सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
३३६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
झोषो, वाचाल, अघर्मी, पर निद, वीर, पिता का वैरी, विशेष उम्भी, आलस्थ
में छीन, अभिमानी (जा० पारि०) 1
बालपने में पिता को कष्ट, भाग्यहीन, घमं भ्रष्ट तथा म्लेच्छ से भाग्य वृद्धि
(जा० सं०) ।
१०-इशम भाव सें ग्रहों का फल
१-दशम में सूर्यं का फल
गुण युक्त, सुखी, अभिमानी, कोमळ चीजों में रुचि रखने वाला, नृत्य गीत में प्रेम,
अत्यन्त पूज्य, राजा होता है । इसके अतिरिक्त काल में रोग भोगने वाला होता है (मान०) ।
पुत्र, बाहन, स्तुति, ज्ञान, घन, बल, कोति प्राप्त, राजा हो (फल०) ।
घनाढ्य नामवर । नोच का सूर्य हो तो पिता से सुख न मिले (खान०) ।
श्रेष्ठ बुद्धि, श्रेष्ठ वाहन, निश्चय घन युक्त, राज कृपा, पुत्र और सोख्य युक्त,
साधु का उपकार कर्ता, मणियुक्त आमूषण वाला (जा० wo) ।
बन्धुहीन, कुकर्मी, शील रहित, चंचल स्त्री वाला, तेजहीन और खजाना रहित हो
(ल० चं०) । सुखी और घनवान् (qo जा०) ।
पिता का घन और झोल प्राप्त, विद्या, यश युक्त, राजा के समान (जा० पारि०) ।
१९ वर्ष में वियोग करता ë (हिल्लाज) ।
शूर वीर, वाहन, बुद्धि बल घन पुत्र इनसे युक्त, असह्य, प्रगल्म और कार्य का
सिद्ध करने वाला, पिता से घन प्राप्त (जा० सं०) ।
२-दशम में चंद्र का फल
धन सम्पन्न, पुत्र, स्त्री युक्त । शत्रु क्षेत्री या पाप गृही हो--छास रोग, दुव॑ंलांग,
घनो, माता तथा कर्म से हीन (मान०) ।
सत कमं करे, सत गुणी, लोगों का प्रिय (फल) ।
पिता तथा कुटुम्ब का सेवक, घनी, विद्वान्, द्यांत प्रकृति (खान०) ।
राजा से धन प्राप्त करे, यशस्वी, सुंदर रूप, ओर बल, संतोषी, बडी लक्ष्मी गोर शीळवती स्त्रो वाळा (जा० wo) ।
बहुत भाग्य युक्त, बड़ा धनी, मनस्वी, मनोहर, राजाओं में पूज्य (ल० चं०) । समस्त कायं की इतकायंता पावे, धमं, घन, बुद्धि, बल इनसे युक्त (qo जा०) 1
घन धान्य, वस्त्र, मूषण से युक्त, स्त्रियों का विलासी, कळा जानने वाला
(जा० पारि०) 1 ४३ वर्ष में घन देता है (हिल्लाज) ।
„ सुघमं स्थित और दास भाव करता है। सिद्धि आरंभ वाला, पवित्र और कर्म में तत्पर, शूर वीर, घनाढय, धर्मवान्, विवाद कर्ता, माता से घन प्राप्त (जा० सं०)। ३-दशम में मंगल का फल
इंद्रियों का दमन कर्ता, खजाने से रहित, अपने कुळ की जय करने वाला, स्त्री
u . ~
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३३७
चित्तचोर, उदर के समान शरीर वाळा, भूमि का काम करने वाला, बड़ा क्रोघो, ब्राह्मण गुरुजनों का भक्त, मध्यम कद (मान०) 1 कूर राजा, दाता, प्रधान जनद्वारा स्तुति प्राप्त (फल०) ।
घनी गुणी, शिफायत सार, संसार में मान्य, साहसी, दयावान्, सब पदार्थं घर में हों, दानी (खान०) ।
राजा के समान अत्यंत आनन्द प्राप्त, श्रेष्ठ साहस करने वाला, परोपकारी, सुंदर आमूषण मणि, अच्छे बुरे प्रकार से लाभ करता है (जा० qo) । शुभ कमं कर्ता, शुभ युक्त, अच्छे पुत्र, सुखी, वीर, अभिमानी (ल० चं०) । सुख व बल रहित (qo जा०) । प्रबल प्रताप, घन से प्रसिद्ध (जा० पारि०) । २७ वषं में शस्त्र से भय (हिल्लाज) ।
सेना बल से युक्त, प्रधान सेवक, शूरवीर, बडा प्रतापी, पुत्रवान्, कर्म में उद्योगी, पराजित न होने वाळा, शत्रु से द्रव्य प्राप्ति (जा० सं०)। ४ दशम में बुध का फल
सुर्य सरीखा फल, सुख और बल युक्त (qo जा०) ।
समस्त विद्या ज्ञाता, यशस्वी, धनी, बिनोदी (जा० पारि०) ।
गुरुजनो के साथ हित करने वाला, अपने कमाये घन से घोड़ा खरीदे । घनों से
सावधान, थोड़ा बोले (मान०) 1 :
कोई कार्य करे उसमें सफलता हो, अच्छी विद्या बल बुद्धि और सुख प्राप्त, सत्कर्मी,
सत्य युक्त (फल०) ।
धमी, बड़ा मालसी, मिष्ट भाषी, दयावान् (खान०) ।
ज्ञान में चतुर, श्रेष्ठ कर्म करने वाला, अनेक सम्पत्ति युक्त, राजमान्य, सुन्दर लीलाओं के सहित, वाणी के विलास में श्रेष्ठ (जा० भ०)। |
घन घान्य से युक्त, बहुत भाग्यवान्, नम्रता युक्त, कांति युक्त (ल० चं०) ।
१९ वषं में घन देता है (हिल्लाज) ।
वाक्य समूहों की रचनाओं से युक्त, बुद्धिमान्, धीर, घम में चेष्टा, मालिक के गुण,
अनेक आभरणों से युक्त, मित्र से घन प्राप्ति (जा० go) । ५-दशम में गुरु का फल
अश्व रत्नों से विभूषित घर, नीति गुणों में बुद्धिमान्, सञ्जनों की संगति, दूसरे की
भूमि और स्त्री से रहित, बड़ा धर्मात्मा (मान०) ।
आचरण का सत्य मागं ग्रहण करे, अपने गुणों से प्रसिद्ध, बहुत घनी, राजा का मित्र (फल०) 1
पालकी, जवाहरात, हाथी, घोड़ा युक्त, श्रेष्ठ (खान०) ।
श्रेष्ठ राजा के चिह्नं छत्र चामर आदि और उत्तम वाहनों से युक्त, मित्र, पुत्र,
लक्ष्मी ओर स्त्री के सुख से युक्त, बहुघा यन को वृद्धि (जा० म०) ।
पुण्य, यश, सुख युक्त, राजाओं के बरावर स्वरूप वाला, दयावान् (छ० चं०)।
२२
३३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
घनवान् (qo जा०) 1 सिद्ध साधु चरित्र, स्वधर्मी, विद्वान्, घनो (smo पारि०) ।
१२ वर्ष में घन प्राप्ति (हिल्लाज) ।
शुभ कमे व घन युक्त, कीति, वाहन, सौख्य, घन, गुण, सत्य इनसे युक्त, सिद्ध
किये कमं वाला, चतुर, भ्राता से घन प्राप्ति (जा० सं०) ।
६-दशम शुक्र का फल
भाई बहरा, स्वयं भोगों को भोगने वाला, बन में भी राज्य फल पाने वाला, युद्ध के
योग्य, पुष्ट, सुन्दर शरीर (मान०) ।
अति प्रसिद्ध, मित्रयुक्त, सुख वृत्ति युक्त, स्वामी (फल०) 1
घृष्ट, घनो, पितृ गुरु भक्ठ, विद्वान्, मंत्री, वडा आदमी (खान०)।
सौभाग्य ओर सन्मान युक्त, स्नान, पुजन, घ्यान में मन, घनवान्, स्त्री पुत्रों में
नित्य प्रेम (जा० भ०) ।
कर्मवान्, निधि और रत्नों से युक्त, राजा को सेवा करने वाला, धर्मवान् ओर स्त्रो
का प्यारा (७० <o) । घनवानु (qo जा०) ।
खेती आदि कर्म से, स्त्री से, घन प्राप्त हो, विमु हो (जा० पारि०) ।
१२ वर्ष में सौख्य देता है (हिल्लाज) ।
आज्ञा में कुटिल या स्त्री-घन से युक्त, स्त्री से घन प्राप्ति, वादविवाद में एकत्र किया
मान अर्थ और प्रीति वाला, कीति युक्त, बुद्धिमान्, घनो, विख्यात (जा० सं०) à
७-ददाम में शनि का फल
बड़ा धनी, भूतको का अनुरागी, परदेश में जाकर राजा के घर में वास, अभिमानी,
छत्रु से भय नहीं पाता (मान०) ।
राजा का मन्त्री, नीति युक्त, बुद्धिमान्, नम्न, श्रेष्ठ ग्राम और नगर के भेद करने
का अधिकारी, चतुर, घन युक्त (जा० qo) 1
कुकर्मी, धन वर्जित, दया सत्य और गुणों से होन, चञ्चल (ल० चं०) ।
सूयंवत् फल, सुखी, बलवान् (qo जा०) । राजा या मन्त्री, सुकृती (खान०) ।
दंड कर्ता, मानो, धनो, निज कुल में वोर (जा० पारि०) .
राजा या मन्त्री हो, कृषि कार्यकर्ता, शुर, प्रसिद्ध (फल०) ।
अनाथ और दुःख युक्त, पुर, ग्राम इनका स्वामी या दंडपति, पंडित, शूरवीर,
घन युक्त, मन्त्रो, चाकर से घन प्राप्त, नीच या दात्रुक्षेत्री--पेवा से इकट्ठा किया घन
बाला, क्रूर, कृपण, पक्षियों को मारने वाला, जंघा में रोग ।
८-दशम में राहु का फल
काम में आतुर, परघन का इच्छुक, सब कामों में अग्रणी, अति हीन,
वैराग्य युक्त, सुख रहित, खेलने में मन, बड़ा चपल, दुष्ट (मान०) ।
प्रसिद्ध, अल्प सन्तान, दुसरे के व्यापार में स्वतः दत्त रहे, कोई सत्कार्य न करे, भय
रहित हो (फल०) 1
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३३९
पिता के सुख को नहीं प्राप्त, स्वतः दुष्ट भाग्य वाळा, वैरियो का नाशक, वाहनों
को रोग, दाता, वात पोड़ा युक्त, वृष या मोन का--सोख्य और कष्ट का भागी (जा० भ०) । ;
बलवान्, शत्रु नाशी, कलह प्रिय (खान०) ।
चोरी में निपुण, बुद्धिमान् और उद्धत हो (जा० पारि०) 1
वृंद पुर ग्राम इनका मीत, दंडनायक और पंडित, शूर मंत्री और घनी (जा० सं०) । ९-दशम में केतु का फल
अच्छे कार्य में विघ्न, अपवित्र, बुरे कार्य, तेजस्वी, शुर, प्रसिद्ध (फल०) ।
पिता द्वारा सुख न मिले, स्वयं कुरूप, अनेक कष्टो का पात्र, सवारी के कारण
दुःख । मेष, वृष, कन्या ओर वृद्चिक में--दात्रुनाश (मान०) ।
पिता का सौख्य नहीं, दुष्ट भाग्य, शत्रुनाशक, रोगयुक्त, वाहनों की पीडा, वावरोन ।
कन्या फा--सुख ओर दुःख दोनों का भागो (जा० wo) ।
राहु के समान फल (खान०) ।
विद्वात्, वला, शिल्पविद्, आत्मज्ञानो, जनानुरागो, विरोध वृद्धि, कलात्मक, वौरो
में श्रेष्ठ, सदा घुभने वाला (जा० पारि०)। .
गुदा में रोग, कफ प्रकृति, म्लेच्छों के समान कर्म, परस्त्रो गामी (जा० सं०) ।
११-लाभ भाव सें ग्रहो का फल
१-लाभ में सूयं का फल :
अत्यन्त घन का भोगी, राजगृह की सेवा करने वाला, भोगों के भोगने से होन,
गुण का ज्ञाता, दुर्बळ अंग, धन से सम्पन्न, कामिनी चित्तहारी, “चंचळ मूर्ति, जाति
अन्धुओं को आनन्द दायक्र (मान०) 1
उन्नति से ही घनी हो, दीर्घजीवी, दुःख रहित, राजा हो (फल०) ।
घनबान्, सुन्दर स्त्री, गायन विद्या में चतुर, सर्दार (खान०) ।
गाने में प्रीति, श्रेष्ठ कर्म में प्रवृत्ति, बडा यद्य, -सदा घन से पूर्ण, राजा से नित्य
'बन लाम करे (जा० भ०) ।
अनेक लाभयुक्त, सात्विक, धमंवान्, ज्ञानी, ख्यवान् (ल० चं०)।
घनवान् (qo जा०) । ;
विपुल घन स्त्री पुत्र और दास से युक्त (जा० पारि०)।
घन घान्य सुवर्ण आदि से युक्त, रूपवान्, कलायुक्त, ज्ञानी, विनीत, गीत में चतुर ।
सुर्य बलवान् अपने षड्वगं में--राजा चोर और पशुओं से घन प्राप्त (जा० सं०) ।
सूर्य योग्यता प्रमाण से गोचर में या अपनी दशा में पदवी, अधिकार, उन्नति, हाथी
घोडे वस्त्र रत्न, मिष्ठान्न, गाय भैस, टांगा आदि वाहन देता है (प्रा० यो०) ।
२-लाभ में चंद्र का फल i
बहुत घन का भोगी, सुखयुक्त, पत्नी तथा मृत्ययुक्त (मान०) 1
३४० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
उच्च विचार का, दीघं जीवी, घन संतान सेवक युक्त (फल०) ।
घनवान्, रूपवान, दाता, बुद्धिमान् मिष्टमाषी (खान०) ।
झनेक संतान और घन वाहन प्राप्त (जा० भ०) ।
लाभयुक्त, प्रगल्भ, सुभग, सुमागंगामी, लज्जा युवत, प्रतापी और आग्यगान्
(७० चं०) । सर्वत्र विख्यात, नित्य लाभयुक्त (q o जा०) 1
संतुष्ट, विषादी, घनी, (जा० पारि०) ।
विख्यात, गुणवान्, पंडित, भोग लक्ष्मी युक्त, गौर वर्ण, स्नेहकर्ता, स्त्री का परमसुख, पुत्रो सुख । बलीचंद्र--कूप यज्ञादि करने वाला (जा० सं०) । ;
उत्तम स्त्री, नाना प्रकार के मोती रत्न, गाँव, खेत, बगीचा आदि का लाभ, राजा
से या बेचने खरोदने से, या समुद्र तालाब आदि के सम्बन्ध से व्यापार में लास
(प्रा० यो०) ।
३-लाभ में मंगल का फल
देवताओं का हितेच्छुक, राजा के समान, स्त्रोवाला, पीड़ित, mil । उच्च का”
सौभाग्ययुक्त, घनवान्, तेजयुक्त, पुण्य कर्मी, घन का लोमी (मान०) 1
घन और सुखयुक्त, शूर, दुःख रहित, अच्छे भाचरण वाला (फल०) ।
घनवान्, दयालु, विशेष कामी, पंडित, सत्यमाषी (खान०) ।
तांबा, मूँगा, सुवणं ; ; श्रेष्ठ, Dn ` mem weve
बड़े राम युक्त, अनेक प्रकार के पकत्रान्नों को खाने वाला; निरोगी, राजाओं में
पुज्य, देव ब्राह्मण में प्रेम (ल० चं०) । घनवान् (qo जा०) ।
चतुर वचन बोलने वाळा, कामो, घनी, पराक्रमी (जा० पारि०) ।
नाना प्रकार के यन्त्र कला घातु वस्त्र सोना चाँदी से लाभ व राजा से द्रव्य,
अधिकार उन्नति आदि का लाभ हो (प्रा० यो०)।
हाथी घोड़ों की पंक्ति होवे, धनवान्, मानयुक्त, सत्यमाषी, दृढ्व्रती, घोड़ों से
युक्त, गीत गाने में प्रवीण, प्रियभाषी, शूरवीर, धनधान्य मानयुक्त, धन अग्नि या चोरों
से नष्ट (जा० go) । ;
४-लाभ में बुध का फल
शास्त्र में बुद्धि, स्वकुल हितेषो, कृश, घनो, स्त्रियों का प्यारा, मनोहर, श्याम मुर्ति,
हुम नेत्र (मात०) । दोर्घायु, सत्ययुक्त, बहुत घनी, सुखो, नौकरों सहित (फल०) ।
घनी, पुत्र सुख युक्त, समझदार, सरदार, स्वच्छहूदय (खान०) ।
सूर्यवत् फल (घनवान्) (qo जा०)। ` मोगो में आसक्त, अति धनवान्, नञ्ज, सदा आनन्द को प्राप्त, श्रेष्ठ शील, बलवान्
#नेक विद्याओं का अम्यासी (जा० भ०) ।
सदा लाम, रोगहीन, सदा सुखी , मनुष्यों का प्रेमी, वृत्ति ओ र यशयुक्त (७० so) ।
निपुण बुद्धि, विद्या, यक्ष वाला, घनी (जा० पारि०) ।
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४१
अक्षर लिखना, छापाखाना, कोष्टी, बढई आदि का काम, बनिया की दूकान, साहु- कार किवा राजा इनसे घन मिले, बड़ा सल्यत्व हो (प्रा० यो०) ।
शैया मुख हो, इच्छित विद्या सुख, स्त्री का प्यारा, अति गुणी, बुद्धिमान मित्रो का
प्रिय, मंदाग्नि वाला, बली बुध हो तो कूप यज्ञादि का सिद्धि करने वाला (जा० सं०) ।
५-लाभ में गुरु का फल
राजा के समान धनी, अपने कुळ को किसी प्रकार दाग लगाने वाला, सब धर्मों में
निरत, घनवान् (मान०) 1
घनी, भय रहित, अल्प सन्तान, दीर्घ जोवी, वाहन में चछने वाला (फळ०) ।
सन्तोषी, सृशरीर; धनी, विद्वान्, पराक्रमी, चतुर (खान०) ।
सामथ्यं युक्त, निश्चय घन लाभ हो, श्रेष्ठ . वस्त्र, उत्तम रत्न और वाहन प्राप्त,
राज कृपा युक्त (जा० भ०) ।
विवेकी, हाथी ओर घोड़ा आदि वाइन और घनयुक्ठ, चंचल, सुखरूप, गुणवान्,
(छ० चं०) । लाभवान् (qo जा०) ।
प्रबल बुद्धि, विख्यात नाम, धनी (जा० पारि) ।
राज आशय उत्तम लोगों की सङ्गति, नित्य मिष्ठान्न, नाना प्रकार का वस्त्र,
घान्य पदाथ, खेती, गांव घर आदि प्राप्त (प्रा० यो०) ।
पुत्र सुख, स्त्री सुख, रोगहीन, पराकमी, qg, मंत्रवेत्ता, शास्त्र का ज्ञाता, अल्पबिद्या, अल्प सन्तान (जा० सं०)।
६-लाभ में शुक्र का फल
गुणी, अग्नि होत्री, काम देव के समान दिव्य रूप, सुख का पात्र, हास्य में प्रीति, देखने में सुन्दर (मान०) 1
घनो, दूसरी औरतों के साथ रहने का प्रेमी, अनेक सुख (फल०) ।
घनी, तेजस्वी, शहीद, शीलवान् (खान५) 1
श्रेष्ठ, गीत भोर हास्य में प्रीति, नित्य यात्रा की चिता करने वाला, श्रेष्ठ कसं
और धर्म में चित्त (जा० भ०) ।
सदा लाभ, यशी, गुणी, घनी, भोगी, क्रिया में शुद्ध, मनुष्यों में उत्तम (ल० चं०) ।
लाभवान् (go जा०) 1
सुखी, पर स्त्रो रत, घूमने वाळा, धनो (जा० पारि०)।
वेश्या, रानी या नाना प्रकार को त्त्रियो से अनेक लाम, राजा से लाभ, विद्या व
फायदा इनकी परीक्षा पास हो (प्रा० यो०) ।
पुत्र सुख, पालको (वाहन) सुख, स्त्री रूप रत्न से युक्त, श्रेष्ठ रत्नों से युक्त,
स्वस्थ चित्त, शोक हीन, बहुत घन और सेवक (जा० सं०) ।
७-लाभ में शनि का फल
चनवान्, विचारवान्, भोगी, शोत प्रकृति, सदा प्रसन्न, बड़ा सुशील, बाळपन में
रोगी (मान०) ।
- <
३४२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
दीर्घजीवी, अंत तक घनी, अच्छी आय, शूर, रोगहीन, घनो (फल०) ।
काले घोड़े और इन्द्रनील मणि, पुणं वस्त्र, बड़े हाथी इनका लाम (जा० भ०) t
सूयं समान फल (घनवान्) (qo जा०) ।
सर्व विद्याओं में निपुण, ऊंट, गौ और भेस से पूर्ण राजाओं में पूज्य और पवित्र
(छ० चं०)। दयावान्, नेक, भिष्ट भाषी, घनी, सन्तोषी, शत्रु नाशक (खान०) ।
भोगी, राजा से प्राप्त विपुल घनवान् हो (जा० पारि०) ।
चोरों से रिक्वत ले, खोटे काम से, झूठ बोलने से, वकीली करने से, बहुत घन य
पदार्थ मिले (प्रा० यो०) ।
हाथी घोड़े होवें, स्थिर सम्पदा, पृथ्वी से लाभ, शूरवीर, कारीगरी से युक्त, सुख
युक्त, बिना लाभ वाला, मुख्य जीविका वाला व सन्तान हीन, शरीर में कष्ट तथा णिला
प्रहार (जा० सं०) ।
<-लाभ में राहु का फल
इन्द्रियजित्, श्याम रंग, देखने में सुन्दर, थोड़ा बोलने वाळा, परदेश वासी, शास्त्रों का ज्ञाता, बड़ा चपल, बड़ा निलंज्ज (मान०) 1
उन्नतिशीळ, बहुत सन्तान, दीर्घायु, कमं रोगी (फल०) 1
सब प्रकार के घन का लाभ, अधिक सौख्य, राजाओं से अनेक मान, वस्त्रोदक सुवणं,
चोपार्यो के सोस्य का भागी, सौख्य, विजय और मनोरथ : प्राप्त । ऋणो, बेकार, कलह
प्रिय (खान०) । कणं रहित, रणोत्सुक, धनी, पंडित (जा० पारि०) ।
हाथी घोड़े होवें, म्लेच्छ और पतित आदि जनों से लाभ, नहीं स्थिर रहने बाला
पुत्र हो, यदि पुत्र हो तो जातक के वृद्ध होने तक जीवित रहे, शरीर में कष्ट तथा णिला प्रहार (जा० स०) ।
९-लाभ में केतु का फल
श्रेष्ठ वाणी, श्रेष्ठ विद्या, दर्शनीय स्वरूप, श्रेष्ठ भोगों से युवत, श्रेष्ठ तेज, सुन्दर
वस्त्रा सहित, गुदा में रोग, दुष्ट पुत्र (जा० भ०) ।
भाग्यशाली, अधिक विद्याओं का जानने वाला, दशनीय सुन्दर शरीर, शाल दुशाले
झादि सुन्दर वस्त्रों से परिपूर्ण, बडा प्रतापी, स्वयं डर से व्याकुल, सन्तान भाग्यहीन, सब वस्तुओं का लाभ (मान०) ।
घन संग्रह करे, कई सद्गुण प्राप्त करे, सुभोगी, अच्छे पदार्थ प्राप्त करने के लिये
सब सुविधाएँ प्राप्त (खान०) । राहु के समान फल (खान०) ।
प्रतापी, परप्रिय, अन्यजन से वंदित, सन्तुष्ट चित्त, समर्थ, अल्प भोगी, शुभ क्रिया
तया आचारवान् (जा० परि०) ।
१२-व्यय भाव में ग्रहों का फल १-व्यय में सुयं का फल १
मुखं, अति कामी, परस्त्री विलासी, पक्षियों को मारने वाला, दुष्ट चित्त, कुख्प,
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भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४२
राजा से प्राप्त घन, कथा वाचकों का विरोधी, कंधे में रोग, अति दुबंल अंग (मा०) ।
पिता का द्वेषी, नेत्र रोगी, पुत्र भौर घन रहित (फल०) ।
वाम नेत्र पीडा, बड़ा खर्चीछा, रोगी, शरारती (खान०) ।
नेत्र के तेज से रहित, पिता से वेर, सबसे विरुद्ध (जा० भ०) ।
रोगी, सत्त्व हीन, वृथा चलने वाळा, असत्य काम में खचं करमे वाला, पुत्र स्त्री
गौर भक्ति हीन (ल० चं०) 1 अपने कर्म से भ्रष्ट (qo जा०) 1
पुत्रवान्, व्यंग, सुन्दर, धीर, पतित, और घूमने वाला (जा० पारि० )!
खर्चीला, परस्त्री गामी, व्यसनी, बहुत खर्चीला, राजा से उसका घन हरण
(जा० सं०) ।
२-व्यय में चन्द्र का फल र
दुबेलांग, निरन्तर कफ रोग, क्रोधी, घन रहित 1 स्वक्षेत्री या गुरु क्षेत्री--इन्द्रियों
का दमन कर्ता, बडे दाँत वाला, त्यागी, दुर्बलांग, सुख भोगी, नोच का संग (मान०) ।
दोषी, दुःखी, अपमानित, अति अकमंशील (फल०) । ०)
नेत्र विकार, विरोधी, दुष्ट स्वभाव, दुष्क्रीति; अधिक खर्च (खान०) ।
श्रेष्ठ शील और मित्र रहित, आँखों में विफलता, क्रोधी, शत्रु वृद्धि (जा० पारि०)॥
पाप बुद्धि, बहु भक्षी, हरने वाला, कुल.में अवम, मद्य पोने वाला, विकारी (ल०
चं०) । क्षुद्र ओर अंग हीन (qo जा०) 1
विदेश वासी (जा० पारि०) ।
कृपणता और पद-पद में अविएवास, कृष्ण पक्ष में जन्म हो तो कृपणता -बढ्ती है 1
क्षीण चन्द्र हो--राजा उसका घन हरे । पूर्ण चन्द्र हो शुम दृष्ट हो- घन को वृद्धि
(जा० सं०) ।
३-व्यय में मंगल का फल
पर घन लेने का इच्छुक, चंचल नेत्र, चपल बुद्धि, विहार करने वाला, हास्य करने
वाला, बड़ा प्रचण्ड, सुखी, परस्त्री गामी, गवाही देने वाला, कर्मों से परिपूर्ण (मान०) ।
दोष युक्त नेत्र, क्रूर, स्त्री रहित, चुगल खोर, अघम (फल०) ।
कठोर व कटु यचन भाषी, जालिम, क्रोघी, सदा परेशान (खान०) ।
मित्रों से वर करने वाला, नेन्न रोगी, क्रोधो, शरीर में विफलता, घन का नाशक,
बन्धन का भागी, थोड़ा तेज वाळा (जा० wo) ।
असत् में खर्च करने वाला, नास्तिक, निष्ठुर, मूखं, बहुत वाद वाला, परदेश #
सदा ही जाने वाला (छ० चं०) 1 पतित (qo जा०) 1
विरोधी, घन स्त्री से हीन (जा० पारि०)।
क्रोषी, कामी, अङ्ग हीन, घमं में दूषण कर्ता, प्रिय बन्धुजनो से वैर (जा० सं०) 1
वाम कर्ण में रोग, वाम नेत्र में रोग, स्त्री को अधिक गंगता, कमर में घाव, कषत्रिय |
बगं से घन का खर्च, खोटे कर्म में wq आदि का भय (are सं०) । इन
३४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
४ व्यय में बुध का फल
विकर शरीर (लूला लंगडा), दरिद्री, दूसरे के धन ओर स्त्री में बहुत मन, व्यसनों से अलग, सदा उपकारी (मान०) ।
दुःखो, विद्या रहित, अपमानित, क्रूर, अकर्मी (फल०) ।
अशुद्ध गुणवान्, नुकसान वाली बातें करे, किसी को बातों को न सहे; दया हीन, दुःखी, बेहूदा, घूमने वाला (खान०) ।
दयाहीन, स्वजन रहित, अपने काम में चतुर, अपने पक्ष को जीतने वाळा, निरंतर
घूर्त, मलिन (जा० भ०) ।
खर्चे करने वाला, रोगी, भाई से युक्त, पाप में रत, पराधीन, शत्रु का पक्ष करने
बाला (छ चं०) । सूर्यवत्, फल, पतित (बृ० जा०) ।
बन्धुओं से वर, घनी, बुद्धि रहित (जा० पारि०) ।
राज पीड़ा से संतप्त, निद्रा से मुक्त, m< (जा० सं०)
५-व्यय में गुरु का फल
बाल्यावस्था में हृदय रोग, उचित दान करने में बहिमुंख, कुल और घन ते युक्त ।
पापस्थानी हो तो--बड़ा दंभी, पाखण्डी (मान०) ।
दुसरे से घुणा करे, दुमुंखो, सन्तान हीन, पाप युक्त, आलसी, नीच (फळ० )! दरिद्री, कम बोलने वाला, मूर्ख, निर्लज्ज, बुरे वचन बोलने वाला, आलसी, बुरे कर्मों में खर्च (खान०) ।
अनेक प्रकार के चित्त के उद्योगों से क्रोध सहित, पापी, आलसी, लज्जाहीन, बुढि” हीन, मान रहित (जा० भ०) | 2 रोगी, परिश्रमी, पराये कर्म को करने वाला, बंधु बैरी, नोचों की सेवा, गुरु वैर (8० चं०) । दुर्जन (qe जा०) । चार्वाक मत, चञ्चल, घूमने वाला, खळ बुद्धि (जा० पारि”) 1 ऊँचा खर्चे करने वाला, सेवा करने में पण्डित, बड़ा क्रोधी, आरधी, लोक में विग्रह करने वाला (जा० सं०) ।
६- व्यय में शुक्र का फल
प्रथम रोग से मुक्त, पीछे कपट में तत्पर चित्त, हीन बल, सदा मलीन (मान०) । योगी, घनी और द्युतियुक्त (फल०) । बड़ा खर्चीला, वदकार, दुष्ट बुद्धि, क्रोधी (खान०) । श्रेष्ठ क्रमं के मार्ग को त्यागने वाळा, कामदेव में चित्त, दया और सत्य रहित (जा० qo) व्यय से युक्त, मित्र और गुरु का विरोघो, भाइयों में झूठ बोलने वाला, गुण होन (छ० चं०) । दुर्जन (qo जा०) । बंधु नाशक, व्यभिचार बुद्धि, दरिद्र (जा० पारि०) । अढाहीन, दयाहीन, रोगा, स्थूल देह (जा० सं०) 1
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४५
७-व्यय में शनि का फल
पंचायत का प्रधान, रोगी, हीनांग, अति दुःखी, जांघ में घाव, बड़ा क्रूर बुद्धि दुबंल अंग, पक्षियों को नित्य मारने बाला (मान०) ।
निर्लज्ज) दरिद्र, सन्तानहीन, अंग में दोष, मूख, शत्रुओं द्वारा भगाया हुआ (फल०) । दयाहीन, घनहीन, खच से दुःखी, सदा आलसो, नीच का संग, अंग-मंग से सौख्य (जा० भ०) ।
असत् म खर्च, कृतघ्न, द्रव्यहीन, भाइयों से वेर, कुवेष, चंचल (go चं०) सूरय
समान फल, पतित (go जा०) ।
तंगदस्त, बुरे आचरण, निर्घन, आलसी (खान०) ।
विकल बुद्धि, मूख, घनवान्, ठग (जा० पारि०)।
नीच कमं में मन, पापी, अंगहीन, भोग विलास की लालसा, दुष्टों से प्रीति
(जा० सं०) ।
<-व्यय में राहु का फल
धर्म अर्थ से रहित, अनेक दुःखों को भोगने वाला, स्त्रो होन, परदेशवासी, सुखहीन,
सुरे नख, बुरे वेष में रहना (मान०) 1
गुप्त पाप करने वाला, अधिक खर्च, पानी के रोग से पीड़ित (फल०) ।
नेत्रों का रोगी, पैरों में घाव, प्रपंच करने वाला, प्रीतियुक्त, दुष्ट जनों से प्रीति,
'अध्यम पुरुष की सेवा करता है (जा० भ०) ।
कलह प्रिय, बेकार, कर्जीला, गरीब, दुःखो (खान०) ।
शील रहित, सम्पत्तिवान्, विकल देह, साधु, पूर्व स्थित घन का नाशक (जा०
“पारि०) । नीच कर्म, अनर्थ में खच, पाप बुद्धि, कपट युक्त, कुछ का दोष देने वाला
(जा० सं०) ।
९-व्यय में केतु का फल
गुप्त रूप से पाप करे, बुरी वातों में घन खर्च, घन का नाशक, विरुद्ध गीत, नेत्र
“रोगी (फल०) ।
पेंडू लिंग गुदा चरण में पीडा, रोग से शरीर पीड़ित, मामा से किसी वस्तु को
श्राप्ति नहीं होती, राजा के समान भाग्यशालो, अच्छे कर्मो में व्यय करे, युद्ध में शत्रुओं
का नाशक (मान०) ।
पैर और नेत्रो में पीड़ा, राजा के तुल्य वेमव में खर्च करने वाला, शत्रु नाशक,
मन में सुखी नहीं, वस्ति और गुदा के रोग से पोड़ित (जा० भ०) ।
चञ्चल और शीळ रहित (जा० पारि०) ।
३४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
अध्याय १६
फलित में ग्रहों के फल का विचार
फलित में ग्रहों के फळ का विचार १२ भाव का ३ प्रकार से होता है ।
(१) लग्न से भाव फल विचार (२) चन्द्र से भाव फल विचार और (३) सूर्य से
भाव फल विचार । यहाँ तीनों प्रकार का भाव फल विचारना दिया ë 1
भाव के साधारण नियम
भाव फल आदि विचारने को आरम्भ में ही संक्षिप्त स्थुल विचार किए हैं । उनको
मनन कर फल विचारना । यहाँ और भी संक्षिप्त में विचार देते हैं ।
१-माव, भावेश और भाव का कारक बलवान् होने से उस भाव सम्बन्धी अच्छा
फल होता है 1 यदि वह भाव या भावेश या उसका कारक निबॅल हों तो उस भाव
सम्बन्धी फल कम हो जाता है 1
२-यदि भाव बलवान् हो, उसका भावेश और कारक एक दूसरे के साथ हों या
एक दूसरे पर दृष्टि हो तो अच्छा फल द्रोता हैं ।
३-भावेश के साथ शुभ ग्रह उसके बल को बढ़ावेगा जैसे धनेश से साथ शुम ग्रह
गुरु हो तो घन देगा और घन बढ़ावेगा ।
सप्तमेश के साथ शुभ ग्रह शुक्र हो, जो विवाह का कारक भी है, तो वह विवाह की
संख्या या स्त्रियां बढ़ावेगा ।
४-किसी भाव में मंगल और शनि दोनों हों तो उस भाव का नाश करता है ।
५-चन्द्र सूयं के साथ हो । द्वितीय भाव में भोम, चतुथं में बुघ, पंचम में गुरु, षष्ठ
में शुक्र, सप्तम में शनि ये दोष युक्त होते हैं प्रायः निष्फ होते हुँ । यदि घन कारक
होने की स्थिति में हों तो तब भी निष्फळ होते हँ । घन लाभ नहीं होगा । इन भावों में
उपरोक्त ग्रहों के साथ चन्द्र भी हो तो चन्द्र भी निष्फळ होता है।
६-पाप ग्रह लग्न या किसी भाव के त्रिक (६-८-१२ भाव) में हो तो उस भाव
के फल को तीक्ष्ण करता है ।
७-्रिकेश किसी भाव से केन्द्र कोण में हों तो भी उस भावका अच्छा फल नहीं
देते । त्रिकेश उस भाव से त्रिक में हो तो अच्छा फल देते ë ।
८-जिस राशि में कोई ग्रह हो वह राशि व उसका स्वामी बली हो और वह
राशिस्थ ग्रह भो बली हो तो उस राशि या भाव का पूर्ण फल होता है यदि इनमें से २
बली हों तो मध्यम फल, केवळ एक बली हो तो हीन फल होता Š 1
९-कोई भावेश पाप युक्त उस भाव से त्रिकमें हो तो उस भाव सम्बन्धो सुख
नहीं देता ।
१०-कारक ग्रह या भावेश बहुत पाप ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो या नोच आदि:
बुरे स्थानों में हो तो अच्छा फल नहीं देता ।
फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३४७
इत्यादि बातों का पहिले बता चुकी बातों का और आगे बताई जाने वाली बातों का
पुर्ण विचार =< भाव के फल का अनुमान करना चाहिये ।
११-जब किसी भाव का स्वामी ६-८-१२ घर की राशि या नवांश में हो तो
शनि जब वहाँ गोचर में पहुँचता है तो उस भाव के फल का बिलकुल नाश हो जाता
है । यदि शनि इन दोनों राशियों के त्रिकोण में जो राशि है वहाँ जाता है तब भी भाव
फल का नाश हो जाता है ।
(१) लग्न कुण्डली से भाव फल विचार
१-लग्न में--शुभ ग्रह हो तो वह नम्र होता है । पाप ग्रह हो तो दरिद्र, शोक व
भय से युक्त व अभक्ष्य भक्षी होता है ।
२-लगन में--शुभ राशि हो तो दोर्घायु राजपूजित और सुखी होता ë 1
३-लरन में--पाप राशि या पापग्रह हो, पापग्रह की दृष्टि हो तो sf से
दग्ध हो ।
४-हलरन मॅ--उपरोक्त प्रकार से चन्द्र हो तो जरू का भय हो ।
५-लग्न में--शुभ गुरु को योग दृष्टि हो तो देह सुख होता है ।
लुग्न में-पापग्रह की योग दृष्टि लग्न या चन्द्र पर हो और शुभग्रह की दृष्टि न
हो तो देह सुख नहीं होता ।
६-लग्न में शुभ ग्रह हो तो जातक सुरूप, पापग्रह हो तो कुरूप हो ।
७-लग्न को देखते बाले या लग्न में रहने वाले अधिक ग्रह हों तो उसमें बली ग्रह
से ही फल विचारना ।
८-हूग्न में शुभ बलवान् हो तो मनुष्य स्थूल होता है । पाप ग्रह तथा निबंल ग्रह से
दुर्वल होता है ।
२-लग्न में पाप युक्त चन्द्र हो--वो शीत रोग से युक्त रहे ।
१०-लग्न में ३ शुम ग्रह हाँ--विनय युक्त राजा ही । पाप ग्रह हों तो अनेक दुःख
दरिद्र शोक से युक्त, बहुत भोजन करने वाला हो 1
११-छग्न में चन्द्र बुध या राहु, केतु, शनि हो--स्वभाव चंचळ होता है
लग्न में सूर्य मंगळ गुरु शुक्र हो तो--स्थिर भाव को देते हैं ।
१२-लग्न या त्रिकोण में शुभ ग्रह हो तो रोग नष्ट हो 1
१३-लग्न को लग्नेश देखे तो घनी, तीक्षण बुद्धि हो, कुल की कीति बढावे ।
१४-लरन में चन्द्र के. साथ यदि बुध गुरु व शुक्र हो या लग्न से केन्द्र में हो तो
राज्य सम्बन्ध से लाभ कारक होता है !
१५-ऊनन में तथा लग्न के होरा में पाप ग्रह हो तो शिर में पीडा हो वह होरा
qd दल में हो तो सिर के बाम भाग में, यदि उत्तर दल में हो तो सिर के दाहिने भाग में
पीड़ा हो ।
३४८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१९ छन द्रेष्काण के विभाग में सिर स्थान में काष्ठ अग्नि व शस्त्र से चोट लगने का भय हो ।
१७-छन से प्रथम ओर नवम स्थान भो धन संज्ञक हैं । १८-यदि लान में कोई ग्रह न हो तो उसके द्रेष्काण पर से भी फल विचारना । (२) धन भाव का विचार
१-दवितीय स्थान वाक् स्थान भी है वाक् सम्बन्धी विचार भी इससे करना । २-छरन से प्रथम और नवम स्थान से भी धन का विचार होता है । रै-धन भाव में शुभग्रह घन प्रद है और पाप ग्रह धन नाशक है । ४-सब पाप ग्रह दूसरे घर में हों तो यह मुख होता है पर धनी भी होता है । (पर्खन भाव में लग्नेश सहित सब ग्रह बलवान् हों तो शुभफल होता है । ६-धन भाव में शुभग्रह द्वितीयेश और लग्नेश से युक्त हों तो घन आदि सस्बन्वी अच्छा फल देते हैं ।
७-घन भाव में शुभग्रह हो तो मधुर भाषी प्रिय भोजन करने वाला होता है यदि पाप ग्रह हो तो कटु भाषी ओर बुरे अन्न का भोजी होता ë! ८-अनभाव में घन कारक ग्रह (बुध, चंद्र, मंगळ) व्यय स्थान में पढे तो व्यय की वृद्धि होने से घन की हानि होती है । ` *-धन भाव में शनि सुर्य मंगल हों या इनको दृष्टि हो तो घन नाश हो, यदि क्षीष चंद्र को दृष्टि हो तो विशेष कर घन क्षीण ( नाश ) हो । १०-घन भाव में मंगल चन्द्र दोनों हों तो त्वचा रोग और दरिद्रता हो । ११-वन भाव में सूर्य और बुध हों तो सेवा में तत्पर रहे । घन स्थिर न रहे । १२-राज योग होने से घन आदिका मुख होता है यंदि दरिद्र योग न हो! दरिद्र योग, रेफा योग आदि में घन सुख आदि सम्बन्धी कष्ट होता है । १३-द्ितीयेश केन्द्र में, उच्च में, मित्र गृही या अपने वर्ग में हो या हितीयेश जिस घर में हो उसका स्वामी गोपुरांश में हो तो बहुत धन होता है । š १४-द्वितीय में गुरु शुक्र हो तो बाक्पटुता आती है । चन्द्र हो तो--कुटुम्ब सौरुय, बुध हो तो घन समृद्धि प्राप्त होती है । १५-घन का विचार करने को, द्वितीय भाव से--धन का सुख । लग्नेश से सौभाग्य । चतुथं से-सुख और पैतृक घन । पंचम से-राज्य द्वारा लाभ, अकल्पित धन सट्टा लाटरी आदि द्वारा । सप्तम से-वाणिज्य द्वारा । नवम से-भाग्योदय द्वारा । दशम से-च्योपार द्वारा लाभ । एकादश से-छाभ और धन संग्रह प्रगट होता ë गुरु ग्रह सेव्य संचय । शुक्र से-सांसारिक घन विषयक सुख। इन सभी योगों की या इनमें से अधिक योगों की शुभता से धन का सुख होता है अन्यथा कष्ट होता है ।
और
१६-दूसरे भाव का विचार करने को उसका स्वामी कहाँ है यह देखो । बली ë सब वर्ग में उसकी स्थिति अच्छी है या नहों है । ग्रहों का योग दृष्टि आदि सब बातों
फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३४९,
का विचार कर फल कहना इसमें कारक का भी विचार करना होगा ।
दुसरा घर आँख मुख घन वाणी कुटुम्ब आदि बताता है । दूसरा घर दाहिना नेत्र है परन्तु इनका प्रथम विचार करने को इनके कारक पर विचार करना होगा । इनके कारक भी भिन्न-भिन्न हैं जैसे वाणी का कारक गुरु है । वाणी सम्बन्धी विचार करने को गुरु की स्थिति पर ओर द्वितीय भावस्थ ग्रह एवं भावेश पर विचार कर फल निर्णय करना होगा । इसी प्रकार नेत्र का कारक शानि है । कुटुम्ब का कारक शुक्र है । इनके बल आदि पर और कारक की स्थिति आदि पर भी विचार कर किसी विदोष बात के सम्बन्ध में फल का अनुमान कर सकते हो ।
१७-एकादश भाव प्रबल हो और घन भाव निर्बल हो तो घन लाभ में सुगमता तो होगी परन्तु घन का संग्रह न हो सकेगा ।
१८-लाभेश दुर्बल या निक या किसी अशुभ योग में हो तो घन प्रभाव प्रबल: शग पर भी लाभ कष्ट साध्य होता है जिसमें घन संग्रह तो होगा परन्तु अनेक कष्ट साथ ।
१९-लग्नेश, लाभेश परस्पर एक दूसरे के स्थान में होंया लाभेदा लाभमें या
घनेश, लाभेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो घनवान् और प्रसिद्ध हो ।
२०-यह पहिले बता चुके ë कि द्वितीय भाव में मंगल अशुभ अर्थात् प्रायः निष्फळ
होता है । चन्द्र भी द्वितीय माव में मंगल के साथ निष्फल होता है ।
२१-दूसरा स्थान कारक स्थान है इसका स्वामी मारकेश कहलाता है इसका
वर्णन प्रथम दिया है 1 ( घन सम्बन्धी योग प्रथम दिये हैं ) ।
(२) तृतीय भाव का फल विचार
१-तृतीय भाव-शुभग्रह युक्त या दृष्ट हो, तो सहोदर युक्त ओर पराक्रमो हो ।
२-तृतीय भाव-में शुभ राशि हो शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो उस भाव सम्बन्धी
सभी बातों में शुभ फल होता है ।
३-भ्रातु भाव स्थित राशि व ग्रह, भ्रातृ स्थानेश और अआतृकारक ग्रह इन चारों
में शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो भ्राता होंगे, शुभ ग्रहों का योग दृष्टि न हो तो सहो-
दर की हानि होगी । इसमें भी इन चारों में या इनमें से एक में गुभता हो तो उस
प्रमाण से सहोदर होंगे । पाप ग्रहों के योग या दृष्टि से हानि होगी ।
४-शुभग्रह भी स्वभाव से अशुम स्थान के स्वामी हो जायें तो अशुभ फल देंगे ।
जैसे मेष लग्न से तीसरे और छठे स्थान का स्वामी बुघ है दोनों अशुभ स्थान का यहाँ
स्वामी हो जाने से बुघ अणुम हो गया या तुला लग्न हो तब तीसरे ओर छठे स्थान का
स्वामी गुरु हो जाने से दो अशुभ स्थानों का स्वामी हो गया इससे गुरु मो यहाँ अशुभ
गया ।
; ५-प्रह ३-६-८ स्थान के स्वामी होने से पाप फछ देते हैं जैसे वृश्चिक लग्न में मंगल छग्नेश और षष्ठेश भी है । वृष लस्तमें शुक्र लग्नेश भी है ओर षष्ठे भी है।'
३५० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
त्रिकेश होने में इनमें अशुभता आ जाती है । इस प्रकार कन्या लग्न में शनि षष्ठश हो
जाता है । इस प्रकार ३-६-८ के स्वामी अशुभ हो जाते Š ।
६-तृतीय में--स्त्रीग्रह हो या तृतीयेश स्त्रीग्रह हो तो अधिक बहन होंगी, यदि
ये पुरुषग्रह हों तो अधिक भाई का सुख हो । स्त्री पुरुष दोनों हो तो भाई बहिन दोनों
का सुख हो! |
७-तृतीय से, भाई साहस यात्रा आदि जाना जाता है परन्तु इनके कारक भिन्न-
“भिन्न हैं जिनसे भिन्न-भिन्न विषय का फल जानना ।
८-तृतोयेश का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से हो तो उसके भाई हों। भाइयों के कारक
मंगळ का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से हो तो उसके भाई अवदय हों । तृतीयेश और मंगल
साथ-साथ हों तो भाई अवश्य हों । तृतोयेश लग्न में हो लग्नेश तृतीय में हो तो भाई हो ।
` ९-तृतीयेश और मंगल ये पाप ग्रहों के साथ हों ६-८-१२ में हों तो कोई भाई न
हों, होवें तो मर जावेंगे । |
१०-तृतीय भाव में सूर्य हो तो बहुत साहसी हो आगे बढे ।
११-तृतीयेश अष्टम में हो तो यात्रा में मृत्यु हो या आकस्मिक भयानक घटना हो ।
१२-तृतीय में बुध हो और तृतीयेश चन्द्रमा से युक्त हो या भ्रातृ कारक ग्रह शनि
से युक्त हो तो पहिले एक बहिन और पीछे एक भाई हो और तोसरा उत्पन्न होकर
सर जावे ।
१३-यदि मंगल द्वादशेश या गुरु से युक्त और तृतीय भाव में चंद्रहो तो ७
सहोदर हों । न
१४-यदि तीसरे भाव में चन्द्र हो उस पर केवल पुरुष ग्रह ( रवि गुरु मंगल ) की
दृष्टि हो तो बड़े भाई का, शनि हो तो छोटे भाई का, मंगल हो तो अपने से बड़े और छोटे दोनों भाई का नाशक होता है !
इन उपरोक्त योगों में बलाबल देख कर भाई बहिन का शुभाशुभ फल विचारना ।
( भाइयों सम्बन्धी योग पृथक् दिये हैं । )
चतुथ भाव विचार
१-चतुर्थ से घर स्थान सम्पत्ति, माता, वाहन, आनन्द, अपनी उन्नति, शैया सुख, शिक्षा, जल, हृदय, कंधा, गर्दन, कूल्हे आदि का विचार होता है--
इससे स्थावर सम्पत्ति, उपभाग की वस्तुयें, सामान फरनीचर आदि, कई प्रकार के
बाहन, आचरण और स्त्री भोग, भिन्न प्रकार का जल जिसे उपयोग करना पड़ता है, हृदय का बल ओर निबंलता, गर्दन और == की शक्ति इत्यादि बातें प्रगट होती है । यद्यपि इस भाव से भिन्न-भिन्न बातें प्रगट होतो हैं और उस भाव का स्वामी एक होता है परन्तु प्रत्येक बातों के कारक भिन्न ë—
जैसे माता कारक चन्द्र है ( किसी के मत में दिन के जन्म में शुक्र रात के जन्म में चन्द्र माता का अतिरिवत कारक Š । इस कारण माता का सुख, स्वास्थ्य, दोघं जीवन,
फलित में ग्रहो के फल का गिचार : ३५१
आचरण मातू प्रेम का विचार केवल चोथे भाव से ही नहीं होता परन्तु चन्द्र शुक्र या शनि
से भी होता ë 1 ) ( माता के २ कारक हैं ) जैसी स्थिति हो विचारना ।
इसी प्रकार शिक्षा का कारक गुरु, वाहन ( घोड़ा, मोटर आदि सवारी ) का कारक
शुक्र है । इसी प्रकार .जतुर्थेश और कारक ग्रह की बलवान् स्थिति आदि पर विचार कर
फल कहना ।
२-जब शुक्र अच्छी स्थिति में हो और चतुर्थेश बलवान् हो तो उसे चतुर्थ भाव
की सब चीजों में शुभता प्राप्त होगी । यदि ये बुरे हों या बलहीन हों तो उपरोक्त चीजें
नहीं प्राप्त होंगी ।
३-शुभ ग्रह चतुर्थ में हो या चतुर्थ को देखता हो तो वे सब शुभ ग्रह अपने अधि-
कार प्रमाण से शुम फल देंगे। परन्तु पाप ग्रह उन स्थानों में हों या पाप ग्रह की दृष्टि
हो तो बुरा फल होकर दुःख व चिता उत्पन्न करायेगा ।
४-चतुथे भाव शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो उस भाव की वृद्धि होगी ।
५-चतुर्थ भाव सम्बन्ध से पूर्ण बली ग्रह का पुणे फल होगा । मध्यम वली का
आधा । होन बली या अस्त आदि का बहुत अल्प फल होगा ।
६-चतुथं में सूयं घ शनि हो तो अन्तःकरण सदा उद्विग्न रहे, दुःखी हो ।
चतुर्थं में बुघ शुक्र हो--वहुत करके वह सुखो हो 1 चतुथं में बुध--पंडित हो ।
७-चतुथं में शुभ ग्रह हों या शुभ ग्रह को दृष्टि हो तो उसके पास वाहन रहे !
८-चतुर्थ में शुभ ग्रह हों या उनको दृष्टि हो तो उसकी माता, दीघंजीवी हो ।
९-चतुर्थं में शुभ ग्रह हो तथा चतुर्थेश अपने उच्चादि शुम स्थान में हो, मातृ
कारक ग्रह भी बली हो तो माता से पूर्ण सुख हो 1 घर पशु आदि सम्बन्धी. योग पृथक्
दिये हैं ।
१०-इसी प्रकार चतुर्थेश बी होकर चतुथं में हो तो चतुर्थ भाव सम्बन्धी सब
फल शुभ होता है |
११-यदि चतुर्थेश अस्त नीच गत आदि हो तो उक्त फल विपरीत होता है, अर्थात्
'फल अशुभ होता है।
१२-शुक्र की चन्द्र पर दृष्टि हो या चन्द्र से तीसरे घर में शुक्र हो या शुक्र से
तीसरे घर में चन्द्र हो तो उसके पास कुछ वाहन हो और बहुत सुख प्राप्त करे 1.
१३-स्थावर सम्पत्ति मिलने के योग ।
(१) मंगल चतुर्थ हो या मंगल की दृष्टि चतुर्थ पर हो या चतुर्थेश मंगल के घर में
'हो तो स्थावर सम्पत्ति मिले ।
(२) चतुर्थेश लग्न में हो लग्नेश चतुर्थ में हो । (३) यदि चतुर्थेश का सम्बन्ध किसी प्रकार मंगल से ( मंगल भूमि का कारक है )
हो जावे ।
(४) चतुर्थश घन भाव में हो।
३५२ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
(५) चतुर्थेश छाभ में हो तो मित्रों द्वारा स्थावर सम्पत्ति मिळे ।
१४-चतुर्थ भाव में चतुर्थेश हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो गृह सम्बन्धी सुख
पूर्ण हो ।
१५-लग्नेश शुम ग्रह हो तथा चतुर्थश नीच में हो, चतुर्थ भाव का कारक व्यय
भाव में हो, चतुथे लाभ स्थान में हो तो १२ वषं में वाहनों का सुख हो ।
१६-चतुथे में सूयं शनि, नवम भाव में चन्द्र, तथा लाभ भाव में मंगल हो तो गाय
भैंस आदि पशुओं का लाम हो ।
(५) पंचम भाव का फल विचार
१-पंचम स्थान से--सन्तान, बुद्धि, अकल्पित घन ( सट्टा लाटरी आदि से ) स्मरण
शक्ति, देवता, विद्या, ज्ञान, वाणी, मंत्रणा शक्ति, सलाह देने की शक्ति, यांत्रिक शक्ति,
बुद्धि. हषं, मानसिक प्रगल्भता, राज्य द्वारा लाभ आदि का विचार होता है परन्तु इनके
कारक भिन्न-भिन्न हैं ।
२-बुद्धि का कारक बुधग्रह है ओर मन का द्योतक चन्द्र है इससे किसी का ज्ञान
निश्चय करने में इनका विचार होता है । किसी ने विद्या ऊंची पढ़ी पर ज्ञान कम होता
है इससे विद्या ओर ज्ञान में अन्तर है ।
३-चन्द्र पंचम भाव में हो उसे शुक्र देखता हो तो उसे अचानक द्रव्य प्राप्त हो
लाटरी आदि किसी प्रकार से प्राप्त हो सकता है |
४-पंचमेश शुभग्रह युक्त हो या शुमग्नह के घर में हो तो वह बुद्धिमान् और शु
आचरण वाला होता ë ।
५-पंचमेश जिस भाव में हो उस राशि का स्वामी शुभग्रहों से दुष्ट हो या दोनों
बाजू शुभग्रह हों तो तेज बुद्धि हो ।
६-पचम में शनि और राहु हो और पंचम पर शुभग्रह की दृष्टि न हो पंचमेश
पर पापग्रहों को दृष्टि हो तो उसकी स्मरण शक्ति बहुत कम हो।
७-पंचम का सम्बन्ध स्त्रीग्रह से हो तो स्त्री देवता जैसे सरस्वती दुर्गा आदि का
पूजन करे यदि पुरुष ग्रह से सम्बन्ध हो तो पुरुष देवता राम कृष्ण शिव आदि की पूजा करे ।
८-पंचमेश सप्तम में हो तो चोरों द्वारा धन की हानि हो 1
९-पंचम में गुरु शुक्र बुध हो ओर योग या दृष्टि द्वारा कोई शुभग्रह गुरु शुक्र या
बुघ से हो तो सन्तान होगी ।
१०-पंचमेश पंचम में हो तो कई सन्तान हों ।
११-पंचम ओर पंचमेश का कोई सम्बन्ध शुभग्रह से हो तो उसकी सन्तान की संख्या में वृद्धि हो ।
१२-पंचम ओर पंचमेश का सम्बन्ध पापग्रह से हो तो सन्तान की हानि हो । १३-पंचम में २-३ पापग्रह हों और पञ्चम पर छत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो कोई सन्तान न हों यदि होवें तो जीवित न रहें ।
फलित में ग्रहों के फल का विचार : ३५३
१४--पंचमेश अष्टम में हो तो सन्तान की हानि हो । १५--पुत्र या कन्या-पंचम या पंचमेश का सः म्बन्ध स्त्री ग्रह से हो तो पुरुष ग्रह से हो तो पुत्र हो । SN NN १६ संतान को कोति ओर मान-पंचमेश् दशम में हो तो उस के संतान को कोति और सान मिले ।
१७--पुत्र विचार-पंचम से, पुत्र कारक ग्रह और गुरु को स्थिति पर विचार कर संतान होना निर्णय कर । भावेश पुरुष या स्त्री ग्रह जैसा हो उससे पुत्र-पुत्रो का विचार करना ।
१८ दत्तक या कृत्रिम पुत्र-पंचम में ३, ६, १० या ११ राशि हो उसमें शनि, मांदि, गुलिक हो तो दत्तक या कृत्रिम आदि पुत्र होता है । १९--एक पुत्र हो-शनि से पंचम में गुरु या गुरु से पंचम में शनि तथा पंचम भाव पाप युक्त हो तो १ पुत्र होगा । š
२०--७ पुत्र-पंचम से पंचम में शनि हो । पंचमेश पंचम में हो तो ७ पुत्र हों दो sf दो दो पुत्र होते हुँ ।
२१--८ पुत्र-गुरु ५ या ९ भाव में हो, पंचमेश बलो हो, ढितोयेश दशम में हो तो ८ पृत्र होंगे ।
२२--९ पृत्र-गुरु “अच्छे स्थान में हो, द्वितीयेश राहु युक्त हो । भाग्येश भाग्य स्थान में हो तो ९ पुत्र हो ।
२३--दुसरी या तीसरी स्त्री से पुत्र-पंचम में पाप ग्रह हो या गुरु से पंचम में शनि हो तो पुरुष की प्रथम स्त्री से पुत्र नहीं होता, दूसरी या तीसरी स्त्रीरे पुत्र होता है । २४--४० वर्ष में पुत्र-लग्न से नवम में गुरु हो गुरु से नवम में शुक्र हो या लरनेश शुक्र हो तो ४० वर्ष में पुत्र हो ।
२५-- एक पुत्र होकर मरे-पंचम माव पापयुक्त हो । गुरु से पंचम शनि हो ।
लग्नेश द्वितीय भाव में हो और पंचमेश पाप युक्त हो तो एक पुत्र होकर नष्ट हो
जाता ë ।
२६---३३-३६ वर्ष में पुत्र मरण-पंचम से ओर लग्न से. पंचम भाव में पाप ग्रह
` हो तो ३३ या ३६ वर्ष में पुत्र का मरण हो ।
२७--५६ वर्ष में पुत्र शोक-छरन में गुलिक हो ओर लग्नेश अपने नीच में हो तो,
५६ वर्ष में पुत्र मरण 1
२८--पेट में पीड़ा-पंचम में शनि पाप दृष्ट हो तो पेट में पीड़ा हो लोह या अग्नि
से पोड़ा हो ।
(पुत्र सम्बन्धी योग पृथक् दिये हैं। )
भाव का फल
जे भाव से रोग, शत्रु, ऋण, माया, चोट, नौकर आदि का विचार होता ë ।
२३
३५४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२- शत्रु या ऋण हानि-छठे घर में पाप ग्रह हो तो शत्रु की हानि हो और कोई
ऋण न रहे ।
३-- म बल-षष्ठेश पष्ठ भाव में हो वीर्यवान् होया शुभ होतो षष्ठ भाव
सम्बन्धी सब फल शुभ होगा । या छठे भाव में शुभ ग्रह की राशि हो शुभ युक्त हो, शुभ
ग्रहों से दुष्ट हो तो उस भाव का फल शुभ होगा । पष्ठ में गुरु बलवान् हो तो शुभ होगा।
जन्म में या प्रश्न में भी इस योग पर विचारना ।
४--अशुभ फल-यदि पापयुवत पापदृष्ट भाव राशि हो तो शुभ नहीं होगा।
५-—-सिद्वि-ष्ठ में स्वक्षेत्री शुक्र हो तो सदा अति सिद्ध हो ।
६--अच्छे नौकर-षष्ठेश छठे भाव में हो तो अच्छे नौकर हों ।
७--पूर्वज की जायदाद की हानि-षष्ठेश चतुर्थ में हो तो अपने पूर्वजों की जायदाद
की हानि हो उनकी कोई जायदाद न मिले ।
८--ऐक्सीडेन्ट या आपरेशन-छठे घर का सम्बन्ध मंगळ से हो तो अचानक अप
घात ( ऐक्सीडेन्ट ) या शस्त्र क्रिया द्वारा चिकित्सा अर्थात् आपरेशन हो ।
९--बीमारो से आराम-छठे भाव का सम्बन्ध गुरु से हो तो बीमारी हो उससे शीक्रष
झाराम पावे ।
१०--कुविचार से रोग-छठे भाव का सम्बन्ध शुक्र से हो तो उसे भोजन या रहन- सहन के सम्बन्ध में कुविचार से रोग हो।
११- पेट दर्द-छठे भाव का सम्बन्ध शनि से हो तो पेट दर्द या अपच का रोग रहे ।
१२- बीमारी या नोकरों द्वारा घन हानि-पष्ठेश धन आव में हो तो रोध हारा
या नोकरों द्वारा धन की हानि हो ।
१३--सूजन और क्षय रोग-षष्ठ में सूर्य युक्त चंद्र हो तो शरीर में सूजन हो और
क्षय रोग हो ।
१४-सदा रोगी-छठे में शुभ ग्रह हों तो सदा रोग हो ।
१५-मृत्यु-छःे में चन्द्रमा हो तो मृत्यु दायक है।
१६--दोष कारक ग्रह-षष्ठ में सूयं हो--दश दोष देता है, षष्ठ में चन्द्र हो--हजार
दोष देता हैं, षष्ठ में मंगल, शनि--कुछ दोष नहीं देते, षष्ठ में शेष ग्र ह--चन्द्र के
समान हजार दोष देते हूँ ।
७--सप्तम भाव का फल
१-सप्तम से स्त्री का सब प्रकार का विचार होता है । स्त्री की सुन्दरता, स्वभाव,
विवाह, घन आदि । वाणिज्य द्वारा लाम का भी विचार होता है ।
२---सप्तम माव, सप्तमेश और इसका कारक ग्रह शुक्र ओर सप्तमस्थग्रह से भाव
फल विचारना ।
३- खूप गुण आदि का विचार--सप्तम स्थित ग्रहों के शीळ, भावादि राशि शीळ
'लग्नादि के अनुसार सब विचार कर अर्थात् उपरोक्त सब ग्रहों ओर राशि के गुण घमं
फलित में ग्रहो के फल का विचार : ३५५
ओर कुडलो में ग्रह स्थिति विचार कर स्त्री के गुण रूप स्वभाव आदि जाने ।
whe ४-सुन्दर स्त्रो-पप्तमेश पडचल सहित शुभमाव हित शुभमाव युक्त यदि शुभग्रह से युक्त दुष्ट हो
५-सप्तम भाव का फल-सप्तमेश दुष्ट स्थान में हो पापदृष्ट हो या पापयुक्त हो तो
सप्तम भाव का फल मध्यम होता है । ऐसा न हो तो शुभ फल होता ë ।
६-अच्छा फल-यदि छर्न से या चंद्र से ५ वाँ या ७ वाँ घर ९ वें घर के स्वामी से
युक्त या दृष्ट हो तो दोनों भाव के लिये शुभ है अन्यथा नहीं 1
सप्तम में शुभ राशि शुभग्रह से दुष्ट युक्त होने से भावफल शुभ होता हे । पाप
राशि पाप दृष्टि योग से अशुभ फल होता ë ।
७-माग्यवान् स्त्री-मप्तम का कोई सम्बन्ध सूर्य से हो तो भाग्यवती स्त्री मिले वह
अच्छे आचरण को होगो । विवाह के बाद जातक की उन्नति होगी ।
८-उद्योगो ईमानदार स्त्री, विवाह में देर-सप्तम का कोई सम्बन्ध शनि से हो तो
बिवाह देर से हो, परन्तु उसको स्त्री ईमानदार और उद्योगो होगी । कमी-कमी कड़े
स्वभाव की होगी ।
९-बुद्धिमान् तेज स्त्री-सप्तम का कोई सम्बन्ध बुध से हो तो स्त्री तेज होगी ओर
बुद्धिमान् होगी ।
१०-स्त्री द्वारा सुख-विवाह के बाद उन्नति-सप्तम का कोई सम्बन्ध गुर सेहोतो
स्त्री द्वारा सुख मिले ओर विवाह फे पश्चात् उन्नति हो 1 या विवाह कारक शुक्र सिह
š हो तो विवाह के पश्चात् जीवन में उन्नति हो 1
११-स्त्री के कारण सुख व घन-सप्तम का कोई सम्बन्ध शुक्र से हो तो स्त्री द्वारा
सुन्न हो और कुछ घन छाम भी हो । š
१२-२-३ अवसर चूकने पर विवाह-सप्तम का कोई सम्बन्ध चन्द्र से हो तो २-३
अवसर चुकले के पश्चात् विवाह हो सकेगा ।
१३-स्त्री स्वेच्छाचारी-सप्तम का कोई सम्बन्ध मंगळ से हो तो स्त्री के कारण
विपत्ति आवे । स्त्रो क्रोधी हो पति को इच्छानुसार न चले ।
१४-स्त्री के कारण दुःख व झगड़ा-सप्तम या सप्तमेंश का कोई सम्बन्ध मंगल से
हो तो स्त्री से झगड़ा हो । कभी-कभो स्त्रो के द्वारा दुःख मी हो ।
१५--विलम्ब मे विवाह-शनि के घर में शुक्र हो और सप्तम या सप्तमेश से शनि
या सूर्य का कोई सम्बन्ध हो तो जीवन में बहुत विलम्ब से विवाह ह्रो।
१६--एक से अधिक विवाह-यदि २-७-९ भाव के स्वाभियों में से किसो का ओर
शुक्र का कोई सम्बन्ध पाप ग्रह या शुभ ग्रह से हो तो एक से अधिक विवाह होगा ।
१७--स्त्रो आचरण होन-सप्तमेश पाप ग्रह के साथ हो या पाप ग्रह को दृष्टि हो
तो स्त्रा वदचलन हागी ।
१८--स्त्रो कामी,एक या अधिक से प्रेम-शुक्र ग्रह मंगल के घर में हो और मंगळ