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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त r ( ७७ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख० ( ५ खं० ) १ (४७) [निरु०] “द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम् । उत्तानयो श्चम्वो ३ र्योनि- रन्तरत्रापितादुहितुर्गर्भमाधात् ॥” [ ऋ० सं० २, ३, २०, ३ ] (४७) (भा०) “द्यौर्मे पिता” माता ( पाता ) वा पालयिता वा । जनयिता । “नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी” महती “इयम्” । ‘बन्धुः’ सम्बन्ध- नात् । ‘नाभिः’ सन्नहनात् । “नाभ्या सन्नद्धा गर्भा जायन्ते” इत्याहुः । एतस्मादेव ज्ज्ञातीन् ‘सनाभयः’ इत्याचक्षते । ‘ सम्बन्धवः ’ इतिच । ‘ज्ज्ञातिः’ सञ्जानात् । “उत्तानयोश्चम्वो३र्योनि- रन्तः ।” ‘उत्तानः’ उत्तानः । ऊर्ध्वतानो वा । तत्र पिता दुहितुर्गर्भ दधातिपर्जन्यः पृथिव्याः । ( शंयुः सुखंयुः । ) (४८) “अथानः शंयोररणो दधात” (ऋ० सं० ७, ६, १७, ४ ) । १-“द्यौर्मेपिता” इति । द्वयम् अस्यवामीयं दीर्घतमसः आर्षम् । तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ४ अ० ३ पा० ५ खं० (भा०) 'रपो' 'रिप्रम्' इति पापनामनी भवतः । शमनं च रोगाणां, यावनं च भयानाम् अथापि 'शंयुः' (४८) बार्हस्पत्य उच्यते । "तच्छंयोरावृणीमहे गातुं यज्ञाय गातुं यज्ञपतये" इत्यपि निगमोभवति (भा०) गमनं यज्ञाय, गमनं यज्ञपतये" ॥ ५ (२१) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥ अनुवादः । 'पिता' (४७) अनवगत शब्द का निगम— "द्यौर्मे पिता"०[ऋ० सं० २, ३, २०, ३] अर्थात् 'द्यौः' ऊपर वाला द्यु लोक 'मे' मेरा 'जनिता' उत्पन्न करने वाला, 'नाभिः' वीर्य के द्वारा नाभि देश में बांधने वाला, 'पिता' बाप है । 'अत्र' इस द्यु लोक रूप पिता के जल दान से अनुगृहीता होने पर, 'बन्धुः' अङ्ग के सम्बन्ध को करने वाली 'मही' पूजनीया 'इयम्' यह 'पृथिवी' पृथ्वी 'मे' मेरी 'माता' मा है । 'उत्तानयोः' ऊपर को उठे हुए 'चम्वोः' द्यु लोक और पृथिवी लोक के 'अन्तः' बीच में 'योनिः' अवकाश दान से मिलाने वाला अन्तरिक्ष (आकाश) लोक है । 'अत्र' इस में 'पिता' द्युलोक ने 'दुहितुः' पृथिवी के ऊपर 'गर्भम्' सब प्राणियों की उत्पत्ति का कारण रूप जल (गर्भ) धारण किया । निरुक्तार्थ द्यु लोक मेरा 'पिता' पालने वाला है । अथवा

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख० उत्पन्न करने वाला है । 'नाभि' नाभिदेश में बांधने वाला । इस द्यु लोक में अङ्ग सम्बन्ध को जोड़ने वाली यह बड़ी या पूजनीय पृथिवी माता है । 'बन्धु' क्यों ? सम्बन्ध करने से । 'नाभिः' क्यों? सन्नहन या बांध लेने से । [क्योंकि-] “ नाभि [ सूंढी ] बंधे हुए गर्भ उत्पन्न होते हैं ” ऐसा विद्वान् कहते हैं । इसी कारण से ज्जातियों को 'सनाभि' इस नाम से बोलते हैं । और 'सम्बन्धु' यह भी (कहते हैं) 'ज्जाति' क्यों? संज्ञान अच्छे प्रकार से ज्ञान या जानकारी से । ऊपर को उठे हुए ःद्युलोक-पृथिवी लोक के बीच में अन्तरिक्ष है । उत्तान क्यों ? उत्तान है । अथवा ऊर्ध्वतान ऊपर को तना हुआ है । उस में पिता पर्जन्य दुहिता [द्यु लोक से जलको दोहने वाली] पृथिवी पर गर्भ धारण करता है । 'शंयु.' (४८) अर्थात् सुखयु सुखी । निगम— “अथानः शंयो ररपो दधात” [ऋ० सं० ७, ६, १७, ७ ] । अर्थात्-हे पितरो ! ‘अथ’ और ‘नः’ हमारे अर्थ 'शम्' रोगों की निवृत्ति 'योः' भयों का नाश और 'अरपः' जो कुछ पाप विना हित हो 'दधात' करो । निरुक्तार्थ-‘रपः’ 'रिम्रम्' यह दो पापके नाम हैं । शमन रोगों का, और यावन ( भगाना ) भयों (डरों) का । और ‘शंयु’ वृहस्पति का पुत्र भी कहा जाता है । 'तत्' ( तदा ) तब ( हम ) ‘शंयोः’ वृहस्पति के पुत्र से 'आ-वृणी- महे' सम्मुखभाव से मांगते हैं- ‘यज्ञाय’ यज्ञ के अर्थ 'गातुम् देवताओं के प्रति जाने को, और ‘यज्ञपतये’ यजमान के अर्थ ‘गातुम्’ देवताओं के प्रति जाने को । ' यह भी निगम है ।

हिन्दी निरुक्त ( ८० ) ४ अ० ४ पा० १ खं० निरुक्तार्थ—यज्ञ के लिये गमन । यज्ञपति (यजमान) के लिये गमन ॥ ५ ( २१ ) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥ चतुर्थेऽध्याये- चतुर्थः पादः । ( १ खं० ) [ निरु० ] ‘ अदिति ’ (४१) अदीना देव- माता ॥ १ ( २२ ) ॥ अनुवादः । ‘अदिति’ यह अनवगत पद है । १ (२२) क्योकि-इसमे प्रकृति और प्रत्यय तथा अर्थ की प्रतीति नहीं होती । ‘अदीना’ इसका अवगम और देवमाता इसका अर्थ है । निरुक्तार्थ-अदिति (४६) क्यों ? वह अदीना है, दीन नहीं है, वह क्या? देवमाता। [यह अर्थ ऐतिहासिक पक्ष से है] नैरूक्तो के मत मे ‘अदिति’ शब्द के उतने ही अर्थ है, जितने कही जाने वाली ऋचा में दिखाए है । अर्थात्-द्यौ, द्युलोक अन्तरिक्ष, माता, पिता, पुत्र, विश्व सर्व देव, पञ्चजन [ गन्धर्व आदि या ब्राह्मण आदि ] जात, भूत जनित्व, [ भविष्यत् । ] ( २ खं० ) १ [निरु०] अदितिर्द्यौरदिति रन्तरिक्ष मदितिर्माता- १ “अदितिर्द्यौः” इति राहूगणस्य गोतमस्य इयमार्षम् । तृतीयसवने सर्वस्तोमेष्वेव, वैश्वदेवस्य शस्तस्य परिधानीया एषा ।

हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ४ अ० ४ पा० २ खं०

सपिता सपुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना
अदिति र्जातं मदितिर्जनित्वम्' ॥ [ ऋ० सं०१०,
६, १६, ५ ]
(भा०) इति अदिते र्विभूतिमाचष्टे । एनानि
अदीनानि-इतिवा ।
“यमेरिरे (५०) भृगवः” [ऋ०सं० २,२,२,४]
(भा०) एरिर इति 'ईर्त्तिः' ( अदा० आ० ) उप
सृष्टोऽभ्यस्तः २, ( २३ ) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः-‘अदितिः’ देवमाता ही ‘द्यौः’ द्युलोक है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘अन्तरिक्षम्’ अन्तरिक्ष है । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘माता’ सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाली
है । ‘सः’ वही ‘पिता’ पालक है । ‘सः’ वही ‘पुत्रः’ पुत्र है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘विश्वे’ सब ‘देवाः’ देवता हैं ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘पञ्च’ पांच ‘जनाः’ जन हैं । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘जातम्’ बहुत क्या ? सर्वथा ही जो कुछ जगत्
में उत्पन्न हुआ हुआ है, सब है । ‘अदितिः’ देवमाता ही
‘जनित्वम्’ जो होनहार जगत् है, सब है ॥
इस मन्त्र में ऋषि ( जिसे मन्त्र का साक्षात्कार हुआ )
अदिति की विभूति को कहता है । [ क्योंकि देवता महाभाग्य
होता है, उसे सब सम्भव है । यह माहाभाग्य दैवत काण्ड में
कहा जावेगा । ]
११

हिन्दी निरुक्त ( ८२ ) ४ अ० ४ पा० ३ ख० अथवा 'ये सब अदीन हैं' यह अर्थ है ॥ [ मन्त्रार्थ में ऐतिहासिक पक्ष से 'अदिति' शब्द का सर्वत्र 'देवमाता' और नैरुक्त पक्ष में 'अदीन' अर्थ लेना । ] 'एरिरे' (५०) (आईरिरे) का निगम— “येमेरिरे भृगवः” [ ऋ० सं० २, २, २, ४ ] अर्थात् 'भृगवः' भृगुओं ने 'यम्' जिस (अग्नि) को 'एरिरे' (आईरिरे) प्रेरणा या स्थापन किया । 'एरिरे' इस पद में 'ईर्' ( अदा० आ० ) धातु 'आ' उपसर्ग से युक्त और दोहराया हुआ है ॥ २ (२३) ( ३ खंड ) [निरु०-] १“उतस्मैने॑ वस्त्रमथिं न तायु मनुक्रोशन्ति (५१) क्षितयो॒भरे॑षु । नी॒चाय॑मानं जसुरिंनश्येनं॑श्रव॒श्रा- च्छा पशुमच्च यूथम् ॥” [ ऋ०सं० ३,७,११,५ ] । ( भा०- ) अपि “स्म-एनम्” “वस्त्रमथिम्” . इव वस्त्रमाथिनम् । 'वस्त्रं' वस्तेः । 'तायुः'-इति स्तेन-नाम । “संस्त्यानम् अस्मिन् पापकम्-” इति नैरुक्ताः। तस्यतेर्वा स्यात् । “अनुक्रोशन्ति क्षितयः” संग्रामेषु । 'भरः' इति संग्रामनाम । भरतेर्वा । हरतेर्वा । “नीचायमानं” नीचैः-अयमानम् । १ “उतस्मैनेम्” इति बामदेवस्य आर्षम् । त्रिष्टुप्छन्दः । दधिक्राव्यो सूक्तं ।

हिन्दी निरुक्त ( ८३ ) ४ अ० ४ पा० ३ खं० 'नीचैः' निश्चितं भवति । 'उच्चैः' उचितं भवति । जस्तमिव “श्येनम्” । ‘श्येनः’ शंसनीयं गच्छति । “श्रवश्चाच्छा पशुमच्चयूथम्” । श्रवश्चापि पशुमच्च यूथम् = प्रशंसांच यूथंच । ‘धनंच यूथंच’:इतिवा। 'यूथं' यौतेः । सभायुतं भवति । “इन्धान एनं जरते स्वाधीः”^(५२) [ऋ०सं०७,८,२८,१] गृणाति मन्दी^(५३), मन्दतेः स्तुतिकर्मणः । “प्रमन्दिने पितुमदर्चतावचः ।” [ऋ०सं०१, ७, १२, १ ] ( भा०) प्रार्चत पितुमद्वचः । ^(५४)गौः व्याख्यातः ॥ ३ ( २४ ) ॥ अनुवादः । 'जस्तुरिः' (५१) (जस्तम्) अनवगत का निगम— “उतस्मैनेम्” [ऋ० सं० ३, ७, ११, ५ ] अर्थात्— ‘क्षितयः’ मनुष्य ‘उत-स्म-एनम्’ इस ( इन्द्र ) को ‘वस्त्रमथिम्’ वस्त्रों को छीन ले जाने वाले ‘तायुम्’ लुटेरेके ‘न’ समान और ‘जस्तुरिम्’ तांत आदि के तन्तु से बंधे हुए, ‘नीचायमानम्’ गुस्से आदि जन्तुओं को मारनेके अर्थ नीचानीचा चलने वाले ‘श्येनम्’ बाज के ‘न’ समान ‘भरेषु’ संग्रामों में ‘अनुक्रोशन्ति’ पुकारते ( बुलाते ) हैं । [इस प्रयोजन से कि] श्रवः-च-अच्छ' कब हम सुने कि-इन्होंने जय लाभ किया इत्यादि कीर्त्ति ‘च’

हिन्दी निरुक्त ( ८४ ) ४ अ० ४ पा० ३ खं० और ‘पशुमत्’ अनेक जाति के पशुओं वाला ‘यूथम्’ समूह [हमारे हो] ॥ निरुक्तार्थ- इसी को। वस्त्रमथि या वस्त्रमाथी (वस्त्रों के छीन लेजाने वाले) के ‘समान। ‘वस्त्र’ शब्द ‘वस्’ (अदा० आ०) धातु से है। [क्योंकि-वह ढांपा जाता है।] ‘तायु’ यह स्तेन या लुटेरे का नाम है। [क्योंकि-] 'इसमें पापकर्म संस्त्यान या इकट्ठा रहता है' ऐसा नैरुक्त मानते हैं। अथवा ‘तस्’ उपक्षयार्थक (दिवा० प०) धातु से है। क्योंकि-वह अधार्मिक होने से हीन होता है। या परलोक की परवाह न करके कर्मों को करता है।] संग्रामों में मनुष्य पुकारते हैं। 'भर' यह संग्राम का नाम है। अथवा 'भृ' (भ्वा० उ०) धातु से है। अथवा 'हृ' (भ्वा० उ०) धातु से है। ‘नीचायमान’ नीचे नीचे अयमान चलने वाला। ‘नीचैः’ क्यों ? निश्चित (झुकाहुआ) होता है। बँधेहुए श्येन (बाज) के समान। ‘श्येन’ क्यों ? शंसनीय (प्रशंसनीय) चलता है। “श्रवश्चा- च्छा पशुमच्चयूथम्” कीर्त्ति और पशुओं वाला झुन्ड। अथवा धन और यूथ (झुन्ड)। ‘यूथ’ क्यों ? ‘यु’ (अदा० प०) धातु से है। एक स्थान में स्त्री, पुरुष, बाल, और वृद्ध पशुओं से संयुक्त होता है। जरते-(५२) (स्तौति) अर्थानवगत पद का निगम- “इन्धान एनं जरते (५२) स्वाधीः” [ऋ० सं० ७, ८, २८, १,] अर्थात् ‘इन्धानः’ दीपन करता हुआ ‘स्वाधीः’ सुन्दर बुद्धि बाला ‘एनम्’ इस अग्नि को ‘जरते’ स्तुति करता है।

हिन्दी निरुक्त ( ८५ ) ४ अ० ४ पा० ४खं० 'मन्दिने' (५३) (मन्दनीयाय) की व्याख्या — 'मन्दी' जो मन्दन या गरण (स्तुति) करता है, या स्तुति किया जाता है । स्तुति अर्थ में 'मन्द' (भ्वा० आ०) धातु से है। निगम— “प्रमन्दिने पितुमदर्चता वचः” [ ऋ० सं० १, ७, १५, १,] अर्थात्–'प्रमन्दिने' स्तुति के योग्य (इन्द्र) के लिये 'पितुमत्' अन्नसंयुक्त 'वचः' वचन 'प्र-अर्चत' उच्चारण करो । निरुक्तार्थ–अन्नसंयुक्त वचन कहो । गो (५४) शब्द का व्याख्यान [ नि० २, २, १ ] हो चुका ॥ ३ (२४) ॥ ( ४ खं० ) [निरु०] अत्राह गोरमन्वत नामत्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥ [१, ६, ७, १५ ] (भा०)“अत्रह गोः” सममंसत आदित्यरश्मयः । स्वं “नाम” “अपीच्यम्” अपचितम्, अपगतम्, अपिहितम्, अन्तर्हितंवा । अमुत्र “चन्द्रमसो गृहे” 'गातुः' (५५) व्याख्यातः । (“गातुं कृणव- न्नुषमोजनाय” इत्यपि निगमो भवति ।) ॥ 'दंसयः' (५६) कर्माणि । दंसयन्तएनानि । १-“अत्राह” इति गोतमस्य राहूगणस्य इयमर्षम् । अ- ग्निचयने इष्टकोपधाने विनियुक्ता ।

हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० “कुत्साय मन्मन्नह्यश्च दंसयः” (ऋ० सं० ८, ७, २६, १) इत्यपिनिगमो भवति ॥ “सतूताव (५७) नैनमश्नोत्यंहतिः ।” [ऋ० सं० १, ६, ३०, २ ] (भा०) सतुताव न-एनम् अंहतिः अश्नोति । 'अंहति' श्व-अंहश्च, अंहुश्च, हन्ते र्निरूढोपधाद् विपरीतात् ॥ “बृहस्पते चयसे (५८) इत्पियारम्” [ऋ० सं० २, ५, १२, ५ ] (भा०) बृहस्पते यच्चातयसि देवपीय़ुम् । पीयति हिंसाकर्मा । वियुते (५९) द्यावापृथिव्यौ । वियवनात् । “समान्या वियुते दूरे अन्ते ।” [ऋ० सं० ३, ३, २५, २,] (भा०) 'समानं' सम्मानमात्रं भवति । 'मात्रा' मानात् । 'दूरं' व्याख्यातम् । 'अन्तः' अततेः । 'ऋधक्' (६०)-इति पृथग् भावस्य प्रवचनं भवति । अथापि ऋध्नोत्यर्थे दृश्यते । “ऋधगया ऋधगुताशमिष्ठाः” [य०वा०सं०८,२०] (भा०) ऋध्नुवन्नयाक्षीः, ऋध्नुवन्नशमिष्ठाः ।

हिन्दी निरुक्त ( ८७ ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० ‘अस्याः’ (६१) इतिच ‘अस्य’-(६२) इतिच । उ- दात्तं प्रथमादेशे । अनुदात्तम् अन्वादेशे । तीव्रार्थ- तरम्-उदात्तम् । अल्पीयोऽर्थतरम्-अनुदात्तम् । “अस्या ऊ षु ण उपसातये भुवोऽहेलमानो ररि- वाँ अजाश्व” (श्रवस्यतामजाश्व) । [ऋ० सं० २, २, २, ४] । (भा०-) अस्यै नः सातये उपभव । “अहेलमानः” अक्रुध्यन् “ररिवान्” रातिः (अदा० प०) अभ्यस्तः “अजाश्व” इति पूषणमाह । अजनाश्व । ‘अजाः’ अजनाः । अथ-अनुदात्तम् ।— “दीर्घायुरस्यायः पतिर्जीवाति शरदःशतम् ।” [ऋ० सं० ८, ३, २७, ४] । (भा०) दीर्घायुः अस्याः यः पतिर्जीवितु स शरदः शतम् । ‘शरत्’ शृता अस्याम्-ओषधयो भवन्ति । शीर्णा आप इति वा ॥ ‘अस्य’ (६२) इति ‘अस्याः’ [६२] इत्येतेन व्या- ख्यातम् ॥ ४ [२५] ॥ अनुवादः ‘गौ’ यह अनेकार्थ होने से यहा नैगम काण्ड में समाम्नान हुआ है । एवम् जिस प्रकार यह अनेकार्थ है, सो पहिले (नै० का० अ० २ पा०२ ख० १) दिखाया जाचुका । किन्तु पहिले यह भी कहा गया था कि—

हिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ४ अ० ४ पा० ४ ख०

“अथाप्यस्यैको रश्मिश्चन्द्रमस प्रति दीप्यते, ०-० सोऽपि ‘गोः’
इत्युच्यते-“अत्राह गोरमन्वत” इति तदुपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः”
अर्थात् “और इस (आदित्य) का रश्मि (किरण) चन्द्रमा में लग
कर चमकता है, ०-० सो भी ‘गो’ कहलाता है—इसका निगम है—
“अत्राह गोरमन्वत” इसकी व्याख्या आगे करेंगे। वही यह अब
कहा जाता है—
[निरू०] [मन्त्रार्थ-] ‘अत्र-ह’ इसी ‘चन्द्रमसः’ चन्द्र के ‘गृहे’
मण्डल में अन्य ‘त्वष्टुः’ सूर्य की रश्मियों ने ‘गोः’ सुषुम्णा
नामक रश्मि का ‘नाम’ अवस्थान ‘अमन्वत’ माना।
निरुक्तार्थ-आदित्य की रश्मियों ने इसी में गो (सुषुम्णा
रश्मि) को माना। अपना अवस्थान, जो ‘अपीच्य’ (अपचित)
सूर्यमण्डल से हटकर चन्द्रमण्डल में लगा हुआ, (अपगत) गया
हुआ, (अपिहित) रखा हुआ, [अन्तर्हित] अथवा भीतर घसा
हुआ। उस चन्द्रमा के गृह (मण्डल) में॥
‘गातु’ (५५) शब्द का [नि०अ०४,पा०३,खं०५,] व्याख्यान
हो चुका। (“गातुं कृण्वन्नुषसो जनाय” यह भी नि-
गम है।)॥
‘दंसयः’ (५६) यह अनेक कर्मों का नाम है। [क्यों कि-
कर्मों के करने वाले] इन्हें दंसन (ग्रहण) करते हैं। [निगम]
“कुत्साय” ०-०[ ऋ० सं० १, ६, ३०, २, ] अर्थात्—
“सन्मन् (मन्यमानाः) मानते हुए ‘कुत्साय’ कृषक के लिये
‘अह्नः’ जल (देने) ‘च’ और ‘दंसयः’ उस के कर्मों को सफल
करने” यह भी निगम है।
‘तूताव’ (५७) (तुताव) इस अनवगत पद का निगम—
“स तूतताव” ०—० [१, ६, ३०, २] अर्थात् ‘सः’
वह ‘तूताव’ (वर्द्धते) बढ़ता है। ‘एनम्’ इस को ‘अंहतिः’

[Header] हिन्दी निरुक्त \qquad ( ८६ ) \qquad ४ अ० ४ पा० ४ ख० \rule{\textwidth}{0.5pt}

पाप 'न' नहीं 'अश्नोति' व्यापता है। अंहति, अंहस्, अंहु ये तीनों शब्द निरूढोपध 'हन्' (अदा० प०) धातुसे हैं। ['नि रूढोपध' जिसका अन्तिम अक्षर से पहिला अक्षर आदि में किया जावे ।] अर्थात् - 'हन्' धातु के अकार को आदि में लाकर हकार नकार को उलटा कर 'अंह' रूपसे बनते हैं । 'चयसे' (५८) (चातयति) अनवगत पद का निगम- "बृहस्पते चयसे" ०-० [ऋ० सं० २,५,१२, ५] अर्थात्-हे बृहस्पते ! दान, आदि गुणोंसे युक्त ! तू 'पियारुम्' देवताओं के अपूजक को 'इत्' अवश्य 'चयसे' (नाशयसि) नाश कर देता है। निरुक्तार्थ-हे वृहस्पति देव ! जो तू देवताओं के अपूजक को नाश करता है। 'पीय' धातु का हिंसा अर्थ है । 'वियुते' (५६) मिलेहुए द्यावा-पृथिवी दोनों लोकों का नाम है। क्यों ? वियवन या परस्पर दोनों को पृथक् होनेसे । निगम- "समान्या वियुते" ०-० [ऋ० सं० ३, ३, २५, २] अर्थात्-'वियुते' द्युलोक और पृथिवी लोक दोनों 'समान्या' परिमाण में समान हैं, 'दूरे' दूरतक हैं, 'अन्ते' जगत् के अन्त तक हैं। [अर्थात्-इन दोनों का ही अन्त नहीं मिलता ।] 'समान' क्यों ? सम्मानमात्र या तुल्य परिमाण होता है। 'मात्रा' क्यों ? मान से। 'दूर' शब्द की व्याख्या हो चुकी । 'अन्त' 'अत्' (भ्वा० प०) धातु से है। 'ऋधक्' (६०)-यह जुड़े हुए हुए का नाम है। और 'ऋध्' (स्वा०प०) धातु के अर्थ में देखा जाता है। निगम- "ऋधगया" ०-० [य० वा० सं० ८, २०] १२

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थात्--हे अग्ने ! तू 'ऋधक्' समृद्ध होता हुआ 'अयाः' आया अथवा यज्ञको बढ़ाते हुएने यजन किया । 'उत' और 'ऋधक्' बढ़ते हुए ने 'अशस्तिहाः' विघ्नों को शान्त किया । ' अस्याः ' ( ६१ ) और 'अस्य' (६२) ये दोनों मुख्य अर्थ में उदात्त होते हैं, और विशेषण या गौण अर्थ में अनुदात्त होते हैं । क्यों ? जो उत्कृष्ट या अधिक गुणयुक्त होता है, वह उदात्त होता है और अल्प या हीन गुणयुक्त अनुदात्त होता है । (लोक में भी 'यह कुल उदात्त (समृद्ध) है'ऐसा प्रसिद्ध है ।) प्रधान वाचक 'अस्या' (६१) का निगम— “ अस्या ऊषुणः ” ०-० [ ऋ०सं० २, २, २, ४ ] अर्थात्-हे 'अजाश्व' हे पूषन् ! 'अस्याः' ( अस्यै ) इस 'सातये' लब्धि के लिये ( जिस प्रकार हम वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हों ) 'नः' हमारे 'उप' समीप 'भुवः' ( भव ) हो । ( क्योंकि-आप के निकट होनेसे हम इस वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हो सकते हैं ।) ( कैसे पास आओ ? ) ‘ अहेलमानः ’ ( अक्रुध्यन् ) क्रोध न करते हुए । ( क्योंकि-सभी याचना करने से क्रोधकरता है । ) (फिर कैसे आ ?) ‘ररिवाञ्’ दान के अभिप्राय से युक्त होकर ‘अजाश्व’ हे अजनाश्व ! (शीघ्र चलने वाले घोड़ों वाले ! अथवा छाग ( बकरा ) रूप घोड़े वाले ' ॥ (‘अ वस्यताम् धन की इच्छा करते हुओं के 'अजाश्व' हे छाग अश्व वाले ! ॥ ) निरुक्तार्थ —इस लब्धिके लिए हमारे पास आ । 'अहेल- मानः' नहीं क्रोध करता हुआ । 'ररिवान्' कैसे ? ('रा'अदा० प०) धातु 'अभ्यस्त' या दोहराया हुआ है। ' अजाश्व ' यह पूषादेव को कहता है । (अर्थ क्या ? ) अजनाश्व । 'अज नाम अजन ( चलने वाले ) । अब अनुदात्त । —

हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ४ अ० ४ पा० ५ खं० “दीर्घायुरस्याः” ०—० [ ऋ० सं० ८, ३, २७, ४ ] अर्थात्-‘अस्याः’ इस [ पिता के द्वारा पहिले दी हुई और अग्नि के द्वारा फिर दी हुई कन्या ] का ‘ यः ’ जो ‘ पतिः ’ पति है, सो ‘ दीर्घायुः ’ दीर्घायु ( बड़ी आयु वाला ) हो । ‘शतम्’ सौ (१००) ‘शरदः’ शरद् ऋतुओं तक ‘जीवतु’ जीवे ! [ क्योंकि शरत् काल में बहुधा रोग उपजते हैं, इसी से शत शरद् जीवन की प्रार्थना है । ] ॥ निरुक्तार्थः—इस का दीर्घायु जो पति है, वह सौ वर्ष जीवे । ‘शरत्’ क्यों ? इस में ओषधिएँ ‘ शृत ’ पक कर गिर जाती हैं । अथवा जल फट जाते हैं । (६२) ‘अस्य’ यह पद ‘अस्याः’ इस से व्याख्यान किया गया [ उसी के समान है । ] ॥ ४ (२५) ॥ १ (५ खंड०) [ निरु० ] “अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्त्यश्नः । तृतीयो भ्राता घृत- पृष्ठो अस्यात्रापश्यं विशपतिं सप्तपुत्रम्” [ २, ३, १४, १ ] (भा०) “अस्य” “वामस्य” वननीयस्य “पलि तस्य” पालयितुः “होतुः” ह्वातव्यस्य “तस्य भ्राता मध्यमः अस्ति” अशनः । ‘ भ्राता ’ भरते र्हराति १ “अस्य वामस्य” इति अस्य वामीयमेवेदं सूक्तम् । दीर्घतमसः आर्षम् । तार्तीयसवने महाव्रते वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ४ अ० ४ पा० ५ खं०


कर्मणः । हरते भागम् । भर्त्तव्योभवति-इतिवा । “तृतीयो भ्राता घृतपृष्ठो अस्य” अयम्-अग्निः, तत्र “अपश्यं” सर्वस्य पातारं वा पालयितारं वा विशपति सप्तपुत्रं” सप्तमपुत्रं, सर्पणपुत्रम्-इति वा । ‘सप्त’ सृप्ता संख्या । सप्त आदित्यरश्मयः इतिवदन्ति ॥ ५ (२६) ॥

अनुवादः ।

अस्य (६२) प्रधान और अप्रधान का एक मन्त्र उदाहरण- “अस्य वामस्य” ०-०[ऋ० सं० २, ३, १४, १] अर्थात् ‘वामस्य’ (वननीयस्य) याचना करने योग्य ‘पलितस्य’ (पाल- यितुः ) पालन करने वाले ‘होतुः’ आह्वान-योग्य ‘तस्य’ उस द्युलोक में रहने वाले ‘अस्य’ इस प्रत्यक्ष सूर्य्य का ‘भ्राता’ , भाग हरने वाला अथवा भरण करने ( जल से भरने ) योग्य ‘मध्यमः’ अन्तरिक्ष लोक में रहने वाला वायु ‘अस्ति’ , है । ‘अस्य’ इस मध्यमस्थान वायु का ‘तृतीयः’ तीसरा ‘भ्राता’ भाई ‘घृतपृष्ठ’ , घृत से संयुक्त पृथिवी स्थान वाला यह अग्नि है । ‘अत्र’ , इस तीन भागों में बटे हुए ज्योति में ‘विशपतिम्’ , विश्व के पालन करने वाले ‘सप्तपुत्रम्’ सात रश्मियों वाले सूर्य्य को ‘अपश्यम्’ प्रधानता से देखता हूं ॥ निरुक्तार्थ-इस वाम या वननीय ( प्रार्थनीय ) पलित ( पालन करने वाले ) होता ( आह्वान करने योग्य ) उस सूर्य्य का भ्राता व्यापक वायु है । ‘भ्रातृ’ हरणार्थक ‘भृ’ (भ्वा० उ०) धातु से है । क्यों ? भाग को हरण करता है । अथवा भर्त्तव्य

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० ( जल से भरने योग्य ) होता है। इस मध्य स्थान वायु का तीसरा भ्राता घृतसंयुक्त यह अग्नि है। तहां सब के पालन करने वाले विश्व के स्वामी सप्त (सात) या सप्तम (सातवें) पुत्र वाले अथवा सर्पण पुत्र ( 'सर्पण निरन्तर चलने वाले ' पुत्रों ' रश्मियों वाले ) ( सूर्य ) को देखता हूं । ' सप्त ' सृप्त या फैली हुई ( छः की अपेक्षा से ) संख्या है । सात आदित्य की रश्मिएं हैं, ऐसा कहते हैं ॥ ५ ( २६ ) ॥ १ ( ६ खंड ) [निरु०] “सप्तयुञ्जन्ति रथमेकचक्रमेकोअश्वो वहति सप्तनांमा । त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधितस्थुः ॥” [ऋ०सं०२,३,१४,२] (भा०) “सप्त युञ्जन्ति रथम्-एकचक्रम्” एक चारिणम् 'चक्रम्' चकतेर्वा । चरतेर्वा । क्रामतेर्वा । “एकः अश्वो वहति सप्तनामा” आदित्यः । सप्त अस्मै रश्मयः रसान् अभिसंनामयन्ति । सप्त एनम् ऋषयः स्तुवन्ति इतिवा । इदमपि इतरत् नाम एतस्मादेव अभिसंनामात् । संवत्सरप्रधानः उत्त- रोऽर्द्धर्चः । “त्रिनाभिचक्रम्” त्र्यृतुः संवत्सरो-‘ग्री- षमो वर्षा हेमन्तः' इति । 'संवत्सरः' संवसन्ते अ- स्मिन् भूतानि । 'ग्रीष्मः' ग्रस्यन्ते अस्मिन् रसाः । १ “सप्त युञ्जन्ति” इति “अस्य वामस्य' इत्यनेन तुल्यो विनियोगः ।

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ४ अ० ४ पा० खं० ६ ‘वर्षाः’ वर्षति आसु पर्जन्यः। ‘हेमन्तः’ हिमवान्। ‘हिमं’ पुनः-हन्तेर्वा। हिनोतेर्वा। “अजरम्” अ- जरणधर्म्माणम्। “अनर्वम्” अप्रत्यूतम् अन्यस्मिन्। “यत्र” इमानि सर्वाणि भूतानि अभिसन्तिष्ठन्ते। तं संवत्सरं सर्वमात्राभिः स्तौति— “पञ्चारे चक्रे परिवर्त्तमाने—” [ऋ० सं० २, ३, १६, ३,—१, २२, ८, १३] । इति पञ्चर्तुतया। “पञ्चर्त्तवः संवत्सरस्य-” इति च ब्राह्मणम्,—हेमन्तशिशिरयोः समासेन । “षळर आहुरर्पितम्” [ऋ० सं० २, ३, १६, १] इति षडृतुतया ‘अराः’ । प्रत्यताः नाभौ । ‘षट्’ पुनः सहतेः । “द्वादशारं नहि तज्जराय” [ऋ०सं०२, ३, १६, १] “द्वादशप्रधयश्चक्रमेकम्” (ऋ० सं० २, ३, २३, २) इति [द्वौपादौ] मासानाम् । ‘मासाः’ मानात् । ‘प्रधिः’ प्रहितो भवति । “तस्मिन् साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चला चलासः ।” (ऋ० सं० २, ३, २३, २) “षष्टिश्च ह वै त्रीणि च शतानि संवत्सरस्य अ- होरात्रा-” इतिच ब्राह्मणं समासेन ।

हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ४ अ० ४ पा० ६ ख० “सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थुः” (ऋ०सं० २, ३, १६, १) “सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः” इति च ब्राह्मणं विभागेन विभागेन ॥६ (२७) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः, चतुर्थोऽध्यायश्च समाप्तः । अनुवादः । जिस प्रकार यह आदित्य सात या सर्पण (गमन) स्वभाव रश्मियों से युक्त होता है, वैसा ही इस ऋचा मे वर्णन है ।— मन्त्रार्थः-‘सप्त’ सात (७) या सर्पण (गमन) करने वाले रश्मि ‘एकचक्रम्’ अकेले आकाश में चलने वाले एवम् अपने प्रकाश से अन्य ज्योतियोंको ग्रास करते हुए ‘रथम्’ रंहण या निरन्तर चलने वाले सूर्य को ‘युञ्जन्ति’ आपे से जोड़ते हैं। ‘एकः’ एक (अकेला) ‘सप्तनामा सप्तस्तुति, सप्तपुत्र, सप्ताश्व इत्यादि सप्त (७) संख्या वाली स्तुतियों वाला ‘अश्वः’ व्यापक (सूर्य) ‘वहति’ चलता है । [संवत्सरवर्णन-] ‘त्रिनाभि’ तीन ऋतु (ग्रीष्म-वर्षा-हेमन्त) रूप नाभियों वाला ‘चक्रम्’ चलन स्वभाव ‘अजरम्’ जरा (बुढापा) रहित ‘अनर्वम्’ दूसरे में नहीं आश्रित [ ऐसा संवत्सर काल ] है । ‘अत्र’ जिसमें ‘इमा’ (इमानि) ये ‘विश्वा’ (विश्वानि) सब ‘भुवना’ (भुवनानि) लोक ‘अधि-तस्थुः’ आश्रित या अधिष्ठित हैं ॥ निरुक्तार्थ-सात एक चक्र रथ को जोड़ते हैं । ‘एकचक्र’ क्या ? एक चारी या अकेला चलने वाला । ‘चक्र’ गत्यर्थक ‘चक’ (स्वा० प ) धातु से है । अथवा चर (स्वा० प०)

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० धातु से है। अथवा 'क्रम्' (भ्वा० प०) धातु से है । एक 'अश्व' आदित्य सप्तनामा विचरता है। 'सप्तनामा' क्या ? सात रश्मिएं इस के लिये रसों को संमुख भाव से संनामन या प्राप्त करती हैं। अथवा सात ऋषि इस की स्तुति करते हैं। यह भी दूसरा 'नाम' (मनुष्य नाम) इसी अभि-संनामन (झुकने से है। (क्योंकि- वह भी अपने अर्थ को या क्रिया पद के प्रति गौण भाव को प्रकट करने के लिए संमुख झुकता है।) पिछली आधी ऋचा 'संवत्सर' को प्राधान्य से कहती है। तीन नाभियों वालां चक्र, तीन ऋतुओं वाला संवत्सर है। (तीन ऋतु) ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ये हैं। 'संवत्सर' क्या इस में सब भूत या प्राणी संवास (निवास) करते हैं। 'ग्रीष्म' इस में रस ग्रसे जाते हैं। 'वर्षा' इनमें पर्जन्य (मेघ) बरसता है। 'हेमन्त' हिम (पाला) वाला है। और 'हिम' अथवा 'हन्' (अदा०प०) धातु से है। अथवा 'हि' (स्वा० प०) धातु से है। 'अजर' जिसमें जरण (बुढापा धर्म नहो। 'अनर्व' दूसरे में प्रत्यृत या आश्रित नहो । जिसमें ये भूत भले प्रकार स्थित रहते हैं। - उस संवत्सरको सब अंशों से स्तुति करता है। “पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने” [ऋ० सं० २, ३, १६, ३-१, २२, ८, १३] ॥ अर्थात्-“ 'परिवर्त्तमाने' जगत् को लेकर घूमते हुए 'पञ्चारे' पांच अरों वाले 'चक्रे' काल चक्र में”-इस मन्त्र में पांच ऋतुवाला संवत्सर वर्णन किया है। “संवत्सर के पांच ऋतु होते हैं ।” यह ब्राह्मण है। इस में हेमन्त और शिशिर ऋतु का समास या एकीभाव कर दिया गया है। “पञ्चर आहु रर्पितम् ” [ऋ० सं० २, ३, १६, १]