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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गोचर विचार : १५१

२०-२७ पेर नाश ` २१-२३ सिर आनन्द

२४-२५ नेत्र कुशल

२६-२७ पीठ मरणभय

विचार--जिस नक्षत्र पर जन्म का चन्द्र हो उससे गोचर के ग्रह के नक्षत्र तक गिनना जो संख्या आवे उसका फल यहाँ दिया है जैसे जन्म नक्षत्र के चन्र से सूर्य का नक्षत्र गोचर में पाँचवां है तो वह सिर में प्रभाव करेगा जिसका फल उन्नति है । इस प्रकार किसी समय गोचर ग्रह की स्थिति पर से विचार हो सकता है । यदि उस समय

अष्टक वर्ग की गणना से इसमें अधिक शुभ रेखा है तो शुभता का प्रभाव अधिक

बढ़ेगा । इस प्रकार से गोचर का दैनिक फल भी निकाल सकते हैं। गोचर फल पर विचार

जन्म लग्न, आधान लग्न फल एवं चंद्र राशि फल में बहुत कुछ समता दिखती है

इससे राशि कुंडली से ही गोचर फल का विचार बताया है । जन्म राशि ( जन्म चंद्र

की राशि ) को प्रथम स्थान मान कर शेष १२ स्थान को १२ भाव]मानकर फल विचा-

रना पड़ता है ।

चन्द्र प्रति २। दिन में बदलता रहता है । शीघ्रगामी है उसे छोड़कर शेष ग्रहों को

वर्तमान कोई अच्छे पंचाङ्ग से देखकर गोचर की कई कुंडलियाँ बना लेनी चाहिये ।

चंद्र छोड़ कर जब-जब कोई ग्रह बदलता है उस समय की एक-एक कुंडली प्रत्येक समय

की वना लेनी चाहिये । जेसे जब सूये बदला उसकी एक कुंडली बना लो आगे कोई

एक भी ग्रह वदले उसी समय की एक नवीन कुंडली वना लो । इस प्रकार वर्ष भर की

गोचर कुंडलियाँ बन जायगी उन कुंडलियों में समय भी लिख लो । फिर जन्म राशि से

प्रत्येक ग्रहों का फल आगे दिये हुए फल के अनुसार विचार लो ।

इसमें विशेष वात यह भी देखनी पड़ेगी कि जन्म काल के ग्रह से कौन से प्रकार

का दृष्टि योग आदि होता है। जन्म कुंडली के स्थान से अब विशेष ग्रह कोन से स्थान

में भ्रमण कर रहा है । जन्म कुंडली की ग्रह स्थिति से वर्तमान गोचर कुंडली का

लम कर देखना होगा कि जन्म का ग्रह अब गोचर में अच्छी या बुरी केसी स्थिति . में है।

जो ग्रह जन्म पत्नी में उत्तम स्थान में पड़ा हो वह गोचर में शुभ स्थान में आते ही

शुभ फल देगा । जो ग्रह जन्म में विगड़ा हो वह यदि गोचर में अच्छा भी होगा तो

भी शुभ फल नहीं देगा ।

जन्मराशि से गोचर फल विचारते समय इस वात का ध्यान रहे कि चन्द्र उस

राशि में कितने अंश कला विकला से जन्म में है। गोचर फल विचारते समय इस

प्रकार जन्म चन्द्र के अंश से इतर ग्रहों के अंश आदि के विचार से वह ग्रह किस भाव

में है और कौन-कौन ग्रहों की योग दृष्टि उस पर है पूरी परिस्थिति पर विचार कर

फल का निर्णय: करना पड़ेगा ।

जिस समय यह जानने की इच्छा हो कि किसी राशिवाले को अमुक समय अच्छा

| |

१५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

है या बुरा है। इसके लिए उसकी जन्म कुंडली देखो उसमें जन्म लग्न के विचार से

सूर्य आदि ग्रह अच्छे हैं या बुरे हैं।

आगे इसका विचार दिया है कि कौन लग्न होने से कौन-कौन ग्रह शुभ या अशुभ हो जाते हैं । ये ग्रह गोचर में जिस स्थान में जावेंगे उस स्थान का सम्बंधीफल उत्पन्न करेंगे । गोचर ग्रह जन्म के ग्रहों से जिस समय अंशात्मक या आसन्न योग करते हैं तव ही उनका ठीक फळ प्रकट होता है !

मनुष्य के जन्म समय ग्रह जिस अंश पर हो जब ठीक उसी राशि ओर अंश पर

गोचर का ग्रह भ्रमण करते हुए पहुंचता है तभी अपना शुभाशुभ फल देने में समर्थ

होता है । ऐसा समझ बैठना कि ग्रहों का राश्यन्त होते हो उस राशि का शुभाशुभ

फल होगा यह समझना सूक्ष्म पद्धति से अशुद्ध है चाहे वह स्थूलमान से ठीक हो । कोई

ग्रह किसी राशि में जन्म होने के पिछले अंशों का फल कैसे दे सकता है जव कि उस

समय उसका जन्म ही नहीं हुआ था । राशि पूरी ३०° की होती है ।

मान लो किसी की वृष राशि है उसमें १५° पर शुक्र है। स्थूल मान से वृष में

शुक्र है । जब शुक्र कन्या राशि में होगा तो पांचवाँ कहा जाता है ! परन्तु सूक्ष्म रूप से

विचार करते हैं तो वृष के १८° से मिथुन के १७° तक १ स्थान हुआ । ककं के १७°

तक दूसरा, सिंह के १७° तक तीसरा, कन्या के १७° तक चौथा ही स्थान हुआ । यहाँ

शुक्र चौथे स्थान का ही फल देगा पांचवें का फल नहीं देगा । आगे तुला के १७° तक

वह पांचवें स्थान का फल देगा । इस प्रकार ग्रह के अंशों के विचार से सूक्ष्म रीति से

विचार कर फल कहना ।

` जन्म लग्नानुसार गोचर फल का बिचार

जन्म कुण्डली के अनुसार मेषादिलग्न में जन्म होने से सूर्यादिग्रह क्या शुभाशुभ

` फल देते हैं यह जान लेना गोचर फळ विचार के लिये आवश्यक है। कोई लग्न होने से

कोन ग्रह शुभ कौन अशुभ है कोन ग्रह मारक होता है आदि हा विचार नीचे दिया. है ।

(१) जन्म लग्न मेष हो तो-शनि, बुध, शुक्र अशभ फलदायक हैं । गुह सूर्य शुभ

फजप्रद हैं । शनि गुरु का संयोग जहां राजकारक है वहां गुरु व्ययेश होने से, शनि

राभेश होने से अन्य प्रकार से पाप फल दायक अवश्य हैं । शनि का जिस समय शुक्र से

सम्वन्ध होता है मारक फल करता है क्योंकि शुक्र यहाँ मारकेश है।

(२) वृष लग्न-शनि, सूर्यं शुभ फक दायक हैं, गुर शुक्र चन्द्र पाप फळ देंगे ।

एक शनि ही राजयोग कारक है पर गुर शुक चन्द्र वुय अनी अपनी दशाओं में अशुभ

फल करेंगे ।

(३) मिथुन छग्न-मंगल, गुरु और सूर्यं अशुभ फल करते हैं। शुक्र शुभ फल

करता है । शनि गुरु का संयोग मेष लग्न के समान ही अशुभ होता है। यदि चन्द्र «

पाप न हुआ तो मारक नहीं होता । बुध शुक्र का संयोग राज योग कारक है। शुक्र

भी व्ययेश होने से कुछ बुरा हो जाता है।

(४) ककं ळग्न-शुक्र वुध अशुभ फल करते हैं । मंगल व गुरु शुभ फ करते हैं

गोचर विचार : १५३

केवल मंगल ही राजयोग कारक है । शनि मारक फल देता है । अन्य ग्रह तो केवल

कष्ट कारक ही हो सकते हैं ।

(५) सिंह लग्न-वुध शुक्र अशुभ, मंगल शुभ, शुक्र गुरु का संयोग शुभ नहीं है ।

बुध आदि ग्रह अपनी दशा अंतर्दशा में मारक फल करते हैं। (६) कन्या रूम्न-मंगल गुरु और चन्द्र पाप फल करते हैं । शुक्र बुध का संयोग

राजयोग कारक है। शुक्र ही विशेष मारक फल दायक है । मंगल आदि अपनी दशा

अंतर्दशा में मारक फल देते हैं ।

(७) तुला लग्न-गुरु सूर्थ मंगल अशुभ हैं | शनि बुश्र शुभ हैं। चन्द्र बुध का

संयोग राजयोग कारक है । गुरु मंगल की दशा अन्तर्दशा में मारक होगा ।

(८) वृश्चिक लग्न-वुध मंगल शुक्र अशुभ । चंद्र गुरु शुभ । सूर्य चन्द्र का योग

राजयोग कारक है । गुरु बुध आदि मारक फल प्रद हैं ।

(९) धनु लग्न-तरुध सूर्यं शुभ । शुक्र अशुभ । सूर्य बुध का संयोग राजयोग कारक

है शुक्र मारकेश. है ।

(१०) मकर-मंगल गुरु चन्द्र पाप प्रद, बुध शुक्र शुभप्रद, मंगल आदि ग्रह अपनी

दशा अन्तर्दशा में मारक फल प्रद है । एक शुक्र ही राजयोग कारक है ।

(११) कुम्भ-गुरु चन्द्र मंगळ पापप्रद है शुक्र शुभ प्रद है । मंगल शुक्र कां संयोग

राजयोग कारक है । गुरु मंगल चन्द्र अपनी दशा अन्तर्दशा में अशुभ फल देंगे ।

(१२) मीन ळग्न-शनि शुक्र सूर्य पाप फल । मंगल चन्द्रमा शुभ फल । मंगल

गुरु का संयोग राजयोग कारक है । केवल मंगल ही मारकेश नहीं हो सकता । शनि

बुध आदि पाप ग्रह भी अपनी दशा अन्तदंशा में मारक फळ देते हैं |

ये ग्रह विशेष लग्न में शुभ-अशुभ क्यों हैं अन्यत्र कारकेश आदि के वर्णन में रये

' हें । ३-६-११ स्थान के स्वामी पाप फल दायक हूँ २-७ के स्वामी मारकेश हैं ५-९

. के शुभ हैं इत्यादि वातों के विचार से यहाँ ग्रहों का शु त्त्र या अशुभत्व वर्णेन किया है ।

गोचर फल में विचारणीय बातें

(१) ग्रह जो शुभ फळ देने वाले हैं या जिसमें वह अच्छा फल देता है उस घर

में हो परन्तु वह नीच या शत्रु घर का या अस्त हो तो प्रभावहीन हो जाता है ।

( २) यह ऐसे नीच शत्रु गृही या अस्त ग्रह गोचर में अलाभ जनक घर में हो

तो अधिक रूप में बुरा फल देगा ।

(३) चन्द्र राशि से गितने पर जब १२- या १ घर में जावे तो पदच्युति धन

हानि जीवन को भय देते हैं ।

( ४ ) सूयं ८ में, मंगल ७वें, राहु ९वें, शुक्र छठे, गुरु तीसरे सूर्य ५वें, शनि पहला,

«बध चौथे स्थान में हो तो धन और मान की हानि करते हैं जीवन को भय देते हैँ ।

( ५) ग्रह अनिष्ट भाव में हो परन्तु उच्च या स्वक्षेत्री हो तो गोचर में वह

हानि नहीं करेया ।

« १५४: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

( ६ ) शुभ फल देने वाले ग्रह की या शुभ ग्रह की दृष्टि हो और पाप ग्रह की भी

दृष्टि हो या शत्रु ग्रह से दृष्ट हो तो दोनों का प्रभाव जाता रहेगा । |

( ७ ) शुक्र ६-७-१० स्यान में गोचर में सिंह के समान भयानक होता है यदि

-इनके विपरीत वेध स्थान में कोई ग्रह न हो ।

(८) जम्म राशि से १, २, ४, ५, ७, ८, १२, वें स्थान में पड़ा सूर्य शनि मंगल

. राहु धन और प्राण का नाश करते हैं।

(९ ) जन्म पत्री में चन्द्रमा यदि ६-८-१२ वें स्थान में पड़ा हो और गोचर में

भ्रमण करते हुए जिस समय शनि, राहु या केतु या चन्द्र के पास पहुँचे उसी समय

संकट उपस्थित होगा, रोग होगा । .

( १०) सिंह राशि के चन्द्र और मंगल चतुर्थ में एकत्र हों तो बाल्यावस्था हीमें

जिस समय गोचर में किसी पाप ग्रह का संयोग या दृष्टि होगी उसी समय मातृ सुख

में विघ्न आयगा 1 र

( ११ ) नवम या-दशम स्थान में शनि पड़ा हो जिस समय उसका किसी गोचर के

पाप ग्रह से सम्बन्ध होगा तो सूर्य पितृ का कारक होने के कारण पितृ सुख“में विघ्न

होगा । सूर्यं के समीप जिस समय गोचर में शनि पहुँचेगा तब पिता की चिन्ता

खड़ी होगी । ps

तुला का सूर्यं नीच का होता है और तुळा या मेष पर शनि होगा तव पिता

. का नाश होगा, या अरिष्ट होगा । दि

( १३ ) लग्न में सूर्य हो यदि गोचर में लग्न में शनि आय तो शरीर पीड़ा होगी ।

(१४) लर्न में सूर्यं हो यदि गोचर में सप्तम में शनि आय तो स्त्रीचिन्ता होगी ।

(१५) घन में सूर्यं हो यदि गोचर में .धन में या अष्टम में शनि आय तो नेत्र

पीड़ा, आथिक बड़चन कुटुम्व की चिन्ता आदि होगी ।

(१६) तृतीय में सूर्य हो और ३ या ९ घर में शनि पहुँचे तो कर्णपीड़ा बंधु-

कलह आदि होगा ।

(१७) चतुर्थ में सूये हो और ४ या १० घर में शनि पहुँचे तो माता पिता की

चिन्ता, उदर विकार, हृदय रोग, व्यापार चिता आदि होगी ।

( १८ ) पंचम में सूर्य हो और ५ या ११ में शनि पहुँचे तो संतान की चिन्ता हो ।

( १९ ) षष्ठ में सूर्यं हो और ६ या १२ में शनि पहुंचे तो शत्रु और ऋण चिता

पड़े । इसी प्रकार जिस स्थान में सूर्य जन्म में पड़ा हो उस स्थान पर या उससे सप्तम

में शनि पहुंचे तो उस स्थान सम्बन्धी पीड़ा होगी ।

. (.२० ) इसी प्रकार नवम में गुरु बलवान्‌ होगा तो ९, २१, ३३, ४५, ६९ वर्ष

की आयु में भाग्योदय या लाभ होगा । -

. (२१) धन स्थान में जन्म में मंगल होगा तो २, १४, २६, ३८, ५०, ६२ वर्ष

की आयु में धन से कष्ट, कुटुम्ब की चिता ऋण चिता आदि होगी ।

(२२ ) चन्द्र शुभ भाव में भी पाप ग्रहों के बीच तथा पाप युक्त और पाप ग्रहों

=

गोचर विचार : १५%

से सप्तम भाव में हो तो अशुभ फल देगा ।

यदि शुभ ग्रह शुभ नवांश में या अधिमित्र नवांश में हो और गुरु से दृष्ट हो तो अशुभ भी हो तो शुभ फल देगा ।

गोचर में किस स्थान से क्या-क्या विचारता

(१) प्रथम स्थान--शरीर सुख, उत्साह, प्रयास, महत्त्वाकांक्षा आदि ।

(२) द्वितीय स्थान--द्रव्य संचय, सम्पत्ति की स्थिति, कुटुम्ब, आभूषण आदि ।

(३) तृतीय स्थान--बन्धु, उद्योग, पराक्रम, महत्त्वाकांक्षा, प्रयास, गुप्त शत्रु,

ज्येष्ठ वन्धु का विचार ।

(४) चतुर्थं स्थान--घर, जमीन, वाहन, कीति, सुख, राजकीय बंधन योग,तलधरा,

मृत मनुष्यों का धन ।

(५) पंचम स्थान--संतति, बुद्धि, आत्म मिलन, उद्योग की दिशा, व्यापार में

यश-अपयश, मातृधन ।

(६) षष्ठ स्थान--रोग, मामा, मौसी, गुप्त शत्रु, सेवक, मित्र, लोक विरोध ।

(७) सप्तम स्थान--विवाहित स्त्री सुख या पति सुख, मुकदमा, प्रीत, स्त्री का

रूप, प्रत्यक्ष शत्रु, वैद्यक, स्थलांतर ।

(८) अष्टम स्थान--कष्ट, अपमान, फौजदारी, श्वसुर आदि की स्थिति, पर-स्त्री

सम्बन्ध, विवाह से धन, अकस्मात्‌ लाभ, मृत्युपत्र से धन प्राप्ति ।

(५) नवम स्थान--भाग्योदय, यश, उत्कर्ष, धमं, समाजसेवा, सार्वजनिक कायं,

राजकीय संस्था से सम्बन्ध, लम्बी यात्रा, मुद्रण कला 4

(१०) दशम स्थान--रोजगार, नौकरी, अधिकार, राजदरबार, सामाजिक

सम्भान, पिता का विचार, प्रतिष्ठितता, चोरी का धन, ज्येष्ठ बन्धु की मृत्यु ।

(११) एकादश स्थान, लाभ, वन्धु सुख, मित्र, नवीन कार्य की योजना, पिता का

धन, माता की मृत्यु, पुत्र के शत्रु ।

(१२) द्वादश स्थान--शत्रु पीड़ा, संकट, द्रव्य नाश, मनुष्य हानि, उद्योग, ऋण

योग, आत्महत्या, हत्या, पूर्वाजित सम्पत्ति, गुप्त शत्रु, जेलखाना ।

जन्म नक्षत्र के चरण अनुसार गोचर में दिन का फल

किस नक्षत्र के किस चरण में जन्म हुआ यह जानकर गोचर में देखना कि गोचर

में जन्म नक्षत्र का यह चरण किस दिन पड़ता है। उस दिन के विचार से उस मास

का गोचर फल इस प्रकार होगा ।

ग्रहों का गोचर फल

सूर्यं का गोचर फल १२ भाव

(१) रविवार--उस मास में घूमा फिरी करने से व्यस्त होगा ।

(२) सोमवार--उस मास में अच्छा फल हो, उत्तम भोजन की प्राप्ति हो ।

(३) मंगलवार--उस मास में आलती हो, अग्नि भय हो ।

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१५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(४) बुधवार--उस मास में विद्यारचि बढ़े परन्तु भय हो ।

(५) गुरुवार--उक मास में वस्त्रादि की प्राप्ति और सुख हो ।

(६) शुक्रवार--सुख । (७) शनिवार--दुःख और सन्ताप ।

(१) उदर रोग, शरीर पीड़ा, मानसिक व्यथा, भोजन में शीघ्रता या बिलम्ब,

सम्बन्धी मित्र सज्जनों से झगड़ा। (योत्र) । थकावट, धन की हानि, उत्तेजना,

थकावट उत्पन्न करने वाली यात्रा ।

(२) दुजनों की सङ्गति, नीच स्वभाव, मानसिक व्यथा, सिर एवं नेत्र में पीड़ा

कृषि एवं वाणिज्य की हानि और भय । धन हानि, दुःखी, घर से धोखा, जिद्दी ।

(३) रोग से मुक्ति, सुख, आनन्द, मित्रों से सम्मान, पुत्रों से सुख और अभीष्ट

लाभ, शत्रुओं का पराजय एवं लक्ष्मी तथा मान की प्राप्ति । नया स्थान प्राप्ति, धन

प्राप्ति सुख ।

(४) मानसिक एवं शारीरिक व्यथा, घर-झगड़ा, सुख की हानि, कुत्सित भोजन व्यसन । यात्रा में असुविधाएँ, पृथ्वी के योग में विघ्न, रोग, स्त्री योग में विघ्न । (५) आसक्ति, मन की व्यग्रता, मित्रों से असुविधा, धन की हानि, दीनता, चित्त में अस्थिरता तथा शत्रु व रोग का भय, बुरा स्वास्थ्य ।

(६) आनन्द, कायं की सिद्धि, स्वस्थता, अन्न वस्त्र की प्राप्ति, शत्रुओं का नाश,

धन और मान की प्राप्ति एवं सुख, रोग दूर, दुःख और मानसिक चिन्ता दूर ।

(७) कुटुम्ब एवं मित्रों से मतभेद, स्त्री और सन्तान को रोग, कार्य में असफलता उदर पीड़ा, यात्रा, थकावट प्रद यात्रा, पेट और गुदा में रोग ।

(८) अपने बुरे कामों का फल, शत्रुओं से झगड़ा तथा पीड़ा, खाँसी, राजभय, अपनी स्त्री भी रुष्ट, शत्रुओं से दुवंचन प्राप्त, अपमान, भय से त्रास, अति गर्मी से पीड़ा ।

(९) कांतिक्षय, मिथ्या अपवाद, अकारण धन और पुण्य की हानि, आय की कमी रोग तथा मानसिक अशांति, भय, अपमान, बन्धु वियोग, अति निराशा ।

(१०) धन, स्वास्थ्य, मित्र, कुटुम्व, राजा एवं बड़े लोगों से समागम, आनन्द,

अभीष्ट सिद्धि, बड़ा कार्य सफलता पुर्वक पूर्ण ।

(११) लाभ, धन, उत्तम भोजन, नवीन पद, स्वास्थ्य, बड़ों का अनुग्रह, गृह में

कोई आनन्द उत्सव का सुख, घन प्राप्ति, रोग निवारण, मान ।

(१२) जन्म-भूमि का त्याग, कुटुम्वियों से वियोग, कार्य एवं पद की हानि, अधिक

व्यय और कठिनाइयाँ, दुःख, धन हानि, भित्रों से कलह, अन्त में ज्वर ।

२--चन्द्र का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--रोग मुक्ति, सुख और आनन्द, धन, सत्कार, उतम भोजन और शैया, स्त्री-

सम्भोग, उपहार की प्राप्ति, भाग्योदय ।

२--मानसिक असन्तोष, नेत्र, रोग, चावल के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भोजन,

धन हानि ।

AO EO डर आसाम ` काका FE

गोचर विचार : १५७

३--धन की प्राप्ति, वस्त्रादि का सुख, आरोग्य, शत्रुओं का पराजय, चित्त में

प्रसन्नता, धैय, इच्छित स्त्रियों का सङ्ग, सफलता प्राप्त ।

४--स्वजनों से झगड़ा, चित्त में चञ्चलता, कुक्षि पीड़ा, कार्य में हानि, भोजन

और निद्रा में असुविधाएँ, जल से भय ।

५--मार्ग में विघ्न, कायं नाश मन में अशान्ति, आसक्ति, धन या किसी प्रिय

पदार्थ की हानि वायु का प्रकोप, गठिया रोग, शोक ।

६--लाभ, स्वस्थता, घनागम, यश, आनन्द, स्त्रियों से वार्तालाप, अपने घर में

निवास, शत्रुओं का पराजय, रोग का विनाश ।

७--धन, सुख, वाहन, ख्याति, स्वास्थ्य, शान्ति, भोजन सुख एवं स्त्री द्वारा सुख।

८--रोग, अपच, झिल्ल्यों में पीड़ा, झगड़ा, चिन्ता, सपं भय, खाद्य भोजन

की प्राप्ति, अनहोनी वात हो ।

९--राजा से भय, वस्त्रादि की हानि, पुत्रों से मतभेद, देश का त्याग, उदर रोग,

व्यवस्था में हानि, विमारी ।

१० सुख, अभीष्ट सिद्धि, कार्यं में सफलता एवं स्वस्थता ।

११--छाभ, सुख, कुटुम्वियों से समागम, उत्तम भोजन, द्रव्य एवं अन्न की

प्राप्ति, आनन्द ।

१२--शोक. मानसिक एवं शारीरिक व्यथा, मान, कार्य और द्रव्य की हानि,

कुटुम्वियों की ओर से घृणा, व्यय ।

टिप्पणी--२-५-९ स्थानों में चन्द्र का अशुभ फल कहा है यह क्षीण चन्द्रमा का

फळ है । पूर्ण चन्द्र होने से शुभ फल होता है ।

३-मङ्गल के प्रत्येक भाव का गोचर फल

१--ज्वर-ब्रण, कुट्म्व एवं स्त्री से मतभेद, दुजंनों से कष्ट तथा भय, मन उदास,

बन्धुओ से वियोग, रक्त अशुद्ध का रोग, पित्त या गर्मी से रोग।

२--बल की हानि, मानसिक अशान्ति, कार्यो में निष्फलता, कठोर बचन, दुर्जनों

की संगति, राजा चोर अग्नि तथा पित्त रोग से भय, धन हानि, भय।

३--धन, खाने के पदार्थ, .ऊनी वस्त्र एवं आरोग्य की प्राप्ति, शत्रु की पराजय,

प्रत्येक कार्य में सफलता, सुख, स्वर्ण भूषण प्राप्ति ।

४--शत्रु बृद्धि, रुपया एवं वस्तुओं की कमी, स्वजनों से विरोध, अशुभ कार्य

निरत, मानसिक भय, ज्वर रुधिर तथा उदर रोग, स्थान हानि, वन्धुओं द्वारा शोक ।

५--धन नाश, भोजन में अतिकाल, पाप कमं में योग, शत्रुओं से पीड़ा, सन्तान

से दुःख, ज्वर, अनुचित इच्छा, मानसिक त्रास, पुत्र या बन्धुओ से झगडा ।

६--धन, अन्न, वस्त्र, सुवणं या तामू पश्र की प्राप्ति, ख्याति, लाभ, आनन्द, शत्रु

भयहीन, शुभ विचार, उदय, रोग से छ,उकारा, जीत, धन, लाभ, सब कार्यों में

सफलता, झगड़े का अन्त ।

१५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

७--धन का नाश, भोजन वस्त्र आदि में कमी, कुटुम्बियों (स्त्री) से असन्तोष,

भाई ओर सन्तान के क्रोध से दुःख, नेत्र एवं उदर रोग ।

८---शस्त्र प्यारा, परदेश वास, कार्य को हानि, पदच्युति, रोग एवं ऋण द्वारा मान हानि, ज्वर पीड़ा, जख्मो से दूषित देह, धन और मान नष्ट ।

९--अनादर, शरीर में पीडा, धातु क्षय से निर्बल, धन का अभाव, उष्णता, रोज￾गार के स्थान से हटना, धन आदि की हानि द्वारा अपमान, बल क्षय ।

१०--रोग दुःख, अपौष्टिक पदाथे का भोजन, किसी कार्यवश विदेश यात्रा,

रोजगार में विघ्न, दुष्ट चेष्टा, कार्य में असफलता, अन्य मत से धन प्राप्ति ।

११--उदय, आरोग्य, धन वस्त्र आदि की प्राप्ति, आनन्द, कायं में सफलता,

भूमि आदि की बढ़ती ।

१२--घन का व्यय, परदेश वास, सन्तप्त, रोग (नेत्र रोग), धन की हानि,

कुटुम्बियों से अनवन, अति उष्णता के रोग से पीड़ित ।

. बुघ का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--चुगलखोर, बन्धन; धन की हानि, कुटुम्ब से विरोध, झगड़ा, कुसमय का

भोजन, स्वागत विहीन, दुर्जनों की संगति ।

२--सवंदा आनन्द, धन एवं रत्नादि की प्राप्ति, अच्छे लोगों की संगति, अन्यमत

से अनादर ।

३ शत्रु भय,कुटुम्वियों से झगड़ा, धन हानि, अन्य मत से मित्र प्राप्ति ।

४--धन की प्राप्ति, माता या कुडुम्त्र को सुख, घन वृद्धि ।

५--पीड़ी, आकस्मिक झगड़ा, संतान व स्त्री से वियोग या अनवन, मृत्यु का भय,

गर्मी के कारण अंगों में शिथिलता ।

६- अन्न एवं वस्त्रादि की प्राप्ति, उत्तम पुस्तकादि के पढ़ने का सुख, सफलता ।

७--पीड़ा, सुख की हानि, द्रव्य की कमी, कुटुम्व एवं मित्रों से झगड़ा, राजभय,

निस्तेज शरीर, शरीर में शिथिलतां, विरोध ।

८--धन लाभ, पुत्र से सुख, बुद्धि का विकास, चित्त में अशांति, भोजन में अरुचि

मिथ्या वचन, सन्तान प्राप्ति ।

९- खेद, अपवाद, समस्त कार्यो में विघ्न बाधा- दूसरों को पीड़ा, कुत्सित भोजन,

पित्त से पीड़ा ।

१०--जये पद की प्रात्ति, वाक्य में चतुराई, शत्रु की पराजय से सुख, भोजन में

असुविधा, मन में अशान्ति, अपवाद ओर दुवंचन का पात्र ।

११--स्वस्थता, सुख, यश, धनागम, कुटूम्बियों से मित्रता, पुष्टि ।

१२--धन एवं सुख की हानि, चित में सन्तोष, भोजन में अरुचि, झगड़ा, कार्यों

में हानि, पराभव का भय ।

५--गुरु का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--भय, मान हानि, राजा से भय, रोजगार में झगड़ा, मानसिक व्यथा, पदार्थो

गोचर विचार : १५९

की हानि, देश का त्याग, अधिक खर्च, अन्यमत से बैर । २- धन और सुख की प्राप्ति, ख्याति, उन्नति,शत्रुहोन तथा दानादि में रुचि,प्रभाव।

३--पीड़ा, विघ्न, कुटूम्वियों से झगड़ा. रोजगार में झंझट, स्थान से च्युति, शरीर में पीड़ा, रोग, पिता की मृत्यु ।

४--मन में अशांति, धन एवं कांति की हानि, शत्रु की वृद्धि, कुटुम्बियो से असु-

विधा, देश का त्याग, बंधु द्वारा शोक, अपमान, पशु भय ।

५--सुख, उन्नति, धनागम, कायं में सफलता, कुटुम्बियों से आनन्द, पद की प्राप्ति, संतान प्राप्ति, राजानुकूल से मित्रता ।

६--शोक, स्त्री, संतान और कुटुस्बियों से झगड़ा, अग्नि चोर राजा से भय, गह

में सब प्रकार की उदासीनता, शत्रु से एवं रोग से पीड़ित ।

७--राजा से मान, उत्तम भोजन, कायं में सफलता, आरोग्य, वुद्धि में चमत्कार,

अनेक सुखों का योग, विवाह आदि उत्सवों में सुख, शुभ कार्य में यात्रा स्त्री एवं

संतान सुख ।

८--शोक, रोग, चोर अग्नि राजा से भय, क्रोध की वृद्धि, वाक्य में कठोरता,

कांति की हानि, पद च्युति, शारीरिक कष्ट, त्रास जनक यात्रा से थकावट, दुःखी, धन हानि, अभाग्यवान्‌ ।

९--धन की प्राप्ति सुख, उत्तम भोजन, स्त्री, सहवास, पुत्र से सुख, विचार

शीलता, घर की प्राप्ति, सब प्रकार की उन्नति ।

१०--हीनता, अन्न तथा धन की हानि, स्वजनों से अपवाद, निरुद्यमता, अपवाद,

स्थान और जायदाद का भय, संतान भय ।

११--धन एवं प्रतिष्ठा की वृद्धि, कांति, बल, आनन्द, शत्रुओं की हानि, समस्त

कार्यो में सफलता, संतान प्राप्त, नया पद, मान ।

१२--दरिद्रता का दुःख, विश्वास पात्रों से कलंक, निवास स्थान का त्याग, शुभ

कार्यों में धन का व्यय, मुकदमे बाजी । द्रव्य के कारण दुःख और भय ।

६. शुक्र का प्रत्येक भाव का गोचर फल

१--सुख और धन की प्राप्ति, शत्रु का नाश हो, जातक दुराचारौ हो, सब प्रकार

का भोग भोगे ।

१--धन की वारम्वार प्राप्ति, स्त्री से सुख, मान की वृद्धि, शरीर में नीरोगता;

वस्त्रादि की प्राप्ति, सव प्रकार से सुख ।

३--व्यवसाय में हानि, धन की कमी, रोजगार में गडबडी, शत्रुओं की वृद्धि, मतां-

तर से प्रसन्नता, पद की प्राप्ति, तरवक्री ।

४--धन की प्राप्ति, मनमानी वातों का करना, मित्र कुटुम्ब एवं स्त्री का सुख,

स्त्री सहवास । भरे र ४--पुत्र और कुटुम्ब से प्रीति, नौकरों की वृद्धि, लाभ, अन्त एवं धन की प्राप्ति,

अच्छे भोजन का सौभाग्य, प्राप्त ।

१६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

६--शत्रु की वृद्धि एवं उससे हानि, दायभागियों से झगड़ा, पुत्र तथा संतान से

मनोव्यथा, विपत्ति ।

७--शोक, बड़े परिश्रम से जीविका निर्वाह, जननेन्द्रिय रोग का भय, किसी से

अपमानित होने का भय, स्त्री की पीड़ा ।

८--धन की प्राप्ति, सुख की वृद्धि, दुःख की समाप्ति ।

९--उत्तम वस्त्र आदि का लाभ, इच्छित पदार्थों की प्राप्यि, स्वस्थता सुख ।

१०--पीड़ा, मानसिक व्यथा, धन की हानि, शत्रुओं से भय, निवंलता, स्त्रियों से

दुःख, कलह ।

११--धन की प्राप्ति, प्रताप, कार्य में सफलत।, धन का आगमन, उत्तम भोजन

की प्राप्ति, अभय ।

१२--शस्त्र एवं चोर से भय, सब कार्यो में विघ्न बाधा, मतांतर से धन तथा

वस्त्रादि लाभ ।

शनि का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--वुद्धि भ्रंश, शरीर निस्तेज, मानसिक और शारीरिक पीड़ा, रोग, कुटुम्बियों

से झगड़ा, दाह क्रिया करे ।

२--क्लेश, वेवात का झगड़ा, स्वजनो से बैर, घन की हानि, कार्य में सफलता,

संतान हानि ।

३--आरोग्य, सुख, कार्यो में सफलता, पद, धन एवं नौकरी की प्राप्ति परन्तु

दुराचरण शीलता होती है ।

४--शत्रु की वृद्धि, रोग, स्थान का परिवतंन, स्त्री और कुटुम्वियों से वियोग, धन

की कमी परन्तु अन्न को प्राप्ति, धन हानि ।

५--अशान्ति, कायं में सफलता, कुटुम्बियों में मुकदमेबाजी, पुत्र से वियोग, धन

एवं सुख की हानि, दुष्ट स्त्रियों का संग, परेशानी, संतान हानि, मतांतर से पुत्र से सुख ।

६--धन, अन्न और सुख की वृद्धि, कुटुम्ध एवं स्त्रीगण से सुख, शत्रु पर विजय,

मकान बनाने का सौभाग्य ।

७--दोष, मानसिक व्यथा, धन की हानि, परदेश वास, स्त्री को पीड़ा, यात्रा,

भय से उद्वेग ।

८--पीड़ा, द्रव्य की हानि, कार्य में निष्फलता, अव्यवस्थित जीवन एवं रोग,

संतान हानि, पशु मित्र घन हानि।

९दुःख, रोग,शत्रु की वृद्धि, कभी-कभी धन की प्राप्ति । इसी प्रकार स्त्री तथा

संतान से कभी सुख एवं कभी असुविधा, धन हानि, अच्छे कार्यों में वाधा, पिता बंघु

की मृत्यु, लगातार शोक ।

१०- दुःख मानसिक व्यथा, पाप कमं, नौकरी एवं रोजगार में विघ्न वाधा,

निर्धनता, हृदयरोग से पीड़ित, मान हानि ।

गोचर विचार : १६१

११- धन की प्राप्ति, रोग से मुक्ति, किसी उच्च अधिकार और स्त्री-सतान आदि

से सुख, मान प्राप्ति ।

१२--क्षति, दरिद्रता, दूर यात्रा, व्यय में अधिकता एवं मानसिक व्यथा, बेकार

फल हानि, कार्य करने से परेशानी ।

राहु तथा केतु का गोचर फल प्रत्येक भाव का

१--हानि, रोग । २-निर्धनता, धन हानि । ३-धन लाभ, सुख । ४-बैर शोक ।

५-धन हानि, शोक | ६-धन लाभ, सुख । ७-कलह, हानि । ८-पीड़ा, जीवन को भय ।

९-पाप कमं में वृद्धि । १०-बैर अन्यमत से लाभ । ११-सुख । १२-धन हानि, खर्च।

राहु केतु उसी ग्रह का फल देता है जिस छर में राहु केतु जन्म के समय था। जसे

कुण्डली में राहु वृष का है तो शुक्र का फल देगा केतु वृश्चिक राशि में होने से मंगल

का फल देगा ।

गोचर में अनिष्टकारी ग्रह क्या रोग करते हैं

(१) रवि--रक्तपित्त विकार, सिर एवं मुँह में पीड़ा ।

( २) चन्द्र--कफ और रक्त के विकार से छाती एवं गले में रोग।

( ३ ) मंगल--पित्त मज्जा कफ व रक्त दोष से सिर पीठ और उदर में पीड़ा ।

( ४ ) वुध--त्रिदोष विकार से हाथ-पैरो में पीड़ा ।

( ५ ) गुरु-वात कफ जनित पीड़ा, कमर एवं जांघ में रोग ।

( ६) शुक्र--अंडकोष में कफ रोग जनित पीड़ा ।

( ७ ) शनि--वायुविकार से जानु एवं पट्टी में पीड़ा ।

स्थानवश से संक्षिप्त में गोचर फल

स्थान शुभ ग्रह का फल पाप ग्रह का फल

१--शरीर सुख, भाग्य वृद्धि, सुख । १--शरीर पीड़ा, आलस्य, दुर्बुद्धि, अहँकार।

२--उत्र्षं, कुटुम्बी सुख, अवसर पर द्रव्य २--आत्मविरोध, द्रव्य हानि असत्य भाषण,

प्राप्ति, सम्पत्ति । नेत्र विकार । 3

३-_वंधु सुख, यश, विद्या में रुचि, प्रवास से ३--बंधु संकट, यात्रा, मित्र से त्रास,

लाभ । क्लेश, साधारण यात्रा ।

४. जायदाद का सुख, वाहन मुख, कीति ४--जायदाद से मामूली लाभ, वाहन से

स्थाई कुलाभिमान का प्रतिपालन । त्रास, मातृसुख में कमी ।

५-वुद्धिमात्‌, राजदरबार में यश, संतान ५--परीक्षा में फेल, संतान चिता, उद्योग

सुख कल्पना, कुलदीपक, व्य लाभ । में कमी, झूठा अभिमान ।

६--विरोधो बड़े सज्जनों से त्रास, परोप- ६--साहसी, रोग नाश, शत्रु की हार,

कार, उत्तम कार्य में प्रवृत्ति । मामा से स्वार्थ ।

७--विवाह सुख, साझेदारी में लाभ, मुक- ७--स्त्री से त्रास, सुख हानि, यात्रा में

दमे में सफलता । मुकदमा मामले में हानि ।

[1 ११

१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

८--स्त्री द्वारा या मृत्युलेख से लाभ, किसी ८--अविचारी काम में प्रवृत्त ओर उससे का ट्रस्टी होकर लाभ, स्त्रीनिधन प्राप्त । लाभ विषैले जीवों से भय विशेष पीड़ा । भाग्य अनुकूल, अनेक प्रकार के सुख ९--भाग्योदय में अड्चन, महत्वाकांक्षा में धर्माचरण में प्रेम, बड़ों की कृपा । कठिनाई, परदेश में भाग्योदय १ १०-सत्कर्मा, सत्याग्रही, उद्योग व्यापार में १०-पितृक्लेश, अहितकारी कार्य में प्रवेश मान, कुलकोति का विस्तार, समाज में कीति। उच्च स्थित से नीची स्थिति, समाज

विरोधी कार्ये । ११-साम्पत्तिक भोग, प्रबल उद्योग व्यापार ११-अकतंव्यों से भी लाभ उठाने वाले या नोकरी में सफलता, साहसी,

मित्रों में सफलता ।

१२-सत्कार में व्यय, परमार्थ की ओर ध्यान, शत्रु वृद्धि, अधिकार में

विघ्नं । संक्षिप्त गोचर फल का चक्र स्थान सूयं चंद्र १--यात्रा, रोग भाग्योदय, सुख, थकावट लाभ, श्रेष्ठ

अन्न प्राप्त २--भय दुःख धोखा घन हानि थोड़, धन हानि लाभ संतोष

सुख ३--धन प्राप्ति सफलता, धन

स्थान प्राप्ति लाभ सुख, सुख यात्रा ४---रोग, विध्न, कुक्षि में रोग,

व्यशन, खचं, कलह,

चिता भय

५-दीनता, क्षोभ, शोक, विध्न, बुरा स्वास्थ्य, वृद्धि मान यश

संतान कष्ट, खर्च

दन शत्रु नाश, सुख लाभ, शत्रु नाश, दुःख और रोग दूर, उत्तम चिता दूर सम्पत्ति छ-यात्रा, स्त्रीपीड़ा, घन लाभ,सुख, पेट व गुदा में रोग, राज-मान्यता

अधिकारियों की कृपा, वड़े भाई को

अनिष्ट, बंधु कलह ।

१२-द्रव्य सम्वन्धी हानि, अपमान, दुष्कीति, ऋणग्रस्त स्थिति,अधिकारी

प्रतिकूल,राजदण्ड |

मंगल बुध

रोग भय, कष्ट बन्धनकष्ट

वियोग धनहानि

चोर भय धन- धन लाभ,

हानि, नेत्र- सुख

पीड़ा, चिता

घन लाभ,कायं शत्रु भय सफल सुख पराक्रम

शत्रु वृद्धि, स्थान- धन वृद्धि

हानि, उदर रोग, सुख लाभ

भय, मातृ कष्ट

ज्ञान धन हानि, पीड़ा, कलह चिता, झगड़ा, बुद्धि वृद्धि ज्वर, भय

घन लाभ, सफलता शोक, शत्रु व शत्रुनाश सुख रोग शत्रु रोगसे पीड़ा भय व झगड़ा अन्त

धननाश, रोग, कष्ट पीड़ा, भय, हानि, मनो-मालिन्य विरोध,छाभ

गोचर विचार : १६३

च-अति पीड़ा, त्रास रोगअनहोनी शस्त्र से चोट धन लाभ, रोग

रोगभय झगड़ा घटना, कलह,पीड़ा कुसंग संतान आदि, हानि,

अपमान भय नष्ट कष्ट भय

९-कांतिक्षय, भग राअभय, रोग, रोगअपमान, खेद, विध्न,

अपमान निराशा, धर्म लाभ, धन हानि, यात्रा, मित्र

चिता कुबुद्धि द्रव्य लाभ यात्रा प्रेम

१०- अभीष्ट सिद्धि, लाभ, आनंद लाभ, वृद्धि लाभ, सुख पुष्टि,

सुख यश, रोग दूर घनागम

११-लाभ सुख मान लाभ, आंनंद लाभ, वृद्धि, लाभ, पुष्टि, धना-

नया पद यश, रोग दूर गम, सुख

१२--खचं, दुःख शोक, खर्च, हानि, धन हानि, अधिक धन नाश,

कलह, पीड़ा कष्ट खर्च, रोग शेय पराभव

धन हानि का भय

गुरु शुक्र शनि राहु केतु

१-भय, कष्ट खर्च स्त्रीसुख, शत्रु स्थान हानि, भय, कष्ट, हानि, रोग

देशत्याग नाश, हषं रोगपीड़ा भोग रोग चिता

२-धन प्राप्ति प्राप्त धन लाभ, धन हानि धन हानि, विरोध

सुख सुख क्लेश खर्चे, चिता हानि

३-रोग पीड़ा, बाधा अति सुख शुभ, सुख, पद सुख धन लाभ

स्थान हानि तरक्की प्राप्ति घन लाभ जय

चिता पराक्रम लाभ

४-शत्रु वृद्धि, शोक, धनलाभ,सुख, शत्रु वृद्धि पीड़ा, शोक बैर भय

कष्ट, धन हानि मित्र वृद्धि बंधन, विरोध क्ष्ट

अपमान हाति कष्ट

५-सुख, हर्ष, मित्रता संतानप्राप्ति पुत्रक्लेश धनशोक धन हानि कष्ट

लाभ, संतान घनागम क्षय, त्रा भय कपट कुबुद्धि हानि

प्राप्ति कष्ट चिता

इ-शत्रवुद्धि सुख वृद्धि, लाभ, घन प्राप्ति) लाभ

विपत्ति शत्रु नाश सुख जय

७-राजमान्य, शुभ शोक, भय, दोष यात्रा भय, हानि, विवाद, थोड़ा

यात्रा, सुखी, स्त्री को कलह, स्त्री को अपमान शोक

्त्रीकष्ठुलाभ पीड़ा पीड़ा शोक

द-दुःख, धन धन लाभ, रोग, पीड़ा और हानि, पीड़ा जीवन का संकट

भय कलह, हानि रोग शत्रु भय भय, रोग- भय

भय यात्रा से थकावट कष्ट

१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

९-सुख, लाभ वस्त्र लाभ, घन सुख, बाधा, शोक, पापकर्म अपमान प्रतिष्ठा लाभ, सुख कुसंग, धन कुबुद्धि कपठ हानि कृष्ट

१०-मानवृद्धि नय धन लाभ,अभय, धन सुख मान सुख धन लाभ लाभ पद लाभ, हषं अधिकार प्राप्त प्राप्त लाभ, यश भय

११-मान वृद्धि, नया घन लाभ, अभय धन सुख मान सख धन लाभ यश पद लाभ, हर्ष अधिकार प्राप्ति यश मान प्राप्ति धन लाभ

१२-पीडा दुःख, धन प्राप्त अनेक अनर्थे द्रव्य हानि विरोध

भय हानि आपत्ति भय खर्च, पीड़ात्रास हानि

गोचर फल शुभाशुभ समय

१-शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में यदि चंद्र शुभ हो तो सारा शुक्ल पक्ष शुभ होता है;

छ 0] अनिष्ट हो तो वह पक्ष अनिष्ट का होगा ।

र-कृष्णपक्षकी , टि अनिष्ट हो तो वह पूराकृष्णपक्षअनिष्ट होगा। .

क शुभहोतो ,, क शुभ होगा ।

गोचर में कौन ग्रह कब फल देते हैं

१--सूर्ये और मंगल जबकि राशि में प्रवेश करते हैं तो आदि में प्रवेश करते ही

फल देते हैं अर्थात्‌ किसी रोशि के १०० पर आदि में फल देते हैं ।

२--गुरु शुक्र राशि के मध्य में जाने के बाद फल देते हैं मध्य के तीसरे भाग में

१०१ के आगे २०१ तक मध्य भाग में ।

३--चंद्र शनि---राशि के अन्त में जाने पर अन्तिम तीसरे भाग में फल देते हैं

अर्थात्‌ २० से ३०° तक अन्तिम भाग में ।

४--बुध और राहु-अपने सम्पूर्ण भाग में अर्थात्‌ सवेदा फल देते हैं ।

१--सूये-जव एक राशि से दूसरी राशि में जाता है उस समय से ५ दिन पूर्व ही

से आगामी राशि के फल की सूचना देता है

२--चंद्र-३ घड़ी पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है ।

३--मंगलू-८ दिन पहिले ही आगामी राशि के फल की सूचना देता है ।

४-_वुध=७ दिन पहिले ही आगामी राशि गत फले की सूचना देता है ।

५--गुरु-२ मास पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता

६--शुक्र=७ दिन पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है ।

७--शनि= ६ मास पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है।

८--राहु5३ मास पहिले ही आगामी राशि गत फल की सूचना देता है। अन्यमत से समय

र्‍सूर्य-१ राशि पर १ मास रहता है=प्रथम के ५ दिन फल देता है ।

२--चंद्र १ राशि पर २। दिन्न रहता है अन्त की ३ घड़ी फल देता है ।

३--मंगल १ राशि पर १॥ मास रहता है प्रथम ८ दिन फल देता है ।

गोचर विचार : १६५

४--बुध १ राशि पर १ मास रहता है सवंकाल फल देता है ।

५--गुरु १ राशि पर १३ मास रहता है मध्य के २ मास फल देता है ।

६--शुक्र १ राशि पर १ मास रहता है मध्य के ७ दिन फल देता है ।

७--शनि १ राशि पर २० मास रहता है अन्त के ६ मास फल देता है ।

८---राहु केतु १ राशि पर १८ मास रहता है अन्त के २ मास फल देता है ।

गोचर में नक्षत्र के विचार से ग्रहों के अंग और फल

जन्म नक्षत्र से गिनने पर २७ नक्षत्र जांतक के अंग विभाग में ग्रहों के अनुप्तार

वटे हैं वे नीचे बताये गरे हैं । जन्म नक्षत्र को १ गिन कर आगे वताये क्रमानुसार अंग

की गणना करना । वर्तमान नक्षत्र जिस अंग में पड़े फल विचारना ।

सूर्य का गोचर में अंग विभाग और फल

जन्म नक्षत्र से नक्षत्रों का क्रम अंग विभाग फल

१--पहिला नक्षत्र मुख हानि

२--२, ३, ४ और ४ वां नक्षत्र सिर धन वृद्धि

३--६, ७, ८ और १९ वाँ नक्षत्र छाती सफलता'

४---१०, ११, १२ और १३ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ सम्पत्ति लाभ

५--१४,१५,१६,१७,१८,१९ वाँ नक्षत्र दोनों पैर धन हानि

६--२०, २१, २२, २३ वाँ नक्षत्र बायाँ हाथ शारीरिक बीमारी

७--२४, २५ वां नक्षत्र दोनों आँख लाभ

८--२६ और २७ वाँ नक्षत्र जननेन्द्रिय जीवन को भय

चन्द्र का अंग विभाग के अनुसार गोचर फल

जन्म नक्षत्र से वर्तमान नक्षत्र तक अंग विभाग फल

१--पहिला और दूसरा नक्षत्र चेहरा अतिशय भय

२--३, ४, ५, ६ वाँ नक्षत्र सिर रक्षा

३-७, ८ वाँ नक्षत्र पीठ शत्रु दमन

४-९, १० वां नक्षत्र दोनों आँख सम्पत्ति लाभ

५-११, १२, १३, १४, १५ वाँ नक्षत्र छाती मानसिक सुख

६-१६, १७, १८ वाँ नक्षत्र वाँया हाथ कलह

७-१९,२०,२१,२२,२३,२४ वाँ नक्षत्र दोनों पैर विदेश यात्रा

८-२५, २६, २७ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ सम्पत्ति लाभ

मंगल का अंगविभाग के अनुसार गोचर फल

जन्म नक्षत्र से बर्तमान नक्षत्र तक संख्या अंग विभाग फल

१--पहिला दूसरा नक्षत्र मुख जीवन को भय

२--३, ४, ५, ६, ७, ८ वाँ नक्षत्र दोनों पैर कलह

३--९, १०, ११ वाँ नक्षत्र छाती सफलता

४--१२, १३, १४, १५ वाँ नक्षत्र बायां हाथ गरीबी

१६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

५-- १६, १७ वाँ नक्षत्र सिर

६-१५५ १९, २०, २१ वाँ नक्षत्र चेहरा

७--२२, २३, २४, २५ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ ८---२६, २७ वाँ नक्षत्र दोनों आँखें बुध गुरु शुक्र के अंग विभाग के अनुसार गोचर फल

जन्म नक्षत्र से वर्तमान नक्षत्र तक संख्या अंग विभाग

१--१, २, ३ रा नक्षत्र सिर

२-४, ५, ६ वाँ नक्षत्र मुख ३--७, ८, ९, १०, ११, १२ वाँ नक्षत्र दोनों हाथ ४-१३, १४, १५, १६, १७ वाँ नक्षत्र पेट ५-१८, १९ वाँ नक्षत्र जननेन्द्रिय

६-२०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७ वाँ, दोनों पेर शनि राहु और केतु का अंग विभाग फल

जन्म नक्ष से वर्तमान नक्षत्र तक संख्या अंग विभाग १--प हिला नक्षत्र मुख २--२, ३, ४, ५ वाँ नक्षत्र दाहिना हाथ ३--६, ७, ८ वाँ नक्षत्र दाहिना पेर ४--९, १०, ११ वाँ नक्षत्र बाँयाँ पैर

५-०१२, १३, १४, १५ वाँ नक्षत्र बाँयाँ हाथ ६--१६, १७, १८, १९, २० वाँ नक्षत्र पेट (कुक्षि) ७--२१, २२, २३ वाँ नक्षत्र सिर ८-२४, २५ वां नक्षत्र दोनों नेत्र ९--२६, २७ वाँ नक्षत्र पीठ गोचर से तक्षत्र विचार

लाभ

अतिभय

सुख

विदेश यात्रा

फल

दुःख या शोक लाभ

कुछ अनहोनी हो द्रव्य का आना

हानि कीति मान

स्त्री भोग

सुख

सुख

जीवन का भय

गोचर विचार : १६७

गोचर से नक्षत्र. वेध फल

इस प्रकार ७ रेखाओं का चक्र बनाकर २८ नक्षत्र यहाँ बताये अनुसार लिखे जहाँ

तीर का निशान दिया है वहाँ से अन्य नक्षत्र की संख्या और नाम लिखना यहाँ बताये

क्रम से आरम्भ करे और अभिजित सहित पूरे २८ नक्षत्र लिख ले 1

१--जतंमान सूर्य नक्षत्र जहाँ हो वहाँ लिख ले यदि जन्म नक्षत्र से सूर्य नक्षत्र का

वेध हो तो जीवन को भय शंका होती है ।

२--जन्म नक्षत्र से १९ वें नक्षत्र से वेध हो तो भय ओर चिन्ता हो ।

३--जन्म नक्षत्र से १० वें नक्षत्र से वेध हो तो धन हानि हो चिन्ता हो ।

` इन स्थानों में सूर्य पाप प्रह युक्त हो तो मृत्यु का अनुभव करना ।

४--यदि उपरोक्त ३ प्रकार के नक्षत्र में से कोई दूसरे पाप ग्रहों के होने से सूयं

की छोड़कर, वेध हो तो मृत्यु हो ।

५--यदि शुभ ग्रह से वेध हो तो जीवन को कोई भय न होगा । इसी प्रकार सब

ग्रहों का.विचार करना ।

६--यदि जन्म नक्षत्र से गिनने पर १, ३, ५, ७, १०, १९, २२ वाँ वेध वर्तमान

पाप ग्रह के नक्षत्र से हो तो जोवन को भय यदि शुभ ग्रह हो तो व्यापार में केवल

हानि हो । र

७--जब सूर्यं संक्रमण जिस दिन हो ( जव सूर्य नई राशि में प्रवेश कर ) या

और कोई ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में जावे ।

या जव ग्रहण हो या ग्रह युद्ध हो या उल्कापात (अकाशसे तारे गिरना) हो तो इन

दिनों में १-१० और १९ वाँ नक्षत्र पड़े तो मृत्यु या इसी प्रकार की अनहोनी घटना हो ।

उल्का--कांल प्रकाशिका मत में सूर्य नक्षत्र से १० वाँ तारा (नक्षत्र) परन्तु बल￾भद्र मत से सूर्य नक्षत्र से २१ वाँ तारा ।

अन्धतारा--अन्ध तारा--पहिला । अनुजन्म या कपंक्ष-जन्म से १० वाँ तारा

आधान या त्रिदन्म तारा-जन्म से १९ बाँ तारा है ऐसा भी कहा है ।

गोचर में शनि का विशेष विचार १--शनि की साढ़े सातो

जन्म राशि से १२ वें स्थान, जन्म राशि पर एवं द्वितीय स्थान पर जब शनि '

रहता है तो उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हँ । शनि एक राशि पर २॥ वर्ष रहता है

इस प्रकार ३ राशि में ७॥ वर्ष हा जाते हैं । इसमें बहुत कष्ट होता है ।

जन्म राशि से जब १२ वें घर में शांन जाता है उस समय से पूरा प्रभाव डालने

लगता है यदि शनि वक्री हो तो ७॥ वर्ष से भी अधिक समय लग जाता है । पंचांग से

पता लग जाता है कि विशेष जन्म राशि वाले को कौन समय से साढ़े साती आरंभ होगी।

साढ़े साती में नाना प्रकार के क्लेश, दुष्टों से भय, कार्य में हानि, विदेश भ्रमण,

संतान पीड़ा, सम्पत्ति नाश, पशुओं से पीड़ा और मृत्यु तक कर देता है, मनमें अशांति,

रोग, स्मरण शक्ति का हास आदि होता है ।

१६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जब १२ वाँ शनि हो तो-शनि की दृष्टि । जन्म राशि में-शनि का भोग । और द्वितीय स्थान में-शनि की लात कही जाती है। जिसका दीर्घ जीवन है उसके जीवन में ३ बार साढे साती आती है । पहिले फेरे में इनमें सब या कुछ बुरा फल देता है परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है और नाना प्रकार से व्यथित कर देता है । दूसरे फेरे में साढे साती का वेग वहुत धीमा हो जाता है कभी-कभी दुःख तो अवश्य होता है परन्तु यथार्थ में उतना हानिकर नहीं होता । दूसरे फरे में किसी को कुछ अच्छा भी फल देता है जिससे उन्नति होती है। परन्तु तीसरा फेरा अर्थात्‌ अन्तिम साढ़े साती प्रायः मृत्यु को ही बुला छाती है कोई भाग्य￾वान्‌ हो इस साढे साती को पाता है ।

साढ़े साती सदा अनिष्ट जाती है ऐसा नहीं है । जव शनि और चंद्र इनकी युति योग, केन्द्र योग या प्रति योग हो तो उस समय साहे साती में विशेष त्रास होता है । साढ़े साती का शुभाशुभ विचार

प्रत्येक राशि के साढ़े साती समय में कौन समय शुभ या अशुभ है यही वताया जाता है--

१-मेष राशि-मीन का पहिला २॥ वपं अति अशुभ मान, धन, मनुष्य की हानि हो । वृष का अंतिम २॥ वर्ष शुभ है ।

२-वृष-मेष का २॥ वर्ष अशुभ । वृष का २॥ वषं शुभ । मिथुन का शुभ धन आदि प्राप्त के लिये अनुकूछ है ।

३-मिथुन राशि-वृष का २॥ वर्ष शुभ, ककं का २॥ वपं शुभाशुभ, सिंह का २॥ वर्ष अशुभ ।

४-कर्क राशि-मिथुन का २॥ वर्ष शुभ, ककं का २॥ वषं शुभाशुभ, सिंह का २॥ वर्षे अशुभ ।

५-सिंह राशि-क्रकं २॥ वर्ष अशुभ, । सिंह २॥ वर्ण अशुभ। कन्या २॥ वपं शुभ।

६-फन्या राशि-सिंह का २॥ वर्ष अशुभ, कन्या का शुभ, तुला का अति शुम ।

इस समय अचानक धन स्थावर मशीन लाभ व श्रेष्ठ दर्जे का शुभ फल मिले ।

७-तुला राशि-कृच्या का शुभ, तुला का अति श्रेष्ठ, वृश्चिक का अति अशुभ ।

८-वृश्चिक राशि-तुला का श्रेष्ठ, वृश्चिक का कनिष्ठ, धन का मध्यम ।

९-धन राशि-तृश्चिक् का अशुभ, धन का शुभ, मकर का मध्यम ।

१०-मकर राशि-धन का शुभ, मकर का मध्यम, कुंभ का उत्तम ।

११--कुंभ राशि-मकर का साधारण. कुंभ का शुभ, मोन काशुभ।

१२--मीन राशि-कुंभ का शुभ, मीन का शुभ, मेष का अशुभ फल ।

विशेष विचार-साढ़े साती का फल विचार करते समय शुभाशुभ भाव शुभाशुभ

ग्रहों की दृष्टि एवं योग पर भी ध्यान देना ।

अन्य मत से साढ़े साती का अनिष्ट समय

मेष राशि को दुसरा २॥ वषं वृष राशिको प्रारम्भ के २॥ वर्ष

गोचर विचार : १६९

वृश्चिक राशि अंत के ५ वर्ष मिथुन राशि “अंत के २। वषं घनराशि >्पहिले ५ वर्ष ककं राशि =दूसरा २॥ वर्ष मकर राशि ज्यहिले २॥ वषं सिंह राशि पहिले ५ वर्ष कुंभ राशि =भंत के २॥ वषं

कन्या राशि =्पहिले २॥ वषं मीन राशि =अंत के २॥वपं

तुला राशि =अन्त के २॥ वषं

शनि की साढ़े साती में तीनों स्थान का फल

१--व्यय में शनि-व्यय की मात्रा अधिक, अकस्मात्‌ धन हानि, एक स्थान में

शांति पूर्वक वास कठिन हो । स्वास्थ्य भी बिगड़े ।

२-णलग्न में शनि-शरीर की शांति एवं स्वास्थ्य में हानि, चित्त में अशांति, धन

का व्यय धन हानि, कार्य में विघ्त, कार्य असफल होने से धन का खच ।

३--धन में शनि-बन्धु वर्गों से अनायास निरथेक झगड़ा, कुटूम्वियों को रोग या

किसी की मृत्यु के कारण अधिक खर्च ।

जन्म कुण्डली से साढ़े साती का विचार

१--अन्म कुंडली में शनि ६-८-१२ भाव में होकर अशुभ ग्रह से युक्त या ६

दुष्ट हो तो अशुभ फल ।

२--जन्म चन्द्र यदि २ या १२ भाव में होकर मंगळ, सूर्य, राहु से युक्त हो तो

अशुभ फल ।

३--जन्म चन्द्र निवंछ हो शुभ ग्रहों से दृष्ट नहीं हो तो साढ़े साती का अशुभ

फळ होता है।

४- जन्म चन्द्र यदि वृश्चिक या शत्रुराशि में होकर राहु केतु मंगल से युक्त'व

दृष्ट हो तो अशुभ है ।

५--जन्म चन्द्र के २ और १२ भाव में शुभ ग्रह हो या इनपर शुभ दृष्टि हो तो

शुभ फल होता है ।

६--जन्म चंद्रके २-१२ स्थानमें कोई ग्रह न हो तो भी साधारण शुभ फल मिलेगा।

७--जन्म चंद्र यदि गुरु शुक्र बुध से युक्त हो नो साढे साती का शुम फल होगा ।

८--जन्म चन्द्र शनि से युक्त हो पर मंगल से दृष्ट न हो तो साढ़े साती का

शुभ फल होगा।

९--जन्म चन्द्रमा तथा शनि २, ६, ८, १२, स्थान में हो व नीच के या पाप

राशि के सोथ हो या अस्तंगत तथा पापदृश्य या पाप युक्त होकर ८-१२ स्थान में पड़े

हों तो शनि की साढ़े साती अशुभ फल करेगी ।

१०--यदि जन्म में सबल चंद्र युक्त शनि (लग्न या चंद्रमा से केन्द्र या त्रिकोण में)

हो या राज्येश, लाभेश, पंचमेश से सम्बन्धित हो और शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो

तो सब प्रकार से सुख कारक होता है।

१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जन्म चंद्र से शनि=१-६-११ स्थान में-स्वर्ण पाद=्सव प्रकार का सुख हो

» =रजत पाद=्अच्छा भाग्य, काम सफल

» उत्ताम्‌ पाद-समफल, मध्यफल अच्छा न बुरा

„» सलोह पादस्धन नाश, दुःख दरिद्र दायक ।

शनि कीं साढ़ेसाती में शनि कब किस अंग पर है विचारना

फल नरपति-जयचर्योक्त शनि नराकार चक्र

हानि जन्म नक्षत्र से शनि के वर्तेमान नक्षत्र तक

हानि गिनना जिस अंग पर शनि आवे उसका

फल नीचे दिया है ।

“लाभ नक्षत्र क्रम अंग फल

लांभ १ मुख हानि

लाभ ४ दक्षिण भुज जय

लाभ ६ चरण भ्रम

भय शू हृदय श्री प्राप्ति मृत्यु ४ वाम भुज भय

जय ३ शीर्ष राज्य

सोख्य २ नेत्र सौख्य

पर्यटन २ गुह्य मृत्यु भय

योग २७

जन्म नक्षत्र से शनि जिस नक्षत्र पर हो उस नक्षत्र तक गिन के फल का विचार करना

शनि का चरण विचार

१ » रै-१०९

[7] कर =३-७-१०

71 ४. =४-८-१२

भाव मास अंग

व्ययस्थान ७ मस्तक

व्ययस्थान ९ नेत्र

व्ययस्थान ८ मुख

व्यथस्थान ६ कंठ

जन्मस्थान १० हृदय

जन्मस्थान ११ उदर

जन्मस्थान ५ नाभि

जन्मस्थान ४ गुह्यांग

धनस्थान १३ घुटना

घनस्थान १२ जंघा

धनस्थान ५ पाद

नारदोक्त शनि चक्र

नक्षत्र क्रम अवयव

१ ललाट

३ दुख

२ गुह्य

२ नेत्र

शर हृदय

४ वाम हस्त

३ वाम पाद

३ दक्षिण पाद

¥ दक्षिण हस्त

२७ नक्षत्र

फल उदाहरण

रोग जन्म नक्षत्र चित्रा हो और गोचर में

लाभ शनि आश्लेषा पर हो तो चित्रा से

हानि आश्लेषा तक गिनने से २३ संख्या

लाभ आई तो दक्षिण पाद के ३ नक्षत्रों

सौख्य में शनि आया जिसका फल इष्ट

बंधन यात्रा है 1

दुःख

इष्ट यात्रा

अर्थ लाभ