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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

अष्टादश पटल ] [ ४२७ ध्यायेन्नीलाद्रिकान्तं शशिशकलधरं मुण्डमालं महेश दिग्वस्त्रं पिङ्गकेशं डमरुमथशृणि खङ्गपाश शूलाऽभयानि नाग घण्टाङ्कपालं करसरसिरुहैर्बिभ्रतं भीमदंष्ट्रम् । सर्वाकल्पं त्रिनेत्रं मणिमयविलसत्किंकिणीनुपुराढ्यम् ।५४ सात्विकं ध्यानमाख्यात मयमृत्यु निवारणम् । आयुरारोग्यजनन मपवर्ग फलप्रदम् ।५५ अब क्रम से तीनों ध्यानों को बतलाया जाता है - स्फटिक के सदृश-केशों से शोभित मुख वाले नौरत्नों से परिपूर्ण दिव्य आभ- रणों से और किंकणी नूपुर आदि से भूषित-दीप्त आकार वाले- स्वच्छ एवं विशाल वस्त्रो से संयुक्त-परम प्रसन्न-तीन नेत्रों से युक्त कर कमलों के द्वारा शूल और दण्ड को धारण करने वाले वटुक की निरन्तर वन्दना करता हूं ।५२। उदीयमान भुवन भास्कर के समान प्रभा से समन्वित-तीन नेत्रों से युक्त-रक्त अंगराग और माला धारण करने वाले-हास्य युक्त मुख से अन्वित-वरदान दाता करों द्वारा कपाल-अभयदान और शूल को धारण करने वाले - नील ग्रीवा से युक्त-उत्तम सैकड़ों भूषणों से विभूषित-चन्द्र से समुज्ज्वल चूड़ा वाले-बन्धूक पुष्प के तुल्य अरुण वस्त्रों को पहिने हुये- भयके हरने वाले देवकी सदा भावना करता हूँ ।५३। नीलगिरिके समान कान्त चन्द्र के खण्ड को धारण करने वाले-मुण्डों की माला पहिने हुये-दिशाओं के वस्त्र वाले-पिङ्ग वर्ण के केशों से अन्वित-कर कमलों के द्वारा डमरू-शृणि खड्ग-पाश् अभयदान-नाग-घण्टा- कपाल को धारण करने वाले भीषण दाढोंसे युक्त-सर्पोंके भूषणों से भूषि-तीन नेत्रों से युक्त मणियों से पूर्ण एवं शोभित किंकिणी ओर नूपुरों से आढ्य महेश का ध्यान करना चाहिये ।५४। यह सात्विक ध्यान अपमृत्यु का निवारक कहा है और आयु तथा आरोग्य का जनम ओर अपवर्गके फल का होता है ।५५।

४२८ ] [ श्रीशारदा तिलक राजसन्ध्यानमाख्यातं धर्मकामार्थसिद्धिदम् । तामस शत्रुशमन कृत्याभूतग्रहा (गदा) पहम् ॥५६ वर्णलक्ष जपेन्मन्त्रं हविष्याशी जितेन्द्रियः । तद्दशांश प्रजुहुयात्तिलैर्मधुरसंयुतैः ॥५७ धर्माधर्मादिभिः कल्पते पीठे पङ्कज शोभिते। षट्कोणान्तस्त्रि कोणस्थव्योम पङ्कजसंयुते ॥५८ वटुक तजयेद्देवं मूर्ति मूलेन कल्पयेत् । सद्योजातेन मन्त्रेण देवमावाहयेत्ततः ॥५९ मूलादिवामदेवेन स्थापयेत्परमेश्वर । मूलमन्त्रेण कर्त्तव्यं सान्निध्यं तदनन्तरम् ।६० दूसरा राजस ध्यान है। यह धर्म--काम और अर्थ की सिद्धि का प्रदाता होता है, ऐसा कहा गया है। तीसरा तामस ध्यान है। यह शत्रुओं के शमन करने वाला होता है ओर कृत्या, भूत, महाग्रहों के अवहनन करने वाला है ।५६। इस मन्त्र में जितने वर्ण हैं उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये और जप करने वाले व्यक्ति को हविष्य का अशन करने बाला तथा इन्द्रियों को जीतकर रखने वाला होना चाहिए। जप का दशवां भाग मन्त्र द्वारा मधुरों से संयुत तिलों के द्वारा हवन करे। धर्माधर्मादि से कल्पत पर जो पंकजों से शोभित होवे और जो षट्कोण के अन्दर स्थित त्रिकोण में स्थित व्योम पंकजों से संयुत होवे । ५७-५८। उस पीठपर बटुक देव की पूजा करे और मूल मन्त्र के द्वारा ही मूर्त्ति की कल्पना कर लेनी चाहिए । फिर सद्योजात मन्त्र के द्वारा देव का आवाहन करे ।५६। मूलादि वामदेव के द्वारा परमेश्वर की स्थापना करनी चाहिए। इसके अनन्तर मूलमन्त्र से सान्निध्य करे ।६०। अघोरेण सुधीः कुर्यात्सन्निरोधमनन्तरम् । तुरुषाख्येन मनुना योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् । ६१

अष्टादश पटल ] [ ४२६ देवाय वन्दन कुर्यादीशानेन समाहितः । एतत्सर्वं विधातव्यं तत्तन्मुद्राभिरादरात् ।६२ ईशानादीन्यजेद्देवान्न्यासमार्गेण देशिकः । सकलीकरणं कृत्वा यजेन्मूर्तीर्यथापुरा ।६३ व्योमपद्मदलेष्वर्चे दमसिताङ्गादिभैरवान् । असिताङ्गं रुरुं चण्डं क्रोधमुन्मत्तभैरवम् ।६४ कपालिनं भीषणाख्यं संहारं च क्रमादमन् । षट् कोणेषु षडङ्गानि क्रमादभ्यर्चयेत्सुधीः ।६५ सुधी को चाहिए कि वह अघोर मन्त्र से इसके अनन्तर सन्निरोध करे । पुरुषाख्य मन्त्र के द्वारा योनि मुद्रा को प्रदर्शित करे ।६१। फिर परम सावधान होकर ईशान के द्वारा देव के लिए वन्दना करनी चाहिए । यह सभी कुछ बड़े आदर के साथ उस-उस मुद्रा के द्वारा ही करना चाहिए ।६२। आचार्य ईशान आदि देवों का न्यास के मार्ग द्वारा यजन करे । सकलीकरण करके पूर्व की ही तरह से मूर्त्तियों का अभ्यर्चन करे ।६३। व्योम पद्म दलों में असिताङ्गादि भैरवों का- अर्चन करना चाहिये । अब उन भैरवों का नामों का परिगणन करके- बताया जाता है—असिताङ्ग—रुद्र—चण्ड—क्रोध—उन्मत्त भैरव— कपाली—भीषण और संहार—इनका क्रम से ही अर्चन करना चाहिए यह सुधी का कर्त्तव्य है । षट्कोणों में क्रम से छै अङ्गों का अर्चन करे ।६४।६५। पूर्वादीशामनपर्यन्तं तद्बहिः पूजयेदिमान् । डाकिनीपुत्रकान्पूर्वं राकिनीपुत्रकांस्ततः ।६६ लाकिनीपुत्रकान्पश्चात्काकिनीपुत्रकास्ततः । शाकिनीपुत्रकान्भूयो हाकिनीपुत्रकान्पुनः ।६७ मालिनीपुत्रकान्पश्चाद्देवीपुत्रांस्ततः परम् । अथोमारुद्रमातृणां पुत्रान्दक्षिणतोयजेत् ।६८

४३० ] [ श्रीशारदा तिलक ऊर्ध्वमुख्याः सुतानूर्ध्वमधोमुख्याः सुतानधः । इति सम्पूजयेन्मन्त्री पुत्रवर्गा स्त्रयोदशः ।६६ तद्वहिः पद्मपत्रेषु लोकेशवटुकान्यजेत् । ब्रह्माणपुत्रकं पूर्वे माहेशीपुत्रमैश्वरे ।७० पूर्व दिशा में ईशान पर्यन्त उनके बाहर इनका पूजन करना चाहिये-पूर्व में डाकिनी पुत्रों का-फिर डाकिनी पुत्रों का-पीछे लाकिनी पुत्रों का--इनके अनन्तर काकिनी के पुत्रों का, शाकिनी के पुत्रों का, फिर हाकिनी के पुत्रों का फिर मालिनी के पुत्रों का । इसके अनन्तर देवों के पुत्रों का--इसके उपरान्त उमा रुद्र मातृकायों के पुत्रों का दक्षिण की ओर यजन करना चाहिये ।६६-६८। ऊर्ध्व में मुख सुतो का ऊर्ध्व में और अधोमुख्य सुतों का अधोभाग में इस तरह से मन्त्रधारी को इन तेरह पुत्र वर्गों का अच्छी तरह से पूजन करना चाहिये ।६६। इनके बाहरी भागों में पद्म के पत्रों में लोकों के ईश वटुकों का यजन करना चाहिये । पूर्व दिशा में ब्राह्मणी पुत्र का अर्चन करे ओर ईश्वर की दिशा मे माहेशी के पुत्रों का अर्चन करना चाहिये ।७०। वैष्णवीपुत्रक सौम्ये कौमारीपुत्रमानिले । इन्द्राणीपुत्रकं भूयः पूजयेत्पश्चिमे तमः ।७१ महालक्ष्मीसुतं पश्चाद्रक्षोदिशि समर्चेयेत् । वाराहीपुत्रकं याम्ये चामुण्डासुतमानले ।७२ वटुकान्दशदिक्ष्वर्चेद्धेतुक त्रिपुरान्तकम् । बेताल वह्निजिह्वाख्यं कालान्ताख्य करालकम् ।७३ एकपादं भीम दंष्ट्रमचल हाटकेश्वरम् । दिग्वि दिक्ष्वन्तरालेषु श्रीकण्ठान्-जेत्पुनः ।७४ क्रोधीशवरादीनव्वृवन्तांस्तद्वद्बाह्ये समर्चेयेत् । ततस्त्रीन्नकुलीशाद्यान्दक्षिणे पूजयेत्सुधीः ।७५

अष्टादश पटल ] [ ४३१ वैष्णवीके पुत्र का सौम्य दिशा में और कौमारी पुत्र का वायव्य में यजन करे। इसके उपरान्त इन्द्राणी के पुत्र का पश्चिम दिशा में पूजन करना चाहिये ।७१। राक्षस दिशा में पीछे महालक्ष्मीके पुत्र का समर्चन करे। याक्ष्य दिशा में वाराही के पुत्र का तथा आनिल दिशा में सुत का यजन करना चाहिये ।७२। वटुकों का दशों दिशाओं में अर्चन करे। धेनुक-त्रिपुरान्तकवेताल वह्नि जिह्वाख्य, कालान्त, करालक पाद, भीम- दष्ट्र, अचल, हाटकेश्वर का दिशा, विदिशाओं के अन्तरालों में यजन करे ओर फिर श्रीकण्ठ आद का अर्चन करे। इनके बाहिरी भाग में क्रोधीश्वर से आदि भृगु के अन्त तक का समर्चन करना चाहिये । ७४-७५ । इस के अनन्तर सुधी पुरुष दक्षिण में तीन नकुलीशाद्यो का पूजन करे । ७५ । दिव्यन्तरिक्षभूमिष्ठान्यो गीशान् शक्तिसंयुतान् । योगिनीभिः सहाभ्यर्च्यदीशाग्निन्र्ऋतिस्थितान् ।७६ इति सम्पूज्योद्देव वटुकं प्रोक्तवर्त्मना । धर्मार्थकाममोक्षाणां पतिर्भवति मानवः ।७७ विघ्नदुर्गा समाराध्य बलिं दत्वा विधानतः । काम्यामि साधयेन्मन्त्रा यथोक्तां सिद्धिमाप्नुयात् ।७८ शाल्यन्नं पलहं सर्पिर्लाजाचूर्णानि शर्करा । गुडमिक्षु०रसापूपर्मध्वक्तैः परिमिश्रितैः ।७९ कृत्वा कवलमाराध्य देवं प्रागुक्तवर्त्मना । रक्तचन्दनपुष्पाद्यैनिशि तस्मै बलिं हरेत् ।८० ईशान-निऋ'ति, अग्नि दिशाओं में स्थित दिविलोक ओर भूमि में स्थित शक्ति से समन्वित योगीशों का योगिनियों के ही साथ में अभ्यर्चन करना चाहिये ।७६। इस प्रकार से कथित मार्ग के द्वारा वटुक देव का पूजन करे । इसके प्रभाव से मानव धर्म--अर्थ--काम-- और मोक्ष का स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सभी उसे आसानीसे प्राप्त हो जाते हैं ।७७। विघ्न दुर्गा का समाराधन करके विधान के

४३२ ] [ श्रीशारदा तिलक साथ बलि देवे । इसका यह प्रभाव होता है कि मन्त्रधारी पुरुष अपने काम्य कर्मों का साधन कर लिया करता है और यथोक्त सिद्धि की प्राप्ति कर लिया करता है ।७८। शाली अन्न - पलल - घृत लाजाओं का चूर्ण -- शक्कर -- गुण - ईख का रस और पूजा-इन सबको मधु में अक्त करके परिमिश्रित करके कवल बनावे और पूर्व में कथित मार्ग से देव का समाराधन करके रदत चन्दन पुष्प आदि के द्वारा रात्रि में उन के लिए बलि का आहरण करना चाहिए ।७६-८०। ततः सिध्यन्ति कार्याणि बलिनानेन मन्त्रिणः । जुहुयात्सर्पिषा मन्त्री यथोक्तां सिद्धिमाप्नुयात् ।८१ वश्याय जुहुयादिक्षुशनलैर्वशयेज्जनान् । जुहुयात्पुत्रलाभाय प्रफुल्लैः कैरवैः सुधीः ।८२ धनधान्यादिसम्पत्त्ये जुहुयादिलतण्डलैः । विल्वप्रसूनैर्जुहुयान्महतीं बिन्दति श्रियम् ।८३ लोणैर्मधुरसम्मिश्रैर्वशपद्वनिताजनान् । वृष्टिकामेन होतव्यं वेतसानां (सस्य) समिद्वरैः ।८४ अन्नेन जुहुयान्नित्यं धनधान्यादिसम्पदे । वश्याय जुहुयान्मन्त्री मधुना दिवसत्रतम् ।८५ इसके उपरान्त मन्त्रधारी के इस बलि के करने से समस्त कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मन्त्रधारी घृत से होम करे तो यथोक्त सिद्धि को प्राप्त कर लिया करता है ।८१। वश्य के लिए ईख के खण्डों से होम करे तो वह सभी मनुष्यों को अपने वंश में कर लिया करता है। सुधी पुरुष को पुत्र के लाभ के लिए खिले हुए कैरव के पुष्पों से होम करना चाहिए ।८२। धनधान्य आदि की सम्पदा के प्राप्त होने के लिए तण्डुलों से होम करना चाहिए। यदि विल्व वृक्ष के पुष्पों से हवन करे तो बहुत बड़ी श्री का लाभ मनुष्य किया करता है ।८३। मधुर से सम्मिश्रित लवणों से यदि होम करे तो वनिताजनों को अपने वश में कर लिया करता है । यदि वृष्टि कराने की कामना हो तो

अष्टादश पटल ] { ४३३ वेतसों की श्रेष्ठ समिधाओं के द्वारा हवन करे ।८४। धनधान्य आदि की सम्पदा के लिए अन्न के द्वारा ही नित्य होम करना चाहिए । मन्त्रधारी को चाहिए कि वश्य करने के लिए तीन दिन पर्यन्त मधु से होम करे ।८५। रोगोक्तौषधहोमेन रोमा नश्यन्ति तत्क्षणात् । कृत्याद्रोहे ग्रहे द्रोहे भूतापस्मारसम्भवं ।८६ व्याघ्राजिने समासीनोजुहुयादयुतं तिलैः । भतादयः पलायन्ते नेक्षन्ते तां दिशं भयात् ।८७ कृष्णाष्टमी समारभ्य यावत् स्यात्तच्चतुर्दशो । तिलैस्तण्डुलसम्मिश्रैर्मधुरत्रयलोलितैः ।८८ त्रिसहस्रं प्रतिदिनं जुहुयात्संस्कृतेऽनले । बटुकेश्वरमभ्यर्च्य भक्ष्यभोज्यफलान्वितम् ।८६ नित्यं निवेद्य नैवेद्यं मध्यरात्रे बलि हरेत् । एवं जपित्वा प्रयत: सहस्राण्येकविंशतिम् ।६० समाप्तिदिवसे नात्रावज हत्वा बलि हरेत् । ततः कारयिता राजा तोषयेत्साधकं धनै ।६१ विधिनानेन सन्तुष्टो बटुकेशः प्रयच्छति । तेजो बल यशः पुत्रान्कान्ति लक्ष्मीमरोगताम् ।६२ रोग में कही हुई औषध के होम करने से रोग उसी क्षण में नष्ट हो जाया करते हैं । कृत्या के द्रोह में-ग्रहों के द्रोह में-भूतों और अपस्मार के रामुत्पन्न होने पर व्याघ्रचर्म पर स्थित होकर तिलों के द्वारा दश सहस्र आहुतियाँ देवे । इस होम के करने से भूत आदि सब भाग जाया करते है और उस दिशा की ओर भय से देखते भी नहीं हैं ।८६-८७। मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ करके जब तक चतुर्दशी होवे तीनों मधुरों में लोलित करके तण्डुलों से मिश्रित तेलों से हवन करे और प्रतिदिन तीन सहस्र आहुतियाँ देवे तथा संस्कार किये हुये अग्नि में ही होम करना चाहिये । वटुकेश्वर का

४३४ ] [ श्रीशारदा तिलक अभ्यर्चन करके भक्ष्य भोज्य और फलों से समन्वित नैवेद्य का नित्य निवेदन करके रात्रि के मध्य में बलि का अपहरण करे । इस प्रकार से प्रयत होकर इक्कीस हजार जप करे और समाप्ति के दिन में रात्रि में बकरा का हनन करके बलि का अपहरण करे । राजा इस तरह इसे कराकर धनों के द्वारा साधक पुरुष को सन्तुष्ट करे । इस विधि से करने पर वटुकेश परम सन्तुष्ट होकर तेज, बल, यश, पुत्रगण, कान्ति, लक्ष्मी और निरोगता को प्रदान किया करते हैं ।५६-६२। नश्यन्ति शत्रवः सर्वे वर्द्धन्ते बन्धुबान्धवाः । अवग्रहो न जायेत विषये तस्य भूपतेः ६३ जुहुयात्केवलैर्लोणैरयुतं स्तम्भनेच्छया । निगडादिविमोक्षाय प्रयोगोऽयमुदाहृतः ।६४ बचाचूर्णपलं जप्तं गव्येनाज्येन लोलितम् । विभज्य भक्षयेद्वन्ध्या मण्डलात्पुत्रकांक्षिणी ।६५ विनीतं पुत्रमाप्नोति मेधाऽऽरोग्यबलान्वितम् । आदावन्ते प्रयोगस्य वटुकाय बलि हरेत् ।६६ द्विविधो बलिराख्यातो राजसः सात्विको बुधैः । राजसो मांसरक्ताढन्नःपलत्रयसमन्वितः ।६७ उसके सभी शत्रुगण नष्ट हो जाया करते हैं और उसके बन्धु- बान्धवों की वृद्धि होती है । उस राजा के देश में अवग्रह नहीं हुआ करता है ।६२। यदि किसी के स्तम्भन करने की इच्छा हो तो केवल लोण से दश सहस्र आहुतियां देनी चाहिये । बन्धन आदि के विमोक्षण करने के लिये यह प्रयोग उदाहृत किया गया है ।६४। वच के चूर्ण को गो के घृत में लोलित करके एक पल प्रमाण को अभिमन्त्रित करे । फिर इसको विभक्त करके वन्ध्या नारी खावे । जो मण्डल से पुत्र की प्राप्ति आकांक्षा रखने वाली होवे तो यह नारी परम विनीत पुत्र को किया करती है, जो मेधा-आरोग्य और बल से अन्वित हुआ करता। आदि में और अन्त में प्रयोग करने पर वटुक के लिये बलि का

अष्टादश पटल ] [ ४३५ आहरण करना चाहिये ।६४-६५। बुध पुरुषों के द्वारा दो प्रकार का बलि बताया है। एक सात्विक होता है और दूसरा राजस बलि हुआ करता है। जो राजस बलि होता है वह रक्त-माँस से अन्वित होता है और तीन फलों से युक्त होता है ।६७। मुद्गपायससंयुक्त्तो मधुरत्रयलोलितः । सात्विको मांंसरहितः शेषमन्यत्पुरोक्तवत् ।६८ ब्राह्मणो विनयः शुद्धः सात्विकं बलिमाहरेत् । साधयन्मनुनाने भस्म सर्वार्थसिद्धिदम् ।६६ उशीर चन्दनं कोष्ठ घनसारं सकुंकुमम् । श्वेताकंमूलं वाराहीं लक्ष्मी क्षीरमहीरुहाम् ।१०० त्वचो बिल्वत्तरोर्मूलं शोषयित्वा सुचूर्णयेत् । चूर्णं व्योम्नि गृहीतेन गोमयेन विमिश्रिम् ।१०१ कृत्वा पिण्डानि संशोष्य संस्कृते हव्यवाहने । मूलेन दग्ध्वा तद्भस्म शुद्धपात्रे वनिःक्षिपेत् ।१०२ जो सात्विक बलि होता है वह मूंग व पायस से संयुक्त और मधुर त्रय में लोलित होता है। सात्विक बलि माँस से रहित होता है और शेष सब पूर्व में कहे हुये ही की भांति हुआ करता है ।६८। विनय से युक्त और शुद्ध ब्राह्मण सात्विक बलि का ही आहरण करे । इस मन्त्र के द्वारा साधन करते हुआ जो भस्म होती है वह सब अर्थ और सिद्धि से प्रदान करने वाली हुआ करती है ।६६। अब भस्म के साधन का प्रकार बताया जाता है, शरीर, चन्दन, कुष्ठ, कपूर, कुंकुम, श्वेत आक का मूल, बाराही, लक्ष्मी, और दूध वाले वृक्षोंकी त्वचा (वल्कल) विल्व वृक्ष की जड़-इस सबको सुखाकर कूट-पीस कर चूर्ण बना लेवे । चूर्ण को व्योम गृहीत कर गोमय से विमिश्रित करे ।१००-१०१। उसके पिण्ड बनाकर सुखावे तथा संस्कार की हुई अग्नि में मूल-मन्त्र से जला कर उस भस्म को शुद्ध पात्र में विनिक्षिप्त कर देवे ।।१०२।

४३६ ] [ श्रीशारदा तिलक केतकी मालती पुष्पैर्वासयेत् भस्म शोधितम् । अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं स्पृष्ट्वा भस्म सुपुजितम् ।१०३ एतदादाय दिनशः प्रातः पुण्ड्रं करोति यः । तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति कृत्यादोहमहाग्रहाः ।१०४ रिपुचौरमृगादिभ्यो भयमस्य न जायते । वर्द्धन्ते सम्पदः सर्वाः पूज्यते सकलैर्जनैः ।१०५ राजा वश्योमवेत्तस्य सामात्यः सपरिच्छदः । अभिषेकं प्रकुर्वीत राज्ञो विजयकांक्षिणः ।१०६ पूर्वोक्ते मण्डपे कॢप्ते वितानध्वजशोभिते । सर्वतोभद्रमालिख्य कर्णिकां तस्य पूरयेत् ।१०७ उस शोभित भस्म को केतकी और मालतीके पुष्पोंसे वासित करे । उस भली भाँति पूजित भस्म का स्पर्श करके दश सहस्र की संख्या में मन्त्र का जप करना चाहिये ।१०३। इसको ग्रहण करके दिन में जो पुरुष प्रातःकाल में पुण्ड्र (तिलक) करता है उस पुरुषके सब रोग और कृत्या द्रोह तथा महान ग्रह सभी नष्ट हो जाया करते हैं ।१०४। शत्रू- चोर और हिंसक पशु आदि से भी इस पुरुष को कभी भी भय नहीं हुआ करता है। इस पुरुष की सभी सम्पदायें बढा करती हैं और यह पुरुष सभी जनों के द्वारा पूजा जाया करता है ।१०५। उस पुरुष का राजा अपने अमात्यों के सहित और सम्पूर्ण परिच्छद के साथ वश्य हो जाया करता है। जो राजा विजय की आकाङ्क्षा रखता हो उस राजा का अभिषेक करना चाहिये ।१०६। पूर्व में वर्णित मंडप में जो कॢप्त किया गया है और वितान और ध्वजा पताओं से सुशोभित है इसमें सर्वतोभद्र का आलेखन करके उसकी कर्णिका को पूरित कर देना चाहिये ।१०७ अष्टद्रोणप्रमाणेन् शालिभिः शोभितैः शुभ्रैः । तदर्द्धन्तण्डुलांस्तस्मिन्न्यस्य दूर्वाक्षतान्विताम् ।१०८

अष्टादश पटल ] [ ४३७ हेमादिविहितं कुम्भं नवरत्नसमन्वितम् । संस्थाप्य विपुलै स्तोयैरापूर्यास्मिन्वनिः क्षिपेत् ।१०६ क्षीरद्रुमग्रपल्लवानि लक्ष्मीदूर्वा सहां पुनः । कर्पूरं चन्दनं बिल्वमुशीरं कुंकुमं पुनः ।११० कङ्कोलमगुरुं जातिं मल्लिकां चम्पकोत्पले । गोमेदं दाडिमं पश्चात्पट्टयुग्मेन वेष्टयेत् ।१११ तस्मिन्नावाह्य वटुकं राजसं सम्प्रपूजयेत् । वहिरष्टसु कुम्भेषु भैरवानष्टपूजयेत् ।११२ आधे द्रोण के परिमाण से भ शोभित शालियों से जिसमें उनके आधे तंडुल रखे जो दूर्वा और अक्षतों से समन्वित होवे । एक कुम्भ सुवर्ण आदि धातुओ से निर्मित कराकर उसे नौ प्रकार के रत्नों से समन्वित करे । उस कुम्भ को संस्थापित करके बहुत अधिक जल से आपूरित करके उसमें डाल देवे । उसमें निःक्षिप्त की जाने वाली वस्तुयें ये हैं—दूध वाले वृक्षो के पल्लव, लक्ष्मी, दूर्वा, सहा, कपूर, चन्दन, विल्व, उशीर, कुंकुम, कंकोल,, अगुरु जाति, मल्लिका चम्पक, उत्पन्त, गोमेद, दाडिम, इन सबका प्रक्षेप करना चाहिये । फिरदो पट्टो से वेष्ठित कर देवे ।१०८-१११। उसमें राजस वटुक का आवाहन करके भली भाँति पूजन करे । बाहर में जो आठ पत्र है उनमें आठों भैरवों का अर्चन करना चाहिये ।११२। त्रयोदशसुकुम्भेषु त्रयोदश गणान्यजेत् । बाह्ये दशसुकुम्भेषु लोकेशानर्चयेत्सुधीः ।११३ तद्बहिर्द्व्यष्टकुम्भेषु श्रीकण्ठादीन्सुरेश्वरान् । पञ्चत्रिशत् घटेष्वर्चैत्कादिबर्णेश्वरान्क्रमात् ।११४ इति गन्धादिभिः सम्यक् पञ्चावरणमर्चयेत् । अयुतं प्रजपेत्पृष्ट् वा तान्घटान्देशिकोत्तमः ।११५ पायसैः सर्पिषा शुद्धैस्तिलै दशशतं पृथक् । जुहुयात्तन्घटन्स्पृष्ट् वा प्रत्यहं बलिमाहरेत् ।११६

४३८ ] [ श्रीशारदा तिलक राजसोक्तप्रकारेण रात्रे देशिकसत्तमः । मुदिने शोभने लग्ने वाचयित्वा द्विजन्मभिः ।११६ स्वस्तिमङ्गलवाक्यानि विशुद्धैर्वेदपारगैः । नदत्सुपञ्चवाद्येषु प्रणम्य वटुकेश्वरम् ।१२० जितेन्द्रियं शुद्धकाय राजानं ब्राह्मणाप्रियम् । आस्तिकं सत्यवचनमभिषिञ्चेत्प्रसन्नधीः ।१२१ तेरह सुन्दर कुम्भों में तेरह गणों का अर्चन करे । बाह्य भाग में दश कुम्भों में सुधी पुरुष लोकेशों का पूजन करे ।१३३। उनके बाहिर आठ कुम्भों में श्रीकण्ठ आदि सुरेश्वरों का यजन करे । पैंतीस घंटों में क्रम से आदि वर्णों के ईश्वरों का अर्चन करना चाहिये ।११४। इन रीति से गन्ध आदि उपचारों के द्वारा अच्छी तरह से पञ्चावरण की पूजा करे । उत्तम आचार्य को चाहिये कि वह उन सब घटों का स्पर्श करके दश सहस्र मन्त्र का जप करे ।११५। पायस, घृत, शुद्ध तिल इनसे पृथक् उन घटों का स्पर्श करके दश शत होम करना चाहिये ओर प्रतिदिन बलि का आहरण करे ।११७-११८। राजस में कहे हुये प्रकार से आचार्यों में परम श्रेष्ठ रात्रि के समय में सुन्दर दिन में और शोभन लग्न में द्विजों के द्वारा स्वस्ति वाचन और पुण्याह वाचन आदि मङ्गल वाक्यों का वाचन करावे । किन्तु ब्राह्मण विशुद्ध और वेदों के पारगामी विद्वान् होने चाहिये । पाँचों प्रकार के वाद्यों के बजाये जाने पर वटु- केश्वर को प्रणाम करे । फिर जिसमें इन्द्रियों को जीत लिया हो ब्राह्मणों पर प्यार करने वाला हो--शुद्ध शरीर वाला हो ऐसे राजा का जो आस्तिक--सत्यवादी होवे उसका प्रसन्न बुद्धि वाला पुरुष अभिषेक करे । ११६-१२१। अभिषिक्तो नरपतिः प्रणिपत्य गुरुं परम् । भूयसीं दक्षिणां दद्यात्प्रसोदति यथा गुरुः ।१२२ राजाभिषषक्तो भवति साक्षाद्भूमिपुरन्दरः । परान्विजयते भूपान्स्तूयते सकल जनैः ।१२३

अष्टादश पटल ] [ ४३६ कृत्वाभिषेकं षण्मासं प्रतिमासं महीपतिः । चतुरम्भोधिबलयां शास्ति सर्वां वसुन्धराम् ।१२४ गजाश्वशान्तिविधये तेष शालासु साधकः । कुण्ड कृत्वा विधानेन होमं कुर्याद्यथाविधि ।१२५ पायसाज्यतिलै विद्वानयुतत्रियावधि । ब्राह्मणान्भोजयेन्नित्यं भक्ष्यभोज्यफलादिभिः ।१२६ अभिषेक किया हुआ राजा परम गुरुको प्रणाम करके बहुत ज्यादा दक्षिणा देवे जिससे गुरुदेव प्रसन्न होवें।१२२। अभिषेक किया हुआ राजा साक्षात् भूति का इन्द्र हो जाता है। वह फिर दूसरे राजाओं पर विजय प्राप्त किया करता है और समस्त जनों के द्वारा स्तुत हुआ करता है ।१२३। राजा छः मास पर्यन्त प्रति मास में अभिषेक करके चार महा- सागरों के वलय वाली अर्थात् आसमुद्रान्त सम्पूर्ण वसुन्धरा पर शासन किया जाता है ।१२४। गजों, अश्वोंकी शान्ति की विधि के लिये साधक उनकी शालाओं में विधि-विधान से कुण्ड की रचना करके विधि के साथ होम करे ।१२५। विद्वान् पुरुष पायस-घृत और तिलों के द्वारा आयुतों की अवधि तक अर्थात् तीस हजार तक होम करे । नित्य ही भक्ष्य-भोज्य और फलादि के द्वारा ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये ।१२६। प्राक् प्रोक्तविधिना कुम्भान्स्थापयित्वात्र देशिकाः । अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैस्तज्जलैः प्रोक्षयेद्गजान् ।१२७ अश्वशालासनेनै, वर्द्धन्ते दिने दिने । युद्धेषु महती शक्तिर्जा ते पूर्वतोऽधिका ।१२८ सर्वेरोगाः प्रणश्यन्ति कृत्याद्रोहाः परैः कृताः । अस्मात्परतरा रक्षा नास्ति तेषा महीतले ।१२६ अभिषिच्य महीपालं परेषां विजयोद्यतम् । उक्तेन विधिना मन्त्री यामिन्यां बलिमाहरेत् ।१३० अन्य्यूनाङ्गमजं हत्वाराजसं प्रागुदाहृतम् । वलिप्रदानसमये रिपूणा सर्वसैन्यकम् ।१३१

४४० ] [ श्रीशारदा तिलक निवेदयेद्वलित्वेन वटुकायः विशिष्टधीः । विदर्भयेच्छत्रुनाम्ना बलिमन्त्रं तथा सुधीः । १३२ आचार्य प्राक् प्रोक्त विधि से यहाँ पर कुम्भों की स्थापना करके उनके जल से गजों का प्रोक्षण करना चाहिये । १२७। इसी विधि से इसके ही द्वारा अश्वशाला का भी प्रोक्षण करेतो वे गज और अश्व दिन पर दिन वृद्धि को प्राप्त ही जाया करते हैं। पूर्वसे भी कहीं अधिक इनकी युद्धों में बड़ी भारी शक्ति हो जाया करती है । १२८। सभी रोगों का विनाश हो जाया करता है और कृत्या द्रोह जो अन्यों के द्वारा किये गये हैं उन सबका भी नाश हो जाता है । उनकी रक्षा इससे बड़ी कोई भी मही-तल में नहीं है । १२६। उनकी सुरक्षा का यही सर्वोत्तम साधन होता है । जो राजा अपने-अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये समुद्यत है उस नरपति का अभिषेक करके मन्त्रधारी पूर्वमें वर्णित विधि से यामिनी में बलि का अपहरण करे । १३०। अन्यून अङ्गों वाले अजका हवन करके पहिले राजस कहा गया है। बलि के दान के समय में सम्पूर्ण सेना को वटुक के लिये बलि के रूप में विशिष्ट बुद्धि वाले को निवेदन करना चाहिये । १३१। तथा शत्रु के नाम से सुधी वाले मन्त्र को पढ़े और बलि का आहरण करे । १३२। शत्रु पक्षस्य रुधिर पिशितं च दिने दिने । भक्षयः स्वग्गणैः सार्द्धं सारमेय समन्वितः । बलिबन्त्रोऽयमाख्यातः शर्वषां विजयप्रदः । अनेन बलिना दृष्टा वटुकः परसैन्यकम् । १३१ सर्वं गणेभ्यो विभजीमामिषं क्रुद्रमानसः । एवं कृते परिकुलं क्षीयते नात्र संशयः । १३४ विजयश्रियमेतेन राजा प्राप्नोत्ययत्नतः । १३५ आये दिन शत्रु के पक्ष वालों के रुधिर और माँस को अपने गणोंके साथ तथा सारमेयों से समन्वित होकर भक्षण करो । इस प्रकार से अभिमंत्रित यह विधान रात्रिमें करे तो विजयके प्रदान करने वाला हुआ

अष्टादश पटल ] [ ४४१ करता है। इस मन्त्र के द्वारा दिये हुए बलिसे भगवान् वटूक देव परम प्रसन्न होते हुये शत्रु की सेना के सैनिकों के मास को अपने समस्त गणों के लिये क्रुद्धमन वाले होकर विभक्त कर दिया करते हैं। ऐसा करने पर शत्रु का बल अवश्य ही क्षीण हो जाया करता है-इससे कुछ भी संशय नहीं है । १३४। इस प्रयोग के द्वारा राजा विजय प्राप्त करने की श्री को अवश्य ही प्राप्त कर लिया करता है अर्थात् राजा को विजय निश्चित रूप से हुआ करती है और उसके प्राप्त करने में कुछ भी अन्य यत्न नहीं करना पड़ता है अर्थात् कुछ भी उपायन करने पर भी विजय हो जाती है ।१३५। श्रोमायास्मरकूटमंत्रविलिखेन्मध्यं दलेष्वष्टसु द्विः-प्रोक्त वटुकाय शब्दमपान्मन्त्रस्य वर्णान्वहिः । 'अष्टद्वन्द्वदलेषु तद्वबहिरधस्तत्संख्यपत्रेष्वथ । द्वात्रिंशद्दलकादिशान्तसहितं यन्त्रं लिखेद् भूपुरे । १३६ आपदुद्धारणं यन्त्रमपमृत्युभयापहम् । सर्वसम्पत्प्रदं नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् । १३७ रक्षाकरं ग्रहार्तानां राज्ञां विजयवर्द्धनम् । आपदुद्धारणादस्मादापदुद्धारणक्षमः । १३८ अब यन्त्र विशेष बतलाया जाता है अर्थात् श्री बीज, माया-शक्ति का बीज, स्मर अर्थात् कामदेव—क्लीं, बीज, कूट-क्लीं, मध्य में अर्थात् कर्णिका में लिखना चाहिये। दो बार कहा हुआ वटु काय’— यह शब्द लिखे, आठ दलों में बाहर मन्त्र के दूसरे वर्णों को लिखना चाहिये। दो आठ दलों में उनके बाहिर और नीचे उतनी ही संख्या वाले पत्रों में लिखे। बत्तीस दलों के आदि वाले सान्त के सहित लिखे और भूपुर का लेखन करके मन्त्र की रचना करनी चाहिये ।१३६। यह मन्त्र आपदाओं का उद्धरण है अर्थात् आपदाओं से रक्षा करने वाला होता है और अपमृत्यु अर्थात् बुरी रीति से होने वाली मौत के भय को दूर भगा देने वाला होता है। यह मन्त्र नित्य ही सब प्रकार की सम्प-

४४२ ] [ श्रीशारदा तिलक दाओं के प्रदान करने वाले हैं ओर सभी तरह के सौभाग्य का भी देने वाला होता है ।१३७। जो पुरुष ग्रहोंके द्वारा किये हुये उपद्रवों से आत्तं अर्थात् पीड़ित होते हैं उनकी रक्षा करने वाला होता है । यह यन्त्र राजाओं के लिये विजय के वर्द्धन करने वाला करता है । इस तरह से आपदाओं के उद्धारण करने के कारण वह मन्त्र आपदाओं को दूर करने में समर्थ हुआ करता है ।१३८। तन्त्रेषु नास्ति मन्त्रोऽन्य इत्याहुर्मन्त्रवेदिमः । अर्धीशोवह्लिशिखरोलान्तस्थो दान्त ईरितः ।१३६ फठन्तश्चण्डमन्त्रोऽयं त्रिवर्णात्मा समीर्रितः । अस्य त्रिको मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।१४० चण्डेशो देवता प्रोक्ता कुर्यादङ्गविधिं पुनः । हृदयं दीप्तफट् प्रोक्तं ज्वलफट् शिर ईरितम् ।१४१ शिखा ज्वालानालिनी फट् ज्ञेया, फट् कवचं मतम् । हनफट् नेत्रमाख्यातं मर्वज्वालिनि फट् परम् ।१४२ विन्यस्यैवं षडङ्गानि ततोदेवं विचिन्तयेत् ।१४३ मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले विद्वान् यही कहा करते है कि तन्त्र शास्त्रों में इससे बड़ा अन्य कोई भी यन्त्र नहीं है और न इसको समा- नता रखने वाला कोई दूसरा मन्त्र है । अब खण्ड मन्त्र बताया जाता है, अर्धीश, ऊ, दान्त, घः, वह्निशिखर, ध्व, लान्तस्थ, दान्त कहा गया है । इसके अन्त से 'फट्'-यह शब्द होता है । यह मन्त्र तीन वर्णों के स्वरूप वाला कहा गया गया है । इस मन्त्र को ऋषि त्रिक कहा गया है और इसका छन्द अनुष्टुप् बताया गया है ।१३६-१४०। इस मन्त्र का देवता खण्डेश कहा गया है । फिर इसके अङ्गों की विधि को करना चाहिये । इसका हृदय दीप्त फट् कहा गया है और ज्वल फट् इसका शिर कहा गया है ।१४१। ज्वालामालिनी फट्-इसकी शिखा जाननी चाहिये और फट् यह इसका कवच बताया है । हस फट्-यह नेत्र कहा है और सर्व ज्वालिनि फट् परम है ।१४२। इस रीतिसे इसके

अष्टादश पटल ] [ ४४३ षट् अङ्गों का विन्यास करके इसके पश्चात् निम्न प्रकार से देव का चिन्तन करना चाहिये ।१४३। चण्डेश्वरं रक्ततनुं त्रिनेत्रं रक्तांशुकाढ्यं हृदि भावयाम् । टङ्कं त्रिशूलं स्फटिकाक्षमालां कमण्डलुं बिभ्रतमिन्दुचण्डम् ।१४४ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः । मधुरत्रयसंयुक्तैर्विशुद्धैस्तिलतण्डुलैः ।१४५ पञ्चाक्षरोदिते पीठे चण्डेशं साधु पूजयेत् । मूर्त्तौ बीजेनं कॢप्तायः तत्क्रमो बिन्दुसंयुतः ।१४६ चण्डेश्वराय हृद्बीलपूर्वः पूजामनुर्मतः । अङ्गैर्मातृभि राशैश्शंङ्खाद्यै राय्धैर्यजेत् ।१४७ चतुरावरणं प्रोक्तं चण्डेशस्य समर्चनम् । इति सिद्धे मनौ मन्त्री धनवाञ्जायतेऽचिरात् ।१४८ अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है-रक्त वर्ण के शरीर को धारण करने वाले-तीन नेत्रों से समन्वित-रक्त वर्ण वस्त्रों से आढ्य टङ्क--त्रिशूल--स्फटिकों की अक्ष माला-- कमण्डल और चन्द्र के खण्ड को धारण करने वाले खण्डेश्वर को हृदय में भी भावना करता हूँ । अर्थात् अपने हृदय में ध्यान किया करता है ।१४४। इस मन्त्र में जितने भी वर्ण है उतने ही लाख इस मन्त्र का जाप करना चाहिये और जो भी जप किया जावे उसके दशम भाग का मन्त्र के ही द्वारा होम करना चाहिये । हवन तीनों प्रकार के मधुरों से संयुक्त तिलों तथा तण्डुलों के द्वारा करे ।१४५। पाँच अक्षरों से उदित पीठ पर खन्डेश का भली-भाँति अर्चन करना चाहिए । बीज के द्वारा कॢप्त सूत्ति में उसका विन्दु से संयुक्त कूर्म है ।१४६। खण्डेश्वरके लिये हृद् बीज पूर्व में रहने वाला इसकी पूजा का मन्त्र माना गया है । अङ्गों से मातृकाओं के द्वारा वज्र आदि आयुधों से युक्त दिक्पालों का यजन करना चाहिए ।१४७। खन्डेश का समर्थन चार आवरणों से समन्वित कहा गया है । इस रीति से मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर मन्त्र

४४४ ] [ श्रीशारदा तिलक के धारण करने वाले पुरुष थोड़े ही समय में धनवान् हो जाया करता है ।१४८। तर्पयेन्मनुनानेन नित्यमष्टोत्तरं शतम् । श्रियमाप्नोति महतीं पुत्रमित्रसमन्वितः ॥१४६ प्रियङ्गकुसुमैः फुल्लोस्तत्काष्ठोज्वलितेऽनले । जुहुयादयुतं मन्त्री पुरक्षोभः प्रजायते ॥१५० साध्यवृक्षत्वचो लोण पिष्ट्वा पिष्टसमन्वितम् । पुत्तलीं रुचिरां कृत्वा प्रतिष्ठाय समीरणम् ॥१५१ इसी मन्त्र के द्वारा मन्त्रधारी पुरुष को चाहिये कि नित्य ही देव का तर्पण किया करे । ओर एक सौ आठ बार तर्पण अवश्य ही करना चाहिये । इस तर्पण का यह प्रभाव होता है कि वह तर्पण करने वाला व्यक्ति अपने पुत्रों और मित्र मण्डलीके सहित बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति का लाभ लिया करता है ।४६। मन्त्र के धारण करने वाले पुरुष को प्रियङ्ग के काष्ठों के द्वारा प्रज्वलित किये हुये अग्निमें खिले हुये प्रियङ्ग के पुष्पों के द्वारा दश सहस्र बार हवन करना चाहिये । इससे पुरक्षोभ हो जाता है ।१५०। साध्य वृक्ष की त्वचा अर्थात् उसका वल्कल और लोण इन दोनों को पीसकर पिष्ट से समन्वित करे । इसके द्वारा एक पुतली की रचना करनी चाहिये । यह पुतली परम सुन्दर बनानी चाहिये । इसकी रचना करके फिर उसमें शास्त्र की विधि के अनुसार प्राणों की प्रतिष्ठा करनी चाहिये १५१। छित्त्वा छित्त्वा प्रजुहुयादष्टोत्तरशतं निशि । सप्ताहमेवं कुर्वीत साध्यो दासो भवेत्तस्यम् ॥१५२ शैवमन्त्रेषु निष्णातश्चण्डेश्वरमनुं भजेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति परत्रेह च नन्दति ॥१५३ धरापोऽग्निमरुद्व्यो ममखेशेन्द्वर्कमूर्त ये । सर्वभूतान्तरस्थाय शङ्कराय नमोनमः ॥१५४

अष्टादश पटल ] [ ४४५ श्रुत्यन्तकृतवासाय श्रुतये श्रुतिजन्मने । अतीन्द्रियाय महसे शाश्वताय नमोनमः ॥१५५ इस पुत्तलिका का छेदन कर-करके रात्रि के समय में एक सौ आठ बार प्रज्वलित अग्नि में आहुतियाँ देवे । इसी रीति से बराबर सात दिन तक किया करे तो वह साध्य ही आकर दास हो जाया करता है ।१५२। जो पुरुष भगवान् शिव से सम्बन्धित मन्त्रों के ज्ञान में परम निपुणात हो उसको ही चण्डेश्वरके मन्त्र का सेवन करना चाहिये । यह मनुष्य मन्त्र के सेवन करने से सभी मनोवाञ्छित कामनाओं को प्राप्ति कर लिया करता है । यह इस लोक में तो परम सुख सम्पन्न होता ही है ओर परलोक में पहुँचकर परमानन्द का सुख भोगा करता है ।१५३। धरा (भूमि), आपः, जल, अग्नि, मरुत, व्योम ( आकाश ) मखेश, इन्दु और अर्क, सूर्य की मूर्त्ति वाले तथा समस्त भूतोंके अन्तर में स्थित शंकर भगवान् के लिये वारम्वार नमस्कार है ।१५४। शैव मन्त्रों के अन्त में सर्वत्र भगवान् शिव का स्तवन होता है । मखेश का अर्थ यजमान होता है । श्रुति के अन्त में किए हुये वास वाले, भूतिस्वरूप, श्रुति के जन्म वाले इन्द्रियों की पहुँच से परे—शाश्वत अर्थात् तेज स्वरूपके लिए बारम्बार नमस्कार है ।१५५। स्थलसूक्ष्मविभागाभ्यामनिर्देश्याय शम्भवे । भवाय भवसम्भूतदुःखहन्ते नमोऽस्तुते ॥१५६ तर्कमार्गातिदूराय तपसः फलदायिने । चतुर्वर्गवदान्याय सर्वज्ञाय नमोनमः ॥१५७ आविमध्यान्तशून्याय निरस्ताशेषभीतये । योगिध्येयाय महते निर्गुणाय नमोनमः ॥१५८ { विश्वात्मनेऽविचिन्त्याय विलसच्चन्द्रमौलये । कन्दर्पदर्पकालाय कायहन्ते नमोनमः ॥१५९

४४६ ] [ श्रीशारदा तिलक स्थूल और सूक्ष्म के विभागों से निर्देशन करने के योग्य - सांसारिक सम्भूत दुःखों को पूर्ण रूप से हनन करने वाले अर्थात् संसार में होने वाले सभी प्रकार के दुःखों को विनाश कर देने वाले भव शम्भु के लिए नमस्कार है ।१५६। वे तर्कों के मार्ग में अत्यन्त दूर देश वाले अर्थात् ऐसे स्वरूप वाले हैं जहाँ तर्कों की सर्वथा पहुँच ही नहीं होती है। सभी प्रकार की तपश्चर्याओं के सुफलों को प्रदान करने वाले - धर्म—अर्थ—काम—मोक्ष इन चारों वर्गों के फलों को देने में वदान्य अर्थात् महान् दानी और सभी कुछ के ज्ञान रखने वाले शिव के लिए बारम्बार नमस्कार है ।१५७। जिनका न तो कोई आदिकाल है और न कोई भी मध्यकाल है तथा न कोई अन्त काल ही होता है वे आदि— मध्य और अन्त से रहित हैं। सभी तरह की भीतियों को निरस्त कर देने वाले हैं अर्थात् उनके भजन करने वाले भक्तजनों को किसी भी प्रकार का भय नहीं हुआ करता है क्योंकि उनके उपास्य देव के सामने कैसा भी भय नहीं टिकता है। जो योगाभ्यास करने वाले योगियों का परम ध्येय है अर्थात् योगीजन अपने ध्यान में समाधिस्थ होकर भगवान् शिव का ही निरन्तर ध्यान किया करते हैं। वे भगवान् शम्भु सबसे महान् हैं अतएव उनका नाम महादेव कहा जाता है । वे त्रिगुणों से रहित हैं। संसार की वस्तुयें और प्राणीगण त्रिगुणों से समन्वित रहा करते हैं और देवगण भी सत्व, रज, तम इन तीन गुणों के चक्रसे शून्य नहीं हैं। किन्तु भगवान् शम्भु इन गुणों से रहित और निर्गुण हैं, ऐसे भगवान् शिव के लिये बारम्बार प्रणाम ।१५८। यह प्रभु विश्व की आत्मा है अर्थात् सम्पूर्ण विश्व इनका ही स्वरूप है । चिन्तन करने के योग्य नहीं है अर्थात् इनका स्वरूप किसी के भी चिन्तन में नहीं आ सकता विराजमान है और इनका मस्तक उस इन्द्र के विद्यमान रहने में चन्द्र विराजमान हैं। कन्दर्प (कामदेव) के दर्प को लिए काल स्वरूप हैं। परम शोभित हैं। कन्दर्प (कामदेव) के दर्प को लिये काल स्वरूप है । कामदेव को सबको वश में कर लेने का बड़ा भारी अभिमान था और