सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
आयुर्दाय विचार : २१७
अल्पायु ३३-शनि ३ पाप ग्रहों से युक्त हो और शुक्र गुरु के योग से रहित हो तो आयु
और पुण्य क्षीण हो ( जा० सं० )।
३४-अष्टमेश पाप ग्रह होकर लाभ स्थान में हो ( जा० लं० )।
३५-अष्टमेश पाप ग्रह होकर अष्टम में हो ( जा० लं० ) ।
३६-कुंडली में लग्न, लग्नेश, सूर्य व चन्द्र निर्वेल हो पाप ग्रह से पीडित हो तो
आयु क्षीण होती है ( वाल बोध ज्यो० ) ।
३७-अष्टमेश लग्न से सप्तम में हो ।
३८-लग्नेश व्यय में हो, तृतीय भाव, तृतीयेश, अष्टम भाव या अष्टमेश पाप ग्रह
से दुष्ट हो ।
३९-लग्न से चन्द्र ६-८-१२ भाव में हो पाप ग्रह ८-१२ घर में हो ।
४०-६-८-१२ भाव में गुरु युक्त चन्द्र हो ।
४१-पफ्रेन्द्र त्रिकोण में पाप ग्रह वलवान् हो लग्नेश बलहीन हो ।
४२-पाप ग्रह युक्त चतुर्थेश और पंचमेश दशम में हो ।
४३-अष्टमेश केतु युक्त लग्न में हो ।
४४-अष्टमेश सप्तमेश युक्त पंचम घर में हो राहु से दृष्ट हो ।
४५-कुंडली में किसी की पूर्णायु या मध्यायु योग हो तो अल्पायु योग नष्ट हो
जाता है ( ज्यो० रहस्य ) ।
४६-शुक्र गुरु दोनों धन स्थान में, पंचम में मंगल और शनि हो चन्द्रमा वल
हीन हो तो अल्पायु हो। मतांतर--गुरु शुक्र लग्न में, पापग्रह युक्त
मंगल पंचम में हो ।
४७-लगन में लग्नेश और सूयं चन्द्र हो किसी शुभाशुभ गूह से युक्त या दुष्ट हो।
४८-लग्न में पाप ग्रह हो किसी राशि का चन्द्र पाप युक्त सप्तम में शुभ ग्रह
की दृष्टि रहित हो ।
४९-लग्न से व्यय भाव में क्षीण चन्द्र हो, लग्न पापग्रह युक्त हो, लग्न व
अष्टम स्थान में कोई शुभ ग्रह न हो ।
५०-लग्न से चन्द्र ६-८ घर में पाप ग्रह से दृष्ट, शुभ ग्रह से अदुष्ट हो ।
५१-लग्न में क्षीण चन्द्र हो अष्टम घर व केन्र में पाप ग्रह हो ।
५२-चन्द्र ४, ७, ८ स्थान में कहीं हो पाप ग्रह उसके आगे पीछे हो ।
५३-चंद्र कोई राशि में कहीं हो पर अंत नवांश में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न
हो, पाप ग्रह नवम पंचम स्थान में हो ।
५४-ऊग्न में चंद्र व सप्तम में पाप ग्रह हो ।
५५-लग्न रों सूर्यं और चंद्र हो पाप ग्रह ९-५ या ८ घर में हो शुभ ग्रह की
उस पर दृष्टि न हो ।
५६-रूग्न से बारहवें घर में शनि, चवम में सूर्य, लग्न में चन्द्र, अष्टम में
मंगल बलवान् हो उस पर गुरु की दृष्टि न हो ।
२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अल्पायु ५७-क्षीण चंद्र णाप ग्रह युक्त हो १, ५, ७, ८, ९ में से किसी स्थान में शुभ
ग्रह भी न हो और न शुभ ग्रह की दृष्टि हो ।
» १प-चंद्र जिस राशि में हो उस राशि में कोई बलवान् अरिष्ट कारक ग्रह हो।
» ५९-प्रातः व संध्या को किसी का जन्म हो उस समय जो लग्न हो उस लग्न में
चंद्र हो या पाप ग्रह उस लग्न के अन्तिम नवांश में हो ( प्रा० योग )
बाल अरिष्ट--जिस ग्रह की दशा में अर्थात् जन्मकाल में जो शेष दशा किसी
ग्रह की हो उसके भीतर या अंत में मरे तो वह बाल अरिष्ट है ।
१. मंगल की राशि में गुरु अष्टम में हो सब पाप ग्रहों से दृष्ट हो शुभ ग्रहों की
दृष्टि न हो तो अरिष्ट हो ( जा० सं० )।
२. षष्ठ स्थान में चन्द्र हो तो अरिष्ट करता है ।
३. सूर्य ग्रहण हो, सूर्य लर्न में हो तो शस्त्र लगकर अरिष्ट हो ।
४. पाप ग्रह शत्रु या नीच राशि में हो तो अरिष्ट करता है । धन रहित, सुख
रहित बन्धन से संतप्त मरण करता है ( स० चि० ) ।
५. जन्म लग्न ककं या वृश्चिक हो इसमें पाप ग्रह लग्न से सातवें भाव तक हों
शुभ ग्रह सातवें घर से लग्न तक होवें तो अरिष्ट कारक है यह वज्मुक्ति योग
है ( जा० भ० ) ।
६. पाप ग्रह युक्त चन्द्र १, ७, ८, १२ घर में हो, केन्द्र शुभ ग्रह युक्त न हो, चन्द्र
पर शुभ दृष्टि न हो तो बालारिष्ट होता है ( जा० पारि० )।
७. १२ वें भाव में सव ग्रह अरिष्ट कारक होते हैं सूर्य शुक्र चन्द्र और राहु ये विशेष
नेष्ट होते हैं । परन्तु इन चारों की दृष्टि अरिष्ट भंग करने वाली होती है (वृ. पा.) ।
८. किसी भी राशि में एक अंश में शनि मंगल, चन्द्रमा से केन्द्र में हो तोऽवह
२ माता या दाई से पालित होने पर भी नहीं जीता ( वृ० पा. ) ।
९. चन्द्र को शनि विशेष तीसरी दृष्टि से देखें तो भयानक वाल अरिष्ट होता है
( ज्यो० रहस्य० ) ।
१०. लग्नेश चन्द्र राशीश और लग्न-नवांशेश तीनों सूर्य के साथ हों ।
११. पाप ग्रह लग्न और अष्टम स्थान में हो, नीच या शत्रु गृही चन्द्र हो, गुरु
केन्द्र में न हो।
१२. मंगल लग्न में हो, सूर्य शनि एक दूसरे के साथ लग्न से सप्तम में हों ।
१३. लगन से अष्टम में चन्द्र और सप्तम में मंगल हो, राहु नवम हो, शनि लग्न
में हो तो भयानक बालारिष्ट हो । द
१४. लग्न, चन्द्र ओर लग्न से अष्टम स्थान पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो ( ज्यो० रह० ) गुरु या शुक्र केन्द्र में हो, मंगल सूर्य शनि की दृष्टि हो तो बाल अरिष्ट नष्ट हो
जाता है । ( ज्यो० रह० ) ।
१५. संध्या में जन्म हो, चक्र का होरा हो और राशि नवांश से अन्य भाग में
जन्म हो ( ज्यो० शा० ) ।
आयुर्दाय विचार : २१५
मध्यायु ८--लग्नेश अष्टमेश और दशमेश इनमें २ बली हों शनि का योगन हो तो
श्र
५ £]
श्र
४७
11
मध्यायु ( जा० परि० )
९---मुरु केन्द्र त्रिकोण में हो और वह बलहीन लग्नेश के साथ हो ।
१०-छग्न से तीसरे और छठे घर का स्वामी केन्द्र में हो ।
११--गुर या शुक्र केन्द्र में हो।
१२--जो पुनवंसु नक्षत्र में उत्पन्न हो वह साधारण प्रकार से मध्यायु होता है ।
जवकि कोई वालारिष्ट या अल्पायू योग न हो ।
१३--जत्र कोई वालारिष्ट अल्पायु योग पूर्ण आयु योग न हो तो मध्यायु योग
समझना ।
अल्पायु योग
अल्पायु १--मेष वृश्चिक राशि का गुरु अष्टम में हो, सूर्य मंगल शनि चन्द्रगा से दृष्ट हो और शुक्र न देखता. हो तो अल्पायु हो (जा० भ० )
२--ग्रुर ओर शुक्र दोनों लग्न में
हों पाप ग्रह पंचम में हो
( जा० छं० ) ।
३-लग्नेश सूर्य युक्त होकर लग्न
में कूर ग्रहों से युक्त या दुष्ट
हो (जा० लं० ) ॥|
४--सातवें घर में मंगळ, आठवें
शुक्र, नवम सूर्य हो (छ. चं)
अल्पायु पर धनी हो ( मान० ) ।
५--वारहवे में चन्द्र,छठे में पापग्रह हो तो अल्पायु और रोगी हो (ल० च०) | ६--पांप ग्रह या लग्नेश से युक्त अष्टमेत्र अष्टम हो ( वृ० पा० ) जैसे अष्टमेश की स्थिति से आयु का विचार होता है उसी प्रकार दशमेश से भी विचारना ( वृ० पा० ) ।
७--पाप ग्रहों के साथ अष्टमेश कहीं हो ओर लग्नेश अष्टम स्थान में हो ( जैमि० ) इसी प्रकार शनि और दशमेश से भी विचारना ( जैमि० )। ८-लग्नेश नीच में हो, अष्टम स्थान पाप ग्रह से युक्त हो, लग्नेश निर्वल हो ( ज॑मि० ) ।
९-लग्न से पंचम स्थान, अष्टमेश ओर अष्टम स्थान पप ग्रह युक्त हो (जैमि०)। १०-अष्टमेश पाप गृही होकर ६-८-१२ भाव में पाप ग्रह युक्त हो (जैमि०) । ११-अष्टमेश पाप ग्रह युक्त ६ या १२ भाव में हो (जैमि०) । १२-अष्टमेश लग्नेश युक्त ६ या वारह भाव में हो और निर्वल हो ।
२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अल्पायु १३-दशमेश, लग्नेश अष्टमेश केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हों तो दीर्घायु योग होता
श्र
है परन्तु उक्त ग्रह शनि के साथ हो तो अल्पायु योग हो जाता है (जैमि०) ।
१४-६-८-१२ भाव भें पाप ग्रह हो लग्नेश निर्वल हो शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट न
हा तो अल्पायु और संतान हीन हो ( जा० पारि० ) ।
१५-अष्टमेश या शनि क्रूर षष्ठ्यंश में हो पाप ग्रह युक्त हो ( जा० पारि० )।
१६-पाप ग्रह २-१२ भाव में क्रूर षष्ठ्यंश में हो शुभ दृष्ट न हो (जा.पारि.) ।
१७-लग्नेश नीच राशि नीच नवांशक में हो, पापग्रह छठे आठवें होवें,माँदि लग्न
में हो शुभ दृष्ट न हो तो अल्पायु हो अपने कुछ का नाशक हो (स० चि०) । १८-शनि लग्न मों हो किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो अल्पायु हो और
कुटुम्व का नाशक हो ( स० चि० )।
१९-अष्टमेश नीच में हो अष्टम भाव में पाप ग्रह हो, लग्नेश निर्बल हो (वु? पा० )। २०-तृतीयेश और मंगल ये दोनों या अष्टमेश और शनि ये दोनों अस्त हों या पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों ( वृ० पा० ) ।
२१-छम्नेश पाप ग्रह युक्त ६, 5, १२ भाव में हो तो अल्पायु या संतान हीन हो ( वृ० पा० ) । २२-केन्द्र में पाप ग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो ओर लग्नेश निर्वल
हो ( वृ० .पा० )।
-२३-२, १२ भाव में पाप ग्रह हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो
(वृ० पा० ) 1
२४-छग्नेश और अष्टमेश दोनों अस्त नीचादि स्थिति में हों और निर्वल हों ( बूर पा० ) । २५-दशमेश, अष्टमेश, लग्नेश इन तीनों में कोई एक वली हो तो अल्पायु हो (जार पारि० ) । इन तीनों में कोई बली न हो तो गतायु समझो । २६-छग्नेश अष्टम में हो या अष्टमेश पापग्रह युक्त या दृष्ट होकर अस्तंगत या शत्रु गृही हो तो आयु रहित हो ( जा० पारि० ) । २७-अस्तंगत व बलवान् पापग्रहों में दुःखी व अल्पायु जातक व उसको स्त्री हो (शंभु० ) । २८-छग्नेश पापग्रह होकर निवल हो, पाप ग्रह लग्न में हो ( जा० संग्र० ) । २९-नवम में सूर्य चन्द्रमा हो ( शंभु० ) । ३०-छम्नेश सूर्ये का शत्रु हो ( स० चिं० ) ।
३१-अष्टम घर में क्रूर षष्ठ चन्द्र हो और अष्टमेश या शनि पाप युक्त या दुष्ट हो ( स० चिंता० )।
३२-छणनेश बलहीन हो पाप ग्रह दृष्ट स्थान में हो ओर गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो (स० चिं० ) ।
आयुर्दाय विचार : २१९
१६. केन्द्र में चन्द्र हो और पाप ग्रह एक-एक कर के स्थित हों शुभ ग्रहों की
दृष्टि न हो। न १७. लर्न के उभय पाशवं ( २-१२ भाव में ) ओर सप्तम के उभय पाश्वं ( ६-८
भाव में ) यदि कूर ग्रह हो [ ज्यो शा० ]।
१८. १, ४, ७, ८, १० घर में कूर ग्रह हों, क्षीण चन्द्र लग्न में हो या चन्द्र
४, ७, ८ घर में हो और इसके पाशवं राशियों में क्रूर ग्रह हो [ ज्यो० शा० ]।
१९. क्षीण चन्द्र १, ५, ७, ८, ९. १२, स्थान में कहीं हो शुभ ग्रहों की दृष्टि न
हो, लग्न में चन्द्र, ८ घर में मंगळ, नवम में सूर्य, व्यय भाव में शनि हो और इनमें से किसी पर गुरु की दृष्टि न हो [ ज्यो० शा० ]। बाल मृत्यु
[१] लग्नेश तथा चंद्र २ पाप ग्रहों से युक्त हो [ स० चि० ]। [२] जन्म समय
चंद्रमा पर ग्रहण या परिवेष [ मंडल ] होवे तथा पाप दृष्टि हो | [ ३ ] पाप ग्रह से
दृष्ट मंगल सप्तम या अष्टम स्थान में होवे। [ ४ ] पाप ग्रह ३-६ घर में शुभ ग्रह
१२ वें घर में हो या चंद्रमा पाप युक्त ४-८ भाव में हो | [५] लग्न में सूर्य चंद्र व्यय
स्थान में पाप ग्रह हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [स० चि० ]। [ ६] ६-८-१२
भाव में चंद्र हो, सूर्य के अतिरिक्त पाप ग्रह भंगल. शनि, राहु केतु से दुष्ट हो तो
लग्न में गुरु के रहने पर भी वालक मर जाता है [ जा०पारि० ] । [७] गण्डान्त
नक्षत्र में चंद्रमा हो पाप ग्रह युक्त या दुष्ट हो मृत्यु भाग में पाप दृष्ट हो । [ जा०
पारि० ]। मृत्यु भाग -मेषादि क्रम में चंद्रमा के अंश इस प्रकार मृत्यु सूचक है।
राशि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १ ११ १२
चंद्र अंश ८ २५ २२ २२ २१ १ ४ २३ १८ २० २४ १० यहाँ अंश मृत्यु सूचक वर्ष भी बताते है जेसे मेष राशि का चंद्र ८° पर हो तो ८
वषं में मृत्यु सूचक है [ जा० पारि० ]।
मतान्तर
नीचे बताये राशि के अंश में जन्म हो तो अशुभ है इनमें जन्मे बालक की
मृत्यु हो जाती है । [जा.भ.]
राशि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२
अंश ८ २९ २३ २२ ५ १ ४ २३ १८ २० २१ १०
[5] क्षीण चंद्र लग्न में हो पाप ग्रह केन्द्र या अष्टम में हो [जा०पारि०] । [९]
लग्नेश नीच राशि में हो या लग्न से अष्टम हो और शनि भी नीच में हो या सप्तम
हो [ जा० पारि० ]। [१०] शनि सूर्य मंगल १२-८-९ भाव में हों उन पर शुभ ग्रह
की दृष्टि न हो [ वृ० पा० ] 1 [११] क्षीण चंद्र लग्न में हो जिसके द्रेष्काण या सप्तम
भाव में पाप ग्रह न हो [ वृ० पार ] 1 [१२] सम्पूर्ण ग्रह अष्टम में हों तो मृत्युप्रद हैं
यदि चंद्रमा हो तो विशेष कर मृत्युप्रद है [ मान० ]। [१३] यदि सूर्य चंद्र शनि त॑नों
पाप ग्रह युक्त हों तो मृत्यु हो । [ जा०सं० ]। [१४] सब केन्द्र भाव पाप ग्रह और
२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चंद्रमा से युक्त हों [जा० सं० ]। [१५] सप्तम और लग्न में पाप ग्रह हों चंद्रमा भी
पाप युक्त हो और शुभ दृष्टि न हो [जाण्सं०] । [१६] सप्तम और लग्न दोनों में
ग्रहों का कतंरी योग हो [जा० सं०] । [१७] पाप युक्त चंद्र १, ६, ८, १२, भाव में कहीं हो शुभ ग्रह की दष्टि न हो और केन्द्र में शुभ ग्रह हो । [ जा० सं० ]। [१८]
लर्न में चंद्र, अष्टम में मंगल, नवम में सूर्य, व्यय में शनि हों ओर गुरु की दृष्टि न
हो [ जा० सं० ] । [१९] पाप युक्त क्षीण चंद्र शुभ ग्रह की दृष्टि से हीन १, ५, ७,
=, ९, १२ भाव में कहीं हो [ जा० सं० ]। [२०] लग्न में सूर्य और चंद्र हो शुभ
ग्रह की दृष्टि न हो या बलवान् ग्रह त्रिकोण और अष्टम में हो [ जा० सं० ]। [२१] जो राशिसंधि में उत्पन्न हुए हों वे शीघ्र मरते हैं जबकि पाप ग्रह उनको देखते हों ।
राशि के ३०० होते हैं किसी एक के मान लो ३° है और आगे की राशि के आरंभ
के २, मिलाकर संधि हो जाती है । इनमें अंतिम नवांश और पहला नवांश मृत्यु ओर
भय करते हैं जब पाप ग्रह युक्त हो दृष्ट हो या तो मृत्यु करते हैं । यदि अपने अच्छे कर्म
से या माता पिता के शुभ कर्मों से वच जावें तो धन वाहन युक्त राजा होगा ( स० चि० )। [ २२ ] लग्न में शनि, अष्टम में चंद्र, तृतीय में गुरु हो [ वृ० पारा ]। [ २३ ] षष्ठ में पाप गृही पाप ग्रह युक्त चंद्र हो [ जा० सं० ]। [ २४ ]लग्न में सब पाप ग्रह, व्यय भाव में गुरु, छठे घर में बुध हो । [२५] पाप ग्रह अष्टम भाव में
शुभ ग्रह के नवांश में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो [ ल० चं० ]। [ २७ ] अष्टम में राहु केन्द्र में चंद्र हो. [ छ० चं० ]। [ २८ ] लगन में कूर ग्रह और मंगल के घर में गुरु हो | छ० चं० ] । [ २९ ] सप्तम में या चतुर्थ में २ पाप ग्रहों के वीच चंद्रमा हो
[ लं० चं० ]। [ ३० ] अष्टम में पाप ग्रहों से दुष्ट शनि हो [ छ० चं०]1[ ३१] छर्न में सूर्य, पंचम में चंद्र, अष्टम में पाप ग्रह हो [ ल० चं० ]। [ ३२ ] त्रिकोण
केन्द्र मे पाप ग्रह ६-८-१२ घर में शुभ ग्रह हो तो सूर्योदय में जन्मा वालक प्राण त्यागे
[ छ० चं० ]। [ ३३] १,६, ७, ८, भाव में शनि युक्त मंगल हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ छ० चं० ]।
[ ३४ ] व्यय में पाप ग्रह हो जो लग्न में आने को हो और षष्ठ में पाप ग्रह हो वह सप्तम में जाने को हो । [ वू० जा० ] [ ३५ | दूसरे आठवें भाव में पाप ग्रह वक्री हो । [ वृ० जा० ] [ ३६ ] क्षीण चन्द्र व्यय में हो, लग्न और अष्टम में पाप
ग्रह हो किसी केन्द्र मै शुभ ग्रह न हो। [ वृ० जा० ] [३७] पाप युक्त क्षीण चन्द्र 1, ७, ८ १२ भाव में हो चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो और केन्द्र में शुभ ग्रह न हों । [ वृ० जा० ] [ ३८ ] लनन में क्षीण चन्द्रमा हो अष्टम और केन्द्र में पाप ग्रह ' हो [ बृ० जा० ] [ ३९ | पाप ग्रहों के वीच चन्द्र ४, ७ या ८ स्थान में हो । [४०] छर्न में सूर्य चन्द्र, त्रिकोण में पाप ग्रह हो वा बलवान शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट न हो [ वृ० जा ] [ ४1 ] भावसंधि, तिथिसंधि और राशि संधि इनमें एक दो या तीन एक साथ पड़ जाने उस समय जन्म हो [ स० चि० ] परन्तु शुक्रवार का दिन हो तो मृत्यु नहीं होती ऐसा चन्दीश्वर का मत है। [ ४२ ] राशि संधि में
आयुर्दाय विचार : २२१
[ गंडांत ] में जन्म हो और ६-८-१२ भाव में पाप युक्त चन्द्र हो । [ स० चि० |
[ ४३ ] सूर्य सप्तम में, चन्द्रमा लग्न में पाप ग्रह युक्त हो । [ जैमि० ] [ ४४ ]
सप्तम में शुक्र शनि और मंगल हो । [ जैमि० ] [ ४५ ] मंगल सप्तम या अष्टम
घर में पाप ग्रह से दृष्ट हो । [ जैमि० ] [ ४६ ] चन्द्र सूर्य लग्न में हो सब पाप ग्रह
व्यय भाव में हों जिस पर कोई शुभ दृष्टि न हो [ स० चि० ]। | ४७ ] २, ६, ८,
१२ भाव में पाप ग्रह हो । [ वृ० पारा० ] [ ४८ ] पाप ग्रहों के बीच लग्न न हो ।
[ वृ० पा० ] [ ४९ ] पाप युक्त चन्द्र १, ७, ९ भाव में हो शुभ ग्रह का योग या
दृष्टि न हो । [ व॒० पारा० ] [ ६० ] संध्या समय जन्म हो [ अर्थात् सूर्य बिम्ब:
अस्त होने के १॥ घडी पहिले और अस्त के बाद १॥ घड़ी यह ३ घड़ी संध्या का
समय है ] लग्न में चन्द्र का होरा हो और कोई भी पाप ग्रह राशि के अंतिम नवांश
में हो [ वृ० जा० ]। [ ५१ ] लग्नेश या चन्द्र का शत्रु पाप ग्रह लग्न में हो परन्तु
वह पाप ग्रह मित्र हो तो उसकी मृत्यु नहीं होगी [ स० चि० ]। [ ५२ ] छग्न
निगड़ पक्षी पाश या सपं द्रेष्काण में हो पाप ग्रह युक्त हो शुभ ग्रह या लग्नेश की
दृष्टि न हो [ स० चि० ]1
मिथुन का दूसरा ककं का तीसरा मकर का पहिला
पक्षी सपं निगड़ द्रेष्काण है ।
[५३] लग्नेश आपोक्लिम में हो, ६, ८ घर में पाप. ग्रह हो जिन पर शुभ दृष्टि
न हो [ सं० चि० ]। [ ५४ ] चन्द्र दो पाप ग्रहों के बीच में १, ७, ८, १२ भाव में
कहीं हो [ वृ० पा० ]। [ ५५ ] चतुथं में सूर्यं हो शनि से दृष्ट हो कोई शुभ ग्रह
की दृष्टि न हो [ जा० भ० ]। [ ५६ ] लग्न से ९ या १० भाव में मंगल सहित चंद्र
हो और पाप ग्रह से दृष्ट हो [ स० चि० ]। [ ५७ | सूर्य चन्द्र व्ययस्थान में और
व्ययेश लग्न में हो [ स० चि ]।
न जीये--[१] लग्न में सूर्य, पंचम घर में चन्द्र, सब पाप ग्रह अष्टम में हों
[मान०] । [२] ऊग्न से सप्तम में शनि, अष्टम में चन्द्रहो [ मान० ] । [३] लग्न या
अष्टम में राहु हो चन्द्र से दृष्ट हो । [४] लग्न में सूर्ये पंचम में चन्द्र हो कोई पाप ग्रह
लग्न या अष्टम में हो तो.वालक नहीं जिये । [५] गुरु बुध शुक्र इन तीनोंमें से कोई ग्रह
नीच के राहु रि युक्त हों उन्हें चन्द्र न देखदाँ हो । [६] ६,८ घर में चन्द्र हो १२ वें घर
में सूर्य मंगल हो । [७] ६ या = घर में केतु और केन्द्र में चन्द्र हो | मान० ]।
जीना कठिन हो
[१] लग्न से दूसरे घर में स्वगृह और कूर ग्रह हो ४, १० घर में भी कर ग्रह
हो [ मोन० ]। [२] लग्न में स्वगृही क्रर ग्रह हो ४ घर में भी कूर ग्रह हो तो जीना
कठिन हो । जीता रहे तो माता को दुःख देवे मातृ पक्ष का क्षय करे । [३] क्रूर ग्रह
के घर में सूये हो, कन्या राशि में भी क्रूर ग्रह हो क्रूर क्षेत्र में राहु हो तो जीना कठिन
हो [ भान० ] 1
२२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
शीघ्र मरने का अरिष्ट योग
शीघ्र मरण १--शनि मंगल और सूर्य एकत्र अष्टम में या षष्ठ में हों शुभ ग्रह
युक्त दृष्ट न हों [ जा० पारि० ] । २--सप्तम या अष्टम में चन्द्र पाप ग्रह युक्त हो
शुभ ग्रह की दृष्टि न हो केन्द्र में भी शुभ ग्रह न हो [ प्रा० यो० ]। यदि शुभ ग्रह
देखते हों तो ८ वर्ष में मृत्यु हो [ जा» पारि० ]। ३--चन्द्र षष्ठ या अष्टम स्थान
में हो उसे पाप ग्रह देखते हों [ जा० सं० ] । ४--अष्टम स्थान व केन्द्र में पाप ग्रह
हो लग्न में क्षीण चन्द्र हो [ प्राण यो० ] । ५-अष्टम में मंगल के घर का गुरु हो
उस पर सूर्य चन्द्र व शनि की दृष्टि हो केवळ शुक्र न देखता हो [ प्रा० यो० | । ६-
६, ८, १२ स्थान में शुभ ग्रह हो त्रिकोण या केन्द्र में पाप ग्रह हो ककं लग्न हो [प्रा.
यो. ] | कके लग्न न भी हो तो यह होता है [ छ० चं० ] । ७--४, ७, ८ वें स्थान
में ग्रह हो व चन्द्र पाप ग्रह के बीच हो [ जा० भ० ]। ८--दशम में सूर्य मंगल
के घरया शनि के घर में हो उसे पाप ग्रह देखते हों [ प्रा० यो० ] ९--दशम या
लग्न में वृश्चिक राशि हो पाप ग्रह पूर्व षट्कांत में, शुभ ग्रह उत्तर पट्कांत में हो यह
बख्र दृष्टि योग हो जाता है । [ प्रा० यो० ]। १०--चतुर्थ स्थान, चन्द्र व सूर्य युक्त
या दृष्ट हो शुभ ग्रह युक्त दृष्ट न हो तो जन्मते द्वी मरे । [ प्रा० यो० ] । ११--
प्रात; या सायंकाल की संध्यां में जन्म हो उस राशि के अन्त्य नवांश में पाप ग्रह हो ।
लग्न में चन्द्र की होरा हो चारों केन्द्रों में पाप ग्रह व चन्द्र हो तो शीघ्र अरिष्ट हो
[ प्रा० यो० ] । १२--क्षीण चन्द्र व्यय भाव में हो पाप ग्रह लग्न और अष्टम में हो
केन्द्र में शुभ ग्रह न हो [ जा० पारि० ]। १३--चंद्र ६, ८ घर में हो ४, ६, ८, १२
'घर में राहु हो तो तत्काल मृत्यु हो ईश्वर पूजन आदि से १ वर्ष की आयु हो जावे
[ जा० सं० ]।' १४--जिस राशि पर केतु [ शिंखी ] का उदय हो उसी राशि में
जन्म हो जन्म के पहिले या पीछे निर्घात शब्द हो या प्रचंड वायु चले या वज्ञपात हो
या जन्म समय रौद्र सारे मुहूर्त हो । [ जा० भ० ]। १५--त्रिकोण में पाप ग्रह ६,
८ घर में शुभ ग्रह हो लग्न में नीच का अष्टमेश हो [ वृ० पा० ]। १६--अष्टमेश
और अष्टम भाव पाप ग्रह युक्त मौर व्यय भाव में पाप ग्रह हो तो जन्मते ही मरे
[ वृ० पा० ] । १७--शनि सप्तम या लग्न में हो, जलचर राशि या वृश्चिक राशि में
चन्द्र हो, शुभ ग्रह केन्द्र में हो [ जा० पारि० ]। १८--लग्न से चतुर्थ में राहु हो,
६, ८ घर में चन्द्र हो [ मान० ]। १९--छग्न से ४ या ९ घर में सुर्य, अष्टम में
गुरु, १२ वे चन्द्र हो [ मान० ]। २०--छग्न से वारहवे राहु शनि वुध हो, गुरु
लग्न या पंचम में हो [ मान० ]। २१- लगन से अष्टम में राह ओर केन्द्र में चन्द्र
हो [ मान० ]। २२--लग्न में क्रूर ग्रह हो ६, ८ घर में चन्द्र हो [ मान० ]।
२३--सूर्य शनि, शनि राहु, मंगल गुरु लग्न में या पंचम में हों [ मान० ]। २४-लग्न
में गुरु, अष्टम में शनि ओर उसी घर में अन्य पाप ग्रह भी हो [ मान? ] । २५--गुरु
वक्री होकर शनि के घर में हो, सूर्य बुध सप्तम हो तो वांछित मृत्यु पावे [ मान० ]।
२६-+मंगलछ व शनि लग्न में, सूर्य सप्तम में हो [ प्रा० यो ] [ जा० भा० ]। २७--
मंगळ शनि चन्द्र लर्न में, सूये सप्तम हो [ प्रा० यो० ] [ जा० भ० ] । २५--लग्न
आयुर्दाय विचार : २२३
में सूर्य चन्द्र, केन्द्र त्रिकोण में पाप ग्रह हो शुभ ग्रह की दृष्टि न.हो । २९--चन्द्रमा
पाप युक्त हो राहु से दृष्ट हो [प्रा० यो०] । ३०-अष्टमेश पाप युक्त ६ या १२ भाव में
या अष्टमेश और लग्नेश ६ या १२ भाव में हो [ जा० सं० ]। ३१--छग्न से ६, ८,
१२ घर में चन्द्र हो पाप ग्रहों की दृष्टि हो [ वृ० पा० ] 1३२--छमन में सूर्य या चन्द्र
हो त्रिकोण या अष्टम में बलवान् पाप ग्रह हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो [ जा० पा० ]।
२३३--लग्न में चन्द्रमा हो, अष्टम में मंगल, वारहवें शनि और नवम सूर्य हो इनको
बलवान् गुरु न देखता हो तो शीघ्र मृत्यु हो । [ जा० पा० ]। गुरु किसी को देखता
हो किसी को न देखता हो तो अरिष्ट मात्र हो। बलहीन गुरु देखे तो दोष नहीं -
मिटता । यदि गुरु पंचम में हो और सव १, ८, १२, ९ घर में हों तो देख सकेगा तब
दोष दूर हो जायगा । ३४--चन्द्र राशि के अन्त नवांशक में हो, शुभ ग्रह से दृष्ट न
हो, पाप ग्रह त्रिकोण में हो [ वृ० जा० ]। ३५--छग्न और सप्तम में पाप ग्रह हो; चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ वृ० जा० ]। ३६--चन्द्रमा लग्न में, ६, ८, ११ घर में शुभ ग्रह त्रिकोण में पाप ग्रह हो [ जा० भ० ]। ३७-लनन में सूर्य, सप्तम में
मंगल व शनि, अन्य स्थान में चंद्र हो [ जा० भ० ] ३५--क्षीण चन्द्र लग्न में, पाप
ग्रह ८ घर या केन्द्र में हो, सप्तमेश पाप ग्रह युक्त हो [ ल० चं० ] । ३९--तृत्तीयेश
३, १, ५ या २ घर में हो [ ० च० ] | ४०--दशम में सूर्य १, ८ या ४ राशि का
पाप ग्रहों से दृष्ट हो [ छ० च० ]। ४१--जन्म में चन्द्र कोई भाग्य सूचक अंश में
हो साथ ही केन्द्र या अष्टम में हो तो शीघ्र मृत्यु हो । राशि १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२[फल०]
भाग्य सूचक अंश २६ १२ १३ २५ २४ ११ २६ १४ १३ २५ ५ १२
इनमें से कोई बुरे योग, दिन मृत्यु, दिन रोग, विष घटी में जन्म हो तो शीघ्र
मृत्यु हो १--दिन मृत्यु--घनिष्टा और हस्त का पहिला चरण, विशाखा और आर्द्रा का
दूसरा चरण, उत्तर भाद्र ० ओर आश्लेपा का तीसरा चरण, भरणी का चोथा चरण ।
२-दिन रोग--आश्लेषा और उत्तर भाद्र» का पहिला चरण, भरणी | और
मूल का दूसरा चरण, उत्तर फाळ और श्रवण का तीसरा चरण, स्वाती और मृग
शिर का चौथा चरण ये बुरे योग दिन में पड़ें तो बुरा प्रभाव डालते है । यदि ये दोनों
योग रात में पड़े तो दोष दूर हो जाता है ।
३--विष घटी--पहिले वता चुके हैं [ फल दी० ]।
४२--सूर्ग दशम में मंगल या चन्द्र के घर का हो जिस पर पाप ग्रहों की दृष्टि
हो शुभ युत या दृष्ट न हो [ स० चि० ]1 ४३--छूग्नेश पाप युक्त सप्तम में हो
[ जा० भ० ]। ४४--राहु केन्द्र में पाप युक्त हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो [ स०
चि० ] । ४५--शनि लग्न या त्रिकोण में हो ६-८-१२ भाव या केन्द्र में पाप ग्रह हो
[ स० चि० ] | ४६--क्षीण चन्द्र लग्न में पाप दृष्ट हो | स० चि० ] | ४७--क्षीण
चन्द्र पाप युवत १, ७, ८ भाव में हो [ स० चि० ] । ४८--लग्न चन्द्र या सूर्य बल?
२२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
वान् हो परन्तु पाप ग्रह केन्द्र में हो अष्टम या त्रिकोण में सूर्य शुक्र मंगळ एक साथ
हों [ स० चि० ] । ४९--मंगलवार को मंगल ही लग्न में हो, क्षीण चन्द्र हो लग्न व
केन्द्रों से बाहर लग्नेश हो तो उसकी मृत्यु यह मंगल शीघ्र ही देता है । ऐसा ही शनि
भी करता है [ स० चि० ]। ५०--सप्तम में मंगल और शनि हो शुभ ग्रहों से दृष्ट
न हो [ ज्यो० शा० ] । ५१--लग्न में मंगल हो ६ या ५ में शनि हो [ज्यो० शा०]।
५२--सब पाप ग्रह ८ भाव या केन्द्र में हों | फल० ]। ५३--सब पाप ग्रह १ या
८ घर में हों [ फल० ] । ५४--सव पाप ग्रह १ या ७ घर में हों | फल० ]। ५५-
पाप युक्त क्षीण चन्द्र ६,८,१२ भाव में हो [ फल० ] । ५६--पाप ग्रह ७ या ८ घर
` में हो [ फल० ] । ५७--केन्द्र स्थान को कोई शुभ ग्रह न देखे [ फल० |। ५८--
क्षीण चन्द्र लस में क्रूर ग्रह सप्तम भाव के पहिले द्रेष्काण में हो [ स० चि० ]।
५९--छम्नेश सूर्य युक्त नीच में या अष्टम हो तो वह शीघ्र मरे या जीता रहे तो मरे
के वराबर रहे [ स० चि० ]। ६०--राहु सिवाय मेष और वृष राशि के लान में ह
[ स॒० चि० ] । ६१--पाप गूह लग्न से २, १२ घर में या ७, ८ और १२ घर में हो
[ स० चि० ] । ६२--गुरु के नवांश में शनि हो राहु से दुष्ट हो लग्नेश पर शुभ
दृष्टि न हो [ जा० पारि० ]। ६३--चन्द्र कुम्भ के २० वें भाग [अंश | में हो या
वृश्चिक या सिंह के २१ वें भाग [ अंश ] में हो [ स० चि० ] । ६४--अष्टमेश पाप
युक्त हो ८, १२ स्थानों में भी पाप गृह हो [जैमि०] 1 ६५४--केन्द्र त्रिकोण में पाप गृह
६,५ में शुभ गह हो लःनेश और अष्टमेश नीच का हो [ जैमि० ] । ६६--सप्तम में
आयुध द्रेष्काण का पाप गूह हो और चन्द्रमा लग्न में हो [ स० चि० ]।
आयुध द्रेष्काण मेष का मिथुन का सिंह का तुळा का कुम्भ का
पहिला दूसरा पहिला दूसरा पहिला
मृत्यु समय के कुछ योग
कुछ दिनों में मरे [१] जन्म में क्षीण चन्द्रमा पाप युवत हो उस पर राहु की
दृष्टि हो तो थोड़े दिनों में मरे [ जा० भ० ] [ स० चि० ]।
[२] लग्नेश, अशेश, राशीश जिसके अस्तंगत हों [ स० चि० ]।
७ दिन में मृत्यु हो [३] १, ७, १२, २ भाव में क्रूर गह चतुर्थ में राहु हो
[ मान० ]1
७ दिन या ७ मास में मृत्यु [४] चन्द्रमा, सप्तम या नवम में शनि राह और मंगल से युक्त हो[ ल० च० ]। प्र
७ दिन में मृत्यु [५] कृष्ण पक्ष में दिन को जन्म हो सप्तम में गुरु शुक्र हो और चन्द्र राह व शनि की दृष्टि हो!
८-१२ दिन में मृत्यु [६] लग्न से २-८-१२ भाव में कूर हो तो आठवे या १२बे' दिन विष्ठा रुकने से मृत्यु हो [ ल० चं० ]।
१० दिन में मृत्यु [७] रून या अष्टम में चन्द्र और राहु हो [ छ० च० ]।
आयुर्दाय विचार : २२५
=-चन्द्र से सप्तम सूर्य मंगल हो या चन्द्र से सप्तम सूर्यं और लग्न में मंगल हो
[ स० चि० ]। ९-राह लग्न या अष्टम में हो चन्द्र से दृष्ट हो [ मान० ] ।
११ दिन में मृत्यु १०-मकर या कुम्भ में गुरु अष्टम घर में हो पाप ग्रह की
दृष्टि लग्न पर हो [ जा० भ० ]। ११-छन में राह लग्न या सप्तम में सूर्य मंगल
के साथ हो ।
१६ दिन में मृत्यु १२-छूग्न में शनि हो पाप गृह से दुष्ड हो [ जा० भ० ] ।
८ दिन ८ मास या ८ वर्ष में मृत्यु १३- ६-८-१२-२ घर में शनि शत्र क्षेत्री
हो [ मान० ] ।
२० दिन में मृत्यु .१४-चतुर्थ में राह ६-८ घर में चन्द्र हो [ मान० ] ।
१ मास में मृत्यु १५- लग्न से १२ वें घर में चन्द्र अष्टम में पाप गृह हो
[मान०]॥ १६-छरन से नवम में सूर्य, अष्टम में शनि, ११ वें घर में शुक्र हो ।
१७-लग्न से ६-८ घर में चन्द्र, सप्तम सूर्य हो तो माता-पिता का घन नाश कर
एक माह तक जिये [ मान० ]। १८- दशम में सूर्य या मंगल शनुक्षेत्री हो तो
आयु १ मास [ मान० ]। १९-लग्न में सूर्य, सप्तम में चन्द्र, अष्टम में पाप ग्रह
हो [ मान० ]।
आयु १ मास-२०- लग्न में मंगल १२वें में गुरु, छठे घर में शुक्र हो
[ मान० ]। २१-लग्न में क्षीण चन्द्र कूर ग्रह से दृष्ट हो २ या १२ घर में मंगल
हो । २२-६-८ घर या केन्द्र में मंगल के घर का सूर्य शनि चन्द्र युक्त हो [प्रा०
यो०] । २३-लग्नेश पाप गृह यक्त अष्टम में हो [ प्रा० यो० ]। २४-६-८ भाव में
शुभ गृह पाप गृह से दुष्ट हो [जा० पारि०]। २४-अन्य मत ६-८ भाव में शुभ गृह
हो वक्री पाप गृह से दृष्ट हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो [ प्रा० यो० ] [ जा० भ० ] 1
२६-छग्न या नवम में सूर्य, सप्तम में शनि, ११ वें गुरु शुक्र हो [ वृ० पा० ]। २७-
अष्टमेश अष्टम में और चन्द्रमा पाप युक्त हो उस पर शुभ दृष्टि न हो [ वृ० पा० ]
२८-सव पाप गृह ६-८ भाव में हों [ जा० सं० ]। २९-गुरु नीच में हो या मंगल के
घर का हो और संधित्रय [१] लग्न संधि [२] नक्षत्र संधि [३] दशा संधि में जन्म हो
[ स० चि० ]। ३०-अष्टम में सूर्यं मंगल शनि हो [ स» चि० ]। ३१-लग्न से
६ घर में शनि मंगल १२ स्थान में वुध, लग्न में चन्द्रहो । ३२-छग्न से नवम सूर्य,
अष्टम शनि और ११ वं शुक्र हो [ ल० चं० ]। ३३-६-८ घर में बुध गुरु या शुक्र
हो जिस पर बलवान् पाप गृह की दृष्टि हो | व्» आ ]। ३४-लग्नेश पाप युक्त व
पराजित गृह युद्ध में पाप गह् से हारा हो | वृ० जा० | ३५-लग्न में शनि पाप ग्रह
युक्त हो [ ल० च० ] । ३६-६-८ घर में शुभ गृह से बली पाप ग्रह दृष्ट हो लग्नेश
सप्तम में हो और पाप गृह से पराजित हो [ जा० पारि० ] । ३७-६-८ घर में चन्द्र
हो कूर गृहों से दृष्ट हो [ ज्यो> शा» ]। ३८-लानेश सप्तम में हो और पाप गहों
से युद्ध में पराजित हो [ ज्यो» शा० ] 1
आयु २ मास--३९-जिसके लग्न में या जन्म नक्षत्र में कतु का उदय हो उस
Ef १५
१२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
खान या नक्षत्र में जन्म हो तो २ महीने में मृत्यु हो [ स० चि ]। लग्न में केतु हो
त्तो दो महीने में मृत्यु [ प्रा० यो० ] । केवल लग्न में केतु होने से मृत्यु नहीं होती
अष्टम में सूर्य मंगल शनि हो और लग्न में केतु हो तो २ मास में मृत्यु होगी । जिसका
जन्म धूम्र केतु तारे के उदय नक्षत्र में हो वह् २ मास में मरता है [ जा० भ० ] ।
२ या ६ मास में नृत्यु--४०-आपोक्लिम [ ३-६-९-१२ ] भावों में सभी गृह
बलहीन हों तो २ या ६ मास में मृत्यु हो [ स० चि० ] [ वि० प्रा० ]।
२-६-१२ मास आयु--४१-लग्न से १२, २, ८, ६ स्थान में पाप गृह हों
शुभ गूहों से युक्त न हों तो २, ६ या १२ मास में मृत्यु हो ।
२॥ मास में मृत्यु --४२-चन्द्र के नवांश में सप्तमस्थ मंगल हो शुभ दृष्ट
रहित हो तो ७७ वें नक्षत्र २॥ मास में मृत्यु हो [ जा पारि० ]। ४३-शनि मंगल और सूर्य पंचम में हो ( जा० पारि० )
३ पक्ष या ३ मास में ४४-जिसका जन्म ग्रहण व परिवेश ( शीड़ल ) के समय
हो लग्न में पाप ग्रह हो लग्नेश बलहीन हो तो ३ पक्ष या ३ मास में मृत्यु हो
(स० चि० )
३ मास में मृत्यु ४५-नवम में सूर्य, सप्तम शनि. लाभ में गुरु शुक्र हो ।
४६-षष्ठ में चन्द्र तृतीय में शनि हो लग्न में शुभ ग्रह की राशि हो ।
४ मास आयु ४७-लग्नेश अष्टम में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो (जा० भ०) ४८- लग्नेश लग्न में सव पाप ग्रह अदृश्याद्ध १ से ३ भाव तक हों (स०चि०)
४९- लग्नेश मंगल लग्न में हो सव पाप ग्रहों से दृष्ट हो ( स० चि० ) । परन्तु मंगल स्वक्षेत्री उच्च या मूल त्रि० का हो तो आयु कुछ अधिक होगी ।
५ मास आयु ५०-छरन में शनि सूर्य शुक्र हो १२ वां गुरु हो ।
६ या ८ मास आयु ५१--पाप ग्रह २, १२ या ६, ८, या ८, ९ या ६, १२ भाव में हो तो ६ या ८ मास में मृत्यु हो । ( जा० भ० )। ८या १२ मास आयु ५२-६ या ८ भाव में चन्द्र पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो शीघ्र मृत्यु होती है यदि ८ भाव को शुभ ग्रह देखे तो ६ महीने या वषं भर में मृत्यु
हो ( ल० च० ) ॥ द
८ मास में मृत्यु ५३-लग्न में मंगल, चतुर्थ में राहु, वारहवें शनि हो [मान०] । ५४-पाप ग्रह युक्त लग्नेश जन्म राशि पति सहित सप्तम भाव में हो पाप ग्रह से दुष्ट हो [ जा० सं० ] । |
९ मास में मृत्यु ५५-छग्न में पाप युक्त शनि हो तो ९ मास में मत्यु हो। १ वष आयु- ५६- देया ८ घर में एक भी पाप ग्रह हो जिस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो १ वषं में मृत्यु हो [जा० भ०] । ५७-छग्न में शनि हो और पाप युक्त दृष्ट न हो [जा० भ०] तो १ वर्ष आयु । पाप युक्त दृष्ट से ९ मास आयु । ५८- अष्टम में चन्द्र चौथे में राहु केन्द्र में पाप ग्रह हो ( ल० चं० ) । ५९-एक भी पाप ग्रह अष्टम में हो पाप ग्रहों से दृष्ट हो शत्रु क्षेत्री हो (ल० चं)। ६०-६ या ८ घर
आयुर्दाय विचार : २२७
में मंगल सूर्य शनि हो (छ० चं०)। ६१-चन्द्र से केन्द्र में पाप ग्रह हों शुभ ग्रह न हों (स० चि०) । ६२-- अष्टम में सुर्य मंगल और शनि शत्रु क्षेत्री हों (मान०)। ६३- लग्न में चन्द्र हो विना शुभ योग के पाप ग्रह केन्द्र में हों (सवै चि०)। ६४- ग्न में वलवान् सूर्य या चन्द्र हो पाप गृह अष्टम या केन्द्र या कोण में हो [ स० चि० ]। ६५-सूय्य चन्द्र शुक्र लग्न में हो पाप गूह अष्टम में या केन्द्र कोण में हो (स० चि० )। ६६-जन्म राशि से अष्टम में सूयं हो उस पर शुक्र की दृष्टि हो
( प्रा० यो० ) । ६७-शनि और मंगल लग्न में, तीसरे घर में राहु हो ( मान० ) ।
६८--छग्न से सप्तम में शनि, वारहूवें भाव में गुरु शुक्र और राहु एकत्र हो (मान०) ।
६९-- क्षीण चन्द्र पाप युक्त १, ५, ७, ८, ९ भाव में हो शुभ ग्रह सेदृष्टन हो
( प्रा० यो० ) ।
१ वर्ष आयु--७०-अदृश्य भाग में पाप गूह दृश्य भाग में शुभ गृह हो लग्न में राहु हो ( प्रा० यो ) 1
२ वर्ष आयु--७१-चन्द्र शनि युक्त हो सूर्य चन्द्र शुक्र केन्द्र में हों, शुभ गूहों से भी भावित कयो न हो २ वर्ष में मृत्यु हो (मान०) । ७२-वक्री शनि मंगळ के घर का होकर केन्द्र या छटे आठवें घर में हो बली मंगल उसे देखता हो (मान०) [स०चि०] । ७३-बुध चन्द्र केन्द्र में हो अस्तंगत हो उसे मंगल शनि देखते हों [ जा० भ० ] [प्रा० यो०]। ७४-६-८ के स्वामी केन्द्र में हों, वक्ती शनि मंगल के घर का हो और वलवान् मंगल की दृष्टि हो [स० चि०]। ७५-वक्रो शनि मंगल के स्थान में
या केन्द्र या ६-८ घर में हो वली मंगळ में दृष्टि हो [ल० चं] ।
अन्यमत--वक्रो शनि मंगल के घर मेष या वृश्चिक का हो चन्द्र १, ४, ७, १० या ६-८ भाव में हो बलवान् मंगळ की दृष्टि हो । ३ वर्ष आयु--७६-जग्नेशसे चन्द्रमा अष्टम हो कृष्ण पक्ष का जन्म हो सव पाप
गूह् उस चन्द्र को देखते हों शुभ गृह की दृष्टि न हो तो ३ वर्ष में मृत्यु हो [स० चि०] ७७- गुरु लग्न से १२ वें घर या केन्द्र में पाप ग्रह युक्त हो लग्नेश ३-६-९ घर में कहीं हो [जा० भ०]। ७८-ककं लग्न में मंगळ और चन्द्रमा हों केन्द्र व अष्टम माव में कोई गृह न हो [जा० छ०]। ७९-गुरु अष्टम में मंगळ के घर का हो और सूर्य चन्द्र मंगल शनि की दृष्टि हो शुक्र की दृष्टि न हो [ स० चि० ] । मेष ओर कन्या "लग्न में ये योग संभव है । ८०--छश्न में शनि, सप्तम सूर्ये या अष्टम में मंगल हो
[स° चि०] । सूर्यं और मंगल तीसरे घर में होया पाप राशियो में हो जिन पर पाप दृष्टि हो तो बीमार रहे कठिनता से ३ वपं जिये [स० चि०]। ८२-मंगलू का घर
६-८ भाव या कहीं केन्द्र में हो उस पर शनि को दृष्टि हो ।
४ वर्षे आयु--८३-६-८ घर में चन्द्र शुभ और अशुभ ग्रह से दृष्ट हो [मान०]
[जा० सं०] । ५४-शन्रु क्षेत्री बध लग्न या ६ घर में हो [ मान० ] । ८५-शम्, क्षेत्री
बुध ६ या ८ घर में हो [मान०]। ८६-ककं का वुध ६-८ घर में हो उस पर चंद्र
की दृष्टि हो (जा० पारि०) । ८७-मंगळ केन्द्र में अस्तंगत हो शनि युक्त या दुष्ट हो
२२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
[स० चि०]। एउप्जछण्त से ६ या ८ घर में बुध हो क्रूर गृह से दृष्ट हो [छ० चं०]
८९--गंडांत में जन्म हो ६, ८, १२ भाव में पाप युक्त चंद्र हो उसे शुभ और पाप
ग्रह दोनों देखें [ स. चि. ]। ९०-लग्न में चन्द्र सप्तम राहु हां। ९१-१,६,८ भाव
में बुध हो । ५ वर्ष आयु--६२-लग्नेश अष्टम में अष्टमेश लग्न मे हो [जा० ल॑०] । ९३-
सूर्य चन्द्र बुध गुरु एक भाव में पड़े या चन्द्र मंगल शुक्र शनि एक भाव में पड़े या सूर्य
चन्द्र मंगल. शनि एक भाव में हो [ जा० म० ]। ९४-पूर्य चन्द्र मंगल गुरु या चन्द्र
मंगल गुरु शनि या सूर्य चन्द्र मंगल शनि एक भाव में एकत्र हो ( स० चि० ) ( जा०
पारि०) । ९५-राहु लग्न मे पाप गृह से युक्त या दृष्ट हो सव शुभ गृह दृश्य चक्र
में हों सब पाप गृह अदृश्य चक्र मे हों ( स० चि० )।
६ वर्ष आयु-९६-सिंह यां ककं का शुक्र, ६, २, १२ भाव में पाप दृष्ट हो शुभ
दृष्ट न हो ( जा० सं० ) । ९७-चंद्र के नवांश में शनि हो जिस पर चंद्र कीदृष्टि हो
और लग्नेश पर चंद्र की दृष्टि हो ( जा० पारि० )1'९८-ल्ग्नसे ६, ८ या २, १२
घर में शत्रु क्षेत्री सूर्य हो ( मान० ) । ९९-छग्न में सूर्य शनि, सप्तम में मंगल और
क्षीण चंद्र हो ( प्राण यो० ) |
६ या ८ वर्षे में मृत्यु-१००-मंग के क्षेत्र में गुरु हो ६, ८ घर में चन्द्र होतो
छठ या आठवें वर्ष मृत्यु हो ( मान० ) ।
७ वर्ष में मृत्यु १०१--छग्न और सप्तम में पाप ग्रह हो लग्नेश को पाप ग्रह
देखे चन्द्रमा लग्न में हो ( जा० सं० )। १०२--छग्न में पाश, पक्षी या श्ट खला
संज्ञक द्रेष्काण हो वह पाप ग्रह युक्त हो ( जा० सं० ) । १०३-छग्न में निगइ या
अहिघर पाश द्रेष्काण क्रूर ग्रह से युक्त हों और अपने स्वामी से दृष्ट न हो । द्रेष्काण
भुजग ककं का दूसरा, मीन का तीसरा, वृश्चिक का पहिला । पाश-वृष का पहिला,
मकर का पहिला दूसरा ! पक्षी-तुला का दूसरा, तीसरा, सिंह और कुंभ का पहिला ।
निगड़-मीन का तीसरा, वृश्चिक का पहिला, दूसरा । १०४- सूर्य, मंगल, शनि लग्न
में हों बलहीन हों चन्द्र या शुक्र के घर में हों गुरु की दृष्टि उन पर न हो (स०चिं०)
१०५-लग्न से सप्तम में पाप ग्रह हो (० चं० ) । १०६-छग्न में सूर्यं शनि मंगल
हो सप्तम में क्षीण चन्द्र हो गुरु की दृष्टि न हो(जा० भ०) । १०७- लग्न से सप्तम
भाव तक पाप ग्रह सप्तम से लग्न तक शुभ ग्रह हो लग्न में राहु हो ( जा० भ० ) |
१०८ ५, ११,८ राशि में राहु हो उसपर पाप ग्रह की दृष्टि हो ( जा० भ० ) ।
१०९- लग्नेश पाप युक्त केन्द्र में हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो और अष्टम स्थान में
पाप ग्रह हो।
६-७ वर्ष में मृत्यु ११०-लर्त में सूर्यं शनि मंगल क्षीण चन्द्र सप्तम में हो
( जा० भ० ) ।
७-८ वषं में मृत्यु १११- लग्न में सूये शनि मङ्गल हो वृष या तुला राशि का
चन्द्र सप्तम में हो गुरु की दृष्टि न हो तो ७ या ८ वर्ष में मृत्यु हो (जा० पारि०) ।
पाला -
आयुर्दाय विचार : २२९
६, ८ या १२ वर्ष में मृत्यु ११२- लग्नेश लग्न में हो शुभ युक्त हो और शनि और गुर से दृष्ट हो अष्टम में न हो । लग्न राशि संधि में हो तो ६, ८ या १२ वर्ष में मृत्यु हो । राशि संधि के अन्तिम ४ और पहिले के ४ में जन्म नहीं होना (स.चि.) । १ वर्ष से ८ वर्ष तक मृत्यु ११३- गुरु लग्न में हो युध ओर शुक्र मिथुन या तुला में हो पाष ग्रह से दृष्ट हो जो कि अष्टम स्थान में हो तो १ वर्ष से ८ वर्ष तक आयु होगी । ( स० चिं० ) । इसमें गोचर और दशा का भी बिचार कर जीवन का निश्चय करना । इस योग में पाठ यह भी है कि शुक्र मिथुन में और बुध तुला में हो । यहाँ जव शुक्र मिथुन में हो तो बुध तुला का नहीं हो सकता । ८ वर्ष आयु ११४- ६, ८ घर में शुभ ग्रह ५, ९ घर में पाप ग्रह हो और पाप ग्रहों से दुष्ट हो ( जा० भ० )। ११५- ६, ८ घर में चन्द्र हो शुभ ग्रहों की दृष्टि हो ( वृ० जा० ) । पाप दृष्टि हो तो शीघ्र मृत्यु होगी । ११६- चन्द्र बलहीन हो पाप ग्रह अष्टम में हो ( स० चिं० ) । ११७- वलहीन चन्द्र ६,८,१२ घर में हो । यदि वलहीन न हो परन्तु क्र ग्रह युक्त और शुभ ग्रह से दृष्ट हो ( स० चिं० ) । ११५० ३,७ राशि का गुरु लग्न में बुध या शुक्र युक्त पाप ग्रह से दृष्ट या अष्टम भाव में हो ( स० चिं० )। ३ वर्ष आयु या ८ वपं आयु ११९- लग्न में शनि, सप्तम सूर्य या अष्टम मंगल हो तो ३ वर्ष की आयु होती है परन्तु ऐसे योग में चन्द्र पर पाप दृष्टि न हो, राहु पर भी पाप दृष्टि न हो तो ८ वर्ष में मृत्यु हो ( सर्व चिं )। १२०- लग्नेश लग्न में कूर ग्रह युक्त, शनि से दृष्ट हो ( स० चि० ) यदि वहाँ गुरु हो तो यह फल नहीं होगा । १२१- गंडांत ( राशि संधि ) में जन्म हो ६, ८, १२ भाव में पापयुक्त चन्द्र हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो ( स० चि० ) । १२२- ६,८ घर में चन्द्र हो, मंगल के घर में गुरु हो। ९ वर्ष आयु १२३- लग्नेश पाप गृही हो वह चन्द्र से १२ वें घर में हो उस पर दूसरे पाप ग्रह की दृष्टि हो या चन्द्र के नवांश में हो ( स० चि० )। इस योग में उच्चता और दूसरी प्रकार की अच्छी स्थिति पर भी ध्यान रखना । ग्रहों की अच्छी
स्थिति से संकट होगा परन्तु मृत्यु नहीं होगी । यहाँ लग्नेश पाप ग्रह के घर में होकर छर्न में हो और चन्द्र से १२ वें घर में हो या लग्नेश किसी भी राशि में चन्द्रमा के नवांश में हो। १२४-सूर्य, शनि और शुक्र पापयुक्त हो और गुरु की दृष्टि न हो । ( जा० भ० ) । १२५-लग्न में अष्टमेश हो जिस पर शनि की दृष्टि हो, चन्द्र सप्तम में हो ( जा० भ० ) । १२६-सूर्य चन्द्र मंगल पञ्चम में हों ( जा० पारि० ) । १२७- लग्नेश से क्षीण चन्द्र अष्टम में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो ( स० चिं० ) । १२८-सूर्य और चन्द्र से शनि युक्त हो ( जा० भ० ) । १२९-सूय चन्द्र मंगल ये पञ्चम में बुध की राशि में हों (जा० भ० ) | १३०-छग्नेश पाप ग्रह चन्द्र से १२ वें भाव में पाप दृष्ट हो या ऐसे योगों में चन्द्र राशीश पापांशक में हो ( स० चिं० ) । १० वर्ष आय्, १३१-शनि मकर के नवांश में हो बुध से दृष्ट हो तो उसके
२३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
शत्रु अधिक हों १० वर्ष में मृत्य, हो ( जा० पारि० ) । १३२-चतुर्थ में राहु ६,८
भाव या केन्द्र में चन्द्र हो । १३३-सप्तम में राहु हो ( मान० )1
१०-१२ वर्ष में मृत्य, १३४-राहु सप्तम हो सूयं ओर चन्द्र की दृष्टि हो णुभ
गृह की दृष्टि न हो ( स० चिं० ) ।
१०-१२ यो १६ वर्ष आय्, १३४-पाप गूहों से दृष्ट राहु केन्द्र मे हो (ल०चं०) ।
राहु अन्य केन्द्र मे इतना अनिष्ट नहीं करेगा जितना कि लग्न और दशम मे. अनिष्ट
कारक है ।
११ वर्षे आय्, १३६-वुध सूयं के साथ हो शुभ दृष्ट हो ( जा० पारि० ) ।
१३७-शुभ दृष्ट भी बुध सूर्या चंद्र से यू क्त हो ( जा. सं.) । १३८-लग्न मे शनि
हो बुध सूयः चंद्र से युक्त हो पाप गृह की दृष्टि हो ( प्रा. यो. )। १३९-केन्द्र भाव
पाप गृह से युक्त हो शनि गुरु परस्पर एक दूसरे के स्थान मे हों अर्थात् शनि की राशि
में गुरु और गुरु की राशि में शनि हो (जा० सं०)। १४०-शनिके घर का गुरु अष्टम
में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो ( प्रा० यो० ) । १४१-सूयं बुध साथ हो शुभ ग्रह से दृष्ट
न हो (स० चि) । १४२-सूय चन्द्रमा युक्त बुध हो पाप ग्रह से दृष्ट हो (जा० भ) ।
१२ वर्ष आय्, १४३-मंगल के घर में गुरु हो गुरुके घर में मंगल हो (मान०) ।
१४४- राहु लग्न से अष्टम में हो शुभ दृष्ट हो, शनि और सूय से दृष्ट हो (मान०) ।
१४५-शनि के घर में सूर्य, सूर्य के घर में शनि हो (मान०)। १४६-सिह में चन्द्र हो
सूय शनि युक्त अष्टम में हो शुक्र से दृष्ट हो (जा. पारि.) । १४७-शनि वृश्चिक के
नवांश में हो सूय से दुष्ट हो तो पिता से बैर करे १२ वर्ष में मृत्यु हो (जा. पारि) ।
१४८-सप्तम में राहुहो उसे शनि ओर सूर्य देखते हों शुभ ग्रह की दृष्टि न हो (प्रा.यो.)
(जा. भ.) । १४९-दशम मे राहु हो तो माता-पिता को पीड़ा देवे १२ वर्ष जीवे
(लू. चं) । १५०-सप्तम मे राहु सूय चन्द्र से दृष्ट हो शुभ गृह से दृष्ट न हो ( स.
चि.) । १५१-चन्द्र राशीश सूय शनि से युक्त अष्टम में हो (स. चि.) । १५२-
लग्नेश तथा जन्म राशीश लग्न से ६,८,१२ भाव में सूय य्क्त हो शुभ गृह युब॒त
या दृष्ट न हो (स. चि) । १५३- लग्न में मंगल अष्टम में गुरु हो ।
१३ वर्षो की आय्, १५४-तुला के नवांश में शनि हो गुरु की दृष्टि हो माता-
पिता का वैरी हो मृत्यु १३ वर्ष में हो ( जा. पारि. ) ।
१४ वर्षो आय्, १५५-कन्या के नवांश में शनि हो बुध से दुष्ट हो जातक क्रोधी
होकर १४ वष मे मरे (जा. पारि. ) ।
१४ वर्षो आय् १५६-सिंह के नवांश में शनि हो राहु से दृष्ट हो तो शस्त्र से
घाव लगे १५ वष मे मृत्यु, (जा. पारि. ) हो ।
१६ वर्ण आय्, १५७-ककं के नवांश मे शनि हो गुरु से दृष्ट हो तो सपे भय हो
और १६ वर्ष मे मृत्य, हो (जा.पारि.) । १५८- लग्न से सप्तम में या नवम मे शत्रु
क्षत्री राहु हो (मान.) । १५९-लग्न से सप्तम मे' शत्रु क्षेत्री राहु हो ( छ. चं. ) ।
आयुर्दाय विचार : २३१
बिलिम
१६०-चन्द्र राशीश सूयः पाप यू क्त ६-८ घर में शुभ दृष्टि रहित हो लग्नेश आपो- ( ३-६-९ १२ घर ) में हो ( स. चि. )1
न १७ वर्ष आय्, १६१-५, ८ या ११ राशि के लग्न मे राहु हो गुरु यक्त या दृष्ट हो. पाप गूह से दृष्ट हो (स. चि.) । १६२-मिथुन लग्न के नवांश में शनि होः लग्नेश से दृष्ट हो वह ऐश्वय वान् और रण शूर हो १७ वषं जिये ( जा. पारि, ) । १८ वषं आय्, १६३-लग्नेश अष्टम में अष्टमेश लग्न मे हो शुम योग रहित हो. या लग्नेश अष्टमेश ६,१२ घर में पंचमेश युक्त हो (स. चि.) । १६४-लग्नेण अष्टमेश परस्पर एक दूसरे के घर मों हो जिन पर कोई शुभ योग या दृष्टि न हो यो ये लग्नेश और अष्टमेश ६,१२ घर में हो गुरु युक्त न हो (स. चि. ) लग्नेश और अष्टमेश यदि अच्छी स्थिति मे हो तो आय् बढ़ती है खराब स्थिति में हो तो आयु घटती है।
भाव
१६५-छगनेश अष्टमेण दोनों पाप गूढ परस्पर एक दूसरे के घर मे' हों या १२या ६ मे हो गुरु यूक्त न हो (जा. पारि. ) । १९ वर्ष मृत्यु (१६६) गुरु के नवांश में शनि हो राह से दृष्ट हो ओर लग्नेश पर शुभ दृष्टि न हो तो वह जन्मते ही मरे यदि लग्नेश उच्च का हो तो १९ वर्ष आय् हो । १६७-सूयः अष्टम में हो चन्द्र शनि दोनों साथ किसी घर में हों। शुभ योग दृष्टि से बुरा प्रभाव घटेगा (स.चि)1
हो
२० वष' आय् १६८-क्षीण चन्द्र हो कोई कूर गृह अष्टम मे हो, अष्टमेश केन्द्र में लग्नेश निर्वल हो [ जा. छ, 11 १६९- शुभ गृह ३, ६, ९, १२ घर में शनि व चंद्र दोनों ६-८ घर में हो [जा. ल॑.] । १७०-चन्द्रमा या राहु इन दोनों को छोड़
दोनों केन्द्र में हों मंगळ लग्न मे हो [ जा. लं. ] । १७२-लग्न में शुभ गृह यक्त लग्नेश हो अष्टमेश अष्टम में हो परन्तु कोई गृह उसे न देखता हो [ जा. लं. Ji १७३-केनद्र में पाप गूह हो, चंद्र या शुम गृह की दृष्टि होया ८ या १० भाव में चन्द्र हो [जा. पारि] । १७४-केन्द्र में पाप गृह हो, चन्द्र या दूसरे गूह की दृष्टि न हो और चन्द्र ६,८,१२ स्थान में हो [ स. चि. ]। १७५-लग्न में मंगल और सूय हो गुरु दशम मे चर राशि का हो चन्द्र ५ या ९ घर मे हो । १७६-क्षीण चन्द्र लग्नेश से अष्टम मे शुभ ग्रह की दृष्टि न हो पाप ग्रहों की दृष्टि हो [जा० पारि०]। १७७ चतुर्थ मे राहु केन्द्र मे चंद्र हो [मान० 11 १७८-स्थानादि वर्गों से परिपूर्ण वळी शुभ गृह केन्द्रों मे हो और लग्न से अग्टम मे कोई ग्रह न होवे (मान०) । २१ वर्ष आय्, १७९-गुरु मित्र क्षेत्री लग्न से १० या ११ घर मे, शुक्र शत्रु क्षेत्री २ या १२ घर मे हो (मान०) । १८०-पष्ठ मेः शुक्र हो तो २१ वर्ष मे शस्त्र से मृत्यु हो (जा. सं )। १८१-छरन मे पापे गही सूर्या पाप ग्रहों के मध्य मे हों । १८२- जन्म संध्या मे हों लग्नेश पाप युक्त ३,६,९,१२ घर मे हो और गुरु शुक्र केन्द्र मे हों।
३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२२ वर्ष आय् १८३-लग्न मे कर्क का गुरु और सूय हो अष्टमेश केन्द्र मे हो
(जः. पारि,) । १८४- लग्न से गुरु पापग्रह यक्त और चन्द्र दृष्ट हो, लग्न से अष्टम
मे अन्य ग्रह हो (जा; रं )। १८५-लग्तेश अष्टमेश केन्द्र मे हो या अष्टम
मे' कोई ग्रह हो और केन्द्रों मे शुभ ग्रहं न होवे पाप ग्रह होवे ( स० चि० )1
१८६-छस्न में कीट राशि (वृश्चिक) में सुर्य गूरु हो अष्टमेश केन्द्रमे हो (त.चि.) ।
इस योग में' वृश्चिक लग्न मे सूरय दशमेश और गुरु २, ५ घर का स्वामी होता है
अष्टमेंण बुध होता है वह लग्न के सिवाय और किसी केन्द्र मे रहना असम्भव है ।
जब लग्न मे सूय है, बुध और गरु लग्न मे' वलवान् हो जाते हैं इससे अधिक
शुभता आ जाती है इससे इस योग मे कुछ शंका होती है। १८७--गुरु लग्न मे
हो राहु युक्त चन्द्र सप्तम या अष्टम मेहो (स. चि.) । यहाँ चन्द्र राहु अष्टम मे
हो तो योग ठीक जंचता है, परन्तु सप्तम में शंका उत्पन्न करता है । क्योकि सप्तम ,
मे राहु है तो लग्न मे केतु गुरु के साथ हुआ । गुरु चंद्र केन्द्र मे होने से गजकेशरी
योग हो जाता है जो दीर्घ जीवन देता है । १८८-छग्न मे' त्रिशांश पति हो [मान.] ।
२४ वर्ष आयु १५९- लग्नेश अष्टम में पाप युक्त या दृष्ट हो शुभ दृष्ट न हो,
अष्टमेश द्वितीयेश और नवमेश से युक्त हो ( स० चि०) १ ९०-लग्नेश अष्टम में पाप
ग्रह युक्त हो अष्टमेश नवम भाव या लग्न में हो ( जा० लं० ) । १९१-लग्नेश अष्टम
में पाप युक्त या दृष्ट हो उक पर शुभ गृह की दृष्टि भी हो, अष्टमेश ९, २, १, भाव
में से कहीं हो ( स० चि० ) ।
२५ वर्षं आयु १९२- शनि द्विस्वभाव राशि का लग्न में हो, ५, १२ भाव के
स्वामी बलहीन हों ( जा० लं० ) । १९३-छगनेश दो पाप गूहों के वीच शुभ ग्रह रहित
हो ओर पिता के जन्म लग्न में जन्म हो ( स० चि० ) ।
२६-२७ वर्ष आयु १९४-म्त में शनि शत्रुक्षेत्री हो शुभ गृह आपोक्लिम ( ३, ६,
९, १२ )--में हों ( जा० पारि० ) । शनि का कट्टर शनु मंगल और सूर्य है । चन्द्र
भी शत्रु है परन्तु उतना कट्टर शत्रु नहीं है । क्योंकि चन्द्र का शनि सम है।
२७ वर्ष आ० १९५--हग्नेश और अष्टमेश अष्टम में पाप युक्त हो शुभ युक्त न
हों ( स० चि० ) । १९६--गुरु स्व स्थानी या स्व द्रेष्काण में हो ( जा० लं० ) ।
२७ या ३० वर्ष आ० १९७--छग्नेश और अष्टमेश के वीच चन्द्रहो और गुर १२
चें हों ( स० चि० ) । यहाँ चंद्र के एक ओर लग्नेश दूसरी ओर अष्टमेश होगा ।
२८वर्षे आ० १९८-अष्टमेश पाप गृह हो अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि हो जन्म राशि
अष्टम में हो जो पाप गूहों से दृष्ट हो ( जा० पारि० ) । १ ९९-अब्टमेश पाप गृह
हो पाप गुदर से दुष्ट हो या लग्नेश अष्टम में हो अष्टमेश पर गुरु की दृष्टि हो
( स० चि० ) | २००--पाप गृह १,७, = भाव में, शुभ गृह केन्द्र के वाहर हों [ स०
चि० ] ¡ २०१-कस्न से या चन्द्र से अष्टम भाव का स्वामी केन्द्र में या व्यय भाव में
हो [ जा० ल० ] । २०२-पाप गूह १, २, ८ भाव में, शुभ प्र ह पणफर ओर आपो-
क्लिम मे हों अर्थात केन्द्र के बाहर हों [ स० चि० | ।
आयुर्दाय विचार : २३३
२९ वर्ष आयु २०३-चन्द्रमा का शनि से स्थान या दृष्टि से सम्बन्ध होकर अप्टम में हो सूर्य भी अष्टम में हो [ जा० पारि० ] 1 ३० वर्ष आयू २०४-ल्ग्न से १२वें भाव में बुध युक्त चंद्र हो अष्टमेश किसी केन्द्र में निर्वल शुभ गूहों से युक्त या दुष्ट हो [ स. चिं ]। २०५-लग्नेश व अध्टमेश दोनों वलहीन होकर केन्द्र में हों [ जा. ल. ]। २०६--सब शुभ गूह शुभ ग्रहों के नवांश में हों [ जा. ल. ] । २०७-केन्द्र में कोई शुभ गृह न हो अष्टम में कोई एक ग्रह हो [ जा. लं. ] । २०८-बल युक्त शुभ गृह केन्द्र म हों अष्टम में कोई ग्रह न हो [ जा. भ. ] । २०९-बुध वली होकर केन्द्र में हो अष्टम में ग्रह न हो [ जा. ल॑" ]। २१०-गुर यदि सूर्य चन्द्र से और चन्द्र शनि मंगल से दृष्ट हो शुक्र से दुष्ट न हो अष्टम में मंगल का घर हो [ ल. चं. | । २११-केन्द्र में शुभ ग्रह हो अष्टम में कोई भी ग्रह न हो व शुभ गूह की दृष्टि हो [ प्रा. यो. ]। २१२-स्थान आदि बल से परिपूर्ण बली शुभ गुह चारों केन्द्र में हो अष्टम में कोई गृह न हो । केन्द्र गत ग्रह पर शुभ दृष्टि हो [ मान. ] ।
३१ वषं आयु २१३-सूर्यं लग्न में २ पाप ग्रहों के बीच हो [ जा. लं. ]
३० या ४२ वर्ष आयु २१५-अष्टमेश केन्द्र में हो लग्नेण बलहीन हो [वृ. पा] । २१६-ऊग्नेश और अष्ठमेश में से कोई अष्टम में हो दूसरा बलहीन हो [ स. चिं ]। २१७-लग्न में वली पाप गृह हो शुभ गूह पणफर और आपोक्लिम में हो, अष्टमेश के नवांश में शनि हो [ स. चि. ]। २१८-पाप ग्रह एक दूसरे के घर में हो लग्नेश पर पाप दृष्टि हो निवळ चन्द्र १२ वें भाव में हो [ स. चि. ]। २१९-पाप गृह एक दूसरे के राशि गत होकर लग्न मे हो-और चन्द्रमा १२ वाँ हो [ स. चिं. ]। २२०- चंद्र और लग्नेश आपोक्लिम में हो और अष्टमेश पापयुक्त ओर बलहीन हो [स. चि] २२ और ३२ वर्ष आयु २२३-छग्नेश और अष्टमेश के वीच चन्द्र हो । गुरु लग्न से १२ वें हो तो २२ ओर ३२ वर्ष के भीतर मृत्यु हो [ स. चि. ]। 2 ३२ वर्ष आयु २२२-लग्नेश और चन्द्रमा आपोक्लिम में हो, चन्द्रमा निर्बल हो
कर ग्रहों से दृष्ट हो [ जा. ल॑. ] । २२१-छग्न निवंछ हो और पाप युक्त हो, क्षीण चद्र पाप युक्त हो अष्टमेश केन्द्र या अष्टम में हो ( जा. पारि. ) । २२४-हीन वळी ग्रह पाप युक्त लग्न में हो, क्षीण चंद्र सूय युक्त हो, अष्टमेश केन्द्र में पाप ग्रह अष्टम भाव में हो ( स. चि. ) । २२५-ऊग्नेश और अष्टमेश केन्द्र में हो कोई गृह अष्टम में हो और शुभ ग्रह केन्द्र में हो ( स. चि. ) । २२६-सू्य चंद्रयुक्त केन्द्र में हो अष्टमेश केन्द्र में हो, पाप ग्रह अष्टम में हों, लग्न में कोई ग्रह न हो ( स. चि. ) । २२७-अष्ट
मेश लग्न में हो लग्नेश वलहीन हो ( स. चि. ) ।
३३ वर्ष आयु २२८-चन्द्रमः, मंगल की राशि का लग्न में हो पाप ग्रहों से दृष्ट हो शुभ ग्रह केन्द्र में हो ( स. चि. )। मङ्गल की राशि लग्न में हो उसमें चंद्रमा हो अभ्य मत है कि पाप गूह ओर शुभ ग्रह केन्द्र के बाहर हो। ८२९-चन्द्रमा और अष्टमेश पाप युक्त होकर केन्द्र या कोण में हो दशम भाव स्थित पाप गृह की दृष्टि हो
२३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
( स. चि. )। २३०-शनि और चन्द्र लग्न में हो मङ्गल कुम्भ का हो (स. चि. |।
३६ वर्ष आयु २३१-गुरु और शुक्र केन्द्र में हो लग्नेश पाप युक्त होकर आपो- बिलम में हो संध्या का जन्म हो (स. चि.) । २३२-बलहीन सूर्य दो पाप गूहों के
बीच शत्रु राशि में होकर लग्न में हो शुभ गृह से दुष्ट न हो (स. चि. ) । २३३
लग्न में चन्द्र और मङ्गल हो । केन्द्र और अष्टम में शुभ गृह न हो लग्न में मान्दि
हो (सः चिं. ) ।
३७ वर्ष आयु २३४-षण्ठ भाव में बुध हो ( जा. सं )। २३५-ऊग्न में सूर्य २
पाप गूहों के बीच हो लग्न से अष्टम में मिथुन का गुरु हो (स. चि.) । २३६-
मिथुन में लग्नेश हो, गुरु चतुर्थ में पाप गूहों के बीच हो (स. चि. )।
४० वर्ष आय्, २३७-बली बुध केन्द्र में हो लग्न से अष्टम स्थान शुभ गृह से
दृष्ट हो ( जा. ळं. ) । २३८-अष्टमेश लग्न मों हो अष्टम स्थान में कोई शुभ गूह न
हो ( जा. छं. ) । २३९-८ और १२ भाव में कूर गूह मध्य में क्रूर गृह ओर शुभ गृह
दोनों हों तो राजयोग होता है आय्, ४० वर्ष ( ल. च. ) । ९४०--वळी शुभ गूह केन्द्र में हो अष्टम में कोई गूह न हो तो ३० वषे आय, होती है शुभ गूह देखते हों तो ४० वर्ष की आय्, हो ( जा. भ. ) । २४१--गुरु त्रिकोण में एवं स्वगृही हो
( मान. ) ।
४२ वषं आय्, २४२--अष्टमेश लग्न में हो मंगल भी लग्न में हो या ८,१२ घर
में स्थिर राशि में हो ( स. चिं. )।
४४ वषं आय्, २४३--छग्न चर राशि में हो गुरु केन्द्र में शनि दशम में हो (स.
चिं.) । २४४--सूयं और शनि मकर राशि में छन्न से ३ या ६ घर में हो अष्टमेश
केन्द्र में हो ( जा. ल॑. ) । २४५--उच्च का मंगल लग्न में, गुरु सप्तम, शनि दशम
में हो तो धनवान व शास्त्रो हो । आय, ४४ वषं हो ( स. चिं. )। २४६--लग्नेश
पाप यक्त अष्टम में हो शुभ गृह केन्द्र में हो (स. चिं )।
४५ वषं आय्, २४७--छग्नेश पाप यक्त अष्टम भाव में, अष्टमेश पाप यक्त
छठे भाव में हो दोनों बलवान् हों, शुभ दृष्टि रहित हों ( स. चिं. ) । २४८--चन्द्र
राशि का स्वामी लग्न से अष्टम में पाप यक्त हो और लग्नेश पाप यक्त षष्ठ में हो
दोनों बहीन हों शुभ दृष्टि रहित हों ( स. चिं. ) ।
आय्, ४८ वर्ष २४९--मकर लग्न में मंगल हो, दशम में तुला मों शनि और
गुरु हो तो वह धनी और कई विद्या का ज्ञाता हो ४८ वर्ष आय् पावे [ स. चिं ]।
२५०--मेष लग्न में पूर्ण चंद्र हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो वह स्वामी या राजा हो ऐसे
चंद्र पर यदि पाप दृष्टि हो तो ४८ वर्ष आय्, हो [ स. चिं. ] ।
आय ५० वषं २५१--लग्न से ४ या १० घर में बुध हो १, ८, १२ घर में चंद्र
हो और गुरु शुक्र एक साथ हों । $
५२ वर्षे आय्, २५२--लग्न में शनि दूसरे गूहों से य्वत हो और चंद्र ८ या
१२ घर में हो तो वेदान्ती ओर घामिक होगा आय्, ५२ वषं की होगी [ स. चिं. | ।