भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

५६२ रसतरङ्गिणी वीरतर्वादिगणभेषजक्वाथसंयुतम् । गिरिजं शीलितं हन्ति मूत्रकृच्छ्रादिकान् गदान् ॥९६॥ सिताक्षीरयुतं प्रातः शीलितं तु शिलाजतु । विनिहन्ति विशेषेण प्रमेहजनितां व्यथाम् ॥९७। शिलाजतु सगोमूत्रं पुरविश्वकणायुतम् । ऊरुस्तम्भं महाघोरं नाशयत्यविलम्बितम् ॥९८॥ लोहभस्मयुतं नित्यं शिलाजतु समाक्षिकम् । शीलितं तु विशेषेण रक्तसञ्जननं परम् ॥९९॥ अर्जुनक्वाथसंयुक्तं शिलाजतु निषेवितम् । मासमात्रप्रयोगेण विनिहन्ति हृदामयम् ॥ १०० ॥ अग्निमन्थरसोपेतं शिलाजतु निषेवितम् । मासद्वयप्रयोगेण स्थौल्यं नाशयति ध्रुवम् ॥ १०१ ॥ शालसारादितोयेन शैलेयं परिभावितम् । तेनैव च कषायेण द्विमासं परिशीलितम् ॥ १०२ ॥ विनाशयेच्चिरोद्भूतं मधुमेहं विशेषतः । तथैव नाशयत्याशु त्वश्मरीं मूत्रशर्कराम् ॥ १०३ ॥ कणापाषाणभेदैलासंयुक्तस्तण्डुलाम्भसा । शिलामयः शीलितस्तु प्रमेहं विनिवारयेत् ॥ १०४ ॥ एलामागधिकायुक्ता शिलालाक्षा तु शीलिता । मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रं नाशयत्यविकल्पतः ॥ १०५ ॥ शिलामयः शिलाघृष्टः सचन्द्रः परिपूरणात् । क्षतं सद्योऽभिघातोत्थं विना पाकं प्ररोपयेत् ॥ १०६ ॥ रजनीरजोपेता शिलालाक्षा तु शीलिता । गोमूत्रेण समाख्याता कुम्भकामलिनां हिता ॥ १०७ ॥ लोहकाञ्चनभस्माढ्यः सर्ज्जकद्रवभावितः । शिलामयो गुञ्जमितः सततं परिशीलितः ॥ १०८ ॥ मसूरिकाज्वरं स्फोटं शोणकायज्वरं तथा । नाशयत्यचिरादेव वृत्तमिन्द्रोऽशनिर्यथा ॥ १०९ ॥ शिलामयस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—वाताकुण्डलिका मूत्राघातविशेषः वरुणादिगणस्तु सुश्रुतोक्तः । तद्यथा—“वरुणार्र्तगलशिग्रुमधुशिग्रुतर्कारीमेषशृ-

३८ द्वांविंशस्तरङ्गः ५६३ ङ्गीपूतीकनक्तमालमोरटाग्निमन्थसैरेयकद्वयबिम्बीवसुकवसिरचित्रकशतावरीबिल्वा- जशृङ्गीदर्भा बृहतीद्वयं च ॥ वरुणादिर्गणो ह्येष कफमेदो निवारणः । विनिहन्ति शिरःशूलगुल्माभ्यन्तरविद्रधीन् ॥” अमृतादिकषायस्तु-“अमृतं नागरं धात्री वाजिगन्धा त्रिकण्टकम् । प्रपिबेद्धातरोगातैः सशूली मूत्रकृच्छ्र- वान् ॥” इत्युक्तः । ससितमित्यादिप्रयोगे शैलेयं शिलाजतु । काकोल्यादिग- णश्च-“काकोलीक्षीरकाकोलीजिवकर्षभकमुद्गपर्णीमेदामहामेदाच्छिन्नरुहाकर्कट- शृङ्गीतुगाक्षीरीपद्मकप्रपौण्डरीकर्द्धिवृद्धिमृद्वीकाजीवन्त्यो मधुकं चेति ।” इति सुश्रुतोक्तः । गुणाश्चास्य “काकोल्यादिरयं पित्तशोणितानिलनाशनः । जीवनो वृंहणो वृष्यः स्तन्यः श्लेष्मकरस्तथा”। वीरतर्वादिकोऽपि गणः सुश्रुताभिहित एव । यथा--“वीरतरुसहचरद्वयदर्भेक्षुन्नादनी-गुन्द्रानलकुशकाशाश्मभेदकाग्निमन्थमो- रटवसुकवसिरभल्लूककुरण्टकेन्दीवरकपोतवङ्गा श्वदंष्ट्रा चेति । वीरतर्वादिरित्येष गणो वातविकारनुत् । अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्राघातरुजापहः ॥” पुरो गुग्गुलुः, विश्वं शुण्ठी । शालसारादिगणोऽपि सुश्रुतोक्तः--“शालसाराजकर्णखदिर- कदरकालस्कन्धक्रमुकभूर्जमेषशृङ्गितिनिशचन्दनकुचन्दनशिशपाशिरीषासनधवा- र्जुनतालशाकनक्तमालपूतीकाश्चकर्णगुरूण कालीय कं चेति । शालसारादिरित्येष गणः कुष्ठविनाशनः । मेहपाण्ड्वामयहरः कफमेदोविशोधनः ॥” मागधिका पिप्पली । सचन्द्रः सकर्पूरक्षोदः । शोणकायज्वरो नाम सपदि सर्वकायस्य शोण- वर्णप्रदो ज्वरविशेषः “Scarlet Fever” इत्याङ्गलभाषायाम् । स्पष्टमन्यत् । दिङ्मात्रमत्रोदाहृतः प्रयोगः । यच्चाधुना दृश्यते प्रायशो वार्द्धक्ये रक्तवहा धमन्यः खरतां गताः रक्तवेगासहाः सत्यः शिरोरुग्भ्रममनोदेहेन्द्रियादिदौर्बल्यादिलक्षणा- नन्यांश्च कांश्चिद्दारुणानुपद्रवान् पक्षाघादीन् जनयन्तस्तत्रापि वातपित्तहरैमूत्रलैर्वा द्रव्यैः सह शिलाजतुनः प्रयोगः सुखकरं भवतीति । तथा-“ज्वरी ज्वरघ्नाम्बुदपर्पटादेः काथेन रक्ती मधुयष्टिकायाः । शोषी रसैः क्रव्यभुगामिषोत्थैर्मायूरमांसैः पयसा च काश्यें । मध्वम्बुना मेदसि सम्प्रवृद्धे क्षीरेण पर्याकुलबुद्धिसत्त्वः । पाण्ड्वामयार्तावुदरे सशोफे पिबेच्छिलाजं महिषीजलेन ॥ अश्मरीं वीरतराद्येन कुष्ठं खदिरवारिणा । विषं विषघ्नैरगदैः हन्त्येवं तद् यथामयम् ॥” इति च वाग्भटोक्तमनुसन्धेयमिति । तथा चास्य प्रयोगानन्तरमपि पथ्यापथ्ये विशेषः--“व्यायामातपमारुतचेतः सन्तापगुरुविदाह्यादि । उपयोगादपि परतो द्विगुणं परिवर्जयेत् कालम् ॥ कुलत्थान् काकमाचीं च कपोतांश्च सदा त्यजेत् । पिवेन्माहेन्द्रमुदकं कौपं प्रस्रवणाम्बु वा ॥” इति च ॥ ८८-१०६ ॥ भा.टी.-दो रत्ती शुद्ध शिलाजीत को मधु में मिलाकर सेवन कराने से शुक्रावरोध के कारण होनेवाले मूत्रकृच्छ्र में आराम आता है । अष्ठीलिका, वात-

५६४ रसतरङ्गिणी वस्ति, तथा वातकुण्डलिक्रा (मूत्ररोग) रोगों में शिलाजीत को दशमूल कषाय में खाँड मिलाकर उसके साथ सेवन करना चाहिए। शिलाजतु को वरुणादि क्वाथ के अनुपान से सेवन करने पर मूत्राघात (मूत्र रुकना) तथा पथरी रोग में लाभ होता है। मूत्राघात तथा मूत्रकृच्छ्र में शिलाजीत को अमृतादि क्वाथ अनु- पान से सेवन कराया जाता है। शिलाजीत में खाँड और कपूर मिलाकर सेवन करने से मूत्रातीत और मूत्र जठर रोगों में आराम आता है। शिलाजीत को गोखुरूक्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र ही सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्र नष्ट हो जाते हैं। त्रिफला क्वाथ से शुद्ध किये हुए शिलाजीत को यदि काकोल्यादि गणों के साथ सेवन किया जाय तो शरीर में वीर्य की वृद्धि होती है। राजयक्ष्मा में शिला- जीत को लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म, घी, शहद, हरीतकीचूर्ण, वायविडंगचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। वीरतरु आदि गणोक्तद्रव्यों के क्वाथ के साथ शिलाजीत का सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र आदि सब रोगों में आराम आता है। प्रमेह जन्य कष्ट को दूर करने के लिए शिलाजतु को प्रातः काल खाँड और दूध के साथ सेवन कराना चाहिए। शिलाजतु में शुद्ध गूगल, सोंठ, पिप्पली- चूर्ण मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र ही तीव्र प्रकार का ऊरु- स्तम्भ रोग शांत होने लगता है। शिलाजीत को लोहभस्म तथा स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है। शिलाजीत को अर्जुनत्वक् क्वाथ अनुपान से दो मास तक निरन्तर सेवन करने से हृदय रोग में लाभ होता है। शरीर की स्थूलता को कम करने के लिए शिलाजीत को अग्निमन्थ (अरणी) के स्वरस के साथ निरन्तर दो मास तक सेवन कराना चाहिए। शुद्ध शिलाजीत को शालसारादि गणोक्त द्रव्यों के क्वाथ की इक्कीस भावना देकर तैयार कर लें। अब इस शिलाजीत को शाल- सारादिगणोक्त द्रव्यों के क्वाथ के साथ ही निरन्तर दो मास तक सेवन करायें तो बहुत पुराना मधुमेह, अश्मरी तथा मूत्रशर्करा रोग में शीघ्र आराम आ जाता है। प्रमेहरोग में शिलाजीत को पिप्पली, पाषाणभेद, इलायचीबीजचूर्ण के साथ मिलाकर चावलों के धोवन के साथ सेवन कराना चाहिए। मूत्राघात और मूत्रकृच्छ्र में शिलाजतु को इलायचीबीजचूर्णा तथा पिप्पलीचूर्णा के साथ मिला- कर सेवन कराना चाहिए। शिलाजीत को कपूर के साथ शुष्करूप में पीसकर तत्काल होनेवाले छुरी या चाकू आदि के घाव में भर देने से वह घाव बिना पके ही भर जाता है। कुम्भकामला रोग में शिलाजतु को हरिद्राचूर्ण में

मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन कराने पर आराम आता है। शिलाजीत में लोहभस्म और स्वर्णभस्म मिलाकर सर्जक (राल) द्रव (क्वाथ) से सात भावना देकर रखलें। अब इसमें से एक रत्ती की मात्रा में कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से मसूरिकाज्वर, स्फोटज्वर तथा तथा शोणकायज्वर (Scarlet Fever) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ८८-१०६ ॥ वक्तव्य—शिलाजतु का सेवन सामान्य और विशेष रूपसे किया जाता है। सामान्य रूप से सेवन करने में विशेषरूप से पथ्यादि की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु विशेषरूप से (रासायनिक गुण प्राप्त करने के लिए) सेवन करने पर शिलाजीत सेवन करने के बाद द्विगुण समय तक रोगी को पथ्यपूर्वक ही रखना चाहिए और अपथ्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए। अथ गैरिकस्य नामानि गैरिकं त्वथ गैरेयं, गिरिमृद् गिरिमृत्तिका। रक्तधातुर्लोहधातुस्तदेव गिरिमृद्भवम् ॥ ११० ॥ भा.टी.—गैरिक, गैरेय, गिरिमृद, गिरिमृत्तिका, रक्तधातु, लोहधातु तथा गिरिमृद्भव; ये सब नाम गेरू के कहे जाते हैं ॥ ११० ॥ वक्तव्य—गेरू पर्वतीय खानों से प्राप्त होनेवाली एक विशेष प्रकार की मृत्तिका है। यह लोहे की उपधातु मानी जाती है। क्योकि इसके सत्वपातन करने में लौह धातु प्राप्त होता है, अतः गेरू लौह का प्राकृत स्वरूप मानी जाती है। इसको साधारणतया हीमोटाइट (Heamatite) कहते हैं। इसका स्वर्णगैरिक भेद भारतवर्ष में अल्पमात्रा में पाया जाता है, किन्तु अमेरिका और जर्मन देशों में प्रचुरमात्रा में मिलता है। यह लौह का समास होने से रेड आयर्न औक्साइड (Red Iron Oxide) कहा जाता है। टाटा के कारखानो में इससे लोहा निकाला जाता है। गैरिकस्य द्वैविध्यम् गैरिकं तु समाख्यातं द्विविधं रसकोविदैः। पाषाणगैरिकं त्वाद्यं द्वितीयं स्वर्णगैरिकम् ॥ १११ ॥ भा.टी.—रसशास्त्रियों ने गेरू के दो भेद माने हैं, १—पाषाणगैरिक, २—स्वर्ण गैरिक ॥ १११ ॥ तयोः स्वरूपम् सुवर्णगैरिकं स्निग्धं मसृणं त्वतिकोमलम् । पाषाणगैरिकं रूक्षं कठिनं नातिलोहितम् ॥ ११२ ॥

५६६ रसतरङ्गिणी पाषाणगैरिकात् श्रेष्ठं कथितं स्वर्णगैरिकम् । अतः सर्वत्र मतिमान् योजयेत्स्वर्णगैरिकम् ॥ ११३ ॥ अथ गैरिकनामानि तन्त्रव्यवहृतानि । तच्च द्विविधं पाषाणगैरिकं स्वर्णगै- रिकञ्चेति । तद् गव्यपयसा भावितं गोघृतभृष्टं वा शुद्धयति ॥ ११२-११३ ॥ भा. टी.—उक्त दोनों में से स्वर्णगैरिक स्निग्ध (चिकना) मसृण (चम- कीला) अत्यन्त कोमल होता है । किन्तु पाषाण गैरिक रूक्ष, कठिन और साधारण लाल वर्ण का होता है । पाषाण गैरिक की अपेक्षा स्वर्णगैरिक श्रेष्ठ माना जाता है, अतः वैद्य को गैरिक प्रयोग में सर्वत्र स्वर्णगैरिक ही लेना चाहिये ॥ ११२, ११३ ॥ गैरिकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः सुवर्णगैरिकं खल्वे चूर्णीकृत्य ततः परम् । भावितं गव्यपयसा शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११४ ॥ भा.टी.—सोनागेरू को खरल में डालकर चूर्ण कर लें, तब इसमें ताजा गोदूध डालकर घोंटकर सुखा लें तो गेरू शुद्ध हो जाती है ॥ ११४ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः गव्याज्येन तु सम्भृष्टं यत्नतो मन्दवह्निना । सुवर्णगैरिकं शीघ्रं शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ११५ ॥ भा.टी.—अथवा सोनागेरू के सूक्ष्म चूर्ण को कड़ाही में डालकर थोड़ा-सा गोघृत के साथ भून लें तो वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ ११५ ॥ शुद्धस्वर्णगैरिकस्य गुणाः सुवर्णगैरिकं स्निग्धं मधुरं शिशिरं परम् । तुवरं तापहरणं हिक्कावमिनिवारणम् ॥ ११६ । रक्तपित्तप्रशमनं तथासृग्दरनाशनम् । विषापहं तथा बल्यं मतं लोचनयोर्हितम् ॥ ११७ ॥ उदर्दकण्डूशमनं तथैव व्रणरोपणम् । ज्वरघ्नं च विशेषेण वह्निदीप्तिविवर्धनम् ॥ ११८ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्णगैरिक स्निग्ध, मधुररस, अत्यन्त शीत, तुवर (कसैला), गर्मी को कम करनेवाला, हिक्का-वमन नाशक होता है । इसको रक्तपित्त तथा रक्तप्रदर में देने से शीघ्र लाभ होता है । बाह्याभ्यन्तर विविध विषों के प्रभाव को नष्ट करता है। कुछ काल तक सेवन करने से लोहांश के कारण बलप्रद है नेत्ररोग

कुकरे पर बाल, शोथ आदि में लाभ करता है। इसको उदर्द की खुजली में लगाया जाता है। व्रणरोपक मलहरों के रूप में यह व्रणों को भरता है। इसको सेवन करने से पित्तज्वर शान्त हो जाता है और अग्नि से जलने पर होनेवाली जलन में इसको लगाने से शान्ति मिलती है ॥ ११६-११८ ॥ गैरिकस्य मात्रानिरूपणम् द्विगुञ्जतः समारभ्य चतुर्गुञ्जमितं परम् । सुवर्णगैरिकं शुद्धं युञ्जीत भिषजां वरः ॥ ११९ ॥ भा.टी.—शुद्ध स्वर्णगैरिक को दो रत्ती से लेकर चार रत्ती पर्यन्त मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ॥ ११९ ॥ गैरिकस्य आमयिकः प्रयोगः निशाभ्रबाजजन्तुघ्नसोमवल्करसाब्जनैः । गैरिकं वारिणा लेपात् योनिकण्डूयनं हरेत् ॥ १२० ॥ सिन्धूत्थयष्टीनिशया गैरिकं परिशीलितम् । विनाशयेद्विशेषेण ह्यभिष्यन्दभवां रुजम् ॥ १२१ ॥ नागरारग्वधखटीकट्फलेन सकाञ्जिकम् । कर्णमूलोत्थितं शोथं हन्ति लिप्तं तु गैरिकम् ॥ १२२ ॥ सुवर्णगैरिकं गुञ्जाद्वयं मधुसमन्वितम् । भक्षितं विनिहन्त्याशु शीतपित्ताह्वयं गदम् ॥ १२३ ॥ सुवर्णगैरिकं शुद्धं निशया परिलेपितम् । शीतपित्तं तथोदर्दं नाशयत्यविकल्पतः ॥ १२४ ॥ गैरिकं चन्दनोशीरधान्यकक्वाथसंयुतम् । एलया सितया वापि रक्तपित्तं विनाशयेत् ॥ १२५ ॥ मालतीकलिकाक्षाररक्तचन्दनसंयुतम् । सुवर्णगैरिकं हन्ति व्रणशुक्रं नवोत्थितम् ॥ १२६ ॥ सुवर्णगैरिकं शुद्धं केवलं वा खगान्वितम् । घृतेन लिप्तं हन्त्याशु विसर्पस्य विसर्पिताम् ॥ १२७ ॥ नारिकेलस्य तैलेन विमलं स्वर्णगैरिकम् । प्रलिप्तं नाशयेत्पीडां वह्निदग्धव्रणोत्थिताम् ॥ १२८ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं विमलं स्वर्णगैरिकम् । शीलितं नाशयेत्तूर्णं जीर्णं वा पैत्तिकं ज्वरम् ॥ १२९ ॥

५६८ रसतरङ्गिणी अथास्य रोग्योग्यः प्रयोगः—निशा हरिद्रा, जन्तुघ्नं विडङ्गम् , सोमवल्कः श्वेतखदिरः । मालतीकलिकाः तदाख्यवल्लीमुकुलानि । खगः काशीसम् । विसर्पिताम् इतस्ततो विसृतिम् ॥ १२०-१२६ ॥ भा.टी.—गेरू को हरिद्रा, आम्रबीजमज्जा, वायविडंग, खदिरसार तथा रसवत चूर्ण में मिलाकर जल से पीसकर लेप करने से योनिकण्डू नष्ट हो जाती है । नेत्राभिष्यन्द की पीड़ा में गेरू को सैन्धा नमक, मुलैठी और हरिद्राचूर्ण में मिलाकर सेवन कराना चाहिए । कर्णमूल शोथ को बैठाने के लिये गेरू को सोंठ अमलतास खडियामिट्टी तथा कायफल चूर्ण में मिला काञ्जी से पीसकर लेप किया जाता है । शीतपित्त रोग को शान्त करने के लिए दो रत्ती सोनागेरू को शहद में मिलाकर चटाया जाता है । शुद्ध सोनागेरू में हल्दी चूर्ण मिला जल से पीसकर लेप करने से निःसन्देह शीत पित्त रोग से आराम आता है । रक्तपित्त में गेरू को चन्दन ( लाल ) खश तथा धनिया क्वाथ के साथ अथवा खाँड़ और इलायची बीज चूर्ण के साथ देने से लाभ होता है । नेत्र के नूतन व्रण शुक्र ( फूला ) में गेरू में चमेली की कलियों का क्षार तथा चन्दनचूर्ण मिलाकर आँखों में लगाने से फूला कट जाता है । केवल शुद्ध सोनागेरू अथवा कासीसचूर्ण मिश्रित स्वर्णगैरिक को घी में मिलाकर लेप करने से वीसर्प-शोथ का फैलना रुक जाता है । आग से जलने के कारण होनेवाले व्रण की पीड़ा में सोनागेरू को नारियल के तेल में मिलाकर लेप किया जाता है । जीर्णज्वर अथवा पित्तप्रकोपाधिक ज्वर में शुद्ध स्वर्णगैरिकचूर्ण में रससिन्दूर मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन कराया जाता है ॥ १२०-१२६ ॥ गैरिकाद्यमलहरः सुवर्णगैरिकं शुद्धं तोलकैकमितं शुभम् । तन्मितां रजनीञ्चैव माषकं भालभूषणम् ॥ १३० ॥ सिक्थतैलं च विमलं कर्षत्रितयसंमितम् । सम्पेष्य खलु यत्नेन काचकुप्यां तु विन्यसेत् ॥ १३१ ॥ गैरिकाद्यो मलहरो नामतः परिकीर्तितः । कण्डूदाहप्रशमनो विविधव्रणरोपणः ॥ १३२ ॥ इति मिश्रलोहादिविज्ञानीयो नाम द्वाविंशस्तरङ्गः ।

त्रयोविंशस्तरङ्गः ५६६ भा.टी.—शुद्ध स्वर्णगैरिक एक तोला, हरिद्राचूर्ण एक तोला, सिन्दूर एक मासा और पूर्वोक्त सिक्थ तैल ६ तोला लेकर इनको यथा विधि मिलाकर मर- हम बना लें और चौड़े मुख की काँच की शीशी में रख लें । इसको गैरिक मरहम कहते हैं । यह मरहम कण्डूदाह को शान्त करता है और विविध प्रकार के व्रणों को भरने के काम में आता है ॥१३०-१३२॥ यह उपधात्वादिविज्ञानीय नाम बाईसवाँ तरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ रत्नविज्ञानीयस्त्रयोविंशस्तरङ्गः रत्नपदानिर्वचनम् रमणीयतरं यस्माद्रमन्तेऽस्मिन्नतीव वा । तस्माद्रत्नमिदं ख्यातं शब्दशास्त्रविशारदैः ॥ १ ॥ भा.टी. — आगे लिखे हुए हीरा आदि द्रव्यों को "रत्न" इसलिए कहा जाता है कि यह अन्य खनिजादिद्रव्यों की अपेक्षा अधिक सुन्दर होते हैं अथवा ये द्रव्य मनुष्यों को अत्यधिक प्यारे लगते हैं, अतः इनको रसशास्त्रज्ञ 'रत्न' शब्द से व्यवहार में लाते हैं ॥ १ ॥ नवमहारत्नानि हीरकं त्वथ माणिक्यं मौक्तिकं पुष्परागकम् । नीलं तार्क्ष्यञ्च वैदूर्य गोमेदं विद्रुमं तथा ॥ २ ॥ भा.टी. -- हीरा, माणिक्य, मुक्ता (मोती), पुष्पराग (पुखराज), नील (नीलम), तार्क्ष्य (पन्ना), वैदूर्य, गोमेद, प्रवाल (मूंगा); ये नौ द्रव्य महा- रत्न के नाम से कहे जाते हैं ॥ २ ॥ नवग्रहाणां रत्नानि एतानीह महारत्नान्यख्याता'न नवानि तु । माणिक्यं मौक्तिकं चैव विद्रुमं तार्क्ष्यसंज्ञकम् ॥ ३ ॥ पुष्परागः पविर्नीलं गोमेदं च विदूरजम् । नवग्रहाणां क्रमशो रत्नानि परिलक्षयेत् ॥ ४ ॥ नवग्रहाणां रत्नानि नवग्रहदैवतकानि माणिक्यादीनि । उक्तं हि "माणिक्यं तरणेर्बुधस्य गरुडोद्गारो गुरोः पुष्पकं । गोमेदं तमसः प्रवालमवनीसूनोर्विधोर्मौ- क्तिकम् ॥ नीलं मन्दगतेः कवेस्तु कुलिशं केतोर्बिडालाक्षकं । रत्नं रत्नविदो वदन्ति विहितं दाने तथा धारणे ॥" इति । क्रमशः इति रविचन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनि-

६०० रसतरङ्गिणी राहुकेतूनाम् यथा क्रमस्तथाऽत्र रत्ननाम्नां निर्देशः कृतः “यथासङ्ख्यमनुदेशः सामान्याम्' इति स्मरणात् । परिलक्षणं च ज्योतिःशास्त्रविधिना ॥ ३-४ ॥ भा.टी.—उक्त नवरत्नों में से माणिक्य सूर्य का, मौक्तिक चन्द्रमा का विद्रुम मङ्गल का, तार्क्ष्य बुध का, पुष्पराग बृहस्पति का, वज्र (हीरा) शुक्र का, नीलरत्न शनैश्चर का, गोमेद राहु का और वैदूर्य केतु ग्रह का रत्न माना जाता है । इस तरह नवग्रहों के उक्त रत्न माने जाते हैं ॥ ३, ४ ॥ वक्तव्य—ज्योतिःशास्त्र में रोगों की उत्पत्ति ग्रहों की दृष्टि के कारण मानी जाती है । अतः उन ग्रहों को शान्त या सन्तुष्ट करने के लिये मनुष्य को ग्रह- दोषानुसार मौक्तिकादि रत्नों का अन्तःप्रयोग, दान तथा धारण करने की विधि दर्शाते हुए रोग निवारणोपाय बताया गया है । अथ हीरकस्य नामानि हीरको हीरकं हीरमभेद्यं 'भिदुरं तथा । कुलिशं वज्रकं वज्रं तथोक्तं भार्गवप्रियम् ॥ ५ ॥ तत्रादौ प्राधान्यात् हीरकस्य परिचयः—हीरको हीरकमिति पुन्नपुंसकं शब्द- द्वयं लिङ्गभेदभिन्नम्, एवमन्यत्रापि । अभेद्यं इति च्छेदः । भार्गवः शुक्रः, तत्प्रियं तद्देवतकं हीरमित्युक्तम् ॥ ५ ॥ भा.टी.—हीरक, हीर, अभेद्य, भिदुर, कुलिश, वज्रक, वज्र, भार्गवप्रिय; ये सब नाम हीरे के कहे जाते हैं ॥ ५ ॥ उत्तमहीरकस्य लक्षणम् स्निग्धं विद्युद्विभं स्वच्छमलेख्यं च विलेखनम् । तीक्ष्णं षट्कोणमष्टास्रं जात्यं हीरकमुच्यते ॥ ६ ॥ उत्कृष्टहीरक लक्षणम्—विद्युद्विभं तडित्समप्रभम् । अलेख्यं हीरकभिन्नेन केनापि “कुलिशं केनापि नो लिख्यते” इति स्मरणात् । विलेखनमन्येषाम् । उक्तं हि—“अन्ये पुनर्विलिख्यन्ते कुलिशेन” इति । तथा—“अच्छत्वं लघुता तथाष्टफलता षट्कोणता तीक्ष्णताऽप्येतान् पञ्चगुणान् गुणन्ति गुणिनो देवोप- भोग्ये पवौ ।” इति च ॥ ६ ॥ भा.टी.—जो हीरा, चिकना (स्पर्श में), बिजली के सदृश चमकीला, साफ, न काटे जानेवाला और शीशे को भी काट लेनेवाला, बहुत तीव्र, छः कोनों- वाला आठ पहलू होता है उसे उत्तम हीरा कहते हैं ॥ ६ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०१ हेयहीरकस्य स्वरूपम् वर्तुलं मलिनं नीलं भूत्याभं स्फुटितं खरम् । सकाकपादं रेखाढ्यं हेयं हीरकमादिशेत् ॥ ७ ॥ त्याज्यं हीरकं वर्तुलं मलिनमित्यादिना । सकाकपादं काकचरणाकाराभिर्ले- खामिश्चिह्नितम् । रेखा राजी । उक्तं हि—“विन्दुः काकपदं यवः किल मलो रेखेति नाम्नोदिताः । दोषाः पञ्च पवेः” इत्यादिना ॥ ७ ॥ भा.टी.—गोलाकार, मैला, नीलवर्ण, राख की सी आभावाला, फटा हुआ, खुरदरा काकपाद सदृश चिह्नवाला और अनेक रेखाओं से युक्त हीरा अग्राह्य समझा जाता है । हीरकस्य परीक्षणम् यन्निकाषफलके शिलातले घृष्यते न हि निकामघर्षितम् । लीलयैव दलयत्यथापरान् तद्वरं भिदुरमीरितं बुधैः ॥ ८ ॥ भा.टी.—उत्तम हीरे को कसौटी पर जोर से देर तक घिसने अथवा किसी दृढ़ पत्थर पर उसे पर्याप्त घिसने पर वह बिलकुल नहीं घिसता है; बल्कि अपनी तेज नोक से कसौटी काँच आदि कठिन द्रव्यों को बड़ी आसानी से काट देता है ॥ ८ ॥ अशुद्धहीरकस्य दोषाः अविशुद्धं मृतं हीरं शीलितं पार्श्ववेदनाम् । कुष्ठं तापं भ्रमादींश्च जनयत्यविलम्बितम् ॥ ९ ॥ अशुद्धहीरकस्य दोषाः—पार्श्ववेदनादयो निगदव्याख्याताः । उक्तं हि— “अशुद्ध कुरुते वज्रं कुष्ठं पार्श्वव्यथान्तथा । पाण्डुं तापं गुरुत्वञ्च” ति ॥६॥ भा.टी.—हीरे का बिना शुद्ध किये और बिना भस्म किये ही सेवन करने से पार्श्वप्रदेश में पीड़ा, रक्त में विकृति हो जाने से कोढ़, शरीर में तापवृद्धि, भ्रम, मूर्च्छा आदि उपद्रव शीघ्र ही उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ६ ॥ पोट्टलीमध्यगं मार्गवस्य प्रियं कोद्रवक्वाथतो दोलिकायन्त्रके । सप्तभिर्वासरैः स्वेदितं मन्तंतयाति शुद्धिं परां निश्चितं सत्वरम् ॥१०॥ हीरकशोधनञ्च कोद्रवक्वाथे सप्तदिनानि स्वेदनात् साध्यम् । अन्यत्र तु व्या- घ्रीकन्दे संस्थाप्य कोद्रवक्वाथे दोलया पाचनमाहुः । यथा—“व्याघ्रीकन्दमतं वज्रं डोलायन्त्रेण पाचयेत् । सप्ताहं कोद्रवक्वाथे कुलिशं विमलं भवेत्” इति । व्याघ्री कण्टकारिका ॥ १० ॥

६०२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—हीरे को एक वस्त्र में बाँधकर पोटली बना ले, इस पोटली को दोलायन्त्र में कोद्रव ( कोदो ) क्वाथ भरकर उसमें लटका दें । इस तरह सात दिन तक निरन्तर इसी द्रवक्वाथ में पकाने से हीरा निश्चित ही शुद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कुलत्थक्वाथसंयुक्तं हीरं दोलाख्ययन्त्रगम् । स्विन्नं दिनत्रयं यत्नाद्विशिष्टां शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ११ ॥ भा.टी.—हीरे को वस्त्र की पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र विधि से कुलथी के क्वाथ में तीन दिन निरन्तर पकाने से वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥११॥ तृतीयः शोधनप्रकारः हीरकं परिसन्तप्तं सुधाक्षीरे निषेचितम् । शतवारं प्रयत्नेन शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ १२ ॥ भा.टी.—हीरे को अग्नि में गरम करके थोहर के दूध में बुझा दें । इस विधि को सौ बार दुहराने से हीरा उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः हीरकं परिसन्तप्तं प्रखरानलयोगतः । शतधा वापितं सूते शुद्धे शुद्धिमवाप्नुयात् ॥ १३ ॥ एवं निर्वापितं हीरं चूर्णतामेति सत्वरम् । अनुभूतः प्रकारोऽयं समाख्यातो महोत्तमः ॥ १४ ॥ शुद्धे सूते पारदे । अनुभूतः प्रकारोऽयमिति श्रद्धातिशयो ध्वनितः । महोत्तम इति प्रकारान्तरान्निर्द्धारणम् ॥ १३ ॥ भा.टी.—हीरे को कोयले की तेज आँच में गरम करके पारद में बुझा दें ! इस प्रकार सौ बार पारद में हीरे को बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है, इस शोधन में बीस पच्चीस बार गरम पारद में बुझाने पर हीरे खण्ड-खण्ड हो जाते हैं, फिर चूर्ण रूप में होने लगता है । यह अत्युत्तम अनुभूत शोधन प्रकार है ॥१३,१४॥ हीरकमारणस्य प्रथमः प्रकारः शोधितं हीरकं यत्नतश्चूर्णितं तालकं गन्धकं हिंगुलं तन्मितम् । माक्षिकं मारितञ्चैव हीरोन्मितं राजकोलद्रवेणैव सम्पेेषयेत् ॥१५॥ पिप्पलोत्थद्रवैर्भावयेत्सप्तधा भावितस्यास्य वै कारयेद् गोलकम् । उपलस्याग्निना वारणाख्ये पुटे सम्पुटस्थं ततो पाचयेद्यत्नतः ॥१६॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०३ हीरकं पञ्चतां नैति यावद् भृशं तावदेवं पुटेद्यत्नतः कोविदः । माक्षिकं न क्षिपेद्वै द्वितीये पुटे हीरकं पञ्चतामेति सर्वात्मना ॥१७॥ हीरकमारणं शोधितं हीरकमित्यादिना । तन्मितं हीरकमानम् । राजकोलं बृहद्बदरीफलम् । यावत् इति प्रायः पञ्चदशभिः पुटैः सिद्धयति । प्रतिपुटदाना- नन्तरं दृढहस्तेनातिदृढप्रस्तरमये खल्वे पेषणं कर्तव्यम् ॥ १५-१७ ॥ भा.टी.—उक्त विधि से शुद्ध चूर्ण किए हुए हीरे में शुद्ध हरताल, शुद्ध गन्धक और शुद्ध हिंगुल तथा स्वर्णमाक्षिकभस्म, प्रत्येक बार हीरे के चूर्ण के समभाग मिलाकर एकत्र खरल में बड़े बेर के फलस्वरस से खूब अच्छी तरह मर्दन करें । इसके बाद इसको पीपलवृक्ष त्वक्-स्वरस की सात भावना दें और अन्त में एक गोला सा बना लें और अच्छी तरह धूप में सुखा लें । अब इस गोले को एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में उपलों की अग्नि में फूँक देवें । इस विधि से तब तक गजपुट में फूँकते रहें जबतक हीरे की उत्तम भस्म न हो जाय । परन्तु पहिले पुट के बाद दिये जानेवाले पुटों में स्वर्णमा- क्षिकभस्म नहीं डालनी चाहिए । हरताल आदि द्रव्य अवश्य डालने चाहिए । इस तरह कुछ ही पुटों में हीरे की भस्म हो जाती है ॥ १५-१७ ॥ वक्तव्य—पुट देकर द्रव्य को एक पक्के न घिसनेवाले खरल में खूब घोटना चाहिए, फिर उसमें हरतालादि मिलाकर पुट देना चाहिए । अर्थात् पर्याप्त मर्दन इसके लिए आवश्यक है । प्रायः खूब मर्दन करके उक्त विधि से पुट देने पर १५ पुटों में इसकी भस्म हो जाती है । द्वितीयो मारणप्रकारः हीरकं विमलं सूतं मृतन्तु समभागिकम् । मनःशिला गन्धकञ्च समं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥ १८ ॥ सम्पुटस्थं तु पुटयेद् वारणाख्ये पुटे भृशम् । तावत्पुटेत्प्रयत्नेन यावन्नायाति पञ्चताम् ॥ १६ ॥ द्वितीयादिपुटेष्वत्र सूतं न विनियोजयेत् । एवं चतुर्दशपुटैर्हीरकं म्रियते ध्रुवम् ॥ २० ॥ अनुभूतः प्रकारोऽयं सुगमस्तु प्रकाशितः । एवं मृतं हीरकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २१ ॥ द्वितीयः प्रकारः-मृतं सूतं पारदमिति सम्बन्धः । द्वितीयादिपुटेषु पारदभस्म न योजयेत् ॥ १८-२१ ॥

६०४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुद्ध हीरे का चूर्ण, पारदभस्म ( रससिन्दूर ), शुद्ध मैनसिल और शुद्ध गन्धक; सबको समभाग लेकर एकत्र खरल में मर्दन करके सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँकें जबतक कि उसकी अच्छी तरह भस्म न हो जाय । परन्तु पहिले पुट के बाद पुट देने में पारदभस्म नहीं डालनी चाहिए । इस तरह चौदह पुटों में हीरे की अवश्य भस्म हो जाती है, हीरे की भस्म करने का यह सरल तथा अनुभूत प्रकार है ॥ १८-२१ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः हीरकं विमलं तालं तथा रोगशिलामला । समं समं समादाय खरखल्वे विमर्दयेत् ॥ २२॥ त्रिवर्षारूढकार्पासशिफास्वरसयोगतः । सम्पेष्य कामं यामैकं निदाघे परिशोषयेत् ॥ २३ ॥ विशुष्कं सम्पुटे न्यस्य पुटयेत्तु महापुटे । एवं चतुर्दशपुटैर्हीरकं याति पञ्चताम् ॥ २४ ॥ रोगशिला मनःशिला अमला इति च्छेदः । खरखल्वे कठिनतमपाषाणो- पादाने खल्वे । शिफा मूलम् । निदाघे घर्मे ॥ २२-२४ ॥ भा.टी.—शुद्ध हीरा, शुद्ध हरताल तथा शुद्ध मैनसिल, इन तीनों को समभाग में एकत्र करके खरल में घोंटे, फिर इसमें तीन वर्ष के पुराने कपास की जड़ का रस डालकर धूप में तीन घंटे तक खूब रगड़ाई करें । जब रगड़ते हुए खुश्क हो जाय तो इसे सम्पुट में बन्द करके महापुट में फूँक देवें । इस विधि से चौदह पुट देने से हीरे की भस्म हो जाती है ॥ २२-२४ ॥ मृतहीरकस्य गुणाः सुमृतं हीरकं हृद्यं परमं षड्रसान्वितम् । योगवाहि मतञ्चैतत्सर्वोत्कृष्टं रसायनम् ॥ २५ ॥ राजयक्ष्मप्रशमनं मेहमेदोविनाशनम् । पाण्डुशोथोदरहरं तथा क्लैब्यहरं परम् ॥ २६ ॥ वृष्यं महायुष्यमतीव नेत्र्यं बल्यं त्रिदोषघ्नमतीव वर्ण्यम् । मेध्यं विशेषाद्विविधामयघ्नं सुधोपमं स्यात्सुमृतं तु हीरम् ॥ २७ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से बनायी हुई हीरे की भस्म अत्यन्त हृद्य ( हृदय बलदायक ) षड् रसयुक्त द्रव्य के समान गुणकारी होती है। अर्थात् हीरकभस्म, पारदभस्म के समान गुणकारी होती है । अथवा इसमें छहों रस होते हैं । यह

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०५ भस्म योगवाही होती है और सर्वोत्तम रसायन है। राजयक्ष्मा, प्रमेह तथा मेदोविकारों को नष्ट करती है। इसके सेवन से पाण्डुरोग, शोथ तथा उदररोग शान्त हो जाते हैं। हीरकभस्म नपुंसकता की अद्वितीय औषधि है। यह वृष्य (उत्पादक अंगों को बल देनेवाला) आयुवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, बलवर्धक, त्रिदोषप्रकोपनाशक, वय्यं, मेधावर्धक होती है। इसके अतिरिक्त उत्तम हीरक भस्म अनेक रोगों को नष्ट करने के कारण अमृत के समान गुणदायक औषधि है ॥ २५-२७ ॥ मृतहीरकस्य मात्रा रक्तिकाया नेत्रगुणभागतस्तु कलांशकम् । मृतं हीरं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ २८ ॥ भा.टी.- रोग और रोगी का बल-काल आदि का पूर्ण निर्णय करके आवश्यकतानुसार रत्ती के बत्तीसवें भाग से लेकर रत्ती के सोलहवें भाग तक हीरे की भस्म की मात्रा समझनी चाहिए ॥ २८ ॥ हीरकस्य मात्रानिर्माणप्रकारः रक्तिकैकमितं हीरं रम्ये खल्वे विनिक्षिपेत् । मेलयेद्रससिन्दूरं चतुर्माषकसंमितम् ॥ २६ ॥ सम्पेष्य त्वतियत्नेन रसतन्रविचक्षणः । गुञ्जैकतः समारभ्य द्विगुञ्ज विनियोजयेत् ॥ ३० ॥ भा.टी.-एक रत्ती उत्तम हीरकभस्म को एक उत्तम खरल में डालकर उसमें चार मासा उत्तम रससिन्दूर मिलाकर अच्छी तरह पीसकर रख लें। अब आवश्यकता पड़ने पर इसमें से एक रत्ती से लेकर दो रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग करें ॥ २६, ३० ॥ मृतहीरकस्य आमयिकः प्रयोगः हीरकं रससिन्दूरयुतं सन्तानिकान्वितम् । निषेवितं निहन्त्याशु ध्वजभङ्गं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥ हीरकं सहिरणयन्तु रससिन्दूरसंयुतम् । विनिहन्त्यचिरादेव राजयक्ष्मासमुल्बणम् ॥ ३२ ॥ मकरध्वजसंयुक्तं हीरकं परिशीलितम् । नाशयत्यचिरादेव क्लैब्यरोगान् विशेषतः ॥ ३३ ॥ भा.टी.-हीरकभस्म में रससिन्दूर मिलाकर मलाई के साथ कुछ दिन सेवन कराने से भयंकर नपुंसकता रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। भयंकर और

६०६ रसतरङ्गिणी सर्वलक्षणयुक्त राजयक्ष्मा रोग में हीरकभस्म को स्वर्णभस्म तथा रससिन्दूर के साथ मिलाकर सेवन करने से आश्चर्यजनक लाभ होता है । सब प्रकार की नपुंसकतात्रों को दूर करने के लिए हीरे की भस्म को मकरध्वज में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र ही लाभ होता है ॥ ३१-३३ ॥ कन्दर्पकोकिलरसः सकर्पूरो हीरः प्रचुररससिन्दूरसहितः सितैलासम्मिश्रः प्रचुररससंयुक्तपयसा । निपीतः षण्मासं जनयति समिष्टाशनयुतो नरं नानानानारोनिधुवनसमासक्तहृदयम् ॥३४॥ लावण्येऽमलमौक्तिकं रतिपतिं रूपे च सम्मोहने भीमं भोजनभक्षणे खगपति दूरात्सदा वीक्षणे । सिंहं संहतगात्रताभवमदे बुद्धौ तु वाचस्पतिं हीरस्येह तु सेवको नरवरः प्रस्पर्द्धते निर्भरम् ॥ ३५ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना कन्दर्पकोकिलः सेवितव्यः सदा यत्नाच्छरीरबलवृद्धये ॥ ३६ ॥ कन्दर्पकोकिलरसः—प्रचुरं यत् रससिन्दूरं तेन सहितः इति समासः । मात्रा- निर्माणप्रकारोक्तविधानेन रससिन्दूरं हीरकभस्मना सह सम्मेल्य मात्रायामाहृत्य कर्पूरसितैलाभिः सह सम्मिश्रय यथोक्तानुपानेन याज्यम् ॥ ३४-३६ ॥ भा.टी.—हीरकभस्म मात्रा निर्माण विधि के अनुसार रससिन्दूरयुक्त हीरे की भस्म में कपूर, खांड तथा इलायचीबीजचूर्ण मिलाकर इसको उत्तम स्वादिष्ट दूध के अनुपान के साथ निरन्तर छः महीने तक सेवन करने से और प्रायः मधुर द्रव्यों का भोजन करने से पुरुष में अनेक स्त्रियों के साथ समागम करने की शक्ति आ जाती है । इसके सेवन से पुरुष मुक्ता के समान सुन्दरता, कामदेव के समान रूप और मुग्धता, भोजन में भीम की समानता, देखने अर्थात् दृष्टि में गरुड़ की समानता, शरीर के सुडौलपने में शेर की समानता और बुद्धि में बृह- स्पति की समानता करने में समर्थ हो जाता है । अर्थात् उक्त रस के सेवन से शरीर में सुन्दरता, रूप, तीव्र पाचनशक्ति, अतुल बल, तीव्र दृष्टि और प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है । इस रस को कन्दर्पकोकिल रस कहते हैं । इसको शरीर की बलवृद्धि के लिए सेवन करना चाहिए ॥ ३४-३६ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०७ अथ हीरकरसायनम् हीरं तार्क्ष्यञ्च माणिक्यं पुष्परागं च नीलकम्॥ वैदूर्यमथ गोमेदं चन्द्ररत्नञ्च विद्रुमम् ॥ ३७ ॥ भागोत्तरमिदं तस्मात्पञ्चगुञ्जोन्मितं हरेत् । योजयेन्मृतवैक्रान्तं तस्मादष्टगुणं ततः ॥ ३८ ॥ माक्षिकद्वयजं भस्म पृथग् वैक्रान्तसम्भवम् । तथा सर्वत्रिगुणितां समगन्धेशकज्जलीम् ॥ ३६ ॥ पिष्ट्वाऽपयसोश्चैव बन्ध्याकर्कोटकीद्रवैः । वन्योपलैः कलावारं पादायुधपुटे पुटेत् ॥ ४० ॥ भिषग्वरैः समाख्यातमेतद्धीररसायनः गर्भिणीनान्तु नारीणां विविधागयनाशनम् ॥ ४१ ॥ हीराद्यं विमलं रसायनमिदं सन्दीपनं पाचनम् बल्यं मेध्यमलं तथैव महिलासौभाग्यसंवर्द्धनम् योनिव्याधिनिबर्हण खलु नृणां बन्ध्यत्वरोगापहं वन्ध्यानां खलु पुत्ररत्नजननं काकादिसंज्ञवताम् ॥ ४२ ॥ हीरकरसायनम्—चन्द्ररत्नं मुक्तां, विद्रुमं प्रवालम् । भागोत्तरमिति क्रमशः यथोत्तरं प्रवर्धमानैकभागम्। समगन्धेशकज्जलीमिति पारदगन्धौ समौ कृत्वा कृतां कज्जलीमित्यर्थः। कलावारं षोडशवारम् । पादायुधपुटे कुक्कुटपुटे । वन्ध्यत्वं पुंसः शुक्रादिदुष्ट्याऽपत्यजननेऽसमर्थत्वम् । काकबन्ध्या च “पूर्वे पुत्रवती या सा कचिद् वन्ध्या भवेद् यदि । काकबन्ध्या तु सा ज्ञेया” इत्युक्तलक्षणा सकृत् प्रसूता इत्यर्थः। “काकबन्ध्या सकृत्प्रसूः” इति स्मरणात् । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ३७–४२ ॥ भा.टी.—हीरकभस्म, तार्क्ष्यमणिभस्म, माणिक्यभस्म, पुखराजभस्म नीलम- भस्म, वैदूर्यभस्म, गोमेदभस्म, मुक्ताभस्म, प्रवालभस्म को क्रमशः उत्तरोत्तर एक- एक भाग वृद्धि से लेकर अर्थात् हीरकभस्म एक भाग, तार्क्ष्य दो भाग, माणिक्य तीन भाग, पुखराज चार भाग, नीलम पाँच भाग, वैदूर्य छः भाग, गोमेद सात भाग, मुक्ता आठ भाग, प्रवाल नौ भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर रख लें । अब इस मिश्रित ओषधि में से पाँच रत्ती मात्रा में लेकर उसमें वैक्रान्तभस्म चालीस रत्ती, स्वर्णमाक्षिकभस्म चालीस रत्ती, रूपामाक्षीभस्म चालीस रत्ती मिलायें, जितना यह सब मिलकर हो अर्थात् एक सौ पच्चीस रत्ती के इसमें सम-

भाग पारद गन्धक की बनी हुई उत्तम कज्जली त्रिगुण अर्थात् तीन सौ पचह- त्तर रत्ती मिलाकर बकरी के दूध तथा बांझ ककोड़े के स्वरस में पीसकर सुखा लें। फिर इसको एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके जङ्गली उपलों के कुक्कुटपुट में फूँक दें। सम्पुट के स्वांगशीत होने पर औषधि को निकाल पुनः बकरी के दूध तथा ककोड़े के स्वरस में घोंटकर कुक्कुटपुट में फूँक दें। इस प्रकार सोलह पुट देवें। अन्त में पीसकर शीशी में रख लें। इस योग को वैद्य लोग हीरक-रसायन कहते हैं। यह रसायन गर्भिणी स्त्रियों के रोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से पाचकाग्नि तीव्र होती है और आमदोष का परिपाक होता है। यह बलवर्धक, स्त्री सौभाग्यवर्धक, योनिरोगनाशक, पुरुषों के वन्ध्यत्वदोष- नाशक तथा काकवन्ध्या स्त्री के बांझ दोष का नाशक है ॥ ३७-४२ ॥ अथ माणिक्यस्य नामानि माणिक्यं रङ्गमाणिक्यं पद्मरागसमाह्वयम् । रविरत्नं शोणरत्नं कुरुविन्दं च लोहितम् ॥ ४३ ॥ भा.टी.-माणिक्य, रंगमाणिक्य, पद्मराग, रवि (सूर्य) रत्न, शोणरत्न, कुरु- विन्द तथा लोहित, ये सब नाम माणिक्य मणि अथवा लाल के कहे जाते हैं ॥४३॥ जात्यमाणिक्यस्वरूपम् रक्तोत्पलदलच्छायं रम्यं दीप्तप्रभं परम् । वृत्तायतं, समाङ्गञ्च माणिक्यं जात्यमुच्यते ॥ ४४ ॥ माणिक्यपरिचयः-तत्र ग्राह्यमाणिक्यस्वरूपं रक्तोत्पलदलच्छायमित्यादिना।४४। भा.टी.-माणिक्यमणि वह उत्तम समझी जाती है जो देखने में रक्त- कमलपत्रवत् छायावाली, सुन्दर चमकीली, गोल लम्बे आकार की, एक-सी बनावट की हो ॥ ४४ ॥ त्याज्यमाणिक्यस्वरूपम् विच्छायं लघु धूमाभं विरूपं कर्कशं परम् । मलिनं चिपिटं वक्रं माणिक्यं त्याज्यमुच्यते ॥ ४५ ॥ त्याज्यञ्च विच्छायमिति । आहुश्च "कुशेशयदलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं महत् स्फुटम् । वृत्तायतं समं गात्रं माणिक्यं त्वष्टधा शुभम् ॥" तथा-"यद्विच्छायं शर्करिलं कर्कशभ्रूभ्रं स्वरागविकलञ्च विरूपं लघु माणिक्यं तद् दोषावहं त्याज्यम्" इति च ॥४५ ॥ भा.टी.-चमक रहित, लघुभार, धूम्रवर्णा, बेडौल, खुरदरी, मैली तथा चपटी और टेढ़ी माणिक्य उत्तम नहीं होती है ॥ ४५ ॥

३६ त्रयोविंशस्तरङ्गः ६०६ माणिक्यशोधनस्य प्रथमः प्रकारः निम्बूकस्वरसेनेह दोलायन्त्रे विधानतः । यामैकं स्वेदितं कामं माणिक्यं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ४६ ॥ अम्लवर्गोक्तभैषज्यैर्दोलायन्त्रयोगतः । विपाचितं तु माणिक्यं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४७ ॥ एतच्छोधनप्रकारः—निम्बूकरसेन दोलायन्त्रे स्वेदनाद् यामम् ॥४६,४७ ॥ भा.टी.—माणिक्यमणि को दोलायन्त्र में निम्बूस्वरस भरकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाती है । इसी तरह किसी अम्लवर्गोक्त द्रव्य के स्वरस आदि को दोलायन्त्र में भरकर उसमें माणिक्य को तीन घंटे तक स्वेदन करने से माणिक्य उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ ४६, ४७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः निम्बूकाम्लयुतं वारा माणिक्यं चषकस्थितम् । सुराप्रदीपे संपक्वं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४८ ॥ आविष्कृतो विधिरयं गुरुवर्यमहोदयैः । प्रकाशितः खलु मया भिषजां हितकाम्यया ॥ ४६ ॥ द्वितीयः प्रकारः—सुगमसाधनो नवाविष्कृतश्चेति ध्वनयति-आविष्कृतो विधिरयमित्यादिना ॥ ४८, ४६ ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्ल (साइट्रिक एसिड) को जल में घोलकर रख लें । अब एक प्याले में माणिक्य रखकर उसमें उक्त निम्बूकाम्ल एवं जल भर दें और प्याले को त्रिपादिका पर रख नीचे सुराप्रदीप की अग्नि जलायें। इस तरह दो- तीन घण्टे निम्बूस्वरस में उबाल लेने से माणिक्य शुद्ध हो जाता है ॥४८,४६॥ माणिक्यमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलीकृतमत्यर्थं माणिक्यं सुविचूर्णितम् । शिलालगन्धैर्विमलैः पृथक् तु समभागिकैः ॥ ५० ॥ निम्बूकस्वरसेनेह पेषयेद्दिनसप्तकम् । विन्यसेत्सम्पुटे घर्म विशुष्कं कृतचक्रिकम् ॥ ५१ ॥ ततस्तु पुटयेद्धीमान् पुटे वारणसंज्ञके । रीत्यानया सुपुटितमष्टवारं प्रयत्नतः ॥ ५२ ॥ माणिक्यं म्रियते भस्म जायते पाण्डुरप्रभम् । पिष्टं तु लकुचद्रावैः पुटेदेवमथापि वा ॥ ५३ ॥

६१० रसतरङ्गिणी माणिक्यमारणम्—शिला मनःशिला, आलं हरितालम्, गन्धः गन्धकः, प्रत्येकं माणिक्यसमानम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ५०-५३ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किये हुए माणिक्य को खरल में डालकर अच्छी तरह चूर्ण कर लें । अब इसमें माणिक्य समभाग (पृथक्-पृथक्) शुद्ध मैनसिल, शुद्ध हरताल, शुद्ध गन्धकचूर्ण मिलाकर निम्बू के रस से सात दिन तक मर्दन करें। जब टिकिया बनाने योग्य हो जाय तो टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब इनको एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस विधि को आठ बार दुहराने से माणिक्य की पाण्डुरवर्ण की भस्म हो जाती है। निम्बूरस के स्थान पर लकुच (बड़हल) स्वरस से पीसकर आठ पुट देने से भी माणिक्य की भस्म हो जाती ॥ ५०-५३ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः चूर्णीकृतं शोणरत्नं विसलैः समभागिकैः । पेषयेन्निम्बुकद्रावैर्बलिरोगशिलेङ्गुलेः ॥ ५४ ॥ विमर्द्य सुदृढे खल्वे यत्नेन सप्तवासरम् । पुटयेद्वारुणपुटे विशुष्कं कृतचक्रिकम् ॥ ५५ ॥ रीत्यानयापि पुटितमष्टवारमसंशयम् । माणिक्यमचिरादेव मृतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ५६ ॥ द्वितीयप्रकारः—तालकस्थाने हिङ्गुलक्षेपः । सर्वमन्यत्पूर्ववत् । "निम्बूरसाभ्यां वा केवलं मारितं शुभम् । गन्धहिङ्गुलनिम्बूकैर्मारितं वा भवेत् शुभम्" इत्यपि ज्ञेयम् । माणिक्यगुणा व्याख्यातप्रायाः । प्राञ्चस्तु—"माणिक्यं दीपनं वृष्यं कफवातक्षयार्त्तिनुत् । भूतवेतालपापघ्नं कर्मजव्याधिनाशनम्" इत्याहुः॥५४-५६॥ भा.टी.—शुद्ध माणिक्य चूर्ण में, माणिक्यसमभाग शुद्ध गन्धक, शुद्ध मैनसिल, तथा शुद्ध हरताल चूर्ण मिला निम्बू के रस से खूब अच्छी तरह मर्दन- कर टिकिया बनाकर सुखा लें । अब इन टिकियाओं को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँक दें । इस विधि से आठ गजपुट देने मे शीघ्र ही माणिक्य की उत्तम भस्म बन जाती है ॥५४-५६ ॥ अथ मृतमाणिक्यस्य गुणाः माणिक्यं सुमृतं मेध्यं मधुरं तु रसायनम् । दीपनं वृष्यमायुष्यं वातपित्तहरं परम् ॥ ५७ ॥

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६११ कफप्रशमनं स्निग्धं क्षयरोगनिषूदनम् । वाजीकरणमत्यन्तं ध्वजभङ्गहरं मतम् ॥ ५८ ॥ भा.टी.—उत्तम माणिक्य भस्म मेधावर्धक, मधुररस, रसायनगुण, दीपक, उत्पादक अंगों के लिए बलदायक, आयुवर्धक तथा उत्तम वात-पित्त दोषहर है । इसके सेवन से कफ प्रकोप शान्त हो जाता है । यह अंगों में स्निग्धता उत्पन्न करती है और क्षय रोग को नष्ट करती है । इसके सेवन से उत्पादक अंगों की शिथिलता दूर होकर उनमें उत्तेजना आती है और नपुंसकता नष्ट हो जाती है ॥ ५७, ५८ ॥ अथ माणिक्यस्य मात्रा आरभ्य गुंजापादांशात् गुञ्जार्द्धप्रमितं मृतम् । माणिक्यं योजयेद्धीमान् बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५६ ॥ भा.टी.—बल काल आदि का विचार कर आवश्यकतानुसार माणिक्य भस्म की चौथाई रत्ती से लेकर आधी रत्ती तक की मात्रा प्रयोग की जाती है। ५६। माणिक्यमिहिरोदरसायनम् माणिक्यं कनकं रौप्यं तार्क्ष्यं तु समभागिकम् । कस्तूरिकाञ्च सर्वार्द्धां दत्त्वा कन्याम्भसा ततः ॥ ६० ॥ पिष्ट्वा द्विगुञ्जप्रमिता वटिकाः कारयेद्भिषक् । रसोऽयं तु समाख्यातो माणिक्यमिहिरोदयः ॥ ६१ ॥ रसायनमिदं वृष्यं बल्यं वह्निप्रदीपनम् । क्लैब्यापहं विशेषेण ध्वजभङ्गहरं मतम् ॥ ६२ ॥ माणिक्यमिहिरोदरसायनम्—तार्क्ष्यं गरुडमणिः ॥ ६०-६२ ॥ भा.टी.—माणिक्य भस्म एक भाग, स्वर्णभस्म एकभाग, रजतभस्म एक- भाग, तार्क्ष्य भस्म एक भाग और उत्तम कस्तूरी दो भाग (सबसे आधा भाग) लेकर खरल में डालकर घीकुआर के गूदे से मर्दन करके दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । यह रस “मणिक्य मिहिरोदय” नाम से कहा जाता है । यह रस रसायन, वृष्य, बल तथा अग्निदीपक और विशेषरूप से नपुंसकता और ध्वज- भंग (नामर्दी) को दूर करता है ॥ ६०-६२ ॥ अथ मौक्तिकस्य नामानि मुक्ता मुक्ताफलञ्चैव मौक्तिकं मौक्तिकैककम् । शुक्तिजं शौक्तिकेयञ्च शशिरत्नं शशिप्रियम् ॥ ६३ ॥ भा.टी.—मुक्ता, मुक्ताफल, मौक्तिक, शुक्तिज, शौक्तिकेय, शशिरत्न तथा शशिप्रिय ये सब नाम मोती के कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥