निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ३९८ ) ११अ० १पा० ८ खं०
इस कारण देवयान में चलने वालों को मृत्यु का भय नहीं
होता, वह दूसरों को ही होता है ।
‘परं मृत्यो०’ इत्यादि भाष्य की पंक्ति लेखक भ्रम आदि
से असम्बद्ध होगई है । भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में इसकी
व्याख्या नहीं है । मन्त्र के शब्द जो इस भाष्य में मिले हुये
हैं, उनकी टीका की जाचुकी है । अतः इसकी यथाक्रम
व्याख्या नहीं की जा सकती ।
‘तेषामेषा भवति’ यह अवतरणिका अपने से आगे आने
वाली ऋचा से सम्बन्ध नहीं करती । कारण, यह अवतर-
णिका बहु देवताओं की ऋचा को आवाहन करती है, और
जो इसके साम्हने ऋचा आती है, वह इन्द्राविष्णु दो देव-
ताओं की है । अतः यह भी पाठ किसी अनभिज्ञ लेखक के
द्वारा यहां असंबद्ध ही प्रक्षिप्त हुआ है । यहां से कुछही आगे
चलकर ८वें शब्द से “मरुतः” आदि आठ गण देवता आते
हैं, उनमें ५ देवताओं के अवतरण सर्वथा ऐसे ही हैं । उनके
सम्पर्क से यह दोष हुआ प्रतीत होता है ।
“त्वेष मित्था समरणम्०” इस ऋचा के उपन्यास का
यहां पर गम्भीर या दुरधिगम कारण प्रतीत होता है । क्यों
कि—प्रथम तो जिन इन्द्राविष्णु देवताओं की यह ऋचा है,
उनका देवता पदों में पाठ ही नहीं है । दूसरे कोई अवान्तर
प्रसंग भी नहीं और न इसका आगे पीछे कहीं प्रयोजन ही
है । इसके अतिरिक्त “त्वेष गित्था०” यह अध्याय के
अन्त में खण्डसूत्र में प्रतीक भी दिया है । इस लिये यह ऋचा
कब से और क्यों यहां प्रविष्ट हुई इसका निर्णय हम नहीं कर
हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) ११ अ० १ पा० ८ ख०
सकते। हां यह ऋचा ऋक्संहिता में है और सायणाचार्य का
इस पर व्याख्यान है। इस लिये इसकी व्याख्या हम भी
कर देते हैं।
"त्वेषं मिथ्या०" यह ऋचा सोमातिरेक में तृतीय सवन
में वैकल्पिक याज्या है , जैसा कि-सूत्र में कहा है--
"त्वेषं मिथ्या समरणं शिमीवतोरिति वा
याज्येति" ।
"त्वेषमिथ्या०" हे इन्द्राविष्णू ! इन्द्र विष्णु देवताओ !
'शिमीवतोः' वाञ्छित फल के देने वालो' 'वाम्' (युवयोः) तुम
दोनोंके 'इत्था' (इत्थम्) इस प्रकारके 'त्वेषम्' (प्रदीप्तम्) प्रज्व-
लित जगमगाते हुये 'समरणम्' यज्ञ देशमें शुभागमनको 'सुमपाः'
होम से बचे हुये सोम को पीये हुये यजमान 'उरुष्यति' (रक्षति)
रक्षा करता है- याग से पूजता है = संस्था करता है। तुम
में बड़ाई या गुण क्या है ? 'या' (यौ ) जो [इन्द्राविष्णू !
तुम दोनों इन्द्र और विष्णु 'सत्याय' हविः के देने वाले यज-
मान मनुष्य के लिये 'प्रतिधीयमानम्-इत्' (प्रतिघातव्यम्) देने
योग्य 'असनाम्' अन्न आदिको 'अस्तुः' शत्रुओं के हटाने वाले
'कृशानेः, [अग्नेः] अग्नि से 'उरुष्यथः' प्रवृत्ति कराते
हो। अर्थात्- अग्नि मे होम किये हुये हविः को स्वीकार
करके उसी के द्वारा अभिमत फलको देते हो ।(सा०भा०).
यह यहां पर बड़े आश्चर्य की बात है कि- एक ही
स्थान में मूल में तीन विलक्षण २ विभ्रम होगये हैं ॥
'विश्वानर' (५) शब्द की व्याख्या (अ०७ पा०६, खं० १.)
की जाचुकी है ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४०० ) ११ अ० १पा० ९खं०
“तस्य०” उस (विश्वानर की यह ऋचा है ॥८॥
( खं० ९ )
निरु०- “प्र वो महे मन्दमानायान्धसोऽर्चा
विश्वानराय विश्वाभुवे । इन्द्रस्य यस्य सुमहं
सहो महि श्रवो नृम्णञ्च रोदसी सपर्थतः ॥”
[ऋ० सं० ८, १, ९,१] ॥(य० वा० सं० ३३,३५]॥
प्रार्चत यूयं स्तुति महते 'अन्धसः' अन्नस्य दात्रे
'मन्दमानाय' मोदमानाय स्तूयमानाय शब्दाय-
मानाय- इति वा विश्वानराय सर्व विभूताय
इन्द्रस्य यस्य प्रीतौ सुमहद् बलं महच्च श्रवणीयं
यशोनृम्णं च बलं नृनतं द्यावापृथिव्यौ वः
परिचरत- इति कम्- अन्यं मध्यमाद्- एवम्
अवक्ष्यत् ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥९॥
अर्थः-“प्रवोमहे०” इस ऋचा का वैकुण्ठ ऋषि है।
जगती छन्द और महाव्रत में विनियोग है ॥
(हे स्तोतारः !) हे स्तुति करने वालो '(यूयम्) तुम 'महे'
(महते) बड़े 'मन्दमानाय' (मोदमानाय) हर्ष करते हुये (स्तू-
यमानाय) अथवा स्तुति किये जाते हुये ( शब्दायमानाय
इति वा) अथवा शब्द (गर्जना) करते हुये 'अन्धसः' (अन्नस्य)
(दात्रे) अन्न के देने वाले 'विश्वाभुवे' (सर्व विभूताय) सब
हिन्दी निरुक्त ( ४०१ ) ११अ० १पा० ६ खं०
विभूक्तियों से युक्त 'विश्वानराय' विश्वानर देव के लिये
(स्तुतिम्) स्तुति को 'प्र-अर्च' (प्रार्चत) उच्चारण करो या
दूसरों की कीहुई स्तुति को सराहो । 'यस्य' जिस 'इन्द्रस्य'
ईश्वर (विश्वानर) का 'सुमहम्' (सुमहत्) सुन्दर बड़ा 'सहः'
(बलम्) बलको 'महि-च' (महच्च) और बड़े 'श्रवः' (श्रवणीयं
यशः) श्रवण करने योग्य यश को 'नृम्णं-च' और बल को
(नॄन् नतम्) जो मनुष्यों के प्रति विशेष रूप से झुका हुआ है
'वः' और तुम्हारी इस स्तुति को 'रोदसी' (द्यावापृथिव्यौ)
द्यावा पृथिवी 'सपर्य्यन्तः' (परिचरन्तः) अनुमोदन करते हैं या
सराहते हैं ॥ इस प्रकार किस मध्यम से अन्य को ( मन्त्र का
द्रष्टा ऋषि) कहता ।
“तस्य एषा” (उस विश्वानर)की यह और ऋचाहै॥६॥
( खं० १० )
निरु०-“उदु ज्योतिरमृतं विश्वजन्यं विश्वा-
नरः सविता देवो अश्रेत् ॥”(ऋ०सं० ५,५,२३,१]
उदशिश्रिय ज्ज्योति रमृतं सर्वजन्यं विश्वानरःसविता
देवः- इति ॥
‘धाता’ सर्वस्य विधाता ॥
तस्य एषा भवति—॥१०॥
अर्थः-“उदुज्योतिः०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषिहै।
प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
सविता सब लोको को कर्म में प्रेरणा करनेवाले 'विश्वा-
हिन्दी निरुक्त ( ४०२ ) ११ अ० १पा० ११खं०
नरः' 'देवः' विश्वानर देव ने 'विश्वजन्यम्' ( सर्वजन्यम् )
सब जनों के लिये हित 'अमृतम्' अमर सूर्यनाम 'ज्योतिः'
ज्योति को 'उद्-अश्रेत्' ( उदशिश्रियत् ) ऊपर को उठाया है
क्योंकि—सब चलने वाले पदार्थों की गति वायु से ही होती
है, इस कारण सूर्य का भी ऊपर को उठाना या चलाना
उसी का कार्य हो सकता है । इस प्रकार 'विश्वानर' ज्योति
को उठाता है । इस कथन से 'विश्वानर' मध्यम होता है ।
इसी अभिप्राय को लेकर कहा है—“कमन्यं मध्यमादेव-
मवक्ष्यत्” मध्यम के अतिरिक्त और किस को ऐसा कहा
जाता ।
इस ऋचाका आधा पिछला भाग उषा देवता का है,
इससे भाष्यकार ने उसे यहां छोड़ दिया है ।
'धाता' ( ६ ) क्यों ? 'सर्वस्य विधाता' सब का करने
वाला है । क्योंकि—सब की सृष्टि जलसे ही होती है, इससे
यह देवता मध्यम है ।
“तस्य०” उस धाता की यह ऋचा है ॥१०॥
( खं० ११ )
निरु०-“धाता ददातु दाशुषे प्राचीमूर्जीवातुम-
क्षिताम् । वयं देवस्य धीमहि सुमतिं सत्यधर्मणः”
( अ०सं० ७, १७, २ )
धाता ददातु दत्तवते प्रवृद्धां जीविकाम्-अनुप-
क्षीणां, वयं देवस्य धीमहि सुमतिं कल्याणीं मतिं
सत्यधर्मणः ।
हिन्दी निरुक्त ( ४०३ ) ११ अ० १ पा० १२ खं०
'विधाता' धात्रा व्याख्यातः ।
तस्य एष निपातो भवति बहुदेवतायाम्
ऋचि ॥ ११ ॥
अर्थ :- "धाता ददातु०" इस ऋचाका वामदेव ऋषि
है। देविकाओं में धाता के हविः में विनियोग है ।
'धाता' धाता देव 'दाशुषे' जिसने अपने अर्थ हविः दी
है, उसके लिये 'प्राचीम्' (प्रवृद्धाम् ) बढी हुई 'अक्षितम्'
(अनुपक्षीणाम् ) नहीं घटने वाली 'जीवातुम्' (जीविकाम् )
जीविका को 'ददातु' (ददाति) देता है। 'वयम्' हम (तस्य)
उस 'सत्यधर्म्मणः' सत्य धर्म वाले 'देवस्य' देव की 'सुमतिम्'
(कल्याणीं मतिम् ) शुभ मति (बुद्धि ) को 'धीमहि' ध्यान
करते हैं ।
'विधातृ' (६) शब्द की 'धातृ' शब्द से व्याख्या होगई ।
“तस्य” उस 'विधाता' का यह बहुत देवताओं की
ऋचा में निपात है-॥११॥
( खं० १२ )
निरु०- "सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्मणि बृह-
स्पतेरनुमत्या उ शर्मणि । तवाह्मद्य मघवन्नुप-
ऽस्तुतौ धातर्विधातः कलशान् अभक्षयम् ॥"
[ ऋ० सं० ८, ८, २५, ३ ]
इति-एताभि र्देवताभिः-अभिप्रसूतः सोमकल-
शान् अभक्षयम्-इति ।
हिन्दी निरुक्त ( ४०४ ) ११ अ० १पा० १२खं०
'कलशः' कस्मात् । कला अस्मिन् शेरते मात्राः ।
'कलि'श्च 'कला'श्च किरतेः विकीर्णमात्राः ।१२।
इति एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११,१॥
अर्थ ः—"सोमस्य राज्ञः०" इस ऋचा का विश्वा-
मित्र ऋषि है ।
“सोमस्य राज्ञः धर्मणि (कर्मणि) सोम राजा के
कर्म में प्रवृत्त होता हुआ, “वरुणस्य, बृहस्पतेः, अनु-
मत्याः उ (च) शरणे (आश्रये)” वरुण, बृहस्पति और
अनुमति के आश्रय में वर्त्तमान “ हे मघवन् ! तव, हे
धातः ! विधातः ! युवयोश्च उपस्तुतौ (वर्त्तमानः)
अहम् कलशान् अभक्षयम्” हे मघवन् ! इन्द्र ! तेरी
और हे धातुदेव ! और हे विधातृदेव ! तुम दोनों की उप-
स्तुति में वर्त्तमान रहकर मैंने ( तुम्हारी सबकी प्रेरणासे प्रेरित
होकर ) सोम के कलश पान किये हैं ।
'कलश' क्यों ? 'कलाः अस्मिन् शेरते' इस में सोमकी कुछ
कला या मात्राएं सोम निकाल लेने पर भी बनी रहती हैं ।
'कल' शब्दसे पूर्व भाग और शयन अर्थमें 'शीङ्' (अदा०आ०)
धातु से उत्तर भाग है ।
'कलि' और 'कला' दोनों शब्द विक्षेप अर्थ में 'कॄ'
[तु०प०] धातु से हैं । क्योंकि—'कलि' या कलह में परस्पर
में वचनों का विक्षेप होता है, और कला (मात्रा) भी किसी
समुदाय से विक्षिप्त (फेंकी हुई) जैसी होती है ।
इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११, १॥
हिन्दी निरुक्त ( ४०५ ) ११ अ० २ पा० १ खं०
द्वितीयः पादः ॥
( खं० १ )
निघण्टुः-मरुतः ॥ ८ ॥ रुद्राः ॥ ९ ॥
ऋभवः ॥ १०॥ अङ्गिरसः ॥११॥ पितरः
॥ १२॥ अथर्वाणः ॥१३॥ भृगवः ॥१४॥
आप्रयः ॥ १५ ॥
निरुक्तम्- अथातो मध्यस्थाना देवगणाः ।
तेषां मरुतः प्रथमागामिनो भवन्ति ।
‘मरुतो’ मितराविणो वा मितरोचिनो वा ।
महद् द्रवन्ति-इति वा ।
तेषाम्-एषा भवति ॥ १ ( १३ ) ॥
अर्थः- अब यहां से मध्यस्थान के देवगण हैं-दशम
अध्याय और ग्यारहवें अध्याय के प्रथम पाद् में मध्यस्थान
के 'वायुः' आदि ३२ और 'श्येनः' आदि ७ देवता कहेगए
वे सब एक २ देवता हैं, उन सब में एक वचन आता है।
जिससे कि-एक २ देवता कहे गए, इससे अब मध्यस्थान के
देवगण = देवताओं के समूहों के नाम-जिनमें सदा बहु-
वचन रहता है, कहे जाते हैं। ये सब एक २ नाम से बहुत २
देवता बाले जाते हैं- इनमें एक २ नाम से देवताओं की
अवान्तर जातिए बताई जाती हैं। इन्हीं की सूचना के लिये
'अथ' शब्द से यह अवान्तर अधिकार सूचित किया है।
हिन्दी निरुक्त ( ४०६ ) ११ अ० २ पा० १ खं०
'तेषाम्०" उन देवगणों में मरुत् पहिले आते हैं। [क्यों-
कि-वृष्टि कर्म में पहिला कार्य ये ही करते हैं।]
'मरुत्' (८) क्यों हैं ? वे मित रवण करते हैं-मन्द २
मिला हुआ शब्द करते हैं। किसी के मत में अमित रवण
करते हैं [भैष्यके पाठ में 'अकार की सन्धि भी निकल
सकती है, इसी पर यह दूसरा मत अवलम्बित है]। अथवा
मित रोचते हैं, थोड़ा२ प्रकाशते हैं। किसी के मतमें अमित
(बहुत) रोचते हैं इससे 'मरुत्' हैं। अथवा महत् द्रवण करते
हैं-बड़ी दौड़ करते हैं इस से 'मरुत्' हैं।
"तेषाम्०" उन मरुतों की यह ऋचा है ॥१ (१३) ॥
व्याख्या।
मरुतः। इस पद में 'मरुत्' शब्द से प्रथमा विभक्ति का
बहुवचन संयुक्त है। इससे बहुत मरुत् देवताओं की प्रतीति
होती है। जब वायु देवता ही भेद से देखा जाता है, तब वही
मरुत् नाम वाला तथा बहुवचन के योग्य हो जाता है। ये
कोई दूसरे देवता नहीं हैं। इसी से इन आठ गण देवताओं
में इनके प्रथम आने का कारण वही है, जो वायु का है।
अर्थात्- इनके प्राथम्य के जानने के लिये वायु देवता का
व्याख्यान पढना चाहिये। विशेष यही है कि-जब कोई कर्म
बहुत रूपों का ही साध्य होता है, तब वह मध्यम देव वायु
ही बहुधा (बहुरूप) हो जाता है। बहुवचन युक्त मरुत् नाम
वाले जो ४६ वायु के रूप हैं, उन में सात (७) सात (७) के
७ गण (समूह हैं', और उनके शुक्रज्योतिः, चित्रज्योतिः,-
इत्यादि पृथक् २ नाम भी हैं। इन सब का कारण भी कर्म
और बुद्धि का भेद ही है। ये सप्त गण मारुत गणों के श्रौत
कर्म में जहां सप्त कपाल पुरोडाश होते हैं, तथा पुराणों में
इसी प्रकार से प्रसिद्ध हैं। दिति ने अपने पुत्र वृत्रासुरके वध
का बदला लेने के लिये पुंसवन व्रत धारण करके मारीच
कश्यप से इन्द्र का वध करने वाला एक गर्भ धारण किया था
इन्द्र ने समय पाकर उस गर्भ के ७ टुकड़े किये और उन में
एक १ के फिर सात २ टुकड़े किये। दिति के तप के प्रभाव
से वे मरे नहीं, किन्तु ४६ मरुत् देवता होगये। (श्री० भा०
स्कं० ६ अ० १८)
नैरुक्तों के मतमें तो ये सभी मध्यम लोक के आठों गण
(८-१५) मरुत् [वायु] ही हैं। जैसा कि-वार्त्तिक में
कहा है-
“मध्यमा वाक् स्त्रियः सर्वाः पुमान् सर्वश्च मध्यमः।
गणाश्च सर्वे मरुतो गणभेदाः पृथक्कृतेः ॥”
अर्थात्-अदिति (१६) आदि मध्यम लोक की २८ स्त्रियें
मध्यमा वाक् देवता है। मध्यम लोक के वायु आदि, पुरुष
देवता मध्यम वायु या इन्द्र देवता है। और मध्यम लोक के
सब मरुतः (८) आदि आठ गण देवता मरुत् ही हैं। इन के
गण भेद भी कर्म के भेद से कल्पित हैं।
( खं० २ )
निरु०-“ आविधुन्मद्भिर्मरुतः स्वकैरथेभिर्याति
ऋष्टिमद्भिरिश्वपर्णैः। आवार्विष्ठया न इषा वयो न
पप्तता सुमायाः ॥ ” ( ऋ० सं० १, ६, १४, १ ) ॥
“ विधुन्मद्भि र्मरुतः स्वकैः” स्वञ्चनैः-इति वा,
स्वर्चनैः-इति वा, स्वर्चिर्भिः-इति वा, रथैः आयात
हिन्दी निरुक्त ( ४०८ ) ११अ० २पा० ३ खं०
ऋष्टिमद्भिः अश्वपर्णैः अश्वपतनैः वर्षिष्ठेन च नः
अन्नेन वयः इव आपतत 'सुमायाः' कल्याणकर्मा-
णो वा, कल्याणप्रज्ञा वा ।
'रुद्रा' व्याख्याताः ।
तेषामे-एषा भवति- ॥ २ [ १४ ] ॥
अर्थ.-“आविद्युन्मद्भिः०” इस ऋचा का गोतमऋषि
है । आस्तार पंक्ति छन्द है ।
'मरुतः' हे मरुत् देवो! (यूयम्) तुम सब 'विद्युन्मद्भिः'नि-
राली चमक वाले (बिजली वाले ) 'स्वर्कैः' ( स्वञ्चनैः ) सुन्दर
गमन वाले ( स्वर्चनैः इति वा ) अथवा सुन्दर पूजन वाले
[पूजे जाने वाले](स्वर्चिभि इतिवा)अथवा सुन्दर किरणोंवाले
'ऋष्टिमद्भिः ' आयुधों वाले या अकाल के नाश करने वाले
'अश्वपर्णैः' अश्व (घोड़े) वाहनों वाले या वज्र के गिराने
वाले 'रथेभिः' रथों से या मेघों से 'आयात' आओ । 'सुमायाः'
(कल्याणकर्माणो वा ) हे सुन्दर कर्मों वाले ! (कल्याणप्रज्ञा
वा) या सुन्दर प्रज्ञा (बुद्धि)वाले ! मरुतों!'वर्षिष्ठया' (वर्षिष्ठेन)
बड़े श्रेष्ठ 'इषा' अन्नेन) अन्नके सहित 'वयः न' पक्षियों के
समान 'आपतत' [आपतत] आओ ।
'रुद्र' (९) व्याख्यान किये जाचुके [अ०१०पा०१खं०५ ] ।
“तेषाम्०” उन रुद्रों की यह ऋचा है ॥२(१४)॥
( सं० ३ )
निरु०-“आरुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्य-
हिन्दी निरुक्त (४०६) ११ अ० २पा० ३ ख०
रथाः सुविताय गन्तन । इयं वो अस्मत् प्रति
हर्यते मतिस्तृष्णजे न दिव उत्सा उदन्धवे ॥ ”
(ऋ०सं०५, ३, २१, १) ॥
आगच्छत रुद्रा इन्द्रेण सहजोषणः सुविताय
कर्मणे इयं वो अस्मदपि प्रति कामर्थते मति-
तृष्णजे इव दिव उत्सा उदन्यवे इति ।
'तृष्णक्' तृष्यतेः।
'उदन्युः' उदन्यतेः ॥
'ऋभवः' उरु भान्ति-इति वा । ऋतेन भान्ति-
इति वा । ऋतेन भवन्ति- इति वा ।
तेषाम्- एषा भवति ॥३ (१५)॥
अर्थः-“आरुद्रासः०” यह ऋचा श्यावाश्व ऋषि की
है । जगती छन्द और आग्निमारुत में शस्त्र है ।
'रुद्रासः' (रुद्राः!) हे रुद्र देवो! (यूयम्)तुम“ इन्द्रव-
न्तः-सजोषसः” (इन्द्रेण सह जोषणाः) इन्द्र के साथप्रीति
युक्तहोते हुये या इन्द्र नाम ऐश्वर्यसे युक्त होते हुए 'हिरण्य-
रथाः' सोने के रथ वाले या जल के हरण के अर्थ रंहण (सर-
कने) वाले 'सुविताय' (कर्मणे) सुन्दर सगुण कर्म के लिये
वा शास्त्र के अनुसार किए जाते हुए कर्म की प्राप्ति के लिए
'आगन्तन' (-आगच्छत) आओ । 'इयम्'यह 'अस्मत्' आप
हमारी भी 'मतिः'मति(बुद्धि)'वः'(युष्मान्)तुम्हारे पास'प्रति-
हिन्दी निरुक्त ( ४१० ) ११ अ० २पा० ३ खं०
हर्य्यन्ते' प्रति गमन करती है— जिस प्रकार पहिले से ही
तुम हमारे हविः की इच्छा करते हो, उसी प्रकार हमारी
बुद्धि भी तुम्हारे प्रति जाती हैकि-'तुम्हारे विना इनअङ्गों से
गुण युक्त भी हमारा यह कर्म विगुण (अङ्गहीन) न हो। जिस
प्रकार ब्राह्मण पहिले से ही न्यूते की इच्छा करते हैं, उसी
प्रकार देवता भी पहिले से हविः की इच्छा करते हैं। इस
अर्थ को श्रुति भी कहती है-
“देवता वै सर्वा आशंसन्ति ग्रहे गृह्यमाणे मह्यं
गृह्णाति”
अर्थात्-सब देवता ग्रह(हविः)लिए जाने के समय इच्छा
करते हैं कि-मेरे लिये ग्रहण करता है। इसीसे कहा है कि-
“हमारी मति तुम्हारे समीप प्रति गमन (गमन
के सामने गमन) करती है।”
कैसे जाती है? 'तृष्णाजे' ग्रीष्म (गरमी)में 'दिवः' द्युलोकसे
'उदन्यवे' जलके चाहने वाले लोक या चातक के लिए'उत्स्राः
न' जैसे मेघ आते हैं । उसीप्रकार तुम हमारे यज्ञ में आओ॥
'तृष्णाज्' कैसे ? पिपासा अर्थ में 'तृष' (दि० प०)
धातु से है।
'उदन्यु' कैसे ? 'उदन्य' नाम धातु से । 'उदन्यु' उदक
[जल] की इच्छा करने वाला ।
'ऋभु' [१०] कैसे ? ' उरु भान्ति ' वे बहुत चमकते हैं ।
'ऋतेन भान्ति इति वा'अथवा वे सत्य से चमकते हैं ।'ऋतेन
भवन्ति इति वा' अथवा वे सत्य से होते हैं ।
“तेषाम्०” उन ऋभुओं की यह ऋचा है ॥३[१५]॥
हिन्दी निरुक्त (४११) ११ अ० २ पा० ४ खं०
[खं० ४]
निरु० "विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाघतो मर्त्तासः
सन्तो अमृतत्वमानशुः । सौधन्वना ऋभवसूर-
चक्षमः संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः ॥" (ऋ०
सं० १, ७, ३०, ४) ॥
कृत्वा कर्माणि क्षिप्रत्वेन वोढारो मेधाविनो
वा मर्त्तासःसन्तःअमृतत्वम् आनशिरे, सौधन्वनाः
ऋभवः सूरख्याना वा, सूरप्रज्ञा वा,संवत्सरे सम-
पृच्यन्त धीतिभिः कर्मभिः ॥
ऋभुः'विभ्वा,वाजः,-इति सुधन्वनः आङ्गिरस-
स्य त्रयः पुत्रा बभूवुः, तेषां प्रथमोत्तमाभ्यां बहु-
वत् निगमा भवन्ति,न मध्यमेन। तदेतदृक्भोश्च
बहुवचनेन चमसस्य च संस्तवेन बहूनि दशतयीषु
सूक्तानि भवन्ति ।
आदित्यरश्मयः अपि ऋभवः उच्यन्ते ।
"अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो
नानुगच्छथ ।” [ऋ० सं० २, ३, ६, १] ॥
'अगोह्यः'आदित्यः । आगूहनीयः । तस्य यद्
अस्वपथ गृहे यावत् तत्र भवथ न तावद् इह भवथ
इति ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१२ ) ११ अ० २पा० ४खंड
'अङ्गिरसः' व्याख्याताः ।
तेषाम्—एषा भवति ॥४[१६]॥
अर्थ :-“विष्टी शमी०” इस ऋचा का कुत्स ऋषि हैं
आर्भवे विनियोग है ।
'सौधन्वनाः' ( सुधन्वनः पुत्राः ) सुधन्वा के पुत्र 'सूर-
चक्षसः' [ सूरख्याना वा ] सूर्य के समान प्रकाश वाले ( सूर-
प्रज्ञा वा ) सूर्य के समान ज्ञान वाले 'वाघतः' ( वोढारः )
यज्ञ के चलाने वाले ( मेधाविनो वा ) मेधा ( धारणा वाली
बुद्धि ) वाले 'ऋभवः' ऋभुओं ने “विष्टी शमी” ( कृत्वा
कर्माणि ) कर्मों को करके 'तरणित्वेन' [क्षिप्रत्वेन] जलदी से
“मर्त्तासः सन्तः” [ मनुष्याः सन्तः ] मनुष्य होते हुए
'अमृतत्वम्' अमर भाव ( देव भाव ) को 'आनशुः' प्राप्त कर
लिया था-सुधन्वा के पुत्र ऋभु कर्म की महिमा से शीघ्र ही
देवता होगए थे । 'संवत्सरे' एक वर्ष में 'धीतिभिः' (कर्मभिः)
कर्मों से 'समपृच्यन्त' संयुक्त हो गए थे - यज्ञ कर्म के अनु-
ष्ठान में अपने अपूर्व कौशल से उन्हों ने एक ही वर्ष में या
संवत्सर के विहित वसन्त आदि काल में कर्मों को समाप्त
किया और उसी कर्मकी यथार्थता के फलसे वे शीघ्र ही देवता
होगए-उनको कर्मके विपाक की बहुत काल तक प्रतीक्षा नहीं
करनी पड़ी ।
“ऋभुः०” । ऋभु, विभ्वा और वाज ये आङ्गिरस (अङ्गि-
रस के पुत्र) सुधन्वा के तीन पुत्र हुये थे, उनमें पहिले (ऋभु)
और तीसरे (वाज) के बहुतों के समान निगम हैं - इन दोनों
के नाम मन्त्रोंमें बहुवचनान्त आते हैं, किन्तु मध्यम (विभ्वा)
के नहीं। सो यह—ऋभु के बहुवचन के साथ और चमस के
संस्तव (एक साथ स्तुति) के साथ दशतयी [ऋग्वेद के दश
मण्डलों] में बहुत सूक्त हैं।
“आदित्यरश्मयः” । आदित्य (सूर्य) की रश्मिएँ
(किरणें) भी ऋभु कहलाती हैं।
“अगोह्यस्य०” । 'ऋभवः' हे ऋभुओ ! 'यद्' (यावत्)
जबतक 'अगोह्यस्य' (आदित्यस्य) सूर्य के 'गृहे' (मण्डले)
मण्डल में 'असतनाः' (अस्वपथ) तुम सोते हो (भवथ)
यो होते हो 'तद्' (तावत्) तब तक 'अद्य' (इह) यहां
'इदम्' इस जगत् को “न अनुगच्छथ” अनुसरण नहीं
करते हो (न भवथ) अथवा यहां नहीं होते हो— जब तुम
रात्रि के समय सूर्य मण्डल में प्रवेश कर जाते हो, तो यह
जगत् तुम्हारे बिना प्रकाश हीन होजाता है, इस तुम्हारे माहा-
भाग्य (महिमा) को मैं अनुकीर्त्तन करता हूं, तुम मेरे इस कार्य
को करो। इस मन्त्र में इस प्रकार 'ऋभु' नाम सूर्य की रश्मि-
ओं का है ॥
'अगोह्य' क्या ? आदित्य। क्यों वह अगूहनीय होता है
किसी से भी छिपाया नहीं छिपता।
“अङ्गिरसो व्याख्याताः” अङ्गिरसों की व्याख्या
[३. ३, ५] की जाचुकी।
“तेषाम्०” उन अङ्गिरसों की यह ऋचा है ॥ ४ [१६]
हिन्दी निरुक्त ( ४१४ ) ११ अ० २पा० ५ खं०
( खं० ५ )
निरु०-“विरूपास इदृषयस्तं इद् गम्भीरवेपसः'
ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे ॥”
( ऋ० सं० ६, २, १, ५ ) ॥
बहुरूपा ऋषयः, ते गम्भीरकर्मणो वा, गम्भीर-
प्रज्ञा वा । ते अङ्गिरसः पुत्राः । ते अग्नेः अधि-
जज्ञिरे,-इति अग्निजन्म ।
'पितरो' व्याख्याताः ।
तेषाम् एषा भवति ॥५[१७]॥
अर्थ :-“‘विरूपासः’” इस ऋचाका नाभानेदिष्ट ऋषि
है अनुष्टुप् छन्द और पाष्ठिक षष्ठ (छठे) अहन् में विनि-
योग है ।
'विरूपास:' ( विरूपाः = नानारूपाः ) अनेक रूप वाले
( इत् ) 'ऋषयः' कभी निष्फल न होने वाले ब्रह्म ( वेद ) के
देखने वाले ( न केवल देखने वाले ही अपितु ) 'गम्भीरवेपसः'
( गम्भीरकर्मणो वा ) अथवा गम्भीर कर्म वाले ( गम्भीर-
प्रज्ञा वा ) अथवा गम्भीर बुद्धि वाले 'ते' वे ' अङ्गिरसः '
अङ्गिरा के 'सूनवः' (पुत्राः) पुत्र 'ते' वे 'अग्नेः' अग्नि के रूप
को प्राप्त हुए अङ्गिरा से 'परिजज्ञिरे' ( अधिजज्ञिरे ) उत्पन्न
हुए । वे नानारूप वाले और गम्भीर कर्म वाले मेरा यह इष्ट
करें । यह इनका अग्नि-जन्म है ।
'पितरः' (१२) (पितृ) व्याख्या किये जा चुके हैं [ ४, ३, ५ ]
उनकी यह ऋचा है-॥५(१७)॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१५ ) ११ अ० २ पा० ६ खं०
(खंड ६)
निरु०-“ उदी॑रता॒मव॑र॒ उत्परा॑स॒ उन्म॑ध्य॒माः
पि॒तरः॑ सो॒म्यास॑: । असुं॒ य ई॒युर॑वृ॒का ऋ॑त॒ज्ञा-
स्तेनो॑ऽवन्तु पि॒तरो॒ हवे॑षु ॥” (ऋ० सं० ७, ३,
१७, १) (य० वाज० सं० १९, ४९) ॥८
उदीरताम् अवरे, उदीरतां परे, उदीरतां म-
ध्यमाः पितरः सोम्याः सोमसम्पादिनः ते, असुं
ये प्राणम् अन्वीयुः अवृकाः अनमित्राः सत्यज्ञा
वा, यज्ञज्ञा वा, ते नः आगच्छन्तु पितरोह्वा-
नेषु ॥
माध्यमिको यमः, तस्माद् माध्यमिकान् पितॄन्
मन्यन्ते ।
'अङ्गिरसो व्याख्याताः, पितरो व्याख्याताः,
भृगवो व्याख्याताः, 'अथर्वाणः' अथनवन्तः।
'थर्वतिः' चरतिकर्मा, तत्प्रतिषेधः।
तेषाम्- एषा साधारणा भवति- ॥ ६ (१८) ॥
अर्थः-“उदीरतामवरे०” इस ऋचाका शङ्ख ऋषि
और पितृमेधमें विनियोग है। (ये) जो 'पितरः' पितर 'अवरे'
(पृथिवीम् आश्रिताः) पृथिवी पर रहते हैं, (ते) वे (तावत्)
पहिले 'उदीरताम्' (ऊर्ध्वं गच्छन्तु) ऊपरको जावें-ऊपर
के लोक में जावें। 'परासः' (परे) (द्युलोकम् आश्रिताः) और
हिन्दी निरुक्त ( ४१६ ) ११अ० २पा० ६ खं०
जो द्युलोक में रहने वाले हैं (तेऽपि) वे भी 'उत्' (उदीरताम्)
ऊपर को जावें — नीचेकी ओर न गिरें या उनके उस अधिकार
के पूरे होजाने पर वे मुक्त होजावें । ( येऽपि ) और जो भी
'मध्यमाः' (पितरः)मध्यम लोक के निवासी पितर हैं,(तेऽपि)
वे भी 'उत्' (उदीरताम्) ऊपर को जावें — उत्तम लोक में चले
जावें । (येऽपि) और जो भी 'सोम्यास' ( सोम्याः = सोमस-
म्पादिनः सोम के सम्पादन करने वाले या हमारे यज्ञ मेंऽङ्ग
भाव को प्राप्त होने वाले 'ये' जो 'असुम्' [प्राणम्] प्राण (वायु)
रूप को 'ईयुः' (अन्वीयुः) प्राप्त हों — वायुमात्र — मूर्त्ति हों-
सूक्ष्म शरीर वाले हों, 'अवृकाः' और जो शत्रु रहित- केवल
समभाव को प्राप्त हों, 'ऋतज्ञाः' [सत्यप्रज्ञावा यज्ञप्रज्ञावा]
और जो सत्य के या यज्ञ के जानने वाले हों, 'ते' वे सब
'पितरः' पितर 'नः' हमारे हवेषु (दानेषु)आह्वानेषु बुलाओं
में 'अवन्तु' नित्य ही आवें ।
‘ यम देवता मध्यम लोक का है ’ यह नैरुक्त कहते हैं,
इससे 'पितृ' (पितर) देवताओं को माध्यमिक या मध्यमलोक
के मानते हैं । [क्यों कि- वह उनका राजा है ।]
‘अङ्गिरस्’ व्याख्यान किये गए ( ३, ३, ५ )
‘पितृ’ (पितर) व्याख्यान किये गए (४,३,५)
‘भृगु’ (१३) व्याख्यान किये गए (३,३,५)
‘अथर्वाणः’ (१३) (अथर्वा) क्या? ‘अथनवन्तः’ नहीं चलने
वाले = स्थिर-प्रकृति = स्थिर स्वभाव । सो कैसे ? ‘ थर्व ’
(भ्वा०प०) धातु गति अर्थ में है, उसका निषेध ‘अथर्वा’ है—
निषेधार्थक ‘अ’ और ‘थर्व’ धातु से है ।
उन सब (चारों) की यह साधारण ( सब के की ) ऋचा
है— ॥ ६ (१८) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१७ ) ११अ० २पा० ७ खं०
[ खं० ७ ]
निरु०-“अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो
भृगवः सोम्यासः। तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि
भद्रे सोमनसे स्याम ॥” [ ऋ०सं० ७, ६. १५. १ ]
य० वा० सं० १९, ५०)
अङ्गिरसो नः पितरो नवगतयो नवनीतगतयो
वा अथर्वाणो भृगवः सोम्याः सोमसम्पादिनः तेषां
वयं सुमतौ कल्याणयां मतौ यज्ञियानामपि च
एषां भद्रे भन्दनीये भाजनवति वा कल्याणे मनसि
स्याम ।
“इति माध्यमिको देवगणः” इति नैरुक्ताः ।
“पितरः” इति अन्वाख्यानम् ।
अथापि ऋषयः स्तूयन्ते ॥७(१९)॥
अर्थः-“अङ्गिरसोनः०”इस ऋचा का यम ऋषि और
त्रिष्टुप् छन्द है ।
'अङ्गिरसः' अङ्गिरस् नाम वाले, जो 'सोम्यासः' (सोम्याः
सोमसम्पादिनः ) सोम के सम्पादन करने वाले, ( नित्यम् )
नित्य 'नः' हमारी 'सुमतौ' (कल्याणयां मतौ ) शुभ मति में
रहते हैं, और 'पितरः' पितर, जो 'नवग्वाः' (नवगतयः नव-
नीतगतयो या ) नवीन (नई) गतिवाले हैं-जिनका प्रतिमास
पितृयज्ञ के अर्थ यजमानों के घरों में नया २ गमन होता
रहता है, अथवा नवनीत ( मक्खन = घृत ) के प्रति जिनके