भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ७२ )

18. O learned men, tell us without any jealousy and with fair consideration whether it is desirable to dwell on and enjoy the middle part of a mountain or to enjoy the hips or charming buttocks of an amorous woman smiling with the excess of passion.

—*

संसारेऽस्मिन्नसारे परिणितिरले द्वे गतीं पण्डितानां तत्त्वज्ञानामृताम्भः कृतललितधियां यातु कालः कदाचित् ॥ नो चैन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजवनभराभोगसंभोगिनानां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलोलेयतानाम् ॥१६॥

इस असार संसारमें, जिसकी अन्तिम अवस्था अतीव चञ्चल है, उन्हीं बुद्धिमानोंका समय अच्छी तरह कटता है, जिनकी बुद्धि तत्त्वज्ञान रूपी अमृत-सरोवरमें बारम्बार गोते लगानेसे निर्मल हो गई है अथवा उन्हींका समय अच्छी तरह अतिवाहित होता है, जो नवयौवनाओंके कठोर और स्थूल कुचों एवं सवन जङ्घाओंको सकाम स्पर्श कर, कामदेवका सुख उपभोग करते हैं ॥१६॥

खुलासा—इस मिथ्या और चञ्चल संसारमें या तो उन्हींके दिन अच्छी तरह व्यतीत होते हैं, जो ब्रह्म-विचारमें लीन रहते हैं अथवा उन्हींके दिन अच्छी तरह कटते हैं, जो सख्त् और मोटे-कुचों तथा गुदगुदी जङ्घाओंवाली नवयुवतियोंको अपने शरीर से चिपटाये, काम की उमङ्गसे मस्त होकर, उनके भोग-विलास का आनन्द लूटते हैं।

पुस्तकपालन

इस लोक में जन्म लेकर पृथ्वी की परीक्षा के निरपेक्ष संवेग करने चाहिये अथवा आपसमें जो समझ से युक्तताओं हुई विचारधाराओं बसणीं किसी के निमज्ज । [ पृष्ठ ४५ ]

Popular Press - Calcutta.

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( ७२ )

जो मृगनयनी कामिनियोंका भोगते हैं, उनके दिन बड़े सुखसे कटते हैं। उन्हें मालूम नहीं होता कि, कब दिन निकलता है और कब रात होती है; दिन-पर-दिन, पक्ष-पर-पक्ष, मास-पर-मास, और वर्ष-पर-वर्ष आते हैं और चले जाते हैं; किन्तु जो कामिनियों के साथ रमण नहीं करते, उनके दिन बुरी तरहसे कटते हैं। उन्हें एक-एक क्षण एक-एक वर्ष मालूम होता और जीवन भारवत् प्रतीत होता है। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

कल शवे वस्त्रमें, क्या जल्द कटी थीं बड़ियाँ।

आज क्या मर गये, घड़ियाल बजाने वाले ?॥

कल भोग-चिलासमें रात कैसी जल्दी कट गई ! आज तो रात बीतती ही नहीं ! क्या आज घण्टा बजानेवाले मर गये ?

और भी किसीने कहा है :—

अय्याम मुसीबतके, तो काटे नहीं कटते।

दिन ऐशकी घड़ियोंमें, गुजर जाते हैं कैसे ॥

दुःखके दिन तो काटे नहीं कटते; पर ऐशके दिन सहजमें कट जाते हैं।

मतलब यह है कि, कोमलाड़ियोंके साथ समय हवा की तरह बीतता है; पर जिनके माशूकाएँ नहीं हैं; उनके दिन पहाड़ हो जाते हैं। हाँ, उनके दिन भी परमानन्दमें हवाकी तेजीसे बीतते हैं, जो ब्रह्मानन्दमें लीन रहते हैं; लेकिन जो न तो ईश्वरका ध्यान करते हैं और न सुन्दरियोंका सुख लूटते हैं, उनके दिन काटेसे भी नहीं कटते।

( ७४ )

वैराग्यपक्ष ।

इस नापायेदार चन्द्रगुप्ता दुनियामें जन्म लेकर, विद्वानोंको दो राहोंमेंसे किसी एक पर चलना चाहिये :— ( १ ) या तो ब्रह्म-विद्याका अमृत पीना चाहिये, अथवा ( २ ) नवयुवती रम-गियोंके सुरतमें मग्न रहना चाहिये ।

रसिक कवि कहते हैं :—

त्याग लोक-सुख या रहें, मत्त परात्मा ध्यान ।

रमणी-रतिमें रत रहें, अथवा रसिक सुजान ॥

यद्यपि अपनी-अपनी रुचिके अनुसार दोनों राहें ही अच्छी हैं ; पर पहली की होड़ दूसरी राह कर नहीं सकती । उसके सुखमें कमी-बेशी—क्षय और वृद्धि तथा अनस्थिरता नहीं । उसका सुख सच्चा और अनन्तकाल-स्थायी तथा अक्षय है । उसमेंसे सदा पीयूष-धारा गिरा करती है ; पर दूसरीके सुखमें कमी-बेशी हुआ करती है । इसका सुख मिथ्या और क्षणस्थायी है । इसमेंसे जो अमृत-विन्दु टपकते हैं, वे वास्तवमें अमृत-विन्दु नहीं, किन्तु विष-विन्दु हैं ; लेकिन मोहसे अमृतसे जान पड़ते हैं । अब बुद्धिमान स्वयं विचार लें और जिस राहको अपने हृदयमें अच्छी समझें, उसे अवलोक्य करें ।

व्यप्य ।

अल्पसार संसार, तहाँ द्वै वात शिरोमनि ।

ज्ञान अमृतके सिन्धु, मगन है रहै रहै बुद्धिनि ॥

( ७५ )

नित्य-प्रनित्य विचार, सहित सब साधन साधें । की यह प्रौढ़ा नारि, धारि उर में आराधें ॥ चैतन्य मदन-शंकुश परसि, तिसकत मसकत करत रिश । रस मसत कसत विलसत हैंसत, इह विधि वितवत दिवसनिशि ॥ १६ ॥

सार—यदि सुखसे जीवन व्यतीत करना हो, तो दो में से एक काम करो:—या तो संसारसे मोह त्याग, एकाग्रचित्तसे, यशोदानन्दन कृष्णके कमल-चरणों की, निष्काम, भक्ति करो अथवा सुन्दरी रमणियों के रतिकेलि में मस्त रहो ।

19. In this unsubstantial world which has a very unsteady ending, there are only two courses for the wise. Either he spends his time by sharpening his intellect in nectar-like spiritual knowledge or he spends his time by laying his hands at and enjoying the body of a lovely and amorous woman having thick breasts,

मुखेन चन्द्रकान्तेन महानीलैः शिरोरुहैः ।

पाणिभ्यां पद्मरागाभ्यां रेजे रत्नमयीव सा ॥२०॥

चन्द्रकान्तेसे मुख, महानील जैसे केश और पद्मरागके समान दोनों हाथोंसे वह ल्नी रत्नमयी सी मालूम होती है* ॥२०॥

❖ यों भी कह सकते हैं कि, वह नाजनी अपने चन्द्रमाकी सी कान्ति वाले मुख, चोर नीले रंगके बाल और कमलके समान लाल हाथोंसे अपूर्व

( ७६ )

खुलासा—उस स्त्रीका शरीर बहुमूल्य रत्नोंसे बना हुआ मालूम होता है ; क्योंकि उसका चेहरा चन्द्रकान्त मणिके सदृश, उसके गहरे नीले बाल नीलमणिके समान और उसकी सुखं हथेलियाँ पद्मराग मणिके जैसी हैं ।

उस स्त्रीके अंग-प्रत्यङ्ग रत्नोंके समान शोभायमान हैं । उसके चन्द्रसम मुखको देखकर चन्द्रकान्त मणिका, उसके नीले बालोंको देखकर नीलमका और लाल कमल सी हथेलियोंको देखकर लालों या पद्मराग-मणिका धोखा होता है ।

गुज़ब की खूबसूरती है ! बलाका हुन्न है ! अगर वह कामिनी कहीं जवाहिर-जड़े हुए जेवर पहन ले, तब तो, बकौल महाकवि दाग, औरभी गुज़ब हो जाय :—

एक तो हुस्न बलाका, उसपै बनावट आफ़त ।

घर बिगाड़ेंगे हज़ारोंके, सँवरने वाले ॥

एक तो परले सिरकी खूबसूरती है ही और फिर उस पर सजावट है । ये सजने-सँवरने वाले हज़ारोंके घर बिगाड़ेंगे ।

देखना ऐ जौक ! होंगे आज फिर लाखोंके खून ।

फिर जमाया उसने, लाले लवपै लाखा पानका ॥ जौक ।

छन्दरी मालूम होती है । क्योंकि चन्द्रकान्त, महानौल और पद्मराग शब्दोंके दो-दो अर्थ हैं । जैसे, चन्द्रकान्त=(१) चन्द्रमाकी सी कान्ति-वाला, (२) चन्द्रकान्त मणि । महानौल=(१) बोर नीला, (२) नौलमणि या नीलम । पद्मराग=(१) कमलके समान छल, (२) पद्मरागमणि, जाल या माषिक ।

( ७७ )

आज उन्होंने अपने लालकी तरह लाल ओठों पर पानका लाखा—रङ्ग—जमाया है। आज इस लाखेसे लाखों ही का धून हो जायगा।

वराहमिहिर महाशय महाराजा भर्तृहरिसे भी एक कदम आगे बढ़ गये हैं। उनकी समझमें, महाकवि दांग वगैरः की तरह, सजावटकी ज़रूरत ही नहीं। उनका ख्याल है कि, जिसे खूबी खुदाने दी, उसे जेवरकी क्या ज़रूरत? वह कहते हैं, खियों से ही रत्नों की शोभा है, न कि रत्नों से खियों की। क्योंकि खियों तो बिना रत्नों के धारण किये ही पुरुषों को अपने ऊपर लट्ठ करके अपना गुलाम बना सकती हैं। क्या रत्न भी, बिना खियोंके सुन्दर शरीरोंका आश्रय लिये, पुरुषोंको अपने ऊपर मुग्ध करनेकी क्षमता रखते हैं? उनका कहा हुआ श्लोक हम नीचे देते हैं—

रत्नानि विभूषयन्ति योषा, भूषयन्ते वनिता न रत्नकान्त्या।

चेतो वनिता हरन्त्यरत्ना, नोरत्नानि बिनाऽङ्गनाऽङ्गसंगात् ॥

विधाता की करीगरीका खातमा इन मनोहर कामिनियों की रचनामें ही हुआ है। सचमुच ही उसने फुसलमें बैठ कर इनकी गढ़ाई की है। अजब खूबसूरती इन्हें दी है! ऐसा कौन है, जो इनको देखकर इनपर अपना तन-मन न चार दे?

वैराग्य पक्ष।

विधाताने सुन्दरियोंके गढ़नेमें खूब कारीगरी दिखाई है। उन्हें सुन्दरता देनेमें ज़रा भी कसर नहीं रखी; तोभी तो लोग,

( ७८ )

उन्हें देख कर, उनके बनाने वालेको भूल जाते हैं। मन्दिरोंमें लोग भगवान्के दर्शनोंको जाते हैं, पर उन्हें देखते ही भगवान्को भूल उनके दर्शन करने लगते हैं। महाकवि दाग कहते हैं :—

कभी ममजिदमें, जो वह शोख परीज़ाद आया ।

फिर न अह्लाहके बन्दोंको, खुदा याद आया ॥

एक दिन वह शोख परीज़ाद मन्दिरमें आ गया, तो ईश्वरके भक्तोंको फिर ईश्वर याद न आया। सब उसे देखकर ईश्वरको भूल गये। कारीगर की बनाई बटिया चीज़को देखकर लोग एकाग्र मनसे चीज़को देखने लगते हैं ! किसने बनाई है, इसका ध्यान भी नहीं आता !

हिन्दुस्तानी औरतोंमें जो रूप, सौन्दर्य और लावण्य है, वह बर्फके समान गोरी मेमोंमें नहीं। पर जिनकी अङ्क पर पर्दा पड़ा हुआ है, वे तो कञ्चनको त्याग कर काँच पर मन डुलाते हैं ; इसी तरह जिनको ब्रह्म-ध्यान या जगदीशकी उपासनाका अवर्णनीय आनन्द नहीं मालूम वे ही, सिरसे पैर तक गन्धर्गसे भरी हुई, संसारी औरतोंको देखते ही ईश्वरको भूल जाते हैं। यद्यपि ऐसी हरकत विश्वामित्र और पराशर आदि महामुनियोंने भी की है, पर वह उनकी ग़लती ही कहलावेगी। ईश्वरसे प्रेम करनेसे अनन्तकालशायी सुख मिलता है ; जो लोग स्वर्ग चाहते हैं उन्हें स्वर्ग और स्वर्गकी अप्सरायें मिलती हैं ; मुसलमानी मतके अनुसार हूरो गिलमें मिलते हैं। संसारी औरतें क्या स्वर्गकी अप्सराओं या हूर और परियोंकी बराबरी कर सकती ह ?

( ७६ )

हरगिज नहीं। पर जिनकी बुद्धिमें भ्रम हो गया है, उन्हें खियोंकी मुहब्बतमें जो आनन्द आता है वह ईश्वरप्रेममें नहीं आता, जिसकी नाम मात्रकी हपासे अप्सराये और हरे मिल जाती ह।

महाकवि अकबर भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं :—

क्या जीके-इबादत हो उनको, जो मिसके लबोंके-शेदा है। हलुआये विहिरती एकतरफ, होटलकी मिठाई एक तरफ ॥

जो मिसके होटोंके प्रेमी हैं उनसे ईश्वर की उपासना नहीं होती—उसमें उनका दिल नहीं लगता। ईश्वरके ध्यानसे स्वर्गमें जो हलवा मिलता है, उसमें वह मज़ा कहाँ, जो होटलमें मिसके साथ बैठकर खानेमें आता है।

कामियोंको सुन्दरियाँ रूपकी साक्षात् मूर्तियाँ और शोभा की कान मालूम होती हैं; इसीसे वे दिवा-रात उन्हींके ध्यानमें समाधि लगाये रहते हैं; पर उनके बनाने वालेके ध्यानमें समाधि नहीं लगता! किन्तु वास्तवमें, वे जैसी दीखती हैं, वैसी हैं नहीं। सब ऊपरकी ही तड़क-भड़क और सफाई हैं। भीतरसे देखो तो वे गन्दगीके पिटाये हैं; पर मोहान्ध कामी पुरुष इन गहरी बातोंको नहीं समझते। समझते हैं, केवल वे ज्ञानी जिन्होंने उनकी असलियतका पता लगा लिया है; इसीसे वे उनके दिखावटी और मिथ्या रूप पर मोहित नहीं होते और उनका खयाल स्वर्गमें भी नहीं करते। वे अपना सारा समय जगदीशके ध्यान और व्यतीत करते हैं; क्योंकि कामिनियोंकी

( ८० )

आराधना-उपासना करनेसे जो सुख मिलता है, वह क्षणस्थायी और झूठा है ; पर ईश्वरकी उपासना-परिस्थितशसे जो सुख मिलता है, वह अनन्तकालस्थायी और सच्चा है ।

दोहा ।

चन्द्रकान्त-सम सुख लसत, नीलम केशहि पास ।

पद्मराग-सम कर लसै, नारी रत्न-प्रकाश ॥२०॥

सार—नारी रत्नों की खान है। उसमें नव रत्नों की शोभा मौजूद है ।

20. That woman with her face like Chandrakanta jewel, her hair like that of Mahanil jewel and her two hands bearing the colour of Padmaraga jewel shines like a heap of jewels.

—*—

समोहयन्ति मद्यन्ति विडम्बयन्ति

निर्भत्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ॥

एताः प्रविश्य सदयं हृदयं नराणां

किं नाम वामनयना न समाचरन्ति ॥२१॥

चतुर भुगनयनी खियाँ पुरुषके हृदयमें एक बार दयासे घुसकर, उसे मोहित करतीं, मदोन्मत्त करतीं, तरसातीं, चिढ़ातीं, धमकातीं, रमण करतीं और विरहसे दुख देतीं हैं । ऐसा कौनसा नाम है जिसे ये भुगलोचनी नहीं करतीं ? ॥२१॥

( ८१ )

जिस पुरुष पर इन सुन्दरियों को निगाहका तेज़ तीर चल जाता है, वह लोट-पोट हो जाता है और उसके होश-हवास ख़ता हो जाते हैं। अगर वह तीर मारने वाली, उस पर दया-भाव नहीं दिखाती, तो बेचारेका करम-कल्याण ही हो जाता है—जीवनके लाले पड़ जाते हैं। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

इधर उसकी निगहका, नाजसे प्राकर पलट जाना ।

इधर सुड़ना तड़पना, ग़शमें आना, दम उलट जाना ॥

इस पदमें कविने प्रेम-दृष्टि की चोटका जो करुणापूर्ण चित्र खींचा है, सो बिल्कुल ठीक है। भुक्तभोगी जानते हैं; हमारे तशरीह करने की ज़रूरत नहीं।

स्त्रियाँ जैसी कोमलाङ्गी होती हैं, वैसी ही वज्रहृदया भी होती हैं। इन्हें अपने शिकारको तड़पते देखनेमें बड़ा मज़ा आता है। जब इनका शिकार इनके कटाक्ष-वाण की मारसे सन्निपात रोगी की तरह मोहित या बेहोश हो जाता है, उसे किसी तरहका ज्ञान नहीं रहता, शराबी की तरह मतवाला होकर प्रलाप करता है, तब ये बड़ी प्रसन्न होती हैं। उस समय ये दयासे काम न लेकर, उसे अपने हाव-भाव और नाज़ों अदा दिखाकर और भी तरसार्ती तथा अथमरा कर देती हैं। जब तक ये अपने आशिक्षसे नहीं मिलतीं, तब तक वह बेचारा रात-दिन गुम खाता, घबराता, सिसकता और आहँ भरता है। मनमें पछताता है कि, हाय मैंने क्यों दिल देकर आफ़त मोल ली। पर मुहब्बतमें तो यह दशा होती ही है। किसी कविने कहा है :—

( ८२ )

न था मालूम उलझतमें, कि ग़म खाना भी होता है । जिगरकी बेकली, और दिलका घबराना भी होता है । सिसकना आह भी करना, अश्क़ लाना भी होता है । तड़पना लोटना, बेताब हो जाना भी होता है । कफ़े अफ़सोसको मल-मलके, पछताना भी होता है । किये पर अपने फिर आप ही, दुख पाना भी होता है ॥

प्रेमी या आशिक़ हज़ारों तरहके दुःख और आफ़तें उठाता है, पर अन्तमें यों कहकर सन्न करता है :—

हम तो हैं आशिक़ तेरे, नाज़ उठाने वाले । तुमसे कम देखे हैं महबूब, सताने वाले ॥

शेषमें ; जब ये सुन्दरियाँ सब तरहसे अपने चाहने वालेका इमतिहान ले लेती हैं, तब कहीं इनका पत्थर-हृदय पसीजता है । उस वक्त यह उसे अपनी सेवामें कुबूल करतीं और उसके दिलको ठण्डा करती हैं । इस समय इनका शिकार पूरे तौरसे इनके क़ाबूमँ हो जाता है । जब ये उसे अपने अधीन पातीं और उसे हर तरहसे मुती और फरमाईदार देखती हैं, तब उसे ज़रा-ज़रा सी चूकों या गुलतियों पर धमकाती और घुड़कती हैं । संशयों-का घर होने की वजहसे, इनमें से बाज़-बाज़ तो उसे, ज़रा देखसे घर आने पर ही, खूब डाँटती-डपटती हैं । कोई-कोई अपने शिकार को नितान्त अब्रानावस्थामें देखकर निपट निरकुश हो जाती है और उससे ठीक गुलाम की तरह काम लेती है ।

( ८३ )

इतना ही नहीं, उसे इनकी फ़रमायशों भी पूरी करनी पड़ती है। उनके पूरा करनेमें उसे बड़ी-बड़ी ज़िल्लतें उठानी होती हैं। सामने रहने पर ये इस तरह नाच नचातीं और नाना प्रकारके कष्ट देती हैं। आँखों की ओफ़ल रहने पर भी, ख़ैर नहीं। इनकी जादू-भरी आँखोंसे उन्मत्त हुआ पुरुष, इनकी वियोगाश्रमिमें, बुरी तरह तड़प-तड़प कर भस्म होता है। बहुत लिखनेसे क्या—इनकी रसीली, मदमाती और नशीली आँखोंके मारे हुए को किसी अवस्थामें भी, सुख-शान्ति नहीं मिलती। कविने ठीक ही कहा है कि, इन नाज़नियोंके चञ्चल नेत्र जिसके हृदयमें प्रवेश कर जाते हैं, उसकी ख़ैर नहीं।

खूबसूरत औरतें जिन पर अपनी निगाहके तेज़ तीर चलाती या कटाक्ष-वाण मारती हैं, वे अपनी होशियारी और चतुराईको ताक पर रखकर पूरे पागल हो जाते हैं—कितनेही तो मजनू बनकर कपड़े फाड़ने लगते हैं। देखिये, एक आशिक़ किसी हसीनके नयनवाणसे घायल होकर क्या कहता है :—

Wदिलचस्प है, आफ़त है, क़यामत है, ग़ज़ब है।

चात उनकी, अदा उनकी, क़द उनकी, चाल उनकी ॥—अक़बर।

उनकी बातें दिलचस्प हैं, उनकी अदाएँ आफ़त हैं, उनका क़द क़यामत बर्पा करनेवाला और चाल ग़ज़ब ढाहनेवाली है। मतलब यह कि, हम उनकी मीठी-मीठी बातों, अदाओं और चाल चौरः पर भर मिटे।

( ८४ )

कहते हैं जिसको जबत, वह इक भलक है तेरी ।

सब बाइजोंकी बाकी, रंगी बयानियाँ हैं ॥—हाली ।

जिसे खर्ग कहते हैं, वह तो मेरी प्यारीकी एक भलकमें है, बाकी सब तो उपदेशकजीकी रड़ीन बातें हैं ।

चुपचुपाते उसे दे आये दिल, एक बात पै हम ।

माल मँहँगा नज़र आता, तो चुकाया जाता ॥—हाली ।

हमने तो न किसीसे कहा न सुना, उसकी एक बात पर चुप- चाप दिल दे आये । अगर माल मँहँगा नज़र आता, तो मोल- तोल करते । दिल देकर खरीदनेमें हमें तो सौदा सस्ता ही जँचा ।

ऐ जौक ! आज सामने, उस चश्म मस्तके ।

बातिल सब अपने, दाव-ये दानिशवरी हुए ॥—जौक ।

ऐ जौक ! उस काम-मदसे मतवाली आँखके सामने, आज हमारी बुद्धिमत्ता और योग्यता भूटी हो गई ।

मस्जिदमें उसने हमको, आँखें दिखाके मारा ।

काफिरकी देखो शोखी, घरमें खुदाके मारा ॥—जौक ।

उसने मन्दिरमें ही हमें अपने कटाक्ष-वाणसे मारा । उस काफिरकी शोखी देखिये, कि उसने हमें ईश्वरके घरमें ही मारा ।

भालूम जो होता हमें, अज्जामे मुहब्बत ।

लेते न कभी भूलके, हम नामे मुहब्बत ॥—जौक ।

( ८५ )

अगर हमें प्रेमका परिणाम मालूम होता, तो हम कभी भूलकर भी प्रेमका नाम न लेते।

बुरी है ऐ दाग ! राहें उलफ़्त, खुदा न ले जाय ऐसे रस्ते। जो तुम अपनी खैर चाहते हो, तो भूलकर दिल्ली न करना ॥ दाग।

ऐ दाग ! प्रेमका पन्थ देढ़ा है। परमेश्वर किसीको इस राहसे न ले जाय। अगर तुम अपना भला चाहते हो, तो भूल कर भी इस राहमें कदम न धरना।

देख ऐ दिल ! न छेड़ किसी-ये जुल्फ़। कि ये हैं, पेचो ताबकी बातें ॥ जौक।

ऐ दिल ! उसकी जुल्फ़ोंके किस्से न छेड़, क्योंकि ये बातें बड़ी पेचीली हैं। इनमें पड़ना ठीक नहीं।

किताबें मुहब्बतमें ऐ हज़रते दिल ! बताओ कि तुम लेते कितना सबक हो ॥ कि जब आनकर तुमको देखा, तो वह ही। लिये दस्ते अफ़सोसके दो वरक हो ॥ जौक।

ऐ हज़रत दिल ! मुहब्बतकी किताबमें तुम कितना सबक लेते हो ? हमने तो तुमको जब आकर देखा, तभी तुम्हारे हाथमें शोक-दुःखके दो वरक देखे।

( ८६ )

मुझे वह पर्दानशीं, सामने कब आने दे ।

जो जिक्र करने न दे अपने रोबरू मेरा ॥ जौक ।

वह पर्दानशीन माशूका मुझे कब सामने आने देती है ? वह तो मेरा जिक्र भी अपने सामने नहीं होने देती ।

कुछ तर्जें सितम भी है, कुछ अन्दरुजि वफा भी ।

खुलता नहीं हाल, उनकी तबीयतका जरा भी ॥—अकबर ।

उसमें कुछ जुल्मके भी ढंग हैं और कुछ वफादारीके भी । उसके दिलमें क्या है, यह जरा भी समझमें नहीं आता ।

याँ लब पै लाख-लाख सखुन इज़्ज़ाब में ।

याँ एक खामुशी तेरी, सबके जवाब में ॥

में तो उनके सामने हज़ारों बातें बनाता हूँ ; पर वे मेरी सभी बातोंके जवाबमें एक चुप्पी साथे रहती हैं—मेरी बातोंका जवाब ही नहीं देतीं ।

इससे तो और आग वह बेदद हो गया ।

अब आह आतशीसि भी, दिल सर्ड हो गया ॥—जौक ।

मैंने समझा था कि मेरे रोने-घोनेसे उसका पत्थर-हृदय कुछ तो पसीजैगा—उसे मुझपर तरस आयेगा ; पर हुआ इसका उल्टा । मेरी गरम आहोने उसे और भी गरम कर दिया—भड़का दिया । मुझे अपनी गरम आहोका बड़ा भरोसा था, उम्मीद थी, कि इनसे ज़रूर कामयाबी होगी, पर अब इस तरफसे भी मेरा

( ८७ )

दिल ठण्डा हो गया—मुर्खा गया । इस हथियारका भरोसा था, पर अब मालूम हो गया कि, यह हथियार भी बेकाम साबित हुआ । ( माथूका जब संगदिली अक्षत्यार कर लेती है, तब नहीं पसीजती, रहम नहीं करती ) ।

मुझको हर शब हिज्जकी, होने लगी जूँ, रोज हश्र ।

मुझसे यह किस दिनेके बदले, आस्माँ लेने लगा ॥—जौक ।

जुदाईकी हरेक रात मेरे लिये प्रलयके दिन सी जान पड़ती है, काटेसे नहीं कटती ! आस्मान ! तू मुझसे किस दिनेके बदले ले रहा है ?

अजल आई न शबे हिज्जमें, और तूने फलक !

वे-अजल हमको, तमन्नाए अजलमें मारा ॥—जौक ।

ऐ आस्मान ! जुदाईकी रातमें मौत न आई, पर तूने मौतकी चाहमें हमें बे-मौतही रातभर मारा ।

मौत हीसे कुछ इलाजे, ददें फुर्कत हो तो हो ।

गुसलु मैथत ही हमारा, गुसले सेहत हो तो हो ॥—जौक ।

जुदाईकी बीमारीका इलाज मौतसे ही हो, तो हो सकता है । मौतका खान ही हमारी आरोग्यताका खान हो सकता है ।

अब आशिक अपनी माथूकासे मुखतिब होकर कहता है :—

तुम्हें ऐ संगदिल ! आरामे जाने मुश्ताला.समझे ।

पड़े पत्थर समझ पर अपनी, हम समझे तो क्या समझे ॥

( ८८ )

ये संगदिल—पत्थर-हृदय ! तुम्हें हमने अपने सुख बढ़ाने-वाली समझी । हमारी अकलपर पत्थर पड़े—हमने क्या का क्या समझ लिया ।

फुलूतमें तेरी, तारे नफ़स सीनेमें मेरे ।

कौटा सा खटकता है, निकल जाय तो अच्छा ॥—जौक ।

तेरी जुदाईमें मेरे प्राण मेरी छातीमें कौटिकी तरह खटकते हैं, किसी तरह यह काँटा निकल जाय तो अच्छा ।

मैं जाता जहाँसे हूँ, तू आता नहीं याँ तक ।

काफ़िर ! तुम्हें कुछ खोफ़ खुदाका नहीं आता ॥—जौक ।

मैं तो तेरी मुहब्बतमें इस दुनियासे ही जाता हूँ, पर तुम्हसे यहताँक भी आया नहीं जाता ! काफ़िर ! क्या तू परमेश्वरसे भी नहीं डरती ?

बाकी न रहा खून भी, अब मेरे ज़िगरमें ।

अफ़सोस ! हुआ चाहती है तर्क गिज़ा भी ॥

तेरे लिये रोते-रोते मेरे ज़िगरमें अब खून भी नहीं रहा है । अफ़सोस ! अब खाना-पीना भी छुटना चाहता है ।

खूने दिल पीनेको, और लड़ते ज़िगर खानेको ।

यह गिज़ा मिलती है जानी ! तेरे दीवानेको ॥

प्यारी ! तेरे पागलको पीनेके लिये खून और खानेके लिए ज़िगरका टुकड़ा मिलता है, अब उसका यही आहार है ।

( ८६ )

जब कहा मैंने—तड़पता है बहुत अब दिल मेरा ।

हँसके फुरमाया—तड़पता होगा सौदाई तो हो ॥—हाली ।

जब मैंने कहा कि, मेरा दिल आपके लिए बहुत तड़पता है, नब उन्होंने हँसकर जवाब दिया—“तड़पता होगा, तुम पागल ही तो हो ।” ( बेरहमीकी हद हो गई ) ।

कहा उन्होंने शवे गमका माजरा सुनकर ।

तेरे मिज़ाजकी शोर्नी थी, इज़्तराब न था ॥—दाग ।

उन्होंने जुदाईकी रातकी बातें सुनकर जवाब दिया—तुमने क्या दुःख उठाया, मनकी ऐसी चञ्चलता ठीक नहीं । मतलब यह कि, तुमने जो दुःख उठाया, वह तुम्हारी चञ्चलताकी वजहसे उठाया, विरहके सन्तापसे नहीं ।

भागये हैं आपके अन्दाज़ो नाज़ ।

कीजिये अगमाज़ जितना चाहिये ॥

आपके नाज़ो अन्दाज़ मुझे पसन्द आ गये हैं । अब आपको अवतार है, चाहे जितने नज़रें कीजिये—चाहे जितना सताइये और तरसाइये ।

तेरे सहरे नज़रसे हुआ य जुनूँ ।

मेरे दिलकी तो इसमें खता ही न थी ॥

तेरे कूचेंमें आके बैठ गया ।

बजुज इसके कुछ और दवा ही न थी ॥—अकबर ।