निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
६६ २ अ० ५ पा० १ खं० । पञ्चमः पादः । [ निघ० ] खदयः (१) । किरणाः (२) । गावः (३) । रश्मयः (४) । अभीशवः (५) । दी- धितयः (६) । गभस्तयः (७) । वनम् (८) । उस्राः (६) । वसवः (१०) । मरीचिपाः (११) । मयूखाः (१२) । सप्त ऋषयः (१३) । साध्याः (१४) । सुपर्णाः (१५) । इति पञ्चदश रश्मि- नामानि ॥ ५ ॥ [ निघ० ] आताः (१) । ओशाः (२) । उपराः (३) । आष्ठाः (४) । काष्ठाः (५) । व्योम (६) । ककुभः (७) । हरितः (८) । इति अष्टौ दिङ् नामानि ॥ ६ ॥ ( खण्ड १ ) [ निरु० ] रश्मिनामानि-उत्तराणि पञ्चदश । 'रश्मिः यमनात् । तेषाम्-आदितः साधारणानि पञ्च अश्वरश्मिभः । दिङ् नामानि उत्त- राणि-अष्टौ । 'दिशः' कस्मात् ? दिशतेः । आसदनात् । अपि वा अभ्यशनात् । तत्र 'काष्ठा' इत्येतद् अनेकस्यापि सत्वस्य भवति । काष्ठा दिशो भवन्ति । क्रान्त्वा
हिन्दी निरुक्त । ६३ स्थिता भवन्ति । काष्ठा उपदिशो भवन्ति । इतरेतरं क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति । आदित्योऽपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आज्यन्तः-अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आपः- अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति-इति स्थावराणाम् ॥ १ ॥ अर्थ । दिव् व आदित्यके नामोंके अनन्तर पन्द्रह ( ५ ) रश्मि (किरण या लगाम) के नाम हैं । 'रश्मि' क्यों ? जलो या अश्वोंके यमन (थाँम्हने) से । उनमें प्रथम पाँच नाम घोडोंकी रश्मियोंके साथ साझेके नाम हैं । रश्मि नामोंके पश्चात् आठ (८) दिशाके नाम हैं । 'दिश्' किस निर्वचनसे ? दिश् अतिसर्जन या दान अर्थ मे (तु० प०) धातुसे । क्योंकि-'अति सृज्यन्ते आसु हविरादीनि देवतानाम्' इनमे देवताओके लिये हविः आदि दी या रखी जाती हैं । ] आसा- दन अर्थात् प्रत्येक वस्तुके आसन्न या समीप रहनेसे । अथवा प्रत्येक वस्तुको अभ्यशन या अपने अन्तर्गत कर लेती हैं, इससे । उनमें 'काष्ठा' यह नाम उनके द्वय्योका होता है । 'काष्ठा' दिशा होती है । क्योंकि वे प्रत्येक वस्तुके प्रति जाकर स्थित होती है । 'काष्ठा' उपदिशा या कोण-दिशा होती हैं । क्योंकि-वे भी परस्परको दबा कर दिशाओंके साथ स्थित होती है । आदित्य भी 'काष्ठा' कहा जाता है । क्योकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर १३
६८ २ अ० ५ पा० २ खं० । स्थित होता है । रण या संग्रामका देश भी-'काष्ठा' कहलाता है । क्योंकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर स्थित होता है। जल भी 'काष्ठा' कहलाते है । [ जल दो प्रकारके होते हैं, स्थावर और जङ्गम उनमें ] ये जलाशयमें जाकर स्थित हो जाते हैं, यह स्था- वरोंका निर्वचन है । [ अस्थावर या चलते हुए जलोंके अभिप्रायसे- 'क्रामन्ते च एताः, न क्वचित् तिष्ठन्ति, इति काष्ठाः मेध्याः आपः' अर्थात् ये चलते ही रहते हैं, किन्तु कहीं भी ठहरते नहीं, इससे 'काष्ठाः' मेध्य या पवित्र जल हैं। यह निर्वचन है । ] ॥ १ ॥ (खण्ड २) (निरु०) "अतिष्ठन्ती नाम निवेशनानां का- ष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् । वृत्रस्य निण्यं वि- चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिरुद्रशत्रुः ॥” “अतिष्ठन्तीनाम्”-अनिवेशमानानाम्-इति । अस्थावराणां “काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरं” मेघः । 'शरीरं' शृणातेः । शम्नातेर्वा । “वृत्रस्य निण्यं” निर्णामं “विचरन्ति” विजानन्ति-“आपः” इति । “दीर्घं” द्राघतेः । “तमः” तनोतेः । “आशयत्” आशेतेः । “इन्द्रशत्रुः” इन्द्रः-अस्य शमयिता वा । घातयिता वा, तस्मादिन्द्रशत्रुः । तत्को वृत्रः ? मेघः इति नैरुक्ताः । त्वाष्ट्रः-असुरः- इति ऐतिहासिकाः । अपां च ज्योतिषश्च मिश्री- भावकर्मणो वर्षकर्म जायते । तत्रउपमार्थेन युद्धवर्णाः
हिन्दी निरुक्त। ६६ भवन्ति । अहिवत् तु खलु मन्त्रवर्णाः ब्राह्मण- वादाश्च । विवृद्ध्या शरीरस्य स्रोतांसि निवारया- ञ्चकार, तस्मिन् हते प्रसस्यन्दिरे आपः । तदभिवा- दिनी-एषा-ऋग् भवति ॥ २ ॥ अर्थ । [ जङ्गम काष्ठा या जलोंके वर्णनमें मन्त्र— ] “हिरण्यस्तूपस्य इयमर्षम्, दासपत्नीरिति च । त्रिष्टुभावेते । 'अग्निष्टोमे निष्केवल्यं नाम शस्त्रम् तत्र निविद्धानीयमेतत् सूक्तम्, तत्र द्वे अपि शस्येते ।” 'अतिष्ठन्ती' मेघके चलते हुए बराबर चलती हुईं 'अनिबेशना' जलाशयकी प्राप्तिसे पहिले कहीं कही रुकनेवाली 'मध्ये' मेघके उदरमें स्थित हुई हुईं काष्ठाआं (जलों) के बाहरसे विधाताने मेघरूप शरीर जो उनको आवरण किये हुए और उन्हींकी रक्षाके लिये है, लगा दिया है। अप् या जल वृत्र (मेघ) के 'निण्य' नीचे स्थानको जिससे वह गमन करता है, जानते हुएके समान नीचेकी ओर जाते हैं, और इन्द्र शत्रु (वृत्र या मेघ) उसके रोकनेवालेके समान दूर तक उसके आगे बढ़ता है, और अन्धकार- को फैला कर स्थित होता है । इस मन्त्रमें वर्षाकालीन मेघका स्वभाव और रूप वर्णन किया है। वर्षाऊ बादलकी काली काली घटाएं नीचेको पृथ्वीकी ओर लटक आती हैं और दूरतक फैल जाती हैं। बादलके भीतरका पानी भारीपनसे नीचेको आता है और उसीके साथ उसका धूम- आदि-मय शरीर भी उसके आगे तक फैल जाता है। मानो एककी स्पर्धासे एक आगे बढ़ता है, यही दृश्य इस मन्त्रके द्वारा देख रहा है।
३०० २ अ० ५ पा० २ ख० । [ निरुक्तार्थ ] नहीं ठहरने वालियोंके, नहीं निवेश ( प्रवेश ) करनेवालियोंके, यह स्थावर (चल) जलोंका (वर्णन है।) काष्ठाओंके बीचमें (रहते हुए) (विधाताने बाहरसे) शरीर रख दिया। शरीर नाम मेघ। "शरीर" शब्द ‘शॄ’ हिंसायाम्- (क्रयादि० प०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह इन्द्रदेवसे विदा- रण किया जाता है।] अथवा हिंसार्थक 'शम्' (क्रया० प०) धातुसे है। 'वृत्र' के 'निण्य' निर्णाम नीचेको झुके हुए स्थानको 'विचरन्ति' विशेषरूपसे जाती हैं। "आपः" जल। "दीर्घ" शब्द 'द्राघ्' वृद्धयर्थक (भ्वा० आ०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह बढ़ा हुआ होता है।] "तमस्" शब्द विस्तार अर्थमें 'तनु' (त० उ०) धातुसे है। [क्योंकि वह विस्तृत होता है।] "आशयत्" पद 'आङ्' (३ प०) और 'शीङ्' स्वप्ने (अदा० आ०) धातुसे है। "इन्द्रशत्रु" [क्यों ?] इन्द्र इसका शमन करनेवाला है। अथवा शातन या छेदन करनेवाला है। इससे वह 'इन्द्रशत्रु' है। सो कौन "वृत्र" है ? 'मेघ' यह निरुक्तके आचार्य कहते हैं। 'त्वष्टाका पुत्र असुर है' यह इतिहासके जाननेवाले कहते हैं। जलोंके और ज्योति या बिजलीके मेलसे वृष्टि होती है। तहाँ मन्त्रोंमें उपमा रूपसे इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन है। अहिके समान और वृत्रके समान मन्त्रोंके वर्ण और ब्राह्मण ग्रन्थोंके वाद हैं। [वृत्रने] शरीरको वृद्धिसे स्रोतों या जलके प्रवाहोंको रोका, इन्द्रके द्वारा उसके विदीर्ण होते ही जल झरे (बरसे) उसको कहनेवाली यह ऋचा है ॥ २ ॥ व्यवस्था । मन्त्रोंमें देवताओं और असुरोंके संग्रामका वर्णन बाहुल्यसे आता है, किन्तु उसमें सन्देह होता है, क्या यह वास्तव है या रूपक ?
हिन्दी निरुक्त । १०१ यास्क आचार्य व्यवस्था देते हैं कि—नैरुक्त आचार्य इसे रूपक मानते हैं, और ऐतिहासिक उसे सच्चा इतिहास मानते हैं, जो कि- स्वयम् तहाँ तहाँ मन्त्रवर्णों से ही प्रमाणित है, किन्तु रूपक होनेमें प्रमाणकी अपेक्षा है, इसीसे आप उसे यों दिखाते हैं—यदि 'वृत्र' नाम मेघका है, तो मन्त्रोंमें जो संग्रामका श्रवण होता है, उसकी क्या सङ्गति है। [ उत्तर ] मेघके भीतर पानी और उपयुक्त बिजलीके मेलसे वर्षा होती है। वैद्युत ज्योति वायुसे लिपटा हुआ होकर जिसे इन्द्र कहते हैं, जलको ताडन करता है, और उस ताडनके वश जल बरसने लगते हैं। वहाँ पर इसी प्रकारके जल और तेजके विरुद्ध- भावको युद्धके रूपमें वर्णन किया गया है, इस लिये मन्त्रोंमें युद्ध वर्णन रूपकमात्र है, क्योंकि न वास्तविक कोई युद्ध है और न इन्द्रके कोई शत्रुही हैं। मन्त्र भी इस बातको प्रमाणित करता है:— यदचरस्तन्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु । मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य शत्रुं न नु पुरा विवित्से ॥ [ ऋ० सं० ८, १, १५, २ ] वामदेवस्य बृहदुक्थस्य आर्षम् । त्रिष्टुप् । व्यूढस्य अष्टमे अहनि निष्केवल्ये शस्यते । अर्थः—हे इन्द्र ! जो तू शरीरधारी होकर फिर फिर बढ़ता हुआ, मनुष्योंमें अपने वीर्योंको कहता हुआ जैसा, नानाप्रकारके कर्म करता है, [ क्या तू वैसा ही है ? ] नहीं। वह सब तेरो माया ही है, और [ ऐतिहासिक ] जो तेरे युद्धोंको वर्णन करते हैं, यह
१०२ २ अ० ५ पा० ३ ख० । भी तेरी माया ही है। न तेरा अब कोई शत्रु है और न पहिले ही था, यह मैं ही नहीं जानता बल्कि—तू भी यह सब जानता ही है। इस प्रकार इस मन्त्रमें युद्धको मायारूप वर्णन किया है। और भी ब्राह्मण ग्रन्थमें कहा है— “वीर्य्यं वै प्रावोर्य्यमिन्द्र इति ह विज्ञायते” अर्थात् 'जितना संसारमें वीर्य है, वह इन्द्र ही है',—फिर कौन उसका शत्रु और किसके साथ उसका युद्ध हो। एवम्— “तद्वाहु नैतदस्ति यद् देवासुरमिति” अर्थात् यह सब ऐसा ही नहीं है, जैसा कि देव और असुरोंका संग्राम वर्णन किया है। अतः ठीक ही कहा है, कि—‘जल और विद्युत्के मेलसे वर्षा होती है, और युद्ध वर्णन उपमा मात्र है' ॥ २ ॥ [ खं० ३ ] ( निरु० ) “दासपत्नीरहिंगोपा अतिष्ठन् निरुद्धा आपः पणिनेव गावः । अपां बिलमपिहितं यदासीद् वृत्तं जघन्वां अप तद्ववार ॥” “दासपत्नीः” दासाधिपत्याः । 'दासः' दस्यतेः । उपदासयति कर्माणि । “अहिगोपा अति- ष्ठन्” । अहिना गुप्ताः । 'अहिः'-अयनात् । एति-अन्तरिक्षे । अयमपि-इतरः-'अहिः' एतस्मा- देव । निर्ह्रसितोपसर्गः-आहन्ति-इति । “निरुद्धा
हिन्दी निरुक्त । १०३ आपः पणिनेव गावः” ‘पणिः’–वणिग् भवति । ‘पणिः’ पण्यात् । वणिक पण्यं नेनेक्ति । “अपां बिलमपिहितं यदासीद् ।” ‘बिलं’ भरं भवति । बिभर्तेः । “वृत्रं जघ्निवानपववार तद् ।” ‘वृत्रः’ वृणोते र्वा । वर्त्तते र्वा । वर्द्धते र्वा । “यद्-अवृ- णोत् तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम्” इति विज्ञायते । “यद् अवर्त्तत तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम्” इति विज्ञायते । “यद्-अवर्द्धत तद्वृत्रस्य वृत्रत्वम्-इति विज्ञायते ॥३॥ इति द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ २, ५ ॥ अर्थः । “दासपत्नीः” दासाधिपत्याः “अहिगोपाः” अहिना ( मेघेन ) गुप्ताः “पणिना” वणिजा “गावः-इव” मेघोदरे “निरुद्धाः” “आपः” “अतिष्ठन् ।” “यदा” “अपां” “बिलम्” “अपिहितम्”मुद्रितम् “आसीत्” तदा इन्द्रः “वृत्रं” मेघम् “जघन्वान्” जघान “तत्” द्वारञ्च “अप-ववार” ‘अपावृत्तवान्’ तथा आपश्च वर्ष- भावेन प्रसस्यन्दिरे,-इत्यर्थः ॥ दास (कर्म करनेवाले) की रक्षा करनेवालीं, मेघसे रक्षित वणियेसे गोओंके समान मेघके भीतर रुकी हुई अप् (जल) ठहरी हुई थीं। जब जलोंके निकलनेका द्वार मुँदा हुआ था उस समय
१०४ २ अ० ५ पा० ३ खं० । इन्द्रने वृत्र या मेघंको हनन किया और उस द्वारको खोला, तथा जल वृष्टिरूपसे गिरे ॥ [ एक-पद निरुक्त ] "दासपत्नी" दासकी अधिपत्नियें या दास- के पेटमें स्थित होकर उसकी रक्षा करनेवालीं । [ अर्थात् जब नौकर काम करता हुआ थक जाता है, तब जलके पानसे उसे बल मिलता है, और उसकी थकावट दूर हो जाती है, यह जलसे दास- की रक्षा है । ] [ विग्रह-प्रसक्त ] 'दास' शब्द 'दसु' उपक्षये ( दि० प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-] वह कृषि आदि कर्मोंको सम्पादन करता है। "अहिगोपाः-अतिष्ठन्" अहि (मेघ) से रक्षित हुई स्थित थीं । 'अहि' [ क्यों ? ] अयन या गमनसे अन्तरिक्ष (आकाश) में गमन करता है । यह भी 'अहि' शब्द जो सर्पका नाम है इसी धातुसे बनता है; क्योंकि—वह भी चलनेवाला है । अथवा उपसर्गको ह्रस्व करके 'अहि' कहा जाता है । [क्योंकि-] वह 'आहन्ति भोगेन' अर्थात् शरीरसे चलता है ] 'आङ्' पूर्वक 'हन्' हिंसागत्योः (अ० प०) धातुसे होता है । "निरुद्धा आपः पणिना इव गावः” वणियेसे गोओंके समान रुके हुए जल । 'पणि' नाम वणिक् या वणियेका है । [ यह पर्यायसे तत्व-कथन है ] 'पणि' [ क्यों ? ] पणन या लेन देनसे । [ क्योंकि-वह पणन या व्यवहार करता है ] [ पर्याय-प्रसक्त ] 'वणिज्' (क्) [ क्यो ? ] वह पण्य (माल) को नित्य सुधारता रहता है, [ जिससे कि वह मूल्यके योग्य हो जावे । ] जब जलोंका बिल मुँदा हुआ था । 'बल' [ क्यों ? ] वह जल आदिसे भरा हुआ रहता है। 'डुभृञ्' धारणपोषणयोः ( जु० उ० ) धातुसे है। 'वृत्रको मारा और उसे खोला।' वृत्र' शब्द 'वृञ्' वरणे (स्वा० ) धातुसे । अथवा 'वृधु' वृद्धौ ( भ्वादि० आ० ) धातुसे । जो कि—वह आकाश अथवा जलसे महान् होनेसे आवरण कर लेता है, यही वृत्रका वृत्रपना
हिन्दी निरुक्त । १०५ है । ऐसे ही ब्राह्मणसे जाना जाता है । अथवा इन्द्रसे हत हुआ वृत्र या मेघ जलोंके बिलके खुल जाने पर जलोंको वृष्टिरूपसे वर्षाता है, यही वृत्रका वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है । अथवा बहुत बढ़ जाता है, यह वृत्रमें वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है ॥ ३ ॥ व्याख्या— इस मन्त्रमें “दासपत्नी” विशेषणसे शूद्रोंका सेवाधर्म और “पणिनैव गावः” इस दृष्टान्तसे वैश्योंका गोसेवा और वाणिज्य धर्म कहा गया है । “कृषि-वाणिज्य गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावजम्” [ भ० गी० १८, ४४ ] अर्थात् भगवद्गीतामें 'कृषि, वाणिज्य और गोरक्षा ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म है' कहा है । इस उदाहरणसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि-वृत्र मेघ है, असुरमें जलोंका रुकना और उसके हननसे वृष्टि होना संभव नहीं । यह नैरुक्त-पक्षमें प्रमाण है ॥ ३ ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥२, ५॥ १४
१०६ २ अ० ६ पा० १ खं० । : षष्ठः पादः । ( निघ० ) श्यावी ( १ ) । क्षपा ( २ ) । शर्वरी ( ३ ) । अक्तुः ( ४ ) । ऊर्म्या ( ५ ) । राम्या ( ६ ) । यम्या ( ७ ) । नम्या ( ८ ) । दोषा ( ९ ) । नक्ता ( १० ) । तमः ( ११ ) । रजः ( १२ ) । असिक्नी ( १३ ) । पयस्वती ( १४ ) । तमस्वती ( १५ ) । घृताची ( १६ ) । शिरिणा ( १७ ) । मोकी ( १८ ) । शोकी ( १९ ) । ऊधः ( २० ) । पयः ( २१ ) । हिमा ( २२ ) । वस्वी ( २३ ) । इति त्रयोविंशती रात्रि- नामानि ॥ ७ ॥ विभावरी ( १ ) । सूनरी ( २ ) । भास्वती ( ३ ) । ओदती ( ४ ) । चित्रा मघा ( ५ ) । अर्जुनी ( ६ ) । वाजिनी ( ७ ) । वाजिनीवती ( ८ ) । सुम्नावरी ( ९ ) । अहना ( १० ) । द्योतना ( ११ ) । श्वेत्या ( १२ ) । अरुषी ( १३ ) । सूनृता ( १४ ) । सूनृतावतो ( १५ ) । सूनृतावरी ( १६ ) । इति षोडश उषोनामानि ॥ ६ ॥ :( खण्ड १ ) ( निरु० ) रात्रिनामानि-उत्तराणि त्रयो- विंशतिः । रात्रिः कस्मात् ? प्ररमयति भूतानि ।
हिन्दी निरुक्त । १०७ नक्तं चारोणि-उपरमयति, इतराणि ध्रुवीकरोति । राते र्वा स्याद् दानकर्मणः । प्रदीयन्ते अस्याम् अवश्यायाः । उषोनामानि उत्तराणि षोडश । उषाः कस्माद् ? उच्छति इति सत्याः । रात्रे रपरः कालः । तस्या एषा भवति ॥ १ ॥ अर्थ । 'काष्ठा' यह अनेक द्रव्यका नाम होता है,-यहाँसे दिशाओंके प्रसंग ओर अनुप्रसंगकी बातें कही गईं, अब प्रकृतकी व्याख्या होती है— दिशाके नामोंसे आगे तेईस ( २३ ) रात्रिके नाम हैं । [ रात्रिमें तम या अँधेरा ही पदार्थ है, और वह दिशाओंमें ही अपनी स्थिति करता है, इससे दिङ्नामोंके अनन्तर रात्रिनाम कहे गये हैं । ] 'रात्रि' क्यों है ? जब यह भी आती है, तो नक्तंचरो ( रात्रिके विचरनेवालों ) को रमण कराती है। [ क्योंकि-वे दिनके बीत जाने पर, रात्रिके आते ही, अपने विहारका समय जान कर विशेष- रूपसे रमण करते हैं । और वही अन्य दिवाचारी मनुष्य आदि प्राणियोंका भी उपरमण कराती है, अर्थात् रात्रिके आजाने पर अपने अपने कार्योंसे निवृत्त होकर निवासके लिये स्थिर हो जाते हैं । अथवा दानार्थ 'रा' ( अदा० प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-] उसमें अवश्यःय ( तुषार ) या ओस गिरती है। इन्हींका प्रदान करनेसे यह रात्रि हैं । क्योंकि-रात्रिका ही पिछला समय 'उषस्' ( उषा ) कहलाता है, इसीसे रात्रिनामोंके पश्चात् सोलह ( १६ ) 'उषा' के नाम हैं।
१०८ २ अ० ६ पा० २ खं० । 'उषा' क्यों है ?. जिससे कि यह अँधेरेको निवृत्त करती है । 'उच्छी' विवासे ( भू० प० ) धातुसे कर्त्तृकारकमें है । 'उषा' रात्रिका पिछला समय है, इसको कहनेवाली यह ऋचा है—॥ १ ॥ ( खण्ड २ ) [ निरु० ) “इदं॒ श्रेष्ठं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रागा- च्चित्रः प्रके॒तो अ॑जनिष्ट॒ विभ्वा । यथा॑ प्रसू॒ता स॑वि॒तुः सवाय॑ ए॒वा रात्र्यु॒षसे॒ योनि॑मारैक् ॥” “इदं॒ श्रेष्ठं॒ ज्योतिषां ज्योतिः”-आगमत् । चित्रं प्रकेतनं प्रज्ञाततमम् “अजनिष्ट” विभूततमम् । “यथा प्रसूता सवितुः” प्रसवाय रात्रिः आदित्यस्य एवं “रात्रौ उषसे योनिम्” अरिचत्, स्थानम् । स्त्री- योनिः । अभियुतः एनां गर्भः । तस्या एषा अपरा भवति ॥ २ ॥ अर्थ । आदित्यादीनां “ज्योतिषां” मध्ये “श्रेष्ठम्” “इदम्” उषो लक्षणं “ज्योतिः” “आगात्” आ- गच्छति । “चित्रः” ‘चित्र’ चायनीयं पूजनीयं वा श्रेष्ठत्वादेव, “प्रकेतः” ‘प्रकेतनं’ ‘प्रज्ञाततमं’ “विभ्वा” ‘विभूततमम्’ “अजनिष्ट” जातमित्यर्थः । “यथा” “प्रसूता” प्रसवमनुप्राप्ता “रात्रि” “सवितु”
हिन्दी निरुक्त । १०६ ‘आदित्यस्य’ “सवाय” ‘प्रसवाय’ आदित्योत्सृष्टे देशे जायते “एवा एवम् “रात्री” “उषसे” “यो- निम्” ‘स्थानम्’ “आरिचत्” आरेचयति-ददाति- इत्यर्थः ॥ “इदं श्रेष्ठम्” इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य इयम्-आर्षम्, उत्तरा च । उभे अपि त्रिष्टुभौ एते । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्येते । आदित्य आदि ज्योतियोंमें, अति शीत अति उष्ण (गरम) न होनेके कारण श्रेष्ठ यह उषा रूप ज्योति आता है। अपनी श्रेष्ठता- से ही पूजनीय अति प्रसिद्ध और अन्य छोटे ज्योतियोंकी अपेक्षा- अधिक व्यापक है। जिस प्रकार जनती हुई रात्रि आदित्यको जननेके लिये उसके स्थानसे दूसरे स्थानमें हो जाती है, उसी प्रकार उषाके लिये भी स्थान देती है। जिस प्रकार उषा आदित्यके जन्मका कारण है, क्योंकि-वह उस (उषा) के अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार रात्रि उषाका हेतु है। इस रीतिसे ‘इस ऋचामें रात्रिका अपर (पिछला) भाग ही ‘उषा हुआ।’ यह प्रतीत होता है। यह ज्योतियोंमें श्रेष्ठ (उत्तम) ज्योति (उषा) आती है। चित्र या पूजनीय, प्रकेतन नाम बहुत प्रसिद्ध और अधिक व्यापक हुआ। जैसे प्रसव या जननेवाली रात्रि सूर्यके प्रसव (जनने) के लिये है, उसी प्रकार रात्रि उषाके लिये स्थान देती है। [यह भी दूसरी] स्त्रीकी योनि [इसी धातुसे है] क्योंकि-गर्भ इसके साथ मिला हुआ रहता है। उसी उषाके लिये यह दूसरी और
११० २ अ० ६ पा० ३ खं० । ऋचा है । [ रात्रिका अन्तिम भाग 'उषा' कहलाता है'—इसी अर्थकी दृढ़ताके लिये यह और ऋचा है ।] ॥ २ ॥ व्याख्या । ‘इदं चित्रम्’ इस ऋचामें योनि शब्द स्थानके लिये आया है । ‘यु’ मिश्रणे ( अदा० प० ) धातुसे है । युत होनेसे वह योनि है । क्योंकि-जो जिसमें होता है वह उससे युत या मिला हुआ ही होता है, इस न्यायसे रात्रिमें उषा होती है, इससे वह उसके साथ युत या मिली हुई है, और इससे उषाकी योनि रात्रि है । यास्क मुनि कहते हैं कि—लोकमे ‘योनि’ शब्दसे स्त्री-योनि ली जाती है, वह भी इसी धातुसे है, क्योंकि-उसके साथ भी गर्भ मिला हुआ रहता है । यास्काचार्यके मतमें ‘योनि’ शब्द पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों प्रकारका है । यह उनके प्रयोगसे सिद्ध है ॥ २ ॥ ( खण्ड ३ ) ( निघ० ) वस्तोः ( १ ) । द्यौः ( २ ) । भानुः ( ३ ) । वासरम् ( ४ ) । स्वसराणि ( ५ ) । घंसः ( ६ ) । घर्मः ( ७ ) । द्युक्षः ( ८ ) । दिनम् ( ९ ) । दिवा ( १० ) । दिवे दिवे ( ११ ) । द्यवि द्यवि ( १२ ) । इति द्वादशाह्नामानि ॥ ६ ॥ [ निरु० ] “रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादा- रैगु कृष्णा सदनान्यस्याः । समानबन्धू अमृते अनूची १द्यावावर्णं चरत आमिनाने ॥ १ ‘द्यावा’ पद प्रथमा-विभक्तिके द्विवचन और, तृतीया विभक्तिके एक वचनमें होता है ।
“रुशद्वत्सा” सूर्यवत्सा । : “रुशत्”-इति वर्णनाम । रोचते-र्ज्वलति कर्मणः । सूर्य्यमस्या वत्सञ्जाहुः । साहचर्य्याद् रसहर- णाद्-वा । “रुशती श्वेत्या गात् ।” “श्वेत्या” श्वेततेः । अरिचत् “कृष्णा” सदनानि अस्याः । कृष्णवर्णा रात्रिः । ‘कृष्ण’ कृष्यतेः निकृष्टो वर्णः । अथ-एने संस्तौति-“समानबन्धू” समानबन्धने “अमृते” अमरणाधर्माणौ ‘अनूची’-इति-इतरे- तरमभिप्रेत्य । “द्यावा वर्णं चरतः” ते एव । द्यावौ द्योतनात् । अपि वा “द्यावा चरतः” ‘तया चरतः’-इति स्यात् । “आमिनाने” अन्योन्यस्य अध्वात्मं कुर्वाणे । अहर्नामानि उत्तराणि द्वादश । अहः कस्मात् ? उपाहरन्ति अस्मिन् कर्माणि । तस्य-एष निपातो भवति, वैश्वानरीयायाम्-ऋचि ॥ ३ ॥ अर्थ । “रुशद्वत्सा” सूर्यवत्सा “रुशती” चात्मनाऽपि रोचनशीला “श्वेत्या” श्वेतवर्णा (उषाः) “आगात्” आगच्छति । “कृष्णा” कृष्णवर्णा रात्रिः च “अस्याः” सदनानि “आरैक्” आरेचयति जहातीत्यर्थः ।
११२ २ अ० ६ पा० ३ खं० । उभे मिलिते स्तौति—"समानबन्धू" समानबन्धने समानबन्धू च "अमृते" अमरण धर्माणी "अनूची" इतरेतरं संश्लिष्टे "द्यावा" द्यावी द्योतनशीले । वा द्यावा सह "आमिनाने" अन्योन्यस्य अध्यात्मं कुर्वाणे "चरतः" गच्छतः इत्यर्थः ॥ 'रुशत्' चमकीले 'वत्स' बछड़ेवाली स्वयम् 'रुशती' चमकती 'श्वेत्या' सफेद (उषा) आती है। और काली (रात्रि) इसके स्थानोंको छोड़ती जाती है। [मिलित स्तुति] दोनों [रात्रि और उषा] सूर्यरूप एक बन्धन या एक बन्धुवालीं, कभी नहीं मरनेवालीं, आपसमें मिली हुईं, एक दूसरीको अपनेमे करती हुईं चलती हैं ॥ "रुशद्वत्सा" नाम सूर्यरूप बछड़ेवाली । 'रुशत्' यह वर्ण (चमकीले रङ्ग) का नाम है। प्रकाश अर्थवाले 'रुच्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। मन्त्रका देखनेवाला ऋषि उस सूर्यको इस (उषा) का वत्स कहता है। [क्योंकि-] बच्छा अपनी माँके साथ रहता है, वैसे ही यह भी उषाके साथ रहता है। इस साहचर्य्यकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। अथवा जैसे बच्छा अपनी माँको ऊँधोसे दुग्धरूप रसको हर लेता है, वैसे ही यह सूर्य प्रभात (उषा) कालको ओसको अपनी किरणोंसे हर लेता है। इस रस-हरण क्रियाकी समानतासे सूर्य उषाका वत्स है। 'रुशती' चमकीली 'श्वेत्या' सफेद रंगवाली 'आगात्' आती है। 'श्वेत्या' शब्द वर्णार्थक 'श्वित्' (भ्वा० आ०) धातुसे है। कृष्णने इसके स्थानोंको छोड़ा या दिया। 'कृष्ण' नाम काले रंगवाली रात्रिका है। 'कृष्ण' शब्द 'कृष्' (दि० प०) धातुसे है। निकृष्ट-अधम
हिन्दी निरुक्त । ११३ रंगका नाम है। [क्योंकि-वह स्वयम् अँधेरेका रंग और अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका विरोधी है। अब इस ऋचाके उत्तरार्द्धसे इन रात्रि और उषा दोनोंकी स्तुति करता है। "समान बन्धू" ये रात्रि और उषा दोनों एक बन्धनमें बंधी हुई हैं। क्योंकि रात्रि आदित्यके अस्त (छिपने) से बँधी हुई या मिली हुई है। और उषाः उसके उदयसे बंधी हुई है। "अनन्चे" दोनों आपसमें एक दूसरेसे मिली हुई। "द्यावा वर्ण, चरतः" दोनों रात्रि और उषा अपने अपने वर्णको प्रकाशित करती हुई साथ चलती हैं। अथवा द्युलोकके साथ स्पर्धा करती हुई दोनों चलती हैं ! 'द्यो' क्यों है ? द्योतन या प्रकाशनसे । 'द्युत' दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातुसे है। "आमिनाने" आपसको आत्मा में (आपसमें) करनेवालीं ॥ 'उषस्' शब्दके अर्थ तत्त्वको निश्चय करानेके लिये ये दोनों मन्त्र आये थे, इनका वर्णन हो चुका। अब प्रस्तुत-विषय कहा जाता है :— 'उषा' के नामोंके पश्चात् अहन् (दिन) के बारह नाम हैं। 'अहन्' क्यों ? इसमें सब प्राणी कर्मोंको करते हैं। 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातुसे है। उस 'अहन्' शब्दका नैघण्टुक या गौण वृत्तिसे वैश्वानर देवताकी ऋचामें यह निपात या उपयोग है।—॥ ३॥ (खण्ड ४) (निरू०) "अहश्च कृष्णमहरर्जुनञ्च विवर्त्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजा वाति रञ्ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥
११४ २ अ० ६ पा० ४ ख० । “अहश्च कृष्णं” रात्रिः, शुक्लं “च-अहः-अर्जुनं विवर्त्तेते रजसी” “वेद्याभिः” वेदितव्याभिः प्रवृत्तिभिः “वैश्वानरो जायमानः” इव उद्यन् आदित्यः सर्वेषां ज्योतिषां “राजा” अवाहन् “अग्निः ज्योतिषा तमांसि” ॥ [ निघ० ] अद्रिः ( १ )। ग्रावा ( २ )। गोत्रः ( ३ )। - वलः ( ४ )। अश्मः ( ५ )। पुरुभोजाः ( ६ )। वलिशानः ( ७ )। अश्मा ( ८ )। पर्वतः ( ६ )। गिरिः ( १० )। व्रजः ( ११ )। चरुः ( १२ )। वराहः ( १३ )। शम्बरः ( १४ )। रौहिणः ( १५ )। रैवतः ( १६ )। फलिगः ( १७ )। उपरः ( १८ )। उपलः ( १६ )। चमसः ( २० )। अहिः ( २१ )। अभ्रम् ( २२ )। वलाहकः ( २३ )। मेघः ( २४ )। दृतिः ( २५ )। ओदनः ( २६ )। वृषन्धिः ( २७ )। व्ववः ( २८ )। असुरः ( २६ )। कोशः ( ३० )। इति त्रिंशन्मेघनामानि ॥ १० ॥ ( निरु० ) मेघनामानि उत्तराणि त्रिंशत् । ‘मेघः’ कस्मात् ? मेहति इति सतः । आ ‘उपरः’ ‘उपलः’ इति-एताभ्यां साधारणानि पर्वतनामभिः । ‘उपरः’ ‘उपलः’-मेघो भवति । उपरमन्ते अस्मिन्-
हिन्दी निरुक्त । ११५ अभ्राणि । उपरता आपः-इति वा । तेषामेषा भवति ॥ ४ ॥ अर्थ । क्योंकि 'अहन्' शब्द रात्रि और दिन दोनोंका ही वाचक है, इससे सन्देहका स्थान है । इसका विभाग इस ऋचामें विशेषणके भेदसे दिखाया है । 'भारद्वाजस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । पृष्ठस्य षष्ठे अहनि आग्निमारुते शस्त्रे शस्यते ।' काला दिन (रात्रि) सुपेद दिन (दिन) दोनों बदलते रहते हैं-रात्रि बीतो दिन आया, दिन बीता रात आई । दोनों प्राणियोंकी अनन्त प्रवृत्तियोंसे (अथवा ज्योति (प्रकाश) से दिन, और अँधेरेसे रात्रि ।) “रजसी” रञ्जक या प्रीतिके देनेवाले है । “वैश्वानर” अग्नि “जायमान” उदय होते हुए ज्योतियोंके राजा सूर्यके समान अपने “ज्योतिष्” प्रकाशसे “तमांसि” अँधेरोंको “अवातिरत्” 'अवाहन्' दूर करता है । व्याख्या । इस ऋचामें एक ही 'अहन्' शब्द 'कृष्ण' विशेषण लगानेसे रात्रिका और अर्जुन (शुक्ल) विशेषण लगानेसे दिनका वाचक होता है । इसी रीतिसे सन्देहके स्थानमे विशेषण आदिके सम्बन्ध- से शब्दका विशेष अर्थ निर्णीत करना चाहिये । वेदितव्या । 'विदित' नाम जानी हुई वस्तुओंका कदाचित् अन्त हो सकता है, किन्तु जो वेदितव्या या अभी नहीं जानी गई हैं किन्तु जानने योग्य है (जानी जावेंगी) उनका अन्त नहीं हो