संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्थिति-प्रकरण ] * शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारके त्यागसे मोक्षकी प्राप्ति * २२९
दीन, शुभ फलसे रहित जो धन, पुत्र आदि लौकिक वस्तुओंकी चिन्ता है, वह दीर्घकालतक बनी रहनेवाली प्रगाढ़ महानिद्रा ही है। उसे त्यागकर सचेत हो जाना चाहिये—विशुद्ध ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर लेना चाहिये। व्यवहारपरायण पुरुषोंके विचारसे लोकमर्यादाके अनुसार तथा शास्त्र और सदाचारके अनुकूल कर्म करके उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जिसका चरित्र सदाचारसे सुन्दर तथा बुद्धि विवेकशील है और संसारके सुख-फलरूपी दुःखद दशाओंमें जिसकी आसक्ति नहीं है, उस पुरुषके यश, गुण और आयु—ये तीनों ही वसन्त ऋतुकी लताओंके समान उत्तम फल देनेके लिये शोभाके साथ विकासको प्राप्त होते हैं। (सर्ग ३२)
शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहंकारकी बन्धकता और उसके त्यागसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! समस्त साधनोंका अधिक अभ्यास ही सफल होता है। इसलिये सर्वत्र और सदा साधन करनेसे सब प्रकारके फलोंकी प्राप्ति सम्भव है; क्योंकि इष्ट, मित्र, स्वजन एवं बन्धु-बान्धवोंको आनन्द देनेवाले नन्दीने तालाबके किनारे आराधना करके भगवान् शिवको पाकर मृत्युपर भी विजय पा ली। दानव-सेना और धन-धान्यसे सम्पन्न बलि आदि दानवों-द्वारा देवता उसी तरह कुचल दिये गये, जैसे हाथियोंके द्वारा कमलोंसे भरे हुए सरोवर मथ डाले जाते हैं; किंतु फिर अतिशय प्रयत्न करनेके कारण देवताओंने सबसे उत्कृष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया। राजा मरुत्तके यज्ञमें महर्षि संवर्तने ब्रह्माजीकी तरह देवताओं और असुरों-सहित दूसरी सृष्टि ही रच डाली थी। (अतिशय साधन और प्रयत्नसे ही उन्हें ऐसी शक्ति प्राप्त हुई थी।) शास्त्रीय विधिसे महान् साधनोंके अनुष्ठानमें अत्यन्त संलग्न रहनेवाले विश्वामित्रने बारं बार की गयी कठोर तपस्या-द्वारा दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। राजकुमारी सावित्री अपने पति-प्रेमरूप पातिव्रत्य धर्मके प्रभावसे यमराजको जीतकर उत्तम वाणीका प्रयोग करके संतुष्ट किये हुए यम देवताकी अनुमतिसे अपने पति सत्यवान्को लौटा लायी। संसारमें ऐसा कोई शास्त्रीय शुभ कर्मका अतिशय अनुष्ठान नहीं है, जिसका फल स्पष्टरूपसे प्राप्त न होता हो। अपने मनमें ऐसा विचार करके कल्याणकामी पुरुषोंको सर्वोत्कृष्ट प्रयत्नसे सुशोभित होना चाहिये। सम्पूर्ण सुख-दुःख आदि अवस्थाओंकी भ्रम-दृष्टियोंका मूलोच्छेद करनेवाला परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही है। अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये साधनका अतिशय अभ्यास करना चाहिये। संसार-सागरको पार करनेके लिये सत्पुरुषोंके सङ्ग और सेवाके बिना तप, तीर्थ तथा शास्त्राभ्यास आदि कोई भी साधन सफल नहीं होते। जिसके सेवनसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हों और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
जबतक अन्तःकरणके आकाशमें चैतन्यरूपी चाँदनी अहंकाररूपी मेघमालासे आच्छादित है, तब-तक वह परमार्थरूपिणी कुमुदिनीको विकसित नहीं कर सकती। जबतक हृदयाकाशमें अहम्भावका बादल उमड़-घुमड़कर बढ़ता जाता है, तभीतक तृणारूपी कुटज-कुसुमकी मञ्जरी विकासको प्राप्त होती है। वह मिथ्याकल्पित अहंकार दूषित अन्तःकरणमें अनन्त संसार-बन्धनमें डालनेवाले मोहको जन्म देता है। 'यह देह मैं हूँ' इस प्रबल मोहसे बढ़कर अनर्थकारी दूसरा अज्ञान इस संसारमें न कभी हुआ है और न होगा ही। इस संसारमें यह जो कुछ भी सुख-दुःखरूपी विकार आता है, उसके रूपमें अहंकार-चक्रका ही
२३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मुख्य विकार बढ़ रहा है। जिस पुरुषने अज्ञानसे आरोपित अहंकाररूपी वृक्षके अङ्कुरको विवेकपूर्वक विचारसे संस्कृत मनरूपी हलके द्वारा जोतकर उखाड़ फेंका है, उसके आत्मारूपी खेतमें संसार-तापका नाशक एवं सहस्रों शाखाओंसे युक्त अच्छेद्यज्ञानरूपी वृक्ष बढ़ता और फलता है। जिस नराधमको अहंकाररूपी पिशाचने पकड़ लिया है, उसके उस पिशाचको मार भगानेके लिये विवेकके बिना न कोई शास्त्र समर्थ हैं न मन्त्र।
श्रीरामजीने पूछा--भगवन् ! ब्रह्मन् ! कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे अहंकार नहीं बढ़ता ? आप संसाररूपी भयकी शान्तिके लिये वह उपाय मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा--रघुनन्दन ! आत्मा चैतन्यमय दर्पणके समान शुद्ध है। उसमें उसके पूर्वोक्त शुद्ध स्वरूपका निरन्तर स्मरण करनेसे अहंकार नहीं बढ़ता। यह जगत् झूठे इन्द्रजालकी शोभाके समान है। इसमें अनुराग या वैराग्यसे मेरा क्या प्रयोजन है--ऐसा मनमें विचार करते रहनेसे अहंकार उत्पन्न ही नहीं होता। श्रीराम ! इस त्रिलोकीमें तीन प्रकारके अहंकार होते हैं। उनमें दो प्रकारके अहंकार तो श्रेष्ठ हैं, किंतु तीसरा त्याज्य है। मैं उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ! मैं ही यह सम्पूर्ण विश्व हूँ। मैं ही अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हूँ। मेरे सिवा दूसरा कुछ नहीं है--इस तरहका जो अहंकार है, उसे उत्तम समझना चाहिये। यह अहंकार जीवन्मुक्त पुरुषकी मोक्ष-प्राप्तिके लिये है। यह बन्धनमें डालनेवाला नहीं होता। 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े करनेपर जो सौवाँ हिस्सा होता है, उसीके समान मुझ जीवात्माका सूक्ष्म स्वरूप है अर्थात् मैं अवयवसे रहित हूँ, अतएव सबसे भिन्न हूँ।' इस प्रकारका जो अनुभव है, वही दूसरा शुभ अहंकार है। वह भी साधकके मोक्षके लिये ही है, बन्धनके लिये नहीं। उपर्युक्त अहंकारके नामसे केवल कल्पना होती है। वास्तवमें वह नहीं है। यह हाथ-पैर आदिसे युक्त शरीर ही मैं हूँ, इस प्रकारका जो मिथ्या अभिमान है, वही तीसरा अहंकार है। वह लौकिक एवं तुच्छ ही है। उस दुष्ट अहंकारको त्याग देना ही चाहिये; क्योंकि वह सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। पहले बताये गये जो दो अहंकार हैं, उनको स्वीकार करके 'मैं देह नहीं हूँ' ऐसा विचारसे भी निश्चय कर लेनेके पश्चात् उन दोनोंको भी अन्तिम तीसरे अहंकारकी भाँति ही लौकिक समझकर त्याग देना उचित है--ऐसा प्राचीन महापुरुषोंका मत है। प्रथम दो अहंकार अलौकिक हैं। उन दोनोंको अङ्गीकार करके तीसरे लौकिक अहंकारका, जो दुःख देनेवाला है, त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि यह तीसरा अहंकार सर्वथा त्यागने ही योग्य है। इस दुःखदायी अहंकारको त्यागकर पुरुष जैसे-जैसे ज्ञानमें स्थित होता जाता है, वैसे-ही-वैसे वह परमात्मभावकी ओर बढ़ता जाता है। निष्पाप रघुनन्दन ! यदि पुरुष पूर्वोक्त दो अहंकारोंकी भावना करता रहे तो उसे परमपद प्राप्त हो जाता है; और यदि उनका भी त्याग करके सम्पूर्ण अहंकारोंसे रहित हो जाय तो वह अत्यन्त उच्च पद (परमात्मभाव)-में शीघ्र ही आरूढ़ हो जाता है। महामते ! जिस जीवका अहंकार शान्त हो गया है, उसे भोग रोगके समान जान पड़ते हैं। जैसे अच्छी तरहसे तृप्त हुए पुरुषको विषमिश्रित रस स्वादिष्ट नहीं प्रतीत होते, उसी प्रकार उसे भोग अच्छे नहीं लगते। रघुनन्दन ! अहंकारकी स्मृतिका भी सर्वथा त्याग करके अतिशय पुरुषार्थरूप प्रयत्नके द्वारा भवसागरको पार किया जाता है। पहले 'सब मैं ही हूँ और ये सब मेरे हैं' ऐसा समझकर फिर 'यह देह आदि मैं नहीं हूँ और इस देहके सम्बन्धी भी मेरे कुछ नहीं हैं' ऐसा विचार करके उससे सब प्रतिबन्धकोंका नाश होनेसे प्रतिष्ठाको प्राप्त हुए स्तुत्य आत्मज्ञानको अपने हृदयमें उतारकर महात्मा पुरुष परम पदको प्राप्त कर लेता है।
( सर्ग ३३ )
स्थिति-प्रकरण ] * मनोनियग्रहके उपाय—भोगेच्छा-त्याग, सत्सङ्ग और आत्मबोधके महत्त्वका वर्णन * २३१
मनोनिग्रहके उपाय—भोगेच्छा-त्याग, सत्सङ्ग, विवेक और आत्मबोधके महत्त्वका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिन्होंने अविद्याके घनीभूत विलासोंसे विषयोंकी ओर उन्मुख हुए अपने मनको जीत लिया है, उन महाशूर श्रेष्ठ पुरुषोंकी ही सदा विजय होती है। सब प्रकारके उपद्रवोंको प्राप्त करानेवाले इस संसारके दुःखको निवारण करनेका एकमात्र उपाय यही है कि अपने मनको वशमें किया जाय। ज्ञानका जो सारभूत सर्वस्व है, उसे बताता हूँ; उसे सुनकर हृदयमें धारण करना चाहिये। भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है। जैसे जहाँ काँटोंके बीज बिखेर दिये गये हैं, वह भूमि काँटोंके समुदायको ही उत्पन्न करती है, उसी प्रकार वासनासे आवृत्त हुई बुद्धि केवल दोषोंको ही जन्म देती है। जिसमें वासना-समूहका कोई लगाव नहीं है, अतएव जहाँ राग और द्वेष नहीं देखे गये हैं, वह चाञ्चल्यरहित बुद्धि धीरे-धीरे परम शान्तिको प्राप्त हो जाती है। जैसे जहाँ उत्तम बीज बोया गया है, वह भूमि समयपर श्रेष्ठ फल देनेवाले पौधोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार शुभ बुद्धि दोषरहित, शुभ एवं उत्तम गुणोंको ही सदा प्रकट करती है। जब शुभ भावोंके अनुसंधानसे मन प्रसन्न (शुद्ध) हो जाता है और धीरे-धीरे मिथ्याज्ञानरूपी घने मेघ शान्त हो जाते हैं, सुजनतारूपी चन्द्रमा जब शुक्लपक्षकी भाँति उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होने लगता है और आकाशमें सूर्यके तेजकी भाँति पुण्यमय विवेकका प्रसार हो जाता है, अन्तःकरणरूपी बाँसके भीतर धैर्यरूपी मोतीकी वृद्धि होने लगती है, वसन्त ऋतुमें चटकीली चाँदनीके प्रसारसे चरितार्थ होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति जब अन्तःकरणकी स्थिति आत्मज्ञानजनित परमानन्दकी प्राप्तिसे सर्वथा सफल हो जाती है, शीतल छायावाले सत्सङ्गरूपी फलवान् वृक्ष जब फलने लगते हैं तथा ध्यान-समाधिरूप सरल वृक्ष जब आनन्दमय सुन्दर रस टपकाने लगता है, उस समय मन निर्द्वन्द्व, निष्काम और उपद्रवशून्य हो जाता है। उसके चपलताकूपी अनर्थ तथा शोक, मोह और भयरूपी रोग शान्त हो जाते हैं। शास्त्रोंके अर्थके विषयमें उसका सारा संदेह दूर हो जाता है। उसमें सभी सांसारिक पदार्थोंको देखनेकी उत्कण्ठाका अभाव हो जाता है। उसकी कल्पनाओंके जाल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। वह मोहरहित एवं वासनाशून्य हो जाता है। उसमें आकाङ्क्षा, उपाक्रोश (परनिन्दा), अपेक्षा और दुश्चिन्ताका अभाव हो जाता है। वह शोकरूपी कुहरेसे रहित और आसक्तिशून्य होता है तथा उसके हृदयकी अज्ञानकी गाँठें खुल जाती हैं।
विशुद्ध आत्मा न तो संसारी पुरुष है, न शरीर है और न रुधिर ही है; शरीर आदि सब जड़ हैं, किंतु शरीरी (आत्मा) आकाशके समान निर्लेप है। जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही बन्धनके लिये रेशमी तन्तुओंका जाल रच लेता है, उसी प्रकार जीवात्मा मनमें विकल्प-वासनाओंका प्रसार करके अपने बन्धनके लिये सुदृढ़ जगत्रूप जालकी रचना कर लेता है। जीवात्मा इस वर्तमान देहभ्रमका त्याग करके फिर दूसरे देश और दूसरे कालमें अन्यदेहभावको धारण करता है; जीवात्माके मनमें जैसी वासना होती है, वैसा ही शरीर उत्पन्न होता है। जीवात्माका चित्त जैसी वासना लेकर सोता है, रातको स्वप्नमें वैसा ही बनकर रहता है। इमलीका बीज यदि शहदके रससे सींचा जाय तो अङ्कुर आदिके क्रमसे वृक्ष बनकर फलनेके समय भी वह उस मधुसे अनुरञ्जित होकर मधुर फल ही देता है और वही बीज यदि विषके प्रतिनिषिभूत धतूरे और करञ्ज आदि लताके पीसे हुए चूर्णके रससे सींचा जाय तो उसका फल कडुवा ही होता है। महती शुभ वासनासे मनुष्यका चित्त महान् होता है। मनुष्य 'मैं इन्द्र हूँ' इस प्रकारका मनोरथ होनेपर इन्द्ररूपमें प्रतिष्ठित होनेका स्वप्न देखता है। इसी तरह मनुष्यका क्षुद्र वासनासे वासित हुआ चित्त तुच्छ क्षुद्रताको
सं० यो० व० अं० ९—
२३२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
देखता है। पिशाचका भ्रम होनेसे मनुष्य रातको स्वप्नमें पिशाचोंको ही देखने लगता है। जैसे प्रतिदिन क्षीण होता हुआ चन्द्रमा अपने पूर्ण होनेकी आशाको कभी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार दरिद्रता आदिसे पीड़ित होनेपर भी उद्योगशील श्रेष्ठ पुरुष उदारगतिका परित्याग नहीं करता। वास्तवमें तो न यहाँ बन्धन है और न मोक्ष है, न बन्धनका अभाव है न बन्धनकी सत्ता ही है। इन्द्रजाल-लताकी भाँति यह झूठी माया ही प्रकट हुई है। बन्धन और मोक्षकी अवस्थाओंसे तथा द्वैत और अद्वैतसे रहित यह सम्पूर्ण विज्ञानानन्दमयी ब्रह्म-सत्ता ही है—ऐसा निश्चय ही परमार्थ है। यह जगत् परमात्माका स्वरूप ही है, ऐसा ज्ञान हुए बिना यह दृश्य जगत् दुःख देनेवाला ही होता है और यदि वैसा ज्ञान हो गया तो यह दृश्य मोक्ष प्रदान करनेवाला होता है। जल भिन्न है और तरङ्ग भिन्न, इस प्रकार अनेकता और भिन्नताका बोध अज्ञान है। जल ही तरङ्ग है, इस प्रकार एकत्वबोधसे यथार्थ ज्ञान सिद्ध होता है। जैसे स्नेहरहित बन्धुके मिलने और बिछुड़नेसे मनुष्यको न सुख होता है न दुःख, उसी प्रकार परमात्माका तात्त्विक ज्ञान हो जानेपर इस पाञ्चभौतिक शरीरके रहने या बिछुड़नेसे पुरुष सुख या दुःखसे लिप्त नहीं होता। वासना-रहित एवं शान्तचित्त हुआ अपने देह-नगरका स्वामी जीवात्मा आक्षेप (संकोच)-शून्य, सर्वव्यापी और सबका अधिपति हो जाता है। चित्तके सर्वथा विगलित (शान्त) हो जानेपर अपने दोषोंका त्याग करके धीर हुई बुद्धिसे युक्त पुरुष मृत्यु और जन्म होनेपर प्राप्त होनेवाली पारलौकिक और ऐहलौकिक नीरस गतियोंपर दृष्टिपात करके विवेक—विचारद्वारा परमात्मारूपी दीपक पाकर तापरहित हो अपने देहरूपी नगरमें आनन्दपूर्वक प्रतिष्ठित होता है। (सर्ग ३४-३५)
सर्वत्र और सभी रूपोंमें चेतन आत्माकी ही स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे जो तरङ्गें भविष्यमें प्रकट होनेवाली हैं और अभी व्यक्त नहीं हुई हैं, वे समुद्रके जलमें अभिन्नरूपसे स्थित हैं, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मामें भावी सृष्टियाँ उस सत्स्वरूप परमात्मासे पृथक् नहीं हैं; क्योंकि उनकी स्वतः सत्ता नहीं है, परमात्माकी सत्तासे ही उनकी सत्ता है। जैसे आकाश सर्वत्र व्यापक होकर भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण दृष्टिमें नहीं आता, उसी प्रकार निरवयव शुद्ध चेतन परमात्मा सर्वव्यापी होनेपर भी दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे जलमय समुद्रमें जो नाना प्रकारकी असंख्य तरङ्गें उठती हैं, उनका वह नानात्व जलसे पृथक् भाव-विकारवाला नहीं है, उसी प्रकार चैतन्य ब्रह्मस्वरूप चिन्मय समुद्रमें 'तू', 'मैं', 'यह', 'वह' इत्यादि रूपसे जो प्रचुर नानात्वरूपमें जगत् भासित होता है, वह उस ब्रह्मरूप चैतन्य-सिन्धुसे पृथक् नहीं है। वास्तवमें चेतन परमात्मा न अस्त होता है न उदित, न उठता है न खड़ा होता या बैठता है, न आता है न जाता है, न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। रघुनन्दन ! वह निर्मल चेतन परमात्मा स्वयं अपने आपमें ही स्थित है। वही भ्रमसे प्रतीत होनेवाले जगत् नामक प्रपंचके रूपमें विस्तारको प्राप्त हुआ है। जैसे तेज ही तेजःपुञ्ज (सूर्य आदि) के रूपमें और जल ही जलराशि (समुद्र आदि) के रूपमें स्फुरित होता है, उसी प्रकार चेतन परमात्मा ही अपने स्पन्दनभूत सृष्टिके रूपमें स्फुरित हो रहा है।
चेतन परमात्मा ही आकाशरूपसे अवकाश प्रदान करता है, जिससे अङ्कुरको बाहर निकलने या फैलनेका अवसर मिलता है। स्पन्दात्मक वायुरूपसे वह उसका आकर्षण करता है, जिससे अङ्कुर बाहर निकलता है। वही जलरूप होकर रसरूपसे अङ्कुरको स्नेहयुक्त बनाता है। वही सुदृढ़ पृथ्वीरूपसे उस अङ्कुरको दृढ़ता प्रदान
स्थिति-प्रकरण ] * ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण * २३३
करता है और तेजरूप होकर उसे अपना रूप देता है, जिससे वह दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार वह परमात्मा स्थावर-जङ्गम जगत्पर अनुग्रह करता है। वही परमात्मा हेमन्त आदि कालरूपसे प्रकट होकर जौ आदि अङ्कुरोंके विरोधी तृण आदिकी उत्पत्तिमें बाधक बनता है और उन अङ्कुरोंकी उत्पत्तिके अनुकूल वातावरण तैयार करता है। वह चेतन तत्त्व परमात्मा ही फूलोंमें धीरे-धीरे केसरका संचय करके गन्धरूपमें प्रकट होता है। मिट्टीके भीतर रसरूपताको प्राप्त हो वही वृक्षकी वृद्धिके द्वारा स्थाणुभाव (मूल और तनेके रूप) को प्राप्त होता है। उस मूलमें स्थित हुए सुन्दर रसलेश ही फलके रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही पल्लवोंमें प्रविष्ट हो रेखाएँ बनकर पत्र आदिके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। वह चेतन तत्त्व परमात्मा ही वृक्षोंमें इन्द्रधनुषके समान नूतनताका सम्पादन करता हुआ उनपर अनुग्रह करता है। स्थिरतारूप चतुरताको प्रकट करनेवाली नियतिरूपसे वही स्थितिको प्राप्त होता है। उसी परमात्माके अनुग्रहसे धारणरूप धर्मवाली यह धीर वसुन्धरा प्रलयकालतक स्थित रहती है।
इस प्रकार सब ओर स्थित और सुस्थिर आकारवाली ये समस्त संसार-पंक्तियाँ, जो ब्रह्मकी स्वभावभूत हैं, बार-बार आती-जाती रहती हैं। यह सारा जगत् एक दूसरेके प्रति कारणभावको प्राप्त होकर अपने अधिष्ठानभूत चैतन्यके सकाशसे स्वयं ही उत्पन्न हुआ है और एक-दूसरेके द्वारा नष्ट होता हुआ यह उस अधिष्ठानभूत चैतन्यमें स्वयं ही लीन होता है। जैसे अगाध जलमें होनेवाला स्पन्दन भी स्वतः अस्पन्दन ही है; क्योंकि वहाँ जलसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार चेतन आत्मामें प्रकट हुआ सद्सद्रूप जगत् भी वास्तवमें अप्रकट ही है; क्योंकि वह सब ज्ञानसे चेतन-स्वरूप ही अनुभूत होता है। (सर्ग ३६-३७)
ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, वासनाके कारण ही कर्तृत्वका प्रतिपादन
तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसी परिस्थितिमें सुख-दुःख आदि भोग देनेवाले कर्मोंमें या ध्यान-समाधिमें तत्त्वज्ञानियोंका जो यह कर्म या कर्तृत्व दिखायी देता है, वह वास्तवमें असत् है; क्योंकि उसमें कर्तापन नहीं है। परंतु मूर्खोंका वह कर्म (कर्तृत्वाभिमान होनेके कारण) असत् नहीं है (यही ज्ञानी और अज्ञानीमें अन्तर है)। पहले यह विचार करना चाहिये कि कर्तृत्व किसका नाम है। अन्तःकरणमें स्थित जो मनकी वृत्ति है, उसका निश्चय—अमुक वस्तु ग्रहण करने योग्य है, इसका विश्वास वासना कहलाता है। वह वासना ही 'कर्तृत्व' शब्दसे प्रतिपादित होती है; क्योंकि वासनाके अनुसार ही मनुष्य चेष्टा करता है और चेष्टाके अनुसार ही फल भोगता है। अतः कर्तृत्वसे फलभोक्तृत्व होता है—यह सिद्धान्त है। कहा भी है—'पुरुष कर्म करे या न करे, वह स्वर्गमें या नरकमें, सर्वत्र उसीका अनुभव करता है जैसी उसके मनमें वासना होती है। इसलिये जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, वे पुरुष कर्म करें या न करें, तो भी उनमें वासना होनेके कारण कर्तृत्व अवश्य है। इसके विपरीत जिन्हें तत्त्वज्ञान हो गया है, वे कर्म करें तो भी उनमें कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि वे वासनासे सर्वथा शून्य हैं। तत्त्वज्ञानीकी वासना शिथिल हो जाती है, इसलिये वह कर्म करता हुआ भी उसके फलकी इच्छा नहीं रखता। उसकी बुद्धि कर्तृत्वाभिमान और आसक्तिसे रहित होती है, अतः वह अनासक्त भावसे केवल चेष्टामात्र करता है। उसे जो कुछ भी प्रारब्धके अनुसार कर्मोंका फल प्राप्त होता है, वह उस सारे कर्म-फलको यह आत्मा ही है—ऐसा अनुभव करता है। परंतु जिसका मन फलासक्तिमें डूबा हुआ है, वह कर्म न करके भी कर्ता ही माना जाता
२३४ * अविच्छिन्नविदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
है। मन जो कुछ करता है, वही किया हुआ होता है। मन जिसे नहीं करता, वह किया हुआ नहीं होता; अतः मन ही कर्ता है, शरीर नहीं। चित्तसे ही यह संसार प्राप्त हुआ है, इसलिये यह चित्तमय ही है, केवल चित्तमात्र होकर चित्तमें स्थित है—यह बात पहले विचार-पूर्वक निर्णीत हो चुकी है। सम्पूर्ण विषय और विभिन्न प्रकारकी चित्तवृत्तियाँ—ये सब शान्त होकर जब वासनारूप हो जाते हैं, तब उस वासनारूप उपाधिसे युक्त जीवात्मा ही रहता है। उनमेंसे जो आत्मतत्त्वके ज्ञाता हैं, उनका मन वर्षाकालमें मृगतृष्णाके जल और प्रचण्ड धूपमें हिमकणके समान गलकर जब परम शान्त हो जाता है, तब तुरीय दशाको प्राप्त हो, उसी परमात्मरूपमें स्थित हो जाता है। विद्वान् लोग ज्ञानियोंके मनको न तो आनन्दमय मानते हैं और न अनानन्दमय ही। उनका मन न चल है, न अचल है। न सत् है, न असत् है और न इनका मध्य ही है। बल्कि वह इन सबसे विलक्षण अनिर्वचनीय है। जैसे हाथी छोटी तलैयामें नहीं डूबता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष वासनामय चेष्टारसमें नहीं मग्न होता। मूर्खका मन तो भोगोंको ही देखता है, परमार्थ-तत्त्वको नहीं। तत्त्वज्ञानीकी चित्तवृत्ति सांसारिक विपत्तिमें भी प्रसन्न ही रहती है। वह चाँदनीकी तरह भुवनमात्रको प्रकाशित करती है। चित्तके संयोगके बिना कर्म करता हुआ भी ज्ञानी अकर्ता ही है; क्योंकि वह कर्म मनको लिप्त नहीं करता। वह यत्नपूर्वक किये हुए हाथ-पैर आदिके संचालनरूप कर्मके फलको भी नहीं भोगता। बालक मनसे ही नगरका निर्माण और उसकी सफाई एवं सजावट करता है तथा उस मनःकल्पित नगरको खेल-खेलमें ही अकृत-सा अनुभव करता है; उसको उपादेयरूपसे नहीं ग्रहण करता। उसके सुख-दुःखको स्वाभाविक-सा देखता है। मनके द्वारा किये गये नगरके विध्वंसको वास्तविक विध्वंस समझकर खेल-खेलमें दुःखका-सा भी अनुभव करता है। साथ ही यह भी समझता रहता है कि यह वास्तविक दुःख नहीं है। उसी प्रकार ज्ञानी कर्म करता हुआ भी वास्तवमें उससे लिप्त नहीं होता। जिनका मन पूर्ण आत्मामें ही संलग्न है, उन ज्ञानियोंकी दृष्टिसे तो वस्तुतः संसारमें मोक्ष नहीं है। जिनका मन आत्मामें संलग्न नहीं है, उन्हीं लोगोंकी दृष्टिसे यह बन्धन-मोक्ष आदि सब कुछ है।
किंतु वास्तवमें तो न बन्धन है न मोक्ष है, न बन्धनका अभाव है और न बन्धनके कारणभूत वासना आदि ही हैं। परमात्मतत्त्वका ज्ञान न होनेसे ही यह दुःख है। यथार्थ ज्ञानसे उसका लय हो जाता है।
(सर्ग ३८)
सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी परब्रह्मरूपताका प्रतिपादन; अत्यन्त मूढको नहीं, विवेकी जिज्ञासुको ही 'सर्वं ब्रह्म'का उपदेश देनेकी आवश्यकता तथा बाजीगरके दिखाये हुए खेलकी भाँति मायामय जगत्के मिथ्यात्वका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! महात्मन् ! ऐसी स्थितिमें यदि वस्तुतः बन्धन और मोक्ष कल्पित ही हैं, एकमात्र परब्रह्म ही सर्वत्र विद्यमान हैं तो बिना दीवारके चित्रकी भाँति इस निराधार सृष्टिका आगमन कहाँसे हुआ ? यह कृपापूर्वक बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राजकुमार ! ब्रह्मतत्त्व ही इस सारी सृष्टिके रूपमें विद्यमान है; क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है। इसलिये उस ब्रह्ममें सारी शक्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। सत्त्व, असत्त्व, द्वित्व, एकत्व, अनेकत्व, आदित्व और अन्तत्व—ये परस्पर विरुद्ध-से प्रतीत होनेवाले सारे भाव परब्रह्ममें हैं। परंतु वे उससे भिन्न नहीं हैं। जैसे समुद्रका जल-प्रवाह उल्लास एवं विकासको प्राप्त हो उत्ताल तरङ्गों-
१५-सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारम्बार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन
स्थिति-प्रकरण ] ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन २३५
द्वारा अपनी नानाकारताका दर्शन कराता हुआ प्रकट होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्म चित्तका तथा चित्तस्वरूप होनेके कारण कर्ममयी, वासनामयी और मनोमयी सारी शक्तियोंका संचय, प्रदर्शन, धारण, उत्पादन और संहार करता है। समस्त जीवोंकी सब ओर फैली हुई सारी दृष्टियोंकी और समस्त पदार्थोंकी परब्रह्मसे ही निरन्तर उत्पत्ति होती है। जैसे लहरें समुद्रसे ही उत्पन्न होती और उसीमें लीन हो जाती हैं, इसलिये सदा समुद्ररूप ही हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ परमात्मासे उत्पन्न होकर उसीमें लीन होते हैं। फलतः चिन्मय परमात्मासे उत्पन्न होनेके कारण वे परमात्मरूप ही हैं।
निष्पाप रघुनन्दन ! यह सब निर्मल ब्रह्म ही विराजमान है। यहाँ मल नामक कोई वस्तु नहीं है। समुद्रमें तरङ्ग-समूहोंके रूपसे जल ही स्फुरित होता है, मिट्टी नहीं। रघुकुलतिलक ! यहाँ एकमात्र परब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी कल्पना ही नहीं है, जैसे अग्निमें उष्णताके सिवा और कोई कल्पना ही नहीं है। जिसकी बुद्धि पूर्णरूपसे व्युत्पन्न नहीं हुई है—जिसमें आधी समझ और आधी मूढ़ता है, उसे 'यह सब ब्रह्म ही है' यह उपदेश अच्छा नहीं लगता। वह दृश्योंको उपस्थित करनेवाली भोगदृष्टिसे सदा दृश्य पदार्थोंकी ही भावना करता हुआ नष्ट (तत्त्वज्ञानरूप परमार्थसे भ्रष्ट) हो जाता है। किंतु जो तत्त्वज्ञानरूप परमार्थ-दृष्टिको प्राप्त है, उस पुरुषके भीतर विषय-भोगकी इच्छा नहीं उत्पन्न होती। उसके लिये तो 'यह सब ब्रह्म ही है' ऐसा समयोचित उपदेश भी उपयुक्त होता है। जिसकी बुद्धि पूर्णतया व्युत्पन्न नहीं है, ऐसे शिष्यको उन सद्गुणोंद्वारा शुद्ध करे, जिनमें शम (मनोनिग्रह) और दम (इन्द्रियनिग्रह) की प्रधानता हो। तत्पश्चात् यह उपदेश दे कि यह सब कुछ ब्रह्म है तथा तुम भी विशुद्ध ब्रह्म ही हो। जो अज्ञानीको अथवा आधी समझवाले पुरुषको 'सर्वं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म है) यह उपदेश देता है, उसने मानो उस शिष्यको महान् नरकोंके जालमें डाल दिया। जिसकी बुद्धि पूर्णतया व्युत्पन्न है, जिसकी भोगेच्छा नष्ट हो गयी है और कामना सर्वथा मिट गयी है, उस महात्मामें अविद्यारूपी मल नहीं है। अतः उसीके लिये 'सर्वं ब्रह्म' का उपदेश देना उचित है। जो शिष्यकी परीक्षा लिये बिना ही उसे उपदेश देता है, वह अत्यन्त मूढ़ बुद्धिवाला उपदेशक महाप्रलय-पर्यन्त नरकको प्राप्त होता है।
ब्रह्म सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वगत और सर्व-स्वरूप है। यह ब्रह्म मैं ही हूँ, यों समझना चाहिये। अपनी मायाद्वारा विचित्र कार्य करनेवाले ऐन्द्रजालिकों (बाजीगरों) को तो तुम देखते ही हो। वे मायाके द्वारा सत्को असत् और असत्को सत् बना देते हैं। उसी प्रकार परमात्मा अमायामयी होकर भी मायामय महान् ऐन्द्र-जालिककी भाँति बनकर सङ्कल्पके द्वारा घटको पट बनाता है और पटको घट। मेरुके सुवर्णमय तटप्रान्तमें लहराते हुए नन्दनवनकी भाँति पत्थरपर लता पैदा करता है और कल्पवृक्षोंपर प्रकट हुए रत्नके गुच्छोंकी भाँति लतामें प्रस्तर पैदा कर देता है तथा आकाशमें सुन्दर वन लगा देता है। गन्धर्वनगरमें दीखनेवाले उद्यानकी भाँति उस भावी जगत्में कल्पनाद्वारा आकाशमें ही नगरकी रचना कर देता है—आकाशको ही नगररूपमें दिखा देता है। व्योमकी नीलिमाको नष्ट-सी करके उसे भूतल बना देता है। गन्धर्वनगरके राजमहलमें बहुत-सी महिषियोंकी भाँति भूतलमें आकाशकी स्थापना कर देता है। पद्मराग-मणिके बने हुए लाल फर्शमें प्रतिबिम्बित हुआ आकाश जैसे आधारकी लालिमासे ही लाल दिखायी देता है, उसी प्रकार जगत्में जो कुछ है, होगा या था, वह सब ब्रह्मकी सत्तासे ही सत्-सा प्रतीत होता है; क्योंकि ईश्वर संकल्पके द्वारा स्वयं व्यक्तरूप हो विचित्र वेश-भूषाको अपनाकर स्वयं अपने आपको दिखलाता है। श्रीराम ! जब कि इस जगत्में एक ही वस्तु सब प्रकारसे सर्वत्र सब रूपोंमें
३१६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रकट होती है, सभी रूपोंमें एक ही रुद्र-वस्तु विद्यमान है, तब हर्ष, ईर्ष्या और आश्चर्यके लिये अवसर ही कहाँ है। अतः धैर्यशाली होकर सदा समभावसे ही स्थित रहना चाहिये। जो समतासे युक्त है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष आश्चर्य, गर्व, मोह, हर्ष और अमर्ष आदि विकारोंको कभी प्राप्त नहीं होता। (सर्ग ३०)
दृश्यकी असत्ता और सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन, मायाके दोष तथा आत्मज्ञानसे ही उसका निवारण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परब्रह्म परमात्माकी जो निर्मल चैतन्य-शक्ति है, वह सर्वशक्तिमती है। वह परमात्माके सकाशसे स्वाभाविक ही विभिन्न रूपोंकी कल्पना करती हुई भावी देह आदि आकृतियोंकी किंचित् स्फुरणाके रूपमें स्वयं ही दृश्य जगत् बन जाती है। उस चेतन शक्तिका संकल्परूप मन ही अपने संकल्पमात्रसे क्षणभरमें गन्धर्वनगरके समान इस असत् (मिथ्या) दृश्यप्रपञ्चका विस्तार कर देता है। सब ओर प्रकाशित होता हुआ वह स्वयम्प्रकाश सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही जब बाह्यदृष्टिसे दृश्यमान आकाशरूप होकर स्थित होता है, वही यह सबकी दृष्टि (अनुभव) में आनेवाला प्रसिद्ध आकाश है। वही परमात्मा कमलजन्मा ब्रह्माका संकल्प करके उनके उस स्वरूपको देखता है। तदनन्तर दक्ष आदि प्रजापतियोंकी कल्पना करके जगत्की कल्पना करता है। श्रीराम ! इस प्रकार चौदह भुवनोंमें रहनेके कारण चौदह प्रकारके अनन्त प्राणिसमुदायके कोलाहलसे युक्त यह सृष्टि परमात्माके चित्तसे ही निर्मित हुई है। भूतलसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी प्राणियोंमें जो ये मनुष्य-जातिके प्राणी हैं, ये ही आत्मज्ञानके उपदेशके पात्र हैं।
श्रीराम ! यह जगत् अमुक निमित्तसे और अमुक उपादानसे उत्पन्न हुआ है, यह जो वाणीकी रचना या कल्पना है, वह शास्त्रोक्त मर्यादाके निर्वाहके लिये है, वास्तवमें कुछ नहीं है; क्योंकि परमात्मामें विकार, अवयव, विभिन्न दिशाओंकी सत्ता तथा देश-काल आदिके क्रम सम्भव नहीं हैं। यद्यपि इनका आविर्भाव प्रत्यक्ष देखा जाता है, तथापि निराकार, निर्विकार और सर्वगत परमात्मामें इन सबका होना कदापि सम्भव नहीं। उस चिन्मय परमात्माके बिना जगत्के किसी दूसरे मूलकारणकी कल्पना हो ही नहीं सकती। दूसरी कोई कल्पना न है न होगी। क्रम, शब्द और अर्थ अन्यत्र कहाँसे आ सकते हैं तथा व्यवहारजनित उक्तियाँ भी उस परमात्माके सिवा और कहाँसे सम्भव हो सकती हैं। यहाँ जो-जो कल्पनाएँ हैं, जो-जो पदार्थ हैं, उनके वाचक जो-जो शब्द हैं और जो-जो वाक्य हैं, वे सब उस सत्-स्वरूप परमात्मासे उत्पन्न तथा सद्रूप होनेके कारण 'सत्' ही समझे जाते हैं। 'यह जगत् भिन्न है और यह ब्रह्म भिन्न है'—इस तरहके शब्दों और अर्थोंका व्यवहार-भ्रम केवल वाणीमें है, परमात्मामें नहीं; क्योंकि परिच्छेद होनेपर ही भिन्नता होती है। (ब्रह्म अपरिच्छिन्न है, इसलिये उसका किसीसे भेद होना सम्भव नहीं।) अग्निकी एक शिखाकी दूसरी शिखा जननी है, यह कथन उक्ति-वैचित्र्यमात्र है। इस वाक्यके अर्थमें वास्तविकता नहीं है। इसी प्रकार परमात्माके विषयमें जन्य-जनक आदि शब्दोंका व्यवहार वास्तवमें सम्भव नहीं है; क्योंकि अनन्त होनेके कारण जब ब्रह्म एक ही है, तब वह किसको किस तरह उत्पन्न करेगा ? जैसे समुद्रमें जो तरङ्गोंका समूह दिखायी देता है, वह उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार परब्रह्ममें जो अर्थबोधक शब्द दृष्टिगोचर होता है, उसे विद्वान् पुरुष ब्रह्म ही मानते हैं। ब्रह्म ही चेतन जीवात्मा है, ब्रह्म ही मन है, ब्रह्म ही बुद्धि है, ब्रह्म ही अर्थ है, ब्रह्म ही शब्द है और ब्रह्म ही धातु है। यह सारा विश्व ब्रह्म ही है। इस विश्वसे परे भी ब्रह्मपद ही है। वास्तवमें तो जगत् है ही नहीं। सब
स्थिति-प्रकरण ] -- * चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहंकार आदिके रूपमें विस्तार * २३७
कुछ केवल ब्रह्म ही है। सर्वस्वरूप एवं सर्वव्यापी उस अनन्त ब्रह्मपदसे दूसरी कोई वस्तु उत्पन्न हो, यह सम्भव नहीं। जो कुछ ब्रह्मसे प्रकट हुआ है, वह ब्रह्मरूप ही है। इस जगत्में ब्रह्मतत्त्वके बिना कुछ भी होना सम्भव नहीं। निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म ही है। यही परमार्थता—यथार्थ कथन है।
रघुनन्दन ! यह माया ऐसी है, जो अपने विनाशसे ही हर्ष देनेवाली होती है। इसके स्वभावका पता नहीं लगता। ज्ञानकी दृष्टिसे जब इसको देखनेका प्रयत्न किया जाता है, तब यह तत्काल नष्ट हो जाती है। अहो ! संसारको बाँधनेवाली यह माया बड़ी ही विचित्र है। यद्यपि यह असत्य ही है, तथापि इसने अत्यन्त सत्यकी भाँति अपना ज्ञान कराया है। जो पुरुष 'यह जगत् ब्रह्मरूपसे सत्य ही है' अथवा 'मिथ्या होनेके कारण असत्य ही है'—इन दो बातोंमेंसे किसी एकको दृढ़ निश्चयके साथ अपना लेता है और मनमें आसक्ति न रखकर जगत्को स्वप्नभूमिकी भाँति भ्रान्तिमात्र ही देखता है, वह कभी दुःखमें नहीं डूबता। जिसकी इन मिथ्याभूत देह-इन्द्रिय आदिरूप द्वैतभावनाओंमें अहंबुद्धि है, वही दुःखके सागरमें डूबता है। स्वरूप-ज्ञानसे शून्य उस मिथ्यादर्शी पुरुषके लिये सब ओर केवल अविद्या ही विद्यमान है। जैसे जलमें सूखी धूल नहीं होती, उसी प्रकार महान् पुरुष परमात्मामें विकार आदि कोई दोष नहीं होते। अविद्यारूपी नदीमें बहता हुआ आत्मा इस संसारमें आत्माके यथार्थज्ञानके बिना अनुभवमें नहीं आता और वह आत्मज्ञान शास्त्रके तात्पर्यका यथार्थ बोध होनेसे ही प्राप्त होता है। श्रीराम ! परमात्माकी प्राप्तिके बिना अविद्यारूपी नदीका पार नहीं मिलता। वह परमात्माकी प्राप्ति ही अक्षयपद कहलाती है।
(सर्ग ४०-४१)
चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहंकार आदिके रूपमें विस्तार तथा अविद्याके कारण जीवोंके कर्मानुसार नाना योनियोंमें जन्मोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! विभिन्न कल्पनाओंद्वारा ही जिसने आकार ग्रहण कर रखा है तथा जो देश, काल और क्रियाके अधीन है, चैतन्यका वही रूप क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्र कहते हैं शरीरको। उसे बाहर और भीतरसे वह पूर्णतया जानता है, इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ञ ही वासनाका संकलन करके अहंकारभावको प्राप्त होता है। अहंकार ही निश्चयात्मकवृत्तिसे युक्त होकर जब निर्णायक एवं विभिन्न कल्पनाओंसे युक्त होता है, तब उसे बुद्धि कहते हैं। संकल्पयुक्त बुद्धि ही मनका स्थान ग्रहण करती है तथा घनीभूत विकल्पोंसे युक्त मन ही धीरे-धीरे इन्द्रियभावको प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष इन्द्रियोंको ही हाथ-पैर आदिसे युक्त शरीर मानते हैं। वह शरीर लोकमें सभीके अनुभवमें आता है, उत्पन्न होता है और जीवित रहता है। इस प्रकार संकल्प-वासनारूपी रस्सीसे जकड़ा और दुःखोंके जालसे व्याप्त हुआ वह जीव अज्ञानसे चित्तता—दृश्यताको प्राप्त होता है। जैसे बेर आदिका फल परिपाकवश अवस्था (रूप, रस आदि गुणोंके परिवर्तन) से ही अन्यरूपताको प्राप्त होता है, उसकी आकृति (जाति) नहीं बदल जाती—वह बेरसे भिन्न कोई दूसरा फल नहीं हो जाता, उसी प्रकार जीव—क्षेत्रज्ञ भी अविद्यारूप मलके परिणामवश अवस्थाभेदसे ही कुछ अन्यरूप-सा हो जाता है, आकृति (परिणामरहित चेतन जाति) से नहीं। (तात्पर्य यह है कि अहंकार, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, शरीरके संघातक अनात्म-वस्तुमें वह आत्माभिमान कर लेता है; किंतु वास्तवमें उसका स्वरूप चेतन ही है।) इस प्रकार जीव अहंकारभावको प्राप्त होता है। अहंकार बुद्धिरूपमें परिणत होता है और बुद्धि संकल्पोंके समूहसे व्याप्त
२३८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मनका स्वरूप धारण करती है। फिर संकल्पमय मन नाना प्रकारके शरीरोंको धारण करनेमें संलग्न होता है। जैसे गौएँ मदमत्त साँड़के पीछे दौड़ती हैं और जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर भागी जाती हैं, उसी प्रकार इच्छा आदि शक्तियाँ मनका अनुसरण करती हैं, जिससे काम-क्रोध-लोभ-मोहादि दोषोंकी ही वृद्धि होती है। इस प्रकार इच्छा-द्वेष आदि शक्तियोंके बाहुल्यसे युक्त मन शाखा-प्रशाखारूपसे अभिमानकी वृद्धि होनेके कारण घनीभूत अहंकारभावको प्राप्त हो रेशमके कीड़ेकी भाँति स्वेच्छासे ही बन्धनको प्राप्त होता है। जैसे पक्षी स्वयं ही अपने शरीरको जाल आदि फंदोंमें फँसाकर कष्टकारी बन्धनमें डालते और पछताते हैं, उसी तरह मन अपने संकल्पोंके अनुसंधानसे स्वयं ही दुःखदायी बन्धनमें पड़कर इस लोकमें संतप्त होता है।
जैसे पक्षी समुद्रमें गिरा हो, उसी तरह मन घोर दुःखके महासागरमें पड़ा हुआ है, गन्धर्वनगरके समान शून्य जगत्-जालमें अपने बन्धनके हेतुरूप देह आदिपर आसक्ति रखता है, विषयोंकी ओर दौड़ा जाता है और तत्त्वज्ञान आदिके प्रति अविश्वासके समुद्रमें निरन्तर बह रहा है।
जो अनन्त विषयोंमें अनन्त संकल्प-कल्पनाओंकी उत्पत्तिमें हेतु है, उस माया अथवा अविद्याके द्वारा इस जगत्रूपी विशाल इन्द्रजालका विस्तार करनेवाले मूढ़ जीव जलमें आवर्तों (भँवरों) के समान तबतक चक्कर काटते रहते हैं, जबतक उन्हें अपने अनिन्दित—विशुद्ध आत्मस्वरूपका साक्षात्कार नहीं हो जाता। किंतु जब वे साधन करते-करते काल पाकर आत्माका साक्षात्कार करके असत्को त्यागकर सत्य ज्ञानको अपनाते हैं, तब परम पदको प्राप्त होकर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते। कुछ अज्ञानी जीव सहस्रों जन्मोंका कष्ट भोगकर विवेकको प्राप्त करके भी मूर्खताके कारण उस संसाररूपी संकटमें ही गिर जाते हैं; कुछ लोग उच्च कुलमें जन्म और साधनकी शक्ति एवं सुविधाको पाकर भी अज्ञान और विषयासक्तिके कारण अपनी तुच्छ बुद्धिसे ही पुनः तिर्यग्योनियोंको प्राप्त होते हैं और तिर्यग्-योनिसे नरकोंमें भी गिरते हैं। कुछ महाबुद्धिमान् सत्पुरुष एक ही जन्मके द्वारा मोक्षरूप ब्रह्मपदमें शीघ्र ही प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रीराम ! कितने ही जीवसमूह तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेते हैं, कितने ही देवयोनियोंको प्राप्त होते हैं, कितने ही नागयोनिको प्राप्त करते हैं। जैसे यह जगत् विशाल दिखायी देता है, वैसे ही अन्यान्य जगत् भी हैं, थे और भविष्यमें भी बहुत-से होंगे। इस ब्रह्माण्डमें लोग जिस व्यवहारसे रहते हैं, उसी व्यवहारसे अन्य ब्रह्माण्डोंमें भी रहते हैं। केवल उनकी आकृतियोंमें अन्तर या विलक्षणता होती है। जैसे नदीकी लहरें परस्पर टकरानेसे परिवर्तित होती रहती हैं, उसी प्रकार विभिन्न सृष्टियाँ अपने सात्त्विक, राजस आदि स्वभाववश परस्पर संघर्षके कारण बदलती रहती हैं। जैसे जलराशि समुद्रमें अनन्त लहरें निरन्तर उठती और विलीन होती रहती हैं, उसी प्रकार उस परमपद-स्वरूप परमात्मामें यह तीनों लोकोंकी रचना आदि मोहमाया व्यर्थ ही विस्तारको प्राप्त हो अनवरत बढ़ती, परिणामको प्राप्त होती और विनष्ट होती रहती है।
( सर्ग ४२-४३ )
परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व, मनोमय होनेके कारण जगत्की असत्ता तथा ज्ञानीकी दृष्टिमें सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! इस क्रमसे जिस जीवने परमात्माके स्वरूपमें अपनी स्थिति प्राप्त कर ली, वह अस्थिपञ्जररूप देहको कैसे ग्रहण किये रहता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो यह शरीर आदिके रूपमें स्थावर-जङ्गम जगत् दिखायी देता है, यह आभास-मात्र ही है, अतएव स्वप्नके समान असत् होता हुआ ही
स्थिति-प्रकरण ] * परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * २३९
प्रकट हुआ। (तात्पर्य यह है कि वह परमात्मनिष्ठ जीव इस शरीर आदिको स्वप्नके तुल्य मिथ्या मानता हुआ ही इसमें रहता है)। निष्पाप श्रीराम ! यह प्रपञ्च दीर्घ-कालतक बने रहनेवाले स्वप्नके समान मिथ्या ही दीखता है, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान तथा पहाड़ी भूमिमें घूमते हुए पुरुषको घूमते दीखनेवाले पर्वतके समान मिथ्या ही दृष्टिगोचर होता है। जिसकी अज्ञानमयी निद्रा टूट गयी है और वासनात्मक भावना गल गयी है, वह ज्ञानवान् पुरुष इस संसाररूपी स्वप्नको देखता हुआ भी नहीं देखता—इसे मिथ्या समझता है। श्रीराम ! जीवोंके स्वभावसे कल्पित यह संसार, जिसकी मोक्ष होनेसे पहले-तक निरन्तर प्राप्ति होती रहती है, अनात्मज्ञानीके ही अंदर सदा सत्य-सा विद्यमान रहता है।
रघुनन्दन ! यह जगत् यद्यपि सब प्रकारसे सम्पन्न दिखायी देता है, तथापि यहाँ वास्तवमें कुछ भी सम्पन्न नहीं है। यह आभासमात्र एवं मनका विलासमात्र है; अतः शून्य (असत्) रूपमें ही स्थित है। मनका संकल्पमात्र ही इसका स्वरूप है। जहाँ भी यह प्रतीत होता है, वहाँ स्वप्नमें देखे गये नगरके समान शून्यरूप ही है, केवल आकाशरूपमें ही स्थित है। शरीर आदिके रूपमें जो ये तीनों लोक दिखायी देते हैं, वे सब-के-सब मनसे ही कल्पित हैं। जैसे पदार्थोंके देखनेमें नेत्र कारण है, उसी प्रकार उनके स्मरणमात्रमें मन कारण है (अतः मनःकल्पित यह जगत् अतीतकी स्मृतिके ही तुल्य है। स्मरणकालमें वह पदार्थरूपसे विद्यमान या उपलब्ध नहीं है)। श्रीराम ! मनकी इस अद्भुत शक्तिको तो देखो; उसने अपनेसे उत्पन्न हुए इस शरीरको अपनी भावना या संकल्पके द्वारा ही प्राप्त किया है। इसलिये लोग उस मनकी कल्पनाको सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न समझते हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्राणी मनके द्वारा अपने संकल्पसे ही रचे गये हैं। अपने संकल्पके शान्त होनेपर तैलरहित दीपककी भाँति वे सब शान्त हो जाते हैं। महामते ! देखो, यह सारा जगत् आकाशके समान शून्य, मनकी कल्पनामात्रसे विकसित तथा दीर्घकालीन स्वप्नके तुल्य मिथ्या ही प्रकट हुआ है। विशुद्ध बुद्धिवाले रघुनन्दन ! इस जगत्में कभी कोई वस्तु वास्तवमें न उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है। यहाँ जो जन्म और मरण दीखते हैं, वे सब मिथ्या ही हैं। जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी किरणोंका ताप बढ़नेसे उसमें मृगतृष्णा (जल) का दर्शन होता है, उसी प्रकार मनके संकल्पसे ये ब्रह्मा आदि सभी प्राणी बिना हुए ही दिखायी देते हैं। संसारमें जितनी आकार राशियाँ दिखायी देती हैं, वे सब-की-सब दो चन्द्रमाओंके भ्रमकी भाँति असत् हैं, मिथ्याज्ञानकी घनीभूत मूर्तियाँ हैं तथा मनोरथकी भाँति संकल्पमें ही प्रकट हुई हैं (वास्तवमें इनकी सत्ता नहीं है)। जैसे नौकाद्वारा यात्रा करनेवाले पुरुषको नदीके तटवर्ती वृक्ष और पहाड़ आदि मिथ्या ही चलते हुए प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार इन दृश्य आकारोंकी परम्परा नित्य असत्य होती हुई ही सत्य-सी प्रकट दिखायी देती है। मायासे ही जिसकी ठठरी रची गयी है और मनके मननसे ही जिसका निर्माण हुआ है, ऐसा जो यह दृश्य जगत् है, इसे इन्द्रजाल ही समझो। यह सत्य नहीं है, तो भी सत्यके समान स्थित है। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है। फिर इसके लिये उससे भिन्न होनेका प्रसङ्ग ही कहाँ है। यदि कोई प्रसङ्ग है तो कौन और कैसा है ! वह भिन्नता या भेदभावना कहाँ स्थित है ? 'यह पर्वत है, यह ठूँठा वृक्ष है' इत्यादि रूपसे जो जगत्के आडम्बरका विलास है, वह मनकी भावनाके दृढ़ होनेसे असत् होता हुआ भी सत्-सा दृष्टिगोचर होता है। जैसे महान् आयोजनोंसे पूर्ण स्वप्न भ्रम ही है, वास्तविक नहीं, उसी प्रकार मनके द्वारा रचे गये इस जगत्को भी दीर्घकालीन स्वप्न ही समझो। जो मूढ़ चित्त मानव अपने संकल्पसे उत्पन्न हुई मनोरथमयी सम्पत्तिको स्वरूपसे युक्त (सत्य) समझकर उसका अनुसरण करता है, वह एक-
२४० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मात्र दुःखका ही भागी होता है। यदि परमात्मस्वरूप यथार्थ वस्तु न हो तो लोग भले ही अवस्तुरूप संसारका अनुसरण करें; परंतु जो यथार्थ वस्तु—परमात्माका परित्याग करके अवस्तुरूप संसारका अनुगमन करता है, वह नष्ट हो जाता है—परमात्माकी प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थसे वञ्चित रह जाता है। जैसे रज्जुमें सर्पका भय मनका व्यामोह (भ्रम) मात्र ही है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनका भ्रम ही है। मनकी भावनाओंकी विचित्रतासे जगत् चिरकालतक प्रतीतिका विषय बना रहता है। जलके भीतर प्रतिबिम्बित हुए चन्द्रमाके समान चञ्चल (क्षणभङ्गुर) जो मिथ्या उदित हुए पदार्थ हैं, उनसे इस लोकमें मूर्ख बालक ही धोखा खा सकता है, तुम-जैसा तत्त्वज्ञानी नहीं। यह जडसंघात देह-आदिरूप जो विशाल जगत् दिखायी देता है, मिथ्या ही है। मनके मननसे ही इसका निर्माण हुआ है। जैसे हृदयमें स्वप्न या संकल्पमय नगर निर्मित होता है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनके संकल्पमें ही निर्मित हुआ है (वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं है)। यह दृश्य-प्रपञ्च मनके संकल्पसे उत्पन्न होता है और उसके संकल्परहित हो जानेसे विलीन हो जाता है। इस तरह यह समृद्धिशाली गन्धर्वनगरकी भाँति बिना हुए ही दिखायी देता है। हृदयमें मनके संकल्पद्वारा कल्पित विशाल नगरका विध्वंस अथवा अभ्युदय हो जानेपर तुम्हीं बताओ, किसकी क्या हानि होती है या किसको क्या लाभ हो जाता है? जैसे बालकोंके मनमें खेलके लिये बने हुए गुड़ियों या खिलौनोंके द्वारा पुत्र-पशु आदि व्यवहारोंकी कल्पना होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी सदा मनसे ही प्रकट होता है। जैसे इन्द्रजालके द्वारा रचित जलके नष्ट-भ्रष्ट होनेपर किसीका कुछ भी नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार मिथ्या प्रकट हुए इस संसारके नष्ट हो जानेपर भी किसीका कुछ नहीं बिगड़ता। जो वास्तवमें असत् ही है, वह यदि अविद्यमान हो जाय तो किसका क्या बिगड़ गया? इसलिये संसारमें हर्ष और शोकका आधार कुछ भी नहीं है। महामते! जिसका सदासे ही अत्यन्त अभाव है, उसके नष्ट होनेसे क्या नष्ट हो जाता है? और जब किसीका नाश ही नहीं होता, तब उसके लिये दुःखका क्या प्रसङ्ग है?
एकमात्र प्रपञ्चका ही विस्तार करनेवाले इस असत्यभूत समस्त संसारमें ग्रहण करने योग्य कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसे विद्वान् पुरुष ग्रहण करनेकी इच्छा करे? इसी प्रकार जो सर्वथा सत्यभूत ब्रह्मतत्त्वमय है, उस समस्त त्रिलोकीमें कौन ऐसा हेय पदार्थ है, जिसका विद्वान् पुरुष त्याग करे? अर्थात् तीनों लोक ब्रह्मभूत होनेके कारण चिन्मय हैं; उनमें विज्ञानानन्दघन परमात्माके सिवा अन्य कोई पदार्थ नहीं है, जिसका त्याग किया जा सके। आदि और अन्तमें जिसका अभाव है, उसका वर्तमानमें भी अभाव ही है। अतः श्रीराम! जो अज्ञानी इस असत् संसारकी इच्छा करता है, उसको असत् (जड संसार) ही प्राप्त होता है। आदि और अन्तमें जो सत्य है, वर्तमानमें भी वह सत्य ही है; अतः जिसकी दृष्टिमें सब सत् परमात्मा ही है, उसे सर्वत्र परमात्म-सत्ताका ही दर्शन होता है। जलके भीतर जो असत्यभूत चन्द्रमा और आकाश-तल आदि दिखायी देते हैं, उन्हें अपने मनके मोहके लिये मूर्ख बालक ही पाना चाहते हैं, उत्तम ज्ञानी पुरुष नहीं। मूर्ख ही विशाल आकारवाले अर्थशून्य कार्योंमें सुख समझकर संतुष्ट होता है; किंतु अज्ञानके कारण उसे अनन्त दुःख ही प्राप्त होता है; सुख नहीं।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! वसिष्ठ मुनिके यों कहनेपर दिन बीत गया। सूर्य अस्ताचलको चले गये। सारी सभाके लोग मुनिको नमस्कार करके सायंकालकी उपासनाके लिये स्नान करनेके उद्देश्यसे उठ गये और रात बीतनेपर दूसरे दिन उदित हुए सूर्यदेवकी किरणोंके साथ-साथ फिर सभाभवनमें आ गये! (सर्ग ४४-४५)
स्थिति-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश * २४१
सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारंबार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध-भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! रमणीय स्त्री आदि तथा धनके नष्ट होनेपर शोकका कौन-सा अवसर है ? इन्द्रजालकी दृष्टिसे देखे गये पदार्थके नष्ट होनेपर क्या कोई विलाप करता है ? अविद्याके अंशभूत पुत्र आदिके प्राप्त होनेपर सुख और नष्ट होनेपर दुःखका प्रसार होना क्या कभी उचित है ? रमणीय धन और स्त्री आदिकी प्राप्ति एवं वृद्धि होनेपर हर्षसे फूल उठनेका क्या अवसर है ? क्या मृगतृष्णाके जलकी वृद्धि होनेपर जलार्थी पुरुषोंको आनन्द प्राप्त होता है ? कदापि नहीं । धन और स्त्री आदिके बढ़नेपर तो उन्हें परमार्थमें बाधक समझकर दुःखका अनुभव करना चाहिये, संतोष मानना तो कदापि उचित नहीं । संसारमें मोह-मायाकी वृद्धि होनेपर भला, कौन सुखी एवं स्वस्थ रह सकता है। जिन भोगोंके बढ़ जानेपर मूढ़ मनुष्यको राग होता है, उन्हींकी वृद्धिसे विवेकशील पुरुषके मनमें वैराग्य होता है । नश्वर धन और स्त्री आदिके सुलभ होनेमें हर्षका क्या कारण है ? जो इनके परिणामको देख पाते हैं, उन साधु पुरुषोंको तो इनसे वैराग्य ही होता है । अतः रघुनन्दन ! संसारके व्यवहारोंमें जो-जो वस्तु नश्वर प्रतीत हो, उसकी तो तुम उपेक्षाकरो और जो न्यायतः प्राप्त हो जाय, उसे यथायोग्य व्यवहारमें लाओ; क्योंकि तुम तत्त्वज्ञ हो। अप्राप्त भोगोंकी स्वभावतः कभी इच्छा न होना और दैवात् प्राप्त हुए भोगोंको यथायोग्य व्यवहारमें लाना—यह ज्ञानवान्का लक्षण है।
जिस किसी भी युक्ति अथवा साधनसे जिस पुरुषका जड़ दृश्यसे राग चला जाता है, उसकी परमात्मामें दृढ़ विश्राम रहनेवाली विमल बुद्धि कभी मोहरूपी सागरमें नहीं डूबती । यह असत् है, ऐसा समझकर जिसकी समस्त सांसारिक वस्तुओंमें आस्था नहीं रह गयी है, उस सर्वज्ञको मिथ्या अविद्या अपने अङ्कमें नहीं ले सकती—चंगुलमें नहीं फँसा सकती । श्रीराम ! अत्यन्त विरक्त, अपने पारमार्थिक स्वरूपमें स्थित और वासस्थानमें सब प्रकारकी अहंता-ममतासे रहित हो तथा न्यायप्राप्त कार्यमें तत्पर रहते हुए भी रागरहित हो तुम आकाशके समान निर्लिप्त हो जाओ; क्योंकि कर्ममें लगे रहनेपर भी जिस ज्ञानी महापुरुषकी उसमें न तो इच्छा (राग) है और न अनिच्छा (द्वेष) ही है, उसकी बुद्धि जलसे कमलदलकी भाँति कभी लिप्त नहीं होती । तुम्हारी इन्द्रियाँ और मन गौणी वृत्तिसे दर्शन और स्पर्श आदि कार्य करें या न करें, तुम सर्वथा इच्छारहित हो अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित रहो। यह संसार-सागर वासनाओंके जलसे भरा हुआ है । जो शुद्ध बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ हैं, वे ही इसके पार जा सके हैं । दूसरे लोग तो डूब ही गये हैं । जो नित्य तृप्त, शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाले जीवन्मुक्त महात्मा हैं, उन्हींके आचारोंका अनुसरण करना चाहिये, भोग-लम्पट दीन-हीन शठोंके आचरणोंका नहीं । महात्मा पुरुष सब कुछ नष्ट हो जानेपर भी खिन्न नहीं होते, देवताओंके उद्यानमें भी आसक्त नहीं होते और शास्त्र-मर्यादाका कभी त्याग नहीं करते । महात्मा पुरुष इच्छारहित तथा न्यायप्राप्त व्यवहारका अनासक्तभावसे अनुसरण करनेवाले होते हैं । वे देहरूपी रथका-आश्रय ले परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो आसक्तिशून्य होकर विचरते हैं । परम सुन्दर श्रीराम ! तुम भी यथार्थ एवं विस्तृत विवेकको प्राप्त कर चुके हो। अपनी इस पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिके बलसे सदा विज्ञानानन्दघन आत्मस्वरूपमें स्थित हो ।
श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और समस्त वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् हैं । आपके पवित्र
२४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उपदेशसे मैं अग्रस्त पुरुषके समान अपने स्वरूपमें निश्च स्थित हूँ। प्रवचन करते समय आपके मुखसे जो उदार भावोंसे युक्त, सुस्पष्ट, सुन्दर तथा परमात्माके स्वरूप को प्रकाशित करनेवाले वचन निकलते हैं, उन्हें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती—अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है। आपने श्रुति-पुराण आदि शास्त्रोंके आधारपर कमलयोनि ब्रह्माकी जो उत्पत्ति कही थी, उसका पुनः स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! इस ब्रह्माण्डमें तथा दूसरे-दूसरे विचित्र ब्रह्माण्डोंमें भी बहुत-से विभिन्न आचार व्यवहारवाले सहस्रों प्राणी विचरते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य समयोंमें उत्पन्न होनेवाले अनन्त भुवनोंमें दूसरे-दूसरे बहुत से प्राणी एक ही समय अधिक संख्यामें उत्पन्न होंगे। महाबाहो! उन ब्रह्माण्डोंमें उन ब्रह्मा आदि देवताओंकी उत्पत्तियाँ विचित्र-सी हुई बतायी गयी हैं। महासर्गके आरम्भकालमें कभी तो ब्रह्मा कमलसे उत्पन्न होते हैं, कभी जलसे, कभी अण्डसे और कभी आकाशसे प्रादुर्भूत होते हैं। विभिन्न सृष्टियोंमें कोई भूमि केवल मिट्टीके रूपमें प्रकट हुई तो कोई पथरीली थी, कोई सुवर्णमयी थी और कोई ताम्रमयी थी। इस ब्रह्माण्डमें भी भिन्न भिन्न प्रकारके कितने ही आश्चर्यमय जगत् हैं। इस सच्चिदानन्दघन परब्रह्मस्वरूप महाकाशमें अनन्त जगत् महासागरकी तरङ्गोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। जैसे समुद्रमें लहरें और मरु-मरीचिकामें जलकी धाराएँ उत्पन्न होती हैं; उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें अगणित विश्वकी शोभा प्रकट होती है। (तात्पर्य यह कि जैसे सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति मिथ्या है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्मामें इस जड जगत्का वैभव मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है।) जैसे वर्षा आदि ऋतुओंमें मच्छरोंके समूह उत्पन्न हो-होकर सब ओर भर जाते हैं और फिर नष्ट भी हो जाते हैं, उसी प्रकार ये संसारकी सृष्टियाँ उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं; यह नहीं ज्ञात होता कि ये सदा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली सृष्टि परम्पराएँ परमात्मामें कबसे आरम्भ हुईं। ये सृष्टियों पूर्व-से-पूर्व कालमें थीं और उससे भी पहले विद्यमान थीं। इस प्रकार अनादिकालसे इनकी परम्पराएँ चल रही हैं। जैसे समुद्रमें निरन्तर लहरें उठती रहती हैं, उसी तरह परमात्मामें सदा ही ये सृष्टियों उत्पन्न एवं विलीन होती रहती हैं। देवता, असुर और मनुष्य आदिसे युक्त ये समस्त प्राणी नदीकी तरङ्गोंके समान उत्पन्न हो-होकर विलीन होते रहते हैं। जैसे मिट्टीकी राशिमें घड़े और अङ्कुरमें पत्ते विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार भविष्यमें होनेवाली अन्य सृष्टि-परम्पराएँ भी परब्रह्म परमात्मामें स्थित हैं।
श्रीराम ! परमात्माके स्वरूपमें जो वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं—बिना हुए ही प्रतीत होती हैं, ऐसी इन विलक्षण सृष्टियोंमें ब्रह्माकी विविध विचित्र उत्पत्तियाँ बीत चुकी हैं। वास्तवमें यह संसार मनके संकल्पका विस्तारमात्र है। यही सर्वसम्मत सिद्धान्त है। मैंने केवल समझानेके लिये तुम्हारे समक्ष इस सृष्टि-क्रमका वर्णन किया है। फिर सत्ययुग, फिर त्रेता, फिर द्वापर और फिर कलियुग—इस प्रकार सारा जगत् घूमते हुए चक्रकी तरह बारंबार आता-जाता रहता है। जैसे प्रत्येक प्रातःकालके बाद दिन आता है, उसी प्रकार पुनः मन्वन्तरोंके आरम्भ होते हैं। एकके बाद पुनः दूसरे कल्पोंकी परम्पराएँ चलती हैं और बारबार कार्यावस्थाएँ प्राप्त होती रहती हैं। जैसे वृक्षमें विभिन्न ऋतुओंके अनुसार सारे फल-फूल आदि कभी अप्रकट रहते हैं और कभी समय पाकर प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार परम तत्त्व परमात्मामें यह सारा जगत् कभी अव्यक्त रहता है और कभी व्यक्त हो जाता है। श्रीराम ! यह संसार कभी भी सत् नहीं है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् परमात्मामें स्वभावसे ही सदा संसारका अत्यन्ताभाव है। महामते ! ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सब कुछ ब्रह्म ही है । इसलिये संसार नहीं है, यह कथन सर्वथा युक्तियुक्त ही है।
स्थिति-प्रकरण ] * विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर * २४३
अज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका कभी विच्छेद नहीं होता, वह सदा बना रहता है । इसलिये यह संसार-माया मिथ्या होती हुई भी मूढ़के लिये नित्य है, यह कथन भी युक्तिसंगत ही है । रघुनन्दन ! जगत् बारंबार उत्पन्न होता रहता है, इसलिये कभी इसका अभाव नहीं है—ऐसा जो कुछ लोगोंका कथन है, वह भी उनकी दृष्टिसे मिथ्या नहीं है। यह सब दृश्य पुनः-पुनः प्रकट होता है । बारंबार जन्म और मरण होते रहते हैं । सुख-दुःख, करण और कर्म भी बारंबार हुआ करते हैं । दिशाएँ, आकाश, समुद्र और पर्वत भी बारंबार उत्पन्न होते हैं । जैसे खिड़कीवाले घरोंमें एक ही सूर्यकी प्रभा बारंबार अनेक रूपोंमें प्राप्त होती है, वैसे ही यह सृष्टि प्रवाहरूपसे पुनः-पुनः चक्रकी भाँति चलती रहती है । फिर दैत्य और देवता जन्म लेते हैं, पुनः लोक-लोकान्तरोंके क्रम प्रकट होते हैं, फिर स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करनेकी चेष्टाएँ चालू होती हैं तथा पुनः इन्द्र और चन्द्रमाका आविर्भाव होता है । अनेकानेक दानव भी बारंबार जन्म लेते हैं तथा बारंबार सम्पूर्ण दिशाओंमें मनोहर चन्द्रमा, सूर्य, वरुण एवं वायुका संचार होता रहता है। कालरूपी कुम्हार नाना प्रकारके प्राणीरूप प्यालोंको बनानेके लिये पुनः बड़े वेगसे निरन्तर कल्प नामक चाकको चलाने लगता है । (सर्ग ४६-४७)
विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर; जगत्को मिथ्या मानकर उसमें आस्था न रखने, देहाभिमानको छोड़ने और अपने विशुद्ध स्वरूप (परमात्मपद) में स्थित होनेका उपदेश
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि भोग और ऐश्वर्यके द्वारा नष्ट हो गयी है तथा जो ऐहिक और पारलौकिक भोग एवं ऐश्वर्यके लिये सकामभावसे नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, ऐसे मूढ़ पुरुष सच्चिदानन्दघन परमात्माकी ओर ध्यान नहीं देते, इस कारण उनको परमात्माके यथार्थ स्वरूपका अनुभव नहीं होता (अर्थात् वे परम पुरुषार्थरूप परमात्माकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाते हैं)। जो पुरुष विवेकयुक्त तीक्ष्णबुद्धिकी चरम सीमाको पहुँचे हुए हैं तथा जिन्हें इन्द्रियोंने अपने वशमें नहीं कर रखा है, वे इस जगत्की मायाका हाथपर रखे हुए बेलके समान प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। जो जीव विवेकपूर्ण विचारसे युक्त है, वह इस जगत्की अहङ्कारमूलक मायाको तुच्छ जानकर उसी तरह त्याग देता है, जैसे साँप केंचुलको । श्रीराम ! जैसे आगसे भुना हुआ बीज चिरकालतक खेतोंमें रहनेपर भी जमता नहीं, उसी प्रकार वह विवेकी पुरुष अनासक्तिको प्राप्त हो दीर्घकालतक शरीरमें रहनेपर भी फिर जन्म नहीं लेता । किंतु अज्ञानी मनुष्य आधि-व्याधिसे घिरे हुए तथा आज या कल प्रातःकाल नष्ट हो जानेवाले इस क्षणभङ्गुर शरीरके हितके लिये ही प्रयत्न करते हैं, आत्माके लिये नहीं ।
इसके बाद दाशूर मुनिका उपाख्यान सुनाकर वसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! यह जड जगत् वास्तवमें है ही नहीं, ऐसा निश्चय करके इसमें सब ओरसे आसक्तिका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि जो वस्तु है ही नहीं, उसके प्रति विवेकशील पुरुषोंका विश्वास कैसे होगा । जैसे मनके संकल्पद्वारा कल्पित पुरुष अथवा मनोराज्यको, स्वप्नगत जन-समुदायको तथा भ्रमसे प्रतीत होनेवाले दो चन्द्रमाओंकी आकृतियोंको तुम देखते हो, उसी प्रकार मनकी भावनासे ही उत्पन्न हुए इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चको भी देखना चाहिये (अर्थात् इसे मिथ्या समझकर इसके प्रति राग-द्वेष नहीं करना
२४४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
चाहिये)। निष्पाप रघुनन्दन ! पदार्थोंके सौन्दर्यका चिन्तन करनेसे जो उनके प्रति आन्तरिक आस्था होती है, उसका पूर्णतः परित्याग करके तुम जिस चिन्मय स्वरूपसे स्थित हो, वही तुम्हारा वास्तविक रूप है। उसी रूपसे इस जगत्में तुम लीलापूर्वक विचरण करो। सब पदार्थोंके भीतर विद्यमान रहते हुए भी जो सबसे अतीत है, वह परमात्मा तुम्हीं हो। तुम्हारे सकाशमात्रसे यह नियति विस्तारको प्राप्त होती है। जैसे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित सूर्यदेवके आकाशमें स्थित होनेपर जगत्के सब व्यवहार होने लगते हैं, उसी प्रकार इच्छारहित परमात्माकी सत्तासे ही समस्त कार्य सम्पन्न होते हैं। जैसे रत्न (सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणि आदि) में प्रकाश करनेकी इच्छा न होनेपर भी उसकी स्थितिमात्रसे स्वतः प्रकाश होने लगता है, उसी प्रकार इच्छारहित परमात्माके सकाशसे ही इस जगत्-समुदायकी प्रवृत्ति (व्यवहारचेष्टा) होती रहती है। सच्चिदानन्द परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे अतीत होनेके कारण वास्तवमें कर्ता और भोक्ता नहीं है, किंतु इन्द्रियोंमें व्यापक होनेके कारण वही कर्ता और भोक्ता भी माना जाता है। 'मैं सबके भीतर स्थित और अकर्ता हूँ'—ऐसी सुदृढ धारणाके साथ विवेकी पुरुष प्रवाहरूपसे प्राप्त हुए कार्यको करता रहे, तो भी वह उससे लिप्त (बद्ध) नहीं होता। चित्तमें प्रवृत्तिका अभाव होनेसे मनुष्य उपरतिका प्राप्त होता है। जिसको यह निश्चय हो गया है कि मैं यहाँ कुछ भी नहीं करता, अर्थात् जो कर्तापनके अभिमानसे रहित हो गया है, ऐसा कौन पुरुष भोग-समूहोंकी कामना मनमें लेकर किसी कार्यको करेगा अथवा छोड़ेगा। इसलिये सदा 'मैं कर्ता नहीं हूँ' इस भावनाको जगाये रखनेसे पुरुषके लिये परम अमृतमयी समता ही शेष रहती है। 'मैं यह हूँ, मैं यह नहीं हूँ; मैं इसे करता हूँ और इसे नहीं करता' इस तरहके भावोंका अनुसंधान करनेवाली दृष्टि वास्तवमें संतोपजनक नहीं होती। 'मैं शरीर हूँ'—ऐसी धारापूर्वक जो स्थिति है, वही कालसूत्र नामक नरकका मार्ग है। वही महावीचि नरकका जाल है और वही असिपत्रवनकी पंक्तियाँ हैं। उस देहाभिमानका सर्वथा प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। मैं यह दृश्यरूप कुछ भी नहीं हूँ, किंतु साक्षात् सच्चिदानन्द परमात्मा हूँ—ऐसा निश्चय करके तुम अपने उस सर्वोत्तम स्वरूपमें सदा स्थित रहो, जिसमें श्रेष्ठ साधु, ब्रह्मवेत्ता पुरुष स्थित हुए हैं।
(सर्ग ४८—५६)
वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वज्ञानी महात्माकी महत्तम स्थितिका वर्णन
**श्रीरामचन्द्रजीने कहा—**ब्रह्मन् ! आपने अपनी उत्तम उक्तियोंद्वारा जो यह सुन्दर बात कही है, वह सर्वथा सत्य है। समस्त भूतोंकी सृष्टि करनेवाले परमात्मा अकर्ता होते हुए ही कर्ता हैं और अभोक्ता होते हुए ही भोक्ता हैं। प्रभो ! जो सबका अधिष्ठान और समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित है, उस सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्द निर्मल पदस्वरूप ब्रह्मका मेरे हृदयमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
**श्रीवसिष्ठजी बोले—**रघुनन्दन ! आत्मा ही आत्माको जानता है, आत्माने ही आत्माको संसारी बनाया है अर्थात् इसने स्वयं ही अज्ञानके कारण अपने-आपको संसार-बन्धनमें बाँधा है। आत्मा ही अपने ज्ञानके द्वारा पवित्र होकर सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त होता है। जो वासनाओंके बन्धनमें बँधा है, उसीको बद्ध कहा गया है। वासनाका अभाव ही मोक्ष है। (वासनाओंका सर्वथा क्षय हो जानेपर साधक संसारके बन्धनोंसे सदाके
स्थिति-प्रकरण ] * वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा * २४५
लिये मुक्त हो जाता है ।) अतः मन, बुद्धि आदिसे युक्त सम्पूर्ण वासनाओंका त्याग करके जिस वृत्तिके द्वारा उन सबका त्याग किया जाता है, उस बुद्धिवृत्तिका भी त्याग कर दो अर्थात् उसमें सम्बन्धरहित हो जाओ और सबका अभाव हो जानेपर जो एकमात्र नित्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही शेष रहता है, उसीमें अविचलभावसे स्थित रहो । शुद्ध बुद्धिसे युक्त रघुनन्दन ! प्राणोंके स्पन्दनपूर्वक कलना (चेष्टा एवं सङ्कल्प), काल, प्रकाश एवं तिमिर आदिका तथा वासना और विषयोंका (इन्द्रियों तथा समूल अहङ्कारका) सर्वथा त्याग करके उनसे सम्बन्धरहित होकर जो तुम आकाशके समान सौम्य (निर्मल), प्रशान्त-चित्त तथा चिन्मयरूपसे विराज रहे हो, उसी सर्वसम्मानित रूपमें स्थित रहो । जो परम बुद्धिमान् पुरुष सबका हृदयसे परित्याग करके सब विक्षेपोंके कारणभूत अभिमानसे रहित हो जाता है, वह साक्षात् शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप परमेश्वर हैं । जिसके हृदयमें अभिमानका अत्यन्त अभाव हो गया है, ऐसा विशुद्ध अन्तःकरणवाला ज्ञानी महात्मा ध्यान, समाधि अथवा कर्म करे या न करे, सदा मुक्त ही है; क्योंकि जिसका मन सर्वथा वासनारहित हो गया है, उसे न तो कर्मोंके त्यागसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके अनुष्ठानसे ही । जप, ध्यान और समाधिसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं है । मैंने शास्त्रका अच्छी तरह विचार किया और चिरकालतक सत्पुरुषोंके साथ परामर्श करके यही सार निकाला कि सम्पूर्ण वासनाओंसे रहित हुए सच्चिदानन्दघन परमात्माके निरन्तर मननरूप मौनसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम पद नहीं है । दसों दिशाओंमें घूम-घूमकर मैंने सारी दर्शनीय वस्तुओंको देख लिया; उनमें कुछ ही लोग ऐसे दिखायी दिये, जो परमात्माके स्वरूपका यथार्थ अनुभव करनेवाले हैं ।
मनुष्यके जो कोई भी लौकिक शुभ आयोजन हैं और जो भी उनके व्यावहारिक सत्कर्म हैं, वे सब केवल शरीरका निर्वाह करनेके लिये ही हैं, आत्माके लिये नहीं । पाताल, भूतल, स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक और आकाशमें कुछ ही ऐसे प्राणी दृष्टिगोचर होते हैं, जिन्हें सच्चिदानन्द परमात्माका यथार्थ बोध हो गया हो । जिस ज्ञानीके 'यह ग्राह्य है, यह त्याज्य है' इस तरहसे अज्ञानजनित निश्चय नष्ट हो गये हैं, ऐसा कर्तव्याकर्तव्य-दृष्टिसे रहित ज्ञानी महात्मा अत्यन्त दुर्लभ हैं । प्राणी चाहे लोकमें राज्य करे, चाहे मेघ या जलमें प्रवेश कर जाय; परंतु परमात्माकी प्राप्तिके बिना उसे परम शान्ति नहीं मिल सकती । जो इन्द्रियरूपी शत्रुओंका दमन करनेमें शूरवीर हैं, जन्मरूपी ज्वरका विनाश करनेके लिये उन्हीं महाबुद्धिमान् महापुरुषोंकी सेवा करनी चाहिये । पातालमें और स्वर्गमें सर्वत्र पाँच ही भूत हैं, छठा कुछ भी नहीं है । फिर धीर मनुष्योंकी बुद्धि कहाँ अनुरक्त हो (क्योंकि सर्वत्र क्षणभङ्गुर पदार्थोंकी ही उपलब्धि होती है) । शास्त्रके अनुसार निष्कामभाव-रूप युक्तिसे व्यवहार करनेवाले विवेकी पुरुषके लिये संसार गौके खुरके समान अनायास ही लाँघ जाने योग्य है । परंतु जिसने उपर्युक्त युक्तिका दूरसे ही परित्याग कर दिया है, उस अज्ञानीके लिये यह संसार महाप्रलयकालीन महासागरके समान दुस्तर है । पातालसे लेकर स्वर्गपर्यन्त इस जगत्में ज्ञानी महात्मा पुरुषके लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है । जैसे मन्द-मन्द वायुके चलनेसे पर्वत नहीं हिलता, वैसे ही भोग-समूहोंसे तत्त्वज्ञानी पुरुष नहीं विचलित होता । जैसे बादल आकाशमें बारंबार छा जानेपर भी उसे अपने रंगमें नहीं रँग सकते, उसी प्रकार संसारके ये विषय-भोगरूप कोई भी पदार्थ पुनः-पुनः प्राप्त होनेपर भी विशाल-हृदय तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषको आसक्त नहीं कर सकते । (सर्ग ५७)
२४६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परमात्मभावमें स्थित हुए कचके द्वारा सर्वात्मत्वका बोध करानेवाली गाथाओंका गान, भोगोंसे वैराग्यका उपदेश तथा सबकी परमात्मामें स्थितिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी पूर्वोक्त वस्तुके विषयमें पहले बृहस्पतिके पुत्र कचने जो पवित्र गाथाएँ गायी थीं, उनका मैं वर्णन करता हूँ; सुनो। एक समय मेरु पर्वतके किसी वनप्रान्तमें देवगुरु बृहस्पतिके पुत्र कच ब्रह्मविचारमें तत्पर होकर रहते थे। वहाँ उन्होंने सुनी हुई ब्रह्मविद्याका बारंवार मनन और निदिध्यासन करके आत्मामें परम शान्ति प्राप्त कर ली थी। इसलिये उनकी बुद्धि परमात्माके यथार्थज्ञानरूपी अमृतसे परिपूर्ण थी। विरक्त एवं विवेकी पुरुषोंके लिये अनादरके योग्य जो यह आपातरमणीय पाञ्चभौतिक दृश्य जगत् है, इसमें उनकी बुद्धि नहीं लगती थी। दृश्य-प्रपञ्चके प्रति आदर न होनेके कारण उसमें उनका मन नहीं लगता था। इसलिये एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्माके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुको न देखते हुए उन्होंने अत्यन्त विरक्त पुरुषकी भाँति अकेले एकान्त स्थानमें हर्ष-गद्गद वाणीद्वारा यह उद्गार प्रकट किया।
अहो ! जैसे महाप्रलयके जलसे समस्त संसार भरा रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व परमात्मासे परिपूर्ण है। दुःख, जीवात्मा और सुख एवं दिशाओंसे घिरा हुआ सुमहान् आकाश—ये सब परमात्मा ही हैं, ऐसा मुझे अनुभव हो गया; अतः उसी आनन्दमय परमात्माके ज्ञानसे मेरे सारे दुःख नष्ट हो गये हैं। बाह्य एवं आभ्यन्तर भावोंसे युक्त इस देहमें, ऊपर-नीचे और पूर्व आदि दिशाओंमें तथा इधर-उधर परमात्मा ही हैं। परमात्माके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु कहीं नहीं है*। सभी जगह परमात्मा स्थित हैं। सब कुछ परमात्ममय ही है। यह सब जगत् परमात्मा ही है, अतः मैं सदा परमात्मामें ही स्थित हूँ। मैं नित्य विज्ञानानन्दघन परमात्मस्वरूप हूँ और एकार्णवके समान सर्वत्र सुखपूर्वक विराजमान हूँ—इस प्रकारकी भावना करके क्रमशः घण्टानादकी तरह ओंकारका उच्चारण करते हुए वे उस मेरु पर्वतके कुञ्जमें बैठे रहे। श्रीराम ! वे कल्पनारूपी कलङ्कसे रहित होनेके कारण शुद्धरूपमें स्थित थे। उनके प्राणोंका स्पन्दन हृदयमें निरन्तर लीन था और वे शरत्कालके मेघरहित आकाशकी भाँति निर्विकार भावसे स्थित थे। ऐसी स्थितिमें पहुँचे हुए महात्मा कचने उपर्युक्त गाथाओंका गान किया था।
रघुनन्दन ! इस जगत्में खाने-पीने और स्त्री-समागमके अतिरिक्त उत्तम पुरुषार्थरूप शुभ वस्तु कुछ भी नहीं है—अज्ञानियोंके इस कथनपर विचार करके परम पदमें आरूढ़ हुआ महान् पुरुष यहाँ किस वस्तुकी वाञ्छा कर सकता है? जो मूढ़ एवं असाधु पुरुष कृपणोंके सर्वस्वभूत—आदि, मध्य एवं अन्तमें भी विनाशशील भोगोंद्वारा संतुष्ट होते हैं, वे पशुओं और पक्षियोंके समान गये-बीते हैं। जो संसारमें इन मिथ्या विषयभोगोंको सत् मानते हैं—इनकी स्थिरतापर विश्वास करते हैं, वे मनुष्योंमें गदहोंके समान हैं, उनका जीवन व्यर्थ है। सारी पृथ्वी मिट्टी ही है। समस्त वृक्ष काष्ठमय ही हैं और सभी शरीर हड्डी-मांसके पुतले ही हैं। नीचे पृथ्वी है तथा ऊपर और आगे-पीछे आकाश है; फिर यहाँ सुख देनेके लिये कौन-सी अपूर्व वस्तु है ? उत्पन्न और विनष्ट होनेवाली, अनित्य तथा मन और इन्द्रियोंके संयोगसे प्रकट हुए समस्त भोग वास्तवमें मिथ्या ही हैं। हड्डियोंके समूहको अपने शरीरकी संज्ञा देनेवाले पुरुषके द्वारा अपनी प्रेयसी कहकर एक रक्त-मांसकी पुतलीका सादर आलिङ्गन किया जाता है। यह संसारको मोहित करनेवाले कामका ही क्रीडा-विलास है। श्रीराम ! यह सारा जगत् मूढ़ पुरुषोंकी दृष्टिमें ही सत्य और स्थिर है। उन अज्ञानी मनुष्योंके लिये ही यह संतोषदायक होता है। विवेकशील
* इस विषयमें श्रुतिका भी कथन है—आत्मैवाधस्ता-दात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति (छा० उ० ७ । २५ । २)। अर्थात् परमात्मा ही नीचे है, परमात्मा ही ऊपर है, परमात्मा ही पीछे है, परमात्मा ही आगे है, परमात्मा ही दायीं ओर है, परमात्मा ही बायीं ओर है और परमात्मा ही यह सब है।
स्थिति-प्रकरण ] * राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन * २४७
एवं विरक्तको इससे संतोष नहीं प्राप्त होता; क्योंकि उनकी दृष्टिमें यह समस्त संसार क्षणभङ्गुर एवं विनाशशील है। भोगोंकी वासना ऐसी विषैली होती है कि उन विषयोंका उपभोग न करनेपर भी विषकी तरह मूर्च्छा (मोह) पैदा कर देती है।
महाबाहु श्रीराम ! सृष्टिकी व्यवस्था करनेवाले पितामह भगवान् ब्रह्मा जब समाधिसे उत्थित होते हैं, जब यह जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र अपनी व्यवस्थाके अनुसार चालू होता है और प्राणीरूपी घट वासनारूपी रस्सीसे बँधकर जीवनकी इच्छासे अपने कर्मानुसार नीचे-ऊपर आने-जाने लगते हैं, तबसे निरन्तर कुछ जीव इस भवकूपसे निकलते हैं और कुछ इसके भीतर प्रवेश करते हैं। श्रीराम ! अनादि-अनन्त ब्रह्मपदसे उत्पन्न हुए जीव-समुदाय उसी तरह ब्रह्ममें स्थित हैं, जैसे तरङ्गोंके समूह समुद्रमें। पुण्यात्मा रघुनन्दन ! संसारमें उत्पन्न हुए जो-जो पुरुष केवल सात्त्विक भावसे सम्पन्न हैं, वे फिर कभी यहाँ जन्म ग्रहण नहीं करते—सर्वथा मुक्त हो जाते हैं; परंतु जो सत्त्वगुणप्रधान राजस-प्रकृतिके पुरुष हैं, उनका इस जगत्में पुनर्जन्म लेना सम्भव है। जो परमात्मासे अधिकार प्राप्त करके प्रधानरूपसे यहाँ आते हैं, ऐसे महान् गुणशाली पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं।
( सर्ग ५८—६० )
राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन; जगत्की अनित्यता एवं परमात्माकी सर्वव्यापकताकी भावनाके लिये उपदेश; श्रीरामके आदर्श गुणोंको अपनाने एवं पौरुष-प्रयत्न करनेसे जीवन्मुक्त पदकी प्राप्तिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो पूर्वजन्मकी राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए हैं, वे महान् गुणशाली पुरुष आकाशमें प्रकाशित चन्द्रमाके समान सदा मनोहर कान्तिसे युक्त एवं आनन्दमग्न रहते हैं। जैसे आकाशका भाग मेघ आदिसे मलिन नहीं होता, उसी प्रकार वे सांसारिक दुःखोंसे दुखी नहीं होते। जैसे सुवर्णनिर्मित कमल रात्रिमें संकुचित या मलिन नहीं होता, उसी प्रकार वे आपत्तिमें पड़नेपर भी शोकसे कातर नहीं होते। जैसे स्थावर वृक्ष आदि प्रारब्धभोगके अतिरिक्त दूसरी कोई चेष्टा नहीं करते, उसी प्रकार वे भी ज्ञान और ज्ञानके साधनोंके अतिरिक्त और कोई चेष्टा नहीं करते। जैसे वृक्ष अपने पुष्प और फल आदिसे सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार वे भी अपने सदाचारोंसे शोभायमान होते हैं। जैसे चन्द्रमा क्षीण होनेपर भी कभी शीतलताका त्याग नहीं करता, उसी प्रकार वे आपत्तिकालमें भी अपने सौम्य स्वभावको नहीं छोड़ते। मैत्री * आदि गुणोंसे कमनीयताको प्राप्त हुई अपनी प्रकृतिसे ही वे नूतन पुष्पगुच्छोंसे विभूषित लतासे शोभायमान वनके वृक्षोंकी भाँति बहुत शोभा पाते हैं। वे पुरुष सबपर समान भाव रखते, समता-रूप रसका अनुभव करते, सदा सौम्यभावका आश्रय लेते, साधुओंसे भी बढ़कर साधु होते और अपनी मर्यादामें स्थित रहनेवाले समुद्रकी भाँति शास्त्र-मर्यादामें स्थित रहते हैं। अतः महाबाहो ! आपत्तियोंकी पहुँचसे परे जो उनका पद (स्थान) है, उसकी ओर सदा चलना चाहिये। मनुष्यको इस जगत्में सत्त्वगुणप्रधान राजस पुरुषोंकी भाँति ऐसा बर्ताव तथा सत्-शास्त्रोंका विचार करना चाहिये, जिससे परमात्माकी प्राप्ति हो। इस प्रकार भावना करनेवाले पुरुषको सब वस्तुओंकी अनित्यताका भी विचार करना चाहिये। विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष अज्ञानको बढ़ानेवाले मिथ्याभूत अनात्मदर्शनका त्याग करके सांसारिक पदार्थोंके विषयमें यह भावना करे कि ये सब-के-सब आपत्ति ही हैं; उनमें सम्पत्तिभावना कभी न करे। उस (यो० द० १ । ३३) 'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्माओंके प्रति क्रमशः मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त शुद्ध होता है।'
* योगदर्शनमें बताया गया है—'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।'
२४८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परम पुरुषार्थरूप अनन्त नित्य-विज्ञानानन्दघन ब्रह्मका भलीभाँति चिन्तन करना चाहिये। कर्मोंमें अत्यन्त आसक्त नहीं होना चाहिये और अनर्थकारी जन-समुदायके साथ कभी नहीं रहना चाहिये। 'संसारकी सभी वस्तुओंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद अवश्यम्भावी है' ऐसा विचार करके सदा श्रेष्ठ पुरुषोंका ही अनुसरण अथवा (अनुकरण) करना चाहिये। जैसे सूतमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उस नित्य विस्तृत सर्वव्यापी सर्वभावित शिवस्वरूप परमपद (परमात्मा) में यह समस्त जगत् पिरोया हुआ है (अर्थात् इस सम्पूर्ण जगत्में परमात्मा व्याप्त हैं)। जो चेतन परमात्मा विशाल भुवनमण्डलको विभूषित करनेवाले आकाशवर्ती सूर्यदेवमें विराजमान हैं, वे ही धरतीमें बिलके भीतर रहनेवाले कीड़ेके पेटमें भी हैं। निष्पाप रघुनन्दन ! जैसे यहाँ घटाकाशका महाकाशसे वास्तविक भेद नहीं है, उसी प्रकार शरीरवर्ती जीवोंका परमात्मासे परमार्थतः भेद नहीं है। श्रीराम ! जो उत्पन्न होकर विलीन हो जाती है, वह वस्तु वास्तवमें है ही नहीं। अतः यह जड संसार प्रतीतिमात्र है। यह सदा स्थिर नहीं रहता, इसलिये इसे सत् नहीं कहा जा सकता। किंतु प्रतीत होता है, इसलिये इसे असत् भी नहीं कहा जा सकता। अतएव यह अनिर्वचनीय है।
पहले विवेक और विचारसे युक्त धीर साधक शास्त्रके अनुसार परम बुद्धिमान् तत्त्वज्ञानी श्रेष्ठ महापुरुषोंसे मिलकर उनके साथ सत्शास्त्र-विषयक विचार करे। विषय-तृष्णासे रहित तत्त्वज्ञानसम्पन्न साधु महापुरुषके साथ परमात्मविषयक विचार करके परमात्माका ध्यान करनेसे परमपद प्राप्त होता है। शास्त्रोंके विचार, महापुरुषोंके सङ्ग, वैराग्य और अभ्यासरूप सत्कार्यसे युक्त पुरुष परमात्माके ज्ञानका पात्र होकर तुम्हारे समान शोभा पाता है। तुम ज्ञानवान् तथा नाना प्रकारके दिव्यगुणोंकी खान हो। तुम्हारा आचार-व्यवहार उदार है तथा तुम समस्त दोषोंसे रहित एवं दुःखरहित परमपदमें स्थित हो। तुम उत्तम अनुभवसे सम्पन्न हो। अतः इस समय संसारमें पूर्वोक्त साधक मनुष्य राग-द्वेषहीन व्यवहारद्वारा तुम्हारी चेष्टाका अनुसरण करेंगे। जो लोकोचित आचारसे युक्त हो बाहर विचरण करेंगे, वे ज्ञानरूपी नौकासे युक्त बुद्धिमान् पुरुष संसार-सागरसे पार हो जायेंगे। जो तुम्हारे समान विशुद्ध बुद्धिसे युक्त और समदर्शी है, वह उत्तम दृष्टिवाला सत्पुरुष मेरी बतायी हुई ज्ञानदृष्टियोंको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। जबतक तुम्हारा शरीर है, तबतक राग-द्वेष और इच्छा आदिसे रहित हो शास्त्रके अनुसार आचरण करते हुए स्थित रहो। शुद्ध सात्त्विक जन्मवाले जीवन्मुक्त पुरुषोंके जो परम सत्य एवं स्वाभाविक शम, दम आदि गुण हैं, उनका सेवन करता हुआ साधारण पुरुष भी मरकर दूसरे जन्ममें जीवन्मुक्त-पदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि जीव इस जगत्में जिन जाति-गुणोंका सदा सेवन करता है, दूसरे जन्ममें उत्पन्न होकर वह उसके अनुसार उसी जातिको प्राप्त होता है। (तात्पर्य यह कि उत्कृष्ट जातिके गुणोंका सेवन करनेपर वह उत्तम जातिमें जन्म पाता है। और अधम जातिके गुणोंका सेवन करनेपर अधम जातिमें ही जन्म ग्रहण करता है।) कर्मोंके अधीन हुए जीव पूर्वजन्मके सब भावोंको कर्मोंके अनुसार ही पाते हैं। पर्वतोंको भी लोग पराक्रमसे जीत लेते हैं, इसलिये मनुष्यको आत्मकल्याणके लिये तत्परतापूर्वक परम पुरुषार्थ करना चाहिये। जीव सात्त्विक, राजस और तामस—किसी भी योनिमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो, उसे कीचड़में फँसी हुई भोली-भाली गायकी तरह अपनी बुद्धिका धैर्यके साथ परम उद्योगपूर्वक संसाररूपी पङ्कसे उद्धार करना चाहिये। पुरुषोचित प्रयत्नसे ही उत्तमोत्तम गुणोंद्वारा सुशोभित होनेवाले मुमुक्षु पुरुष दूसरे जन्ममें जीवन्मुक्त-पदको प्राप्त होते हैं। पृथ्वीपर, स्वर्गमें, देवनागोंमें अथवा अन्यत्र भी कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे सद्गुणसम्पन्न पुरुष अपने पुरुषार्थ या प्रयत्नसे प्राप्त न कर सके। (सर्ग ६१-६२)
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