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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

then space then "हेगेन" (Copenhagen = Kopenhagen).

Line 31: "भारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' में लिखा है कि महाभारत का मूल कोई पौराणिक गाथा रही होगी ।"

Line 32: "उसकी एकता से उसका रचयिता कोई एक ही व्यक्ति रहा होगा । उसमें परस्परविरोधी सिद्धान्त, पुनरुक्ति और बिना"

Line 33: "प्रसङ्ग की बातें नहीं आनी चाहिये । अतः ऐसे अंशों को प्रक्षिप्त ही मानना चाहिए । इस कसौटी पर उन्हें सात-आठ"

Line 34: "हजार श्लोकों से अधिक नहीं मिले जिनको उपलब्ध महाभारत का मूल कहा जा सके ।"

Let's do a final review of each line against the image: Top header: ८५२ रामायणमीमांसा द्वाविंश

Heading: महाभारत और पाश्चात्य विद्वान्

Text: महाभारत के आलोचनात्मक अध्ययन की ओर सर्वप्रथम क्रिश्चियन लासेन का ध्यान गया । सन् १८३७ Wait, let's look at the year again in : Is it १७७३ or १८३७? Look at: First digit: १ Second digit: look at ८ in १८४२ (L5) vs this digit. Wait, let's compare: In L5: १८४२ -> the second digit has a top loop, bottom loop. In L8: १८८४ -> the second and third digits are clearly ८. In L8:

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८५३ डालमान के 'जेनेसिस वे भारत' ( महाभारत का मूल ) में उन्होंने कहा है कि कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे इस महाकाव्य का विकास हुआ है, यह मत भ्रान्त है। उनके अनुसार वास्तविक युद्ध केवल कवि की कल्पना है । यदि कोई युद्ध हुआ होता तो उसका ऐतिहासिक प्रमाण मिलता । इसमें तो धर्म और अधर्म के ही संग्राम का वर्णन है । विंटरनित्स का 'भारतीय साहित्य का इतिहास' जर्मन भाषा में प्राग से प्रकाशित हुआ । उसके अनुसार महा- भारत को कला की कृति नहीं कहा जा सकता । महाभारत सचमुच एक साहित्यिक दानव है । यदि महाभारत का रचयिता कोई एक ही व्यक्ति माना जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह एक साथ महाकवि और टुच्चा लेखक, एक चतुर साधु और मूर्ख एवं सुयोग्य कलाकार तथा पक्का नक़्क़ाल रहा होगा। यह विचित्र व्यक्ति, अत्यन्त परस्पर विरोधी धार्मिक भावों और दार्शनिक सिद्धान्तों में विश्वास रखता था फिर भी इस काव्य के जङ्गल में जिसको साफ करना विद्वानों ने आरम्भ कर दिया है, घास-फूस और लता-पत्तों में छिपे हुए सच्ची कविता के भी कुछ पौधे मिल जाते हैं। साहित्य के इस बेतुके ढेर में अमर कलाकृति और गम्भीर बुद्धि के कुछ रत्न भी चमकते हैं । सर मोनियर विलियम्स हापकिन्स, ग्रियर्सन आदि ने भी मनमाने विचार प्रकट किये हैं । वस्तुतः जैसे बादलों द्वारा लाया हुआ ही समुद्र का पानी मधुर और तृप्ति का हेतु होता है । स्वतः ग्रहण करने पर वह खारा ही रहता है । उसी तरह भारतीय आचार, विचार, संस्कार तथा गुरुपरम्पराओं से ही भारतीय शास्त्रों के रहस्य विदित होते हैं । वैसा न होने पर उनका उलटा ही अर्थ भासित होता है। पाश्चात्यों का विद्या- व्यसन, अनुसन्धान तथा अनोखी सूझ किसी अंश में प्रशंसनीय हैं, परन्तु उनका यह परिश्रम किसी गूढ़ उद्देश्य से ही है और वह है भारतीयों को अपने धर्म से विमुख करना ! उनकी प्रवृत्ति ज्ञान की उच्च भावना से प्रेरित नहीं है। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रबल प्रचारक लार्ड मैकाले ने कहा था कि हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए हिन्दू-धर्म के खण्डन की आवश्यकता नहीं है। पाश्चात्य शिक्षा में आये हुए हिन्दू का मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रह जायगा। स्वयं मैक्समूलर, जो भारत-प्रेम के लिए प्रसिद्ध हैं, ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वेदमन्त्र दकियानूसी और निरर्थक हैं। जिस वातावरण में हम रह रहे हैं, उसमें मँडराते रहने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है । उन्हें अजायबघरों में प्रतिष्ठित पद देने के लिए हम तैयार हैं, परन्तु हम कभी अपने जीवन को उनके द्वारा प्रभावित नहीं होने दे सकते । दूसरी पुस्तक 'चिप्स फ्राम दि जर्मन वर्कशाप' में उन्होंने और खुलकर कहा है—वेद हिन्दू-धर्म की चाभी हैं। उनका अच्छा ज्ञान, उनके दृढ़ तथा दुर्बल स्थानों का ज्ञान धर्म के विद्यार्थियों के लिए विशेषतः ईसाई मिशनरियों के लिए अनिवार्य है। ऐसी दशा में यही बात मन में आयी कि भारतवर्ष में ईसाई धर्म-प्रचारकों के काम की चीज वेद के एक संस्करण से बढ़कर और कुछ न होगी । इससे पाश्चात्य विद्वानों के मानसिक भावों का पता चलता है । भारतीय शास्त्रों के अनुवाद एवं लम्बी चौड़ी समालोचनाओं के पीछे उनकी यही दुरभिसन्धि रहती है । भारत में अंग्रेजीराज पुस्तक में भी पाश्चात्यों द्वारा ही पाश्चात्यों के इतिहाससम्बन्धी दुरभिसन्धियों का भण्डाफोड़ किया गया है । डॉ० वेबर के अनुसार महाभारत में वर्णित नारायणीय भागवत-धर्म में जो भक्तिपक्ष है वह श्वेतद्वीप से अर्थात् हिन्दुस्थान के बाहर से आया है । अर्थात् ईसाई-धर्म से भागवत-धर्म में भक्ति का प्रवेश हुआ है । परन्तु पाणिनि जो कि ईसा से बहुत पहले हुए थे । उनको वासुदेवभक्ति का तत्त्व मालूम था । इतना ही नहीं बौद्ध तथा जैन धर्मों में भी भागवत-धर्म तथा भक्ति के उल्लेख पाये जाते हैं । राघव चिन्तामणिराव वैद्य ने कहा है कि श्रीकृष्ण, यादव, पाण्डव तथा भारतीय युद्ध का एक ही काल है और वह कलियुग का आरम्भ है । पुराणों के अनुसार पांच हजार वर्ष से भी अधिक काल बीत गया है। भागवत और विष्णुपुराण के अनुसार परीक्षित् राजा के जन्म से लेकर नन्द के अभिषेक तक १११५ या १०१५ वर्ष होते

८५४ रामायणमीमांसा द्वाविंश हैं ( भाग० १२।२।२६ ), ( वि० पु० ४।२४।३२ ) । पाश्चात्य विद्वानों ने माना है कि ईसवी सन् से लगभग १४०० वर्ष पूर्व भारतीय युद्ध और पाण्डव हुए होंगे । अतः कृष्ण का भी वही काल है । कुछ लोगों के अनुसार कृष्ण एक क्षत्रिय योद्धा थे । उनको पहले महापुरुष पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुपद मिला । अन्त में परब्रह्म का रूप मिला । इन अवस्थाओं के आरम्भ से अब तक बहुत सा काल चाहिये । अतः भारतीय धर्म का उदय और भारतीय युद्ध का एक ही काल नहीं, परन्तु यह शङ्का ठीक नहीं है । क्योंकि उपनिषदों में ज्ञानी को ब्रह्मरूप कहा है ( बृ० उ० ४।४।६ ) । मैत्रायणी उपनिषद् में रुद्र, विष्णु, नारायण ये सब ब्रह्म ही हैं यह कहा गया है । बुद्ध भी अपने को ब्रह्मभूत कहते हैं ( सेलमुत्त १४ तथा थेरगाथा ८३१ ) । वस्तुतः ये सब विचार-सरासर गलत हैं । क्योंकि वेदादि प्रमाणों के आधार पर कृष्ण वस्तुतः परब्रह्म थे । उनको किसी ने ब्रह्मपद प्रदान नहीं किया था । पश्चिमी पण्डितों में अधिकांश का मत है कि ऋग्वेद का काल ईसा से पूर्व १५०० वर्ष या बहुत हुआ तो २००० वर्ष पूर्व का है। इसी लिए उनकी दृष्टि में ईसा से १४०० वर्ष पूर्व भागवत-धर्म मानने में झिझक होती है । क्योंकि उनके अनुसार ऋग्वेद के बाद यज्ञादिप्रतिपादक यजुर्वेद और ब्राह्मणग्रन्थ बने । तदनन्तर ज्ञानप्रधान उपनिषद्, सांख्यशास्त्र और अन्त में भक्तिप्रधान ग्रन्थ बने । उनके अनुसार भागवत-धर्म के उदय से पहले इन धर्माङ्गों की उत्पत्ति और वृद्धि के लिए कम से कम तो दस बारह शतक अवश्यक लगने चाहिये । अतः भागवत-धर्म का उदय बुद्ध के बाद हुआ होगा । परन्तु जब बौद्ध और जैन धर्मों में भी भागवत-धर्म (भक्ति) मिलते हैं तो यही कहना उचित है कि ओरायन आदि के अनुसार वेदकाल को ही और प्राचीन मानना चाहिये । वैदिक काल की पूर्व मर्यादा ईसा पूर्व ४५०० वर्ष होनी चाहिये । यह भी आधुनिक दृष्टि है । भाषा की दृष्टि से वेदकाल मैत्रायणी उपनिषद् पाणिनि से भी प्राचीन है । उसके अनुसार ऐसी कई शब्दसन्धियों के प्रयोग हैं जो केवल मैत्रायणीसंहिता में ही पाये जाते हैं और जिनका प्रचार पाणिनि के समय बन्द हो गया था । ज्योतिर्गणित से यह सिद्ध होता है कि वेदाङ्गज्योतिष में कही गयी उदगयनस्थिति ई० सं० के लगभग १२०० या १४०० वर्ष पहले की है । मैत्रायणी उपनिषद् में—'मघाद्यं श्रविष्ठार्धमाग्नेयं क्रमेणोत्क्रमेण सार्पाद्यं श्रविष्ठार्धन्तं सौम्यम्' ( ६।१४ ) में काल रूपी या संवत्सररूपी ब्रह्म का विवेचन करते हुए यह वर्णन मिलता है कि मघा नक्षत्र के आरम्भ से क्रमशः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्र के आधे भाग पर पहुँचने तक दक्षिणायन रहता है और सार्प अर्थात् आश्लेषा नक्षत्र से विपरीत क्रमेण आश्लेषा, पुष्य आदि क्रम से पीछे गिनते हुए धनिष्ठा नक्षत्र के आधे भाग तक उत्तरायण रहता है । उदगयनस्थिति के दर्शक वचन तत्कालीन उदगयनस्थिति को लक्ष्य कर कहे गये हैं । पर उसी से इस उपनिषद् का कालनिर्णय भी गणितरीति से सहज ही में किया जा सकता है । यह स्थिति वेदाङ्गज्योतिष की उदगयनस्थिति से पहले की है । उसका आरम्भ धनिष्ठा नक्षत्र के आरम्भ से होता है । मैत्रायणी उपनिषद् के 'श्रविष्ठार्ध' इस पद का अर्थ धनिष्ठार्ध किया गया है । इस तरह वेदाङ्गज्योतिष की उदगयनस्थिति जब ई० सन् से १२०० या १४०० वर्ष पहले की है तो आधे नक्षत्र से उदगयन के पीछे हटने में लगभग ४८० वर्ष लग जाते हैं । इस तरह गणित से विदित होता है कि मैत्रायणी उपनिषद् ई० पूर्व १८८० से १६८० के बीच कभी बनी होगी । छान्दोग्य आदि के अवतरण उसमे दिये जाने के कारण वे उससे भी प्राचीन हैं । वस्तुतः वेद, उपनिषद् सब अनादि अपौरुषेय ही हैं । भारत लोकमान्य के अनुसार वैशम्पायन ने जनमेजय को गीतासहित भारत सुनाया, आगे चलकर जब सौति ने शौनक को सुनाया तब से भारत प्रचलित हुआ ।

अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल ८५५ भारतीय युद्ध से ५०० वर्ष के भीतर आर्ष महाकाव्यात्मक भारत का निर्मित होना सम्भव है, क्योंकि बौद्ध धर्म के ग्रन्थ बुद्ध की मृत्यु के बाद इससे भी जल्दी तैयार हुए थे। नायकों के कार्यों का धार्मिक तथा नैतिक दृष्टिकोण से समर्थन करना महाकाव्य का मुख्य विषय होता है। इस दृष्टि से तत्काल प्रचलित भागवत-धर्म से उनका सम्बन्ध और तदनुकूल व्यवहार-वर्णन आवश्यक है। उसका तर्कपूर्ण वर्णन गीता में हुआ है, अतः गीता कम से कम ईसा से ९०० वर्ष पूर्व की होनी चाहिये। लोकमान्य की दृष्टि से महाभारत-कालनिर्णय महाभारत लक्षश्लोकात्मक बड़ा ग्रन्थ है। राव बहादुर चिन्तामणि के अनुसार उस संख्या में कुछ न्यूनाधिकता भी है। हरिवंश के श्लोक यदि मिला दिये जायें तो भी एक लाख योगफल नहीं होता। इस महाभारत में यास्क के निरुक्त, मनुसंहिता और गीता में ब्रह्मसूत्रों का भी उल्लेख है। अतः इनके पीछे का ही महाभारत होगा। प्रमाण (१) अठारह पर्वों का भारत तथा हरिवंश ये दोनों ही संवत् ५३५ और ६३५ के मध्य में जावा और वाली के द्वीपों में थे तथा वहाँ की प्राचीन कवि नाम की भाषा में उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवाद के आदि, विराट, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासिक, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण ये आठ पर्व वालीद्वीप में उपलब्ध हैं। अनुवाद यद्यपि कविभाषा में है, तथापि स्थान-स्थान पर महाभारत के मूल संस्कृत श्लोक ही रखे गये हैं। अतः लक्षश्लोकात्मक महाभारत संवत् ४३५ के लगभग दो सौ वर्ष तक हिन्दुस्तान में प्रमाणभूत माना जाता था। अन्यथा जावा तथा वाली वाले उसे न ले गये होते। तिब्बत की भाषा में भी महाभारत का अनुवाद है। परन्तु वह बाद का है। (२) गुप्त राजाओं का लेख हाल में उपलब्ध हुआ है जो कि चेदि संवत् १९७ विक्रमी सं० ५०२ में लिखा गया था। उसमें यह स्पष्टरूप से निर्देश है कि महाभारत ग्रन्थ एक लाख श्लोकों का था। संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य रहा होगा। भास कवि के नाटकों में जो कि भारत के आधार पर लिखे गये थे, बालचरित नाटक में श्रीकृष्ण की शिशु अवस्था की बातों एवं गोपियों का उल्लेख पाया जाता है। इसी से हरिवंश का भी उस समय अस्तित्व सिद्ध होता है। भास कवि का समय ई० सन् के दूसरे तीसरे शतक के इस ओर का नहीं माना जा सकता। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अश्वघोष कवि शालिवाहन शक संवत्सर के आरम्भ में हुआ है। उसके बुद्धचरित्र और सौन्दरनन्द में भारतीय कथाओं का उल्लेख है। महाभारत के नारायणीयाख्यान में विष्णु के अवतारों में बुद्ध का नाम नहीं है। महाभारतशान्ति पर्व ३६९।१०० में दस अवतारों में हंस से लेकर कल्कि तक को दस अवतारों में गिना जाता है। पर वनपर्व में कलियुग के भविष्य का वर्णन करते हुए कहा है— "एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता।" अर्थात् कलियुग में देवगृहों के स्थान पर एडूक होंगे (म० भा० ३।१९०।६८)। बुद्ध के बाल, दाँत आदि स्मारक वस्तुओं को जमीन में गाड़कर उसके ऊपर बने हुए स्तम्भ या मीनार को ही एडूक कहा जाता है। आजकल उसे डागोवा कहते हैं। इससे मालूम होता है कि बुद्ध के बाद किन्तु उनकी अवतारों में गणना होने के पहले महाभारत रचा गया होगा। महाभारत में यद्यपि बुद्ध तथा प्रतिबुद्ध का वर्णन (शा० प० १९४।५९; ३०७। ४९; ३४३।५३) में है तथापि वह ज्ञानी के अर्थ में ही है। बौद्धों ने इन शब्दों को वैदिक धर्म से लिया होगा।

८५६ रामायणमीमांसा द्वाविंश महाभारत में काल-गणना अश्विनी आदि नक्षत्रों से न होकर कृत्तिका आदि से है । ( म० भा० अनु० ६४ और ८९) । मेष, वृषभ आदि राशियों का महाभारत में कहीं उल्लेख नहीं है । इससे यह समझा जाता है कि यूनानियों के सहवास से हिन्दुस्तान में मेष, वृष आदि राशियों के आने से पहले अर्थात् सिकन्दर से पहले ही महाभारत रचा गया होगा । इससे भी अधिक महत्त्व की बात है श्रवण आदि नक्षत्र-गणना के विषय की । महाभारत आदि पर्व ( ७१।३४) में कहा है कि विश्वामित्र ने श्रवण आदि की नक्षत्र-गणना आरम्भ की थी । टीकाकारों के अनुसार उस समय श्रवण से उत्तरायण का आरम्भ होता था । वेदाङ्गज्योतिष के समय धनिष्ठा से उत्तरायण आरम्भ होता था । वह काल शकसंवत्सर से १५०० वर्ष पूर्व होता है । ज्योतिर्गणित के अनुसार एक नक्षत्र पीछे हटने में उदगयन होने का काल शक के पहले ५०० वर्ष पूर्व आता है । उसी समय महाभारत बना होगा । भारतीय ज्योतिःशास्त्र में यही अनुमान किया गया है ( पृ० ८७-९०, १११।१४७ ) । किन्तु महाभारत में मेष, वृषभ आदि राशियों का उल्लेख नहीं है, अतः महाभारत बौधायन के पहले का ही है । बौद्ध धर्म बौद्ध ग्रन्थों से यह स्पष्ट है कि बुद्ध के समय चार वेद, वेदाङ्ग-व्याकरण, ज्योतिष आदि, इतिहास, निघण्टु आदि धर्मग्रन्थ प्रचलित हो चुके थे । बुद्ध अध्यात्मदृष्टि से अनात्मवादी थे । तथापि आचरण की दृष्टि से उपनिषदों के संन्यास धर्म से प्रभावित थे । पर अशोक के समय से बौद्ध भिक्षु जङ्गल में रहना छोड़कर प्रचार और परोपकार में लगे थे । महावग्ग ( ५।१।२७ ) में बुद्ध के एक शिष्य सोनकोलीविस की कथा में कहा है कि जो भिक्षु निर्वाणपद तक पहुँच चुका है उसके लिए न तो कोई काम ही अवशिष्ट रहता है और न किया हुआ कार्य ही भोगना पड़ता है । यह शुद्ध संन्यासमार्ग है “तस्य कार्यं न विद्यते” इस गीतावचन के समानार्थक है । बौद्धों के नये मत के प्रकट होने पर पुराने मत से झगड़ा हो गया । पुराने लोग अपने को थेरवाद स्थविर या वृद्ध पन्थ कहने लगे । नवीन पन्थ के लोग अपने मत को महायान तथा पुराने को हीनयान कहने लगे । अश्वघोष महायानपन्थ का था । इसलिए उसने सौन्दरनन्द ( १८।५४ ) में वर्णन किया है कि जब नन्द अर्हत् अवस्था में पहुँच गया तब बुद्ध ने उपदेश दिया था- “अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतो न तेऽस्ति किञ्चत् करणीयमण्वपि । विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन् परकार्यमप्यथो ॥” तेरा कार्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गयी । अब तेरे लिए तिल भर भी कर्म नहीं रहा, अतः अब तू अपना कार्य छोड़कर परकार्य कर । “तस्य कार्यं न विद्यते ॥” (गीता ३।१७) और “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचार ।” (गीता ३।१९) इन गीतावचनों से मेल मिलता है । अतः मानना होगा कि अश्वघोष को ये सब तर्क गीता से ही मिले । बुद्धधर्मानुयायी तारानाथ ने अपने बुद्धधर्मविषयक इतिहाससम्बन्धी ग्रन्थ में, जो तिब्बती भाषा में लिखा है, कहा है-बौद्धों के पूर्वकालीन संन्यासमार्ग में महायान पन्थ ने जो कर्मविषयक सुधार किया था, उसे ज्ञानी श्रीकृष्ण और गणेश से महायान के पुरस्कर्ता नागार्जुन के गुरु राहुलभद्र ने जाना । इस ग्रन्थ का अनुवाद रूसी भाषा से जर्मनी भाषा में किया गया है । डा० केर्न ने १८९९ ई० में बुद्धधर्म पर एक पुस्तक लिखी थी । उसी से लोकमान्य तिलक ने यह अंश गीतारहस्य में लिखा है । संन्यासधर्मप्रधान बौद्धधर्म में कर्मप्रधान तथा भक्तिप्रधान महायान पन्थ की उत्पत्ति गीता से हुई थी ।

जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म वैदिक धर्म के पुत्र लोकमान्य के अनुसार यह बात निर्विवाद सिद्ध हो चुकी है कि जैनधर्म के समान ही बौद्धधर्म भी अपने वैदिक धर्म पिता का ही पुत्र है। अपनी सम्पत्ति का हिस्सा लेकर ये किसी कारण विभक्त हो गये। बुद्ध के अनुसार आत्मा ब्रह्म यथार्थ में कुछ नहीं है। केवल भ्रम है। इसलिए आत्मा अनात्मा के विचार या ब्रह्मचिन्तन के पचड़े में पड़कर किसी को अपना समय न खोना चाहिये। सब्बास्रवसूत्र (९।१३) बुद्ध के सिद्धान्त में दुःख, समुदय, निरोध और मार्ग ये चार आर्य सत्य मान्य हैं। संसार छोड़कर मन को निर्विषय तथा निष्काम करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। बृहदारण्यक उपनिषद् (४।४।६) के इसी अंश को बुद्ध ने स्वीकार किया है। महानिर्वाणसुत्त (१-२४) के अनुसार सिद्ध है कि वैदिक हिंसात्मक यज्ञ आदि धर्म बुद्ध को अग्राह्य थे। केवल स्मार्त पञ्चमहायज्ञ, दान, परोपकार आदि आचरण गृहस्थ के धर्म ही बुद्ध को ग्राह्य थे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सर्वभूतानुकम्पा, आत्मौपम्य, शौच तथा मन की पवित्रता आदि मान्य थे। जैनों के मतानुसार अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर थे, पर वे अध्यात्मवादी थे। लोकमान्य कहते हैं खाने की ही दृष्टि से जो प्राणी मारे न गये हों उनके पवत्त (संस्कृत प्रवृत्त) अर्थात् तैयार किये हुए मांस को स्वयं बुद्ध खाते थे और पवत्त मांस तथा मछलियाँ खाने की आज्ञा बौद्ध भिक्षुओं को भी दी गयी है। जैन और बौद्ध के पुराणादि वैदिक कथाओं के ही विकृत रूप हैं। अहिंसा, सत्य, दम आदि बहुत से ऐसे निवृत्तिमार्गीय धर्म वैदिक संन्यासियों और बौद्ध भिक्षुओं के समान रूप से वर्णित हैं। इसका कारण यही है कि वे सब अंश वैदिक धर्म के ही हैं। इतना ही नहीं दशरथजातक के समान वैदिक पुराण तथा इतिहास की सभी कथाओं का बौद्धधर्म के अनुसार रूपान्तर तैयार किया गया है। जैनों ने भी अपने अभिनव पुराणों में वैदिक कथाओं के ऐसे ही रूपान्तर किये हैं। सेल साहब ने लिखा है ईसा के अनन्तर प्रचलित मोहम्मदी धर्म में ईसा के चरित्र का इसी तरह विपर्यास किया गया है। पुरानी बाइबिल में सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय तथा नूह आदि कथाएँ प्राचीन खाल्दीजाति की धर्म-कथाओं के रूपान्तर हैं। उपनिषद्, प्राचीन धर्मसूत्र तथा मनुस्मृति में वर्णित कथाएँ तथा विचार बौद्ध ग्रन्थों में पाये जाते हैं। कई बार तो बिल्कुल शब्दशः वही के वही होते हैं। जय से वैर की वृद्धि होती है, वैर से वैर शान्त नहीं होता (म० भा० उद्योग० ६१।५९-६३)। क्रोध को शान्ति से जीतना चाहिये, विदुरनीति तथा महाभारत उद्योगपर्व (३८।७३)। यदि मेरी एक भुजा में चन्दन लगाया जाय और दूसरी काटकर अलग कर दी जाय तो मुझे दोनों बातें समान ही हैं (म० भा० ३२०।२६)। ये ही सब बातें धम्मपद (५।२२३) तथा मिलिन्दप्रश्न (७।३।५) में हैं। गीता और ईसाई-धर्म डॉक्टर लरिनसर ने गीता के जर्मन भाषानुवाद के अन्त में लिखा है कि गीता में नयी बाइबिल के एक सौ से अधिक शब्दसादृश्य पाये जाते हैं। जैसे उस दिन तुम जानोगे कि तुम अपने पिता में, तुम मुझमें और मैं तुम में हूँ (जान्० १४।२०)। "येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।" (गीता ४।३५) वे कहते हैं गीताकार बाइबिल से प्रभावित थे। ईसा से लगभग ५०० वर्षों बाद गीता बनी (इण्डियन एण्टीक्वेरी)। परन्तु जब पूर्वोक्त प्रमाणों से गीता का काल ईसा से ५०० वर्ष पूर्व सिद्ध होता है तो यही मानना होगा कि गीता से ही बाइबिलकार ने उन अंशों को बाइबिल में सङ्गृहीत किया है। अंग्रेजी ग्रन्थकार लिलि तथा फ्रेञ्च पण्डित एमिल बुर्नफ ने भी यही अनुमान किया है। बाइबिल में इस बात का कहीं भी वर्णन नहीं मिलता कि ईसा अपनी आयु के बारहवें वर्ष से तीस वर्ष तक क्या करता था और कहाँ था। इससे प्रकट है कि उसने यह समय धर्मचिन्तन और प्रवास में ज्ञानार्जन में बताया होगा।

अतएव विश्वासपूर्वक यह कौन कह सकता है कि आयु के इस भाग में उनका बौद्ध भिक्षुओं से प्रत्यक्ष या पर्याय से कुछ भी सम्बन्ध हुआ न होगा। क्योंकि उस समय बौद्ध यतियों का दौरदौरा यूनान तक हो चुका था। नेपाल के बौद्धमठ के ग्रन्थ में स्पष्ट वर्णन है कि उस समय ईसा हिन्दुस्थान में आया था और वहाँ उसे बौद्धों से ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह ग्रन्थ निकोलुसनोटोविश नाम के एक रूसी के हाथ लग गया था। उसने फ्रेञ्च भाषा में इसका अनुवाद सन् १८९४ ई० में प्रकाशित किया था। ईसाई पण्डित कहते हैं कि नोटोविश का अनुवाद भले ही सच हो, परन्तु मूल ग्रन्थ का प्रणेता लफङ्गा था। जो भी हो, परन्तु ईसाई-धर्म का मूल बौद्ध धर्म और परम्परा से गीता और वैदिक धर्म ही हो सकता है। जब दो ग्रन्थों के सिद्धान्त एक से होते हैं तो समानता के बल पर यह कहना सम्भव नहीं होता कि अमुक ग्रन्थ पहले रचा गया और अमुक बाद में। क्योंकि यहाँ दो बातें सम्भव हो सकती हैं। इन दोनों ग्रन्थों में से पहले ग्रन्थ के विचार दूसरे ग्रन्थ से लिये गये हों अथवा दूसरे ग्रन्थ के विचार पहले से। अतएव जब दोनों ग्रन्थों के काल स्वतन्त्ररूप से निश्चित कर लिये जायँ तभी यह सम्भव है। दूसरे यह भी होता है कि दो विभिन्न देशों में दो ग्रन्थकारों को एक ही से विचारों का एक ही समय में अथवा आगे पीछे स्वतन्त्र रीति से सूझ पड़ना कोई अशक्य बात नहीं है। अतः वहाँ यह भी विचार करना पड़ता है कि वे स्वतन्त्ररूप से आविर्भूत होने योग्य हैं या नहीं और उन दोनों देशों में आवागमन द्वारा एक देश के विचारों का दूसरे देश में पहुँचना सम्भव था या नहीं। इस तरह चारों तरफ से विचार करने पर स्पष्ट विदित होता है कि ईसाई-धर्म से किसी भी बात का लिया जाना सम्भव नहीं। बल्कि गीता से ही बाइबिल में अनेक अंशों का सङ्कलन सम्भव है। ईसाई-धर्म का मूल यहूदियों की पुरानी बाइबिल है। अग्नि में पशु या अन्य वस्तुओं का हवन करना और ईश्वर के बनाये हुए नियमों का पालन कर के जिह्नोवा को सन्तुष्ट करना आदि से वह कर्म-प्रधान था। नयी बाइबिल उसका ही सुधारा हुआ रूपान्तर है। जैसे वैदिक यज्ञादि धर्मों के अनन्तर अहिंसा तथा ज्ञानप्रधान संन्यासधर्म का प्रादुर्भाव हुआ ऐसी पाश्चात्यों की धारणा है वैसे ही कर्म-प्रधान यहूदियों के धर्म में भी अहिंसा तथा ज्ञानप्रधान ईसाई-धर्म का उद्भव हुआ है ऐसा क्यों न माना जाय ? कई लोग पाईथा गोरस के तत्त्वज्ञान का प्रभाव बाइबिल पर मानते हैं। परन्तु उसकी अपेक्षा बौद्ध धर्म से ही इसमें समता है। जैसे ईसा को भ्रम में फँसाने का शैतान ने प्रयत्न किया वैसे ही बुद्ध को सिद्धावस्था प्राप्ति में अनेक विघ्न उत्पन्न हुए। जैसे ईसा ने ४० दिन तक उपवास किया, वैसे ही ४९ दिन तक बुद्ध निराहार रहे। जब बौद्ध धर्म की निर्विवाद प्राचीनता सिद्ध है। तब ईसाई तथा बौद्ध धर्म में दिखनेवाले साम्य के सम्बन्ध में दो ही पक्ष रह जाते हैं। वह साम्य स्वतन्त्र रीति से दोनों ओर उत्पन्न हो अथवा इन तत्त्वों को ईसा ने या ईसा के शिष्यों ने बौद्धधर्म से लिया हो। प्रो० हिसडेविड्स के अनुसार बुद्ध और ईसा की परिस्थिति एक सी होने के कारण दोनों ओर यह सादृश्य अपने आप स्वतन्त्र रीति से हुआ है। परन्तु विचार करने से यह ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जब कोई बात किसी स्थान में स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न होती है, तब उसका प्रचार सदैव क्रमशः होता है। उदाहरणस्वरूप जैसे वैदिक कर्मकाण्ड से ज्ञानकाण्ड, भक्ति, पातञ्जलयोग, अन्त में बौद्धधर्म का उदय हुआ। परन्तु कर्ममय यहूदी-धर्म से एकाएक संन्यासप्रधान ईसाई-धर्म का

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८५९ उदय कैसे हो सकता है ? अतः उसमें किसी बाहरी शक्ति का हाथ अवश्य ही मानना चाहिये । बौद्ध धर्म के साथ ईसाई-धर्म की पूर्ण समता दिखायी देती है । वैसी समता का स्वतन्त्र रीति से उत्पन्न होना सम्भव नहीं है । यदि बौद्ध धर्म से उसका सम्बन्ध होना असम्भव होता तो दूसरी बात थी । परन्तु प्रकृत में तो इतिहास से सिद्ध होता है कि सिकन्दर के समय ही नहीं, अशोक के समय भी यूनान तक बौद्ध भिक्षुओं का सञ्चार हो रहा था । बाइबिल-काल मेथ्यू (२।१) में यह वर्णन है कि जब ईसा पैदा हुआ तब पूर्व की ओर से कुछ ज्ञानी पुरुष यरूशलम गये थे । उस समय बौद्ध धर्म काश्मीर, काबुल, ईरान तथा तुर्किस्तान तक पहुँचा था । अतः वे ज्ञानी बौद्ध ही हो सकते हैं । अतः भक्तियुक्त संन्यास प्रधान बौद्धधर्म से ही ईसाई धर्म का विकास होना सम्भव है । बौद्ध धर्म का मुख्य स्रोत वैदिक धर्म है । यह भी स्पष्ट ही है, अतः वैदिक धर्म उपनिषद्, गीता आदि से ही बौद्ध धर्म एवं बौद्ध धर्म से ही ईसाई-धर्म में भक्ति, ज्ञान आदि का आविर्भाव हुआ है। पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि बौद्ध धर्म के आचरण-सम्बन्धी आधार वैदिक ही हैं । लोकमान्य तिलक ने अपने गीता-रहस्य ग्रन्थ में पूर्वोक्त रीति से पाश्चात्यों की शैली से गीता का काल ईसा से ५०० वर्ष पूर्व बतलाया है । उनके अनुसार बुद्ध-निर्वाण के बाद तथा शक से ५०० वर्ष पहले महाभारत का निर्माण हुआ था । किन्तु उनका यह निर्णय भी पाश्चात्य-प्रभाव से ही प्रभावित है । भारतीय शास्त्रीय दृष्टिकोण से महाभारत का ही काल ईसा से तीन हजार वर्ष से भी प्राचीन है । गीता का तो सुतरां महाभारत से भी प्राचीन काल है । सर विलियम जोन्स, जनरल प्रिंसेप, जनरल कनिङ्घम आदि पाश्चात्य विद्वानों ने महाभारत का युद्धकाल लगभग १७०० वर्ष पीछे हटाया है । पर यह विचार भ्रमपूर्ण ही है । उसका आधार है मेगस्थनीज की पुस्तक में लिखित सैण्ड्राकोटस को मौर्य चन्द्रगुप्त और उसकी राजधानी पालिबोथ्रा को पाटलिपुत्र मान लेना और उसी के समर्थन के लिए अशोक की धर्मलिपियों के प्रज्ञापन दूसरे और तेरहवें में अन्तियोकस आदि पश्चिम भारत के पाँच राज्यों में यूनान देश के पाँच राजाओं के नामों की कल्पना की गयी है । इस भ्रान्ति के पोषण के लिए महाभारत के युद्धकाल से लेकर मौर्य चन्द्रगुप्त अथवा अशोकवर्धन के समय तक जितने राजा हुए हैं, जिनकी राजवंशावलियाँ उनके राजत्वकाल के सहित हमारे पुराणों में स्पष्ट पायी जाती हैं, उन राजवंशावलियों के राजत्वकालों के अशुद्ध पाठों के आधार पर मनमाना अर्थ किया गया है। उनके अनुयायी भारतीय विद्वानों ने भी उसी का समर्थन किया है। परीक्षित् के जन्म से महापद्म के अभिषेक तक बार्हद्रथों के १००० वर्ष, प्रद्योतों के १३८ वर्ष और शिशुनाकों के ३६२ वर्ष सब मिलाकर १५०० वर्ष होते हैं । "महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एकवर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पञ्चशतोत्तरम् १ ।। (म० पु० १७२।४५) कलियुगारम्भ विक्रम संवत् पूर्व ३०४५ और ईसवी सन् पूर्व ३१०२ का समय है। महापद्मनन्द का अभिषेक काल युधिष्ठिर स० १५०१, विक्रम पूर्व १५४५ एवं ई० सन् पू० १६०२ प्रमाणित होता है । चन्द्रगुप्त मौर्य का राजत्वकाल कलि सं० १६०१, विक्रम पूर्व १४४५, ई० पू० १५०२ से कलि सं० १६२५ विक्रम सं० पु० १४२१ १. पञ्चाशदुत्तरमित्येव पाठो लभ्यते ।

तक एवं अशोक का राजत्वकाल कलि सं० १६५०, वि० पू० १३९६ से २६ वर्षों तक ई० पू० १४२७ तक प्रमाणित होता है । सेण्ड्राकोट्स ऐसी स्थिति में जिस सैण्ड्राकोट्स (चन्द्रगुप्त) का शासनारम्भ विलियम जोन्स आदि विद्वानों ने ई० पू० ३२३ वर्ष के आसपास माना है उसे चन्द्रगुप्त मानना भ्रम है । शिलालेखों के अनुसार मौर्य अशोक का शासनकाल यूनान के पाँच राजाओं के समसामयिक ई० पू० २५८ की कल्पना करना भी साहस ही है। शिलालेखों में पश्चिम- भारतीय राजाओं के यवनादि पञ्च गणराज्यों को यूनान के पाँच राजाओं के नाम पढ़ना भी साहस ही है । श्रीजोन्स आदि विद्वानों के अनुसार यूनानी लेखकों की दृष्टि में पालिबोथ्रा नगरी को पाटलिपुत्र और सैण्ड्रा कोट्स को मौर्य चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश माना जाता है। यूनानी इतिहास के आधार पर उसका काल ई० पू० ३२२ है । यह सब सिद्ध किया जाता है मेगस्थनीज की उक्त पुस्तक के आधार पर जिसे उसने पाँच वर्ष तक सेल्यूकस राजा के राजदूत के रूप में सैण्ड्राकोट्स के दरबार में उसकी राजधानी पालिबोथ्रा में रहकर लिखा था और अब वह कहीं नहीं मिलती । उसके कुछ प्रकीर्ण अंश यूनानी इतिहासकारों की पुस्तकों में मिलते हैं। जिनको पाश्चात्य विद्वानों ने एकत्रित किया था जिनका अंग्रेजी अनुवाद वेक साहब ने किया है। पं० रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित मेगस्थनीज का भारतभ्रमण (हिन्दी) में उल्लेख है कि डायनुशस् पश्चिम से आया था। उसी वंश में हेराक्लीज हुआ था जो साधारण मनुष्यों से बल और बुद्धि में बड़ा था। उसने बहुत-सी स्त्रियों से विवाह कर के बहुत से पुत्र उत्पन्न किये और बहुत से नगर बसाये, जिनमें सबसे बड़ा पालिबोथ्रा है । मेगस्थनीज की पुस्तक का जो अवतरण ओरायन ने दिया है उसमें हेराक्लीज से सैण्ड्राकोट्स तक १३६ पीढ़ियाँ दी हैं। देखो महाभारतमीमांसा (पृ० ९१ प्रकरण ४)। इससे यह सिद्ध होता है कि सैण्ड्राकोट्स से १३८ पीढ़ी पहले पालिबोथ्रा नगरी बसी थी। इतिहासविशारद प्लायनी के अनुसार पालिबोथ्रा नगर गङ्गा और ईरानाबोअस के सङ्गम से २०० मील ऊपर की ओर स्थित है। प्लायनी फ्रैगमेन्ट्स आफ इण्डिया (पृ० १३०)। एम० डी० आनविल्ले के अनुसार ईरानाबोअस यमुना नदी है । इससे गङ्गा और यमुना के सङ्गम से २०० मील ऊपर पालिबोथ्रा का होना सिद्ध होता है। प्लायनी फ्रैगमेंट्स आफ इण्डिया (पृ० १३०) । जोन्स के वक्तव्य में ओरायन के मत से गङ्गा और ईरानाबोअस का सङ्गम प्रसई (प्रस्सी) जनपद में था। कर्टियस का मत है कि मेगस्थनीज का पालिबोथ्रा प्रभद्रक या पारिभद्रक जनपद में है। इस तरह यदि प्रति पीढ़ी बीस वर्ष का समय मानें तो सैण्ड्राकोट्स द्वारा २७६० वर्ष पूर्व पालिबोथ्रा का बसाया जाना सिद्ध होता है। इधर वायुपुराण के अनुसार पाटलिपुत्र नगर शिशुनाक-वंश के आठवें राजा उदायी ने अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में बसाया था— “उदायी भविता तस्मात् त्रयस्त्रिशत् समा नृपः । स वै पुरवरं राजा पृथिव्यां कुसुमाह्वयम् ॥ गङ्गाया दक्षिणे कूले चतुर्थेऽब्दे करिष्यति ।।” (वायु० पृ० ९९।३१८, ३१९) दर्शक का पुत्र उदायी ३३ वर्ष तक राज्य करेगा । वह अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में गङ्गा के तट पर कुसुम नामक नगर बसायेगा । ब्रह्माण्डपुराण उपोद्घात ३ पा० १३२ श्लोक में भी उदायी का अभिषेक कलि सं० १३८५, विक्रम पूर्व १६५७, ई० पू० १७१६ से चौथे वर्ष ई० पू० १७१३ के कुसुमपुर बसाया गया । जैनपुस्तक 'पटवन' में भी पाटलिपुत्र को शिशु नामक वंश में आठवें राजा ने बसाया लिखा है। परन्तु पालिभाषा के बौद्ध ग्रन्थ महामग्ग सुत्तनिपात में लिखा है कि शिशुनामक वंश में छठे राजा अजातशत्रु ने कुसुमपुर बसाया। देखो भारत के प्राचीन नगर पुस्तक पृष्ठ ३२ । कुसुमपुर, पुष्पपुर, पाटलिग्राम, पाटलिपुत्र, पाटलिनगरी ये सब पर्यायवाची शब्द हैं ।

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अध्याय रामचरित आदि का रचना-काल ८६१ इन सब प्रमाणों से जोन्स का यह मत खण्डित हो जाता है कि पालिबोश्रा पाटलिपुत्र का अपभ्रंश है। मेगस्थनीज के किसी भी अवतरण में पालिबोश्रा का मगध देश में होने का वर्णन नहीं है । पाटलिपुत्र उदायी द्वारा ई० पू० १७१३ में बसाया गया और पालिबोश्रा ई० पू० ३०८२ वर्ष में हेराक्लीज द्वारा बसाया गया । इसी तरह पालिबोश्रा का राजा सैण्ड्राकोट्स पौराणिक मौर्य चन्द्रगुप्त नहीं हो सकता । मौर्य चन्द्रगुप्त के शासनाारम्भकाल से ११८० वर्ष पीछे सैण्ड्राकोट्स का शासनाारम्भ हुआ । हो सकता है शूरसेन देश के पुसई जनपद के प्रभद्रनगर का कोई दूसरा चन्द्रगुप्त या चन्द्रकेतु रहा हो या इसी से मिलते जुलते नाम का शासक रहा हो । जोन्स के वक्तव्य के समर्थन में प्रिसेप बकिङ्घम, ने जिन गुहाभिलेखों और स्तम्भाभिलेखों को खोज निकाला है । उनको बड़े परिश्रम से पढ़कर यह प्रतिपादित किया गया है कि ये सब अशोक के हैं । चौदह प्रज्ञापन- वाले लेख में भी अन्तियोकस, मग, अन्तेकिन, तुरमय और अलीकसिन्धुर पाँच नामों के विषय में यूनान के भिन्न-भिन्न भागों के राजाओं के नामों की कल्पना की है। तथा उन सब राजाओं के समसामयिक ई० पू० २५८ वर्ष पर उन प्रशासनों को अङ्कित होना मानकर अभिलेखों के लिखनेवाले राजा को मौर्य अशोक प्रतिपादित किया गया है। उसी के आधार पर अशोक के पितामह चन्द्रगुप्त का राजत्वकाल वही लिखा है जो जोन्स के अनुसार मान्य होता है । परन्तु ये सब कल्पनाएँ भी भ्रान्तिमूलक ही हैं । वस्तुतः अशोक के नाम से प्रख्यात—'‘देवांनांप्रियः प्रियदर्शी राजा’’ देवानां प्रिय एवं बिना नाम के किसी व्यक्ति के लिखाये गये जितने धर्मलेख गुहाओं, स्तम्भों और शिलाओं के पाये गये हैं, वे धर्मलेख कब लिखे गये इसका कोई उल्लेख नहीं है, केवल इतना ही उल्लेख है कि प्रज्ञापन लिखानेवाले व्यक्ति के अभिषेक से कितने वर्ष पर लिखे गये हैं। अतएव जबतक लिखानेवाले राजा का अभिषेक का काल ज्ञात न हो तब तक उन लेखों का समय नहीं जाना जा सकता । म० म० पं० हीराचन्द्र ओझा के अनुसार किसी लेख या दानपत्र का निश्चित संवत् न होने पर उसकी लिपि के आधार पर समय स्थिर करना चाहिये । पर उसमें भी सैकड़ों वर्षों की चूक होना सम्भव है । प्रथम लघु शिलालेख में जो २५६ वाँ अङ्क है उसको बहुत से इतिहासज्ञ बुद्ध-निर्वाण संवत् मानते थे । हिन्दी टॉड राजस्थान के सम्पादक ओझाजी ने भो प्रकरण ६ की टिप्पणी ४४ में इसका समर्थन किया है, किन्तु पं० जनार्दन- भट्ट ने अशोक के धर्मलेख पृष्ठ ७९ की टिप्पणी १२ में कहा है कि आजकल इस मत का पूरा पूरा खण्डन हो गया है । अतः धर्मलेखों का निश्चित समय निरूपण करना सम्भव नहीं । कहा जाता है उपलब्ध समस्त अभिलेख अशोक के हैं । पर यह असंदिग्ध नहीं है, क्योंकि केवल मासकी के खण्ड प्रथम लघु शिलालेख से अशोकस्तम्भ में अशोकस ये चार अक्षर मिले हैं । शेषों में अशोक का नाम नहीं है । इन अभिलेखों में ‘'देवानांप्रियः प्रियदर्शी राजा” की द्विरुक्ति त्रिरुक्ति तो की गयी है, पर ‘अशोक' ये तीन अक्षर नहीं लिखे गये । अतः इन अभिलेखों को मौर्य अशोकवर्धन के मानना युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि जिन विषयों का वर्णन सातवें स्तम्भाभिलेख और तेरहवें विज्ञापन में है । ठीक उसी प्रकार का वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने भारत के वर्णन प्रसङ्ग में अपने आश्रयदाता हर्षवर्धन ( शिलादित्य द्वितीय ) के विषय में किया है। देखिये रमेशचन्द्रदत्तकृत प्राचीन भारत की सभ्यता भाग ४ अ० २ पृ० २६ । ऐसी स्थिति में देवानांप्रियः प्रियदर्शी राजा शब्दों को, जो बौद्ध राजाओं की उपाधियां थीं, राजा हर्षवर्धन के लिए भी उपयुक्त मान सकते हैं। देखिये अशोक की लिपियां पृ० ७ की टिप्पणी । यदि उक्त धर्मलेख अशोकवर्धन के मान- कर पौराणिक राजवंशवलियों के राजत्वकालों के आधार पर विचार करें तो मौर्य अशोकवर्धन का राजत्वकाल कलि संवत् १६५०, विक्रम संवत् पूर्व १३९६, ई० पू० १४५३ से कलि संवत् १६७६, वि० पू० १३७०, ई० पू० १४२७

८६२ रामायणमीमांसा द्वाविंश तक २६ वर्ष होता है। ऐसी स्थिति में शिलालेख के प्रज्ञापनों में यूनान के उन पाँच राजाओं का नाम पढ़ना जिनका राजत्वकाल ई० पू० २८५ से २३९ तक माना जाता है। सर्वथा असङ्गत ही ठहरेगा । अतः उन्हें मौर्य अशोकवर्धन के समसामयिक मानना महान् भ्रम है। वस्तुतः उक्त शिलालेखों के अन्ति- योकस, तुरमय, अन्तेकिन, मग तथा अलीकसिन्धुर ये नाम भारत के पश्चिमीय राज्यों के नाम हैं जो वारुण भारत के पञ्चगण नाम से अयोध्या के महाराज सगर के पूर्व काल से प्रसिद्ध हैं और जो चन्द्रवंशीय ययाति के तुर्वसु आदि तीनों पुत्रों के वंशधर राजाओं के अधिकार में थे। समयानुसार शासकों के नाम तथा प्रदेशों की प्राकृतिक दशाओं के कारण इन गणराज्यों के नामों और सीमाओं में परिवर्तन होता रहा। फिर भी ये पञ्चगण राज्य संस्कृत साहित्य में सिन्धु नदी के पश्चिम भारत के मुख्य राज्य माने गये हैं। इन्हीं का उल्लेख तथाकथित अशोक प्रियदर्शी प्रज्ञापनवाले शिलालेख के दूसरे, पाँचवें और तेरहवें विज्ञापनों में है। एलेक्जेण्डर को एपिरस का राजा कहना कथमपि सङ्गत नहीं। किसी भारतीय सम्राट् के लिखाए हुए भारतीय धार्मिक शिलालेख में यूनानी राजाओं के नामोल्लेख की कोई भी सङ्गति नहीं। इससे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि पाश्चात्यों को हमारे वेदादि शास्त्रों की तथा आर्ष इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि की अपौरुषेयता तथा प्राचीनता खटकती है। इसी लिए तो वेदों को भी वे ई० पू० दो हजार वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं मानना चाहते । आधुनिकों के दृष्टिकोण से किसो ग्रन्थ का या उसके रचयिता का नामोल्लेख किसी ग्रन्थ में देखकर अथवा उस ग्रन्थ का नाम और उसके रचयिता का नाम दूसरे किसी ग्रन्थ में न देखकर दोनों ग्रन्थों के रचना-काल का पूर्वापरत्व निर्णय किया जाता है। अथवा यवनादि जाति अथवा व्यक्तिविशेष के नामों, वारों के नाम, राशियों के नाम, नक्षत्र- गणना के आधार पर निर्धारण किया जाता है। इस दृष्टि से महाभारत में आये हुए नामों एवं ग्रन्थों के आधार पर महाभारत के रचनाकाल का निर्णय किया जाता है। परन्तु जब तक उन नामों और ग्रन्थों का निर्माण-काल निश्चित न कर लिया जाय तब तक महाभारत का निर्माण-काल भी निर्धारित नहीं हो सकता है। पाश्चात्यों के मतानुसार भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की महास्थूल गणना वेदाङ्गज्योतिष की गणना से भी स्थूल थी, जिसके अनुसार भीष्मपितामह ने तेरह वर्ष के सौरमान में तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन की व्यवस्था विराटपर्व में दी थी। सिद्धान्तगणित का ज्ञान तो भारत को यूनानी ज्योतिषियों से हुआ था। नक्षत्र-मण्डल के बारह विभाग (राशियों का विभाग) भी यूनानियों की ही देन हैं। भारत में सप्ताह के स्थान षडह की गणना होती थी । वारों का ज्ञान भारतीयों को कल्डियावालों से हुआ था। इसी दृष्टि से जिन संस्कृत ग्रन्थों में (भले वे किसी विषय के हों) राशियों के बारह विभाग एवं सूर्यादि वारों तथा ज्योतिष की सिद्धान्तगणना का उल्लेख हो वे सभी ग्रन्थ ई० पू० ४०० वर्ष से पूर्व के नहीं हैं। चैत्रादि मासों का नाम भी जिन ग्रन्थों में हो उन्हें वेदाङ्गज्योतिष के पूर्व और ब्राह्मण ग्रन्थों के मध्यकाल का निर्माण मानते हैं। पाश्चात्यों के अनुसार महाभारत, पुराण, पातञ्जल महा- भाष्य और जिन ज्योतिषग्रन्थों में यवन जाति की विद्वत्ता, आक्रमणकारिता और वीरता का उल्लेख है वे सभी ग्रन्थ सिकन्दर के आक्रमण ई० पू० ३२३ के पीछे के हैं। अर्थात् ई० पू० ५०० वर्ष के प्रथम के नहीं हो सकते। इसी दृष्टि से लोकमान्य ने भी महाभारत में राशिविभाग का वर्णन न होने से उसे सिकन्दर के आक्रमण से पूर्व का और बौधायनगृह्यसूत्र में मेष, वृष आदि का नाम होने से उसे सिकन्दर के बाद का माना है। परन्तु उपर्युक्त बातें भी निःसार हो हैं, क्योंकि महाभारत आदि में आये हुए यवन शब्द ग्रीक या यूना- नियों के अर्थ में है ही नहीं। किन्तु उन्हें महाराज ययाति के पुत्र तुर्वसु के पुत्र यवन राजाओं के लिए ही समझना चाहिये । “यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ।” (म० भा० १।८५।३४ )

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६३ यदु से यादव तथा तुर्वसु से यवन लोग हुए । इस तरह ययातिपौत्र यवनों के वंशधर यवन हैं, यूनानी नहीं । उन्हों का राज्य यवनराज्य के नाम से प्रख्यात हुआ है । ब्रह्मपुराण के अनुसार सूर्यवंशीय राजा बाहु पर हैहयादि राजाओं के आक्रमण के समय पञ्चगणाधिपति यवन भी उनके साथ थे— “हैहयेस्तालजङ्घैश्च शकैः सार्द्धं द्विजोत्तम । यवनाः पारदाश्चैव काम्बोजाः पह्लवास्तथा ॥ एते ह्यपि गणाः पञ्च हैहयार्थे पराक्रमन् ॥” (ब्र० पु० २।३ इन्द्रविजय पृष्ठ ४४) जब राजा बाहु के पुत्र सगर ने पितृशत्रुभूत पञ्चगणों को पराजित किया तब वशिष्ठ के शरणागत होने के कारण उनको धर्मभ्रष्ट, आचारभ्रष्ट तथा आर्यसंस्कृतिहीन कर के निर्वासित कर दिया था— “अर्धं शकानां शिरसो मुण्डयित्वा व्यसर्जयत् । यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च ॥ पारदा मुक्तकेशाश्च पह्लवाः श्मश्रुधारिण । सर्वे ते क्षत्रिया विप्रा धर्मस्तेषां निराकृतः ॥” (इन्द्रविजय पृ० ४४।१०,११) मनुस्मृति के अध्याय १० श्लोक ४३, ४४ में कहा गया है । पाण्ड्य, चोल, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दरद, खश आदि क्षत्रियजातियाँ थीं । ब्राह्मणों के अदर्शन से संस्कारहीन होते हुए वे सब म्लेच्छप्राय हो गये— “शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥” (मनु १०।४३ ) “पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविड़ाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥” (मनु० १०।४४ ) इस तरह यवनों का नाम देखकर उन्हें यूनानी समझना अत्यन्त भ्रम है । इसी लिए शक, यवन आदि प्रयोग अनिर्वासित शूद्रों में प्रयुक्त हुआ है । इसी तरह भारतीय ज्योतिष ज्योतिर्विज्ञान-कालगणना के आधार पर स्थित है । भारतीय कालगणना सृष्टि के आदि से अन्त तक समान रहती है । विराटपर्ववाली भीष्मपितामह की गणना भी उससे विरुद्ध नहीं है । उस समय भी सौरमान और चान्द्रमान दोनों ही मान प्रचलित थे । दोनों के समन्वय के लिए अधिकमास की व्यवस्था थी । उस दृष्टि से भीष्मजी ने व्यवस्था के रूप में कहा था कि इस समय तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन द्यूतक्रीड़ा के दिन से बीत चुके हैं । उसी के अनुसार भगवान् रामचन्द्र ने भी चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण किया था । उसी के अनुसार पाण्डवों ने भी तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी की थी । वह गणना सौरचान्द्रगणना है । जिसका वर्ष चैत्र शुक्लप्रतिपदा से आरम्भ होकर चैत्रकृष्ण अमावस्या को पूरा होता है । उसके दिन कम से कम ३५४ और अधिक से अधिक ३८४ होते हैं । उसी के अनुसार कौरवों के ठीक चौदहवें वर्ष के प्रथम दिन में वेदाङ्गज्योतिष की गणना के अनुसार तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन होते हैं । यदि द्यूतक्रीडा की मिति वि० सं० १९९० ज्येष्ठ कृष्ण ८मी बुधवार को मान लें तो उस दिन राश्यादि सूर्य ( १।१३।०।४१) ता० १७ मई ई० १९३३ और अर्जुन के प्रकट होने की मिति वि० सं० २००३ ज्येष्ठ कृष्णाष्टमी शुक्रवार को मान लें तो उस दिन राश्यादि सूर्य १।९।५२।९ ता० १४ मई १९४६ ई० द्यूतक्रीडा और अर्जुन का प्रकट होना इन दोनों का अन्तर सौरचान्द्रमान से तेरह वर्ष एक दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का पहला दिन, सौरमान से होगा तेरह वर्ष ६ दिन अर्थात्

८६४ रामायणमीमांसा द्वाविंश चौदहवें वर्ष का छठा दिन तथा अंग्रेजी मान से होगा १३ वर्ष ७ दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का सातवाँ दिन। वेदाङ्गज्योतिष चान्द्रमान के अनुसार तेरह वर्ष ५ महीने १२ दिन होंगे। यही भीष्मजी की व्यवस्था है। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि महाभारत-युद्धकाल में सिद्धान्तज्योतिष के अनुसार ही पञ्चाङ्गगणना होती थी, क्योंकि ऊपर की गणना सिद्धान्तज्योतिषगणना के पञ्चाङ्ग द्वारा ही की गयी है। चान्द्र, सावन और सौर भेद से तीन प्रकार के मास होते हैं। संवत्सर भी चान्द्र, सावन और सौर भेद से तीन प्रकार के होते हैं। पहला चैत्र शुक्ला प्रतिपद् से आरम्भ होकर फाल्गुन दर्शान्त होता है, मेष राशि से मीन राश्यन्त सौर संवत्सर होता है एवं तीन सौ साठ अहोरात्र का सावन संवत्सर होता है। चन्द्रकलाओं की वृद्धि और ह्रास के अनुसार प्रतिपदादि ३६० तिथियों का चान्द्र संवत्सर होता है तथा द्वादश राशियों में सूर्य-संक्रमण से निष्पन्न सौर संवत्सर होता है। सोमयाग में प्रातःसवन, मध्याह्नसवन और सायंसवन रूप से तीन सवन अहोरात्रसाध्य होते हैं, अतः सवनत्रय अहोरात्रसंपाद्य होने के कारण अहोरात्र ही सावन शब्द से कहे जाते हैं। तीन सौ साठ अहोरात्रों से सम्पन्न संवत्सर ही सावन संवत्सर कहा जाता है। गोसत्र आदि यज्ञों में तथा लोकव्यवहार में भी सावन संवत्सर का ही उपयोग होता है। यही विष्णुधर्मोत्तरपुराण में कहा गया है— “सत्राण्युपास्यानान्यथ सावनेन लोक्यञ्च यत्स्यात् व्यवहारकर्म ।” श्रुति में गवामयन सत्र का संवत्सर नाम से व्यवहार होता है। अतः संवत्सरकाल उसका अङ्ग है। “गोसत्रं वै संवत्सरो य एवं विद्वांसः संवत्सरमुपयन्त्युदृध्नुवन्त्येव ।” (तै० सं० ७।५।१।१) अतः उस सत्र में सावन ही संवत्सर ग्राह्य है, सौर और चान्द्र नहीं। एक अहोरात्र साध्य सोमयाग वेदों में अहःशब्द से व्यवहृत होता है। ऐसे अहर्विशेषों का गण एक षडह कहा जाता है। षडह अभिप्लव और पृष्ठ्य भेद से दो प्रकार का होता है। चार अभिप्लव षडह एवं एक पृष्ठ्य षडह इन पाँच षडहों से एक मास बनता है। तादृश द्वादश मासों से सावन संवत्सर बनता है। चान्द्र संवत्सर में छः अहोरात्र कम होते हैं। सौर में सपाद पाँच अहोरात्र अधिक होते हैं। “संवत्सरे संवत्सरे यजेत” इस श्रुति में चान्द्र संवत्सर ही ग्राह्य है, क्योंकि ‘सर्वान्ल्लोकान् पशुबन्धयाजी अभिजयति तेन यक्ष्यमाणोऽमावस्यायां वा’ इस तरह कल्पसूत्रकारों ने चान्द्र तिथि में ही उसका अनुष्ठान विहित किया है। सौर संवत् सुजन्मप्राप्ति व्रतों में उपयुक्त होता है। विष्णुधर्मोत्तर में वैसा व्रत विहित है। अतः भारतीय विद्वानों ने नक्षत्र-मण्डल के बारह विभाग कर १२ राशि और सात वासरों का ज्ञान यूनान से सीखा है, यह पाश्चात्यों का कथन सर्वथा निराधार है। क्योंकि वासर-ज्ञान के बिना अहर्गण की गणना ही नहीं हो सकती। सिद्धान्तज्योतिषगणना अहर्गण द्वारा मध्यम सूर्य, चन्द्रादि ग्रहों में मन्दोच्च शीघ्रोच्च संस्कार देकर ही सम्पादित होती है। “एको अश्वो वहति सप्तनामा ।” (ऋ० सं० १।१६४।२) इस मन्त्र से सप्तवासरों का प्रमाण मिलता है— “अमा सोमे तथा भौमे गुरुवारे यदा भवेत् । तत्पवं पुष्करं नाम सूर्यपर्वशताधिकम् ॥”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६५ हेमाद्रि-दानखण्ड तृतीय प्रकरण में उद्धृत महाभारतवचन । अर्थात् सोम, भौम तथा गुरुवार को अमावस्या होने पर पुष्कर पर्व होता है और वह सौ सूर्य पर्वों से भी अधिक पुण्य काल है । इसी तरह अयन ( कर्क और मकर ), विषुव ( मेष और तुला ), षडशीतिमुख ( मिथुन, कन्या, धनु और मीन ) तथा पर्व अर्थात् विष्णुपद ( वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ ) नामों से संक्रान्तियों का वर्णन महाभारत में विद्यमान है— "ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्ययनादिषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहौविषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ।।" (म०भा० ३।२००।२६) “अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखे ध्रुवम् । चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ।।" (म० भा० ३।२००।२५) इन वचनों में अयन, विषुव, षडशीतिमुख आदि उक्त राशियों के संकेत हैं। अतः वेदादि शास्त्रों के समान ही यह गणना भी अनादि ही है। वृद्धवसिष्ठ ने संक्रान्तियों के उक्त नाम बतलाये हैं— “अयने द्वे विषुवे द्वे चतस्रः षडशीतयः । चतस्रो विष्णुपद्यश्च संक्रान्तयो द्वादश स्मृताः ॥” पञ्चाङ्गों के तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण यह ज्योतिषपञ्चाङ्ग प्रसिद्ध ही है । पञ्चाङ्गों के अनुसार आज से (ग्रन्थ निर्माण दिन से) २०२९ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् तथा ५०७३ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् एवं कलि सम्वत् का आरम्भ हुआ था ! धृतराष्ट्र के दिवङ्गत होने के अनन्तर युधिष्ठिर के शासनकाल में ही महाभारत का निर्माण हुआ था । भारतीय साहित्यों के अनुसार तथा विविध लेखों के अनुसार भी महाभारत- निर्माण का काल यही था । संवत् ९७७ शिशुपालवध माघकाव्य के टीकाकार वल्लभदेव ने महाभारत के श्लोकों की सवा लाख संख्या बतलायी है । वल्लभदेव के पुत्र चन्द्रादित्य थे तथा पौत्र कैय्यट थे । कैय्यट ने देवीशतक की विवृति में अपना समय कलि संवत् ४०७८ अर्थात् विक्रम १०३४ लिखा है ( माघ का० २।३८ ) । सपाद लक्ष संख्या हरिवंश सहित महाभारत की समझनी चाहिये । संवत् ९३७ के राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में भारतसंहिता को शतसाहस्री ( लक्षश्लोकोंवाली ) कहा है । गीता की पुष्पिका में भी महाभारत को शतसाहस्रीसंहिता के रूप में स्मरण किया गया है । विक्रम नवमशती के आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोकवृत्ति ३।१५ में महाभारत शान्तिपर्व अ० १५३ के गृध्रगोमायुसंवाद की चर्चा की है। वे अनुक्रमणिकाध्याय और हरिवंश को महाभारत का ही भाग मानते हैं । “ननु महाभारते यावान् विवक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुक्रान्तः••••महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन तेनैव कविबेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः ।” (ध्वन्यालोक चतुर्थ उद्योत ) सातवीं शती के आचार्य कवि दण्डी अपनी अवन्तिसुन्दरी में महाभारत एवं उसके निर्माता व्यासजी का स्मरण करते हैं— "मर्त्ययन्त्रेषु चैतन्यं महाभारतविद्यया । अर्पयामास तत्पूर्वं यस्तस्मै सुनये नमः ।।" ( अवन्तिसुन्दरी )

८६६ रामायणमीमांसा द्वाविंश जिसने मर्त्यरूपी यन्त्र में महाभारतविद्या से चैतन्य का सञ्चार किया था उन व्यास मुनि को नमस्कार है । दण्डिपूर्वभावी बाणभट्ट अपनी कृति कादम्बरी तथा हर्षचरित में अनेक बार महाभारत और व्यास का उल्लेख करते हैं । यथा— पार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता, विराटनगरीव कीचकशतावृता । (पृ० ६०) भीष्ममिव शिखण्डिशत्रुम्, पराशरमिव योजनगन्धानुसारिणम् । (पृ० १०७,१०८) महाभारते शकुनिवधः । (पृ०१४३) महाभारतपुराणरामायणानुरागिणा (पृ० १७९) आस्तीकतनुरिवानन्दितभुजङ्गलोका । (पृ० १८२) महाभारते दुःशासनापराधाकर्णनम् । (पृ० १९९, कादम्बरीपूर्वभागे) एकाकी तपस्वी वनमृगैः सह संवर्धितः सहजब्राह्मणमार्दवसुकुमारमनाः कृतनिश्चयः समग्र- मुद्यतमेकविंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान् राजन्यकं रामः । (उच्छ्वास षष्ठ, पृ० २९१) हिडिम्बामुखचुम्बनास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतमपायि पवनात्मजेन । (उच्छ्वास षष्ठ, पृ० २९२) जामदग्न्येन क्षत्रियक्षतमहाह्रदेषु अस्नायि । (हर्षचरित उच्छ्वास षष्ठ, २९२) “नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी । कथेव भारती यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम् ॥” (श्रीहर्षचरिते उपोद्घाते ४ और १०) उपर्युक्त वचनों में वानराक्रान्ता पार्थरथपताका को तथा कीचकों से आवृत विराटनगरी को उपमान के रूप में देखा है । शिखण्डिशत्रु भीष्म तथा योजनगन्धानुसारी पराशर को भी उपमान बनाया गया है । महाभारत के शकुनिवध, नागसमुदाय को आनन्दित करनेवाले आस्तीक मुनि, दुःशासन के अपराध, जामदग्न्य के इक्कीस बार क्षत्रोन्मूलन, हिडिम्बा, भीम तथा दुःशासन के रक्तपान, जामदग्न्य का क्षत्रियरक्तमहाह्रद में स्नान आदि का उल्लेख है । यह सब कथावस्तु महाभारत की ही है । श्लोकों में सर्वविद् व्यास एवं उनकी जगत्त्रय-व्यापिनी भारतीय कथा की चर्चा है । काशिकाकार जयादित्य भी बाणभट्ट के समकालिक हैं— “द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ।” (पा० सू० ४।१।१०३) में “नैवात्र महाभारतद्रोणो गृह्यते” इस वाक्य द्वारा महाभारत की चर्चा करते हैं । मेघदूत में कालिदास ने रामायण और महाभारत दोनों की चर्चा की है । रामायण— “जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा ।” महाभारत— “क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद् भजेथाः ।”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६७ जयादित्य से प्राचीन भट्टपाद कुमारिल व्यासजी एवं उनके श्लोक का स्मरण करते हैं— “प्रसिद्धो हि तथा चाह पाराशर्योऽत्र वस्तुनि । इदं पुण्यमिदं पापम्…………॥ (श्लोकवार्तिक) धर्मकीर्ति भी भारत की चर्चा करता है— “भारतादिष्वपि इदानीन्तनानामशक्तावपि कस्यचित् शक्तिसिद्धेः । (प्र० वार्तिक ४४७, ४४८) संवत् ६२७ से पूर्ववर्ती वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने वाक्यपदीय काण्ड १।१४२ में अश्वमेध पर्व का श्लोक उद्धृत किया है—“गौरिव प्रक्षरत्येका”। वासवदत्ता में उद्धृत न्यायवार्तिककार उद्योतकरसूत्र ४।१।२१ वार्तिक में महाभारत वनपर्व के ३०।२८ वां श्लोक उद्धृत करते हैं— “अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ॥” योगभाष्य में योगभाष्यकार द्वारा १।४७ और २।४२ में महाभारत शान्तिपर्व १७।२०, १५१।११ तथा महाभारत शान्तिपर्व १७४।४६, २७७।५१, ७७।७ उद्धृत है । “प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥” महाराज सर्वनाथ के शिलालेख संवत् १९१-२१४ तक के मिल चुके हैं । पाश्चात्य-पद्धति के लोग इस संवत् को कलियुगी संवत् मानते हैं । सर्वनाथ के ताम्रलेख में भारत के १ लाख श्लोक माने गये हैं— उक्तं च महाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां परमर्षिणा पराशरसुतेन व्यासेन । ( गुप्तशिलालेख भाग ३ पृ० १३४ ) शाबरभाष्य के लेखक शबरस्वामी इससे भी प्राचीन हैं । इन्होंने भी ८।१२ में महाभारत आदिपर्व १।४९ का श्लोक उद्धृत किया है— “विस्तीर्यं हि महज्जालमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥” इस उद्धरण के अनुसार महाभारत का अनुक्रमणीपर्व भी व्यासकृत है और महाभारत लक्षश्लोकात्मक है, यह सिद्ध होता है । कामसूत्रकार वात्स्यायन ने १।४ में इस श्लोक को उद्धृत किया— “धर्मकामार्थयुक्तानि शास्त्राणि विविधानि च । लोकयात्राविधानं च सर्वं तद् दृष्टवानृषिः ॥” आचार्य गर्ग स्कन्दस्वामी के पूर्ववर्ती हैं । उन्होंने निरुक्तभाष्य ४।१ में आदिपर्व का यह वचन उद्धृत किया है— “विस्तीर्य हि महज्ज्ञानमृषिः संक्षेपतोऽब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥”

८६८ रामायणमीमांसा द्वाविंश

एष वाख्यानसमयः ७।७ पर दुर्गाचार्य कहते हैं । भारते आख्यानसमयः इसके आगे के आख्यानों का निर्देश करते हैं । पृथिवी स्त्रीरूप में ब्रह्मा से याञ्चा करती है ( म० भा० १।६४ ) । अग्नि ने ब्राह्मणरूप में वासुदेव एवं अर्जुन से खाण्डव वन की याञ्चा की थी ( म० भा० १।२२४-२२५ ) । “व्यासः कणाद ऋषभः कपिलः शाक्यनायकः । निर्वृते मम पश्चात्तु भविष्यन्त्येवमादयः ॥ मयि निर्वृते वर्षशते व्यासो वै भारतस्तथा । पाण्डवाः कौरवा राम पश्चान्मोर्यो भविष्यति ॥ मौर्या नन्दाश्च गुप्ताश्च ततो म्लेच्छा नृपाधमाः । म्लेच्छान्ते शस्त्रसंक्षोभः शस्त्रान्ते च कलियुगः ॥” लङ्कावतारसूत्र का चीनी अनुवाद सन् ५७ ई० में हुआ है । उक्त श्लोक लङ्कावतारसूत्र के हैं । इसमें व्यास और भारत का नाम है । वररुचिकृत वाररुच निरुक्तसमुच्चय मिलता है । उसमें “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ‘इति व्यासवचनम्’ कहा गया है । इससे महाभारत व्यासकृत सिद्ध होता है । वररुचि विक्रमादित्य का पुरोहित था । अतः विक्रम १ शती का था । पैशाची बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के अनुसार उसके समय में महा- भारत विद्यमान था । अतएव उसके अनुवादभूत कथासरित्सागर में रुरु मुनि की कथा १४।७६ आदिपर्व अध्याय ८ में मिलती है । सुन्दोपसुन्द कथा ५।१३५ आदि २१२ में मिलती है । कुन्ती दुर्वासा १६।३६ आ० प० ११३।३२ में, पाण्डुमुनिवध-कथा २१-२० आदिपर्व १०८ में तथा शकुन्तला ३२।१०८ आदिपर्व ६२ में मिलती है । अश्वघोष के बुद्धचरित १।४७ में नष्ट वेद का सारस्वत द्वारा उपदेश का वर्णन है । वह महाभारत शल्यपर्व अध्याय ५१ में ही है । आद्य कालिदास ही रघुवंश, कुमारसम्भव, अभिज्ञानशाकुन्तल आदि के प्रणेता हैं । ‘यतो हि रसविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यसाहसाङ्कस्याभिरूपपण्डितभूयिष्ठेयं परिषद्’ इस अभिज्ञानशाकुन्तल के वचन से विक्रमादित्य के स्पष्ट सङ्केत तथा विक्रमोर्वशीयम् एवं मालविकाग्निमित्रम् आदि ग्रन्थों से विक्रमा- दित्य, अग्निमित्र, शूद्रक आदि से उनका विशेष सम्बन्ध निश्चित होता है । कालिदास विक्रमादित्य की सभा के रत्न थे यह प्रसिद्धि ठीक ही है । मृच्छकटिक में शूद्रक अपने को द्विज मुख्यतम कहते हैं । वे अपने को कवि, महासत्त्व, ऋग्वेद, सामवेद, गणितकला, हस्तिशिक्षा आदि में निष्णात, शिवजी के प्रसाद से सर्वज्ञानलब्धा, अश्वमेधयाजी, साग्रशतसंवत्सरजीवी, प्रमादशून्य, वेदविदां ककुद्, तपोधन तथा समरव्यसनी भी कहते हैं— “ऋग्वेदं सामवेदं गणितमथ कलां वैशिकीं हस्तिशिक्षां ज्ञात्वा शर्वप्रसादाद् व्यपगततिमिरे चक्षुषी चोपलभ्य । राजानं वीक्ष्य पुत्रं परमसमुदयेनाश्वमेधेन चेष्ट्वा लब्ध्वा चायुः शताबदं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः ॥” ( मृच्छकटिक १।४ ) उपर्युक्त श्लोकों में यह भी उल्लेख है कि शूद्रक अन्त में अग्नि में प्रविष्ट हो गया था । यहाँ यह शङ्का होती है कि स्वयं शूद्रक अपने भावी अग्निप्रवेश की 'अग्निं प्रविष्टः' अतीतरूप से कैसे लिख सकता है । अतः ये श्लोक शूद्रकरचित न होकर किसी अन्य के ही होने चाहिये । परन्तु यह शङ्का निरर्थक ही है, क्योंकि शूद्रक शिबजी

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६९ का गण था । शिवप्रसाद से ही जैसे उसने अन्य चमत्कारपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त की थीं वैसे ही भावी अग्निप्रवेश का भी ज्ञान एवं उल्लेख उसके द्वारा सम्भव है । भावी वृत्तान्त का निर्देश भी सौकर्य-द्योतन के लिए परोक्ष अतीत रूप से किया जाता है । तभी तो 'व्योतेने किरणावलीमुदयनः' प्रयोग हुआ है । किरणावलीकार ग्रन्थ के आरम्भ में ही कहते हैं—'व्यातेने किरणावलीम्' किरणावली का निर्माण मेरे लिए इतना सुकर है कि समझ लेना चाहिये कि उदयन ने किरणावली का निर्माण किया और इतने अनायास से किया कि उसको भी नहीं ज्ञात हुआ । कवि दण्डी भी शूद्रक का वैसा ही स्मरण करते हैं । वे हर्षचरित के टीकाकार रङ्गनाथ अग्निमित्र को ही शूद्रक मानते हैं। वही समरों में आदित्यवत् प्रकाशमान होने में विक्रमादित्य की संज्ञा को प्राप्त हुए थे । उनकी ऐतिहासिकता में उनका प्रचलित विक्रमीय संवत् ही परम प्रमाण है । वह युधिष्ठिरसंवत्, कलिसंवत्, बुद्धसंवत्, वीरसंवत् आदि सबसे अधिक प्रसिद्ध है । विशेषतः आसेतु हिमाचल वैदिक सम्प्रदाय तथा पञ्चाङ्गों में उसी का सर्वाधिक प्राधान्य है । कहा जाता है कि जो पर्याप्त सुवर्णदान के द्वारा भूतल में सभी का ऋण उतार देता है । वही संवत्सर की स्थापना कर सकता है । वीर विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जैनसम्प्रदाय में ऐसी ही प्रसिद्धि है । प्रभावकचरित्र नामक ग्रन्थ में निम्नोक्त श्लोक मिलते हैं— “शकानां वंशमुच्छेद्य कालेन कियतापि हि । राजा श्रीविक्रमादित्यः सार्वभौमोपमोऽभवत् ।। स चोन्नतमहासिद्धिसौवर्णपुरुषोदयात् । मेदिनीमनृणां कृत्वाऽचीकरद् वत्सरं निजम् ।।” अर्थात् कुछ ही काल में शकों का वंशोच्छेद कर राजा विक्रमादित्य सार्वभौम तुल्य हो गये थे । उनकी महासिद्धि से सौवर्ण पुरुष का उदय होने से सम्पूर्ण मेदिनी को अनृण कर के उन्होंने अपना संवत्सर चलाया था । फिर भी कुछ लोगों का आक्षेप है कि यह संवत् अपने प्रारम्भ की शताब्दियों में विक्रम के नाम से सम्बद्ध नहीं था । उस समय के ज्योतिषियों ने अपने ग्रन्थों में शक संवत्सर का ही प्रयोग किया है, विक्रम संवत् का नहीं । साथ ही राजस्थान आदि तत्समीपवर्ती प्रान्तों में प्राप्त लेखों में कृत नाम से इस संवत् का उल्लेख है । उदयपुर में नन्दसायूपाभिलेख में कृत संवत् २८२ तथा चैत्र पूर्णिमा तिथि का उल्लेख है— “कृतयोर्द्वयोर्वर्षशतयोः द्व्यशीत्योः चैत्रपूर्णमास्याम् ।” राजस्थान के कोटाराज्य में उपलब्ध बडवायूपाभिलेख में कृत संवत् २९५ का उल्लेख है । मालव में उप- लब्ध दशपुर ( मंदसौर ) के अभिलेख में कृत संवत् और मालव संवत् —“श्रीमालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञके ।” कुमारगुप्त के दशपुराभिलेख में मालवगण संवत् दिया है— “मालवगणस्थितिवशात् कालज्ञानाय लिखितेषु ।” कोटाराज्य में उपलब्ध किसी शिवगणाभिधेय ने कनस्वामिलेख में मालवेश से संवत् का उल्लेख किया है— ‘ संवत्सरशतैर्याते''''मालवेशानाम् ।’ चण्डमहासेन के धौलपुर के अभिलेख में ८९८ विक्रम संवत् का उल्लेख है—‘‘वसुनवाष्टौ वर्षगतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य ।” विद्दग्धराज के बीजापूरीय लेख में ९७३ विक्रमकाल का उल्लेख है—“विक्रमकाले गते ।” बोधगया के लेख में विक्रम संवत् १००५ का उल्लेख है। उदयपुर के राज्य में नरवाहन नामक एकलिङ्ग के अभिलेख में विक्रमादित्य संवत् १०२८ का उल्लेख है— “विक्रमादित्यभूपतः अष्टाविंशतियुक्ते शते दशगुणे सति ।”

सिरोहि पूर्णपाल के वसन्तगढ़ीय लेख में १०९९ विक्रम संवत् का उल्लेख है—'नवनवतिरिहासीद् विक्रमादित्यकाले ।' विद्वानों का मत है कि कृत, मालवा तथा विक्रम नाम से प्रख्यात संवत् एक ही है । यहाँ प्रश्न होता है कि यदि विक्रम ही इस संवत् के स्थापक हैं तो पहले ही से इनके नाम से इसकी प्रख्याति क्यों नहीं हुई ? पहले कृत नाम से, फिर मालव नाम से और फिर विक्रम नाम से प्रख्याति क्यों हुई ? इसका समाधान यह हो सकता है कि विक्रमादित्य मालवगण के प्रमुख थे, निरङ्कुश राजा नहीं थे । अतः उन्होंने मालव संवत् की ही स्थापना की होगी । अपने नाम से ही संवत् स्थापन करने में गणभेद की सम्भावना हो सकती थी । मालवगण के द्वारा बर्बर शकों के पराजित होने पर शान्तियुग का समय आया होगा । जनता में शान्ति और समृद्धि का युग होने के कारण उसे पहले कृत नाम से कहा जाने लगा, परन्तु विक्रम राज्यारोहण से १३५ वर्ष बाद शक फिर से विजयी हो गये थे जैसा कि 'प्रभावकचरित' में उल्लेख है— 'ततो वर्षशते पञ्चत्रिंशता साधिके पुनः तस्य राज्ञोऽन्वयं हत्वा वत्सरः स्थापितः शकैः ।' परन्तु मालवगण का विजयी शकों से सङ्घर्ष बना ही था । फिर भी मालवगण जीवित था । तब कृत काल तो स्वप्नप्राय ही हो गया, अतः अब मालवगण नाम से वही संवत्सर चलने लगा । चौथी शती पूर्वार्ध में गुप्तसाम्राज्य के वृद्धिगत होने पर भी मालवशक्ति विद्यमान थी ही । सम्राट् समुद्र गुप्त ने मालवगण को पराजित करके छोड़ दिया था । इसी लिए समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में गणतन्त्र-नामावली में मालव का प्रथम नाम है । “मालवार्जुनायनयौधेयभाद्रकाभीरप्रार्जुनसनकानीककाकखर्परिकादिगणानुन्मूल्य साम्राज्यसीमा विस्तारिता पश्चात् महत्त्वमाकाङ्क्षमाणेण द्वितीयचन्द्रगुप्तेन ।” पश्चात् द्वितीय चन्द्रगुप्त ने पूर्वोक्त गणों का उन्मूलन करके अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ायी थी । गुप्त राजाओं ने भी गुप्तसंवत् चलाया था, परन्तु विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का प्रभाव जनमानस में बद्धमूल था । अतः गुप्तशासनकाल में भी प्रजा ने विक्रमसंवत्सर का ही आदर किया था । अतः महान् सम्राट् कुमार- गुप्त ने अपने अभिलेख में मालव-संवत्सर का ही उल्लेख किया । फलतः गुप्तसाम्राज्य समाप्त होने पर मालवीय प्रजा फलतः विक्रम संवत् को ही दृढ़ता से ग्रहण करती रही । आठवीं शती में भारत में निरङ्कुश राजतन्त्र की स्थापना हुई । गणतन्त्र की भावना जनमानस से लुप्त हो गयी तब लोकप्रिय प्रभविष्णु विक्रमादित्य सम्राट् के नाम से वही संवत्सर प्रसिद्ध हो गया । प्रारम्भिक शताब्दियों में विक्रम संवत् जैसे विक्रम नाम से प्रख्यात नहीं हुआ, वैसे ही शक-संवत् भी स्वस्थापना से ५०० वर्ष बाद शकनाम से प्रचलित हुआ । सन् संवत् भी स्वप्रचलन से पाँच छः सौ वर्ष बाद ईसा के नाम से सम्बद्ध हुआ था । गुप्त संवत् २२१ वर्ष तक गुप्त नाम से निर्दिष्ट नहीं होता था । हाल प्रतिष्ठान के राजा ( सातवाहन ) प्रथम शती में विद्यमान थे । उन्होंने गाथा-सप्तशती में विक्रमा- दित्य का उल्लेख किया है । “संवाहण सुहरसतो सियेण दन्तेण तुह करे लक्खरूयं चललेण विक्कमा इव चरियम् अणु सिक्खियम् तिस्सा ।” टीकाकार गदाधर के अनुसार “विक्रमादित्योऽपि भृत्यकृत्येन तुष्टः सन् भृत्यस्य करे लक्षं ददाति स्म ।” अर्थात् विक्रमादित्य भृत्य के कार्य से तुष्ट होकर उसके हाथ में लक्ष मुद्रा देते थे । बृहत्कथा के अनुसार भी विक्रमादित्य ईसवीय सन् से पहले के ही हैं । गुणाढ्य ने पिशाची भाषा में बृहत्कथा लिखी थी । गुणाढ्य सात- वाहन की सभा के अलङ्कार थे । अतः सातवाहन के समकालीन ही थे । बृहत्कथा का अनुवाद काश्मीरपरम्परा में ११वीं शती के क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथामञ्जरी के नाम से किया था ।

अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल ८७१ दूसरा अनुवाद सोमदेव ने कथासरित्सागर नाम से किया है। क्षेमेन्द्र ने यद्यपि लम्बकों के पौर्वापर्य में कुछ स्वातन्त्र्य का भी अवलम्बन किया था, किन्तु सोमदेव तो कहते हैं — मैं यथामूल ही लिख रहा हूँ। इसमें किञ्चित् भी मूल का अतिक्रम नहीं है— “यथा मूलं तथैवैतत् न मनागप्यतिक्रमः ।” नेपालपरम्परा में आठवीं शती से भी पूर्व बुद्धस्वामी ने श्लोकसंग्रह नाम से बृहत्कथा का अनुवाद किया था। उस बृहत्कथा में कहा गया है कि भगवान् शिव का माल्यवान् नामक गण ही उनके आज्ञानुसार विक्रमादित्य के रूप में आया था। ऋषि सर्वज्ञकल्प होते हैं, अतः विक्रम से कई सौ वर्ष पूर्व नरवाहनदत्त को कण्व द्वारा विक्रम की कथा सुनाना असम्भव नहीं है। जैन मेरुतुङ्गाचार्य ने अपने विचारश्रेणी नामक प्राकृत ग्रन्थ में विशाला (उज्जयिनी) के इतिहास का वर्णन करते हुए कहा है कि महावीरनिर्वाण ईस्वी सन् प्रारम्भ से ५२७ वर्ष पूर्व हुआ था। महावीरनिर्वाण के ४७० वर्षों के पश्चात् शकों का उन्मूलनकर मालव के राजा विक्रमादित्य उदित होंगे— “कालान्तरेण केण वि उप्पाडिता सगाणतं वंशं हो हि । मालव राया नामेण विक्कमा इच्छो ॥” ज्योतिर्विदों की परम्परा में भी संवत्सरकर्त्ता के रूप से विक्रमादित्य का स्मरण होता है— “युधिष्ठिरो विक्रमशालिवाहनौ नराधिनाथौ विजयाभिनन्दनः । इमे तु नागार्जुनमेदिनीविभुर्बली क्रमात् षट् शककारकाः कलौ ॥” संवत् १६९९ की लिखित अभिज्ञानशाकुन्तल की प्रति में निम्न वाक्य है— “आर्ये, रसभावविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यसाहसाङ्कस्य अभिरूपपण्डितभूयिष्ठेयं परिषद् । अस्यां च कालिदासप्रयुक्तेन अभिज्ञानशाकुन्तलनाम्ना नवेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः ।” इसमें स्पष्ट ही विक्रमादित्य की पण्डितभूयिष्ठा परिषद् में कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल के अभिनय की बात कही गयी है। कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण में उसके निर्माण का काल कलि संवत् ३०६८ वैशाख कहा गया है— “वर्षेः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणैर्यति कलौ सम्मिते । मासे माधवसंज्ञिते च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः ॥” यह कलि का ५०७३ व्यतीत संवत् है और विक्रमराज्य से २०२९ गताब्द हैं। इस तरह विक्रमादित्य के सिंहासनारोहण से २४ वर्ष बाद २५वें वर्ष के वैशाख में इस ग्रन्थ की रचना प्रारम्भ हुई है। “काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततः कियदहो श्रुतिकर्मवादः । ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो द्विजतो बभूव ॥” इस श्लोक से स्पष्ट है कि कालिदास की कृतियों में रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत काव्यत्रय तथा कोई मीमांसाग्रन्थ श्रुतिकर्मवाद एवं ज्योतिर्विदाभरण प्रधान ग्रन्थ हैं। कालिदास ने विक्रमादित्य के सभासदों की गणना भी वहीं बतायी है— “शङ्कुः सुवाग् वररुचिर्मणिरङ्गदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरी घटखर्पराख्यः । अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमी ॥”