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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

अष्टक वर्ग विचार : १३९.

(६) त्रिकोण में स्वक्षेत्री गुरु हो उस पर ३ या कम रेखा हों तो संतानों की

मृत्यु हो ।

(७) गुरु जिस राशि पर हो उसका स्वामी उच्च का हो गुरु अ० बग में उच्च ग्रह

पर ५ रेखा हों तो वह राजा या महाराजा होता है ।

(८) लग्न से ६ या ८ घर में गुरु लग्नेश युक्त हो गुरु स्थिति राशि की ३ या

कम रेखा हों तो आजन्म भाग्यहीन रहे ।

(९) ६-८या १२ घर में गुरु हो गुरु से ३ या पांचवें स्थान में गुरु अ० वर्ग

` में जितनी रेखायें हों उतनी संतान होगी ।

(१०) लग्न से पाँचवें घर का स्वामी गुरु से युक्त या दृष्ट हो ओर पंचमेश स्थिति

राशि में ४ या अधिक रेखा हों तो एक संतान, कुल की वृद्धि एवं ख्याति करने

वाला हो ।

(११) लग्न से पञ्चम घर को स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी यदि गुरु से युक्त या दुष्ट हो । पंचमेश स्थिति राशि पर ३ या कम रेखा हों तो १ संतान जातक के प्रति दुर्व्यवहार करने वाला हो ।

(१२) लग्न से और गुरु के स्थान से पञ्चम स्थान में ३ या कम रेखा हों तो

बहुत कम संतान हो ।

(१३) गुरु से पञ्चम स्थान में जितनी रेखा हों उतनी संतान होना बताया गया

है परन्तु नीच या शत्रु गृही ग्रह से तो फल ठीक नहीं होता ।

(१४) गुरु और लग्न से नवमेश उच्च या स्वगृही होकर केन्द्र में हो उस पर

४ से अधिक रेखा हो तो दंड देने का अधिकारी हो ।

(१५) गुरु अष्टक वर्ग में जब गोचर में उस राशि मे शनि जावे जिसमें सबसे |

कम रेखा हैं तब उस समय जातक की मृत्यु होती है ।

(१६) गुरु से पञ्चम स्थान का स्वामी जितने नवांश में हो उतनी संतान दों ।

(१७) गुरु से पञ्चम भाव की रेखा > गुरु योग पिड-+ २७-गेष नक्षत्र या उसके

त्रिकोण में जब शनि जावे, या रेखा+योगपिड <- १२ शेष राशि या उसके त्रिकोण में

जब शनि जावे तब संतान कष्ट होगा घमं ओर विद्या की हानि होगी ।

(१८) गुरु अ० वगं में गुरु से पाँचवें घर में जितनी शुभ रेखा हों उसमें से नीच

या शत्रु घर में जितनी रेखा हों उनको घटाना जो शेष वचे उतनो संतान होगी ।

शुक्र के अष्टक वग का विचार

शुक्र स्थिति राशि से सप्तम स्थान द्वारा स्त्री का विचार होता है ।

(१) इसी सप्तम स्थान एवं सप्तम से अष्टम स्थान में जो राशि हो उसकी

रेखाओं द्वारा पूर्ववत्‌ रत्री के कष्ट का विचार होता है ।

जैसे शुक्र मीन पर है उससे सप्तम स्थान कन्या राशि है । शुक्र अ० वर्ग कन्या

की ४ रेखा हैं योगपिण्ड ४४ है । ४२ ४४=१७६ -: २७=६ ३ङन्शेष १४ चित्रा में

या इसके त्रिकोण धनिष्ठा और मृग० में जब शनि आयेगा तव स्त्री कष्ट होगा या

१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४ >९ ४४-१७६ ~ १२=१४४=शेष ८ राशि वृश्चिक में या इसके त्रिकोण मीन और

कर्क में जब शनि जायगा तब स्त्री को कष्ट होगा ।

(२) शुक्र अष्ट० में जिस २ राशि में अधिक रेखा हो उस २ राशि में जब शुक्र

गोचर में जायगा तब धन, स्त्री और भूमि का सुख लाभ होगा ।

(३) शुक्र अ० वर्ग की जिस राशि में कम रेखायें हों उस राशि की दिशा में

जातक स्त्री का शयन गृह बनावे तो स्त्री जातक के वशीभूत रहे। अन्यमत जिस राशि

में अधिक रेखा पड़ती हों उस राशि की दिशा में गृह निर्माण करता है ।

(४) केन्द्र या त्रिकोण गत शुक्र स्थिति राशि की ८ रेखा हों तो सेनापति या

खाहनाधिपति हो ७ रेखा-धनाढ्य रत्नादि सम्पन्न या जन्म भर सुखी रहे । ५-६ रेखा दाम्पत्य जीवन सुखमय हो ।

यदि शुक्र नीच का हो या अस्त या ६-८ या १२ भाव में हो तो कोई राजयोग

होने पर भी राजयोग नष्ट हो जाता है ।

(५) शुक्र मेष या वृश्चिक का हो शुभ ग्रह युत या दृष्ट हो ४ से अधिक रेखा हों "तो धनी बहुत वाहन युक्त होता है

(६) शुक्र केन्द्र या त्रिकोण में हो मंगल से दृष्ट न हो शुक्र स्थिति राशि की ४

से अधिक रेखा हों तो अल्प अवस्था में विवाह हो । मंगल से दुष्ट होने में विवाह में

विघ्न होता है । -

(७) शुक्र १० या ११ राशि में हो मंगल से दृष्ट हो ओर शुक्र स्थिति राशि की

३ या अधिक रेखा हों तो उसकी स्त्री कुलटा होती है ।

शनि अष्टक वर्ग फल

शनि के अष्टक वर्ग से आयु का विचार होता है जिस राशि में शनि हो उससे अष्टम स्थान मृत्यु स्थान कहलाता है ।

(१) शनि अ० वर्ग में लग्न से शनि तक जितनी रेखायें हों उतने वर्ष में जातक

हो रोग या झगड़ा होता है।

शनि से लग्न तक जितनी रेखाएं हों उतने वषं में मृत्यु, धनक्षय या कष्ट या

“विदेश गमन होता है ।

लग्न से शनि तक और शनि से लग्न तक जितनी रेखा हों सबको जोड़ने से जो

संख्या आये उतने वर्ष में मृत्यु का भय हो ।

शनि अष्टक वर्ग में कुल ३९ रेखाएं होती हैं उसमें शनि स्थिति राशि एवं लग्न

ड स्थिति राशि की रेखाओं को जोड़ने से ठीक कष्ट प्रद वषं आयगा ।

इसी प्रकार लग्न से शनि तक अर्थात्‌ शनि स्थिति राशि तक जितनी रेखाएं हों

उनको ७ से गुणाकर २७ का भाग दो जो शेष रहे उस संख्या के नक्षत्र में गोचर में

जब शनि आता है तब सुख एवं धन की हानि होती है ।

जसे शनि अ० वर्ग में लग्न से शनि स्थिति राशि तक ९ रेखा हैं । शनि योग `

पिंड ४९ है ४९ > ९=४४१ =- २७-१६६७ शेष ९ श्लेषा नक्षत्र में जव गोचर का

खचि जायगा तब सुख और धन की हानि .होगी ।

अष्टक वर्भ विचार : १४१

(२) शनि अ० वर्ग में जिस राशि में कोई रेखा नहीं है उस राशि में गोचर का शनि आमे से मृत्यु या धन हानि होती है । (३) जन्म में शनि केन्द्र में हो । किसी केन्द्र स्थान में तुला राशि हो पर शनि तुला में न हो ऐसे शनि स्थिति राशि की ४ या कम रेखा हो तो अल्पायु हो । (४) लग्न में बली शनि हो उसमें ५-६ रेखा हों तो धन की हानि होती है जन्म से हो दुःख भोगता है ।

(५) शनि लग्न में हो रेखा न हो तो अल्पायु हो ।

(६) चंद्र शुभ वर्ग शोर शनि नीच या शत्रुगृही हो ऐसे शनि स्थिति राशि में

५-६ रेखा हो तो दीर्घायु हो । (७) शनि नीच या शत्रुगृही हो और शुभ दृष्ट हो, शनि पर ४ रेखा से अधिक हो तो दीर्घायु हो ।

(८) शनि लग्न या पंचम स्थान में हो, नीच शत्रुगृही या अस्त हो और शनि पर ४ या ६ रेखा हो तो बहुत दासियाँ होती हँ ! यह धनी और ऊंटों का मालिक होता है।

(९) शनि लग्न या पंचम में हो और शनि पर ७रेखायें हों तो धनी हो । ८ रेखा

हों तो ग्राम शहर आदि का अधिपति हो । ऐसे शनि पर ७-८ रेखा हों तो व्यापार में अप्रवृत्ति होने से लक्षाधीश हो ।

(१०) शनि मंगल युक्त हो, शनि पर ४-५ रेखा हो तो पुर ग्राम आदि का

स्वामी हो ओर तंत्र मंत्र जानने वाला हो ।

(११) शनि ३-६-११ घर में हो नवमेश या दशमेश हो तो राजा सदुश हो।

(१२) शनि चंद्र युक्त लग्न में हो शनि की चार रेखा हो तो ऋणग्रस्त हो ।

(१३) यदि शनि चंद्र युक्त ४, ७ या १० स्थान में हो ४ रेखा हो तो राजयोग होता है । RR

(१४) शनि कहीं हो उस पर ३ य। कम रेखा हो तो परदेश में मृत्यु हो । (१५) चतुर्थेश से युक्त या दुष्ट शनि द्वितीय में हो शनि पर २, ३ रेखा होतो

तीर्थाटन करता है।

(१६) शनि दशम में दशमेश युक्त हो ३ रेखा हो तो जीवन के विशेष अंश में

परदेशवासी रहता है ।

(१७) शनि अ० वं में जिस स्थान में एक भी रेखा न हो उस राशि में जब

` शनि गोचर में जावे उस समय सूर्य और चंद्र भी गोचर में वहाँ आवें तब बहुत

अनिष्ट कारी होता है । इस समय दशा भी खराव हो तो मृत्यु भी संभव है ।

. (१८) शति अ० वर्ग में जिस राशि में रेखा न हो उसमें सूर्य या शनि या दोनों

जब जाते हैं तो रोग पीड़ा आदि का कष्ट होता है ।

(१९) शनि से अष्टम राशि की रेखा%योगपिड-+ २७=शेष नक्षत्र, या उसके

त्रिकोण में जो रेखा%योगपिंड5-१२=शेष राशि, पर उसके त्रिकोण में जब शनि

जायया तब मृत्यु संभव हैं या सुख एवं धन को हानि हो । जैसे सिंह पर शनि है उससे

१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अप्टम मीन है जिसकी रेखा ३ है योगपिंड ४९ है। ४९५३=१४७-- २७=५२उ शेष

१२ उ. फा. हुआ इसमें या इसके त्रिकोण का उ० षा० या कृतिका में जब शनि जाये

तब मरण संभव है। या ३)१(४९-१४७--१२-१२ह६ 45शेष ३ मिथुन. या इसके

त्रिकोण की राशि तुला और कुंभ में जव शनि गोचर में जायगा तब मृत्यु संभव है ।

इस समय छिद्रा दशा हो अर्थात्‌ जन्म कालीन नीच या शत्रुगृही वली ग्रह की अन्त￾दंशा हो तो मृत्यु अवश्य होगी । .

. (२०) जिस राशि में रेखा न हो उसमें गोचर का शनि जाये और उस समय

दुष्ट दशा भी हो तो मृत्यु हो । छु

-(२१) अन्यमत-शनि के अ० वर्ग में लग्न से जो अष्टम भाव हो उसकी शुभ

. रेखा,शनि योगपिर्ड :- २७=शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में, जब शनि या गुरु जावे

तब मृत्यु होगी ।

लग्न के अष्टकवर्ग का फल

लग्न अष्टकवर्ग कुण्डली से सब भावों के फल जानने की यह रीति हैः--

जिस भाव का फल विचारना हो उस भाव गत लग्न अ० वर्ग रेखा को लग्न

अ० वर्ग योगपिंड रा गुणा कर २७ का भाग देना । शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में

जब शनि जावे तव यह फल होता है ।

(१) यदि उस भाव में कोई ग्रह न हो तो भाव फल साधारण क्लेश होता है।

(२) उसमें कोई शुभ ग्रह हो तो उस भाव के फल में अनिष्ट होने की सम्भावना

नहीं होगी । १

(३) उसमें कोई पाप ग्रह हो तो उस भाव के फल में क्लेश लाता है ।

(४) उसमें कोई पाप और शुभ ग्रह हो तो भाव का फल मिश्रित होगा ।

उदाहरण १)-लग्न अप्ट० वर्ग में-लग्न में ४ रेखा हैं लग्न योगपिंड परे है ।

८३५४=३३२--२७=१२६ङ=शेष ८ पुष्य नक्षत्र, इसके त्रिकोण के नक्षत्र अनु-

राधा और उ० भा० लग्न में पाप ग्रह राहु है। इसलिये इन नक्षत्रों में गोचर का

शनि जाने पर कष्ट की सूचना देगा ।

(२) धनभाव-लग्न से दूसरे भाव में ४ रेखा है । इसमें कोई ग्रह नहीं है । उप￾रोक्त नक्षत्रों में शनि जायगा तो धन सम्बन्धी बातों में कुछ चिन्ता होगी ।

(३) प्रातृभाव--इसमें भी ४ रेखा हैं । इसमें शनि है । इससे जब, गोचर में

उपरोक्त नक्षत्रों में शनि जायगा तो भाई आदि को कष्ट होगा ।

` (४) चतुर्थ में-३ रेखा हैं कोई ग्रह नहीं है। ३ रेखा%योगपिंड :३=२४९ --

२७=९६७=शेष ६ आर्द्रा और इसका त्रिकोण नक्षत्र स्वाती, शतभिष पर जब शनि

आयगा तो सुख, माता, भू-सम्पत्ति आदि की कुछ चिन्ता होगी ।

(५) पंचम में-३ रेखा हैं कोई ग्रह नहीं है तो उपरोक्त नक्षत्रों मे शनि जाने

पर पुत्र सम्बन्ध से नाम मात्र को कुछ चिंता. होगी ।

(६) षष्ठ में--७ रेखा हैं इसमें पाप ग्रह मंगळ स्वगृही है ७५८३५८१ -न २७

अस्टक वर्ग विचार : १४३

=२१ देर्डुन्शेष १४ चित्रा में या इसके त्रिकोण धनिष्ठा और मृग० में जब शनि

जायगा तव शत्रु द्वारा कष्ट होगा । परन्तु मंगल स्वगृही होने से शत्रु पीड़ा बढ़ने नहीं देगा अर्थात्‌ कष्ट न होगा ।

(७) सप्तम में-३ रेखा हँ । इसमें पाप ग्रह केतु है तो स्त्री सम्बन्ध से पीड़ा देगा जवकि शनि उन नक्षत्रों में जायगा जिसका वर्णन चतुर्थ भाव के फल विचार में दिया है।

(८) अष्टम में पाँच रेखा हैं। योगपिंड ५३ १६ ५=४१५-- २७-१५३६-शेष१०

मघा या इसके त्रिकोण के नक्षत्र मूल और अश्विनी में जव शनि जायगा कोई अनिष्ट

नहीं होगा । क्योंकि इसमें शुभग्रह गुरु बेठा है ।

(९) नवम में-३ रेखा हैं चन्द्र और बुध इसमें हैं । इससे चतुर्थ भाव फल विचार

में जिन नक्षत्रों का वर्णन है उनमें शनि जायगा तो भाग्य सम्बन्धी कष्ट नहीं होगा ।

(१०) दशमभाव में ३ रंखा हैं सूये और शुक्र पाप और शुभग्रह मिश्रित होने से

मिश्रित फल होगा । जव चतुर्थ में बताये नक्षत्रों में शनि जायगा तब व्यापार जीविका

आदि सम्बन्ध से मिश्रित फल होगा ।

(११) लग्न में ५ रेखा हैं । कोई ग्रह नहीं है । अष्टम भाव के अनुसार नक्षत्रों में

जव शनि जायगा तो तव आय के सम्वन्ध में विशेष विघ्न वाधा नहीं होगी ।

(१२) व्यय में भी ५ रेखा हैं कोई ग्रह नहीं हैं उपरोक्त नक्षत्रों में शनि जायगा

तो खर्च के सम्वन्ध से विशेष कोई झंझट नहीं होगी । ४

संक्षिप्त में शनि के १२ भावों का फल |

गोचर में शनि नक्षत्र भाव स्थूल फल विचार

पुष्य, अनुराधा, उ० भाद्र० लग्न, द्वितीय, शारीरिक कष्ट, धन सम्बन्धी वातों की

तृतीय किंचित्‌ चिंता, भाइयों के सम्बन्ध के कष्ट।

आर्द्रा, स्वातो, शतभिष चतुर्थ, पंचम सुख भू-संपत्ति मातृ सुख, संतान सम्बन्ध

: सप्तम,नवम, से किंचित्‌ चिंता होगी, स्त्री को कष्ट, भाग्य

दशम में साधारण व्यापार जीविका सम्बन्धी

कुछ चिंता होगी ।

चित्रा, धनिष्टा, मुग षष्ठ शत्रु द्वारा विशेष कष्ट नहीं ।

सघा, मूल, अश्विनी अष्टम,लाभ आयु सम्बंध से कोई अनिष्ट नहीं होगा

व्यय लाभ में विशेष बाधा नहीं होगी । और

विशेष खर्च की झंझट नहीं होगी ।

उपरोक्त भाव की रेखा ><योगपिंड<- १२=शेष राशि या उसके त्रिकोण में शनि

आवे तब उस समय भी उपरोक्त फल का विचार करना ।

अष्टक वर्ग से भावफल विचार दु

(१) जिस भाव का फल विचारना हो उस भाव की राशि गत रेखा % योग

-:-१२ शेष राशि या उसके त्रिकोण की राशि में जब शनि जाता है तव उसका

अनिष्ट फल प्रगट है यदि उसमें कोई ग्रह नहीं है तो लेश. मात्र अनिष्ट होता

१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

है 1 यहाँ शुभ ग्र ह हो तो अनिष्ट हीं होता । पाप ग्रह हो तो पूर्ण अनिष्ट होता है पाण

और शुभ ग्रह वहाँ हो तो मिश्रित फल होगा । इस प्रकार लग्न अष्टक वर्ग से सव भाव के फल का विचार होता है । र (र) अष्टमेश जिस राशि में हो उस राशि के त्रिकोण शोधित रेखा को अष्टम स्थान की रेखाओं से गुणाकर १२ का भाग देने से जो शेष वचे उस राशि या उसके

त्रिकोण की राशि में जब गोचर का सूर्य जाता है, तव उस सौर मास में अनिष्ट

होता है जसे अष्टमेश शनि सिंह राशि का है सिंह में लग्न अ० वर्ग में त्रिकोण के

पश्चात्‌ १ रेखा है । अष्टम स्थान में मकर राशि है उसकी ५ रेखा हैं। ५%१-५-: १२=शेष ५ सिंह है । इसके त्रिकोण में धन और मेष है इन सौर मास में ( गोचर का

सूर्य इन राशियों में जाने पर ) अनिष्टकारी होगा ।

(३) शनि के स्थान में आरम्भ करके अष्टमेश जहाँ हों उस स्थान तक की

रेखाओं को जोड़कर अष्टम स्थान की रेखा से गुणाकर १२ का भाग देना जो शेष राशि आवे उसमें या उसके त्रिकोण में जव गोचर का सूयं जाता है उन सौर मासों में

अरिष्ट होता है । जैसे अष्टमेश शनि सिंह राशि में है यहाँ शनि और अष्टमेश एक ही है । केवल सिंह की रेखा ४ थी । अष्टम स्थान की रेखा ५ है। ५१(४-८२० -+ १२=शेष ८ वृश्चिक या इसके त्रिकोण की राशि मीन और कर्के । इन सौर मासों में अरिष्ट होगा ।

प्रत्येक ग्रह के अष्टक वर्ग से शुभाशुभ समय भी प्रकट होता है लग्न से उस ग्रह तक जिसका अष्टक वर्ग है और उस ग्रह से लग्न तक रेखाओं को जोड़ने से जो समय आयगा पाप ग्रह से पाप फल शुभ ग्रह से शुभ का समय प्रकट होगा जैसे :--

(१) सूर्य अष्ट० वर्ग में लग्न मिथुन से सूर्य स्थित राशि मीन तक ३९ रेखा हैं और सूर्य की मीन राशि से मिथुन लग्न तक १७ रेखा हैं । इन वर्षो में रोगादि फल होगा ।

(२) मंगल के अ० वग में छर्न मिथुन से वृश्चिक के मंगल तक २० रेखा हैं और

मंगल से लग्न तक २८ रेखा हैं इन वर्षों में कष्ट शस्त्र अग्निभय आदि होगा ।

(३) शनि से लग्न तक शनि अ० वर्ग में ९ रेखा हैं और शनि से लग्न तक ३७ है इन वर्षो में बड़ा कष्ट रोग पीड़ा आदि होगा । (४) चन्द्र अ० वर्ग में लग्न से चन्द्र तक ३९ रेखा हैं और चन्द्र से लग्न तक १५ रेखा हैं इन वर्षों में सुख होगा, भाग्यवृद्धि होगी । (५) बुध अ० वर्ग में लग्न से बुध तक ४२ रेखा हैं बुध से लग्न तक १७ रेखा हैं इन वर्षो में सुख होगा भाग्य वृद्धि धमं के कार्य होंगे । (६) गुरु अ० में लग्न से गुरु तक ४० रेखा हैं गुरु से लग्न तक २५ रेखा हैं इन वर्षों में स्वास्थ अच्छा रहेगा रोग दूर होगा सुख होगा । (७) शुक्र अ० वर्ग में लग्न से शुक्र तक ४२ रेखा हैं शुक्र से लग्न तक १९ रेखा हैं इन वर्षों में व्यापार आदि का सुख स्त्री सुख आदि प्राप्त होंगे ।

अष्टक दर्ग विचार : १४५

(८) लग्न अ० वर्ग में लग्न से मंगल तक २५ रेखा हैं मंगल से लग्न तक ३५

रेखा हैं इन वर्षों में शत्रु पीड़ा रोग आदि से कष्ट होगा ।

(९) लग्न अ० वर्ग से लग्न में गुरु तक ३३ रेखा और गुरु से लग्न तक २५

रेखा हैं इन वर्षों में फल शुभ होगा स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।

इन सभयों में शुभ या पाप ग्रहों के योग से फल में भी प्रभाव पड़ेगा पाप ग्रह के

अष्टक वग में पाप ग्रह के योग से वहुत अशुभ होगा । शुभ ग्रह के अष्टक वर्ग में शुभ

ग्रहों के योग से शुभता बढ़ेगी । दोनों प्रकार के ग्रह हों तो मिश्रित फल होगा।

अरिष्ट जानना

(१) अष्टमेश जिस राशि में हो उसके त्रिकोण शोधन फल से अष्टम स्थान की

शुभ रेखा से गुणा कर १२ से भाग देना शेष राशि या उसके त्रिकोण के सौर मास

में अरिष्ट होगा ।

इसी प्रकार मातृ पितृ भाव से उससे अष्टम स्थान की गणना कर उसके अरिष्ट

का समय उपरोक्त प्रकार से निकालना ।

जैसे अष्टम में मकर राशि है अष्टमेश शनि सिंह राशि में है । लग्न अ० वर्ग में

मकर की शुभ रेखा ५ है सिंह में त्रिकोण शोधन के पश्चात्‌ १ रेखा प्राप्त हुई है

५ १=५--१२=शेष ५ सिंह या इसके त्रिकोण की राशि धन,मेष के सूयं में अरिष्ट

होगा । ः

(२) शनि से लग्न के अ टमेश तक रेखा जोड़कर अष्टम स्थान की रेखा से गुणा

कर १२ का भाग देने से जो शेष राशि या उसके त्रिकोण की राशि आवे उसमें सूर्य

जाने से अरिष्ट होगा ।

(३) जिस जन्म लग्न में ९, १२ राशि का राहु हो उसमें या उसके त्रिकोण में

जव गोचर का गुरु आवे तव अरिष्ट संभव है । या जिस राशि में राहु युक्त हो उस

राशि के त्रिकोण में जव शनि गोचर में आवे तब अरिष्ट संभव है ।

(४) षष्ठेश जिस नक्षत्र में हो उस राशि नक्षत्र से त्रिकोण में जव शनि जावे तव

मरण संभव है ।

जैसे यहाँ षष्ठंश मंगल वृश्चिक में अनुराधा नक्षत्र में त्रिकोण में उ० भाद्र० और

पुष्य है इनमें शनि जाने पर मरण तथा अरिष्ट संभव है । यदि प्रबल दीर्घायु योग

हो तो अपने समान अन्य करिसी को अरिष्ट आदि हो ।

(५) चन्द्रमा से या लग्न से तीसरे उपकरण में गुरु हो तो उस अ० कोण का जो

स्वामी है उसके त्रिकोण में जव शनि आवे उस वर्ष विवाद, परदेश गमन, और मृत्यु

तुल्य शरीर पीड़ा होती है । |

(६) अष्टमेश जिस द्वादशांश में हो उसके त्रिकोण में जब राहु जावे उस समय

अष्टमेश गत राशि के त्रिकोणस्थ सूर्य में मृत्यु संभव है एवं- स्पष्ट सूर्यं की कला ५

राहु को कला बनाकर-:-१२ राशि की कला=छब्धि अंश फलादि जो आवे उसे स्पष्ट

सूयं में जोड़ने से जो आयगा उस तुल्य सूर्य स्पष्ट में मरण संभव । -

१ १०

१४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड र

जैसे सूर्य स्पष्ट ११-५-४०-४५। राहु स्पष्ट २-८-६-३२, सूर्य की कला ३०-१४०--४५ ५ राहु कला ४००६'--३२”“-८२३० ५८४६--१ ५० ८२३०५८४६,--१४ --- २१६०० (१२ राशि की कला ) -३०१०२--२७” रा० रा ० ' रात ७. 2

=२-२-३०-२७तमूर्य स्पष्ट पर ११--५--४०--४५=१-९-११--१२

इस स्पष्ट पर सूर्य जाने पर मृत्यु संभव है ।

(७) सूर्य स्पष्ट की कला % मंगल स्पष्ट की कछा-गुणन फल 5-१२ राशि की कला २१६००=लब्धि कला की राशि आदि बनाकर सूर्य स्पष्ट में जोड़ना । उस स्पष्ट के तुल्य सूर्य आने पर या उसके त्रिकोण राशि में सूर्यं आने पर क्लेश एवं क्षय होगां।

रा० ०

जैसे सूर्य स्पष्ट ११--.५--४०(--४५” की कला २८१४०४५” > भौम स्पष्ट

रा०

७०१२-२९-४४” की कला १३३४९'-४४/-२६८८७७६१'४-३८ उक्त गुणन फल

रा ०

+१२ राशि की कला २१६००८-१ २४४८--२ % ६--२७ - २८--२+

रा ०

सूर्य १९---५--४०--४४”“-६---३---८---४७ इनका सूर्य गोचर में होने पर क्लेश आदि होगा ।

(८) लग्न के द्वादशांश के त्रिकोण में जव सूर्य जावे तब मरण संभव होगा।

(९) था अष्टमेश के त्रिकोण में जब सूर्यं जावे ८ A

(१०) या अष्टमेश के त्रिकोण में जब चन्द्र जावे या अष्टमेश गत नवांश के

त्रिकोण में जब चन्द्र जावे उस दिन अल्प रेखा भी हो तो मृत्यु निश्चित जानो ।

(११) या ६-८-१२ भावेशों के स्पष्ट के योग करने से जो आवे उसमें जब शनि

जावे या उसके त्रिकोण में शनि जावे तव मृत्यु संभव है ।

(१२) निधन लग्न-जन्म लग्न स्पष्ट और चन्द्र स्पष्ट के नवांश से ६५ वें नवांश

को जिस राशि में लग्न या चन्द्र हो उस समय मरण संभव है । उस समय रेखा शून्य

हो और दुष्ट ग्रह की दशा हो तव उस लग्न में मृत्यु संभव है या जन्म लग्न से दूसरी

या सप्तम राशि के लग्न में उक्त फल हो । एक नवांश ३-२० का होता है ६४ वें

रा०

नवांश में ७--३--२० अधिक हो जाते हैं । इससे इतने जोड़ने पर ६५ वाँ नवांश आ जाता है।

जैसे २--२०--११--५३ हे-९--२३--३१ का नवांश ५ सिंह राशि आई

प७--३--२०

६--२३--३ ५

गोचर विचार : १४७

चन्द्र स्पष्ट १०--२--७--५५। ५-५-२७ का नवाश ११ कुंभ राशि आई

न७---३---२०

१७---५--२७

अध्याय ६

गोचर विचार

गोस्तारा, चरस्संचार सूर्यादि ग्रहों की दैनिक गति के भ्रमण से जो ग्रहों को

स्थिति प्रकट होती है उसे गोचर कहते हैं । -

जन्म कुण्डली में जो ग्रह दिये हैं वे वहाँ स्थिर हैं पंचांग के अनुसार वे ग्रह

चतंमान में कहाँकहाँ पर हैं इस विचार को गोचर कहते हैं ।

अर्थात्‌ जन्म चन्द्र की स्थिति के विचार से वर्तमान में ग्रहों की स्थिति के सम्बन्ध

से भविष्य के फल विचार को गोचर विचार कहते हैं । जन्म राशि-जन्म समय चन्द्र

जिस राशि पर हो उसे ही जन्म राशि कहते हैं ।

गोचर फल का विचार :

गोचर का फल विचारने को यह देखना पड्ता है कि जन्म राशि से वर्तमान में

(पंचांग के अनुसार) कौन-कौन ग्रह कौन-कौन स्थान में हैं जेसे किसी जन्म कुण्डली में

चन्द्रमा कुम्भ राशि पर है तो उसकी राशि कुम्भ कहलाई । अव पञ्चांग देखा

संवत २० १८ के कातिक कुष्ण अमावस्या को वहाँ दिये कुण्डली अनुसार ग्रह है ।

72222] यहाँ कुम्भ ११ जहाँ दिया है वहाँ

से प्रत्येक ग्रहों के स्थान देखा। वहाँ से

६ स्थान में राहु है, नवम स्थान में चन्द्र

सूर्य, बुध, शुक्र है । दशम स्थान में मंगल ।

ग्यारहवे' स्थान से शनि । वारहवे स्थान

में गुरु और केतु हँ । इनकी गति के अनुसार

स्थान बदलते रहते हैं। आगे दिया है

| कि किस स्थान में कौन ग्रह होने से

क्या फल होता है उस चन्द्र से ग्रह का फल प्रकट हो जायगा कि किस ग्रह का प्रभाव

इस समय अच्छा है किस का वुरा है ४

में ग्रहों की स्थिति के अनुसार फळ कहा जाता है कुण्डली में ग्रहों की

स्थिति सदैव काल के लिये स्थिर कर दी जाती है परन्तु गोचर में उन ग्रहों की स्थिति

ET

१४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बदलती रहती है । इससे कुण्डली के फल से गोचर का फल भिन्न है।

ग्रहों के शुभ स्थान

म राशि से कौन ग्रह कब-कब अच्छा फल देते हैं इसका विचार नीचे दिया

है चन्द्र ( राशि ) से इन स्थानों की गिनती दी है।

१ सूर्य-३, ६, १० और ११ वे घर में अच्छा फल देता है।

२ चन्द्र-१, ३, ६, ७, १०, ११ वे घर में भी अच्छा फल देता है।

शुक्ल पक्ष का चन्द्र= २, ५, ९ वे घर में अच्छा फल देता है।

३ बुध-र, ४, ६, ८, १०, ११ वे घर में अच्छा फल देता है।

४ गुरु-२, ५ ७, ९, ११, वे घर में अच्छा फल देता है ।

५ शुक्र-१, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, 1२ वे घर में अच्छा फल देता है ।

इन स्थानों के अतिरिक्त इतर स्थान अशुभ हैं, जहाँ ग्रह अशुभ फल देगा ।

इन शुभ स्थानों में ग्रह हो तो शुभ है परन्तु इनके वेध स्थान भी हैं जिनमें यदि

ग्रह हो तो शुभत्व नाश हो जाता है। वेध स्थान नीचे दिये हैं ।

वेध स्थान

ग्रह शुभ स्थान वेध स्थान

१ सुयं-३, ६, १०, ११ वाँ स्थान ९, १२, ४, ५ वाँ स्थान

२ चन्द्र-१, ३, ६, ७, १०, ११ वाँ स्थान ५, ९, १२, ४, ८ वाँ स्थान

३ चन्द्र शुक्ल पक्ष मे-२, ५, ९, वाँ स्थान ६, ४, ८ वाँ स्थान

४ बुध-२, ४, ६, ८, १०, ११ वाँ स्थान ५, ३, ९, १, ८, १२ वाँ स्थान

५ गुरु २, ५, ७, ९, ११ वाँ स्थान १२, ४, ३, १०, ८ वाँ स्थान

६ शुक्र-१, २, ३े, ४, ५, ८, ९, ८, ७, १, १०, ९, श्र ११, ३,

११, १२ वाँ स्थान ६ वाँ स्थान

७ मंगल शनि राहु ३, ६, ११ १२, ९, ५ वाँ स्थान

स्पष्टी करण-- (१) सूर्यं का शनि पुत्र है पिता पुत्र का विचार नहीं होता अर्थात्‌

सूर्य के वेध स्थान में यदि शनि हो तो अशुभ नहीं होता क्योंकि वेध स्थान में कोई ग्रह

हो तो शुभत्व मिट जाता | है इससे सूर्य|-शनि का वेध होना नहीं माना

जाता है।

(२) इसी प्रकार चन्द्र. वुध का परस्पर वेध नहीं होता ( वेध, होने पर भी वेध

नहीं मानते ) अर्थात्‌ सूर्यं का शनि से और शनि का सूर्ये से या चन्द्र का वुध से भौर

वुध का चन्द्र से वेध होने पर भी वेध नहीं माना जाता अर्थात्‌ शुभत्व दूर नहीं होता

क्योंकि साधारणतः यहाँ बताये वेध स्थानों में कोई भी ग्रह हो तो वहाँ उस ग्रह का वेध

होना माना जाता है जिससे शुभत्व दूषित हो जाता हे अर्थात्‌ वह स्यान शुभ नहीं माना जायगा ।

उदाहरण--जैसे कोई भी जन्म राशि से यदि तीसरे स्थान में सूयं हो तो शुभ

फल होगा ऐसा माना जाता है परन्तु सूर्य के तीसरे स्थान के वेध स्थान में देखना

गोचर विचार : १४९

पड़ेगा कोई ग्रह तो नहीं है तीसरे का वेध स्थान ९ हे यदि जन्म राशि से ९ स्थान गिनने पर शनि है तो कोई हानि नहीं, शनि से वेध होना नहीं माना जायगा। मान लो जन्म राशि से शनि नहीं है और भो कोई ग्रह है तो वेध होना माना जायगा जिससे शुप्तत्व दूर हो जाता है ।

मान छो जन्म राशि से ११वें स्थान में मंगल है तो यह शुभ है । परन्तु उसके

११ वें स्थान का वेध स्थान ५ है । यदि जन्म राशि से पांचवे स्थान में कोई भी ग्रह हो तो वेध होने से शुभत्व दूर हो जाता है अर्थात्‌ अशुभ फल दायक होगा । यदि शनि जन्म रांशि से ६ स्थान में हो और इसके वेध स्थान जन्म राशिसे ९ वें स्थान में सूर्य हो तो वेध होना नहीं माना जायगा यदि वहाँ सूर्य को छोड़कर और कोई ग्रह हो तो वेध होने से शुभत्व दूर हो जायगा अर्थात्‌ अशुभ फल दायक होगा। वुध यदि जन्म राशि से अष्टम स्थान में हो तो शुभ होता है परन्तु उसक्रा वेध स्थान १ में चन्द्र हो तो वेध नहीं माना जायगा । यदि और कोई ग्रह हो तो वेध होने से शुभत्व दूर होकर अशुभ होगा ।

इसी प्रकार जन्म राशि से गुरु पांचवा हो तो शुभ होता है परन्तु इसके वेध स्थान

४ में कोई भी ग्रह हो तो शुभत्व नहीं रहेगा ।

इस कारण गोचर में ग्रहों का स्थान फळ देखते समय यह भी देख लेना चाहिये कि उनके वेध स्थान में कोई ग्रह तो नहीं है ।

oo ग्रहों का शुभ स्थान और वेध स्थान सूचक चक्र

ग्रह सूर्य शनि मगल राहु कृष्ण चन्द्र शुक्ल चन्द्र

शुभ स्थान ३ ६ | ११ ३६ १९ १३ ६७ १० १५ २ ९ ५ वध स्थान ९ १२ ४ |५ १२ ९ ५। ५९१२ २४ पत ६८४

ग्रह बुध गुरु शुक्र

शुभ स्थान २ ४ ६ ८१० ११) २ ५७९ ११|१२ ३ ४ ५ ८ ९ ११ १२ वेब स्थान ५ ३९१८५ १ | १२४ ३१० ८]८ ७१ १० ९ ५११३६

विपरीत वेध > व्य

शुभ स्थान के वेध स्थान जो ग्रहों के ऊपर वताये हैं यह क्रम वेध हूँ । अर्थात्‌ ग्रहों

के शुम स्थानों में उनके वेध स्थानों में ग्रह होने से शुभत्व दूर हो जाता है । विपरीत

वेध इसके विरुद्ध है। ग्रहों के शुभ स्थानों को छोड़कर जो इतर स्थान हूँ वे अशुभ

स्थान कहाते हैं । यदि अशुभ स्थान में कोई ग्रह हो परन्तु उसके वेध स्थान में वह अंक

खोजों जिसका वह वेध स्थान है उसमें यदि ग्रह हो तो वह अशुमत्व दूर हो जाता है ।

जैसे सूर्य का शुभ स्थान का वेध स्थान १२ है। सूरं यदि जन्म राशि से १२

वें स्थान में हो तो शुभत्व नहीं होगा अर्यात्‌ अशुभ होगा। यदि सुर्य जन्म राशि से

अशुभ १२ वें स्थान में हो और यदि ६ स्थान में कोई ग्रह हो तो यह वाम वेध

२५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( विपरीत वेध ) अर्थात्‌ उल्टा वेध हुआ । इस प्रकार वाम वेध स्थान में कोई ग्रह

होने से अशुभत्व दूर हो जाता है और वह शुभ हो जाता है जसे सूर्य १२ के अशुभ

स्थान में भी होकर वाम वेध से शुभत्व पा गया । क्रम वेध का उल्टा वांम वेध है ।

यह विपरीत वेध हिमालय और विन्ध्याचल के बीच के देशों में माना जांता है ।

समस्त देश भर को इसके विचार की आवश्यकता नहीं है ( परन्तु क्रम वेध सब स्थानों

में माननीय है।

नक्षत्र अनुसार गोचर फल विचार

जन्म तक्षत्र से कोई ग्रह गोचर में जिस नक्षत्र में हो गिनकर उसका फल विचार￾१ सूर्य २ चन्द्र ३ मंगल

न० सं० अंग प्रभाव न०सं० अंग प्रभाव न० सं० अंग फल

१ पहिला मुख नाश १-२ मुख वड़ा भय १-२ मुख मृत्यु और

शोक समाचार

२से५ सिर ऐश्वर्य ३-६ सिर कुशल ३-८ पैर शत्रुता कलह

(उन्नति)

६-९ छाती सफलता ७-८ पीठ शत्रु पर ९-११ गर्दन सफलता

जीत

१०-१३ दाहिना दान द्रव्य ९-१० नेत्र धन लाभ १२-१५ बाँया धन हानि

हाथ आगम हाथ ` :

१४-१९ पैर द्रव्य हानि ११-१५छाती मानसिक १६-१७ सिर लाभ

प्रसन्नता

२०-२३ बायाँ हाथ देह पीड़ा १६-१७ बाँया शत्रुता १८-२१ मुख भय की (बीमारी) हाथ वृद्धि २४-२४ नेत्र लाभ १८-२३ पैर घर पर २२-२५ दाहिना कुशलता

वास हाथ

२६-२७गुह्य देह नाश २४-२७ हाहिना धन लाभ २६-२७ नेत्र यात्रा

या भारी हाथ

रोग ४-बुघ ५-गुरु ६-शुक्र ७ शनि ८ राहु € केतु न० स० अङ्ग फल न० सं० अंग फल

१-३ सिर दुःख २-५ बाँया हाथ दुःख ४-६ मुख लाभ ६-८ दाहिना हाथ यात्रा ७-१२ हाथ लाभ ९-११ बाँया पैर नाश १३-१७ पेट अचानक १२-१५ दाहिना पर लाभ घटना अनर्थं

१८-१९ गुह्य धन लाभ १६-२० पेट नाना भोग

गोचर विचार : १५१

२०-२७ पेर नाश ` २१-२३ सिर आनन्द

२४-२५ नेत्र कुशल

२६-२७ पीठ मरणभय

विचार--जिस नक्षत्र पर जन्म का चन्द्र हो उससे गोचर के ग्रह के नक्षत्र तक गिनना जो संख्या आवे उसका फल यहाँ दिया है जैसे जन्म नक्षत्र के चन्र से सूर्य का नक्षत्र गोचर में पाँचवां है तो वह सिर में प्रभाव करेगा जिसका फल उन्नति है । इस प्रकार किसी समय गोचर ग्रह की स्थिति पर से विचार हो सकता है । यदि उस समय

अष्टक वर्ग की गणना से इसमें अधिक शुभ रेखा है तो शुभता का प्रभाव अधिक

बढ़ेगा । इस प्रकार से गोचर का दैनिक फल भी निकाल सकते हैं। गोचर फल पर विचार

जन्म लग्न, आधान लग्न फल एवं चंद्र राशि फल में बहुत कुछ समता दिखती है

इससे राशि कुंडली से ही गोचर फल का विचार बताया है । जन्म राशि ( जन्म चंद्र

की राशि ) को प्रथम स्थान मान कर शेष १२ स्थान को १२ भाव]मानकर फल विचा-

रना पड़ता है ।

चन्द्र प्रति २। दिन में बदलता रहता है । शीघ्रगामी है उसे छोड़कर शेष ग्रहों को

वर्तमान कोई अच्छे पंचाङ्ग से देखकर गोचर की कई कुंडलियाँ बना लेनी चाहिये ।

चंद्र छोड़ कर जब-जब कोई ग्रह बदलता है उस समय की एक-एक कुंडली प्रत्येक समय

की वना लेनी चाहिये । जेसे जब सूये बदला उसकी एक कुंडली बना लो आगे कोई

एक भी ग्रह वदले उसी समय की एक नवीन कुंडली वना लो । इस प्रकार वर्ष भर की

गोचर कुंडलियाँ बन जायगी उन कुंडलियों में समय भी लिख लो । फिर जन्म राशि से

प्रत्येक ग्रहों का फल आगे दिये हुए फल के अनुसार विचार लो ।

इसमें विशेष वात यह भी देखनी पड़ेगी कि जन्म काल के ग्रह से कौन से प्रकार

का दृष्टि योग आदि होता है। जन्म कुंडली के स्थान से अब विशेष ग्रह कोन से स्थान

में भ्रमण कर रहा है । जन्म कुंडली की ग्रह स्थिति से वर्तमान गोचर कुंडली का

लम कर देखना होगा कि जन्म का ग्रह अब गोचर में अच्छी या बुरी केसी स्थिति . में है।

जो ग्रह जन्म पत्नी में उत्तम स्थान में पड़ा हो वह गोचर में शुभ स्थान में आते ही

शुभ फल देगा । जो ग्रह जन्म में विगड़ा हो वह यदि गोचर में अच्छा भी होगा तो

भी शुभ फल नहीं देगा ।

जन्मराशि से गोचर फल विचारते समय इस वात का ध्यान रहे कि चन्द्र उस

राशि में कितने अंश कला विकला से जन्म में है। गोचर फल विचारते समय इस

प्रकार जन्म चन्द्र के अंश से इतर ग्रहों के अंश आदि के विचार से वह ग्रह किस भाव

में है और कौन-कौन ग्रहों की योग दृष्टि उस पर है पूरी परिस्थिति पर विचार कर

फल का निर्णय: करना पड़ेगा ।

जिस समय यह जानने की इच्छा हो कि किसी राशिवाले को अमुक समय अच्छा

| |

१५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

है या बुरा है। इसके लिए उसकी जन्म कुंडली देखो उसमें जन्म लग्न के विचार से

सूर्य आदि ग्रह अच्छे हैं या बुरे हैं।

आगे इसका विचार दिया है कि कौन लग्न होने से कौन-कौन ग्रह शुभ या अशुभ हो जाते हैं । ये ग्रह गोचर में जिस स्थान में जावेंगे उस स्थान का सम्बंधीफल उत्पन्न करेंगे । गोचर ग्रह जन्म के ग्रहों से जिस समय अंशात्मक या आसन्न योग करते हैं तव ही उनका ठीक फळ प्रकट होता है !

मनुष्य के जन्म समय ग्रह जिस अंश पर हो जब ठीक उसी राशि ओर अंश पर

गोचर का ग्रह भ्रमण करते हुए पहुंचता है तभी अपना शुभाशुभ फल देने में समर्थ

होता है । ऐसा समझ बैठना कि ग्रहों का राश्यन्त होते हो उस राशि का शुभाशुभ

फल होगा यह समझना सूक्ष्म पद्धति से अशुद्ध है चाहे वह स्थूलमान से ठीक हो । कोई

ग्रह किसी राशि में जन्म होने के पिछले अंशों का फल कैसे दे सकता है जव कि उस

समय उसका जन्म ही नहीं हुआ था । राशि पूरी ३०° की होती है ।

मान लो किसी की वृष राशि है उसमें १५° पर शुक्र है। स्थूल मान से वृष में

शुक्र है । जब शुक्र कन्या राशि में होगा तो पांचवाँ कहा जाता है ! परन्तु सूक्ष्म रूप से

विचार करते हैं तो वृष के १८° से मिथुन के १७° तक १ स्थान हुआ । ककं के १७°

तक दूसरा, सिंह के १७° तक तीसरा, कन्या के १७° तक चौथा ही स्थान हुआ । यहाँ

शुक्र चौथे स्थान का ही फल देगा पांचवें का फल नहीं देगा । आगे तुला के १७° तक

वह पांचवें स्थान का फल देगा । इस प्रकार ग्रह के अंशों के विचार से सूक्ष्म रीति से

विचार कर फल कहना ।

` जन्म लग्नानुसार गोचर फल का बिचार

जन्म कुण्डली के अनुसार मेषादिलग्न में जन्म होने से सूर्यादिग्रह क्या शुभाशुभ

` फल देते हैं यह जान लेना गोचर फळ विचार के लिये आवश्यक है। कोई लग्न होने से

कोन ग्रह शुभ कौन अशुभ है कोन ग्रह मारक होता है आदि हा विचार नीचे दिया. है ।

(१) जन्म लग्न मेष हो तो-शनि, बुध, शुक्र अशभ फलदायक हैं । गुह सूर्य शुभ

फजप्रद हैं । शनि गुरु का संयोग जहां राजकारक है वहां गुरु व्ययेश होने से, शनि

राभेश होने से अन्य प्रकार से पाप फल दायक अवश्य हैं । शनि का जिस समय शुक्र से

सम्वन्ध होता है मारक फल करता है क्योंकि शुक्र यहाँ मारकेश है।

(२) वृष लग्न-शनि, सूर्यं शुभ फक दायक हैं, गुर शुक्र चन्द्र पाप फळ देंगे ।

एक शनि ही राजयोग कारक है पर गुर शुक चन्द्र वुय अनी अपनी दशाओं में अशुभ

फल करेंगे ।

(३) मिथुन छग्न-मंगल, गुरु और सूर्यं अशुभ फल करते हैं। शुक्र शुभ फल

करता है । शनि गुरु का संयोग मेष लग्न के समान ही अशुभ होता है। यदि चन्द्र «

पाप न हुआ तो मारक नहीं होता । बुध शुक्र का संयोग राज योग कारक है। शुक्र

भी व्ययेश होने से कुछ बुरा हो जाता है।

(४) ककं ळग्न-शुक्र वुध अशुभ फल करते हैं । मंगल व गुरु शुभ फ करते हैं

गोचर विचार : १५३

केवल मंगल ही राजयोग कारक है । शनि मारक फल देता है । अन्य ग्रह तो केवल

कष्ट कारक ही हो सकते हैं ।

(५) सिंह लग्न-वुध शुक्र अशुभ, मंगल शुभ, शुक्र गुरु का संयोग शुभ नहीं है ।

बुध आदि ग्रह अपनी दशा अंतर्दशा में मारक फल करते हैं। (६) कन्या रूम्न-मंगल गुरु और चन्द्र पाप फल करते हैं । शुक्र बुध का संयोग

राजयोग कारक है। शुक्र ही विशेष मारक फल दायक है । मंगल आदि अपनी दशा

अंतर्दशा में मारक फल देते हैं ।

(७) तुला लग्न-गुरु सूर्थ मंगल अशुभ हैं | शनि बुश्र शुभ हैं। चन्द्र बुध का

संयोग राजयोग कारक है । गुरु मंगल की दशा अन्तर्दशा में मारक होगा ।

(८) वृश्चिक लग्न-वुध मंगल शुक्र अशुभ । चंद्र गुरु शुभ । सूर्य चन्द्र का योग

राजयोग कारक है । गुरु बुध आदि मारक फल प्रद हैं ।

(९) धनु लग्न-तरुध सूर्यं शुभ । शुक्र अशुभ । सूर्य बुध का संयोग राजयोग कारक

है शुक्र मारकेश. है ।

(१०) मकर-मंगल गुरु चन्द्र पाप प्रद, बुध शुक्र शुभप्रद, मंगल आदि ग्रह अपनी

दशा अन्तर्दशा में मारक फल प्रद है । एक शुक्र ही राजयोग कारक है ।

(११) कुम्भ-गुरु चन्द्र मंगळ पापप्रद है शुक्र शुभ प्रद है । मंगल शुक्र कां संयोग

राजयोग कारक है । गुरु मंगल चन्द्र अपनी दशा अन्तर्दशा में अशुभ फल देंगे ।

(१२) मीन ळग्न-शनि शुक्र सूर्य पाप फल । मंगल चन्द्रमा शुभ फल । मंगल

गुरु का संयोग राजयोग कारक है । केवल मंगल ही मारकेश नहीं हो सकता । शनि

बुध आदि पाप ग्रह भी अपनी दशा अन्तदंशा में मारक फळ देते हैं |

ये ग्रह विशेष लग्न में शुभ-अशुभ क्यों हैं अन्यत्र कारकेश आदि के वर्णन में रये

' हें । ३-६-११ स्थान के स्वामी पाप फल दायक हूँ २-७ के स्वामी मारकेश हैं ५-९

. के शुभ हैं इत्यादि वातों के विचार से यहाँ ग्रहों का शु त्त्र या अशुभत्व वर्णेन किया है ।

गोचर फल में विचारणीय बातें

(१) ग्रह जो शुभ फळ देने वाले हैं या जिसमें वह अच्छा फल देता है उस घर

में हो परन्तु वह नीच या शत्रु घर का या अस्त हो तो प्रभावहीन हो जाता है ।

( २) यह ऐसे नीच शत्रु गृही या अस्त ग्रह गोचर में अलाभ जनक घर में हो

तो अधिक रूप में बुरा फल देगा ।

(३) चन्द्र राशि से गितने पर जब १२- या १ घर में जावे तो पदच्युति धन

हानि जीवन को भय देते हैं ।

( ४ ) सूयं ८ में, मंगल ७वें, राहु ९वें, शुक्र छठे, गुरु तीसरे सूर्य ५वें, शनि पहला,

«बध चौथे स्थान में हो तो धन और मान की हानि करते हैं जीवन को भय देते हैँ ।

( ५) ग्रह अनिष्ट भाव में हो परन्तु उच्च या स्वक्षेत्री हो तो गोचर में वह

हानि नहीं करेया ।

« १५४: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( ६ ) शुभ फल देने वाले ग्रह की या शुभ ग्रह की दृष्टि हो और पाप ग्रह की भी

दृष्टि हो या शत्रु ग्रह से दृष्ट हो तो दोनों का प्रभाव जाता रहेगा । |

( ७ ) शुक्र ६-७-१० स्यान में गोचर में सिंह के समान भयानक होता है यदि

-इनके विपरीत वेध स्थान में कोई ग्रह न हो ।

(८) जम्म राशि से १, २, ४, ५, ७, ८, १२, वें स्थान में पड़ा सूर्य शनि मंगल

. राहु धन और प्राण का नाश करते हैं।

(९ ) जन्म पत्री में चन्द्रमा यदि ६-८-१२ वें स्थान में पड़ा हो और गोचर में

भ्रमण करते हुए जिस समय शनि, राहु या केतु या चन्द्र के पास पहुँचे उसी समय

संकट उपस्थित होगा, रोग होगा । .

( १०) सिंह राशि के चन्द्र और मंगल चतुर्थ में एकत्र हों तो बाल्यावस्था हीमें

जिस समय गोचर में किसी पाप ग्रह का संयोग या दृष्टि होगी उसी समय मातृ सुख

में विघ्न आयगा 1 र

( ११ ) नवम या-दशम स्थान में शनि पड़ा हो जिस समय उसका किसी गोचर के

पाप ग्रह से सम्बन्ध होगा तो सूर्य पितृ का कारक होने के कारण पितृ सुख“में विघ्न

होगा । सूर्यं के समीप जिस समय गोचर में शनि पहुँचेगा तब पिता की चिन्ता

खड़ी होगी । ps

तुला का सूर्यं नीच का होता है और तुळा या मेष पर शनि होगा तव पिता

. का नाश होगा, या अरिष्ट होगा । दि

( १३ ) लग्न में सूर्य हो यदि गोचर में लग्न में शनि आय तो शरीर पीड़ा होगी ।

(१४) लर्न में सूर्यं हो यदि गोचर में सप्तम में शनि आय तो स्त्रीचिन्ता होगी ।

(१५) घन में सूर्यं हो यदि गोचर में .धन में या अष्टम में शनि आय तो नेत्र

पीड़ा, आथिक बड़चन कुटुम्व की चिन्ता आदि होगी ।

(१६) तृतीय में सूर्य हो और ३ या ९ घर में शनि पहुँचे तो कर्णपीड़ा बंधु-

कलह आदि होगा ।

(१७) चतुर्थ में सूये हो और ४ या १० घर में शनि पहुँचे तो माता पिता की

चिन्ता, उदर विकार, हृदय रोग, व्यापार चिता आदि होगी ।

( १८ ) पंचम में सूर्य हो और ५ या ११ में शनि पहुँचे तो संतान की चिन्ता हो ।

( १९ ) षष्ठ में सूर्यं हो और ६ या १२ में शनि पहुंचे तो शत्रु और ऋण चिता

पड़े । इसी प्रकार जिस स्थान में सूर्य जन्म में पड़ा हो उस स्थान पर या उससे सप्तम

में शनि पहुंचे तो उस स्थान सम्बन्धी पीड़ा होगी ।

. (.२० ) इसी प्रकार नवम में गुरु बलवान्‌ होगा तो ९, २१, ३३, ४५, ६९ वर्ष

की आयु में भाग्योदय या लाभ होगा । -

. (२१) धन स्थान में जन्म में मंगल होगा तो २, १४, २६, ३८, ५०, ६२ वर्ष

की आयु में धन से कष्ट, कुटुम्ब की चिता ऋण चिता आदि होगी ।

(२२ ) चन्द्र शुभ भाव में भी पाप ग्रहों के बीच तथा पाप युक्त और पाप ग्रहों

=

गोचर विचार : १५%

से सप्तम भाव में हो तो अशुभ फल देगा ।

यदि शुभ ग्रह शुभ नवांश में या अधिमित्र नवांश में हो और गुरु से दृष्ट हो तो अशुभ भी हो तो शुभ फल देगा ।

गोचर में किस स्थान से क्या-क्या विचारता

(१) प्रथम स्थान--शरीर सुख, उत्साह, प्रयास, महत्त्वाकांक्षा आदि ।

(२) द्वितीय स्थान--द्रव्य संचय, सम्पत्ति की स्थिति, कुटुम्ब, आभूषण आदि ।

(३) तृतीय स्थान--बन्धु, उद्योग, पराक्रम, महत्त्वाकांक्षा, प्रयास, गुप्त शत्रु,

ज्येष्ठ वन्धु का विचार ।

(४) चतुर्थं स्थान--घर, जमीन, वाहन, कीति, सुख, राजकीय बंधन योग,तलधरा,

मृत मनुष्यों का धन ।

(५) पंचम स्थान--संतति, बुद्धि, आत्म मिलन, उद्योग की दिशा, व्यापार में

यश-अपयश, मातृधन ।

(६) षष्ठ स्थान--रोग, मामा, मौसी, गुप्त शत्रु, सेवक, मित्र, लोक विरोध ।

(७) सप्तम स्थान--विवाहित स्त्री सुख या पति सुख, मुकदमा, प्रीत, स्त्री का

रूप, प्रत्यक्ष शत्रु, वैद्यक, स्थलांतर ।

(८) अष्टम स्थान--कष्ट, अपमान, फौजदारी, श्वसुर आदि की स्थिति, पर-स्त्री

सम्बन्ध, विवाह से धन, अकस्मात्‌ लाभ, मृत्युपत्र से धन प्राप्ति ।

(५) नवम स्थान--भाग्योदय, यश, उत्कर्ष, धमं, समाजसेवा, सार्वजनिक कायं,

राजकीय संस्था से सम्बन्ध, लम्बी यात्रा, मुद्रण कला 4

(१०) दशम स्थान--रोजगार, नौकरी, अधिकार, राजदरबार, सामाजिक

सम्भान, पिता का विचार, प्रतिष्ठितता, चोरी का धन, ज्येष्ठ बन्धु की मृत्यु ।

(११) एकादश स्थान, लाभ, वन्धु सुख, मित्र, नवीन कार्य की योजना, पिता का

धन, माता की मृत्यु, पुत्र के शत्रु ।

(१२) द्वादश स्थान--शत्रु पीड़ा, संकट, द्रव्य नाश, मनुष्य हानि, उद्योग, ऋण

योग, आत्महत्या, हत्या, पूर्वाजित सम्पत्ति, गुप्त शत्रु, जेलखाना ।

जन्म नक्षत्र के चरण अनुसार गोचर में दिन का फल

किस नक्षत्र के किस चरण में जन्म हुआ यह जानकर गोचर में देखना कि गोचर

में जन्म नक्षत्र का यह चरण किस दिन पड़ता है। उस दिन के विचार से उस मास

का गोचर फल इस प्रकार होगा ।

ग्रहों का गोचर फल

सूर्यं का गोचर फल १२ भाव

(१) रविवार--उस मास में घूमा फिरी करने से व्यस्त होगा ।

(२) सोमवार--उस मास में अच्छा फल हो, उत्तम भोजन की प्राप्ति हो ।

(३) मंगलवार--उस मास में आलती हो, अग्नि भय हो ।

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पा क 0 हाईक 0 SE

१५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(४) बुधवार--उस मास में विद्यारचि बढ़े परन्तु भय हो ।

(५) गुरुवार--उक मास में वस्त्रादि की प्राप्ति और सुख हो ।

(६) शुक्रवार--सुख । (७) शनिवार--दुःख और सन्ताप ।

(१) उदर रोग, शरीर पीड़ा, मानसिक व्यथा, भोजन में शीघ्रता या बिलम्ब,

सम्बन्धी मित्र सज्जनों से झगड़ा। (योत्र) । थकावट, धन की हानि, उत्तेजना,

थकावट उत्पन्न करने वाली यात्रा ।

(२) दुजनों की सङ्गति, नीच स्वभाव, मानसिक व्यथा, सिर एवं नेत्र में पीड़ा

कृषि एवं वाणिज्य की हानि और भय । धन हानि, दुःखी, घर से धोखा, जिद्दी ।

(३) रोग से मुक्ति, सुख, आनन्द, मित्रों से सम्मान, पुत्रों से सुख और अभीष्ट

लाभ, शत्रुओं का पराजय एवं लक्ष्मी तथा मान की प्राप्ति । नया स्थान प्राप्ति, धन

प्राप्ति सुख ।

(४) मानसिक एवं शारीरिक व्यथा, घर-झगड़ा, सुख की हानि, कुत्सित भोजन व्यसन । यात्रा में असुविधाएँ, पृथ्वी के योग में विघ्न, रोग, स्त्री योग में विघ्न । (५) आसक्ति, मन की व्यग्रता, मित्रों से असुविधा, धन की हानि, दीनता, चित्त में अस्थिरता तथा शत्रु व रोग का भय, बुरा स्वास्थ्य ।

(६) आनन्द, कायं की सिद्धि, स्वस्थता, अन्न वस्त्र की प्राप्ति, शत्रुओं का नाश,

धन और मान की प्राप्ति एवं सुख, रोग दूर, दुःख और मानसिक चिन्ता दूर ।

(७) कुटुम्ब एवं मित्रों से मतभेद, स्त्री और सन्तान को रोग, कार्य में असफलता उदर पीड़ा, यात्रा, थकावट प्रद यात्रा, पेट और गुदा में रोग ।

(८) अपने बुरे कामों का फल, शत्रुओं से झगड़ा तथा पीड़ा, खाँसी, राजभय, अपनी स्त्री भी रुष्ट, शत्रुओं से दुवंचन प्राप्त, अपमान, भय से त्रास, अति गर्मी से पीड़ा ।

(९) कांतिक्षय, मिथ्या अपवाद, अकारण धन और पुण्य की हानि, आय की कमी रोग तथा मानसिक अशांति, भय, अपमान, बन्धु वियोग, अति निराशा ।

(१०) धन, स्वास्थ्य, मित्र, कुटुम्व, राजा एवं बड़े लोगों से समागम, आनन्द,

अभीष्ट सिद्धि, बड़ा कार्य सफलता पुर्वक पूर्ण ।

(११) लाभ, धन, उत्तम भोजन, नवीन पद, स्वास्थ्य, बड़ों का अनुग्रह, गृह में

कोई आनन्द उत्सव का सुख, घन प्राप्ति, रोग निवारण, मान ।

(१२) जन्म-भूमि का त्याग, कुटुम्वियों से वियोग, कार्य एवं पद की हानि, अधिक

व्यय और कठिनाइयाँ, दुःख, धन हानि, भित्रों से कलह, अन्त में ज्वर ।

२--चन्द्र का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--रोग मुक्ति, सुख और आनन्द, धन, सत्कार, उतम भोजन और शैया, स्त्री-

सम्भोग, उपहार की प्राप्ति, भाग्योदय ।

२--मानसिक असन्तोष, नेत्र, रोग, चावल के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भोजन,

धन हानि ।

AO EO डर आसाम ` काका FE

गोचर विचार : १५७

३--धन की प्राप्ति, वस्त्रादि का सुख, आरोग्य, शत्रुओं का पराजय, चित्त में

प्रसन्नता, धैय, इच्छित स्त्रियों का सङ्ग, सफलता प्राप्त ।

४--स्वजनों से झगड़ा, चित्त में चञ्चलता, कुक्षि पीड़ा, कार्य में हानि, भोजन

और निद्रा में असुविधाएँ, जल से भय ।

५--मार्ग में विघ्न, कायं नाश मन में अशान्ति, आसक्ति, धन या किसी प्रिय

पदार्थ की हानि वायु का प्रकोप, गठिया रोग, शोक ।

६--लाभ, स्वस्थता, घनागम, यश, आनन्द, स्त्रियों से वार्तालाप, अपने घर में

निवास, शत्रुओं का पराजय, रोग का विनाश ।

७--धन, सुख, वाहन, ख्याति, स्वास्थ्य, शान्ति, भोजन सुख एवं स्त्री द्वारा सुख।

८--रोग, अपच, झिल्ल्यों में पीड़ा, झगड़ा, चिन्ता, सपं भय, खाद्य भोजन

की प्राप्ति, अनहोनी वात हो ।

९--राजा से भय, वस्त्रादि की हानि, पुत्रों से मतभेद, देश का त्याग, उदर रोग,

व्यवस्था में हानि, विमारी ।

१० सुख, अभीष्ट सिद्धि, कार्यं में सफलता एवं स्वस्थता ।

११--छाभ, सुख, कुटुम्वियों से समागम, उत्तम भोजन, द्रव्य एवं अन्न की

प्राप्ति, आनन्द ।

१२--शोक. मानसिक एवं शारीरिक व्यथा, मान, कार्य और द्रव्य की हानि,

कुटुम्वियों की ओर से घृणा, व्यय ।

टिप्पणी--२-५-९ स्थानों में चन्द्र का अशुभ फल कहा है यह क्षीण चन्द्रमा का

फळ है । पूर्ण चन्द्र होने से शुभ फल होता है ।

३-मङ्गल के प्रत्येक भाव का गोचर फल

१--ज्वर-ब्रण, कुट्म्व एवं स्त्री से मतभेद, दुजंनों से कष्ट तथा भय, मन उदास,

बन्धुओ से वियोग, रक्त अशुद्ध का रोग, पित्त या गर्मी से रोग।

२--बल की हानि, मानसिक अशान्ति, कार्यो में निष्फलता, कठोर बचन, दुर्जनों

की संगति, राजा चोर अग्नि तथा पित्त रोग से भय, धन हानि, भय।

३--धन, खाने के पदार्थ, .ऊनी वस्त्र एवं आरोग्य की प्राप्ति, शत्रु की पराजय,

प्रत्येक कार्य में सफलता, सुख, स्वर्ण भूषण प्राप्ति ।

४--शत्रु बृद्धि, रुपया एवं वस्तुओं की कमी, स्वजनों से विरोध, अशुभ कार्य

निरत, मानसिक भय, ज्वर रुधिर तथा उदर रोग, स्थान हानि, वन्धुओं द्वारा शोक ।

५--धन नाश, भोजन में अतिकाल, पाप कमं में योग, शत्रुओं से पीड़ा, सन्तान

से दुःख, ज्वर, अनुचित इच्छा, मानसिक त्रास, पुत्र या बन्धुओ से झगडा ।

६--धन, अन्न, वस्त्र, सुवणं या तामू पश्र की प्राप्ति, ख्याति, लाभ, आनन्द, शत्रु

भयहीन, शुभ विचार, उदय, रोग से छ,उकारा, जीत, धन, लाभ, सब कार्यों में

सफलता, झगड़े का अन्त ।

१५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

७--धन का नाश, भोजन वस्त्र आदि में कमी, कुटुम्बियों (स्त्री) से असन्तोष,

भाई ओर सन्तान के क्रोध से दुःख, नेत्र एवं उदर रोग ।

८---शस्त्र प्यारा, परदेश वास, कार्य को हानि, पदच्युति, रोग एवं ऋण द्वारा मान हानि, ज्वर पीड़ा, जख्मो से दूषित देह, धन और मान नष्ट ।

९--अनादर, शरीर में पीडा, धातु क्षय से निर्बल, धन का अभाव, उष्णता, रोज￾गार के स्थान से हटना, धन आदि की हानि द्वारा अपमान, बल क्षय ।

१०--रोग दुःख, अपौष्टिक पदाथे का भोजन, किसी कार्यवश विदेश यात्रा,

रोजगार में विघ्न, दुष्ट चेष्टा, कार्य में असफलता, अन्य मत से धन प्राप्ति ।

११--उदय, आरोग्य, धन वस्त्र आदि की प्राप्ति, आनन्द, कायं में सफलता,

भूमि आदि की बढ़ती ।

१२--घन का व्यय, परदेश वास, सन्तप्त, रोग (नेत्र रोग), धन की हानि,

कुटुम्बियों से अनवन, अति उष्णता के रोग से पीड़ित ।

. बुघ का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--चुगलखोर, बन्धन; धन की हानि, कुटुम्ब से विरोध, झगड़ा, कुसमय का

भोजन, स्वागत विहीन, दुर्जनों की संगति ।

२--सवंदा आनन्द, धन एवं रत्नादि की प्राप्ति, अच्छे लोगों की संगति, अन्यमत

से अनादर ।

३ शत्रु भय,कुटुम्वियों से झगड़ा, धन हानि, अन्य मत से मित्र प्राप्ति ।

४--धन की प्राप्ति, माता या कुडुम्त्र को सुख, घन वृद्धि ।

५--पीड़ी, आकस्मिक झगड़ा, संतान व स्त्री से वियोग या अनवन, मृत्यु का भय,

गर्मी के कारण अंगों में शिथिलता ।

६- अन्न एवं वस्त्रादि की प्राप्ति, उत्तम पुस्तकादि के पढ़ने का सुख, सफलता ।

७--पीड़ा, सुख की हानि, द्रव्य की कमी, कुटुम्व एवं मित्रों से झगड़ा, राजभय,

निस्तेज शरीर, शरीर में शिथिलतां, विरोध ।

८--धन लाभ, पुत्र से सुख, बुद्धि का विकास, चित्त में अशांति, भोजन में अरुचि

मिथ्या वचन, सन्तान प्राप्ति ।

९- खेद, अपवाद, समस्त कार्यो में विघ्न बाधा- दूसरों को पीड़ा, कुत्सित भोजन,

पित्त से पीड़ा ।

१०--जये पद की प्रात्ति, वाक्य में चतुराई, शत्रु की पराजय से सुख, भोजन में

असुविधा, मन में अशान्ति, अपवाद ओर दुवंचन का पात्र ।

११--स्वस्थता, सुख, यश, धनागम, कुटूम्बियों से मित्रता, पुष्टि ।

१२--धन एवं सुख की हानि, चित में सन्तोष, भोजन में अरुचि, झगड़ा, कार्यों

में हानि, पराभव का भय ।

५--गुरु का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--भय, मान हानि, राजा से भय, रोजगार में झगड़ा, मानसिक व्यथा, पदार्थो