भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( २२५ ) परिभावितश्च सिद्धो भवेत्संग्रहणीकपाटः । वातो- त्तरायां मरिचाज्ययुक्तः पित्तोत्तरायां मधुपिप्प- लीभिः ॥ ४४ ॥ कफोत्तरायां विजयारसेन कटु- त्रयेणाज्ययुतो ग्रहण्याम् । क्षये ज्वरे चार्शसि षट्प्रकारे भगन्दरे चारुचिपीनसे च । मेहे च कृच्छ्रे गतधातुवर्द्धने गुञ्जाद्वयञ्चास्य महामयघ्नम् ॥ ४५ ॥ मोती,सोनाभस्म,पारा, गंधक, सुहागा, अभ्रकभस्म और कौड़ीकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, शंखकी भस्म ७ भाग इन सब द्रव्योंको एकत्रकर अलसीके क्वाथमें मर्दन करके गोला बना नरम वस्त्रमें लपेटकर मूषामें संपुटकर हांडीमें रख दो प्रहरतक पकावे । जब शीतल होजावे तब एक लोहेके पात्रमें डालकर धतूरेके पत्ते, चीतेकी जड़ और मुसलीके रसकी अलग अलग भावना दे; फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इस औषधिका वातजन्य ग्रहणी रोगमें कालीमिर्चोंके चूर्ण और घृतके साथ, पित्तप्रधान ग्रहणीरोगमें पीपलके चूर्ण और शहदके साथ, कफप्रधान ग्रहणी रोगमें भांगके रस; त्रिकुटेके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करे । क्षयरोग, छः प्रकारके अर्शरोग, भग- न्दर, अरुचि, पीनस, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्रमें और नष्ट धातुको बढ़ानेके लिये इसका प्रयोग करना चाहिये । इसको संग्रहग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ ४२-४५ ॥ महाराजनृपतिवल्लभ रस । कर्षत्रयं मृतं कान्तं मृताभ्रं मृतताम्रकम् । मृतं तारं माक्षिकञ्च कर्षं कर्षं प्रदापयेत् ॥ ४६ ॥ मृतं स्वर्णं मृतं तारं टङ्कणं शृङ्गमेव च । वसिंरं दन्तिमूलञ्च मरिचं तेजपत्रकम् ॥ ४७ ॥ यमानी बालकं मुस्तं शुण्ठकञ्च सधान्यकम् ।

( २३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सिन्धूद्भवं सकर्पूरं विडङ्गं.चित्रकं विषम् ॥ ४८ ॥ पारदं गन्धकञ्चैव तोलमानं प्रदापयेत् । तोलद्वयं त्रिवृच्चूर्णं लवंगं तच्चतुर्गुणम् ॥ ४९ ॥ जातीकोषफलञ्चैव तत्समं तु वराङ्गकम् । सर्वेषामर्द्धभागन्तु विडकं तत्र मिश्रयेत् ॥ ५० ॥ सर्वमेकीकृतं यद्यत् त्रुटिचूर्णञ्च तत्समम् । भावना च प्रदातव्या छागीदुग्धेन सप्तधा ॥ ५१ ॥ मातुलुङ्गरसैः पश्चाद्भावयेत्सप्तवारकम् । छायाशुष्कां वटीं कृत्वा भक्षयेद्दशरक्तिकाम् ॥५२॥ कांतलोहभस्म ३ कर्ष, अभ्रकभस्म, तांबेकी भस्म, सोनामाखी और रूपामाखीकी भस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेवे। सोनाभस्म, चांदीभस्म, सुहागा, बारहसिंगेके सींगकी भस्म, गजपीपल, दंतीकी जड़, कालीमिरच, तेजपात, अजवायन, सुगन्धवाला, नागरमोथा, सोंठ, धनिया, सेंधानामक, कपूर, वायविडंग, चित्रक, विष, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, निसोधका चूर्ण दो तोले, लौंग, जावित्री, जायफल और दालचीनी यह प्रत्येक आठ आठ तोले, सब औषधियोंसे आधा भाग विडनमक और सब औषधियोंके समान छोटी इलायचियोंका चूर्ण इन सब औषधियोंको एकत्र करके बकरीके दूधकी सात तथा बिजौरे नींबूके रसकी सात भावना देकर छायामें सुखा दश दश रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करे ॥ ४६–५२ ॥ मन्दानलं संग्रहणीं प्रवृद्धामामानुबन्धीं क्रिमि- पाण्डुरोगम् । छर्द्यम्लपित्तं हृदयामयञ्च गुल्मो- दरानाहभगंदरं च ॥५३॥ अर्शांसि वै पित्तकृता- नशेषान् सामं सशूलाष्टकमेव हन्ति । साजीर्ण-

भाषाटीकासहित । ( २२७ ) विष्टम्भंविसर्पदाहं विलम्बिकाञ्चाप्यलसं प्रमेहम् ॥५४॥कुष्ठान्यशेषाणि च कासशोषं हन्यात् स- शोथं ज्वरमूत्रकृच्छ्रम् । मतान्तरे सर्वतोभद्रनामा महेश्वरेणैव विभाषितोऽयम् ॥ ५५ ॥ इसके सेवन करनेसे मंदाग्नि, अत्यन्त बढ़ी हुई आम सहित संग्र- हणीरोग, कृमि, पाण्डु, वमन, अम्लपित्त, हृदयरोग, गुल्म, उदररोग, आनाह, भगन्दर, बवासीर, पित्तजनित अनेक प्रकारके रोग, आम- दोष, आठ प्रकारके शूल, विष्टब्धाजीर्ण, विसर्प, दाह, विलम्बिका, अलसक, प्रमेह, सब प्रकारके कुष्ठ; खांसी, शोथ, ज्वर और मूत्रकृच्छ्र रोग यह सब दूर होते हैं। इसको कोई सर्वतोभद्र रस भी कहते हैं । यह स्वयं महादेवजीने कहा है ॥ ५३-५५ ॥ माक्षिकं लौहमभ्रञ्च वङ्गं रजतहाटकम् । ग्रन्थियमानिका चोचं ताम्रं नागरटंकणम् ॥ ५६ ॥ सैन्धवं वालकं मुस्तं धान्याकं गन्धकं रसम् । शृङ्गी कर्पूरकञ्चैव प्रत्येकं माषकोन्मितम् ॥ ५७ ॥ माषद्वयं रामठं स्यान्मरिचानां चतुष्टयम् । जातीकोषं लवङ्गञ्च पत्रञ्च तोलकोन्मितम् ॥ ५८ ॥ नाभिशङ्खं विडङ्गञ्च शाणं माषद्वयं विषम् । कर्षषट्कं सत्रिमाषं सूक्ष्मैलानां ततः क्षिपेत् ॥ ५९॥ विडं कर्षद्वयं सर्वं छागीक्षीरेण पेषयेत् । चतुर्गुञ्जामितं खादेत्सानाहग्रहणीं जयेत् ॥ १६० ॥ शम्भुना निर्मितो ह्येष पूर्ववद्गुणकारकः । नाम्ना महाराजपूर्वो नृपवल्लभ उच्यते ॥ १६१ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ग्रहणीरोगचिकित्सा ।

( २२८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दूसरा महाराजनृपतिवल्लभ-सोनामाखी, लोह, अभ्रक, वंग, चांदी और सोना इन सबकी भस्म, पीपलामूल, अजवायन, दालचीनी, तांबा- भस्म, सोंठ, सुहागा, सेंधानमक, सुगन्धवाला, नागरमोथा, धनिया, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, काकड़ासिंगी और कपूर यह प्रत्येक औषधि एक एक मासा, हींग २ मासे लेवे; कालीमिरच ४ मासे, जावित्री, लौंग और तेजपात यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । शंखकी भस्म और वायविडंग चार चार मासे, विष २ मासे, छोटी इलायचीके बीज ६। कर्ष और विडनमक २ कर्ष लेवे । इन सबको बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोलियां बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली खाये तो आनाह और ग्रहणी रोग दूर हो, यह महाराज- नृपतिवल्लभ पहिले कहे महाराजनृपतिवल्लभके समान गुणकारक है । इसको महादेवजीने निर्माण किया है ॥ १५६-१६१ ॥ इति ग्रहणीरोगचिकित्सा समाप्त । अथार्शोऽधिकार । चक्रेश्वर रस । चतुर्भागं शुद्धसूतं पञ्च टंकणमभ्रकम् । त्रिदिनं भावयेद्धर्मे द्रवैः श्वेतपुनर्नवैः ॥ १ ॥ द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं वातदुर्नामशान्तये । सिद्धश्चक्रेश्वरो नाम रसश्चार्शःकुलान्तकः ॥ २ ॥ शुद्ध पारा ४ भाग, सुहागा और अभ्रकभस्म पांच पांच भाग इन सबको एकत्र करके सफेद विषखपरेके रसमें तीन दिनतक धूपमें खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन कर- नेसे वातजन्य अर्शरोग दूर होता है, यह चक्रेश्वर रस अर्शकुलनाशक है । (चक्रेश्वरमें पारदभस्म या रससिंदूर पारेके स्थानमें डालना चाहिये, अथवा द्विगुण गंधक मिलाकर पारा डालना चाहिये ) ॥ १ ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित। (२२९) तीक्ष्णमुख रस। मृतसूतार्कहेमाभ्रं तीक्ष्णं मुण्डञ्च गन्धकम् । मण्डूरञ्च समं ताप्यं मर्द्यं कन्याद्रवैर्दिनम् ॥३॥ अन्धमूषागतं सर्वं ततः पाच्यं दृढाग्निना । चूर्णितं सितया माषं खादेत्तच्चार्शसां हितम् ॥ रसस्तीक्ष्णमुखो नाम चासाध्यमपि साधयेत् ॥४॥ पारेकी भस्म, तांबेकी भस्म, सोनेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, तीक्ष्ण- लोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, गंधक, मण्डूरभस्म और सोनामाखीकी भस्म इन सबको घीकारके रसमें एक दिनतक खरल करे। पश्चात् इसको अन्धमूषामें रखकर तीक्ष्ण अग्निसे पकावे। जब शीतल होजाय तब मूषा- मेंसे औषधिको बाहर निकालकर चूर्ण कर ले। इसको एकमासे परि- माण मिश्रीके साथ सेवन करनेसे असाध्य अर्श रोग भी नष्ट होजाता है। इसको तीक्ष्णमुख रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ अर्शःकुठार रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मृतलौहञ्च ताम्रकम् । प्रत्येकं द्विपलं दन्ती त्र्यूषणं शूरणन्तथा ॥ ५ ॥ शुभा टंकयवक्षारसैन्धवं पलपञ्चकम् । पलाष्टकं स्नुहीक्षीरं द्वात्रिंशच्च गवां जलैः ॥ ६ ॥ आपिण्डितं पचेदग्नौ खादेन्माषद्वयं ततः । रसश्चार्शःकुठारोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ ७ ॥ शुद्ध पारा एक पल, शुद्ध गंधक दो पल, लोहेकी भस्म और तांबेकी भस्म आठ आठ तोले, दंती, सोंठ, मिरच, पीपल, जमींकंद, वंशरोचन, सुहागा, जवाखार और सेंधानमक यह सब बीस बीस

(२३०) रसेन्द्रसारसंग्रह । तोले, थूहरका दूध ३२ तोले और गोमूत्र १२८ तोले लेवे । इन सबको एकत्र करके खूब खरल करके गोलासा बना लेवे । फिर इसको विधि- पूर्वक मंद मंद अग्निसे पकावे । प्रतिदिन इसमेंसे दो मासे परिमाण सेवन करे तो यह अर्शकुठार रस सब रोगोंको नष्ट करता है ॥५-७॥ चक्राख्य रस । मृतसूताभ्रवैक्रान्तं ताम्रं कांस्यं समं समम् । सर्वतुल्येन गन्धेन दिनं भल्लातकद्रवैः ॥ ८ ॥ मर्दयेद्यत्नतः पश्चाद्वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् । भक्षणाद्गदजान् हन्ति द्वन्द्वजान्सर्वजानपि ॥ ९ ॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, वैक्रान्तकी भस्म, तांबेकी भस्म और कांसेकी भस्म यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर शुद्ध गंधक लेवे । इन सबको एकत्र भिलावेके रसमें एक दिन तक खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे द्वन्द्वज और सर्वदोषजनित अर्शरोग दूर होता है ॥८॥९॥ नित्योदित रस । मृतसूताभ्रलौहार्कविषं गन्धं समं समम् । सर्वतुल्यन्तु भल्लातफलमेकत्र चूर्णयेत् ॥ १०॥ माषमात्रं लिहेदाज्यै रसश्चार्शांसि नाशयेत् । नित्योदितो रसो नाम गुदोद्भवकुलान्तकः ॥ ११ ॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म, तांबेकी भस्म, शुद्ध विष और शुद्ध गंधक यह सब समान भाग लेवे और सबकी बराबर शुद्ध भिलावे लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर तीन दिन तक जमींकं- दके रसमें भावना देवे और खरल करे । इसमेंसे प्रतिदिन एक मासे परिमाण औषधि लेकर घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे अर्शरोग नष्ट होता है। यह नित्योदित रस बवासीरको जड़से नष्ट करता है॥१०॥११॥

भाषाटीकासहित । (२३१) चन्द्रप्रभा वटिका । क्रिमिरिपुदहनव्योषत्रिफलासुरदारुचव्यभूनिम्बम् । मागधिमूलं मुस्तं सशटा वचा धातुमाक्षिकञ्चैव ॥ लवणक्षारनिशायुगकुस्तुम्बुरुगजकणातिविषा ।१२॥ कर्षांशकान्येव समानि कुर्यात्पलाष्टकं चाश्मज- तोर्विदध्यात् । निष्पत्रशुद्धस्य पुरस्य धीमान् पलद्वयं लौहरजस्तथैव ॥ १३ ॥ सिताचतुष्कं पलमत्र वांश्यां निकुम्भकुम्भात्रिसुगन्धियुक्तम् । चन्द्रप्रभेयं गुटिका विधेया अर्शांसि निर्णाशयते षडेव॥१४॥भगन्दरं कामलपाण्डुरोग विनष्टवह्नेः कुरुते च दीप्तिम् । हन्त्यामयान् पित्तकफानिलो- त्थान्नाडीगते मर्मगते व्रणे च ॥ १५ ॥ ग्रन्ध्यर्बुदे विद्रधिराजयक्ष्ममेहे भगाख्ये प्रदरे च योज्या । शुक्रक्षये चाश्मरिमूत्रकृच्छ्रे मूत्रप्रवाहेऽप्युदरा- मये च ॥१६॥ तक्रानुपानं त्वथ मस्तुपानमाजो रसो जाङ्गलजो रसो वा । पयोऽथवा शीतजलानु- पानं बलेन नागस्तुरगो जवेन ॥ १७ ॥ दृष्ट्या सुपर्णः श्रवणे वराहः कान्त्या रतीशो धिषणश्च बुद्धया । न पानभोज्ये परिहार्यमस्ति न शीत- वातातपमैथुनेषु । शम्भुं समभ्यर्च्य कृतप्रणामं प्राप्ता गुटी चन्द्रमसःप्रसादात् ॥१८॥ शुक्रदोषान् निहन्त्याशु प्रमेहानपि दारुणान् । वलीपलित- निर्मुक्तो वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ १९ ॥

( २३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वायविडंग, चीतेकी जड़, सोंठ, मरिच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, देवदारु, चव्य, चिरायता, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, वच, सोनामाखी भस्म, सेंधानमक, जवाखार, सज्जीखार, हल्दी, दारु- हल्दी, धनिया, गजपीपल और अतीस यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेवे, शिलाजीत ८ पल लेवे, शुद्ध गूगल २ पल, लोहा २ पल, मिश्री ४ पल, वंशलोचन १ पल, दन्तीकी जड़ १ पल, निसोथ १ पल, दालचीनी १ पल, इलायची १ पल और तेजपात १ पल लेवे; इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोली बना लेवे । इस चन्द्रप्रभा गुटिकाके सेवन करनेसे छः प्रकारकी बवासीर, भगन्दर, कामला और पांडुरोग नष्ट होते हैं । मंदाग्नि नष्ट होकर अग्नि दीप्त होती है । पित्त, कफ और वातजन्य रोग नष्ट होते हैं । तथा नाड़ीगत व्रण, मर्मगत व्रण, ग्रंथि, अर्बुद, रसौली, विद्रधि, राजयक्ष्मा, प्रमेह, भगन्दर, प्रदर, शुक्रक्षय, पथरी रोग, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रप्रवाह और उदरामय प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् तक्र, दहीका तोड़, बकरीका दूध, जंगल प्रदेशके जीवोंका मांस, दूध अथवा शीतल जल पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे हाथीके समान बल; घोड़ेके समान गतिशक्ति, गरुड़के समान दृष्टिशक्ति, सूअरके समान श्रवणशक्ति, कामदेवके समान कांति और बृहस्पतिके समान बुद्धिशक्ति उत्पन्न होती है । इस औषधिके सेवन करनेपर पान भोजन, शीतल वायुका सेवन, सूर्यकी धूप और स्त्री प्रसंग आदिका कुछ नियम नहीं.है । इससे वीर्यदोष और अत्यंत दारुण प्रमेह रोग नष्ट होता है तथा वलीपालित रोग नष्ट होकर वृद्ध भी तरुणताको प्राप्त होता है । इसको चन्द्रमाके प्रसादसे प्राप्त हुई चन्द्रप्रभा वटी कहते हैं ॥ १२-१९ ॥ माणाद्य लोह । माणशूरणभल्लातत्रिवृद्दन्तीसमन्वितम् । त्रिकत्रयसमायुक्तं लौहं दुर्नामनाशनम् ॥ २० ॥

भाषाटीकासहित । ( २३३ ) मानकन्द, जमींकंद, भिलावे, निसोध, दन्तीमूल, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, तेजपात, दालचीनी और इलायची यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबके बराबर लोहा लेवे; इन सबको एकत्र करके जलमें पीसकर गोली बना लेवे । प्रतिदिन इस- मेंसे यथामात्रानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करे तो बवासीर नष्ट होती है ॥ २० ॥ चंचुकुठार रस । रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं भागयुग्मकम् । दन्तित्रिकटुकुष्ठैकं षड्भागं लाङ्गलस्य च ॥ २१ ॥ क्षारसैन्धवटङ्गानां प्रत्येकं भागपञ्चकम् । गोमूत्रस्य च द्वात्रिंशत्स्नुहीक्षीरं तथैव च ॥ २२ ॥ यावच्च पिण्डितं सर्वं तावन्मृद्वग्निना पचेत् । माषद्वयं ततः खादेद्दिवास्वप्नादि वर्जयेत् । रसश्चञ्चुकुठारोऽयमर्शासां कुलनाशनः ॥ २३ ॥ पारा दो भाग,गंधक दो भाग और लोहेकी भस्म दो भाग लेवे; सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीकी जड़, कूठ और कलिहारी यह प्रत्येक औषधि छः छः भाग लेवे; जवाखार, सेंधानमक और सुहागा यह प्रत्येक पांच पांच भाग, गोमूत्र और थूहरका दूध प्रत्येक बत्तीस २ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके मंद मंद अग्निसे तब- तक पकावे जबतक कि औषधिका गोला न हो जाय । प्रतिदिन इस- मेंसे दो मासे औषधि खाये और इसपर दिनमें सोना आदि त्याग देवे । यह चंचुकुठार रस बवासीरको समूल नष्ट करता है ॥२१-२३॥ शिलागन्धक वटक । शिलागन्धकयोश्चूर्णं पृथग्भृङ्गरसाऽऽप्लुतम् । सप्ताहं भावयेत्सर्पिर्मधुभ्याञ्च विमर्दयेत् ॥२४॥

( २३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अर्शसश्चानुलोम्यार्थं हताग्निबलवर्द्धनम् । रक्तिकाद्वितयं खादेत्कुष्ठादिरहितो नरः ॥ २५ ॥ मैनशिल और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेवे । फिर भांगरेके रसकी सात भावना देकर घी और शहदमें खरल करके दो रत्ती परिमाण सेवन करनेसे बवासीर रोग नष्ट होता है । तथा मंदाग्नि दीप्त होती है और कुष्ठादि रोग दूर होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ जातीफलादि वटी । जातीफलं लवङ्गञ्च पिप्पली सैन्धवन्तथा । शुण्ठीधूस्तूरबीजञ्च दरदं टङ्कणं तथा ॥ २६ ॥ समं सर्वं विचूर्ण्याथ जम्भीराम्भसा विमर्दयेत् । जातीफलवटिकेयमर्शोऽग्निमान्द्यनाशिनी ॥ २७ ॥ जायफल, लौंग, पीपल, सेंधानमक, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंगरफ और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे बवासीर और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको जातीफलादि वटी कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ पञ्चानन वटी । मृतसूताभ्रलोहानि मृतार्कगन्धकैः सह । सर्वाणि समभागानि भल्लातं सर्वतुल्यकम् ॥ २८ ॥ वन्यसूरणकन्दोत्थैर्द्रवैः पलप्रमाणतः । मर्दयेद्दिनमेकञ्च माषमात्रं पिबेद् घृतैः ॥ २९ ॥ भक्षणाद्धन्ति सर्वाणि चार्शांसि च न संशयः । असाध्येष्वपि कर्तव्या चिकित्सा शंकरोदिता ॥ कुष्ठरोगं निहन्त्याशु मृत्युरोगविनाशिनी ॥३०॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म, तांबेकी भस्म और शुद्ध गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबके बरा-

भाषाटीकासहित । ( २३५ ) बर भिलावे लेवे, सबको एकत्र पीसकर वनजमीकंदके चार पल रसमें एक दिनतक खरल करे । इसमेंसे प्रतिदिन एक मासे औषधि लेकर घृतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे असाध्य अर्शरोग, कुष्ठरोग और मृत्युजनक घोर रोग भी शीघ्र ही नष्ट हो जात हैं; इसको महादेवने कहा है ॥ २८-३० ॥ अष्टांग रस । गन्धं रसेन्द्रं मृतलौहकिट्टं फलत्रयं व्यूषणवह्नि- भृङ्गम् । कृत्वा समं शाल्मलिका गुडूचीरसेन यामत्रितयं विमर्द्य । निष्कप्रमाणं गदितानुपानैः सर्वाणि चार्शांसि हरेद्रसस्य ॥ ३१ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्शोऽधिकारः । गन्धक, पारा, लोहेका मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मरिच; पीपल, चीतेकी जड़ और भांगरा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर सेमल और गिलोयके रसमें तीन प्रहर खरल करके चार मासे औषधि यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी बवा- सीर दूर होती है । इसको अष्टांगरस कहते हैं ॥ ३१ ॥ इति अर्शोऽधिकार समाप्त । अथ अजीर्णाधिकार । महोदधि वटी । ऐकैकं विषसूतञ्च जातीटंकं द्विकं द्विकम् । कृष्णात्रिकं विश्वषट्कं गन्धं कापर्दकं द्विकम् ॥ १॥ देवपुष्पं बाणमितं सर्वं संमर्द्य यत्नतः । महोदधिवटी नाम्ना नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ २ ॥

( २३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विष १ भाग, पारा १ भाग, जायफल २ भाग, सुहागा २ भाग, पीपल ३ भाग, सोंठ ६ भाग, गंधक २ भाग, कौड़ीकी भस्म २ भाग और लौंग ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार वटी बनाके सेवन करनेसे नष्ट अग्नि फिरसे दीप्त हो जाती है । इसको महोदधि वटी कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ अग्नितुण्डी रस । शुद्धसूतं विषं गन्धमजमोदा फलत्रिकम् । स्वर्जिक्षारं यवक्षारं वह्निसैन्धवजीरकम् ॥ ३ ॥ सौवर्चलं विडङ्गानि सामुद्रं त्र्यूषणन्तथा । विषमुष्टिसमं सर्वं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥ मरिचाभां वटीं खादेद्वह्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, विष, गंधक, अजवायन, हरड़, बहेड़ा, आमला, सज्जी, जवाखार, चीतेकी जड़, सेंधानमक, जीरा, कालानमक ( बिरिया संचर नमक ) वायविडंग, सामुद्रलवण, सोंठ, मरिच, पीपल और कुचला इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके मरिचकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके यथोक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि नष्ट होती है ॥ ३ ॥ ४ ॥ वडवानल रस । शुद्धसूतस्य कर्षैकं गन्धकं तत्समं मतम् । पिप्पली पञ्चलवणं मरिचञ्च फलत्रयम् ॥ ५ ॥ क्षारत्रयं समं सर्वं, चूर्णं कृत्वा प्रयत्नतः । निर्गुण्डयाश्च द्रवेणैव भावयेद्दिनमेकतः ॥ वडवानलनामाऽयं मन्दाग्निश्च विनाशयेत् ॥ ६ ॥ शुद्ध पारा १ कर्ष, शुद्ध गंधक १ कर्ष, पीपल १ कर्ष, पांचों लवण प्रत्येक एक एक कर्ष, काली मिरच १ कर्ष, त्रिफला ३ कर्ष,

भाषाटीकासहित । ( २३७ ) जवाखार १ कर्ष, सज्जी १ कर्ष और सुहागा १ कर्ष इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके सम्हालूके रसमें एक दिन भावना देकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि दूर होती है । इसको वड- वानल रस कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ हुताशन रस । गन्धेशटंकणैकैकं विषमत्र त्रिभागिकम् । अष्टभागन्तु मरिचं जम्भाम्भोमर्दितं दिनम् ॥ ७ ॥ तद्वटीं मुद्गमानेन कृत्वाऽद्रेण प्रयोजयेत् । शूलारोचकगुल्मेषु विषूच्यां वह्निमान्द्यके ॥ अजीर्णे सन्निपातादौ शैत्ये जाड्ये शिरोगदे ॥ ८ ॥ गन्धक, पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, विष ३ भाग, काली मिरच ८ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जम्बीरी नींबूके रसमें एक दिन अच्छे प्रकारसे खरल करके मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरकके रसके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे शूल, अरुचि, गुल्म, विषूचिका, अग्निमान्द्य, अजीर्ण, सन्निपात, शैत्य, जडता और शिरोरोग नष्ट होता है । इसको हुताशन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ बृहत् हुताशन रस । एकद्विकद्वादशभागयुक्तं योज्यं विषं टंकणमूष- णञ्च । हुताशनो नाम हुताशनस्य करोति वृद्धिं कफजिन्नराणाम् ॥ ९ ॥ विष एक भाग, सुहागा दो भाग और कालीमिरच १२ भाग लेवे; इन सबको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे अग्निकी वृद्धि होकर कफ नष्ट होता है ॥ ९ ॥ ९

( २३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अमृतकल्प वटी । शुद्धौ पारदगन्धौ च समानौ कज्जलीकृतौ । तयोरर्द्धं विषं शुद्धं तत्समं टंकणं भवेत् ॥ १० ॥ भृङ्गराजद्रवैर्भाव्यं त्रिदिनं यत्नतः पुनः । मुद्गप्रमाण! वटिकाः कर्त्तव्या भिषजां वरैः ॥ ११ ॥ वटीद्वयं हरेच्छूलमग्निमान्द्यं सुदारुणम् । अजीर्णं जरयत्याशु धातुपुष्टिं करोति च ॥ १२ ॥ नानाब्याधिहरा चेयं वटी गुरुवचो यथा । अनुपानविशेषेण सम्यग्गुणकरी भवेत् ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा १ भाग, गन्धक १ भाग, विष १ भाग और सुहागा १ भाग लेवे । पहले पारे गंधककी कज्जली कर ले; फिर इन सब औष- धियोंको एकत्र करके भांगरेके रसमें तीन भावना देकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे। इनमेंसे दो गोली नित्य खानेसे शूल, अग्निकी मंदता और अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं, धातुकी वृद्धि होती है और अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । यह गुरुदेवके वचनानुसार अनुपानविशे- षोंके साथ सेवन करनेसे श्रेष्ठ गुणोंको उत्पन्न करती है ॥ १०-१३ ॥ अग्निकुमार रस । रसेन्द्रगन्धौ सह टंकणेन समं विषं योज्यमिह त्रिभागम् । कपर्दशंखाविह नेत्रभागौ मरीचमत्रा- ष्टगुणं प्रदेयम् ॥ १४ ॥ सुपक्वजम्बीररसेन घृष्टः सिद्धो भवेदग्निकुमार एषः । विषूचिकाजीर्णसमी- रणार्त्ते दद्याद्धि वह्नौ ग्रहणीगदे च ॥ १५ ॥

भाषाटीकासहित । (२३९) पारा, गंधक,सुहागा प्रत्येक एक एक भाग, विष तीन भाग,शंखकी भस्म २ भाग, कौड़ीकी भस्म २ भाग और काली मिरच ८ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र करके अच्छे प्रकारसे पके हुए जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे विषूचिका, अजीर्ण, वातरोग और ग्रहणी रोग नष्ट होते हैं। इसको अग्निकुमाररस कहते हैं ॥ १४ ॥ १५ ॥ बृहदग्निकुमार रस। शुद्धसूतं द्विधा गन्धं गन्धतुल्यञ्च टंकणम् । फलत्रयं यवक्षारं व्योषं पञ्चपटूनि च ॥ १६ ॥ द्वादशैतानि सर्वाणि रसतुल्यानि दापयेत् । संमर्द्य सप्तधा सर्वं भावयेदार्द्रकद्रवैः ॥ १७ ॥ संशोष्य चूर्णयित्वा तु भक्षयेदार्द्रकाम्बुना । शाणमात्रं वयो वीक्ष्य नानाऽजीर्णप्रशान्तये ॥ रसश्चाग्निकुमारोऽयं महेशेन प्रकाशितः ॥ १८ ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, सुहागा २ भाग, त्रिफला, जवा- खार, त्रिकुटा और पांचों लवण यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदरखके रसकी सात भावना देवे और धूपमें सुखा लेवे। पश्चात् इसका चूर्ण करके रोगीकी अवस्थाको देखकर चार मासे परिमाण अदरखके रसके साथ सेवन करे। अनेक प्रकारके अजीर्णोंको दूर करनेवाली यह औषधि स्वयं महादेवने कही है ॥ १६-१८ ॥ महाग्निकारकश्चै कालभास्करतेजसाम् । अग्निमान्द्यभवान् रोगान् शोथं पाण्ड्वामयं जयेत् १९ दुर्नामग्रहणीसामरोगान् हन्ति न संशयः । यथेष्टाहारचेष्टस्य नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ॥२०॥

( २४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इससे अत्यन्त बढ़ी हुई मंदाग्नि,शोथ, पाण्डुरोग, बवासीर,संग्रहणी और आमरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार विहार करे, इसपर किसी प्रकारका नियम नहीं है । यह प्रलयके सूर्यके समान अग्निको अत्यंत प्रदीप्त करता है ॥ १९ ॥ २० ॥ व्योषं जातीफले द्वे च लवङ्गञ्च वरांगकम् । पत्रं शृंगीं कणा टङ्कं यमानी जीरकद्वयम् ॥ २१ ॥ सैन्धवञ्च विडं हिङ्गु रसं गन्धञ्च रौप्यकम् । लोहमभ्रं समं सर्वं जम्बीररसमर्दितम् ॥ २२ ॥ चतुर्गुञ्जां वटीं कृत्वा खादेदजीर्णशान्तये । अत्यग्निकारकश्चायं रसश्चाग्निकुमारकः ॥ २३ ॥ संग्रहग्रहणीञ्चैव वातपित्तकफोद्भवाम् । नाशयेदामदोषञ्च त्रिदोषजनितञ्च यत् ॥ शूलदोषं विषूचीञ्च भास्करस्तिमिरं यथा ॥ २४ ॥ अपर बृहदग्निकुमार रस—सोंठ,पीपल,कालीमिरच, जायफल,जावित्री, लौंग, दालचीनी, तेजपात, काकड़ासिंगी, पीपल, सुहागा, अजवायन, जीरा, कालाजीरा, सेंधानमक, विडनमक, हींग, पारा, गंधक, रूपा भस्म, लोहभस्म और अभ्रकभस्म इन सब द्रव्योंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । अनेक प्रकारके अजीर्णोंको शमन करनेके लिये इन गोलियोंका सेवन करे । यह अग्निको अत्यन्त दीपन करता है । इसके सेवन करनेसे वातज, पित्तज और कफज ग्रहणी रोग नष्ट होता है तथा आमदोष, त्रिदोषजरोग, शूल और विषूचिका रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्धकारका समूह नष्ट होता है । इसको अपर बृहदग्निकुमार रस कहते हैं ॥ २१-२४ ॥

भाषाटीकासहित । ( २४१ ) बृहन्महोदधि वटी । लवंगं चित्रकं शुण्ठी जयपालं समं समम् । टंकणञ्च प्रदातव्यं वृद्धदारस्य कार्षिकम् ॥ २५ ॥ चतुर्दश भावनाश्च दन्तीद्रावैः प्रदापयेत् । निम्पाकेन त्रिधा देया वृद्धदारेण पञ्चधा ॥ २६ ॥ रसं गन्धञ्च गरल मेलयित्वा विभावयेत् । आर्द्रकस्य रसेनैव चित्रकस्य रसेन वा ॥ २७ ॥ मुद्गप्रमाणां वटिकां कृत्वा खादेद्दिने दिने । क्षुत्पिपासाकरी चेयं जीर्णज्वरविनाशिनी ॥ २८ ॥ लौंग, चित्रकमूल, सोंठ, जमालगोटे, सुहागा और विधारके बीज यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर दंतीकी जड़के रसमें चौदह भावना देवे, फिर कागजी नींबूके रसमें तीन भावना देवे, पश्चात् विधारके क्वाथकी पांच भावना देवे । फिर इसमें पारा एक कर्ष, गंधक एक कर्ष और विष एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर अदरखके रसकी सात और चित्रक जड़की सात भावना देकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इनमें से प्रतिदिन एक गोली भक्षण करे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्षुधा और पिपासाकी वृद्धि होती है तथा जीर्णज्वर नष्ट होता है । इसको बृहन्महोदधि वटी कहते हैं ॥ २५-२८ ॥ रामबाण रस । पारदामृतलवंगगन्धकं भागयुग्ममरिचेन मिश्रि- तम् । जातिकाफलमथार्द्धभागिकं तिन्तिडीफल- रसेन मर्दितम् ॥ २९ ॥ माषमात्रमनुपानयोगतः सद्य एव जठराग्निदीपनः। संग्रहग्रहणीकुम्भकर्णकं

( २४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सामवातखरदूषणं जयेत् । वह्निमान्द्यदशवक्त्र- नाशनो रामबाण इव विश्रुतो रसः ॥ ३० ॥ पारा, विष, लौंग और गंधक यह प्रत्येक एक एक भाग, काली- मिरच दो भाग, जायफल आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कच्ची इमलीके रसमें भावना देकर यथोचित मात्रानुसार अथवा एक मासे औषधि यथोक्त अनुपानके साथ सेवन करे तो जठराग्निकी वृद्धि होकर मंदाग्नि नष्ट होती है । इसके सेवन करनेसे कुम्भकर्णकी समान संग्रहणी, खरदूषणके समान आमवात और दशाननकी समान मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको रामबाण रस कहते हैं ॥ २९ ॥ ३० ॥ अजीर्णकण्टक रस । शुद्धसूतं विषं गन्धं समं सर्वं विचूर्णयेत् । मरिचं सर्वतुल्यञ्च कण्टकार्याः फलद्रवैः ॥ ३१ ॥ मर्दयेद्भावयेत्सर्वमेकविंशतिवारकम् । त्रिगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्वाजीर्णप्रशान्तये । अजीर्णकण्टकः सोऽयं रसो हंति विषूचिकाम्॥३२॥ शुद्ध पारा, विष और गंधक समान भाग लेकर एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले और सब चूर्णके बराबर काली मिरचोंका चूर्ण लेवे । सबको एकत्र कटेरीके फलोंके रसमें २१ बार भावना देकर तीन तीन रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका अजीर्ण रोग दूर होता है तथा विषूचिका नष्ट होती है । इसको अजीर्णकण्टक रस कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ पाशुपत रस । कर्षं सूतं द्विधा गन्धं त्रिभागं तीक्ष्णभस्मकम् । त्रिभिर्विषं समं देयं चित्रकक्वाथभावितम् ॥ ३३ ॥

भाषाटीकासहित । (२४३) धूर्त्तबीजस्य भस्मापि द्वात्रिंशद्भागसंयुक्तम् । कटुत्रयं त्रिभागं स्याल्लवंगैला च तत्समम् ॥ ३४ ॥ जातीफलं तथा कोषमर्द्धभागं नियोजयेत् । तथाऽर्द्धं लवणं पञ्च स्नुह्यर्कैरण्डतिन्तिडी ॥ ३५ ॥ अपामार्गाश्वत्थजञ्च क्षारं दद्याद्विचक्षणः । हरीतकी यवक्षारं स्वर्जिका हिंगुजीरकम् ॥ ३६ ॥ सूततुल्यं टङ्कणं च चाम्लयोगेन मर्दयेत् । भोजनान्ते प्रयोक्तव्यो गुञ्जाफलप्रमाणतः ॥ ३७ ॥ रसः पाशुपतो नाम सद्यः प्रत्ययकारकः । दीपनः पाचनो हृद्यः सद्यो हन्ति विषूचिकाम्॥३८॥ पारा १ भाग , गंधक २ भाग, लोहाभस्म ३ भाग और विष छः भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसमें ३२भाग धतूरेके बीजोंकी भस्म, त्रिकुटेका चूर्ण ३ भाग, लौंग ३ भाग, इलायची ३ भाग, जायफल आधा भाग, जावित्री आधा भाग, पांचों नमक प्रत्येक आधा आधा भाग तथा थूहर, आक, अरण्ड, इमली, चिरचिटा और पीपल इन प्रत्येकका क्षार एक एक भाग लेवे । फिर हरड़, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा और सुहागा यह समस्त औषधि प्रत्येक एक एक भाग मिलाकर पूर्वोक्त अम्लवर्गकी औषधियोंमें खरल करे । भोजनके पश्चात् इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि सेवन करनी चाहिये। यह औषधि तत्काल गुण- दायक है; अग्निको दीपन करनेवाली, पाचक, हृदयको हितकारी और तत्काल विषूचिका रोगको दूर करती है ॥ ३३-३८ ॥ तालमूलीरसेनैव उदरामयनाशनः । मोचरसेनातिसारं ग्रहणीं तक्रसैन्धवैः ॥ ३९ ॥

( २४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सौवर्चलकणाशुण्ठीयुतः शूलं विनाशयेत् । अर्शो हन्ति च तक्रेण पिप्पल्या राजयक्ष्मकम्॥४०॥ वातरोगं निहन्त्याशु शुण्ठीसौवर्चलान्वितः । शर्कराधान्ययोगेन पित्तरोगं निहन्त्ययम् ॥ ४१ ॥ पिप्पलीक्षौद्रयोगेन श्लेष्मरोगञ्च तत्क्षणात् । अस्मात् परतरो नास्ति धन्वन्तरिमतो रसः ॥४२॥ इस औषधिको मुसलीके रसके साथ सेवन करनेसे उदरामय नष्ट होता है, मोचरसके साथ सेवन करनेसे अतिसार रोग, तक्र और सेंधा- नमकके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी, कालानमक पीपल और सोंठके साथ सेवन करनेसे शूल, तक्रके साथ सेवन करनेसे बवासीर, पीपलके साथ सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, सोंठ और काले नमकके साथ सेवन करनेसे वातरोग, मिश्री और धनियेके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, पीपलके चूर्ण और शहदके साथ सेवन करनेसे कफरोग तत्काल नष्ट होजाता है । इसके समान संसारमें अन्य औषध गुणकारक नहीं है । इसको पाशुपत रस कहते हैं ॥ ३९-४२ ॥ बृहच्छंखवटी । दग्धशंखस्य चूर्णं स्यात्तथा लवणपञ्चकम् । तिंतिडीक्षारकञ्चैव कटुकत्रयमेव च ॥ ४३ ॥ तथैव हिंगुकं ग्राह्यं विषपारदगन्धकम् । अपामार्गस्य वह्नेश्च क्वाथैर्निम्पाकजैर्द्रवैः ॥ ४४ ॥ भावयेत्सर्वचूर्णं तदम्लवर्गैर्विशेषतः । यावत्तदम्लतां याति गुटिकाऽमृतरूपिणी ॥ ४५ ॥ सद्यो वह्निकरी चैव भस्मकञ्च नियच्छति ।