रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६५ जल-क्रिया (गाथा १) “एथ लक्खण सीता च उभो ओतरथोकं । एवायं भरतो आह राजा दशरथ मतो ॥”१॥ लक्ष्मण और सीता दोनों जल में उतरे क्योंकि भरत कहते हैं—राजा दशरथ मर गये । यह पहली गाथा स्पष्टतया रामायण में वर्णित जलक्रिया से सम्बन्ध रखती है। रामायण के निम्नाङ्कित श्लोक प्रस्तुत गाथा से मिलते जुलते हैं । राम लक्ष्मण से कहते हैं— “भरतो दुःखमाचष्टे स्वर्गतिं पृथिवीपतेः । जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मनः ॥ सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज । अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिर्ह्येषा सुदारुणा ॥” (वा० रा० २।१०५।१५,२०) पाली जातकट्ठवण्णना में इस गाथा को एक भिन्न अर्थ देने का प्रयत्न किया गया है ।१ गाथा (२-१२) में यह उल्लेख है कि राम से पूछा गया कि हे राम ! शोक का कारण रहते हुए भी आप किस धैर्य के आधार पर शोक नहीं करते ? पिता का देहान्त सुन कर भी आप दुःख के वशीभूत नहीं हैं ? “केन राम प्पभावेन सोचितव्वं न सोचसि । पितरं कालकतं सुत्वा तं पसहते दुखं ॥ (२) राम उत्तर देते हैं “बहुत विलाप करने पर भी जो रखा नहीं जा सकता । उसके लिए बुद्धिमान् शोक नहीं करता ।” जिस तरह पके फलों के गिरने का नित्य भय बना रहता है उसी तरह जन्म लिये हुए मनुष्यों के मरण का भय सदा ही बना रहता है— फलानमिव पक्कानं निच्चं पपतना भयं । एवं जातानं मच्चानं निच्चं मरणतो भयं ॥” इस उपदेश की प्रथम गाथा में राम से उपर्युक्त प्रश्न किया गया है, तदनन्तर अन्य गाथाओं में शोक की व्यर्थता को दर्शानेवाले उपदेश उद्धृत हैं । जातक के गद्य के अनुसार वे राम के वचन कहे जाते हैं । परन्तु इन सम्पूर्ण उपदेशों के अन्तर्गत रामकथाओं का किञ्चित् सङ्केत भी प्राप्त नहीं होता । डा० विंटरनित्स का कहना है कि वाल्मीकिरामायण के उल्लेखानुसार राम अपने पिता के देहान्त का समाचार सुनकर अत्यन्त शोक करते हैं (वा० रा० २।१०३।१ आदि) और भरत को सान्त्वना भी देते हैं (वा० रा० २।१०५।१५-५२), परन्तु जातक के राम किञ्चित् भी शोक नहीं करते, इससे बौद्ध प्रभाव स्पष्ट हो जाता है । उनका अनुमान है कि प्राचीन गाथाओं में श्रीराम को अत्यन्त शोकातुर दिखाया गया था, परन्तु बौद्धों ने इन गाथाओं को नया रूप दिया और शोक-सम्बन्ध का उल्लेख करनेवाली गाथाएँ छोड़ दी गयी हैं । केवल इसी आधार पर गाथाओं के वर्तमान रूप को बौद्धों द्वारा निर्मित मानना निराधार है । महाभारत के अनेक स्थलों में भी शोकापनोदन के प्रकरण आते हैं । जातक गाथाओं की शिक्षा बौद्धों की अपनी नहीं है । जलक्रिया गाथा की ही तरह ये गाथाएँ भी बौद्धों द्वारा ज्यों की त्यों अपना ली गयी होंगी । १. रामकथा, पृष्ठ ८३; वही, पृ० ८७ ।
१६६ रामायणमीमांसा पञ्चम इन गाथाओं में से केवल एक— "यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्। एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम् ॥" गाथा रामायण से मिलती है। बुल्के का यह मत कि "जातक की गाथाएँ वाल्मीकिरामायण पर निर्भर नहीं हैं : इनका मूल स्रोत कोई प्राचीन आख्यान ही रहा होगा," ठीक नहीं है; क्योंकि यह प्रमाणसिद्ध है कि उप- निषदों में भी रामकथा मिलती है और वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ तो राम के समकाल का ही है, अतः उपस्थित रामायण से भिन्न अन्य किन्हीं अप्रसिद्ध आख्यानों की कल्पना भी निराधार ही है। डा० याकोबी का यह अनुमान ठीक है कि "प्रस्तुत गाथा का मूल स्रोत कोई काव्य रहा होगा और बहुत सम्भव है कि वह वाल्मीकिरामायण ही हो।" बुल्के का यह कथन कि "बौद्ध-साहित्य से भिन्न ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में निर्मित रामसम्बन्धी प्राचीन गीतों में इसका मूल स्रोत खोजा जाना चाहिये," अत्यन्त विचित्र ही है। ब्राह्मण-धर्म के प्रसिद्ध ग्रन्थ रामायण, महाभारत, पुराण, संहिता आदि को इन बौद्ध कथाओं का आधार न मान कर किन्हीं अज्ञात, अप्रसिद्ध एवं अप्रामा- णिक गीतों में उनका आधार ढूंढ़ना कहाँ तक युक्ति-युक्त होगा, यह विचारणीय है। कुछ लेखक रामराज्य की तुलना करते हुए रामायण एवं बौद्ध रामकथा का सम्बन्ध जोड़ते हैं। रामराज्य का काल गाथा १३ में निम्नोक्त है— "दस वस्ससहस्सानि सट्ठि वस्ससतानि च। कंबुगीव महावाहु रामो रज्जमकारयि ॥" "कम्बुग्रीव महाबाहु राम ने सोलह सहस्र वर्ष तक राज्य किया। वाल्मीकिरामायण, महाभारत और हरिवंश तीनों में इस गाथा का संस्कृत रूप पाया जाता है। रामायण में— "दशवर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च। भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् रामो राज्यमकारयत् ॥" (वा० रा० ६।१३१।१०६) श्रीराम ने भ्राताओं के साथ ग्यारह हजार वर्ष राज्य किया। "दशवर्षसहस्राणि दशवर्ष शतानि च। रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥" (बा० रा० १।१।९७ अन्य पाठ) ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य करके राम ब्रह्म (परब्रह्म) लोक में जायेंगे। महाभारत में— "दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। राज्यं कारितवान् रामस्ततः स्वभवनं गतः ॥" ( ३।१४८।१९ ) "श्यामो युवा लोहिताक्षो मातङ्ग इव यूथपः। आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥ दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ।। (म० भा० १२।२९।६०, ६१ )
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६७ श्याम, युवा, लोहिताक्ष, मत्तगज-पराक्रमी, आजानुबाहु, मनोज्ञमुख, सिंहस्कन्ध राम ग्यारह हजार वर्ष राज्य करके परम धाम गये । हरिवंश में— “दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥” ( १।४१।१५१ ) ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त राम ने अयोध्याधिपति होकर राज्य किया। इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि पाली गाथा और संस्कृत श्लोकों का मूलस्रोत एक ही है। यह पाली गाथा दशरथ-जातक के समोधान में दी जाती है। यह समोधान, इस गाथा को छोड़कर, गद्य में ही लिखा गया है। इससे डा० याकोबी ठीक ही अनुमान करते हैं कि “यह गाथा कहीं से उद्धृत की गयी है। इस जातक की वर्तमान कथा में पोराण पण्डिता का उल्लेख है, अतः प्रस्तुत गाथा का मूलस्रोत कोई प्राचीन काव्य रहा होगा और बहुत सम्भव है कि यह वाल्मीकिरामायण ही हो ।१” बुल्के इसका आधार ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में निर्मित प्राचीन आख्यान साहित्य में राम-सम्बन्धी प्राचीन गीतों को मानते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में रामायण उनसे अर्वाचीन है। परन्तु यह उनका भ्रम है, क्योंकि यह वा० रा० १म काण्ड से सिद्ध है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माण राम के समकाल में ही हुआ है, अतः डा० याकोबी का मत ही ठीक है। डा० वेबर के अनुसार दशरथजातक में रामकथा का पूर्वरूप रक्षित है। इसके अतिरिक्त वे पाँचवीं शताब्दी ई० की दो अन्य बौद्ध रचनाओंमें इस कथा के प्राचीनतम तत्त्व पाते हैं। पर यह उनकी कल्पनामात्र है। सो भी बिना प्रमाण की। धम्मपद की टीका में निम्नलिखित कहानी मिलती है। यह ज्यों की त्यों पाली जातकट्ठवण्णना में भी उद्धृत है। ( देवधम्म-जातक नं० ६ दे० ) । ( क ) वाराणसी के राजा के दो पुत्र थे महिसास ( क ) और चन्द्र । उनकी माता के मरने पर राजा ने फिर विवाह किया। नई महिषी के सूर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी अवसर पर राजा से उसको एक वर भी मिला। जब सूर्य युवावस्था को प्राप्त हुआ तब रानी ने वर के बल पर अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन का अधिकार माँगा। राजा ने स्पष्ट अस्वीकार किया। लेकिन महिषी के षड्यन्त्रों से भयभीत होकर उन्होंने अपने पुत्रों को यह कह कर वनवास दिया कि “मेरे मरने के बाद लौट कर राज्य पर अधिकार प्राप्त करना ।” सूर्य अपने दोनों भाइयों के साथ स्वेच्छा से वन चला गया। राजा के मरने के पश्चात् तीनों बनारस लौटते हैं। महिसास राजा बन जाते हैं, चन्द्र उपराजा और सूर्य सेनापति। ( ख ) डा० वेबर के अनुसार यह दशरथ-जातक का प्रथम रूप है। आगे चलकर वे बुद्धघोष की सुत्तनिपात-टीका में वर्णित शाक्य तथा कोलिय वंशों की उत्पत्ति की कथा में ( २, १३ ) दशरथ-जातक का द्वितीय रूप देखते हैं। १. रामकथा, पृष्ठ ८८ ।
१६८ रामायणमीमांसा पञ्चम शाक्यों की उत्पत्ति वाराणसी की पटरानी की नौ सन्तानें थीं—चार पुत्र और पाँच पुत्रियाँ । उसके मर जाने के बाद अंबट्ठ राजा ने नया विवाह किया और अपनी युवती पत्नी को पटरानी बनाया—( अग्गमहेसि ट्ठाने ठपसि ) । नई पटरानी के पुत्र उत्पन्न होने पर राजा ने उसको एक वर दिया और उसने उस वर के बल पर अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन माँगा । राजा ने पहले अस्वीकार किया। फिर भी उसने अपने नौ पुत्र-पुत्रियों को यह कह कर वनवास दे दिया “मेरी मृत्यु के पश्चात् आओ और राज्य पर अधिकार प्राप्त करो ।” बहुत लोग उनके साथ चल दिये और सबों ने वन में एक नगर बसाया । नगर को 'कपिलवस्तु' नाम दिया गया, क्योंकि उसी स्थान पर कपिल नामक तपस्वी तपस्या करते थे । राजसन्तान से विवाह करने योग्य वन में कोई नहीं था, अतः चारों राजकुमार अपनी बहनों से विवाह करने के लिए बाध्य हुए । ज्येष्ठा कन्या पिया अविवाहित रह कर सबों की माता मानी जाने लगी यही शाक्यों की उत्पत्ति की कथा है । कोलियों की उत्पत्ति कुछ समय बाद अविवाहिता पिया को कुछ रोग हो गया । इस कारण वह वन के किसी एकान्त स्थान पर छोड़ दी गयी । उसी वन में राम नामक एक राजा रहते थे । कुछ रोग के कारण राजा राम भी; अपने पुत्र को राज्य देकर वन में आये थे और औषधीय पौधों का सेवन कर स्वस्थ हो गये थे । उन्हीं पौधों द्वारा पिया की चिकित्सा कर के राम ने उससे विवाह किया और ३२ पुत्र उत्पन्न किये (१६ यमल) इसके बाद उसने वन में कोलनगर बसाया और शाक्य राजकुमारियों से अपने पुत्रों का विवाह कराया । शाक्य तथा कोलिय प्रत्येक वंश के २५० राजकुमार भिक्षु बन गये थे । वे अपने वैराग्य में दृढ़ न रह कर लौटने की अभिलाषा करते हैं । तब महात्मा बुद्ध उनको महाकुणाल-जातक सुनाकर उनकी संसार में आसक्ति दूर करते हैं । डा० वेबर के अनुसार रामकथा का विकास इस प्रकार हुआ । धम्मपद और सुत्तनिपात की टीकाओं में विमाता की ईर्ष्या के कारण राजसन्तति को वनवास दिया जाता है, भाई-बहन का विवाह होता है और राम के के नाम का भी उल्लेख होता है । दशरथजातक में विमाता के कारण वनवास और भाई-बहन के विवाह के साथ-साथ दशरथ, लक्ष्मण, भरत और सीता, ये नाम मिलते हैं और राम पराये न होकर राजकुमारों के ज्येष्ठ भाई बन जाते हैं । रामायण में राजकुमारों की राजधानी वाराणसी से अयोध्या बन जाती है । वनवास का स्थान हिमालय से दण्डकारण्य में बदल जाता है और राम तथा सीता भाई-बहन न होकर प्रारम्भ से ही विवाहित होते हैं । इन परिवर्तनों के अतिरिक्त सीता-हरण और रावण-वध ये नये वृत्तान्त भी जोड़े गये हैं । रामायण में सीता के वनवास के अन्त तक कोई सन्तान नहीं होती, यह डा० वेबर के अनुसार दशरथ- जातक की कथा का प्रभाव है जिसमें वनवास के बाद ही उनका विवाह होता है । वाराणसी का अयोध्या बनना भी बौद्ध कथाओं के कारण हुआ । शाक्य और कोलिय वंशो की राजधानियाँ क्रमश: कपिलवस्तु और कोलनगर दोनों थीं, दोनों नगर अयोध्या के पड़ोस में थे । वनवास का स्थान इसलिए बदल गया कि सीता-हरण और रावण-वध का वृतान्त जोड़ना था । अन्तिम विषय का आधार यूनानी कवि होमर की रचना है जिसमें पैरिस द्वारा हेलेन का हरण है और लङ्का से जो युद्ध हुआ उसका आधार सम्भवतः यूनानी सेना द्वारा त्राय का अवरोध है। श्रीदिनेशचन्द्र सेन भी दशरथजातक में रामकथा का आधार और पूर्वरूप देखते हैं । रामायण में एकाध पाली गाथाओं का संस्कृत अनुवाद पाते हैं और अन्तरङ्ग प्रमाण भी देते हैं—रामायण और बौद्धकथा की तुलना
करने पर स्पष्ट है कि विश्वकवि वाल्मीकि ने कितने कौशल से इस अपरिष्कृत बौद्ध कथा को उत्कर्ष की सीमा तक पहुँचाया है । बुल्के के अनुसार "इस तर्क का प्रत्युत्तर यह है कि रामायण तथा बौद्धकथा की तुलना करने पर स्पष्ट है कि बौद्धों ने रामायण के कारुणिक कथानक को शोक की व्यर्थता के एक उपदेश मात्र में बदल दिया है । इससे सिद्ध होता है कि रामायण बौद्धकथा का मूल एवं प्राचीन है ।” बुल्के यह कहते हैं कि “डा० वेबर और दिनेशचन्द्र गाथाओं और गद्य इन दोनों की प्रामाणिकता में कोई भेद नहीं मानते । यद्यपि दोनों के रचनाकाल में शताब्दियों का अन्तर है । यह तर्क दशरथजातक के विषय में विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें प्रायः समस्त कथा गद्य में दी गयी है । पहली गाथा का जो प्रसङ्ग दशरथजातक में दिया गया है वह मौलिक नहीं है । अन्य गाथाओं का मूल स्रोत भी रामायण से मिलता-जुलता कोई पुराना उपाख्यान रहा होगा, यह सम्भवतः गाथाओं के उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो गया है ।”१ वस्तुतः बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किया गया उपनिषदों और वाल्मीकिरामायण का काल-निर्णय ही भ्रान्तिपूर्ण है । यदि तत्सम्बन्धी हमारा विवेचन उनकी समझ में आ जाय तो वे भी मानने लगेंगे कि जैन-रामकथा की भाँति ही बौद्धरामकथा भी वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है । विभिन्न दुरभिसन्धियों से जैनों और बौद्धों ने रामकथा को अपने धार्मिक विश्वासों के साँचे में ढालने का प्रयास किया है । स्वयं बुल्के का कथन है कि “दशरथजातक में प्राप्त रामकथा की अन्तरङ्ग समीक्षा करने पर वह रामायणकथा का विकृत रूपमात्र ही सिद्ध होती है२ ।” साथ ही डा० वेबर का मत इस धारणा पर निर्मित प्रतीत होता है, जिस कथा में अपेक्षाकृत कम पात्र, कम घटनाएँ, कम तत्त्व मिलते हैं वह निस्सन्देह पूर्वकृत होगी । ऐसी धारणा निर्मूल है। इसका प्रमाण दशरथकथानम् में मिल जाता है । यह कथा एक सङ्ग्रह में पायी जाती है जिसकी रचना दूसरी शताब्दी ई० के बाद हुई थी । इस दशरथकथानम् में सीता का या किसी राजकुमारी का उल्लेख नहीं है । रामकथा का यह रूप दूसरी शताब्दी ई० के बाद भी बौद्ध जगत् के किसी प्रदेश में प्रचलित रहा होगा । दशरथकथानम् के रचना-काल में वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो चुका था, फिर डा० वेबर की युक्ति के अनुसार दशरथकथानम् के वृत्तान्त में इन सब रचनाओं के पहले की रामकथा का रूप विद्यमान है ।३ अस्तु, उनकी यह उक्ति सर्वथा निस्तत्त्व है । वस्तुतः रामकथा का विकसित रूप जो वाल्मीकिरामायण में पाया जाता है वह प्राचीनकाल में ही बौद्धों में प्रचलित था। इसके सङ्केत पाली जातकट्ठवण्णना की अन्य गाथाओं से मिलते हैं । जयद्दिशजातक (नं० ५१३) की गाथा १७ के अनुसार राम का वनवास हिमालय प्रदेश में न होकर दण्डकारण्य में है । एक माता अपने पुत्र से कहती है । जिस तरह दण्डकारण्यवासी राम की सुन्दर माता ने (अपने पुण्य द्वारा पुत्र का) कल्याण किया है, इस तरह मैं तेरा कल्याण ( सोत्थानं स्वस्त्ययन ) करती हूँ । यं दण्डकारण्णगतस्स माता रामस्स सोत्थानं सुगत्ता तं ते अहं सोत्थानं करोमि । दशरथजातक के अनुसार राम के निर्वासन के समय उनकी माता का देहान्त हो गया था । वेस्संन्तरजातक (नं० ५४७) मद्दी, वेस्संन्तर की पत्नी, कहती है, "मैं एक प्रतापवान् निर्वासित राज- कुमार की भार्या हूँ । अनुगामिनी सीता जिस तरह से राम का आदर करती थीं, उसी तरह मैं इनका आदर करती १. रामकथा, पृष्ठ ९१ पर्यन्त । २. वही, अनुच्छेद-७७१ । ३. वही, पृष्ठ ९२ । २२
१७० रामायणमीमांसा पञ्चम हूँ । इससे यह ध्वनि निकलती है कि वनवास के समय राम और सीता का सम्बन्ध भाई-बहन का न होकर पति-पत्नी का था । अनामकजातक में भी रामकथा का विकसित रूप मिलता है; वह पीछे उद्धृत है । १इसके अतिरिक्त अश्वघोष, अभिधर्म महाविभाषा आदि प्राचीन बौद्ध-ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण के निर्देश मिलते हैं । अश्वघोषकृत बुद्धचरित महाकाव्य से स्पष्ट पता चलता है कि अश्वघोष (दूसरी शताब्दी ई० पूर्वार्द्ध) न केवल ब्राह्मण-रामकथा से लेकिन वाल्मीकिरामायण के पाठ से भी परिचित थे, और इससे अपनी सारी रचना में प्रभावित हुए हैं। राम का आज्ञापालन (९।२५), उनका वन से लौटना (९।६७), दशरथ का पुत्र वियोग के कारण शोक (८।७९, ८१), इन सब में रामकथा के किसी निश्चित रूप की ओर निर्देश नहीं है । लेकिन वनवासी राम से वामदेव की भेंट (९।९), वाल्मीकि (१।४८), तथा सारथि सुमन्त्र (६।३६; ८।८) का उल्लेख— यह रामायणीय रामकथा (विशेष करके अयोध्याकाण्ड) से सम्बन्ध रखता है। इसके अतिरिक्त अश्वघोष के सौन्दर- नन्द में वाल्मीकि का सीता के दोनों पुत्रों का शिक्षक होने का उल्लेख हुआ है। इससे यह ध्वनि निकलती है कि अश्वघोष उत्तरकाण्ड की कथावस्तु से भी अभिज्ञ थे । बुद्धचरित के अनेक स्थलों पर रामायण की कथावस्तु से बहुत कुछ समानता मिलती है। सिद्धार्थ के बिना छन्दक के कपिलवस्तु में लौटने का सारा वर्णन सुमन्त्र के प्रत्यागमन से प्रभावित हुआ है। कवि स्वयं दोनों वृत्तान्तों की तुलना करता है । “त्वामरण्ये परित्यज्य सुमन्त्र इव राघवम् ।” (६।२५) राम के वन से लौटने का भी एक उल्लेख मिलता है— “महीं विप्रकृतामनार्यैस्तपोवनादेत्य ररक्ष रामः ।” (९।५९) पृथिवी को अनार्यों से पीड़ित देखकर राम ने वन से लौटकर उसकी रक्षा की ।२ यह बात दशरथजातक में नहीं है । बुल्के का यह कहना कि “रामायण में इस कथा का रूप नहीं है;" सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि रामायण के 'उत्तरकाण्ड' से लवण दैत्य के द्वारा मथुरा आदि की भूमि के विप्रकृत होने और राम से प्रेषित शत्रुघ्न के द्वारा उसकी रक्षा की जाने का उल्लेख है । रामायण और बुद्धचरित के कई स्थलों में बहुत समानता है। उदाहरणतः-“गजेन्द्रमृदिता फुल्ला लता इव महावने” (वा० रा० ५।९।४७) का उल्लेख है, “गजभग्ना इव कर्णिकारशाखा” (बुद्धचरित ५।५१) का उल्लेख है। ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। विंटरनित्स के अनुसार इसका मूल स्रोत बुद्धचरित है, रामायण में यह प्रक्षिप्त है। कीथ के मतानुसार अश्वघोष ने ही रामायण का अनुकरण किया है । वस्तुतः इस सम्बन्ध में कीथ का मत ही युक्तियुक्त है । “मुमोक्ष बाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते” (बु० च० ८।८) जैसी युक्ति गौतमी के विलाप (८।५१-५९) में राजमहल और वनवास का जो विरोध चित्रित है वह रामायण के दशरथ-विलाप (वा० रा० २।१२।९७-११०, २।५७-५९) और कौशल्या-विलाप (वा० रा० २।४३।१-२०) का स्मरण दिलाता है। दोनों ही वर्णनों में वनवासी पुत्र के पैदल जाने और भूमि पर शयन करने आदि का उल्लेख हुआ है । “प्रलम्बबाहुर्मृगराजविक्रमो महर्षभाक्षः कनकोज्ज्वलद्युतिः । विशालवक्षा घनदुन्दुभिस्वनस्तथाविधोऽप्याश्रमवासमर्हति ॥” (बु० च० ८।५३) १. रामकथा, पृष्ठ ९७, अनुच्छेद ८३ । २. वही, पृष्ठ ९३ ।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७१ “नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धरः । वनमाविशते नूनं सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥” ( वा० रा० २।४३।६ ) “शुचौ शयित्वा शयने हिरण्मये प्रबोध्यमानो निशि तूर्यनिस्वनैः । कथं बत स्वप्स्यति सोद्य मे व्रती पटैकदेशान्तरिते महीतले ॥” (बु० च० ८।५८) “दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः । भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत् ॥” ( वा० रा० २।५८।६ ) तीसरी शताब्दी ई० उत्तरार्द्ध की अभिधर्ममहाविभाषा में रामायण का उल्लेख किया गया है। यह रचना चीनी अनुवाद में सुरक्षित है। इसमें लिखा है—रामायण नामक ग्रन्थ में १२००० श्लोक हैं। श्लोक केवल दो विषयों से सम्बन्ध रखते हैं—(१) रावण द्वारा सीता का हरण, (२) राम द्वारा सीता की पुनः प्राप्ति तथा (अयोध्या में) प्रत्यागमन । इसके अतिरिक्त तीन बौद्ध रचनाएँ और मिलती हैं, जिनसे पता चलता है कि रामायण का बौद्धों में पर्याप्त प्रचार था। कुमारपालकृत कल्पनामण्डितिका में ( तीसरी शताब्दी ई० का अन्त ) महाभारत और रामायण का उल्लेख हुआ है। वसुबन्धु ( चौथी शताब्दी ई० ) की जीवनी में भी यह कहा गया है कि वसुबन्धु रामायण की कथा सुना करते थे। सद्धर्मस्मृत्युपस्थानसूत्र में रामायण का द्विवर्णन उद्धृत है। यह रचना पहली शताब्दी ई० की मानी जाती है। इसका छठी शताब्दी में चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था। श्रीबुल्के के अनुसार “रामकथा का जो रूप पाली दशरथजातक में मिलता है वह या तो रामायण ही पर अथवा रामायण से मिलती जुलती किसी अन्य रामकथा पर निर्भर है। यह दशरथजातक की अन्तरङ्ग परीक्षा से सिद्ध होता है।” रामायण में कैकेयी ने वर के बल पर राम के लिए चौदह वर्ष तक वनवास माँग लिया था; अतः राम का दशरथ के मरने के बाद वन में रहना स्वाभाविक और अनिवार्य है। लेकिन दशरथजातक में इसके लिए कोई समीचीन कारण नहीं मिलता। इसके अनुसार दशरथ ने राम और लक्ष्मण से कहा था कि वे उनकी मृत्यु के पश्चात् लौटें। तब उन्होंने ज्योतिषियों से अपना अन्तकाल पूछा था। यह जानकर कि मैं बारह वर्ष तक जीवित रहूँगा तो उन्होंने अपने पुत्रों से इस अवधि के अन्त में आने के लिए कहा था। फिर दोनों पुत्रों को एक ही आदेश मिला था। तब लक्ष्मण क्यों नौ वर्ष के बाद लौटते हैं ? रामायण की कथा में सीता का अपने पति के साथ जाना स्वाभाविक है। दशरथजातक में इसके लिए कोई ऐसा कारण नहीं है। विमाता के षड्यन्त्रों की सीता को कोई आशंका नहीं थी। जातक में सीता दशरथ के मरने पर लक्ष्मण के साथ राजधानी को लौट आती है और राम तथा सीता का तीन वर्षों के वियोग के बाद विवाह हो जाता है। इसमें सम्भवतः रामायण के सीताहरण के पश्चात् दोनों का संयोग प्रतिबिम्बित है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि दशरथजातक ब्राह्मण-रामकथा पर निर्भर है तो दोनों में इतना अन्तर क्यों है ? इसके तीन मुख्य कारण स्पष्ट हैं। एक तो दशरथजातक का जो रूप जातकट्ठवण्णना में प्रस्तुत है, वह शताब्दियों तक अस्थिर रहने के बाद पाँचवीं शताब्दी ई० में लिपिबद्ध किया गया है। अतः इसमें परिवर्तन की सम्भावना रही है। विशेष कर दूर सिंहलद्वीप में जहाँ रामायण की कथा उस समय तक कम प्रचलित थी। दूसरे बौद्ध आदर्श और शैली का प्रभाव पड़ना अत्यन्त स्वाभाविक है। तीसरे दशरथजातक की वर्तमान कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध ने पिता के मरण से शोकातुर पुत्र को धैर्य देने के लिए दशरथ के मरने पर राम के धैर्य का उदाहरण देकर यह जातक कहा था। इस उद्देश्य के लिए सीता-हरण का उल्लेख अनावश्यक था। इसके अतिरिक्त इस जातक
के अनुसार महात्मा बुद्ध ही अपने पूर्व जन्म में राम पण्डित थे। अतः बौद्ध आदर्श के प्रतिकूल होने के कारण रावणवध का अभाव स्वाभाविक है । बौद्ध जातकों की शैली के अनुसार राजधानी अयोध्या न होकर वाराणसी है। वनवास का स्थान हिमालय है जो बौद्ध कथाओं में अत्यन्त लोकप्रिय है और जिसका उल्लेख जातकों में निरन्तर होता रहता है । वनवास का कारण विमाता के षड्यन्त्रों का भय है जो अनेक बौद्ध कथाओं में भी मिलता है। राम और सीता, भाई-बहन का विवाह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कहा जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बौद्धसाहित्य में कई उदाहरण प्रस्तुत हैं। दशरथ के अन्तकाल के विषय में ज्योतिषियों का कथन असत्य सिद्ध होता है। इसमें भी चिन्तामणिवैद्य बौद्ध-प्रभाव देखते हैं। बौद्धों की ज्योतिषियों में जो अरुचि थी वह इस भूल में प्रगट की गयी है। सारांश यह है कि दशरथजातक में जो आन्तरिक असङ्गति मिलती है वह वाल्मीकीय कथा को इस जातक का आधार होना सिद्ध करती है । दूसरी ओर जातक तथा रामायण में जो अन्तर पाये जाते हैं वे भी उपर्युक्त कारणों से स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। बौद्ध साहित्य में जो रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है, उसके विश्लेषण से सिद्ध होता है कि दशरथ- जातक के गद्य में जो वृत्तान्त प्रस्तुत हुआ है वह तो वाल्मीकीय कथा का विकृत रूप है ही, किन्तु इस जातक की गाथाओं का भी मूल स्रोत बौद्ध नहीं है। फिर भी इनका आधार प्रचलित वाल्मीकिरामायण भी नहीं हो सकता, अतः ये गाथाएँ पुराने आख्यान काव्य पर निर्भर होंगी ।”१ बुल्के का उपर्युक्त कथन तब सत्य होता जब कि वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण जैसे ग्रन्थों की बौद्धग्रन्थों से अतिप्राचीनता सिद्ध न होती । वेद, उपनिषद् अनादि हैं और रामायण राम के समकाल की रचना है। यह बात वा० रा० १म काण्ड तथा तर्कों द्वारा सिद्ध की जा चुकी है, अतः रामायण को ही उन गाथाओं का मूल स्रोत मानना उचित है । जयद्दिसजातक और वेस्संतरजातक की कथाएँ वाल्मीकिरामायण की प्रतिच्छाया हैं, यह भी कहा जा चुका है । सामजातक (सं० ५४०) का वृत्तान्त रामायण की अंधमुनि-पुत्रवधसम्बन्धी कथा का अन्य रूप है। बौद्ध जगत् मे इस जातक की लोकप्रियता का प्रमाण यह है कि साँची और अमरावती के स्तूपों पर तत्सम्बन्धी चित्र अङ्कित किये गये हैं। अन्ध मुनि के पुत्र की कथा रघुवंश नवें सर्ग में भी मिलती है पर ये वृत्तान्त रामायण की तत्सम्बन्धी कथा पर निर्भर हैं; और सामजातक से कोई सीधा सम्बन्ध नही रखते । सामजातक का संक्षिप्त वृत्तान्त इस प्रकार है--निषादों के कुल में उत्पन्न दुकूलक छोर पारिका हिमालय प्रदेश के किसी आश्रम में तपोमय जीवन बिताते हैं। विवाहित होकर भी वे ब्रह्मचारी ही रहते हैं। बोधिसत्व अलौकिक रीति से पारिका के गर्भ से जन्म लेते हैं और साम कहलाते हैं। साम के १६ नर्ष में दुकूलक और पारिका दोनों को एक सर्प अन्धा कर देता है। उसी समय से साम अपने माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा करने लगता है। एक दिन साम पानी लेने किसी नदी पर जाता है और वहीं काशीराज के विष-दिग्ध बाण से विद्ध हो जाता है। राजा उसके पास जाता है ! साम को किञ्चित्मात्र भी क्रोध नहीं होता, परन्तु वह अपने माता-पिता के भाग्य पर फूट-फूट कर रोता है। राजा उसके माता-पिता के पास जाकर उसके वध का समाचार सुनाता है। समाचार सुनकर दोनों विलाप करने लगते हैं। तदनुसार उनके कहने पर राजा उनको मृत पुत्र के पास ले जाते हैं। वहाँ पहुँचने पर १. रामकथा, पृ० ९४-९६ ।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७३ मर्मस्पर्शी विलाप करते हुए शपथ करते हैं। पारिका कहती है कि "यदि मेरा पुत्र माता-पिता का सच्चा भक्त था तो विष लुप्त हो जाय" दुकूलक भी अपने और अपनी पत्नी के नाम पर शपथ करता है। वनदेवी भी उन्हीं की तरह शपथ करती है। साम उठ बैठता है और राजा का स्वागत करते हुए कहता है कि मैं मूर्च्छित हुआ था, जो माता- पिता की सेवा करता है वह दोनों लोकों में सुख पाता है। तदनन्तर साम राजा पिलियक को राजधर्म का उपदेश देता है। रामायण की कथा में आहत मुनि-पुत्र उत्तेजित हो जाता है, उसके माता-पिता का विलाप भी अत्यन्त कारुणिक एवं अधिक हृदय-स्पर्शी है और वह पुनः जीवित भी नहीं होता इन अन्तरों के रहते हुए भी दोनों वृत्तान्तों का पारस्परिक सम्बन्ध सन्दिग्ध नहीं कहा जा सकता। रामायण और गाथा की कथाओं में शाब्दिक साम्य भी हैं। उदाहरणतः - "इयमेकपदी राजन् ।” (वा० रा० २।६३।४४) "अयं एकपदी राज।" (गाथा २९) "वृद्धौ च मातापितरावाहं चैकेषुणा हतः ।” (वा० रा० २।६३।३२ ) "अदूसक पितापुत्ता तयो एकेसूना हता।" (गाथा ३९ ) "कन्दमूलफल हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम् । भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम् ॥” (वा० रा० २।६४।३४) "को दानि भुजयिस्सति वनमूलफलानि च । सामो अयं कालकतो अंधानं परिचारक ॥" (गाथा ८५) बुल्के के कथनानुसार "सामजातक के सरल वृत्तान्त में इस रामकथा का प्राचीन रूप सुरक्षित है। यह वृत्तान्त रामकथा से स्वतन्त्ररूप में भी प्रचलित था और कालान्तर में रामायण की कथा में उसे एक नया और काव्यात्मक रूप मिला।" बुल्के की यह मान्यता असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण की प्राचीनता सिद्ध है। इतना ही नहीं, इस स्थिति में यही युक्तिसङ्गत प्रतीत होता है कि कथा के इस अंश को भी बौद्धों ने वाल्मीकिरामायण से लेकर अपने साँचे में ढाल लिया है। यदि रामायण में बौद्ध-कथा का अनुकरण किया गया होता तो मुनि-पुत्र के क्रोध न करने और माता-पिता के शपथ से उसके जी उठने जैसे अंश भी अवश्य ही अनुकृत होते । जैसे इतर प्राकृत संस्कृत का अपभ्रंश है वैसे ही उक्त प्राकृत गाथाएँ भी संस्कृत रामायण का ही अपभ्रंश एवं विकृत रूप हैं। 'प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्' इस प्राकृत नियम के अनुसार संस्कृत प्रकृति है उससे उत्पन्न होनेवाली भाषा प्राकृत है। वेस्सन्तर जातक यह जातक बौद्ध जगत् में सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसकी ७८६ गाथाओं में राजकुमार वेस्सन्तर की दानवीरता का चित्रण हुआ है। कथावस्तु इस प्रकार है। राजकुमार वेस्सन्तर ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं किसी भी माँगी हुई वस्तु के देने से इनकार नहीं करूँगा। देश की भलाई का ध्यान न रखते हुए उसने एक अलौकिक हाथी दान में दे दिया। दण्डस्वरूप उसको वनवास दिया गया। उसकी पतिभक्त पत्नी मद्दी और दो पुत्र उसके साथ गये। वह चार घोड़ों के रथ में चले। पथ में एक ब्राह्मण भिखारी ने रथ माँग लिया। वेस्सन्तर ने उसे
१७४ रामायणमीमांसा पञ्चम निःसङ्कोच रथ दे दिया। अन्त में चारों एक कुटी में पहुँचकर वहाँ निवास करने लगे। तब सक्क (शक्र) एक कुरूप ब्राह्मण के वेश में दिखायी पड़े और उन्होंने वेस्सन्तर के दोनों पुत्रों को दास के रूप में माँगा और प्राप्त किया। तत्पश्चात् ब्राह्मण ने पत्नी को भी माँग लिया। इसपर ब्राह्मण अपना परिचय देता है और कथा आनन्दपूर्वक समाप्त होती है। मद्दी कहती है— 'अवरुद्धस्सहं भरिया राजपुत्तस्य सिरीमतो। तं चाहं नातिमण्णामि रामनि सीता वनुब्बता॥' (गाथा ५४१) मैं एक प्रतापवान् निर्वासित राजकुमार की भार्या हूँ। अनुगामिनी सीता जिस तरह राम का आदर करती थी इस तरह मैं इनका आदर करती हूँ। इस जातक में अनेक स्थलों पर रामकथा से मिलते-जुलते प्रसङ्ग मिलते हैं। राम के समान वेस्सन्तर का वनवास के पहले दान देना, कौशल्या तथा वेस्सन्तर की माता का विलाप, वन और कुटी का वर्णन। मद्दी और सीता दोनों अपने पति के साथ वन जाने का अनुरोध करती हैं। 'अग्गिं निज्जालायित्वान एकजालसमाहितम्। तत्थ मे मरणं सेय्यो यं चे जीवे तया विना॥' (गाथा ७३) "यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि। विषमग्नि जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥" (वा० रा० २।२९।२१) पूर्वोद्धृत गाथा में मद्दी ने तो स्पष्टतः सीता का उल्लेख किया है।२ बुल्के कहते हैं "वेस्सन्तर जातक का रचयिता रामकथा से परिचित था, लेकिन वह रामायण भी जानता था, इसके लिए वेस्सन्तर जातक में कोई आधार नहीं मिलता।"३ वस्तुतः रामायण की कथावस्तु का ज्ञान रामायण से ही हो सकता हूँ। उससे भिन्न अनुपलब्ध एवं अश्रुत उपाख्यानों एवं गीतों को गाथाओं का आधार मानना सर्वथा निर्मूल है। उपस्थित का परित्याग कर अनुपस्थित की कल्पना ही युक्ति-रहित एवं अमान्य है— "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्।" संबुला जातक इस 'जातक' की गाथा रामायण की कथा से कुछ मिलती है। गाथा (५१९) में पतिभक्त संबुला का वृत्तान्त दिया गया है। अपने कुष्ठरोगी पति राजकुमार सोत्थिसेन के साथ वनवासी बन कर उसकी सेवा में अपना जीवन बिताती है। किसी दिन दानव संबुला को वन में देखता है और उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता है। संबुला अस्वीकार करती है और सक्क (शक्र) द्वारा बचायी जाती है। इस घटना का वृत्तान्त सुनकर सोत्थिसेन अपनी पत्नी के सतीत्व पर सन्देह करता है। यह देख कर संबुला एक 'सच्चकिरियम् (सत्यक्रिया) द्वारा अपने पति को नीरोग कर देती है। "तथा मं सच्चं पालेतु पालयिस्सति चे ममं। यथानं नाभिजानामि अञ्जं पियतरं तया॥ रतेन सच्चवज्जेन व्याधि ते वूपसम्मति (उपशमति)।" (गाथा २७) १. रामकथा—पृष्ठ ९९-१००। २. "तं चाहं नातिमण्णामि रामनि सीता वनुब्बता।" (५४१) ३. 'रामकथा' पृ० १००।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७५ इसके बाद दोनों राजधानी लौटते हैं। कृतघ्न सोत्थिसैन अन्य स्त्रियों के साथ विलास करके अपनी पत्नी को दुःख देता है। अन्त में अपने पिता के कहने पर वह संबुला से क्षमा माँगता है और दोनों का जीवन सुखमय बन जाता है। संबुला और सीता दोनों वनवासी पति की सेवा करती हैं। संबुला की सच्चक्रिया सीता की अग्निपरीक्षा के समय की शपथ का स्मरण दिलाती है। दानव और रावण दोनों की धमकी में भी शाब्दिक समानता मिलती है। “यदि तुम मेरी महिषी बनने के लिए सहमत न हुई तो तुम मेरा प्रातः का भोजन (पातराशाय—प्रातराश) बन जाओगी। “नो चे तुवं महेसेय्यं संबुले कारयिस्ससि । अलं त्वं पातरासाय मज्जे भक्खा भविस्ससि ॥” ( गाथा १० ) "द्वाभ्यामूर्ध्वं तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् । मम त्वां प्रातराशार्थे सूदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः ॥”१ ( वा० रा० ५।२२।९ ) यह कथा भी परम प्रसिद्ध एवं व्यापक रामायण की रामकथा के अंश का सङ्कलन ही प्रतीत होती है। इन कथाओं को रामकथा का मूल मानना उपहासास्पद है । महासुतसोम जातक इस जातक की गाथा (नं० ५३७) भी अत्यन्त एकदेशीय है। 'महासत्तो' (बोधिसत्त्व) एक 'पोरिसाद' (पुरुषाद) को भर्त्सना देकर कहता है— “पञ्च पञ्चनखा भक्खा खत्तियेन पजानता । अभक्खं राजा भक्खेसि ततमा अधम्मिको तुव ॥ ( गाथा ५८ ) यह राम के प्रति वाली की उक्ति का स्मरण दिलाता है— “पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव ।” ( वा० रा० ४।१७।३९ ) श्वाविधं शल्यकं गोधां खड्गकूर्मशशांस्तथा । भक्ष्यान् पञ्चनखेष्वाहुः” ( मनु० ५।१८ ) दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान है कि “जातकों के साहित्य से वाल्मीकि ने अपनी सामग्री प्राप्त की है और इसे अपनी अमर रचना के नये साँचे में ढाला है।” किन्तु यह मत प्रमाणशून्य है। जातकों में रामकथा से सीधा सम्बन्ध रखनेवाली सामग्री इस प्रकार है— 'शोकापनोदन' का एक छोटा सा भाषण, जलक्रिया के विषय में एक गाथा, राम के राज्यकाल के विषय में एक गाथा, राम का दण्डकारण्य में वनवास का उल्लेख और सीता का अपने पति के साथ वन गमन का उल्लेख । इसके अतिरिक्त वेस्संतरजातक की कथावस्तु रामायण के वृत्तान्त से कुछ मिलती जुलती है । संबुला तथा महासुतसोम जातक में एक गाथा पायी जाती है। जिसका रूपान्तर रामायण में भी मिलता है। सामजातक का वृत्तान्त सम्भवतः दशरथ द्वारा अन्धमुनिपुत्र के वध की कथा का आधार माना जा सकता है। १. रामकथा, पृष्ठः १०१ ।
१७६ रामायणमीमांसा पञ्चम बुल्के कहते हैं “इस सामग्री की अल्पता का ध्यान रखकर यह निस्सङ्कोच कहा जा सकता है कि समस्त रामायण का आधार पाली गाथाओं में ढूंढना व्यर्थ है। रामायण रामकथा-सम्बन्धी आख्यान काव्य पर निर्भर है और इस आख्यान काव्य की थोड़ी सी सामग्री पाली गाथाओं में आ गयी है। इसका अर्थ यह है कि जिस समय पाली तिपिटक बनता रहा ( चौथी शताब्दी ई० पू० ) उस समय रामकथा को लेकर पर्याप्त मात्रा में आख्यान-काव्य की रचना हो चुकी थी । आगे बढ़कर यह भी कहा जा सकता है कि रामायण की भी रचना हो चुकी थी ।” बुल्के कहते हैं “उपर्युक्त सामग्री से ऐसा प्रतीत नहीं होता । सामजातक के अतिरिक्त पाली तिपिटक में केवल पांच गाथाओं में रामायण के श्लोकों से शाब्दिक समानता पायी जाती है। यदि रामायण जैसे महाकाव्य की रचना हुई होती तो गाथाओं के कवि इससे कहीं अधिक प्रभावित हुए होते । इसके अतिरिक्त रामायण की अपेक्षा पाली तिपिटक की सामग्री पुराने आख्यान काव्य की शैली और छन्द से कहीं अधिक निकट है। सामजातक के वृत्तान्त में भी सम्भवतः अन्धमुनि-पुत्र के वध की कथा का प्राचीन रूप सुरक्षित है ।”१ बुल्के के कथनानुसार सामजातक का वृत्तान्त सम्भवतः दशरथ द्वारा अन्धमुनि के पुत्र के वध की कथा का आधार माना जा सकता है। परन्तु वह सङ्गत नहीं है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण बुद्ध से अति प्राचीन है। आधुनिक दृष्टिकोण से भी मुनि-पुत्र के क्रोध न करने और पुनर्जीवित हो जाने आदि कथाओं का वाल्मीकिरामायण में अनुकृत न होने से रामायण में उनका अनुकरण सङ्गत नहीं । उपर्युक्त उद्धरणों से यह भी स्पष्ट है कि रामायण के रचना-काल-सम्बन्धी ( बुल्के द्वारा दिये गये ) तर्क भी निस्सार हैं, क्योंकि उनके ही कथनानुसार पर्याप्त मात्रा में आख्यान काव्यों की रचना हो चुकी थी; फिर 'गाथा' के कवि उनसे क्योंकर प्रभावित नहीं हुए ? साथ ही एक और प्रश्न उठता है । अपार बौद्ध-साहित्यान्तर्गत रामकथा सम्बन्धी सामग्री इतनी कम मात्रा में क्यों मिलती है ? वस्तुतः तो रामकथासम्बन्धी उपाख्यानों एवं गीतों का मूल भी वेद, उपनिषद् और वाल्मीकिरामायण ही हैं । रामायण महाकाव्य के विद्यमान रहने पर भी बुद्ध के अनात्मवाद, अनीश्वरवाद और वेदाप्रामाण्यवाद का प्रभाव होने के कारण बौद्धों की वेद, उपनिषद् और वाल्मीकिरामायण की ओर प्रवृत्ति कम ही हुई। बुल्के भी स्वीकार करते हैं कि “आगे चलकर बौद्धों में रामकथा की लोकप्रियता घटने लगी” ।२ सर्वसम्मति से उस समय रामायणमहाकाव्य के विद्यमान रहने पर भी ऐसा क्यों हुआ ? इसका कारण कहा ही जा चुका है । तिपिटक के ५४७ जातकों में यक्ष, दानव, नाग, रक्खस, बन्दर और अन्य असंख्य पशु आदि के विषय में कितनी ही कहानियाँ मिलती हैं; परन्तु कहीं भी राक्षस रावण अथवा हनुमान् आदि रामायण के अन्य कपियों का उल्लेख नहीं हुआ है । निष्कर्ष यह कि तिपिटक के रचनाकाल में रामकथासम्बन्धी स्फुट आख्यान काव्य प्रचलित हो चुका था । लेकिन रामायण की रचना उस समय नहीं हो पायी थी ।”३ उपर्युक्त उद्धरण के अनुसार 'तिपिटक' के ५४७ जातकों में राक्षस रावण और हनुमान् आदि का उल्लेख न होना रामायण के रचनाकाल के निर्णय के अपर्याप्त प्रमाण है। केवल इस आधार पर यह कदापि नही कहा जा सकता कि उस समय रामायण की रचना ही नहीं हुई थी । स्वयं बुल्के के कथनानुसार रामकथासम्बन्धी अन्य उपाख्यान पर्याप्त मात्रा में प्रचलित थे ही । अतः प्रश्न होता है कि फिर भी राक्षस रावण और हनुमान् का उल्लेख क्यों नहीं हुआ ? किसी ग्रन्थ में किसी अन्य ग्रन्थ का अनुल्लेख या उसकी कथावस्तु का अनुल्लेखमात्र से यह नहीं कहा जा सकता कि वह ग्रन्थ अथवा उसकी कथावस्तु का अस्तित्व ही नहीं था । स्वयं बुल्के भी यह न कह सकेंगे कि उस समय तक रावण और हनुमान् उत्पन्न ही नहीं हुए थे या उपाख्यानों में उनका वर्णन नहीं था । वाल्मीकिरामायण पर बौद्ध प्रभाव के प्रसङ्ग में बुल्के का यह कहना कि 'पाली-तिपिटक की रचना १. रामकथा, पृष्ठ १०३ । २. रामकथा, पृष्ठ ६४ अनुच्छेद ५४ । ३. वही; पृष्ठ १०३ ।
रामायण के पहले हुई थी, अतः रामायण पर बौद्ध प्रभाव का पड़ना असम्भव नहीं कहा जा सकता ।" १ सर्वथा असङ्गत है यह बात पीछे कही जा चुकी है। जैसे मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों के रहने पर भी उनके ईश्वरवाद, आत्मवाद एवं यज्ञवाद का प्रभाव त्रिपिटक पर इसलिए नहीं पड़ा कि बौद्ध उनके विरोधी थे। इसी लिए रामायण के रहने पर भी बौद्धों के ग्रन्थों पर उसका प्रभाव कम पड़ा है। पूर्ववर्ती रामायण पर त्रिपिटक का प्रभाव न होना ठीक ही है। दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान है कि "वाल्मीकि ने एक विशेष उद्देश्य से दशरथजातक का सरल वृत्तान्त विकसित कर दिया है। बौद्ध तपस्या और भिक्षुपन की प्रतिक्रिया स्वरूप आदि कवि ने रामायण में हिन्दूगृहस्थ जीवन का आदर्श अपने पाठकों के सामने रखा है।" ह्वीलर भी रामायण का उद्देश्य बौद्धों के साथ जोड़ते हैं। इनके अनुसार रामायण का समस्त काव्य ब्राह्मण और बौद्ध दोनों धर्मों के सङ्घर्ष का प्रतीक है, उसमें सिंहलद्वीप के बौद्धों के प्रति वाल्मीकि का विरोध और द्वेष प्रकट है।२" बुल्के स्वयं ही उपर्युक्त मतों का खण्डन करते हैं। उनके कथनानुसार "लङ्का और सिंहलद्वीप की अभिन्नता संदिग्ध है। राक्षस ब्राह्मणों के विरोधी अवश्य हैं, लेकिन वे स्वयं भी यज्ञ करते हैं और नरभक्षी भी कहे जाते हैं। रामायण में जो राक्षसों का चित्रण मिलता है उसमें उनके बौद्ध होने का कोई निर्देश नहीं मिलता।"३ इसके अतिरिक्त जब यह सिद्ध है कि रामायण की रचना बुद्ध के जन्म से पहले हो चुकी थी तब उसमें बौद्ध के द्वेष की कल्पना ही क्योंकर सम्भव हो सकती है ? रामायण में जाबालि-वृत्तान्त के अन्तर्गत बुद्ध के लिए 'चोर' और 'नास्तिक' शब्दों का प्रयोग अवश्य ही हुआ है— “यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि ।” ( वा० रा० २।१०९।३४ ) इसी आधार पर ह्वीलर का कथन है कि “जाबालि बौद्ध-धर्म के प्रतिनिधि हैं और राम उनके विरुद्ध ब्राह्मण-धर्म का पक्ष लेते हैं ।"४ इस पहलू पर भी ह्वीलर से बुल्के का मतभेद है। "बुल्के के अनुसार जाबालि बौद्ध- धर्म का पक्ष न लेकर लोकायत ( चार्वाक ) दर्शन का प्रतिपादन करते हैं और राम उसका खण्डन करते हुए नास्तिकों के प्रसङ्ग से बुद्ध का उल्लेखमात्र करते हैं। वस्तुतः जाबालि केवल लोकायत मत का ही नहीं किन्तु बौद्ध धर्म का भी प्रतिपादन करते हैं। बौद्धों के क्षणभङ्गवाद के अनुसार ही जाबालि भी कहते हैं— “अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते ।” ( वा० रा० २।१०८।१०) । क्षणभङ्गवाद के अनुसार पिता-पुत्र में कार्य-कारण भाव नहीं बन सकता । यद्यपि विज्ञानसन्तान में कार्यकारणभाव होता है तथापि निमित्तकारण की ही उपपत्ति होती है, उपादानकारण की नहीं। “बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च ॥” ( वा० रा० २।१०८।११ ) पिता जन्तु का बीज ( निमित्त ) मात्र होता है; जैसे यूका, लिक्षा आदि मनुष्य से उत्पन्न होने पर भी उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं बनता वैसे ही तुम्हारा भी दशरथ से कोई सम्बन्ध नहीं। “दानसंवनना होते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः । यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व सन्त्यज ॥” १. रामकथा, पृष्ठ १०४, अनुच्छेद ९० । २. वही, पृष्ठ १०४ । ३. रामकथा, पृष्ठ १०४ । ४. वही, पृष्ठ १०५ । ५. वही, पृष्ठ १०५ । २३
१७८ रामायणमीमांसा पञ्चम इसी प्रकार के १६ वचनों के द्वारा जाबालि ने बौद्धों के समान ही वेदादि-शास्त्रों का अप्रामाण्य और यज्ञ, तप, दान एवं दीक्षा आदि को निरर्थक कहा है। अस्तु, वेदप्रामाण्यबाधक होने के कारण ही राम ने चोरतुल्य बौद्धादि नास्तिकों को धर्मानुसारी राजा द्वारा दण्डनीय कहा है। बुल्के के मतानुसार “बुद्धसम्बन्धी श्लोक गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठों में अप्राप्त होने के कारण प्रक्षिप्त हैं।” परन्तु उनकी यह मान्यता सङ्गत नहीं, क्योंकि दाक्षिणात्य पाठ में, जो परम प्रामाणिक मान्य है, उक्त श्लोक प्राप्त हैं । हाँ, यहाँ शङ्का की जा सकती है कि जब बुद्ध के जन्म के पूर्व राम के राजसिंहासन होने के समय रामायण का निर्माण हुआ तो उसमें बुद्ध का उल्लेख क्यों कर सम्भव हुआ ? परन्तु उस शङ्का का खण्डन बहुत ग्रन्थों के ही आधार पर हो जाता है । बुद्धजातकों तथा लङ्कावतारसूत्र के अनुसार अनेकों बुद्ध गौतम-बुद्ध के पूर्व भी हुए थे। त्रेताकालीन लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले बुद्ध त्रेता में भी थे। अतः राम के द्वारा बुद्ध का उल्लेख असङ्गत नहीं । आदिरामायण की चर्चा भी व्यर्थ है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण से भिन्न आदिरामायण नामक किसी ग्रन्थ का अस्तित्व प्रमाणशून्य है । बुल्के के कथनानुसार “रामायण के रचना-काल में कोशल में बुद्ध-धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था, अतः यह असम्भव नहीं कि वाल्मीकि ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में रहते हुए भी परोक्षरूप से बौद्ध आदर्शों से प्रभावित हुए थे । सीता का हिंसा के विरुद्ध भाषण, जो बौद्ध अहिंसा का स्मरण दिलाता है; प्रक्षिप्त माना जा सकता है । लेकिन राम का अत्यन्त शान्त और कोमल स्वभाव, उनकी सौम्यता आदि ध्यान में रखकर स्वीकार करना पड़ता है कि वे मुनि पहले थे, क्षत्रिय बाद में । अतः इनके चरित्रचित्रण में किञ्चित् परोक्ष बौद्ध प्रभाव देखना निर्मूल कल्पना नहीं प्रतीत होती है ।”१ परन्तु उनका यह कथन निरर्थक है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों एवं रामायण आदि सभी भरतीय ग्रन्थों में विविध प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन मिलता है। जिन अति प्राचीन उपनिषदों का लक्ष्य ही मुनिजनसम्मत अखण्ड अनन्त परब्रह्म का निरूपण है और जिनका आदर्श ही शान्ति, दान्ति, उपरति और तितिक्षा है उनमें भी क्रूर मारणादि प्रयोगों के वर्णन मिलते हैं, परन्तु उनका लक्ष्य भी उग्र प्रकृतिवाले जनों को वैदिक कर्म-काण्ड में विश्वास दिला कर उनको भी निवृत्तिमार्ग की ओर अग्रसर कर देना ही है। महाभारत में भी जहाँ भीम जैसे उग्रतेजा का वर्णन है वहीं राम जैसे ही परम शान्त युधिष्ठिर का भी वर्णन है। शान्ति, दान्ति और अहिंसा आदि का महत्त्व एवं गौरव वैदिक धर्म में बौद्ध धर्म के पूर्व से ही विद्यमान है। वेद, उपनिषदादि अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ हैं और उनमें वर्णित वसिष्ठ, वामदेव, शुक, सनकादि महर्षियों के चरित्र इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। वस्तु- स्थिति तो यह है कि अति प्राचीन वेद, उपनिषद्, रामायण एवं महाभारतादि ग्रन्थों से ही सत्य, अहिंसा आदि को बौद्धों ने कुछ विकृत रूप में अपनाया है । मनु का माहात्म्य शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित है; रामायण तथा महाभारत में भी उनका नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। इन्हीं मनु महाराज के द्वारा वर्णित अहिंसा और संन्यास-धर्म की शान्ति, दान्ति और अहिंसा आदि का सम्यक् अनुकरण भी बौद्ध नहीं कर पाये । सीता के अहिंसासम्बन्धी भाषण और राम के सौम्य स्वभाव वर्णन पर परोक्षरूप से बौद्ध प्रभाव मानना सर्वथा निर्मूल ही है । जिन वेदों, उपनिषदों तथा मन्वादि शास्त्रों का प्रभाव बौद्धों की विकृत अहिंसा और शान्ति पर पड़ा था उनके अनुसार सीता और राम की अहिंसा, शान्ति आदि समझनी चाहिये । * १. रामकथा, पृष्ठ १०५ ।
षष्ठ अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनायें डा० वेबर का मत डा० वेबर के मतानुसार रामकथा के दो मूल स्रोत है—एक दशरथजातक और दूसरा होमर का काव्य । बुल्के के लेखानुसार ही डा० वेबर के मत से अन्य कोई भी विद्वान् सहमत नहीं । वे स्वयं डा० वेबर के मत का खण्डन करते हैं । “होमर के काव्य में नावों को बहुत महत्त्व दिया गया है । यदि वाल्मीकि इससे परिचित होते तो उन्होंने सेना को समुद्र पार पहुँचाने के लिए सेतु के स्थान पर नावों का सहारा अवश्य लिया होता । होमर तथा वाल्मीकि की रचना में जो साम्य ( स्त्री का हरण तथा धनुष-सन्धान ) है वह इतना सामान्य और साधारण है कि जब तक अन्य विशेषताओं में कोई साम्य नहीं मिलता तब तक पारस्परिक प्रभाव मानने की आवश्यकता नहीं ।”१ वस्तुतः उपर्युक्त पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों ही अकिञ्चित्कर हैं । वाल्मीकि वेद से परिचित थे; ऋग्वेद में बड़ी से बड़ी समुद्री नावों का वर्णन है । तुग्रपुत्र भुज्यु की नाव के समुद्र में भग्न हो जाने पर अश्विनों ने अपनी सौ यन्त्रोंवाली शतारित्रा नाव से भुज्यु को उसके पिता के पास पहुँचाया था । गङ्गा पार करने के लिए राम ने भी नाव का उपयोग किया ही था । महर्षि वाल्मीकि को सत्य घटना का वर्णन अपेक्षित था । किसी काव्य-कल्पना अथवा किसी का अनुसरण नहीं करना था । उन्होंने वेदों तथा उपनिषदों के अध्ययन से जो प्राप्त किया और परम्परा से जो सुना, उसका ब्रह्माजी के आदेश से समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा साक्षात्कार कर उसी का उल्लेख किया । उनका यह रामायण किसी अन्य पुस्तक या आख्यान से प्रभावित नहीं है । भले ही, सर्वज्ञ होने के कारण उनको रामायण-निर्माण के पूर्व ही पीछे घटी हुई एवं भविष्य में होनेवाली घटनाओं का ज्ञान रहा होगा तो भी उन्होंने रामायण में रामचरित्र की घटनाओं एवं वस्तुस्थिति का क्रमिक एवं यथार्थ ही वर्णन किया है । महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे और होमर आदि अत्यन्त अर्वाचीन हैं, अतः होमर के काव्य को रामायण का आधार मानना युक्तिसङ्गत नहीं है । डा० याकोबी का मत डा० याकोबी के अनुसार “रामायण की रामकथा स्पष्टतया स्वतन्त्र भागों के संयोग से उत्पन्न हुई है । प्रथम भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ प्रधान नायक हैं । द्वितीय भाग में दण्डकारण्य तथा रावण सम्बन्धी कथा मिलती है । इसका मूलस्रोत देवतासम्बन्धी कथाएँ प्रतीत होती हैं । बहुत से विद्वान डा० याकोबी के इस मत का आजकल भी समर्थन करते हैं । डा० याकोबी के अनुसार वैदिक सीता और रामायण की सीता की अभिन्नता असन्दिग्ध है ।२ इसके अतिरिक्त गृह्यसूत्रों में सीता को पर्जन्यपत्नी कहा गया है । इससे स्पष्ट है कि राम इन्द्र का एक अन्य रूपमात्र हैं । वैदिक साहित्यमें इन्द्र का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वृत्र-वध है । इन्द्र वृत्र या अहि को मार कर पर्वत में रोके हुए पानी को विमुक्त कर देते हैं । सायण के अनुसार वृत्र का अर्थ मेघ है जिसमें पानी वृत्र के ही द्वारा रोका जाता है । इन्द्र १. रामकथा, पृष्ठ १०७ । २. वही, पृ० १०८ ।
और वृत्र का यह वृत्तान्त राम और रावण के युद्ध के रूप में प्रतिबिम्बित होता है। अतः रावण और वृत्र का मूलरूप एक है। इसके अन्य लक्ष्य भी मिलते हैं—रावण के पुत्र मेघनाद की उपाधि इन्द्रजित् है और उसका भाई कुम्भकर्ण एक गुफामें रहकर वृत्र का स्मरण दिलाता है। इन्द्र का दूसरा कार्य पणियों द्वारा चुराई हुई गायों की पुनः प्राप्ति है (ऋ० सं० २।१२)। देवसुनी शरमा रसा नदी को पार कर इन गायों का पता लगाती है (ऋ० सं० १०।१०८)। वैदिक काल में पशुपालन करनेवाले आर्यों के लिए गायों का जो स्थान था वही कृषकों के लिए खेती की सीता का था, अतः गायों का हरण सीता-हरण में बदल गया। जिस तरह सरमा इन्द्र की सहायता करती है उसी तरह हनुमान् भी राम के लिए सीता की खोज करते हैं। हनुमान् का गाँवों में लोकप्रिय होने का एकमात्र कारण यही हो सकता है। याकोबी के अनुसार हनुमान् कृषि से सम्बद्ध कोई देवता थे। सम्भवतः वर्षाकाल के अधिष्ठाता देवता हों। वह वायु-पुत्र हैं। बादलों के समान कामरूपी हैं और आकाश में उड़ते हैं। वह भी दक्षिण की ओर से, जहाँ से वर्षा आती है, सीता अर्थात् कृषि सम्बन्धी शुभ समाचार लेकर राम के पास पहुँचते हैं। इस सबके अतिरिक्त इन्द्र का एकनाम शिप्रवत् भी है (ऋ० ६।१७।२)। निरुक्त में "शिप्रे हनू नासिके वा" उल्लेख है। इससे इन्द्र और हनुमान् इन दोनों का वर्षा के देवताओं से सम्बन्ध निर्दिष्ट होता है। लक्ष्मण रामके सहायकमात्र हैं। वे कहीं भी घटनाओं की प्रगति को बदलने की चेष्टा नहीं करते। फिर भी उनका वैदिक देवता मित्र से सम्बन्ध असम्भव नहीं, क्योंकि वे सुमित्रा के पुत्र हैं।" डा० याकोबी के उपर्युक्त मत की समालोचना करते हुए बुल्के कहते हैं कि उनका मत कल्पनाप्रधान है। इस कल्पना को प्रमाणित करने के लिए तर्क कम हैं। रामायण की सीता के वृत्तान्त पर वैदिक सीता के व्यक्तित्व का प्रभाव हम भी मानते हैं, लेकिन दोनों में समानता की अपेक्षा भिन्नता अधिक है।" यद्यपि बुल्के का यह कथन कि डा० याकोबी का मत कल्पनाप्रधान है, ठीक है; तथापि उनका भी मत निराधार है। पिछले प्रकरणों में मैंने यह सिद्ध किया है कि कृषि की अधिष्ठात्री देवता रामायण की सीता का ही एक अंश है। इसी तरह राम और वृत्रहन्ता देवराज इन्द्र दोनों भिन्न हैं। तथापि "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (बृ० उ० २।५।१९) इत्यादि स्थलों पर परम ऐश्वर्य के योग से परमेश्वर में इन्द्रपद का प्रयोग हुआ है। वही परमेश्वररूप इन्द्र राम के रूप में अवतीर्ण होते हैं। इतना ही नहीं, देवराज इन्द्र परमेश्वर इन्द्र रूप राम का ही एक अंश हैं। इन्द्र और उपेन्द्र का असाधारण सम्बन्ध भी प्रसिद्ध है, अतः इन्द्र-पत्नी और पर्जन्य-पत्नी शब्दों का प्रयोग भी रामायणीय सीता की अंशभूत कृषि की अधिष्ठात्री देवता में युक्त ही है। बुल्के कहते हैं कि "हनुमान् के सम्बन्ध में डा० याकोबी का यह अनुमान ठीक है कि रामायण में उनका उल्लेख उनकी लोकप्रियता का एकमात्र कारण नहीं हो सकता। इसका कारण यही हो सकता है कि प्राचीन यक्ष पूजा के साथ हनुमान् का सम्बन्ध स्थापित किया गया है", किन्तु उनका यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि वेदों, रामायणों तथा प्राकृत भाषा के ग्रन्थों में सर्वत्र रामकथा तथा राम का महत्त्व वर्णित है। महाभारत के भीम और अर्जुन के परम हितकर और पूज्य होने के कारण भी उनका महत्त्व है। निर्गुणवादी कबीर प्रभृति भी रामनाम का सहारा लेते रहे हैं। रामनाम का माहात्म्य अत्यन्त प्रसिद्ध है। राम के परम-प्रिय भक्त तथा सीता के परम कृपा- पात्र होकर उनसे अगणित वरदान प्राप्त करने के कारण ही हनुमान् की प्रख्याति बढ़ी। उसी के प्रभाव से राम- भक्ति और रामतत्त्व-ज्ञान के अतिरिक्त लौकिक अभीष्ट सिद्धि भी हनुमान् की पूजा से प्राप्त होने के कारण सर्व- साधारण में उनका महत्त्व और बढ़ गया। महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने राष्ट्रोद्धार के लिए गाँव-गांव में हनुमान् महावीर की स्थापना की। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस, हनुमान्- चालीसा, सङ्कटमोचन आदि ग्रन्थों एवं रामलीलाओं के विस्तार से घर-घर हनुमान् की पूजा लोकप्रिय हुई। यक्षरूप हनुमान् की पूजा का कोई प्रमाण कहीं भी प्राप्त नहीं होता। ऐसी निराधार कल्पना पाश्चात्यों के उच्छृङ्खल मस्तिष्क
अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १८१ की ही उपज है। अस्तु, जैसे बुल्के के कथनानुसार ही डा० याकोबी का यह मत कि वर्षाकाल के किसी अधिष्ठाता देवता अथवा इन्द्र से हनुमान् की अभिन्नता में कोई प्रमाण या सङ्केत नहीं है वैसे ही बुल्के की उक्त कल्पना भी सर्वथा निराधार ही है क्योंकि उसमें भी कोई प्रमाण नहीं है । डा० हॉपकिन्स के अनुसार महाभारत के 'शान्तिपर्व' में जो रामकथा मिलती है उससे डा० याकोबी के कथन की पुष्टि होती है । इस कथा में जो रामचरित्र मिलता है वह किसी प्राचीन देवतासम्बन्धी आख्यान पर आधारित होगा । बाद में इससे सीता कृषि की अधिष्ठात्री की कथा जोड़ दी गयी। अन्त में वाल्मीकि ने रावण, हनुमान्, लङ्का आदि का वृत्तान्त लेकर उसे बढ़ाया है। बुल्के का कहना है कि "राम का व्यक्तित्व इन्द्र की कथाओं से विकसित हुआ हो, यह तो शान्तिपर्व के प्रसङ्ग से विरुद्ध है। वहाँ १६ राजाओं के संक्षिप्त वृत्तान्त दिये गये हैं । ये सब राजा महान् थे, परन्तु सभी मर गये । अतः सृञ्जय को अपने पुत्र की मृत्यु के कारण शोक नहीं करना चाहिए। पर बेचारे बुल्के नहीं जान सके हैं कि राम विष्णुरूप से साक्षात् परमेश्वर परब्रह्म हैं। उनका जन्म और मरण दोनों ही अतात्त्विक हैं। अवतार लीला में वे नर के तुल्य उत्पन्न हुए और असाधारणरूप से रामरूप से विष्णु- रूप में परिवर्तित हो साकेत धाम चले गये । यह तथ्य वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के वर्णन से अत्यन्त स्पष्ट है तथापि सृञ्जय को धैर्य बँधाने के लिये अत्यन्त स्थूल दृष्टि से उनके भी मर्त्यलोक से प्रस्थान करने की चर्चा की गयी है। “स चतुर्दश वर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः । दशाश्वमेधान् जाहूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥” ( म० भा० १२।२९।५३ ) इस पद्य में चौदह वर्ष पर्यन्त वनवास के बाद अश्वमेध किये जाने का स्पष्ट उल्लेख है । हापकिन्स के अनुसार यहाँ वनवास का अभिप्राय वानप्रस्थाश्रम से है, परन्तु यह मान्यता भी असङ्गत है, क्योंकि वानप्रस्थाश्रम में काल की सीमा नहीं बाँधी जाती हं और न उससे लौट कर आना ही सम्भव होता है । अतः यहाँ वनवास का वानप्रस्थ अर्थ नहीं किया जा सकता, इसलिए उक्त श्लोक वाल्मीकिरामायण की कथा के अनुसार ही है। वाल्मीकिरामायण की कथा मुख्यरूप से वेदों पर ही आधारित है । वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का उपबृंहण ही मानते हैं, यह सिद्धान्त मन्त्ररामायण के विवरण से स्पष्ट है । परन्तु पाश्चात्य लोग अपनी कल्पनाओं के आधार पर उस सिद्धान्त को दूषित करने का प्रयास करते हैं । इन्द्र, वृत्र आदि शब्द प्रत्यक्ष वृत्ति से देवराज इन्द्र तथा वृत्रासुर के बोधक होते हुए भी परोक्ष वृत्ति से राम और रावण के बोधक भी होते हैं । डा० वान नेगेलैन के अनुसार भी रामकथा वैदिक साहित्य सामग्री से ही विकसित हुई है । "बुल्के उसे कष्टकल्पना ही मानते हैं । 'पुरूरवा उर्वशी' ( ऋ० सं० १०।९५ ), 'रामः पृथुवैन्यः' ( ऋ० सं० १।११२ ) उर्वशी आदि अप्सराओं का मनुष्यों के साथ विवाह रामकथा का बीज है। सीता के सौन्दर्य और उनके अलौकिक जन्म का उल्लेख उनके अप्सरा होने का निर्देश है। सीता पृथ्वी के मानवीकरण का परिणाम है। राम और पृथु वैन्य ( ऋ० सं० १।११२।१५ आदि ) अभिन्न हैं ।'” कष्टकल्पना तो नहीं, परन्तु विकृत कल्पना अवश्य ही हैं। रामायण के राम को वैदिक पृथु (वैन्य ) से भिन्न मानने पर भी वहीं वर्णित राम से तो अभिन्न मानना ही होगा। प्रत्यक्ष रूप से पुरूरवा और उर्वशी राम एवं सीता से भिन्न होने पर भी परोक्षरूप से अभिन्न ही हैं । गीता के अनुसार जो भी विभूतिमत् ऊर्जित सत्त्व है वह सब भगवान् का अंशविशेष है— १. रामकथा, पृ० १११ ।
१८२ रामायणमीमांसा षष्ठ “यद् यद् विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम् ॥” ( गी० १०।४१ ) डा० याकोबी यह भी कहते हैं कि “ईरानीय 'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूलस्रोत एक ही है । साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अवेस्ता के देवताओं के अस्पष्ट एवं धुंधले व्यक्तित्व के कारण इस प्रश्न का निर्णय असम्भव है । फिर भी अन्य अनेक ग्रन्थों की अपेक्षा अवेस्ता बहुत प्राचीन है । उसकी भाषा भी वैदिक भाषा के अत्यन्त निकट है, अतः वैदिक राम से अवेस्ता लेखक का प्रभावित होना असम्भव नहीं है । रामहुवास्त्र ( ह्वास्त्र ) का उल्लेख जेन्द अवेस्ता में प्रायः वायु तथा मिथ्र के साथ होता है । राम का अर्थ है शान्तिविश्राम, हुवास्त्र का अर्थ चरागाह है, 'रामहुवास्त्र' का अर्थ है चरागाह में विश्राम । कहा जाता है कि प्रारम्भ में वायु एवं मिथ्र देवता से 'रामहुवास्त्र' चरागाह में विश्राम माँगा जाता था। बाद में रामहुवास्त्र स्वयं देवता बन गया । साथ ही वह अ छा वायु स्वरूप हो गया । इसके नाम पर एक पूरा यश्त जेन्द अवेस्ता में मिलता है । इसका रचना-काल चौथी शती ई० पू० माना जाता है ।” वस्तुतः जैसे वेदों तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों में अपनी दुष्कल्पना भिड़ायी गयी है वैसी ही जेन्द अवेस्ता आदि में भी दुष्कल्पनाएँ की गयी हैं । जिस रामहुवास्त्र पर जेन्द का एक पूरा यश्त है उसका पीछे देवता बन जाने की बात दुरभिसन्धिमूलक ही हैं । वस्तुतः 'रामहुवास्त्र' का अर्थ है विश्राम का विस्तृत क्षेत्र; उसका रामायण के राम से स्पष्ट ही सम्बन्ध है । प्रसिद्ध भारतीय हनुमन्नाटक में रामायणीय दाशरथि राम के नाम को कविवरवचःस्तोम का विश्राम-स्थान कहा गया है— “विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानाम् ।” इसी तरह असीरियन देवता रम्मन अथवा रम्मान या हिब्रू भाषा का रिमोन, जो मेघगर्जन का देवता माना जाता है, भी रामायणीय राम से भिन्न नहीं है, कारण जैसे संसार के थाईलैण्ड आदि अनेक देशों में रामकथा का प्रसार हुआ वैसे ही असीरिया में रामकथा का प्रसार हुआ हो यह असम्भव नहीं है । भारत में भी देहातों में मेघ का गर्जना और बरसना राम का ही काम माना जाता है । हिब्रू में राम धातु का अर्थ है श्रेष्ठ । बाइबिल में इस धातु से अनेक नगरों के नाम तथा दो तीन व्यक्तियों के नाम भी मिलते हैं । ( दे० एफ० बिगू : दिक्सियोनेर दि ला बिबल, पेरिस ) यह भी वेदों एवं रामायणों के राम का परोक्ष प्रभाव ही है । दिनेशचन्द्र सेन के अनुसार “रामकथा के दो प्रधान स्रोत हैं दशरथजातक और दक्षिण में प्रचलित रावण-सम्बन्धी आख्यान । तीसरा गौण आधार हनुमान्सम्बन्धी सामग्री भी है । इसमें वानरपूजा का अवशेष भी पाया जाता है । रावण-सम्बन्धी आख्यानों में रावण की धार्मिकता, तपस्या तथा महत्त्व वर्णित है । इस मत की सिद्धि के लिए जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों का सहारा लिया जाता है । उनके अनुसार राम की अपेक्षा राक्षस और वानर अधिक लोकप्रिय थे । लङ्कावतारसूत्र में रावण तथा बुद्ध का धार्मिक संवाद वर्णित है, परन्तु राम-रावण युद्ध का किञ्चित् भी सङ्केत नहीं है । रावण रामकथा की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रसिद्ध था । धर्मकीर्ति ( ६ठी शती ई० ) आदर्श बौद्ध राजा रावण को रामायण के दोषारोपण से बचाने का प्रयत्न करता है ।'’ आश्चर्य है कि जब वेद, उपनिषद् एवं रामायण जैसे परम प्रामाणिक सद्ग्रन्थों में ऐतिहासिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक रूप से सुस्पष्ट सुबोध रामकथा वर्णित है तब पाश्चात्य विद्वान् उसको विकृत करने के लिए इतस्ततः कुशकाश का अवलम्बन करते हुए क्यों भटकते हैं ? यदि उनकी दृष्टि से वेद, उपनिषद् तथा रामायण प्रामाणिक नहीं हैं तो जातक एवं उपाख्यानों की प्रामाणिकता का आधार ही क्या है ? यदि रामायण किसी अन्य मूलस्रोत के आधार पर की गयी काव्यकल्पनामात्र है तो वह स्रोत तथा मूलभूत ग्रन्थ भी किसी अन्य मूलस्रोत के आधार पर
अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १८३ कल्पित कहे जा सकते हैं। इन बातों का उत्तर पाश्चात्यों एवं तदनुयायियों के पास नहीं है। तथापि वे अपनी उच्छृङ्खल कल्पनाओं से विरत नहीं होते । स्वयं बुल्के ही रावण को कहीं जैन-धर्मावलम्बी तो कहीं बौद्धधर्मावलम्बी कहते हैं । निश्चय ही इन दोनों कथनों में से एक तो भ्रामक है ही। जैन साहित्य में रावण की कथा स्वतन्त्ररूप से नहीं मिलती, रामकथा के अन्तर्गत ही उसका उल्लेख है। बुल्के के कथनानुसार "जैन साहित्य में प्रचलित रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण पर ही आधारित है। (५७ अनु० ) में वे कहते हैं— जैन-रामकथा में प्रारम्भ से ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावणादि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की छः महीने की निद्रा, रावण का राक्षस तथा सुग्रीव आदि का वानर होने आदि की असत्य कथाएँ पायी जाती हैं । इससे स्पष्ट है कि जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद उत्पन्न हुई है, अतः जैन-रामकथा में रामकथा का मूलस्रोत खोजना व्यर्थ है ।" बौद्ध लङ्कावतारसूत्र दिनेशचन्द्र सेन के मतानुसार "यह रचना पहले दूसरी शती ई० की मानी जाती थी और इसका प्रथम अध्याय जिसमें लङ्कापति रावण तथा बुद्ध का संवाद मिलता है, प्रामाणिक माना जाता था । लेकिन आजकल इसके प्रमाण मिलते हैं कि लङ्कावतारसूत्र चौथी शती ई० का है और उसका प्रथम अध्याय प्रक्षिप्त है। मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। गुणभद्र ने उसका ४४३ ई० में अनुवाद किया था। इसके चीनी अनुवाद में रावण-बुद्ध-संवाद नहीं मिलता और न रावण का कोई उल्लेख ही है। ५१३ ई० में इस रचना का पुनः चीनी भाषा में अनुवाद किया गया है और इस छठी शताब्दी के अनुवाद में एक नया प्रथम अध्याय मिलता है, जिसमें रावण धर्म के विषय में बुद्ध से प्रश्न करता है। इस अध्याय के प्रक्षिप्त होने के अन्तरङ्ग प्रमाण भी मिलते हैं। अन्य अध्यायों में गद्य और पद्य का सम्बन्ध ऐसा है कि पद्य गद्य का अर्थ दुहराता है तथा सारी रचना बुद्ध तथा बोधिसत्त्व महामति के संवाद के रूप में है। उसमें कहीं भी रावण का उल्लेख नहीं मिलता। केवल प्रथम अध्याय में पद्य गद्य का अर्थ नहीं दुहराता और इसमें ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो सूत्र को समझने के लिए आवश्यक हो। डी० टी० सुज़ुकि का अनुमान है कि रामकथा की लोकप्रियता के कारण लङ्कावतारसूत्र का सम्बन्ध इससे जोड़ा गया है। लङ्कावतार का अर्थ है बुद्ध का लङ्का में अवतार । लङ्का दक्षिण में मानी जाती थी । इसके अतिरिक्त इसमें रामकथा-विषयक कोई भी निर्देश नहीं मिलता । रावण सिंहलद्वीप का राजा हुआ हो इसके लिए भी वहाँ के प्राचीनतम ग्रन्थों में कोई प्रमाण नहीं पाया जाता । दीपवंश ( चौथी शती ई० ) तथा महावंश (पांचवीं शती ई० ) सिंहलद्वीप के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक काव्य हैं इनमें रामकथा का निर्देश मिलता है। लेकिन सिंहलद्वीप के राजा रावण का कही भी उल्लेख नहीं पाया जाता है।" ( अनु० १०३ में ) बुल्के का मत है कि "वाल्मीकि के पहले हनुमान् के विषय में आख्यान-काव्य प्रचलित रहा होगा और वाल्मीकि ने उसका प्रयोग अपनी रामकथा के लिए किया होगा, दिनेशचन्द्र की इस धारणा के लिए कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह अनुमानमात्र ही है। वैदिक साहित्य में हनुमान् का कहीं भी उल्लेख नहीं हुआ है। बौद्ध त्रिपिटक के जातकों में भी हनुमान् का नाम नहीं आया । अतः उनके विषय में रामकथा के पहले स्वतन्त्र आख्यान प्रचलित थे, यह बहुत सन्दिग्ध है। समुग्गजातक ( जातक नं० ४३६ ) में एक वायुरस पुत्त नामक विद्याधर, जो ऐन्द्रजालिक था, का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसके सम्बन्ध में न तो हनुमान् का उल्लेख हुआ है और न किसी अन्य वानर का । हनुमान् शब्द सम्भवतः एक द्रविड़ शब्द का रूपान्तर है। ( आण-नर, मन्दि-कपि ) जिसका अर्थ है 'नरकपि' । इसी कारण अनुमान किया गया है कि 'वृषाकपि' तथा हनुमान् दोनों किसी प्राचीन द्रविड़ देवता के नाम
१८४ रामायणमीमांसा षष्ठ के रूपान्तर हों। इस अनुमान का कोई आधार नहीं है, यह निर्मूल है। 'वृषाकपि' का अर्थ 'नरकपि' न होकर वराह अथवा एकशृङ्ग वराह होता है। महाभारत में वृषाकपि को अनेक आर्य देवताओं (विष्णु, शिव, इन्द्र आदि) से अभिन्न माना गया है। ऋग्वेद (१०।८६) में जो वृषाकपि का उल्लेख है वह सम्भवतः एक सूर्य देवता है जिसका प्रतीक वराह था, अतः ऋग्वेदोय वृषाकपि का द्रविड़ सभ्यता के साथ कोई भी सम्बन्ध प्रमाणित नहीं होता। यह अवश्य ही बहुत सम्भव है कि 'हनुमान्' नाम एक द्रविड़ शब्द का संस्कृत रूपान्तर है और इसका अर्थ 'नरकपि' है। कारण यह है कि रामायण के अन्य वानरों की तरह हनुमान् भी वानर-गोत्रीय आदिवासी थे। वह एक प्राचीन द्रविड़ देवता थे, इसके लिए सङ्केत भी नहीं मिलता। रामायण में हनुमान् की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति का सहारा तो लिया गया है फिर भी उनके देवता होने का कहीं भी उल्लेख नहीं हुआ है।'"१ उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि दिनेशचन्द्र के मत का खण्डन बुल्के स्वयं ही करते हैं। परन्तु बुल्के का कथन भी तर्क-सम्मत नहीं है। क्योंकि उपनिषद् भी वैदिक साहित्य है और रामतापनीय, रामरहस्य तथा मुक्ति- कोपनिषद् आदि उपनिषदों में हनुमान् का चरित्र वर्णित है। समुग्ग जातक के वायुस्स पुत्र नामक विद्याधर को भी हनुमान् ही समझना चाहिये, क्योंकि हनुमान् वायुपुत्र हैं ही। जैनों ने वानरों को विद्याधर माना ही है। साथ ही, जब हनुमान् द्रविड़ शब्द का संस्कृत रूपान्तर मान्य है और उसका अर्थ नरकपि है तो उसके द्रविड़ देवता होने में क्या आपत्ति है ? रामायण के अनुसार लाखों वर्ष प्राचीन राम एवं हनुमान् आदि की उपासना सर्वत्र होती आयी है। द्रविड़ देश में भी विष्णु-भक्ति का प्रचार बहुत प्राचीन है। श्रीमद्भागवत-माहात्म्य में तो यहाँ तक उल्लेख है कि भक्ति द्रविड़ देश में ही उत्पन्न हुई— “उत्पन्ना द्राविड़े साहं वृद्धि कर्णाटके गता।” (भाग० मा० १।४८) आज भी वैष्णव-मन्दिरों में द्रविड़ भाषामय प्रबन्ध बड़े आदर से पढ़े जाते हैं। अतः वहाँ राम के समान ही हनुमान् को भी देवता माना जाना असम्भव नहीं कहा जा सकता। इसी तरह हनुमान् को आदिवासी मनुष्य मानना भी रामायण से विरुद्ध है। पाश्चात्यों की निराधार कल्पनाओं से आर्ष रामायण का प्रामाण्य कहीं अधिक है। रामायण में स्पष्ट उल्लेख है कि रावण ने ब्रह्मा से वरदान माँगा था कि मैं नर एवं वानर से भिन्न अन्य किसी के द्वारा न मारा जा सकूँ। ब्रह्मा ने वैसा ही वरदान उसको दिया। तब सब देवताओं ने भगवान् विष्णु से रावण-वध की प्रार्थना की और भगवान् विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा कि तुम लोग वानर तथा ऋक्ष बनकर विष्णु की सहायता के लिए भूमि पर प्रकट हो जाओ। ब्रह्मा स्वयं जाम्बवान् हुए, रुद्र और वायु हनुमान् हुए, इन्द्र के अंश से वाली और सूर्य के अंश से सुग्रीव का आविर्भाव हुआ। रामसम्बन्धी उपनिषदों में भी इन बातों का वर्णन है। अतः यह कहना सर्वथा गलत है कि हनुमान् को देवता नहीं कहा गया है। इसी तरह हनुमान् की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति की कल्पना भी निर्मूल है, क्योंकि रुद्र साक्षात् परमेश्वर हैं। वायु से रहित होने पर प्रत्येक प्राणी की मृत्यु हो जाती है; अतः रुद्रावतार वायु-पुत्र हनुमान् की शक्ति का जो भी वर्णन है वह अपर्याप्त ही कहा जा सकता है। उसमें अतिशयोक्ति की कल्पना भी सम्भव नहीं। “पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः। उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम्॥ सत्यसन्धस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः। विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः॥ मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे।
१. रामकथा, पृष्ठ ११३-११५।