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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

Fr

१८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

सप्तम सूयं-स्त्री के शारीर में पीड़ा, अपने शरीर में पीड़ा, दिर में रोग, मार्ग

में भय,विवाह, गुदा तथा पैर में पीड़ा, पेडू ब नेत्र में पीड़ा, विचित्र वाहन प्राप्त हो।

सप्तम चन्द्र-पाप ग्रह से दुष्ट हो तो खांसी ज्वर वात पीड़ा भय, स्त्री को पीड़ा

कफ उत्पत्ति से बाधा । शुभ युक्त या दुष्ट हो तो धन लाभ, स्त्री सुख, राजा सेः

प्रतिष्ठा, ग्रामान्तर से लाभ, वाणिज्य या जल मार्ग से लाभ ।

सप्तम मंगल-मार्ग में कष्ट, स्त्री को कष्ट,चित्त में क्लेश, शत्रु से भय, विवाद,

देश का छूटना, आत्म पीड़ा, पुत्र या स्त्री को रोग ।

सप्तम बुध-स्त्री के साथ सुख विलास, प्रतिष्ठा की वृद्धि सुवर्ण वस्त्र जय प्राप्तः

हो वाणिज्य से धन प्राप्ति धर्म कार्य में मन, मार्ग से लाभ ।

सप्तम गुरु-स्त्री सुख, निर्भयता, शत्रु नाश, वाहन का सुख, राजा से धन प्राप्ति,

वाणिज्य से व्यवहार से और मार्ग से धन की प्राप्ति, सम्मान प्राप्त हो ।

सप्तम शुक्र-स्त्री का सुख, भोग विलास का सुख, शरीर सुख, शत्रु नाश, वस्त्र

ब सुवर्ण लाभ, वाणिज्य से धन प्राप्ति, मान वाहन व धन प्राप्ति ।

सप्तम शनि-स्त्री को कष्ट, मागं में भय, पशु का मरण, राज्य से भय, विकलता,

क्लेश, मिथ्या कलंक, स्थान हानि, धन नाश, रोग, भाई व मित्र को कष्ट ।

सप्तम राहु-गुप्त इन्द्रियों में पीड़ा, प्रमेह आदि रोग, विष व अग्नि से पीड़ा,

प्रवास, भय, स्त्रियों को कष्ट, चित्त चंचल, स्थानान्तर, अंग में पीड़ा ।

सप्तम केतु-विष अग्नि से पीड़ा, गुप्त इन्द्रियों में पीड़ा, स्त्री को पीड़ा या स्त्री

से भय प्रमेह वात आदि रोग ।

करनेश-जन्म लग्नेश वली होकर वर्ष में सप्तम हो तो स्त्री सुख हो।

लग्नेश सप्तमेश का इत्थश्षाल हो तो भी स्त्री सुख हो |

जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश सप्तम हो और उदित तथा बळवान्‌ हो तो स्त्री सुख हो ।

सप्तम शुक्र-वली वर्षेश शुक्र सप्तम हो तो स्त्री पक्ष से सुख हो और इस पर गुरु की दृष्टि भी हो तो अत्यन्त स्त्री सुख करता है।

ot शुक्र पंचाधिकारियों में होकर मङ्गल से दृष्ट हो सुख अत्यन्त तो स्त्री करता है ।

शुक्र सप्तम में निबंछ व अस्त हो तो स्त्री से कष्ट हो ।

वषश शुक्र सप्तम हों अधिकारी बुध से दृष्ट हो तो अल्प वय की स्त्री से या

वेश्या से व्यभिचार हो ।

उक्त शुक्र पर अधिकारी या अनधिकारी शनि की दृष्टि हो तो वृद्धा परस्त्री से.

व्यभिचार हो ।

उक्त शुक्र पर अधिकारी या अनधिकारी गुरु की दृष्टि हो तो विवाहिता नवीन

भार्या से संयोग हो तथा शीघ्र सन्तान प्राप्त हो ।

जन्म में शुक्र जिस राशि में हो बह वषं में सप्तम हो और शुक्र वर्षश हो तो

स्त्री छाभ हो ।

वर्ष फल में भाव फल विचार : १८३

सप्तम शुक्र-शुक्र वर्षश होकर मङ्गल से दृष्ट हो या मङ्गल वषश होकर शुक्र

से दृष्ट हो तो स्त्री लाभ हो ।

स्त्री सहम पर मङ्गल शुक्र की दृष्टि हो तो स्त्री लाभ हो या विवाद हो.।

सहमेश-स्त्री सहम पर शुक्र तथा सहमेश की दृष्टि से भी उपरोक्त फल हो।

स्त्री सहमेश और सप्तमेश अस्तंगत हो पाप युक्त दृष्ट हो तो स्त्री को कष्ट हो 1

जन्म कालिक सप्तमेश वर्ष में स्त्री सहमेश हो तो स्त्री सुख हो ।

चन्द्र-यदि जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष में क्षीण चन्द्रमा हो तो स्त्री प्रसंग

सुख अल्प हो ।

मङ्गल-यदि जन्म के शुक्र की राशि में वली मङ्गल हो तो स्त्री सुख और

उत्सव को करता है ।

गुरु-जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष में गुरु केन्द्र त्रिकोण में हो तो स्त्री सुख हो ।

हद्देश-जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष में वर्ष लग्न के हुद्दा का स्वामी केन्द्र

त्रिकोण में हो तो स्त्री सुख हो ।

विवाह सहमेश-जन्म के शुक्र की राशि में वर्ष का विवाह सहमेश केन्द्र त्रिकोण

में हो तो स्त्री प्राप्ति हो ।

सप्तमेश-जन्म का सप्तमेश यदि वर्षे शुक्र से युत या दृष्ट हो तो बहुत विलास

सुख युक्त स्त्री सुख हो ।

जन्म में सप्तमेश शुक्र हो वह वषं में सप्तम हो और वली होकर लग्नेश से

इत्यशाल हो तो निश्चय स्त्री लाभ हो । *

सूर्य-सुर्य पंचाधिकारियों में हो तो स्त्री के हेतु चित्त में व्याकुलता रहे ।

शनि-शनि सप्तम हो तो कलंक कलह और भत्संना हो ।

मुन्था-मुंयेश की राशि का गुरु हो वा मुंया की राशि में गुरु हो वा मुंया राखि

को गुरु देखे तो विवाह योग होता है ।

सूर्यं मंगल युक्त मुन्था सप्तम में हो तथा स्त्री सहम पापाक्रांत हो तो स्त्री व

पुत्र से कष्ट होवे। उस पर पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो स्त्री पुत्रों से अधिक ही

कृष्ट होगा ।

स्वगृही या उच्च का चन्द्र मुन्था से सप्तम हो अर्थात्‌ मुन्था मकर में हो चन्द्र

ककं में हो या मुन्था वृश्चिक में हो चंद्र वृष में हो तो विदेश यात्रा होती है। पाप

दृष्टि हो तो कष्ट हो । शुभ दृष्टि से सुख पूर्वक यात्रा हो चंद्र ककं में हो तो जल

यात्रा वृष में हो तो स्थल यात्रा हो ।

सप्तम गुरु-वर्षश गुरु पंचाधिकारी होकर सप्तम में हो तो क्रय-विक्रय से घन

लाभ हो!

मुंया-मुन्था ७ या ८ स्थान में हो उसपर शनि की दृष्टि हो तो शुरू रोग हो ।

मंगल चंद्र राहु-सप्तम में मंगल और चन्द्र युक्त राहु हो तो क्लेश हो स्त्री

का धन नाद हो ।

१८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा; चतुथं वर्षफल खण्ड

  • सप्तमेश-सप्तमेश केन्द्र में शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो तो स्त्री का सुख हो धन धान्य का लाभ हो शत्रु का नाश हो पुण्य का उदय हो । गुरु शुक्र-गुरु और शुक्र अस्त होंकर सप्तम हों लग्नेश नीच का हो तो शस्त्र या अग्नि से मृत्यु हो । र मंगल शनि-मंगळ शनि के साथ सप्तम हो सूर्यं धन में हो चन्द्र वारहवें हो तो अग्नि लगे धन धान्य नाश हो । टु राहु चंद्र-सप्तम में चंद्र युक्त राहु हो तो उस वर्ष. अधिक कष्ट हो विशेष कर स्त्रियों को कष्ट हो ।

... चंद्र-बली चंद्र सप्तम में हो क्रूर ग्रह युक्त दृष्ट न हो तो स्त्री आदि प्राप्त हो अनेक सुख हो ।

, . मंगल-मंगल् सप्तम में पाप ग्रह युक्त हो शनि मंगल के स्थान में हो तो कलत्र नाश हो धन की हानि, मागे में व्यय हो । हु लग्नेश मुन्येश-जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, मुन्येश यदि सप्तम में हो क्रूर ग्रह से दुष्ट हो तो अवश्य कष्ट हो । Es गुरु-सप्तम में.गुरु हो, चंद्रमा सिंह में हो मंगल से दुष्ट हो तो सुख और धन का नाश हो स्त्री पुत्र को कष्ट मित्र क्लेश, दाह, कष्ट इवास रोग हो। शनि-सप्तम में पाप युक्त शनि हो कन्या का शुक्र लग्न में हो तो कष्ट हो, स्त्री की मृत्यु हो ।

` सप्तमेश चतुर्थश-सप्तमेश चतुर्थेश सप्तम या लग्न में हो शुभ ग्रह युक्त दृष्ट हो तो शगार योग है स्त्री का सुख देने वाळा है अपने वर्ग से लाभ, रत्न सुवर्ण प्राप्त हो, भूमि सुख हो कर्म की प्राप्ति हो । राहु मंगळ चंद्र-सप्तम में राहु मंगळ और चंद्र से युक्‍त सप्तमेश हो तो स्त्री का निधन हो। |

राहु व वर्गेश-सप्तम में राहु से युक्त सप्तांश वर्ग का स्वामी हो तो अनिष्ट हो, स्वप्न में भी पुत्र नहीं होता कन्या ही होती हैं । ` सप्तमेश-सध्तमेश बळवानु होकर केन्द्र में हो, शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो शत्रु का नाश हो सुख, धन-धान्य लाभ हो, पुण्य का उदय हो । गुरु मंगल-उच्च का गुरु मंगल युक्त सप्तम हो तो राजा से मान प्राप्त हो, धन-धान्य सुवर्णं आदि का लाभ हो। लग्तेश-सप्तम में लग्नेश हो और सप्तमेश लग्न में हो तो अरिष्ट दुर हो सब अर्थे की सिद्धि हो ।

पाप प्रह-सप्तम में पाप ग्रह हो अष्टम में शुक्र और चंद्र हो तो रोग से मृत्यु हो। शानि मूर्य-सप्तम सूरये शनि युक्त हो या अष्टमेश शनि युक्त हो तो सम्पूर्ण अथं का नाश करता है।.

. मंगछ-सप्तमःया अष्टम मंगल हो तो उस वर्ष में अपयश हो मूत्रेन्द्रिय और सिर में वाधा हो ।

वर्ष फल में भाव फल विचार :.१८४५

अष्टम भाव का गृह फल

अष्टम में-पाप ग्रह युक्त चन्द्र-मरण ।

पापग्रह-मरण सम कष्ट !

शुभ ग्रह-जिस ग्रह का जो धातु हो, उससे रोग, धन नाश, सम्मान नादा । यदि

शुभ ग्रह से इत्यशाल हो तो शुभ फल होगा ।

अष्टम सूर्य-वन्धुओं से दुःख, शरीर कष्ट, धन का क्षय, यश नष्ट, स्त्री कष्ट,

'पुत्र को रोग, व्रण, वात पीड़ा,राजा,अग्नि,विष व सपं से भय, नेत्र रोग,अनादर।

अष्टम चन्द्र-कष्ट, ज्वर, वमन, उदर रोग, कफ विकार, नेत्र रोग, अंग-भंग,

'जल से भय, विवाद, धन नाश, थोड़ा आनन्द मिले, वृद्धि मन्द, अनर्थ हो 1

, अष्टम मंगल-झात्रु से पीड़ा, शरीर में कष्ट, स्त्री को कष्ट, शस्त्र घात, धन नाश,

मानसिक चिता, विकलता, मित्र से विपत्ति, रक्त पित्त प्रकोप, दीनता ।

अष्टम बुध-मृत्यु तुल्य कष्ट, कफ और ज्वर का प्रकोप नेत्र में पीड़ा, भय,

'बबराहुट। अन्य मतवाले अष्टम बुध का फल अच्छा होना मानते हैं । -

अष्टम गुरु-ज्वर, वमन, कफ, पीड़ा, आँख-कान में रोग, शत्रु का भय, स्त्री .

'कष्ट, ब्रण से पीड़ा, परदेश गमन, वियोग, धन खर्च; वुद्धि भ्रष्ट हो ।

अष्टम शुक्र-मृत्यु तुल्य कष्ट, ज्वर आदि की पीड़ा, भय, नेत्र रोग, शत्रु से

"विवाद, स्त्री पुत्र को पीड़ा, चिता, प्रवास, धर्म नाश ।

अष्टम शनि-मृत्यु, ज्वर पीड़ा, कफ रोग, अपवाद, राज भय, धन हानि, शत्रु से

-भय,- संताप, वादी की पीड़ा, व्यसन, स्त्री पुत्र को क्लेश ।

अष्टम राहु-मृत्यु तुल्य कष्ट, राजभय. ज्वर, अतिसार, कफ वृद्धि विसूचिका,

चात रोग, प्रवास स्त्री को कष्ट, वन्धुओं से विवाद, प्राप्त धन का क्षय।

अष्टम केतु-मृत्यु तुल्य कष्ट, राजा से भय, ज्वर, अतिसार कफ, विशूचिका, बात रोग का भय।

अष्टम सूर्य-जन्म में यदि सूये शुक्र से मुशरिफ करे और वर्ष में-पंचाधिकारियों

में होकर केन्द्र में हो तो राज भय या राज रोग से भय ।

अष्टम सू. मं. श.-सूयं मंगल शनि यदि ८ या १० घर में होतो सव,री से गिरने का भय ।

अष्टम चन्द्र-यदि चन्द्रमा पुण्य सहम में लग्न में हो सप्तम में पाप ग्रह हो तो

मृत्यु, यदि दो पाप ग्रह २-१२ घर में हों तो भी मृत्यु हो। और जन्म लग्नेश वर्ष

“लग्नेश अष्टम में हो तो मरण ।

जन्म और वर्ष में अधिकार पाया हुआ चन्द्रे यदि जन्म की बुध आश्रित राशि में

हो, पाप पीड़ित हो तो परदेश गमन हो, लोगों से विवाद और वैमनस्य होता है ।

जम्म में जहाँ मङ्गल हो उस राशि में वर्ष में चन्द्र अधिकारी होकर रहे तो रोग झो, गुप्त राज भय हो । >

कि क a००.“

१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

अष्टम म ङ्गल-मङ्गल वर्ष में अष्टम हो तो अग्नि शस्त्र या राजा से भय हो ।

मङ्गल यदि दशम हो तो चतुष्पद से पतन और रक्त विकार से रोग ।

वर्ष लग्नेश यदि मङ्गल से पीड़ित हो तो शत्रु या अपने वंशजों से कलह तथा

लड़ाई का भय हो ।

मङ्गल यदि १,५,९,२ राशि में होकर वर्ष में अष्टम हो तो मृत्यु देता है । जन्म में मङ्गल जिस राशि में हो वही यदि वर्ष लग्न हो जाय बुध यदि वर्षेवा'

हो तो वह वर्ष अच्छा नहीं होता ।

मङ्गल युक्त चन्द्र ६-८-१२ घर में हो तो मृत्यु ।

मङ्गल-मङ्गर युक्त वषश अष्टम हो तो मृत्यु हो।

दिन के वषं प्रवेश में वर्षेश मङ्गल सूर्य युक्त हो तो राज भय-हो ।

मङ्गल वर्षा होकर निर्वळ और पाप युक्त दृष्ट हो तो लोहे की चोट से घाव हो ।.

यदि वही मंगल अग्नि तत्त्व की राशि में हो तो आग से जलने का भय हो ।

यदि द्विपद राशि में (३-६-७-९ पूर्वार्ध राशि में) हो तो क्रूर नर से मरण ।

निवंल मङ्गल वर्षेश होकर दशम हो तो राजा से, मन्त्री से, शत्र, से, मित्र से,

गुरु से भय हो ।

बुध- जन्म के मङ्गल की राशि में बुध वर्ष में अधिकारी हो तो रोग हो । , वेसा बुध मङ्गल की क्रूर दृष्टि से दृष्ट हो तो रक्त विकार आदि रोग हो। वसा वुध अस्तंगत हो पाप पीड़ित हो तो विदेश से बन्धन मरण। पाप ग्रह से पीडित बुध यदि क्रूर दृष्टि से मङ्गल से इत्थशाल करता हो तो मरण ॥

बुध मङ्गल की दशा में हो पाप दुष्ट हो तो धन नादा उपरोक्त दोनों योगों में यदि शुभ ग्रहं की दृष्टि हो तो शुभ होता है। गुरु-वर्ष लग्न से २-८ घर में गुरु वषश हो पाप दुष्ट हो तो धन नादा हो । जन्म में ग्रह अष्टम हो यदि वर्ष में पंचाधिकारियों में न हो तो भारी झगड़ा हो । जन्म में गुरु अष्टम हों यदि वर्ष में अधिकार रहित हो उस पर शुक्र की' दृष्टि हो तो विवाद में प्रत्युत्तर देने से जय हो । जन्म और वर्ष में अधिकारी गुरु जन्म के मङ्गल की राशि में हो पाप पीड़ित हो तो लोगों से विवाद होता है । ः

गुरु पाप युक्त अष्टम में हो और चन्द्र युक्त मङ्गल लर्न में हो तो मूर्छा और तंद्रा रोग हो ।

अष्टम शनि-हानि अष्टम हो अष्टमेद से इत्यशाल करता हो तो मृत्यु हो। शुभ ग्रह से इत्यशाल होने से अशुभ योग अनिष्टकर नहीं होता । जन्म से अष्टमेश शनि वर्ष में भी अष्टमेश होकर लग्नेश से क्रूर दृष्टि से इत्यशाल: करता हो तो तत्काळ मृत्युदायक होता है । ` जन्म और वर्षे का अधिकार पाया हुआ पाप पीड़ित चन्द्र यदि शनि के पढ (राशि) में हो तो स्पष्ट रूप से विवाद होता है । £

वर्षे फल में भाव फल विचार : १८७-

लग्नेश-लरनेश मुंथेश वर्षेश यदि अष्टमेश हो या अष्टमेश से इत्थशाळ करता:

हो तो मरण प्रद हो जन्म कालिक दुर्ग्रह मारक ग्रहों की दशा या अन्तदं्षा में उक्तः

फल होगा ।

वर्ष लग्नेश निर्वल या अस्तंगत या पाप युक्त हो तो स्त्रियों से विवाद हो ।

जन्म छू्नेश पाप से पीड़ित होकर अष्टम हो तो रोग व कलह हो ।

पाप युक्त जन्म लग्नेश यदि वर्ष में अष्टम हो तो मृत्यु हो।

जन्म लग्नेश वर्ष लग्नेश अष्टम हो तो मरण हो ।

मुन्या-शनि के साथ मुन्या कहीं हो उस पर मंगल की शत्रु दृष्टि हो तोः

आत्मघात ( अपने हाथ से मृत्यु ) हो ।

सहमेश-मुत्यु सहमेश उदित हो (अस्त न हो ) निबंल हो तो जीवन में मृत्यु,

समान कष्ट हो।

पुण्य सहमेक्ष यदि पुण्य सहम से अष्टम हो पाप ग्रहों से युक्त दुष्ट हो तो मरण हो ।-

या जन्म लग्न से अष्टमेश पृण्य सहम में हो पाप युक्त दृष्ट हो तो मरण हो ।

जन्म लग्न से अष्टम राशि यदि वर्ष में पुण्य सहम हो पुण्य सहमेश से युक्त हो:

तो मृत्यु हो । सहमेश-या वर्ष लग्न से अष्टम राशि में पुण्य सहम और पुण्य सहमेदा भी होः

तो मृत्यु हो । पुण्य सहमेश पाप से युक्त हो और अष्टमेश ६-८-१२ घर में हो तो मृत्यु हो ।-

या मुन्था या वर्षेश पाप युक्त हो ६-८-१२ घर में हो तों मृत्यु हो ।

गुरु-अष्टम, नवम या द्वादश गुरु हो उस वपं में तीर्थ यात्रा होती है ।

लग्नेश अष्टमेश-लग्नेश और अष्टमेश एक होकर अष्टम में हो तो रुधिर विकार:

व शरीर कष्ट हो |

मंगल चंद्र-अष्टम में मंगळ और चंद्र हो लग्नेश ६-८ घर में हो तो विष याः

व्याघ्र से मृत्यु का भय हों ।

दशमेश्-अष्टम में दशमेश अस्तंगत हो छठे घर में शनि, चंद्र हो तो राजा या:

रोग से मृत्यु हो या ऊपर से गिरे। शनि चंद्र-अष्टम में शनि युक्त चंद्रमा हो लग्नेश से युक्त या दूष हो तो उस

वर्षे धन, स्त्री, कुटुम्ब में कष्ट हो अरिष्ट हो ।

मङ्गल-मङ्गल ८, १ या १० घर में हो तो चौपाये से चोट लगे । क

लग्नेश-छग्नेश अष्टम हो, गुरु, शुक्र युक्त मङ्गल सप्तम हो अष्टम में चंद्रमाः

हो तो शीतला आदि का रोग हो अरिष्ट हो।

व्ययेश-व्ययेश अष्टमं हो अष्ठमेश धनभाव में हो लग्नेश निबेळ हो तो सपं केः

काटने से मृत्यु हो ।

` मङ्गल चंद्र-अष्टम में मङ्गल युक्त चन्द्र हो तो गुप्त दुःख हो ।

सूर्य शुक्र शनि-शुक्र अष्टम में हो वा लग्नेश पांप ग्रह से दृष्ट हो तो भय पलेष्माः

“१८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

:आदि रोग हो, सूयं अष्टम में हो तो नेत्र रोग, शनि हो तो जल से भय, अष्टमेश को

“पाप ग्रह देखता हो तो मृत्यु हो ।

लग्नेश-लग्नेश अष्टम में अस्तंगत हो, दशमेश छठे और धनेश बारहवें हो तो

“दरिद्र करता है ।

लग्नेश अष्टम, शनि दशम, चन्द्र पंचम, पापयुक्त मंगल दशम में हो तो विष से

“मृत्यु हो । `

सूये-सूर्यं अष्टम हो, अष्टमेश चंद्र युक्त हो, लग्नेश छठे हो, शनि दशम हो तों

: छाठी की चोट से अरिष्ट हो ।

गुरू_गुरु अष्टम में पापयुक्त हों, शनि युक्त चंद्र बारहवें हो तो राजा से अनेक

-कष्ट दण्ड से धन हानि हो ।

दश्मेश-नीच का दशमेश अष्टम हो, पापग्रह दशम में हो तो उस वर्ष में सुख न

"हो उसका राज्य हरण हो जायगा । :

दशमेश अष्टम हो, अध्टमेश् दशम में हो अष्टम क्रूर ग्रह युक्त हो तो अर्थ नाश

:हो । राजा से भय हो !

लग्नेश-लग्नेश अष्टम में हो अष्ठमेश केन्द्र में हो शनि और चंद्रमा छठे हो तों

“अनेक कष्ट हों ।

लग्नेश चम्द्र-चन्द्र युक्त लग्नेश अष्टम हो लग्न में पाप युक्त अष्टमेश हो तो

-रोग शोक आदि से शरीर क्षय हो ।

लग्नेश शुक्र-ऊग्नेश शुक्र अष्टम में पाप ग्रह युक्त व दृष्ट हो लग्न में मंगल हों

«तो तृषा आदि से कष्ट हो ।

गुरु चन्द्र-गुर चन युक्त अष्टम में हो मंगळ सप्तम हो, यह खल्छासर योग कष्ट

“देने वाला है।

चन्द्र युक्त गुरु अष्टम हो और शनि के साथ मुन्था हो तो मृत्यु हो

केतु चन्द्र-केतु युक्त चन्द्र अष्टम होया अष्टम पर दृष्टि हो तो स्त्री का वियोग

-या मनुष्य का मरण हो ।

चन्द्र-केतु युक्त चन्द्र अष्टम हो, अष्ठमेश केन्द्र में हो लग्नेश ६ या १२वाँ हो

"तो निर्धन हो । !

पाप युक्त चन्द्र अष्टम हो नीच का लग्नेश सप्तम हो तो भय, चिता दुःख

~निरुद्यम करे |

चन्द्र सूर्य मंगछ-चन्द्रमा या सूर्य से युक्त मंगल अष्टम हो शनि ७ या ९ स्थान

"में हो तो उस वर्ष ९वें महीने में अरिष्ट हो ।

चन्द्र मंगछ-चन्द्र युक्त मंगळ अष्टम हो तो अग्नि आदि से भय इवास कास रोग

“घात पात आदि का कष्ट हो ।

__ अष्टमेश-अष्ठमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो विष बन्धन आदि से कष्ट, श्वास

मूळ दाह तन्द्रां आदि रोग हो ।

वर्षे फल में भाव फल विचार : १८९:

शनि चन्द्र-शनि और चन्द्र अष्टम हों तो शूल घात धातु क्षय शीतला आदि

अनेक रोग हो ।

लग्नेश शनि-लग्नेश शनि युक्त अष्टम हो चतुर्थ में वक्री पाप ग्रह हो, पाप'

ग्रह को दृष्टि हो तो अनेक प्रकार के दुष्टों से कष्ट हों ।

अष्टमेश-अष्टमेश अष्टम हो बलवान्‌ हो लग्नेश सप्तम हो तो शूल दस्त दाह:

तन्द्रा आदि रोग से कष्ट हो ।

मंगल-मंगल अष्टम हो चन्द्र छठे हो तो शत्रु का उदय घात पात आदि हो ।

चन्द्र-अष्टम चन्द्र हो या मङ्गल शनि युक्त चन्द्र के वर्ग में हो तो बात कफ सेः

शरीर क्षय शस्त्र से ज्वर पीड़ा आदि हो ।

नीच कं ग्रह-जो ग्रह जन्म में नीच का हो वही ग्रह वर्ष में अष्टम भाव में हो

तो सुख घन आदि प्राप्त हो ।

५ ग्रह-अष्टम में ५ ग्रह हों या ६ से अधिक नीच युक्त हों तो वज्ञ से हत होने

का कष्ट हो ।

वर्षेश बुध-वर्षे् और बुध अष्टम हों शनि मङ्गल पाप युक्त सप्तम में हों चन्द्रः

की दृष्टि हो तो कण्ठादि रोग या मरण हो ।

पाप ग्रह-अष्टम क्रूर ग्रह युक्त दृष्ट हो सप्तमेश ४या५ भाव में हो तो मुत्यु हो।'

लग्नेश-लग्नेश अष्टम हो शनि चन्द्र के स्थान में हो चन्द्रमा पाप युक्त मकर

राशि में हो तो कष्ट हो जलोदर रोग हो ।

लग्नेश मज़्ल-लग्नेश और मङ्गल अष्टम हो अष्टमेश ६ या १२ भाव में होः

तो भृत्यादि का घात शत्रु विवाद अरिष्ट हो ।

लाभेश-अष्टम में लाभेश हो गुरु चतुर्थं हो चतुर्थश नीच का सप्तम हो तो ४

महिना में अरिष्ट हो ।

तृतीयेश-तृतीयेश् अष्टम में क्रूर ग्रह से दुष्ट हो तो शरीर पीड़ा हो भाई काः

वियोग हो ।

व्ययेश-व्ययेश अष्टम हो धनेश व्यय में हो तो स्व जाति में अधिक व्यय होः

ईश्वर की पूजा करे ।

पाप ग्रह-अष्टम में एक भी पाप ग्रह शत्रुग्रही हो पाप ग्रह से दुष्ट हो तोः

बालक नष्ट हो ।

नवम भाव का ग्रह फल

नवम में पाप ग्रह-सहोदर को भय, पशुओं को पीड़ा ।

सुर्य-अति हृषं प्रद ।

शुभ ग्रह-धन व धर्म की वृद्धि ।

अन्य मत है कि नवम में पाप ग्रह भी शुभ हैं ।

नवम सूर्य-धमे राज्य व यश को बढ़ावे, बन्धुओं को पीड़ा कारक, स्त्री पुत्र से:

विवाद क्लेश, मति मन्द ।

-१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वषंफल खण्ड

नवम चन्द्र-भाग्योदय, धन का लाभ, घर में सौख्य, शत्रु नाश, व्यापार में

“सुख, पुण्य का उदय, यात्रा में सुख, यश की वृद्धि, चित में संतोष,राजा से सम्मान ।

नवम मङ्गल-पुण्य का उदय, धन का लाभ, प्रतिष्ठा एवं पाप में प्रीति, उद्वेग,

अपने जनों से कलह, धन व ऐडवर्य की हानि भी करे ।

नवम बुध-धर्म में बुद्धि, राजा से जय, भाग्योदय, कीर्ति की वृद्धि, शत्रुनाश,

“कार्य सिद्धि में विघ्न, उद्वेग और स्त्री को पीड़ा भी करता है।

नवम गुरु-अधिक धर्मे, सुख प्राप्ति, भाग्योदय, धन लाभ, तीर्थाटन, पुण्य कार्ये

“में बुद्धि, स्त्री विलास, मन प्रसन्न, राज सुख ।

नवम शुक्र-धर्म की बृद्धि, राजा तुल्य हो, वाहुन सुख, गौ भूमि भूषण वस्त्र का

मलाभ, आरोग्यता, स्त्री, पुत्र मित्र से सन्तोष, निर्बल बुद्धि, उन्नति ।

नवम शनि-जाया पुत्र मित्र को कष्ट, धन नादा, पाप बुद्धि, भाइयों से भय

:और पीड़ा एवं भाग्य का उदय, राजा से लाभ, कीति, शत्रु नादा ।

नवम राहु-शरीर पीड़ा, स्त्री से विरोध, धर्मे काम में विलम्ब, पशु व वन्धुओं

“को पीड़ा एवं अन्य मत से राजा से जय, भाग्योदय, रात्रुनाश ।

नवम केतु-धर्म नाह, पशु और भाइयों को पीड़ा, दातु नारा, भाग्यो दय, राजा

मसे जय ।

नवम सूर्य-तर्षेश सूर्ये अधिकार युक्त हो और चन्द्रमा से कम्बूली भी हो तथा

  • स्वगृह उच्चादि में होवे तो अपनी इच्छा से मार्ग चलना पड़े मार्ग में सुख भी होवे ।

-यदि सूर्य स्वगृह आदि अधिकार युक्त न हो तो दूसरे की प्रेरणा से गमन होवे, मागं

-में सुख भी न हो ।

नवम चन्द्र-यदि चन्द्र या गुरु जन्म के शनि की राशि में वर्ष में नवम भाव में

“पाप युक्त हो तो बिना प्रयोजन दीर्घ मार्ग चलना पड़े ।

चन्द्रमा बलवान होकर नवम में हो और, मुन्था सप्तम हो तो विदेश सम्बन्धी

“मार्ग चलना पड़े ।

नवम मङ्गल-वर्षे्च मङ्गल ३ या ९ स्थान में बलवान हो पाप युक्त न हो तो

यात्रा गुणदायक होवे चर कायं भी स्थिर हो जावे अर्थात्‌ कोई भी कार्यं अधिक

समय तक स्थिर रहता है । जड

जन्म में गुर जिस राशि में हो उती में वर्ष का मङ्गल नवम हो नौकर और

  • धर्म की प्राप्ति होने वाली यात्रा होती है । टु

जन्म का बुध जिस राशि में हो उसी में वर्ष का मङ्गल हो और धनेश की दृष्टि

  • उस पर हो तो यात्रा सुख देने वाली होगी । र

जन्म का मंगल स्व राशि में हो वर्ष में भी स्वराशि का नवम स्थान में हो और

लग्न को देखता हो तो शुभ कार्ये सम्बन्धी यात्रा हो और यात्रा में प्रसन्नता हो।

यदि गुरु से नवम स्थान में बली मङ्गल हो तो यात्रा शुभ होती है।

वर्षे फल में भाव फल विचार : १९१

नवम मंगल-जन्म के शनि की राहि ऐ वर्ष में मंगल ३-९ घर में वलहीन

अस्तंगत पाप युक्‍त दृष्ट हो तो पाप को वृद्धि हो ।

नवम मङ्गल-मङ्गल वषश होकर निर्व अधिकार रहित होकर नवम में हो तो

“उसे अपने सम्यन्धियों को छोड़कर दूर देश जाना पड़े।

नवम म० बु० गु०-मङ्गल और वुध बली होकर गुरु से युक्‍त हो अस्त न हों

-तो शत्रु सेना पर आक्रमण के लिए जाना पड़े और यश सुख देने वाला जय हो ।

नवम बुध-वर्षश बुध वली हो और पाप रहित होकर वक्री हो और ३-९ स्थान

में हो तो तीर्थ या देव सम्वन्धी यात्रा होवे ।

वैसा बुध वर्षे होकर पाप पीड़ित हो (क्रूर दृष्टि हो) नतो बुरी यात्रा हो ।

नवम वुध-बुध जन्म अधिकारी (छग्नेश) होकर वर्ष में उस राशि में हो जि

"में जन्म का शनि है और पाप युक्त हो तो शत्रु से कलह सम्वन्धीमार्ग चलना हो ।

नवम गुरु-बली वर्पेश गुरु पाप युक्त या दुष्ट रहित ३-९ घर में हो तो धमं

सम्बन्धी यात्रा होती है ।

यदि गुर निर्वेल होकर वर्षेश हो और पाप पीड़ित होकर ३-९ स्थान में हो तो

'कुयात्रा हो ।

अधिकार रहित गुरु नवम में हो तो दूर देश की यात्रा होती है वहाँ राजा से

"मिलन उससे लाभ प्रतिष्ठा होती है '

नवम शुक्र-वर्षेश शुक्र ३-९ घर में पाप रहित हो बलवान हो तो मागे में

सुख हो। यदि शुक्र अस्तंगत, व वक्री होकर ३-९ घर में -हो तो मार्ग गमन ठीक नहीं

होता इच्छा के विरुद्ध गमन हो ।

नवम शनि-यदि अधिकार रहित शनि नवम हो तो अशुभ यात्रा हो ।

शनि पंचाधिकारियों में होकर वषश होकर ३-९ घर में हो तो धर्म की वृद्धि

हो । पाप नाश हो।

शनि-वर्षेश शनि अस्त हो निर्बेल पाप युक्त हो तो पाप करने वाला नास्तिक हो

यदि ऐसा शनि ३ या ९ घर में हो ।

लग्नेश-लग्तेश यदि नवमेश को अपना तेज देता हो अर्थात्‌ लग्नेश शीघ्र गति

चाला अल्प अंश में हो और नवमेश मन्द गतिवाला अधिक अंश में हो और दोनों

दीप्रांश के भीतर हों तो पूर्व निश्चित यात्रा होवे ।

यदि लग्नेश वर्षेश का इत्यश्ञाल होता हो या वषं लग्नेश और मुन्थेश का

इत्यशाल हो तो भी उपरोक्त फल हो ।

सब योगों में लग्नेश और नवमेश का इत्थशाळ होता हो तो अकस्मात्‌ गमन

हो जहाँ संभावना न हो वहाँ जाता पड़े ।

वर्षेश-कोई बली ग्रह वर्षेश पंच अधिकारियों में कोई अधिकार प्राप्त होकर

१९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

केन्द्र में हो पाप युक्त दृष्ट नं हो अधिकार मिलने से परदेश में गमन होवे या सेनाः अध्यक्ष के पद पर होकर जाना पड़े।'

मुन्था-मुन्था यदि ३-९ घर में हो शुभ में आश्रय से पुण्य का आगम होता है और पाप के आश्रय से पाप का आगम होता है। सूर्य-सूर्य वर्षेश होकर क्षीण बळ पाप युक्त या दुष्ट होकर ३-९ घर में होतो पापकर्ता और धर्म का निन्दक हो ।

गुरु गुरु वर्षेश होकर अधिकारी हो ३-९ स्थान में हो तो अस्त वलहीन हो तो न्याय से धन पाता है ।

गुरु नवम में सौम्य ग्रहों से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश करता है । ददाम साच में ग्रहों का फल -

दशम में शनि-पशु धन नाशक ।

दशम में सूय मंगल-व्यापार उद्योग को करते है । दशम में शुभ ग्रह-राजसमागम सुख धन व पुत्र का सुख । दशम सूयं-राजा से लाभ, धन की प्राप्ति, सुवर्ण गौ भुमि.वस्त्र का लाभ, कायं सिद्ध हो, मान बढ़े, पशुओं के अंग में रोग वृद्धि । ॥ दशम चन्द्रमा-शत्रु का नाश, प्रतिष्ठा कीति वृद्धि, पुत्र और वस्त्र का लाभ, व्यापार में सुख, रोग नाश, मित्र व स्त्री का सुख, राजा से धन प्राप्ति । दशम मंगल” भाग्य का उदय, धन लाभ, प्रतिष्ठा, मान सुख, राजा की कृपा, व्यापार में लाभ, आरोग्यता, पशुओं की वृद्धि दशम बुध-वाहन का सुख पुत्र वृद्धि, धन लाभ, राजा से जय, भाइयों से सुख, भोग विलास, सत्कार, देह सुख बल कांति वृद्धि । दशम गुरु-राजा की प्रसन्नता, शत्रु नाश, .भूमि गौधन का लाभ, कीति, मान वृद्धि, चित्त में आनन्द, घर में महोत्सव, सुहृद का सुख, कमं का उदय । दशम शुक्र-राजा से मान, सववत्र जय गौ धन धान्य लाभ, खेती तथा वाहन से सुख, शत्रु नाश, कार्य सिद्धि, भाइयों से सुख, व्यापार में लाभ । दशम शनि-खेती से हानि, पशु का भय, अपने जनों में उदरपीड़ा, राजा से भय, स्थान हानि, व्यापार से लाभ, प्रवास, दुःख व्याकुलता, धने हानि । दशम राहु-वाहन नाश, भुमि खेती आदि का नाश, व्यापार से लाभ, अन्यः मत- मंगल कार्य हो, धन लाभ, स्वजनों से वैर । दशम केतु--च्यापार में लाभ, राजा से जय, वाहन की हानि, मंगल कार्यं हो । दशम सूर्य-वर्षेश सुर्यं नीच राशि का पाप युक्त ददाम में हो तो राजा से मृत्यु या बन्धन हो, जिसका जन्म कातिक में हो उसे यह योग हो सकता है। जन्म का सूर्य सिंह राशि में हो और वर्ष में बलवान होकर दशम में हो तो नवीन स्थान प्राप्ति ओर राजा का आश्रय भी होवे । जन्म में सुयं दशमेरा हो (जन्म लग्न वुर्चिक हो) और वषं में दशाम हो और लग्नेश

वर्ष फल में भाव फल विचार : १९३

से इत्यशाल करता हो तो बल के अनुसार राज्य का लाभ हो । यदि धर्मेश कर्मे दोनों अस्तंगत या पाप पीडित हों तो धर्म का क्षय और राज्य नाश हो । छ चन्द्रमा-बली चन्द्रमा जन्म के मंगल की राशि में हो तो अन्य स्थान का लाभ ॥

दशम मंगल-यदि मंगल जन्म के शनि की राशि में रह कर वर्ष में दशम हो और मुन्या को देखे तो पाप कर्म आदि करने से राजदंड और धन नाश हो । दशम वर्षश-बलवान्‌ वर्षेश दशम में हो तो राज्य लाभ, धन लाभ,यश लाभ हो । या बलवान वर्षश दशम को छोड़कर केन्द्र १, ४, ७ में हो तो घर सम्बन्धी

सुख प्राप्त हो ।

यदि वर्षेश, लग्नेश दशमेश इन सव का इत्थशाल होता हो तो राज्य दायक योग होता है ।

या वर्षेश राज्य सहम में हो सूर्य से इत्यशाल करता हो तो महाराजा हो । त ह मुन्या सूर्य युक्त हो या लग्न से दशम हो तो राज्य लाभ का सुख ।

शनि-अधिकारी शनि दशम हो तो लोह प्रहार से पीडा हो ।

दशम शनि-वर्षेश शनि, स्वगृही या उच्च में होकर दशम में हो तो निरोग रहे और धनागमन भी हो ।

दशम गुरु-वर्षेश गुरु स्वग्रही या उच्च का होकर दशम में हो तो निरोग रहे, धन मिले । ३

मंगल-वर्षेश मंगल स्वगृही या उच्च का होकर दशम में हो तो बाहुवल से घन प्राप्त हो ।

सूर्य-सूर्य वर्षेश स्वगृही या उच्च का होकर दशम में हो तो राजा से धन मिले। बुध-वर्षश बुध स्वगृही या उच्च का होकर दशम हो तो वैद्यक, ज्योतिष या शिल्प (कारी गरी) से लाभ हो ।

चन्द्र मंगळ-चन्द्र युक्त मंगल दशम हो तो घोड़ों आदि का नाश करता है । यय वर्षे होकर दशम हो तो निराशा हो तथा एक स्थान पर स्थिति ना होवे ' कपः -

यदि वर्षश सूर्य हो और जन्म के चन्द्रमा की राशि का वर्ष में शनि हो तो शुभ

कार्यों में विफलता हो । जन्म काल या वर्षकाल में बलहीन शनि हो या शनि वक्र या अस्तंगत हो तो भी उपरोक्त फल हो । " 2

दशमेश-यदि दशम स्थान, दशमेश तथा कमं सहमेश ये सब शनि से युक्त या

दृष्ट हो तो कार्य की हानि हो व्यर्थ परिश्रम हो ।

दशमेश दशम में शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो, लग्नेश केन्द्र में हो तो अरिष्ट नास हो, राजा से धन मिले ।

लग्नेश आदि-यदि धनेश, नवमेश, बुध, लग्नेश बलहीन होकर दशम में हों तो

धन नाश हो मरण तुल्य कष्ट हो बहुत दोष करता है ।

१३

~ SN

१९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

॥ वर्षश-वर्षश दशम में बळी हो और सौम्य ग्रह युक्त हो तो राजा से अर्थ लाभ

हो शरीर सुख हो मन प्रसन्न रहे, वाहन का लाभ हो ।

  • ददामेश-दशमेश दशम हो शुभ ग्रहों से युक्त हो लग्नेश केन्द्र में हो तो स्त्री का

सुख राजा पक्ष से लाभ शत्रु का नाश हो अरिष्ट का नाश हो ।

2 ददामेहा-दशमेश दशम हो और धनेश पंचम में हो तो धान्य का लाभ हो शत्रुक्षय हो अरिष्ट का नाश हो ।

, ५ दशमेश-दशमेञ्ष शुभ युक्त २, ३, ४ भाव में हो ओर चतुर्थेश केन्द्र में हो या

दशम में हो तो घोड़े की सवारी या वाहन प्राप्त हो ।

त्रिराशि पति-त्रिराशि पति दशम हो और दशमेश नवम पंचम, हो तों सब

अरिष्ट दूर हों ।

शमेश-दशमेश दशम सौम्य ग्रह युक्त हो लाभेश केन्द्र में हो तो स्त्री सुख, शत्रु

नाश, राजा से लाभ हो

एकादश (लाम). भाव में ग्रह फल

लाभ में-सब पाप या शुभ ग्रह्‌-धन वृद्धि, यश वृद्धि अच्छे मित्रों का संग, बल पुष्टि हो ।

बलहीन पाप ग्रह-पुत्र, घन, बुद्धि इन का नाश ।

बलहीन शुभ ग्रह-अपने शुभ फल को न्यून करते हैं ।

. लाभ में सूर्य-राजा से धन प्राप्ति, धान्य, वस्त्र, सुवर्णं इनकी प्राप्ति, भोग,सुख,

शंत्रु नाश, आरोग्यता, भाग्योदय, कामना सिद्धि, घोड़ा, बैल आदि से धन प्राप्ति,

पुत्र के शरीर में पीड़ा, शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो पुत्र सुख हो ।

लाभ में चन्द्रमा-व्यापार से लाभ, राजा से सुख, धन लाभ, पुत्र सुख, प्रतिष्ठा

वृद्धि, शत्रु नाश, पुत्र वस्त्र भूषण आदि प्राप्ति, बुद्धि बढ़े, श्वेत वस्तु का लोभ.

  • लाभ में मंगल-राजा से सुख, शत्रु नाश, मित्र पक्ष से लाभ, विजय, घोड़ा हाथी

सुवणे वस्त्र की प्राप्ति, स्त्री, पुत्र, भाई का सुख, सम्पत्ति का आगमन । ०

लाभ में बुध-विजय सम्पत्ति, धान्य वस्त्र इनकी वृद्धि, कीति, मनोरथ सिद्धि,

पशुओं की वृद्धि, आरोग्यता, सुख, द्रव्य का छाभ, भाग्योदय ।

लाभ में गुरु-जय, हाथी घोड़ा आदि वाहन लाभ, शत्रु नाश, पुत्रोत्सव, प्रतिष्ठा वृद्धि, आरोग्यता, स्त्री पुत्र भाई का सुख ।

: लाभ में शुक्र-विजय, पुत्रों की वृद्धि, राज पक्ष से जय, शत्रु नाश, मित्रों की

वृद्धि, सुवर्ण लाभ जल मागं से धन प्राप्ति, ऐश्वर्य वृद्धि, सुख, व्यापार से लाभ ।

लाभ में शनि-सुवर्ण गो भूमि वाहन अदव आदि लाभ, कीति वृद्धि,स्त्री से सुख,

आरोग्यता, चित्त प्रसन्न, धेयं वृद्धि, संतान को पीड़ा ।

: लाभ में राहु-राजा तुल्य हो, शत्रु नाश, आरोग्यता, ऐश्वर्य, स्त्री सुख, नीचजन

से लाभ, सुवर्णे गो भूमि धन की वृद्धि, पुत्र को भय ।

. लाभमें केतु-राजा के समान करे, शत्रु नाश, सुवर्ण गो भूमि तथा धन का लाभ, पुत्र भय ।

वर्ष फल में भाव फल विचार : १९५

लाभ में शुभ ग्रह-यदि पाप ग्रह रहित शुभ ग्रह लाभ में हो तो लाभ कारक है। लाभ में लाभेश-लाभेश लाभ में हो तो वह विद्या के द्वारा लाभ कराने वाला ऱहोता है।

लाभ में लाभेश-लाभेश पाप ग्रह युक्त अस्तंगत हो तो हानि होती है । लग्नेश लाभेश-लाभेश और लग्नेश का इत्थशाल हो तो धन लाभ हो और 'स्वजनों में गौरव बढ़े । : लाभ में सूयं-बली वर्षेश सूर्ये लाभ में हो. तो राजा के मन्त्रियों से मित्रता हो लाभ में सहम-अर्थ सहम में शुभ ग्रह हो और वली बुध मुन्या के साथ लग्न में हो और लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो धातु आदि भूमि सम्बन्धी गडी हुई सम्पत्ति लाभ हो । यदि योग कारक ग्रह पर पाप दृष्टि हो तो उक्त लाभ नहीं होता । लाभ में ग्रह लाभ स्थान में बलवान शुभ या पाप ग्रह हो तो धन लाभ हो यदि ये निर्वल होकर लाभ में हों तो हानि होती है । लाभ में लामेश-लाभेश लाभ में हो अष्टमेश छठे हो तो दुःख और अरिष्ट हो परन्तु पुत्र स्त्री मित्रों का लाभ हो ।

धनेश-धनेश लाभ में हो शुक्र और गुरु नवम में हो तो राजा की मित्रता से स्वर्ण लाभ हो शत्रु का नाश हो ।

'द्वादश (व्यय) भाव में ग्रह फल

व्यय में पाप ग्रह-नेत्र रोग विवाद राजा से या चोर से धन हानि । व्यय में शुभ ग्रह-अच्छे कार्य में खर्चे ।

व्यय में शनि-हर्ष वृद्धि करता है ।

व्यय में सूयं-चित्त में उद्देग,स्त्री से विग्रह,व्यर्थं खर्च,मस्तक,उदर,नेत्रों में पीड़ा, चरण में रोग, शत्रु से विवाद, धन नाश, अनेक पीड़ा, मित्र से बेर, दुःख । व्यय में चन्द्र-पत्काये में धन खर्च, घर में क्लेश, शत्रु भय, कलह, चित्त चंचल, नेत्र रोग, कफ की पीड़ा, गुप्त रोग, भूख कम ।

व्यय में मंगल-व्यथं व्यय, राजा से भय, परिजनों से विरोध, स्त्री के शरीर में "रोग, नेत्र, कान व मस्तक में रोग, विषाद, विवाद, धन क्षय ।

व्यय में बुध-व्यर्थ घन हानि गुप्त चिता, शत्रु से विवाद, कलह, कान व नेत्र में “पीडा, कफ से कष्ट, थोड़ा लाभ । बुद्धि की मंदता ।

व्यय मेंगुरुराजा से भय, नेत्र रोंग, कफ रोग, शरीर में पीड़ा, विवाद, अपवाद, 'धन हानि, शोक भय व हानि, प्रवास, मित्रों से वैर, आपत्ति, स्थान हानि । व्यय में शुक्र-अच्छे काम में धन खर्च, राज भय, प्रवास, ज्वर, वमन, कर्ण रोग, मरण तुल्य कष्ट ।

` व्यय में शनि-व्यर्थ का खचं, शत्रु और धन का नाश, चित्त में विकलता, क्लेश चिता, सिर, नेत्र, हृदय व चरण में पीड़ा।

व्यय में राहु-शत्रु भय, धन की हानि, स्त्री सम्बन्धी चिता से व्याकुलता, आपस

में कलह, सिर, कान, नेत्र, व उदर में रोग, मृत्यु तुल्य कष्ट, स्थान त्याग ।

१९६ 3 सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

व्यय में केतु-शत्रु से भय, स्त्री को पीड़ा, मनुष्यों से विवाद विकलता, कान,

नेत्र, उदर में पीड़ा ।

व्यय में सूयं-यदि सूर्य वर्षेश होकर वर्ष में पाप युक्त या दृष्ट होकर छठे घर में

चतुष्पद राशि ( १, २, ५, ९ उत्तराद्धे, १० पूर्वार्ध राशि ) में हो या ८-१२ स्थान में

हो तो नौकरों से कलह हो ।

व्यय में बुघ-वर्षेश बुध पाप युक्त होकर ६, ८, १२ घर में हो तो नीच कर्म

करता है । यदि यह वर्षश बुध पाप ग्रह से दृष्ट हो तो लाभ नहीं होता ।

यदि यह वर्षश बुध अस्तंगत हो तो लेखन कर्म से लाभ नहीं होता ।

व्यय में शनि-यंदि बली झनि वर्षश होकर ६-१२ घर में हो तो नई जमीन में

बसे, वृक्ष लगावे, जलाशय आदि का निर्माण करे ।

व्यय में वर्षश-वर्षेश तथा लग्नेश बलहीन होकर ६-८-१२ स्थान में चतुष्पद

आदि जैसी राशि में हो तो उसके सदुश फल देते हैं। जैसे चतुष्पद राशि में हो तो

चोपायों का नाश करते हैं। द्विपद से आश्रित मनुष्यों का नाश, जलचर राशि से

जल जीवों का नाश आदि ।

वर्षेश लग्न से ६-८-१२ में हो और जन्म और वषं में भी दशमेश बलहीन हो तो

शुभ नहीं होता ।

या वर्ष में अष्टमेश बलहीन होकर ६-८-१२ घर में हो तो शुम नहीं होता ।

व्यय में शुक़्-यदि बलहीन शुक्र छठे स्थान में पाप युक्त या दृष्ट हो और नर.

राशि में हो तो सेवकों की हानि हो यदि वह चतुष्पद राशि में हों तो चोपायों की

हानि करता है ।

ऐसा ही वर्षेश का ८-१२ स्थानगत होने का फळ है।

व्यय में चंद्र मंगू-यदि चन्द्र युक्त मंगळ पाप ग्रहों से युक्त होकर १२ भाव में

हो तो चोपायों में व्याकुलता होती है।

मंगल वर्ष में व्यय भाव में हो सूर्य दुसरे घर में हो तो विवाद में क्लेश हो ।

व्यय में पंचमेश-पंचमेश व्यय में हो व्ययेश की दृष्टि पंचम पर हो तो धन व्यय

हो पुत्रों को पीड़ा हो, कन्या हो । .

व्यय में व्ययेश छग्नेश-व्ययेश लग्नेश वारहवे में पाप ग्रह युक्त हों तो खर्चे बढ़े

दंड से पीड़ा हो ।

व्यय में शति-वलवान शनि व्यय में सौम्य ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो सुख हो,

कष्ट नाश हो ।

व्यय में गुरु शनि स्‌र्य-बारहर्वे गुरु सूर्य और शनि हो तो उस वर्ष में अधिक

खचं हो, स्वजनों से बैर और परजनों को सुख देवे ।

व्यय में अष्टमेश-अष्टमेश वारहवें हो और शनि क्रूर ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो

उस वर्ष में अपने वर्ग से शरीर को कष्ट हो ।

व्यय में सप्तमेश शनि-व्यय में शनि युक्त सप्तमेश हो तो उस वर्ष कलत्र को

पीड़ा, लोकापवाद, स्वजनों से बैर, मन में व्याकुलता, संतान पीड़ा हो ।,

बर्षे फल में भाव फल विचार : १९७

. व्यय में सूंयें मंगल-शुक्र लग्न में या वारहवें सूर्य मंगल के साथ हो तो नेत्र रोग हो ।

वर्षे में भाव फल का संक्षिप्त विचार

(१) जो भाव अपने स्वामी से या शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो या मित्र दृष्टि

से दृष्ट हो उस भाव की वृद्धि होती है, जैसे लग्नेश लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता हो

तो उत्तम फल होवे, धन भाव का स्वामी धन भाव को देखता हो तो धन की वृद्धि हो।

( २) कोई भाव पाप युक्त या दुष्ट हो तो उस भाव की हानि होती है यदि

सौम्य या पाप ग्रह मिश्रित हो तो मिश्रित फल होगा ।

( ३) भावेग जिस भाव को देखता हो वैसा कार्य करने वाला होता है ओर

आक्रांत होकर भी देखता हो तो पराये के साथ में कार्य सिद्ध करने वाला होता है।

(४) नीच का और शत्रु के घर में वैठा हुआ ग्रह उस भाव का नाश करता

है। उदासीन राशि में मध्यम फल करता है, मित्र का, स्वराशि का, त्रिकोण में गया

हुआ ग्रह अपने उच्च का या मित्र दृष्टि से दृष्ट हो, वह ग्रह भाव की अवश्य वृद्धि

करता है, अर्थात्‌ उस भाव से होने वाला फल पूर्ण रूप से मिलता है ।

( ५) ६-३-१२ स्थानों में क्रूर ग्रह शुभ और सौम्य ग्रह अशुभ माने जाते हैं ।

अन्य मत है फि ६-८-१२ घर में सौम्य ग्रह इस प्रकार हानि करते हैं कि छठे में

शत्रु की हानि, आठवें में मृत्यु की हानि, वारहवें में व्यय की हानि करते हैं इससे

इनमें सौम्य ग्रह अच्छे और पाप ग्रह बुरे माने जाते हैं ।

( ६) भिम भाव में भावेश सहित लग्नेश हो उस भाव की वृद्धि होती है और

अष्टमेश से युकः जो भाव हो उसकी हानि होती है।

(७) जिम वर्ष में लग्न पंचम या धन स्यान इन तीनों स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, उस वर्ष में सुख और सम्पत्ति प्राप्त होती है ।

( ८ ) लग्नेश या राशीश उदयी हो और अपने उच्च का हो या दोनों एक

साथ वँठे हों, उत वर्ष में शुभ होता है ।

(९) लग्न में उच्च का ग्रह हो तो लक्ष्मी प्राप्त हो, चतुर्थं उच्च का ग्रह हो

तो सुख मिले, उच्च का ग्रह सप्तम में स्त्री की प्राप्ति, दशम में राज्य प्राप्ति

कराता है।

(१०) जन्म में जो ग्रह जिस भाव में हो, वर्ष में भी उसी प्रकार हो तो जन्म के

'अह अनुसार ही शुभ या अशुभ फल देते हूँ।

(११) जो ग्रह जन्म में बलवान परन्तु वर्ष में निबेळ हो तो वर्ष के पहिले भाग

सें शुभ फल मंत में अशुभ फल होता है । इसके वि रुद्ध हो तो वषं के पूर्व भाग में

अशुभ फल भंत में शुभ फल करता है। जब जन्म ओर वषं में समान वल हो तो

दोनों भागो में समान फल देता है।

(१२) स्वगृही उच्च का, मित्र ग्रही, शत्रु ग्रही, अस्त नीच भौर हुद्दादि में बैठे

हुए का अच्छी प्रकार बलाबल विचार कर उसके अनुसार फल का निर्णय करना ।

(१३) ग्रहों का फल उन ग्रहों की दशा में होता है।

बळ

१९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(१४) दो भावों के मध्य में जो ग्रह हो तो उसी दशा का भाव फल देता है

जिसमें वह है । और दोनों संधियों से कम हो तो वरत॑मान भाव का और अधिक हो

तो आगे के भाव का फल देगा । यदि ग्रह संधि के समान हो तो कुछ फल नहीं देगा।

इसके लिए भाव की कुछ संधियाँ निकाल कर चलित भाव कुंडली वना लेना ।

(१५) किसी भाव के पोषक का योग कारक ग्रह और उस भाव का स्वामी ग्रह

बलहीन हो तो उसका नाश होता है ।

(१६) जो ग्रह जिस राशि में जन्म में रहतां है वह राशि उस ग्रह की' पद संज्ञक

है । वह पद संज्ञक राशि वर्ष में यदि वली हो तो जन्म में वह राशि जिप भाव में

रहती है उस भाव सम्वन्धी शुभ फल होता है । यदि वर्ष में वह राशि निर्बल हो तोः

अशुभ फल होता है ।

(१७) जन्म में केन्द्र में स्थित पाप ग्रह यदि वर्ष लग्न में हो तो रोग होता है ।,

(१५) जन्म में जिस राशि में गुरु और शुक्र हों, उसी राशि में वर्ष में मंगल हो;.

अस्तंगत भी हो तो पाप, तिल्ली, गलगंड, शीत, पित्त, सर्दी आदि के रोग होते हैं ।

(१९) वर्ष लग्न, मुंथा, मु थेश, वर्ष लग्नेश ये सव पाप ग्रहों के वीच में हों तों

रोग होवें ।

(२०) चंद्र जैसे-जैसे अंशो में बढ़ता है शुभ फल देता है और जैसे-जैसे घटता

जाता है, अशुभ फल करता है ।

(२१) पंचवर्गी बल के अनुसार ग्रहों के ३ प्रकार के बल इस प्रकार हैं ५ विश्वा

से कम-बलहीन । ५ से १० विशवाबल-मध्यवली । १० से २० विशवावल-पूर्णंबली ।

(२२) वर्ष लग्नेश, वषश, मु था, मु थेश ये सव अपने बल के अनुसार अपनी

दशा में फल देते हैं । >

(२३) वर्ष लग्न, जन्म लग्न से ६-८ भाव में हो तो आथिक हानि मृत्यु या मृत्यु

तुल्य कष्ट हो । (२४) जन्म में जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी हों वे यदि वषे में केन्द्र त्रिकोण

या शुभ भाव में हों और वे पूर्ण बली हों तो वर्ष में उन-उन भावों की वृद्धि कर.

लाभ पहुंचायेगे । म (२५) त्रिकोण में गुरु सुर्य शनि या मंगल हो तो उस वर्ष धनहानि हो । (२६) शुक्र कन्या राशि में या अस्त हो और चंद्र भी वृश्चिक राशि में हो तो. वह वर्ष अशुभ हो ।

(२७) सूर्यं चंद्र एक राशि में हों या दोनों ६-८-१२ में हों तो वह वर्ष अनिष्ट: कारक होगा । 2

(२५) चंद्र पाप युक्त या दृष्ट हो तो उस वर्ष चित्त में अशान्ति हो चिन्ता हो । (२९) ३-४-७ भाव में पाप युक्त शनि हो तो उस वर्षो भर रोग होते रहें ।

(३०) जन्म में जिस राशि पर शुक्र हो, उस राशि पर वर्ष में वर्षेश हो तो बिवाह या स्त्री सुख हो ।

वर्षफल में भाव फल विचार : १९९

(३१) सूयं शनि मंगल ८ या १० में हों तो वाहन से चोट लगने की घटना हो ।

(३२) जन्म में सूर्य मेष या सिंह राशि का हो तथा वर्ष में बलवान होकर दशमं

हो तो पदोन्नति हो ।

(३३) जन्म का मंगल जिस राशि का हो, वर्ष में यदि चंद्र उसी राशि में हो तो धन लाभ एवं पदोन्नति हो ।

(३४) लाभेश लग्नेश का परस्पर इत्थशाळ हो तो उस वर्ष यश और सम्मान मिले कीति बढे ।

(३) वर्ष कुंडली में चंद्र लग्न में या ६-८-१२ घर में हो और सूर्य की दृष्टि

हो तो शत्रु भय । मंगल की दृष्टि-शस्त्र भय । शनि दृष्टि-रोग भय । बुध गुरु शुक्र

की दृष्टि हो तो लाभ हो, परन्तु रोग भी हो ।

(३६) ३-६-११ भाव में शनि, मंगल, राहु या सूर्य हो तथा चंद्र, गुरु, शुक्र,

केन्द्र या त्रिकोण में हों तो धन सुख सम्पत्ति आरोग्यता लाभ हो।

(३७) वर्ष में ३-१०-११ भाव में बली मंगल हो तो उस वर्षे भाई द्वारा यहां

एवं सुख सम्पत्ति प्राप्त हो ।

(३८) पाप युक्त शुक्र २ या १२ भाव में हो तो उस वषं नेत्र पीड़ा या नेत्रों की

शल्य क्रिया होने का योग होता है ।

(३९) वर्ष में मंगल चंद्र का दृष्टि आदि द्वारा सम्बन्ध हो या तृतीयेश से

इत्थशाल हो तो भ्रातु सुख में अल्पता हो ।

(४०) वर्ष लग्नेश पर ८ या १२ के स्वामी की दृष्टि हो तो वर्षभर दुःख और कष्ट भोगे ।

(४१) जन्म का धनेश वषे में पूर्ण वली हो या शुभ स्थान में हो तथा उसका सम्बन्ध वर्ष में धनेश से हो तो उस वर्ष आथिक लाभ हो, धन वढे । (४२) यदि मिवंल धनेश भाग्य भाव में हो तो संचित धन का नाश हो । (४३) धनेश भाग्येश बलवान होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो उस वर्ष आथिक लाभ हो ।

(>) घनेश मंगल व्यय भाव में हो तो भूमि सम्बन्धी कार्यों में संचित पूँजी खच हो ।

(४५) धनेश चंद्र व्यय में-मांगलिक कार्ये में खच हो। |

(४६) धनेश बुध या शुक्र व्यय में-उपरोक्त फळ । |

(४७) धन भाव में गुरु हो और शुम ग्रहों से दृष्ट हो तो उस वर्ष धन प्राप्त

करने में सहायक हो ।

(४८) धनेश पर बुध, गुरु, शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो तो उस वर्ष धन प्राप्त हो ।

(४९) धनेश वर्षेश का परस्पर इत्यशाल हो तो अचानक धन प्राप्त हो ।

(५०) बली धनेश कहीं हो लाभ करायेगा ।

(५१) घनेश चतुर्थेश का सम्बन्ध हो तो वाहन खरीदने या बेचने से लाभ हो ।

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२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

(४२) चतुर्थेश की दृष्टि चतुर्थ पर हो तथा गुरु केन्द्र में हो तो उस वर्ष लाभ

हो अच्छा सम्वाद सुने ।

(५३) चतुर्थं में मंगल-माता का सुख न्यून हो ।

(५४) चंद्र वर्ष में ४-१० भाव में हो तो वह वषे लाभप्रद हो ।

(५५) जन्म में गुरु जिस राशि में हो वह राशि वर्ष में, पंचम भाव में हो उसमें

गुरु हो या उस पर वर्षेश या पंचमेश की दृष्टि हो तो उस वर्ष सन्तान लाभ हो । (५६) पंचम भाव में सूये शनि हो तो सन्तान कष्ट व दुर्घटना से दु.ख हो

(५७) पंचम में मंगल और शुक्र दोनों हों तो सन्तान का योग है ।

(५८) पंचम में बलवान गुरु चंद्र हो तो सन्तान का योग है ।

(५९) छठे भाव में पापग्रह हो तो आरोग्यता हो ।

(६०) छठे भाव में षष्ठेश हो तो स्त्री प्राप्ति में सहायक हो ।

(६१) जन्म में मंगल षष्ठेश हो तथा वर्ष में वह षष्ठ भाव में हो तो रक्त दोष

से रोग हो !

(६२) सप्तम में शुक्र हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तो सन्तान हो ।

(६३) सप्तम पर पाप ग्रहों को दृष्टि हो तो उस वर्ष स्त्री रोगी हो या कष्ट भोगे ।

(६४) जन्म का सप्तमेश यदि वर्ष में मुंथेश या वर्षेश हो तो सुख प्राप्त हो ।

(६५) जन्म का अष्टमेश वर्ष में लग्न में हो या लग्नेश हो तो अनेक वाधा एवं

कठिनाइयाँ हों ।

(६६) वली अष्टमेश केन्द्र में हो या वर्ष लग्नेश अष्टम हों तो वह वर्ष अनिष्ट

कारक हो ।

(६८) अष्टम में सूर्य, बुध, मंगल धन-नाशकारी हैं ।

(६८) अष्टम भाव में चंद्र मंगल की युति कष्ट कारक है ।

(६९) जन्म का अष्टमेश शनि वर्ष में अष्टम भाव में होकर लग्न से इत्थशाल

करे तो उस वर्ष मृत्यु संभव हो ।

(७०) अष्टमे त्रिकोण या केन्द्र में हो तो उस वर्ष घातक दुर्घटना हो ।

(७१) नवम भाव में लग्नेश नवमेश वक्री हो और शनि या चंद्र अष्टम हो तो

वर्ष अनिष्ट कारक हो ।

(७२) शनि दशम हो तो धन हानि करे।

(७३) दशमेश अष्टमेश का सम्बन्ध हो तो स्थानांतर या राज्य पद की हानि करे।

(७४) जन्म में शनि जिस राशि में हो वह राशि वर्ष में दशम हो और मंगल

दशम हो तो जातक राज्य दंड प्राप्त करे या पदच्युति हो । (७५) छाभ भाव में कोई बली ग्रह हो तो उस ग्रह की दशा में घन लाभ हो ।

अध्याय २०

वषश फल विचार

वर्षेश--६-८-१२ भाव को छोड़कर अन्य भाव में हो तो धन, सुख और राज्य

के सुख आदि देता है। पूर्णवली का पूर्ण फल मध्य वली का मध्यम फल और हीन

'बली हो तो भय, शोक, दुःख, रोग आदि होते हैं ।

वर्षेश उपरोक्त स्थान के अतिरिक्त अन्य स्थान में हो र दित हो वर्ष और जन्म

में वल पाया हो तो अच्छा फल सुख, निरोगता लाभ आदि देता है।

वर्षेश ६-८-१२ भाव में हो या पाप ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो अरिष्ट क्लेश

आदि करता है। शुभ फल नहीं देता ।

यदि केन्द्र में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो सुख और लाभदायक होता है।

जो ग्रह वर्षेश होता है वह वर्ष भर दशापति रहता है, उसकी दशा का फळ

चष भर रहता है । इसलिए वर्षश का वल जन्म काल एवं वपं में भी विचारना ।

दोनों में पूर्ण बली-पूर्ण शुभ फल, दोनों में मध्य वली-मध्यम फल, दोनों में हीन

बली-अधम फल । जन्म में पूर्ण बल वपं में मध्यम बल-मध्यम फल । जन्म में पूर्ण

बल वपं में हीन वल-उस से कम फल होगा। इसी प्रकार दोनों का बल विचार कर

फल का अनुमान करना ।

वर्षेश का जिस ग्रह से इत्थशाल हो वह अपनी प्रकृति के अनुसार शुभ फल

देता है । शुभ ग्रह से इसराफ हो तो शुभ फल कुछ कम देता है । पाप ग्रह के

इत्यशाल से अशुभ फल होता है ।

जन्म वर्षे में जो ग्रह जैसी हुद्दा में होकर दुसरे का तेज ग्रहण कर्ता हो वपं में

“भी उसी प्रकार हुद्दा में हो तो अपना फल अपने सम्बन्धी ग्रह को दे देता है अर्थात्‌

जन्म में जिस हद्दा में ग्रह है उसी हद्दा में जो कोई ग्रह हो उसके साथ मुथशिली

होतो जन्म के उस ग्रह का तेज ले लेता है।

जो ग्रह जन्म में शुभ या अशुभ फल देने में समर्थ है वह वर्ष लग्नेश या वपंश

क्के साथ मूसदिक योग करता हो तो जन्म कालोक्त फल वर्ष में नहीं होता जो इन के

साथ इशराफ योग न हो तो उस ग्रह का जन्म कालिक फल वर्ष में होता है। यदि

-लग्नेश वर्पेश इन दोनों में किसी से इत्यशाळ करता हो तो विशेष रूप से फल

कहना । यदि उस ग्रह को वर्षेश या वषं लग्नेश से न तो इशराफ हो और न इत्यशाल

हो तो भी जन्म का फल होगा ।

यदि जन्म में पंचमेश पुत्र भाव को देखता हो या पुत्र भाव में हो तो अपनी

दशा में पुत्र देने में समर्थ होता है यदि यही जन्म का पुत्र भावेश वर्ष लग्नेश या

वर्षेश से या पंचमेश से मुसरिफ योग करे तो वर्ष में अवश्य पुत्र नाश करेगा ।