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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

ताजिक के १६ योग : २४१

इत्थक्षाल पुणं हुआ या नहीं !

शीश्री ग्रह के अंशादि में उसी शी क्री ग्रह के दीप्तांश जोड़ना जो योग आवे उस री के भीतर मंद ग्रह के अंश हैं तो समझो इत्यञ्ञाल योग होता है । यदि उस योग से मंदीग्रह के अधिक अंश हैं तो यह योग नहीं होगा इसमें भविष्य इत्यशाल योग का अपवाद है जिसे आगे समझाया है ।

इत्थशाल योग के भेद

इत्थशाल योग के ४ भेद हैं। (१ ) वर्तमान इत्थशाल या मुन्थसिल (२) पूर्ण मुथसिल ( ३ ) राइयंत' राश्यादिस्थ वर्तमान मुंथसिल ( ४ ) भविष्य मुंथसिल ।

( १ ) वर्तमान मुन्यसिल शीघ्री ग्रह न्यून अंश पर पीछे हो मंदी ग्रह अधिक अंश पर शीघ्री से आगे हो।

दोनों की नवम पंचम आदि दृष्टि हो और

शीघ्री के दीप्तांश के भीतर यह दृष्टि हो तो

पृष्ठ गत शीत्री' ग्रह अपना तेज ( शक्ति )

मंद गति वाले ग्रह को दे देता है। तब

यह वर्तमान मुंथप्तिक् हुआ। इसका फळ

पूर्ण मुंयसिल से कुछ कम होता है

यहाँ लग्नेश सूर्ये शीघ्री के अल्प अंश २० पर है । इतके आगे मंदी ग्रह गुद के

अधिक अंश २६ हैं । दोनों की नवम पंचम दृष्टि है। और सूर्थ के दीप्तांश के भीतर

मंदी ग्रह है ( २६-२० )=६ केवल ६? अन्तर है। इमते यह्‌ योग हो गया । यहां

सन्तान भाव का कार्येश गुरु से रूम्नेश का मुन्धतिल है ।

( २ ) पूर्ण मुच्यसिल योग

यह वर्तमान इत्यशाल सरीखा ही है। केवल अन्तर इतना ही है कि शीघ्र ग्रह

के अंश मन्द ग्रह के अंश से केवल कला विकला मात्र से कम हों । इतका फळ पूर्ण

होता है ।

शीघ्री और मंदी ग्रह का अन्तर आधा

अंश ( ३० कला ) तक भी हो तो भी पूर्ण

न्थसिछ योग हो जाता है ।

यहाँ स्त्री लाभ प्रश्‍न में लग्नेश चन्द्र

शीघ्र यामी ५-२-१०” पर है। इसके

आगे सप्तमेश शनि पंचम में ५९-.३”-५”

पर है। दोनों की सप्तम दृष्टि है। यहाँ

२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

०_३”-५” दोनों में केवल ५५ विकला का अन्तर है । इससे यह पूर्ण मुन्यसिल' ५-२ -१० योग हुआ। यहाँ शीघ्री ग्रह केवल ५५“ से मंदी ग्रह से न्युन है ।

०-० -५५

जव विकला मात्र न्युन हो या आधी विकला से न्यून हों तव यह वीस बिश्वा

वाला मुन्थसिल होता है । जव विकला तक समानता हो तो पूर्ण मुन्यसिल श्रेष्ठ

होता है ।

(३) राश्यंत राइयादिस्थ दतंमान मुन्थसिल

शीघ्री ग्रह जब राशि के अन्त में होता

है। जैसे २९? पर हो अर्थात वह आगे

वाली राशि में जाने वाला हो जिससे आगे

जाने वाली राशि में पहुँच कर मंद ग्रह से

दृष्ट होकर दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो जावे।

मंद ग्रह के थोड़े अंश हों तव यह योग होता

है। शीघ्री ग्रह जव राशि के अन्त में होता

है । तव आगे जाने वाली राशि में वह मंदी ग्रह से अल्प अंश में हो जाता है ।

जैसे धन भाव में मंगल २९ अंश पर है भौर लाभ भाव में शनि ६ अंश पर है।

मंगळ शीघ्री ग्रह है शनि मंदी ग्रह है । शीघ्री के आगे मंदी ग्रह शनि है। यहाँ दोनों

की दृष्टि दीप्तांश के भीतर नहीं है परन्तु जत्र मंगल आगे राशि में जायगा तब वह

तीसरे भाव में पहुंच जायगा तव उस आगे की राशि १९-२० आदि बंश में मंगल

शीघ्री ग्रह अल्प अंश में हो जाता है और मंदी ग्रह अधिक अंश में हो जाता हैं। दोनों

की दृष्टि तव दीप्तांश के भीतर हो जाती है ।

यह वर्तमान इत्यशाल योग का ही भेद है परन्तु दृष्टि रहित इत्यशाल होता है

दीप्तांश के भीतर दृष्टि नहीं है ।

इसमें शीघ्री ग्रह राशि के अन्त में ३०० के समीप हो और मंद ग्रह आगे हों तो

शीघ्री ग्रह आगे की राशि में जाने पर मंद ग्रह जब शीत्री ग्रह के दीप्तांश के भीतर

हो जावे तव शीघ्री ग्रह अपना सामर्थ मंद ग्रह को दे देता है यह अदृष्ट मुन्यसिल है ।

यहाँ धन लाभ प्रश्‍न में छाभेश गुरु ,

मंदी ग्रह ३० पर है। लग्नेश शुक्र शीघ्री

ग्रह २९० पर दशम में हैँ । शुक्र लाभ भाव

में जाने पर दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर

हो जायगी उस समय कार्य सफल होंगा ।

ताजिक के १६ योग : २४३

(४) भविष्य मुन्थसिल

शीघ्री ग्रह न्यून अंश पर और मंद ग्रह

उसके आगे अधिक अंश पर हो। दोनों की

दृष्टि नवम पंचम आदि हो परन्तु दृष्टि

दीप्तांश के भीतर न हो । मंदी ग्रह के अंश

दीप्तांश से कुछ अधिक हों । जव शीघी

ग्रह अपनी तेज चाल से आगे बढ़ेगा तव

—— न शीघ्री के अंश अधिक हो जाने से मंदी ग्रह शीघ्री के दाप्तांश के भीतर हो जायगा । यहाँ भविष्य में मुन्यसि होगा । तव इस का फल होगा । इस कारण इसे भविष्य मुंथसिर कहते हैं । जैसे यहां शीघ्री ग्रह ६ अंश पर है । इसके आगे मंदी ग्रह १५० पर है । दोनों की परस्पर दृष्टि दीप्तांश के भीतर नहीं है (१५-६)-९०। यहाँ ९ अंश का अन्तर है । शीघी ग्रह मंगल का दीप्तांश ८ है। उससे १ अंश अधिक मंदी ग्रह वढ़ गया है। शीघी ग्रह जब आगे बढ़ेगा तव मंदी ग्रह उसके दीप्तांश के भीतर हो जायगा तव फल होगा । मान लो शीघी ग्रह मंगल आगे बढ़ कर ७० पर हो गया या और आगे वढ़ गया तव मंदी ग्रह का अन्तर दीप्तांश ६ के भीतर हो जायगा ।

यह्‌ मुन्थसिल आगे होने को है इस कारण यहाँ भविष्य मुन्थसिळ हो गया । इममें

शीघी ग्रह अपना सामर्थ्यं तव मंदी ग्रह को दे देगा । इस प्रकार लग्नेश कार्यश का

१. वर्तमान मुंथसि हो तो उस भाव सम्वन्धी फछ उसी समय वर्तमान है ऐसा समझना ।

२. पूर्ण मुंथसिल हो तो पूर्ण सुख या पूर्ण फल कहना ।

३. भविष्य मुन्थसिल हो तो आगे सुख होगा या आगे फल होगा जव कि दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो जायगी ।

जिस भाव सम्वन्धी कार्य है उस भाव का स्वामो (कार्येश) और लग्नेश का

इत्यशाल होने पर उस कार्य की सिद्धि होती है ।

(४) इसराफ-मुशरिफ-फिजूलछ खर्ची

इसराफ योग--यह्‌ नं० ३ इत्यशाल के योग से विपरीत है । इसे मुशरिफ योग भी कहते हैं । -

शीघ्री ग्रह अल्प अंश पर मंद ग्रह के

पीछे हो और मंद ग्रह के अधिक यंश हों

और आगे हो दोनों की दृष्टि दीप्तांश के

भीतर हो तो यह इत्यशाल योग होता है ।

परन्तु इसमें यदि शीघी ग्रह मंद ग्रह के अंश

से भी अंश में आगे बढ़ जावे तो यह इसराफ योग हो जाता है।

२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

इत्थशाल योग में जो कार्य होने को था वह विपरीत कर देता है । अर्थात्‌ उसः

कार्य का नाश कर देने वाला है या उसकी सिद्धि नहीं होती । कष्ट देता है ।

यहाँ लग्नेश मंदी ग्रह २० अंश पर लग्न में है स्त्री भाव सम्बन्धी कार्य था,

कार्येश बुध शीघ्री ग्रह २२ अंश पर है । यहाँ मंद ग्रह गुरु के अंश से शीक्षी ग्रह वुध

से १ अंश बढ़ गया है। क्योंकि मंद. ग्रह के अंश से शीघ्री ग्रह के अल्प अंश होनाः

था । इसके विपरीत होने से अर्थात्‌ शीघ्री ग्रह के अंश मंद ग्रह के अंशो से बढ़ जाने

से यह इशराफ योग हो गया ।

हिज्जाल आचार्य के मत से इसमें इतना विचार है कि यह योग पाप ग्रहों का

हो तो कार्ये विपरीत करता है अर्थात्‌ शुभ के बदले अशुभ करता है। शीघ्री और

मंदी दोनों पाप ग्रह हों तो कार्यं का अवश्य नाश होता है? शुभ ग्रहों का योग हो तो

कार्य विपरीत तो नहीं करेगा किन्तु शुभ फल को जो इत्थशाल से होने वाला था न

होने देगा इसमें भी मत है कि शीघ्री और मंदी दोनों ग्रह शुभ हों तो कार्य सिद्ध

होगा परन्तु कठिनाई से सिद्ध होगा ।

(५) नक्त योग-नकछर्नकदी ।

जहाँ शीघ्री ग्रह के अंश अल्प हों और मदी ग्रह के अंश उससे अधिक हों । और

इत्थशाल योग में जेसा होना था दोनों की परस्पर दृष्टि नहीं हो । इन दोनों ग्रहों के

बीच एक ऐसे ग्रह से जो इन दोनों से गति में शीघ्र हो और लग्नेश और कार्येश

दोनों को देखता हो तो वह अल्प अंश वाले ग्रह (शीघ्री ग्रह) का तेज लेकर अधिक

अंश वाले ग्रह (मंदी ग्रह) को दे देता है। इस योग में अन्य के द्वारा कार्य सिद्ध होता है!

यहाँ लग्नेश बुध के कम अदा १२

हूँ । कायंश गुरु अधिक अश १४ पर है।

दोनों एक दूसरे से ६-८ भाव में होने से

परस्पर दृष्टि नहीं है । परन्तु नवम भाव

में इन दोंनों से शीघ्री चन्द्र १० अश

पर है उसकी चोथी दृष्टि लग्नेश वुध पर

इस प्रकार यह थीघ्री चन्द्र दोनों को देखते हुए शीघ्री ग्रह बुध का तेज लेकर मंदी

ग्रह गुरुको दे दिया। इस प्रश्‍न में तीसरे आदमी की मध्यस्थता से कार्य पूरा

होगा । यहाँ मध्यस्थ ग्रह की दृष्टि लग्नेश और कार्य श के दीप्तांश के भीतर ही होना

आवश्यक है । यहाँ चन्द्र लग्नेश कार्येश से शीघ्र गति वाला होने से और कायश के

अंशों से अल्प होने से यह कार्येश के अडा को पहुंच सकता है। (६) यमया योग-जमिअः-जमाऊसंयोजक । इसमें लग्नेश कार्या में एक शीघ्र गति वाला हो एक मंद ग्रति वाला हो ये

ताजिक के १६ योग : २४५

'किसी भाव में हों और उन की परस्पर दृष्टि न हो परन्तु दोनों के अ शा दीप्तांश के भीतर होना चाहिए । दोनों की परस्पर दृष्टि न होने से यह योग नहीं होता परन्तु रा के वीच एक ऐसा ग्रह हो जो दोनों से मंद गति वाला हो और उन दोनों ग्रहों को देखता हो और दृष्टि में दीप्तांश के भीतर हो तो वह मध्यस्थ ग्रह लग्नेश कार्येश से तेज लेकर मंदी ग्रह को दे देता है ।

यहाँ राज्य प्राप्ति प्रश्न में लग्नेश सूये

१५० पर सप्तम में है और दहामेश कार्येहा

शुक्र १७° पर अष्टम में है। इन दोनों के `

अशा तो दीप्तांश के भीतर हैं परन्तु परस्पर

दृष्टि का अभाव है । ऐसी स्थिति में इन

दोनों से मंद गति वाला ग्रह दोनों के वीच

दशम भाव में गुरु १७? पर है । गुरु की दृष्टि सूर्य ओर शुक्र दोनों पर है और दृष्टि

दीप्तांश के भीतर है । इस से यह मध्यस्थ ग्रह शीघ्री ग्रह शुक्र का तेज लेकर मंदी

अह सूर्यं को दे दिया।

इवलिए मध्यस्थ द्वारा यह कार्य होगा । यहाँ गुरु ग्रह मध्यस्थ है तो गुर के

अनुरूप मध्यस्थ पुरोहित मंत्री आदि के द्वारा यह कार्य सम्पादन होगा । यह योग

‘विचारणीय काय को मध्यस्थ द्वारा सिद्ध करता है ।

नं० ५ नक्त योग में मध्यस्थ ग्रह दोनों से शीघ्री था । यहाँ दोनों की अपेक्षा

मंदी ग्रह यहाँ गोचर में शुक्र शीधी ग्रह और सूर्य मंदी ग्रह है ।

यमया योग में मध्यस्थ ग्रह लग्नेश और कार्यंश दोनों से मंद होता है। इस

कारण इन दोनों से अश में कुछ अधिक होता है । इतना अधिक हो कि लग्नेश या

“कार्यश में दीप्तांश के भीतर दृष्टि कर सके ।

(७) सणङ योग =ममनुआ=मना

इसमें शीघी ग्रह अल्प अश पर हो उसके आगे मदी ग्रह अधिक अंश पर हो

और दोनों की परस्पर दृष्टि दीप्तांश के भीतर हो परन्तु इनके वीच में शीधी ग्रह

के समीप शीघ्री ग्रह के कुछ अशो से आगे या पीछे (कुछ अंश से कम या अधिक)

श्नि या मंगल हो और उम्र शनि या मंगल की ४, ७ या एकक्षे (एक स्थान) की

दृष्टि उप्त शीघ्री ग्रह पर हो और मंदी ग्रह को वह किसी भी दृष्टि से देखता हो तो

यह मंगल या शनि शीघ्र ग्रह का तेज हर लेता है और मंद ग्रह को तेज नहीं

देता है ।

इप प्रकार इस्यश्ाळ योग से जो कां होने वाळा था वह कार्य शनि या मंगळ

.बरीच में पड़कर मना कर देता है अर्थात्‌ कार्य होने नहीं देता । कार्य का नाश कर

देता है । इससे मंगळ या दाति मणऊयोग का कर्ता हुआ ।

२४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षेफल खण्ड

यह योग पाँचवाँ नक्त योग सरीखा है । इसमें शनि या मंगल योग को त्रिगाइते

वाला है । इसमें इत्यशाल के अतिरिक्त ये वाते होंगी ।

(१) दोनों शीघ्री मंदी ग्रह के वीच शनि या मंगल में से कोई हो ॥ टु

(२) यह शनि या मंगल शीघ्री ग्रह की १, ४ या ७ स्थान की वैर दृष्टि से

देखता हो । परन्तु मंद ग्रह को किसी प्रकार की दृष्टि से न न देखता हो । व

(३) शनि या मंगल शीघ्री ग्रह के अंश के कुछ आगे या पीछे हो परन्तु मंद ग्रह

शनि या मंगल के दीप्तांश के भीतर हो तब यह योग होता है ।

एक स्थान दृष्टि चतुर्थ स्थान एवं सप्तम स्थान दृष्टि के विचार से शनि के ३

योग और मंगल के भी ३ योग बनते हैं । इत प्रकार इसके ६ योग हुए । इन प्रत्येक

के २ भेद शीघ्री ग्रह के आगे या पीछे के विचार से हो जाते हैं। इस प्रकार १२

भेद हो जाते हैं । क FE

उदाहरण--यहाँ स्त्री लाभ प्रश्‍न में लग्नेश ०.0 ss Ee बुध ओर कार्येश (सप्तमेश) गुरु है । बुध शीघ्र

ग्रह १४ अंश पर है इसके आगे मंदी ग्रह गुर १९

अंश पर है। दोनों की दृष्टि दीप्तांश के भीतर

है। इससे इत्थशाल योग हो गया। कार्य हो

जाना था परन्तु दोनों के बीच मंगल पड़ जाने से

कार्य में बाधा इस कारण पड़ गई कि यह मंगल शीघ्री ग्रह के अंशों के समीप १५°

पर है और शौत्री ग्रह को चतुर्थं शत्रु दृष्टि से देखता है और यहु मंगल दशम्‌ दृष्टि

से कार्येश गुर को भी देखता है और दोनों मंगळ के दीप्तांश के भीतर हूं । इससे

यह मंगल कार्यं जो होना था उसमें विघ्न कर देता है अर्थात्‌ कार्य में मना कर

देता है या कार्य का नाश कर देता है । यहाँ शीघी ग्रह बुध का तेज मंगल ने हरण

कर लिया जिससे बुध निस्तेज हो गया अर्थात्‌ उसमें फल देने की सामर्थ नहीं रही ।

यहाँ बुध से १° अधिक होकर मंगल आगे स्थित है। शौत्रगामी बुध से १° कम

अर्थात्‌ १३° भी होता तो भी यह योग हो जाता । परन्तु मंगळ या शनि के दीप्तांश

के भीतर लग्नेश और कार्येश हो ।

ES

मंगळ के स्थान में शनि यहाँ हो तो भी मणऊ योग हो जावेगा ।

ब इसरा उदाहरण--यहाँ लग्न प्रश्न

45.५९ में लग्नेश चंद्र लाभ भाव में वृष के १३”

पर है और छाभेश शुक्र लग्न में कर्क के

१८० पर है। इनका इत्थशाल योग हो

गया जिससे धन लाभ होना था परन्तु

मंगल वृष के १९° पर लग्नेश के साथ

एक भाव में होने से मणऊ योग हो गया।

ताजिक के १६ योग : २४७

शुक्र को भी देखता है और मंगल के वीप्तांश मणऊ योग होने से कार्य की हानि होगी ।

तीसरा उदाहरण-यहाँ शनि व लग्नेज् मीन लग्न में हैं। लग्नेश गुरु मंदी ग्रह है जो १४० पर है । सप्तम भाव सम्बन्धी कार्य होने से कार्येश बुध हुआ जो १४० पर है । मणऊ कर्ता ग्रह यहाँ शनि १५० पर मीन राशि में लग्न में है। यहाँ शनि १० अधिक होने पर भी मणऊ योग हो गया । यह शनि कार्येश बुध को सप्तम दृष्टि से भी देखता है और शनि के दीप्तांश के भीतर लग्नेश कार्येश दोनों हैं । इससे यह मणऊ योग हो गया । जिससे कार्य नहीं होगा ।

मणऊ योग का एक और भेद है ।

जव लग्नेश कार्येश का इत्थशाल हो । इन दोनों के बीच शनि और मँगल दोनों मणऊ कर्ता हों या लग्नेश कार्येश में से किसी

के साथ शनि और मंगल दोनों होकर मणऊ योग कर्ता हों। यहाँ शनि और मंगल के अंश लग्नेश कार्योश के दीप्तांश के भीतर हों

चाहे लग्नेश कार्येश के आगे या पीछे या

इनमें से किसी एक के साथ शनि और

मंगल दोनों हों चाहे मंगल और शनिके भंश लग्नेश कार्येश के अंश के भीतर हो या कुछ ही आगे हों परन्तु उनके दीप्तांश के

भीतर ही मंगल और शनि के अंश हों ।

क्योंकि यह मंगल तीसरी दृष्टि से कार्योश के भीतर लग्नेश कार्येश् दोनों हैं । यहां

उदाहरण-यहाँ राज प्राप्ति प्रश्न में लग्नेश शुक्र दशम भाव में कक के १८० पर्‌ "

है और राज्येश ( कार्येश ) चन्द्र अष्टम भाव में वृष के १३० पर है। जिसके साथ

शनि १३ अंश पर और मंगल १९० पर दोनों कार्येश के साथ हैं और लग्नेश कार्येश

के दीप्तांश के भीतर हैं यहाँ इत्थशाल योग का नाशक मणऊ योग हो गया । केवळ |

शनि या मंगल से ही यह मणऊ योग हो जाता है। परन्तु यहाँ ढोनों शनि और

मंगल कार्य नाहक मणऊ योग के कर्ता हैं ।

(८) कम्बूल योग

कम्वूल=स्वीकार

लग्नेश कार्येश का पूवे बताये अनुसार इत्यशाळ योग हो और इन दोनों में से

किसी के साथ या दोनों के साथ चन्द्र भी इत्थशाल करे तो यह योग हो जाता है।

(

२४८ $ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

कम्बूल योग के १६ प्रकार

(१) उत्तमोत्तम कम्बुल (९) सम उत्तम कम्वूल'

(२) उत्तम मध्यम ,, (१०) ,, मध्यम Ee

(३) „ सम (११) „.समाख्य र . (४) ,, अधम ही (१२) ,, अधम फर

(५) मध्यम उत्तम ,, (१३) ,, अधम उत्तम ,,

(६) ¬ मध्यम १2 (१४) „» मध्यम i

(७) छ सस गा (१५) गर सम गर (८) ,, अधम | (१६) अधमाधम छ

यहाँ ४ प्रकार के मुख्य भेद वताये गये हैं और इनके मिश्रण से १६भेद हो गये ।

(१) उत्तम-उच्च और स्वग्रही होने से उत्तम अधिकार ।

(२) मध्य़म-स्वहृद्दा, स्वद्रेष्काण, स्वनवांश, से मध्यम अधिकार ।

(३) अधम-शत्रु नीच ग्रह स्थिति से अधम अधिकार ।

(४) सम-जहाँ इन तीनों में एक भी अधिकारी न हों वह सम अधिकार है ।

चन्द्रमा के उपरोक्त ४ प्रकार के अधिकार में से कोई अधिकार हो और लग्नेश

कार्येश में से भिन्न अधिकार हो तो प्रत्येक के ४ भेद हो जाते हैं जैसा ऊपर वत्ताया है । इस प्रकार इसके १६ भेद हो जाते हैं।

. इसमें भी कार्यश के विचार से उपरोक्त

१६ भेद होंगे तो लग्नेश के विचार से भी

१६ भेद पृथक होंगे। इस प्रकार सब ३२ भेद हो जाते हैं ।

मंत्री विचार करने के लिए कल्पित

उदाहरण इसमें मित्र शत्रु और सम गृही का

विचार होता है आगे इनके उपयोग के लिए

मंत्री के विचार से नीचे उदाहरण देकर समझाया है ।

मैत्री स्याना सूय चंद्र मंगल वुध गुरु शुक्र शनि

मित्र ३-५ मग ० गु.सू.शु. ० सूःशुमं. मं.गु ०

९-११

शत्रु १-४ शु. वु.मं.श. चं.बु.श. चं.मंश. ० सू. चं.वु.मं-

६-१०

सम २-६ चबुः. गुणुश. ० सूगु.शु. चं.वु.श. चं.वु.श. सू-शु.गुः

८-१२

ताजिक के १६ योग : २४९

कंबूल के १६ योगों का स्पष्टीकरण

'कम्वुल के १६ चन्द्र कार्येश और लग्नेश भेद

१ उत्तमोत्तम स्वशुही या उच्च का स्वगृही या उच्च के

२ उत्तम मध्यम ११ „= __ स्वहद्दा स्वद्रेकाणया स्व नवांश में ३ उत्तम अधम ह ज्र शत्रु ग्रही या नीच में

४ उत्तम सम ii ती सम गृही सम हद्दा द्रेष्काण या नवाँश ५ मध्यम उत्त स्वहह्वाद्रेष्काण या में स्वगृही या उच्च में

नवांश में

६ , मध्यम स्वहद्दा द्रेष्काण या नवांश में

७ ,, अधम i म शत्रु गुही या नीच में

षप ,, सम 0 19 सम गृही हद्दा द्रेष्काण या नवांश में

९ अधम उत्तम स्वगृही या नीच में स्वगुही या उच्च में

१० ,, मध्यम i स्वहदा द्रेष्काण या नवांश में

११ ,, अधम „ 9 शन्रुगृहीयानीच में

११ „ सम „ २ संमगुहीहद्दाद्रेष्काण या नवांश में

१३ सम उत्तप सभ गृही हद्दाद्रेष्काण स्वगृही या उच्च में

या नवांश में

१४ ,, मध्यम 0) १ 12 स्वहद्दा आदि में

१५ ,, अधम है म „» शतु गृही या नीच में

१६ सम गर i „ सम गुही सम हददा सम द्रेष्काण सम

नवांश में

ऊपर जो कम्बूछ योग के १६ भेद बताये हैं इनका विचार ।

(१) लग्नेश कार्येश का परस्पर इत्थशाल हो ओर चन्द्रमा भी किसी के साथ

या दोनों से इत्यशाल करे तो १६ प्रकार के योग नीचे बताये अनुसार होते हैं।

(२) इनमें पहिले चन्द्रमा का अधिक्रार फिर लग्नेश और कार्ये का अधिकार

विचारना ।

(३) लग्नेश और कार्येश का अधिकार दोनों का एक सा होना । चन्द्र का अधि-

कार चाहे जैसा हो।

(४) चन्द्रमा अपने हदूदा में जहाँ कहा है वहाँ द्रेष्काण नवांश ही लेता क्यों कि

चना की हृद॒दा नहीं होती ।

१६ योगों का चक्र

भेद चन्द्र लग्नेश कार्येश फल

१ उत्तन+उत्तम उत्तम+उत्तम कार्य उत्तम करेगा

२ , मध्यम » +मध्यम फल मध्यम अवश्य होगा

|

२५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

है ,, +सध्यम 2.1 अधम थोड़े यत्न से प्राप्ति

४ ,, नसम १ + सम उत्तम प्राप्ति

५ मध्यम +उत्त म मध्यम +उत्तम प्राप्ति उत्तम

६ ,, ¬ मध्यम 7. मध्यम अति प्रयत्न से प्राप्ति

७ ,, पअधम ४ +अधम अधम कष्ट से प्राप्त '

८ , सम „ ञ+सम अति प्रयत्न से प्राप्ति

९ अधम+-उत्तम अधम-- उत्तम परिश्रम से थोड़ा प्राप्ति

१० ,, + मध्यम ४ +मध्यम अत्यंत प्रयत्न से प्राप्ति

११ ,, +अधम „ +अधम कार्य नाश, दुःखप्रद लाभ नहीं

१२ |, +सम १२ +सम अति प्रयत्न से कष्ट से प्राप्ति

१३ सम -- उत्तम सम +उत्तम उत्तमता से प्राप्ति

१४ ,, +मध्यम ४ +मध्यम यत्न से मध्यम लाभ

१५ , अधम „ +अधम कष्ट साध्य

१६ ,, असम ४ "सम मध्यम लाभ

यहाँ एक राशि स्थित शीध्र मंद ग्रहों का मुंथसिळ योग होने से भी कम्बूछ योग

हो जाता हैं ज॑से--

(१) उत्तमाधम कंत्रूल--चन्द्रमा ओर मंगल दोनों ककं राशि में इत्थशाली हों तो चन्द्रमा यहाँ स्वगृही है और मंगल नीच में है । यहाँ इत्थशाल योग के विचार से उत्तछ अधम कम्बूल हो जाता है।

(२) मध्यम कंबूल-मेप में चन्द्र और शनि परस्पर अंशों में मुयलिश हो तो यहाँ

चन्द्र स्वगृही या उच्च का नहीं है । स्वनवांश में हो तो शनि मेष का नीच में होता

है यह मध्यम अधम कम्वूल हुआ यह अशुभ फल कर्ता होता है ।

(३) मध्यमाधम कंवूळ-कन्या में शुक्र और चन्द्र होकर परस्पर इत्थशाळी हों

तो । यहाँ शुक्र नीच का है और चन्द्रमा कन्या में स्त्र नवांश में हुआ तो यह भी मध्यम अधम कंबूल हुआ ।

(४) मध्यमाधम कंवूल-चन्द्र और गुरु मकर में परस्पर मुंबसिल हो तो यहाँ गुरु नीच का है चन्द्र स्व नवांश में हो तो मध्यम अधम कबूल हो जाता है । (४) मध्यमाधम कंवूळ-मीन में चन्द्र और बुध होकर इत्यशाली हो वुध नीच का है चन्द्र स्व नवांश में हो तो मध्यम अधम कम्बूल हो जाता है ।

ये पाँचों उपरोक्त उदाहरण अशुभ फल देने वाले हैं ।

एक राशिस्थ अधमाधम योग नहीं हो सकता क्योंकि सव ग्रहों का एक सा नीच या शत्रु गृह नहीं होता । इस कारण नीचता शत्रुता और दृष्टि आदि के विचार से

एक राशि में यह योग होना असम्भव है । आगे ये प्रत्येक १९ योग उदाहरण देकर समझाये हैं ।

ताजिक के १६ योग : २५%

चंद्र एवं कार्येश लग्नेश भी स्वगृही याः

उच्च में हों लग्नेश कार्यश का इत्थशाल हो,

चंद्रमा दोनों से इत्थशाळी हो तो उत्तमोत्तमः

कंवूल होता है। यहाँ संतान के प्रन में

कार्ये सूर्य शीघ्री ५° पर लग्न में हूँ और

लग्नेश मंगल मंदी ग्रह १८९ पर लग्न में है ।.

यहाँ सूर्यं उच्च का है और मंगल स्वगृही है ।

दोनों की एक रादिस्थ दृष्टि दीप्तांश के भीतर है। यहाँ चतुथं भाव में १२° पर

स्वगृही होकर १० स्थान की दृष्टि से लग्नेश कार्थेश दोनों को देखता है और दोनों

के साथ इत्यशाल करता है । यह कार्य उत्तमोत्तम करेगा ।

यहाँ पंचमेश सूयं कार्येश उच्च का लग्न

में है । लग्नेश मंगल उच्च का दशम में”

१८० पर है । दोनों का इत्थशाल योग है ।

उच्च का चंद्र चतुर्थ स्थान में १२° का

बैठकर लग्नेश कार्येश दोनों से इत्यशालः

करता है। इससे यह उत्तमोत्तम कम्बूः

हुआ ।

स्त्री विषय का सप्तम भाव का कार्येश शुक्र

पंचम में है । दोनों का इत्थशाळ योग है।

चन्द्र स्वगृही चतुर्थ भाव में ९° पर १०

भाव की दृष्टि से लग्नेश मंगल को देखता

है जो स्वगृही है। दोनों की दृष्टि दीप्तांश

के भीतर है केवल ३० का अंतर है । परन्तु,

यह चन्द्र कार्येश शुक्र को नहीं देखता । यहाँ चन्द्र का एक लग्नेश के साथ इत्यशार

होने से कम्वूल योग हो गया ।

(२) उत्तन मध्यम कंबुल

चंद्र स्वगृही या उच्च में हो लग्नेश कार्यश स्व हद्दा आदि में हों । यहाँ लग्नेश.

शुक्र अपनी हुदूदा में है। भाग्य विषय का विचार होने से भाग्येश बुध भी अपनी:

२५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफड़ खण्ड

हदूदा में है । दोनों का इट्थशाछ योग होता

है । दशम में स्तर॒ग॒ही चंद्र एक स्थान दृष्टि

से लग्नेश से और दशम दृष्टि से कार्येश बुध

से इत्यशाळ करता है । इश्षते यह उत्तन

मध्यम कम्बूछ योग हुआ । भाग्य वृद्धि होगी

परन्तु मध्यम होगी ।

अन्य उदाहरण

पंचम स्थान सम्बन्धी प्रश्‍न में पंचमेश (कार्येश) सूर्य अपने नवांश में ६० पर है।

लग्नेश मंगल भी स्व नवांश में दशम में

११° पर है। दोनों का इत्थशाल योग है। चंद्र स्वगृही चतुर्थ में है । दोनों से इत्यशाल

करता है। इससे उत्तम मध्यम कम्वूल योग हुआ । इतका फल मध्यम होगा ।

(३) उत्तम अधम कम्बल

चंद्र स्वग्रही या उच्च में हो लग्नेश कार्येश नीच में या शत्रु गृही हो ।

तीसरे भाव सम्वन्धी प्रश्‍न में कार्येश

गुरु मकर का होने से नीच में हँ । और

लग्नेश शनि मेष में नीच का है। इन दोनों

का इत्यशाल योग है । स्वग्रृही चंद्र सप्तम में है इन दोनों से इत्यशाल करता है। इनमें यह उतम अभ्रम कम्नूक योग हुआ । इश्षमें कुछ प्रयत्न करने पर कार्य की सिद्धि होगी ।

(३) उत्तम सम क+बल

चंद्र उच्च का या स्वगृही हो लग्नेश

कार्येश सम ग्रह हद्दा आदि में हों ।

यहाँ रोग विषयक प्रश्‍न में लग्नेश सूर्य

अपने सम बुध के घर में १४० पर है।

कार्येश शनि अपने सम गृह शुक्र के घर में

१६° पर है । इन दोनों का इत्थशाल योग

; हे । चंद्र स्वगृही व्यय भाव में १३० पर

९। यह रेच कार्येश दोनों का देखता है इससे उत्तम सम कम्बल योग हो गयां । यहाँ मैत्री चक्र का उदाहरण पहिले दे चुके हैँ उसी के अनुसार मैत्री विचार से सम अह छिया है । अर्थात २-६ और ८-१२ स्थान के ग्रह सम समझे जायेंगे । इस थोग के फल से उत्तम कायं होगा रोग निवारण होगा ।

ताजिक के १६ योग: २५३

(५) मध्यम उत्तम कम्बल

2८: HS

चंद्र स्व हद्दा आदि में हो ळगनेश कार्येस' स्वगृही या उच्च के हों ।

यहाँ स्त्री विपयक प्रश्‍न में लग्नेश

कार्येश स्वगृही हैं । दोनों का इत्थशाल योग है । यहाँ चंद्र स्व नवांश में होकर लग्नेश

कायश दोनों को देखता है । इससे चंद्र की

चंद्र, कार्येश, लग्नेश सब स्व हुद्दा

स्वद्रे्काण आदि में हों ।

यहाँ लग्नेश कार्येश दोनों अपनी हुद्दा

में है । दोनों का इत्थशाल योग है। पंचम

भाव सम्वन्धी प्रश्‍न होने से कायंश शुक्रः

हुआ। लग्नेश बुध है। चंद्र स्वनवांश में

दशम भाव में होकर लग्नेश और कायाः

दोनों से इत्थशाल करता है। यह योग म ध्यम मध्यम कम्वूल हुआ । इसमें बहुत

यत्न करने से सन्तान होगी। (७) मध्यम अधम कम्बुल

चंद्र स्व नवांश आदि में हो लग्नेश कार्येश नीच गृही आदि हों ।

यहाँ भाग्य स्थान सम्बन्धी कायं होने से सूर्य कार्येश और लग्नेश गुरु दोनों नीच

गुही हैं। चंद्रमा स्व नवांश में है। लग्नेश

कार्येश का इत्यशाल योग है । चंद्र भी दोनों से इत्थशाल करता है यह मध्यम अधमः

कम्बूल हुआ । फलस्वरूप भाग्य सम्बन्धी कार्य के सम्पादन में वहुत कष्ट होगा ।

( ८) मध्यम सम कम्सूल

चंद्र स्व नवांश आदि में हो लग्नेश

कार्ये समग्रृह हृदया आदि में हो ।

यहाँ पंचम भाव सम्वन्धी कार्येण बुध मेप में अपने सम गुरु की हदा में

है। लग्नेश शुक्र अपने सम गुरु की हदा में

हैं। दोनों का इत्थशाल योग है । चंद्र स्व

"२५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

नवांश में होकर दोनों से इत्यशाल करता है । यह मध्यम सम कम्बुल हुआ सन्तान

प्राप्ति अति प्रयास से होगी ।

चंद्र नीच, शत्रु गृही हो लग्नेश

कार्येश स्वगृही या उच्च में हो ।

यहाँ चतुर्थ भाव सम्वन्धी विचार

से कार्येश गुरु उच्च का है लग्नेश बुध

स्वगृही है । दोनों का इत्थशाल योग

है। चंद्र नीच का है वह दोनों से

इत्थशाल करता है । यह अधम उत्तम

कम्बूल हुआ। चतुर्थ भाव सम्वन्धी

प्रश्‍न या सुख की प्राप्ति परिश्रम से

होगी और अल्प सुख प्राप्त होगा ।

(१०) अधन मध्यम कम्बूल

चन्द्र नीच या शत्रु गुही हो लग्नेश

कार्येश स्व हुद्दा आदि में हो ।

यहाँ सन्तान प्रश्‍न में कार्येश शनि मीन

में अपने द्रेष्काण में है। लग्नेश बुध

अपनी हुद्दा में है। दोनों से इत्थशालू

करता है यह अधम मध्यम कम्वुल

|| हुआ। बहुत ही प्रयत्न करने से

पय सन्तान लाभ होगा । | (११) अधमाधम कम्बुल

चन्द्र Ss लग्नेश तीन नीच ऱ्या शत्नुगृही हों । यहाँ लग्नेश गुरु और सप्तम भाव का कार्येश बुध दोनों नीच में हैं इनका इत्थशाळ योग होता है । चंद्र भी नीच का है दोनों से इत्थशाल करता है यह अधमाधम कम्बूल हुआ इसमें स्त्री लाभ नहीं होगा ।

(१२) अवम सम कम्बुल

चन्द्र नीच या शत्रु गृही हो लग्नेश कार्येश सम गृही हद्दा आदि में हो । यहाँ

नवम भाव सम्बन्धी प्रश्‍न में कार्येश सूर्य अपने सम बुध के घर में हे । छग्नेश गुरु

भी अपने सम शनि के घर में है। दोनों का इत्थशाल योग है । चन्द्र मीन का

होकर दोनों से इत्यद्याल करता है । यह

.

ताजिक के १६ योग : २५५

'अधम सम कम्बू हुआ । इससे कठिन उपाय से अति यल से कष्ट पुर्वक भाग्य "सम्बन्धी लाभ होगा ।

(१३) सम उत्तम कम्बल

चन्द्रमा पादोन (अधिकार रहित) हो अर्थात्‌ समग्रही हो और कार्येश लग्नेश

स्वगृह या उच्च में हो यहाँ धन सम्वन्धी कार्येश बुध और लग्नेक्ष सुयं स्वगृही हैं इनका इत्थशाल योग है । चन्द्र अपने सम गुरु के घर में है जो इन दोनों से इत्थशाल करता है । यह सम उत्तम कम्बूल हुआ । धन प्राप्ति उत्तमता से होगी । पादोन--२ प्रकार का है ।

(१) समगही हद्दा द्रेष्काण नवां आदि में सच या नीच या शत्रु गर्दी नहो दि में हो स्वग्रही उच्च स्व हृद्दा आदि में

(२) सम गृह हह द्रेष्काण नवांश के आदि व अन्त में सन्धि गत होने से ।

Fr

(१४) सन मध्यम कम्बूल

(१५) सम अधम कम्बुल

चंद्र सम- ग्रह हृद्दा आदि में हों और

लग्नेश कार्येश नीच या शत्रू ग्रही हों ।

धन भाव के प्रश्‍न में कार्यश बुध

में है। लग्नेश शुक्र भी नीच में है।

इनका इत्थशांल योग है । चंद्र अपने सम

गुरु के घर में है जो इन दोनों से इत्थशाल

करता है । यह समाधम कम्वूल हुआ ।

धन की प्राप्ति कष्ट साध्य होगी ।

चन्द्र समग्रह हृददा आदि में हो

लग्नेश कार्येश स्व हद्दा नवांश आदि में

हों लाभ प्रश्न में लाभेश मंगल कार्येश

यह्‌ स्व नवांश में हुँ । लग्नेश बुध भी स्व

नवांश में हैं । इनका इत्यशाल है । चन्द्र

अपने सम गुरु के घर में है जो इन दोनों

से इत्थशाल करता है । यह सम मध्यम

कम्बूल हुआ । लाभ मध्यम होगा यत्न

करने पर लाभ होगा ।

२५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

(१६) सम समाख्य कम्बल

चंद्र एवं कार्येश लग्नेश भी सम ग्रह

रे हृदुदा आदि में हो यहाँ लाभ प्रश्न में:

लाभेश मंगल, लग्नेश शनि सम हुद्दा में

है । दोनों का इत्थश्याळ योग है । चंद्र भो

सम शुक्र की हद्दा में है दोनों से इत्थशालः

  1. पथ८ | करता है यह सम समाख्य कम्बूल हुआ । | लाभ मध्यम होगा। न वहुत न अल्प होगा ।

यहाँ पीछे वताई मैत्री के अनुसार ही २-६-८-१२ स्थान के ग्रह सम समझे

जाते हैं उसी अनुसार सम का विचार करना । सम ग्रह के विचार से सम ग्रह की हृददा, सम ग्रह का द्रेष्काण सम ग्रह का नवांश इसमें इनमें से कोई होना ।

९ गैर कम्बुल-गैर' कबूल-अस्वीकार

जव लग्नेश और कार्येश का इत्थशाल हो और चंद्रमा शून्य मार्गी हो । चन्द्रमा के लग्नेश तथा कार्येश इनमें से किसी का इत्थशाल योग न हो | ऐसा चन्द्र यदि

राशि के अन्त में हो जो आगे की राशि में प्रवेश करने वाला हो । जव चन्द्र आगे

की राशि में प्रवेश करे वह राशि जिस ग्रह का स्त्र गृह या उच्च स्थान हो वह ग्रह

यदि इसी राशि में वहाँ स्थित हो और उस ग्रह के साथ चंद्र इत्थशाल करे तो वह गैर कम्बूल योग होता है ।

इस योग में तीसरे मनुष्य की सहायता से काम होगा ।

यदि अन्य राशि में स्थित चन्द्र इस राशि में स्थित स्त्रग्रह आदि अधिकारों सेः रहित ग्रह के साथ इत्यशाल करे तो वह अशुभ फल देने वाला है।

शुन्य सार्गो--जो ग्रह स्वगृही अपने उच्च में या अपनी हददा, अपने द्रेष्काण

अपने नवमांश ऐसे कोई शुभ अधिकार का न हो तथा नीच शत्रु गुही! आदि अशुभ

अधिकारी भी नहीं हो तथा पदहीन सम द्रेष्काण हदूदा नवांश अधिकार भी न हो

और उस पर पाप या शुभ किसी प्रकार के ग्रह की दृष्टि भी न हो तो यह शून्य मार्गी या शून्याध्वग कहलाता है। यह भी कम्वूल भेद के तुल्य फल देता है। दुसरे जो राशिस्थ शून्याध्वग गैर कम्वूल अशुभ फल देता है । उदाहरण--

२९ ९ यहाँ लग्नेश सूर्य सप्तम में ६० पर

जज है । नवम भाव सम्वन्धी प्रश्‍न में कायेंश

3

मंगल नवम भाव में है। इन दोनों का

इत्यशाल है । चंद्र धन भाव में २९? पर

है । यहाँ चंद्र शून्य मार्गो है वह लग्नेश

। EE १मं१० कार्येश किसी से इत्थशाळ नहीं करता

परन्तु चंद्र जब आगे सहज भाव में

पहुंचेगा तो वहाँ स्वग्रही शुक्र से वह

ताजिक के १६ योग : २५७

कर

इत्यशाल करेगा । यह गैर कंवूल योग हुआ । तीसरे मनुष्य की सहायता से कार्य होगा] इ्चंर > यदि इस कुंडली में तीसरे भाव में शुक्र के स्थान में बुध हो । यह बुध न तो स्वगृही है और न उच्च में है अधिकारहीन' है। यदि चंद्र बुध के साथ इत्यशाल क्रे

Do, तो यह भी गैर कम्बूल योग होता है वम्‌+ नो १मं१०| यह अशुभ फल देने वाला है ।

| (१०) खल्लासर-खलास=छूटा हुआ ।

चंद्रमा शून्य मार्गी हो (जैसा पहिले वता चुके हैं) यह चंद्र लग्नेश या कार्येश के साथ इत्थशाल न करे और न वह लग्नेश कायश में से किसी के साथ हो और लग्नेश कार्ये का इत्थशाल हो यह खल्लासर योग होता है और कम्बू के फल को नाश करता है। यह शुभ फल नहीं देता अशुभ फल देता है ।

यहाँ पुत्रभावेश गुरु कार्येश है ।

छग्नेश सूर्य से इत्यशाल है । चंद्र धन

भाव में २६० पर है । यह चंद्र लग्नेदा

या कार्येश किसी से इत्यशाल नहीं करता

और न लग्नेश कार्येश के साथ ही है।

यह खह्लासर योग पुत्र प्राप्ति में

वाधा करेगा ।

(११) रह=निकम्मा=दु्बेल=निस्तेज ।

दुर्बल प्रह लक्षण--जो ग्रह अस्त, नीच राशिगत, चत्रुगृही, वक्रगति व अस्त होने वाला हो या समीप में ही उदय हुआ हो या बाळ वृद्ध हो या खल स्थान अर्थात्‌ तात्कालिक शत्रु स्थान या पाप युक्त व क्र्राक्रात हो वह ग्रह दुर्वळ कहलाता है। रद्द योग- ऐसा दुवंल या निस्तेज ग्रह जब किसी भावेश (कार्ये) के साथ इत्थशार करे तो वह ग्रह आदि में या अन्त में इत्यशाल से होने वाळे फल को नहीं देता गा निवँल होने से किसी का तेज न आप ले सकता है और न किश्ी को दे सकता है।

यहाँ इस रदूद योग के २ भेद हो जाते हैं।

(१) जब उपरोक्त प्रकार का दुर्बेल कार्येश ग्रह केन्द्र में हो ओर लग्नेश ग्रह

ु्वेल कार्योदा से आपोक्लिम (३-६--९-१२) घर में हो और दोनों का इत्यक्षाल योग

हो तो उस इःथशाल का समस्त फल नष्ट नहीं होता किन्तु वह कार्य सिद्ध होकर अन्त में नष्ट हो जायगा ।

१७

२४५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

इसमें निर्वल कार्येश केन्द्र में हो कार्येश से लग्नेश ३-६-९-१२ घर में हो और

दोनों का इत्यशाल योग हो । यहाँ आपोक्लिम में ३ और ९ ही घर लिए जायेंगे।

क्योंकि ६ और १२ घर में इत्यशाल के लिए आवश्यक दृष्टि नहीं होती । केवल

३-९ स्थानों में ही दृष्टि होने से इत्यक्षाळ योग हो सकेगा ।

(२) कार्येश दुर्व होकर आपोक्छिम स्थान में हो और लग्नेश केन्द्र में हो इन

दोनों का इत्यशाल योग हो तो प्रथम उस भाव के कार्य को नष्ट करेगा पश्चात्‌

उस कायं को सिद्ध करेगा । (१) उदाहरण

लग्नेश बुध, कार्येश (दशमेश) गुरु

दोनों सूर्ये के साथ छठे घर में हैं अस्त

हैं । बुध के ४० गुरु के ५० हैं । दोनों का

इत्थशाल योग है । यहाँ लग्नेश कार्येश

` दोनों अस्त होकर पाप युक्त छठे स्थान

में हैं। इससे रद्द योग हो गया। राज्य

संबधी प्रश्‍न में राज्य सम्बन्धी कार्य का

नाश होगा ।

(२) उदाहरण

(२) यहाँ लग्नेश बुध पंचम भाव

कार्ये शुक्र से आपोक्लिम में ७? पर

है । कार्येश शुक्र केन्द्र में नीच का ८° पर

। है। यह निवे हुआ । लग्नेश कार्येश का

इत्थशाळ है। यह रद्द योग हुआ |

क्योंकि इत्थश्ञाळ कर्ता कार्येश नीच में

है । इस योग में प्रथम कार्य सिद्ध होकर

वाद में नष्ट हो जायगा ।

(३) यहाँ लग्नेश बुध शीघ्री ग्रह

नीच होने से निर्बल होकर केन्द्र में है।

पंचम भाव का कार्येण शुक्र लग्नेश से

आपोक्लिम में व्यय भाव में है। दोनों

का इत्यशाल योग है परन्तु लग्नेश नीच

में होने से रद्द योग हो गया ।

इसमें प्रथम कार्य नष्ट होकर फिर कार्य

की सिद्धि होगी ।

ताजिक के १६ योग : २५९

(१२) ढुष्फाली उत्य-कुत्य-शुमभ । दुष्फाली=दुःसाष्य । मंद गति वाला ग्रह स्वगृही या उच्च का या स्वद्रेष्काण, स्वहृददा, स्वनवांश में हो और शीघ्री ग्रह पादोन (अधिकार रहित) हो अर्थात्‌ स्व, उच्च आदि अधिकार से रहित हो तव इन दोनों के इत्थशाल होने पर कार्य की सिद्धि कठिनाई से होती है । यदि शीघ्र ग्रह अस्त नीच शत्रु गृही वाल वृद्ध हो निवेल स्थान में स्थित होकर सी हो तो इस दुष्फाली कुत्थ योग में कार्य सिद्धि नहीं होगी और अनिष्ट ( गा।

यहाँ लग्नेश गुद स्व स्थानी लग्न में १६० पर है यह मंद ग्रह है। स्त्री सम्वन्धी अश्न में कार्येश बुध लाभ भाव में

१४? पर है यह शीघ्री यहाँ कार्यश और लग्नेश का इत्थशाल है। इसमें लग्नेश गुर स्वगृही होने से अधिकार युक्त

है और कायंश बुध पदहीन है। इससे

दुष्फाली कुत्य योग हो गया । इसमें स्त्री

सम्बन्धी कार्य कठिनता से सिद्ध होगा ।

यदि पदहीन शीघ्री ग्रह के साथ सूयं हो तो अस्त होने के कारण बुध निर्बल होक अनिष्ट फल देगा अर्थात्‌ काये सिद्ध नहीं होगा । ST (१३) इुत्योत्यदिवौर योग या दुत्य दरी र-दुव्वार । तदवी र-दुष्प्राप्प-मध्यम । =दूसरे की सहायता से काम करने वाळा योग । जव लग्नेश कार्येश दोनों निर्बल हों अर्थात्‌ अस्त नीच वत्रुगृही वक्री इत्यादि तेज से रहित होकर परस्पर इत्थश्ाली' हों । यदि इनमें से कोई ग्रह अन्य तीसरे ऐसे ग्रह से इत्थश्ाल करे जो स्वगृह उच्च स्वहदूदा द्रेष्काण नवांश आदि बळ से युक्त हो तो किसी दूसरे की सहायता से कार्य सिद्ध होगा ।

अथवा कोई दो शीघ्री ग्रह स्वग्रही उच्च स्वहद्दा द्रेष्काण नवांश मादि अधिकार सें होने से बल्वान हो और लग्नेश या कार्येश इनमें से किसी एक के साथ इत्यशाळ करे तो भी यह योग हो जाता है । किसी अन्य की सहायता से कायं सिद्ध होगा ।

और यहाँ स्त्री लग्नेश सम्बन्धी मंगल प्रश्‍न कर्के में का कार्येश नीच शुक्र में >>>

कन्या का नीच में है दोनों का इत्यशाळ योग होता है । यहाँ लग्नेश मंगल के

साथ उच्च का गुरु होने से स्त्री सम्बन्धी कार्य अन्य की सहायता से सिद्ध होगा

क्‍योंकि लग्नेश कार्येश निर्बल होने से कार्य सिद्ध नहीं होना था वह कायं

उच्चग्रही गुरु के मंगल से युक्त होने एवं

इत्यथशाल करने के कारण अन्य की सहायता से कार्य सिद्ध होगा ।

२६० ¦ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

यहाँ मेष में २.शीघ्री ग्रह सूयं और

मंगल हैं। सूर्य उच्च का है और मंगल

स्वगृही है। इनके साथ नीच का शनि

लग्नेश है । इससे अन्य की सहायता से

कार्य होगा । तीसरे भाव सम्बन्धी कार्य

का कार्ये गुरु नीच में लग्न में है और

लग्नेश शनि मेष में नीच का है। इन

दोनों के इत्यशाल से कार्य नहीं होना

शा वर्योकि दोनों निर्बल हैं। परन्तु लग्नेश दो पद युक्त शीघ्री ग्रह के साथ होने से

यह कार्य अन्य की सहायता से होगा !

(१४) तंवीर योग-तदवीर ।

जब लग्नेश और कार्येश का इत्थशाल न हो और उनमें से एक ग्रह राशि के

अन्त में हो अर्थात आने वाली राशि में जाने वाला हो जहाँ अर्थात्‌ आगे वाली राशि

में कोई ऐसा स्वगृही उच्च आदि पद युक्त बलवान ग्रह हो जो ऐसे अंशोंमें हो कि

वहाँ आने वाला उससे भविष्य में इत्यशाल कर सके तो यह तंवीर योग हो जाता है।

यहाँ राज्य सम्बन्धी प्रदन में राज्येश

सूर्य और लग्नेश मंगल इनका इत्यशालू

नहीं है। शीघ्रगामी सूर्य २९० पर राशि

के अन्त में कुंभ राशि में है। वह आगे

मीन राशि में जाने वाला है जहाँ स्वग्रही

(बलवान) गुरु है। मीन में सूर्य जाने

पर भविष्य में लग्नेश से इत्थशाल करेगा और वह गुरु से भी इत्यशाल करेगा ।

यह तंवीर योग हो गया । सूर्य ने अपना तेज गुरु को दे दिया । इस योग से अभीष्ट

कार्यं की सिद्धि होगी ।

(१५) कुत्थ योग-कुब्व-बलिष्ठ-शुभ ।

बल वा बहुत प्रकार से विचार होता है ।

(१) जो ग्रह स्वग्रही, उच्च, स्वनवांश, स्व. हृददा, स्व द्रेष्काण में हो । (२) केन्द्र में हो । (३) ग्रह जो लग्न में हों या लग्न को देखते हों । (४) ग्रह जो अच्छे ग्रहों (शुभ ग्रह) से युक्त या दृष्ट हों । (५) पाप ग्रहों का १, ४, ७, १० में योग या दृष्टि

से रहित हो, (६) उदयी हो, (७) जो काल बळ से युक्त हो । (८) जो ग्रह वक्री

होकर मार्गी हुआ हो ।