संग्रह पर लौटें




















शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
पृष्ठ 51स्थायी लिंक
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थोपक्रम | १ | भूमि के मानभेदों का निर्देश | ३० |
| नीतिशास्त्र का उपक्रम | ,, | राजधानी बनाने योग्य प्रदेश | ३२ |
| नीतिशास्त्र-प्रशंसा | २ | राजोचित भवन का निर्देश | ३३ |
| राजा का नीतिशास्त्र-ज्ञान में प्रयोजन | ३ | राजोचित दुर्ग बनाने का निर्देश | ३६ |
| राजा की काल-कारणता का निर्देश | ४ | राजसभा बनाने का निर्देश | ,, |
| धर्म की प्रशंसा | ५ | मन्त्री आदि के भवन का निर्देश | ३७ |
| राजा के सात्त्विकादि तीन भेद | ,, | सेना तथा प्रजावर्गों के स्थान | ,, |
| सुगति-दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणता | ६ | धर्मशाला-निर्माण का निर्देश | ३८ |
| राजा के देवांश होने का निर्देश | ११ | राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश | ,, |
| ७ गुणों से युक्त राजा की प्रजा-रंजकता का निर्देश | १२ | धर्मशाला की व्यवस्था | ४० |
| इन्द्रियजय की आवश्यकता | १६ | राजाओं के दैनिक कृत्य | ४१ |
| विनाश के चार कारण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध | ,, | प्रहरियों का कर्त्तव्य | ४२ |
| जैसे शब्द-विषय के द्वारा | ,, | राजा के आदेशों की घोषणा | ४३ |
| रूप-विषय द्वारा | १७ | राजाओं के कर्त्तव्य | ४५ |
| रस-विषय द्वारा | ,, | विषादि से दूषित अन्नादि-परीक्षा | ४७ |
| गन्ध-विषय द्वारा | ,, | शिकार खेलने का वर्णन | ४८ |
| द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश | ,, | राजा के सम्बन्धी आदियों का राजनिर्धारित कर्त्तव्य | ५० |
| आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश | २० | परिषद् की व्यवस्था का निर्देश | ५१ |
| राजा के दोष-गुण का निर्देश | ,, | राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश | ५२ |
| आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण | २४ | राजा के कर्त्तव्य | ५३ |
| मनोहर वचन बोलने का निर्देश | २६ | राजा को प्रतिवर्ष देश के अधिकारियों के निरीक्षण का निर्देश | ५४ |
| राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश | २८ | राजा के पारलौकिक कार्य | ५६ |
| एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश | ५७ |
शुक्र ०
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( २ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार-निर्णय का निषेध | ५७ | अधिकारयोग्य को अधिकार देने का निर्देश | ७३ |
| अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, | योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश | ,, |
| बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश | ५८ | अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश | ७४ |
| युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश | ,, | दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश | ,, |
| युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्ह युवराज के अधिकारो | ५९ | राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश | ७५ |
| दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश | ६० | योजनाकर्त्ता की दुर्लभता | ,, |
| राजपुत्रों के पिता के विषय में कर्तव्यता का निर्देश | ६३ | गजाधिपति एवं महावत के लक्षण | ,, |
| अमात्यादिभृत्य-विषयक विचार | ६४ | अश्वाधिपति के लक्षण | ७६ |
| श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण | ६५ | सारथि के लक्षण | ,, |
| निन्यभृत्य के लक्षण | ६६ | घुड़सवार के लक्षण | ,, |
| दस प्रकृतियों के नाम | ६७ | अश्वशिक्षक के लक्षण | ,, |
| आठ प्रकृतियों के नाम | ,, | अश्वसेवक ( साईस ) के लक्षण | ७७ |
| पुरोहितादिकों के अधिकार | ६८ | सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण | ,, |
| पुरोहितादिकों के लक्षण | ,, | पत्ति ( पैदल सेना ) पाल आदिकों के अधिकार | ,, |
| प्रतिनिधि का कार्य | ७० | शतानीकादिकों के लक्षण | ७८ |
| प्रधान का कृत्य | ,, | उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश | ,, |
| सचिव के कृत्य | ,, | तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश | ७९ |
| मन्त्री के कार्य | ७१ | रत्नादि के अध्यक्षों के लक्षण | ,, |
| प्राड्विवाक के कार्य | ,, | कोषाध्यक्ष के लक्षण | ,, |
| पण्डित के कार्य | ,, | वस्त्राधिपति के लक्षण | ,, |
| सुमन्त्र के कार्य | ,, | वितानाधिप के लक्षण | ,, |
| अमात्य के कार्य | ७२ | धान्यपति के लक्षण | ८० |
| राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश | ,, | पाकाध्यक्ष के लक्षण | ,, |
| अधिकार की व्यवस्था का निर्देश | ७३ |
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( ३ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| आरामाधिपति के लक्षण | ८० | सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इससे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश | ८७ |
| गुहाद्यधिपति के लक्षण | ,, | संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को न रखने का निर्देश | ८८ |
| देवाध्यक्ष के लक्षण | ८१ | सद्भृत्य के लक्षण तथा कृत्य | ,, |
| दानाध्यक्ष के लक्षण | ,, | द्वारपाल के कर्तव्यों का निर्देश | ,, |
| सभासद के लक्षण | ,, | राजपार्श्ववर्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य | ,, |
| सत्राधिप के लक्षण | ,, | भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य | ८९ |
| परीक्षक के लक्षण | ८२ | राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश | ,, |
| साहसाधिप के लक्षण | ,, | राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश | ,, |
| ग्रामाधिप के लक्षण | ,, | राजा से स्वकार्य-निवेदन-प्रकार तथा जोर से हंसने आदि का निषेध | ,, |
| कर वसूल करनेवाले के लक्षण | ,, | हितकारी सेवक का कृत्य | ९० |
| लेखक के लक्षण | ,, | राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश | ९१ |
| द्वारपाल के लक्षण | ८३ | समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश | ,, |
| चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण | ,, | स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध | ,, |
| तपोनिष्ठ के लक्षण | ,, | राजवेशभूषा-धारण की नकल करने का निषेध | ९२ |
| दानशील के लक्षण | ,, | राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश | ,, |
| श्रुतज्ञ के लक्षण | ,, | विरक्त राजा के लक्षण | ,, |
| पौराणिक के लक्षण | ,, | अनुरक्त राजा के लक्षण | ९३ |
| शास्त्रविद् के लक्षण | ,, | ||
| ज्योतिर्विद् के लक्षण | ८४ | ||
| मान्त्रिक के लक्षण | ,, | ||
| वैद्य के लक्षण | ,, | ||
| तान्त्रिक के लक्षण | ,, | ||
| अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण | ,, | ||
| परिचारक के लक्षण | ,, | ||
| जासूस के लक्षण | ८५ | ||
| दण्डधारी-आसा-वल्लमधारी के लक्षण | ,, | ||
| गायकाधिप के लक्षण | ,, | ||
| वेश्या के लक्षण | ,, | ||
| वेश्या-भृत्य के लक्षण | ८६ | ||
| वैतालिक तथा शिल्पज्ञों को पास में रखने का निर्देश | ,, |
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( ४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश | ९३ | निश्चितान्यस्वामिक संचित धन के भेद | १०६ |
| स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य | ९४ | औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण | ,, |
| आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य | ९५ | अज्ञातस्वामिक के लक्षण | १०७ |
| राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश | ,, | स्वत्वविनिश्चित के भेद | ,, |
| डाकू के समान राजा के लक्षण | ,, | साहजिक के लक्षण | ,, |
| प्रच्छन्न चोर के लक्षण | ,, | अधिक के लक्षण | ,, |
| बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध | ९६ | संचित धन के लक्षण | ,, |
| लेख्यों के भेदों का निर्देश | १०१ | संचित धन के भेद | ,, |
| लेख के दो भेदों का निर्देश | १०२ | पार्थिवसंज्ञक आय के भेद | १०८ |
| जयपत्रक के लक्षण | ,, | चलसंज्ञक आय के लक्षण | ,, |
| आज्ञापत्र के लक्षण | ,, | विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश | ,, |
| प्रज्ञापनपत्र के लक्षण | ,, | व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण | ,, |
| शासनपत्र के लक्षण | १०३ | निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण | १०९ |
| प्रसादलिखित के लक्षण | ,, | स्वत्वनिवर्त्तक के भेद | ,, |
| भोग-कर-उपायन-पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण . | ,, | ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद | ,, |
| विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण | ,, | प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन-व्यय के लक्षण | ,, |
| दानपत्र के लक्षण | ,, | उपभोग्य के लक्षण | ,, |
| क्रयपत्र के लक्षण | १०४ | भोग्य व्यय के लक्षण | ११० |
| सादिलेख्य के लक्षण | ,, | पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण | ,, |
| संवित्पत्र के लक्षण | ,, | आय-व्यय-लेखक के कर्त्तव्य | ,, |
| ऋणलेख्य के लक्षण | ,, | अवशिष्ट आय के विविध भेद | १११ |
| शुद्धिपत्र के लक्षण | ,, | मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण | ,, |
| सामयिक लेख्यपत्र-लक्षण | ,, | लोकव्यवहारार्थ द्रव्य तथा धन के लक्षण | ,, |
| संमतिसंज्ञक पत्र के लक्षण | ,, | मूल्य की परिभाषा | ,, |
| क्षेमपत्र के लक्षण | १०५ | ||
| वेदनार्थक पत्र के लक्षण | ,, | ||
| आय-व्यय लेख्य के लक्षण | ,, | ||
| राजाओं के आय-व्ययादिक के लक्षण | ,, | ||
| आय के भेद | १०६ | ||
| संचित आय के भेद | ,, |
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( ५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश | ११२ | कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार | १२१ |
| पत्रलेखन-प्रकार | ,, | राजा के भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन | १२२ |
| सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश | ११३ | भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश | ,, |
| पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार | ११४ | भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध | ,, |
| व्यापक-व्याप्य के लक्षण | ,, | १० प्रकृति पुरोहितादियों का जातिनियम | १२३ |
| स्थान-टिप्पणादि के भेद | ११५ | भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश | ,, |
| शेषापव्यय-स्थलापव्ययज्ञान | ,, | सेनापति-पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश | ,, |
| तिथ्यादि लिखने का निर्देश | ,, | भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण | ,, |
| गुञ्जादिकों का लक्षण | ११६ | सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश | १२५ |
| प्रस्थपाद का लक्षण | ,, | धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश | ,, |
| संख्या का प्रमाण | ,, | सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश | ,, |
| संख्या की अनन्तता | ,, | निषिद्धाचरणों का निर्देश | १२६ |
| एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम | ११७ | दशविध पापों का निर्देश | ,, |
| कालमान का वैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था | ,, | दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश | ,, |
| भृति के ३ प्रकारों का निर्देश | ,, | समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश | १२७ |
| कार्यमानादिकों के लक्षण | ,, | अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध | ,, |
| मध्यमादि भृति के लक्षण | ११८ | अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध | ,, |
| पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश | ,, | ||
| हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश | ,, | ||
| शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश | ,, | ||
| भृत्य के तीन भेद | ११९ | ||
| भृत्यों को छुट्टी देने का नियम | ,, | ||
| रोग के समय भृति देने का प्रकार | ,, | ||
| बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश | १२० | ||
| सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश | ,, |
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( ६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| पराधीन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश | १२७ | आततायियों के लक्षण | १३२ |
| इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश | ,, | एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश | ,, |
| इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश | १२८ | विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध | ,, |
| स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश | ,, | अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध | १३३ |
| स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार | ,, | मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश | ,, |
| एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध | ,, | सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश | १३४ |
| यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश | १२९ | माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध | ,, |
| चैत्यादिकों के लंघन का निषेध | ,, | स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध | ,, |
| तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध | ,, | अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध | ,, |
| देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध | १३० | अन्य धर्म के सेवन का निषेध | ,, |
| सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध | ,, | त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश | ,, |
| सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध | ,, | मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश | १३५ |
| व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन | १३१ | बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध | ,, |
| राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध | ,, | बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध | ,, |
| आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध | ,, | दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश | १३६ |
| किञ्चित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध | ,, | आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध | ,, |
| अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश | ,, | अश्लील बातें आदि करने का निषेध | ,, |
| सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश | १३२ | लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध | ,, |
| अधर्मरत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश | ,, |
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( ७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश | १३६ | विद्यादिकों के फल | १४१ |
| प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश | १३७ | शूरतादि के फलों का निर्देश | ” |
| दीर्घदर्शी के लक्षण | ” | सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश | ” |
| प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण | ” | नष्ट वस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश | १४२ |
| आलसी मनुष्य के लक्षण | ” | परद्रव्यहरणादि का निषेध | ” |
| साहसी के लक्षण व दोष | ” | प्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश | ” |
| चिरकारी मनुष्य के लक्षण | १३८ | स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध | ” |
| सहसा कार्य करने का निषेध | ” | वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध | ” |
| मित्र की विशेषता | ” | सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध | १४३ |
| बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध | ” | सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध | ” |
| मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश | ” | सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादि का समूल नाश करने का निर्देश | ” |
| विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध | १३९ | याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार | ” |
| प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश | ” | दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश | १४४ |
| परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश | ” | समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश | ” |
| उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध | ” | स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश | ” |
| विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध | १४० | मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश | ” |
| विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल | ” | स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश | ” |
| शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल | ” | ||
| धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| बलमत्त की स्थिति का वर्णन | १४१ | ||
| मानमत्त की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश | ” |
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( ८ )
| रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक-उपहास के निषेध का निर्देश १४४ | निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश १४९ |
| कार्य-साधक के कृत्यों का वर्णन १४५ | बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध ,, |
| दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध ,, | मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध १५० |
| असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश ,, | आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश ,, |
| बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश ,, | |
| जगत् को वश में करने के उपाय ,, | |
| तरुणी स्त्री को इ तन्त्र छोड़कर जाने का निषेध ,, | वश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश १५१ |
| साध्वी भार्यादि का यत्नपूर्वक पालन का निर्देश १४६ | वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश ,, |
| जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश ,, | मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश ,, |
| गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश १४७ | कूट व्यवहार का निषेध ,, |
| देशाटनादि की कर्त्तव्यता ,, | विहित कार्य करने का निर्देश ,, |
| देशाटन के लाभ ,, | रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश १५२ |
| सभा में बैठने से लाभ का वर्णन ,, | योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये एकाकी गमन का निषेध ,, |
| बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल ,, | मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता 'न करने का निर्देश ,, |
| वेश्यादर्शन के फल १४८ | गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध ,, |
| पण्डितों के साथ मैत्री के फल ,, | उत्तम पुरुष के लक्षण ,, |
| अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध ,, | स्त्री के कथनमात्र से बिना स्वयं अनुभव किये समझने का निषेध १५३ |
| गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश ,, | स्त्रियों के ८ दुर्गुणों का निर्देश ,, |
| शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश ,, | |
| शृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध १४९ | |
| शयनादि के निषेध के विषय ,, | |
| बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध ,, |
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( ६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| १६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध | १५३ | विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश | १५८ |
| दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश | ,, | २ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध | ,, |
| स्वामी के लक्षण | ,, | ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध | १५९ |
| एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध | ,, | शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश | ,, |
| वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश | १५४ | बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश | ,, |
| वर के लक्षण | ,, | उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण | ,, |
| कन्या के लक्षण | ,, | बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश | १६० |
| विद्या और धन का संचय करने का निर्देश | १५५ | यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश | ,, |
| धनार्जन के उपयोगों का निर्देश | ,, | दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश | ,, |
| धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, | परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण | ,, |
| अवश्य धनार्जन करने का निर्देश | ,, | पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण | ,, |
| धन के प्रभाव का निर्देश | १५६ | आचारदत्त या ह्रीदत्त दान | १६१ |
| व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश | १५७ | भीदत्त दान | ,, |
| मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश | ,, | नष्टदान | ,, |
| लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश | ,, | आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानना | ,, |
| आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश | ,, | वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता | ,, |
| उचित व्यय करने का निर्देश | १५८ | विचार करके स्नेह या द्वेष करना | ,, |
| भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश | ,, | अतिक्रूरतादि का निषेध | १६२ |
| सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का |
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( १० )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल | १६२ | हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध | १६६ |
| अपने को अधिक श्रेष्ठ न मानना | ” | चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश | ” |
| देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध | १६३ | बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश | ” |
| देवादिकों के तिरस्कार उचित नहीं | ” | दुःखप्रद विषयों का निर्देश | ” |
| युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेध | ” | सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश | ” |
| अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध | ” | जीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण | १६७ |
| बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहना | ” | खल पुरुष के लक्षण | ” |
| विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध | १६४ | आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश | ” |
| कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश | ” | धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश | ” |
| बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसता | ” | प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण | ” |
| कुमित्र के लक्षण | ” | प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण | १६८ |
| कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश | ” | आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण | ” |
| स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश | ” | आनन्ददायक पिता के लक्षण | ” |
| 'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश | १६५ | मित्र के लक्षण | ” |
| अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दूषणता का निर्देश | ” | मानहानिकारक कार्यों का निर्देश | ” |
| एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश | ” | मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संसर्ग रखने का निषेध | १६९ |
| दुःखकारक कार्यों का निर्देश | ” | ||
| स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश | ” |
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( ११ )
| विषय एवं निर्देश | पृष्ठ | विषय एवं निर्देश | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय | १६९ | सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश | १७२ |
| व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देश | ” | दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश | १७३ |
| अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश | १७० | वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश | ” |
| तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश | ” | प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश | ” |
| मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश | ” | मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश | ” |
| मूर्ख जनों के कृत्य | १७१ | प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश | १७४ |
| सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश | ” | कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश | ” |
| स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश | ” | शिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश | ” |
| स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश | ” | अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें | ” |
| धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता | ” | गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश | १७५ |
| कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता | १७२ | अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण | ” |
| भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता | ” | समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश | ” |
| आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश | ” | प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश | ” |
| बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश | ” | ||
| राजाओं के साथ सर्प की भांति | ” |
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( १२ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश | १७६ | बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश | १७९ |
| पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देश | ” | अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश | ” |
| शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देश | ” | बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश | १८० |
| प्रिय होने के उपाय | ” | पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश | ” |
| अप्रिय होने के कारणों का निर्देश | ” | प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश | ” |
| स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देश | ” | मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश | १८१ |
| स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश | १७७ | ४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण | ” |
| महान् पुरुष के लक्षण | ” | बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश | १८२ |
| साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षण | ” | परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण | ” |
| कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध | १७८ | राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश | ” |
| मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्त्तव्य विषयों का निर्देश | ” | सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश | १८३ |
| बलवान के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देश | ” | विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश | ” |
| मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देश | ” | सार्थक पुत्र के लक्षण | ” |
| वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश | १७९ | स्वाभाविक शत्रु के लक्षण | ” |
| अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेध | ” | परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश | ” |
| ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश | ” | मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश | ” |
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( १३ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध | १८४ | रिपु-पीड़ित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश | १८७ |
| राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण | ,, | स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश | ,, |
| मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश | ,, | प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश | १८८ |
| मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश | १८५ | दण्ड के लक्षण | ,, |
| मित्रता होने के कारणों का निर्देश | ,, | दण्ड के भेद का निर्देश | ,, |
| मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण | ,, | दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश | ,, |
| भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण | ,, | घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश | १८९ |
| उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश | ,, | दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण | १८६ | उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश | ,, |
| शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश | ,, | सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश | १९० |
| शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश | ,, | राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश | ,, | धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश | ,, |
| मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने निषेध | ,, | पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश | १९१ |
| सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश | १८७ | स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश | ,, |
| शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश | ,, | राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश | ,, |
| मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश | ,, |
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( १४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश | १९१ | पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण | १९६ |
| 'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश | ,, | नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश | ,, |
| चुगलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश | १९२ | वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश | ,, |
| उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश | ,, | अपराधी के असहाय आदि को दण्ड न देना | ,, |
| अपराध के ४ भेद पुनःप्रत्येक के दो दो भेदों का निर्देश | ,, | देशनिष्काशन योग्य अपराधी | १९८ |
| पुनः उक्त अपराधोंके २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश | ,, | मार्ग-संरक्षण योग्य का निर्देश | १९९ |
| मानंसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश | १९३ | संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश | ,, |
| दण्ड के योग्य पुरुषोंके लक्षण | ,, | राजादिकों से बिगाड़ करनेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश | ,, |
| उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में जेल देने का निर्देश | ,, | गणों की दुष्टता करने पर उपाय | ,, |
| अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश | ,, | ||
| संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण | १९४ | अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश | २०० |
| शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण | ,, | ||
| आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण | ,, | माता आदि के भरण-पोषण का त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश | ,, |
| मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण | १९५ | उत्तमादि साहस दण्ड के एवं पण आदि के लक्षण | २०१ |
| अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार | ,, | कोश के लक्षण | ,, |
| धनवर्ग से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश | ,, | सुखप्रद कोश का निर्देश | ,, |
| दुःखप्रद कोश का निर्देश | ,, | ||
| बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण | १९६ | अन्यायोपार्जित कोश के दुष्टफलों का निर्देश | २०२ |
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( १५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश | २०२ | मूर्ख के लक्षण | २०७ |
| अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश | ,, | राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश | ,, | हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश | २०८ |
| देवोत्तर-संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश | ,, | नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश | ,, |
| आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश | ,, | सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश | २०९ |
| आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश | २०३ | श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण | ,, |
| प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल | ,, | असत् रत्न के लक्षण | ,, |
| कोश संग्रह करने का प्रमाण | ,, | पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश | ,, |
| प्रजा-संरक्षण के फल | ,, | दोषवर्जित रत्न के लक्षण | २१० |
| राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण | २०४ | मूल्य अधिक और कम होने के कारण | ,, |
| नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश | ,, | मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश | ,, |
| श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण | ,, | मोती के रंग और भेद का निर्देश | ,, |
| नीचादि धन के लक्षण | ,, | कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान | २११ |
| प्रजा के सन्ताप से सबंश राजा के नाश का निर्देश | २०५ | मोती की परीक्षाविधि-निर्देश | ,, |
| धान्य-संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश | ,, | रत्नों का तुलामान निर्देश | ,, |
| संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश | ,, | वज्र का मूल्य-विचार | २१२ |
| ओषधि आदि सब वस्तुओं का संचय करने का निर्देश | २०६ | काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश | २१३ |
| संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश | ,, | माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार | ,, |
| स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश | २०७ | गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश | ,, |
| संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश | ,, | अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश | ,, |
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( १६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मोतियों की मूल्य-कल्पना | २१३ | काष्ठ आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश | २१९ |
| मोती के भेद और लक्षण | २१४ | भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश | २२० |
| सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश | ” | किसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश | ” |
| सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव | ” | क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश | ” |
| स्वर्णादि धातुओं के गुण | २१५ | व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वाँ भाग लेने का निर्देश | ” |
| धातुओं के मूल्य का प्रमाण | ” | दूकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश | २२१ |
| अधिक मूल्य गौ के लक्षण | ” | राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश | ” |
| बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण | २१६ | राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश | ” |
| गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश | ” | राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश | २२२ |
| हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश | ” | नरक के लक्षण का निर्देश | ” |
| उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देश | ” | राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश | ” |
| देश-कालानुसार सबों की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश | २१७ | सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश | ” |
| शुल्क के लक्षण | ” | मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश | २२३ |
| वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश | ” | जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश | ” |
| किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण | २१८ | द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश | ” |
| उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण | ” | क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश | २२४ |
| तडागादिकों से संपन्न भूमि से प्राप्त राजभाग का तारतम्य निर्देश | ” | शूद्रादि के कर्मों का निर्देश | ” |
| रजतादियुक्त भूमि के लिये राज-भाग-नियम | २१९ | ||
| तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २०वाँ भाग कर लेने का निर्देश | ” | ||
| बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश | ” |
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( १७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश | २२४ | तर्क लक्षण | २२८ |
| ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश | ,, | सांख्य लक्षण | २२९ |
| द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश | ,, | वेदान्त लक्षण | ,, |
| गुरु का लक्षण | २२५ | योग लक्षण | ,, |
| मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश | ,, | इतिहास लक्षण | ,, |
| विद्या और कला के लक्षण | ,, | पुराण लक्षण | ,, |
| विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश | ,, | स्मृति लक्षण | ,, |
| वेदों के ६ अंगों का निर्देश | ,, | नास्तिक मत लक्षण | २३० |
| मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश | ,, | अर्थशास्त्र लक्षण | ,, |
| वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश | २२६ | कामशास्त्र लक्षण | ,, |
| मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण | ,, | शिल्पशास्त्र लक्षण | ,, |
| ऋग्वेद के लक्षण | ,, | अलङ्कार शास्त्र लक्षण | ,, |
| यजुर्वेद के लक्षण | ,, | काव्य लक्षण | २३१ |
| सामवेद के लक्षण | ,, | देशभाषा लक्षण | ,, |
| अथर्ववेद के लक्षण | ,, | अवसरोक्ति लक्षण | ,, |
| आयुर्वेद के लक्षण | २२७ | यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण | ,, |
| धनुर्वेद के लक्षण | ,, | देशादि धर्म लक्षण | ,, |
| गान्धर्ववेद के लक्षण | ,, | गान्धर्व वेदोक्त ७ कलायें | २३२ |
| तन्त्र या आगम के लक्षण | ,, | आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण | ,, |
| शिक्षा के लक्षण | ,, | धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण | २३३ |
| कल्प के लक्षण व भेद | ,, | पृथक् ४ कलाओं के लक्षण | २३४ |
| व्याकरण के लक्षण | २२८ | तडागकूपादि कलाओं के लक्षण | ,, |
| निरुक्त के लक्षण | ,, | ४ आश्रमों का नाम निर्देश | २३७ |
| ज्योतिष लक्षण | ,, | ४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश | ,, |
| छन्द लक्षण | ,, | स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश | २३८ |
| मीमांसा लक्षण | ,, | स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध | ,, |
| स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश | ,, | ||
| साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश | २४० | ||
| यथोक्त पतिसेवा से पतिलोक जाने का निर्देश | ,, |
२ शु० सूची
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( १८ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश | २४० | जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गृह के गृह बनाने के स्थान का निर्देश | २४७ |
| रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश | २४१ | ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश | ,, |
| पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश | ,, | मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश | ,, |
| पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध | २४२ | मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश | २४८ |
| शूद्र धर्म का निर्देश | ” | ध्यान योग में प्रतिमा की साधन-मुख्यता का निर्देश | ,, |
| संकर जाति के नियम का निर्देश | ” | बालु से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश | ,, |
| राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने निर्देश | २४३ | शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल | ,, |
| मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश | २४४ | देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश | ,, |
| दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश | ,, | सात्त्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश | २४९ |
| वृक्षारोपण और पोषण के नियम | ,, | सात्त्विकी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश | ,, | राजसी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश | २४५ | तामसी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश | ,, | अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश | २५० |
| वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय | ,, | वामनी, मानुषी, दैवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण | ,, |
| वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय | ,, | स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | ,, |
| आरण्य-वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश | ,, | नर-नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण | ,, |
| कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश | २४६ | ||
| देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश | ,, |
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( १६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊँचाई के प्रमाण | २५० | अनेक भुजाओं की व्यवस्था | २५८ |
| असुरों की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | ,, | ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था | २५९ |
| बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | २५१ | हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार | ,, |
| सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद | ,, | अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| ९ ताल प्रमाण ऊँची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश | ,, | सौख्य दायक प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| रम्य प्रतिमा के लक्षण | २५३ | सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन | २६० |
| रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर | ,, | लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश | ,, |
| मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर | ,, | प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश | २६१ |
| अवयवों की आकृति का वर्णन | ,, | युगभेद से वर्णभेद का कथन | ,, |
| अवयवों के अन्तर का प्रमाण | २५४ | वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश | ,, |
| अवयवों की परिधि का प्रमाण | २५५ | युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश | ,, |
| प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण | २५६ | अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध | ,, |
| प्रतिमा के आसन का प्रमाण | २५७ | भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश | २६२ |
| योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण | ,, | वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश | ,, |
| देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण | ,, | गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण | २६३ |
| मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश | ,, | स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण | २६५ |
| प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश | ,, | सर्वों के मुख का प्रमाण | ,, |
| मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश | ,, | बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण | ,, |
| प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार | २५८ | शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण | २६६ |
| प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार | ,, | सप्त ताल प्रमाण की मूर्ति के अवयवों का प्रमाण | ,, |
| प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश | ,, | आसुरी आदि मूर्त्तियों के लक्षण | २६७ |
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( २७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शिल्पी को कभी मूर्तियों की वृद्ध-सदृश कल्पना न करने का निर्देश | २६८ | यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण | २७३ |
| राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश | ” | सभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश | ” |
| मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध | ” | सभा में जाने का नियम | ” |
| प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालन करने का निर्देश | ” | सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश | ” |
| राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश | २६९ | निर्णयकों का तारतम्य | ” |
| शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण | ” | निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण | २७४ |
| शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण | ” | धर्म का लक्षण | ” |
| व्यवहार-लक्षण | ” | अनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश | ” |
| राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश | ” | दश साधनों का निर्देश | ” |
| पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश | २७० | यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश | २७५ |
| राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश | ” | दशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश | ” |
| स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश | ” | गणक तथा लेखक के लक्षण | ” |
| ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश | २७१ | धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश | ” |
| सभासद के लक्षण | ” | राजसभा में प्रवेश करने का प्रकार | २७६ |
| राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण | ” | सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश | ” |
| राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश | २७२ | राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश | ” |
| देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश | ” | ||
| देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश | ” | ||
| कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश | २७७ | ||
| न्यायादिकों के समय का निर्देश | ” | ||
| मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश | ” |