रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
ध्याय अवतार-सामग्री २८३ चतुर्दशसहस्रं च मात्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम् । तथा ग्रहसहस्रंतु मार्कण्डेयं महाद्भुतम् ॥ चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्च शतानि च । भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ४ ॥ अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल । तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्राह्मसंज्ञकम् ॥ द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम् । तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च ॥ अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च । चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक ॥ त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम् । चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम् ॥ षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञकम् । पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम् ॥ ९
तस्माद्भूतं भविष्यच्च वर्तमानमपि द्विजाः। वदन्ति सूक्ष्मं शास्त्राणि तेषु शङ्कां न कारयेत् ॥ (का० के० मा० १५।९-१०) काशीकेदारमाहात्म्य में कहा गया है कि वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि सभी युगों के अनुसार अनादि हैं, भगवान् के श्वासस्वरूप हैं। कभी वे मलिन कभी विशद होते हैं और वे भगवान् की प्रपञ्च-लीला का वर्णन करते हैं। उनमें भूत, भविष्य तथा वर्तमान का वर्णन होता है, अतः उनमें शङ्का नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार अन्य पुराणों और उपपुराणों में भी पुराणों तथा उपपुराणों के नाम एवं उनकी श्लोकसंख्या तथा कहीं कहीं अनुक्रमणिका भी निर्दिष्ट है। इससे पुराणों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। यदि कोई पुराण किसी आधुनिक वञ्चक द्वारा रचित होता तो अन्य पुराणों में उसका उल्लेख कैसे होता ? सभी को वञ्चक कहना तो किसी वञ्चक के लिए ही सम्भव है। प्रमाणरूप से आदृत इन अनेक ग्रन्थों में विभक्त अष्टलक्षाधिक श्लोकों का निर्माण करनेवाले लोग निर्माता के रूप में नाम न देते यह सर्वथा असम्भव ही है। अतः पाश्चात्यों तथा उनके अनुयायी भारतीयों की पुराणसम्बन्धी कालकल्पना सर्वथा अप्रामाणिक ही है। योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण को बुल्के १७४ वें अनुच्छेद में साम्प्रदायिक रामायण कहते हैं। इनका भी रचनाकाल एम्. विंटरनित्स तथा एस. एन्. दास गुप्ता ८वीं शती मानते हैं। डाक्टर वी. राघवन् ११वीं शती इनका रचनाकाल मानते हैं। यह कम से कम योगवासिष्ठ के तो सर्वथा विरुद्ध ही हैं। जिस ग्रन्थ के काल का विचार किया जाय यदि उसके कथन की उपेक्षा कर मनमाने ढङ्ग से काल का निर्णय किया जाने लगे तो किसी भी ग्रन्थ का मनमाना काल निर्धारित किया जा सकता है। योगवासिष्ठ के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ही उक्त ग्रन्थ के रचयिता हैं। ऐसी स्थिति में जो काल उन महर्षि का है वही योगवासिष्ठ का भी काल है। विंटरनित्स के अनुसार योगवासिष्ठ शङ्कराचार्य के अनुयायियों की कृति है। भीखनलाल आत्रेय के अनुसार ७वीं से ८वीं शती में उसकी उत्पत्ति हुई है। भर्तृहरि के वाक्यपदीय के एवं योगवासिष्ठ के कुछ श्लोक परस्पर मिलते जुलते हैं। भर्तृहरि का काल ७वीं शती माना जाता है। इस दृष्टि से भी कम से कम ई० सन् ६०० योगवासिष्ठ का रचनाकाल है। परन्तु यह सब वस्तुतः पाश्चात्य प्रभाव हैं। पाश्चात्य लोग संसार भर के सभी ग्रन्थों को हजार पन्द्रह सौ वर्ष के भीतर लाने का प्रयास करते हैं। योगवासिष्ठ के टीकाकार आनन्दबोधेन्द्रसरस्वती तथा अन्वयारण्य आत्मसुख, गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती आदि भी १६वीं शती के आसपास के हैं। मुकुन्द्यति के शिष्य रामवनस्वामी की व्याख्या योगवासिष्ठ पर है, वे १४वीं शती से पहले के हैं। उनकी रामार्चनचन्द्रिका का उल्लेख निर्णयसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थों में किया गया है। मधुसूदनसरस्वती १६वीं शती के आचार्य हैं। उनके सिद्धान्तबिन्दु तथा संक्षेपशारीरकव्याख्या में तथा गीताव्याख्या में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण है। गीता के ६-३२ तथा ३६वें श्लोकों की व्याख्या में योगवा- सिष्ठ के बहुत श्लोकों का उल्लेख हुआ है। 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की टीका में “वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु रुसिष्ठ- पराशरादिभिर्बहुधा गीतम् ।” श्रीधरस्वामो ने गीता की सुबोधिनी टीका में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण किया है। काश्मीरी विद्वान् गौड़ अभिनन्दी ने, जो ९वीं शती के थे, योगवासिष्ठसार नाम का ग्रन्थ लिखा है। आद्य श्रीशङ्कराचार्य ने श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्य में लिखा है— “तथा च—वासिष्ठयोगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम् । तथात्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥” इत्यादि चार श्लोक उन्होंने उद्धृत किये हैं। सनत्सुजातीयभाष्य में भी १।१५ से आद्यशङ्कराचार्य कहते हैं—“तथा चाह भगवान् वसिष्ठः—
अध्याय अवतार-सामग्री २८५ चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति । वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥” ३१ वें श्लोक में “तथा चाह भगवान् वासिष्ठः— यन्न सन्तं न चासन्तम् ॥” श्वेताश्वतर उपनिषद् शङ्कराचार्य का प्रधान ग्रन्थ है। शङ्करदिग्विजय में माधवाचार्य ने कहा है— “सन्तत्सुजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ॥” विवेकचूडामणि, लघुवाक्यादि में भी योगवासिष्ठ के भाव हैं । भारतीय परम्परा के अनुसार आद्यशङ्करा- चार्य का काल विक्रम से कई शती पूर्व है । फिर योगवासिष्ठ उनसे भी पहले का है ही । इसके अनुसार वसिष्ठ रामचन्द्र को मोक्षप्राप्ति पर विस्तृत उपदेश करते हैं । इस संवाद को वाल्मीकि अरिष्टनेमि को सुनाते हैं । अगस्त्य ने उसी का उपदेश सुतीक्ष्ण के लिए दिया है । योगवासिष्ठ में भी राम विष्णु के अवतार बताये गये हैं । वस्तुतः रामायण में वेद के पूर्वकाण्ड का ही उपबृंहण हं । वेद के उत्तरकाण्ड वेदशीर्ष वेदान्त का उपबृंहण योगवासिष्ठ या महारामायण में किया गया है। मर्यादापुरुषोत्तम राम ने जैसे वेद के पूर्वकाण्ड का स्वयं आचरण कर आदर्श उपस्थित करके लोकशिक्षा दी उसी तरह तीर्थयात्रा, परमवैराग्य एवं उत्तम मुमुक्षा से युक्त होकर उत्तम जिज्ञासु हो गुरुपसदनपूर्वक वेदान्तों के श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा तत्त्वसाक्षात्कार के सम्पादन का भी आदर्श उपस्थित कर लोकशिक्षा दी थी । इसी प्रकार अध्यात्मरामायण को भी साम्प्रदायिक एवं आधुनिक कहना वास्तविकता का अपलाप है, यह पीछे कहा जा चुका है। अध्यात्मरामायण और श्रीमद्भागवत ये दोनों ग्रन्थ रामचरितमानस के प्रमुख आधार हैं। अध्यात्मरामायण में राम को परब्रह्म, सीता को लक्ष्मी तथा लक्ष्मण को शेष कहा गया है। उसमें राम को विष्णु का अवतार भागवत का अनुकरण कर नहीं कहा गया है, किन्तु जन्म-समय में राम ने कौशल्या को विष्णुरूप में जो दर्शन दिया था उस वस्तुस्थिति के अनुसार ही कहा गया है। अहिल्योद्धार के अनन्तर केवट का वृत्तान्त दिया गया है। यौवराज्य अभिषेक के पूर्व राम-नारद-संवाद तथा मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश बताया गया है। रामनाम- महिमा के वर्णन प्रसङ्ग में वाल्मीकि की आत्मकथा, मायामयी सीता के हरण का वृत्तान्त, लक्ष्मण का द्वादशवर्ष तक उपवास, सेतुबन्ध रामेश्वर की स्थापना, कालनेमि का वृत्तान्त, रावण का शुक्र के परामर्श से यज्ञानुष्ठान करना और अङ्गद के द्वारा उसका भङ्ग किया जाना, रावण की नाभि में अमृत का होना, भगवत्पदप्राप्ति के उद्देश्य से रावण के द्वारा सीताहरण आदि इसकी विशेष कथाएँ हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में राम के माधुर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। भक्ति-सिद्धान्त में माधुर्य- प्रधान रूप का बड़ा महत्त्व है। उसमें लौकिक रूप का ही अधिकांश प्राकट्य होता है। रागानुगा स्वारसिकी प्रीति होती है । ऐश्वर्यप्रधान रूप में वह भक्ति नहीं हो पाती । एक माता अपने बालक में स्वाभाविक जितना स्नेह या प्यार कर सकती है उतना ईश्वर में नहीं कर सकती है, क्योंकि ऐश्वर्य में भय, संकोच आदि के कारण उद्दाम ममता और स्नेह नहीं बन पाता । यदि यशोदा कृष्ण को ब्रह्म या परमेश्वर समझती तो मृत्तिका-भक्षण के प्रसङ्ग से कृष्ण को उलूखल में बाँधने की हिम्मत कदापि नहीं कर सकती । इसी लिए मृद्भक्षण के प्रसङ्ग में मैंने मिट्टी नहीं खायी । ग्वालबाल सब मिथ्या बोलते हैं। तुझे विश्वास नहीं है तो मेरा मुंह देख ले, कृष्ण के यह कहने पर जब यशोदा ने मुख खोलने को कहा, तब श्रीकृष्ण ने माँ के भय से मुँह खोल दिया । उसके भीतर सूर्य, चन्द्र, भूधर, सागर आदि सारे विश्व को देखकर उसने निश्चय कर लिया कि यह तो साक्षात् परब्रह्म है। यह मेरा पुत्र है, मैं माँ हूँ यह कल्पना मोहमूलक है। भगवान् ने फिर से अपनी मोहनी वैष्णवी माया फैलाकर माता यशोदा के ज्ञान को आवृत कर दिया,
२८६ रामायणमीमांसा अष्टम क्योंकि ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप में तादृक् स्नेहसम्बन्ध नहीं बन सकता था । अतः वाल्मीकिरामायण में लौकिक स्वरूप का आधिक्येन वर्णन है, ऐश्वर्य का अल्प वर्णन है । किन्तु अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान मार्गीय भक्ति का ही वर्णन है । माधुर्य में ही ऐश्वर्य के वर्णन के बिना कोई लौकिकता का भान होने से प्राकृत साधारणता आ सकती है । अतः वाल्मीकिरामायण में भी तत्र-तत्र स्थलों में ईश्वरता का वर्णन है । सनातन सिद्धान्त के अनुसार गुणोपसंहार- न्याय से साङ्गोपाङ्ग रामचरित जानने के लिए सभी रामायणों, महाभारत, पुराणों, उपनिषदों संहिताओं तथा आगमों का समन्वय ही मान्य है । अद्भुतरामायण के सम्बन्ध में अनु० १७६ में बुल्के का कहना है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि अद्भुत- रामायण या अद्भुतोत्तरकाण्ड की रचना अध्यात्मरामायण के कुछ काल बाद हुई ।” इस तरह उनकी दृष्टि में वह अत्यन्त अर्वाचीन है, परन्तु यह ठीक नहीं है । उलटे यही कहा जा सकता है कि अद्भुतरामायण में अध्यात्मरामायण के अंशों का उल्लेख होने से शिवपार्वतीसंवादरूप अध्यात्मरामायण अति प्राचीन है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण के ही दोनों अंश हैं। अन्यथा ऋषिव्यतिरिक्त कोई लेखक वाल्मीकि और भरद्वाज के संवाद को कैसे जान सकता है ? सर्ग १ में नारद एवं पर्वत के द्वारा विष्णु को दिये जानेवाले शाप के कारण रामरूप में विष्णु के अवतार का ज्ञान भी अर्वाचीन समाधिशून्य को कैसे हो सकता था । अम्बरीष की पुत्री श्रीमती का शापवशात् जानकी बनकर रावण द्वारा अपहृत होना (सर्ग २-४), नारद के शाप से लक्ष्मी का सीतारूप में मन्दोदरी की पुत्री बनना आदि सबको काल्पनिक एवं मिथ्या ही मानना पड़ेगा क्या ? किन्तु कोई भी भारतीय सभ्य विद्वान् निराधार निरर्थक मिथ्या प्रलाप करना उचित नहीं समझता; अतः अद्भुतरामायण भी महर्षि वाल्मीकि के आर्षविज्ञान के आधार पर ही निर्मित है । सहस्रमुख रावण का वध (सर्ग १७-२७) देवीमाहात्म्य का अनुकरण नहीं है, किन्तु घटनामूलक है। सत्य घटना में तो उक्त रामायण ही प्रमाण है । परन्तु उक्त घटना के अभाव में बुल्के के पास कुछ भी प्रमाण नहीं है। क्योंकि अतीत विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं होती । अतीत से सम्बन्धित कोई लिङ्ग गृहीत नहीं है, अतः अनुमान की प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती । १७७वें अनु० में आनन्दरामायण के सम्बन्ध में भी बुल्के का यह कहना कि इसकी रचना १५वीं शती ई० की है, सङ्गत नहीं है। आनन्दरामायण के विषय वाल्मीकिरामायण से कुछ भिन्न हों यह उसकी मौलिकता का ही साधक है । दशरथ और कौशल्या का विवाह तथा रावण द्वारा कौशल्या का हरण, देवदानव-युद्ध में कैकेयी की वरप्राप्ति, श्रवणकुमार का वध, दशरथयज्ञ तथा कैकेयी के पायस का काक द्वारा अपहरण और उसका अञ्जनी के पर्वत पर फेंका जाना ( सर्ग १ ) । आनन्दरामायण की विशिष्ट कथाएँ—बाललीला वर्णन ( सर्ग २ ), अहिल्योद्धार तथा तदनन्तर नाविकवृत्तान्त ( सर्ग ३।२४-२८ ) ये दोनों वृत्तान्त अध्यात्मरामायण के तुल्य हों यह ठीक है, परन्तु ये उसी के अंश के उद्धरण हैं, यह नहीं कहा जा सकता है। सीतास्वयंवर में रावण की उपस्थिति ( सर्ग ३ ), अग्निजा सीता की जन्मकथा ( ३।१८८ आदि ), वृन्दा का शाप, कलहा और धर्मदत्त का कैकेयी तथा दशरथ के रूप में जन्म लेना ( सर्ग ४ ), सीताहरण के बाद सीता का रूप धारण कर उमा का रामपरीक्षा करना ( सर्ग ७ ), रावण का शिव से आत्मलिङ्ग तथा पार्वती को प्राप्त करने तथा दोनों को खो बैठने की कथा ( सर्ग ९ ), मैरावण का राम और लक्ष्मण को पाताल ले जाना, हनुमान् द्वारा राम और लक्ष्मण को वापस लाना ( सर्ग ११ ), सुलोचना की कथा ( सर्ग १।१२०५ आदि ) एवं आत्ममुक्ति के उद्देश्य से रावण द्वारा सीताहरण करने का उल्लेख ( सर्ग १३। ११९ आदि ) । यात्राकाण्ड में वाल्मीकिरामायण की उत्पत्ति ( सर्ग १।२-१२ ) तथा वाल्मीकि द्वारा शतकोटि- प्रविस्तर रामायण की रचना का उल्लेख ( सर्ग १, २) । इसके बाद चारों दिशाओं में राम की तीर्थयात्रा का वर्णन मिलता है । पूर्वोक्त सभी विषय रामचरित्र के ही अनिवार्य अङ्ग हैं। यागकाण्ड में राम के अश्वमेध का वर्णन है । विलासकाण्ड में शङ्करकृत रघुवीर-स्तव ( सर्ग १ ), सीता का नख-शिखवर्णन, सीतालङ्कार, जलक्रीड़ा तथा सीता-
अध्याय अवतार-सामग्री २८७ राम की दिनचर्या (सर्ग २-६)। एकपत्नीव्रत के कारण कृष्णावतार में बहुत पत्नियों की प्राप्ति का राम को वरदान (सर्ग ७।१-२८)। कामपीड़ित देवपत्नियों को राम द्वारा गोपिकाएँ बनने का आश्वासन (सर्ग ७।२९ आदि), कृष्णावतार में गुणवती तथा पिंगला को सत्यभामा तथा कुब्जा बनने का आश्वासन देना वर्णित है (सर्ग ८)। इसी में सीता-सहित राम की कुरुक्षेत्र यात्रा का वर्णन है (सर्ग ९)। जन्मकाण्ड में राम द्वारा सीता-त्याग (सर्ग १-३), कुशजन्म तथा वाल्मीकि द्वारा लव की सृष्टि (सर्ग ४)। कुश और लव का राम की सेना से युद्ध करना, सीता की शपथ से पृथ्वी का प्रकट होना तथा राम से भयभीत होकर सीता को लौटा देना। उर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति के दो दो पुत्रों का होना वर्णित है (सर्ग ६-९)। विवाहकाण्ड में राम आदि के आठों पुत्रों के विवाह वर्णित हैं। राज्यकाण्ड में राम के राज्य-शासन का विस्तृत वर्णन है। इसमें रामका स्वरूप-सौन्दर्य देखकर बहुत सी नारियाँ मोहित हुई हैं। कृष्णावतार में उनकी लालसा-पूर्ति का आश्वासन दिया गया है। इसे कृष्णावतार का प्रभाव कहना निष्प्रमाण कल्पनामात्र है। कृष्णोपनिषत् से ही राम का लोकोत्तर सौन्दर्य प्रसिद्ध है। उसके अनुसार स्त्रियों की कौन कहे ऋषि-महर्षि लोग भी उनके सौन्दर्य से मोहित हुए हैं और उन्हें भी गोपी बनने का भगवान् ने वरदान दिया है। मनोहरकाण्ड में रामोपासना का विधान वर्णित है। पूर्णकाण्ड में सोमवंशी राजाओं से युद्ध तथा सन्धि, कुश का अभिषेक और रामादि का वैकुण्ठा- रोहण वर्णित है। इस तरह यह रामायण भी रामचरित के वर्णन में पर्यवसित है। यह भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अङ्ग एवं प्रामाणिक है। 🕮
नवम अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव और महत्त्व का वर्णन भारतीय राजाओं का स्वरूप, स्वभाव एवं महत्त्व का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने कहा है— “सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्त्मनाम् ॥ यथाविधिहुताग्नीनां यथाकामार्चितार्थिनाम् । यथापराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ॥ त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम् । यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥ शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥” ( रघुवं० १।५-८ ) जन्मप्रभृति निषेकादि संस्कारों से शुद्ध तथा फलसिद्धिपर्यन्त कर्म करनेवाले, समुद्रपर्यन्त भूमि के एकमात्र स्वामी अर्थात् सार्वभौम, स्वर्ग तक रथ से यात्रा करनेवाले अर्थात् इन्द्र के सहचारी, विधिवत् अग्निहोत्र करनेवाले, कामना के अनुसार याचकों का आदरपूर्वक मनोरथ पूर्ण करनेवाले, अपराध के अनुसार दण्डविधान करनेवाले, समय पर जागनेवाले, त्याग के लिए अर्थसंग्रह करनेवाले, सत्य के लिए मित भाषण करनेवाले, यश के लिए विजय की इच्छावाले, सन्तति के लिए दारसंग्रह करनेवाले, बालकपन में विद्याभ्यास करनेवाले, युवावस्था में भोग की इच्छा- वाले, वृद्धावस्था में मुनिवृत्तिवाले और अन्त में योग से शरीर-त्याग करनेवाले रघुवंशी राजा होते थे । “आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः । आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥” ( रघुवं० १।१५ ) महाराज दिलीप की आकार के सदृश बुद्धि थी, बुद्धि के समान ही शास्त्र का परिश्रम था, शास्त्र के समान ही कर्म और कर्म के समान ही फल होता था । “प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् । सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥” ( रघुवं० १।१८ ) महाराज दिलीप प्रजा की वृद्धि के लिए ही प्रजा से कर ग्रहण करते थे । भगवान् भास्कर हजारों गुना वर्षा करने के लिए ही गर्मी में जल का शोषण करते हैं । महाराज दिलीप स्वयं ही बलवान् थे— “सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् । शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिमौर्वी धनुषि चातता ॥” ( रघुवं० १।१९ ) सेना उनकी छत्र, चामर के समान उपकरणमात्र थी । शास्त्रों में अकुण्ठित बुद्धि और धनुष पर चढ़ी हुई डोरी ये ही दो उनके कार्यसाधक थे ।
अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २८९ “तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेङ्गितस्य च। फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इव ॥” ( रघुवं० १।२० ) महाराज दिलीप का मन्त्र गुप्त रहता था और आकार तथा चेष्टा भी गुप्त रहती थी, इसलिए उनके द्वारा प्रयुक्त साम आदि उपायों का पता फल होने पर ही लगता था । जैसे कि फलों के द्वारा ही पूर्वजन्म के संस्कारों का पता लगता है । “जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः । अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥” ( रघुवं० १।२१ ) महाराज दिलीप अपनी रक्षा करते थे, किन्तु उन्हें डर नहीं था, बिना विपत्ति के ही धर्म का पालन करते थे । अर्थसंग्रह करते हुए भी लोभी नहीं थे । सुख भोगते थे, किन्तु उसमें आसक्ति नहीं थी । “ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः । गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ॥” ( रघुवं० १।२२ ) महाराज दिलीप दूसरे की बात जानते हुए भी मौन रहते थे । प्रतीकार की सामर्थ्य रहने पर भी दूसरे का अपकार सहते थे । दान करके अपनी प्रशंसा नहीं करते थे । इस तरह परस्पर विरोधी भी गुण उनमें ऐसे एक साथ रहते थे जैसे कि सभी सहोदर हों । प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि । स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ॥” ( रघुवं० १।२४ ) सन्मार्ग में लगाने, विपत्ति दूर करने और अन्न, पान आदि द्वारा पोषण करने से प्रजाओं के मुख्य पिता महाराज दिलीप ही थे । उनके अपने पिता केवल जन्ममात्र देनेवाले थे । इस प्रकार राजा लोकस्थिति बनाये रखने के लिए ही दण्ड्यों को दण्ड देता था । सन्तानोत्पत्ति के लिए ही विवाह करता था । इस तरह दण्ड और विवाह जो कि अर्थ एवं काम के साधन थे वे भी लोकस्थिति और प्रजोत्पादन के लिए ही थे, सुतरां उनका पर्यवसान भी धर्म में हो गया था । अर्थात् उनके अर्थ और काम भी धर्मरूप ही थे— “स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यान् परिणेतुः प्रसूतये । तस्यार्थकामावप्यास्तां धर्म एव मनीषिणः ॥” ( रघुवं० १।२५ ) “दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् । सम्पद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥” ( रघुवं० १।२६ ) महाराज दिलीप यज्ञ करने के लिए पृथ्वी से कर ग्रहण करते थे और देवराज इन्द्र धान्यवृद्धि के लिए वर्षा करते थे । इस तरह दोनों परस्पर आदान-प्रदान से दोनों लोकों का धारण ( पोषण ) करते थे । “न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षिणो यशः । व्यावॄत्ता यत्परस्वेभ्यः श्रुतौ तस्करता स्थिता ॥” ( रघुवं० १।२७ ) अन्य राजाओं के लिए प्रजा-रक्षण में चौकस राजा दिलीप के यश का अनुकरण असम्भव था, क्योंकि उनके राज्य में परस्वापहरण से सभी के डरने के कारण तस्करता ( चोरी ) पराये धन से हटकर शब्दरूप से कान में ही रह गयी थी । '३७
Here is the precise line-by-line transcription in Markdown of the provided image:
२९० रामायणमीमांसा नवम द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्त्तस्य यथौषधम् । त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ॥" ( रघुवं० १।२८ ) शिष्ट जन (सज्जन) द्वेषी होने पर भी महाराज दिलीप को प्रिय था जैसे रोगी को औषध प्रिय होता है । यदि अपना प्रिय भी दुष्ट होता तो महाराज दिलीप को वैसे ही त्याज्य होता जैसे सर्पदष्ट अङ्गुलि । "स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् । अनन्यशासनामुर्वी शशासैकपुरीमिव ॥" ( रघुवं० १।३० ) समुद्र का तट जिसकी चहार दीवारी और समुद्र ही जिसकी खाई है उस अखण्ड भूमण्डल के एकमात्र शासक महाराज दिलीप अखण्डभूमण्डल का शासन ऐसे अनायास करते थे जैसे कि एक नगरी का शासन हो । "पुरुषायुषजीविन्यो निरातङ्का निरीतयः । यन्मदीयाः प्रजास्तस्य हेतुस्त्वद्ब्रह्मवर्चसम् ॥" ( रघुवं० १।६३ ) मेरी प्रजा अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि ईतियों से रहित होकर निर्भय रह कर पुरुषायुष पर्यन्त जीवित रहती है उसका एकमात्र कारण आपका ब्रह्मतेज है । श्रीकालिदास के अनुसार ब्राह्मबल एवं क्षात्रबल के प्रभाव से राजा रघु की जल, स्थल, पर्वत और आकाश सर्वत्र अव्याहत गति थी । "वसिष्ठमन्त्रोक्षणजात् प्रभावादुदन्वदाकाशमहीधरेषु । मरुत्सखस्येव बलाहकस्य गतिर्विजघ्ने नहि तद्रथस्य ॥" ( रघुवं० ५।२७ ) जैसे वायु की सहायता से मेघ की सर्वत्र अव्याहत गति होती है वैसे ही वसिष्ठजी के मन्त्र के प्रभाव से महाराज रघु के रथ की गति समुद्र, आकाश तथा पर्वत सर्वत्र ही अव्याहत थी । आजकल के संशयित विमानों की अपेक्षा श्रीरघु का रथ कहीं अधिक शक्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण था । अध्यात्मवाद पर आधारित धर्मनियन्त्रित शासन- तन्त्र का सञ्चालक सम्राट् दिलीप गुरु के आज्ञानुसार काया की छाया बनकर नन्दनी गौ की सेवा में तत्पर हो गया । एतावता गौ तथा ब्राह्मण की सेवापरायणता ऐसे शासकों का स्वाभाविक धर्म था । "स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः । जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥" ( रघुवं० २।६ ) महाराज दिलीप नन्दिनी गौ जब खड़ी होती थी तब खड़े हो जाते थे, जब चलती थी तब चलते थे, जब बैठती थी तब बैठते थे, जब वह जल पीती थी तब जल पीते थे इस तरह छाया के समान उसका अनुसरण कर रहे थे । "आस्वादवद्भिः कवलैस्तृणानां कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च । अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥ ( रघुवं २।५ ) सम्राट् महाराज दिलीप स्वादिष्ट तृणों के कवलों, कण्डूयनों, दंशों के निवारणों और अव्याहत स्वच्छन्द- गमनों के द्वारा नन्दिनी गौ की आराधना में लगे थे । प्रचण्ड शौर्य के साथ ही दयालुता भी उनमें अनिवार्यरूप से विद्यमान थी । "धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्तःकरणैरविशङ्कैः । विलोकयन्त्यो वपुषापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ॥" ( रघुवं० २।११ )
अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव का वर्णन २९१ महाराज दिलीप को धनुर्धर देखते हुए भी हरिणियों के मन में आशङ्का नहीं हुई । इसी लिए समझना चाहिये कि उनका हृदय दया से भरपूर था । दयार्द्र महाराज दिलीप का शरीर देखते हुए हरिणियों ने अपनी आँखों के विस्तार का फल प्राप्त किया । प्रजा के ऊपर आये हुए भौतिक एवं आधिदैविक सङ्कटों को भी धर्मनिष्ठ राजा अपने प्रभाव से दूर कर सकता है । आज हजारों लौकिक प्रयत्नों से भी अन्नसङ्कट नहीं कट रहा है, काम होने पर भी धार्मिकता के बिना बरकत या समृद्धि नहीं हो रही है, परन्तु महाराज दिलीप के आगमनमात्र से वन के सब सङ्कट दूर हो गये थे । “शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥” ( रघुवं० २।१४ ) महाराज दिलीप के वन में प्रवेश करते ही वृष्टि के बिना भी जंगल में लगी हुई अग्नि शान्त हो गयी । जंगल में फलों और पुष्पों की विशेष वृद्धि हो गयी । जानवरों में बलवान् जन्तुओं ने दुर्बलों को सताना छोड़ दिया । यह सब सेना, पुलिस या कोर्ट का प्रभाव नहीं, किन्तु धर्मनिष्ठा का ही लोकोत्तर प्रभाव था । धर्मनियन्त्रित शासक दिलीप धर्मपालन के सामने राज्य एवं प्राणों को भी तुच्छ समझते थे । “क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः । राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥” ( रघुवं० २।३५ ) क्षत ( विनाश ) से रक्षा करने ( बचाने ) के कारण क्षत्रिय जाति का वाचक क्षत्रशब्द विश्वविख्यात है । इसके विपरीत यदि हम एक नन्दिनी गौ को न बचा सके तो राज्य से ही हमारा क्या लाभ ? अथवा निन्दा से मलिन प्राणों को ढोने से ही क्या फल ? अर्थात् धर्मविमुख निन्दित पुरुष का सब कुछ व्यर्थ है । धर्मनियन्त्रित शासक धर्म के प्रभाव से न केवल स्थूल शरीर पर ही शासन करता है, अपितु मनपर भी नियन्त्रण करके प्रजा के मन को बुरे कामों से निवृत्त करता है; अपराध रोकने के लिए दण्ड-विधान ही नहीं, किन्तु शासक की विशेष शक्ति भी अपेक्षित होती है । “अकार्यचिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवंश्चापधरः पुरस्तात् । अन्तःशरीरेष्वपि यः प्रजानां प्रत्यादिदेशाविनयं विनेता ॥” ( रघुवं० ६।३९ ) महाराज कार्तवीर्य असत्कार्य का विचार प्रजा में आते ही धनुष-बाण धारण कर उनके सामने प्रकट हो जाते थे । इस तरह से उन्होंने प्रजा के मन से भी अपराधसृष्टि रोक दी थी । धर्म एवं योग के बल से वह प्रजा के मन के दुर्विचारों को जान लेते थे और तत्काल योगबल से ही प्रकट होकर आतंकित करके बुरे विचारों को रोक देते थे । इस तरह शरीर से अपराध की बात कौन कहे मन से भी पाप करने में प्रजा सदः ही डरती रहती थी । “यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्धपथे गतानाम् । वातोऽपि नासंस्रयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम् ॥” ( रघुवं० ६।७५ ) महाराज दिलीप के शासनकाल में उद्यान में घूमने के लिए गयी हुई मत्ताङ्गनाओं के उद्यान में सो जाने पर उनके देहपर से कपड़ा हटा देने की क्षमता वायु में भी नहीं थी । फिर, दूषित वृत्ति से चोरी करने के लिए कोई हाथ कैसे बढ़ा सकता था ? आज की चोरी, डकैती तथा अनुशासनहीनता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ।
२९२ रामायणमीमांसा नवम सीता-वनवास से क्षुब्ध महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं :— “उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्थनेऽपि । त्वां प्रत्यकस्मात्कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे ॥' (रघुवं० १४।७३) यद्यपि राम ने रावण को मारकर सबके के मार्ग का काँटा दूर किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं। सबका उपकार करके भी अपनी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं। इतने गुणगण राम में विद्यमान होने से वे मुझे प्रिय होने चाहिए तथापि तुम्हारे साथ उन्होंने अकस्मात् ऐसा व्यवहार किया है इसलिए हमारी नाराजगी उनपर है ही। अर्थात् सीता के साथ उन्होंने वनवास देकर अन्याय क्यों किया ? यद्यपि यह भी आपात दृष्टि से ही अन्याय प्रतीत होता है। वस्तुतः भगवान् राम तो कभी शत्रु का भी अहित नहीं कर सकते थे 'अरिहुँक अनभल कीन न रामा'' फिर अपनी ही प्राणेश्वरी सीता का अहित कैसे कर सकते थे ? धर्मनियन्त्रित शासकों पर सर्वदा धर्मनिष्ठ महर्षियों का नियन्त्रण रहता था। इसी लिए वसिष्ठ, वाल्मीकि महर्षि भगवान् राम के गुणों और दोषों का विचार कर गुणों की प्रशंसा एवं यत्किञ्चित् दोषों से भी अवगत रहते थे।
नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम
वस्तुतः नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परमरहस्य को मात्र राम ही जानते थे, अन्य कोई नहीं । यथा— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोऊ न राम सम जान जथारथ ॥” (रा० मा० २५।३।३) भगवती सीता के वनवास में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का यथार्थ सामञ्जस्य हुआ है। नीति, लोकतन्त्रात्मक शासन की यही विशेषता होती है कि शासन की सम्पूर्ण गति-विधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करनेवाली होनी चाहिये । अपने या भाई भतीजों के स्वार्थ वश, शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नही ठुकरा सकता, इस दृष्टि से शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित मानी जाती है। धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र में भी लोकतन्त्र के ये गुण बहुत उत्कृष्टरूप में व्यक्त होते हैं । राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था— “स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥” स्नेह, दया, सुख आदि किं बहुना मेरी हृदयेश्वरी जनकनन्दिनी को भी लोकरञ्जन के लिए त्यागना पड़ेगा तो भी मुझे व्यथा न होगी । आत्मा या आत्मीयों के स्वार्थवश नासमझ शासक जनता की भावनाओं की उपेक्षा करते हुए अर्थदण्ड अथवा कारागार-दण्ड का विधान करते हैं। अस्त्र-शस्त्र एवं तोप-बन्दूक आदि के बल पर जनता का मुख बन्द करने का असफल प्रयत्न करते हैं, परन्तु समझदार शासक जानता है कि मात्र दण्डविधान से जनता का मुंह बन्द नहीं किया जा सकता और यदि जबरदस्ती मुंह बन्द करने का प्रयत्न किया भी गया तो फिर हजारों हजारों मुखों से ही विरोधी आवाजें निकलेंगी । अपनी दुर्नीति बदलने से ही जनता का मुंह बन्द किया जा सकता है। दण्ड- भय से नहीं । यद्यपि श्रीजनकनन्दिनी महाराज्ञी सीता के विरोध में बहुमत नहीं था; कुछ ही लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि रावण की लङ्का में कई महीनों तक रहनेवाली सीता को राम ने राजमहलों में क्यों रख लिया। इस प्रकार तो हमारे घर की स्त्रियां भी बाहर रहकर घरों में पुनः रहने लग जायेंगी जिससे मर्यादा अवश्य ही भङ्ग हो
अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९३ जायगी। उनको यह नहीं विदित था कि श्रीसीता अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी, आनन्दसिन्धु रामचन्द्र के माधुर्यसार- सर्वस्व की अधिष्ठात्री महाशक्ति थीं। उन्होंने लङ्का का अन्न-जल-फल ग्रहण किये बिना ही, इन्द्रप्रदत्त विशिष्ट चरु को एक ही बार ग्रहण कर, लङ्का में काल यापन किया था। वे भानु की प्रभा, चन्द्र की चन्द्रिका एवं गङ्गा की पवित्रता के तुल्य आनन्दसिन्धु भगवान् राम की माधुर्यसार-सर्वस्वरूपा ही थीं। पुनश्च देवताओं, ऋषियों, वानरों एवं राक्षसों के सामने श्रीसीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया और सबके समक्ष साक्षात् वैश्वानर अग्नि ने उनके पावित्र्य को प्रमाणित किया था। श्रीब्रह्मा एवं श्रीशिव ने उनके पावित्र्य को परिपुष्ट किया था, तथापि उसका वर्णन श्रीराम के पक्ष की ओर से होने में शासकीय प्रचारमात्र समझा जा सकता था। अतः श्रीराम ने बहुमत। नहीं, वरन् अल्पमत का भी आदर करते हुए श्रीसीता को अरण्यवास दिया और निष्पक्ष वीतराग महर्षियों को अवसर दिया कि वे दूध का दूध और पानी का पानी के समान अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रजा के सम्मुख सत्य वस्तुस्थिति रखें, और हुआ भी ऐसा ही। जिस वन में सीता को निर्वासित किया था वहीं कुछ दूर पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। उनके कुछ ब्रह्मचारी छात्र समिधा, कुश आदि लेने के प्रसङ्ग से उधर पहुँच गये और उन्होंने ही उस अलौकिक दिव्य महाशक्ति के दर्शन एवं रोदन की सूचना महर्षि को दी। महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि ने अपने ध्यानयोग से वस्तुस्थिति को समझ कर सीता से कहा- "पुत्रि ! तुम्हारे पिता जनक मेरे मित्र हैं, तुम्हारे श्वसुर चक्रवर्ती दशरथ भी मेरे शिष्य थे, अतः पितृगृहसुलभ मेरे आश्रम में चलकर रहो।" श्रीसीता महर्षि के पीछे पीछे चलकर आश्रम में आयीं, महर्षि ने आश्रम की ऋषि-पत्नियों को, उनकी देख-रेख, रक्षण-पोषण आदि के लिए नियुक्त किया। वहीं उनके लव और कुश नामक दो पुत्ररत्नों का जन्म हुआ, जिनका संस्कार, शिक्षण-रक्षण सब महर्षियों की ही देख-रेख में हुआ। धर्मधुरन्धर चक्रवर्ती नरेन्द्र राघवेन्द्र रामचन्द्र द्वारा निर्वासिता सीता को अपने आश्रम में प्रश्रय देते हुए ही महर्षि ने अपने उत्तरदायित्व को खूब समझ लिया था और उस मिथ्याभिशाप को समूलोन्मूलन कर देने के लिए वे कृतसंकल्प थे। विश्वविधाता ब्रह्मा भी यह सब महर्षि वाल्मीकि के द्वारा ही कराना चाहते थे। तमसा के तटपर विहरणपरायण क्रौञ्च-युग्म में से एक क्रौञ्च के व्याध द्वारा मारे जाने पर क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन सुनकर महान् क्लेशानुभूति करनेवाले महर्षि के सामने सीता के करुण-क्रन्दन का दृश्य आ गया। पहले से ही करुणरस पूरित वाल्मीकि का हृदय इस दृश्य से आहत होकर छलक पड़ा और वही शोक करुणरस श्लोक बन महर्षि के मुखारविन्द से विश्वकल्याण के लिए प्रस्फुटित हो आया। "शोकः श्लोकत्वमागतः ।" (वा० रा० १।१।४०) शोक श्लोक बन गया। श्लोक था- "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” (वा० रा० १।२।१५) भरद्वाज आदि शिष्यों ने आदि काव्य के इस प्रथम श्लोक को सुनकर धारण कर लिया। यह श्लोक, लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा की इच्छा से, ब्राह्मी महाशक्ति सरस्वती की कृपा से व्यक्त हुआ था। श्लोक के ऊपरी अर्थ में तो निषाद (व्याध) के लिए एक प्रकार का शाप ही है, यथा- हे निषाद ! तुम पुरुषापुष्य तक शान्ति या प्रतिष्ठा न प्राप्त कर सकोगे, क्योंकि तुमने क्रौञ्च-युग्म में से एक को मार दिया है, परन्तु अन्तरङ्ग अर्थ यह कि रावण- मन्दोदरीरूप युग्म ही वे क्रौञ्च-युग्म थे। रामरूप लक्ष्मीपति ने ही रावण को मारा था। इस दृष्टि से यह श्लोक आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण ही है यथा-
२९४ रामायणमीमांसा नवम 'हे मानिषाद मायां लक्ष्म्यां निषीदतीति मानिषादस्तत्सम्बुद्धो हे मानिषाद लक्ष्मीपते ! तुम शाश्वतीः समाः अनन्त काल तक प्रतिष्ठित रहो, क्योंकि तुमने रावण-मन्दोदरी रूप युगल के एक रावण को मारकर वेद, धर्म, संस्कृति सब का ही रक्षण किया है।" अस्तु, महर्षि के हृदय में उक्त दृश्य के कारण नितान्त क्षोभ था ही आश्रम में लौट आने पर भी वे उसी चिन्ता में निमग्न थे कि इतने में ही लोकपितामह ब्रह्माजी आश्रम में पधारे । महर्षि ने पाद्य-अर्घ्य-मधुपर्क से उनका पूजन किया और फिर रामवियुक्ता सीता के चिन्तन में ही निमग्न हो गये । ब्रह्मा ने बतलाया कि मेरी ही प्रेरणा से आदि काव्य रामायण का यह प्रथम श्लोक आप के मुख से प्रगट हुआ है । आप समाधि द्वारा राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, दशरथ, कौशल्या, कैकेयी एवं सुमित्रा आदि सभी के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर इसी प्रकार के श्लोकों द्वारा राम-सीता के परम पवित्र चरित्रों का वर्णन करो । मेरे प्रसाद से तुम्हारे इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत न होगी— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” इस प्रकार ब्रह्मा की प्रेरणा से महर्षि ने समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा सम्पूर्ण सीता एवं राम के चरित्र का पूर्ण एवं यथार्थ अनुभव कर दिव्य श्लोकों में शतकोटिप्रविस्तर रामायण का वर्णन किया । वह वर्णन निःसंकोच एवं परम सत्य था । संवाददाताओं एवं टेलीप्रिंटरों द्वारा भेजी गयी अथवा आँखों देखी घटनाओं में भी भ्रान्ति हो सकती है, परन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा तो सर्वथा ऋत (सत्य) का ही दर्शन होता है । और जगह तो काव्य सोष्ठव आदि की दृष्टि से कुछ औपचारिक बातें भी लायी जाती हैं, परन्तु यहाँ तो सीता-चरित्र-वर्णन की दृष्टि से शुद्ध सत्य का वर्णन अपेक्षित था । महर्षि ने, सीता-पुत्र लव और कुश का यथावत् संस्कार किया और वेदों; धनुर्वेद, गान्धर्ववेद आदि उपवेदों का भी साङ्गोपाङ्ग उन्हें शिक्षण दिया । तत्पश्चात् वेदों के उपबृंहण के लिए ही रामायण का अध्यापन किया और तन्त्री ( वीणा ) के तालस्वर के साथ संगीतरूप में रामायण का अभ्यास कराया । वे दोनों ही बालक दीप से उद्भूत दो दीपों के समान ही सर्वथा श्रीराम के ही अनुरूप थे । सीता-राममय दिव्य दम्पती की दिव्य दीप्ति एवं प्रभाव से युक्त थे । अश्विनीकुमारद्वय से भी अत्यधिक सुन्दर वे दोनों बालक जब स्वरसम्पदा से युक्त वीणा-वादन-पूर्वक रामायण का गायन करते थे तो सभी मोहित हो जाते थे । अनेक बार उनका रामायण गान सुनकर ऋषिगण मन्त्रमुग्ध हो जाते थे एवं प्रेमविह्वल होकर कोई ऋषि अपना कमण्डलु, कोई मेखला, कोई वृषी आदि पुरस्कार के रूप में देने लगते थे । श्रीराम के अश्वमेधयज्ञ में निमन्त्रित होकर महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि एवं उनके सब आश्रम- वासी नैमिषारण्य पधारे हुए थे । महर्षि दोनों बालकों ( लव और कुश ) को फल-मूलभोजन कराकर कुछ साथ के लिए भी दे देते थे और कहते कि जाकर अवधवासियों को रामायण सुनाओ और भूख लगने पर अपना ही फल खाना, प्यास लगने पर अपने आप ही नदी या कूप से जल निकालकर पीना एवं किसी के कुछ देने पर भी लेना नहीं । परन्तु जो श्रद्धा से सुने उसे रामायण सुनाना । महर्षि के आदेशानुसार दोनों बालकों ने अयोध्याकाण्ड का ही प्रसङ्ग अवधवासियों को सुनाना प्रारम्भ किया : जो भी इस प्रसङ्ग को सुनता मन्त्रमुग्ध हो जाता । आखों देखी पुरानी घटनाओं का प्रत्यक्ष चित्र उनके सामने उपस्थित हो जाता था । कितना सुन्दर, सत्य, सरल एवं हृदयस्पर्शी था वह चरित्रचित्रण । उसे सुनकर सबको आश्चर्य होता था । लोग बालकों के गान से प्रभावित होकर उन्हें बहुत कुछ देना चाहते थे, किन्तु वे कुछ लेते न थे । यह समाचार राम-दरबार में भी गया । वहाँ भी सबको उस आश्चर्यजनक चरित्र-चित्रण के श्रवण द्वारा रसास्वादन की उत्सुकता हुई । अश्विनीकुमारों के तुल्य सुभग सीता-पुत्रों ने ऋषिकुमार के रूप में, वहाँ भी अपने स्वर,
अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९५ संगीतसौष्ठव तथा सौम्य सुन्दर दिव्य आकृति से सबको प्रभावित किया। उनके रामायण गान से राम, भरत, लक्ष्मण शत्रुघ्न, वसिष्ठादि महर्षि एवं अमात्यवर्ग आदि सभी मोहित हो उठे । श्रीरामचन्द्र ने रामायण गान के अन्त में लक्ष्मण को आदेश दिया कि इन बालकों को शतभार सुवर्ण एवं रत्न प्रदान किया जाय, परन्तु उन्होंने तो परमनिःस्पृहरूप से स्पष्ट कहा कि हम लोग कन्द-मूलफलाशी, वल्कलवसनधारी आश्रमवासी हैं, हमें आपके सुवर्ण-रत्नों की अपेक्षा नहीं है । पुनश्च यदि आप लोगों की इच्छा हो तो हम लोग रामायण-श्रवण करा सकते हैं । विशेषरूप से रामायण-श्रवण का प्रबन्ध किया गया । संसार के सभी गण्यमान ऋषि, महर्षि, राजर्षि, चातुर्वर्ण्य प्रजा के विशेष प्रतिनिधि, देव, असुर, गन्धर्व सभी वहाँ उपस्थित हुए । उन्होंने लोकोत्तर सौन्दर्य, अद्भुत वेदवेदाङ्ग-पाण्डित्य, दिव्य वीणावादन और मनोहर स्वर, परम निःस्पृहता एवं अद्भुत त्याग से सब के मन को वश में कर लिया । ऊँचे से ऊँचे गुण भी सस्पृहता से फीके पड़ जाते हैं। सस्पृह की अच्छी से अच्छी सच्ची बातों पर लोगों को आदर एवं विश्वास नहीं होता, परन्तु जो निःस्पृह एवं त्यागी होता है उसी वक्ता का जनता पर समुचित प्रभाव पड़ता है। फिर भी यहाँ तो कहना क्या ? निःस्पृह परमविरक्त महर्षि की ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्यक्ष दृष्ट 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' रामायण महाकाव्य का निःस्पृह ऋषिकुमारों द्वारा गायन सुनकर सबको वर्णित घटना के सम्बन्ध में पूर्णविश्वास हो गया । स्थाली-पुलाकन्याय से सम्पूर्ण चरित्र की सत्यता में सबका विश्वास हो गया। अयोध्याकाण्ड की सत्यता में सबका विश्वास हो गया । अयोध्याकाण्ड की सत्यघटनाओं को सुनकर अरण्य, किष्किन्धा एवं लङ्काकाण्ड के चरित्र-श्रवण की सबको उत्कट उत्कण्ठा हुई । सीता-चरित्र की जिज्ञासा भी जागरूक थी ही । सबने सत्य घटनाओं को मन्त्रमुग्ध की भाँति सुना और श्रद्धा तथा विश्वास से भगवती सीता के परम-पवित्र चरित्र की प्रशंसा की । कुटिलों की भी अपनी दुर्भावना पर पश्चात्ताप हुआ । "सीतायाश्चरितं महत्" (वा० रा० १।४।७) के अनुसार उसमें प्रधानरूप से सीता-चरित्र का वर्णन था, परन्तु पतिव्रता सीता का चरित्र जब तक उसके पति भगवान् के चरित्र का वर्णन न होता तब तक वह अपूर्ण ही रहता। अतः उसमें राम-चरित्र का वर्णन भी किया गया । यह वर्णन राजकीय प्रचारमात्र (प्रोपेगण्डा) न था, किसी राजकीय कवि की काव्यकल्पना न थी, किन्तु यह थी राजाश्रय से दूर रहकर, राजान्न से बच कर, कन्दमूल, फल तथा वल्कलवसन पर निर्भर, तपोनिष्ठ, समाधिसम्पन्न महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि की समाधि भाषा, जिसका गान कर रहे थे, उन महर्षि के ही परम प्रिय शिष्य, परम विद्वान्, परम त्यागी, वनवासी देवी के पुत्र लव और कुश । ऐसी स्थिति में जनता का सुस्थिर विश्वास क्यों न होता और कुटिल हृदयों के भी काले कल्मष उससे क्यों न धुल जाते ? सभी के हृदय पिघल गये, कण्ठ गद्गद हो गये, अङ्ग रोमाञ्चकण्टकित हो उठे, आँखों से आनन्दाश्रु एवं शोकाश्रु की धारा वह निकली । राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, माताएँ एवं परिवार के अन्य लोग भी प्रेम-समुद्र में निमग्न हो गये । वसिष्ठादि ऋषिगण भी प्रेमोद्रेक में अधीर हो उठे । महाशक्ति भगवती चिदानन्दस्वरूपा सीता के उज्ज्वल चरित्र ने सब के अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा को उद्योतित कर दिया । महर्षि वाल्मीकि के रामायण महाकाव्य से सबको स्पष्ट विदित हुआ कि सीता के असाधारण तेज के सामने रावण का प्रभाव सर्वथा नगण्य था । श्रीसीता अपने अखण्ड पातिव्रत्य तेज के प्रभाव से रावण की सत्ता में रहती हुई भी रावण को तृणतुल्य समझती थी । और सिंही के तुल्य श्रीसीता ने कहा था—दुष्ट रावण, सावधान, मेरे भगवान् राम का सन्देश एवं आदेश न होने और अपनी तपस्या-पालन करने के अभिप्राय से मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं कर रही हूँ । अन्यथा मैं क्षण भर में तुम्हें अपने भस्मार्ह तेज से भस्म कर सकती हूँ— "असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥" (वा० रा० ५।२२।२०)
ऐसे अवसरों पर रावण में श्रीसीता के सामने स्थिर रहने की हिम्मत नहीं रहती थी। यह कोई कवि- कल्पना नहीं अपितु महर्षि की समाधि-भाषा की सत्य वाणी है। वहीं कुछ क्षणों के पश्चात् जब राक्षसियों ने सीता को यह समाचार सुनाया कि सीते, जो वानर आपके पास आया था, वह पकड़ लिया गया और उसकी पूंछ में घृत-तैलसने वस्त्र लपेट कर आग लगा दी गयी। जब सीता ने यह समाचार सुना तो उन्होंने अग्नि से कहा, अग्ने ! यदि मैंने समुचितरूप से गुरुशुश्रूषा की है और मैंने ठीक तपस्या तथा पातिव्रत धर्म का परिपालन किया है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ— “यद्यस्ति पतिशुश्रूषा यद्यस्ति चरितं तपः । यदि वा त्वेकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ॥” ( वा० रा० ५।५३।२६ ) सीता के आदेशानुसार दहनशील अग्निदेव शीतल हो गये । श्रीहनुमान् को आश्चर्य हो रहा था कि मेरी पुच्छाग्नि से सम्पूर्ण लङ्का भस्मीभूत हो रही है, परन्तु मेरी पूंछ में तो उष्णता का लेश भी नहीं प्रतीत हो रहा है। हनुमान् ने यह निश्चय किया था कि यह महाशक्ति सीता के तप एवं त्याग तथा पातिव्रत का ही प्रभाव है। जो सीता अपने प्रभाव से अग्नि को ठण्डा कर सकती थी वह अवश्य ही अपने तेज से रावण को भस्म कर सकती थी, यह बात सरलता से समझी जा सकती है। श्रीसीता के विरोधी कुटिल समाज ने भी उनका भक्त होकर पश्चात्ताप की अश्रुधाराओं से अपने कल्मषों को धो डाला। यह थी महर्षि वाल्मीकि की लोकोत्तर सुमधुर कृति की कुशलता। वे अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल हुए और यह थी श्रीराघवेन्द्र की नीति जिसके फलस्वरूप ये घटनाएँ घटित हुईं। जो काम किसी दण्डविधान से या प्रोपेगण्डा से कभी सम्भव नहीं था वह उनकी नीति से अनायास सुसम्पन्न हुआ। फिर तो वसिष्ठ ने भी अपनी तपस्या एवं योगबल के प्रभाव से सत्य वस्तु का साक्षात्कार करके जनता को सीताचरित्र की निर्मलता का ज्ञान कराया। त्रिजटा एवं विभीषण-पत्नी ने भी सीता के परमपवित्र चरित्र का बखान किया। अन्त में परमानन्द सच्चिन्दमयी पराम्बा सीता का अपने परम दिव्य रूप से महामहिम वैभवशालिनी माधवी देवी के अङ्क में प्रत्यक्ष प्राकट्य भी सब की भ्रान्तियों को मिटाकर उनकी परम उपास्यता का प्रमाण बना। श्रीसीता रामचन्द्र की छाया की छाया थीं । राम-रूप भानु की प्रभा एवं रामरूप चन्द्र की चन्द्रिका थीं, रामरूप ईश्वर की महाशक्तिरूपा प्रकृति थीं एवं आनन्दसिन्धु श्रीराम की माधुर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी थीं। बहिरङ्ग दृष्टि से ही राम-सीता का विप्रयोग सम्भव था, अन्तरङ्ग दृष्टि से तो यह विप्रयोग सम्भव ही न था। इसी लिए जैसे लंका में सीता की छाया ही रह सकती थी वैसे वनवास में भी छाया ही थी। वस्तुतः अमृत से जैसे उसकी मधुरिमा का पार्थक्य असम्भव है वैसे ही राघवेन्द्र श्रीराम से सीता का पार्थक्य असम्भव ही था। परन्तु वह काल्पनिक विप्रयोग भी राम के लिए असह्य वेदना का विषय था। अपने हाथों को राम निष्करुण कहते थे— “निर्भरगर्भखिन्नसीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते । हे हस्त ! तुम आसन्नप्रसवा सीता के निर्वासन में दक्ष राम के हस्त हो, अतः तुम में करुणा कैसे हो सकती है ? परन्तु स्नेह एवं प्रेम के उद्रेक में राम ने कर्तव्य से विचलित न होने की प्रतिज्ञा ले रखी थी। वे किसी भी स्नेह, दया या सुख के मोह में पड़ कर लोकाराधन, प्रजारञ्जन के कार्य से कैसे विमुख हो सकते थे और उन्होंने सीता का भी इसी में हित समझा था और वह हुआ भी। इस कठोरता का आश्रयण किये बिना महर्षि वाल्मीकि
अध्याय नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्यज्ञ श्रीराम २९७ का समागम नहीं हो सकता था, उनके द्वारा विश्वपावन रामायण महाकाव्य का निर्माण सम्पन्न न हो पाता और सीता के सुपुत्र लव-कुश इस प्रकार के संस्कारी विद्वान्, बलवान्, धनुष्मान्, कीर्तिमान् तथा प्रतिभावान् नहीं बन सकते थे । सीता का कष्ट राम का ही कष्ट था । स्वयं राम ने ही सीता को वनवास देकर स्वयं को कष्ट में डालकर सीता के निर्मल, निष्कलङ्क, परमपवित्र उज्ज्वल चरित्र को संसार के सामने उपस्थित किया था । परम सानुक्रोश होते हुए भी राम निरनुक्रोश से बन गये थे । श्रीराम ने लव-कुश से पूछा था "तुम्हारी माता का क्या नाम है ?" उन्होंने कहा "हमारी माँ का नाम वनदेवी है।" पिता का नाम पूछने पर कुश ने कहा "हम लोगों को मालूम नहीं।" परन्तु लव ने कहा मैं जानता हूँ मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश है, क्योंकि एक दिन माता ने कहा था "निरनुक्रोशतनयौ ।" श्रीराम के नेत्रों में अश्रु आ गये थे । वस्तुतः जगज्जननी सीता राम के हृदय को पहचानती थीं। पहले उन्होंने वन में छोड़कर लौटते हुए लक्ष्मण से कहा था- 'वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकावादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत् सदृशं कुलस्य ।।' ( रघुवं० १४।६१ ) अर्थात् लक्ष्मण, मेरी तरफ से उन राजा से यह कहना कि आप के सामने ही मेरी अग्निपरीक्षा एवं अग्निशुद्धि हुई थी, फिर भी आपने लोकवाद-श्रवण के कारण जो मेरा परित्याग किया है क्या यह आप के कुल एवं श्रुत के सदृश है ? परन्तु दूसरे ही क्षण सीता ने फिर कहा- "नहीं, प्रभो ! आप तो प्राणिमात्र के हितैषी एवं कल्याण की कामना करनेवाले हैं, फिर मेरे सम्बन्ध में आपकी अन्यथाबुद्धि कैसे हो सकती है । वज्रोपम असह्य श्रीचरणविप्रयोगरूप दुःख तो मेरे ही पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है"- 'कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ।।' ( रघुवं० १४।६२ ) पतिव्रतामुकुटशिरोमणि सीताजी ने आगे कहा कि "मैं प्रसव के पश्चात् सूर्य में दृष्टि लगाकर ऐसी तपस्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और फिर कभी ऐसा विप्रयोग न हो"- "साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ।।' ( रघुवं० १४।६९ ) श्रीराम ने सीता को वन भेजकर स्वयं तपस्या करते हुए ग्यारह हजार वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए यागादि के लिए विहित होने पर भी दूसरा परिणय नहीं किया । सुवर्णमयी सीता को ही अपने दक्षिणाङ्क में बैठाकर अश्वमेधादि बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया था । श्रीराम का स्मरण कर विह्वल होने पर श्रीसीता की सखी वासन्ती कहती थी कि सखी ! तुम ऐसे निष्ठुर राम का स्मरण करके क्यों दीर्घ एवं उष्ण उच्छ्वास लेती हो । सीता ने कहा; "सखि ! राम निष्ठुर नहीं हैं। मैं बहिरङ्ग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ, वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ। सखि, श्रीराम के हृदय को अन्य किन्हीं स्त्रियों का श्वास कभी स्पर्श नहीं कर सका।" इस प्रकार श्रीराम ने नीति के साथ ही पूर्णरूप से प्रीति का भी परिपालन किया था । श्रीराम ने अनन्त अद्भुत अनुराग के साथ ही सीता को वनवास देकर, सीता को भी अवसर दिया कि वे महर्षियों के मुखारविन्द से अध्यात्मचर्चा श्रवण कर सकें और समाधि-निष्ठ होकर आध्यात्मिक उच्च स्थिति की परमार्थ साधना में प्रतिष्ठित हों । स्वयं भी राम विषयविरक्त होकर ब्रह्मनिष्ठा का सम्पादन कर सके । इस प्रकार प्रजारञ्जन के साथ साथ परमार्थ-साधन भी सम्पन्न हो । ३८
किसी भी मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् के लिए मातृपवित्रता-ख्याति अत्यावश्यक है। अतः अपने उत्तराधिकारी लव-कुश की उच्च स्थिति के लिए सीता-चरित्र का उज्ज्वल निष्कलङ्क होना अत्यावश्यक है। राज- महलों में पालन, पोषण एवं संस्कारों की अपेक्षा, आरण्यक ऋषियों के आश्रमों का पालन, पोषण एवं संस्कार बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। इसी लिए अपने उत्तराधिकारी पुत्रों का उत्कृष्ट संस्कार एवं उत्कृष्ट शक्तिशाली चरित्र निर्माण हो सके, इस कार्य में सीता का वनवास अधिक उपयोगी था । महर्षि श्रीवाल्मीकिजी ने स्वयं ही वेदवेदाङ्गों की शिक्षा के समान ही, धनुर्वेद एवं गन्धर्ववेदादि की भी शिक्षा दी थी। इसी लिए लव-कुश धनुर्वेद के भी प्रतिष्ठित रहस्यज्ञ हुए थे। अयोध्या, किष्किन्धा, लङ्का एवं संसार के सभी शूरवीरों ने उनका लोहा माना था। रामाश्वमेध के अश्व को अवरुद्ध कर लव-कुश ने श्रीराम सहित उनके सभी शूर-वीरों के साथ युद्ध में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी। इस तरह सीता-निर्वासनरूप एक कार्य में भी नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ सब का सामञ्जस्य राम ने सम्पादित किया था। नीतिज्ञों ने नीतिनिष्ठा में राम को ही सर्वोत्कृष्ट आदर्श माना है— “यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानन्तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥” (अनर्घराघव १।४) न्याय पर चलनेवाले के साथी वानर, भालू, गृध्र आदि पशु-पक्षी भी बन जाते हैं। न्याय का पथ छोड़कर चलनेवाले का भाई भी साथ छोड़ देता है। दृष्टान्तरूप में श्रीराम एवं रावण को देखा जा सकता है। कुछ पाश्चात्य अज्ञ कुप्रचारक दुःसंस्कारों से दूषित मस्तिष्कवाले अपने अधकचरे रामायण-ज्ञान का दुष्प्रचार में दुरुपयोग करते हैं। वे सीता के लङ्का-निवास एवं वनवास दोनों के रामायणवर्णित स्वरूप को विकृत करके उससे श्रीसीता के दुश्चरित्र होने तथा दण्डित होने की कल्पना करते हैं। श्रीसीता के निर्वाण को, सीता को राम के द्वारा जीवित धरती में गड़वा देने के रूप में वर्णन करते हैं और इसे राम की क्रूरता और पिछड़े हुए जङ्गलियों के उदाहरण के रूप में उपस्थित करते हैं। परन्तु यह उनका उपहासास्पद अर्धकुक्कुटीन्याय का उदाहरणमात्र है। जैसे कोई आधी मुर्गी का भक्षण करके आधी को अण्डा देने के लिए रखना चाहता है उसी प्रकार ऐसे लोग रामायण के ही आधार पर श्रीसीता एवं राम का अस्तित्व मानकर रामायण के द्वारा ही वर्णित श्रीसीता-राम के परमेश्वरत्व तथा उनके दिव्य अलौकिक चरित्रों को अस्वीकार कर देते हैं । वस्तुतः रामायण आदि भारतीय आर्ष-ग्रन्थों का प्रामाण्य अस्वीकार करने से श्रीसीता एवं राम का अस्तित्व किसी भी आधुनिक इतिहास एवं प्रत्यक्ष तथा अनुमान से नहीं सिद्ध हो सकता । अतः यदि रामायण आदि का प्रामाण्य मान्य है तब तो रामायण में वर्णित श्रीसीता और राम के दिव्य चरित्रों को मानना भी अनिवार्य ही है। यदि रामायण का प्रामाण्य नहीं मान्य है तो फिर सीता और राम का अस्तित्व तथा विरोधियों द्वारा कल्पित घटनाओं की भी सिद्धि नहीं हो सकती । अन्यथा ईसा आदि सम्बन्धी इतिहासों में भी उनके विरुद्ध बहुत सी कल्पनाएँ की जा सकती हैं, परन्तु यह शिष्टता, सभ्यता न होकर असभ्यता की पराकाष्ठा ही होगी। रामायण के अनुसार श्रीसीता के निर्मल निष्कलङ्क परमपवित्र चरित्र की प्रामाणिकता राक्षसों तथा वानरों के समक्ष साक्षात् अग्नि ने, ब्रह्मा ने, इन्द्र ने तथा सभी देवताओं ने सिद्ध कर दी है। सीतावनीवास का पवित्र उद्देश्य भी पूर्ववर्णित प्रकार से श्रीराम का नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ का सामञ्जस्य सम्पादन करना ही है। श्रीसीता का निर्णय तो रामायणवर्णित दिव्य चरित्र है, जिससे सर्वसाधारण को भी सीता के साक्षात् दिव्य परमेश्वरी होने का विश्वास हो जाता है। श्रीसीता ने धरती देवी से प्रार्थना की कि यदि मैं पवित्र तथा निष्कलङ्क हूँ तो कृपा
अध्याय रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता २९९ करके आप स्वयं प्रकट होकर मुझे अपने अङ्क में स्थान दें। यह कहते ही तत्क्षण धरती फटती है, उसमें से एक दिव्य परमतेजोमय प्रकाशमय सिंहासन प्रकट होता है। उसपर विराजमान विष्णु-पत्नी माधवी मूर्तिमती भगवती धरती श्री- सीता को प्यार से अपने अङ्क में बैठा लेती हैं और सबके देखते देखते अन्तर्धान हो जाती हैं। प्रजा में जय-जयकार होने लगता है। भारत में आज भी कितनी सतियां जनसमूह के समक्ष ही अपने शरीर से दिव्य अग्नि प्रकट कर पति-सह- गमन करती हैं। श्रीसीता का तो, रामायण के अनुसार, जन्म भी पृथ्वी से ही हुआ था। ये सब बातें जड़वादियों की समझ में भले ही न आयें, परन्तु आध्यात्मिक तथा आधिदैविक तत्त्वों में विश्वास करनेवालों के लिए ऐश्वर्य तथा माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी तथा श्रीगङ्गा की अधिष्ठात्री दिव्यसुरेश्वरी के समान ही अखण्ड भूमण्डल की अधिष्ठात्री विष्णुपत्नी माधवी सर्वमान्य तत्त्व है। अतः उससे श्रीसीता का आविर्भाव तथा उसके अङ्क में निवेश असम्भव नहीं है। साथ ही देवता विग्रहवान् होते हैं। देवता स्वेच्छानुसार दिव्य लीलाविग्रह धारण कर सकते हैं। केन उपनिषद् में ब्रह्म का दिव्य अप्रधृष्य तेजोमय यक्षरूप में आविर्भाव श्रुत है। छान्दोग्य में आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुष का हिरण्यश्मश्रु, हिरण्यकेश, पुण्डरीक- नेत्र तथा ज्योतिर्मय स्वरूप स्पष्टरूप से वर्णित है। मन्त्रसंहिताओं में भी नीलग्रीव शिव तथा त्रिविक्रम विष्णु का श्रीविग्रह वर्णित है। इसी दृष्टि से सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् विष्णु या ब्रह्मा का रामस्वरूप में एवं साधिष्ठान दिव्य-शक्ति का श्रीसीतारूप में आविर्भाव शास्त्र एवं युक्तितर्कसङ्गत है। श्रीकामिल बुल्के ने भी अपनी रामकथा में राम के लौकिक रूप का ही वर्णन किया है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि वेदों में कहीं भी श्रीराम का वर्णन नहीं है। यद्यपि दशरथ का वर्णन वेदों में है, यह वह स्वयं मानते हैं, परन्तु वे वेदशब्द से केवल मन्त्र-संहिता ही समझते हैं, जब कि पूर्वोत्तरमीमांसक, कल्पसूत्रकार तथा सभी मिताक्षरा प्रभृति निबन्धकार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को ही वेद मानते हैं। उपनिषदों में पूर्णरूप से श्रीराम, श्रीसीता तथा श्रीकृष्ण, श्रीराधा, श्रीनृसिंह आदि का शुद्ध सच्चिदानन्दघन परब्रह्म होना अत्यन्त प्रसिद्ध है। इस विषय में रामतापनीय, रामरहस्य, रामतारसार, गोपालतापनीय, नृसिंह- तापनीय आदि उपनिषदें द्रष्टव्य हैं। मन्त्र भाग में भी रामादि दिखाये जा चुके हैं। जो ईसाई श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य चरित्रों पर विश्वास नहीं करते उन्हें बाइबिल में वर्णित ईसा के दिव्य चरित्रों को भी मिथ्या मानना पड़ेगा। फिर कुमारी के उदर से ईसा का आविर्भाव भी कैसे सिद्ध होगा ? कुमारीगर्भसंभूत ईसा ईश्वरपुत्र है ? या किसी नारकादि विशेष के सम्बन्ध से विवाह के पूर्व ही किसी कुमारी से ईसा की उत्पत्ति हुई, इसका निर्णय कैसे हो सकेगा ? रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता “यदुवाच न तन्मिथ्या यद्ददौ न जहार तत् । सोऽभूद् भग्नव्रतः शत्रूनुद्धृत्य प्रतिरोपयन् ॥” ( रघुवं० १७।४२ ) महाराज अतिथि ने दान और रक्षा के विषय में जो कुछ कहा वह मिथ्या नहीं हुआ, जो उन्होंने दान दे दिया उसका अपहरण नहीं किया। हाँ, एक ही विषय में उनका व्रत टूटा जो उन्होंने शत्रुओं को उजाड़कर पुनः बसाया। “वयोरूपविभूतीनामेकैकं मदकारणम् । तानि तस्मिन् समस्तानि न तस्योत्सिषिचे मनः ॥” ( रघुवं० १७।४३ )
३०० रामायणमीमांसा नवम अवस्था ( यौवन ), रूप ( सौन्दर्य ), विभूति ( धनसम्पत्ति ) इनमें से एक एक भी गर्व का कारण होता है । अतिथि में ये सभी वस्तुएं थीं, परन्तु उनका मन गर्वीला नहीं हुआ । “तपो रक्षन् स विघ्नेभ्यस्तस्करेभ्यश्च सम्पदः । यथास्वमाश्रमैश्चक्रे वर्णैरपि षडंशभाक् ॥” ( रघुवं० १७।६५ ) विघ्नों से तपस्वियों के तप की तथा चोरों से प्रजाओं की सम्पत्ति की रक्षा करने के कारण उस महाराज अतिथि को ब्राह्मणादि वर्णों, ब्रह्मचारी आदि आश्रमियों ने अपने-अपने तप और सम्पत्ति के छठे हिस्से का भागी बना दिया । “खनिभिः सुषुवे रत्नं क्षेत्रैः सस्यं वनैर्गजान् । दिदेश वेतनं तस्मै रक्षासदृशमेव भूः ॥” ( रघुवं० ७१।६६ ) रक्षा के अनुरूप ही पृथ्वी ने खानों से रत्न, खेतों से अन्न और वनों से हाथियों का उत्पादन कर उस राजा अतिथि के लिए वेतन दिया । “स गुणानां बलानाञ्च षण्णां षण्मुखविक्रमः । बभूव विनियोगज्ञः साधनीयेषु वस्तुषु ॥” ( रघुवं० १७।६७ ) कार्तिकेय के समान पराक्रमी वह राजा अतिथि सन्धि, विग्रह आदि छह गुणों एवं मूल भृत्यादि बलों का प्रयोजन के अनुसार विनियोजन का यथार्थ ज्ञाता था । “कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि तस्मिन् सन्मार्गयोधिनि । भेजेऽभिसारिकावृत्ति जयश्रीर्वीरगामिनी ॥” ( रघुवं० १७।६९ ) वह राजा अतिथि कूटयुद्ध का विशेषज्ञ होता हुआ भी अपनी वीरता के कारण सरल धार्मिक युद्ध ही करता था । विजयश्री अभिसारिका के समान उसका स्वयं वरण करती थी, कारण वह वीर पुरुष के ही पास पहुँचती है । “प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः समुद्रोऽपि तथाविधः । स तु तत्समवृद्धिश्च न चाभूत्ताविव क्षयी ॥” ( रघुवं १७।७१ ) चन्द्रमा बढ़कर क्षीण होता है और उसी तरह समुद्र भी बढ़कर क्षीण होता है । राजा अतिथि उनके समान बढ़ा अवश्य पर उनके समान क्षीण नहीं हुआ । “स्तूयमानः स जिह्लाय स्तुत्यमेव समाचरन् । तथापि ववृधे तस्य तत्कारिद्वेषिणो यशः ॥” ( रघुवं० १७।७३ ) प्रशंसनीय कार्य करने पर भी यदि कोई अतिथि राजा की प्रशंसा करता था तो वह अपनी प्रशंसा सुन कर लज्जित ही होता था । प्रशंसकों का द्वेषी होने पर भी उसका यश बराबर बढ़ता ही गया । “इन्दोरगतयः पद्मे सूर्यस्य कुमुदेऽशवः । गुणास्तस्य विपक्षेऽपि गुणिनो लेभिरेऽन्तरम् ॥” ( रघुवं० १७।७५ ) कमल में चन्द्रमा की और कुमुद में सूर्य की किरणे प्रवेश नहीं पा सकती । परन्तु गुणवान् महाराज अतिथि के गुण शत्रुओं के यहाँ भी स्थान पाते थे । अर्थात् शत्रु भी उनके गुणों की प्रशंसा करते थे । “पराभिसन्धानपरं यद्यप्यस्य विचेष्टितम् । जिगीषोरश्वमेधाय धर्म्यमेव बभूव तत् ॥” ( रघुवं० १७।७६ )
अध्याय रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता ३०१ अश्वमेधयज्ञ करने के लिए अतिथि राजा ने विजय की कामना से शत्रुओं के साथ छलछद्मप्रधान कर्म किया तथापि छल-छद्म धर्मयुक्त ही रहा। "अनित्याः शत्रवो बाह्या विप्रकृष्टाश्च ते यतः। अतः सोऽभ्यन्तरान्नित्यान् षट् पूर्वमजयद्रिपून् ॥” ( रघुवं० १७।४५ ) बाहर के शत्रु कार्यवशात् कभी शत्रु बन सकते हैं और कभी मित्र भी बन सकते हैं, अतः वे अनित्य शत्रु हैं तथा वे दूर भी रहते हैं, इसलिए अतिथि राजा ने अपने हृदय में रहनेवाले काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं के ऊपर पहले विजय प्राप्त की । “कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ॥” (रघुवं० १७।४७ ) पराक्रमरहित केवल नीति कायरता है और नीतिरहित केवल पराक्रम हिंसकपना है, अतः अतिथि ने नीति और पराक्रम दोनों का सम्बन्ध करके सफलता प्राप्त करने का निश्चय किया । “न तस्य मण्डले राज्ञो न्यस्तप्रणिधिदीधितेः । अदृष्टमभवत्किञ्चिद् व्यभ्रस्येव विवस्वतः ॥” ( रघुवं० १७।४८ ) गुप्तचरों का जाल बिछाने के कारण उस राजा अतिथि को अपने राज्य में कुछ भी वैसे ही अज्ञात नहीं था जैसे मेघरहित सूर्य को कुछ भी अज्ञात नहीं रहता । "परेषु स्वेषु च क्षिप्तैरविज्ञातपरस्परैः । सोऽपसर्पैर्जजागार यथाकालं स्वपन्नपि ॥” ( रघुवं० १७।५१ ) राजा अतिथि समयानुसार सोते हुए भी परस्पर अविज्ञात गुप्तचरों को शत्रु-देश में और अपने अधिकारियों में नियुक्त कर उनके द्वारा सब कुछ जानते रहते थे । “दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्तस्य रोद्धुरपि द्विषाम् । नहि सिंहो गजास्कन्धी भयाद् गिरिगुहाशयः ॥” ( रघुवं० १७।५२ ) राजा अतिथि स्वयं ही दूसरे (शत्रु) लोगों के किलों का अवरोधक था; अतिथि के किले का दूसरे अवरोध नहीं कर सकते थे । ऐसा कहना ठीक न होगा कि ऐसी स्थिति में उसे किले की क्या आवश्यकता थी ? कारण स्वभाव से ही राजा के लिए किला अपेक्षित होता है ! हाथियों के झुण्डपर आक्रमण करनेवाला सिंह भय से गिरिगुहा में नहीं सोता, किन्तु स्वभाव से ही सोता है । “भव्यमुख्याः समारम्भाः प्रत्यवेक्ष्या निरत्ययाः । गर्भशालिसधर्माणस्तस्य गूढं विपेषिरे ॥” (रघुवं० १७।५३) राजा अतिथि के कार्य कल्याणप्रधान होते थे और वे आरम्भ करने के पहले उनपर भली भाँति विचार भी कर लेते थे, इसलिए उनमें किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं होती थी । जैसे धान के दाने भीतर ही भीतर परिपाक (फल) को प्राप्त होते हैं वैसे ही उनके काम भी गुप्तरूप से आरम्भ होकर पूर्ण हो जाते थे । “अपथेन प्रवृवृते न जातुपचितोऽपि सः । वृद्धो नदीमुखेनेव प्रस्थानं लवणाम्भसः ॥” ( रघुवं० १७।५४) अतिथि समृद्ध होने पर भी अपथ से नहीं चले अर्थात् मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया । ज्वार आने पर समुद्र नदी-प्रवेश के मार्ग से ही बढ़ता है, दूसरे मार्ग से नहीं ।
३०२ रामायणमीमांसा नवम “शक्येष्वेवाभवद्यात्रा तस्य शक्तिमतः सतः। समीरणसहायोऽपि नाम्भःप्रार्थी दवानलः॥” ( रघुवं० १७।५६ ) अतिथि यद्यपि शक्तिसम्पन्न थे तथापि अपने से हीन शक्तिवाले राजाओं के ऊपर ही उन्होंने आक्रमण किया। दवाग्नि वायु की सहायता पाकर भी जलाने के लिए तृण, काष्ठादि की ही अपेक्षा रखती है, जल की नहीं । “न धर्ममर्थकामाभ्यां बबाधे न च तेन तौ। नार्थं कामेन कामं वा सोऽर्थेन सदृशस्त्रिषु ॥” ( रघुवं० १७।५७ ) अतिथि ने अर्थ और काम परायण होकर धर्म को खतरे में नहीं डाला । न तो धर्मपरायण होकर अर्थ और काम को हो सङ्कट में डाला । काम से अर्थ और अर्थ से काम को उन्होंने पीड़ित नहीं किया । वह धर्म, अर्थ और काम तीनों में समवर्ती रहे । “हीनान्यनुपकर्तॄणि प्रवृद्धानि विकुर्वते । तेन मध्यमशक्तीनि मित्राणि स्थापितान्यतः॥” ( रघुवं० १७।५८ ) क्षीणशक्ति मित्र उपकार नहीं कर सकता और बढ़ा हुआ मित्र विकृत हो सकता है, इसलिए अतिथि ने मध्यमशक्ति मित्रों की स्थापना की । “परात्मनोः परिच्छिद्य शक्त्यादीनां बलाबलम् । ययावेवमबलिष्ठश्चेत् परस्मादास्त सोऽन्यथा ॥” ( रघुवं० १७।६० ) अतिथि अपने और शत्रु के देश, काल, शक्ति और परिस्थिति का बलाबल पहले निश्चित करते थे । बलवान् होने पर आक्रमण करते थे अन्यथा सन्धि आदि की वार्ता से शत्रुओं को सान्त्वना देते हुए अपने यहाँ रहते थे । “कोशेनाश्रयणीयत्वमिति तस्यार्थसङ्ग्रहः । अम्बुगर्भो हि जीमूतश्चातकैरभिनन्द्यते ॥” ( रघुवं० १७।५९ ) खजाने से ही दुनिया में आदर होता है, इसलिए अतिथि ने खजाने का संग्रह किया, क्योंकि जलपरिपूर्ण मेघ का ही चातक अभिनन्दन करता है । “परकर्मापहः सोऽभूदुद्यतः स्वेषु कर्मसु । आवृणोदात्मनो रन्ध्रं रन्ध्रेषु प्रहरन् रिपून् ॥ ( रघुवं० १७।६१ ) अतिथि सदा शत्रुओं के कार्यों में रोड़ा अटकाता हुआ अपने कर्म में सदा उद्यत रहता रहा । शत्रुओं के रन्ध्र में प्रहार करता हुआ वह अपना रन्ध्र सदा छिपाये रहता था । “सर्पस्येव शिरोरत्नं नास्य शक्तित्रयं परः । स चकषं परस्मात्तदयस्कान्त इवायसम् ॥ ( रघुवं० १७।६३ ) सर्प के सिर के रत्न को जैसे कोई खींच नहीं सकता वैसे ही अतिथि की तीनों शक्तियों ( प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति ) को किसी ने नहीं खींचा, किन्तु चुम्बक जैसे लोहे को खींच लेता है वैसे ही अतिथि ने शत्रुओं की तीनों शक्तियों को खींच लिया ।