी ज्ञातीनां च तथा प्रीतौ सुग्रीवस्य विशेषतः ॥ ११२ प्रसन्नताके लिये दृढ़ निश्चय करके वहाँ (लङ्कामें) जाओ। महावीर ! प्रायः यही जान पड़ता है कि रावण प्रायेण रक्षसा नीता भार्या मे जनकात्मजा। नामक राक्षस ही सीताको ले गया है; अतः जहाँ सीता तत्र गच्छ महावीर यत्र सीता व्यवस्थिता ॥ ११३ रखी गयी हो, वहाँ जाना। यदि वे पूछें कि 'तुम जिनके यदि पृच्छति सादृश्यं मदाकारमशेषतः। पाससे आते हो, उन श्रीराम और लक्ष्मणका स्वरूप अतो निरीक्ष्य मां भूयो लक्ष्मणं च ममानुजम् ॥ ११४ कैसा है?' तो इसका उत्तर देनेके लिये तुम मेरे शरीरको तथा मेरे छोटे भाई लक्ष्मणको भी अच्छी तरह ज्ञात्वा सर्वाङ्गगं लक्ष्म सकलं चावयोरिह । देख लो। हम दोनोंके शरीरका प्रत्येक चिह्न देखकर नान्यथा विश्वसेत्सीता इति मे मनसि स्थितम् ॥ ११५ उनसे बताना। नहीं तो सीता तुमपर विश्वास नहीं कर सकतीं—यह मेरे मनका दृढ़ विचार है' ॥ १०८–११५॥ इत्युक्तो रामदेवेन प्रभञ्जनसुतो बली। भगवान् श्रीरामके यों कहनेपर महाबली वायुनन्दन उत्थाय तत्पुरः स्थित्वा कृताञ्जलिरुवाच तम् ॥ ११६ हनुमान् उठकर उनके सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर उनसे बोले—'मैं आप दोनोंके सब लक्षण जानामि लक्षणं सर्वं युवयोस्तु विशेषतः । विशेषरूपसे जानता हूँ; अब मैं वानरोंके साथ जा रहा हूँ, गच्छामि कपिभिः सार्धं त्वं शोकं मा कुरुष्व वै ॥ ११७ आप खेद न करें। कमललोचन राजन् ! इसके अतिरिक्त अन्यच्च देह्यभिज्ञानं विश्वासो येन मे भवेत् । आप मुझे कोई पहचानकी वस्तु दीजिये, जिससे आपकी सीतायास्तव देव्यास्तु राजन् राजीवलोचन ॥ ११८ महारानी सीताका मुझपर विश्वास हो ॥ ११६–११८॥ इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामः कमललोचनः । वायुनन्दन हनुमान्‌के इस प्रकार अनुरोध करनेपर कमलनयन श्रीरामने अपनी अँगूठी निकालकर दे दी, अङ्गुलीयकमुन्मुच्य दत्तवान् रामचिह्नितम् ॥ ११९ जिसपर 'राम' नाम खुदा हुआ था। उसे लेकर पवनकुमार तद्गृहीत्वा तदा सोऽपि हनूमान्मारुतात्मजः। हनूमान्‌ने भी श्रीराम, लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीवकी रामं प्रदक्षिणीकृत्य लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १२० परिक्रमा की। फिर उन्हें प्रणामकर वे अञ्जनीनन्दन हनूमान् नत्वा ततो जगामाशु हनूमानञ्जनीसुतः । वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले। तब सुग्रीव भी अपने आज्ञाकारी सुग्रीवोऽपि च ताञ्छ्रुत्वा वानरान् गन्तुमुद्यतान् ॥ १२१ एवं बलाभिमानी वानरोंके विषयमें यह जानकर कि वे आज्ञेयानाज्ञापयति वानरान् बलदर्पितान् । जानेके लिये उद्यत हैं, उन्हें आदेश देते हुए बोले—'सभी वानर इस समय मेरी आज्ञा सुन लें—तुम पर्वतों और शृण्वन्तु वानराः सर्वे शासनं मम भाषितम् ॥ १२२ वनोंमें विलम मत जाना। शीघ्र जाकर महाभागा रामपत्नी विलम्बनं न कर्तव्यं युष्माभिः पर्वतादिषु । पतिव्रता सीताका पता लगाकर लौट आना; मैं श्रीरामचन्द्रजी- द्रुतं गत्वा तु तां वीक्ष्य आगन्तव्यमनिन्दिताम् ॥ १२३ के पास ठहरता हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाके विपरीत चलोगे रामपत्नीं महाभागां स्थास्येऽहं रामसंनिधौ । तो मैं तुम्हारी नाक और कान काट लूँगा' ॥ ११९–१२४॥ कर्तनं वा करिष्यामि अन्यथा कर्णनास्योः ॥ १२४

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२१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०

२१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० एवं तान् प्रेषयित्वा तु आज्ञापूर्वं कपीश्वरः । अथ ते वानरा याताः पश्चिमादिषु दिक्षु वै ॥ १२५ ते सानुषु समस्तेषु गिरीणामपि मूर्धसु । नदीतीरेषु सर्वेषु मुनीनामाश्रमेषु च ॥ १२६ कन्दरेषु च सर्वेषु वनेषूपवनेषु च । वृक्षेषु वृक्षगुल्मेषु गुहासु च शिलासु च ॥ १२७ सह्यपर्वतपार्श्वेषु विन्ध्यसागरपार्श्वयोः । हिमवत्यपि शैले च तथा किम्पुरुषादिषु ॥ १२८ मनुदेशेषु सर्वेषु सप्तपातालकेषु च । मध्यदेशेषु सर्वेषु काश्मीरेषु महाबलाः ॥ १२९ पूर्वदेशेषु सर्वेषु कामरूपेषु कोशले । तीर्थस्थानेषु सर्वेषु सप्तकोङ्कणकेषु च ॥ १३० यत्र तत्रैव ते सीतामदृष्ट्वा पुनरागताः । आगत्य ते नमस्कृत्य रामलक्ष्मणपादयोः ॥ १३१ सुग्रीवं च विशेषेण नास्माभिः कमलेक्षणा । दृष्टा सीता महाभागेत्युक्त्वा तांस्तत्र तस्थिरे ॥ १३२ ततस्तं दुःखितं प्राह रामदेवं कपीश्वरः । सीता दक्षिणदिग्भागे स्थिता द्रष्टुं वने नृप ॥ १३३ शक्या वानरसिंहेन वायुपुत्रेण धीमता । दृष्टा सीतामिहायाति हनूमान्नात्र संशयः ॥ १३४ स्थिरो भव महाबाहो राम सत्यमिदं वचः । लक्ष्मणोऽप्याह शकुनं तत्र वाक्यमिदं तदा ॥ १३५ सर्वथा दृष्टसीतस्तु हनुमानागमिष्यति । इत्याश्वास्य स्थितौ तत्र रामं सुग्रीवलक्ष्मणौ ॥ १३६ अथाङ्गदं पुरस्कृत्य ये गता वानरोत्तमाः । यत्नादन्वेषणार्थाय रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ १३७ अदृष्ट्वा श्रममापन्नाः कृच्छ्रभूतास्तदा वने । भक्षणेन विहीनास्ते क्षुधया च प्रपीडिताः ॥ १३८ भ्रमद्भिर्गहनेऽरण्ये क्वापि दृष्टा च सुप्रभा । गुहानिवासिनी सिद्धा ऋषिपत्नी ह्यनिन्दिता ॥ १३९ सा च तानागतान्दृष्ट्वा स्वाश्रमं प्रति वानरान् । आगताः कस्य यूयं तु कुतः किं नु प्रयोजनम् ॥ १४० कपिराज सुग्रीवने इस प्रकार आज्ञापूर्वक उन्हें भेजा और वे वानर पश्चिम आदि दिशाओंमें चल पड़े। समस्त पर्वतोंके सानुओं (उपत्यकाओं) और शिखरोंपर, सारी नदियोंके तटोंपर, मुनियोंके आश्रमोंमें, खड्डोंमें, सब प्रकारके वनों और उपवनोंमें, वृक्षों और झाड़ियोंमें, कन्दराओं तथा शिलाओंमें, सह्यपर्वतके आस-पास, विन्ध्याचल और समुद्रके निकट, हिमालय पर्वतपर किम्पुरुष आदि देशोंमें, समस्त मानवीय प्रदेशोंमें, सातों पातालोंमें, सम्पूर्ण मध्यप्रदेशोंमें, कश्मीरमें, पूर्वदिशाके सारे देशोंमें, कामरूप (आसाम) और कोशल (अवध)-में, सम्पूर्ण तीर्थ-स्थानोंमें तथा सातों कोङ्कण देशोंमें भी जहाँ-तहाँ सर्वत्र सीताकी खोज करते हुए वे महाबली वानर उन्हें न पाकर लौट आये। आकर उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणके चरणोंमें तथा विशेषतः सुग्रीवको प्रणाम किया और यह कहकर कि 'हमने कमललोचना महाभागा सीताको कहीं नहीं देखा', वहाँ खड़े हो गये ॥ १२५-१३२ ॥ तब दुःखित हुए भगवान् रामसे कपिराज सुग्रीवने कहा-'राजन् ! सीताजी दक्षिण दिशामें ही वनमें स्थित हैं; उन्हें वानरश्रेष्ठ बुद्धिमान् पवनकुमार ही देख सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि हनुमान्जी सीताको देखकर ही आयेंगे। महाबाहु श्रीराम ! आप धैर्य धारण करें, मेरा यह कथन बिलकुल सत्य है।' तब लक्ष्मणने भी शकुन देखकर यह बात कही - 'हनुमान् सर्वथा सीताको देखकर ही आयेंगे।' इस प्रकार सुग्रीव और लक्ष्मण भगवान् श्रीरामको सान्त्वना देते हुए उनके पास रहने लगे ॥ १३३-१३६ ॥ इधर जो-जो श्रेष्ठ वानर अङ्गदजीको आगे करके यशस्विनी श्रीसीताजीकी यत्नपूर्वक खोज करनेके लिये गये थे, वे वनमें कहीं भी सीताजीका पता न पाकर बहुत थक गये तथा कष्टमें पड़ गये। यही नहीं, कुछ भोजन न मिलनेके कारण वे भूखसे भी बहुत पीड़ित हो गये। गहन वनमें घूमते हुए उन्होंने एक परम कान्तिमयी और उत्तम गुणोंवाली ऋषिपत्नी देखी, जो कन्दरामें निवास करनेवाली और सिद्धा थी। उसने उन वानरोंको अपने आश्रमपर आया देख पूछा- 'आप लोग किसके दूत हैं? कहाँसे आये हैं? और यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है?' ॥ १३७-१४० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१७ इत्युक्ते जाम्बवानाह तां सिद्धां सुमहामतिः । | उसकी बात सुनकर महामति जाम्बवान्ने उस सिद्धा सुग्रीवस्य वयं भृत्या आगता ह्यत्र शोभने ॥ १४१ | तपस्विनीसे कहा—'शोभने! पापहीने! हम सुग्रीवके भृत्य | हैं, श्रीरामचन्द्रजीकी भार्या सीताकी खोज करनेके लिये यहाँ रामभार्यार्थमनघे सीतान्वेषणकर्मणि । | आये हैं। हम किस दिशाको जायँ, इसका ज्ञान हमें नहीं कां दिग्भूता निराहारा अदृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ १४२ | रह गया है। सीताजीका पता न पानेके कारण अभीतक हमने | कुछ भोजन भी नहीं किया' ॥ १४१-१४२ ॥ इत्युक्ते जाम्बवत्यत्र पुनस्तानाह सा शुभा। | जाम्बवान्के यों कहनेपर उस कल्याणी तपस्विनीने जानामि रामं सीतां च लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १४३ | पुनः उन वानरोंसे कहा—'मैं श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और | कपिराज सुग्रीवको भी जानती हूँ। वानरेन्द्रगण! आप लोग भुञ्जीध्वमत्र मे दत्तमाहारं च कपीश्वराः । | यहाँ मेरा दिया हुआ आहार ग्रहण करें। आप लोग रामकार्यगतास्त्वत्र यूयं रामसमा मम ॥ १४४ | श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे यहाँ आये हैं, अतः हमारे लिये | श्रीरामचन्द्रजीके समान ही आदरणीय हैं।' यों कहकर इत्युक्त्वा चामृतं तेषां योगाद्दत्त्वा तपस्विनी । | उस तपस्विनीने अपने योगबलसे उन वानरोंको अमृतमय भोजयित्वा यथाकामं भूयस्तानाह तापसी ॥ १४५ | मधुर पदार्थ अर्पित किया तथा यथेष्ट भोजन कराकर पुनः | उनसे कहा—'सीताका स्थान पक्षिराज सम्पातिको ज्ञात है। सीतास्थानं तु जानाति सम्पातिर्नाम पक्षिराट् । | वे इसी वनमें महेन्द्रपर्वतपर रहते हैं। वानरगण! आप आस्थितो वै वने सोऽपि महेन्द्रे पर्वते द्विजः ॥ १४६ | लोग इसी मार्गसे वहाँ पहुँच जायँगे। सम्पाति बहुत मार्गेणानेन हरयस्तत्र यूयं गमिष्यथ । | दूरतक देखनेवाले हैं, अतः वे सीताका पता बता देंगे। स वक्ति सीतां सम्पातिर्दूरदर्शी तु यः खगः ॥ १४७ | उनके बताये हुए मार्गसे आप लोग पुनः आगे जाइयेगा। | जनकनन्दिनी सीताको ये पवनकुमार हनुमान्जी अवश्य तेनादिष्टं तु पन्थानं पुनरासाद्य गच्छथ। | देख लेंगे' ॥ १४३–१४८॥ अवश्यं जानकीं सीतां द्रक्ष्यते पवनात्मजः ॥ १४८ | तयैवमुक्ताः कपयः परां प्रीतिमुपागताः । | उसके इस प्रकार कहनेपर वानरगण बहुत ही प्रसन्न हृष्टास्तेजनमापन्नास्तां प्रणम्य प्रतस्थिरे ॥ १४९ | हुए; उन्हें बड़ा उत्साह मिला। फिर वे उस तपस्विनीको | प्रणाम करके वहाँसे प्रस्थित हुए। सम्पातिको देखनेकी महेन्द्राद्रिं गता वीरा वानरास्तद्दिदृक्षया । | इच्छासे वे वीर कपीश्वर महेन्द्रपर्वतपर गये तथा वहाँ बैठे तत्र सम्पातिमासीनं दृष्टवन्तः कपीश्वराः ॥ १५० | हुए सम्पातिको उन्होंने देखा। तब पक्षिराज सम्पातिने वहाँ | आये हुए वानरोंसे कहा—'आप लोग कौन हैं? किसके तानुवाचाथ सम्पातिर्वानरानागतान्द्विजः । | दूत हैं? कहाँसे आये हैं? शीघ्र बतायें' ॥ १४९–१५१ ॥ के यूयमिति सम्प्राप्ताः कस्य वा ब्रूत मा चिरम् ॥ १५१ | | सम्पातिके यों पूछनेपर वानरोंने सारा समाचार यथार्थरूपसे इत्युक्ते वानरा ऊचुर्यथावृत्तमनुक्रमात् । | क्रमशः बताना आरम्भ किया—'पक्षिराज! हम सब रामदूता वयं सर्वे सीतान्वेषणकर्मणि ॥ १५२ | श्रीरामचन्द्रजीके दूत हैं। कपिराज महात्मा सुग्रीवने हमें | सीताजीकी खोजके लिये भेजा है। पक्षिवर! एक सिद्धाके प्रेषिताः कपिराजेन सुग्रीवेण महात्मना । | कहनेसे हम आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं। त्वां द्रष्टुमिह सम्प्राप्ताः सिद्धाया वचनाद्विज ॥ १५३ | महामते! महाभाग! सीताके स्थानका पता आप हमें बता सीतास्थानं महाभाग त्वं नो वद महामते। | दें।' वानरोंके इस तरह अनुरोध करनेपर गृध्र सम्पातिने इत्युक्तो वानरैः श्येनो वीक्षांचक्रे सुदक्षिणाम् ॥ १५४ | अपनी दृष्टि दक्षिण दिशाकी ओर दौड़ायी और पतिव्रता In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०

२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० सीतां दृष्ट्वा स लङ्कायामशोकाख्ये महावने। सीताको देखकर बताया—'सीताजी लङ्कामें अशोकवनके स्थितेति कथितं तेन जटायुस्तु मृतस्तव ॥ १५५ भीतर ठहरी हुई हैं।' तब वानरोंने कहा—'आपके भ्राता जटायुने सीताजीकी रक्षाके लिये ही प्राणत्याग किया है।' भ्रातेति चोचुः स स्नात्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। यह सुनकर महामति सम्पातिने स्नान करके जटायुको योगमास्थाय स्वं देहं विससर्ज महामतिः ॥ १५६ जलाञ्जलि दी और योगधारणाका आश्रय ले अपने शरीरको त्याग दिया॥ १५२—१५६॥ ततस्तं वानरा दग्ध्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। तदनन्तर वानरोंने सम्पातिके शवका दाह-संस्कार किया गत्वा महेन्द्रशृङ्गं ते समारुह्य क्षणं स्थिताः ॥ १५७ और उन्हें जलाञ्जलि दे, महेन्द्रपर्वतपर जाकर तथा उसके शिखरपर आरूढ़ हो, क्षणभर खड़े रहे। फिर समुद्रकी सागरं वीक्ष्य ते सर्वे परस्परमथाब्रुवन्। ओर देख वे सभी परस्पर कहने लगे—'रावणने ही भगवान् रावणेनैव भार्या सा नीता रामस्य निश्चितम् ॥ १५८ श्रीरामकी भार्या सीताका अपहरण किया है, यह बात निश्चित हो गयी। सम्पातिके वचनसे आज सब बातें ठीक- सम्पातिवचनादद्य संज्ञातं सकलं हि तत्। ठीक ज्ञात हो गयीं। शोभाशाली वानरो! अब आप सब वानराणां तु कश्चात्र उत्तीर्य लवणोदधिम् ॥ १५९ लोग सोचकर बतायें कि यहाँ वानरोंमें कौन ऐसा वीर है, जो इस क्षार समुद्रके पार जा लङ्कामें घुसे और परम लङ्कां प्रविश्य दृष्ट्वा तां रामपत्नीं यशस्विनीम्। यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताजीका दर्शन करके पुनः समुद्रके पुनश्चोदधितरणे शक्तिं ब्रूत हि शोभनाः ॥ १६० पार लौट आनेमें समर्थ हो सके'॥ १५७—१६०॥ वानरोंकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा—'समुद्रको इत्युक्तो जाम्बवान् प्राह सर्वे शक्तास्तु वानराः। पार करनेमें तो सभी वानर समर्थ हैं, परंतु यह कार्य एक सागरोत्तरणे किंतु कार्यमन्यस्य सम्भवेत् ॥ १६१ अन्यतम वानरसे ही सिद्ध होगा। मेरे विचारमें तो यह आता है कि इस कार्यको सिद्ध करनेमें केवल हनूमान्‌जी तत्र दक्षोऽयमेवात्र हनूमानिति मे मतिः। ही समर्थ हैं। अब समय नहीं खोना चाहिये। हमारे कालक्षेपो न कर्तव्यो मासार्धमधिकं गतम् ॥ १६२ लौटनेकी जो नियत अवधि थी। उससे पंद्रह दिन अधिक बीत गये हैं। वानरेन्द्रगण! यदि हमलोग सीताको यद्यदृष्ट्वा तु गच्छामो वैदेहीं वानरर्षभाः। देखे बिना ही लौट जायँगे तो कपिराज सुग्रीव हमारी नाक कर्णनासादि नः स्वाङ्गं निकृन्तति कपीश्वरः ॥ १६३ और कान काट लेंगे। इसलिये मेरी राय यह है कि हम सब लोग इस कार्यके लिये वायुनन्दन हनुमान्‌जीसे ही तस्मात्प्रार्थ्यः स चास्माभिर्वायुपुत्रस्तु मे मतिः। प्रार्थना करें'॥ १६१—१६३१/२ ॥ इत्युक्तास्ते तथेत्यूचुर्वानरा वृद्धवानरम् ॥ १६४ यह सुनकर उन वानरोंने वृद्ध जाम्बवान्‌जीसे कहा, 'अच्छा, ऐसा ही हो।' तत्पश्चात् वे सभी वानर कार्यसाधनमें ततस्ते प्रार्थयामासुर्वानराः पवनात्मजम्। विशेष कुशल महाबुद्धिमान् पवननन्दन हनूमान्‌जीसे प्रार्थना हनूमन्तं महाप्राज्ञं दक्षं कार्येषु चाधिकम् ॥ १६५ करने लगे—'अञ्जनीनन्दन! आप श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय सेवक हैं। आप ही रावणको भय देनेके लिये लङ्कामें गच्छ त्वं रामभृत्यस्त्वं रावणस्य भयाय च। जायँ और हमारे वानरवृन्दकी रक्षा करें।' वानरोंके यों रक्षस्व वानरकुलमस्माकमञ्जनीसुत। कहनेपर पवनकुमार हनुमान्‌जीने 'तथास्तु' कहकर उनकी इत्युक्तस्तांस्तथेत्याह वानरान् पवनात्मजः ॥ १६६ प्रार्थना स्वीकार की। एक तो श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा थी, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५१ ] हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २१९ रामप्रयुक्तश्च पुनः स्वभर्तॄणा फिर अपने स्वामी सुग्रीवने भी आदेश दिया था, इसके पुनर्महेन्द्रे कपिभिश्च नोदितः । बाद महेन्द्रपर्वतपर उन वानरोंने भी उन्हें प्रेरित किया, गन्तुं प्रचक्रे मतिमञ्जनीसुतः अतः अञ्जनीकुमार हनुमान्जीने समुद्र लाँघकर निशाचरपुरी समुद्रमुत्तीर्य निशाचरालयम् ॥ १६७ ॥ लङ्कामें जानेका निश्चय कर लिया ॥ १६४-१६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥ इक्यावनवाँ अध्याय हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन करके श्रीरामको समाचार देना मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- हनुमान्जीने रावणद्वारा हरी गयी सीताकी खोज करने तथा उनके स्थानका पता स तु रावणनीतायाः सीतायाः परिमार्गणम् । लगानेके लिये चारणोंके मार्ग (आकाश)-से जानेकी इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥ १ इच्छा की। पूर्वाभिमुख हो, हाथ जोड़कर उन्होंने देवगणोंसहित आत्मयोनि ब्रह्माजीको मन-ही-मन प्रणाम अञ्जलिं प्राङ्मुखं कृत्वा सगणायात्मयोनये । किया तथा श्रीराम और महारथी लक्ष्मणको भी मनसे मनसाऽऽवन्द्य रामं च लक्ष्मणं च महारथम् ॥ २ ही प्रणाम करके सागर तथा सरिताओंको मस्तक नवाया। फिर अपने वानर-बन्धुओंको गले लगाकर उन सबकी सागरं सरितश्चैव प्रणम्य शिरसा कपिः । प्रदक्षिणा की। तब अन्य सब वानरोंने यह आशीर्वाद ज्ञातींश्चैव परिष्वज्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ॥ ३ दिया- 'वीर ! तुम (सकुशल) लौट आनेके लिये पवित्र वायुसे सेवित मार्गपर बिना विघ्न-बाधाके जाओ।' यों अरिष्टं गच्छ पन्थानं पुण्यवायुनिषेवितम् । कहकर उन्होंने हनुमान्जीका सम्मान किया। फिर पराक्रमी पुनरागमानायेति वानरैरभिपूजितः ॥ ४ पवनकुमार अपनी सहज शक्तिको प्राप्त हुए-उनमें वायुके सदृश बलका आवेश हो गया। दूरतकके मार्गका अञ्जसा स्वं तथा वीर्यमाविवेशाथ वीर्यवान् । अवलोकन करते हुए उन्होंने ऊपर दृष्टि डाली। अपने- मार्गमालोकयन् दूरादूर्ध्वं प्रणिहितेक्षणः ॥ ५ आपमें षड्विध ऐश्वर्यकी पूर्णताका-सा अनुभव करते हुए वे महाबली हनुमान् महेन्द्र पर्वतको पैरोंसे दबाकर सम्पूर्णमिव चात्मानं भावयित्वा महाबलः । उसके शिखरसे आकाशकी ओर उछले ॥ १-६॥ उत्पात गिरेः शृङ्गान्निष्पीड्य गिरिमम्बरम् ॥ ६ बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके कार्य- साधनमें तत्पर हो जब अपने पिता वायुके मार्गसे चले पितुर्मार्गेण यातस्य वायुपुत्रस्य धीमतः । जा रहे थे, उस समय उनको थोड़ी देरतक विश्राम देनेके रामकार्यपरस्यास्य सागरेण प्रचोदितः ॥ ७ लिये, समुद्रद्वारा प्रेरित हो, मैनाक पर्वत पानीसे बाहर ऊपरकी ओर उठ गया। उसे देख उन्होंने वहाँ थोड़ा- विश्रामार्थं समुत्तस्थौ मैनाको लवणोदधेः । सा रुककर उससे आदरपूर्वक बातचीत की और फिर तं निरीक्ष्य निपीड्याथ रयात्सम्भाष्य सादरम् ॥ ८ उसे अपने वेगसे दबाकर उछलते हुए वे दूर चले गये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५१


[संस्कृत श्लोक]

उत्पतंश्च वने वीरः सिंहिकास्यं महाकपिः। आस्यप्रान्तं प्रविश्याथ वेगेनान्तर्विनिस्सृतः॥ ९

निस्सृत्य गतवाञ्शीघ्रं वायुपुत्रः प्रतापवान्। लङ्घयित्वा तु तं देशं सागरं पवनात्मजः॥ १०

त्रिकूटशिखरे रम्ये वृक्षाग्रे निपपात ह। तस्मिन् स पर्वतश्रेष्ठे दिनं नीत्वा दिनक्षये॥ ११

संध्यामुपास्य हनुमान् रात्रौ लङ्कां शनैर्निशि। लङ्काभिधां विनिर्जित्य देवतां प्रविवेश ह॥ १२

लङ्कामनेकरत्नाढ्यां बह्वाश्चर्यसमन्विताम्। राक्षसेषु प्रसुप्तेषु नीतिमान् पवनात्मजः॥ १३

रावणस्य ततो वेश्म प्रविवेशाथ ऋद्धिमत्। शयानं रावणं दृष्ट्वा तल्पे महति वानरः॥ १४

नासापुटैर्घोरकारैर्विंशद्भिर्वायुमोचकैः । तथैव दशभिर्वक्त्रैर्दंष्ट्रोपेतैस्तु संयुतम्॥ १५

स्त्रीसहस्रैस्तु दृष्ट्वा तं नानाभरणभूषितम्। तस्मिन् सीतामदृष्ट्वा तु रावणस्य गृहे शुभे॥ १६

तथा शयानं स्वगृहे राक्षसानां च नायकम्। दुःखितो वायुपुत्रस्तु सम्पातेर्वचनं स्मरन्॥ १७

अशोकवनिकां प्राप्तो नानापुष्पसमन्विताम्। जुष्टां मलयजातेन चन्दनेन सुगन्धिना॥ १८

प्रविश्य शिंशपावृक्षमाश्रितां जनकात्मजाम्। रामपत्नीं समद्राक्षीद् राक्षसीभिः सुरक्षिताम्॥ १९

अशोकवृक्षमारुह्य पुष्पितं मधुपल्लवम्। आसांचक्रे हरिरस्तत्र सेयं सीतेति संस्मरन्॥ २०

सीतां निरीक्ष्य वृक्षाग्रे यावदास्तेऽनिलात्मजः। स्त्रीभिः परिवृतस्तत्र रावणस्तावदागतः॥ २१

आगत्य सीतां प्राहार्थ प्रिये मां भज कामुकम्। भूषिता भव वैदेहि त्यज रामगतं मनः॥ २२

इत्येवं भाषमाणं तमन्तर्धाय तृणं ततः। प्राह वाक्यं शनैः सीता कम्पमन्नाथ रावणम्॥ २३

गच्छ रावण दुष्ट त्वं परदारपरायण। अचिराद्रामबाणास्ते पिबन्तु रुधिरं रणे॥ २४


[हिन्दी अनुवाद]

मार्गमें सिंहिका नामकी राक्षसी थी। उसने जलमें मुँह फैला रखा था। महाकपि हनुमान्‌जी उसके मुँहमें जा पड़े। मुँहमें पड़ते ही वे वेगपूर्वक उसके भीतर घुसकर पुनः बाहर निकल आये। इस प्रकार सिंहिकाके मुखसे निकलकर प्रतापी पवनकुमार उस समुद्र-प्रदेशको लाँघते हुए त्रिकूट पर्वतके सुरम्य शिखरपर एक महान् वृक्षके ऊपर जा उतरे। उसी उत्तम पर्वतपर दिन बिताकर हनुमान्‌जीने वहीं सायंकालकी संध्योपासना की। फिर रातमें धीरे-धीरे वे लङ्काकी ओर चले। मार्गमें मिली हुई ‘लङ्का’ नामकी नगर-देवताको जीतकर उन्होंने नाना रत्नोंसे सम्पन्न और अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे युक्त लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ ७-१२ १/२॥

तदनन्तर जब सब राक्षस गहरी नींदमें सो गये, तब नीतिज्ञ हनुमान्‌जीने रावणके समृद्धिशाली भवनमें प्रवेश किया। वहाँ रावण एक बहुत बड़े पलंगपर सो रहा था। हनुमान्‌जीने देखा—साँस छोड़नेवाले बीस भयंकर नासिका-छिद्रोंसे युक्त उसके दसों मुखोंमें बड़ी भयानक दाढ़ें थीं। नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित रावण हजारों स्त्रियोंके साथ वहाँ सोया था। किंतु रावणके उस सुन्दर भवनमें सीताजी कहीं नहीं दिखायी दीं। वह राक्षसराज अपने घरके भीतर गाढ़ निद्रामें सो रहा था। सीताजीका दर्शन न होनेसे वायुनन्दन हनुमान्‌जी बहुत दुःखी हुए। फिर सम्पातिके कथनको याद करके वे अशोकवाटिकाforegroundमें आये, जो विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित और अत्यन्त सुगन्धित मलयज-चन्दनसे व्याप्त थी॥ १३-१८॥

वाटिकामें प्रवेश करके हनुमान्‌जीने अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुई जनकनन्दिनी श्रीरामपत्नी सीताको देखा, जो राक्षसियोंसे सुरक्षित थीं। वह अशोकवृक्ष सुन्दर मृदुल पल्लवोंसे विलसित और पुष्पोंसे सुशोभित था। कपिवर हनुमान्‌जी उस वृक्षपर चढ़ गये और ‘ये ही सीता हैं’—यह सोचते हुए वहीं बैठ गये। सीताजीका दर्शन करके वे पवनकुमार ज्यों ही वृक्षके शिखरपर बैठे, त्यों ही रावण बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरा हुआ वहाँ आया। आकर उसने सीतासे कहा—‘प्रिये! मैं कामपीड़ित हूँ, मुझे स्वीकार करो। वैदेहि! अब शृङ्गार धारण करो और श्रीरामकी ओरसे मन हटा लो।' इस प्रकार कहते हुए रावणसे भयवश काँपती हुई सीताजी बीचमें तिनकेकी ओट रखकर धीरे-धीरे बोलीं—'परस्त्रीसेवी दुष्ट रावण! तू चला जा। मैं शाप देती हूँ—भगवान् श्रीरामके बाण शीघ्र ही रणभूमिमें तुम्हारा रक्त पीयें'॥ १९-२४॥

अध्याय ५१ ] हनुमान्‌जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २२१

तथेत्युक्तो भर्त्सितश्च राक्षसीराह राक्षसः। द्विमासाभ्यन्तरे चैनां वशीकुरुत मानुषीम्॥ २५ यदि नेच्छति मां सीता ततः खादत मानुषीम्। इत्युक्त्वा गतवान् दुष्टो रावणः स्वं निकेतनम्॥ २६ ततो भयेन तां प्राहू राक्षस्यो जनकात्मजाम्। रावणं भज कल्याणि सधनं सुखिनी भव॥ २७ इत्युक्ता प्राह ताः सीता राघवोऽलघुविक्रमः। निहत्य रावणं युद्धे सगणं मां नयिष्यति॥ २८ नाहमन्यस्य भार्या स्यामृते रामं रघूत्तमम्। स ह्यागत्य दशग्रीवं हत्वा मां पालयिष्यति॥ २९ इत्याकर्ण्य वचस्तस्या राक्षस्यो ददृशुर्भयम्। हन्यतां हन्यतामेषा भक्ष्यतां भक्ष्यतामियम्॥ ३० ततस्तास्त्रिजटा प्राह स्वप्ने दृष्टमनिन्दिता। शृणुध्वं दुष्टराक्षस्यो रावणस्य विनाशनः॥ ३१ रक्षोभिः सह सर्वैस्तु रावणस्य मृतिप्रदः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामस्य विजयप्रदः॥ ३२ स्वप्नः शुभो मया दृष्टः सीतायाश्च पतिप्रदः। त्रिजटावाक्यमाकर्ण्य सीतापाश्र्वं विसृज्य ताः॥ ३३ राक्षस्यस्ता ययुः सर्वाः सीतामाहाञ्जनीसुतः। कीर्तयन् रामवृत्तान्तं सकलं पवनात्मजः॥ ३४ तस्यां विश्वासमानीय दत्त्वा रामाङ्गुलीयकम्। सम्भाष्य लक्षणं सर्वं रामलक्ष्मणयोस्ततः॥ ३५ महत्या सेनया युक्तः सुग्रीवः कपिनायकः। तेन सार्धमिहागत्य रामस्तव पतिः प्रभुः॥ ३६ लक्ष्मणश्च महावीरो देवरस्ते शुभानने। रावणं सगणं हत्वा त्वामितोऽदाय गच्छति॥ ३७ इत्युक्ते सा तु विश्वस्ता वायुपुत्रमथाब्रवीत्। कथमत्रागतो वीर त्वमुत्तीर्य महोदधिम्॥ ३८ इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः पुनस्तामाह वानरः। गोष्पदवन्मयोत्तीर्णः समुद्रोऽयं वरानने॥ ३९

सीताजीका यह उत्तर और फटकार पाकर राक्षसराज रावणने राक्षसियोंसे कहा—'तुम लोग इस मानव-कन्याको दो महीनेके भीतर समझाकर मेरे वशीभूत कर दो। यदि इतने दिनोंतक इसका मन मेरी ओर न झुके तो इस मानुषीको तुम खा डालना।' यों कहकर दुष्ट रावण अपने महलमें चला गया। तब रावणके डरसे डरी हुई राक्षसियोंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा—'कल्याणि! रावण बहुत धनी है, इसे स्वीकार कर लो और सुखसे रहो।' राक्षसियोंके यों कहनेपर सीताने उनसे कहा—'महापराक्रमी भगवान् श्रीराम युद्धमें रावणको उसके सेवकगणोंसहित मारकर मुझे ले जायँगे। मैं रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके सिवा दूसरेकी भार्या नहीं हो सकती। वे ही आकर रावणको मारकर मेरी रक्षा करेंगे'॥ २५-२९॥

सीताकी यह बात सुनकर राक्षसियोंने उन्हें भय दिखाते हुए कहा—'अरी! इसे मार डालो, मार डालो; खा जाओ, खा जाओ।' उन राक्षसियोंमें एकका नाम त्रिजटा था। वह उत्तम विचार रखनेवाली-साध्वी स्त्री थी। उसने उन सभी राक्षसियोंको स्वप्नमें देखी हुई बात बतायी। वह बोली—'अरी दुष्टा राक्षस्यो! सुनो; मैंने एक शुभ स्वप्न देखा है, जो रावणके लिये विनाशकारी है, समस्त राक्षसोंके साथ रावणको मौतके मुँहमें डालनेवाला है, भ्राता लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी विजयका सूचक है और सीताको पतिसे मिलानेवाला है।' त्रिजटाकी बात सुनकर वे सभी राक्षसियाँ सीताके पाससे हटकर दूर चली गयीं। तब अञ्जनीनन्दन हनुमान्‌जीने अपनेको सीताके सामने प्रकट किया और 'श्रीराम-नाम' का कीर्तन करते हुए उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण वृत्तान्तका उनके समक्ष वर्णन किया। इस प्रकार सीताके मनमें विश्वास उत्पन्न करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी अँगूठी दी। फिर उनसे श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरके लक्षण बताये और कहा—'सुमुखि! वानरोंके राजा सुग्रीव बहुत बड़ी सेनाके स्वामी हैं। उन्हींके साथ आपके पतिदेव भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तथा आपके देवर महावीर लक्ष्मणजी यहाँ पधारेंगे और रावणको सेनासहित मारकर आपको यहाँसे ले जायँगे'॥ ३०-३७॥

हनुमान्‌जीके यह कहनेपर सीताजीका उनपर विश्वास हो गया। वे बोलीं—'वीर! तुम किस तरह महासागरको पार करके यहाँ चले आये?' उनका यह वचन सुनकर हनुमान्‌जीने पुनः उनसे कहा—'वरानने! मैं इस समुद्रको उसी प्रकार लाँघ गया, जैसे कोई गौके खुरसे बने हुए

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२२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५१

जपतो रामरामेति सागरो गोष्पदायते। | गड्ढेको लाँघ जाय। जो 'राम-राम' का जप करता दुःखमग्नासि वैदेहि स्थिरा भव शुभानने॥ ४० | है, उसके लिये समुद्र गौके खुरके चिह्नके समान हो | जाता है। शुभानने वैदेहि ! आप दुःखमग्ना दिखायी देती क्षिप्रं पश्यसि रामं त्वं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते। | हैं, अब धैर्य धारण कीजिये। मैं आपसे सत्य-सत्य कह इत्याश्वास्य सतीं सीतां दुःखितां जनकात्मजाम्॥ ४१ | रहा हूँ, आप बहुत शीघ्र श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करेंगी।' | इस प्रकार दुःखमें डूबी हुई पतिव्रता जनकनन्दिनी ततश्चूडामणिं प्राप्य श्रुत्वा काकपराभवम्। | सीताको आश्वासन दे, उनसे पहचानके लिये चूड़ामणि नत्वा तां प्रस्थितो वीरो गन्तुं कृतमतिः कपिः॥ ४२ | पाकर और श्रीरामके प्रभावसे काकरूपी जयन्तके | पराभवकी कथा सुनकर, वहाँसे चल देनेका विचार ततो विमृश्य तद्भङ्क्त्वा क्रीडावनमशेषतः। | करके हनुमान्‌जीने सीताको नमस्कार करनेके पश्चात् तोरणस्थो ननादोच्चै रामो जयति वीर्यवान्॥ ४३ | प्रस्थान किया॥ ३८-४२॥ | तत्पश्चात् कुछ सोचकर पराक्रमी हनुमान्‌जीने रावणके अनेकान् राक्षसान् हत्वा सेनाः सेनापतींश्च सः। | उस सम्पूर्ण क्रीडावन (अशोकवाटिका)-को नष्ट-भ्रष्ट कर तदा त्वक्षकुमारं तु हत्वा रावणसैनिकम्॥ ४४ | डाला और वनके द्वारपर स्थित हो, उच्चस्वरसे सिंहनाद | करते हुए बोले—'भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो!' फिर साश्वं ससारथिं हत्वा इन्द्रजित्तं गृहीतवान्। | तो युद्धके लिये सामने आये हुए अनेक राक्षसोंको मारकर रावणस्य पुरः स्थित्वा रामं संकीर्त्य लक्ष्मणम्॥ ४५ | सेना और सेनापतियोंका संहार किया। इसके बाद रावणके | सेनापति अक्षकुमारको अश्व तथा सारथिसहित यमलोक सुग्रीवं च महावीर्यं दग्ध्वा लङ्कामशेषतः। | पहुँचा दिया। इसपर रावणपुत्र इन्द्रजित्ने वरके प्रभावसे उन्हें निर्भर्त्स्य रावणं दुष्टं पुनः सम्भाष्य जानकीम्॥ ४६ | बंदी बना लिया। इसके बाद वे रावणके सम्मुख उपस्थित | किये गये। वहाँसे छूटकर उन्होंने श्रीराम, लक्ष्मण और भूयः सागरमुत्तीर्य ज्ञातीनासाद्य वीर्यवान्। | महाबली सुग्रीवके यशका कीर्तन करते हुए सम्पूर्ण लङ्कापुरीको सीतादर्शनमावेद्य हनूमांश्चैव पूजितः॥ ४७ | जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर दुष्टात्मा रावणको डाँट | बताकर पुनः सीताजीसे वार्तालाप किया। फिर पराक्रमी वानरैः सार्धमागत्य हनुमान्मधुवनं महत्। | हनूमान्‌जी समुद्रके इस पार आकर अपने वानर बन्धुओंसे निहत्य रक्षपालांस्तु पाययित्वा च तन्मधु॥ ४८ | मिले और सीताजीके दर्शनका समाचार सुनाकर सबसे | सम्मानित हुए॥ ४३-४७॥ सर्वे दधिमुखं पात्य हर्षितो हरिभिः सह। | तत्पश्चात् हनुमान्‌जी सभी वानरोंके साथ मधुवनमें आये। खमुत्पत्य च सम्प्राप्य रामलक्ष्मणपादयोः॥ ४९ | उसके रखवालोंको मारकर उन्होंने वहाँ सब साथियोंको | मधु-पान कराया और स्वयं भी पीया। इस कार्यमें बाधा नत्वा तु हनुमांस्तत्र सुग्रीवं च विशेषतः। | देनेवाले दधिमुख नामके वानरको सबने धरतीपर दे मारा। आदितः सर्वमावेद्य समुद्रतरणादिकम्॥ ५० | इसके बाद हनुमान्‌जी सब वानरोंके साथ आनन्दित हो, | आकाशमें उछलते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके निकट जा कथयामास रामाय सीता दृष्टा मयेति वै। | पहुँचे। वहाँ उन दोनोंके चरणोंमें प्रणाम कर, विशेषतः अशोकवनिकामध्ये सीता देवी सुदुःखिता॥ ५१ | सुग्रीवको मस्तक झुकाकर उन्होंने समुद्र लाँघनेसे लेकर | सारा समाचार आद्योपान्त सुनाया और यह भी कहा कि | 'मैंने अशोक-वाटिकाके भीतर सीतादेवीका दर्शन किया।

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अध्याय ५१ ] हनुमान्‌जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २२३ राक्षसीभिः परिवृता त्वां स्मरन्ती च सर्वदा। उन्हें राक्षसियाँ घेरे हुए थीं और वे बहुत दुःखी होकर अश्रुपूर्णमुखी दीना तव पत्नी वरानना ॥ ५२ निरन्तर आपका ही स्मरण कर रही थीं। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और वे बड़ी दीन अवस्थामें शीलवृत्तसमायुक्ता तत्रापि जनकात्मजा। थीं। रघुनन्दन ! आपकी धर्मपत्नी सुमुखी सीता वहाँ भी सर्वत्रान्वेषमाणेन मया दृष्टा पतिव्रता ॥ ५३ शील और सदाचारसे सम्पन्न हैं। मैंने सब जगह ढूँढ़ते हुए पतिव्रता जानकीको अशोकवनमें पाया, उनसे वार्तालाप मया सम्भाषिता सीता विश्वस्ता रघुनन्दन । किया और उन्होंने भी मेरा विश्वास किया। प्रभो! उन्होंने अलङ्कारश्च सुमणिस्तया ते प्रेषितः प्रभो ॥ ५४ आपको देनेके लिये अपना श्रेष्ठ मणिमय अलङ्कार भेजा है' ॥ ४८-५४ ॥ इत्युक्त्वा दत्तवांस्तस्मै चूडामणिमनुत्तमम्। यह कहकर हनुमान्‌जीने भगवान् श्रीरामको वह इदं च वचनं तुभ्यं पत्न्या सम्प्रेषितं शृणु ॥ ५५ उत्तम चूड़ामणि दे दी और कहा- 'प्रभो! आपकी धर्मपत्नी श्रीसीताजीने यह संदेश भी कहला भेजा है, चित्रकूट मदङ्के तु सुप्ते त्वयि महाव्रत। सुनिये—'महान् व्रतका पालन करनेवाले महाराज ! चित्रकूट वायसाभिभवं राजंस्तत्किल स्मर्तुमर्हसि ॥ ५६ पर्वतपर जब आप मेरी गोदमें [सिर रखकर] सो गये थे, उस समय काकवेषधारी जयन्तका जो आपने मान- अल्पापराधे राजेन्द्र त्वया बलिभुजि प्रभो। मर्दन किया था, उसे स्मरण करें। राजेन्द्र ! प्रभो ! उस यत्कृतं तन्न कर्तुं च शक्यं देवासुरैरपि ॥ ५७ कौएके थोड़े-से ही अपराधपर उसे दण्ड देनेके लिये आपने जो अद्भुत कर्म किया था, उसे देवता और असुर ब्रह्मास्त्रं तु तदोत्सृष्टं रावणं किं न जेष्यसि । भी नहीं कर सकते। उस समय तो आपने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था? क्या इस समय इस रावणको पराजित इत्येवमादि बहुशः प्रोक्त्वा सीता रुरोद ह। नहीं करेंगे?' इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर सीताजी एवं तु दुःखिता सीता तां मोक्तुं यत्नमाचर ॥ ५८ रोने लगी थीं। यह है दुःखिनी सीताका वृत्तान्त ! आप उन्हें उस दुःखसे मुक्त करनेका प्रयत्न कीजिये।' पवनकुमार इत्येवमुक्ते पवनात्मजेन हनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर सीताजीका वह संदेश सीतावचस्तच्छुभभूषणं च। सुन और उनके उस सुन्दर आभूषणको देख, भगवान् श्रुत्वा च दृष्ट्वा च रुरोद रामः श्रीराम उन कपिवर हनुमान्‌जीको गलेसे लगाकर रोने कपिं समालिङ्गय शनैः प्रतस्थे ॥ ५९ लगे और धीरे-धीरे वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ५५-५९॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

२२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

२२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२ बावनवाँ अध्याय श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और उन्हें लङ्काके राज्यकी प्राप्ति; समुद्रका श्रीरामको मार्ग देना; पुलद्वारा समुद्र पार करके वानरसेनासहित श्रीरामका सुवेल पर्वतपर पड़ाव डालना; अङ्गदका प्रभाव; लक्ष्मणकी प्रेरणासे श्रीरामका अङ्गदकी प्रशंसा करना; अङ्गदके वीरोचित उद्गार और दौत्यकर्म; वानर वीरोंद्वारा राक्षसोंका संहार; रावणका श्रीरामके द्वारा युद्धमें पराजित होना, कुम्भकर्णका वध; अतिकाय आदि राक्षस वीरोंका मारा जाना; मेघनादका पराक्रम और वध; रावणकी शक्तिसे मूर्च्छित लक्ष्मणका हनुमान्‌जीके द्वारा पुनर्जीवन; राम-रावण-युद्ध; रावण-वध; देवताओं‌द्वारा श्रीरामकी स्तुति; सीताके साथ अयोध्यामें आनेपर श्रीरामका राज्याभिषेक और अन्तमें पुरवासियोंसहित उनका परमधामगमन

मार्कण्डेय उवाच इति श्रुत्वा प्रियावार्तां वायुपुत्रेण कीर्तिताम्। रामो गत्वा समुद्रान्तं वानरैः सह विस्तृतैः॥ १ सागरस्य तटे रम्ये तालीवनविराजिते। सुग्रीवो जाम्बवांश्चाथ वानरैरतिहर्षितैः॥ २ संख्यातीतैर्वृतः श्रीमान् नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः। अनुजेन च धीरेण वीक्ष्य तस्थौ सरित्पतिम्॥ ३ रावणेनाथ लङ्कायां स सूक्तौ भर्त्सतोऽनुजः। विभीषणो महाबुद्धिः शास्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिः सह॥ ४ नरसिंहे महादेवे श्रीधरे भक्तवत्सले। एवं रामेऽचलां भक्तिमागत्य विनयात्तदा॥ ५ कृताञ्जलिरुवाचेदं राममक्लिष्टकारिणम्। राम राम महाबाहो देवदेव जनार्दन॥ ६ विभीषणोऽस्मि मां रक्ष अहं ते शरणं गतः। इत्युक्त्वा निपपाताथ प्राञ्जली रामपादयोः॥ ७ विदितार्थोऽथ रामस्तु तमुत्थाप्य महामतिम्। समुद्रतोयैस्तं वीरमभिषिच्य विभीषणम्॥ ८ लङ्काराज्यं तवैवेति प्रोक्तः सम्भाष्य तस्थिवान्। ततो विभीषणेनोक्तं त्वं विष्णुर्भुवनेश्वरः॥ ९ अब्धिर्ददातु मार्गं ते देव तं याचयामहे। इत्युक्तो वानरैः सार्धं शिश्ये तत्र स राघवः॥ १०


मार्कण्डेयजी बोले—वायुनन्दन हनुमान्जीके द्वारा कथित प्रिया जानकीका वृत्तान्त सुन लेनेके पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी विशाल वानरसेनाके साथ समुद्रके निकट गये। साथ ही सुग्रीव और जाम्बवान् भी तालवनसे सुशोभित सागरके सुरम्य तटपर जा पहुँचे। अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे पूर्ण उन असंख्य वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् भगवान् राम नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे। अपने धीर-वीर अनुज लक्ष्मणजीके साथ समुद्रकी विशालताका अवलोकन करते हुए वे उसके तटपर ठहर गये। इधर लङ्कामें रावणने [राक्षसकुलके हितके लिये] अच्छी बात कहनेपर भी अपने छोटे भाई महाबुद्धिमान् विभीषणको बहुत फटकारा। तब वे अपने शास्त्रज्ञ मन्त्रियोंके साथ महान् देवता भक्तवत्सल लक्ष्मीपतिके अवतार नरश्रेष्ठ श्रीराममें अविचल भक्ति रखते हुए उनके निकट आये और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले उन भगवान् श्रीरामसे हाथ जोड़ विनयपूर्वक यों बोले—'महाबाहो श्रीराम! देवदेव जनार्दन! मैं [रावणका भाई] विभीषण हूँ, आपकी शरणमें आया हूँ; मेरी रक्षा कीजिये'—यों कहकर हाथ जोड़े हुए वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े। उनका अभिप्राय जानकर भगवान् श्रीरामने उन महाबुद्धिमान् वीर विभीषणको उठाया और समुद्रके जलसे उनका राज्याभिषेक करके कहा—'अब लङ्काका राज्य तुम्हारा ही होगा।' श्रीरामके यों कहनेपर विभीषण उनके साथ बातचीत करके वहीं खड़े रहे॥ १–८ १/२ ॥ तब विभीषणने कहा—'प्रभो! आप जगत्पति भगवान् विष्णु हैं। देव! ऐसी चेष्टा करें कि समुद्र ही आपको जानेका मार्ग दे दे। हम सब लोग उससे प्रार्थना करें।' उनके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके साथ समुद्रके

अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २२५ सुप्ते रामे गतं तत्र त्रिरात्रममितद्युतौ। तटपर धरना देते हुए लेट गये। अपार कान्तिमान् भगवान् ततः क्रुद्धो जगन्नाथो रामो राजीवलोचनः ॥ ९१ श्रीरामको वहाँ लेटे-लेटे तीन रातें बीत गयीं; तब कमलनयन जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा ही क्रोध हुआ और संशोषणमपां कर्तुमस्त्रमाग्नेयमाददे। उन्होंने समुद्रके जलको सुखा डालनेके लिये हाथमें तदोत्थाय वचः प्राह लक्ष्मणश्च रुषान्वितम् ॥ ९२ अग्निबाण धारण किया। यह देख लक्ष्मणजी तत्काल उठे और क्रुद्ध हुए भगवान् रामसे यों बोले— ॥ ९—१२ ॥ क्रोधस्ते लयकर्ता हि एनं जहि महामते। 'महामते ! आपका क्रोध तो समस्त ब्रह्माण्डका भूतानां रक्षणार्थाय अवतारस्त्वया कृतः ॥ १३ प्रलय करनेवाला है, इस समय इस कोपको दबा दें; क्योंकि आपने प्राणियोंकी रक्षाके लिये अवतार धारण क्षन्तव्यं देवदेवेश इत्युक्त्वा धृतवान् शरम्। किया है। देवदेव ! आप क्षमा करें',—यों कहकर ततो रात्रित्रये याते क्रुद्धं राममवेक्ष्य सः ॥ १४ उन्होंने श्रीरामके उस बाणको पकड़ लिया। इधर तीन रात बीत जानेपर श्रीरामचन्द्रजीको कुपित देख, उनके आग्नेयास्त्राच्च संत्रस्तः सागरोऽभ्येत्य मूर्तिमान्। अग्निबाणसे भयभीत हो, समुद्र मनुष्यरूप धारणकर आह रामं महादेवं रक्ष मामपकारिणम् ॥ १५ उनके निकट आया और महान् देवता भगवान् श्रीरामसे बोला—'भगवन् ! मुझ अपराधीकी रक्षा कीजिये। रघुनन्दन ! मार्गो दत्तो मया तेऽद्य कुशलः सेतुकर्मणि। अब मैंने आपको जानेका मार्ग दे दिया। आपकी सेनामें नलश्च कथितो वीरस्तेन कारय राघव ॥ १६ वीरवर नल पुल बनानेमें निपुण कहे गये हैं। उनके द्वारा आपको जितना बड़ा अभीष्ट हो, उतने ही बड़े उत्तम यावदिष्टं तु विस्तीर्णं सेतुबन्धनमुत्तमम्। पुलका निर्माण करा लीजिये' ॥ १३—१६ १/२ ॥ ततो नलमुखैर्नानावनैरमितौजसैः ॥ १७ तब भगवान् रामने नल आदि अन्य अमित-तेजस्वी बन्धयित्वा महासेतुं तेन गत्वा स राघवः। वानरोंद्वारा बहुत बड़ा पुल बनवाया और उसीके द्वारा सुवेलाख्यं गिरिं प्राप्तः स्थितोऽसौ वानरैर्वृतः ॥ १८ समुद्रके पार जा, सुवेल नामक पर्वतपर पहुँचकर वहीं वानरोंके साथ डेरा डाल दिया। वहाँसे अङ्गदने देखा— हर्म्यस्थलस्थितं दुष्टं रावणं वीक्ष्य चाङ्गदः। 'दुष्ट रावण महलकी अट्टालिकापर बैठा हुआ है।' उसे रामादेशादथोत्प्लुत्य दूतकर्मसु तत्परः ॥ १९ देखते ही वे भगवान् श्रीरामकी आज्ञा ले, दूत-कार्यमें संलग्न हो, उछलकर रावणके पास जा पहुँचे। जाते ही प्रादात्पादप्रहारं तु रोषाद्रावणमूर्धनि। उन्होंने रोषपूर्वक रावणके मस्तकपर लात मारी। उस विस्मितं तैः सुरगणैर्वीक्षितः सोऽतिवीर्यवान् ॥ २० समय देवताओंने महान् पराक्रमी अङ्गदजीकी ओर बड़े विस्मयके साथ देखा। इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा पूरी साधयित्वा प्रतिज्ञां तां सुवेलं पुनरागतः। करके वे पुनः सुवेल पर्वतपर चले आये। तदनन्तर प्रतापी ततो वानरसेनाभिः संख्यातीताभिरच्युतः ॥ २१ भगवान् श्रीरामने असंख्य वानर-सेनाओंके द्वारा रावणकी पुरी लङ्काको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १७—२१ १/२ ॥ रुरोध रावणपुरीं लङ्कां तत्र प्रतापवान्। तब श्रीरामने चारों ओर देख लक्ष्मणको पास बुलाकर रामः समन्तादालोक्य प्राह लक्ष्मणमन्तिके ॥ २२ कहा—'भाई ! हम लोगोंने समुद्र तो पार कर लिया तथा कपिराज सुग्रीवके सैनिकोंने राक्षसोंकी राजधानी लङ्काको तीर्णोऽर्णवः कवलितेव कपीश्वरस्य आनन-फाननमें अपना ग्रास-सा बना लिया है। पुरुषार्थसे सेनाभटैर्झटिति राक्षसराजधानीम्। जो कुछ सिद्ध होनेके योग्य था, उसका अङ्कुर तो हमने यत्पौरुषोचितमिहाङ्कुरितं मया तद् उत्पन्न कर दिया; अब आगे जो कुछ होना है, वह भाग्य दैवस्य वश्यमपरं धनुषोऽथ वास्य ॥ २३ अथवा इस धनुषके अधीन है' ॥ २२-२३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_9_1_Front

२२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

२२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२ लक्ष्मणः प्राह—कातरजनमनोऽवलम्बिना किं | लक्ष्मण बोले—'भाई! कातर पुरुषोंके हृदयको दैवेन। | अवलम्बन देनेवाले भाग्य या दैवसे क्या होनेवाला है? यावल्ललाटशिखरं भ्रुकुतिर्न याति | जबतक हमारी भ्रुकुटि रोषसे तनकर ललाटके ऊपरतक यावन्न कार्मुकशिखामधिरोहति ज्या। | नहीं जाती और जबतक प्रत्यञ्चा धनुषके अग्रभागपर तावन्निशाचरपतेः पटिमानमेतु | नहीं चढ़ती, तभीतक निशाचरराज रावणका दर्प त्रिभुवनका त्रैलोक्यमूलविभुजेषु भुजेषु दर्पः ॥ २४ ॥ | मूलोच्छेदन करनेवाली उसकी भुजाओंके भरोसे बढ़ता रहे' ॥ २४ ॥ तदा लक्ष्मणः रामस्य कर्णे लगित्वा | ऐसा विचार प्रकट करके लक्ष्मणने उसी समय पितृवधवैरस्मरणे अथ तद्भक्तिवीर्यपरीक्षणाय | भगवान् श्रीरामके कानमें मुँह लगाकर कहा—'अब इस लक्षणविज्ञानायादिश्यतामङ्गदाय दूत्यम्। रामः साधु | समय इस बातकी परीक्षा तथा जानकारीके लिये कि इति भणित्वा अङ्गदं सबहुमानमवलोक्य | यह अङ्गद अपने पिता वालीके वैरजनित वधका स्मरण आदिशति ॥ २५ ॥ अङ्गद! पिता ते | करके भी आपमें कितनी भक्ति रखता है, इसमें कितना यद्द्याली बलिनि दशकण्ठे कलितवान्शक्तास्तद्वक्तुं | पराक्रम है तथा इसके अब कैसे लक्षण (रंग-ढंग) हैं, वयमपि मुदा तेन पुलकः। | आप अङ्गदको पुनः दूतकर्म करनेका आदेश दीजिये।' स एव त्वं व्यावर्तयसि तनुजत्वेन पितृतां | श्रीरामचन्द्रजी 'बहुत अच्छा' कहकर अङ्गदकी ओर ततः किं वक्तव्यं तिलकयति सृष्टार्थपदवीम् ॥ २६ ॥ | बड़े आदरसे देखकर उन्हें आदेश देने लगे—'अङ्गद! अङ्गदो मौलिमण्डलमिलत्करयुगलेन प्रणम्य | तुम्हारे पिता वालीने दशकण्ठ रावणके प्रति जो पुरुषार्थ यदाज्ञापयति देवः। अवधार्यताम् ॥ २७ ॥ | किया था, उसका हम भी वर्णन नहीं कर सकते। उसकी किं प्राकारविहारतोरणवतीं लङ्कामिहैवानये | याद आते ही हर्षके कारण हमारे शरीरमें रोमाञ्च हो आता किं वा सैन्यमहं द्रुतं रघुपते तत्रैव सम्पादये। | है। वही वाली आज तुम्हारे रूपमें प्रकट है। तुम पुत्ररूपमें अत्यल्पं कुलपर्वतैरविरलैर्बध्नामि वा सागरं | उत्पन्न हो, अपने पुरुषार्थसे पिताको भी पीछे छोड़ रहे देवादेशय किं करोमि सकलं दोर्दण्डसाध्यं मम ॥ २८ ॥ | हो; अतः तुम्हारे विषयमें क्या कहना है। तुम पुत्र- श्रीरामस्तद्वचनमात्रेणैव तद्भक्तिं सामर्थ्यं | पदवीको मस्तकका तिलक बना रहे हो' ॥ २५-२६ ॥ चावेक्ष्य वदति ॥ २९ ॥ | अङ्गदने अपने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ भगवान्को अज्ञानादथवाधिपत्यरभसा वास्मत्परोक्षे हृता | प्रणाम करके कहा—'जैसी आज्ञा; भगवान् इधर ध्यान सीतेयं प्रविमुच्यतामिति वचो गत्वा दशास्यं वद। | दें। रघुपते! क्या मैं चहारदीवारी, विहार-स्थल और नो चेल्लक्ष्मणमुक्तमार्गणगणच्छेदोच्छलच्छोणित- | नगरद्वारसहित लङ्कापुरीको यहीं उठा लाऊँ? या अपनी छत्रच्छन्नदिगन्तमन्तकपुरीं पुत्रैर्वृतो यास्यसि ॥ ३० ॥ | सारी सेनाको ही उस पुरीमें आक्रमणके लिये पहुँचा दूँ? अथवा इस अत्यन्त तुच्छ सागरको अविरल कुलाचलोंद्वारा पाट दूँ? भगवन्! आज्ञा दीजिये, क्या करूँ? मेरे भुज- दण्डोंद्वारा सब कुछ सिद्ध हो सकता है' ॥ २७-२८ ॥ भगवान् रामने अङ्गदके कथनसे ही उनकी भक्ति और शक्तिका अनुमान लगाकर कहा—'वीर! तुम दशमुख रावणके पास जाकर कहो—'रावण! तुम अज्ञानसे या प्रभुत्वके अभिमानमें आकर हम लोगोंके पीठ-पीछे चोरकी भाँति जिस सीताको ले गये हो, उसे छोड़ दो; नहीं तो लक्ष्मणके छोड़े हुए बाणोंद्वारा बेधे जाकर छलकते हुए रक्तकी धाराओंसे छत्रकी भाँति दिगन्तको आच्छादित करके तुम अपने पुत्रोंके साथ ही यमपुरीको प्रस्थान करोगे' ॥ २९-३० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 113 Narsingpuran_Section_9_1_Back

अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २२७ अङ्गदः ॥ ३१ ॥ देव! अङ्गदने कहा—'देव! मुझ दूतके रहते हुए रावण संधि करे या विग्रह, दोनों ही अवस्थाओंमें उसके दसों मस्तक संधौ वा विग्रहे वापि मयि दूते दशाननी। पृथ्वीतलपर गिरकर लोटेंगे। हाँ, इतना अन्तर अवश्य होगा अक्षता वाक्षता वापि क्षितिपीठे लुठिष्यति ॥ ३२ कि संधि कर लेनेपर उसके मस्तक बिना कटे ही (आपके सामने प्रणामके लिये) गिरेंगे और विग्रह करनेपर कटकर तदा श्रीरामचन्द्रेण प्रशस्य प्रहितोऽङ्गदः । गिरेंगे।' तब श्रीरामचन्द्रजीने अङ्गदकी प्रशंसा करके उन्हें उक्तिप्रत्युक्तिचातुर्यैः पराजित्यागतो रिपुम् ॥ ३३ भेजा और वे भी वहाँ जा, वाद-प्रतिवादकी चातुरीसे शत्रुको हराकर लौट आये ॥ ३१-३३॥ राघवस्य बलं ज्ञात्वा चारैस्तदनुजस्य च। दशानन रावणने भी अपने गुप्तचरोंद्वारा श्रीरामचन्द्रजीका, वानराणां च भीतोऽपि निर्भीरिव दशाननः ॥ ३४ उनके भाई लक्ष्मणका और वानरोंका बल जानकर भयभीत होनेपर भी निडरकी भाँति लङ्कापुरीकी रक्षाके लिये लङ्कापुरस्य रक्षार्थमादिदेश स राक्षसान्। राक्षसोंको आज्ञा दी। सम्पूर्ण दिशाओंमें राक्षसोंको जानेकी आदिश्य सर्वतो दिक्षु पुत्रानाह दशाननः ॥ ३५ आज्ञा दे उसने अपने पुत्रोंसे और धूम्राक्ष तथा धूम्रपानसे भी कहा—'राक्षसो! तुम लोग नगरमें जाओ और उन दोनों धूम्राक्षं धूम्रपानं च राक्षसा यात मे पुरीम्। मनुष्य-कुमारोंको पाशसे बाँध लाओ। शत्रुओंके लिये पाशैर्बध्नीत तौ मर्त्यौ अमित्रान्तकवीर्यवान्। यमराजके समान पराक्रमी मेरा भाई कुम्भकर्ण भी इस कुम्भकर्णोऽपि मद्भ्राता तुर्यनादैः प्रबोधितः ॥ ३६ समय वाद्योंके शब्दसे जगा लिया गया है ॥ ३४-३६ ॥ इतना ही नहीं, रावणने बड़े बलवान्-बलवान् राक्षसोंको राक्षसाश्चैव संदिष्टा रावणेन महाबलाः। युद्धके लिये आदेश दिया और वे भी उसकी आज्ञा तस्याज्ञां शिरसाऽऽदाय युयुधुर्वानरैः सह ॥ ३७ शिरोधार्य कर वानरोंके साथ जूझने लगे। अपनी शक्तिभर युद्ध करते हुए करोड़ों राक्षस वानरोंके हाथ मारे गये। युध्यमाना यथाशक्त्या कोटिसंख्यास्तु राक्षसाः। और-तो-और, दशमुख रावणने जिन दूसरे-दूसरे अपार- वानरैर्निधनं प्राप्ताः पुनरन्यान् यथाऽऽदिशत् ॥ ३८ तेजस्वी राक्षसोंको पूर्वद्वारपर युद्धके लिये आदेश किया था, वे सब भी नील आदि वानरोंसे युद्ध करते हुए पूर्वद्वारे दशग्रीवो राक्षसानमितौजसः। मृत्युको प्राप्त हुए। इसके बाद रावणने दक्षिण दिशामें ते चापि युध्य हरिभिर्नीलाद्यैर्निधनं गताः ॥ ३९ लड़नेके लिये जिन राक्षसोंको नियुक्त किया था, वे भी श्रेष्ठ वानरोंद्वारा अपने अङ्गोंके विदीर्ण कर दिये जानेपर अथ दक्षिणदिग्भागे रावणेन नियोजिताः। यमलोकको चले गये। फिर पश्चिम द्वारपर जो पर्वताकार ते सर्वे वानरैर्दारितास्तु यमं गताः ॥ ४० राक्षस थे, वे भी अत्यन्त गर्वीले अङ्गदादि वानर वीरोंद्वारा यमपुरीको पहुँचा दिये गये। फिर उत्तर द्वारपर रावणके पश्चिमेऽङ्गदमुख्यैश्च वानरैरतिगर्वितैः। द्वारा ठहराये हुए क्रूर राक्षस मैन्द आदि वानरोंके हाथ राक्षसाः पर्वताकाराः प्रापिता यमसादनम् ॥ ४१ मारे जाकर धराशायी हो गये। तदनन्तर वानरगण लङ्काकी ऊँची चहारदीवारी फाँदकर उसके भीतर रहनेवाले तदुत्तरे तु दिग्भागे रावणेन निवेशिताः। पेतुस्ते राक्षसाः क्रूरा मैन्दाद्यैर्वानरैर्हताः ॥ ४२ ततो वानरसङ्घास्तु लङ्काप्राकारमुच्छ्रितम्। उत्प्लुत्याभ्यन्तरस्थांश्च राक्षसान् बलदर्पितान् ॥ ४३ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_9_2_Front

२२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

२२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

हत्वा शीघ्रं पुनः प्राप्ताः स्वसेनामेव वानराः । बलाभिमानी राक्षसोंका भी संहार करके पुनः शीघ्रतापूर्वक एवं हतेषु सर्वेषु राक्षसेषु दशाननः ॥ ४४ अपनी सेनामें लौट आये ॥ ३७-४३ १/२ ॥ रोदमानासु तत्स्त्रीषु निर्गतः क्रोधमूर्च्छितः । इस प्रकार सब राक्षसोंके मारे जानेपर उनकी स्त्रियोंको रोदन करते देख दशानन रावण क्रोधसे द्वारे स पश्चिमे वीरो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ॥ ४५ मूर्च्छित होकर निकला। वह प्रतापी वीर हाथमें धनुष क्वासौ रामेति च वदन् धनुष्पाणिः प्रतापवान् । ले बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ पश्चिम द्वारपर आया रथस्थः शरवर्षं च विसृजन् वानरेषु सः ॥ ४६ और बोला- 'कहाँ है वह राम ?' तथा रथपर बैठे-बैठे वानरोंपर बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसके बाणोंसे ततस्तद्वाणछिन्नाङ्गा वानरा दुद्रुवुस्तदा। अङ्ग छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण वानर इधर-उधर पलायमानांस्तान् दृष्ट्वा वानरान् राघवस्तदा ॥ ४७ भागने लगे। उस समय वानरोंको भागते देख श्रीरामने कस्मात्तु वानरा भग्नाः किमेषां भयमागतम्। पूछा- 'वानरोंमें क्यों भगदड़ पड़ गयी है? इनपर कौन-सा भय आ पहुँचा?' ॥ ४४-४७ १/२ ॥ इति रामवचः श्रुत्वा प्राह वाक्यं विभीषणः ॥ ४८ शृणु राजन् महाबाहो रावणो निर्गतोऽधुना । श्रीरामकी बात सुनकर विभीषणने कहा- 'राजन्! महाबाहो ! सुनिये, इस समय रावण युद्धके लिये निकला तद्बाणछिन्ना हरयः पलायन्ते महामते ॥ ४९ है। महामते ! उसीके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो वानरगण भाग रहे हैं' ॥ ४८-४९॥ इत्युक्तो राघवस्तेन धनुरुद्यम्य रोषितः । विभीषणके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने कुपित ज्याघोषतलघोषाभ्यां पूरयामास खं दिशः ॥ ५० होकर धनुष उठाया और प्रत्यञ्चाकी टंकारसे समस्त दिशाओं तथा आकाशको गुँजा दिया। तत्पश्चात् कमलनयन युयुधे रावणेनाथ रामः कमललोचनः । श्रीरामचन्द्रजी रावणसे युद्ध करने लगे और सुग्रीव, सुग्रीवो जाम्बवांश्चैव हनूमानङ्गदस्तथा ॥ ५१ जाम्बवान्, हनूमान्, अङ्गद, विभीषण, पराक्रमी लक्ष्मण विभीषणो वानराश्च लक्ष्मणश्चापि वीर्यवान् । तथा अन्यान्य महाबली वानर पहुँचकर हाथी, घोड़े उपेत्य रावणीं सेनां वर्षन्तीं सर्वसायकान् ॥ ५२ और रथोंसे युक्त रावणकी चतुरङ्गिणी सेनाको, जो हस्त्यश्वरथसंयुक्तां ते निजघ्नुर्महाबलाः । सब प्रकारके बाणोंकी वर्षा कर रही थी, मारने लगे। रामरावणयोर्युद्धमभूत् तत्रापि भीषणम् ॥ ५३ वहाँ भी श्रीराम और रावणका युद्ध बड़ा ही भयंकर हुआ। रावण जिन-जिन अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करता रावणेन विसृष्टानि शस्त्रास्त्राणि च यानि वै। था, उन सबका बाणोंद्वारा छेदन करके महाबली तानि छित्त्वाथ शस्त्रैस्तु राघवश्च महाबलः ॥ ५४ श्रीरामचन्द्रजीने एक बाणसे सारथिको तथा दस बाणोंसे शरेण सारथिं हत्वा दशभिश्च महाहयान् । उसके बड़े-बड़े घोड़ोंको धराशायी करके एक भल्ल रावणस्य धनुश्छित्त्वा भल्लेनैकेन राघवः ॥ ५५ नामक बाणद्वारा रावणके धनुषको भी काट डाला। फिर मुकुटं पञ्चदशभिश्च्छित्त्वा तन्मस्तकं पुनः। महान् पराक्रमी रामने पंद्रह बाणोंसे उसके मुकुट बेधकर सुवर्णकी पाँखवाले दस बाणोंसे उसके मस्तकोंको भी सुवर्णपुङ्खैर्दशभिः शरैर्विव्याध वीर्यवान् ॥ ५६ बेध दिया। उस समय देवताओंका मान-मर्दन करनेवाला तदा दशास्यो व्यथितो रामबाणैर्भृशं तदा। रावण श्रीरामके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो गया और विवेश मन्त्रिभिर्नीतः स्वपुरीं देवमर्दकः ॥ ५७ मन्त्रियोंद्वारा ले जाया जाकर वह अपनी पुरी लङ्काको लौट गया ॥ ५०-५७ ॥

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अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २२९ बोधितस्तूर्यनादैस्तु गजयूथक्रमैः शनैः। तदनन्तर वाद्योंके घोषसे जगाया गया कुम्भकर्ण पुनः प्राकारमुल्लङ्घ्य कुम्भकर्णो विनिर्गतः ॥ ५८ लङ्काके परकोटेको लाँघकर धीरे-धीरे गजसमूहकी-सी उत्तुङ्गस्थूलदेहोऽसौ भीमदृष्टिर्महाबलः। मन्द गतिसे बाहर निकला। उसका शरीर बहुत ही ऊँचा वानरान् भक्षयन् दुष्टो विचचार क्षुधान्वितः ॥ ५९ और मोटा था, आँखें बड़ी ही भयानक थीं। वह महाबली दुष्ट राक्षस भूखसे व्याकुल हो वानरोंको अपना तं दृष्ट्वोत्पत्य सुग्रीवः शूलेनोरस्यताडयत्। आहार बनाता हुआ रणभूमिमें विचरने लगा। उसे देख कर्णद्वयं कराभ्यां तु च्छित्त्वा वक्त्रेण नासिकाम् ॥ ६० सुग्रीवने उछलकर उसकी छातीमें शूलसे प्रहार किया तथा अपने दोनों हाथोंसे उसके दोनों कानोंको और सर्वतो युध्यमानांश्च रक्षोनाथान् रणेऽधिकान्। मुखसे उसकी नासिकाको काट लिया॥ ५८-६०॥ राघवो घातयित्वा तु वानरेन्द्रैः समन्ततः ॥ ६१ तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने रणमें सब ओर युद्ध करते हुए बहुसंख्यक राक्षसाधिपतियोंको चारों ओरसे वानरोंद्वारा चकर्त विशिखैस्तीक्ष्णैः कुम्भकर्णस्य कन्थराम्। विजित्येन्द्रजितं साक्षाद्गरुडेनागतेन सः ॥ ६२ मरवाकर अपने तीखे बाणोंसे कुम्भकर्णका भी गला काट लिया। फिर वहाँ आये हुए साक्षात् गरुडके द्वारा रामो लक्ष्मणसंयुक्तः शुशुभे वानरैर्वृतः। इन्द्रजित्को भी जीतकर वानरोंसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी व्यर्थं गते चेन्द्रजिति कुम्भकर्णे निपातिते ॥ ६३ लक्ष्मणसहित बड़ी शोभा पाने लगे। इन्द्रजित्का उद्योग व्यर्थ होने और कुम्भकर्णके मारे जानेपर लङ्कापति लङ्कानाथस्ततः क्रुद्धः पुत्रं त्रिशिरसं पुनः। रावणने क्रुद्ध हो अपने पुत्र त्रिशिरा, अतिकाय, महाकाय, अतिकायमहाकायौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ ६४ देवान्तक और नरान्तकसे कहा-'पुत्रवरो! तुम उन यूयं हत्वा तु पुत्राद्या तौ नरौ युधि निघ्नत। दोनों मनुष्यों-राम और लक्ष्मणको युद्धमें मार डालो।' तान्नियुज्य दशग्रीवः पुत्रानेवं पुनर्ब्रवीत् ॥ ६५ इस प्रकार उन पुत्रोंको ऐसी आज्ञा दे दशकण्ठ रावणने महोदरमहापाश्र्वौ सार्धमेतैर्महाबलैः। पुनः महोदर और महापार्श्व नामक राक्षसोंसे कहा- 'तुम संग्रामेऽस्मिन् रिपून् हन्तुं युवां व्रजतमुद्यतौ ॥ ६६ दोनों इस संग्राममें शत्रुओंका वध करनेके लिये उद्यत हो बहुत बड़ी सेनाओंके साथ जाओ'॥ ६१-६६॥ दृष्ट्वा तानागतांश्चैव युध्यमानान् रणे रिपून्। रणभूमिमें उपर्युक्त शत्रुओंको आकर युद्ध करते अनयल्लक्ष्मणः षड्भिः शरैस्तीक्ष्णैर्यमालयम् ॥ ६७ देख लक्ष्मणने छः तीखे बाणोंसे मारकर उन्हें यमलोक वानराणां समूहश्च शिष्टांश्च रजनीचरान्। भेज दिया। इसके बाद वानरगणने शेष राक्षसोंको मार सुग्रीवेण हतः कुम्भो राक्षसो बलदर्पितः ॥ ६८ डाला। सुग्रीवने बलाभिमानी कुम्भ नामक राक्षसको मारा, हनुमान्‌जीने देवताओंके लिये कण्टकरूप निकुम्भका निकुम्भो वायुपुत्रेण निहतो देवकण्टकः। वध किया। युद्ध करते हुए विरूपाक्षको विभीषणने विरूपाक्षं युध्यमानं गदया तु विभीषणः ॥ ६९ गदासे मार डाला। वानरश्रेष्ठ भीम और मैन्दने श्वपतिका भीममैन्दौ च श्वपतिं वानरेन्द्रौ निजघ्नतुः। संहार किया, अङ्गद और जाम्बवान् तथा अन्य वानरोंने अङ्गदो जाम्बवांश्चाथ हरयोऽन्यान्निशाचरान् ॥ ७० दूसरे निशाचरोंका संहार किया। नरेश्वर! युद्धमें लगे हुए श्रीरामचन्द्रजीने भी संग्रामभूमिमें बाणोंकी वर्षा करनेवाले युध्यमानस्तु समरे महालक्षं महाचलम्। महालक्ष और महाचल नामक राक्षसोंको मौतके घाट जघान रामोऽथ रणे बाणवृष्टिकं नृप ॥ ७१ उतार दिया॥ ६७-७१॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth