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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

( ६४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [- आर्हत- स्थावराणां च तदहिंसाव्रतं मतम् ॥ प्रियं पथ्यं वचस्तथ्यं सूनृतं व्रतमुच्यते । तत्तथ्यमपि नो तथ्यमप्रियं चाहितं च यत् ॥ अनादानमदत्तस्यास्तेयव्रतमुदीरितम् । वाह्या प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता हि ते ॥ दिव्यौदार्यिककामानां कृतानुमतका- रितै ॥ मनोवाक्कायतस्त्यागो ब्रह्माष्टादशधा मतम् ॥ २४ ॥ संसार हेतु कर्मकी निवृत्ति सम्यक् चारित्र है यह सब अर्हत्ग्रन्थमे प्रपंचित है (सर्वयेत्यादि) निन्दित कर्मका सर्वथा त्याग चारित्र है वह अहिंसादि व्रतभेदसे पाँच प्रकार है. अहिंसा १ अपरिग्रह २ अस्तेय ३ ब्रह्मचर्य ४ सूनृत ५ यह पाँच हैं चर, वा स्थावररूप प्राणियोंको प्रमाद् अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभरूप चतु- र्विध कषायमे जीवित (दश इन्द्रियोंका) वियोग न करना अहिंसाव्रत है । अतएव तत्त्वार्थसूत्र “प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इति ॥ प्रिय, हित, और सत्य- वचन सूनृत व्रत है तथ्य भी हो परन्तु अप्रिय ओर अहित हो तो उसको अस- त्यके समान जानना चाहिये । तथा च मनुः 'सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान ब्रूयात्सत्य- मप्रियम् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयादेष धर्म सनातन ॥” इति । तत्वार्थसूत्र “असदभिधानमनृतम्” इति । जो नहीं दिये हुए वस्तुको ग्रहण करना स्तेय (चोरी) है उससे भिन्न अस्तेय है क्योंकि धन प्राणियोंके बाह्य प्राण है अतः उस प्राणको हरनेसे प्राणी हत होता है । तथा च सूत्रम् 'अदत्तादानं स्तेयम्” इति । दिव्य और औदार्यिक कामको मन कर्म बचनसे त्यागना ब्रह्मचर्य है वह अठारह प्रकार है ॥ २४ ॥ सर्वभावेषु मूर्छायास्त्याग स्यादपरिग्रह । यदसत्स्वपि जायेत मूर्छया चित्तविप्लव ॥ भावनाभिर्भावितानि पञ्चभि पञ्चधा क्रमात् । महाव्रतानि लोकस्य साधयन्त्यव्ययं पदम् ॥” इति। भावनापञ्चकप्रपञ्चनं च प्ररूपितम् - "हास्यलोभभयक्रो- धप्रत्याख्यानैर्निरन्तरम् । आलोच्य भाषणेनापि भावयेत् सूनृतं व्रतम् ॥” इत्यादिना । एतानि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मिलितानि । मोक्षकारणं न प्रत्येकं यथा रसायनसाधनानि सम्भूय रसायनफलं साधयन्ति न प्रत्येकम् ॥ २५ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ६५ ) समस्त वस्तुओंमें मोहविशेषका त्याग अपरिग्रह है । क्योंकि मूर्च्छासे निन्दित वस्तुओंमेंभी मनकी आसक्ति होजाती है । उक्त पाँचों व्रत वक्ष्यमाण पाँच प्रकारकी भावनाओंमे अनुष्ठित होनेपर प्राणियोंका अव्यय पद प्राप्त कराते हैं। पाँच भावनाओंके कहते हैं। हास्य, लोभ, त्याग, भय और क्रोध इनका त्याग तथा सदा विचारपूर्वक भाष- णरूपी पाच भावनाओंसे सूनृत व्रतको सम्पादन करे एवं अन्य चारों व्रतोंमें भी प्रत्येक पाँच पाँच प्रकारकी भावना करे । जिस प्रकार रसायनादि औषधियोंके लिये जितनी सामग्री अपेक्षित हे वह सब मिलकर रसायनका फल उत्पन्न करती हैं न की केवल एक एकवस्तु तादृश फल देसकती है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र मिलकर मोक्षकाकारण है ॥ २५ ॥ अत्र सङ्क्षेपतस्तावज्जीवाजीवाख्ये द्वे तत्त्वे स्तः। तत्र बोधात्मको जीवः, अबोधात्मकस्त्वजीवः। तदुक्तं पद्मनन्दिना "चिदचिद्वे परे तत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनम्। उपादेयमुपादेयं हेयं हेयं च कुर्वतः ॥ हेयं हि कर्तृरागादि तत् कार्यमविवेकिनः। उपादेयं परं ज्योति- रुपयोगैकलक्षणम् ॥" इति। सहजचिद्रूपपरिणति स्वीकुर्वाण- ज्ञानदर्शने उपयोग । स परस्परप्रदेशानु प्रदेशन्बधात्कर्मणै- कीभूतस्यात्मनोऽन्यत्वप्रतिपत्तिकारणं भवति ॥ २६ ॥ सक्षेपत तत्त्वविचार-जीव और अजीव दो तत्त्व हैं बोधरूप अर्थात् चेतनालक्षण जीव है इससे विपरीत अचेतन अजीव है । ( चिदाचिद्वेति ) उक्तार्थ कर्तृत्व रागादि हेय है वह अविवेकका कार्य है । परज्योति उपादेय है वह मतिज्ञान श्रुतज्ञान मत्य- ज्ञान श्रुताज्ञानादि भेदयुक्त ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग स्वरूप है । वह उपयोग कर्मवश परस्पर प्रदेश संयोगसे एकीभूत आत्माको अन्यत्वप्रतीतिका कारण है ॥२६॥ १ तथा च तत्त्वार्थसूत्र " तत्स्थैर्यार्थ भावना पच पच " तत्स्थैर्य पूर्वोक्त व्रतपुष्टिके लिये प्रथमव्रतम " वाङ्मनोगुप्तिर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पच " द्वितीयमें- " क्रोध लोभ भीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभापणञ्च पञ्च " इति । तृतीयमें- " शून्यागारे विमोचितावासे परोपरोधाकरणे भैक्ष्यशुद्धि सद्धर्माविसंवादा पञ्च " इति । ब्रह्मचर्यव्रतभावना " स्त्रीरागकथाश्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वतानुस्मरण वृष्येतरस स्वश- रीरसंस्कारत्यागा पच " इति । अपरिग्रहव्रत भावनाः-"मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्ज- नानि पञ्च " इति । इन सूत्रोंका विस्तृत व्याख्यान सर्वार्थसिद्धिमें है यहां केवल नामनिर्देश मात्र किया है ।

( ६६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- सकलजीवसाधारणं चैतन्यमुपशमक्षयक्षयोपशमवशादौपश- मिकक्षायात्मकक्षायोपशामिकभावेन कर्मोदयवशात् कालुष्या- कारेण च परिणतजीवपर्यायजीवविवक्षायां स्वरूपं भवति । यदवोचद्वाचकाचार्य्य - "औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रं च जीवस्य सत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ चेति । अनुदयप्राप्तिरूपे कर्मण उपशमे सति जीवस्योत्पद्यमानो भाव औपशमिकः । यथा पङ्के कलुषतां कुर्वति कतकादिद्रव्यसम्बन्धादधः पतिते जलस्य स्वच्छता । कर्मणः क्षयोपशमे सति जायमानो भाव- क्षायिकः । यथा मोक्षः । उभयात्मा भावो मिश्रः । यथा जलस्या- र्द्धस्वच्छता । कर्मोदये सति भवन् भाव औदयिकः । कर्मोपश- माद्यनपेक्षः सहजो भावश्चेतनत्वादिः पारिणामिकः । तदेतत् स्वतत्त्वं यथासम्भवं भव्यस्याभव्यस्य जीवस्य तत्त्वं स्वरूप- मिति सूत्रार्थः ॥ २७ ॥ समस्त जीव साधारण चैतन्य उपशम, क्षय, क्षयोपशम, निमित्तसे ओपशामिक क्षायिक, क्षयोपशामिक भाव वश कर्मोदय और कालुष्यसे अन्याकारमे परिणत जीवपर्यायका स्वरूप होता है इसमें तत्त्वार्थसूत्र प्रमाण भी देते हैं (यदवोचदित्यादि ) आत्मामें कर्मरूप स्वशक्तिका किसी कारणवश प्रादुर्भाव न होना उपशम है तादृश उपशमके अनन्तर जीवका उत्पद्यमान भाव औपशमिक है । जिस प्रकार जलको कलुषित करनेवाला कर्दम निर्मलीके संयोगसे जब नीचे बैठ जाता है तब जलकी निर्मलता होती है । अत्यन्त निवृत्ति क्षय है तथा च कर्मका क्षय होनेसे उत्पन्न भाव क्षायिक है जिस प्रकार स्फटिकादि पात्रमें रखे हुए जलमें कर्दमका अत्यन्त अभाव होता है वैसी जीवकी मोक्षदशामें कर्मोंका अत्यन्त अभाव है । उभयात्मक भाव मिश्र है जिस प्रकार जलमें आधी स्वच्छता द्रव्यादिनिमित्तसे कर्म फलप्राप्तिका नाम उदय है कर्मोद्यमे जायमान भाव औदयिक है कर्मोपशमनिरपेक्ष सहज होनेवाला चेतन त्वादि अर्थात् द्रव्यात्मलाभ मात्र निमित्तक परिणामिक हे उक्त पाँच भाव यथा- योग्य भव्याभव्यात्मक जीवका स्वरूप है ॥ २७ ॥ तदुक्तं स्वरूपसम्बोधने—“ज्ञानाद् भिन्नो न चाभिन्नो भिन्ना-

दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेत. । ( ६७ ) भिन्नः कथञ्चन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मेति कीर्तितः ॥" इति ॥ २८ ॥ ( तदुक्तमिति ) ज्ञानसे अत्यन्त भिन्न या अत्यन्त अभिन्न आत्मा नहीं है किन्तु भिन्नाभिन्न अर्थात् पूर्वापरोभूत ज्ञानको आत्मा कहते हैं ॥ २८ ॥ 'ननु भेदाभेदयोः परस्परपरिहारेणावस्थानादन्यतरस्यैव वास्त- वत्वादुभयात्मकमयुक्तमिति चेत्तदयुक्तम्, बाधे प्रमाणाभावात्। अनुपलम्भो हि बाधकं प्रमाणं न सोऽस्ति समस्तेषु वस्तुष्वने- करसात्मकत्वस्य स्याद्वादिनो मते सुप्रसिद्धत्वादित्यलम् ॥ २९ ॥ भेदाभेदका विरोधाभाव समर्थन-( ननु इत्यादि ) यथा घटसे भिन्न पट है घटमें पटका भेद अर्थात् अभाव है तहा घट नहीं रहसकता अभेद अर्थात् भेदाभाव घटमें पटका भेदाभाव पटरूपता है तथा च भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होनेसे एकत्र नहीं रह सकते । नैयायिकोंने भी भेदका प्रतियोगितावच्छेदकके साथ और अभावका प्रतियोगीके साथ विरोध माना है अतः परस्पर विरुद्ध होनेसे एकको सत्यत्व और अन्यको मिथ्यात्व कहनाहोगा । उत्तर(तदयुक्तमिति ) सहानवस्थान लक्षण ही विरोध है विरोध होनेपर बाध्यबाधकभाव होता है बाधमें कोई प्रमाण ही नहीं घट जहापर है वहा घटाभाव उपलब्ध नहीं होता न घटाभाव व्यवहार भी नहीं होता है अत अनुपलब्धरूप ही प्रमाण कहोगे सो भी ठीक नहीं क्योंकि स्याद् वादियोंके मतमें समस्तवस्तुओंमें अनेकान्तात्मक अर्थात् ( स्यादस्ति स्यान्नास्ति ) इत्यादि अनिश्चयात्मक रहता है अतः आर्हत् मतमें कोई विरोध ही नहीं ॥ २९ ॥ अपरे पुन जीवाजीवयोरपरं प्रपञ्चमाचक्षते जीवाकाशधर्माधर्म- पुद्गलास्तिकायभेदात् । एतेषु पञ्चसु तत्त्वेषु कालत्रयसम्ब- न्धितया स्थितिव्यपदेशः, अनेकप्रदेशत्वेन शरीरवत् कायव्य- पदेशः । तत्र जीवा द्विविधाः, संसारिणो मुक्ताश्च । भवाद्भवा- न्तरप्राप्तिमन्त संसारिण । ते च द्विविधा , समनस्का अमन- स्काश्च । तत्र संज्ञिनः समनस्का , शिक्षाक्रियालापग्रहणरूपा संज्ञा, तद्विधुरास्त्वमनस्काः । ते चामनस्का द्विविधा , त्रस- स्थावरभेदात् । तत्र द्वीन्द्रियादय शङ्खगण्डोलकप्रभृतयश्चतु- र्विधास्त्रसाः ॥ ३० ॥

( ६८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

तत्त्वपञ्चक वादिका मत-(अपरेषु नास्त्यादि) जीव, आकाश, धर्म, अधर्म, पुद्गल अस्तिकायशब्दका प्रत्येकमे सम्बन्ध है अर्थात् जीवास्तिकाय आकाशास्तिकाय इत्यादि इन पांच तत्त्वोंमे कालत्रयसम्बन्धसे स्थिति व्यवहार और अनेक प्रदेश होनेसे शरीरवत् काय व्यवहार योग्य होनेसे अस्तिकाय कहा जाता है। संसारी और मुक्त भेदसे जीव दो प्रकार है ससरण अर्थात् परिवर्तनशील संसारी है वह भी मनो युक्त और मनोरहित भेदमे दो प्रकार है । शिक्षा क्रिया आलापादिरूप संज्ञायुक्त समनस्क है इससे शून्य अमनस्क है अमनस्क । भी त्रस, स्थावर भेदसे दो प्रकार है (द्वीन्द्रियादय इत्यादि) तथा च तत्त्वार्थसूत्र 'द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः' इति । दो तीन चार पांच इन्द्रिय जिसको हो वह त्रस है "कृमि पिपीलिका भ्रमर, मनुष्यादीनामे कैकवृद्धानि" इति । अर्थ पूर्वसूत्र "वनस्पत्यन्तानामेकम्" में वनस्पतियोंको एक मात्र स्पर्शनेन्द्रिय कहा है उसमेंसे स्पर्शका अधिकार इस सूत्रमे आता है उसके साथ क्रमशः एक एक बढानेसे (द्वीन्द्रियादि) कृमि शंख प्रभृतिको स्पर्श और रसना दो इन्द्रिय होतीहे पिपीलिका प्रभृतिको स्पर्श, रसना, घ्राण तीन इन्द्रिये हे भ्रमरादिको स्पर्श, रसना, घ्राण और चक्षु चार इन्द्रिये हे मनुष्यादिको श्रोत्र सहित पूर्वोक्त मिल कर पाच इन्द्रिय होती है ॥ ३० ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतय स्थावरा । तत्र मार्गगतधूलि पृ- थिवी, इष्टकादि पृथिवीकाय, पृथिवीकायत्वेन येन गृहीता स पृथिवीकायिक, पृथिवी कायत्वेन यो ग्रहीष्यति स पृथिवी- जीव । एवमब्वादिष्वपि भेदचतुष्टयं योज्यम् । तत्र पृथिव्यादि कायत्वेन गृहीतवन्तो ग्रहीष्यन्तश्च स्थावरा गृह्यन्ते न पृथि- व्यादिपृथिवीकायादय तेषा जीवत्वात् । ते च स्थावरा स्पर्श- नैकैन्द्रियाश्च भवान्तरप्राप्तिनिष्ठुरा मुक्ता• धर्मा धर्माधर्माका- शास्तिकायास्ते एकत्वशालिनो निष्क्रियाश्च द्रव्यस्य देशा- -न्तरप्राप्तिहेतु ॥ ३१ ॥ स्थावर निरूपण-पृथिवी, जल, तेज, वायु और वनस्पति ये स्थावर हे (मार्ग गतेति) अचेतन कठिन गुणयुक्त पृथिवी हे पृथिव्यादिके चार चार भेद आगममे कहे हैं पृथिवी पृथिवीकाय पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव यही चार प्रकार हैं इस प्रकार जलादिमे भी चार भेद है काय शरीर है पृथिवीकाय इष्टकादि है पृथिवी

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ६३ ) कायिक मृतशरीरादि पृथिवीको शरीररूपसे जो ग्रहण करता है वह पृथिवी जीव है पृथिव्यादिको कायरूपसे ग्रहण करनेवाला स्थावर है पृथिवी वा पृथिवीकाय नहीं क्योंकि वह जीव है "वनस्पत्यन्तानामेकम्" इति सूत्रोक्त प्रकार पृथिव्यादि एक मात्र स्पर्शन इन्द्रिय है यह सब पुनः संसार प्राप्ति रहित होनेसे मुक्त कहा जाते हैं धर्म्म अधर्म और आकाशास्तिकायादिक एक और निष्क्रिय है द्रव्यको प्रदेशान्तर प्राप्तिमें हेतुभी है ॥ ३१ ॥ तत्र धर्माधर्मौ प्रसिद्धौ आलोकेनाविच्छिन्ने नभसि लोकाकाश- पदवेदनीये सर्वत्रावस्थितिगतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुप- कार, अत एव धर्मास्तिकाय प्रवृत्त्यनुमेयः अधर्मास्तिकायः स्थित्यनुमेयः । अन्यवस्तुप्रदेशमध्येऽन्यस्य वस्तुन प्रवेशोऽ- वगाहः तदाकाशकृत्यम् । स्पर्शरसवर्णवन्त पुद्गला । ते च द्विविधा, । अणव स्कन्धाश्च । भोक्तुमशक्या अणव । द्व्यणु- कादयः स्कन्धाः । तत्र द्व्यणुकादिस्कन्धभेदादण्वादिरुत्पद्यते, अण्वादिसङ्घातात् द्व्यणुकादिरुत्पद्यते । क्वचिद्भेदसंघाताभ्यां स्कन्धोत्पत्ति, अतएव पूर्य्यन्त गलन्तीति पुद्गलाः । कालस्या- नेकप्रदेशत्वाभावेनाऽस्तिकायत्वाभावेऽपि द्रव्यत्वमस्ति तल्ल- क्षणयोगात् ॥ ३२ ॥ विहितकर्मानुष्ठानादि धर्म और निन्दित कर्मानुष्ठानादि अधर्मरूपसे प्रसिद्ध है आलोकविशिष्ट आकाश अर्थात् जिसको लोकाकाश कहते हैं उसमें सर्वत्र गति ओर स्थितिका उपकारक धर्माधर्म है । धर्माधर्म प्रवृत्ति और निवृत्तिके उपकारक होनेसे ही प्रवृत्ति स्थितिरूप कार्यसे धर्माधर्मका अनुमान होता है । आकाश अवकाशका हेतु है जैसे गृहमें घटादिका प्रवेश होता है । स्पर्श, रस, रूपगुणवाला पुद्गल है । वह अणु स्कन्ध भेदसे दो प्रकार है । उपभोगका अशक्य प्रदेशशून्य सूक्ष्म अणु है द्व्यणुक आदि स्कन्ध है स्कन्धका भेद न होनेसे अणु उत्पन्न होता है । अणुसमु- दायमें स्कन्ध उत्पन्न होता है कहीं कहीं अणु और संघात दोनों मिलकर स्कन्ध उत्पन्न होता है जैसे अणु द्व्यणुक मिलकर एक स्कन्ध उत्पन्न हुआ उसी स्कन्धमें पुन एक अणुका संयोग होनेमें पुनः स्कन्धान्तर उत्पन्न होता है एवं दो दो संघा- तसे भी संघातान्तर उत्पन्न होता है यथा द्व्यणुक त्रसरेणु प्रभृतिकी उत्पत्ति होती है

(७०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत अतएव पूरयन्ति गलन्ति इस प्रकार पुद्गलकी व्युत्पत्ति होती हे अर्थात् स्कन्धों अलग होजानेसे गलन ( विशीर्ण ) होता हे अणुसंयोगद्वारा स्कन्ध होनेसे पूर होता है ॥ ३२ ॥ तदुक्तं गुणपर्यायवद्द्रव्यमिति । द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा । यथा जीवस्य ज्ञानत्वादिसामान्यरूपा पुद्गलस्य रूपत्वादिसामान्य- स्वभावा धर्माधर्माकाशकायानां यथासम्भव गतिस्थित्यवगाह- हेतुत्वादिसामान्यानि गुणा । तस्य द्रव्यस्योक्तरूपेण भवनमु- त्पाद तद्भाव परिणाम पर्याय इति पर्याया । यथा जीवस्य घटादि ज्ञानसुखक्लेशादय पुद्गलस्य मृत्पिण्डघटादय धर्मादीनां गत्यादिविशेषा , अतएव षट् द्रव्याणीति प्रसिद्धिः ॥ ३३ ॥ ( गुणपर्यायवदिति ) गुण एक द्रव्य द्रव्यान्तरसे जिसके द्वारा व्यावृत्त हो वह गुण है यथा नील घट इत्यादिमे नीलादि विशेषण नीलगुण घटान्तरसे व्यावृत्ति करता है यदि तादृश गुण न होता तो समस्त द्रव्य एकरूपहोनेसे सांकर्य होता जीव भी ज्ञानादि गुणद्वारा पुद्गलादिसे व्यावृत्त होता हे और पुद्गलादि भी रूपादिगुणसे व्यावृत्त रहता है अत अन्वयी गुण है उसके विकार अर्थात् विशेषरूपसे व्यावृत्त होनेवाले पर्याय हैं। क्रोध मान गन्धादि जो द्रव्यमे रहनेवाले हो और जिनपर गुण नहीं रहता हो वही गुण हे।धर्माधर्म आकाशकायके यथाक्रम गतिस्थिति अवकाशादि गुण हैं। द्रव्योंकी उक्तरूपसे उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं जिस द्रव्यका जो वास्तविक स्वभाव हो उस स्वरूपप्राप्तिरूप परिणामको पर्याय कहते हैं । अत एव जीवाजीव, धर्माधर्म, आकाश पुद्गल भेदसे किसीके मतमें द्रव्य हैं किसीके मतमें छह अजीवके स्थानपर काल मिलाकर छह हैं ॥ ३३ ॥ केचन सप्त तत्त्वानीति वर्णयन्ति । तदाह जीवाजीवास्रवबन्ध- संवरनिर्जरमोक्षास्तत्त्वानीति । तत्र जीवाजीवौ निरूपितौ । आ- स्रवो निरूप्यते । औदारिकादिकाय्यादिचलनद्वारेणात्मनश्चलनं योगपदवेदनीयमास्रव । यथा सलिलावगाहिद्वारं नद्यां स्रवणं कारणत्वादास्रव इति निगद्यते तथा योगप्रणाडिकया कर्मास्रव- तीति स योग आस्रवः ॥ ३४ ॥

नम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) सप्ततत्त्ववादीका मतनिरूपण-(केच नेत्यादि)बोधात्मक जीव अबोधात्मक अजीव यह कहचुके हैं । आस्रवनिरूपण-( औदारिकेत्यादि ) तात्पर्य, योगका नाम आस्रव है “ कायवाङ्मनःकर्म योगः” इति सूत्रोक्तप्रकार आत्मप्रदेशका चलन योग है वह शरी- रयोग वाग्योग और मनोयोगभेदसे तीन प्रकार है “ तत्र औदारिकवैक्रियिका- हारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ” इस सूत्रोक्त प्रकार उदार अर्थात् स्थूलमे जो हो वह औदारिक और अणिमादि ऐश्वर्यसे अनेक शरीर धारण विक्रिया है विक्रि- याके निमित्त वैक्रियिक इत्यादि सूत्रार्थ है तथा च औदारिकादि सात प्रकारके शरीर चलनसे आत्माका चलन योग है वही आस्रव है जिस प्रकार जलमे प्रवेश होनेके लिये जो मार्ग है वह नदीमे प्राप्त होनेका द्वार होनेसे आस्रव कहाता है तिसी प्रकार योगप्रणालीसे आत्माके कर्मकी गति होनेसे आस्रव भी योग कहाता है ॥ ३४ ॥ यथा आर्द्रं वस्त्रं समन्ताद्वातानीतं रेणुजातमुपादत्ते तथा कषा- यजलार्द्र आत्मा योगानीतं कर्म सर्वप्रदेशैर्गृह्णाति । यथा वा निष्टप्तायःपिण्डे जले क्षिप्ते अम्भः समन्ताद्गृह्णाति तथा कषा- योष्णो जीवो योगानीतं कर्म समन्तादादत्ते । कषति हिनस्त्या- त्मानं कुगतिप्रापणादिति कषायः क्रोधो मानो माया लोभश्च । स द्विविधः शुभाशुभभेदात् । तत्राहिंसादिः शुभः काययोगः सत्यमितहितभाषणादिः शुभो वाग्योग । तदेतदास्रवभेदप्र- भेदजातं कायवाङ्मनः कर्मयोग । स आस्रव शुभ पुण्यस्य अशुभ पापस्येत्यादिना सूत्रसन्दर्भेण ससंरम्भमभाणि। अपरे त्वेवं मेनिरे आस्रवयति पुरुषं विषयेष्विन्द्रियवृत्तिरास्रवः । इन्द्रियद्वारा हि पौरुषं ज्योतिर्विषयानस्पृशद्रूपादिज्ञानरूपेण परिणमित इति ॥ ३५ ॥ बन्धनिरूपण-जिस प्रकार आर्द्र वस्त्रमे हवामे उडी हुई धूली चिपक जातीहै तिसी प्रकार क्रोध मान माया और लोभ रूप कषाय जलसे आर्द्र जो आत्मा वह योगसे प्राप्त क्रियाको चारों ओरसे ग्रहण करता है यथावा तप्त लोहमें निक्षिप्त जलको लोहपिण्ड सर्वात्मना ग्रहण करता है तिसी प्रकार कषायसे तप्त आत्मा योगसे प्राप्त कर्मको सर्वत ग्रहण करता है । कष धातु हिसार्थक होनेसे कषाय जीव- स्वरूपविनाशक अर्थात् बन्धहेतु है । वह कर्म शुभाशुभ भेदसे दो प्रकार है. अहिंसादि

शुभ काययोग हे सत्यभाषण मितभाषण हितभाषणाद शुभ वाग्योग हे उक्त आस्रव भेद प्रभेदरूप योगको शुभ. पापस्येत्यादि सूत्रसंदर्भमे सविस्तर सूत्रवृत्तिकारने निरू- पण किया है । आस्रवशब्दके व्याख्यानम मतान्तर कहते हैं ( अपगेत्यादि ) पुरुषको चञ्चल करनेवाली विषयेन्द्रियवृत्ति आस्रव हे पुरुषज्योति सम्बन्धी इन्द्रियद्वारा नि कलकर विषयाकारसे जो परिणत होती है वही आस्रव हे ॥ ३५ ॥ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषायवशाद्योगवशाच्चात्मा सूक्ष्मैक- क्षेत्रावगाहिनामनन्तानन्तप्रदेशानां पुद्गलानां कर्मबन्धयोग्याना- मादानमुपश्लेषण यत् करोति स बन्ध । तदुक्तं, सकषायत्वा ज्जीव कर्मभावयोग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्ध इति तत्र कषाय ग्रहणं सर्वबन्धहेतूपलक्षणार्थम् । बन्धहेतून पपाठ वाचका- चार्य्य. । मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाया बन्धहेतव इति । मिथ्यादर्शनं द्विविधं मिथ्याकर्मोदयात् परोपदेशानपेक्षं तत्त्वा- श्रद्धानं नैसर्गिकमेकम् अपरं परोपदेशजम् पृथिव्यादिषड्घा- पादकं षडिन्द्रियासंयमनं च अविरति । पञ्चसमितिगुप्ति- ष्वनुत्साह प्रमा द । कषायःक्रोधादि । तत्र कषायान्ता- स्थित्यनुभावबन्धहेतव प्रकृतिप्रदेशबन्धहेतुर्योग इति विभाग ॥ ३६ ॥ वन्धनिरूपणम्-मिथ्यादर्शनादिवश आत्मांका सूक्ष्मक्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले ही अनन्तानन्त प्रदेशयुक्त कर्मबन्धयोग्य पुद्गलके साथमें जो है वही बन्ध है इसमें तत्त्वार्थसूत्र भी प्रमाण देते है( सकषायेति ) कषायग्रहण “मिथ्यादर्शनेत्यादि”सूत्रोक्त बन्धकारणीभूत मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग पांचोंका उपलक्षण है । ग्रन्थकार सूत्रार्थ भी स्वयं कहते हैं ( द्विविधमिति ) मिथ्यादर्शन दो प्रकारके हैं १ नैसर्गिक २ परोपदेशन• परोपदेशके विना मिथ्याक्रमादयसे स्वभाववश जो तत्त्वा र्थमें अश्रद्धा होती है वह नैसगिक हे परोपदेश उत्पन्न तत्त्वार्थमें अश्रद्धा परोपदेशज हे पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, वनस्पतिरूप षड्तत्त्वोंका आपादक छहों इन्द्रियोंका असंयम अविरति हे । ईर्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेप उत्सर्गरूप पञ्चसमिति गुप्तिसमिति आदिमें अनुत्साहका नाम प्रमाद है । कषायक्रोधादि पूर्वोक्त हैं कषाय-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७३ ) पर्यन्त स्थित्यनुभाव बन्धहेतु है । प्रकृतिप्रदेशका बन्धहेतु योग है प्रकृति बन्ध स्थिति, अनुभाव, प्रदेशभेदसे बन्ध चार प्रकार है ॥ ३६ ॥ बन्धश्चतुर्विध इत्युक्तम्, प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशास्तु तद्विधय इति । यथा निम्बगुडादेस्तिक्तत्वमधुरत्वादिश्वभावः एवमावरणी- यस्य ज्ञानदर्शनावरणत्वमादित्यप्रभोच्छेदकाम्भोधरवत् प्रदीप- प्रभातिरोधायककुम्भवच्च सदसद्वेदनीयस्य सुखदुःखोत्पाद- कत्वमसिधारामधुलेहनवद्दर्शनमोहनीयस्य तत्त्वार्थाश्रद्धानका- रित्वं दुर्जनसङ्गवच्चारित्रे मोहनीयस्यासंयमहेतुत्वं मद्यमदवदा- युषो देहबन्धकर्तृत्वं जलवत् नाम्नो विचित्रनामकारित्वं चित्र- कवद्गोत्रस्योच्चनीचकारित्व कुम्भकारवद्दानादीनां विघ्ननिदान- त्त्वमन्तरायस्य स्वभावः कोशाध्यक्षवत् । सोऽयं प्रकृतिबन्धोऽ- ष्टविधः, द्रव्यकर्मावान्तरभेदमूलप्रकृतिवेदनीय । तथाचोदुमा- स्वातिवाचकाचार्य्य 'आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीया- युर्नामगोत्रान्तराया 'इति । तद्भेदश्च समगृह्णात् पञ्चनवद्व्यष्टाविंश- तिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चदशभेदा यथाक्रममिति । एतच्च सर्व विद्यानन्दादिभिर्विवृतमिति विस्तरभयान्न प्रस्तूयते ॥ ३७ ॥ बन्धके चार भेद हैं-प्रकृति स्थिति, अनुभव और प्रदेश, प्रकृतिका, अर्थ स्वभाव है जिस : प्रकार निम्ब ओर गुडका तिक्त और मधुर स्वभाव है उसी प्रकार अर्थका तिरोधान : करना ज्ञानावरणका स्वभाव है जैसे मेघ सूर्यकी प्रभाको आच्छादन करता है वैसे ही : ज्ञानावरण अर्थका तिरोधान करता हे जिस भाँति घटादि दीपप्रभाको तिरोधान : करता है उसी भाँति दर्शनावरण वस्तुको अप्रकाशित करता है मधुलिप्त तलवारकी : धार जिस प्रकार सुख और दुःख दोनोंको उत्पन्न करती है उसी प्रकार सदसद्रूपवेद्य : सुख ओर दुःख दोनोंको उत्पन्न करता है दुर्जनोंका संग जिस प्रकार सदाचारसे : श्रद्धाको हटादेताहै उसी प्रकार दर्शन मोहन तत्त्वार्थमे अश्रद्धा उत्पन्न करदेते हैं । : यह आठ प्रकारका बन्ध द्रव्य कर्मके अवान्तर मूल प्रकृति वेदनीय है प्रसंगवश : बन्ध और उसके भेदमे प्रमाण कहते है ( जाद्यो ज्ञानदर्शनेत्यादि ) मूलप्रकृति- : बन्धके आठों भेदोंके अनन्तर उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद कहते हैं-( पञ्चनवेत्यादि ) : पाँच प्रकार ज्ञानावरणीय, नौ प्रकार दर्शनावरणीय, दो प्रकार वेदनीय २८ प्रकार

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( ७४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- मोहनीय ४ प्रकार आयुः, ४२ प्रकार नामबन्ध दो प्रकार गोत्रबन्ध और ५ प्रकार अन्तराय बन्ध है । यह सब सर्वार्थसिद्धिमै प्रपञ्चित है ॥ ३७ ॥ यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणामेतावन्तमनेहसं माधुर्य्यस्वभा- वादप्रच्युतिस्थितिः तथा ज्ञानावरणादीनां मूलप्रकृतीनामादित- स्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्यः परास्थिति- रित्याद्युक्तं कालदुद्दुर्द्दानवत् स्वीयस्वभावादप्रच्युतिस्थितिः॥३८॥ एव अष्टमाध्यायके चारसे तेरहवे सूत्रतक प्रकृति बन्धके भेदप्रभेद निरूपण करके आगे स्थितिवन्ध प्रदर्शन करते हैं-(यथा अजागोमहिष्येत्यादि) जिसका जो स्वभाव हो उससे च्युत न होना स्थिति हे जिस प्रकार गौ महिषी प्रभृतिका दुग्ध अनादि- कालसे आजतक माधुर्य्यस्वभावसे च्युति नहि हुआ है तिसी प्रकार ज्ञानावरणादि “आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्य परास्थिति”इति सूत्रोक्त ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय अन्तरायरूप अनेककोटिकोटिप्रकृतिको स्वस्वभावमे च्युत न रहना स्थिति बन्ध है इसका भी अवान्तर भेद “शेषाणामन्तर्मुहूर्त्ता” इत्यन्त आठवे अध्यायके बीसवें सूत्रतक वर्णन किया है ॥ ३८ ॥ यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमन्दादिभावेन स्वकार्य्य- कारणे सामर्थ्यविशेषोऽनुभाव तथा कर्मपुद्गलानां स्वकार्य्य- कारणे सामर्थ्यविशेषोऽनुभावः ॥ ३९ ॥ अनुभववन्धनिरूपण करते ह-(यथेति)“तद्रसविशेषोऽनुभव ” इति वृत्ति । जिस प्रकार गो महिषी आदिके दूधको तीव्र मन्दादि स्वभावसे स्वकार्यकारणमे जो सामर्थ्य- विशेष है अर्थात् रसविशेष प्रकटन सामर्थ्यानुभव हे उसी प्रकार कर्म पुद्गलको भी स्वकार्यविशेषमें सामर्थ्यविशेष अनुभव हे ॥ ३९ ॥ कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कन्धानामनन्तानन्तप्रदेशानामा त्मप्रदे- शानुप्रवेश प्रदेशबन्ध , आस्रवनिरोध संवर , येनात्मनि प्रवि- शत् कर्म प्रतिषिध्यते स गुप्तित्समित्यादि- संवर । ससारका- रणयोगादात्मनो गोपनं गुप्ति । सा त्रिविधा कायवाङ्मनो निग्रहभेदात् । प्राणिपीडापरिहारेण सम्यगयनं समिति सा ईर्य्याभाषादिभेदात् पञ्चधा ॥ ४० ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । (७५) प्रदेशबन्धका निरूपण करते हैं-(एतावदेव) इस प्रकार निश्चयका नाम प्रदेश हे कर्मभावसे परिणत अनन्तानन्त प्रदेशवाले पुद्गल और स्कन्ध हैं उनको आत्मप्रदेशमें अनुप्रवेश अर्थात् परमाणुरूपसे अवस्थानका नाम प्रदेशबन्ध है। चतुर्विधबन्धनिरू- पणानन्तर उद्देशक्रमप्राप्त संवरनिरूपण करते हैं (आस्रवनिरोधः संवर इति) अभिनवकर्म- हेतुभूत जो आस्रव कहे हैं उनका निरोध अर्थात् जिनसे आत्मामें प्रवेश करनेवाले कर्मका प्रतिबंध हो वह संवर हे । गुप्ति, समिति, धर्मानुप्रेक्षा, परीषहजय, चारित्र संवरका भेद हे । संसारके कारणोंसे आत्माका गोपन करना गुप्ति है। वह कायगुप्ति, वाग्गुप्ति और मनोनिरोधभेदसे तीन प्रकार है प्राणियोंकी पीडापरिहारार्थ सम्यक यत्नका नाम समिति है। वह ईर्ष्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेपोत्सर्ग भेदसे पांच प्रकार है ॥ ४० ॥ प्रपञ्चितं च हेमचन्द्राचार्य्यैः—“लोकातिवाहिते मार्गे चुम्बिते भास्वदंशुभिः । जन्तुरक्षार्थमालोक्य गतिरीर्ष्या मता सताम् ॥ आपद्यनागतं सर्वजनीनं मितभाषणम् । प्रिया वाच्यमानां सा भाषासमितिरुच्यते ॥ द्विचत्वारिंशता भिक्षादोषैर्नित्यमदूषि- तम् । मुनिर्यदन्नमादत्ते सैषणासमितिर्मता ॥ आसनादीनि सं- वीक्ष्य प्रतिलङ्घ्य च यत्नतः । गृह्णीयान्निक्षिपेद् ध्यायेत् सादा- नसमिति स्मृता ॥ कफमूत्रमलप्रायैर्निर्जन्तुजगतीतले । यत्ना- द्युत्सृजेत् साधु सोत्सर्गसमितिर्भवेत्॥” अत एवास्त्रव स्रोतसो द्वारं संवृणोतीति संवर इति निराहु ॥ ४१ ॥ (लोकातिवाहितेत्यादि) आकाश दो प्रकार है एक लोकाकाश दूसरा आलोकाकाश । धर्माधर्म पुद्गलादि लोक है तादृश लोक जिसमें अधिष्ठित हो वह लोकाकाश हे । तथा च लोकाधाग्भूत भास्वत् सूर्य किरणोंसे चुम्बित युक्त आकाशमें प्राणियोंकी रक्षाके लिये जो गति है उसका नाम ईर्ष्या है । सर्वावस्थामें सर्व प्रकार सर्व जनके हितार्थ प्रिय ओर परिमित भाषणनाम समिति है । ४२ प्रकारकी भिक्षाजाके दोषोंसे अदूषित जिस अन्नको मुनिजन ग्रहण करते हैं वह एषणा है । सम्यक् प्रकार देखकर आसनादिको रखना उठाना एव ध्यानादिक करनेका नाम आदानस- मिति है। कफ मूत्र ओर मलादिसे उत्पन्न जीवरहित भूमिपर मलमूत्रादिके त्यागका नाम उत्सर्ग है अतएव आस्रवकर्म प्रवाहद्वारको संवरण आच्छादन करनेसे संवर कहाता है ॥ ४१ ॥

( ७६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

तदुक्तमभियुक्तैः- "आस्रवो भवहेतुः स्यात् संवरो मोक्षकारणम् । इतीयमार्हती सृष्टि रन्यदस्याः प्रपञ्चनम् ॥" अर्जितस्य कर्मण- स्तपः प्रभृतिभिर्निर्जरणं निर्जराख्यं तत्त्वं चिरकालप्रवृत्तकषा- यकलापं पुण्यं सुखदुःखे च देहेन जरयति नाशयति केशोल्लु- ञ्चनादिकं तप उच्यते ॥ सा निर्जरा द्विविधा यथा कालौपक्रमि- कभेदात् । तत्र प्रथमा यस्मिन् काले यत् कर्म फलप्रदत्वेना- भिमतं तस्मिन्नेव काले फलदानाद्भवन्ती निर्जरा कामादिपाक- जेति च जेगीयते । यत् कर्म तपोबलात् स्वकामनयोदयावलिं प्रवेश्य प्रपद्यत तत् कर्मनिर्जरा ॥ यदाह- "संसारबीजभूतानां कर्मणां जरणादिह । निर्जरा संस्मृता द्वेधा सकामाकामनिर्जरा । स्मृता सकामा यमिनामकामा त्वन्यदेहिनाम् ॥" इति ॥४२॥ सारांश कहते हैं- आस्रव संसारका कारण है संवर मोक्षका कारण है यही आर्हत मतमें सृष्टि, अन्य सब इसीका प्रपञ्च है । कृतकर्मको तप समाधिप्रभृतिसे निर्जरण अर्थात् अनन्तकालसे प्राप्त क्रोधादि कषाय, पुण्य, पाप, सुख और दुःखको देहके साथ ही नाश करदेनेका नाम निर्जराख्य तत्त्व है केशलुञ्चनादिका नाम तप है उक्त निर्जरा काल और औपक्रमिक भेदसे दो प्रकार है जिस कालमें फलप्रदत्व नियम है उसी कालमें फल उत्पन्न करनेसे कालनिर्जरा कहाता है । वह कामादि और पाकज कहाताहै जो कर्म स्वकामनावश फलजनक होता है वह सकाम निर्जरा है (यदाहेति) , संसारकारणभूत कर्मका नाश करनेसे निर्जरा कहाता है वह सकाम अकाम भेदसे दो प्रकार है योगियोंका सकाम और अन्य संसारियोंका अकाम है ॥ ४२ ॥ (मिथ्यादर्शनादीनां बन्धहेतूनां निरोध अभिनवकर्मभावात्, निर्जराहेतुसन्निधानेनार्जितस्य कर्मणो निरसनादात्यन्तिककर्म- मोक्षणं मोक्षः, बन्धहेतुभ्रन्निहेतुनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षणं मोक्ष इति तदनन्तरमूर्द्धं गच्छत्यालोकान्तात् यथा हस्तदण्डा- दिभ्रमिप्रेरितं कुलालचक्रमूषरतेऽपि तस्मिन् तद्बलादेवासंस्का- रक्ष्यं भ्रमति तथा भवस्थेनात्मना अपवर्गप्राप्तये बहुशो

४. रामानुज दर्शन (विशिष्टाद्वैत मत)

दर्शनम् [ भाषाटीकासमेतः । ( ७७ ) यत् कृतं प्रणिधानं मुक्तस्य तदभावेऽपि पूर्वसंस्कारादालोकान्तं गमनमुपपद्यते यथा वा मृत्तिकालेपकृतमलाबुद्रव्यं जलेऽधः पतति पुनरपेतमृत्तिकाबन्धनमूर्ध्वं गच्छति तथा कर्मरहित आत्मा असङ्गतत्वादूर्ध्वं गच्छति बन्धच्छेदादेरण्डबीजवच्चोर्ध्व- तिस्वभावाच्चाग्निशिखावत् ॥ ४३ ॥ मोक्षपदार्थको निरूपण करते हैं-(मिथ्यादर्शन-विरत्यादि) जो तत्त्वार्थ श्रद्धानादिरूप बन्ध कारणका निरोध है वह अभिनव कर्मके अभावसे होता है वह भी निर्जराके हेतुसन्निधानसे अर्जित कर्मके निरास होनेसे कर्मोंके अत्यन्त उच्छेदका नाम मोक्ष है अतएव बन्धहेतु और भवहेतु निर्गममे कृतकर्मकी अत्यन्तनिवृत्तिको मोक्ष कहा है अनन्तर आत्मा लोकाकाशसे ऊपर जालोकाकाशमें पतंगेके समान ऊपर उड़ता रहता है। मुक्तात्मामें क्रिया न होनेसे ऊर्ध्वगमन असम्भव है ऐसी आशङ्काका परिहार करते हैं-(यथा हस्तेत्यादि) जिस प्रकार कुम्हारके चक्र घुमाकर हस्त और दण्डका व्यापार शान्त होनेपर भी पूर्वव्यापार वेगबलसे चक्र घूमता रहता है तिसी प्रकार संसारदशामें मोक्षप्राप्तिके लिये किये हुए प्रणिपतन ध्यानादि आत्माके विपुल कर्म मुक्तावस्थामें कर्म न होनेपरभी पूर्व कर्म ही स्वसंस्कारद्वारा आलोकाकाशान्त गमनके साधक होते हैं। असंग तथा बन्धाभाव एवं स्वाभावरूप हेतुत्रयसे आत्माको ऊर्ध्व- गतिसमर्थन-(यथा वेत्यादि) अथवा असंगसे भी ऊर्ध्वगमन सम्भव है जैसे मृत्तिकासे लिप्त तुम्बिका जलमें नीचे डूब जाती है परन्तु मृत्तिकासंयोग टूट जानेपर स्वभा- वतः ऊपर आजाती है तिसी प्रकार कर्मसे बद्ध आत्माका ऊर्ध्वगमनस्वभाव न रह- नेपर भी कर्मबन्धसे मुक्त होनेपर निस्सग होनेके कारण स्वभावत ऊपर उड़ता है इसीमें दृष्टान्तद्वय और भी देत हैं जिस प्रकार एरण्डका फल सूखके फटजानेपर बीज बन्धरहित होनेके कारण ऊपर उड़जाता है तिसीप्रकार आत्मा भी बन्धरहित होनेसे ऊपर उड़जाता है यथावा अग्निकी ज्वाला स्वभावसे ऊपर जाती है तथेव आत्मा भी ऊर्ध्वगति स्वभाव है ॥ ४३ ॥ अन्योन्यं प्रदेशानुप्रवेशे सत्यविभागेनावस्थानं बन्धः परस्पर- प्राप्तिमात्रं सङ्ग । तदुक्तं 'पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वान् बन्धच्छेदात्तथा गतिपरिणामाच्चाविरुद्ध कुलालचक्रवद् व्यपगतलेपालाबुवदे- रण्डबीजवद्ग्निशिखावच्च' इति ॥ ४४ ॥

( ७८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

बन्ध और संगका परस्पर भेद कहते हैं । परस्पर एकके प्रदेशमें अन्यके प्रवे- शका नाम बन्ध है यथा जल और मृत्तिका मिलकर जो पिण्ड होता है उसमें जल और मृत्तिका दोनों रहते परस्पर संयोगमात्रका संग है जैसे घटपटका संग है एव स्फटिक और जपाकुसुमका संग है उक्त हेतुमें आप्तोक्ति भी प्रमाण देते हैं ( पूर्व- प्रयोगेत्यादि ) पूर्वप्रयुक्त कुलालके व्यापारसे यथा चक्रभ्रमण होता है असंग होनेसे जिस प्रकार तुम्बिका ऊपर जाती है तिसी प्रकार असंग होनेसे आत्मा भी ऊपर जाता है बन्ध छेदसे एरण्डबीज जिस प्रकार ऊपर जाता है उसी प्रकार आत्मा भी संसारबन्धमे छूटनेपर ऊपर जाता है । गतिपरिणाम गतिस्वभावसे यथा अग्निशिखा ऊपर जाती है तद्वत् आत्मामें भी ऊपर गमन अविरुद्ध है ॥ ४४ ॥ अतएव पठन्ति--"गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्त्तन्ते त्वालोकाकाशमागताः ॥” इति ॥४५॥ ( अतएवेति ) चन्द्रसूर्यादि जितने ग्रह हैं वह सब स्वस्वनियतकाल नियतदेश- पर्यन्त ऊपर जा जाकर लौट जाते हैं । परन्तु लोकाकाशके ऊपर आलोकाकाशमें प्राप्त परम मुक्त आजतक नहीं लौटे हैं ॥ ४५ ॥ अन्ये तु-गतसमस्तक्लेश तद्वासनस्यानावरणज्ञानस्य सुखैकता- नस्यात्मन उपरिदेशावस्थानं मुक्तिरित्यास्थिपत । एवमुक्तान् सु- खदुःखसाधनाभ्यां पुण्यपापाभ्यां सहितान्नवपदार्थान् केचना- ङ्गीचक्रु । तदुक्तं सिद्धान्ते-'जीवाजीवौ पुण्यपापयुतावास्त्रव संवरौ निर्जरणं बन्धो मोक्षश्च नव तत्त्वानि' इति। सङ्ग्रहे प्रवृत्ता वयमुपरता स्म ॥ ४६ ॥ पूर्वोक्त निरन्तर उपरिगमनरूप मुक्तिसे भिन्न देशविशेष स्थितिरूप मुक्तिवादीका मत कहते हैं । ( अन्ये तु इति ) वासना संस्कारसहित समस्तदुःख नष्ट होनेपर ज्ञानावरण दर्शनावरणादि शून्य निरतिशय सुखस्वरूप आत्माको लोकाकाशमें उप रिस्थान प्राप्ति ही मुक्ति है। नौ पदार्थवादियोंके मतको कहते हैं, सुखदुःखका साधन पुण्य पाप और पूर्वोक्त जीवाजीवास्त्रवबन्ध, संवर निर्जरा और मोक्ष मिलाकर नौ तत्त्व कोई कोई मानते हैं ॥ ४६ ॥ अत्र सर्वत्र सप्तभङ्गिन्याख्यं न्यायमवतारयन्ति जैना । स्याद- स्ति स्यान्नास्ति स्यादस्ति च नास्ति च स्यादवक्तव्य स्याद-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७९ ) स्ति चावक्तव्यः स्यान्नास्ति चावक्तव्य स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्य इति ॥ तत्सर्वमनन्तवीर्य्यः प्रत्यपीपदत् । “तद्विधानविवक्षायां स्यादस्तीति,गतिर्भवेत् । स्यान्नास्तीति प्रयोगः स्यात्प्रतिषेधे विवक्षिते ॥ क्रमेणोभयवाञ्छायां प्रयोगः समुदायभाक् । युगपद्विवक्षायां स्यादवाच्यमशक्तितः ॥ आद्यावाच्यविवक्षायां पञ्चमो भङ्ग इष्यते । अन्त्यावाच्य- विवक्षायां षष्ठभङ्गसमुद्भवः ॥ समुच्चयेन युक्तश्च सप्तमो भङ्ग उच्यते ॥” इति ॥ ४७ ॥ “स्याद्वादिनो नैकान्तिकस्येष्टत्वात्” इति बौद्धमतखण्डनप्रकरणोक्त अनेका- न्तिकत्वसाधक स्याद्वादका निरूपण करते हैं-(अत्र सर्वत्र इत्यादि सप्तभ- ङ्गीति ) सातों भङ्गोंके समाहार ( सम्मेलन ) का नाम सप्तभङ्गी है सप्तभङ्गी रूप नय ( न्याय ) सप्तभङ्गीनय है । स्यादस्ति १ स्यान्नास्ति २ स्यादस्ति च नास्ति च ३ स्यादवक्तव्य ४ स्यादस्ति चावक्तव्य. ५ स्यान्नास्ति चावक्तव्य. ६ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः७ यही सात भङ्ग हैं । स्यात्पद क्रियावाचक तिङन्त नही है किन्तु तिङन्तसमानाकृतिक अव्यय है यथा 'अस्तिक्षीरा गौ.' इत्यादिमें अस्तिशब्द है । अनन्तवीर्य्योक्तविवरण ( तत्सर्वमित्यादि ) वस्तुके सत्ताकी विवक्षामें प्रथम भङ्ग होता है अभावकी विवक्षामें द्वितीय भङ्ग होता है । क्रमसे जहां वस्तुकी सत्ता और प्रभाव कहना हो तो तृतीय भङ्ग होता है । एक ही कालमें वस्तुका विधान और निषेध करना असम्भव होनेसे चतुर्थ ( स्यादवक्तव्य ) पक्ष होता है । प्रथम और चतुर्थ भङ्गकी विवक्षामें स्यादस्ति चावक्तव्यरूप पाँचवा भङ्ग होता है । द्वितीय और चतुर्थकी विवक्षामें षष्ठभङ्ग और तृतीय चतुर्थकी विवक्षामें सप्तम भङ्ग होता है ॥ ४७ ॥ स्याच्छब्दः खल्वयं निपात तिङन्तरूपकोऽनेकान्तद्यो- तकः । यथोक्तम्-“वाक्येष्वनेकान्तद्योतिगम्यं प्रति विशेषणम् । स्यान्निपातोऽर्थयोगित्वात्तिङन्तप्रतिरूपकः ॥” इति । यदि पुनरेकान्तद्योतक स्याच्छब्दोऽयं स्यात्तदा स्यादस्तीति वाक्ये स्यात्पद्मनर्थकं स्यात् । अनेकान्तद्योतकत्वे तु स्यादस्ति

(८०) , सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

कथञ्चिदस्तीति स्यात्पदात् कथञ्चिदिति अयमर्थो लभ्यत इति नानर्थक्यम् । तदाह-“स्याद्वादः सर्वथैकान्तत्यागात् किं- वृत्त चिद्विधौ । सप्तभङ्गिनयापेक्षो हेयादेयविशेषकृत् ॥” इति ॥ ४८ ॥ यथोक्तमिति पूर्व कहे हुए वाक्यमें जो स्यात्‌शब्द है वह अनिश्चयका बोधक और प्रतिपादनीय प्रधान अर्थमें विशेषण भी है यथा प्रथमवाक्य स्यादस्ति है इसमें अस्ति शब्दका अर्थ प्रधान है स्यात्‌पद तिङन्त क्रियाबोधकके सदृश अव्यय होनेसे उसका अर्थ कथञ्चित् है तथा च कथञ्चित् है ऐसा अर्थ हुआ यदि स्यात्‌पद अनिश्चयार्थक न होता तो स्यात्‌पद और अस्तिपद दोनों अस् धातुसे निष्पन्न होनेके कारण समानार्थक होनेसे स्यात्‌पद व्यर्थ होजायगा, क्योंकि अस्तिपदसे वस्तुकी सत्ता और नास्तिपदसे निषेध हो जाता है । कथञ्चित् अर्थ मानो तो किसी एक रूपसे है अन्य रूपसे नहीं अर्थात् एकत्र होता है इसलिये स्यात्‌शब्द सार्थक होता है अतएव कहा है स्यात् शब्द किम्‌शब्दसे निष्पन्न जो कथम् शब्द उससे चित्प्रत्यय विधान करनेसे जो पद बनता है उसके अर्थको कहनेवाला अर्थात् कथञ्चित् अर्थ कहनेके कारण अनेकान्त पक्षको छोडकर सर्वथा एकान्त पक्ष ही मानाजाय तो त्याग उपादानादि व्यवहार सब नष्ट होजायेंगे ॥ ४८ ॥ यदि वस्तुस्त्येकान्तत सर्वथा सर्वदा सर्वत्र सर्वात्मनास्तीति न उपादित्साजिहासाभ्यां क्वचिव कदा केनचित् प्रवर्त्तेत निव- र्त्तेत वा प्राप्तप्रापणीयत्वहेयज्ञानानुपपत्तेश्च । अनेकान्तपक्षे तु कथञ्चित् क्वचित् केनचित् सत्त्वेन हानोपादाने प्रेक्षावतामुप- पद्येते ॥ ४९ ॥ उसीको उपपादन करते हैं-(यदीति ) यदि वस्तुका एकान्त अर्थात् अस्तित्वादि निश्चित एकही स्वरूप होता तो सर्वत्र सर्वकालमें सब प्रकार हान उपादानादि समस्त रूपसे रहजायगा अत घटादि किसी वस्तुके ग्रहण त्यागादिके लिये न कोई प्रवृत्त ही होगा न कोई कदापि कही भी निवृत्तही होगा क्योंकि जो वस्तु प्राप्त हो चुकी है उसकी प्राप्तिके लिये पुन उद्योग नहीं किया जाता है अनेकान्तपक्षमें किसीके पास किसी कालमें किसीरूप अर्थात् दर्शनीयरूपसे है जलाहरणादिरूपसे नहीं है एवं 'बाहर है घरम नहीं पूर्व दिवस था आज नहीं' इत्यादि अनेक रूपसे सत्ता और तदभाव दोनों होनेसे प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों उपपन्न होती है ॥ ४९ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) किञ्च वस्तुन सत्त्व स्वभाव असत्त्वं वेत्यादि प्रष्टव्यम् । न तावदस्तित्वं वस्तुन स्वभाव इति समास्ति घटोऽस्तीत्यनयोः पर्यायतया युगपत् प्रयोगायोगात् नास्तीति प्रयोगविरोधाच्च । एवमन्यत्रापि योज्यम् ॥ ५० ॥ एकान्त पक्षमें दूषणान्तर भी देते हैं-(किञ्चेति) वस्तुका स्वभाव सत्त्व है या असत्त्व है? सत्त्व तो कह नहीं सकते क्योंकि "घटोऽस्ति" इत्यादि स्थलमें घटशब्द भी सत्त्वस्वभा- वका बोधक है और अस्तिशब्द भी सत्त्वस्वभावका बोधक है अत दोनों पर्यायशब्द होजायेंगे तो पर्यायशब्दको युगपत् एकत्र प्रयोग न होनेसे उक्त वाक्य ही अप्रमा- णिक होगा । और “घाटो नास्ति” ऐसे प्रयोगका भी असम्भव होगा क्यों नास्ति- शब्द अभावको कहता है घटशब्द सर्वथा भाववाची होनेसे भावाभाव दोनोंको एकत्र स्थिति बाधित है । इसी प्रकार “स्याद् एक, स्यादनेक, स्यादेकोऽनेकश्च, स्यादवक्तव्यः स्यादेकोवक्तव्य', स्यादनेकोऽवक्तव्यः स्यादनेकोऽवक्तव्य', स्यादेकोऽनेकश्चावक्तव्यः, स्यान्नित्य', स्यादानित्य', इत्यादि सर्वत्र जानना चाहिये ॥ ५० ॥ यथोक्तम्—“घटोऽस्तीति न वक्तव्य सन्नेव हि यतो घट । ना- स्तीत्यापि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्त्वयोः॥” इत्यादि ॥ ५१ ॥ (यथोक्तमिति) घट और अस्ति दोनोंका प्रयोग एक साथ नहीं कर सकते क्योंकि घटका स्वरूप ही अस्तित्व है अर्थबोधनके लिये शब्दका प्रयोग कियाजाता है जब घट- शब्दसेही अस्तित्वका बोध होगया । 'उक्तार्थानामप्रयोग' इस न्यायसे अस्तिशब्दका प्रयोग व्यर्थ और अन्याय होगा । नास्तिशब्दका भी प्रयोग नहीं हो सकेगा क्योंकि भाव और अभाव दोनों अत्यन्त विरुद्ध होनेसे एकत्र असम्भव है ॥५१॥ ९ तस्मादित्यं वक्तव्यम्-सदसत्सदसदनिवर्चनीयवादभेदेन प्रतिवा- दिनश्चतुर्विधाः । पुनरप्यनिर्वचनीयमतेनाऽमिश्रितानि सद्सदादि मतानीति त्रिविधाः । तान् प्रति कि वस्तुवस्तीत्यादिपर्यनुयोगे कथञ्चिदस्तीत्यादिप्रतिवचनसम्भवेन ते वादिन सर्वे निर्विण्णाः सन्त तूष्णीमासत इति सम्पूर्णार्थविनिश्चायिन स्याद्वादमङ्गी- कुर्वतस्तत्र तत्र विजय इति सर्वमुपपन्नम् ॥ ५२ ॥ उपसंहार' करते हैं-(तस्मादिति) चार प्रकारके वादी हैं एक पदार्थको सदा सत् मानते हैं, दूसरे असत्, तीसरे सत् और असत् कहते हैं, चौथे न सत् कहते न असत् कहते हैं किन्तु अनिर्वचनीय कहते हैं। उनमें अनिर्वचनीयपक्ष सिद्धान्ति सम्मत होनेसे प्रथम तीनों प्रतिवादी रहजाते हैं। उनसे घटादि वस्तु है ? ऐसे पूछनेपर कथञ्चित् है ऐसा ६

( ८२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

उत्तर देते हैं। यही स्याद्वादका मुख्य सिद्धान्त है इसको स्वीकार करनेसे वे सब विरक्त होकर निरुत्तर होजाते हैं अतः स्याद्वादियोंकी विजय सर्वत्र होजाती है ॥ ५२ ॥ यद्वोचदाचार्य्य स्याद्वादमञ्जर्य्याम्-“अनेकान्तात्मकं वस्तु गो- चरः सर्वसंविदाम् । एकदेशविशिष्टोऽर्थो न यस्य विषयो मतः ॥ न्यायानामेकनिष्ठानां प्रवृत्तौ श्रुतवर्त्मनि । सम्पूर्णार्थविनिश्चायि स्याद्वस्तु श्रुतमुच्यते ॥” इति ॥ ५३ ॥ समस्तज्ञानका विषय वस्तु अनेकान्त ( अनिश्चित ) रूप है एकदेशविशिष्ट सत् या असत् इत्यादि एकान्त ज्ञानका विषय नहीं हो सकता । अस्ति नास्ति इत्यादि एकदेशविशिष्टार्थकशब्दको सुनकर प्रवृत्तको समस्त अर्थोंका निर्णायक स्यात्शब्द ही श्रुत है ॥ ५३ ॥ “अन्योन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद्यथापरे मत्सरिणः प्रवादः । नयानशे- षानविशेषमिच्छन्नपक्षपाती समयस्तथार्हतः ॥” इति ॥ ५४ ॥ ( अन्योन्येति ) परस्पर एकका पक्ष दूसरेका प्रतिपक्ष होनेसे जन्यवादियोंका सिद्धान्त मत्सरग्रस्त है । जैसे सांख्य कहते हैं कार्य सत् है तब नैयायिक उसी कार्यको असत् कहते हैं, मीमांसक शब्दको नित्य मानते हैं परन्तु नैयायिक अनित्य मानते हैं नैयायिक आकाश कालादिको नित्य मानते हैं तो वेदान्ती उसको भी कार्य मानते हैं वेदान्ती जगत्के उपादान ब्रह्मको कहते हैं तो सांख्यवादी प्रकृतिको कहते हैं और नैयायिक परमाणुको कहते हैं वे सब पदार्थोंको स्थिर मानते हैं तो बौद्ध क्षणिक मानते हैं इसी प्रकार एकका पक्ष दूसरेका विपक्ष होजानेसे परस्पर स्वपक्षस्थापन ओर परपक्ष खण्डनके लिये मत्सर बढ जाता है । परन्तु सप्तभंगीन्यायसे समानरूप सत्, असत्, क्षणिक, नित्यादि सब सर्वत्र समान माननेके कारण आर्हतसिद्धान्त पक्षपातशून्य है ॥ ५४ ॥ जिनदत्तसूरिणा जैनं मतमित्थमुक्तम्-“बलभोगोपभागोनामु- भयोर्दानलाभयो । अन्तरायस्तथा निद्रा भीरज्ञानं जुगुप्सि- तम् । हिंसा रत्यरती रागद्वेषौ रतिरिति स्मरः ॥ शोको मिथ्या- त्वमेतेऽष्टादश दोषा नयस्य च॥ जिनो देवो गुरु सम्यक् तत्त्व- ज्ञानोपदेशक । ज्ञानदर्शनचारित्राण्यपवर्गस्य वर्तिनि ॥ स्याद्वा- दस्य प्रमाणे द्वे प्रत्यक्षमनुमापि च । नित्यानित्यात्मकं सर्व नव तत्त्वानि सप्त वा । जीवाजीवौ पुण्यपापे चास्रवः संवरोऽपि च ।

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( ८३ ) बन्धो निर्जरणं मुक्तिरेषां व्याख्याऽधुनोच्यते ॥ चेतनालक्षणा जीवः स्यादजीवस्तदन्यकः । सत्कर्मपुद्गला पुण्यं पापं तस्य विपर्ययः ॥ आस्रवः कर्मणां बन्धो निर्जरस्तद्वियोजनम् । अष्टकर्मक्षयान्मोक्षोऽथान्तर्भावश्च कैश्चन । पुण्यस्य संस्रवे पापस्यास्रवे क्रियते पुनः ॥ लब्धानन्तचतुष्कस्य लोकागूढस्य चात्मन । क्षीणाष्टकर्मणो मुक्तिर्निव्यावृत्तिर्जिनोदिता ॥५५॥५६॥ पूर्वोक्त तत्त्वोंको संक्षेपसे जिनदत्तसूरिने इस प्रकार कहा है कि बल, भोग, उपभोग, और दान, लाभके प्रतिबन्धक निद्रादि १८ दोष जिनमें न हो एवम्भूत जो तत्त्वज्ञा - नका उपदेशक गुरु जिनदेव है । ज्ञानदर्शनादि मोक्षका मार्ग है स्याद्वादमें प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण हैं अनेकान्तात्मक सब तत्त्व है किसीके मतमें नौ तत्त्व हैं किसीके मतमें सात हैं जीवाजीवेत्यादि तत्त्व पूर्वोक्त हैं। चेतनास्वरूप जीव है इससे विपरीत अजीव है शुभ कर्मका पुद्गल पुण्य और शुभ कर्मका विपर्यय पाप है । कर्म- बन्धका नाम आस्रव है कर्मनाशको नाम निर्जर है आठों कर्मोंके क्षयसे कोई २ मोक्ष मानते हैं । कोई २ पुण्यके आस्रव पापके संस्रवमें उसका अन्तर्भाव है कहते हैं आनन्दादिको प्राप्त लोक सम्बन्ध शून्य पुनरावृत्तिरूप मुक्ति आठों प्रकारके कर्मोंके नाशसे होती है ऐसा जिनदेवने कहा है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ सरजोरणा भैक्षभुजो लुञ्चितमूर्द्धजा । श्वेताम्बराः क्षमाशिला निःसङ्गा जैनसाधवः ॥ लुञ्चिता पिच्छिकाहस्ता पाणिपात्रा दिगम्बराः । ऊर्द्धाशिनो गृहे दातुर्द्वितीया स्युर्जिनर्षय ॥ भुङ्क्ते न केवलं न स्त्री मोक्षमेति दिगम्बरः । प्राहुरेषामयं भेदो महान् श्वेताम्बरैः सह ॥” इति ॥ ५७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे आर्हतदर्शनम् ॥ ३ ॥ जैनसंन्यासियोंके आचरणको कहत हैं—धूलिसे लिप्त अर्थात् स्नानादि न करनेसे देहमें सदा मैल भरा रहता है भिक्षान्न भोजन केशळुञ्चन क्षमावान् और निःसङ्ग श्वेताम्बर जैनसाधुओंका आचरण होता है । केशळुञ्चन हाथमें छोटेछोटे जीवोंको उडानेके लिये पिच्छिका रखना, जलपात्र रखना, खडेखडे भिक्षा देनेवालेके घरमें भोजन करना यह दिगम्बर नामक जैनसंन्यासियोंका अनुष्ठान है वे अकेले भोजन नहीं करते स्त्रीसंभोग नहीं करते मुक्त समझे जाते हैं इत्यादि श्वेताम्बरोंसे बहुत भेद है ॥ ५७ ॥ इति आर्हतमत समाप्त ।