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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

( ४८ )

अधिकारी उसकी देख-रेख करें और एक स्थायी व्यक्ति उसका नित्य-व्यवस्थापन करे। इस व्यक्ति को 'पान्थ-शालाधिप' कहा गया है। इस पान्थ-शाला में आए व्यक्ति के स्थानादि का विवरण रहना¹ चाहिए।

इसी प्रकार अन्यान्य प्रमुख विषयों का भी विशद् वर्णन इस ग्रन्थ में मिलता है, यहाँ तो केवल कुछ ही विषयों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जो अपर्याप्त है। अतः समस्त ग्रन्थ का विधिवत् अध्ययन ही इस अंश में पर्याप्त हो सकता है।

शुक्र-नीति के संस्करण

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शुक्र-नीति अपने विषय का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। अतएव इस ग्रन्थ का कई बार प्रकाशन हुआ। प्रामाणिक संस्करण के रूप में हम ऑपर्ट ( Oppert ) महाशय के द्वारा मद्रास से प्रकाशित तथा जीवानन्द विद्यासागर के संस्करण को ले सकते हैं। प्राध्यापक विनय कुमार सरकार ने 'सेक्रेड बुक्स ऑफ हिन्दू-सीरीज' में अंग्रेजी अनुवाद भी इस ग्रन्थ-रत्न का प्रकाशित किया है। सभी संस्करणों में यह ग्रन्थ चार अध्यायों में विभक्त है।

ऐसे अपूर्व ग्रन्थ का हिन्दी व्याख्यान भी परमावश्यक था, विशेषतः आज के भारतवर्ष में। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह संस्करण पाठकों के सामने प्रस्तुत है। यद्यपि 'वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई' से आचार्य मिहिरचन्द्र जी की हिन्दी व्याख्या (अनुवाद) के साथ भी इसका प्रकाशन हुआ है तथापि उसकी हिन्दी आज की दृष्टि से बहुत उपयोगी नहीं है। हमें विश्वास है कि विद्वान् पाठकगण इस संस्करण की कुछ त्रुटियों की उपेक्षा कर विद्वान् व्याख्याकार तथा धैर्य एवम् उत्साह से सम्पन्न प्रकाशक की कामना की पूर्ति करने में सानुग्रह दृष्टि-कोण अपनायेंगे जिससे इस ग्रन्थ-रत्न का अग्रिम संस्करण भी यथा-सम्भव परिष्कार के साथ शीघ्र ही प्रस्तुत हो सके।

वाराणसी ⎬
वि० सं० २०२५ ⎭
विदुषामनुविधेयः—
श्रीनारायण मिश्रः


१. वही १।२६९-७१ ॥

विषय-सूची

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थोपक्रमभूमि के मानभेदों का निर्देश३०
नीतिशास्त्र का उपक्रम,,राजधानी बनाने योग्य प्रदेश३२
नीतिशास्त्र-प्रशंसाराजोचित भवन का निर्देश३३
राजा का नीतिशास्त्र-ज्ञान में प्रयोजनराजोचित दुर्ग बनाने का निर्देश३६
राजा की काल-कारणता का निर्देशराजसभा बनाने का निर्देश,,
धर्म की प्रशंसामन्त्री आदि के भवन का निर्देश३७
राजा के सात्त्विकादि तीन भेद,,सेना तथा प्रजावर्गों के स्थान,,
सुगति-दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणताधर्मशाला-निर्माण का निर्देश३८
राजा के देवांश होने का निर्देश११राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश,,
७ गुणों से युक्त राजा की प्रजा-रंजकता का निर्देश१२धर्मशाला की व्यवस्था४०
इन्द्रियजय की आवश्यकता१६राजाओं के दैनिक कृत्य४१
विनाश के चार कारण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध,,प्रहरियों का कर्त्तव्य४२
जैसे शब्द-विषय के द्वारा,,राजा के आदेशों की घोषणा४३
रूप-विषय द्वारा१७राजाओं के कर्त्तव्य४५
रस-विषय द्वारा,,विषादि से दूषित अन्नादि-परीक्षा४७
गन्ध-विषय द्वारा,,शिकार खेलने का वर्णन४८
द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश,,राजा के सम्बन्धी आदियों का राजनिर्धारित कर्त्तव्य५०
आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश२०परिषद् की व्यवस्था का निर्देश५१
राजा के दोष-गुण का निर्देश,,राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश५२
आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण२४राजा के कर्त्तव्य५३
मनोहर वचन बोलने का निर्देश२६राजा को प्रतिवर्ष देश के अधिकारियों के निरीक्षण का निर्देश५४
राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश२८राजा के पारलौकिक कार्य५६
एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश५७

शुक्र ०

( २ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार-निर्णय का निषेध५७अधिकारयोग्य को अधिकार देने का निर्देश७३
अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश,,योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश,,
बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश५८अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश७४
युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश,,दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश,,
युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्ह युवराज के अधिकारो५९राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश७५
दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश६०योजनाकर्त्ता की दुर्लभता,,
राजपुत्रों के पिता के विषय में कर्तव्यता का निर्देश६३गजाधिपति एवं महावत के लक्षण,,
अमात्यादिभृत्य-विषयक विचार६४अश्वाधिपति के लक्षण७६
श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण६५सारथि के लक्षण,,
निन्यभृत्य के लक्षण६६घुड़सवार के लक्षण,,
दस प्रकृतियों के नाम६७अश्वशिक्षक के लक्षण,,
आठ प्रकृतियों के नाम,,अश्वसेवक ( साईस ) के लक्षण७७
पुरोहितादिकों के अधिकार६८सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण,,
पुरोहितादिकों के लक्षण,,पत्ति ( पैदल सेना ) पाल आदिकों के अधिकार,,
प्रतिनिधि का कार्य७०शतानीकादिकों के लक्षण७८
प्रधान का कृत्य,,उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश,,
सचिव के कृत्य,,तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश७९
मन्त्री के कार्य७१रत्नादि के अध्यक्षों के लक्षण,,
प्राड्विवाक के कार्य,,कोषाध्यक्ष के लक्षण,,
पण्डित के कार्य,,वस्त्राधिपति के लक्षण,,
सुमन्त्र के कार्य,,वितानाधिप के लक्षण,,
अमात्य के कार्य७२धान्यपति के लक्षण८०
राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश,,पाकाध्यक्ष के लक्षण,,
अधिकार की व्यवस्था का निर्देश७३

( ३ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
आरामाधिपति के लक्षण८०सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इससे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश८७
गुहाद्यधिपति के लक्षण,,संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को न रखने का निर्देश८८
देवाध्यक्ष के लक्षण८१सद्भृत्य के लक्षण तथा कृत्य,,
दानाध्यक्ष के लक्षण,,द्वारपाल के कर्तव्यों का निर्देश,,
सभासद के लक्षण,,राजपार्श्ववर्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य,,
सत्राधिप के लक्षण,,भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य८९
परीक्षक के लक्षण८२राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश,,
साहसाधिप के लक्षण,,राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश,,
ग्रामाधिप के लक्षण,,राजा से स्वकार्य-निवेदन-प्रकार तथा जोर से हंसने आदि का निषेध,,
कर वसूल करनेवाले के लक्षण,,हितकारी सेवक का कृत्य९०
लेखक के लक्षण,,राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश९१
द्वारपाल के लक्षण८३समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश,,
चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण,,स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध,,
तपोनिष्ठ के लक्षण,,राजवेशभूषा-धारण की नकल करने का निषेध९२
दानशील के लक्षण,,राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश,,
श्रुतज्ञ के लक्षण,,विरक्त राजा के लक्षण,,
पौराणिक के लक्षण,,अनुरक्त राजा के लक्षण९३
शास्त्रविद् के लक्षण,,
ज्योतिर्विद् के लक्षण८४
मान्त्रिक के लक्षण,,
वैद्य के लक्षण,,
तान्त्रिक के लक्षण,,
अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण,,
परिचारक के लक्षण,,
जासूस के लक्षण८५
दण्डधारी-आसा-वल्लमधारी के लक्षण,,
गायकाधिप के लक्षण,,
वेश्या के लक्षण,,
वेश्या-भृत्य के लक्षण८६
वैतालिक तथा शिल्पज्ञों को पास में रखने का निर्देश,,

( ४ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश९३निश्चितान्यस्वामिक संचित धन के भेद१०६
स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य९४औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण,,
आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य९५अज्ञातस्वामिक के लक्षण१०७
राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश,,स्वत्वविनिश्चित के भेद,,
डाकू के समान राजा के लक्षण,,साहजिक के लक्षण,,
प्रच्छन्न चोर के लक्षण,,अधिक के लक्षण,,
बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध९६संचित धन के लक्षण,,
लेख्यों के भेदों का निर्देश१०१संचित धन के भेद,,
लेख के दो भेदों का निर्देश१०२पार्थिवसंज्ञक आय के भेद१०८
जयपत्रक के लक्षण,,चलसंज्ञक आय के लक्षण,,
आज्ञापत्र के लक्षण,,विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश,,
प्रज्ञापनपत्र के लक्षण,,व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण,,
शासनपत्र के लक्षण१०३निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण१०९
प्रसादलिखित के लक्षण,,स्वत्वनिवर्त्तक के भेद,,
भोग-कर-उपायन-पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण .,,ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद,,
विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण,,प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन-व्यय के लक्षण,,
दानपत्र के लक्षण,,उपभोग्य के लक्षण,,
क्रयपत्र के लक्षण१०४भोग्य व्यय के लक्षण११०
सादिलेख्य के लक्षण,,पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण,,
संवित्पत्र के लक्षण,,आय-व्यय-लेखक के कर्त्तव्य,,
ऋणलेख्य के लक्षण,,अवशिष्ट आय के विविध भेद१११
शुद्धिपत्र के लक्षण,,मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण,,
सामयिक लेख्यपत्र-लक्षण,,लोकव्यवहारार्थ द्रव्य तथा धन के लक्षण,,
संमतिसंज्ञक पत्र के लक्षण,,मूल्य की परिभाषा,,
क्षेमपत्र के लक्षण१०५
वेदनार्थक पत्र के लक्षण,,
आय-व्यय लेख्य के लक्षण,,
राजाओं के आय-व्ययादिक के लक्षण,,
आय के भेद१०६
संचित आय के भेद,,

( ५ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश११२कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार१२१
पत्रलेखन-प्रकार,,राजा के भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन१२२
सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश११३भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश,,
पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार११४भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध,,
व्यापक-व्याप्य के लक्षण,,१० प्रकृति पुरोहितादियों का जातिनियम१२३
स्थान-टिप्पणादि के भेद११५भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश,,
शेषापव्यय-स्थलापव्ययज्ञान,,सेनापति-पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश,,
तिथ्यादि लिखने का निर्देश,,भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण,,
गुञ्जादिकों का लक्षण११६सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश१२५
प्रस्थपाद का लक्षण,,धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश,,
संख्या का प्रमाण,,सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश,,
संख्या की अनन्तता,,निषिद्धाचरणों का निर्देश१२६
एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम११७दशविध पापों का निर्देश,,
कालमान का वैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था,,दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश,,
भृति के ३ प्रकारों का निर्देश,,समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश१२७
कार्यमानादिकों के लक्षण,,अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध,,
मध्यमादि भृति के लक्षण११८अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध,,
पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश,,
हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश,,
शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश,,
भृत्य के तीन भेद११९
भृत्यों को छुट्टी देने का नियम,,
रोग के समय भृति देने का प्रकार,,
बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश१२०
सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश,,

( ६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
पराधीन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश१२७आततायियों के लक्षण१३२
इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश,,एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश,,
इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश१२८विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध,,
स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश,,अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध१३३
स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार,,मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश,,
एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध,,सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश१३४
यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश१२९माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध,,
चैत्यादिकों के लंघन का निषेध,,स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध,,
तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध,,अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध,,
देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध१३०अन्य धर्म के सेवन का निषेध,,
सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध,,त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश,,
सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध,,मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश१३५
व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन१३१बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध,,
राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध,,बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध,,
आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध,,दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश१३६
किञ्चित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध,,आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध,,
अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश,,अश्लील बातें आदि करने का निषेध,,
सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश१३२लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध,,
अधर्मरत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश,,

( ७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश१३६विद्यादिकों के फल१४१
प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश१३७शूरतादि के फलों का निर्देश
दीर्घदर्शी के लक्षणसुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश
प्रत्युत्पन्नमति के लक्षणनष्ट वस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश१४२
आलसी मनुष्य के लक्षणपरद्रव्यहरणादि का निषेध
साहसी के लक्षण व दोषप्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश
चिरकारी मनुष्य के लक्षण१३८स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध
सहसा कार्य करने का निषेधवार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध
मित्र की विशेषतासपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध१४३
बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेधसर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध
मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देशसर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादि का समूल नाश करने का निर्देश
विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध१३९याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार
प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देशदाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश१४४
परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देशसमय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश
उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेधस्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश
विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध१४०मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश
विद्यामत्तता के अनर्थकारी फलस्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश
शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल
धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन
कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन
बलमत्त की स्थिति का वर्णन१४१
मानमत्त की स्थिति का वर्णन
विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश

( ८ )

रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक-उपहास के निषेध का निर्देश १४४निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश १४९
कार्य-साधक के कृत्यों का वर्णन १४५बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध ,,
दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध ,,मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध १५०
असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश ,,आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश ,,
बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश ,,
जगत् को वश में करने के उपाय ,,
तरुणी स्त्री को इ तन्त्र छोड़कर जाने का निषेध ,,वश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश १५१
साध्वी भार्यादि का यत्नपूर्वक पालन का निर्देश १४६वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश ,,
जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश ,,मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश ,,
गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश १४७कूट व्यवहार का निषेध ,,
देशाटनादि की कर्त्तव्यता ,,विहित कार्य करने का निर्देश ,,
देशाटन के लाभ ,,रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश १५२
सभा में बैठने से लाभ का वर्णन ,,योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये एकाकी गमन का निषेध ,,
बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल ,,मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता 'न करने का निर्देश ,,
वेश्यादर्शन के फल १४८गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध ,,
पण्डितों के साथ मैत्री के फल ,,उत्तम पुरुष के लक्षण ,,
अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध ,,स्त्री के कथनमात्र से बिना स्वयं अनुभव किये समझने का निषेध १५३
गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश ,,स्त्रियों के ८ दुर्गुणों का निर्देश ,,
शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश ,,
शृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध १४९
शयनादि के निषेध के विषय ,,
बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध ,,

( ६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
१६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध१५३विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश१५८
दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश,,२ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध,,
स्वामी के लक्षण,,ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध१५९
एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध,,शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश,,
वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश१५४बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश,,
वर के लक्षण,,उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण,,
कन्या के लक्षण,,बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश१६०
विद्या और धन का संचय करने का निर्देश१५५यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश,,
धनार्जन के उपयोगों का निर्देश,,दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश,,
धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश,,परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण,,
अवश्य धनार्जन करने का निर्देश,,पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण,,
धन के प्रभाव का निर्देश१५६आचारदत्त या ह्रीदत्त दान१६१
व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश१५७भीदत्त दान,,
मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश,,नष्टदान,,
लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश,,आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानना,,
आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश,,वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता,,
उचित व्यय करने का निर्देश१५८विचार करके स्नेह या द्वेष करना,,
भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश,,अतिक्रूरतादि का निषेध१६२
सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का

( १० )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल१६२हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध१६६
अपने को अधिक श्रेष्ठ न माननाचुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश
देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध१६३बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश
देवादिकों के तिरस्कार उचित नहींदुःखप्रद विषयों का निर्देश
युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेधसुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश
अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेधजीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण१६७
बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहनाखल पुरुष के लक्षण
विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध१६४आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश
कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देशधूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश
बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसताप्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण
कुमित्र के लक्षणप्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण१६८
कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देशआनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण
स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देशआनन्ददायक पिता के लक्षण
'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश१६५मित्र के लक्षण
अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दूषणता का निर्देशमानहानिकारक कार्यों का निर्देश
एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देशमैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संसर्ग रखने का निषेध१६९
दुःखकारक कार्यों का निर्देश
स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश

( ११ )

विषय एवं निर्देशपृष्ठविषय एवं निर्देशपृष्ठ
स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय१६९सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश१७२
व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देशदूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश१७३
अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश१७०वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश
तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देशप्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश
मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देशमृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश
मूर्ख जनों के कृत्य१७१प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश१७४
सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देशकुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश
स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देशशिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश
स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देशअधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें
धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठतागृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश१७५
कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता१७२अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण
भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तितासमय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश
आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देशप्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश
बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश
राजाओं के साथ सर्प की भांति

( १२ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश१७६बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश१७९
पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देशअन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश
शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देशबिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश१८०
प्रिय होने के उपायपारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश
अप्रिय होने के कारणों का निर्देशप्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश
स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देशमित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश१८१
स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश१७७४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण
महान् पुरुष के लक्षणबैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश१८२
साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षणपरम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण
कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध१७८राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश
मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्त्तव्य विषयों का निर्देशसहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश१८३
बलवान के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देशविद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश
मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देशसार्थक पुत्र के लक्षण
वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश१७९स्वाभाविक शत्रु के लक्षण
अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेधपरस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश
ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देशमूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश

( १३ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध१८४रिपु-पीड़ित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश१८७
राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण,,स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश,,
मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश,,प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश१८८
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश१८५दण्ड के लक्षण,,
मित्रता होने के कारणों का निर्देश,,दण्ड के भेद का निर्देश,,
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण,,दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश,,
भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण,,घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश१८९
उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश,,दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश,,
शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण१८६उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश,,
शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश,,सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश१९०
शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश,,राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश,,
शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश,,धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश,,
मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने निषेध,,पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश१९१
सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश१८७स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश,,
शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश,,राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश,,
मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश,,

( १४ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश१९१पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण१९६
'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश,,नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश,,
चुगलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश१९२वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश,,
उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश,,अपराधी के असहाय आदि को दण्ड न देना,,
अपराध के ४ भेद पुनःप्रत्येक के दो दो भेदों का निर्देश,,देशनिष्काशन योग्य अपराधी१९८
पुनः उक्त अपराधोंके २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश,,मार्ग-संरक्षण योग्य का निर्देश१९९
मानंसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश१९३संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश,,
दण्ड के योग्य पुरुषोंके लक्षण,,राजादिकों से बिगाड़ करनेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश,,
उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में जेल देने का निर्देश,,गणों की दुष्टता करने पर उपाय,,
अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश,,
संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण१९४अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश२००
शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण,,
आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण,,माता आदि के भरण-पोषण का त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश,,
मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण१९५उत्तमादि साहस दण्ड के एवं पण आदि के लक्षण२०१
अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार,,कोश के लक्षण,,
धनवर्ग से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश,,सुखप्रद कोश का निर्देश,,
दुःखप्रद कोश का निर्देश,,
बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण१९६अन्यायोपार्जित कोश के दुष्टफलों का निर्देश२०२

( १५ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश२०२मूर्ख के लक्षण२०७
अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश,,राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश,,
शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश,,हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश२०८
देवोत्तर-संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश,,नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश,,
आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश,,सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश२०९
आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश२०३श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण,,
प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल,,असत् रत्न के लक्षण,,
कोश संग्रह करने का प्रमाण,,पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश,,
प्रजा-संरक्षण के फल,,दोषवर्जित रत्न के लक्षण२१०
राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण२०४मूल्य अधिक और कम होने के कारण,,
नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश,,मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश,,
श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण,,मोती के रंग और भेद का निर्देश,,
नीचादि धन के लक्षण,,कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान२११
प्रजा के सन्ताप से सबंश राजा के नाश का निर्देश२०५मोती की परीक्षाविधि-निर्देश,,
धान्य-संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश,,रत्नों का तुलामान निर्देश,,
संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश,,वज्र का मूल्य-विचार२१२
ओषधि आदि सब वस्तुओं का संचय करने का निर्देश२०६काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश२१३
संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश,,माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार,,
स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश२०७गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश,,
संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश,,अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश,,

( १६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मोतियों की मूल्य-कल्पना२१३काष्ठ आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश२१९
मोती के भेद और लक्षण२१४भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश२२०
सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देशकिसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश
सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भावक्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश
स्वर्णादि धातुओं के गुण२१५व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वाँ भाग लेने का निर्देश
धातुओं के मूल्य का प्रमाणदूकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश२२१
अधिक मूल्य गौ के लक्षणराष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश
बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण२१६राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश
गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देशराजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश२२२
हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देशनरक के लक्षण का निर्देश
उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देशराजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश
देश-कालानुसार सबों की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश२१७सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश
शुल्क के लक्षणमुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश२२३
वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देशजरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश
किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण२१८द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश
उत्तम कृषिकृत्य के लक्षणक्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश२२४
तडागादिकों से संपन्न भूमि से प्राप्त राजभाग का तारतम्य निर्देशशूद्रादि के कर्मों का निर्देश
रजतादियुक्त भूमि के लिये राज-भाग-नियम२१९
तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २०वाँ भाग कर लेने का निर्देश
बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश

( १७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश२२४तर्क लक्षण२२८
ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश,,सांख्य लक्षण२२९
द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश,,वेदान्त लक्षण,,
गुरु का लक्षण२२५योग लक्षण,,
मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश,,इतिहास लक्षण,,
विद्या और कला के लक्षण,,पुराण लक्षण,,
विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश,,स्मृति लक्षण,,
वेदों के ६ अंगों का निर्देश,,नास्तिक मत लक्षण२३०
मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश,,अर्थशास्त्र लक्षण,,
वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश२२६कामशास्त्र लक्षण,,
मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण,,शिल्पशास्त्र लक्षण,,
ऋग्वेद के लक्षण,,अलङ्कार शास्त्र लक्षण,,
यजुर्वेद के लक्षण,,काव्य लक्षण२३१
सामवेद के लक्षण,,देशभाषा लक्षण,,
अथर्ववेद के लक्षण,,अवसरोक्ति लक्षण,,
आयुर्वेद के लक्षण२२७यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण,,
धनुर्वेद के लक्षण,,देशादि धर्म लक्षण,,
गान्धर्ववेद के लक्षण,,गान्धर्व वेदोक्त ७ कलायें२३२
तन्त्र या आगम के लक्षण,,आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण,,
शिक्षा के लक्षण,,धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण२३३
कल्प के लक्षण व भेद,,पृथक् ४ कलाओं के लक्षण२३४
व्याकरण के लक्षण२२८तडागकूपादि कलाओं के लक्षण,,
निरुक्त के लक्षण,,४ आश्रमों का नाम निर्देश२३७
ज्योतिष लक्षण,,४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश,,
छन्द लक्षण,,स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश२३८
मीमांसा लक्षण,,स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध,,
स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश,,
साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश२४०
यथोक्त पतिसेवा से पतिलोक जाने का निर्देश,,

२ शु० सूची

( १८ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश२४०जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गृह के गृह बनाने के स्थान का निर्देश२४७
रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश२४१ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश,,
पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश,,मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश,,
पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध२४२मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश२४८
शूद्र धर्म का निर्देशध्यान योग में प्रतिमा की साधन-मुख्यता का निर्देश,,
संकर जाति के नियम का निर्देशबालु से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश,,
राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने निर्देश२४३शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल,,
मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश२४४देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश,,
दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश,,सात्त्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश२४९
वृक्षारोपण और पोषण के नियम,,सात्त्विकी प्रतिमा के लक्षण,,
ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश,,राजसी प्रतिमा के लक्षण,,
बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश२४५तामसी प्रतिमा के लक्षण,,
वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश,,अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश२५०
वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय,,वामनी, मानुषी, दैवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण,,
वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय,,स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण,,
आरण्य-वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश,,नर-नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण,,
कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश२४६
देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश,,

( १६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊँचाई के प्रमाण२५०अनेक भुजाओं की व्यवस्था२५८
असुरों की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण,,ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था२५९
बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण२५१हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार,,
सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद,,अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण,,
९ ताल प्रमाण ऊँची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश,,सौख्य दायक प्रतिमा के लक्षण,,
रम्य प्रतिमा के लक्षण२५३सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन२६०
रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर,,लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश,,
मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर,,प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश२६१
अवयवों की आकृति का वर्णन,,युगभेद से वर्णभेद का कथन,,
अवयवों के अन्तर का प्रमाण२५४वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश,,
अवयवों की परिधि का प्रमाण२५५युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश,,
प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण२५६अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध,,
प्रतिमा के आसन का प्रमाण२५७भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश२६२
योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण,,वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश,,
देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण,,गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण२६३
मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश,,स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण२६५
प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश,,सर्वों के मुख का प्रमाण,,
मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश,,बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण,,
प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार२५८शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण२६६
प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार,,सप्त ताल प्रमाण की मूर्ति के अवयवों का प्रमाण,,
प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश,,आसुरी आदि मूर्त्तियों के लक्षण२६७