संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उपशम-प्रकरण ] * महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन * ३०९
रघुकुलभूषण राम ! संसारसे वैराग्य, जप-ध्यानके अभ्यास, सत्-शास्त्रोंके विचारपूर्वक अध्ययन, पवित्र और तीक्ष्ण बुद्धि, सद्गुरुके उपदेश और यम-नियमोंके पालनसे परमात्माकी प्राप्तिरूप विशुद्ध परमपदकी प्राप्ति होती है अथवा केवल विशुद्ध और तीक्ष्ण प्रज्ञासे ही परमपद मिल जाता है; क्योंकि जो बुद्धि सम्यक् प्रकारसे ज्ञानयुक्त, तीक्ष्ण और दोषरहित है, वह सम्पूर्ण साधनोंके बिना भी यथार्थ ज्ञानद्वारा जीवको अविनाशी परमपदकी प्राप्ति करा देती है।
श्रीरामजीने पूछा—भूत और भविष्यके ज्ञाता भगवन् ! कोई ज्ञानी पुरुष व्यवहार करता हुआ भी समाधिस्थके सदृश विश्रामको प्राप्त हुआ रहता है और कोई एकान्तका आश्रय लेकर ध्यान-समाधिमें स्थित रहता है। इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है ? यह मुझे बतलानेकी कृपा करें।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! जो इस सत्त्वादि गुणोंके समाहाररूप दृश्य जड संसारको अनात्मरूप ( अनित्य और मिथ्या ) देखता है, उस पुरुषकी जो यह परम शान्तिस्वरूप अन्तःशीतलता है, वही समाधि कहलाती है। मनके रहनेपर दृश्य पदार्थोंके साथ सम्बन्ध होता है — ऐसा निश्चय करके जो मनसे रहित होकर परम शान्तिको प्राप्त हो चुका है, ऐसा कोई पुरुष तो व्यवहारमें लगा रहता है और कोई ध्यान-समाधिमें तल्लीन हो जाता है। यदि उनके अन्तःकरणमें परम शान्तिरूप शीतलता है तो वे दोनों ही सुखी हैं; क्योंकि जो अन्तःकरणकी शीतलता है, वह अनन्त साधनरूप तपस्याओंका फल है। इसलिये जो ज्ञानी व्यवहारपरायण है और जिसने ज्ञान प्राप्त करके वनका आश्रय ले लिया है, वे दोनों ही सर्वथा समान हैं; क्योंकि उन दोनोंको ही सम्पूर्ण सन्देहोंसे रहित परम पदकी प्राप्ति हो गयी है। रघुनन्दन ! चित्तमें जो कर्तापनका अभाव है, वह उत्तम समाधान है और वही मङ्गलमय परमानन्द-पद है। उसीको तुम केवल चिन्मयभाव समझो। जो मन वासनाओंसे रहित हो गया है, वह स्थिर कहा गया है, वही ध्यान-समाधि है, वही केवल चिन्मयभाव है और वही अविनाशी परम शान्ति है। जिसके मनकी वासनाएँ क्षीण हो चुकी हैं, वह पुरुष सर्वोत्कृष्ट परमपदकी प्राप्तिके योग्य कहा जाता है; क्योंकि वासनाशून्य मनवाला पुरुष कर्तापनसे रहित हो जाता है, अतः उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। जिस साधनसे मनुष्यकी जगद्विषयिणी आस्था पूर्णतया शान्त हो जाती है और उसका अन्तःकरण शोक, भय और एषणाओंसे रहित हो जाता है तथा आत्मा अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो जाता है, उस साधनको समाधि कहते हैं। जिन गृहस्थोंके चित्त अच्छी प्रकार समाहित हो चुके हैं तथा जिनके अहङ्कार आदि दोष शान्त हो गये हैं, उनके लिये घर ही निर्जन वनस्थलियोंके समान है। समाहित मन और बुद्धिशाले तुम्हारे-जैसे प्राणियोंके लिये इस जगत्में घर और वन एक-से हैं। राजकुमार राम ! जिसका चित्त अहंता, ममता, रागादि दोषरूप महामेघसे रहित होकर शान्त हो चुका है, उसके लिये जनसमूहोंसे व्याप्त नगर भी सुनसान अरण्य-जैसे लगते हैं; परंतु शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले रघुनन्दन ! जिसका चित्त अहन्ता, ममता, राग आदि वृत्तियोंसे युक्त होनेके कारण उन्मत्त बना रहता है, उसके लिये निर्जन वन भी प्रचुर जनोंसे परिपूर्ण नगर-जैसे ही हैं।
जो मनुष्य समाधि-कालमें परमात्माको सम्पूर्ण भावों और पदार्थोंसे अतीत तथा व्यवहारकालमें सम्पूर्ण भावोंको परमात्माका स्वरूप समझता है, वह समाहित कहा जाता है। जिसका मन सदा अन्तर्मुख बना रहता है, वह सोते, जागते और चलते हुए भी ग्राम, नगर और देशको जंगल-जैसा ही समझता है। यद्यपि यह सारा जगत् प्राणियोंसे परिपूर्ण है, तथापि नित्य अन्तर्मुखी स्थितिवाले पुरुषके लिये सर्वथा अनुपयोगी होनेके कारण यह आकाशकी तरह शून्य हो जाता है। जिन पुरुषोंके
३१० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अन्तःकरणमें परम शान्ति प्राप्त हो जाती है, उनके लिये सारा जगत् सदा शान्तिमय हो जाता हैं; परंतु जिनका अन्तःकरण तृष्णाकी ज्वालासे संतप्त होता रहता है, उनके लिये जगत् दावाग्निसे दग्ध होता हुआ-सा प्रतीत होता है; क्योंकि समस्त प्राणियोंके भीतर जैसा भाव होता है, वैसा ही बाहर अनुभव होता है। जो बाहर कर्मेन्द्रियोंद्वारा क्रियाओंका सम्पादन करता हुआ भीतर केवल आत्मामें ही रत रहता है और हर्ष-शोकके वशीभूत नहीं होता, वह समाहित कहा जाता है। जो शान्तबुद्धि पुरुष सर्वव्यापक आत्माका साक्षात्कार करते हुए न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी चिन्ता ही करता है, वह समाहित कहलाता है। जो आकाशकी तरह निर्मल है, शास्त्र और शिष्टाचारके अनुकूल बाह्य चेष्टाओंका सम्यक् प्रकारसे आचरण करता है और हर्ष, अमर्ष आदि विकारोंमें काष्ठ और मिट्टीके ढेलेके समान विकाररहित एवं शान्तस्वभाववाला है तथा जो भयसे नहीं, बल्कि स्वाभाविक ही समस्त प्राणियोंको अपने आत्माके तुल्य और पराये धनको मिट्टीके ढेलेके सदृश देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो इस प्रकारके आशयसे सम्पन्न होकर सच्चिदानन्द ब्रह्मरूप परमपदको प्राप्त हो गया है, उसके ऐश्वर्य आदि पदार्थ चाहे पूर्ववत् स्थित रहें, चाहे अभ्युदयको प्राप्त हों, चाहे नष्ट हो जायें, चाहे उसके बन्धु-बान्धव मृत्युको प्राप्त हो जायें, चाहे वह उत्तमोत्तम भोग-सामग्रियोंसे परिपूर्ण तथा कुटुम्बी जनोंसे भरपूर घरमें रहे, अथवा सभी प्रकारके भोगोंसे शून्य विशाल वनमें रहे, चाहे उसके शरीरपर चन्दन, अगुरु और कपूरका अनुलेप किया जाय अथवा वह बड़ी-बड़ी ज्वालाओंसे व्याप्त अग्निमें गिरे, चाहे उसकी आज ही मृत्यु हो जाय अथवा अनेक कल्पोंके बाद हो, वह न तो स्वयं कुछ बनता है और न उस महात्माने कुछ किया ही। अर्थात् वह सभी स्थितियोंमें विकार-रहित समभावसे स्थित रहता है। अहंकार और वासनारूपी अनर्थोंके उत्पन्न होनेसे संविदात्मा पुरुषके जीवनमें नाना प्रकारके सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं; परंतु उस अहंताके पूर्णतया शान्त हो जानेपर चित्तमें ऐसी समता प्राप्त हो जाती है, जैसे रज्जुमें सर्पभ्रान्तिके नष्ट हो जानेपर 'यह सर्प नहीं है' इस ज्ञानसे निर्भयता और प्रसन्नता होती है। ज्ञानी जो कार्य करता है, जो खाता है, जो दान देता है, जो हवन आदि करता है—उन सब कर्मोंको करता हुआ भी वह कुछ नहीं करता एवं न उनमें रत ही रहता है; क्योंकि वह अहंता-ममतासे रहित हो जाता है, इसलिये उसका कर्म करना अथवा न करना एक-सा है। उसका न तो कर्मोंके करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके न करनेसे ही कोई मतलब है; क्योंकि वह तो यथार्थ ज्ञानके प्रभावसे स्वाभाविक ही परमात्मामें स्थित है। अतः उसके मनमें कामनाओंकी उत्पत्ति उसी प्रकार रुक जाती है, जैसे पत्थरमे मञ्जरियाँ नहीं निकलतीं।
(सर्ग ५४-५७)
किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना और उपदेश देकर अपने आश्रमको लौट जाना, सुरघुके आत्मविषयक चिन्तनका वर्णन तथा उसे परमपदकी प्राप्ति
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो किरात-राज सुरघुका परम विस्मयजनक वृत्तान्त है। पूर्वकालमें हिमालयके शिखरभूत कैलासके मूल देशमें हेमजट नामक किरात निवास करते थे। उनका जो राजा था, उसका नाम सुरघु था। वह उदारचेता एवं शत्रु-नगरोंपर विजय पानेवाला था। विजयलक्ष्मी तो मानो उसकी भुजा ही थी। वह बलवान् तथा प्रजापालनमें दक्ष था। पराक्रममें
उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना * ३११
तो वह सूर्यतुल्य और बलमें साक्षात् मूर्तिमान् वायुके समान था। उसने नाना प्रकारके राज्यवैभवों तथा विविध धन-सम्पत्तियोंसे गुह्यकाधिपति कुबेरको, ज्ञानसे इन्द्रगुरु बृहस्पतिको और काव्यगुणोंसे असुर-गुरु शुक्राचार्यको जीत लिया था। वह यथावसर प्राप्त हुए राजकार्योंको निग्रह-अनुग्रहकी व्यवस्थासे उत्साहपूर्वक करता था। तदनन्तर उन राजकार्योंसे उत्पन्न हुए सुख-दुःखोंसे उसकी पारमार्थिक गति उसी प्रकार अभिभूत हो गयी, जैसे जालमें फँसे हुए पक्षीकी गति रुक जाती है। तब वह यों विचार करने लगा—'मैं इन दुखी प्रजाजनोंको कोल्हूमें पेरे जाते हुए तिलोंकी भाँति क्यों बलपूर्वक पीड़ित करता हूँ ? मेरे समान ही इन सभी प्राणियोंको भी तो दुःख होता होगा। अतः अब मेरा इन्हें और अधिक दण्ड देना व्यर्थ है। मैं इन्हें धन-सम्पत्ति प्रदान करूँगा; क्योंकि मेरी तरह सभी लोग धनसे आनन्दित होते हैं। अथवा निग्रहका अवसर प्राप्त होनेपर उसे भी करूँगा; क्योंकि निग्रहके बिना प्रजा अपनी मर्यादामें स्थित नहीं रहती। यह मेरे लिये दण्डनीय है। यह सदा मेरे अनुग्रहका पात्र है। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं सुखी हूँ और दुर्भाग्यवश आज मैं दुखी हूँ। यह सब अन्तमें कष्ट-ही-कष्ट है।' पृथ्वीपति सुरघुका मन इस प्रकारके सङ्कल्प-विकल्पोंसे चञ्चल हो गया, जिससे उसे कहीं विश्राम नहीं मिला—जैसे चिरकालकी तृषासे युक्त मन जलके बड़े-बड़े आवर्तोंपर घूमते रहनेपर भी जलके बिना कहीं शान्ति नहीं पाता।
तदनन्तर किसी समय महर्षि माण्डव्य सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए राजा सुरघुके घर पधारे—ठीक उसी तरह, जैसे देवर्षि नारद इन्द्र-भवनमें पदार्पण करते हैं। वे मुनिराज सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे, अतएव सन्देहरूपी दुष्ट वृक्षस्तम्भका छेदन करनेके लिये कुठारस्वरूप थे। राजाने उनका पूजन किया और यों पूछा।
सुरघुने कहा—मुने ! जैसे लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दर्शन करके भक्त परम प्रसन्न होता है, उसी प्रकार आपके शुभागमनसे मुझे परम हर्ष प्राप्त हुआ है। भगवन् ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं और चिर-कालसे परमपदमें विश्राम भी कर चुके हैं; अतः जैसे सूर्य अन्धकारका विनाश कर देते हैं, उसी प्रकार आप मेरे संशयका निवारण कीजिये; क्योंकि दुःखके स्वरूप-को पूर्णतया जाननेवाले विज्ञजन संशयको ही महान् दुःख बतलाते हैं। भला, महापुरुषोंके सङ्गसे किसके दुःखका विनाश नहीं होता अर्थात् सभीके दुःख नष्ट हो जाते हैं। प्रभो ! अपने प्रजाजनोंपर मेरे द्वारा किये गये निग्रह और अनुग्रहसे उत्पन्न हुई चिन्ताएँ मुझे उसी प्रकार उत्पीड़ित कर रही हैं, जैसे सिंहके नख हाथीको कष्टमें डाल देते हैं। अतः मुने ! जिस प्रकार मेरी बुद्धिमें सूर्यकी किरणोंके समान समताका उदय हो और विषमता न आने पाये, कृपापूर्वक वैसा ही प्रयत्न कीजिये।
३१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
महर्षि माण्डव्य बोले- राजन् ! जैसे सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे कुहरेका विनाश हो जाता है, उसी तरह वैराग्य, श्रवण-मनन-निदिध्यासनरूप अभ्यासादि निजी प्रयत्नसे तथा आत्मस्थितिरूप उपायसे मनकी यह कायरता पूर्णतया नष्ट हो जाती है। आत्मविषयक विवेक-विचार करनेसे ही मनके भीतरी संतापका शमन होता है—ठीक उसी तरह, जैसे शरद्ऋतुके आगमनमात्रसे विशाल मेघमण्डल विलीन हो जाता है। इसलिये तुम मन ही-मन विचार करो—ये जो पुत्र, मित्र आदि अपने सम्बन्धी हैं तथा अपने शरीरमें रहनेवाली इन्द्रियाँ हैं, वे तत्त्वतः कौन हैं और कैसी हैं? मैं कौन हूँ? कैसा हूँ? यह दृश्य जगत् क्या है ? प्राणियोंके जन्म-मरण कैसे होते हैं? यों हृदयमें विचार करनेसे तुम्हें परमोत्कृष्ट महत्ता प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार जब परमात्म-तत्त्वका यथार्थ अनुभव कर लेनेपर तुम संतुष्ट हो जाओगे, तब जैसे संतान संतुष्ट हुए पिताकी कृपाका पात्र होती है, उसी तरह वे सभी सम्पत्तिशाली राजा-महाराजा तुम्हारे कृपापात्र हो जायँगे। सज्जनशिरोमणे ! परमात्माकी प्राप्तिरूप महत्ताके प्राप्त कर लेनेपर तुम्हारा चित्त जागतिक विषय-भोगोंमें उसी प्रकार नहीं डूबेगा, जैसे गायके खुरके गढ्ढेके जलमें हाथी नहीं डूबता। तुम्हारे अन्त:करणमें केवल दृश्यका अवलम्बन करनेवाली वासनारूपा दीनता छायी हुई है, अभी उसी दीनताके कारण तुम कीड़ेकी भाँति भोगोंमें पच रहे हो। जो सर्वात्मिका बुद्धिसे सब देशमें, सब कालमें, सभी प्रकारोंसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चका परित्याग कर देता है, उसे सर्वरूप परमात्मा अपने-आप उपलब्ध हो जाते हैं; किंतु जबतक सम्पूर्ण दृश्योंका पूर्णतया त्याग नहीं हो जाता, तबतक परमात्मा-का साक्षात्कार होना दुर्लभ है; क्योंकि सभी अवस्थाओं-का परित्याग कर देनेपर जो शेष रहता है, वही परमात्मा कहा गया है। राजन् ! अन्यान्य कार्योंका परित्याग करके आत्मा जिस विषयकी प्राप्तिके लिये स्वयं सब प्रकारसे यत्न करता है, उसीको पाता है; उससे भिन्न कुछ नहीं मिलता। इसलिये अपने आत्मा-का साक्षात्कार करनेके लिये सभी विषयोंका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि सब कुछ त्याग देनेपर अन्तमें जो दृष्टिगोचर होता है, वही परमपद है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! महर्षि माण्डव्य राजा सुरघुको यो उपदेश देकर अपने उसी रुचिर आश्रमकी ओर चले गये, जहाँ मुनियोंका जमघट लगा रहता था। उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर राजा सुरघु किसी दोषरहित एव एकान्त स्थानमें जाकर अपनी बुद्धिसे यों विचार करने लगा—'वस्तुतः स्वयं मैं कौन हूँ ? मै मेरु पर्वत तो हूँ नहीं और न मेरुगिरि मेरा है। न तो मैं जगत् हूँ और न जगत् मेरा है। मैं पर्वत भी नहीं हूँ और न पर्वत मेरे हैं। मैं न पृथ्वी हूँ और न पृथ्वी मेरी है। यह किरात-मण्डल भी मेरा नहीं है और न मैं किरातमण्डल हूँ। केवल अपने संकेतसे ही यह देश मेरा कहा जाता है। लो, मैंने इस संकेतको छोड़ दिया, अतः न तो मैं देश हूँ और न यह देश मेरा है। इस नगरके विषयमें भी इस कल्पनात्यागसे यही निश्चय होता है कि यह पुरी जो पताकाओं और वनश्रेणियोंसे सुशोभित, भृत्यों और उपवनोंसे व्याप्त तथा हाथी, घोड़ों और सामन्तोंसे परिपूर्ण है, वह मैं नहीं हूँ और न यह पुरी मेरी है। जो मिथ्याभूत मान्यतासे सम्बन्ध रखनेवाला और उस मान्यताका विनाश होनेपर नष्ट हो जानेवाला है, ऐसा यह भोग-समुदाय और भार्या आदि कुटुम्ब भी मैं नहीं हूँ और न ये सब मेरे हैं। इसी प्रकार भृत्यों, सेनाओं, वाहनों एवं अन्यान्य नगरोंसे युक्त राज्य मैं नहीं हूँ और न राज्य मेरा है; क्योंकि यह मान्यता तो केवल कल्पित है। इस शरीरमें स्थित मांस और अस्थि भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि ये जड़ हैं। कमलदलपर पड़े
उपशम-प्रकरण ] * सुरघुके आत्मविषयक चिन्तनका वर्णन और उसे परमपदकी प्राप्ति * ३१३
हुए जलकी बूँदकी तरह उनका मेरे साथ सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार मास, रक्त और हड्डियाँ—ये सभी जड हैं; अतः मैं ये नहीं हूँ और न किसी दशामें ये मेरे हैं। कर्मेन्द्रियाँ भी मैं नहीं हूँ और न कर्मेन्द्रियाँ मेरी हैं। इस प्रकार इस देहमें यावन्मात्र जड पदार्थ हैं, वे मैं नहीं हूँ; क्योंकि मैं तो चेतन हूँ। मैं भोग नहीं हूँ और न भोग मेरे हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ भी मेरी नहीं हैं और न मैं ही ज्ञानेन्द्रियाँ हूँ; क्योंकि वे जड और असत्स्वरूपा हैं। जो संसाररूपी दोषका मूल कारण है, वह मन भी मैं नहीं हूँ; क्योकि वह तो जड है। बुद्धि और अहङ्कार भी मैं नहीं हूँ और न वे मेरे हैं; क्योंकि यह दृष्टि मनोमयी होनेके कारण जड है। यों चञ्चलत्वरूपवाले शरीरसे लेकर मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदितक जो स्थूल-सूक्ष्म भूतोंका समुदाय है, उनमेंसे मैं एक भी नहीं हूँ।
'अहो ! महान् आश्चर्यकी बात है, मैं तो सम्पूर्ण विकल्पोंसे रहित विशुद्ध साक्षीस्वरूप चेतन आत्मा हूँ। जिसकी प्राप्तिके लिये मै चिरकालसे प्रयत्नशील था, उस आत्माकी उपलब्धि तो मुझे आज ही हुई है । जिस विशुद्ध आत्माका कहीं अन्त नहीं है, वह तत्पदबोध्य असीम आत्मा ही मैं हूँ। वह चेतन आत्मा निर्मल, विषय-दोषोंसे शून्य, सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको परिपूर्ण करनेवाला, सर्वव्यापक, सूक्ष्म, उत्पत्ति-विनाश- रहित, समस्त आकारोंसे परे एव सर्वदा सर्वभावको प्राप्त है। जगत्की यह अनुमन्त्रात्मक कल्पना भी चेतना- शक्तिमयी ही है। यह जो सुख और दुःखकी दशाका ज्ञान होना है, वह तो मिथ्या अनुभवमात्र है तथा जो नाना प्रकारके आकारोंकी प्रतीति होती है, वह सब कुछ परम चेतन आत्मा ही है। जो समस्त जगत्में व्यापक है, वही चेतन मेरा आत्मा है और जो मेरी बुद्धिका साक्षी है, वही यह चेतन है। इसी चेतन- शक्तिकी कृपासे मन देहरूपी रथपर आरूढ होकर अनेकों सृष्टि-विलासोंमें जाता है, वहाँ दौड़-धूप करता और नाचता है । वस्तुतः तो ये मन-शरीर आदि वस्तुएँ कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि इनके नष्ट हो जानेपर भी आत्माका कुछ नहीं बिगड़ता । चित्तरूपी नटने ही इस जगज्जालरूपी नाटकका विस्तार किया है । इसे' केवल वही बुद्धि देखती है, जो दीप-शिखाके समान देदीप्यमान है। अत्यन्त खेदकी बात है कि निग्रह और अनुग्रहकी स्थितिमें मुझे देहविषयिणी चिन्ता व्यर्थ ही हुई; क्योंकि परमार्थतः देह कुछ भी नहीं है। अहो ! अब तो मुझे विशेषरूपसे ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है, जिससे मेरा असद्विचार नष्ट हो गया है। जिसे जानना आवश्यक था, उसे मैंने जान लिया और जो प्राप्त करने योग्य था, उसे पा लिया । अब लोकमें वे निग्रह और अनुग्रह कहाँ हैं, किस प्रकारके हैं, किसमें रहते हैं और उनका स्वरूप क्या है ? इसी तरह हर्ष और अमर्षकी परम्परा भी कहाँ है ? अर्थात् ये सभी व्यर्थ कल्पनामात्र ही हैं। अब मैं रागशून्य, विषयोंके संसर्ग- से रहित और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे परे होकर उस विशुद्ध विज्ञानानन्दघन परमात्मामें, जो संसार-भ्रम और रागादिसे शून्य है, नित्य निवास करूँगा।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! जैसे गाधिनन्दन विश्वामित्रने अपने तपोबलसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था, उसी तरह हेमजट नामक किरातोंके राजा सुरघुने निश्चयात्मक ज्ञानके बलसे परमपद प्राप्त कर लिया । तभीसे राजा सुरघु चिन्ताओंसे मुक्त हो गया । वह सर्वदा निग्रह-अनुग्रहरूपी अपने राजोचित कार्योंमें उसी तरह अटल बना रहता था, जैसे जल- प्रवाहके सम्मुख पर्वत निष्कम्प बना रहता है। हर्ष, विषाद और ईर्ष्यासे रहित होकर प्रतिदिन यथावसर प्राप्त हुए कार्योंको न्यायपूर्वक करता हुआ राजा सुरघु अपनी उदार और गम्भीर आकृतिद्वारा समुद्रसे भी बढ़- कर सुशोभित होने लगा। उसकी वृत्ति अन्त करणको
३१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शीतल करनेवाली, निश्चलताके कारण धीर और समदर्शनात्मक थी; उस वृत्तिसे वह परिपूर्ण समुद्र और चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगा। यह सारा जगत् केवल चेतन-तत्त्वकी कल्पना ही है—यों निश्चय करनेके कारण उसकी बुद्धि सांसारिक सुख-दुःखोंसे रहित हो गयी थी; अतः वह पूर्णरूपसे प्रकाशित हो रही थी। इसलिये प्रबुद्ध तथा चेतनमें विलीन हुआ वह राजा हर्षित होते, प्रफुल्लित होते, पूर्णरूपसे स्थित रहते, चलते, बैठते और सोते समय सदा समस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता था। उसका शरीर विकाररहित था तथा नेत्र कमलके समान सुन्दर थे। वह अनासक्तभावसे राज्य करते हुए सैकड़ों वर्षपर्यन्त इस भूमण्डलपर विद्यमान रहा। तत्पश्चात् उसने स्वयं ही इस पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग कर दिया और परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेके कारण, जो सृष्टि और प्रलयके हेतु तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, उन परब्रह्म परमात्मामें प्रवेश कर गया—ठीक उसी तरह, जैसे नदियोंका जल परिपूर्ण समुद्रमें प्रवेश करता है। वह विशुद्ध एकरस स्वप्रकाश परमात्माको यथार्थरूपसे जान चुका था और जन्म आदि विकारोंसे रहित अवस्थाको प्राप्त कर लेनेके कारण उसके समग्र शोक शान्त हो गये थे; इसलिये वह पूर्णरूप परब्रह्म परमात्मामें उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त हो गया, जैसे घटके फूट जानेपर घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है। (सर्ग ५८-६०)
किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का संवाद
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिस समय सुरघुको तत्त्वज्ञान हो चुका था, उसी समय अर्थात् उसके जीवनकालमें ही उसका और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का परस्पर जो अद्भुत संवाद हुआ था, उसे सुनो। रघुकुलको आनन्दित करनेवाले राम ! जैसे रथपर रखा हुआ परिघ नामक अस्त्र विपक्षी वीरोंका संहार करनेमें प्रसिद्ध है, उसी तरह पारसीक देशका एक विख्यात राजा हो गया है, जो शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला था। उसका नाम था परिघ। वह किरातराज सुरघुका परम मित्र था। किसी समय जैसे कल्पान्तके
अवसरपर संसारमें वर्षाका अभाव हो जाता है, उसी तरह राजा परिघके राज्यमें महान् अवर्षण हुआ, जिसमें प्रजाजनोंका पापरूपी दोष ही कारण था। उस समय बहुत-सी जनता भूखसे गतप्राण होकर उसी प्रकार विनष्ट हो गयी, जैसे जगलमें आग लग जानेपर झुंड-के-झुंड प्राणी जलकर भस्म हो जाते हैं। प्रजाके उस कष्टको देखकर राजा परिघको अपार विषाद हुआ। उसने प्रजाजनोंको विनाशसे बचानेके लिये अनेकों यत्न किये, किंतु वे सब निष्फल सिद्ध हुए। तब उसे राज्यसे वैराग्य हो गया। फिर तो जैसे राहगीर जले हुए गाँवको छोड़कर
उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद ( परिव ) का संवाद * ३१५
चल देते हैं, उसी तरह उसने शीघ्र ही अपने सम्पूर्ण राज्यका परित्याग कर दिया और मृगचर्मधारी मुनियोंकी तरह तपस्या करनेके लिये जंगलकी राह ली। वह विरक्तात्मा परिव किसी दूरवर्ती काननमें, जो पुरवासियोंकी जानकारीके बाहर था, जाकर इस प्रकार रहने लगा मानो किसी अन्य लोकमें चला गया हो। उसकी बुद्धि तो शान्त थी ही, उसने अपने मन-इन्द्रियोंका भी दमन कर लिया था; अतः वह वहाँ एक पर्वतकी कन्दरामें आसन लगाकर तपस्यामें निरत हो गया। उस समय स्वयं सूखकर गिरे हुए पत्ते ही उसके आहार थे। इस प्रकार चिरकालतक वह अग्निकी भाँति सूखे पत्तोंको ही भक्षण करता रहा, जिससे तपस्वियोंके मध्यमें वह 'पर्णाद' नामसे विख्यात हुआ। तभीसे वह परिव जम्बूद्वीपमें मुनियोंके आश्रमोंमें राजर्षिश्रेष्ठ पर्णादके नामसे प्रसिद्ध हो गया। तदनन्तर एक सहस्र वर्षोंकी घोर तपस्या और अभ्यासके द्वारा परमात्माकी कृपासे उसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति हुई। साधुस्वभाव राम! फिर तो उसकी बुद्धि प्रबुद्ध हो उठी। वह सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे परे हो गया। उसकी विषय-वासनाएँ नष्ट हो गयीं। उसका मन विक्षेपशून्य और शान्त हो गया तथा वह विषयोंकी आसक्तियों और आक्षेपोंसे रहित हो गया। इस प्रकार जीवन्मुक्त होकर वह तत्त्वज्ञानियों तथा तत्त्वजिज्ञासु मुनियोंके साथ स्वेच्छानुकूल त्रिलोकीमें विचरण करने लगा। यों पर्यटन करते हुए वह एक समय हेमजट देशके अधिपति राजा सुरघुके रत्ननिर्मित महलमें जा पहुँचा। वे दोनों पहलेके मित्र तो थे ही, साथ ही वे पूर्ण ज्ञानी थे। उन्हें ज्ञातव्य तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो चुका था तथा वे जीवन्मुक्त थे; अतः वे परस्पर एक-दूसरेका आदर-सत्कार करके यों कहने लगे—'अहो! निश्चय ही आज मेरे कल्याणमय पावन सत्कर्मोंका फल उदय हुआ है, जिससे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ।' उस समय उनके शरीर आनन्दसे परिपूर्ण हो गये थे,
अतः वे परस्पर आलिङ्गन करके एक ही आसनपर विराजमान हुए।
तब परिवने कहा—सखे! तुम्हारे दर्शनसे आज मेरा चित्त परमानन्दसे परिपूर्ण हो गया है। सज्जन-शिरोमणे! पहलेके वे संकोचहीन वार्तालाप, विविध लीलाएँ और विभिन्न चेष्टाएँ बारंबार मेरे स्मृति-पटलपर आ रही हैं, जिससे मुझे परम हर्ष हो रहा है। निष्पाप राजन्! जैसे महर्षि माण्डव्यकी कृपासे तुम्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई है, उसी तरह आराधनाद्वारा प्रसन्न हुए परमात्माके प्रसादसे मुझे भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ है। मित्र! अब तो तुम्हें कोई कष्ट नहीं है न? तुम मेरुगिरिपर विश्राम करनेवाले भूमण्डलके अधिपतिकी तरह परम कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें विश्रामको प्राप्त हो गये हो न ? परम कल्याणस्वरूप! तुम्हारे चित्तमें आत्मारामताके कारण सदा प्रसन्नता छायी रहती है न ? परम सौभाग्यशाली नरेश ! तुम अत्यन्त
३१६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रसन्नता एवं गम्भीरतापूर्ण समदृष्टिसे जनताके कल्याणार्थ कर्तव्यकर्मोंको करते हो न ? तुम्हारे देशमें निवास करनेवाली जनता शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओंसे रहित, धैर्य-सम्पन्न और धन-धान्यसे परिपूर्ण है न ? उसे कोई चिन्ता तो नहीं सताती ? क्या उत्तम फल प्रदान करनेवाली एवं अनेकविध फलोंके भारसे नम्र हुई कल्पलताकी भाँति तुम्हारे राज्यकी भूमि प्रजाजनोंका उनके अभिलषित पदार्थोंकी पूर्तिद्वारा सदा-सर्वदा पोषण करती है ! जैसे चन्द्रमाके किरणजाल सारे भूमण्डलको व्याप्त कर लेते हैं, उसी तरह तुम्हारा पावन यश, जो तुषार-राशिके सदृश निर्मल है, सारी दिशाओंमें फैला हुआ है न ! जैसे सरोवरका जल अपने अंदर रहनेवाले कमल-नालोंकी भूमिको पूर्ण कर देता है, वैसे ही तुमने अपने गुण-गणोंसे सारी दिशाओंको भर दिया है न ? क्या गाँव-गाँवमें धानकी क्यारियोंके कोनोंमें बैठी हुई हर्षित चित्तवाली कुमारियाँ तुम्हारे आनन्दवर्धक यशका गान करती हैं ? तुम्हारे धन-धान्य, ऐश्वर्य, भृत्यवर्ग, पुत्र-कलत्र और नगर आदि सबकी कुशल तो है न ? तुम्हारी यह शरीररूपी लता शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओ-से रहित होकर उस पुण्य नामक फलको उत्पन्न करती है न, जिसकी इहलोक तथा परलोक—दोनोंके लिये शास्त्र आज्ञा देते हैं ? जो तत्त्वज्ञानमें प्रतिबन्धक होनेके कारण महान् शत्रु-तुल्य हैं तथा सर्पके समान विषवत् फल प्रदान करनेवाले हैं, ऐसे इन आपात-रमणीय विषयभोगोंसे तुम्हारा मन विरक्त तो है न ? अहो ! हम दोनोंको वियुक्त हुए बहुत-सा काल व्यतीत हो गया, परंतु कालकी प्रेरणासे आज हम पुनः मिल गये । सखे ! जगत्में संयोग-वियोग-जनित सुख-दुःखकी ऐसी कोई अवस्थाएँ हैं ही नहीं, जिनका प्राणियोंको अनुभव न होता हो । इसी नियमके अनुसार हमलोग भी दीर्घकालिक सुख-दुःखकी दशाओंके फेरमें पड़ गये थे, परंतु अब पुनः आ मिले हैं । अहो ! भगवान्का कैसा अद्भुत विधान है !
सुरघु बोला—भगवन् ! भगवद्विधानरूप इस नियतिकी गति सर्पकी चालकी तरह बड़ी टेढ़ी है । वह गम्भीर एवं विस्मयजनक है । भला, उसे कौन जान सकता है । उसने ही आपको और मुझे चिरकालतक दूर हटाकर आज पुनः मिला दिया है । अहो ! उस नियतिके लिये क्या असाध्य है ? अर्थात् कुछ नहीं । महात्मन् ! आज आपके शुभागमन-जनित पुण्यके संस्पर्शसे हम सब तरहसे कल्याणके भागी और परम पावन हो गये । राजर्षे ! इस नगरमें हमारी जो सम्पत्तियाँ वर्तमान हैं, वे सभी आज आपके शुभागमनसे सैकड़ों रूपोंमें वृद्धिको प्राप्त हो गयी हैं । महानुभाव ! आपके पुण्यवचन और दर्शन चारो ओरसे मानो राशिश-राशि अमृतरूप मधुर रसायनोंकी वर्षा कर रहे हैं; क्योंकि सत्पुरुषोंका समागम परमपदकी प्राप्तिके समान होता है ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! प्रायः ऐसे ही प्राचीन स्नेहसे ओतप्रोत एवं संकोचहीन वार्तालाप करते हुए राजा परिघ सुरघुके राजसदनमें चिरकालतक स्थित रहे । तदनन्तर उन्होंने सुरघुसे पूछा—'राजन् ! जो समग्र संकल्पोंसे शून्य, विश्रामका परमोत्तम स्थान तथा विक्षेपात्मक दुःखोंकी शान्तिका परम साधन है, उस कल्याणकारिणी समाधिका अनुष्ठान तो तुम करते हो न ?
सुरघुने कहा—प्रभो ! आप मुझसे 'सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित परम शान्ति ही कल्याणप्रद है' ऐसा तो कहिये, परंतु समाधिके लिये क्यों कहते हैं ? क्योंकि महात्मन् ! जो तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुष है, वह चाहे समाधिस्थ रहे चाहे व्यवहार करे, उसका तो स्वरूप ही सदा समाधिस्थ-सा हो जाता है । वह कभी असमाहित चित्तवाला हो ही नहीं सकता । जिनका चित्त प्रबुद्ध हो गया है, ऐसे तत्त्वज्ञानी महात्माओंकी आत्मारूपी अद्वितीय तत्त्वमें परम निष्ठा हो जाती है, इसलिये वे सांसारिक व्यवहारोंको करते हुए भी सदा-
उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद (परिघ) का संवाद * ३१७
सर्वदा समाधिसम्पन्न ही बने रहते हैं। परन्तु जिसका अन्तःकरण चञ्चल होनेके कारण विश्रामको नहीं प्राप्त हुआ है, वह चाहे पद्मासन बाँधे चाहे परब्रह्मको अञ्जलि समर्पित करे, उसकी कोई समाधि कैसे लग सकती है। भगवन् ! मौन होकर बैठे रहना ही समाधि थोड़े ही है। समाधि तो परमात्मतत्त्वके उस यथार्थ ज्ञानको कहते हैं, जो सम्पूर्ण आशारूपी घास- फूसको भस्म करनेके लिये अग्निरूप है। साधो ! परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन उस तीक्ष्ण और अचल परा प्रज्ञाको ही समाधि कहते हैं, जो एकाग्र, सदा-सर्वदा तृप्त और सत्य अर्थको ग्रहण करनेवाली है। एवं जो प्रज्ञा क्षोभरहित, अहंकारशून्य, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे पृथक् रहनेवाली तथा मेरुसे भी बढ़कर स्थिरतायुक्त है, उसे समाधि कहते हैं। जो मनःस्थिति चिन्ताशून्य, अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त करनेवाली, ग्रहणोपादानसे रहित तथा सच्चिदानन्द परमात्मभावसे परिपूर्ण है, उसके लिये समाधि-शब्दका व्यवहार किया जाता है। जब मन तत्त्वज्ञानके साथ सदाके लिये अत्यन्त सम्बद्ध हो जाता है, तबसे ज्ञानी महात्माकी समाधि सदा बनी रहती है, उसका कभी विच्छेद नहीं होता। जैसे सूर्य दिनभर प्रकाशसे विश्राम नहीं लेता, अपितु प्रकाश- पूर्ण ही रहता है, उसी तरह तत्त्वज्ञानीकी प्रज्ञा जीवन- पर्यन्त परमात्म-तत्त्वके यथार्थ अवलोकनसे विश्राम नहीं लेती, अपितु सदा-सर्वदा परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे परिपूर्ण रहती है। जैसे नदी निरन्तर बेरोक-टोक जलकी धारा बहाती रहती है, उसी तरह महात्माकी विज्ञानमयी दृष्टि क्षणमात्रके लिये भी परमात्माके स्वरूपज्ञानसे विरत नहीं होती, अपितु सदा-सर्वदा एकरस बनी रहती है। जैसे काल अपने क्षण आदि कलाओंकी गतिको कभी नहीं भूलता, उसी तरह तत्त्वज्ञानी पुरुषकी बुद्धि अपने आत्मस्वरूपका कभी विस्मरण नहीं करती। तथा जैसे सर्वत्र गमन करनेवाले वायुदेवको सदा अपनी गतिका
ध्यान बना रहता है, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि निश्चय करने योग्य विज्ञानानन्दघन परमात्माका सतत चिन्तन करती रहती है। जैसे जिस पदार्थकी सत्ताका विनाश हो जाता है, उसकी पुनः उपलब्धि नहीं होती, उसी तरह तत्त्वज्ञानीका समय परमात्माके ज्ञानसे विहीन होकर कभी उपलब्ध नहीं होता। अर्थात् वह सदा परमात्माके ध्यानमें ही रचा-पचा रहता है। जैसे संसारमें गुणवानोंका गुणहीन होना असम्भव है, उसी तरह आत्मज्ञानी महात्मा कभी भी परमात्माके ज्ञानसे विहीन नहीं रह सकता। मैं सदा-सर्वदा ही परमात्मज्ञानसे सम्पन्न, परमशुद्धस्वरूप, शान्तात्मा और समाहितचित्त हूँ; ऐसी दशामें मेरा समाधिसे विच्छेद किसके द्वारा और कैसे हो सकता है। क्योंकि मेरी समाधि परमात्माके स्वरूपसे भिन्न नहीं है, अतः उस परमात्मस्वरूप समाधि- का अस्तित्व नित्य ही बना हुआ है। जब यह जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, वह सारा-का-सारा सदा सब प्रकारसे सर्वव्यापक परमात्मस्वरूप ही है, तब किसे समाधि कहा जाय और किसे असमाधि ?
तब परिघने कहा—राजन् ! निश्चय ही तुम्हें परमात्माके यथार्थ रूपका ज्ञान प्राप्त हो गया है और उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्मरूप परमपदकी प्राप्ति भी हो चुकी है। इसीलिये तुम्हारा अन्तःकरण परमशान्तिरूप शीतलता- से युक्त हो गया है, जिससे तुम पूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे हो। महाराज ! इस समय स्नेहके कारण अत्यन्त मधुर, शीतल, आनन्दरूपी पुष्परससे परिपूर्ण एवं उत्तम श्रीसे सम्पन्न होनेके कारण तुम्हारी शोभा कमल-जैसी हो रही है। तुम्हारा चित्त निर्मल, विस्तृत, परिपूर्ण, गम्भीर और विशद आशयवाला है; इससे तुम्हारी वैसी ही शोभा हो रही है, जैसी तटवर्ती झंझावातसे मुक्त हुए शान्त समुद्रकी होती है। जैसी शोभा शरत्कालीन निर्मल आकाश धारण करता है, वैसे ही तुम भी स्वच्छ, आनन्दसे परिपूर्ण, अहंकाररूपी
३१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
बादलोंसे रहित, स्पष्ट, विस्तीर्ण और अत्यन्त गम्भीर होनेके कारण शोभित हो रहे हो। राजन् ! तुम सर्वत्र अपने स्वरूपमें समभावसे स्थित दीख पड़ते हो, सर्वत्र पूर्णतया संतुष्ट हो और किसी विषयमें तुम्हारी आसक्ति नहीं रह गयी है; इसलिये सर्वत्र तुम्हारी शोभा हो रही है। तुम अपनी उत्तम बुद्धिसे सार-असारका निर्णय करके उसके झमेलेसे पार हो गये हो तथा तुम्हें इसका भी ज्ञान हो चुका है कि यह जो कुछ दृश्य-प्रपञ्च है, वह सारा-का-सारा अखण्ड परब्रह्म परमात्मा ही है।
सुरघु बोला—मुने ! संसारमें ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जिससे ग्रहण करनेके लिये हमारे मनमें अभिलाषा हो; क्योंकि यह जितना दृश्य-प्रपञ्च है, यह सभी कुछ नहीं है अर्थात् मिथ्या है। त्रिलोकीमें जो ये स्त्रियाँ, पर्वत, समुद्र, वनश्रेणियाँ आदि पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये सभी वास्तविकतासे शून्य हैं; क्योंकि वास्तवमें इस जगत्-में कोई सारभूत वस्तु है ही नहीं। इस मांस और अस्थिमय शरीरमें तथा काष्ठ, मिट्टी और शिलामय जगत्में जो जर्जर, अवाञ्छनीय और अभावरूप है, किस वस्तुकी इच्छा की जाय? अर्थात् इनमें कुछ भी वाञ्छनीय नहीं है। इस विषयमें अब विशेष कुछ कहना आवश्यक नहीं दीख पड़ता; क्योंकि यदि मन रागरूप रससे रहित तथा समभावमें नित्य स्थित एवं आत्मस्वरूप ही परितृप्त है तो वही सर्वोत्तम स्थिति है। अतः परमानन्दकी प्राप्तिके लिये केवल इसी दृष्टिका सदा-सर्वदा आश्रय ग्रहण करना उचित है।
( सर्ग ६१-६३ )
आत्माका संसार-दुःखसे उद्धार करनेके उपायोंका कथन तथा भास और विलास नामक तपस्वियोंके वृत्तान्तका आरम्भ
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यों तत्त्वज्ञ सुरघु और राजर्षि पर्णाद ( परिघ ) दोनो जगद्भ्रमका विचार करके परम प्रसन्न हुए । उन्होने एक-दूसरेका आदर-सत्कार किया और फिर वे अपने-अपने कार्यमें तत्पर होकर अभीष्ट स्थानको चले गये। ज्ञानी महापुरुषों के साथ विचार-विमर्श करनेके कारण अत्यन्त तीव्र हुई उत्तम बुद्धिद्वारा जिसके हृदयाकाशमें अहंकाररूपी काले मेघोंका सर्वथा अभाव हो गया है, शरत्कालीन निर्मल आकाशकी तरह जिसका विस्तृत चित्त समस्त लोगोंद्वारा अनुमोदित, फलात्मक बोधसे युक्त, आह्लादजनक एवं रागादि मलोंसे रहित हो गया है, जो ध्यान करने एवं शरण लेनेयोग्य, सुगम, सम्पूर्ण आनन्दोंकी निधि, अत्यन्त प्रसन्न विज्ञानानन्दघन परमात्मामें स्थित रहता है और जो नित्य परमात्माके विचारमें निरत, सदा अन्तर्मुखी वृत्तिसे युक्त, सुखी तथा नित्य चिन्मय परमात्माका अनुसंधान करनेवाला है, उसे मानसिक शोक कभी बाधा नहीं पहुँचा सकते। जो परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे सम्पन्न, शुद्ध, भीतरसे परमशान्तियुक्त एवं मननशील महात्मा है, उसे मन क्लेश नहीं दे सकता—ठीक उसी तरह, जैसे हाथी सिंहको बाधा नही पहुँचा सकता। ज्ञानीका अन्तःकरण तो अत्यन्त विशाल होता है; क्योंकि वह केवल विषय-भोगोंकी शरण लेनेवाला और दीन नहीं होता। ज्यों ही 'अविद्या असत् है' यों अविद्याके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हुआ, त्यों ही उसका सदा-सर्वदाके लिये अभाव हो जाता है—जैसे स्वप्नका ज्ञान हो जानेपर स्वप्नदृष्ट भोग-भूमिका सर्वथा विनाश हो जाता है। जिसकी बुद्धि विषयोंकी आसक्तिसे रहित और केवल विज्ञाना-नन्दघन परमात्मामें नित्य स्थित है, उस श्रेष्ठ'महापुरुषको व्यवहारपरायण रहनेपर भी पाप स्पर्श नहीं कर सकता। जब चेतन परमात्माके देदीप्यमान प्रकाशका उदय होता है, तब अज्ञानरूपी रात्रि विनष्ट हो जाती है और ज्ञानीकी परमानन्दको प्राप्त हुई बुद्धि प्रकाशित हो उठती है।
उपशम-प्रकरण ] * आत्माका संसार-दुःखसे उद्धार करनेके उपायोंका कथन * ३१९
सत्-शास्त्रज्ञानरूपी सूर्यद्वारा प्रबोधित मनुष्यकी अज्ञान-निद्राका जब सर्वथा विनाश हो जाता है, तब उसे परमात्मविषयक उस यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति होती है, जिसे पा लेनेपर फिर कभी मोह नहीं होता। उन्हीं दिनोंका जीवन वास्तवमें सफल है और वे ही क्रियाएँ सच्चे आनन्दसे युक्त हैं, जिन दिनों और जिन क्रियाओंमें हृदयाकाशमें परमात्मारूपी चन्द्रमाके उदय होनेसे चेतनारूपिणी चाँदनी खिल रही हो। मोहका अतिक्रमण कर लेनेवाला मनुष्य निरन्तर आत्मचिन्तनके प्रभावसे अपने अन्तःकरणमें उसी प्रकार शीतलताको प्राप्त कर लेता है, जैसे चन्द्रमा अपने अंदर वर्तमान अमृतसे सदा शीतल बना रहता है। वे ही मित्र सच्चे मित्र हैं, वे ही शास्त्र सत्-शास्त्र हैं और वे ही दिन शुभ दिन हैं, जिनके सहयोगसे वैराग्यरूपी उल्लाससे युक्त परमात्मविषयक चित्तका अभ्युदय स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है। जिनके पाप क्षीण नहीं हुए हैं और जो परमात्माकी प्राप्तिकी उपेक्षा करते हैं, वे जन्मरूपी जंगलके गुल्म हैं, दीन हैं और उन्हें चिरकालतक दुःखोंके लिये शोक करना पड़ता है।
श्रीराम ! जीवात्मा एक बैलके समान है। बुढ़ापेने इसके शरीरको जर्जरित कर दिया है, जिससे यह शोकजनित उच्छ्वाससे विडम्बित हो रहा है। यह आशारूपी सैकड़ों पाशोंसे जकड़ा हुआ है, फिर भी भोगरूपी घासके लिये इसके मनमें उत्कृष्ट लालसा भरी है। यह अपनी पीठपर दुःखका भारी बोझ लिये हुए जन्मरूपी जंगलमें भटक रहा है और सारे शरीरमें कुकर्मरूपी कीचड़ लपेटे हुए मोह-जलाशयमें लोट रहा है। रागकी दन्तपङ्क्तियाँ इसे चबाये डालती हैं और तृष्णारूपी नाथसे यह खींचा जा रहा है। मनरूपी वणिक्ने इसपर अधिकार जमा रखा है। यह बन्धु-ममतारूपी बन्धनमें बँधा होनेके कारण चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गया है। पुत्र-कलत्रकी ममताजनित जीर्णतारूपी दलदलमें यह बुरी तरह फँस गया है। लंबे रास्तेपर चलनेके कारण इसका मन टूट गया है और विश्राम न मिलनेसे यह थक गया है, जिससे अब इसके चलने-फिरनेकी शक्ति क्षीण हो गयी है। संसाररूपी अरण्यमें चक्कर काट रहा है, फिर भी परम शान्तिरूप शीतल छाया इसे नसीब नहीं हुई; उल्टे यह विषय-संसर्गजनित तीव्र तापसे संतप्त हो उठा है। बाह्य इन्द्रियाँ इसे आक्रान्त किये हुए हैं, जिससे ऊपरसे तो इसका आकार सुन्दर है किंतु अन्तःकरण दीन हो गया है। इसके गलेमें लटकते हुए कर्मरूपी घंटेका शब्द हो रहा है। यह जन्म-मरणरूपी गाड़ीके बोझसे लदा हुआ अज्ञानके विकट वनमें लोट रहा है, ऊपरसे पापरूपी कोड़ोंकी मार पड़ रही है, जिससे इसका शरीर भग्न हो गया है। अनर्थोंमें ही सदा निमग्न रहनेसे दुखी, दीन और शिथिल अङ्गवाला यह कर्मोंके भारी भारसे पीड़ित होकर करुण-क्रन्दन कर रहा है। अतः चिरकालतक उत्तम यत्नका आश्रय लेकर परमात्मविषयक ज्ञानरूपी बलके सहारे इसका संसाररूपी जलाशयसे उद्धार करना चाहिये।
राघव ! परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे जब चित्त विनष्ट हो जाता है, तब जीवात्मा पुनः संसारमें कभी जन्म नहीं लेता; क्योंकि वह तो उसी समय संसार-सागरसे पार हो जाता है। श्रीराम ! जैसे समुद्रको पार करनेके लिये नाविकसे जहाज प्राप्त होता है, उसी तरह ज्ञानी महात्मा पुरुषोंके सङ्गसे संसार-सागरको लाँघ जानेकी युक्ति ज्ञात हो जाती है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह मरुस्थलकी भाँति जिस देशमें परम शान्तिरूपी शीतल छाया और मोक्षरूपी फलसे सम्पन्न तत्त्वज्ञ महापुरुषरूपी वृक्ष न हों, वहाँ निवास न करे। श्रीराम ! कोमल और शान्तिप्रद वचन ही जिसके पत्ते हैं, सच्चरित्रता ही जिसकी छाया है, मुस्कान ही जिसके पुष्प हैं—ऐसे महापुरुषरूपी चम्पाके वृक्षके नीचे जानेसे उनके सङ्गके प्रभावसे क्षणभरमें ही आत्यन्तिक विश्राम प्राप्त हो जाता है। मनुष्य स्वयं ही
३२० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अपना मित्र है। अतः उसे चाहिये कि वह सत्सङ्ग, तीव्र अभ्यास, वैराग्य, विवेक-विचार आदि उपायोंसे स्वयं ही अपना उद्धार कर ले; संसारकी आसक्ति, ममता, कामना और देहाभिमानके गर्वसे अपने-आपको जन्म-मरणरूपी कीचड़के महासागरमें न फँसाये। विवेकशील पुरुषोंको सत्सङ्ग, तीव्र अभ्यास और वैराग्य आदि प्रबल उपायोंद्वारा सदा यों विचार करते रहना चाहिये कि 'यह देह आदि दुःख क्या है ? कैसे आया है ? इसका मूल कारण क्या है ? और किस साधनसे इसका विनाश हो सकता है ?' क्योंकि अज्ञानमें निमग्न हुए अपने आत्माका उद्धार करनेमें मनुष्योंका धन, मित्र, साधारण शास्त्र और बन्धु-बान्धव—कोई भी उपकारक नहीं होते। हाँ, सदा-सर्वदा साथ रहनेवाले विशुद्ध मनरूपी सुहृद्के साथ थोड़ा-सा भी परामर्श करनेसे आत्माका उद्धार हो जाता है। तीव्र वैराग्य और अभ्यासरूपी प्रयत्नोंके द्वारा विवेकपूर्वक किये गये आत्मविचारसे जिसकी उपलब्धि होती है, उस परमात्मतत्त्व-साक्षात्काररूपी पोतके आश्रयसे यह भवसागर पार किया जाता है। जिसके लिये लोग प्रतिदिन चिन्ता कर रहे हों और जो दुराशाओंद्वारा दग्ध हो रहा हो, उस अपने आत्माकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; बल्कि आदरपूर्वक उसका उद्धार करना चाहिये। यह जीवात्मारूपी दंतार गजराज, जिसे बाँधनेके लिये अहंकार ही सुदृढ़ आलान है, तृष्णा ही लोहेकी साँकल है और मन ही जिसका मद है, जन्म-मरणके दलदलमें फँस गया है; अतः इसका उद्धार करना चाहिये।
जब मनुष्य विवेक-वैराग्यकी दृष्टिसे यों देखने लगता है कि यह देह काष्ठ और मिट्टीके ढेलेके समान है, तब उतनेसे ही उसे देवाधिदेव परमात्माका ज्ञान हो जाता है। पहले जब अहंकाररूपी मेघ नष्ट हो जाते हैं, तब यथार्थ आत्मज्ञानरूप सूर्य दिखायी पड़ता है। तदनन्तर उसके परिणामस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती है। जैसे अन्धकारका पूर्णतया विनाश हो जानेपर प्रकाशका अनुभव स्वतः होने लगता है, उसी तरह अहंकारका समूल नाश हो जानेपर परमात्माका अपने-आप ज्ञान हो जाता है। इस प्रकार अहंकारके विनष्ट हो जानेपर जो परम आनन्द और परम शान्तिमय अवस्था होती है, वह परिपूर्णावस्था है। पूर्ण समुद्रकी भाँति वह असीम होती है। न तो वह हमलोगोंके मन आदि इन्द्रियोंका विषय है, न उसकी किसी उपमानके साथ तुलना ही की जा सकती है और न वह विनाशशील विषयोंके पीछे ही दौड़ती है; अतः उसका तीव्र प्रयत्नसे निरन्तर सेवन करना चाहिये। श्रीराम ! मन और अहंकारका विनाश हो जानेपर समस्त पदार्थोंके अंदर विद्यमान रहनेवाली जिस निरतिशयानन्दात्मक परमात्मस्वरूपसत्ताका आविर्भाव होता है, वह स्वयं समाधिसिद्ध तथा वाणीके अगोचर है। उसका तो केवल हृदयमें ही अनुभव होता है। जैसे अनुभूतिके बिना खाँडकी मिठासका अनुभव नहीं होता, उसी तरह अनुभवके बिना परमात्माके स्वरूपका भी ज्ञान नहीं होता।
राजीवनयन राम ! 'यह मेरा है, यह मैं हूँ' इस प्रकारके अभिमानको त्यागकर मनसे ही विवेकपूर्वक विचारद्वारा संकल्पात्मक मनका छेदन करके यदि परमात्माका साक्षात्कार न किया जाय तो चित्रलिखित सूर्यके सदृश मिथ्या होते हुए भी इस जगत्-दुःखका कभी नाश नहीं होता, प्रत्युत महासागरकी तरह विस्तारवाली एवं दुःखदायिनी संसाररूपी विपत्ति अनन्त हो जाती है। इस विषयमें सह्य पर्वतके शिखरपर रहनेवाले भास और विलास नामक दो मित्रोंके संवादरूपमें निम्नलिखित प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। वह सह्य पर्वत नाना प्रकारके पुष्पोंसे आच्छादित तथा निर्मल जलसे पूर्ण बहुसंख्यक झरनोंसे सुशोभित है। उसके ऊपरी भागमें देवता निवास करते हैं, तलहटीमें मनुष्योंने अपना आवासस्थान बना रखा है और पृथ्वीके अंदरका हिस्सा नागोंसे भरा रहता है। उसकी कन्दराओंमें सिद्धोंका निवासस्थान है। भीतरी भागमें नाना प्रकारकी खानें हैं। उसके शिखरोंपर उगे हुए चन्दन-वृक्षोंपर सर्प लिपटे
उपशम-प्रकरण ] * भास और विलासकी परस्पर बातचीत * ३२१
रहते हैं और चोटियोंपर सिंह दहाड़ते रहते हैं । उसी सह्य पर्वतके उत्तर-तटवर्ती शिखरपर, जहाँ फलोंके भारसे झुके हुए वृक्ष सुशोभित हैं, महर्षि अत्रिका अत्यन्त शोभाशाली विशाल आश्रम है । वह आश्रम सिद्धोंके श्रमका अपहरण करनेवाला, ब्रह्मलोकके समान उत्कृष्ट, स्वर्ग-तुल्य रमणीय और शिवजीके नगर कैलासके समान शोभासम्पन्न है । उसी विशाल आश्रममें शुक्र और बृहस्पति नामके दो तपस्वी रहते थे, जो आकाशमार्गमें विचरण करनेवाले शुक्र और बृहस्पतिके समान शास्त्रोंके ज्ञाता थे । कुछ समय बाद एक ही स्थानमें रहनेवाले उन दोनों तपस्वियोंके पवित्र शरीरवाले दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम थे—विलास और भास । वे दोनों बालक उस आश्रममें पिताओंद्वारा लगाये हुए लता-वृक्षोंके लंबे-लंबे पल्लवोंकी तरह क्रमशः बढ़ने लगे । वे दोनों मित्र थे। उनके मनमें एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त स्नेह था, जिससे वे परस्पर प्रेम रखते थे और एक-दूसरेसे मिल-जुलकर रहते थे । उन दोनोंका मन समान होनेके कारण ऐसा प्रतीत होता था मानो एक ही मनने दो भागोंमें विभक्त होकर दो शरीर धारण कर लिये हैं । इस तरह वहाँ रहते हुए उन दोनोंने थोड़े ही समयमें बचपनको लाँघकर युवावस्थामें प्रवेश किया । तदनन्तर जैसे दो पक्षी अपने-अपने घोंसलेसे उड़कर अन्यत्र चले जायँ, उसी तरह उनके वे दोनों पिता (शुक्र और बृहस्पति) बुढ़ापेसे दुखी हो शरीरका परित्याग करके स्वर्गको चले गये । पिताओंकी मृत्यु हो जानेपर उन दोनोंका मुख जलसे निकाले गये कमलकी तरह दीन हो गया, शरीर संतप्त हो गया और उत्साह जाता रहा । वे व्यथासे अभिभूत हो गये । तदनन्तर वे पिताओंकी और्ध्वदेहिक क्रिया सम्पन्न करके पितृशोकजनित करुणापूर्ण आर्त वाणीसे विलाप करने लगे ।
( सर्ग ६४-६५ )
भास और विलासकी परस्पर बातचीत और तत्त्वज्ञानद्वारा उन्हें मोक्षकी प्राप्ति; देह और आत्माका सम्बन्ध नहीं है तथा आसक्ति ही बन्धनका हेतु है—इसका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार वे दोनों सुदृढ तपस्वी भास और विलास पिताके मृत्यु-जनित शोकसे पराभूत होकर स्थित थे । उस शोकजनित संतापसे उनके शरीर सूखकर काँटा हो गये थे और ऐसे लगते थे, जैसे ग्रीष्म ऋतुके प्रचण्ड तापसे आमूल-चूल सूखे हुए दो जंगली वृक्ष हों । उन्हें सांसारिक पदार्थोंसे परम वैराग्य हो गया था, अतः वे दोनों ब्राह्मण झुंडसे बिछुड़े हुए दो मृगोंकी भाँति वियुक्त होकर उस जंगलमें कालक्षेप करने लगे । इस प्रकार क्रमशः उनके दिन मास और वर्ष बीतते गये । अन्ततोगत्वा उन्हें बुढ़ापेने घेर लिया; परंतु उन्हें विशुद्ध ज्ञानकी प्राप्ति न हुई चिरकालके पश्चात् एक समय प्रारब्धवश उन दोनों
३२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
बिछुड़े हुए वृद्ध तापसोंकी परस्पर भेंट हो गयी, तब वे परस्पर यों कहने लगे ।
विलासने कहा—मित्रवर भास ! इस जगत्में तुम्हीं मेरे परम प्रेमी बन्धु, मेरे जीवनरूपी उत्तम वृक्षके फल और सदा-सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करनेवाले अमृतके सागर हो; तुम्हारा स्वागत है । सज्जनशिरोमणे ! पहले यह तो बताओ, मुझसे अलग होकर तुमने इतने दिन कहाँ व्यतीत किये ? तुम्हारी तपस्या तो सफल हुई है न ? क्या तुम्हारी बुद्धि संसारविषयक संतापसे रहित हो गयी ? तुम्हारी विद्या फलवती हो गयी है न ? क्या तुमने परमात्माको प्राप्त कर लिया ? तुम सकुशल तो हो न ?
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तब जिसे परमात्म-विषयक यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई थी तथा जो संसारसे पूर्णतया उद्विग्न हो गये थे, उन अपने मित्र विलासके यों कहनेपर परम हितैषी भासने उनसे आदर-पूर्वक कहना आरम्भ किया ।
भास बोले—दूसरोंको मान देनेवाले साधो ! स्वागतता तो आज ही चरितार्थ हुई है; क्योंकि सौभाग्यवश मुझे तुम्हारा दर्शन प्राप्त हो गया । किंतु मित्रवर ! इस दुःखमय संसारमें चक्कर काटनेवाले हम लोगोंकी कुशल कहाँ ? भला, जबतक मुझे जानने योग्य परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, मेरे मनमें उत्पन्न होनेवाले संकल्प आदि नष्ट नहीं हुए और मैंने संसारसागरको पार नहीं कर लिया, तबतक मेरी कुशल कहाँ । जबतक चित्तमें उत्पन्न होनेवाली आशाएँ तीव्र वैराग्यरूप शस्त्रके द्वारा पूर्णतया काटी नहीं गयीं, तबतक हमलोगोंकी कुशल कहाँ ? जबतक परमात्माका यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ और जबतक समता उद्भूत नहीं हुई तथा जबतक विवेक नहीं उत्पन्न हुआ, तबतक हमलोगोंकी कुशल कहाँ । सज्जनशिरोमणे ! परमात्माकी प्राप्ति तथा ज्ञान-रूपी महौषधके बिना यह जन्म-मरणरूपी दुष्ट महामारी बारंबार प्राप्त होती ही रहती है । यह जीवात्मा लौकिक क्रियाओंमें तथा देहरूपी पर्वतकी उन अत्यन्त भीषण कन्दराओंमें, जो विषयोपभोगरूप भयंकर सर्पोंसे व्याप्त एवं तृणारूपी कण्टकोंसे आच्छादित हैं, सदा-सर्वदा लोटता रहता है । यों कुत्सित आशाओंके आवेशसे युक्त व्यर्थ क्रियाकलापोंके करते रहनेसे इसकी आयु वृथा ही नष्ट हो जाती है । यह मन एक मदमत्त गजराजके समान है, जिसने परमात्मामें बन्धनके हेतुभूत विवेकरूपी आलानको उखाड़ डाला है और जो तृष्णारूपिणी हथिनिमें कामासक्त होनेके कारण उद्विग्न हो उठा है, अतः वह जगत्में दूरसे दूर भटकता रहता है । जैसे राजहंस सूखे हुए सरोवरसे तत्क्षण ही भाग खड़ा होता है और फिर कभी उसकी ओर ताकता तक नहीं, उसी तरह जिसका यौवनरूपी जल नष्ट हो गया है, उस सूखते हुए शरीररूपी सरोवरसे आयु तत्काल पलायन कर जाती है, पुनः वह कभी लौटती ही नहीं । जब
उपशम-प्रकरण ] * भास और विलासकी परस्पर बातचीत * ३२३
यह जीवन-वृक्ष जर्जर हो जाता है और कालरूपी वायु उसे बलपूर्वक झकझोरता है, तब उसके भोगरूपी पुष्प और दिनरूपी पत्ते झड़कर नीचे गिर जाते हैं अर्थात् नष्ट हो जाते हैं। परंतु नाना प्रकारके अनुरागोंसे लिपटी हुई यह तुच्छ चञ्चल तृष्णा देवालयोंके ऊपर फहराती हुई पताकाकी भाँति अधिकाधिक बढ़ती रहती है। बन्धुसमूहरूपी ये असंख्य सरिताएँ गम्भीर कोटर-वाले विस्तृत काल-सागरमें निरन्तर गिरती रहती हैं। तात ! यह देहरूपी रत्नशलाका विनाशरूपी कीचड़-से परिपूर्ण सागरके गर्भमें न जाने कहाँ समा गयी है कि जन्म-जन्मान्तरमें भी इसका पता नहीं चलता। चिरकालसे चिन्ताचक्रमें बँधा हुआ तथा पाप कर्मोंके आचरणमें संलग्न चित्त समुद्रके गम्भीर आवर्तमें पड़कर चक्कर काटते हुए तृणकी भाँति संसारमें भटकता रहता है। इसे कार्यरूपी असंख्यों विशाल तरङ्ग उछालती रहती हैं तथा चिन्ताके फेरमें पड़कर यह ताण्डव नृत्य करता रहता है, जिससे इसे क्षणभर भी विश्राम नहीं मिलता। 'मैंने इसे कर लिया, यह करता हूँ और आगे उसे करूँगा' इस प्रकारकी कल्पनाओंके जालमें फँसकर इस मनुष्यकी बुद्धिरूपी पक्षिणी अत्यन्त मोहित हो जाती है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! उन दोनोंने परस्पर एक-दूसरेका कुशल-समाचार पूछा। तदनन्तर काल-क्रमसे विवेकपूर्वक ध्यानके अभ्यास और संसारसे वैराग्यके द्वारा परमात्माका विशुद्ध ज्ञान लाभ करके वे दोनों मोक्षको प्राप्त हो गये। महाबाहो ! इसीलिये मैं कहता हूँ कि सांसारिक पाशसे जकडे हुए चित्तको संसार-सागरसे पार होनेके लिये परमात्माके यथार्थ ज्ञान-के अतिरिक्त और कोई दूसरा सुगम उपाय नहीं है। यह उपर्युक्त दुःख यद्यपि अज्ञानीके लिये अनन्त है तथापि ज्ञानी पुरुषके लिये वह अत्यन्त साधारण है—ठीक उसी तरह, जैसे सागर तुच्छ पक्षीके लिये दुस्तर होते हुए भी गरुड़के लिये गौकी खुरीके जलके समान ही प्रतीत होता है। जैसे दर्शक पुरुष दूरसे ही जनसमूह-का अवलोकन करता है, किंतु उसके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता, उसी तरह जो देहाभिमानसे रहित तथा विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें एकी-भावसे स्थित हैं, वे ज्ञानी महात्मा पुरुष साक्षीभूत होकर दूरसे ही शरीरको देखते रहते हैं। इसलिये भले ही देह दु खसे भलीभाँति क्षुब्ध हो जाय, उससे आत्माको कौन-सी क्षति पहुँचती है ? शोभाशाली राम ! भला हिमालय पर्वत और समुद्रका क्या सम्बन्ध ! उसी तरह आत्मा और संसाररूप बन्धनका भी वास्तवमें परस्पर क्या सम्बन्ध है? अर्थात् कुछ नहीं है। जैसे सरिताओंका जल कमलोंको अपनी गोदमें धारण किये रहता है, फिर भी वे कमल उस जलसे कोई सम्बन्ध न रखकर निर्लेप बने रहते हैं, उसी तरह इस जगत्में शरीरका भी आत्माके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। ये सुख-दुःख आदिके अनुभव केवल शुद्ध चेतन आत्मा और केवल जड देह-को नहीं होते, किंतु देह और आत्माके तादात्म्यके कारण होते हैं। अतः जब यथार्थ ज्ञानके द्वारा अज्ञानका नाश हो जाता है, तब सुख-दुःखोंका अत्यन्ताभाव होकर केवल शुद्ध चेतन आत्मा ही शेष रह जाता है। अज्ञानी पुरुष जिस रूपमें इस संसारको देखता है, वह उसी रूपमें उसे सत्य मान लेता है; परंतु ज्ञानीके लिये वैसी बात नहीं है। वह उसी रूपमें संसारको सत्य नहीं मानता; क्योंकि वह समझता है कि यह संसार अज्ञानसे ही प्रतीत होता है।
जैसे वास्तवमें सम्बन्ध न होनेपर भी स्वप्नमें स्त्रीके साथ रति-क्रीडा आदि व्यापारमें सम्बन्ध-सा हो जाता है तथा जैसे वास्तविक प्रेत न होनेपर भी अँधेरेमें ठूंठ प्रेत-सा दीखने लग जाता है, उसी तरह यद्यपि वास्तव-में आत्माके साथ देहादिका सम्बन्ध नहीं है, फिर भी अज्ञानके कारण सम्बन्ध-सा दीखता है। वस्तुतः तो
३२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शरीर और शुद्ध आत्माका सम्बन्ध मिथ्या ही है; क्योंकि इनका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। विद्वानोंका कथन है कि देहमें अहम्भावना करनेसे ही आत्मा दैहिक दुःखोंके वशीभूत होता है तथा उस देहभावनाका त्याग कर देनेसे वह उस दुःखजालसे मुक्त हो जाता है। वत्स राम! जैसे सरोवरमें गिरे हुए पत्ते, जल, मल और काष्ठ यद्यपि परस्पर सम्बद्ध रहते हैं, तथापि भीतरी सङ्गसे रहित होनेके कारण वे दुखी नहीं होते, उसी तरह यद्यपि आत्मा, देह, इन्द्रिय और मन परस्पर पूर्णतया सम्बद्ध हैं, तथापि अन्तःकरणमें अहंता, ममता और आसक्तिका अभाव होनेके कारण ज्ञानी महात्मा सदा-सर्वदा दुःखरहित ही रहते हैं। श्रीराम ! अन्तःसङ्ग अर्थात् अहंता, ममता और आसक्ति ही संसारमें समस्त प्राणियोंके जरा, मरण और मोहरूपी वृक्षोंका मूल कारण है। जो जीव अहंता, ममता और आसक्तिसे युक्त है, वह भवसागरमें डूबा हुआ है; परंतु जो इनसे मुक्त हो गया है, वह समझ ले कि मैं संसार-सागरसे पार हो गया। जो चित्त विषयोंकी आसक्तिसे रहित और निर्मल है, वह संसारी होते हुए भी निस्संदेह मुक्त है; परंतु विषयासक्त चित्त दीर्घकालकी तपस्यासे युक्त होता हुआ भी कामनाके कारण सुदृढ़ बन्धनसे बँधा हुआ है। जैसे काष्ठभारोंको पार उतारनेवाली जलस्थित नौका जलके गुण-दोषसे लिपायमान नहीं होती वैसे ही अहंता, ममता और आसक्तिसे रहित पुरुष शरीर यात्राके लिये न्याययुक्त कर्म करता हुआ भी कर्तृत्वसे लिप्त नहीं होता। जो मनुष्य अहंता, ममता और आसक्तिसे रहित तथा परम मधुर परमात्मामें नित्य स्थित है, वह बाहरसे कुछ भी कार्य करे अथवा न करे, किसी भी दशामें वह कर्ता अथवा भोक्ता नहीं है।
(सर्ग ६६-६७)
संसक्ति और असंसक्तिका लक्षण, आसक्तिके भेद, उनके लक्षण और फलका वर्णन; आसक्तिके त्यागसे जीवात्मा कर्मफलसे सम्बद्ध नहीं होता—इसका कथन
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! किस प्रकारका सङ्ग मनुष्योंके लिये मोक्षदायक कहा गया है और कैसा सङ्ग बन्धनका हेतु होता है एवं उसके बन्धनका निमित्त बननेमें कारण क्या है तथा बन्धनके हेतुभूत उस सङ्गकी निवृत्ति कैसे की जा सकती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! शरीर—क्षेत्र और शरीरी—क्षेत्रज्ञ आत्माका जो विभाग है अर्थात् शरीर जड है और आत्मा चेतन है—ऐसा जो अनुभव है, उसके अभावमें केवल देह ही आत्मा है, ऐसी भावनासे उत्पन्न देहाभिमान ही सङ्ग है और वही बन्धनका हेतु कहा जाता है। तथा देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न होनेके कारण आत्माका स्वरूप अनन्त है; किंतु अज्ञान-वश उसमें परिच्छिन्नताका निश्चय हो जानेपर जीव अपने अंदर जो सुखकी चाह करने लगता है, वही सङ्ग है और वही बन्धनका कारण कहा जाता है। यह दृश्यमान सम्पूर्ण संसार परमात्माका संकल्प होनेके कारण परमात्माका स्वरूप है, तब फिर मैं उसमेंसे किसकी चाह करूँ और किसको त्याग दूँ—इस प्रकारकी धारणासे उत्पन्न होनेवाली जो जीवन्मुक्तकी अवस्था है, उसे तुम असङ्ग स्थिति समझो। न तो मैं ही हूँ और न दूसरा ही कुछ है; अतः विषयोंसे उत्पन्न सुख हों अथवा न हों—ऐसा निश्चय करके जिसका अन्तःकरण अहंता, ममता और आसक्तिसे रहित हो गया है, वह मनुष्य मुक्तिका अधिकारी कहलाता है। जो निष्कर्मभावकी प्रशंसा नहीं करता, किसी भी कर्ममें आसक्त नहीं होता, सबमें समभाव रखता है और कर्मफलोंकी इच्छासे रहित है, वही पुरुष असंसक्त कहा जाता है। केवल परमात्माके स्वरूपमें अटल स्थितिवाले जिस महात्माका
उपशम-प्रकरण ] * संसक्ति और असंसक्तिका लक्षण, आसक्तिके भेद, उनके लक्षण और फल * ३२५
मन हर्ष, शोक और ईर्ष्याके वशीभूत नहीं होता, वही असक्त है और उसीकी 'जीवन्मुक्त' संज्ञा होती है। जो मनुष्य सम्पूर्ण कर्मों और उनके फल आदिका कर्मसे नहीं, अपितु केवल मनसे भलीभाँति त्याग कर देता है, वह असंसक्त कहलाता है।
रामजी ! वृक्ष एक स्थानपर स्थित रहकर अपने स्थावर शरीरसे जो शीत, वात और घामके क्लेशोंको सहता रहता है, वह उसके पूर्व जन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। पृथ्वीकी दरारमें पड़ा हुआ कीड़ा अङ्गोके पीड़ित होनेके कारण विकल होकर जो कालक्षेप करता है, वह उसके पूर्वजन्मके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। जिसका पेट भूखके कारण दुर्बल होकर पीठसे सट गया है तथा बूंदके आघातके भयसे सदा भीत बनी रहती है, ऐसा पक्षी जो वृक्षकी शाखाओंपर निवास करता हुआ कालयापन करता है, वह उसके पूर्वजन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। दूर्वाङ्कुरों और तिनकोंका आहार करनेवाला मृग किरातोंके बाणोंकी चोटसे पीडित होकर जो मर जाता है, वह उसके पूर्वजन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। ये असंख्य भूत-प्राणी जो नदीमें तरङ्गोंकी भाँति बारंबार उत्पन्न होकर पुनः विलीन हो रहे हैं, यह उनके पूर्वजन्मोंके अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका ही फल है। लता और तिनकोंके समान शक्तिहीन दशाको प्राप्त हुए मनुष्य चलने-फिरनेकी शक्तिसे शून्य होकर जो बारंबार मरते रहते हैं, उसका कारण उनके पूर्वजन्ममें अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये गये कर्मोंका फल ही है।
राघव ! यह आसक्ति दो प्रकारकी कही गयी है— एक वन्द्या अर्थात् प्रशस्त और दूसरी वन्ध्या अर्थात् पुरुषार्थफलसे शून्य। इनमें तत्त्वज्ञ महात्माओंकी अपने
सं० यो० व० अं० १२—
स्वरूपमें आसक्ति वन्द्या है और वन्ध्या आसक्ति सर्वत्र अज्ञानियोंकी है। जो आसक्ति आत्मतत्त्वके ज्ञानसे शून्य, देह आदि असत्य वस्तुओंसे उत्पन्न और बारंबार संसारमें सुदृढ़रूपसे स्थित है, वह वन्ध्या कही जाती है तथा जो आसक्ति आत्मतत्त्वके ज्ञानद्वारा यथार्थ विवेकसे उत्पन्न हुई है और पुनर्जन्मका कारण नहीं है, उसे लोग वन्द्या कहते हैं। यह वन्द्या आसक्तिका ही प्रभाव है, जो आत्मतत्त्वके विज्ञानमें कुशल सिद्धगण, लोकपाल तथा अन्यान्य मुक्त पुरुष इस जगत्के प्राङ्गणमें अध्यात्म-विषयकी प्रीतिसे युक्त होकर स्थित रहते हैं। अन्यान्य भुवनोंमें निवास करनेवाले अध्यात्मविषयकी प्रीतिसे युक्त तत्त्वज्ञ महात्मालोग जो जन्म-मरणसे रहित शरीररूपी यन्त्रसमूहोंको धारण करते हैं, वह भी वन्द्या आसक्तिकी ही सामर्थ्य है। किंतु वन्ध्या आसक्तिके वशीभूत होनेसे मन विषयभोगोंमें व्यर्थ ही रमणीयताकी कल्पना करके उनपर उसी प्रकार टूट पड़ता है, जैसे गीध मांसके टुकड़ोंपर झपटता है। वन्ध्या आसक्तिके प्रभावसे ब्रह्माण्डरूपी गूलरके फलके अंदर मच्छरकी तरह स्फुरित होते हुए देवता स्वर्गलोकमें, मनुष्य मृत्युलोकमें और नाग तथा असुर पातालमें स्थित हैं। ये असंख्य प्राणी जो नदीमें तरङ्गोंकी भाँति जन्मते हैं, मरते हैं, गिरते हैं और उठते हैं—यह भी वन्ध्या आसक्तिका ही चमत्कार है। यह भी वन्ध्या आसक्तिका ही प्रताप है, जो ये भूत-प्राणी झरनोंके जलकणोंकी तरह बारंबार उत्पन्न होकर पुनः विरसतापूर्वक नष्ट हो रहे हैं।
श्रीराम ! शून्य आकाशमें केवल मनकी आसक्तिरूपी रंगसे संकल्पपूर्वक जो यह जगद्रूपी चित्र बनाया गया है, वह कभी भी सत्य नहीं हो सकता। इस संसारमें आसक्तिपूर्ण मनसे व्यवहार करनेवाले मनुष्योंके शरीरोंको तृष्णा उसी प्रकार क्षीण करती रहती है, जैसे अग्निकी लपट तृणोंको भस्मसात् कर देती है। जैसे समुद्र-तटकी सिकताओं और
३२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
त्रसरेणु-समूहोंकी संख्या करना असम्भव है, उसी तरह जिसकी बुद्धि सर्वथा विषयोंमें आसक्त है, भला, उसके शरीरोंकी ठीक-ठीक गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ! अर्थात् कोई नहीं। राघव ! विषयासक्त चित्तवाला मनुष्य दुःखोंके कारण सूख जाता है, जिससे वह धधकती हुई नरकाग्नियोंके लिये इन्धन-समूहका काम देता है; क्योंकि वे नरकाग्नियाँ उस इन्धनसे ही जलती हैं। इस भूतलपर यह जो कुछ दुःखसमूह दृष्टिगोचर हो रहा है, उस सबकी कल्पना विषयासक्त चित्तवाले मनुष्योंके लिये ही हुई है। जैसे जलकी तरङ्गोंसे युक्त बड़ी-बड़ी नदियाँ किलोल करती हुई समुद्रकी ओर दौड़ी जाती हैं, उसी तरह सारी दुःख-परम्पराएँ विषयासक्त चित्तवाले मनुष्यको आ घेरती हैं। जो मन आसक्तिशून्य, सब ओरसे शान्त, आकाशके समान निर्मलरूपसे स्थित और असत्-सा प्रतीत होते हुए भी सद्रूपसे भासमान हो रहा है, वह साधकके लिये सुखका ही हेतु होता है।
रघुनन्दन ! कल्याणकामी विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह सर्वत्र स्थित रहते हुए, सबके साथ रहते हुए और सभी न्याययुक्त कर्मोंमें लगे हुए भी सदा-सर्वदा अपने मनको अनासक्त और सम बनाये रक्खे। उसे चेष्टाओंमें, किसी प्रकारकी चिन्ताओंमें, पदार्थोंमें, आकाशमें, नीचे पातालमें, ऊपर पृथ्वीमें, दसों दिशाओंमें, लताओंमें, बाहरके विशाल विषय-भोगोंमें, इन्द्रिय-वृत्तियोंमें, अन्तःकरणमें, प्राण, मूर्धा और तालुमें, भ्रूमध्यमें, नासिकाके अग्रभागमें, मुखमें, दक्षिण नेत्रकी कनीनिकामें, अन्धकारमें, प्रकाशमें, इस हृदय-रूपी आकाशमें, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओंमें, शुद्ध सत्त्वगुणमें, तमोगुणमें, रजोगुणमें, त्रिगुणमय पदार्थ-विशेषमें, चल-अंचल पदार्थोंमें, सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें, दूरमें, समीपमें, सामने, नाम-रूपात्मक किसी पदार्थमें अपने आत्मामें, शब्द-स्पर्श-रूप आदि विषयोंमें, अज्ञानजनित आनन्दकी वृत्तियोंमें, गमनागमनकी चेष्टाओंमें और घड़ी, दिन, मास, संवत्, युग आदि कालकी कल्पनाओंमें आसक्त नहीं करना चाहिये। सर्वत्र दृश्य पदार्थोंमें अनासक्त-सा होकर जड दृश्य जगत्के आश्रयभूत नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मामें विश्राम करके परमात्मामें ही अमृतमय रससे युक्त मनवाला होकर स्थित रहना चाहिये। इस प्रकार उस परमात्मामें स्थित हुआ जीवात्मा सम्पूर्ण आसक्तियोंसे रहित होकर ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। फिर तो वह इन समस्त व्यवहारोंको करे अथवा न करे; क्योंकि उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। जैसे आकाशका मेघोंके साथ कोई सम्पर्क नहीं रहता, उसी तरह अपने परमात्मस्वरूपमें रत हुआ जीवात्मा क्रियाओंको करता हुआ अथवा न करता हुआ भी क्रियाजनित फलोंके साथ तनिक भी सम्बद्ध नहीं होता। अथवा शान्त चैतन्य-घन जीवात्माको चाहिये कि वह पूर्वोक्त दृश्य संसारके सम्बन्धका भी परित्याग करके शान्त होकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहे। रामभद्र ! जिसने अपने स्वरूपमें परम विश्रामको प्राप्त कर लिया है, जिसका अन्तःकरण आत्मसाक्षात्कारसे सम्पन्न है और जिसकी कर्म तथा उसके फलोंमें तनिक भी आसक्ति नहीं रह गयी है, ऐसा जीवात्मा कर्म करते हुए भी आसक्तिसे रहित होनेके कारण कर्मजनित फलोंसे सम्बद्ध नहीं होता।
( सर्ग ६८-६९ )
उपशम-प्रकरण ] * असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें दुखी न होनेका प्रतिपादन * ३२७
असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें भी दुखी न होनेका प्रतिपादन, ज्ञानीकी तुर्यावस्था तथा देह और आत्माके अन्तरका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो संसारमें रागके अत्यन्त अभावसे उत्पन्न निर्विशेष आनन्दके अभ्यासमें संलग्न हैं और जिनके अन्तःकरण अत्यन्त विशाल हैं, वे जीवन्मुक्त महापुरुष चाहे व्यवहार करें, पर वे सदा-सर्वदा भय और शोकसे रहित होकर ही स्थित रहते हैं। जिसका अन्तःकरण दृश्य-चिन्तनसे रहित, केवल नित्य चेतन परमात्माका ही अवलम्बन करनेवाला तथा सम्पूर्ण चिन्ताज्वरोंसे मुक्त हैं, उस महात्मा पुरुषके सत्सङ्गसे मनुष्य वैसे ही विशुद्ध हो जाते हैं, जैसे निर्मलीसे जल शुद्ध हो जाता है। परमात्माके स्वरूपमें निमग्न रहनेवाला वह तत्त्ववेत्ता पुरुष क्रियाशील होते हुए भी अपने स्वरूपमें नित्य स्थित रहता है। जैसे चिकने स्फटिक मणिपर वास्तवमें किसी भी रंगसे रंग नहीं चढ़ता, वैसे ही परमात्मस्वरूपको प्राप्त तत्त्ववेत्ताका अन्तःकरण सुख-दुःखकी प्राप्ति होनेपर विकारवान् नहीं होता। जिसने सगुण-निर्गुणरूप परमात्माको भलीभाँति जान लिया है और जो परमात्मस्वरूप परम अभ्युदयको प्राप्त हो गया है, उस महात्मा पुरुषके चित्तको संसारका दृश्य उसी प्रकार लिपायमान नहीं कर सकता, जैसे जलरेखा कमलको लिपायमान नहीं कर सकती। जब यह जीवात्मा परमात्माका ज्ञान प्राप्तकर समस्त कल्पनाओंके हेतुभूत मलोंसे रहित हुआ ध्यानाभाव-दशामें भी परमात्माके स्वरूपानुभवमें निमग्न रहता है, तब वह 'स्वसक्त' (आत्माराम) कहलाता है। आत्माराम होनेसे ही मनुष्य संसारमें असङ्गभावको प्राप्त करता है; क्योंकि आत्माके ज्ञानसे ही विषयासक्तिका क्षय होता है। चित्तके विषय-सम्बन्धिनी वृत्तियोंसे रहित हो जानेपर क्षीणवृत्तिवाले अन्तःकरणोंकी जो वासनाओंसे रहित शान्तिमयी स्थिति है, वही जाग्रत्में सुषुप्तिके समान समाधि-अवस्था कही जाती है। इस प्रकार अखण्ड समाधि-अवस्थाको प्राप्त मनुष्य व्यवहार करता हुआ भी सुख-दुःखरूपी रस्सोंसे बँधकर संसारकी ओर कभी आकृष्ट नहीं होता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें संसार है ही नहीं। जो पुरुष जाग्रत्में ही परमात्मामें स्थित हुआ जगत्के कार्योंको करता है, उस पुरुषको यन्त्रकी पुतलीके समान सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता।
जो पूर्वसे ही यानी साधनावस्थासे ही तीव्र वैराग्यके कारण उपेक्षाबुद्धिसे कर्म करता है तथा जिसकी बुद्धि परमात्मामें ही स्थित है, वह मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और फिर वह उन कर्मोंके फलोंसे नहीं बँधता। विवेकशील साधकको कर्मोंका अनुष्ठान या परित्याग—कुछ भी अच्छा नहीं लगता। किंतु जिन्होंने आत्मतत्त्वको जान लिया है, वे महात्मा तो जिस समय जो कुछ प्राप्त हो जाता है, तदनुसार न्याययुक्त जीवन-यापन करते हुए स्थित रहते हैं। सांसारिक विषयोंके सम्बन्धसे रहित सच्चिदानन्दघन परमात्मपदमें भलीभाँति स्थित परमात्मप्राप्त पुरुष जो-जो कर्म करता है, उसमें वस्तुतः उसका कर्तापन नहीं रहता। श्रीराम ! यही अखण्ड समाधिरूप सुषुप्ति-स्थिति अभ्यासयोगसे जब दृढ़ हो जाती है, तब तत्त्वज्ञ महात्माओंके द्वारा वह तुर्य-स्थिति कही जाती है। जिसके अन्तःकरणसे समस्त विकार विनष्ट हो चुके हैं और जिसके मनका अत्यन्त अभाव-सा हो गया है, वह ज्ञानी महानुभाव विशुद्ध आनन्दमय हो जाता है। उपर्युक्त अखण्ड समाधिमें स्थित रहनेवाला ज्ञानी अतिशय प्रसन्नतासे परिपूर्ण और परम आनन्दमें निमग्न हुआ इस जगत्के व्यवहारको सदा लीलाकी ज्यों देखता रहता है। श्रीराम ! जिसके शोक, भय एवं सांसारिक क्लेश सदाके लिये निवृत्त हो गये हैं तथा जो संसाररूपी भ्रमसे रहित है, वह तुर्यावस्थामें सदा-सर्वदा स्थित आत्मज्ञानी फिर इस संसारचक्रमें कभी नहीं गिरता। जैसे आकाशमार्ग वायुओंके लिये गम्य है,
३२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ
वैसे ही दूरसे भी अति दूर परमपद विदेहमुक्त पुरुषोंके लिये अनुभवगम्य है । परमानन्दमें निमग्न ज्ञानी पूर्वोक्त सुषुप्तिके समान अखण्ड ब्रह्माकार समाधि अवस्थासे जगत्स्थितिका वास्तविक अनुभव करके उसके पश्चात् तुर्यावस्था ( जीवन्मुक्तावस्था ) को प्राप्त होता है । रघुकुलतिलक ! जिस प्रकार तुर्यातीत पदका ज्ञान रखनेवाले आत्मतत्त्व-ज्ञानी महात्मा तुर्यातीत पदमें स्थित रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित हो उस परमपदमें स्थित रहो । चाहे देह नष्ट हो जाय, चाहे वह नष्ट न हो यानी स्थिर रहे, उससे तुमको क्या प्रयोजन है ? तुम तो केवल आत्मज्ञानमें ही स्थित रहो । यह देह जैसा है, वैसा भले ही बना रहे । श्रीराम ! जैसे अन्धकार और मेघ-मण्डलसे मुक्त शरत्पूर्णिमाकी रात्रिका आकाशमण्डल सुशोभित होता है, वैसे ही तुम अभीष्ट और अनभीष्ट विषयोंसे मुक्त हुए शीतल साक्षात्काररूपी आलोककी शोभासे सुशोभित हो रहे हो ।
रघुनन्दन ! इस संसारमें देश, काल और वस्तुके परिच्छेदसे शून्य एक विशुद्ध चेतन आत्मा ही है, उसके सिवा अन्य कुछ नहीं है । सर्वत्र व्यापक चेतन 'आत्मा' यह नाम केवल व्यवहारके लिये ही कल्पित है, वास्तवमें नाम-रूप आदि भेद तो इस चेतनसे अत्यन्त दूर ही हैं अर्थात् यह चेतन आत्मा नाम-रूप आदि उपाधिसे रहित है । जैसे समुद्र जलस्वरूप ही है, उससे भिन्न तरङ्ग आदि कुछ भी नहीं हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न पृथ्वी-जल आदि कुछ भी नहीं हैं । जैसे छाया और धूपका तथा प्रकाश और अन्धकारका परस्पर सम्बन्ध नहीं हो सकता, वैसे ही शरीर और आत्माका भी परस्पर सम्बन्ध नहीं हो सकता । श्रीराम ! जैसे सदा परस्पर विरुद्ध रहनेवाले शीत और उष्णका एक दूसरेसे सम्बन्ध नहीं हो सकता, वैसे ही देह और आत्माका भी एक दूसरेसे कभी सम्बन्ध नहीं हो सकता । जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंसे प्रतीत हुआ जल किरणोंके यथार्थ ज्ञानसे विनष्ट हो जाता है; वैसे ही अज्ञानजनित यह देह और आत्माका परस्पर सम्बन्ध-भ्रम भी आत्म-तत्त्वके साक्षात्कारसे विनष्ट हो जाता है । वह चेतन आत्मा शुद्ध, अविनाशी, स्वप्रकाश एवं सम्पूर्ण विकारोंसे रहित है और देह विनाशशील, अनित्य और मलरूप विकारसे युक्त है; ऐसी स्थितिमें अत्यन्त अन्तर होनेके कारण आत्माका शरीरके साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है । प्राणवायुसे बलवान् होकर ही शरीर स्पन्दको प्राप्त करता है, इसलिये आत्माके साथ किंचित् भी शरीरका सम्बन्ध नहीं है । श्रेष्ठ बुद्धिसे सम्पन्न श्रीराम ! जब द्वैतको माननेपर भी आत्माके साथ पूर्वोक्त प्रणालीसे देहादिका सम्बन्ध नहीं हो सकता, तब द्वैतकी असिद्धिमें तो इस प्रकार सम्बन्धकी कल्पना ही कैसे हो सकती है । जैसे परस्पर अत्यन्त विरुद्ध प्रकाश और अन्धकारका एक दूसरेसे सम्बन्ध और सादृश्य नहीं हो सकता, वैसे ही परस्पर अत्यन्त विरुद्ध आत्मा और शरीरका भी एक दूसरेसे सम्बन्ध और सादृश्य नहीं हो सकता ।
जैसे शीत और उष्णकी एकता कहीं दिखलायी नहीं पड़ती, वैसे ही क्रमशः जड और चेतनस्वरूप देह और आत्माका भी संयोग नहीं हो सकता। यह देह प्राणवायुसे ही चलता है, उसीसे उसका गमनागमन होता है एवं देह-की नाड़ियोंमें संचार करनेवाले प्राणवायुसे ही शब्द होता है। जिस प्रकार छिद्रयुक्त बाँसोंसे वायुके गमनागमनसे शब्द उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार शरीरके कण्ठरूप छिद्रसे निकले हुए प्राणवायुसे जब कण्ठ, तालु आदि स्थानोंमें जिह्वा आदिके द्वारा अभिघातसे निकाले जाते हैं, तब कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग आदि शब्द प्रकट होते हैं—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है । शरीररूपी स्थानको छोड़कर जहाँ चित्तरूपी पक्षी अपनी वासनाके अनुसार जाता है, वहींपर विचार करनेपर आत्माका अनुभव होता है । जहाँ पुष्प रहता है, वहींपर जैसे गन्धका ज्ञान रहता है, उसी