झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
६६ झाँसी की रानी जो और लड़कियां उन स्त्रियो के साथ थी, उनके विषय में मनू ने प्रश्न किये । वे सब दासियो के रूप में मनू के पास रहने के लिये नियुक्त कर दी गई थी, क्योकि विवाह का मुहूर्त आ रहा था । उसके बाद भी उनको मनू के पास ही रहना था । ये लड़कियां अब्राह्मण जातियो में से रूप, रस इत्यादि; के पैमानो से तौल कर चुनी जाती थी और उनको आजन्म अपनी रानी के साथ कुमारी होकर रहना पडता था । यदि वे विवाह कर लेती तो उनको महल की नौकरी छोडनी पडती था । दहेज मे दासियो और दासो का देना महाराष्ट्र में नही था, शायद राजपूताने के कुछ रजवाडो से वहा पहुचा हो । शायद इसका प्रारम्भ, भिक्षुणी और देवदासी प्रथा से निसृत हुआ हो । इन दासियो के जीवन कितने कुतूहलो और कितने कोलाहलो से भरे रहते होगे और इनके जीवन कितने दु खान्त होते होगे उसकी कल्पना की जा सकती है । इनको जन्म देने वाले लगभग उसी प्रकार के माता-पिता, केवल धन-लोभ से इनको महलो के सुपुर्द कर देते थे । फिर, या तो वे अपने सौदर्य के जमाने मे राजा के विलास की सामग्री बनी रहती थी या जीवन के स्वाभाविक मार्ग पर जाकर महल से अलग हो जाती थी । मनू ने दासियो के इस चित्र की कुछ कल्पना की । उसने अपनी उसी सहज मुस्कराहट से कहा, 'मै तुमको दासियां बनाकर नही रक्खूंगी । तुम मेरी सखी-सहेली बनोगी । केवल एक शर्त है। मनू ने अपने विशाल नेत्रो की दृष्टि को उन पर बिखेरा । बोली, 'जानती हो क्या ?' उन सबो ने 'नाहीं' के सिर हिलाये । मनू ने कहा, 'मेरे साथ जो रहना चाहे—उसको घोडे की सवारी अच्छी तरह आनी चाहिये । तलवार बन्दूक, बर्छा, छुरी-कटार, तीर- तमञ्चा इत्यादि का चलाना—अच्छी तरह चलाना सीखना पड़ेगा । दोनो हाथो से हथियार एक से चलाना सीख जावे तो और भी अच्छा ।
लक्ष्मीबाई ६७ पुरुषो जैसे काम सीखने की बात सुनते ही स्त्रियो के चेहरो पर लाज की हल्की लाली दौड गई । परन्तु मनके हर्ष और उत्साह ने लाज को दबा दिया । काशी ने स्थिर दृष्टि और स्थिर स्वर में कहा, 'हम लोगो को जो कुछ सिखलाया गया है उतना ही हम जानती हैं । अब जो कुछ सरकार की आज्ञा होगी उसको हम लोग जी लगाकर और दृढता के साथ सीखेगे । परन्तु कुश्ती और मलखब कौन सिखलावेगा ?' मनू ने तुरन्त बतलाया, 'जितना मै जानती हूँ, मै सिखलाऊँगी । वाकी बिठूर के प्रसिद्ध आचार्य बाला गुरू । उनको यहाँ बुला दूँगी ।' बाला गुरू का नाम सुनते ही लडकिया शरमा गई और उनसे बडी उम्र की स्त्रिया हँस पडी । उस हँसी पर मनू के मन में क्षोभ उठा, परन्तु मनू ने उसको नियन्त्रित कर लिया । फिर उसी मुस्कराहट के साथ बोली, 'बाला गुरू देवता हैं, और न भी हो तो तुमको क्या डर ? स्त्रिया दृढता का कवच पहिने तो फिर ससार में ऐसा पुरुष कोई हो ही नही सकता जो उनको लूट ले । बाला गुरू के साथ लडकर कुश्ती सीखने की जरूरत नही पडेगी । वह बतलाया भर करेगे । अखाडे मे उतरकर सिखलाऊँगी मैं ।' गणेश मन्दिर पास ही था । वाद्य बज रहे थे । उनमे होकर कभी कभी मीठी शहनाई की चहक भी सुनाई पड जाती थी । स्त्रिया मनू से श्रृंगाररस की बात करने आई थी । अपने आदर के झरोखे मे होकर । मनू के मन की धारा गंगाधरराव की सवारी, बाजो-गाजो और झासी निवासियो के हर्षोन्माद से सघर्ष पाकर दूसरी ओर चली गई थी । सब स्त्रिया लडकिया भी अपने अच्छे से अच्छे वस्त्र और आभरण पहिने हुये थी । केश खूब संवारे गये थे और उनमें रंग-बिरगे और सुगन्धित फूल गुँथे हुये थे । मनू के केशो मे भी फूल थे । मनू ने हँसकर कहा, 'तुम लोग यदि कुश्ती सीखने के लिये इसी समय अखाडे मे उतरो तो क्या हो ?' सुन्दर मुस्कराकर बोली 'तो इन फूलो से सारा अखाड़ा भर जावेगा ।'
६८ झांसी की रानी
मनू ने हँसकर कहा, 'और तुम्हारे बालो मे अखाडे की मिट्टी भर जावेगी।' वे सब खिलखिला पडी । मनू बोली, 'परन्तु वह मिट्टी तुम्हारे केशो पर इन फूलो से कही अधिक सुहावनी लगेगी।' मुन्दर बोली, 'सरकार, बालो की शोभा मिट्टी से ?' मनू ने मुन्दर का कन्धा हिलाकर कहा, 'ये फूल कहा से आये ? कहा जायेगे ? ये क्या मिट्टी से बढकर हैं ?' मनू की बात मे, अपनी दादियो से सुनी हुई ससार की अस्थिरता की झांई सुनकर वे सब सहम गई । मनू समझ गई। बोली, 'नही फूलो से नाता बनाये रक्खो, परन्तु मिट्टी से सम्बन्ध तोड कर नही।' स्त्रियो के मन पर एक दार्शनिक झकोर ठोकर दे गई। उन्होने ऊंचे स्वर में 'हा, हा' कही, परन्तु आँखो से ऐसा जान पडता था, मानो उनका आनन्द कही भाग गया, उन्हे अपनी असगत अवस्था मे क्लेश होने लगा, मानो मनू ने उनके फूलो की भर्त्सना की हो और उनके आदर का अपमान। मनू ने उन सब स्त्रियो से कहा, 'तुम गणेश मन्दिर मे जाकर देखो क्या होता है। मै तब तक इन तीनो से बात करती हूँ। परन्तु एक बात सुनती जाओ। मुझको तुम्हारे फूल बहुत अच्छे लगे इनको फेक मत देना।' इस बात पर प्रसन्न होकर वे सब चली गई । केवल सुन्दर, मुन्दर और काशी रह गई । मनू बोली, 'मै सुनती हू झासी के लोग फूलो को बहुत प्यार करते हैं। अच्छा है। मुझको भी पसन्द है, परन्तु क्या दुबले पतले घोडे पर सोने-चादी का जीन अच्छा लगता है ?' सुन्दर ने उमग के साथ तुरन्त कहा, 'सरकार मै आपकी बात अब समझी।'
लक्ष्मीबाई ६६ [ १५ ] सीमन्ती इत्यादि की प्रथाएँ पूरी होने के उपरान्त गणेश ' मन्दिर में गायन-वादन और नृत्य हुये और, एक दिन विवाह का भी मुहूर्त आया । विवाह के उत्सव पर आसपास के राजा भी आये । उनमें दतिया के राजा विजयबहादुरसिंह खासतौर से उत्साह प्रदर्शन कर रहे थे । कोठी कुआँ वाले भवन में भावर पडने को थी । बाहर गायन-वादन और नृत्य हो रहा था । सामने वाले मकान में मोतीबाई, जूहीबाई इत्यादि अभिनेत्रिया भरपो के पीछे वस्त्राभूषणो और पुष्पो से लदी बैठी थी । बाहर दुर्गाबाई का नृत्य और उस काल के प्रसिद्ध धुरपदिये मुगलखा का गायन अभ्यन्तर के साथ हो रहा था । मुगलखा के ध्रुवपद-अालाप इत्यादि पर अनेक लोग वाह वाह कर रहे थे, परन्तु जनता दुर्गाबाई के नृत्य के लिये बार-बार अकुला उठती थी । इसलिये मुगलखा ने अपना तम्बूरा रख दिया और दुर्गाबाई को खडे होने का इशारा किया । राजा विजयबहादुर महफिल में मसनद पर बैठे थे । उन्हे ऊँचे दर्जे के गायन और नृत्य-दोनो का व्यसन था । दुर्गाबाई नृत्य करने को खडी होने को ही थी कि भीतर से इत्रपान का सामान आया । सोने के वर्कों से लिपटे पान और वढिया इत्र । पान लाने वाले एक सरदार थे । उन्होने कहा कि भावर शुरू हो गई । उसी समय भीतर एक घटना हुई । पुरोहित ने मनूबाई की गाठ गंगाधरराव से जोडने के लिये वर की चादर और वधू की साडी के छोर हाथ में पकडे । वृद्धावस्था के कारण हाथ काँप रहा था । गाठ लगाने में जरा सा विलम्ब हुआ । गाठ अच्छी तरह नहीं बँध पारही थी । बार-बार हाथ काप जाता था । मनू मे सोचा, 'मै ही क्यो न इसको बाध दू ?' परन्तु उसने विचार को नियन्त्रित कर लिया । गाठ तो पुरोहित ने बाघली, लेकिन वह कापते हुये हाथो से गाठ का फन्दा कसने में कुछ
७० झांसी की रानी क्षणों का विलम्ब कर रहे थे। मनू से न रहा गया। बिना मुस्कराहट के और दृढ स्वरं में बोली, 'ऐसी बाधिये कि कभी छूटे नही।' गंगाधरराव सिकुड गये। मोरोपन्त मन ही मन क्षुब्ध हुये। होठ सिकोड लिया। परन्तु पुरोहित खिलखिला कर हंस पडा। उसके पास वाले सब स्त्री पुरुष हँस पडे। कह-कहे लग गये। मनू-पुलकित हो गई। आंखे नीची करके उसने थोडा सा मुस्करा भर दिया। इस कह कहे की आवाज बाहर पहुची और मनू की कही हुई बात भी। वहा भी कह कहे लगे। चारो ओर उस वाक्य की चर्चा हो उठी। सामने वाले मकान में भी समाचार पहुचा। जूही ने, जो अब यौवनावस्था में लहराने को थी, कहा, 'मै तो नाचना चाहती हूँ। ऐसे अवसर पर चुपचाप बैठे-बैठे थक गई हू। इतनी खुशी के समय भी न नाचे तो कब नाचेगे?' मोतीबाई में बाहरी गम्भीरता आगई थी, परन्तु मन आल्हाद में फुदक रहा था। बोली, नाचो कोई हर्ज नही। मै भी नाचना चाहती हूँ, परन्तु घुँघरू बाँधकर नही। बाहर बड़े बड़े राजे महाराजे बैठे हैं। शोर- गुल सुनेगे तो क्या कहेगे?' जूही बोली, 'तबला घुघरू हमको कुछ नही चाहिये, शोर-गुल न होगा। इस पर भी महाराज अगर कुछ कहेगे तो मै भुगत लूगी। आखिर नाटक होगा ही। हमलोग रंगशाला मे नाचे और गावें गे ही। राजे महाराजे नाटक-शाला मे पास से सब कुछ देखेगे ही। मै नही मानूगी।' उन दोनो ने मनमाना नृत्य किया और नर्तकियो ने ताल दिया, परन्तु मीठी थपकी से। बाहर मुगलखा खडा हो गया। बोला, 'वाह जैसा राज्य है, वैसी ही महारानी हमको मिली। दिल चाहता है कि मैं नाचू, परन्तु कभी सीखा नही इसलिये मजबूर हू।' और उसकी आंख मे आसू आगये, बैठ गया। .
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दुर्गाबाई खड़ी हो गई। बोली, 'उस्ताद यह काम मेरा है। मैं दिल और पैर दोनो से नाचूँगी। आप अकेले दिल से, खेलिये या नाचिये।' और उसने सिर नीचा कर लिया। विजयबहादुर प्रसन्न हुये। स्वभाव से ही जरा सनकी थे। इस समय सनक कुछ तीव्रतर हो गई। बोले, 'दुर्गा खूब अच्छी तरह नाचो, इनाम मिलेगा।' 'बहुत अच्छा सरकार।' कहकर दुर्गा पूरे उत्साह के साथ गाने और नाचने लगी। मुगलखा को इसका गाना खटक रहा था, परन्तु उसके मन की इस चोट को दुर्गा का नृत्य सम्भाल ले गया। थोड़ी देर में भावर की रस्म पूरी हो गई। अन्य रस्मो के पूरा होने पर गङ्गाधरराव वर की सजधज में पावडो पर, फूलो और चावलो की वरसा में, बाहर आये। सबने ताजीम दी। गाना बजाना थोड़ी देर के लिये वन्द हो गया। गङ्गाधरराव एक ऊँची मसनद पर जा बैठे और इधर उधर बारीकी के साथ देखने लगे कि मनू के उस वाक्य का असर भद्देपन की किस हद तक हुआ है। उनकी आँख जम नही रही थी। आँखो के लाल डोरो में, रौव की जगह को सकोच ने पकड लिया था। वहाँ के उपस्थित लोगो के जी मे वही वाक्य बार-बार और ज़ोर के साथ चक्कर काट रहा था। आँखें सबकी गङ्गाधरराव के दूल्हा वेश पर जा रही थी और मन के मना करने पर भी आँखें उसी वाक्य को दोहरा रही थी। उस मकान की भरप के भीतर का नृत्य वन्द हो गया था। उन अभिनेत्रियो की आँखो पर भी वही वाक्य सवार था। जूही ने धीरे से मोतीबाई से कहा, 'असली राजा तो झासी को अब मिला वाई जी।' मोतीबाई ने आँख तरेर कर जूही का हाथ दबाया, 'राजा सुनेंगे तो गर्दन काटकर फिकवा देगे। खबरदार।' 'मैने तो आपसे कहा,' जूही बोली, 'आपके हाथ जोडती हू किसी को मेरी बात मालूम न होने पावे।
७२ झांसी की रानी फिर ये सब झरपो के पास खडी होकर जो कुछ दूसरी ओर हो रहा था, देखने-सुनने लगी । गङ्गाधर, विजयबहादुर से बोले, 'आपने मुगलखाँ का ध्रुवपद सुना ?' विजयबहादुर ने कहा, 'पहले भी सुना है । इनकी होरी भी सुनी है । परन्तु दुर्गा का नाच मुझको बहुत भाया ।' मुगलखा की आँख बदल पडी, परन्तु उसने सिर नीचा कर लिया गङ्गाधरराव ने देख लिया । वे बोले, मुगलखा ताव खाने पर बहुत अच्छा गाता है । अब सुनियेगा । इसके ध्रुवपद का मुकाबिला कही हैं ही नही । नृत्य अपनी जगह अच्छा है, परन्तु मुगलखाँ का ध्रुवपद राजा है और दुर्गाबाई का नाच उसका चाकर ।' मुगलखाँ हर्ष के मारे फूल गया । आँखो मे आसू छलक आये । उनको जल्दी पोछकर हाथ जोडकर खडा हो गया । बोला, 'श्रीमन्त सरकार का हुकुम हो तो लखनऊ वाली बात सुना दूँ ।' मनू के उस वाक्य से गङ्गाधरराव को छुटकारा नही मिल रहा था । उनको विश्वास था कि उपस्थित लोग भी उसमे उसी प्रकार उलझे होगे । प्रतिघात से उमग की एक लहर उठी और उन्होने मूगलखाँ से कहा, 'महाराजा साहब को ज़रूर सुनाओ और फिर गाओ । बैठकर सुनाओ ।' मुगलखा की बात सुनने के लिये वहाँ सन्नाटा छा गया । मुगलखा ने कहा, 'सरकार मैं गाने के लिये लखनऊ गया । वहाँ के गवैयो ने सलाह करली कि मैं नवाब साहब के सामने पहुच ही न पाऊँ । इसलिये उन्होने कहा, 'पहले हमको सुनाओ । समझेगे कि उस्ताद हो, तो नवाब साहब के सामने पेश कर देगे, वरना अपने वनखड को वापिस जाना । मै अपने देश के कपडे पहिने था । पहले तो उसका मज़ाक उडाया गया, बुन्देलखण्ड्डी है । क्या ऊल-जलूल साफा वाघे है ! जूते आपके-माशा-अल्लाह ! दाढी बुन्देलखण्ड के रीछो जैसी ! बातचीत जङ्गलियो सी ! बर्ताव ठीक भेडियो का ! इत्यादि सुनते सुनते कलेजा
लक्ष्मीबाई · ७३ पक गया। फिर मैंने गाया। जो कुछ गाने के बाद हुआ उसको मैं कह नही सकता।' गंगाधरराव उत्साह के साथ बोले, 'मैं बतलाता हू महाराजा साहबं। जब उस्ताद ने आठो अङ्ग सहित ध्रुवपद सुनाया तब सच्चे स्वरो की वर्षा हो उठी, निन्दा करने वाले उसमें बह गये। उस्ताद के उन लोगो ने पैर छुये और इनको नवाब साहब के सामने पेश किया। नवाब साहब स्वय संगीत के बडे जानकार हैं। उस्ताद को काफी इनाम दिया। बुन्देलखण्ड को उन्होने जी खोलकर सराहा।' फिर मुगलखा ने तल्लीन होकर गाया। लगभग सारी जनता मुग्ध हो गई। राजा विजयबहादुर इस अवसर पर पुरस्कार बांटने के लिये अपने साथ काफी रुपया लाये थे। सनक तो सवार थी ही, अपने बख्शी से बोले, 'मुगलखा के साफे मे जितने रुपये आवे दे दो, तबले वाले के तबलो में चाहे फोडकर चाहे वैसे ही भरदो। सारङ्गी वालो की सारङ्गी में रुपये ठूंस दो। दुर्गा जितना बोझ बांध ले उतना बाध लेने दो।' इस आज्ञा के सुनते ही अनेक वाद्य वाले खडे हो गये। इनमें से एक शहनाई वाला भी था उसकी शहनाई में बहुत थोडे रुपये जा सकते थे। इसलिये गुस्से में आकर उसने शहनाई तोड डाली। बोला, 'सरकार ऐसा बाजा किस काम का जो रुपये का मेल न खा सके।' राजा विजयबहादुर ने उसकी शहनाई को सोने से भरने का आदेश किया। उस युग की प्रथा के अनुसार उस दिन सबको कुछ न कुछ दिया। गया। रात को नाटक हुआ। बहुत अच्छा। विजयबहादुर ने नाटकशाला से सम्बन्ध रखने वाले सब लोगो को काफी इनाम दिया। विवाह की समाप्ति पर दरबार हुआ। नजर-न्योछावरे हुई। पुरस्कार बँटे। बडे बडे सरदारो की नज़र-न्योछावरो के उपरांत छोटे जागीरदारो की बारी आई। एक मऊ का जागीरदार अपने को आनन्दराय कहते हुये
७४ झांसी की रानी आगे बढा । राजा थकावट के मारे खीझ उठे थे । आनन्दराय ने अपने कुटुम्ब और अपनी सेवा का बखान करते हुए रामचन्द्रराव वाली घटना का वर्णन भी शुरू कर दिया । राजा खिसिया उठे । बोले, 'में भी स्मरण किए हूं । तुम्हारी दास्तान पर यहा कोई काव्य या रायसा नही लिखा जाने वाला है । नजर करने के बाद अपनी जगह जा बैठो । तुमको जो मिलना होगा मिल जावेगा ।' आनन्दराय नजर-न्योछावर करके एक कोने मे सिमट गया । अवस्था अधेड हो गई थी, परन्तु शरीर अब भी बलिष्ठ था । अपने को अपमानित हुआ समझकर बार बार उसास ले रहा था—और छाती फुला रहा था । वह एक निश्चय पर पहुँचा । जैसे ही राजा के सामने जरा भीडभाड देखी वहां से खिसक गया । राजा के कर्मचारी नजर-न्योछावरो का व्योरा भेट करने वालो के नाम-पते सहित लिखते जा रहे थे । भेट करने वालो को पलटे में पुरस्कार भी बाटने थे, इसलिए, और हिसाब रखने के लिये भी । जब पुरस्कार बाटते बाटते आनन्दराय की वारी आई तब वह गैर- हाजिर था । दरबार के निकट ही रनवास के लिये झरपे लगी थी । रानी भी वहा बैठी थी । 'कहा चला गया आनन्दराय ?' राजा ने पूछा । थोडी सी तलाश करने के बाद वह नही मिला । फिर और लोगो की हाजिरी होती रही । इस रस्म की समाप्ति पर वहा के सब लोगो ने जयजयकार किया । 'महाराजा गगाधरराव की जय' 'महारानी लक्ष्मीबाई की जय' विवाह के उपरान्त ससुराल में आने पर मनू का नाम उसी दिन महाराष्ट्र और बुन्देलखण्ड की प्रथा के अनुसार लक्ष्मीबाई रक्खा गया था ।
लक्ष्मीबाई ७५ दरबार की समाप्ति के कुछ समय उपरात रानी लक्ष्मीबाई—अब मनू नही कहा जावेगा—किले के महल के अपने कक्ष में सुन्दर, मुन्दर और काशी के साथ थी। उनको अपनी सब सहचारियो में ये तीन सबसे अधिक प्यारी लग उठी थीं। रानी ने कहा, 'आज एक बात अच्छी नही हुई। आनन्दराय नाम के उस जागीरदार की अवहेलना की गई।' मुन्दर बोली, 'सरकार को कैसे नाम याद रह गया ? और इतने हल्ले गुल्ले और भीड भाड की ध्वनियो मे यह घटना कैसे स्मरण रही ?' रानी ने कहा, 'मैने देख लिया है कि बुन्देलखण्ड पानीदार देश है। इस पानी को बनाये रखने की हमको ज़रूरत है। उस आदमी का पानी उतारा गया—यह बुरा हुआ।' काशी बोली, 'छोटे छोटे से आदमियो का महाराज कहा तक लिहाज करे ? थक भी तो बहुत गये आज। सुना है नाटकशाला भी नही जायगे।' रानी ने कहा, 'जिन्हे तुम छोटा आदमी कहती हो, आधार तो हमारे वे ही हैं।
७६ झांसी की रानी [ १६ ] विवाह होने के पहले गगाधरराव को, शासन का अधिकार न था। उन दिनो झासी का नायब पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान डनलप था। वह राजा के पास आया-जाया करता था। 'लोग कहते थे कि दोनो, में मैत्री है। गगाधरराव अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न पहले से कर रहे थे। विवाह के उपरान्त उनको अधिकार मिल गया। परन्तु अधिकार मिलने के पहले कम्पनी सरकार के साथ फिर एक अहदनामा हुआ। पुरानी बाते पुष्ट की गई। केवल एक बात नई हुई—झाँसी में एक अङ्गरेजी फौज रक्खी जावेगी अङ्गरेजी हुकूमत मे, पर खर्चा झासी का राज्य देगा। गंगाधरराव को मानना पडा। मनको खटका। उन्होने नकद खर्चा न देकर कम्पनी सरकार का आग्रह निभाने के लिये झासी के राज्य से २ लाख २७ हजार चारसौ अट्ठावन रुपये वार्षिक आय का एक इलाका इन राज्य लोलुपो को दे दिया। जब यह सब हो गया तब गगाधरराव को शासन का अधिकार मिल पाया। इसके बाद दरबार हुआ। खुशियां मनाई गई। 'खेल-कूद, नाटक इत्यादि हुये, परन्तु अनेक झासी निवासियो को उनमें खोखलापन ही दिखलाई पडा। उनको अपने प्रदेश का खण्डित होना कसका। स्वय राजा को नाटकशाला मे यथेष्ट मनोरञ्जन नही मिल सका। वे शीघ्र वहा से चले आये और रंगमहल में रानी के पास पहुचे। रानी किले वाले महल मे ही प्राय. रहती थी। बाहर बहुत कम निकल पाती थी। जब निकलती तब पर्दे की कैद में। इसलिये सवारी, व्यायाम इत्यादि किले वाले महल के इर्दगिर्द आड ओट से कर पाती थी। तो भी वे काफी समय इन बातो में लगाती थी और अपनी समग्र सहेलियो तथा किले के भीतर रहने वाली स्त्रियो को सवारी, शस्त्र-प्रयोग मलखव, कुस्ती का अभ्यास कराती थी। बचे हुये समय में धार्मिक-ग्रन्थो
लक्ष्मीबाई ७७ परम श्रद्धा थी। बाल्यावस्था को पार कर यौवन मे पदार्पण करने को थी परन्तु नये नये वस्त्र, कीमती आभूषणो का शौक न करके उनकी धुन ऊपर लिखी बातो की ओर अधिक रहती थी। झासी आने के बाद चपल, सुखी मनू मे एक परिवर्तन धीरे धीरे घर करता जा रहा था - वे अब उतना नही बोलती थी। रानी लक्ष्मीबाई मे गम्भीरता जगह करती जा रही थी और क्रुद्ध हो जाने की वृत्ति तो और भी अधिक शीघ्रता के साथ घुलती चली जा रही थी। व्यंग करने की इच्छा ज़रूर कुछ बढती पर थी, परन्तु वह सहज, सरल भव्य, दिव्य मुस्कान सदा साथ रही। और चित्त की दृढता तो पूर्व जन्मो से सचित होकर मानो छठी के दिन ही ब्रह्मा ने पूरी समूची उनके हिस्से में रख दी थी। रंगमहल में आने पर रानी ने गगाधरराव का सत्कार जैसा कि हिन्दू नारी—और रानी—कर सकती है, किया। राजा अपने भावो को छिपा पाने में असमर्थ थे। उनको इसका अभ्यास न था। चेहरे पर रुखाई थी और आखो में उदासी। रानी ने कहा, ‘आज आप नाटकशाला से जल्दी लौट आये। खेल अच्छा नही हुआ क्या?’ राजा बोले, ‘खेल तो सदा अच्छा होता है। मन नही लगा। एक नये खेल की तैयारी के लिये कह आया हूँ।’ रानी—‘कौन सा?’ राजा—‘मृच्छकटिक।’ रानी—‘यह क्या है?’ राजा—‘शूद्रक कवि ने संस्कृत में लिखा है। मैने हिन्दी में उलथा करवाया है। चारुदत्त ब्राह्मण और वसन्तसेना के प्रेम की अद्भुत कहानी है। आप देखने चलोगी?’ रानी—‘न।’
७८ झांसी की रानी राजा—'घोडे की सवारी, कुश्ती, मलखंब के सिवाय आपको और भी कुछ पसन्द है या नही ?' रानी—'अवश्य । सहेलियो को अपना सा बनाना । उनको अवसर कुअवसर पडे पुरुषो की सहायता करने में पीछे पैर न देने की सीख देना, घर की सफाई, स्वच्छता इत्यादि बनाये रखना, काफी काम हैं।' राजा—'इन सबो को मोटा-तगडा बनाकर आप क्या करने जा रही हैं ?' रानी—'अभी तो मुझको भी नही मालूम । पर देह और मनको सबल बना लेना क्या कोई कम महत्व का काम है ?' राजा—'व्यर्थ है। घर का ही इतना काफी काम स्त्रियो के लिये ससार में है कि उनको घुडसवारी इत्यादि की ओर खीच ले जाना फूहड बनाना है।' रानी—'और नाचना-गाना ?' राजा—'अकेले मे सभी स्त्रिया नाचती-गाती हैं। परन्तु यदि वे इन विद्याओ को ढङ्ग से सीखे तो शरीर और मन दोनो के लिये काफी कसरत पा सकती हैं।' रानी—'हा स्वराज्य स्थापित है। अब सिवाय हंसने-खेलने के नर-नारियो के लिये और काम ही क्या बचा है ? देखिये न किस आराम के साथ झासी-राज्य का पचमाश से अधिक अङ्गरेजो के हाथ में दे दिया गया। आपका वह मित्र गार्डन भी नाटकशाला में आता होगा ?' राजा—'अङ्गरेज लोग खूब हँसते-खेलते और नाचते-गाते हैं...’ रानी—'और नाचते-गाते ही पूरे हिन्दुस्तान को रोदते चले जाते हैं। खेल तो बढिया है।' राजा—'हमारे यहा फूट है। गाव गाव में उपद्रवी, डाकू और बटमार भरे हुये हैं। अङ्गरेजो के पास हथियार अच्छे हैं। इसलिये उन्होने राज्य कायम कर लिया।'
लक्ष्मीबाई ७६ रानी—‘नाटकशाला में जो हथियार बनते हैं, उनसे क्या अङ्गरेज नही हराये जा सकते हैं ?’ राजा को यह व्यंग अखर गया । पर जिस मुस्कान के साथ वह निसृत हुआ था वह आकर्षक थी । साथ ही मोतीबाई, जूही इत्यादि कल्पना में बिजली की तरह कौध गई और आगे आने वाले मृच्छकटिक नाटक के अभिनय ने एक उमङ्ग पैदा की, रानी की मुस्कान का आकर्षण उसी क्षण तिरोहित हो गया और उसके साथ ही उठता हुआ क्षोभ । बोले, ‘आप कभी-कभी बहुत कडी चोट कर बैठती हैं ।’ रानी ने अदम्य भाव से कहा, ‘आपके यहा के भाट क्या केवल प्रशंसा और यशगान ही करते हैं या कभी कभी कडखा भी सुनाते हैं ?’ राजा का क्षोभ उभडा, परन्तु उन्होने वहा का वही दबाने का प्रयत्न किया और विषयान्तर करते हुए बोले, ‘हमारे यहा कवि, चित्रकार इत्यादि अनेक कलाकार हैं ।’ रानी ने भी बात न बढ़ाते हुये पूछा, ‘कवि कौन हैं और क्या करते हैं ?’ राजा ने उत्तर दिया, ‘एक हृद्येश है । अच्छा कवि है । एक पजनेश है । रङ्गीन है । कहता अच्छे ढङ्ग से है । ‘ये लोग क्या लिखते हैं ?’ ‘राधागोविन्द का प्रेमवर्णन, नखशिख नायिकाभेद ।’ ‘नखशिख नायिकाभेद क्या ?’ ‘राधा या गोपियो की चोटी से लेकर एडी तक का कोमल वर्णन । यह नखशिख हुआ । नाना प्रकार की सुन्दर स्त्रियो की वृत्तियो का विविध वर्णन, यह नायिका भेद है ।’ ‘अर्थात् स्त्रियो के पूरे शरीर की सूक्ष्म जाच-पडताल-और, इस काम के लिये इन लोगो को इनाम-पुरस्कार भी दिये जाते होगे ?’
८० झांसी की रानी राजा जरा झेंपे, परन्तु सहमे नही। बोले, 'इस प्रकार की कविता करने में बहुत विद्वत्ता और मिहनत खर्च करनी पडती है। इसलिये उनको पुरस्कार दिया जाता है। वे लोग राजदरबारो की शोभा हैं।' रानी ने फिर उसी मुस्कराहट के साथ पूछा, 'भूषण को छत्रपति शिवाजी क्या इसी तरह की कविता के लिये बढावा दिया करते थे? भूषण तो दरबार की शोभा रहे न होगे?' राजा इस व्यङ्ग से कुढ गये और क्षोभ को दबा न सके। बोले, 'आप हमेशा छत्रपति, और पन्तप्रधान बाजीराव और न जाने किन-किन का नाम दिन रात रटा करती हैं। मैंने कई बार कहा कि इन बातो की छेडछाड में अब कोई सार नही।' रानी ने कहा, 'मै भी तो विनती किया करती हू कि उन बातो को बतलाइये जिनमें सार हो।' राजा—'आप राज्य का प्रबन्ध करना सीखिये। मैं भी इस ओर ध्यान देता हूँ। अच्छी व्यवस्था बनी रहेगी तो राज्य बचा रहेगा अन्यथा अङ्गरेज फिर इसको अपनी देख रेख मे ले-लेगे—या शायद राज्य को खत्म करके अपना अधिकार बर्तने लग जावे।' रानी—'उस समय क्या नाटकशाला वाले किसी काम न श्रावेगे?' राजा के हृदय में आग लग गई। कुछ कहना चाहते थे कुछ कह गये, 'आपके मन में हठ, नगर-कोट बाहर घोडे पर घूमने का है और सखी सहेलिया भी जगल-टोरियो पर साथ मे घोडे कुदाये तो इससे बढकर न राज्य है, न राज्य प्रबन्ध और न विचारी नाटकशाला। ठीक है न?' रानी के ऊपर उनके क्रोध का कोई प्रभाव नही पडा। बोली, मेरे आपके—दोनो के—लिये वह विशाल महल क्या कम है?' राजा पर इस व्यग की चोट पड गई, पर वे गुस्से को पीने लगे। कुछ सोचकर पूछा, 'क्या सचमुच आपको नाटकशाला का मेरा मनोरञ्जन नापसन्द है?'
लक्ष्मीबाई ८१ रानी ने तुरन्त उत्तर दिया, 'इन दिनो अब इससे अधिक और हो ही क्या सकता है ? राज्य का काम चलाने के लिये दीवान हैं । डाकुओ का दमन करने और प्रजा को ठीक पथ पर चालू रखने के लिये अँगरेजी सेना है ही । इस पर भी यदि कोई गलती हो गई तो कम्पनी के एजेन्ट की खुशामद कर ली । बस सब काम ज्यो का त्यो मनमाना चलता रहा ।' रानी मुस्कराने लगी । इस बात मे रानी की विलक्षण बुद्धि का आभास पाकर राजा को जरा विस्मय हुआ और उनके होठो पर बरबस हँसी आई ।
६२ झाँसी की रानी [ १७ ] राजा गंगाधरराव और रानी लक्ष्मीबाई का कुछ समय लगभग इसी प्रकार कटता गया । सन् १८४० में (माघ सुदी सप्तमी स० १६०७) वे सजधज के साथ (कम्पनी सरकार की इजाजत लेकर !) प्रयाग, काशी, गया इत्यादि की यात्रा के लिये गये । लक्ष्मीबाई साथ थी । उनको किले में बन्द रहना पडता था, इस यात्रा में भी तामझाम इत्यादि बन्द सवारियो में चलना पडा, परन्तु नए-नए स्थान देखने के अवसर मिले । इस कारण बन्धनो का क्लेश न अखरा । काशी-यात्रा मे उनको देव-दर्शन और जन्म-गृह दर्शन प्राप्त हुये । गगाधरराव का क्रोध समय-कुसमय न देखता था । एक दिन काशी नगर मे सैर के लिये निकले । एक विचारा राजेन्द्र बाबू मार्ग में पड गया । उसने प्रणाम तो किया, परन्तु खडे होकर ताजीम नही दी । शामत आगई । गगाधरराव ने उसको बेहद पिटवाया । उसने कम्पनी सरकार मे फरियाद की । जवाब मिला, 'गगाधरराव एक बडे राजा हैं । यदि तुमको खडे होकर ताजीम देना पसन्द न था तो अपने घर मे बैठे रहते !' रानी को यह सब देख सुनकर काफी क्लेश हुआ था । तीर्थयात्रा के लिये झाँसी छोडने के पहले जब गगाधरराव को कम्पनी सरकार ने शासन के अधिकार वापिस किये तब पहले का जमा किया हुआ तीस-लाख रुपया कम्पनी ने उनको लौटाया था । उसका उन्होने अपव्यय किया । अपने अनेक हाथियो में उनको सिद्धबकस नामक हाथी बहुत प्यारा था । उसका सारा सामान सोने का बनवाया । और भी अनेक हाथी घोडो का सामान-अम्बारी, हौदा, जीन, झूले इत्यादि-सोने की बनवाई । काशी से एक तामझाम, जिस पर बढिया नक्कासी का काम था, बहुत कीमत देकर मँगवाया । और भी काफी राजसी-ठाट इकट्ठा किया । राजा प्रदर्शन के बहुत प्रेमी थे । रानी को प्रदर्शन बहुत कम
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पसन्द था । परन्तु उनको राजा की एक बात अच्छी लगी—उन्होने पाच हजार के लगभग सेना कर ली, लगभग दो सहस्र गोल पुलिस, पाचसौ घोडो का रिसाला, सौ खास पायगा के सिपाही और चार तोपखाने । झाँसी राज्य में और बुन्देलखण्ड में लगभग हर जगह आताताई और डाकू-बटमार बडा उपद्रव कर रहे थे । गंगाधरराव ने अपने कठोर शासन से इनका दमन किया इस कार्य मे उनको अपने प्रधान-मन्त्री राघव रामचन्द्र पन्त, दरबार वकील नरसिंहराव, और न्यायाधीश वृद्ध नाना भोपटकर से बहुत सहायता मिली । राजा के शासन से अँगरेज सन्तुष्ट थे, क्योकि उपद्रवो का शान्त करना ही राजा का सबसे बडा कर्तव्य समझा जाता था । राजा गंगाधरराव ने कई मौकों पर अँगरेजो की बहुत सहायता की । एक बार अपने विश्वस्त साथी और फौजी अफसर दीवान रघुनाथसिंह को कुछ सिपाहियो के साथ मुहिम पर भेज दिया । दीवान रघुनाथसिंह आज्ञा- कारी योद्धा था । उसने बडी वीरता के साथ अपना कर्तव्य पालन किया । राजा गंगाधरराव को अँगरेजो की मैत्री और भी बढी हुई मात्रा में मिली और दीवान रघुनाथसिंह को इंगलैंड और कम्पनी सरकार की रानी विक्टोरिया की ओर से एक प्रशंसापत्र तथा खड्ग मिला । परन्तु रानी लक्ष्मीबाई को अपने पति के इस यश पर हर्ष नही हुआ और न सन्तोष । अभी उनकी आयु लगभग १५ वर्ष के होगी, परन्तु उनका आचार विचार आश्चर्य उत्पन्न करने वाली परिपक्वता कैसा प्रतीत होता था । उस युग की लडकियाँ जिस आयु में खेलना-खाना, पहिनना- ओढना ही सब कुछ समझती होगी, उस आयु में लक्ष्मीबाई गम्भीर और गम्भीरतर होती चली गई । छुटपन की छबीली मनू, लक्ष्मीबाई के विशाल आदर्शों में विलीन हो गई ।
८५ झाँसी की रानी [ १८ ] राजा गगाधरराव पुरातन पन्थी थे । वे स्त्रियो की उस स्वाधीनता के हामी न थे जो उनको महाराष्ट्र में प्राप्त रही है । दिल्ली, लखनऊ की पर्दा के बन्धेजो को वे जानते थे । उतना बन्धेज वे अपने रनवास में उत्पन्न नही कर सकते थे । यह भी उनको मालूम था । जनता की स्त्रिया मुँह उघाडे फिरे, चाहे घूंघट डाले फिरे, इस विषय में उनको उपेक्षा थी । परन्तु अपने महल में काफी पर्दा बर्तने के वे दृढ पक्षपाती थे । इसलिए लक्ष्मीबाई किले के बाहर घोडे पर नही जा सकती थी । किले में भी उनकी स्वतन्त्रता पर काफी बन्धन था । तीर्थ यात्रा से लौटने पर किले-भीतर वाले महल के मैदान के चारो ओर ऊँची ऊँची कनाते लगवा दी गई, जिससे उनको घोडे की सवारी इत्यादि में बहुत अडचन होने लगी । मलखम्ब और कुश्ती का प्रवन्ध उनको अपने कक्ष के भीतर ही मोटे और नरम कालीनो की पर्तो पर करना पडा । उन्होने अभ्यास छोडा नही । गगाधरराव ने उनकी सहेलियो को बदलने का प्रयत्न किया, परन्तु सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई को वे नही हटा सके । अन्तर्द्वन्द के कारण गंगाधरराव के मन में क्रोध की मात्रा बढ गई । और अपराधियो को दण्ड देने के लिए वे बिलकुल नए नए साधन काम में लाने लगे । मृच्छकटिक नाटक के खेल का दिन आया । मोतीबाई ने वसन्तसेना का अभिनय किया और जूही ने उसकी सखी का । राजा ने उस दिन नाटकशाला को खूब सजवाया । कप्तान-गार्डन् भी निमन्त्रित हुआ । खेल अच्छा हुआ । नृत्य, गायन, अभिनय सभी की गार्डन ने प्रशसा की । खेल की समाप्ति पर गार्डन के मुँह से निकल पड़ा, ‘महाराजा साहब एक बात समझ मे नही आती । आपकी सस्कृति मे वेश्याओ को इतने आदर का स्थान क्यो दिया गया है ?’ राजा ने हँसकर उत्तर दिया, ‘क्यो कि हमारे पुरखे बहुत समझदार थे’ ।
लक्ष्मीबाई ८५ गार्डेन को अपने देश के क्रामवैल के समय का कठमुल्लावाद (Puritanism) और उसके तुरन्त ही बाद का, चार्ल्स द्वितीय के समय का मनमौज-वाद याद आगया । बोला, 'नही महाराज कुछ और बात है । असल में हिन्दुस्थान कई बातो में बहुत गिरा हुआ है ।' गंगाधरराव ने कहा, 'फिर कभी बात करूँगा ।' गार्डेन चलने को हुआ कि राजा ने एक कोने में खुदाबख्श को देख लिया । तुरन्त अपने अंगरक्षक से पूछा, 'यह कौन है ?' उसने उत्तर दिया, 'खुदाबख्श ।' 'यहाँ कैसे आया ?' राजा ने प्रश्न किया । अंगरक्षक उत्तर नही दे पाया । खुदाबख्श ने समझ लिया । और वह तुरन्त भीड में विलीन होकर निकल गया । गार्डेन ने पूछा, 'क्या बात महाराजा-साहब ?' राजा ने कहा, 'कुछ नही-यो ही । एक आदमी को आज बहुत दिनो के बाद नाटकशाला में देखा है ।' गार्डेन चला गया । राजा ने नाटकशाला के प्रहरी को कैद में डलवा दिया और सबेरे पेश किए जाने की आज्ञा दी । खुदाबख्श को बहुतेरा ढुंढवाया, परन्तु पता नही लगा । दूसरे दिन मोतीबाई नाटकशाला से बरखास्त कर दी गई । नाटकशाला के पात्रो को कोई कारण समझ में नही आरहा था । वे लोग आशा कर रहे थे कि इतना अच्छा अभिनय इत्यादि करने के उपलक्ष में बधाई और पुरस्कार मिलेगे, परन्तु हुआ उल्टा । उनकी सबसे अच्छी अभिनेत्री निकाल दी गई । झासी में जिन लोगो ने मोतीबाई के नृत्य को देखा था अथवा उसका गायन सुना था, सब क्षुब्ध थे । सबेरे नाटकशाला के प्रहरी की पेशी हुई । राजा ने स्वयं मुकद्दमा सुना । राजा ने खिसियाकर पूछा, 'क्यो रे नमक हराम यह खुदाबख्श नाटकशाला में कैसे आगया ?'