ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
विप्रुतं रेभमुदनि प्रवृक्तमुन्निन्धथुः सोममिव स्रुवेण.. (२४) असुर शत्रुओं ने रेभ ऋषि को पीटा और दुःखद रस्सियों से बांधकर कुएं में डाल दिया. व्यथित एवं जल से भीगे रेभ दस रात और नौ दिन तक वहीं पड़े रहे. जिस प्रकार अध्वर्यु सुच की सहायता से सोमरस निकालता है, उसी प्रकार तुमने उन्हें कुएं से निकाला. (२४) प्र वां दंसांस्यश्विनाववोचमस्य पतिः स्यां सुगवः सुवीरः. उत पश्यन्नश्रुवन्दीर्घमायुरस्तमिवेज्जरिमाणं जगम्याम्.. (२५) हे अश्विनीकुमारो! मैंने तुम्हारे पुराकृत कर्मों का वर्णन किया है. मैं सुंदर गायों एवं वीरों का स्वामी होने के साथ-साथ राष्ट्र का स्वामी बनूं. जिस प्रकार घर का मालिक घर में बिना बाधा के घुसता है, उसी प्रकार मैं भी आंखों से देखता हुआ दीर्घ आयु भोग कर बुढ़ापे में प्रवेश करूं. (२५) सूक्त—११७ देवता—अश्विनीकुमार मध्वः सोमस्याश्विना मदाय प्रत्नो होता विवासते वाम्. बर्हिष्मती रातिर्विश्रिता गीरिषा यातं नासत्योप वाजैः.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पुराना होता तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मधुर सोमरस से तुम्हारी सेवा करता है. ऋत्विजों द्वारा स्तुति के साथ ही कुशों पर हव्य रखा गया है. हमारे लिए देवबल और अन्न के साथ हमारे यहां आओ. (१) यो वामश्विना मनसो जवीयान्रथः स्वश्वो विश आजिगाति. येन गच्छथः सुकृतो दुरोणं तेन नरा वर्तिरस्मभ्यं यातम्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! मन से भी अधिक तीव्रगामी एवं सुंदर घोड़ों वाला तुम्हारा जो रथ प्रजाओं की ओर जाता है तथा जिससे तुम सुंदर यज्ञ करने वाले लोगों के घर जाते हो, हे नेताओ! तुम उसी रथ द्वारा हमारे समीप आओ. (२) ऋर्षिं नरावंहसः पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन. मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्वं वृष्णा चोदयन्ता.. (३) हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने पांच जनों द्वारा पूजित अत्रि को शतद्वार यंत्रगृह की पाप रूप तुषानल से पुत्र-पौत्रों सहित छुड़ाया था. इसके लिए तुमने शत्रुओं की हिंसा एवं दस्युओं की दुःखदायिनी माया का क्रमशः विनाश किया. (३) अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरैवैर्ऋर्षिं नरा वृषणा रेभमप्सु. सं तं रिणीथो विप्रुतं दंसोभिर्न वां जूर्यन्ति पूर्व्या कृतानि.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने दुर्दांत दस्युओं द्वारा कुएं के जल में डुबाए गए रेभ ऋषि को बाहर निकालकर उनका विकलांग शरीर घोड़े के समान अपनी दवाओं से ठीक किया था. तुम्हारे पूर्वकृत कार्य अभी पुराने नहीं हुए हैं. (४) सुषुप्व़ांसं न निर्ऋतेरुपस्थे सूर्यं न दस्रा तमसि क्षियन्तम्. शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय.. (५) हे दर्शनीयो! तुमने धरती के ऊपर सोए हुए मनुष्य के समान पड़े हुए, कुएं में पड़ने वाले सूर्यबिंब के समान तेजस्वी एवं शोभन स्वर्ण निर्मित अलंकार के समान दर्शनीय कूपपतित वंदन ऋषि को बाहर निकाला था. (५) तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन्. शफादश्वस्य वाजिनो जनाय शतं कुम्भाँ असिञ्चतं मधूनाम्.. (६) हे नेता रूप नासत्यो! अभीष्ट प्राप्ति के कारण कहे जाने वाले अनुष्ठान के समान ही मैं अंगिरावंशी कक्षीवान् तुम्हारे यज्ञ की प्रतिज्ञा करता हूं. तुमने वेगवान् घोड़ों के खुरों से निकले हुए मधु से अपेक्षित लोगों के लिए सैकड़ों घड़े भर दिए थे. (६) युवं नरा स्तुवते कृष्णियाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय. घोषायै चित्पितृषदे दुरोणे पतिं जूर्यन्त्या अश्विनावदत्तम्.. (७) हे नेताओ! कृष्ण के पुत्र विश्वकाय ने तुम लोगों की स्तुति की तो तुमने उसके खोए हुए पुत्र विष्णायु को लाकर दे दिया. हे अश्विनीकुमारो! कुष्ठ रोग के कारण पति को प्राप्त न करके अपने पिता के घर बैठी हुई एवं वृद्धावस्था को प्राप्त घोषा को तुमने पति प्रदान किया. (७) युवं श्यावाय रुशतीमदत्तं महः क्षोणस्याश्विना कण्व़ाय. प्रवाच्यं तद्वृषणा कृतं वां यन्नार्षदाय श्रवो अध्यधत्तम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने कोढ़ी श्याव ऋषि को उज्ज्वल त्वचा वाली स्त्री प्रदान की एवं दृष्टिरहित होने के कारण चलने में अशक्त कण्व को तेजपूर्ण नेत्र दिए. हे कामवर्षको! तुमने नृषद के बहरे पुत्र को कान प्रदान किए. तुम्हारे ये कार्य प्रशंसा के योग्य हैं. (८) पुरू वर्पांस्याश्विना दधाना नि पेदव ऊहथुराशुमश्वम्. सहस्रसां वाजिनमप्रतीतमहिहनं श्रवस्यं1 तरुत्रम्.. (९) हे बहुरूपधारी अश्विनीकुमारो! तुमने पेदु ऋषि को शीघ्रगामी सहस्र संख्या वाले धन का दाता, बलवान्, शत्रुओं द्वारा जीतने में अशक्य, शत्रुहंता, स्तुतिपात्र एवं रक्षक अश्व दिया था. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
एतानि वां श्रवस्या सुदानू ब्रह्माङ्गूषं सदनं रोदस्योः. यद्द्वां पज्रासो अश्विना हवन्ते यातमिशा च विदुषे च वाजम्.. (१०) हे शोभनदानशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे वीर-कार्य सबके जानने योग्य हैं. धरती और आकाश के रूप में वर्तमान तुम दोनों की स्तुति प्रसन्नतादायक एवं घोषणा करने योग्य है. अंगिरागोत्रीय यजमान तुम्हें जब-जब बुलावें, तब-तब देने योग्य अन्न लेकर आओ एवं तुम्हारी स्तुति जानने वाले मुझको बल प्रदान करो. (१०) सूनोर्मनेनाश्विना गृणाना वाजं विप्राय भुरणा रदन्ता. अगस्त्ये ब्रह्मणा वावृधाना सं विस्पलां नासत्यारिणीतम्.. (११) हे पोषणकर्त्ता एवं सत्य स्वभाव वाले अश्विनीकुमारो! तुमने कुंभ से उत्पन्न अगस्त्य ऋषि की स्तुतियों का विषय बनकर मेधावी भरद्वाज ऋषि को अन्न दिया एवं मंत्रों से वृद्धि पाकर तुमने विष्पला की जंघा को तोड़ा. (११) कुह यान्ता सुष्टुतिं काव्यस्य दिवो नपाता वृषणा शयुत्रा. हिरण्यस्येव कलशं निखातमूदूथुर्दशमे अश्विनाहन्.. (१२) हे सूर्यपुत्र एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुम किस निवासस्थान में वर्तमान काव्य की शोभन स्तुति सुनने जाते हो? जिस प्रकार सोने से भरे एवं धरती में गड़े कलश को कोई जानकार ही निकालता है, उसी प्रकार तुमने कुएं में पड़े रेभ ऋषि को दसवें दिन बाहर निकाला था. (१२) युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः. युवो रथं दुहिता सूर्यस्य सह श्रिया नासत्यावृणीत.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने ओषधि दान के कार्य द्वारा वृद्ध च्यवन ऋषि को युवा बनाया. हे सत्य स्वभावो! सूर्य की पुत्री संपत्ति के साथ तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (१३) युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवैः पुनर्मन्यावभवतं युवाना. युवं भुज्युमर्णसो निः समुद्राद्विभिरूहथुऋञ्जेभिरश्वैः.. (१४) हे दुःखनिवारको! तुम जिस प्रकार प्राचीन समय में तुग्र के स्तुतिपात्र थे, उसी प्रकार बाद में भी स्तुतिपात्र रहे. तुम सेना के साथ डूबे हुए भुज्यु को अधिक जलयुक्त सागर में गमनशील नौकाओं एवं शीघ्रगति वाले अश्वों द्वारा ले आए थे. (१४) अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्हः समुद्रमव्यथिर्जगन्वान्. निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्वस्ति.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुग्र द्वारा समुद्र में भेजे गए एवं जल में डूबे हुए भुज्यु ने ebook converter DEMO Watermarks*
सरलतापूर्वक सागर के पार जाकर तुम्हारी स्तुति की थी. हे मनोवेगयुक्तो एवं कामवर्षको! तुम शोभन अश्वों वाले रथ द्वारा क्षेमपूर्वक भुज्यु को लाए थे. (१५) अजोहवीदश्विना वर्तिका वामास्नो यत्सीममुञ्चतं वृकस्य. वि जयुषा ययथुः सान्वद्रेर्जातं विष्वाचो अहतं विषेण.. (१६) हे अश्विनीकुमारो! वर्तिका ने उस समय तुम दोनों का आह्वान किया था, जिस समय तुमने वृक के मुख से उसे बचाया था. तुम अपने जयशील रथ द्वारा जाहुष को लेकर पर्वत की चोटियों पर चले गए थे एवं विष्वाच राक्षस के पुत्र को तुमने विष से मारा था. (१६) शतं मेषान्वृक्ये मामहानं तमः प्रणीतमशिवेन पित्रा. आक्षी ऋज्राश्वे अश्विनावधत्तं ज्योतिरन्धाय चक्रथुर्विचक्षे.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! वृकों के निमित्त सौ मेषों को समर्पित करने वाले एवं दुःखदायी पिता द्वारा अंधे बनाए गए ऋजाश्व को तुमने नेत्र दिए एवं उस अंधे को संसार देखने योग्य बनाया. (१७) शुनमन्धाय भरमह्वयत्सा वृकीरश्विना वृषणा नरेति. जारः कनीन इव चक्षदान ऋज्राश्वः शतमेकं च मेषान्.. (१८) हे नेताओ एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! दृष्टिहीन को पोषण का कारणभूत सुख देने की इच्छा से वृकी ने तुम्हें बुलाया था, क्योंकि ऋजाश्व ने उसी प्रकार एक सौ एक मेष के टुकड़े करके मुझे दिए हैं, जिस प्रकार यौवन प्राप्त कामुक किसी परस्त्री को बहुत सा धन देता है. (१८) मही वामूतिरश्विना मयोभूरूत स्रामं धिष्ण्या सं रिणीथः. अथा युवामिदह्वयत्पुरन्धिरागच्छतं सीं वृषणाववोभिः.. (१९) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा महान् रक्षाकार्य सुख का कारण है. हे स्तुतिपात्रो! तुमने व्याधित पुरुषों को स्वस्थ शरीर वाला बनाया था. बहुबुद्धिसंपन्ना घोषा ने रोग नाश के निमित्त तुम्हीं को बुलाया था. हे कामवर्षको! अपने रक्षणकार्य सहित यहां आओ. (१९) अधेनुं दस्रा स्तर्य१ं विषक्तामपिन्वतं शयवे अश्विना गाम्. युवं शचीभिर्विमदाय जायां न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषाम्.. (२०) हे दर्शनीयो! तुमने विशेषरूप से कृश अंगों वाली, निवृत्तप्रसवा एवं दुग्धहीना गाय को शंयु के निमित्त दुधारू बनाया था. तुमने अपने कर्मों द्वारा पुरुमित्र की कन्या को विमद ऋषि की पत्नी बनाया था. (२०) यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा. ebook converter DEMO Watermarks*
अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरायर्याय.. (२१) हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुमने विद्वान् मनु के लिए हल द्वारा जुते हुए खेत में जौ बोए, अन्न की हेतुभूत वर्षा की एवं भासमान वज्र द्वारा दस्युओं का नाश करके अपना माहात्म्य विस्तृत किया. (२१) आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम्. स वां मधु प्र वोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यदस्रावपिकक्ष्यं वाम्.. (२२) हे अश्विनीकुमारो! तुमने अथर्वा के पुत्र दधीचि के धड़ पर घोड़े का सिर लगाया था. उसने पूर्वकृत प्रतिज्ञा को सत्य बनाते हुए त्वष्टा से प्राप्त मधुविद्या तुम्हें बताई थी. हे दर्शनीयो! वही तुम लोगों से संबंधित प्रवर्ग्य नामक विद्या बनी. (२२) सदा कवी सुमतिमा चके वां विश्वा धियो अश्विना प्रावतं मे. अस्मे रयिं नासत्या बृहन्तमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथाम्.. (२३) हे क्रांतदर्शी अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी कल्याणकारिणी अनुग्रह बुद्धि की सदा प्रार्थना करता हूं. तुम मेरे सभी कर्मों की रक्षा करो. हे दर्शनीयो! हमें महान्, संतानयुक्त एवं प्रशंसनीय धन दो. (२३) हिरण्यहस्तमश्विना रराणा पुत्रं नरा वधिमत्या अदत्तम्. त्रिधा ह श्यावमश्विना विकस्तमुज्जीवस ऐरयतं सुदानू... (२४) हे दाता एवं नेता अश्विनीकुमारो! तुमने तीन भागों में विच्छिन्न श्याव को जीवन दिया है. (२४) एतानि वामश्विना वीर्याणि प्र पूर्व्याण्यायवोऽवोचन्. ब्रह्म कृण्वन्तो वृषणा युवभ्यां सुवीरासो विदथमा वदेम.. (२५) हे अश्विनीकुमारो! मेरे द्वारा कहे गए तुम्हारे इन वीर-कर्मों को प्राचीन लोगों ने कहा है. हे कामवर्षको! तुम्हारी स्तुति करते हुए हम शोभन वीरों से युक्त होकर यज्ञ के अभिमुख हों. (२५) सूक्त—११८ देवता—अश्विनीकुमार आ वां रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ्. यो मर्त्यस्य मनसो जवीयान्त्रिवन्धुरो वृषणा वातरंहाः.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा घोड़ों से चलने वाला सुखयुक्त एवं धनयुक्त रथ हमारे सामने आए. हे कामवर्षको! वह मानव मन के समान वेगवान् त्रिबंधुर एवं वायु के समान तीव्रगामी ebook converter DEMO Watermarks*
है. (१) त्रिवन्धुरेण त्रिवृता रथेन त्रिचक्रेण सुवृता यातमर्वाक्. पिन्वतं गा जिन्वत मर्वतो नो वर्धयतमश्विना वीरमस्मे.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने त्रिबंधुर, तीन पहियों वाले, तीन लोकों में चलने वाले एवं शोभन गति वाले रथ द्वारा हमारे समीप आओ. हमारी गायों को दुधारू, हमारे घोड़ों को प्रसन्न एवं हमारे पुत्रादि को वृद्धियुक्त करो. (२) प्रवद्यामना सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः. किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः.. (३) हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! अपने शीघ्रगामी एवं शोभन आकृति वाले रथ द्वारा आकर आदर करने वाले स्तोता की वाणी सुनो. क्या भूतकाल में उत्पन्न मेधावियों ने तुम्हें स्तोताओं की दरिद्रता मिटाने के लिए जाने वाला नहीं कहा था. (३) आ वां श्येनासो अश्विना वहन्तु रथे युक्तास आशवः पतङ्गाः. ये अप्तुरो दिव्यासो न गृध्रा अभि प्रयो नासत्या वहन्ति.. (४) हे अश्विनीकुमारो! रथ में जुड़े हुए सर्वत्र गतिशील, उछलने में समर्थ एवं प्रशंसनीय गमन वाले घोड़े तुम्हें लावें. हे सत्यस्वरूपो! जल के समान अथवा आकाशचारी गृध्र पक्षी के समान शीघ्र गति वाले घोड़े तुम्हें हव्य अन्न के सामने लाते हैं. (४) आ वां रथं युवतिस्तिष्ठदत्र जुष्ट्वी नरा दुहिता सूर्यस्य. परि वामश्वा वपुषः पतङ्गा वयो वहन्त्वरुषा अभीके.. (५) हे नेताओ! सूर्य की युवती कन्या प्रसन्न होकर तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. तुम्हारे सुंदर, उछलने में समर्थ, गतिशील एवं तेजस्वी घोड़े तुम्हें तुम्हारे घर के पास ले जावें. (५) उद्वन्दनमैरतं दंसनाभिरुद्रेभं दस्रा वृषणा शचीभिः. निष्टौग्र्यं पारयथः समुद्रात्पुनश्च्यवानं चक्रथुर्युवानम्.. (६) हे दर्शनीय एवं कामवर्षको! तुमने वंदन ऋषि को कुएं से निकाला था. तुग्र के पुत्र भुज्यु को सागर से पार किया तथा च्यवन ऋषि को दोबारा युवक बनाया. (६) युवमत्रयेऽवनीताय तप्तमूर्जमोमानमश्विनावधत्तम्. युवं कणवायापिरिप्ताय चक्षुः प्रत्यधत्तं सुष्टुतिं जुजुषाणा.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुमने शतद्वार पीड़ागृह में बंद अत्रि को बचाने के लिए अग्नि को बुझाया एवं उन्हें सुखकारी अन्न दिया. तुमने शोभन स्तुति स्वीकार करके अंधेरे में पड़े कण्व ebook converter DEMO Watermarks*
ऋषि को नेत्र दिए. (७) युवं धेनुं शयवे नाधितायापिन्वतमश्विना पूर्व्याय. अमुञ्चतं वर्तिकामंहसो निः प्रति जङ्घां विशपलाया अधत्तम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने प्राचीन याचक शंयु ऋषि के लिए गाय को दुधारू किया था. तुमने वर्तिका को पाप से बचाया एवं विशपला को दूसरी जंघा लगाई थी. (८) युवं श्वेतं पेदव इन्द्रजूतमहिहनमश्विनादत्तमश्वम्. जोहूत्रमर्यो अभिभूतिमुग्रं सहस्रसां वृषणं वीळ्वङ्गम्.. (९) हे अश्विनीकुमारो! तुमने राजा पेदु को श्वेत-वर्ण, इंद्रप्रदत्त, शत्रुहंता एवं संग्राम में शत्रुओं को ललकारने वाला, शत्रुपराभवकारी, उग्र, हजारों धन देने वाला, सेचन समर्थ एवं दृढांग घोड़ा दिया था. (९) ता वां नरा स्ववसे सुजाता हवामहे अश्विना नाधमानाः. आ न उप वसुमता रथेन गिरो जुषाणा सुविताय यातम्.. (१०) हे नेता एवं शोभनजन्म वाले अश्विनीकुमारो! धन की याचना करते हुए हम तुम्हें रक्षा के लिए बुलाते हैं. तुम हमारी स्तुतियों को स्वीकार करके हमें सुख देने के लिए अपने धनयुक्त रथ द्वारा हमारे सामने आओ. (१०) आ श्येनस्य जवसा नूतनेनास्मे यातं नासत्या सजोषाः. हवे हि वामश्विना रातहव्यः शश्वत्तमाया उषसो व्युष्टौ.. (११) हे सत्यस्वरूप अश्विनीकुमारो! तुम समान प्रीतयुक्त एवं प्रशंसनीय गति वाले घोड़े के नए वेग से युक्त होकर हमारे समीप आओ. हम तुम्हें देने योग्य हवि लेकर नित्य उषा के उदय काल में बुलाते हैं. (११) सूक्त—११९ देवता—अश्विनीकुमार आ वां रथं पुरुमायं मनोजुवं जीराश्वं यज्ञियं जीवसे हुवे. सहस्रकेतुं वनिनं शतद्वसुं श्रुष्टीवानं वरिवोधामभि प्रयः.. (१) हे अश्विनीकुमारो! मैं जीवन एवं अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हारे आश्चर्यपूर्ण, मन के समान शीघ्र चलने वाले, वेगशील अश्वों से युक्त, यज्ञों में बुलाने योग्य हजार झंडों वाले, उदकपूर्ण, सौ धनों सहित, शीघ्रगामी एवं धन देने वाले रथ का आह्वान करता हूं. (१) ऊर्ध्वा धीतिः प्रत्यस्य प्रयामन्धायि शस्मन्त्सम्यन्त आ दिशः. स्वदामि घर्मं प्रति यन्त्यूतय आ वामूर्जानी रथमश्विनारुहत्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
उस रथ के चलते ही अश्विनीकुमारों की स्तुति में हमारी बुद्धि ऊर्ध्वमुखी हो जाती है. हमारी स्तुतियां उनके पास पहुंचती हैं. हम हव्य को स्वादपूर्ण बनाते हैं. रक्षक आते हैं. हे अश्विनीकुमारो! ऊर्जांनी नाम की सूर्यपुत्री तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (२) सं यन्मिथः पस्पृधानासो अग्मन् शुभे मखा अमिता जायवो रणे. युवोरह प्रवणे चेकिते रथो यदश्विना वहथः सूरिमा वरम्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ करने वाले अगणित जयशील मनुष्य संग्राम में शोभन धनप्राप्ति के लिए स्पर्धा करते हुए जब मिलते हैं, तभी उत्तम धरती पर तुम्हारा रथ दिखाई देता है. तुम उसी रथ पर स्तोता के लिए धन लाते हो. (३) युवं भुज्युं भुरमाणं विभिर्गतं स्वयुक्तिभिर्निर्वहन्ता पितृभ्य आ. यासिष्टं वर्तिर्वृषणा विजेन्यं१ दिवोदासाय महि चेति वामवः.. (४) हे कामवर्षको! तुमने घोड़ों द्वारा लाए हुए एवं सागर में डूबे हुए भुज्यु को अपने स्वयं युक्त घोड़ों द्वारा लाकर उनके पिता के समीप, दूरस्थ घर में पहुंचा दिया था. तुमने दिवोदास की जो महती रक्षा की थी, उसे हम जानते हैं. (४) युवोरश्विना वपुषे युवायुजं रथं वाणी येमतुरस्य शर्ध्यम्. आ वां पतित्वं सख्याय जग्मुषी योषावृणीत जेन्य युवां पती.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे प्रशंसनीय अश्व तुम्हारे जुड़े हुए रथ को दौड़ की सीमा, सूर्य तक सबसे पहले ले गए थे. जीती हुई कुमारी ने मित्रता के लिए आकर कहा था कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं और तुम्हें अपना पति बना लिया. (५) युवं रेभं परिषूतेरुरुष्यथो हिमेन घर्मं परितप्तमत्रये. युवं शयोरवसं पिप्यथुर्गवि प्र दीर्घेण वन्दनस्तार्यायुषा.. (६) तुमने रथ को चारों ओर के उपद्रव से बचाया, अत्रि ऋषि को जलाने के लिए असुरों द्वारा लगाई हुई आग शीतल जल से बुझाई, शंयु की गाय को दुधारू बनाया एवं वंदन ऋषि को दीर्घ आयु दी. (६) युवं वन्दनं निर्ऋतं जरण्यया रथं न दस्रा करणा समिन्वथः. क्षेत्रादा विप्रं जनथो विपन्यया प्र वामत्र विधते दंसना भुवत्.. (७) हे कुशल अश्विनीकुमारो! जैसे शिल्पी पुराने रथ को नया कर देता है, उसी प्रकार तुमने बुढ़ापे से ग्रस्त वंदन ऋषि को दोबारा युवा बना दिया था. गर्भस्थ कामदेव की स्तुति से प्रसन्न होकर तुमने उस मेधावी को माता के उदर से बाहर निकाला. तुम्हारा वही रक्षाकर्म सेवा करने वाले यजमान को प्राप्त हो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
अगच्छतं कृपमाणं परावति पितुः स्वस्य त्यजसा निबाधितम्. स्वर्वतीरित ऊतीर्युवोरह चित्रा अभीके अभवन्नभीष्टयः.. (८) तुम दूर देश में अपने पिता द्वारा त्यक्त होकर दुःख उठाते एवं प्रार्थना करते हुए भुज्यु के पास गए. तुम्हारी शोभन गति एवं विचित्र रक्षा को सब लोग समीप पाना चाहते हैं. (८) उत स्या वां मधुमन्मक्षिकारपन्मदे. सोमस्यौशिजो हुवन्त्यति. युवं दधीचो मन आ विवासथोऽथा शिरः प्रति वामश्व्यं वदत्.. (९) मधुमक्षिका ने तुम्हारी मधुयुक्त स्तुति की. मैं उशिज का पुत्र कक्षीवान् तुम्हें सोमरसपान से आनंदित होने के लिए बुलाता हूं. तुमने दधीचि का मन सेवा से प्रसन्न किया था. उसके अश्वशिर ने तुम्हें मधुविद्या का उपदेश किया. (९) युवं पेदवे पुरुवारमश्विना स्पृधां श्वेतं तरुतारं दुवस्यथः. शर्येरभिद्युं पृतनासु दुष्टरं चर्कृत्यमिन्द्रमिव चर्षणीसहम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! तुमने पेदु को अनेक जनों द्वारा वांछित युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाला, दीप्तिसंपन्न, समस्त कामों में बार-बार लगाने योग्य एवं इंद्र के समान शत्रुपराभवकारी सफेद घोड़ा दिया था. (१०) सूक्त—१२० देवता—अश्विनीकुमार का राधद्धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयोः. कथा विधात्यप्रचेताः.. (१) हे अश्विनीकुमारो! कौन सी स्तुति तुम्हें प्रसन्न बना सकती है? तुम्हें प्रसन्न करने में कौन सा होता समर्थ है? तुम्हारे महत्त्व को न जानने वाला तुम्हारी सेवा कैसे कर सकता है. (१) विद्वांसाविद्दुरः पृच्छेद्विद्वानित्थापरो अचेताः. नू चिन्नु मर्ते अक्रौ.. (२) अज्ञ स्तोता इसी प्रकार तुम सर्वज्ञों की सेवा रूपी मार्ग को जानना चाहता है. उनके अतिरिक्त सब ज्ञानहीन हैं. शत्रु द्वारा आक्रमणरहित वे शीघ्र ही स्तोता पर अनुग्रह करते हैं. (२) ता विद्वांसा हवामहे वां ता नो विद्वांसा मन्म वोचेतमद्य. प्रार्छद्यमानो युवाकुः.. (३) तुम सर्वज्ञों को हम बुलाते हैं. हे अभिज्ञो! तुम आज हमें ज्ञातव्य स्तोत्र बताओ. तुम्हारी कामना करता हुआ मैं तुमको हव्य देकर भली-भांति स्तुति करता हूं. (३) वि पृच्छामि पाक्या३ न देवान्वषट्कृतस्याद्भुतस्य दस्रा.
पातं च सह्यसो युवं च रभ्यसो नः.. (४) हे दर्शनीयो! मैं तुम्हीं से पूछना चाहता हूं, अन्य पक्व-बुद्धि देवों से नहीं. तुम वषट्कार के साथ अग्नि में डाले गए सोमरस को पिओ एवं प्रौढ़ बनाओ. (४) प्र या घोषे भृगवाणे न शोभे यया वाचा यजति पज्रियो वाम्. प्रैष्युर्न विद्वान्.. (५) घोषापुत्र सुहस्त्य एवं ऋषि जिस स्तुति से सुशोभित हुए थे, अन्न की इच्छा करता हुआ पज्रिवंशी मैं कक्षीवान् उसी स्तुति से तुम्हारी प्रशंसा करके सफल बनूं. (५) श्रुतं गायत्रं तकवानस्याहं चिद्धि रिरेभाश्विना वाम्. आक्षी शुभस्पति दन्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! अटक-अटक कर चलते हुए अंधे ऋषि ऋजाश्व की स्तुति सुनो. हे शोभन पालको! उसने भी मेरे ही समान स्तुति करके आंखें पाई थीं. (६) युवं ह्यस्तं महो रन्युवं वा यन्न्निरतंतसतम्. ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं नो वृकादघायोः.. (७) हे गृहदाताओ! महान् धन के दाता एवं नाशक तुम हमारे रक्षक बनो एवं हमें पापी वृक से बचाओ. (७) मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणो नो माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः. स्तनाभुजो अशिश्वीः.. (८) हमें किसी शत्रु के सामने उपस्थित मत करो. हमारे घरों की दुधारू गाएं बछड़ों से बिछड़ कर किसी अगम्य स्थान में न जाएं. (८) दुहीयन्मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै. इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै.. (९) तुम्हारी कामना से स्तुति करने वाला बंधुओं का पोषण करने के लिए धन पाता है. हमें बलयुक्त एवं गायों सहित अन्न दो. (९) अश्विनोरसनं रथमनश्वं वाजिनीवतोः. तेनाहं भूरि चाकन.. (१०) मैंने अन्नदाता अश्विनीकुमारों का अश्वरहित रथ पाया है. मैं उससे विपुल धन की कामना करता हूं. (१०) अयं समह मा तनूह्याते जनाँ अनु. सोमपेयं सुखो रथः.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२१ देवता—इंद्र
हे धन सहित रथ! मेरा वंश विस्तार करो. अश्विनीकुमार उस सुखकारी रथ को स्तोताओं के सोमपान वाले स्थान पर ले जाते हैं. (११) अध स्वप्रस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवतः. उभा ता बस्नि नश्यतः.. (१२) मैं प्रातःकाल के स्वप्न एवं दूसरों को रक्षा न करने वाले धनी से घृणा करता हूं. ये दोनों शीघ्र नष्ट हो जाते हैं. (१२) सूक्त—१२१ देवता—इंद्र कदित्था नूँः पात्रं देवयतां श्रवद्गिरो अङ्गिरसां तुरण्यन्. प्र यदानड्दिश आ हर्म्यस्योरु क्रंसते अध्वरे यजत्रः.. (१) स्तोताओं के पालक एवं गोरूप धन के देने वाले इंद्र अपने भक्त अंगिरा की स्तुति कब सुनेंगे? वे जब गृहस्वामी यजमान के ऋत्विजों को सामने देखते हैं, तभी यज्ञपात्र बनकर यज्ञ में स्वयं आ जाते हैं. (१) स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं पुषायद्भुर्वजाय द्रविणं नरो गोः. अनु स्वजां महिषश्चक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गोः.. (२) उसने आकाश को धारण किया, असुरों द्वारा चुराई गई गायों को निकाला एवं परम भासमान होकर प्राणियों द्वारा सेवित एवं अन्न का कारण वर्षाजल बिखेरा. वह महान् अपनी पुत्री उषा के पश्चात् उदय होता है. उसने घोड़ी को गाय की माता बनाया. (२) नक्षद्धवमरुणीः पूर्व्यं राट् तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून्. तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद् द्यां चतुष्पदे नर्य्याय द्विपादे.. (३) अरुण वर्ण की उषा को रंजित करने वाले वे पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा निर्मित स्तोत्र सुनें. वे अंगिरागोत्रीय ऋषियों को प्रतिदिन धनदाता, वज्र को तीखा करने वाले एवं मानवों के हितार्थ द्विपाद एवं चतुष्पाद की रक्षा करते तथा आकाश को धारण करते हैं. (३) अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्. यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप दृहो मानुषस्य दुरो वः.. (४) तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर पणियों द्वारा चुराई हुई गायों का यज्ञ के लिए प्रशंसनीय दान दिया था. तीनों लोकों में उत्तम इंद्र जब युद्ध में संलग्न थे, तब वे मानवद्रोही असुरों का द्वार गायों के निकलने के लिए खोल देते थे. (४) तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू. शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे क्षिप्रकारी इंद्र! तुम्हारे लिए जगत् के माता-पिता, धरती और आकाश ने बलवर्धक, वीर्यसंपन्न एवं धनयुक्त दुधारू गायों का दूध जिस समय अग्नि में अर्पित किया, तभी तुमने पणियों का द्वार खोल दिया था. (५) अध प्र जज्ञे तरणिर्ममत्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूरः. इन्दुर्यैभिर्राष्ट स्वेदुहव्यैः सुवेण सिञ्चञ्जजरणाभि धाम.. (६) उषा के समीपवर्ती सूर्य के समान चमकते हुए शत्रुविजयी इंद्र इस समय प्रकट हुए हैं. वे हमें प्रसन्न बनावें. हम भी स्तुतिपात्र सोमरस को स्रुच से यज्ञस्थल में छिड़कते हुए पीते हैं. (६) स्विध्मा यद्धनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गोः. यद्ध प्रभासि कृत्व्याँ अनु द्यूननर्विशे पश्विषे तुराय.. (७) प्रकाशयुक्त मेघमाला जिस समय अपना कर्म करने को तत्पर होती है, उस समय प्रेरक इंद्र यज्ञ के निमित्त वर्षा का आवरण दूर करते हैं. हे इंद्र! तुम जब कार्य योग्य दिवसों को प्रकाशित करते हो, तब गाड़ी वाले एवं चरवाहे अपने काम में शीघ्र सफल होते हैं. (७) अष्टा महो दिव आदो हरी इह द्युम्नासाहमभि योधन उत्सम्. हरिं यत्ते मन्दिनं दुक्षन्व्धे गोरभसमद्रिभिर्वाताप्यम्.. (८) जब ऋत्विज् तुम्हारी बुद्धि के लिए मनोहर, मादक, बलकारी, एवं उपभोग योग्य सोमरस को पत्थरों की सहायता से निचोड़ें, तब तुम अपने हर्षदाता एवं सोमरस का भोग करने वाले दोनों घोड़ों को इस यज्ञ में सोम पिलाओ एवं हमारे धन का अपहरण करने वाले शत्रुओं को हराओ. (८) त्वमायसं प्रति वर्तयो गोर्दिवो अश्मानमुपनीतमृभ्वा. कुत्साय यत्र पुरुहूत वन्वञ्छुष्णमनन्तैः परियासि वधैः.. (९) हे इंद्र! तुमने आकाश से ऋभु द्वारा लाए गए, शत्रु के प्रति शीघ्र जाने वाले लौहमय वज्र को गमनशील शुष्ण असुर की ओर फेंका था. हे पुरुहूत! उस समय तुमने कुत्स ऋषि के कल्याण के लिए शुष्ण को अनेकविध हनन साधनों से हिंसा करते हुए छेड़ा था. (९) पुरा यत्सूरस्तमसो अपीतेस्तमद्रिवः फलिगं हेतिमस्य. शुष्णस्य चित्परिहितं यदोजो दिवस्परि सुग्रथितं तदादः.. (१०) हे वज्रधारक! प्राचीन काल में जब सूर्य अंधकार के साथ हुए संग्राम से निवृत्त हुए, उस समय तुमने मेघ का विनाश किया. सूर्य को आच्छादित करने एवं सूर्य में संलग्न होने वाले शुष्ण के बल को तुमने समाप्त कर दिया था. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन्. त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहम्.. (११) हे इंद्र! विशाल शक्तिसंपन्न एवं सर्वत्र व्यापक धरती और आकाश ने तुम्हें वृत्रवध के पश्चात् प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने सर्वत्र वर्तमान एवं शोभन आहार वाले वृत्र असुर को महान् वज्र से मारकर पानी में गिरा दिया. (११) त्वमिन्द्र नर्यो याँ अवो नॄन्तिष्ठा वातस्य सुयुजो वहिष्ठान्. यं ते काव्य उशना मन्दिनं दाद्वृत्रहणं पार्यं ततक्ष वज्रम्.. (१२) हे मानव हितकारी इंद्र! तुम जिन अश्वों की रक्षा करते हो, उन वायु तुल्य शीघ्रगामी एवं शोभन रथ में जुते हुए अश्वों पर आरोहण करो. कविपुत्र उशना द्वारा प्रदत्त मदकारक वज्र को तुमने वृत्रघातक एवं शत्रु अतिक्रमणकारी के रूप में तेज किया है. (१२) त्वं सूरो हरितो रामयो नॄन्भरच्चक्रमेतशो नायमिन्द्र. प्रास्य पारं नवतिं नाव्यानामपि कर्तमवर्तयोऽयज्यून्.. (१३) हे इंद्र! सूर्य रूप में अपने हरि नामक घोड़ों को रोको. एतश नाम का घोड़ा तुम्हारे रथ का पहिया आगे चलाता है. तुम नाव द्वारा पार होने योग्य नब्बे नदियों के पार जाकर यज्ञविहीन असुरों के पास पहुंचो एवं उन्हें कर्त्तव्य में लगाओ. (१३) त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवो दुरितादभीके. प्र नो वाजान्रथ्यो३ अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै.. (१४) हे वज्रधारणकर्त्ता! इस शक्तिशाली दरिद्रता से हमारी रक्षा करो, समीपवर्ती संग्राम में हमें पाप से बचाओ तथा कीर्ति एवं सत्यभाषण के निमित्त रथ एवं अश्वयुक्त धन प्रदान करो. (१४) मा सा ते अस्मत्सुमतिर्वि दसद्वाजप्रमहः समिषो वरन्त. आ नो भज मघवन्गोष्त्वर्यो मंहिष्ठास्ते सधमादः स्याम.. (१५) हे संपत्तियों के कारण पूजनीय इंद्र! तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि हमसे अलग न हो. हे मघवन्! तुम धन के स्वामी हो, हमें गाय प्राप्त कराओ. तुम्हारी विशाल स्तुतियों से वृद्धि प्राप्त करने वाले पुत्र-पौत्रादि के साथ आनंदित हों. (१५) सूक्त—१२२ देवता—विश्वेदेव प्र वः पान्तं रघुमन्यवोऽन्धो यज्ञं रुद्राय मीळहुषे भरध्वम्. दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे क्रोधहीन ऋत्विजो! तुम कर्मों का फल देने वाले रुद्र को पालक एवं यज्ञसाधन अन्न अधिक मात्रा में दो. मैं स्वर्ग के देव रुद्र तथा उनके अनुचरों एवं आकाश और धरती के बीच निवास करने वाले मरुद्गण की स्तुति करता हूं. रुद्र अपने वीरों अर्थात् मरुतों की सहायता से शत्रुओं को उसी प्रकार भगा देते हैं, जैसे तूणीर में रहने वाले बाणों द्वारा शत्रु को भगाया जाता है. (१) पत्नीव पूर्वहूतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने. स्तरीनार्कं व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यैः.. (२) जिस प्रकार पत्नी पति की पहली पुकार सुनकर शीघ्र दौड़ती आती है, उसी प्रकार दिवस एवं रात्रि नामक देवता अनेक प्रकार की स्तुतियों से ज्ञायमान होकर हमारे पहले आह्वान पर शीघ्र आवें. उषादेवी शत्रुनाशक सूर्य के समान सुनहरी किरणों से युक्त होकर एवं महान् रूप धारण करके आवें. उषा सूर्य की शोभा को धारण करे. (२) ममत्तु नः परिज्मा वसर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान्. शिशीतमन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः.. (३) निवास के योग्य एवं सर्वत्र गतिशील सूर्य हमें प्रसन्न करें. जल बरसाने वाला वायु हमें प्रमुदित करे. इंद्र एवं मेघ हमारी वृद्धि करें. इस प्रकार विश्वेदेव हमें पर्याप्त अन्न प्रदान करें. (३) उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै. प्र वो नपातमपां कृणुध्वं प्र मातरा रास्पिनस्यायोः.. (४) हे ऋत्विजो! उषिज के पुत्र मुझ कक्षीवान् के कल्याण के लिए यज्ञीय अन्न के भक्षक, सोमपानकर्ता एवं स्तुति के योग्य अश्विनीकुमारों को विश्वप्रकाशक उषाकाल में बुलाओ. तुम जल के नाती अग्नि की स्तुति करो. मुझ जैसे व्यक्तियों की मातृतुल्य अहोरात्र देवताओं की भी स्तुति करो. (४) आ वो रुवण्युमौशिजो हुवध्यै घोषेव शंसमर्जुनस्य नंशे. प्र वः पूष्णे दावन आँ अच्छा वोचेय वसुतातिमग्नेः.. (५) हे देवगण! उषिज का पुत्र मैं कक्षीवान् आपको बुलाने के लिए आपके अनुकूल स्तोत्र का पाठ करता हूं. हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार ब्रह्मवादिनी महिला घोषा ने अपने श्वेत कुष्ठ रोग के विनाश के लिए तुम्हारी स्तुति की थी, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं फल देने वाले पूषा एवं धन देने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (५) श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वतः सीम्. श्रोतु नः श्रोतुरातिः सुश्रोतुः सुक्षेत्रा सिन्धुरद्भिः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मित्र और वरुण! मेरे आह्वान के साथ-साथ यज्ञमंडप में वर्तमान अन्य लोगों का भी आह्वान सुनो. हमारे आह्वान को भली प्रकार सुनने वाले जलदेवता सिंधु हमारे फसलों वाले खेतों को जल से सींचते हुए हमारी स्तुति सुनें. (६) स्तुषे सा वां वरुण मित्र रातिर्गवां शता पृक्षयामेषु पज्रे. श्रुतरथे प्रियरथे दधानाः सद्यः पुष्टिं निरुन्धानासो अग्मन्.. (७) हे मित्र और वरुण! मैं अन्न का नियमन करने वाले स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति करता हूं. इसलिए मुझ कक्षीवान् को तुम अनगिनत गाएं दो. तुम लोग प्रसिद्ध एवं सुंदर रथ पर बैठकर एवं मुझ कक्षीवान् के प्रति प्रसन्न होकर आओ एवं मेरी पुष्टि को स्थायी करो. (७) अस्य स्तुषे महिमघस्य राधः सचा सनेम नहुषः सुवीराः. जनो यः पज्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो मह्यं सूरिः.. (८) मैं पवित्र धन वाले देवसमूह के धन की स्तुति करता हूं. वे कक्षीवान् के प्रिय व्यक्ति हैं. हम पुत्र-पौत्रादि के साथ मिलकर प्रेम से इस धन का उपभोग करें, मैं अंगिरा गोत्र वाले कक्षीवान् को प्रसन्नतापूर्वक अन्न, घोड़े और रथ देने वाले देवसमूह की स्तुति करता हूं. (८) जनो यो मित्रावरुणावभिध्रुगपो न वां सुनोत्यक्षणयाध्रुक्. स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिर्ऋतावा.. (९) हे मित्र और वरुण! जो व्यक्ति तुम्हारा यज्ञ न करके द्रोह करता है अथवा तुम्हारे निमित्त सोमरस न निचोड़कर तुमसे शत्रुता बढ़ाता है, वह मूर्ख मनुष्य अपने आप ही अपने हृदय में यक्ष्मा रोग को धारण करता है. जो व्यक्ति यज्ञ करने वाला है एवं स्तुतिपाठ करता हुआ सोमरस निचोड़ता है, वह कुशल अश्व प्राप्त करता है. (९) स व्राधतो नहुषो दंसुजूतः शर्धस्तरो नरां गूर्तश्रवाः. विसृष्टरातिर्याति बाळ्हसृत्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूरः.. (१०) वह कुशल अश्व प्राप्त करता है, मनुष्यों को हराने वाला तथा अपने समान लोगों में अन्न के लिए प्रसिद्ध होता है. अतिथियों का धन से स्वागत करने वाला ऐसा व्यक्ति हिंसक शत्रुओं से सदा निडर होकर सभी प्रकार के युद्धों में जाता है. (१०) अध ग्मन्ता नहुषो हवं सुरेः श्रोता राजानो अमृतस्य मन्द्राः. नभोजुवो यन्निरवस्य राधः प्रशस्तये महिना रथवते.. (११) हे सर्वेश्वर एवं आनंददाता देवगण! मुझ स्तुतिकर्त्ता एवं मरणशील व्यक्ति की स्तुति सुनो और इस यज्ञ में पधारो. हे आकाशव्यापी देवो! तुम ऐसे यजमान को महान् बनाने वाले हव्य की प्रशंसा करना चाहते हो, जिसका रक्षक तुम्हारे अतिरिक्त कोई न हो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
एतं शर्धं धाम यस्य सूरेरित्यवोचन्दशतयस्य नंशे. द्युम्नानि येषु वसुताती रारन्विश्वे सन्वन्तु प्रभृथेषु वाजम्.. (१२) जिन देवों ने यह कहा कि हमने उस यजमान को विजय का साधन बल प्रदान किया, जिसके दस इंद्रियपोषक सोम को ग्रहण करने के लिए हम आए हैं, ऐसे देवों का प्रकाशवान् अन्न एवं विस्तृत धन अत्यंत शोभा पाता है. समस्त देव उत्तम यज्ञों में हमें अन्न प्रदान करें. (१२) मन्दामहे दशतयस्य धासेर्द्धिर्यतपञ्च बिभ्रतो यन्त्यन्ना. किमिष्टाश्व इष्टरश्मिरेत ईशानासस्तरुष ऋञ्जते नॄन्.. (१३) जब-जब हम विश्वदेवों की स्तुति करते हैं, तब-तब ऋत्विज् दस प्रकार की इंद्रियों को पुष्ट करने वाले दस प्रकार के अन्नों को धारण करके यज्ञ मंडप की ओर चलते हैं. इष्टाश्व एवं इष्टरश्मि नाम के राजा शत्रुनाशक एवं नेता-रूप वरुण आदि देवताओं को बिलकुल प्रसन्न नहीं कर सकते. (१३) हिरण्यकर्णं मणिग्रीवमर्णस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवा:. अर्यो गिर: सद्य आ जग्मुषीरोसाश्चाकन्तूभयेष्वस्मे.. (१४) समस्त देव हमें ऐसे सुंदर पुत्र दें जो कानों में स्वर्णाभूषण एवं ग्रीवा में रत्नमाला धारण करते हों. समस्त आदरणीय देवों का समूह हमारे आने के तुरंत बाद ही स्तुतियों एवं हव्य की अभिलाषा करे. (१४) चत्वारो मा मशर्शारस्य शिश्वस्त्रयो राज्ञ आयवसस्य जिष्णो:. रथो वां मित्रावरुणा दीर्घाप्सा: स्यूमगभस्ति: सूरो नाद्यौत्.. (१५) मशशरि राजा के चार एवं जयशील अयवस राजा के तीन पुत्र मुझ कक्षीवान् को कष्ट पहुंचाते हैं. हे मित्र और वरुण! तुम्हारा अत्यंत विस्तृत एवं सुखकर प्रकाश वाला रथ सूर्य के समान चमकता है. (१५) सूक्त—१२३ देवता—उषा पृथू रथो दक्षिणाया अयोज्यैनं देवासो अमृतासो अस्थु:. कृष्णा दुदस्थादर्या३ विहायाश्चिकित्सन्ती मानुषाय क्षयाय.. (१) अपने व्यापार में कुशल उषा देवी के रथ में घोड़े जोड़े गए. उस रथ में मरणरहित देवसमूह यज्ञ में जाने के लिए बैठ गया. पूजा के योग्य एवं विविध गमन वाली उषा काले रंग के अंधकार से उत्पन्न होती है एवं अंधकार निवारण रूपी चिकित्सा करती हुई मानवों के निवासस्थान की ओर आती है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
पूर्वा विश्वस्माद्भुवनादबोधि जयन्ती वाजं बृहती सनुत्री. उच्चा व्यख्यद्युवतिः पुनर्भूरोषा अगन्प्रथमा पूर्वहूतौ.. (२) गमनशील प्रकाश द्वारा अंधकार पर विजय प्राप्त करने वाली, महती एवं विश्व को सुख देने वाली उषा समस्त प्राणियों से पहले जागती है. वह नित्य यौवना उषा पुनः पुनः उत्पन्न होती है. सारे संसार को देखती हुई वह हमारे एक बार बुलाने पर ही आ जाती है. (२) यदद्य भागं विभजासि नृभ्य उषो देवि मर्त्यत्रा सुजाते. देवो नो अत्र सविता दमूना अनागसो वोचति सूर्याय.. (३) हे सुजाता एवं मानवपालिका उषादेवी! तुम इस समय मनुष्यों के लिए अपने प्रकाश का जो अंश देती हो, उसीको हमें सविता देव प्रदान करें तथा हमारे यज्ञस्थल में सूर्य के आगमन के निमित्त हमें पापरहित कहकर अनुगृहीत करें. (३) गृहङ्गहमहना यात्यच्छा दिवेदिवे अधि नामा दधाना. सिषासन्ती द्योतना शश्वदागादग्रमग्रमिद्भजते वसूनाम्.. (४) भोग की इच्छा से युक्त एवं सारे संसार को प्रकाशित करती हुई उषा प्रतिदिन नम्र भाव से प्रत्येक घर की ओर आती है एवं हवि-रूप धन का श्रेष्ठ भाग स्वीकार कर लेती है. (४) भगस्य स्वसा वरुणस्य जामिरुषः सूनृते प्रथमा जरस्व. पश्चा स दघ्या यो अघस्य धाता जयेम तं दक्षिणया रथेन.. (५) हे उषा! तुम मनुष्यों की शोभन नेत्री हो. तुम आदित्य की स्वसा एवं अंधकार निवारक सविता की भगिनी तथा अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो. समस्त देव तुम्हारी स्तुति करें. तुम्हारी प्रसन्नता के पश्चात् जो दुःख देने वाला आएगा, हम तुम्हारी सहायता प्राप्त करके उसे अपने रथ आदि साधन से जीत लेंगे. (५) उदीरतां सूनृता उत्पुरन्धीरुरुद्ग्नयः शुशुचानासो अस्थुः. स्पार्हा वसूनि तमसापगूळ्हाविष्कृणवन्त्युषसो विभातीः.. (६) हे ऋत्विजो! प्रिय एवं सच्ची बातें स्तुति रूप में कहो, बुद्धि का प्रमाण देने वाले यज्ञकर्म करो तथा दीप्तिशाली अग्नि प्रज्वलित करो. ऐसा करने से विविध प्रकाश वाली उषा अंधकार से ढके हुए एवं यज्ञसाधन धनों को प्रकट करती है. (६) अपान्यदेत्यभ्य१न्येदेति विषुरूपे अहनी सं चरेते. परिक्षितोस्तमो अन्या गुहाकरद्यौदुषाः शोशुचता रथेन.. (७) नाना रूपवान् अहोरात्र—दोनों देवता व्यवधान रहित होकर चलते हैं. वे एक-दूसरे के विरुद्ध गति वाले हैं. एक आता है तो दूसरा जाता है. बारीबारी से आने वाले इन देवताओं में ebook converter DEMO Watermarks*
एक पदार्थों को छिपाते हैं और दूसरे अपने अत्यंत प्रकाशवान् रथ के द्वारा उन्हें प्रकाशित करते हैं. (७) सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम. अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः.. (८) उषा आज जितनी सुंदर है, उसी के समान कल भी सुंदर होगी. सूर्य जहां रहता है, उषा प्रतिदिन उससे तीस योजन आगे रहती है. एक ही उषा सूर्य के उदयकाल में आने और जाने का—दोनों कार्य करती है. (८) जानत्यह्नः प्रथमस्य नाम शुक्ला कृष्णादजनिष्ट श्वितीची. ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती.. (९) दीप्त एवं श्वेत वर्ण वाली तथा काले रंग के अंधकार से उत्पन्न होने वाली उषा दिन के पहले अंश को जानती है. उत्पन्न होने पर उषा सूर्य के तेज में मिल जाती है. उसके तेज का पराभव नहीं करती, अपितु प्रतिदिन उसकी शोभा बढ़ाती है. (९) कन्येव तन्वा३ शाशदानाँ एषि देवि देवमियक्षमाणम्. संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादाविर्वक्षांसि कृणुषे विभाती.. (१०) हे उषादेवी! तुम कन्या के समान अपने अंगों को स्पष्ट करती हुई दानशील एवं प्रकाशयुक्त सूर्य रूपी प्रिय के समीप आओ. तुम युवती के समान अत्यंत प्रकाशयुक्त होती हुई तथा हंसती हुई सूर्य के सामने अपने गोपनीय अंगों को वस्त्ररहित करो. (१०) सुसङ्काशा मातृमृष्टेव योषाविस्तन्वं कृणुषे दृशे कम्. भद्रा त्वमुषो वितरं व्युच्छ न तत्ते अन्या उषसो नशन्त.. (११) जिस प्रकार माता द्वारा स्नान आदि से शुद्ध किए जाने पर कन्या का रूप दर्शनीय हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी सबको दिखाने के लिए अपना शरीर प्रकाशित करो. हे कल्याण करने वाली उषा! अंधकार मिटाओ. अन्य उषाएं तुम्हारे कार्य व्याप्त नहीं करेंगी. (११) अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा यतमाना रश्मिभिः सूर्यस्य. परा च यन्ति पुनरा च यन्ति भद्रा नाम वहमाना उषासः.. (१२) उषा देवियां अश्वों एवं गायों से संपन्न एवं सभी कालों में रहने वाली हैं. वे सूर्य की किरणों के साथ नित्य ही अंधकार का नाश करने का प्रयत्न करती हैं. वे सबके अनुकूल होने के कारण कल्याणकर नाम धारण करके आती-जाती हैं. (१२) ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं ऋतुमस्मासु धेहि. उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मायु रायो मघवत्सु च स्युः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—१२४ देवता—उषा
हे उषा! तुम सूर्य की किरणों के अनुकूल चलती हुई हमें ऐसी बुद्धि दो, जिससे हम यज्ञ आदि कर्मों के द्वारा अपना कल्याण कर सकें. हमारे द्वारा आहूत होकर तुम अंधकार का नाश करो. हविरूप धन से युक्त हम यजमानों के पास अनेक प्रकार की संपत्ति हो. (१३) सूक्त—१२४ देवता—उषा उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्यन्त्सूर्य उर्विया ज्योतिरश्रेत्. देवो नो अत्र सविता न्वर्थं प्रासावीद् द्विपत्प्र चतुष्पदित्यै.. (१) यह उषा प्रातःकाल अग्नि के प्रज्वलित होने पर अंधकार को हटाती है एवं उदित होते हुए सूर्य के समान प्रभूत प्रकाश फैलाती है. सविता देव हमारे गमन-आगमन व्यवहार के लिए मनुष्य और पशुरूप धन देते हैं. (१) अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिनती मनुष्या युगानि. ईयुषीणामुपमा शश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत्.. (२) उषा देव संबंधी व्रतों में बाधा नहीं डालती तथा मनुष्यों का वियोग करती है. यह भूतकाल में होने वाली तथा सदा आने वाली उषाओं के तुल्य है. यह भविष्य में आने वाली उषाओं में प्रथमा बनकर विशेष प्रकाश दे रही है. (२) एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात्. ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति.. (३) यह उषा स्वर्ग की पुत्री है. इसलिए यह प्रकाश रूपी वस्त्र को धारण करती हुई पूर्व दिशा में भली-भांति चलती हुई सभी के सामने प्रकाशित होती है. उषा अपने प्रिय सूर्य का अभिप्राय जानती हुई भी उसके मार्ग पर आगे-आगे चलती है एवं पूर्वादि दिशाओं को कभी समाप्त नहीं करती. (३) उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि. अद्मसन्न ससतो बोधयन्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम्.. (४) जिस प्रकार सूर्य अपना रश्मिसमूह रूपी वक्षस्थल प्रकट करते हैं एवं नोधा ऋषि ने जिस प्रकार अपने प्रिय मंत्रसमूह को प्रकट किया था, उसी प्रकार उषा भी स्वयं को सबके समीप प्रकट करती है. उषा गृहिणी के समान सबसे पहले जागकर शेष लोगों को जगाती है एवं प्रातःकाल आने वाली वारवनिताओं में सर्वाधिक सुंदर है. (४) पूर्वे अर्धे रजसो अप्तसस्य गवां जनित्र्यकृत प्र केतुम्. व्यु प्रथते वितरं वरीय ओभा पृणन्ती पित्रोरुपस्था.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
उषा विस्तृत आकाश के पूर्व भाग में जन्म लेकर दिशाओं का ज्ञान कराती है. धरती और आकाश उसके पिता हैं. उषा इन दोनों के मध्य में स्थित होकर अपने तेज से अत्यंत विस्तीर्ण रूप से प्रसिद्ध हुई है. (५) एवेदेषा पुरुतमा दृशे कं नाजामिं न परि वृणक्ति जामिम्. अरेपसा तन्वा३ शाशदाना नार्भादीषते न महो विभाती.. (६) इस प्रकार विस्तार को प्राप्त हुई उषा अपने जाति वाले देवों और विजातीय मानवों सभी को प्राप्त होती है, जिससे वे सुखपूर्वक देख सकें. अपने निर्मल शरीर के कारण स्पष्ट होती हुई उषा छोटे बड़े किसी के पास से नहीं हटती. (६) अभ्रातेव पुसं एति प्रतीची गर्तारुगिव सनये धनानाम्. जायेव पत्य उशती सुवासा उषा हस्रेव नि रिणीते अप्सः.. (७) उषा बिना भाई की बहिन के समान पश्चिम की ओर मुख करके चलती है तथा पतिहीना नारी के समान प्रकाश रूप धन प्राप्त करने के लिए आकाश में चढ़ती है. उषा पति को प्रसन्न करने वाली पत्नी के समान सुंदर वस्त्र पहनकर हास्य द्वारा अपने दांतों का प्रदर्शन करती है. (७) स्वसा स्वस्रे ज्यायस्यै योनिमारैग्पैत्यस्याः प्रतिचक्ष्यैव. व्युच्छन्ती रश्मिभिः सूर्यस्याञ्ज्यङ्क्ते समनगा इव व्राः.. (८) निशा रूपी छोटी बहिन उषा रूपी बड़ी बहिन को अपना स्थान देकर चली जाती है. सूर्य की किरणों से अंधकार का नाश करती हुई यह उषा बिजलियों के समान संसार में प्रकाश करती है. (८) आसां पूर्वांसामहसु स्वसृणामपरा पूर्वामभ्येति पश्चात्. ताः प्रत्नवन्नव्यसीनूनमस्मे रेवदुच्छन्तु सुदिना उषासः.. (९) सभी उषाएं परस्पर बहिनें हैं एवं एकदूसरी के पीछे चलती हैं. आने वाली उषाएं प्राचीन उषाओं के समान सुदिन लावें एवं हमें बहुधनसंपन्न करें. (९) प्र बोधयोषः पृणतो मघोन्यबुध्यमानाः पणयः ससन्तु. रेवदुच्छ मघवद्भ्यो मघोनि रेवत्स्तोत्रे सूनृते जारयन्ती.. (१०) हे धनवती उषा! हवि देने वालों को जगाओ तथा लालची पणियों को सोने दो. तुम हवियुक्त यजमानों को समृद्ध बनाओ. तुम सुंदर नेत्री हो. तुम सब प्राणियों को क्षीण करती हो, पर अपने यजमान को उन्नत बनाओ. (१०) अवेयमश्वैद्युवतिः पुरस्ताद्युङ्क्ते गवामरुणानामनीकम्. ebook converter DEMO Watermarks*