भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

१८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रहते थे। उन्होंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा इस परोपकार-धर्मका ही आश्रय ले रखा था। संसारमें ऐसा कोई धर्म न तो प्रकट हुआ है और न होनेवाला है, जो सब अवस्थाओंमें सर्वथा निर्दोष हो। इस निश्चयपर पहुँचे हुए नन्दभद्रने इस विशाल धर्म-समुद्रका सब ओरसे मन्थन करके जो सारतत्त्व ग्रहण किया था, उसे बतलाता हूँ, सुनो। नन्दभद्र जीविकाके लिये वाणिज्यको ही श्रेष्ठ मानते थे और उसीको अपनाये हुए थे। उन्होंने थोड़े-से काठ और घास-फूससे अपने रहनेके लिये घर बना रखा था और सब लोगोंकी भलाईके लिये वे थोड़ा-सा ही लाभ लेकर व्यापार करते थे। उनके क्रय-विक्रयकी वस्तुओंमें मदिरा सर्वथा वर्जित थी। उनके यहाँ ग्राहकोंके साथ भेद-भाव नहीं किया जाता था। झूठ और कपटका तो वहाँ नाम भी न था। वस्तुओंके आदान-प्रदानमें वे सबके साथ समतापूर्ण बर्ताव करते थे। बिना छल-कपटके दूसरोंसे खरीदकी वस्तु लेकर उसे बिना किसी धोखाधड़ीके वे सब लोगोंके हाथ बेचते थे; यही उनका श्रेष्ठ व्रत था। कुछ लोग यज्ञकी प्रशंसा करते हैं, परंतु नन्दभद्र ऐसा नहीं मानते थे। उन्होंने यज्ञमें आये हुए कुछ दोषोंको लक्ष्य करके ही ऐसी धारणा बनायी थी, तथापि वे श्रद्धापूर्वक देवपूजन, नमस्कार, स्तुति, नैवेद्य-निवेदन आदि यज्ञकी सारभूत बातोंका सदा ही पालन करते थे। कोई-कोई संन्यासकी प्रशंसा करते हैं, परंतु नन्दभद्र उनसे भी सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि जो विषयोंका बाहरसे त्याग करके मनके द्वारा पुनः उनको ग्रहण करता है वह गृहस्थ और संन्यास अथवा इहलोक और परलोक दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर फटे हुए बादलकी भाँति नष्ट हो जाता है। संन्यासका जो सारभूत उत्तम तत्त्व है, उसका आदर तो नन्दभद्र भी करते थे। वे किसीके कर्मोंकी निन्दा या प्रशंसा नहीं करते थे। अनेक भिन्न-भिन्न मार्गोंमें स्थित हुए लोगोंको चन्द्रमाकी भाँति तटस्थ रहकर लीलापूर्वक देखते थे। किसीके साथ न उनका द्वेष था, न राग; न अनुरोध था, न विरोध। पत्थर और सुवर्णको वे समान समझते तथा अपनी निन्दा और स्तुतिमें भी समान भाव रखते थे। वे स्वभावसे ही धीर थे। सम्पूर्ण भूतोंसे निर्भय रहते थे। अपनी आकृति ऐसी बनाये रखते थे, मानो अन्धे और बहरे हों। कर्मोंके फलकी उन्हें कोई आकांक्षा नहीं थी। अतः वह कर्म उनके लिये भगवान् सदाशिवकी आराधना बन जाता था। इसी कारण वे धर्मका अनुष्ठान तो चाहते और करते थे, परंतु उसमें कोई लोभ नहीं रखते थे। नन्दभद्रने भलीभाँति विचार करके इसीको मोक्षके साररूपसे ग्रहण किया था। कुछ लोग खेतीकी प्रशंसा करते हैं; परंतु नन्दभद्रने उसके भी सारभागको ही अपनाया था। आठ बैलोंसे जुड़ा हुआ एक हल होना चाहिये और खेतीकी आयमेंसे तीसवें भागका त्याग करना चाहिये—उसे धर्मके कार्यमें लगा देना चाहिये। बूढ़े पशुओंका भी स्वयं ही पालन-पोषण करना चाहिये। जो ऐसा करे, वही श्रेष्ठ किसान है। नन्दभद्रने इसीको खेतीका सार मानकर इसका आदर किया था। उनके मतसे प्रतिदिन अपनी शक्तिके अनुसार देवताओं, पितरों, मनुष्यों (अतिथियों), ब्राह्मणों तथा पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि भूतोंके लिये अन्न देना चाहिये। सदा इन सबको देकर ही स्वयं भोजन करना उचित है। कुछ लोग ऐश्वर्यकी प्रशंसा करते हैं; परंतु नन्दभद्र उसे भी प्रशंसाके योग्य नहीं मानते थे। क्योंकि ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मनुष्य दूसरे मनुष्योंको दास बनाकर उनका उपभोग करते हैं। वे मनुष्योंका वध करते हैं, उन्हें बाँधते हैं और बंदी बनाकर दिन-रात पीड़ा देते हैं। ऐश्वर्यशाली पुरुष अपनेको अजर-अमर समझकर दूसरोंके साथ दुर्व्यवहार करते

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हैं। उनपर ऐश्वर्यका मद तो रहता ही है, मदिरापानके मदसे भी वे अत्यन्त मतवाले हो उठते हैं। वास्तवमें जो धनके मदसे उन्मत्त होता है, वह पतित होकर विवेक खो बैठता है। अतः सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों)-को अपना स्वरूप मानकर उनके प्रति अपने ही जैसा बर्ताव करना चाहिये। जिसकी सर्वत्र आत्मदृष्टि है, वह ऐश्वर्यसे मतवाला नहीं होता। जो सबके शरीरमें अपने ही जैसे सुख-दुःखका अनुभव करता हो, ऐसा ऐश्वर्यशाली पुरुष आज कहाँ है? इसलिये नन्दभद्रने ऐश्वर्यका जो सार ग्रहण किया था, वह भी सुनो। वे अपनी शक्तिके अनुसार सभी प्राणियोंकी सेवा करते थे, किसीकी भी सेवासे विमुख नहीं होते थे।

इस प्रकार इधर-उधर प्रकट हुए सारभूत सदाचारका संग्रह करके बुद्धिमान् नन्दभद्र उसीका पालन करते थे। इस आचरणसे रहनेवाले साधु-शिरोमणि नन्दभद्रके सद्व्यवहारकी देवतालोग भी स्पृहा रखते थे। इन्द्र आदि सब देवताओंको उनकी स्थिति देखकर बड़ा विस्मय होता था। इसी स्थानमें एक शूद्र भी रहता था, जो नन्दभद्रका पड़ोसी था। उसका नाम तो था सत्यव्रत, किंतु वह बड़ा भारी नास्तिक और दुराचारी था। धर्मपरायण नन्दभद्रपर बारंबार दोषारोपण किया करता था और सदा उनके दोष ही ढूँढ़ता रहता था। उसकी इच्छा थी, यदि इनका कोई छिद्र देख पाऊँ तो इन्हें धर्मसे गिरा दूँ। खोटे हृदयवाले क्रूर नास्तिकोंका यह स्वभाव ही होता है कि वे अपनेको तो नीचे गिराते ही हैं, दूसरोंको भी गिरानेकी चेष्टा करते हैं।

धार्मिक वृत्तिसे रहनेवाले बुद्धिमान् नन्दभद्रके वृद्धावस्थामें बड़े कष्टसे एक पुत्र हुआ, किंतु वह चल बसा। इसे प्रारब्धका फल मानकर उन महामति वैश्यने शोक नहीं किया। देवता हो या मनुष्य, प्रारब्धके विधानसे कौन छूट पाता है। तदनन्तर नन्दभद्रकी प्यारी पत्नी कनका, जो अरुन्धतीकी भाँति साध्वी स्त्रियोंके समस्त सद्गुणोंसे विभूषित तथा गृहस्थधर्मकी साक्षात् मूर्ति थी, सहसा मृत्युको प्राप्त हो गयी। नन्दभद्र जितेन्द्रिय थे; फिर भी पत्नीके न रहनेसे गृहस्थ-धर्मका नाश होगा, यह सोचकर उन्हें शोक हुआ।

नन्दभद्रका यह अन्तर देखकर सत्यव्रतको बहुत दिनोंके बाद बड़ी प्रसन्नता हुई। वह 'हाय-हाय! बड़े कष्टकी बात हुई' ऐसा कहता हुआ शीघ्र ही नन्दभद्रके पास आया और मित्रकी भाँति मिलकर उनसे बोला—'हा नन्दभद्र! यदि तुम-जैसे धर्मात्माको भी ऐसा फल मिला तो इससे मेरे मनमें यही आता है कि यह धर्म-कर्म व्यर्थ ही है। भाई नन्दभद्र! मैं सदा तुमसे कुछ कहना चाहता था, किंतु तुम्हारी ओरसे कोई प्रस्ताव न होनेके कारण मैंने कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि बिना किसी प्रस्तावके बृहस्पतिजी भी कोई बात कहें, तो उनकी बुद्धिकी अवहेलना होती है और उन्हें नीच पुरुषकी भाँति अपमान प्राप्त होता है। मैं वाणीके अठारह और बुद्धिके नौ दोषोंसे रहित सर्वथा निर्दोष वाक्य बोलूँगा। सूक्ष्मता, संख्या, क्रम, निर्णय और प्रयोजन—ये पाँच अर्थ जिसमें उपलब्ध होते हैं, उसे 'वाक्य' कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके उद्देश्यसे जो कुछ कहा जाता है, वह 'प्रयोजन' नामक वाक्य कहा गया है। यह वाक्यका प्रथम लक्षण है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें प्रतिज्ञा करके वाक्यके उपसंहारमें 'यही वह है' ऐसा कहकर जो विशेषरूपसे सिद्धान्त बताया जाता है, वह 'निर्णय' नामक वाक्य है। 'यह पहले और यह पीछे कहना चाहिये'—इस प्रकार क्रमविभागपूर्वक जो प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन किया जाता है, उसे वाक्यतत्त्वके ज्ञाता विद्वान् 'क्रमयोग' कहते हैं। जहाँ दोषों और गुणोंका

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यथावत् विभाग करके दोनोंके लिये प्रमाण उपस्थित किया जाय उसे 'संख्या' वाक्य समझना चाहिये। और जहाँ वाक्यके विभिन्न अर्थोंमें अभेद देखा जाता है, उस अतिशय अभेदकी प्रतीतिमें जो हेतु है; उसे ही 'सूक्ष्मता' कहते हैं। यह वाक्यके गुणोंकी गणना हुई। अब वाणीके अठारह दोषोंका वर्णन सुनो। अपेतार्थ, अभिन्नार्थ, अप्रवृत्त, अधिक, अश्लक्ष्ण, सन्दिग्ध, पदान्त अक्षरका गुरु होना, पराङ्मुखमुख, अनृत एवं असंस्कृत, त्रिवर्गविरुद्ध, न्यून, कष्टशब्द, अतिशब्द, व्युत्क्रमाभिहत, सशेष, अहेतुक तथा निष्कारण*—ये वाणीके दोष हैं। अब बुद्धिके दोषोंको सुनो। काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्जव (कुटिलता)—इन छः दोषोंसे युक्त होकर तथा दया, सम्मान और धर्म—इन तीन गुणोंसे हीन होकर मैं कोई बात न कहूँगा। (उक्त छः दोषोंके साथ दयाहीनता, सम्मानहीनता और धर्महीनता—ये तीन दोष और मिल जानेसे नौ दोष होते हैं।) जब वक्ता, श्रोता और वाक्य तीनों अविकल रहकर बोलनेकी इच्छामें समान अवस्थाको प्राप्त हों, तभी वक्ताका अभिप्राय यथावत् रूपसे प्रकट होता है। बातचीत करते समय जब वक्ता श्रोताकी अवहेलना करता है अथवा श्रोता ही वक्ताकी उपेक्षा करने लगता है, तब बोला हुआ वाक्य बुद्धिपथपर नहीं चढ़ता। इसके सिवा, जो सत्यका परित्याग करके अपनेको अथवा श्रोताको प्रिय लगनेवाला वचन बोलता है, उसके उस वाक्यमें सन्देह उत्पन्न होने लगता है; अतः वह वाक्य भी सदोष ही है। इसलिये जो अपनेको या श्रोताको प्रिय लगनेवाली बात छोड़कर केवल सत्य ही बोलता है, वही इस पृथ्वीपर यथार्थ वक्ता है, दूसरा नहीं।

शास्त्रोंके जालसे पृथक् हो मिथ्यावादोंको छोड़कर केवल सत्य कहना ही मेरा व्रत है। इसलिये मैं 'सत्यव्रत' कहलाता हूँ। मैं तुमसे सच्ची बात कहूँगा और तुम्हें भी उसे सत्य मानकर ही स्वीकार करना चाहिये। भलेमानुस ! जबसे तुम पत्थर पूजनेमें लग गये, तबसे तुम्हें कोई अच्छा फल मिला हो, ऐसा मैं नहीं देखता। तुम्हारे एक ही तो पुत्र था, वह भी नष्ट हो गया। पतिव्रता पत्नी थी, सो भी संसारसे चल बसी। साधो ! झूठे तथा कपटपूर्ण कर्मोंका ही ऐसा फल हुआ करता है। भैया ! देवता कहाँ हैं? सब मिथ्या है। यदि होते तो दिखायी न देते? यह सब कुछ कपटी ब्राह्मणोंकी झूठी कल्पना है। लोग पितरोंके उद्देश्यसे दान देते हैं, यह देखकर मुझे तो हँसी आती है। मेरी दृष्टिमें यह अन्नकी बरबादी है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा? मूर्ख एवं नीच ब्राह्मण, जो समस्त संसारकी सृष्टिका अनेक प्रकारसे वर्णन किया करते हैं, उसमें भी जो यथार्थ बात है उसे सुनो। संसारकी सृष्टि और संहार—ये दोनों बातें झूठी हैं। वास्तवमें यह जगत् सत्य है और इसी रूपमें सदा बना रहता है। यह विश्व स्वभावसे ही सदा वर्तमान


* जिस वाणीके उच्चारण करनेपर भी अर्थका भान न हो, वह 'अपेतार्थ' है। जिससे अर्थभेदकी स्पष्ट प्रतीति न हो, वह अभिन्नार्थ है। जो सदा व्यवहारमें न आता हो ऐसा शब्द 'अप्रवृत्त' कहा गया है। जिसके न रहनेपर भी वाक्यार्थ-बोध हो जाता है, वह वाक् या शब्द अधिक है। अस्पष्ट अथवा अपरिमार्जित वाणीको अश्लक्ष्ण कहते हैं। जिससे अर्थमें सन्देह हो वह सन्दिग्ध है। पदान्त अक्षरका गुरु उच्चारण भी एक दोष ही है। वक्ता जिस अर्थको व्यक्त करना चाहता है, उसके विपरीत अर्थकी ओर जानेवाली वाणीको पराङ्मुखमुख कहा गया है। अनृतका अर्थ है असत्य। व्याकरणसे सिद्ध न होनेवाली वाणीको असंस्कृत कहते हैं। धर्म, अर्थ और कामके विपरीत विचार प्रकट करनेवाली वाणी त्रिवर्ग-विरुद्ध कही गयी है। अर्थ-बोधके लिये पर्याप्त शब्दका न होना न्यून दोष है। जिसके उच्चारणमें क्लेश हो, वह कष्टशब्द है। अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दको यहाँ अतिशब्द कहा है। जहाँ क्रमका उल्लंघन करके शब्दप्रयोग हुआ हो, वह व्युत्क्रमाभिहत कहलाता है। वाक्य पूरा होनेपर भी यदि बात पूरी नहीं हुई तो वहाँ सशेष नामक दोष है। कथित अर्थकी सिद्धिके लिये जहाँ उचित तर्क या युक्तिका अभाव हो; वहाँ अहेतुक दोष है। जब किसी बातके कहे जानेका कोई कारण नहीं बताया गया हो अथवा किसी शब्दके प्रयोगका उचित कारण न हो, तब वहाँ निष्कारण दोष है।

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रहता है, ये सूर्य आदि ग्रह स्वभावसे ही आकाशमें विचरण करते हैं, स्वभावसे ही निरन्तर वायु चलती है, स्वभावसे ही मेघ पानी बरसाता है और स्वभावसे ही बोया हुआ धान्य जमता है। स्वभावसे ही पृथ्वी स्थिर है, स्वभावसे ही नदियाँ बहती हैं, स्वभावसे ही पर्वत अविचलभावसे सुशोभित हैं और स्वभावसे ही समुद्र अपनी मर्यादामें स्थित है। स्वभावसे ही गर्भवती स्त्री पुत्र पैदा करती है, स्वभावसे ही ये बहुतेरे जीव उत्पन्न होते हैं। जैसे स्वभावसे ही लोग टेढ़े होते हैं, ऋतुके स्वभावसे ही बेरोंमें काँटे पैदा होते हैं—उसी प्रकार स्वभावसे ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। इसका कोई प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला कर्ता नहीं है। इस प्रकार स्वभावसे ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं। ऐसी अवस्थामें भी मूर्ख मनुष्य इस विषयको लेकर मतवालेकी भाँति व्यर्थ मोहमें पड़ा रहता है। धूर्तलोग इस मनुष्ययोनिको भी जो सबसे श्रेष्ठ बतलाते हैं, इसकी भी पोल खोलता हूँ, सुनो। मनुष्ययोनिसे बढ़कर दूसरी किसी योनिमें कष्ट नहीं है। मनुष्योंको जो कष्ट है, वह हमारे शत्रुओंको भी न हो। मनुष्योंके समक्ष क्षण-क्षणमें शोकके सहस्रों स्थान आते हैं। यह मानवयोनि क्या है, बन्दीगृह है! कोई बड़भागी पुरुष ही इससे छुटकारा पाता है। ये पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े बिना किसी बन्धनके सुखपूर्वक विहार करते हैं; इनकी योनि अत्यन्त दुर्लभ है। ये स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) कितने निश्चिन्त हैं। पृथ्वीपर इन्हींका सुख महान् है। अधिक क्या कहें, मनुष्योंकी अपेक्षा अन्य योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले सभी जीव धन्य हैं। कोई स्थावर हैं, कोई कीड़े हैं, कोई पतंग हैं और कोई मनुष्य आदि जीवोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। इसमें स्वभावको ही प्रधान कारण समझो। पुण्य और पाप आदि तो कल्पनामात्र हैं। इसलिये नन्दभद्र! तुम मिथ्या-धर्मका परित्याग करके मौजसे खाओ, पीओ, खेलो और भोग भोगो। पृथ्वीपर, बस यही सत्य है।'

नारदजी कहते हैं—सत्यव्रतके इन वाक्योंसे, जो अशुभकर, अयुक्तिसंगत तथा असमंजस (दोषपूर्ण) थे, महाबुद्धिमान् नन्दभद्र तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे क्षोभरहित समुद्रकी भाँति गम्भीर थे। उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया—'सत्यव्रतजी! आपने जो यह कहा कि धर्मनिष्ठ मनुष्य सदा दुःखके भागी होते हैं, वह झूठ है। हम तो पापियोंपर भी बहुतेरे दुःख आते देखते हैं। संसारबन्धनजनित क्लेश तथा पुत्र और स्त्री आदिकी मृत्युके दुःख, पापी मनुष्योंके यहाँ भी देखे जाते हैं। इसलिये मेरे मतमें धर्म ही श्रेष्ठ है। किसी पुण्यात्मा साधुपुरुषपर संकट आया देखकर बड़े-बड़े लोग सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए यह कहते हैं कि 'अहो! ये तो साधु पुरुष हैं, इनपर कष्ट आया, यह तो हमारे लिये बड़े दुःखकी बात है' इत्यादि। पापियोंको तो यह सहानुभूति भी दुर्लभ है। स्त्री तथा धन आदिके लोभसे जब कोई पापी लुटेरा घरमें घुसता है, तो आप भी उससे डर जाते हैं; उसके प्रति द्वेषका परिचय देते हैं और उसके

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ऊपर क्रोध भी करते हैं। यह सब व्यर्थ ही तो है। दूसरी बात जो आप यह कहते हैं कि इस संसारका कारण कोई महान् ईश्वर नहीं है, यह भी बच्चोंकी-सी बात है। क्या प्रजा बिना राजाके रह सकती है? इसके सिवा जो आप यह कहते हैं कि तुम झूठे ही पत्थरके लिंगकी पूजा करते हो, इसके उत्तरमें मुझे इतना ही निवेदन करना है कि आप शिवलिंगकी महिमाको नहीं जानते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे अन्धा सूर्यके स्वरूपको नहीं जानता। ब्रह्मा आदि समस्त देवता, बड़े-बड़े समृद्धिशाली राजा, साधारण मनुष्य तथा मुनि भी शिवलिंगकी पूजा करते हैं। उनके द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिंग उन्हींके नामसे अंकित एवं प्रसिद्ध हैं, क्या ये सब-के-सब मूर्ख ही थे और अकेले आप सत्यव्रतजी ही बुद्धिमानीका ठेका लिये बैठे हैं? भगवान् विष्णु (राम) ने युद्धमें रावणको मारकर समुद्रके किनारे रामेश्वरलिंगकी स्थापना की है, क्या वह झूठा ही है? प्राचीन कालमें इन्द्रने वृत्रासुरका वध करके महेन्द्रपर्वतपर शिवलिंगको स्थापित किया, जिससे वृत्रवधके पापसे मुक्त होकर इन्द्र आज भी स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं! चन्द्रमाने पश्चिम समुद्रके तटपर प्रभासक्षेत्रमें भगवान् सोमनाथकी स्थापना करके आरोग्यलाभ किया था। यमराज और कुबेरने काशीमें, गरुड़ और कश्यपने सह्यपर्वतपर तथा वायु और वरुणने नैमिषारण्यक्षेत्रमें शिवलिंगको स्थापित किया है, जिससे वे सदा आनन्दमग्न रहते हैं। इसी स्तम्भतीर्थमें भगवान् स्कन्दने कुमारेश्वर-लिंगकी स्थापना की है, क्या वह समस्त पापोंका नाशक नहीं है? इसी प्रकार अन्य देवताओं, राजाओं और मुनियोंने जो-जो शिवलिंग स्थापित किये हैं, उनकी गणना करनेमें मैं असमर्थ हूँ। भूलोकवासी, स्वर्गलोकवासी तथा पातालनिवासी भी शिवलिंगके पूजनसे तृप्त होते हैं। आप जो यह कहते हैं कि देवता नहीं हैं और यदि हैं तो कहीं भी दिखायी क्यों नहीं देते? आपके इस प्रश्नसे मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। जैसे दरिद्रलोग द्वार-द्वार जाकर कुलथी माँगते हैं, उसी प्रकार क्या देवता भी आपके पास आकर याचना करें? भैया! आप बड़े बुद्धिमान् हैं, आप जो चाहते हैं उसकी सिद्धि तो आपके गुरु ही कर सकते हैं। यदि आपके मतमें सब पदार्थ स्वभावसे ही सिद्ध होते हैं, तो बताइये, कर्ताके बिना भोजन क्यों नहीं तैयार हो जाता? इसलिये जो भी निर्माण-कार्य है, वह अवश्य किसी-न-किसी कर्ताका ही है। जिस पदार्थमें जितनी निर्माणशक्ति विधाताने भर दी है, वह वैसा ही है। और आपने जो यह कहा है कि ये पशु आदि प्राणी ही सुखी तथा धन्य हैं, यह बात आपके सिवा और किसीने न तो कही है और न सुनी ही है। तमोगुणी और अनेक इन्द्रियोंसे रहित जो पशु-पक्षी आदि प्राणी हैं तथा उनके जो कष्ट हैं, वे भी यदि स्पृहणीय और धन्य हैं तो सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे युक्त मनुष्य श्रेष्ठ और धन्य क्यों नहीं? मैं तो समझता हूँ कि आपका जो यह अद्भुत सत्यव्रत है, इसे आपने नरक जानेके लिये ही संग्रह किया है। आपने पहले ही जो आडम्बरपूर्ण भूमिका बाँधकर अपने ज्ञानका परिचय देना आरम्भ किया है, उसीमें आपके इन वचनोंकी सारहीनता व्यक्त हो गयी है। क्योंकि मायावी लोग जब बोलने लगते हैं, तब उनकी बातें आडम्बरसे आच्छादित होती हैं। आपने प्रतिज्ञा तो की थी कुछ और कहनेके लिये, परंतु कह डाला कुछ और ही। इसमें आपका कोई दोष नहीं है, सब दोष मेरा ही है, जो मैं आपकी बात सुनता हूँ। नास्तिक, सर्प और विष इनका तो यह गुण ही है कि ये दूसरेको मोहित करते हैं। प्रतिदिन साधुपुरुषोंका संग करना धर्मका कारण है। इसलिये विद्वान्,

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वृद्ध, शुद्ध भाववाले तपस्वी तथा शान्तिपरायण संत-महात्माओंके साथ सम्पर्क स्थापित करना चाहिये। नीच, अज्ञानी तथा आत्मज्ञानसे रहित पुरुषोंका संग नहीं करना चाहिये। जिनके कुल, विद्या और कर्म तीनों शुद्ध हों और जिन्हें शास्त्रका ज्ञान हो, ऐसे पुरुषोंका विशेषरूपसे सेवन करना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंके दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, एक आसनपर बैठने तथा एक साथ भोजन करनेसे धार्मिक आचार नष्ट होते हैं और मनुष्योंको सिद्धि नहीं प्राप्त होती। नीचोंके संगसे पुरुषोंकी बुद्धि नष्ट होती है, मध्यमश्रेणीके लोगोंके साथ उठने-बैठनेसे बुद्धि मध्यम स्थितिको प्राप्त होती है और श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ समागम होनेसे बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है।* इस धर्मका स्मरण करके मैं पुनः आपसे मिलनेकी इच्छा नहीं रखता, क्योंकि आप सदा ब्राह्मणोंकी ही निन्दा करते हैं। वेद प्रमाण हैं, स्मृतियाँ प्रमाण हैं तथा धर्म और अर्थसे युक्त वचन प्रमाण हैं, परंतु जिसकी दृष्टिमें ये तीनों ही प्रमाण नहीं हैं, उसकी बातको कौन प्रमाण मानेगा?

महात्मा नन्दभद्र सत्यव्रतसे ऐसा कहकर उसी समय सहसा घरसे निकल पड़े और भगवान् भट्टादित्यके परम पावन बहूदक तीर्थमें जा पहुँचे।


## नन्दभद्र और बालकका संवाद, बालादित्यकी स्थापना और नन्दभद्रकी मुक्ति

नारदजी कहते हैं—तदनन्तर परम बुद्धिमान् नन्दभद्र बहूदक कुण्डके तटपर वर्तमान कपिलेश्वर-लिंगकी पूजा करके प्रणामपूर्वक हाथ जोड़कर भगवान्‌के आगे खड़े हुए। संसारके चरित्रोंसे उनके मनमें कुछ दुःख हो गया था। इसलिये उन्होंने दुःखी होकर यह गाथा गायी—यदि इस संसारकी सृष्टि करनेवाले भगवान् सदाशिवको मैं देख पाऊँ, तो अनेक प्रश्नोंके साथ उनसे तुरंत यह प्रश्न करूँगा कि भगवन्! क्या आपके उत्पन्न किये बिना ही यह अनेक रूपोंमें उपलब्ध होनेवाला निरीह संसार भरता चला जा रहा है? आप चेतन हैं, शुद्ध हैं और राग आदि दोषोंसे रहित हैं, तो भी आपने जो अखिल विश्वकी सृष्टि की है, उसे अपने समान ही चेतन, विशुद्ध एवं राग आदि दोषोंसे रहित क्यों नहीं बनाया? क्यों जड़ बना दिया? आप तो निर्वैर और समदर्शी हैं; फिर आपका बनाया हुआ यह जगत् सुख-दुःख और जन्म-मरण आदिसे क्लेश क्यों पा रहा है? संसारके ऐसे चरित्रसे मैं मोहित हो गया हूँ। अतः अब किसी दूसरे स्थानपर नहीं जाऊँगा, भोजन नहीं करूँगा और पानी भी नहीं पीऊँगा। उपर्युक्त बातोंका चिन्तन करता हुआ मृत्युपर्यन्त यहीं खड़ा रहूँगा। इस प्रकार विचार करते हुए नन्दभद्र वहीं खड़े रहे। तत्पश्चात् उसके चौथे दिन कोई सात वर्षका बालक पीड़ासे पीड़ित होकर बहूदकके सुन्दर तटपर आया। वह बहुत ही दुर्बल तथा गलित कुष्ठका रोगी था। उसे पग-पगपर पीड़ाके मारे मूर्च्छा आ जाती थी। उस बालकने बड़े क्लेशसे अपनेको सँभालकर नन्दभद्रसे कहा—‘अहो! आपके तो सभी अंग सुन्दर और स्वस्थ हैं, फिर भी आप दुःखी क्यों हैं?’ उसके पूछनेपर नन्दभद्रने अपने दुःखका सब कारण कह सुनाया। वह सब सुनकर बालकने दुःखी होकर कहा—

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\* बुद्धिश् च हीयते पुंसां नीचैस्सह समागमात् । मध्यस्थैर्मध्यतां याति श्रेष्ठतां याति चोत्तमैः ॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४०।२८)

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'अहो! इस बातसे मुझे बड़ा भयंकर कष्ट हो रहा है कि विद्वान् पुरुष भी अपने कर्तव्यको नहीं समझ पाते हैं। जिसका शरीर सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे युक्त और स्वस्थ है, वह भी व्यर्थ मरनेकी इच्छा रखता है। जहाँ राजा खट्वांगने दो ही घड़ीमें मोक्षका मार्ग प्राप्त कर लिया, उसी भारतवर्षको आयु रहते कौन त्याग सकता है। मैं तो अपनेको ही दृढ़ मानता हूँ; क्योंकि मेरे माता-पिता कोई नहीं हैं, मुझमें चलनेकी भी शक्ति नहीं है, तथापि मैं मरना नहीं चाहता हूँ। धैर्यवान्‌को सभी लाभ प्राप्त होते हैं, यह श्रुतिका वचन सत्य हैं। आपको तो श्रुतिके इस कथनसे सन्तोष धारण करना ही उचित है; क्योंकि आपका यह शरीर अभी दृढ़ है। यदि मेरा भी शरीर किसी प्रकार नीरोग हो जाय, तो मैं एक-एक क्षणमें वह सत्कर्म करूँ, जिसको एक-एक युगमें भोगा जा सकता है। इन्द्रियाँ जिसके वशमें हों और शरीर जिसका दृढ़ हो, वह भी यदि साधनके सिवा और किसी वस्तुकी इच्छा करे, तो उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है? मूर्ख मनुष्यको ही प्रतिदिन शोकके सहस्रों और हर्षके सैकड़ों स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान् पुरुषको नहीं।* जो ज्ञानके विरुद्ध हों, जिनमें नाना प्रकारके विनाशकारी विघ्न प्राप्त हों तथा जो मूलका ही उच्छेद कर डालनेवाले हों, ऐसे कर्मोंमें आप-जैसे बुद्धिमान् पुरुषोंकी आसक्ति नहीं होती। आठ अंगोंवाली जिस बुद्धिको सम्पूर्ण श्रेयकी सिद्धि करनेवाली बताया गया है, वह वेदों और स्मृतियोंके अनुकूल चलनेवाली निर्मल बुद्धि आपके भीतर मौजूद है। इसलिये आप-जैसे लोग दुर्गम संकटोंमें तथा स्वजनोंकी विपत्तियोंमें भी शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे पीड़ित नहीं होते। पण्डितोंकी-सी बुद्धिवाले विवेकी मनुष्य प्राप्त होने योग्य वस्तुकी भी अभिलाषा नहीं करते, नष्ट हुई वस्तुके लिये शोक करना नहीं चाहते तथा आपत्तियोंमें मोहित नहीं होते हैं। सम्पूर्ण जगत् मानसिक और शारीरिक दुःखोंसे पीड़ित है। उन दोनों प्रकारके दुःखोंकी शान्तिका उपाय विस्तारपूर्वक और संक्षेपसे भी सुनिये। रोग, अनिष्ट वस्तुकी प्राप्ति, परिश्रम तथा अभीष्ट वस्तुके वियोग—इन चार कारणोंसे शारीरिक और मानसिक दुःख उत्पन्न होते हैं। अप्रियका संयोग और प्रियका वियोग—यह दो प्रकारका मानसिक महाकष्ट बताया गया है। इस प्रकार यहाँ शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकारका दुःख बताया गया। जैसे लोहपिण्डके तप जानेसे उसपर रखा हुआ घड़ेका जल भी गरम हो जाता है, उसी प्रकार मानसिक दुःखसे


* शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४१। २३)

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १८९

शरीरको भी सन्ताप होता है। अतः शीघ्र ही औषध आदिके द्वारा उचित प्रतीकार करनेसे व्याधि अर्थात् शारीरिक दुःखका और सर्वदा परित्याग करनेसे आधि अर्थात् मानसिक दुःखका शमन होता है। इन दो क्रियायोगोंसे व्याधि और आधिकी शान्ति बतायी गयी है। इसलिये जैसे जलसे आगको बुझाया जाता है, उसी प्रकार ज्ञानसे मानसिक दुःखको शान्त करे। मानसिक दुःखके शान्त होनेपर मनुष्यका शारीरिक दुःख भी शान्त हो जाता है। मनके दुःखकी जड़ है स्नेह। स्नेहसे ही प्राणी आसक्त होता है और दुःख पाता है। स्नेहसे दुःख और स्नेहसे ही भय उत्पन्न होते हैं। शोक, हर्ष तथा आयास—सब कुछ स्नेहसे ही होता है। स्नेहसे इन्द्रियराग तथा विषयरागका जन्म हुआ है, ये दोनों ही श्रेयके विरोधी हैं। इनमें पहला अर्थात् इन्द्रियराग भारी माना गया है। इसलिये जो स्नेह या आसक्तिका त्यागी, निर्वैर तथा निष्परिग्रह होता है, वह कभी दुःखी नहीं होता। जो त्यागी नहीं है, वह इस संसारमें बार-बार जन्म-मृत्युको प्राप्त होता है। इस कारण मित्रोंसे तथा धनसंग्रहसे होनेवाले स्नेहमें कभी लिप्त न हो और अपने शरीरके प्रति होनेवाले स्नेहका ज्ञानद्वारा निवारण करे। ज्ञानी, सिद्ध, शास्त्रज्ञ और जितात्मा—इनमें स्नेहजनित आसक्ति नहीं होती। ठीक वैसे ही, जैसे कमलके पत्तोंमें पानी नहीं सटता। रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर खींचता है, फिर उसके मनमें भोगकी इच्छा उत्पन्न होती है, उस इच्छासे ही तृष्णा या लोभकी उत्पत्ति होती है। तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ और सदा उद्वेगमें डालनेवाली मानी गयी है। इसके द्वारा बहुत-से अधर्म होते हैं। तृष्णाका रूप भी बड़ा भयंकर है। वह सबके मनको बाँधनेवाली है। खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंके द्वारा बड़ी कठिनाईसे जिसका त्याग हो पाता है, जो इस शरीरके वृद्ध होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणान्तकारी रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है।* तृष्णाका आदि और अन्त नहीं है। जैसे लोहेकी मैल लोहेका नाश करती है, उसी प्रकार तृष्णा मनुष्योंके शरीरके भीतर रहकर उनका विनाश करती है।

नन्दभद्र बोले—शुद्ध बुद्धिवाले बालक! यह क्या बात है कि पापी मनुष्य भी निरापद होकर स्त्री और धनके साथ आनन्दमग्न देखे जाते हैं?

बालकने कहा—यह तो बहुत स्पष्ट है। जिन्होंने पूर्वजन्मोंमें तामसिक भावसे दान दिया है, उन्होंने इस जन्ममें उसी दानका फल प्राप्त किया है। परंतु तामसभावसे जो कर्म किया गया है, उसके प्रभावसे उन लोगोंका धर्ममें कभी अनुराग नहीं होता। ऐसे मनुष्य पुण्य-फलको भोगकर अपने तामसिक भावके कारण नरकमें ही जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। इस संशयके विषयमें मार्कण्डेयजीने पूर्वकालमें जो बात कही है, वह इस प्रकार सुनी जाती है—एक मनुष्य ऐसा है, जिसके लिये इस लोकमें तो सुखका भोग सुलभ है, परंतु परलोकमें नहीं। दूसरा ऐसा है, जिसके लिये परलोकमें सुखका भोग सुलभ है, किंतु इस लोकमें नहीं। तीसरा ऐसा है, जिसके लिये इस लोकमें और परलोकमें भी सुखभोग प्राप्त होता है और एक चौथे प्रकारका मनुष्य ऐसा है, जिसके लिये न तो इस लोकमें सुख है और न परलोकमें ही। जिसका पूर्वजन्ममें किया हुआ पुण्य शेष है, उसीको वह भोगता है


* तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी मता। अधर्मबहुला चैव घोररूपानुबन्धिनी ॥
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। यासौ प्राणान्तको रोगस्तां तृष्णां त्यजतस्सुखम् ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४१। ४०-४१)

१९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


और नूतन पुण्यका उपार्जन नहीं करता, उस मन्दबुद्धि एवं भाग्यहीन मानवको प्राप्त हुआ वह सुखभोग केवल इसी लोकके लिये बताया गया है। जिसका पूर्वजन्मोपार्जित पुण्य नहीं है, किंतु वह तपस्या करके नूतन पुण्यका उपार्जन करता है, उस बुद्धिमान्‌को परलोकमें सदा ही सुखका भोग प्राप्त होता है। जिसका पहलेका किया हुआ पुण्य भी वर्तमान है और तपस्यासे नूतन पुण्यका भी उपार्जन हो रहा है, ऐसा बुद्धिमान् कोई-ही-कोई होता है, जिसे इहलोकमें और परलोकमें भी सुख-भोग प्राप्त होता है। जिसका पहलेका भी पुण्य नहीं है और इस लोकमें भी जो पुण्यका उपार्जन नहीं करता, ऐसे मनुष्यको न इहलोकमें सुख मिलता है न परलोकमें ही। उस नराधमको धिक्कार है। हे महाभाग! ऐसा जानकर सब कार्योंका त्याग करके भगवान् सदाशिवका भजन और वर्णधर्मका पालन कीजिये। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्म नहीं है। जो अपने मनोरथोंके नष्ट होने तथा प्राप्त होनेपर भी शोक करता है, अथवा जो भोगोंसे तृप्त नहीं होता, वह निश्चय ही दूसरे जन्ममें बन्धनमें पड़ता है।

नन्दभद्र बोले—हे बालक! आप बालरूपमें उपस्थित होनेपर भी वास्तवमें बालक नहीं हैं, बड़े बुद्धिमान् हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मैं बड़े विस्मयमें पड़ा हूँ और आप कौन हैं, यह यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। मैंने बहुत-से वृद्ध पुरुषोंका दर्शन और सत्संग लाभ किया है, किंतु उन सबकी ऐसी बुद्धि न तो मैंने देखी है और न सुनी ही है। आपने तो मेरे जन्मभरके सन्देह खेल-खेलमें ही नष्ट कर दिये। अतः आप कोई साधारण बालक नहीं हैं, यह मेरा निश्चित मत है।

बालकने कहा—यह बड़ी लम्बी कथा है। एकाग्रचित्त होकर सुनिये। इससे पहले आठवें जन्ममें मैं विदिशा नगरके भीतर ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरा नाम धर्मजालिक था। मैं वेद-वेदान्तोंका तत्त्वज्ञ, धर्मशास्त्रोंके अर्थ जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ तथा साक्षात् बृहस्पतिके समान धर्मशास्त्रोंका व्याख्याता था। लोगोंके लिये तो मैं नाना प्रकारके धर्मोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करता था, परंतु स्वयं अत्यन्त दुराचारी तथा पापियोंमें भी सबसे बड़ा पापिराज था। मांस खाता, मदिरा पीता और परायी स्त्रियोंके साथ सदा रमण किया करता था। झूठा, दम्भी, पाखण्डी, दुष्ट, लोभी, दुरात्मा और शठ—इन सभी विशेषणोंसे मैं विभूषित था। कभी और कहीं भी कोई सत्कर्म नहीं करता था। जाली पुरुषोंकी भाँति लोगोंको केवल जाल सिखाता था। इसलिये मेरे यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले लोग मुझे धर्मजालिक कहते थे। इस प्रकार मैंने बहुत-से पातक बटोरे। फिर अन्तकाल आनेपर मृत्युके पश्चात् मैं यमलोकमें गया और वहाँ मुझे कूटशाल्मलि नामक नरकमें गिराया गया। पुनः यमदूत मुझे अपने कुकृत्योंका स्मरण दिलाते हुए इधर-उधर घसीटने लगे। मैं कभी तलवारोंसे काटा जाता और कभी कुत्तोंसे नुचवाया जाता था। इस दशामें वहाँ प्रतिक्षण जीता और मरता रहा अर्थात् बार-बार मूर्च्छित होता था। उस समय अनेक प्रकारसे अपनी निन्दा करता हुआ मैं बहुत वर्षोंतक पड़ा रहा। धर्मराजके दूतोंद्वारा पीड़ित होनेपर नरकमें जैसी बुद्धि होती है, वही यदि यहाँ दो घड़ी भी रह जाय, तो मनुष्य धन्य-धन्य हो जाय। तदनन्तर अत्यन्त यातना भोगनेके पश्चात् यमदूतोंने मुझे किसी प्रकार छोड़ा। फिर स्थावर-योनिमें जाकर अनेक प्रकारके क्लेशोंका उपभोग करके मैं सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर एक कीड़ा हुआ। कीड़ेकी योनिमें रहते समय एक दिन मैं मार्गमें सुखपूर्वक सो रहा था। इतनेहीमें वहाँ अकस्मात् आते हुए रथकी घरघराहट मुझे बड़े जोरसे सुनायी पड़ी। उस आवाजको सुनकर मैं डर गया और सहसा मार्ग छोड़कर बड़े वेगसे दूर भागने लगा। उसी बीचमें इच्छानुसार घूमते

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *१९१

हुए भगवान् वेदव्यास उधर आ निकले। मुनिवर व्यासने वहाँ उस अवस्थामें पड़े हुए मुझे कृपापूर्वक देखा। ब्राह्मणजन्ममें मैंने सब लोगोंको जो नाना प्रकारके धर्मोंका उपदेश किया था, उसीके प्रभावसे उस कीट जन्ममें मुझे व्यासजीका संग प्राप्त हुआ। वे सब जीवोंकी भाषा जानते हैं, उन्होंने कीड़ेकी भाषामें मुझसे कहा—'ओ कीट! क्यों इस प्रकार भागा जा रहा है? किसलिये मृत्युसे इतना डरता है? अहो!

मनुष्यको यदि मृत्युसे भय हो तो उचित हो सकता है, तू तो कीट है। तुझे इस शरीरके छूटनेका इतना भय क्यों है?'

व्यासजीके ऐसा कहनेपर पूर्वपुण्यके प्रभावसे मेरी भी बुद्धि जाग्रत् हुई। तब मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—'विश्ववन्द्य मुनीश्वर! मुझे इस मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं, मेरे मनमें यही भय है कि मैं इससे भी नीच योनिमें न चला जाऊँ। इस कुत्सित कीटयोनिसे भी अधम दूसरी करोड़ों योनियाँ हैं। उनमें गर्भ आदि धारणके क्लेशसे मुझे डर लगता है और किसी कारणसे मैं भयभीत नहीं हूँ।'

व्यासजी बोले—कीट! तू भय न कर, जबतक तुझे ब्राह्मणशरीरमें न पहुँचा दूँगा, तबतक सभी योनियोंसे शीघ्र ही छुटकारा दिलाता रहूँगा।

व्यासजीके ऐसा कहनेपर उन जगद्गुरुको प्रणाम करके मैं पुनः मार्गमें लौट आया और रथके पहियेसे दबकर मृत्युको प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् कौवे और सियार आदि योनियोंमें मैं जब-जब उत्पन्न हुआ, तब-तब व्यासजीने आकर मुझे पूर्वजन्मका स्मरण करा दिया। तदनन्तर बहुत-सी योनियोंमें भ्रमण करके अत्यन्त क्लेश भोगता हुआ मैं अब अन्तमें ब्राह्मणके घरमें आकर इस मानव-योनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। इसमें जन्म लेकर भी अत्यन्त दुःखी हूँ। जन्मसे ही पिता-माताने मुझे अकेला छोड़ दिया। मेरे शरीरमें गलित कोढ़का रोग हो गया है। इसके कारण मैं बड़ी भारी पीड़ाका अनुभव करता हूँ। जब मैं पाँच वर्षका हुआ, तभी व्यासजीने आकर मेरे कानमें सारस्वत-मन्त्रका उपदेश कर दिया। उसके प्रभावसे मुझे बिना पढ़े ही वेदों, शास्त्रों तथा सम्पूर्ण धर्मोंका स्मरण हो आया। फिर व्यासजीने ही मुझे यह आज्ञा दी कि तुम भगवान् कार्तिकेयके क्षेत्रमें जाओ और वहाँ महामति नन्दभद्रको आश्वासन दो। इसके बाद बहूदक तीर्थमें प्राणत्याग करके महीसागरसंगमके जलमें अपनी हड्डियाँ डलवा दो। उसके बाद तुम भावी जन्ममें 'मैत्रेय' नामक श्रेष्ठ मुनि होओगे। मुनि होनेके पश्चात् तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा।

स्वयं व्यासजीने इस प्रकार मुझसे कहा है, इसलिये मैं भारवाहकोंकी सहायतासे अत्यन्त क्लेश उठाकर इस तीर्थमें आया हूँ। इस प्रकार आपसे मैंने अपना सब चरित्र कह सुनाया। नन्दभद्रजी! पाप इस प्रकार कष्टदायक होता है, अतः आप सदा ही उसका त्याग करें।

नन्दभद्र बोले—अहो! आपका यह चरित्र

१९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बड़ा अद्भुत है। इससे मेरे हृदयमें पुनः धर्मके लिये सौगुनी दृढ़ता आ गयी है। परंतु आपने जो मुझे धर्मका उपदेश किया है, उसके बदलेमें मैं आपकी कोई सेवा करना चाहता हूँ। अतः आप धर्मका स्मरण कीजिये और मुझे कोई निश्चित आदेश दीजिये।

बालकने कहा—नन्दभद्रजी ! मैं इस तीर्थमें एक सप्ताहतक निराहार रहकर भगवान् सूर्यके मन्त्रोंका जप करूँगा। तत्पश्चात् शरीर त्याग दूँगा। उसके बाद आप बर्करिका तीर्थमें ले जाकर मेरे शरीरका दाह कर दीजियेगा और मेरी सब हड्डियाँ इसी तीर्थमें डाल दीजियेगा। इस बहूदक तीर्थमें जहाँ मैं प्राणत्याग करूँगा, वहाँ मेरे नामसे भगवान् सूर्यकी स्थापना भी कर दीजियेगा। भगवान् सविता सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, द्विजोंके तो वे सर्वस्व ही हैं। सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंने भगवान् सूर्यकी महिमाका गान किया है। आप भी सदा इन सूर्यभगवान्‌का भजन और इस बहूदक कुण्डका सेवन करते रहें। व्यासजीके बताये अनुसार इस तीर्थका संक्षिप्त माहात्म्य भी मैं आपको बता रहा हूँ। जो मनुष्य माघमासकी सप्तमी तिथिको बहूदक तीर्थमें स्नान करके पितरोंको पिण्डदान देता है, उनके वे पितर अक्षय तृप्तिको प्राप्त होते हैं। बहूदक तीर्थके किनारे पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ भी दिया जाता है, वह अक्षय होकर उनके समीप पहुँच जाता है। बहूदक कुण्डमें किया हुआ स्नान, दान, जप; होम, स्वाध्याय और पितृ-तर्पण सब महान् फल देनेवाले होते हैं।

नारदजी कहते हैं—यों कहकर वह बालक मौन हो गया और बहूदक कुण्डमें स्नान करके पवित्र हो तटवर्ती वृक्षके नीचे बैठकर स्वयं सूर्य-मन्त्रोंका जप करने लगा। सातवीं रात्रि व्यतीत होनेपर बालकने प्राण त्याग दिये। फिर नन्दभद्रने बालकके कथनानुसार ब्राह्मणोंद्वारा उसके शवका विधिपूर्वक दाहसंस्कार करवाया। सूर्यमन्त्रके जपमें लगे हुए उस बालकने जहाँ प्राणत्याग किये थे, वहाँ नन्दभद्रने बालादित्यके नामसे विख्यात भगवान् सूर्यकी प्रतिमा स्थापित की। जो बहूदकमें स्नान करके बालादित्यका पूजन करता है, उसपर भगवान् सूर्य प्रसन्न होते हैं और वह मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है।

तदनन्तर नन्दभद्रने भी दूसरी स्त्रीसे विवाह करके उसके गर्भसे अपने ही समान अनेक पुत्र उत्पन्न किये। वे सदा भगवान् शिव तथा सूर्यकी उपासनामें लगे रहे। अन्तमें उन्होंने भगवान् शिवका सारूप्य प्राप्त किया, जिससे फिर इस संसारमें लौटना नहीं होता। इस प्रकार यह महाकुण्ड बहूदकके नामसे विख्यात हुआ है। जो श्रद्धापूर्वक इस तीर्थके माहात्म्यको सुनता है, उसपर भगवान् सूर्य प्रसन्न होते हैं तथा वह अपने हृदयमें मोक्षका चिन्तन करते हुए भवसागरसे मुक्त हो जाता है।


महीसागरसंगमतीर्थकी रक्षा करनेवाली देवियोंका परिचय

नारदजी कहते हैं—अर्जुन ! तदनन्तर मैंने इस तीर्थकी रक्षाके लिये देवियोंकी आराधना करके जिस प्रकार उन्हें यहाँ स्थापित किया वह प्रसंग सुनो। जैसे सबके आत्मा परमेश्वर सब भूतोंमें व्यापक हैं, उसी प्रकार उनकी शक्ति परमेश्वरी प्रकृति भी नित्य एवं व्यापक है। शक्तिके प्रसादसे मनुष्य सुख और समस्त सम्पदाओंको प्राप्त करता है। अर्जुन! भगवती ईश्वरी सम्पूर्ण भूतोंमें इस प्रकार स्थित है—बुद्धि, ह्री, पुष्टि, लज्जा, तुष्टि, शान्ति, क्षमा, स्पृहा, श्रद्धा, चेतना, मन्त्रशक्ति, उत्साहशक्ति तथा प्रभुशक्ति—इन सब रूपोंमें परमेश्वरी शक्ति ही सर्वव्यापक है। यही अविद्यारूपसे बन्धनका और विद्यारूपसे मोक्षका कारण होती है। सदा इसीकी

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९३

आराधना करके इन्द्र आदि देवताओंने ऐश्वर्य प्राप्त किया है। भगवती शक्ति ही परा प्रकृति है। वही अनेक भेदों (भिन्न-भिन्न अनेक रूपों)-में स्थित है। इसलिये मैंने जिन महादेवियोंको जहाँ स्थापित किया है, वह सुनो। चारों दिशाओंमें चार महाशक्तियोंकी स्थापना की गयी है। पूर्व दिशामें स्कन्दस्वामीके द्वारा सिद्धाम्बिकाकी स्थापना हुई है, उन्हींको सृष्टिकी आदिमें प्रकट हुई मूलप्रकृति कहते हैं। सिद्धोंने उनकी आराधना की है, इसलिये उनका नाम सिद्धाम्बिका है। दक्षिण दिशामें तारादेवी विराजमान हैं, उनकी स्थापना मैंने ही की है। ये वही तारा हैं जिन्होंने देवताओंको तारनेके लिये भगवान् कच्छपका आश्रय लिया है। उन्हींके आवेशसे युक्त होनेके कारण जगद्गुरु भगवान् कूर्मने देवताओंका उद्धार किया। ये गिरिराजनन्दिनी तारा बड़ी आराधनाके बाद मेरे द्वारा यहाँ लायी गयी हैं। ये करोड़ों देवियोंसे घिरी हुई बड़ी उग्र देवी हैं। मेरे प्रति आदरका भाव होनेके कारण मेरी प्रार्थनासे दक्षिण दिशामें आकर रहती हैं। इसी प्रकार पश्चिम दिशामें शुभस्वरूपा भास्वरादेवी स्थित हैं, जिनसे व्याप्त होकर सूर्य आदि मण्डल प्रकाशित होते हैं। जिनकी शक्तिसे सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल सब ओर आते-जाते हैं, वे भास्वरादेवी ही हैं। वे बड़ी प्रबल शक्ति हैं। मैं आराधना करके ब्रह्माण्डकटाहसे उन्हें यहाँ लाया हूँ। वे कोटि देवियोंसे आवृत होकर यहाँ रहती हैं और सदा पश्चिम दिशाकी रक्षा करती हैं। उत्तर दिशामें योगनन्दिनीदेवीका निवास है, जो पूर्वकालमें भगवती पराप्रकृतिके शरीरसे प्रकट हुईं तथा जिनकी निर्मल दृष्टिसे देखे जानेपर चारों सनकादिकोंने योग प्राप्त कर लिया। इसीलिये सनकादि महात्माओंने उन्हें 'योगेश्वरी' कहा है। उन्हें भी मैं आराधना करके अण्डकटाहसे ही लाया हूँ। वे योगिनियोंसे घिरी हुई यहाँ उत्तर दिशामें निवास करती हैं। इस प्रकार ये चार महाशक्तियाँ इस तीर्थमें सदा स्थित रहती हैं।

तदनन्तर मैं नौ दुर्गाओंको भी यहाँ ले आया, उनका परिचय सुनो। त्रिपुरा नामसे प्रसिद्ध एक उच्चकोटिकी देवी हैं, जिनसे आविष्ट होकर जगदीश्वर भगवान् शिवने त्रिपुरासुरको भस्म किया था। इसीलिये भगवान् हरने त्रिपुरा कहकर स्वयं देवी दुर्गाका स्तवन किया। अतः वे सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय हैं, मैं उनकी आराधना करके उन्हें अमरेश पर्वतसे यहाँ लाया हूँ। भक्तोंकी मनोवांछित कामनाएँ पूर्ण करनेवाली वे त्रिपुरादेवी भट्टादित्यके समीप विराजमान हैं। इनके सिवा दूसरी कोलम्बा नामकी देवी हैं, जो सनातन महाशक्ति हैं। उन्हींके आवेशसे युक्त होकर वाराहरूपधारी भगवान् विष्णुने इस पृथ्वीको जलसे ऊपर उठाया था। इसीलिये भगवान् विष्णुने कोलम्बा नामसे उनकी स्तुति और पूजा की है। अर्जुन! मैंने शक्तियोगसे कोलम्बादेवीको प्रसन्न किया है। वे वाराह गिरिपर निवास करती हैं, वहींसे मैं उनको यहाँ लाया हूँ। तीसरी दुर्गा भी इस पूर्व दिशामें ही स्थित हैं, उनका नाम कपालेशा है। मैंने और कार्तिकेयजीने उनकी स्थापना की है। उनके प्रभावका वर्णन पहले किया जा चुका है। वे नरश्रेष्ठ धन्य हैं जो कपालेश्वरकी पूजा करके उन कपालेशा देवीका नित्य दर्शन करते हैं। वे सम्पूर्ण विश्वकी शक्ति हैं, इस प्रकार तीन दुर्गाएँ पूर्व दिशामें विराज रही हैं। अब पश्चिम दिशामें जो परम उत्तम तीन दुर्गाएँ सुशोभित हैं, उनका वर्णन करूँगा। पश्चिममें जो सुवर्णाक्षीदेवी हैं, वे समस्त ब्रह्माण्डका भलीभाँति पालन करनेवाली हैं। मैंने बड़ी आराधना करके इस तीर्थमें उन्हें विराजमान किया है। जो उन्हें प्रणाम तथा भक्तिपूर्वक उनका पूजन करते हैं, वे तैंतीस करोड़ देवियोंके समादरके पात्र होते हैं। पश्चिममें दूसरी महादुर्गा चर्चिता भी निवास करती

१९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


हैं। उन्हें मैंने बड़ी भक्तिके साथ प्रार्थना करके रसातलसे यहाँ बुलाया है। उसी दिशामें त्रैलोक्य-विजया नामसे प्रसिद्ध तीसरी महादुर्गाका भी निवास है, जिनकी आराधना करके रोहिणीवल्लभ चन्द्रमाने त्रिभुवनमें विजय प्राप्त की थी। उनको मैं सोमलोकसे लाया हूँ। वे पूजित होनेपर सदा विजय देनेवाली हैं।

अब उत्तर दिशामें निवास करनेवाली देवियोंका परिचय सुनो। उत्तरमें भी एकवीरा आदि तीन देवियाँ स्थित हैं। एकवीरा देवी पूजन तथा आराधन करनेपर मनुष्योंको उनकी समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करती हैं। अर्जुन! उन्हें मैं बड़ी आराधनाके बाद ब्रह्मलोकसे लाया हूँ। उनका नामकीर्तन भी दुष्टोंका विनाश करनेवाला है। दूसरी हरसिद्धि नामवाली दुर्गादेवी हैं, जो बड़ी बलवती हैं। उन्हें मैं शाकोत्तर नामक स्थानसे आराधना करके लाया हूँ। जो लोग हरसिद्धिकी उपासनामें तत्पर रहनेवाले हैं, उनके पास डाकिनी आदि नहीं जातीं। तीसरी दुर्गा चण्डिका देवी ईशान कोणमें स्थित हैं। वे ही नवीं दुर्गा हैं। उन्होंने पार्वतीके शरीरसे निकलकर रोषपूर्वक चण्ड-मुण्ड नामक महान् असुरोंका संहार किया था। जो थोड़ी या बहुत सामग्रीके द्वारा कात्यायनी देवीका पूजन करते हैं, उन्हें करोड़ों देवियोंसे घिरी हुई वे दुर्गादेवी ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। जो मनुष्य देवीको प्रणाम करता है, वह सब प्रकारके अरिष्टोंसे छुटकारा पा जाता है।


## उभय सोमनाथके प्रादुर्भावकी कथा और कमठके द्वारा गर्भवास तथा मानव-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन

नारदजी कहते हैं—अब मैं सोमनाथकी महिमाका स्पष्ट रूपसे वर्णन करूँगा। जो इसका श्रवण और कीर्तन करता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। अर्जुन! पहलेकी बात है। त्रेतायुगमें गौड़ देशके भीतर दो महातेजस्वी ब्राह्मण थे। एकका नाम था 'ऊर्जयन्त' और दूसरेका 'प्रालेय'। उन दोनोंने एक दिन पुराणमें एक श्लोक देखा। वे शास्त्रोंके ज्ञाता थे। वह श्लोक देखकर उनके शरीरमें रोमांच हो आया। श्लोक इस प्रकार था—

> प्रभासाद्यानि तीर्थानि पुलस्त्यायाह पद्मभूः।  
> न यैस्तत्राप्लुतञ्चैव न तैस्तीर्थमुपासितम् ॥  

'ब्रह्माजीने पुलस्त्य मुनिसे प्रभास आदि तीर्थोंका वर्णन किया है। जिन्होंने इनमें डुबकी नहीं लगायी, उन्होंने तीर्थोंका सेवन नहीं किया।'

यह श्लोक पढ़कर वे बार-बार इसे दुहराने लगे। तदनन्तर वे दोनों ब्राह्मण प्रभासस्नानके लिये घरसे निकले और वनों एवं नदियोंको धीरे-धीरे पार करते हुए महर्षियोंसे सेवित कल्याणमयी नर्मदा नदीके पारतक चले गये। मार्गमें गुप्तक्षेत्र महीसागरसंगमकी महिमा सुनकर वहाँ स्नान करके पुनः वे प्रभासके ही पथपर चल दिये। वह मार्ग सर्वथा जनशून्य था। वे दोनों यात्री भूख और प्याससे बहुत पीड़ित हुए और सिद्धलिंगके समीप पहुँचकर मूर्छित हो गये। फिर दो ही घड़ीके बाद कुछ चेतमें आनेपर प्रालेयने ऊर्जयन्तसे धैर्यपूर्वक कहा—'सखे! मुझे यहाँ कुछ सुनायी पड़ा है। वह बतलाता हूँ, सुनो। 'तीर्थयात्रासे थककर मनुष्य ज्यों-ज्यों शिथिल एवं कान्तिहीन होता जाता है, त्यों-त्यों उसके किये हुए दानसे भगवान् सोमनाथ प्रसन्न होते हैं।' यह बात एक-दूसरेसे कह-सुनकर मूर्छा दूर होनेके बाद ऊर्जयन्त और प्रालेय लोटते हुए प्रभासक्षेत्रकी ओर चले। उनकी यह निष्ठा देखकर भगवान् शंकरने दोनोंको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और उन दोनोंके शरीरको अपनी कृपादृष्टिसे देखकर सुदृढ़ एवं सबल बना दिया।
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९५

तब ये दोनों प्रभासतीर्थमें शिवजीके स्थानको चले गये। वे ही ये दो सोमनाथ सिद्धेश्वरके समीप विद्यमान हैं। पश्चिममें ऊर्जयन्त और पूर्वमें प्रालेयेश्वर हैं। जो सोमकुण्डके जलमें तथा महीसागरसंगममें धीरेसे स्नान करके युगल सोमनाथका दर्शन करता है, वह जन्मभरके पापोंसे छूट जाता है। ब्रह्माजीने यहाँ हाटकेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी स्तुति की थी। अर्जुन! उस स्तुतिको सुनो। 'भगवान् रुद्र! सूर्यके समान अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्ति करनेवाले भव, दुःखोंको दूर भगानेवाले रुद्र तथा जलमय रस हैं; आपको नमस्कार है। आप संहारकारी शर्व हैं। पृथ्वी आपका रूप है। आप नित्य सुन्दर गन्ध धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप सबके ईश्वर तथा वायुरूप हैं। आपने ही कामदेवका नाश किया है। आपको नमस्कार है। आप पशुओं (जीवों) के अधिपति, पालक तथा अत्यन्त तेजस्वी हैं। आपका स्वरूप भयंकर है। यह आकाश आपका ही एक रूप है। आप शब्दमात्र परमेश्वरको नमस्कार है। आप महादेव हैं। सोम (चन्द्रमारूप अथवा उमासहित) हैं तथा अमृतस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप उग्ररूप, यजमानमूर्ति तथा कर्मयोगी हैं। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार दिव्य नामोंके साथ उच्चारित इस हाटकेश्वर स्तोत्रको जिसका निर्माण साक्षात् ब्रह्माजीने किया है, जो पढ़ता और सुनता है, वह भगवान् शिवके सायुज्यको प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं है। महीसागरसंगममें इस प्रकारके बहुत-से पवित्र तीर्थ हैं, जिनका मैंने संक्षेपसे वर्णन किया है।

अर्जुन बोले—मुने! आपके द्वारा स्थापित महीसागर स्थानमें जो-जो प्रधान तीर्थ हैं, उनका मुझसे वर्णन कीजिये।

नारदजीने कहा—अर्जुन! महीसागरमें जो-जो मुख्य तीर्थ हैं, उन्हें बतलाता हूँ। उस तीर्थमें जयादित्य नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्य विराजमान हैं। उनके प्रादुर्भावकी कथा सुनो। मैं इस महीसागर-संगमस्थानकी स्थापना करके कुछ कालके अनन्तर भगवान् सूर्यका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया। वहाँ प्रणाम करके आसनपर बैठ जानेके बाद सूर्यदेवने अर्घ्यसे मेरा पूजन किया और हँसकर मधुर वाणीमें कहा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और कहाँ जायँगे।' मैंने उत्तर दिया—'प्रभो! मैं भारतवर्षके महीनगरसे आपका दर्शन करनेके लिये आया हूँ।'

सूर्यदेव बोले—आपने जो वहाँ स्थान स्थापित किया है, उसमें जो ब्राह्मण निवास करते हैं, उनके गुण मुझसे बतलाइये। वे ब्राह्मण कैसे गुणोंसे युक्त हैं?

भगवान् सूर्यके ऐसा पूछनेपर मैंने फिर उत्तर दिया—भगवान्! यदि मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ, तो मुझपर यह दोष लगाया जा सकता है कि यह अपने आत्मीय जनोंकी स्तुति करता है, और निन्दाके तो वे पात्र ही नहीं हैं; फिर निन्दा कैसे कर सकता हूँ? दोनों ही ओर संकट है। अथवा उन महात्मा ब्राह्मणोंकी महिमा तो अपार है। यदि मैंने उसे बहुत घटा करके कहा तब तो मुझे महान् दोष ही लगेगा। अतः मेरी यह सम्मति है कि यदि आप मेरे द्वारा पूजित द्विजेन्द्रोंकी महिमा श्रवण करना चाहते हों तो स्वयं वहाँ चलकर उन्हें देखें।

मेरी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यको बड़ा विस्मय हुआ। वे बार-बार कहने लगे, मैं स्वयं ही चलकर उनका दर्शन करूँगा। यों कहकर भगवान् भास्करने मुझे तो विदा कर दिया और अपनी योगशक्तिके प्रभावसे आकाशमें तपते हुए भी दूसरे स्वरूपसे समुद्रके तटको चल दिये। उन्होंने महातेजस्वी वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया था। त्रिकाल-स्नानसे जैसी पिंगल वर्णकी जटा हो जाती है वैसी पिंगल वर्णकी जटा धारण किये हुए उन महात्माको मेरे ब्राह्मणोंने देखा। फिर तो वे हारीत आदि द्विज अपनी ब्रह्मशालासे उठकर उन

१९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ब्राह्मण देवताकी ओर दौड़ पड़े। उस समय उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे। नये आये हुए उन श्रेष्ठ द्विजको नमस्कार करके वे सब-के-सब प्रसन्नतापूर्वक बोले—'विप्रवर! आज हमारा दिन बड़ा ही पुण्यजनक है, आज यह स्थान परम उत्तम है; क्योंकि आपने स्वयं कृपा करके यहाँ पदार्पण किया है। इसमें सन्देह नहीं कि उत्तम ब्राह्मण कृपा करके ही किसी धन्य गृहस्थको पवित्र करनेके लिये उसके घर अतिथिके रूपमें पधारते हैं। अतः आप इन पैरोंसे चल-फिरकर आज हमारे गृहोंको पवित्र कीजिये। साथ ही दर्शन, भोजन और विश्राम आदिके द्वारा हमारेसहित इस स्थानको भी पावन बनाइये।'

अतिथि बोले—ब्राह्मणो! भोजन दो प्रकारका होता है—एक प्राकृत और दूसरा परम। अतः मैं आपलोगोंका दिया हुआ उत्तम परम भोजन प्राप्त करना चाहता हूँ।

अतिथिकी यह बात सुनकर हारीतने अपने आठ वर्षके बालकसे कहा—'बेटा कमठ! क्या तुम ब्राह्मणके बताये हुए भोजनको जानते हो?'

कमठने कहा—पिताजी! मैं आपको प्रणाम करके वैसे परम भोजनका परिचय दूँगा तथा ब्राह्मणदेवताको वह भोजन देकर तृप्त करूँगा। प्रकृति आदि चौबीस तत्त्वोंके समुदायको जो तृप्त करता है, वही प्राकृत भोजन कहलाता है। वह छः^१ रसों और पाँच^२ भेदोंवाला बताया गया है। उसके भोजन करनेसे शरीररूपी क्षेत्रकी तृप्ति होती है। दूसरा जो परम भोजन कहा गया है, उसकी व्याख्या इस प्रकार है—परम कहते हैं आत्माको, उसका जो भोजन है वही परम भोजन है। अतः नाना प्रकारके धर्मका जो श्रवण है, उसे अन्न कहा गया है। क्षेत्रज्ञ आत्मा उस अन्नका भोक्ता है और दोनों कान उस अन्नको ग्रहण करनेके लिये मुख हैं। पिताजी! वही परम भोजन आज मैं इन ब्राह्मणदेवताको दूँगा। 'विप्रवर! आपकी जो इच्छा हो पूछिये, विद्वान् ब्राह्मणोंकी इस सभामें अपनी शक्तिके अनुसार मैं आपको सन्तुष्ट करूँगा।'

कमठकी यह महत्त्वपूर्ण बात सुनकर अतिथि ब्राह्मणने मन-ही-मन उसकी सराहना की और यह प्रश्न उपस्थित किया—'जीव कैसे उत्पन्न होता है?'

कमठने कहा—ब्रह्मन्! पहले गुरुको, उसके बाद धर्मको नमस्कार करके मैं इस वेदवर्णित प्रश्नका यथाशक्ति समाधान करूँगा! जीवके जन्म लेनेमें तीन प्रकारका कर्म कारण होता है—पुण्य, पाप और उभय मिश्रित। अर्थात् कर्म तीन प्रकारके हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। इन कर्मोंके अनुसार जो सात्त्विक पुरुष है, वह स्वर्गमें जाता है। फिर समयानुसार जब स्वर्गसे नीचे गिरता है, तब संसारमें धनी, धर्मी और सुखी होता है। जो तमोगुणी पुरुष है, वह नरकमें पड़ता है और वहाँ नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगनेके पश्चात् यहाँ आकर स्थावरयोनिमें जन्म लेता है। तदनन्तर


१- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त—ये छः रस हैं।
२- भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य तथा चोष्य—ये भोजनके पाँच भेद हैं।

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९७

दीर्घकालतक उस योनिमें रहते हुए महात्मा पुरुषोंके दर्शन, स्पर्श, उपभोग और समीप बैठने आदिसे स्थावर शरीरसे मुक्त होकर वह मनुष्य होता है। मनुष्य होनेपर भी वह दुःखी, दरिद्रता आदिसे घिरा हुआ तथा विकलेन्द्रिय (अन्धा, बहरा, काना, कुबड़ा, लँगड़ा, लूला आदि) होता है। यह सब लोगोंके प्रत्यक्ष है। यह सब पापका ही लक्षण है। जो पाप और पुण्य दोनोंसे मिश्रित कर्मवाला पुरुष है, वह पशु-पक्षी आदिकी योनिको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह इस संसारमें मनुष्य होता है। जिसका पुण्य अधिक और पाप थोड़ा होता है, वह पहले दुःखी होकर पीछे सुखी होता है। जिसका पाप बहुत अधिक और पुण्य बहुत कम हो, वह पहले सुखी और पीछे दुःखी होता है; यह मिश्रित कर्मका लक्षण है। इनमेंसे पहले मनुष्यकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनिये।

पुरुष और स्त्रीके वीर्य तथा रजका संगम होनेपर सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा शुभाशुभ कर्मसंस्कारके साथ जीव गर्भमें प्रवेश करके रजोवीर्यमय कललमें स्थित होता है। उस समय वह मूर्च्छित अवस्थामें रहकर एक मासतक कललमें ही पड़ा रहता है। दूसरा महीना आनेपर वह कललाकार जीव घनीभावको प्राप्त हो जाता है। तीसरे महीनेमें उसके अवयवोंका निर्माण होने लगता है। (इस प्रकार होते हुए) सातवें महीनेमें वह माताके खाये-पीये हुए अन्न और जलका सार अंश ग्रहण करने लगता है। आठवें और नवें महीनेमें उस बालकको गर्भमें बड़ा उद्वेग प्राप्त होता है। उसके सब अंग झिल्लीमें लपेटे हुए होते हैं और हाथोंकी अंगुलियाँ मुखसे बँधी होती हैं। यदि गर्भका बालक अधिकतर उदरके मध्यभागमें रहता है तब वह नपुंसक है, यदि वाम भागमें ठहरता है तो कन्या है, और यदि दक्षिण भागमें रहा करता है तो पुरुष है। इस प्रकार वह उदरके किसी एक भागमें स्थित होता है। जिन योनियोंमें वह जन्म लेता है उनका ज्ञान उस समय उसे होता है। इतना ही नहीं, उसे पहलेके अनेक जन्मोंकी बातोंका भी स्मरण हो आता है। वह गाढ़ अन्धकारमें अदृश्य होकर पड़ा रहता है। वहाँकी दुर्गन्धसे वह अत्यन्त मोहको प्राप्त होता है। यदि माता ठंडा जल पीती है तो उसे सर्दी मालूम होती है। यदि गरम जल पीती है तो उसे गरमीका अनुभव होता है। माताके मैथुन या परिश्रम करनेपर उसको क्लेश होता है। यदि माताको कोई रोग है तो उससे गर्भके बालकको भी पीड़ा होती है। इसके सिवा इस बालकको स्वयं भी ऐसे रोग होते हैं, जिन्हें पिता-माता नहीं देख पाते। अधिक सुकुमारता होनेसे वे रोग गर्भस्थ शिशुके अंगोंमें तीव्र वेदना उत्पन्न करते हैं। उस अवस्थामें थोड़े-से समयको भी वह सौ वर्षोंके समान दुःसह मानता है। अपने प्राचीन कर्मोंसे भी गर्भमें बालकको बड़ा सन्ताप होता है। वहाँ वह बार-बार पुण्य करनेके मनसूबे बाँधता है। 'यदि मैं मनुष्य-शरीरमें जन्म और जीवन पा जाऊँ तो ऐसा कार्य करूँगा, जिससे निश्चय ही मेरा मोक्ष हो जाय।' सीमन्तोन्नयन-संस्कारके बाद उपर्युक्त चिन्तामें पड़े हुए बालकके शेष दो मास अधिक पीड़ाके कारण तीन युगोंके समान बीतते हैं। तत्पश्चात् जन्मका समय आनेपर प्रसूति वायुसे प्रेरित होकर नीचे मुखवाला वह बालक बड़ी पीड़ाका अनुभव करता है तथा योनिके संकीर्ण द्वारसे कष्टपूर्वक निकलने लगता है। उस समय उसे ऐसी पीड़ा होती है, मानो कोई उसकी चमड़ी नोंच रहा हो। किसीके हाथका स्पर्श आदि भी उसे आरेकी धारके स्पर्श-सा जान पड़ता है। जन्म लेनेके पश्चात् वह अचेत बालक केवल माताके स्तनमात्रको जानता है। पूर्वकर्मोंके अधीन होनेके कारण उसका गर्भगत ज्ञान नष्ट हो जाता है। फिर तो वह पूर्ववत् काले, लाल और सफेद

१९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


(तामस, राजस और सात्त्विक) कर्म करने लगता है। मनुष्यका शरीर एक घरके समान है। इसमें हड्डियाँ ही प्रधान स्तम्भ हैं, नस-नाड़ियोंके बन्धनसे ही यह बँधा हुआ है, रक्त और मांसरूपी मिट्टीसे यह लिपा हुआ है, विष्ठा और मूत्ररूपी द्रव्यका पात्र है। सात धातुरूपी सात दीवारोंसे यह अत्यन्त दृढ़ बना हुआ है, केश और रोमरूपी घास-फूससे इसे छाया गया है, मुख ही इस घरका प्रधान दरवाजा है। शेष दो आँख, दो कान, दो नाक, लिंग और गुदा—ये आठ खिड़कियाँ इस घरकी शोभा बढ़ा रही हैं। दोनों ओठ मुखरूपी द्वारके किवाड़ हैं, दाँतोंकी अर्गलासे इस द्वारको बंद किया गया है। नाड़ी ही इसकी नाली और पसीने आदि ही इसके गंदे जलके प्रवाह हैं। यह देह-गेह कफ और पित्तमें डूबा हुआ है। जरावस्था और शोकसे व्याप्त है, कालकी मुखाग्निमें इसकी स्थिति है, राग और द्वेष आदिसे यह सदा ग्रस्त रहता है तथा यह नाना प्रकारके शोककी उत्पत्तिका स्थान है। इस प्रकार मनुष्योंका यह देहरूपी गेह उत्पन्न होता है, जिसमें क्षेत्रज्ञ आत्मा गृहस्थके रूपमें निवास करता है और बुद्धि उसकी गृहिणी है। इस शरीरमें रहकर जीव नाना प्रकारके साधनोंमें संलग्न हो नरक, स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त करता है।

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कमठद्वारा शरीरकी उत्पत्ति, विनाश तथा जीवके परलोकवासका वर्णन

अतिथि बोले—वत्स कमठ! तुम्हारी बुद्धि तो वृद्धोंकी-सी है। तुम बहुत अच्छा प्रतिपादन कर रहे हो। अब मैं तुमसे शरीरका लक्षण सुनना चाहता हूँ; उसे बताओ।

कमठने कहा—विप्रवर! जैसा यह ब्रह्माण्ड है, वैसा ही यह शरीर भी बताया जाता है। पैरोंका मूल (तलवा) पाताल है, पैरोंका ऊपरी भाग रसातल है, दोनों गुल्फ तलातल हैं, दोनों पिण्डलियोंको महातल कहा गया है, दोनों घुटने सुतल, दोनों ऊरु (जाँघ) तथा कटिभाग अतललोक हैं। नाभिको भूलोक, उदरको भुवर्लोक, वक्षःस्थलको स्वर्गलोक, ग्रीवाको महर्लोक और मुखको जनलोक कहते हैं। दोनों नेत्र तपोलोक हैं तथा मस्तकको सत्यलोक कहा गया है। जैसे पृथ्वीपर सात द्वीप स्थित हैं, उसी प्रकार इस शरीरमें सात धातुएँ हैं, उनके नाम सुनिये। त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा और वीर्य—ये सात धातुएँ हैं। शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ हैं तथा तीस लाख छप्पन हज़ार नौ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं। जैसे नदियाँ इस पृथ्वीपर जल बहाती हैं, उसी प्रकार वे नाड़ियाँ शरीरमें रसका संचार करती हैं। यह शरीर साढ़े तीन करोड़ स्थूल एवं सूक्ष्म रोएँसे आच्छादित है। स्थूल रोएँ तो दिखायी देते हैं और सूक्ष्म नहीं दिखायी देते। शरीरमें छः अंग प्रधान बताये जाते हैं—दो बाँह, दो जाँघें, मस्तक और उदर। देहके भीतर साढ़े तीन-तीन व्याम* पुरुषकी तीन आँतें हैं। स्त्रियोंकी आँतें तीन-तीन व्यामकी ही होती हैं; वेदवेत्ता द्विज ऐसा ही कहते हैं। हृदयमें एक कमल बताया जाता है, जिसकी नाल तो है ऊपरकी ओर और मुख है नीचेकी ओर। उस हृदय-कमलके वामभागमें प्लीहा है और दक्षिण-भागमें यकृत्। शरीरमें मज्जा, मेदा, वसा, मूत्र, पित्त, कफ, विष्ठा, रक्त तथा रसके गड्ढे हैं; इनका माप दो-दो अंजलि माना गया है। उन्हीं


* यह लम्बाईकी एक माप है। दोनों हाथोंको जहाँतक हो सके, दोनों बगलमें फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेपर जितनी दूरी होती है, वह व्याम कहलाती है।

  • माहे‍श्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १९९

गड्ढोंसे प्रवृत्त होकर वे मज्जा, मेदा आदि धातु इस शरीरको धारण करते हैं। इन गड्ढोंके सिवा शरीरमें सात सीवनी (विशेष नाड़ी) हैं। इनमेंसे पाँच तो मस्तककी ओर गयी हैं, एक नाड़ी लिंगतक तथा एक जिह्वातक गयी है। सब नाड़ियाँ नाभि-कमलसे ही सब ओर गयी हैं। इन सबमें मस्तककी ओर गयी हुई तीन नाड़ियाँ प्रधान हैं—सुषुम्ना, इडा और पिंगला। इडा और पिंगला नाड़ी नासिकाके द्वारतक पहुँची हुई है। ये ही दोनों शरीरकी वृद्धि एवं पुष्टि करनेवाली हैं। शरीरमें वायु, अग्नि तथा चन्द्रमा—ये पाँच-पाँच भागोंमें विभक्त होकर स्थित हैं। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान—ये वायुके पाँच भेद माने गये हैं। उच्छ्वास (ऊपरकी ओर श्वास खींचना), निःश्वास (श्वासको बाहर निकालना) तथा अन्न और जलको शरीरके भीतर पहुँचाना—ये तीन प्राणवायुके कर्म हैं। कण्ठसे लेकर मस्तकतक इसका निवासस्थान है। मल, मूत्र तथा वीर्यका त्याग और गर्भको योनिसे बाहर निकालना यह अपान वायुका कर्म बताया गया है। इसका स्थान गुदाके ऊपर है। समान वायु खाये हुए अन्नको धारण करती, उसके विभिन्न अंशोंको बिलगाती तथा सम्पूर्ण शरीरमें रस-संचार करती हुई बेरोक-टोक विचरती है। वाक्य बोलना, उद्गार (कण्ठके भीतरसे कुछ निकालना) तथा कर्मोंके लिये सब प्रकारके प्रयत्न करना—ये उदान वायुके कार्य हैं। इसका स्थान कण्ठसे लेकर मुखतक है। व्यान वायु सदा हृदयमें स्थित रहती है और सम्पूर्ण देहका भरण-पोषण करती है। धातुको बढ़ाना, पसीना, लार आदिको निकालना तथा आँखके खोलने-मीचनेकी क्रिया करना—ये सब व्यान वायुके कार्य हैं।

पाचक, रंजक, साधक, आलोचक तथा भ्राजक—इन पाँच रूपोंमें अग्नि इस शरीरके भीतर स्थित है। पाचक अग्नि सदा पक्वाशयमें स्थित होकर खाये हुए अन्नको पचाती है। रंजक अग्नि आमाशयमें स्थित होकर अन्नके रसको रँगकर रक्तके रूपमें परिणत कर देती है। साधक अग्नि हृदयमें रहकर बुद्धि और उत्साह आदिको बढ़ाती है। आलोचक अग्नि नेत्रोंमें निवास करके रूप देखनेकी शक्ति बढ़ाती है तथा भ्राजक अग्नि त्वचामें स्थित हो शरीरको निर्मल एवं कान्तिमान् बनाती है। क्लेदक, बोधक, तर्पण, श्लेषण तथा आलम्बक—इन पाँच रूपोंमें चन्द्रमाका शरीरके भीतर निवास है। क्लेदक चन्द्रमा पक्वाशयमें स्थित होकर प्रतिदिन खाये हुए अन्नको गलाता है। बोधक रसनेन्द्रियमें रहकर मधुर आदि रसोंका अनुभव कराता है। तर्पण चन्द्रमा मस्तकमें स्थित होकर नेत्र आदि इन्द्रियोंकी तृप्ति एवं पुष्टि करता है। इसीलिये उसका नाम तर्पण है। श्लेषण सब सन्धियोंमें व्याप्त होकर उन्हें परस्पर मिलाये रखता है तथा आलम्बक चन्द्रमा हृदयमें स्थित हो शरीरके सब अंगोंको परस्पर अवलम्बित रखता है। इस प्रकार वायु, अग्नि तथा चन्द्रमाने इस शरीरको धारण कर रखा है। इन्द्रियोंके छिद्र, रोमकूप तथा उदरका अवकाश-भाग—ये सब आकाशजनित हैं। नासिका, केश, नख, हड्डी, धीरता, भारीपन, त्वचा, मांस, हृदय, गुदा, नाभि, मेदा, यकृत्, मज्जा, आँत, आमाशय, शिरा, स्नायु तथा पक्वाशय—इन सबको वेदवेत्ता विद्वानोंने पृथ्वीका अंश बताया है। नेत्रोंमें जो श्वेत भाग है, वह कफसे उत्पन्न होता है और काला भाग वायुसे पैदा होता है। श्वेत भाग पिताका तथा काला भाग माताका अंश है। नेत्रमें पाँच मण्डल होते हैं। पहला पक्ष्म-मण्डल, दूसरा चर्म-मण्डल, तीसरा शुक्ल-मण्डल, चौथा कृष्ण-मण्डल तथा पाँचवाँ दृङ्-मण्डल है। नेत्रके दो भाग और हैं—उपांग और अपांग। नेत्रोंका जो अन्तिम किनारा है, उसे उपांग कहते हैं और नासिकाके मूल भागसे मिला हुआ जो नेत्रका अंश है, उसका नाम अपांग है। दोनों अण्डकोष मेदा, रक्त, कफ

२००* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और मांस—इन चार धातुओंसे युक्त बताये गये हैं। समस्त प्राणियोंकी जिह्वा रक्त-मांसमयी ही होती है। दोनों हाथ, दोनों ओठ, लिंग और गला—इन छः स्थानोंमें चर्मप्रधान मांस और रक्त होते हैं। इस प्रकार इन सात धातुओंके बने हुए पचीस तत्त्वयुक्त शरीरमें जीव निवास करता है। त्वचा, रक्त और मांस—ये तीनों माताके अंशसे तथा मेदा, मज्जा और अस्थि—ये पिताके अंशसे उत्पन्न बताये गये हैं। इन्हीं छः कोषोंसे इस शरीरका संगठन हुआ है।

यह पांचभौतिक शरीर पाँच भूतोंसे उत्पन्न होनेवाले अन्नद्वारा जिस प्रकार पुष्टिको प्राप्त होता है, उसका वर्णन करता हूँ। देहधारी जीव पिण्ड, कौर तथा ग्रासके रूपमें जो अन्न खाते हैं, उसे प्राणवायु पहले स्थूलाशयमें एकत्र करती है; फिर उस अन्नमें प्रवेश करके अन्न और जलको पृथक्-पृथक् कर देती है। जलको अग्निके ऊपर रखकर अन्नको उसके ऊपर रखती है और स्वयं जलके नीचे स्थित हो धीरे-धीरे अग्निको उद्दीप्त करती है। वायुसे उद्दीप्त हुई अग्नि जलको अत्यन्त गरम कर देती है; फिर उस उष्ण जलसे वह अन्न सब ओरसे पकने लगता है। पकनेपर उसके दो भाग हो जाते हैं; मैल अलग छँट जाती है और रस पृथक् हो जाता है। मल निकलनेके बारह मार्गोंसे वह छँटी हुई मैल शरीरसे बाहर हो जाती है। दो कान, दो आँख, दो नाक, जिह्वा, दाँत, लिंग, गुदा, नख और रोमकूप—ये बारह मलके आश्रय हैं। शरीरकी सब नाड़ियाँ सब ओरसे हृदय-कमलमें बँधी हुई हैं। व्यान वायु पूर्वोक्त अन्न-रसको उन नाड़ियोंके मुखमें रख देती है; तब समान वायु सभी नाड़ियोंको उस रससे परिपूर्ण करती है। तत्पश्चात् वे रसपूर्ण नाड़ियाँ देहमें सब ओर उस रसको पहुँचा देती हैं। नाड़ियोंमें स्थित हुआ वह रस रंजक अग्निकी उष्णतासे पकने लगता है और पकते-पकते रुधिररूपमें परिणत हो जाता है। तदनन्तर त्वचा, रोम, केश, मांस, स्नायु, शिरा, अस्थि, नख, मज्जा, इन्द्रियोंकी शुद्धि तथा वीर्यकी वृद्धि—ये कार्य क्रमशः होते हैं। इस प्रकार अन्नका बारह रूपोंमें परिणाम बताया जाता है। इन सबसे बना हुआ यह शरीर पुण्यके लिये प्राप्त हुआ है, जैसे सुन्दर रथ भार ढोनेके लिये ही होता है। यदि वह भार न ढो सके तो, केवल तेल लगाने आदि नाना प्रकारके यत्नोंद्वारा रथकी रक्षा करनेसे क्या कार्य सिद्ध हो सकता है? इसी प्रकार उत्तम-उत्तम भोजनोंसे पुष्ट किये हुए इस शरीरके द्वारा पुण्य-सम्पादनके सिवा और क्या लाभ है? यदि यह पुण्य नहीं करता, तो पशुके तुल्य है। इस विषयमें ये श्लोक स्मरण रखने योग्य हैं—

यस्मिन्काले च देशे च वयसा यादृशेन च।
कृतं शुभाशुभं कर्म तत्तथा तेन भुज्यते॥
तस्मात् सदा शुभं कार्यमविच्छिन्नसुखार्थिभिः।
विच्छिद्यन्तेऽन्यथा भोगा ग्रीष्मे कुसरितो यथा॥
यस्मात्पापेन दुःखानि तीव्रानि सुबहून्यपि।
तस्मात्पापं न कर्तव्यमात्मपीडाकरं हि तत्॥

'जिस समय जिस देशमें और जिस आयुसे शुभ तथा अशुभ कर्म किये जाते हैं उसी देश, काल और आयुमें कर्ताको उनका फल भोगना पड़ता है। इसलिये अक्षय सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा शुभ कर्म ही करना चाहिये। अन्यथा गरमीमें सूख जानेवाली छोटी-छोटी नदियोंकी भाँति समस्त सुख-भोग छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। क्योंकि पापसे बहुत तीव्र दुःख प्राप्त होते हैं, अतः पाप-कर्मका आचरण कदापि नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह अपनेको पीड़ा देनेवाला है।'

महात्मन्! इस प्रकार मैंने आपके प्रश्नका यथाशक्ति उत्तर दिया है। प्राणी किस प्रकार

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड *२०१

उत्पन्न होता है, यह बात बता दी गयी। अब किस प्रकार उसकी मृत्यु होती है, यह सुनिये। कर्मके अनुसार आयु क्षीण होनेपर जब मनुष्योंका मृत्युकाल उपस्थित होता है, उस समय अपने कर्मोंके अधीन रहनेवाले जीवको यमराजके दूत शरीरसे बाहर खींचते हैं। तब पुण्य और पापके बन्धनमें बँधा हुआ जीव पंचतन्मात्राओंको तथा मन, बुद्धि और अहंकारको साथ लेकर शरीरको त्याग देता है। पुण्यात्मा पुरुषोंके प्राण मुखमण्डलमें स्थित सात छिद्रोंके द्वारा बाहर निकलते हैं। पापियोंके प्राण गुदा-मार्गसे बाहर होते हैं और योगी पुरुषोंके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर ऊर्ध्वलोकमें गमन करते हैं।

मृत्यु होनेपर जीव उसी क्षणमें आतिवाहिक शरीर धारण करता है; वह अँगूठेकी पोरके बराबर होता है। उस शरीरका निर्माण अपने ही प्राणोंसे किया जाता है। उस आतिवाहिक शरीरमें जब जीव स्थित हो जाता है, तब यमराजके दूत उस देहको बाँधकर बलपूर्वक यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं। वह मार्ग तपे हुए भाड़के समान, गरम किये हुए लोहेके गोलेके सदृश, तपी हुई बालूवाले स्थानकी भाँति तथा जलते हुए ताम्रपत्रके समान होता है। पृथ्वीसे छियासी हजार योजन दूर यमराजकी पुरी है, जहाँ यमदूत पापी जीवको घसीटकर ले जाते हैं। मार्गमें कहीं अत्यन्त सर्दी पड़ती है, कहीं अत्यन्त दुर्गम स्थान लाँघना पड़ता है, कहीं भारी अन्धकार छाया रहता है तथा कहीं अग्निके समान मुखवाले काक, कंक, जम्बुक, मक्खी, डाँस, मच्छर तथा साँप और बिच्छू आदि जीव काट खाते हैं। उनके काटनेपर जीव चीखता और चिल्लाता है, परंतु मरता नहीं है। कहीं-कहीं भयंकर राक्षस उसे खाते, घसीटते और इधर-उधर फेंकते हैं। कहीं तपी हुई बालूवाले अत्यन्त भयंकर मार्गसे जलता हुआ पापी जीव ले जाया जाता है। यमपुरीके उस अत्यन्त दुस्तर मार्गको वह केवल दस मुहूर्त (चार घंटे)-में पार करता है; परंतु उतना ही समय वह एक वर्षके बराबर बड़ा भारी समझता है। उस मार्गमें पापी जीवको पीब और रक्तकी धारा बहानेवाली भयंकर वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है, जिसमें बाल ही शैवालका काम देते हैं।

यमलोकमें पहुँचनेपर यमदूत पापी मनुष्यको ले जाकर यमराजके सामने खड़ा कर देते हैं। पापात्मा जीव काल और अन्तक आदिसे घिरे हुए यमराजको बड़े भयंकर रूपमें देखता है तथा पुण्यात्मा पुरुष यमराजका परम शान्त सौम्य रूपमें दर्शन पाता है। मनुष्य ही यमलोकमें जाते हैं, दूसरे प्राणी नहीं। अन्य प्राणियोंकी मृत्यु होनेपर शीघ्र ही किसी-न-किसी योनिमें उनका जन्म हो जाता है। इस प्रकार उनकी योनिपूर्ति मात्र की जाती है। केवल मनुष्य ही प्रेत होते सुने जाते हैं, अन्य प्राणी नहीं। धर्मात्मा पुरुष यमलोकमें जानेपर वहाँ पूजित होता है और पापी जीव बन्धनमें डाला जाता है।

विप्रवर! धर्मात्मा पुरुष जिस प्रकार परलोकमें जाते हैं, उस मार्गका वर्णन करता हूँ। जो इस लोकमें बगीचा और वृक्षका दान करते हैं, वे फल और फूलवाले वृक्षोंकी छायासे होकर सुखपूर्वक यात्रा करते हैं। इसी प्रकार जो छत्र दान करनेवाले मनुष्य हैं, वे भी छायामें ही सुखसे जाते हैं। उपानह (जूता आदि) दान करनेवाले सवारीसे यात्रा करते हैं। कुआँ और पोखरा खुदानेवाले प्यासकी पीड़ासे रहित होकर जाते हैं। सवारी, शय्या और आसन देनेवाले लोग विमानोंपर बैठकर जाते हैं। जो लोग भोजन-दान करनेवाले हैं, वे लोग भक्ष्य-भोज्यसे भलीभाँति तृप्त होकर यात्रा करते हैं। दीप-दान करनेवाले उजालेमें जाते हैं, गोदान करनेवाले वैतरणी नदीको सुखसे पार करते हैं। जो जन्मसे ही लेकर जीवनभर भगवान् सूर्य, भगवान् शिव अथवा भगवान् विष्णुकी पूजा करते हैं, वे यमदूतोंसे पूजित होकर भगवान्‌के धाममें जाते हैं। भूमि, गौ, सोना, लोहा, तेल,