राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
११६ राजतरंगिणी तं चामरमरुल्लोलकाकपक्षमृपासने । विधाय मन्त्रिणोऽशृण्वन्प्रजानां धर्मसंशयम् ॥ ८१ ॥ ८१. चामर मरुत् द्वारा बालक के काकपक्ष उल्लोलित होते थे । उसे नृपासन पर बैठाकर मन्त्रीगण विवादों को सुनकर धर्म संशयों का सविधि निर्णय करते थे । इति काश्मीरको राजा वर्त्तमानः स शैशवे । साहायकाय समरे न निन्ये कुरुपाण्डवैः ॥ ८२ ॥ ८२. अस्तु यही कारण है । कौरव एवं पाण्डव दोनों पक्षों ने कश्मीर के राजा को शिशु जानकर महाभारत युद्ध में सम्मिलित होने के लिये आमन्त्रित नहीं किया था । श्लोक सं० ७ स्पष्ट उल्लेख करता है कि दोनों राजाओं में युद्ध हुआ । उसमें काश्मीर राजा पराजित हुआ । वीर गति प्राप्त किया । ८१ ( १ ) काक पक्ष : मस्तक के दोनों पार्श्व में बच्चों तथा क्षत्रिय युवकों में कुछ बाल छोड़ दिये जाते थे । मेरी बाल्यावस्था में मेरे घर में मस्तक के ऊपर लगभग एक चौथाई बनवाकर शेष बाल छोड़ देते थे । यह बाल रखने की प्रथा लुप्त हो गयी है । पठान तथा सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रान्त के पुराने कुलीन लोग अब भी इस प्रकार के बाल रखते हैं । मैने अफगानिस्तान की अपनी यात्रा में प्रायः लोगो को इस प्रकार का बाल रखे देखा था । भारत में काबुली लोग अब भी इस प्रकार का बाल रखते हैं । ईरान मे इस फैशन को 'काकुल' कहते हैं । ( २ ) धर्मसंशय : यहाँ धर्मसंशय से अर्थ है— विवाद । दो पक्षो में अधिकार, अपराध, दण्ड आदि के विषयों में जब संशय उत्पन्न होता था और प्रचलित विधि के विषय में शंका उत्पन्न होती थी तो वह विषय अन्तिम निर्णय हेतु राजा के सम्मुख उपस्थित होता था । राजा को प्रतीक मानकर मन्त्रीगण राजा के नाम से राजा के सम्मुख निर्णय देते थे । राजा न्याय का स्रोत था । न्याय का संरक्षक था । अतएव राजा को सम्मुख रखकर मन्त्रीगण निर्णय लेते थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ८२ में 'निन्ये' का 'नीतः' पाठ- भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८२ ( १ ) महाभारत और कश्मीर राज : नीलमत पुराण का प्रारम्भ राजा जनमेजय की इस जिज्ञासा से होता है । महाभारत युद्ध स्थल में सभी देशो के राजा उपस्थित थे । किन्तु क्या कारण है कि कश्मीर मण्डल के राजा ने युद्ध में किसी पक्ष से भाग नहीं लिया । इस प्रश्न का उत्तर वैशम्पायन ने कश्मीर का राजा बालक होना दिया है : जनमेजय उवाच : महाभारतसंग्रामे नानादेश्या नराधिपाः । महायूथाः समायाताः पितॄणां मे महात्मनाम् ॥ ३ : ३ कथं काश्मीरिको राजा नायातस्तत्र कीर्त्तय । पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रैश्च न वृतः स कथं नृप ॥ ४ : ४ कश्मीरमण्डलं चैव प्रधानं जगति स्थितम् । कथं नासौ समाहूतस्तत्र पाण्डवकौरवैः ॥ ५ : ५ किंनामाऽभूत् राजा च कश्मीराणां महाशयः । कथं वासौ निशम्यैतन्नायातश्चात्मना तदा ॥ ६ : ६
प्रथम तरंग ११७ आम्नायभङ्गान्निर्णनामकृत्यास्ततः परम् । पञ्चत्रिंशन्महीपाला मग्ना विस्मृतिसागरे ॥ ८३ ॥
पैंतीस राजा ८३. तत्पश्चात् हुए पैंतीस महीपालों के नाम तथा कर्म परम्परा गत लेखादि के नष्ट होने के कारण विस्मृति सागर में डूब चुके हैं।
स्वर्गसोपानपंक्तिर्हि भव्यानां समभूदिदम् । भारतं नाम युद्धं यन्जिगीषूणां महात्मनाम् ॥ 7 : ७ रुरोध च कंसारेर्मथुरां मधुराकृतिः । घनैः स्वैर्बलौघान् राजा त्रेसुस्ते यत्र यादवाः ॥ 16 : १६
अकारणमिदं नाम न भवेदद्यदसौ तदा । नायातो भारतं युद्धं राजा काश्मीरिको महान् ॥ 8 : ८ भूरिशोऽथ बले भग्ने यादवानां बलोद्धतः । बलो बलेन रुरुधे महता तं जिगीषया ॥ 17 : १७
वैशम्पायन उवाच : सत्यमेतन्महाराज त्वया प्रोक्तं महीपते । यथा नामौ समायातस्तन्निशामय सुव्रत ॥ 9 : ९ अतीव तुमुले तस्मिन् युद्धेऽन्योन्यजिगीषया । काश्मीरिकोऽसौ क्रुद्धेन बलेन बलवान् बलात् ॥ 18 : १८
कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् । पाविताभूदितिसुतानवतीर्णाऽधवान् यत् ॥ 10 : १० रुद्धोऽभूत्पतितो भूमौ शस्त्रास्त्रक्षतविग्रहः । इत्यस्मिन् वीरकलितां गतिमाप्ते महात्मनि ॥ 19 : १९
तस्मिन्कालेऽत्र समभूद्राजा विशदकीर्तिमान् । कश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संज्ञया ॥ 11 : ११ दामोदराभिधस्तस्य सूनू राजाऽभवत्सुधीः । विभूतिकलितेनाऽथ समृद्धेन महात्मना ॥ 20 : २०
असौ प्रतापकलितो दिशं सौम्यां समाश्रितः । शुशुभे विक्रमोदग्रो मानी कलितसंस्थितिः ॥ 12 : १२ येन काश्मीरभूः राज्ञाऽन्विता सौम्या जहा सह । स राजवीजो सत्कीर्तिर्वंशशाली महाभुजः ॥ 21 : २१
अथोत्थिते किल महाविरोधे दैत्यबन्धुना । वृष्णीनां कृष्णमुख्यानां जरासंधेन भूभृता ॥ 13 : १३ अतश्चिन्तातुरो जातु न लेभे निवृत्तिं पराम् ॥ अहो महात्मा राजा स कथं नाम हतो बलात् । द्वीपान्तर्वासिना तातो बलेन बलवान् मम ॥ 22-23 : २२-२३
अनेन बन्धुना मानस्थानमेष महीपतिः । काश्मीरिकोऽभ्यर्थनयाहूतः माहात्म्यकाम्यया ॥ 14 : १४ हसन गोनन्द द्वितीय को बाल गोनन्द लिखता है। अराकीन दौलत के मशविराह से यह शख्स सन् २५ क० बाद अज वलगत तख्त नशीन हुआ। एक खासी मुद्दत नेकनामी के साथ हुकूमत के चलाने में गुजारी। बिल आखिर हरणदेव के हाथ कत्ल हुआ। मुद्दत सल्तनत चालीस साल।
गत्वासौ बन्धुयुद्धार्थमजरासंधस्य भूपतेः । चक्रे माहात्म्यकं धीमान् जरामन्धस्य भूपतेः ॥ 15 : १५
११८ राजतरंगिणी
हसन का यह कयास है कि द्वितीय गोनन्द मारा गया। इसका कोई प्रमाण नहीं है। कोई कारण नहीं देता कि गोनन्द की हत्या क्यों की गयी। हत्याकारी हरणदेव का गोनन्द से क्या सम्बन्ध था। ८३ (१) लुप्त राजा : कल्हण ने ३५ राजाओ का नाम तथा समय नहीं दिया है। इस प्रसंग में एक रोचक बात रत्नाकर पुराण की है उसका उल्लेख यहाँ कर देना आवश्यक है । कश्मीर का बड़शाह अर्थात् बादशाह जैनुल आबदीन (सन् १४२०-७० ई०) ने प्राचीन पुस्तकों का अन्वेषण कराया था। उसने १५ राज- तरंगिणियों का पता लगवाया था। सिकन्दर बुत शिकन (१३६३-१४१६ ई०) के समय केवल ११ ब्राह्मणों के कुटुम्ब कश्मीर में रह गये थे। उनके अतिरिक्त हिन्दू या तो मुसलमान हो गये या विनष्ट कर दिये गये या कश्मीर त्याग कर भाग गये। देवस्थान तथा मन्दिर नष्ट कर दिये गये। पुस्तकें आदि भस्म कर दी गयीं। उनका या तो नदियों में प्रवाह कर दिया गया अथवा भस्म कर दी गयी। बहुतो ने राज्य भय से स्वयं वितस्ता में उनका जल प्रवाह कर दिया। बड़शाह के समय कल्हण की राजतरंगिणी जो प्रायः एक सौ वर्ष तक लुप्त थी प्राप्त हुई। उसमे ३५ विस्मृत राजाओ का उल्लेख नही था। कुछ समय पश्चात् भोजपत्र पर लिखी एक पुस्तक और मिली। उसका नाम 'रत्नाकर पुराण' था। रत्नाकर पुराण में ३५ लुप्त राजाओ का वर्णन था। बादशाह जैनुल आबदीन ने रत्नाकर पुराण तथा राजतरंगिणी का अनुवाद फारसी में कराया। पुराण में कलियुग के प्रारम्भ से होने वाले राजाओ का वर्णन था। दोनो ही मूल ग्रन्थ अर्थात् रत्नाकर पुराण तथा उसका अनुवाद इस समय अप्राप्य हैं। कश्मीर के इतिहासकार पीर हसन शाह का कहना है कि उन्हें रत्नाकर पुराण के अनुवाद की एक प्रति रावलपिण्डी में किसी काश्मीरी सज्जन से प्राप्त हुई थी। उसमें जिन ३५ राजाओं का वर्णन कल्हण ने नही किया है, उनका उल्लेख था। हसन वितस्ता में एक दिन रत्नाकर पुराण के अनुवाद वाली पुस्तक के साथ नाव पर जा रहे थे। नाव डूब गयी। वे स्वयं बच गये पुस्तक डूब गयी। हसन ने नहीं लिखा है कि यह पुस्तक रावलपिण्डी में किससे मिली थी। हसन के अनुसार २२ राजाओं का शासन काश्मीर में एक हजार वर्ष तक था। उन्हें वह पाण्डववंशीय कहता है। कश्मीर की परम्परा बलो धाती है कि प्रत्येक स्मारक तथा गाथा को पाण्डव से जोड़ते हैं। उन्हें पाण्डव लारेह किंवा पाण्डव स्मारक कहते है। हिमाल तथा लोलार की प्रेमगाथाएं इसी काल की कही जाती हैं। हिमाल का प्रेमी नागराय तथा लोलार का प्रेमी बोम्बरे था। कश्मीर के ग्राम्य गीतों में उनका नाम अभी तक प्रचलित है। बोम्बरे उन विस्मृत राजाओ मे से एक था। बोम्बरे लोलार पर इतना आसक्त था कि उसने राज्य त्याग दिया। हिमाल-नागराय की एक प्रचलित कहानी है। नागराय को भी उक्त ३५ लुप्त राजाओ में रखा गया। हसन के अनुसार हरणदेव पाण्डव वंशज था। यह गोनन्द द्वितीय के यहाँ सेवावृत्ति करता था। कालान्तर मे वह राजमन्त्री हो गया। गोनन्द की हत्या कर स्वयं राजा बन गया। रामदेव हरणदेव के पश्चात् राजा हुआ। उस प्रतापी राजा ने भारतवर्ष के ५०० राजाओं को परास्त कर अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक राज्य कायम किया। उसने उपज का १० प्रतिशत राजकर निश्चित किया। किन्तु उसके उत्तराधिकारियों ने उसे बढ़ाकर २० प्रतिशत कर दिया था।
प्रथम तरंग ११६
यदि रामदेव इतना प्रतापी राजा होता तो कश्मीर के इतिहास तथा तत्कालीन कश्मीर साहित्य में उसके सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहानी तथा कोई न कोई घटना अवश्य लिखी मिलती । उसका कोई न कोई स्मारक, मन्दिर अथवा भवन के रूप में अवश्य होता । उसका किसी न किसी काश्मीरी साहित्य में उल्लेख मिलता । कल्हण के समय तक कुछ बात उसके सम्बन्ध में अवश्य प्रचलित रहती । हसन के अनुसार पाण्डव वंश का वाईसवाँ राजा सुन्दरसेन था । उसके समय में भयंकर भूकम्प आया । भूकम्प राजधानी के सन्धिमत नगर के मध्य में हुआ । समस्त नगर, राजा, नागरिक, जीव- जन्तु इसके शिकार हो गये । नगर जिस स्थान पर था वहाँ उलर झील हो गयी । हसन ने बाइबिल तथा कुरान शरीफ वर्णित जल प्लावन के आधार पर इस कथा का वर्णन किया है । राजवंश के निर्मूल होने पर, कश्मीर के उत्तर-पूर्व स्थित अत्यन्त रमणीय, उर्वरा लोलह किंवा लोलाव अथवा आधुनिक लोव उपत्यका के सामन्त लव को कश्मीर के लोगो ने राजा निर्वाचित किया । उसे कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया । सम्भव है कि भूचाल तथा जलप्लावन के कारण जो कश्मीर में प्रायः हुआ करते हैं, लुप्त राजाओ से संबंधित पुस्तिकाएं तथा सामग्रियां नष्ट हो गयी हों । जिस रत्नाकर पुराण के आधार पर हसन ने इतिहास लिखा है, उसके विषय मे कहता है कि वह पुस्तक के साथ वितस्ता नदी में नाव पर जा रहा था । तूफान आया । पुस्तक नदी में डूब गयी । नीलमत पुराण तुल्य रत्नाकर पुराण का होना सम्भव हो सकता है । नीलमत के समान उसमें भी ऐतिहासिक वर्णन रहा होगा । किन्तु अभी तक रत्नाकर पुराण तथा उसका अनुवाद नहीं मिल सका है । मैने हसन द्वारा वर्णित राजाओ का वर्णन परिशिष्ट ३ में दे दिया है। इसका ऐतिहासिक महत्त्व भविष्य के गर्भ में है । वस्तुस्थिति तथा घटना क्रम जो प्रकाश में आये हैं, उनके आधार पर उसका ऐतिहा- सिक महत्त्व नगण्य है । मैं यहाँ मुल्ला अहमद के 'वाक्ये कश्मीर' का 'दीवाचा' दे देना उचित समझता हूँ जिससे बहुत बातें साफ हो जायेंगी । पता चलेगा कि रत्नाकर पुराण की कहानी सर्व प्रथम कैसे आरम्भ हुई या गढ़ी गयी । लुप्त राजाओं को किस प्रकार एक दूसरे से जोड़ने का प्रयास किया गया है । हसन ने दीवाचा अपनी पुस्तक में उद्धृत की है । उसे अविकल रूप में यहाँ देना अच्छा होगा । मुल्ला अहमद 'वाक्ये कश्मीर' के दीवाचा में रकम तराज है—'यह हकीर पुर तकसीर जब आला हजरत शहन्शाह मुअज्जम यानी जैनुल आबदीन के 'वाजिबुल अर्ज' के मुताबिक किताब महाभारत के फ़ारसी तरजुमे से फारिग हुआ तो इसके फौरन बाद ही कश्मीर के राजे-महाराजो की तारीख नवीसी पर मुकर्रर हुआ । चुनांच: इस इरशाद के मिलते ही मैने संस्कृत जबान के उन 'पुरानो' और 'तरंगिनियो' की तलाश शुरू की जो तुरकी लुटेरे कश्मीर पर हमलावर होने और वाज सुलतान सिकन्दर बुतशिकन की मजहबी ना सादारी के वापस जाया हो चुकी थी । और जो बाक़ी थी वह बहुत थोड़ी और नायाब थी । वकौल शस्ते जो- इब्दा या बिन्दा बडी मशक्कत और मिहनत के बाद मैं उनके पाने में कामयाब हो गया । इनमें से क़ाबिले जिक्र किताबें कल्हण पण्डित, क्षेमेन्द्र, छबिल्लकार और पद्ममिहिर की राजतरंगिनियां हैं । लेकिन उसे छोड़कर कल्हण पण्डित की राजतरंगिनी के तरजुमा की तरफ मुतवज्जह हुआ जो बहम्दुल्लाह बहुत जल्द इख्तिनाम पजीर हो गया । 'इसके थोड़े अरसा बाद ही पण्डित रत्नाकर की पुरानी तारीख के कुछ अजजा पण्डित प्रजा की
१२० राजतरंगिणी तवज्जो और इनायत से हासिल हो गये। ये सारीख भोज के पत्तों पर लिखी हुई थीं। मुतालह करने से पैंतीस राजाओं के नाम जो सन् कलयुग शुरू होने से कवल कश्मीर मे हुए थे और जिन्हे कल्हन पण्डित ने ब वजह अदम बसूक तर्क कर दिया था मालूम हुए। बादशाही हुक्म के मुताबिक इस किताब का तरजुमा भी किया गया और बतौर जमीया अपनी किताब के आखिर मे मिलाकर दोस्त अहबाब के लिये सामाने मुसर्रत बनाने की कोशिश की।' हसन कहता है—'राकुमउल हुरुफ़ ने मुस- न्निफ 'वाकए कश्मीर' के तरजुमा के मुताबिक उन राजाओं के अहवाल से अपनी तारीख शुरू की है। जिन्हें कल्हन पण्डित ने अपनी राजतरंगिनी में तर्क कर दिया था। यहाँ गोविद सानी तक जो तजकिरा किया गया है सबका सब मुल्ला अहमद की 'वाकये कश्मीर' से माखोज हैं।' (पृष्ठ १४-१५) तारीख हसन कश्मीर के मुसलमानो मे बहुत प्रचलित है। इसलिए कश्मीर के इतिहास का वास्तविक ज्ञान कश्मीर उपत्यका की मुसलिम जनता को कम प्राप्त हो सका है। लुप्त राजाओं के विषय में हसन का वर्णन उनके शब्दो में देना अच्छा है। 'मुसन्निफ ने कश्मीर की यह तारीख चार जिल्दो में मदून की है। जिल्द अव्वल मे जुगराफिया का बयान है। उसमें इक्त सादियात पैदावार आसार करीमा और शहराए सबक़ा मुफस्सल और निहायत दिल आवेज हाल मिलता है। हक तो यह है कि यह अपनी नवैयत का पहला कारनामा है और अपनी अफाहियत की वजह से बड़ी ही अहम तालीफ है। जिल्द दोयम मे जिसका उर्दू तरजुमा इन ओराक के साथ कारहन है। कदीम हिन्दू राजाओं सलातीन व मल्कूत मुतल्लिकाएँ कश्मीर सलातीन चुगताइया, अफागना, सिख और डोगरा हुक्मदानो के हालात हैं। जिल्द सोयम और चहारम सूफिया औलियाए कराम उलमा और शोहरा के हाल पर मुस्तमिल है। 'जिल्द अव्वल एक मशरकी तर्ज के मुख्तसर मुवदमा से शुरू होती है। ओवस्लन अकातीन आलम और जुगराफिया फलकी व सबई का बयान है। यह हिस्साए असमी नुक्ता निगाह से ज्यादा बकी नही। और गालिवन इब्तदाई दरसी किताबों से माखूज है। हिस्साए मावद पूरे तौर पर कश्मीर से मुतअल्लिक है। अगर ये इसमें ओरेल स्टाइन के कदीम जोगराफिया कश्मीर या कनिघम की एक ऐसी (दिक्कत) नजर नही मिलती ताहम इसकी बफादियत से भी इन्कार नही किया जा सकता। जिल्द दोयम में गयासो मदो जजर का बयान है। वकोल मुसन्निफ उसमें मुन्दरजः जैल माखोनों से इस्तफादा हासिल किया गया है। (२) वाक्ये कश्मीर : मुसन्निफ़ा अल्लामा अहमद काश्मोरी—इसके मुतल्लिक सतूर बाला में इशारा हो चुका है। इस किताब की मदद से मुसन्निफ ने उन पैंतीस राजाओ का तजकिरा मुरत्तन किया है जिनके हालात कल्हण की राजतरंगिणी में भी नही मिलते। अलावा अजई उन ६ राजाओ का तजकिरा भी इस किताब का रहीने मिन्नत है। जिन्होने १६१ सन् से ४१४ ईसवी तक और फिर रानादित्य के अहद हकूमत ४१४-४७४ के बाद ५७१ ई० तक काश्मीर पर हुक्मदानी की। यहाँ इस चीज का जिक्र दिलचस्पी से खाली न होगा कि कल्हण को जब इन सात राजाओं के हालात दस्तयाव न हो सके तो उसने रानादित्य के अहदे हकूमत ३०० वर्ष मुतैय्यन करके इस खला को पूरा करने की कोशिश की। जाहिर है कि अकले सलीम इसके मानने से कासिर है और कल्हण का यह कोल महज वर बजन सुखन है। हमारे मुसन्निफ की इस दरयाफ्त ने तारीख कश्मीर को मुकम्मल कर दिया और यह एक बडी ही अहम कडी है जो तारीख हसन के अलावा कही और दस्तयाव नही होती। कारैन की दिलचस्पी के लिए इन राजाओं की फहरिस्त दर्ज जैल है।'"
प्रथम तरंग १२१ अथाभवत् लवो नाम भूपालो भूमिभूषणम् । वेल्लद्यशोदुकूलायाः प्रीतिपात्रं जयश्रियः ॥ ८४ ॥ छवि¹ ८४. अनन्तर जयश्री² का प्रिय पात्र उल्लोलित दुकूल धारी भूमिभूषण लव राजा हुआ । यस्य सेनानिनादेन जगदौन्निद्र्यदायिना । निन्यिरे वैरिणश्चित्रं दीर्घनिद्राविधेयताम् ॥ ८५ ॥ ८५. उसके सेना का निनाद जिसने दुनिया की नींद हराम कर दी थी, आह ! आश्चर्य है !! वैरियों को लम्बी नींद में सुला दिया था । पाठभेद : श्लोक संख्या ८४ में 'दुकूलायाः' का पाठभेद 'दुगूलायाः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८४ (१) लव : मुस्लिम इतिहासकारों ने लव का नाम लू अथवा लूलू लिखा है । उसने लोलार नगर बसाया था । आइने अकबरी में अबुल फज़ल ने लिखा है । लोलार कश्मीर का पश्चिमी अंचल था । यहाँ उसके निर्माण की साक्षी वहाँ के एक करोड़ शिलाखण्ड व स्मारक दे रहे थे । आइने अकबरी के अनुसार नगर का आकार सम्राट् अकबर के समय तक देखा जा सकता था । इतिहासकार हसन ने लव का निर्वाचन होना लिखा है । कल्हण ने केवल ४ श्लोकों में इस राजा का वर्णन किया है । कल्हण ने अन्य राजाओं तुल्य लव का वर्णन नहीं किया है कि उसने किस प्रकार राज्य पाया । स्पष्ट है कि लव पूर्वकालीन राजवंश से भिन्न वंश अथवा कुल का था । उसने अपने राज- वंश की नवीन परम्परा चलाया । कल्हण ने लव, कुश, खगेन्द्र, सुरेन्द्र, गोधर सुवर्ण जनक और सचीनर का नाम पद्ममिहिर के आधार पर लिखा है । पद्ममिहिर की तालिका विवादास्पद है । १६ लोलार के साथ लव का नाम व्यर्थ जोड़ दिया गया है । डाक्टर थी हुल्त्ससेह ने आलोचना की है । स्थानीय नाम लवादि राजाओं के साथ वह इस लिये जोड़ दिया गया है कि स्वरविज्ञान किंवा साम्य ध्वनि पर आधारित मालूम होता है । स्थानीय नामों के अर्थ लगाने में प्राय यह प्रवृत्ति देखी गयी है कि उसे किसी न किसी राजा के नाम के साथ जोड़ दिया जाता है । वे राजा चाहे काल्पनिक किंवा सत्य क्यो न रहे हो । कश्मीर के स्थानों के नामों को इस बात ने बहुत प्रभावित किया है । ( विल्सन द्वारा उल्लिखित पृष्ठ १७ ) था स्टीन उक्तमत का समर्थन करते हैं । उनका भी मत है कि यह बात पद्ममिहिर की तालिका के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करती है । (२) जयश्री : विजय देवी का चित्र भारत तथा पश्चिम देशों में तूर्य सहित आकाश में उड़ते हुए वस्त्रों के साथ दिखाया गया है। उनके पृष्ठ भाग में मेघ रहता है । वह बहती वायु का प्रतीक है । श्रीदेवी के दुकूल किंवा वसन में भरती हवा अभिराम, उत्साह, उमंग एवं उल्लास पूर्ण चित्र उपस्थित करती है । विजय देवी पश्चिम में जैतून शाखा का मुकुट किंवा केवल पल्लव युक्त शाखा लिये दिखाई गयी है । वह शान्ति, सन्धि, मैत्री, तथा वीरता की प्रतीक मानी जाती है । भारत में जैतून के पल्लव एवं शाखा के स्थान पर माला एवं पुष्प चित्रित किया जाता है ।
१२२ राजतरंगिणी तेन षोडशभिर्लक्षैर्विहोनामश्मवेश्मनाम् । कोटिं निष्पाद्य नगरं लोलोरं निरमीयत ॥ ८६ ॥ ८६. उसने पाषाण वेश्म¹ बनवाकर लोलोर² नगर का निर्माण कराया। दत्त्वाऽग्रहारं लेदर्यां लेवारं द्विजपर्षदे । स द्यामनिन्द्यशौर्यश्रीरारुरोह महाभुजः ॥ ८७ ॥ ८७. लेदरी¹ स्थित अग्रहार² लेवार³ द्विज परिषद् को दान देकर महाभुज अनिन्द्य शौर्य- शाली राजा ने स्वर्गारोहण किया।
पाठभेद : श्लोक संख्या ८६ में 'लक्षै' का पाठभेद 'लक्ष्यै' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८६ (१) वेश्म : रत्नाकर पुराण में ८४ लाख के स्थान पर केवल ८० हजार मकानों का उल्लेख है। उसी के अनुसार राजा ने ६० वर्ष राज्य किया। (२) लोलार : कश्मीर में प्रचलित परम्परा से प्रतीत होता है कि राजा लव ने लोलो (लोलाव) परगना कमराज में स्थापित किया था। पुराना संस्कृत नाम (त० रा० ७:१२४१) लोलाट है। लोक प्रकाश में इसे 'ललव' कहा गया है। पण्डित साहिब राम ने 'लोलाह' का वर्तमान नाम 'ललव' दिया है। हसन इसका नाम 'लो लो' देता है-इलाका लोलाव के बीचो बीच एक शहर 'लो लो' नाम का भी था जिसमें निहायत उम्दा किस्म की दुकानें और मकानात थे तामीर कराया। उक्त प्राचीन नगर किस स्थान पर था निश्चय नहीं किया जा सका है। लोल्लार से मिलता कोई स्थानीय नाम श्री स्टीन को नहीं मिल सका था। वह कहते हैं कि परम्परा सब का नाम कमराज के परगना 'लोलाऊ' किंवा 'लोलाव' से जोड़ती है। पाठभेद : श्लोक संख्या ८७ में 'पर्षदे' का पाठभेद 'षट्पदे' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ८७ (१) लेदरी : इसे लेदर्य तथा लम्बोदरी भी कहते हैं। आधुनिक नाम लिदर नदी है। यह वितस्ता की एक मुख्य सहायक नदी है। उर्ध सिंध उपत्यका के दक्षिणी क्षेत्र के जल को बहाकर ले जाती है। वितस्ता में अनन्त नाग तथा विजशोर के मध्य में आकर मिलती है। नदी तट पर पर्यटकों का प्रिय प्रसिद्ध नगर पहलगाव इस समय बसा है। स्थान रम्य तथा चित्ताकर्षक है। भारतीय स्वाधीनता तथा कश्मीर में लोकतन्त्रीय शासन स्थापित होने के पश्चात् पहलगाव की अभूतपूर्व उन्नति हुई है। यहाँ से यात्री श्री अमरनाथ की यात्रा करते हैं। मैंने इस यात्रा का दृश्य देखा है। सर्व प्रथम छड़ी चलती है। उसके पीछे हजारों यात्री पैदल तथा टट्टुओं पर चलते हैं। भारत के कोने कोने से तीर्थ यात्री आकर यात्रा में सम्मिलित होते हैं। नीलमत में इसका उल्लेख है : खेडः शपालः रंरीशो लाहुरी लेदिरस्तथा । रैडिश्च फरडाडश्च जयन्ताश्च समन्ततः ॥ 887 : १०५७ (२) अग्रहार : यह एक प्रकार की जागीर थी। किसी राजा की ओर से ब्राह्मणों के निर्वाहार्थ भूमि दान को अग्रहार कहते थे। अग्र का अर्थ प्रथम आहार एवं भोजन है। सर्व प्रथम भोजन के लिए दिया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है। भूमि, क्षेत्र अथवा ग्राम की आमदनी किसी परिषद्, मन्दिर, देवस्थान अथवा व्यक्ति को अर्पण किया जाता था।
प्रथम तरंग १२३ कुशेशयाक्षस्तत्पुत्रः प्रतापकुशलः कुशः । कुरुहाराग्रहारास्य दाताऽभूत्तदनन्तरम् ॥ ८८ ॥ कुश ८८. उसके पश्चात् उसका कुशेशयाक्ष प्रताप कुशल पुत्र कुश १ जिसने कुरुहार २ अग्रहार दान किया था राजा हुआ । जागीर देने की वर्तमान प्रथा पुराने अग्रहार प्रथा पर आधारित हैं । मुसलिम, सिख तथा डोंगरा काल में भी यह प्रथा प्रचलित थी । (३) लेवार : लिदर नदी के दक्षिण तटपर वर्तमान ग्राम लिवार है। इसे लेवरा भी कहते हैं। लिदर नदी वितस्ता नदी में अनन्त नाग तथा ब्रिज- ब्रोर के मध्य में मिलती है । वितस्ता की सहायक नदी है । सिंधु उपत्यका के ऊर्ध्वभाग का पर्वतीय जल लाती हैं । नीलमत पुराण में इस ग्राम का उल्लेख है । भूर्जस्वामी हिडिम्बेपु लोमारः श्रीविनायकः । उच्चैकेषु गुहावासी मीमेषु सौमुलस्तथा ॥ 992 : ११९३ जोनराज ने अपनी राजतरंगिणी में लेद्री किंवा लेदरी का उल्लेख किया है । उसका कहना है कि वितस्ता लेद्री, सिन्धु, तथा क्षिप्रिका नदियाँ परस्पर अपने समीपवर्ती ग्रामो एवं भूमिखण्ड को जल प्लावित करने में स्पर्धा करती थीं । ( जो० १०६, १०८) श्रीवर एक युद्ध के प्रसंग में वर्णन करता है । चक्रेश के नेतृत्व में मार्ग पति से चक्रधर की ओर से आकर वामतट से नदी पार कर बादशाह से मिल गये । ( श्लोक : २२२ ) मुझे लेवार, सोलोव ग्राम तथा लोलोव का उल्लेख जोनराज, श्रीवर, शुक की राजतरंगिणियो में नहीं मिला । इन पुस्तकों में नामानुक्रमणिका उपलब्ध न होने के कारण और कठिनाई पड़ी है । निस्सन्देह नीलमत वर्णित लोभार का अपभ्रंश लोहार हो सकता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ८८ में 'कुशेशयाक्षं' का 'कुशेश- याक्ष्यं' तथा 'कुरुहाराप्रहार' का पाठभेद 'कुलर' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८८(१) कुश : राजतरंगिणीकारने लव, कुश का क्रम कश्मीर के राजाओं में एक के बाद दूसरा रखा है। लव निर्वाचित राजा कश्मीर का था। अतएव वह बाहरी व्यक्ति था । राम के पुत्र लव से लवकुश को मिलाना ठीक नहीं होगा। पुराणों के आधार पर लव कुश के भाई तथा उत्तरकोसल के राजा थे । इनकी राजधानी श्रावस्ती थी । (पुराण भागवत ९:११:११; पुराण ब्रह्माण्ड ३:६३:१९८; पुराण वायु ८८:२००) आइने अकबरी में राजा का नाम किरोन तथा राज्यकाल ७ वर्ष दिया गया है । हसन ने राजा का नाम 'कोशिशी' दिया है । राज्य काल १३ वर्ष लिखा है । कुश नाम के कई व्यक्ति हुए हैं । राम के पुत्र कुश थे । कुश के पुत्र अतिथि थे । कुशस्थली को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया था । ( पुराण वायु ८८:१९८, विष्णु पुराण ४:४:४७, भागवत पुराण ६:११:११, मत्स्य पुराण १२:५१; ब्रह्माण्ड पुराण ३१३:१९८।) राम ने उत्तरकोसल का राज्य कुश को दिया था । उसकी राजधानी श्रावस्ती थी । विदर्भराजा के तीन पुत्रों में एक पुत्र कुश का उल्लेख भागवत पुराण ९:२४:१ में आता है । कुश नामक एक जाति का उल्लेख मिलता है । ( ब्रह्माण्ड पुराण ३:७४:१६८; मत्स्य पुराण २७४:७२ ) भागवत पुराण के अनुसार सुहोत्र राजा के तीन पुत्रो में दूसरा कुश था ।
१२४ राजतरंगिणी ततस्तस्य सुतः प्राप रिपुनागकुलान्तकः । भूर्यः शौर्यश्रियः श्रीमान् खगेन्द्रः पार्थिवेन्द्रताम् ॥ ८९ ॥ खगेन्द्र ८९. कुश के पश्चात् उसका पुत्र रिपुनाग कुलान्तक पार्थिवेन्द्र श्रीमान् खगेन्द्र राजा हुआ। यह शौर्यशाली और जननेता था। स खागिखोनमुपयोः कर्ता मुख्याग्रहारयोः । हरहाससितैः कृत्यैः क्रीताँल्लोकान्क्रमाद्ययौ ॥ ६० ॥ ९०. वह खोनमुप' तथा खागी२ अग्रहारों का कर्ता था। शिव के हास तुल्य उज्ज्वल अपने शुभ कर्मों द्वारा उसने स्वर्ग लोक क्रय कर स्वर्ग गमन किया ।
एक दूसरी कुशस्थली अनर्तदेश की राजधानी थी। पुण्यजन नामक राक्षसों ने रैवत राजा के समय इसे लूट लिया था। (पुराण विष्णु ४:१:१९, वायु ८६:२४:२४, भागवत १:१०:२७; ब्रह्माण्ड ३:६१:२०) कुशद्वीप का उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है। कुशमाल समुद्र को कुशद्वीप से मिलाने की चेष्टा की गयी है। अफ्रीका के उत्तरी पूर्वीय तट नुबिया के समीपवर्ती समुद्र को इसकी सज्ञा दी गयी है। (सुपारग जातक भाग ४ पृष्ठ १४०) जम्बूः शाकः कुशः क्रौञ्चः शाल्मलिर्दीप एव च । गोमेधः पुष्करश्चैव द्वीपाः पूज्या पृथक्-पृथक् ॥ 587 : ७०८ कुशपुर किंवा कुशभवनपुर नाम जनश्रुति के अनुसार राम के पुत्र कुश के नाम पर रखा गया है। यह तीन तरफ गोमती नदी से घिरा है। उत्तर प्रदेश में है। कुशावती वर्तमान कुशीनारा अथवा कुशीनगर है। जहाँ भगवान् बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ था। यह मल्लों की राजधानी थी। (जातक ५:२७८; दीघ- निकाय २:१७०) कुश वैदिक साहित्य में कुशा के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। यह सरड़ी अथवा धातु के सूप में भी प्रयुक्त किया गया है। (शतपथ ब्राह्मण २:१; १५:२:२५; ३:१:२:१६; ५:१३:२:७; .
यणो सहिता ४:५:७, तैत्तिरीय ब्राह्मण १:५:१०:१) (२) कुरुहार : वर्तमान कुलर है। लिदर नदी की पश्चिम दिशा में लगभग ४ मील उत्तर लिदर उपत्यका में स्थित है। यह एक बडा गांव है। पण्डित दयाराम कौल का मत है कि यह दक्षिणपुर परगना में है। ८९ (१) खगेन्द्र : आइने अकबरी ने खगेन्द्र का नाम कहेगुन्दर दिया है। खगेन्द्र का अर्थ गरुड़ होता है। हसन ने इसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया है। खगेन्द्र का शाब्दिक अर्थ गरुड होता है। नाग का अर्थ सर्प है। गरुड तथा सर्प में वंशपरम्परागत शत्रुता है। गरुड़ सर्प किंवा नाग का संहार करता है। कल्हण ने वही उपमा यहाँ दी है। गरुड खग अर्थात् पक्षियों का राजा है। तात्विक दृष्टि से खगेन्द्र ज्योति तथा नाग तम के प्रतीक है। ज्योति एग तम अर्थात् अन्धकार एवं प्रकाश का संघर्ष ही खगेन्द्र एवं नागों का चिरकालीन संग्राम है। खगेन्द्र जिस प्रकार पक्षियों का नेता है। उसी प्रकार मानव नामधारी खगेन्द्र जनता का नेता है। गरुड़ विष्णु का वाहन है। वेगवान् है। शौर्यशाली है। इस प्रकार गरुड़ के नाग विध्वंसक, तथा नेतृत्व, एवं शौर्य की तुलना मानवीय खगेन्द्र से कल्हण ने की है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९० में ' मिलता है।
प्रथम तरंग १२५ अनर्घमहिमा दीर्घमघवृत्ताद्वहिष्कृतः । अथ साश्चर्यचयोऽभूत् सुरेन्द्रस्तत्सुतो नृपः ॥ ९१ ॥ सुरेन्द्र ९१. उसके पश्चात् उसका पुत्र सुरेन्द्र१ राजा हुआ । वह पापों से बहुत दूर था। उसमें असीमित महत्ता थी । उसके कार्यों से जगत् आश्चर्यित था । पादटिप्पणियाँ : ९० (१) खोनमुप : यह प्रसिद्ध वर्तमान ग्राम खनमोह है। पाम्पुरके उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम लगभग ३ मील पर है। यह केशर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। विक्रमांकदेवचरित के लेखक कवि विल्हण की जन्म-भूमि है। (वि० १८.७०:७) विक्रमादित्य त्रिभुवन मल्ल ने कल्याण में सन् १०७६ से ११२७ ई० तक राज्य किया था। यहाँ के मन्दिरों को मुस्लिम जियारत में परिणत कर दिया गया है। विल्हण जैसे महान् कवि का यहां स्मारक नही है। यह देखकर दुःख हुआ । स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत की। किसी ने विल्हण का नाम जैसे यहाँ सुना हो नही है। यह नाम उनके लिए अपरिचित सा लगा। इस स्थान की क्यों प्रसिद्धि है किसी को कुछ मालूम नही। प्राचीन इतिहास लोग भूल गये हैं। श्रीनगर जाने वाली सड़क के वार्ड तरफ सटा एक नाग है। सड़क के नीचे पुश्ता बांधा गया है। सड़क के एक ओर उठता पहाड़ है। दूसरी तरफ नीचे के कुण्ड बने हैं। सड़क के पुश्ता के लगभग १५ फुट नीचे चोखटा कुण्ड बनाया गया है। जल सडक के नीचे नली से सरोवर होकर कुण्ड में पहुँचता है। जल दूसरी तरफ वाली पहाड़ी से आता है। जलस्रोत का जल उपयोगी बनाने के लिये दो कुण्ड चोकोर बने हैं। पहला कुण्ड सड़क के पुश्ता से सटा है। उसके दक्षिण कोण पर कुछ शिवलिंग तथा ठोस मन्दिराकार शिलाखण्ड रखे हैं। दूसरे कुण्ड में उतरने के लिए सीढ़ियां नाग की बाईं तरफ से बनी हैं। उन सीड़ियों के बाईं तरफ फर्श पर कुछ ठोस शिलाखण्ड मन्दिराकार रखे थे। स्नान करने के लिए एक स्त्री तथा एक पुरुष के लिए लकड़ी के स्नान गृह बने रखे थे। ग्राम की जनता मुसलिम है। मुसलिम स्त्रियां कुण्ड में वस्त्र धो रही थी। कुण्ड का जल गन्दा हो गया था । शहतूत के वृक्ष आस पास काफी हैं। बादाम के पेड़ इस ओर बहुत मिलेंगे। बादाम के बाग, शालो तथा केशर यहाँ की मुख्य कृषि है। स्थान रम्य है। ग्रामीण जनता सरल तथा भावुक है। कुण्ड के दक्षिण पार्श्व के बाग में मसजिद तथा जियारतें हैं। (२) खागी : वर्तमान ग्राम खाडा है। यह एक बड़ा ग्राम है। वोरू परगना में है। इसका उल्लेख रा० त० १:३४० में पुनः किया गया है। गोपा- दित्य ने खोंगिका अग्रहार स्वरूप इसका दान किया था। हैदर मलिक तथा नारायण कोल के इतिवृत्त के अनुसार काकपुर ग्राम है। यह ग्राम पाम्पुर के ऊपर स्थित है। उसे खागो कहा गया है। परन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। खागी से ३६ मोल उत्तर एक शैलबाहु बाहर निकला है। इसे पोष्कर कहते हैं। यह पीर पंजाल पर्वतमाला से मैदान की तरफ निकलता है। इसके पूर्व छोर पुष्कर नाग है। नीलमत तथा माहात्म्यों में इसकी संज्ञा तीर्थ की दी गयी है। लोग यहाँ की यात्रा करते हैं। कशमीर में कई पुष्कर तीर्थों का वर्णन है। एक सुरेश्वरी तीर्थ से सम्बन्धित सम्भवतः फाक में था।
१२६ राजतरंगिणी
९१ ( १ ) सुरेन्द्र : आइने अकबरी में सुरेन्द्रिर नाम दिया गया है । सुरेन्द्र का अर्थ इन्द्र होता है । हसन ने इसका शासन-काल ४७ वर्ष लिखा है । मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि राजा की एक कन्या सतपनभानु थी । यह अत्यन्त सुन्दरी थी । उसकी सुन्दरता, यौवन तथा शालीनता की ख्याति सुनकर इफन्दियर का पुत्र बहमन उस पर मोहित हो गया । उसने भानु से विवाह कर लिया । अरदिशीर दिरजदेस्त के नाम से ईरान का बादशाह हुआ । वैदुद्दीन इतिहासकार के अनुसार—यह सम्बन्ध सुखकर नहीं हुआ । राजपुत्री के पिता, कश्मीर के राजा सुरेन्द्र के सम्बन्ध में बादशाह ने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया । काश्मीर राजपुत्री की प्रेरणा पर बहमन मार डाला गया । हसन एक और विचित्र कहानी पेश करता है- 'राजा सिर्फ एक लड़की रखता था । कनालू नामी जो शक्ल व सूरत और इल्म व फन में मशहूर रोजगार थी । एक दिन एक ईरानी नाजिर कीमती जवाहरात लेकर बराए फरोख्त राजा की खिदमत में हाजिर हुआ । नावाकफियत की वजह से राजा को इनमें से एक भी पसन्द न आया । जिससे बेचारा बहुत ही शिकस्त- दिल हुआ । इन्तहाई मायूशी के पेशनजर नाजिर मजकूर कनालू की खिद- मत में गया । कनालू जो हर शनास थी, लेहाजा उसने एकदम तमाम जवाहरात ताजिर से खरीद लिए । 'वापसी पर सौदागर ने इस लडकी के हुस्न व जमाल और सलीफः की तारीफ अपने मुल्क के बादशाह बहमन असफंदयार से की । असफंदयार लडकी ना नादीदः आशिक हो गया । हकीम तानास्य को ख्वास्तगारी के लिए राजा के पास भेजा । राजा ने कनालू की मरजी को मुताबिक बहमन की दरखास्त मंजूर की और कीमती तोहफे व तहायफ के साथ अपनी लडकी उसके रजायी भाई लोलो हमराह बहमन के पास भेज दिया । बहमन पारजानी के साथ दाद ऐश देने में मशरूफ था कि कुछ वरष बाद अपने बीबी के रजाई भाई लोलो की गद्दारी से इस दुनिया से रुखसत हो गया । लोलो भी अपने फेल बद की सजा भुगतने से न बच सका । हसन का बयान किसी आधार पर आधारित नहीं है । विल्कुल बनावटी है । कश्मीर में मुसलिम शासन स्थापित होने पर बहुत से मुसलिम इतिहास- कारों ने कश्मीर का सम्बन्ध गैर हिन्दुस्तानी देशों से जोड़ने तथा हिन्दुओं को नीचा दिखाने का प्रयास किया है । उसी का यह एक नमूना है । कल्हण स्पष्ट लिखता है कि राजा सुरेन्द्र सन्तानहीन था । यदि हसन तथा मुसलिम इतिहास लेखकों की बात मान ली जाय कि राजा की एक कन्या थी और उसका विवाह ईरान के राजा से कर दिया गया था तो यह स्वाभाविक था कि कश्मीर मण्डल के राज्य का उत्तराधिकारी उसकी कन्या अथवा कन्या की सन्तान होती । ईरान का राजा तथा कश्मीर की राजकुमारी अपने अधिकार का अवश्य दावा करती । यदि राजकुमारी का पति उसकी अनुमति से मार डाला गया था तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि राजकुमारी का ईरान के राजनीतिक जीवन में प्रभाव था । अन्यथा राजा के वध-षड्यंत्र में सम्मिलित तथा सफल नहीं होती । राजा के वध के पश्चात् उसका ईरान की राजनीति में प्रवल हाथ होता । वह अपने निःसन्तान पिता का राज्य लेने का अवश्य प्रयास करती । किसी मुसलिम इतिहास- कार ने राजकुमारी का मारा जाना नहीं लिखा है । केवल हसन ने लिखा है कि राजपुत्री के रजाई अर्थात् धात्री भाई न ईरान के राजा की हत्या की और वह मारा गया । इसका एक दूसरा पहलू है । कल्हण कहता है । सुरेन्द्र का राज्य दूसरे कुल में चला गया । ऐसी स्थिति में राजा सुरेन्द्र अपनी एक मात्र सन्तान
प्रथम तरंग १२७ शतमन्युः शान्तमन्योगो॑त्रभिद्रोत्ररक्षिणः । लेभे यस्य सुरेन्द्रस्य सुरेन्द्रो नोपमानताम् ॥ ९२ ॥ ९२. इन्द्र सुरेन्द्र १ की इस सुरेन्द्र से तुलना नहीं हो सकती क्योंकि सुरेन्द्र शतमन्यु अर्थात् शतक्रोधी था और सुरेन्द्र शान्त मन्यु अर्थात् शान्त क्रोध था। यह सुरेन्द्र गोत्र अर्थात् पर्वत रक्षक था और वह सुरेन्द्र गोत्रभिद् अर्थात् पर्वत संहारक था। कश्मीर के बाहर विदेश नहीं भेजता। कश्मीर में हिन्दू धर्म का प्रभाव था। सुरेन्द्र स्वयं धार्मिक राजा था। उसके लिए यह संभव नहीं हो सकता था कि वह अपनी एक मात्र सन्तान का विवाह एक विधर्मी से कर देता। ईरान के राजा ने उस पर आक्रमण नही किया था। एक सौदागर के कहने और एक हकीम से संदेश सुनकर, राजपुत्री को विवाह के लिए भेज देना तर्क सम्मत नही मालूम होता। यदि वह अपनी कन्या का विवाह करना स्वीकार करता तो दो राज्यों के विवाह सम्बन्ध के अनुसार पिता किंवा वर स्वयं एक दूसरे के यहाँ आकर करते। कश्मीर मण्डल के चारो ओर हिन्दू राज्य था। कन्या के लिए वर मिलना कठिन नहीं था। राजा सुरेन्द्र अपना राज्य कैसे दूसरे कुल में, अपनी कन्या ईरान के राजा को देकर, जाना पसन्द करता, कुछ बात दिमाग में बैठती नहीं। हसन अथवा मुस्लिम इतिहास- कारों के दिमाग में मुस्लिम काल की बातें याद आई होंगी। जहाँ लड़कियाँ छोटे राजाओं के यहाँ से खूबसूरती की शोहरत सुनने पर मँगा ली जाती थी। उनका धर्म परिवर्तन कर विवाह कर लिया जाता था। यह सब मनगढ़न्त और इतिहास पर दूसरा रंग देने का विचित्र प्रयास किया गया है, जो कल्पना तथा मानव-प्रवृत्ति के परे की बात है। (२) दीर्घवहिष्कृतः—इसका श्री स्टीन ने दो प्रकार से अनुवाद किया है।—उसका एक अनुवाद उन्होंने किया है—'जिसने कि इन्द्र के राज्य को भी मात कर दिया था—।' पाठभेद : श्लोक संख्या ९२ में 'सुरेन्द्रो नोपमानदाम्' का पाठभेद 'न सुरेन्द्रः समानताम्' तथा 'यस्य' का 'तस्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८२(१) सुरेन्द्र—सुरेन्द्र का अर्थ यहाँ इन्द्र है। दोनों सुरेन्द्रों के आचरणों की तुलना कल्हण ने की है। उसने राजा सुरेन्द्र को 'शान्तमन्यु' अर्थात् शान्त क्रोध और इन्द्र को 'शतमन्यु' अर्थात् 'सैकड़ों से क्रुद्ध' कहा है। इन्द्र को पर्वत नाशक अर्थात् गोत्रभिद् और सुरेन्द्र राजा को गोत्र रक्षक अर्थात् पर्वत का रक्षक कहा है। कश्मीर मण्डल पर्वतीय क्षेत्र है। पर्वत द्वारा आवृत है। अतएव कल्हण ने सुरेन्द्र को पर्वतीय कश्मीर का रक्षक कहा है। उत्तर वैदिक साहित्य में वर्णन है। पर्वतों को पंख होते थे। वे उड़ते थे। एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़कर बैठ जाते थे। जनता तथा भूमि नष्ट हो जाती थी। इन्द्र ने पर्वतों का पंख काट दिया। उस समय से पर्वतों का उड़ना बन्द हो गया। पूर्व वैदिक साहित्य के अनुसार इन्द्र को गोत्रभिद् कहा गया है। वैदिक कथानक के अनुसार गोत्रपर्वत का भेद किया था जिससे जल मुक्त होकर निकला। इन्द्र का निवासस्थान स्वर्ग है। राजधानी अमरा- वती है। नन्दन उद्यान है। ऐरावत श्वेत हाथी है। अश्व उच्चैः श्रवा है। सारथि मातलि है, धनुष शक्र- धनुष है। तलवार का नाम पेरेज है। क्षत्रिय राजाओं की उपमा प्रायः इन्द्र से दी जाती है। भारतीय राजतन्त्र का सिद्धान्त इन्द्र की कल्पना पर आधारित है। इन्द्र स्वर्ग का राजा है। पृथ्वी का राजा क्षत्रिय है, मनुष्य है। अतएव इन्द्र की तुलना पृथ्वो के श्रेष्ठ राजाओं से की जाती है।
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१२८ राजतरंगिणी दरद्देशान्तिके कृत्वा सोरकाख्यं स पत्तनम् । श्रीमान्बिहारं विदधे नरेन्द्रभवनाभिधम् ॥ ९३ ॥ ९३. उसने दरद देश १ के समीप सोरक २ नामक पत्तन बसाया और उस श्रीमान् ने ३ नरेन्द्र भवन विहार का निर्माण कराया । तेन स्वमण्डलेऽखण्डयशसा पुण्यकर्मणा । विहारः सुकृतोदारो निर्मितः सौरसाभिधः ॥ ९४ ॥ ९४. उस अखण्ड यशशाली पुण्यकर्मा राजा ने अपने मण्डल में सौरस १ विहार की स्थापना की जो सुकृत तथा उदारता के लिये प्रसिद्ध था । यहाँ कल्हण ने सुरेन्द्र शब्द का अच्छा निर्वाह किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ९३ में 'सोरकाख्यं' का पाठभेद 'सरोकाख्यं' तथा 'सौरसारव्यं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ . ९३ (१) दरद देश : इसका वर्णन प्राचीन ग्रन्थों में आता है । यह अंचल कश्मीर का आज भी एक भाग है। कश्मीर प्रदेश के उत्तर में है। इसको दर्दस्तान कहते हैं। जातकों में इसकी स्थिति हिमवा अर्थात् हिमालय में बतायी गयी है। हिमालय की शाखा हिन्दुकुश में है । मार्कण्डेय पुराण में दर्दुर पर्वत का उल्लेख है। इस अंचल के पर्वत को दर्दुर कहा जाना ठीक है। यूनानियों ने दरदाई नामक जाति का उल्लेख किया है। जातकों में उपचर के पाँचवें पुत्र के दद्दरपुर नगर बसाने का उल्लेख मिलता है। ( चेतिय जातक : जातक भाग १:६७ ३:१५-१६ । विशेष परिशिष्ट दरद जाति में देखिये ) । (२) सोरक : दरद अर्थात् दर्दस्तान के साथ कल्हण के स्वमण्डल शब्द के प्रयोग से प्रतीत होता है कि यह स्थान कश्मीर के बाहर था। इस स्थान का पता अभी तक नहीं लग सका है। एक मत है कि दर्दस्तान की सीमा पर वह स्थान है । (३) नरेन्द्र भवन : कल्हण ने भवन शब्द का प्रयोग विहारों के लिए किया है। नरेन्द्र-भवन-सुह्य स्पंद भवन, अमृत भवन, मोराक भवन आदि विहारों का वर्णन मिलता है। भवन शब्द का साधारण अर्थ निवास स्थान होता है । सोरक तथा नरेन्द्र भवन विहार स्थानों के विषय से निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये कहाँ थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ९४ में 'सुकृतोदारः' का पाठभेद 'स्वकृतोदारे' और सुकृतोदारे' तथा 'सौरसाभिधः' का पाठभेद 'सौरसाभिध'' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९४ (१) सौरस : पंडित पी० गोविन्द कौल ने सौरस विहार का स्थान वर्तमान ग्राम सुरस बताया है । यह नागाम परगना के संगरफेद ( छतस्कनी ) पर स्थित है । यह स्पष्ट है कि नाम सौरस स्थान का सुरस शब्द की व्युत्पत्ति के आधार पर रखा गया है । (२) विहार स्थापना : विहार शब्द का राजतरंगिणी एवं कश्मीर के इतिहास में यहाँ प्रथम बार उल्लेख मिलता है । मालूम होता है कि राजा सुरेन्द्र के समय बौद्ध धर्मावलम्बी कश्मीर में आए और राजा ने उस धर्म की ओर आकर्षित होकर विहारों की स्थापना की थी। विहार की स्थापना भिक्षुओं के लिए की जाती है । अतएव यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बौद्ध धर्म के प्रचारक कश्मीर मंडल में पहुँच चुके थे । उनका प्रभाव कश्मीर में बढ रहा था ।
प्रथम तरंग. १२९ तस्मिन्निस्सन्ततौ राज्ञि प्रशान्तेऽन्यकुलोद्भवः । बभार गोधरो नाम सम्भूधरवरां धराम् ॥९५॥ गोधर ९५. राजा सुरेन्द्र जब सन्तान हीन स्वर्ग गमन किया तो अन्य कुलोद्भव गोधर१ राजा हुआ । उसने सुरम्य पर्वतों सहित पृथ्वी का भार उठाया । गोधराहस्तिशालारव्यमग्रहारमुदारधीः । म प्रदाय द्विजन्मभ्यः पुण्यकर्मा दिवं ययौ ॥९६॥ ९६. उस उदारधी राजा ने गोधर१ हस्तिशाला२ अग्रहार द्विजन्मों को प्रदान किया और पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग गमन किया । . विहार शब्द रहने तथा कोठरी जिसमें भिक्षु- निवास करते हैं दोनों के लिये आता है । संघाराम के अन्दर अनेक कोठरियां होती है। उनमें एक कोठरी का नाम विहार पड़ता है। मूलगन्धकुटी विहार भगवान् बुद्ध के रहने की कोठरी थी । बौद्ध मठों के लिये कालान्तर में विहार शब्द की संज्ञा दी जाने लगी । विहारों की अधिकता के कारण बिहार प्रदेश का नाम पड़ा है। विहार शरीफ एक स्थान पटना से लगभग ३० मिल दक्षिण पूर्व पंचानन नदी पर स्थित है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९५ में 'वरां धरां' का पाठभेद 'वसुन्धराम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९५ (१) आइने अकबरी में गोधर नाम दिया गया है । हसन इस राजा का राज्य-काल ३२ वर्ष देता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ९६ में 'गोधराह' का पाठभेद 'गोधरोह' तथा 'गोधर अस्ति हिल्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९६ (१) गोधरं दिवसर परगना के वर्तमान ग्राम गोधर, अस्तेल प्राचीन गोधर तथा हस्तिशाला अग्रहार हैं । गोधर विशोका नदी के तट पर ग्राम है । यह विशोका में मिलने वाली स्थानीय नदी १७ गोदावरी के संगम पर है। गोदावरी माहात्म्य में गोदर नाम से गुदर ग्राम का उल्लेख पाया है। उसे गोदावरी उद्भव गया से सम्बन्धित करता है। अस्मिन् गिरौ महादेवी गौतमेन महात्मना । गौर्वा विदारिता प्रोक्तो गौद्रो गिरिसत्तमः ॥ यह गोदावरी नदी दक्षिणापथ की सबसे लम्बी बड़ी और प्रसिद्ध नदी नहीं है। कश्मीर की साधारण एक स्रोतस्विनी है । नीलमत पुराण में उल्लेख हैं। नदी चित्ररथा पुण्या भृगनन्दा भृगा तथा । गोदावरी वैतरणी तथा मन्दाकिनी शुभा ॥ १२५४ : १४६६, १४६७ गोदावरी माहात्म्य में उल्लेख आता है । यस्मिन्गिरौ महादेवि गौतमेन महात्मना । कृत्या गौर्दारिता प्रोक्तो गोदरः सः गिरिर्महान् ॥ यस्मिन् ग्रामे गोद्राख्यः पर्वतः संप्रतिष्ठितः । स ग्रामो प्रथितः क्वापि गोदराख्यो महेश्वरि ॥ गौर्वा विदारिता यत्रोत्थिता गंगा जलोच्छिता । सैव गोदावरी नाम गंगा परमपावनी ॥ (रघुनाथ मंदिरजम्मूः सं० ३६६४।३६ बी०) थ्तीन यहाँ आये थे । उन्हें यहाँ के मियां, जागीरदार तथा स्थानीय पुरोहितों से मालूम हुआ था कि एक जनश्रुति प्राचीन काल से सुनाई पड़ती चली आती है कि इस स्थान पर राजा गुदर ने एक नगर
१३० राजतरंगिणी तस्य सूनुः सुवर्णाख्यस्ततोऽभूत्स्वर्णदोऽर्थिनाम् । सुवर्ण सुवर्णमणिकुल्यायाः कराले यः प्रवर्तकः ॥६७॥ ९७. उसके पश्चात् य.चकों का सुवर्ण१ दाता उसका पुत्र सुवर्ण राजा हुआ। उसने कराल२ में सुवर्ण मणि कुल्या३ लाया।
बसाया था। यहाँ कोई ध्वंसावशेष नही मिलता। बड़ा नगर आबाद होने योग्य स्थान नहीं है। सम्भव है प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक उथल-पुथल में उनका प्राचीन रूप नष्ट हो गया तथा बचे-खुचे ध्वंसावशेषों का उपयोग वही ओर हो गया हो। (२) हस्तिशाला : गुदर से लगभग १ मील उत्तर-पूर्व विशांका नदी के बलुए द्वीप पर हस्तिशाला स्थित है। इसे अस्ति हेल कहते हैं। मालूम होता है कि हेलराज द्वारा उल्लिखित राजा गोधर के कारण कल्हण तथा पद्ममिहिर का ध्यान इस ग्राम की ओर गया होगा। यहाँ गोधर राजा सम्बन्धी कुछ गाथा प्रचलित है। गोधर का अर्थ होता है। गाय का स्थान गोशाला। ६७(१) सुवर्ण : आइने अकबरो सुरेन नाम देती है। हसन लिखता है कि सन् ११६६ क० में राजा सुवर्ण गद्दी पर बैठा। उसने आडोन का परगना आबाद किया। राज्य-काल ३५ वर्ष कहता है। (२) कराल : जोन राज (८६१-६२) तथा श्रीवर ने (३:१९४) अपनी राजतरंगिणियो में कराल का उल्लेख किया है। वहाँ बडशाह जैनुल आबदीन ने जैनपुरी परगना कराल विषय मे बसाया था। जैनपुरी (दत्त ४७,२४८) वर्तमान जैनपुर है। यह अद्विन अर्धवन परगना की अधित्यका में रामब्यार नदी के दक्षिणी क्षेत्र का बाधक है। यही क्षेत्र कराल है। हैदर मलिक ने भी राजा सुवर्ण के कार्य स्थान का सम्बन्ध इससे जोड़ा है। (३) सुवर्ण मणि कुल्या : कुल्या शब्द वैदिक है। ऋग्वेद में यह उस नहर के लिए व्यवहृत किया गया है जो किसी शोल किंवा हृद में गिरती अथवा मिलती है। (ऋग्वेद ३:४५:३; १०:४३:७;)
कश्मीर की अनेक कुल्याएं इन लेक तथा उत्तर लेक में मिलती हैं या उनसे निकाली गयी हैं। पुराणों में मुल्या का उल्लेख मिलता है : त्रिसामा ऋषिकुल्या च इक्षुला त्रिदिवा च या । लांगलिनी वंशधरा महेन्द्र-तनया स्मृता ॥ ऋषिकुल्या कुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी । क्रिया पलाशिनो चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ॥ त्रिसादा ऋषिकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः । ऋषिकुल्या कुमारांद्याः शुक्तिमत्पादसम्भवाः ॥ मार्कण्डेय पुराण में 'पितृ सामपि कुल्पा; 'वायु पुराण में 'त्रिसामा ऋषिकुल्या,' 'त्रिसामा ऋतु कुल्या,' ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिमामा ऋषिकुल्या,' विष्णु पुराण में 'त्रिसामा ऽचार्यकुल्यायाः,' 'ऋषि कुल्या कुमार्याद्या', ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिसाग्य- ष्टाष्टि कुल्याया,' 'त्रिमाया ऋषिकुल्याया' तथा 'ऋषिकुल्या कुमाराया' का उल्लेख आया है। कूर्म पुराण में 'ऋषिकुल्या त्रिसामा', मत्स्य पुराण में 'त्रिभागा ऋषिकुल्या' का उल्लेख मिलता है। ऋषिकुल्या नामक एक धारा बरहमपुर के दक्षिण पूर्वी रेलवे स्टेशन पर स्थित गंजाम जिला उत्कल प्रदेश के समीप बंगाल की खाडी में गिरती है। एक दूसरी ऋषिकुल्या और धारा है। उसे छोटा नागपुर में कोइल कहते हैं। कुल्या का अपभ्रंश कोइल हो गया। तीसरो ऋषिकुल्या गंगा की एक सहायक नदी कियुल है। कियूल शब्द भी कुल्या शब्द का अपभ्रंश है। कुल्या शब्द वैदिक काल से अब तक जलधारा के लिए मुख्यत. वे धाराएं जो जल सिंचन निमित्त निकाली गयी है, प्रयुक्त होता रहा है। नाला शब्द
प्रथम तरंग १३१ तत्सूनुर्जनको नाम प्रजानां जनकोपमः । विहारमग्रहारं च जालोराख्यं च निर्ममे ॥९८॥ जनक । ९८. प्रजागण के लिये जनक तुल्य उसका पुत्र जनक¹ राजा हुआ । उसने जालोर² विहार तथा अग्रहार निर्मित किया । शचीनरस्तस्य सूनुः क्षितिं क्षितिशचोपतिः । ततः श्रीमान्क्षमाशीलो ररक्षाऽक्षतशासनः ॥६६॥ शचीनर ९९. उसके पश्चात् उसका पुत्र शचीनर¹ जो पृथ्वी पर शचीपति तुल्य था, पृथ्वी की रक्षा किया । उस श्रीमान् क्षमा शील के शासन का कोई स्वेच्छया उल्लंघन नहीं करता था । कुल्या के तत्सम रूप से प्रयुक्त होता है । कुल नाला के लिए व्यवहार किया गया है। सम्भव है किसी रूप में कुल्या का अपभ्रंश नाला शब्द हो गया है । नलिका शब्द छोटी धारा के लिए प्रयुक्त किया गया है । नलिका का अपभ्रंश नाली है । ऋषिकुल्यामासाद्य देवकुल्यां तथैव च । अश्वतीर्थं प्रभासं च वारुणं तीर्थमेव च ॥ 1316 : १५३० सुवर्ण मणि कुल्या को स्वर्णमय नादो कहते हैं । यह वर्तमान सुनमन् कुल है। जैनपुरी अधित्यका के पूर्वीय अंचल में निल्लू, परगम, कुजुरू, आदि गाँवों में बीम मिल बहती आदयिन गांव से थोड़ी दूर पर विशोका अर्थात् विसावू नदी में पुनः मिल जाती है। यह विशोका नदी से ही लागू ग्राम के समीप निकाली गयी है । ९८ (१) जनक : आइने अकबरी ने जन्नेक नाम दिया है। वैदुद्दीन इतिहासकार कहता है कि जनक ने अपने पुत्र को ईरान पर आक्रमण करने के लिए भेजा । उस समय ईरान का राजा होमार्द्र था । वहमन के पुत्र दरब द्वारा आक्रमणकारी राजपुत्र मार डाला गया । (२) जालोर : हसन ने जालोर तथा जालोर बाग का दान देना लिखा है। विहार का अर्थ उसने गांव लगाया है। यह गलत है। हसन को इतना भी ऐतिहासिक ज्ञान नहीं है कि विहार बौद्धों के देवस्थान को कहते हैं । यदि रत्नाकर पुराण से अथवा अन्य किसी ग्रन्थ से यह लिया गया है तो विहार का अर्थ सर्वदा बौद्ध स्थान के रूप में किया गया है। इस राजा का राज्य-काल वह ३२ वर्ष देता है । पं० गोविन्द कौल जालोर को वर्तमान ग्राम जोलुर बताते हैं। यह जैनगिर परगना में है। हैदर मल्लिक 'जालुर:' को 'विहू' अर्थात् 'वोहों' परगना में होना बताते हैं। इस पर कुछ और अन्वेषण की आवश्यकता है । ९९ (१) शचीनर : आइने अकबरी में नाम सजोनीर दिया गया है। हसन ने राजा शचीनर का राज्य-काल ४० वर्ष दिया है। यह केवल अनुमान है। वैदिक साहित्य में शची शब्द का प्रयोग शक्ति, सामर्थ्य के अर्थ में किया गया है । इंद्र का नाम शचीपति है। यहाँ शचीपति का शाब्दिक अर्थ होगा इन्द्र । (ऋग्वेद १:१७:४. १:६२:१२; १:१०३:२; १:१०९:७, ३:६० ६ शाखायन गृह्यसूत्र १:१२, वाजसनेयि संहिता १९:८१ तथा ऐतरेय ब्राह्मण ७:३३ ) । कल्हण ( तरंग ८:३४११ ) ने शचीनर की माता का नाम शची दिया है ।
१३२ राजतरंगिणी राजाग्रहारयोः कर्त्ता शमाङ्गाशानारयोः । सोऽभूदपुत्रः सुत्रामविष्टरार्धसमाश्रयी ॥१००॥ १००. यह राजा राजकीय अग्रहार शमांगासा तथा शनार की स्थापना किया। राजा निःसन्तान था उसने इन्द्र का आधा सिंहासन प्राप्त किया । प्रपौत्रः शकुनेस्तस्य भूपतेः प्रपितृव्यजः । अथावहदशोकाख्यः सत्यसन्धो वसुंधराम् ॥१०१॥ अशोक १०१. तत्पश्चात् सत्यसंध १ अशोक २ जो भूपति के प्रपितृव्य तथा शकुनी ३ का प्रपौत्र था, वसुंधरा पर राज्य किया । १०० (१) समांगासा : यह वर्तमान सामत ग्राम है। यह एक बड़ा ग्राम है। कोठार अथवा कुठहार परगना के अरपथ नदी के वाम तट पर स्थित है । हैदर मलिक लिखता है 'शमाल काश' नामक गाव कुटहार परगना मे राजा ने बसाया था । समानासा का उल्लेख पुनः कल्हण ने रा० तं० ८:६५ में किया है । (२) शनार : वीही परगना में शार नाम ग्राम है। यह रन्भू के दक्षिण पूर्व एक भील पर होगा । हैदर मल्लिक के अनुसार राजा शचीनर ने वीही परगना में 'शरार' ग्राम आबाद किया था । शार लोहे के कारवार का केन्द्र था । सार का अर्थ लोहा होता है । यह पूर्व काल में लोहा बनाने का केन्द्र था । स्टोन ने यहा की यात्रा सन् १८९१ में की थी । यहाँ के गाँव के मध्य की जियारत 'ख्वाजा खिज़्र' में प्राचीन ध्वस्तावशेष के विशाल पत्थर लगे हैं। यह जियारत सन् १५८० ई० की बनी है। एक नाग अर्थात् निर्भर के समीप कुछ अलंकृत स्तम्भ पड़े हैं। श्री वाइने ने अपने यात्रा-वर्णन (ट्रेवेल्स २:३५) में इसका उल्लेख किया है । हसन ने शनार को शारदा गांव माना है । १०१ (१) सत्यसंध का अर्थ होता है सत्य- प्रतिज्ञ, सत्यवादी, सत्य संकल्प, वचन पालक तथा ईमानदार । निःसन्देह अशोक सच्चरित्र था । सत्य- प्रिय था । सत्य प्रतिज्ञ था । मालूम होता है । कल्हण के समय अशोक नाम से सम्बन्धित प्रसिद्ध विशेषण 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी' जनता विस्मृत कर गयी थी । सम्भव है अशोक कालीन लिपि, भाषा तथा पालि भाषा विज्ञ उस समय कोई नहीं रह गया था । अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक स्वल्प किंवा प्रचुर सामग्री कल्हण को नही प्राप्त थी । अतएव उसने विस्तार के साथ अशोक जैसे महान् राजा के विषय में नहीं लिखा है । अशोक का जन्म ईसा पूर्व २९७ में हुआ था । वह सिंहासन पर ईसा पूर्व २७२ में बैठा । उसकी मृत्यु ईसा पूर्व २३२ मे हुई थी । इस प्रकार कल्हण और अशोक के काल में १३८० वर्षों का अन्तर पड़ता है । कल्हण के समय देवानाम् प्रिय एवं प्रियदर्शी विशेषण लोग भूल गये थे । कल्हण ने अशोक जैसे सम्राट् का राज्य काल एवं समस्त वर्णन केवल ७ श्लोकों ( १ : १०१-१०७ ) में समाप्त कर दिया है । स्पष्ट है कि उस समय कश्मीर में अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध नहीं थी । उसके निर्मित चैत्य, विहार जिन पर पालि भाषा तथा ब्राह्मी लिपि आदि में शिलालेख अंकित रहे उनका पढ़ना तथा अर्थ लगाना लोग भूल गये थे । अन्यथा अशोक द्वारा निर्मित विहारो, चैत्यों
प्रथम तरंग १३३ एवं स्तूपों के स्थान, कालादि के वर्णन द्वारा कल्हण अशोक का पूर्णतया वर्णन करता । उनके कारण इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ता । यदि कश्मीर में अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती तो कल्हण जैसी पैनी दृष्टि वाला इतिहास लेखक, इस प्रकार की दुर्लभ सामग्रियों की उपेक्षा नहीं कर सकता था । तथापि सत्यसंध शब्द देवानाम् प्रिय तथा प्रियदर्शी से कम महत्त्व नहीं रखता । सम्भव है इस विशेषण का उल्लेख किसी भूगर्भ स्थित शिला- लेखादि में कभी प्राप्त हो जाय । यह भी सम्भावना हो सकती है । कश्मीर के किसी शिलालेख किंवा ग्रन्थ में अशोक के नाम के साथ सत्यसंध विशेषण लगा कल्हण को मिल गया हो, जो अब लुप्त हो गया है । मुझे इसकी सम्भावना अधिक मालूम होती है । कल्हण ने अपने पूर्व इतिहासकारों के अशोक सम्बन्धी उल्लेखों से लेखन सामग्री प्राप्त की थी । शिलालेखादि यदि मिला होता, उन्हें पढ़ लिया होता और अशोक जैसे महान् सम्राट् पर उन आलेखों के आधार पर बहुत कुछ लिखता । कल्हण ने स्वयं लिखा है । उसने तत्कालीन प्राप्त शिलालेखों आदि का अध्ययन किया था । उनके आधार पर इतिहास लिखा था । अतएव अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों, स्तूपों तथा चैत्यों के अभिलेखों पर अशोक का प्रसिद्ध विशेषण, देवा- नाम् प्रिय मिलना सम्भव था । क्योंकि अशोक के समस्त साम्राज्य में लिखने की यह शैली प्रचलित थी । कल्हण ने स्तूपों, चैत्यों तथा स्तम्भों के आलेखों का अपनी इतिहास सामग्री में उल्लेख नहीं किया है । उन्हें अपना स्रोत नहीं माना है। उनकी गणना अपने इतिहास सामग्री में नहीं की है । कल्हण से सात शताब्दी पूर्व हुएनसांग ने भारत की यात्रा की थी । उसके समय में बुद्ध धर्म ह्रास की ओर कश्मीर में था । यही प्रतिक्रिया समस्त भारत- वर्ष में हो रही थी । कश्मीर उसका अपवाद नहीं था । हुएन सांग स्वयं लिखता है। कश्मीर में किसी एक धर्म विशेष की ओर जनता की आस्था नहीं थी । कश्मीर में सनातन धर्म एवं शैव सिद्धान्त की प्रबलता उत्तरोत्तर होती गयी । लोग भारतवर्ष के समान कश्मीर में बुद्ध धर्म को बारहवीं शताब्दी में प्रायः भूल चुके थे । कश्मीर में कुछ उत्सव बुद्ध धर्म सम्बन्धी पूर्व काल से होते चले आये थे । वे किसी रूप में कुछ होते रहे । वे पूर्व काल की केवल धुँधली स्मृति मात्र थे । कश्मीर के राजा नव निर्माण निमित्त पुरानी सामग्रियों का भी उपयोग करते थे । मन्दिरों, चैत्यों, स्तूपों, मठों, शाला तथा विहारों के ध्वंसावशेषों, शिलाखण्डों, पत्थरों, ईंटों का प्रयोग मुक्तहस्त करते थे । भारत में भी सारनाथ के धर्मराजिक स्तूप के पूरे स्तूप के ईंटों तथा शिलाखण्डों का उपयोग तत्कालीन काशी के राजा तथा उनके कुटुम्बियों ने किया था। उस विशाल स्तूप की केवल नींव मात्र रह गयी है । भगवान् ने सारनाथ में प्रथम उपदेश किंवा धर्मचक्र प्रवर्त्तन जहाँ किया था वहाँ बहुत बड़ा स्तूप था । वर्तमान धमेक स्तूप जैसा बना था । वह धर्मराजिक स्तूप था । अज्ञान के कारण लोगों ने उसे ईंटों का खदान या पहाड़ समझ लिया था। उस स्तूप में से भगवान् की धातु मिली थी । भ्रम के कारण उसे अस्थि समझ कर गंगा में प्रवाह कर दिया गया था । भारत ही केवल इसका अपवाद नहीं है । इसराइल की यात्रा में मैंने देखा कि क्रूसेड के समय निर्मित गिरजाघरों, उपासना स्थानों तथा प्रासादों में लगे स्तम्भों तथा पत्थरों का उपयोग 'केसरिया' (हैफा के समीप ) के बन्दरगाह तथा घाटों के बनाने में किया गया था । भारत में इसी प्रकार
१३४ राजतरंगिणी
मन्दिरों को खण्डित कर उनके पत्थरों से मसजिद तथा जिमारत बनाना साधारण बात हो गयी थी । काशी विश्वनाथ का मन्दिर, मथुरा तथा अयोध्या का जन्म स्थान, महरौली दिल्ली में विष्णु पर्वत पर, विष्णु मन्दिर के स्थान पर, कुतुबमीनार तथा मसजिद, कूबते इसलाम आदि का बन जाना अनेक उदाहरण हैं । कश्मीर में राजाश्रय न मिलने के कारण बुद्ध धर्म तथा उससे सम्बन्धित इमारतों की उपेक्षा हो गयी । बुद्ध धर्म के प्रति रुचि न होने के कारण तत्स- म्बन्धी धार्मिक स्थान क्षीणता को प्राप्त होते होते सुप्त हो गये । कल्हण अशोक के १६ शताब्दी पश्चात् हुआ था । इतने लम्बे काल तक बिना जीर्णोद्धार किंवा मरम्मत के किसी भी रचना का कायम रहना कठिन था । कश्मीर का प्रत्येक राजा किंवा रानी अपने काल में अपने नाम से किसी न किसी नवीन इमारत की रचना अपना नाम कायम रखने के लिए करता था । मेरी समझ में यही कारण है । बौद्ध भुवन रचना सामग्रियां जो प्रायः उस समय जीर्णा- वस्था में थीं, बिसरी थीं और जिनका जन जीवन में विशेष महत्त्व नही रह गया था । कल्हण ने उनका प्रयोग नहीं किया। इसलिये 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी' शब्दों का अभाव कल्हण के साहित्य में मिलता है ।
जीर्णोद्धार कराया । कालान्तर में उसने जैन शासन चलाया । राजा जैनेह का अशोक भतीजा था । उसके काल में ब्राह्मण संस्कार के स्थान पर जैन शासन कश्मीर में चलाया गया । राजा जैनेह कौन था इसपर अबुल फजल आइने अकबरी में कोई प्रकाश नहीं डालता । हसन लिखता है—'राजा शचोनर वल्द शकुनी के पोतों में से अशोक था। कलयुग संवत् १६५५ में अपनी ख्वाहिश से तख्त कश्मीर को जीनत देकर परगना खादर भारत मे एक शहर आलीशान और दिलपसन्द महलात वाला बनाया । पिछले मुअरखीन इन मकानों की तायदाद ६ लाख लिखते हैं । शहर के आस-पास एक निहायत ऊँचो और पायदार फसील बनवायी । पनगलवा और पतेख के गाँव आबाद करके बरहमनों को बख्शिश दिये और मजहब जैन यानी बुद्ध मजहब जिसका जिक्र पहले हिस्सा में आ चुका है, अपने लिए पसन्द किया । उसकी इशाअत और तबलीग में दिल व जान से कोशिश की और सारे मुल्क मे उमके अहकाम जारी कर दिये। कसबा बिजबारह मे पिछले तमाम मन्दिर तबाह व बरबाद करके उनकी जगह अपने मजहब के इबादतखाने निहायत आलीशान और पुख्तगी से बनवाये । बैजवारह के मुत्तसिल ही एक और मन्दिर बनवाया जिसका नाम अपने नाम पर अशोकेश्वर रखा । मोजा हैवलतरो और मोजा बतर द्रेल में के बहुत से मन्दिर बनवाये । बिल आखीर अछूतों की मुखालिफत और उनकी नाफरमानी से पेशनजर तारिकुल दुनिया होकर पहाट बदेश्वर की तलहटी में नारायण नाग के चश्मा पर बूनेश्वर का मन्दिर जिसके निशानात ताहान मौजूद हैं बनवाया । यहां आतों बकिया उम्र इबादत बग्ग हकूमत करके इस दारेफानी से रुख्सत हुआ ।'
हसन का यह कहना है कि ५१ वर्ष अशोक ने राज्य किया सर्वथा मिथ्या है । अशोक का यह क०
प्रथम तरंग. १३५ यः शान्तवृजिनो राजा प्रपन्नो जिनशासनम् । शुष्कलेत्रवितस्तात्रौ तस्तार स्तूपमण्डलैः ॥१०२॥ १०२. यह नृप जिसके पाप शान्त हो गये थे, जिन¹ शासन स्वीकार किया। शुष्कलेत्र² तथा वितस्तात्र³ स्थानों को स्तूप मण्डलों से आच्छादित कर दिया। १६५५ संवत् में राज्यारोहण तथा उसके पश्चात् इतिहास का यह वह काल है जब रोम और जलोक का राज्यारोहण क० १७२६ संवत् में बताता कार्थेज यूनिक युद्ध में रत थे। बुद्ध धर्म का कश्मीर हैं। इस प्रकार अशोक का राज्य काल ७१ वर्ष में प्रवेश करने के कारण बौद्धधर्मानुयायियो को कष्ट होता है न कि एक्कावन वर्ष। वह अशोक तथा सहने का आदत पड़ गयी थी। सहिष्णुता की भावना जलोक के बीच किसी और राजा को नहीं रखता। बढ़ गयी थी। भूकम्प विसूचिका तथा महामारी अशोक के पश्चात् जलोक का होना स्वीकार आदि का स्थिरतापूर्वक सामना करना चाहिये यह करता है। भावना बढ़ने लगी थी। उन्हें केवल दैवो प्रकोप ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है कि मानकर चुप बैठने की पुरानी आदत बुद्ध धर्म के राज्य उत्तराधिकार का संघर्ष २७० वर्ष ईशा पूर्व व्यावहारिक रूप और ज्ञान के कारण बदल रही थी। आरम्भ हुआ था। अशोक २७४ वर्ष ई० पू० राज नास्तिक बुद्ध धर्म के वैज्ञानिक तर्क ने पुराने विचारों सिंहासन पर बैठा था। उसकी मृत्यु ई० पू० २३२ में एक क्रान्ति उपस्थित कर दी थी। कर्म, वर्ष में हुई। (परिशिष्ट ए० 'अशोक' ले० राधाकुमुद आचरण, और शील की ओर लोगो को उन्मुख किया मुकर्जी, १९६२ संस्करण)। था। अन्ध विश्वास, निष्क्रियता, केवल सैद्धान्तिक इस प्रकार उसका राज्यकाल केवल ३८ वर्ष आकाशीय उड़ान के स्थान पर भूमि पर चलने की ठहरता है। अतएव हसन का राज्यारोहण, राज्य- ओर लोगो को प्रवृत्त किया था। काल आदि सब भ्रामक, परस्पर विरोधी तथा अशोक के कारण कश्मीरियो के चरित्र निर्माण अप्रमाणित उसकी अन्य बातों की तरह होता है। में बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। यही अशोक ने कितने दिनों तक शासन किया, इस पर कारण है कि कश्मीर की मसजिदें बौद्ध पगोड़ा तुल्य कोई प्रकाश कल्हण नहीं डालता। उसका सम्बन्ध दिखायी पड़तो है। यद्यपि नूरजहाँ ने सर्व प्रथम मौर्य वंश से भी नही जोड़ता है। अपने मसजिद के निर्माण द्वारा सेमेटिक स्थापत्य एवं रत्नाकर पुराण की बात केवल कपोलकल्पना वास्तु कला का प्रवेश कश्मीर में कराया था। है। इसका लाभ उठाकर हसन ने अनुमान से समय निश्चित किया है। बुद्ध धर्म कल्हण के समय तक कश्मीर में किसी अशोक के जीवन की प्रमुख घटनाओ पर तिथि- न किसी रूप में अत्यन्त लघु पैमाने पर प्रचलित वार प्रकाश डाल देने से इतिहास समझने मे सुविधा था। कल्हण स्वयं शैव था। 'अशोक' परिशिष्ट में होगी। कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा। विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। अन्यथा इसका उल्लेख परिशिष्ट 'अशोक' में किया टिप्पणी स्वतः बहुत बड़ी हो जातो। गया है। जोनराज, श्रीवर, प्रज्ञाभट्ट एवं शुक की राज- अशोक कश्मीर का राजा था। इसपर विस्तृत तरंगिणियों में अशोकेश्वर तथा अशोक का विवेचन मैने परिशिष्ट 'अशोक' में किया है। अशोक उल्लेख मै प्राप्त नही कर सका। उनका किसी का एक राज्यपाल तक्षशिला में रहता था। सन्दर्भ मे भी वर्णन नही मिलता।