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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६१ ---|---

मुखोंसे परम उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। आपके सहस्रों नाम और असंख्य इन्द्रियाँ हैं, आपको नमस्कार है।'

भगवान् विष्णुका यह सहस्रनाम परम प्राचीन और वेदोंके तुल्य मान्य है। यह समस्त मंगलोंका भी मंगल है। इसका सदा भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये।


भगवान्‌का वामनरूपसे प्रकट हो बलिसे तीन पग भूमि माँगना और वामनकुण्डकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार इस स्तोत्रके द्वारा भगवान्‌की स्तुतिमें संलग्न हुए देवताओंपर प्रसन्न होकर वरदायक भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'देवताओ! मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

देवता बोले—विष्णो! हमारी प्रार्थना है कि आप अदितिके गर्भसे उत्पन्न होकर इन्द्रके छोटे भाई हों।

देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर 'तथास्तु' कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भगवान् विष्णु अदितिके पुत्र होकर प्रकट हुए। वे देखनेमें वामन (अत्यन्त लघु) होनेके कारण 'वामन' कहलाये। व्यास! बलिने सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन आरम्भ किया। कश्यपको ऋत्विग् और शुक्राचार्यजीको होता बनाकर उस यज्ञमें ब्रह्माजी स्वयं ही ब्रह्माके आसनपर आसीन हुए। महर्षि अत्रि अध्वर्यु और नारदजी उद्गाता हुए। वसिष्ठजीने सभासदका आसन ग्रहण किया। इस प्रकार ऋत्विजोंका वरण करके राजाओंमें श्रेष्ठ बलिने यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की। जब यज्ञ प्रारम्भ हुआ, तब पवित्र मुसकानवाले वामनजी वहाँ आये। वे वेदोंके पारंगत विद्वान् थे और अपने मुखके अग्रभागसे चारों वेदोंके मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे।

उस समय द्वारपालने राजा बलिसे यह निवेदन किया कि 'महाराज! एक श्रेष्ठ ब्राह्मण जो बहुत ही छोटे कदके हैं, दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनकर महाराज बलि सहसा उठे और अर्घ्य लेकर सभासदोंके साथ उस स्थानपर गये। वहाँ समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले भगवान् वामनकी यथायोग्य पूजा करके वे उन्हें सभामण्डपमें ले आये और बैठनेके लिये आसन देकर राजाने पूछा—'ब्रह्मन्! कहाँसे आपका आगमन हुआ है, मैं आपको कौन-सी अभीष्ट वस्तु दूँ।'

वामनजी बोले—राजाधिराज! यह सारी सृष्टि ब्रह्माजीकी बनायी हुई है, मैं उन्हींके लोकसे तुम्हारा यह यज्ञ देखने और तुमसे कुछ माँगनेके लिये यहाँ आया हूँ।

राजा बलिने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! आपकी अभीष्ट वस्तु क्या है, बताइये मैं उसे अभी देता हूँ।

वामनजी बोले—महाराज! यदि आपको जँचे तो मेरे रहनेके लिये तीन पग भूमि दीजिये।

राजा बलिने कहा—ब्रह्मन्! आपने यह क्या माँगा! यह तो बहुत थोड़ा है। नाना प्रकारके रत्न, हाथी, घोड़े, रथ, भूमि, दास-दासी, स्त्री और धनादि वस्तुएँ भी जितनी चाहिये, माँग लीजिये।

वामनजी बोले—राजन्! मुझे दूसरी किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। यदि आपकी श्रद्धा हो तो मुझे केवल तीन पग पृथ्वी ही दीजिये।

'मानद! आप अपने निवासके लिये यह तीन पग भूमि लीजिये।' ऐसा कहकर राजर्षि बलिने उन्हें भूमि संकल्प करके दे दी। व्यास! यद्यपि आचार्य शुक्रने उस समय बलिको रोका था, तो भी दैवसे प्रेरित होकर बलिने भूमिका दान कर ही दिया। संकल्पका जल हाथमें देते ही श्रीहरिने तत्काल विराट् रूप धारण करके समूचे ब्रह्माण्डको

९६२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नाप लिया। पर्वत, वन और काननोंसहित यह पृथ्वी तथा अन्य लोक सब भगवान्‌के ढाई पगमें ही आ गये। उस समय शेष आधे पगकी पूर्तिके लिये बलिने अपना शरीर भी भगवान्‌को समर्पित कर दिया।

इस प्रकार समस्त असुरोंको जीतकर और इन्द्रको राज्य देकर वामनजी कुमुद्वतीपुरीमें गये। वहाँ ऋद्धि-सिद्धि देनेवाले पुण्यमय प्रदेशमें अपने लिये एक तीर्थका निर्माण करके उन्होंने वहीं निवास किया। वामनजीने जो तीर्थ निर्माण किया, उसे वामनकुण्ड कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्षमें श्रवण नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथि वामनद्वादशी कहलाती है। वह करोड़ों हत्याओंका पाप नष्ट करनेवाली है। जो मनुष्य एकादशी तिथिको यहाँ उपवास करके रात्रिमें जागरण करते और द्वादशीको बड़े-बड़े दान देते हैं, वे ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं। उनके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।


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भैरवतीर्थ और नागतीर्थकी महिमा

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**मुनिवर! पूर्वकालमें कालचक्रके द्वारा कुछ कृत्याएँ प्रकट की गयी थीं, जो योगिनीगणके नामसे प्रसिद्ध थीं। उन्हीं योगिनियोंमें काली नामसे प्रसिद्ध एक योगिनी थी, जो बहुत उत्तम स्वभावकी थी। उसने भैरवजीको सदा अपने पुत्रकी भाँति पाला था। भैरवने उस क्षेत्रके समस्त दोष और उत्पात नष्ट कर दिये थे। महामारी, पूतना, कृत्या, शकुनि, रेवती, खला, कोटरी, तामसी और माया—ये नौ मातृकाएँ मानी गयी हैं। ये सब-की-सब दुष्ट दोषकी प्राप्ति करानेवाली दुष्ट स्वभावकी तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर हैं। समस्त कामनाओं तथा वरोंको देनेवाले धर्मात्मा भैरवने इन सबको वशमें किया। वे भैरवजी शिप्रा नदीके उत्तर तटपर सदा स्थित रहते हैं। आषाढ़मासके शुक्ल पक्षमें रविवारके दिन अष्टमी, नवमी अथवा विशेषतः चतुर्दशी तिथिका योग पाकर जो मनुष्य एकाग्र एवं स्थिरचित्त होकर उनकी पूजा करते हैं, वे परम कल्याणके भागी होते हैं। जिनके नेत्र निर्मल कमलके समान सुन्दर हैं, जिन्होंने मस्तकपर चन्द्रमाका मनोहर मुकुट धारण कर रखा है, जो सब गुणोंसे श्रेष्ठ हैं, सबके सन्तापका निवारण करते हैं तथा डाकिनियोंके नाशके हेतु हैं, हे मन! मनुष्योंके लिये कल्याणस्वरूप उन भगवान् भूतनाथ भैरवका भजन कर। जो संसारभयका निवारण करनेवाले, दुष्ट योगिनियोंके लिये भयंकर और समस्त देवताओंके स्वामी हैं, सुन्दर चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने अपने मस्तकपर मुकुट और गलेमें मोतियोंकी माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्यमात्रके लिये कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरवका हे मन! तू भजन कर। जो देखनेमें सुन्दर, बोलनेमें मनोहर, प्रियजनोंमें सर्वाधिक सुन्दर और यश, कीर्ति तथा तपस्याके द्वारा भी अत्यन्त मनोहर हैं, उन भगवान् भूतनाथ भैरवकी मैं शरण लेता हूँ। जो आदिदेव सनातन ब्रह्म पवित्रतामें तत्पर सिद्धिदाता मनोरथपूरक भक्तिसे सेवन करनेयोग्य, देवताओंमें श्रेष्ठ, भक्तियुक्त, सर्वथा योग्य, योग-विचारमें तत्पर, युगको धारण करनेवाले, दर्शनयोग्य मुखवाले, योगी, कलायुक्त, कलंकरहित तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित हैं, उन भगवान् भैरवको मैं प्रणाम करता हूँ।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस पवित्र भैरव-स्तोत्रका पाठ करता है, उसके दुःस्वप्नोंका नाश तथा मनोवांछित फलकी सिद्धि होती है। इस तीर्थमें मनुष्योंको स्नान-दानादि करने चाहिये। संसारके भयसे डरे हुए मानवोंको भगवान् भैरवका अवश्य पूजन करना चाहिये।

पूर्वकालमें नागगण अपनी माताके शापसे

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९६३

परिभ्रष्ट होनेके कारण राजा जनमेजयके द्वारा अग्निकुण्डमें जलाये जा रहे थे। उस समय महात्मा आस्तीकने आकर उन सब नागोंको संकटसे मुक्त किया। तब नागोंने जरत्कारुपुत्र आस्तीकसे पूछा—'ब्रह्मन्! आपकी कृपासे हमलोग जनमेजयके यज्ञकी आगमें जलनेसे बचे हैं। अब आप हमें रहनेके लिये ऐसा कोई स्थान बतलाइये, जहाँ हमें किसी प्रकारका भय न हो।'

आस्तीकने कहा—श्रेष्ठ मातुलगण! मनोहर महाकाल वनमें जो कुशस्थली नामक पुरी है, उसके दक्षिण भागमें एक सनातनतीर्थ है। वहीं नागोंका स्थान बताया गया है। वहाँ भगवान् शंकरका नित्य निवास है। एक समय बकदाल्भ्य नामक ऋषिने उत्तम व्रतका पालन करते हुए वहाँ तपस्या की थी। महातेजस्वी लोमश मुनि भी वहीं रहते हैं। भगवान् कपिलदेव मुनि भी उसी श्रेष्ठ तीर्थमें सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अतः आप सब लोग वहीं चलकर विश्राम करें।

आस्तीकका यह वचन सुनकर उस समय सब श्रेष्ठ नाग वहाँ निवास करनेके लिये आये। एलापत्र, कम्बल, कर्कोटक, धनंजय, वासुकि, तक्षक, नील, पद्म तथा अर्बुद नामवाले सभी प्रधान-प्रधान नागोंने वहाँ आकर अपने-अपने लिये स्थान बनाये। इन सबके नामपर वहाँ नौ परम सुन्दर कुण्ड निर्मित हुए, जो उत्तम तीर्थस्वरूप हैं। इन सब कुण्डोंको महान् पुण्यप्रद तथा बड़े-बड़े पापोंका नाशक बताया गया है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य परम कल्याणमय वैकुण्ठ-धामको जाता है और इस लोकमें सदा श्रीसम्पन्न रहता है। व्यासजी इस प्रकार वह नागतीर्थ सब पापोंको हरनेवाला उत्तम स्थान है। वहाँ राजा बलिकका अद्भुत आश्रम है, जहाँ भगवान् विष्णु सदा स्थित रहते हैं। वहाँ स्नान आदि अवश्य करना चाहिये। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे विशुद्धचित्त हो जाता है।

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नृसिंहतीर्थकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास! अब नृसिंहतीर्थका माहात्म्य श्रवण करो। प्राचीन कालकी बात है। दैत्यराज हिरण्यकशिपुने इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उसके दुष्ट दैत्योंकी सेनासे सारी पृथ्वी छा गयी थी। अतः वह शोकसे पीड़ित हो गौका रूप धारणकर नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। वसुधाको भारसे पीड़ित देख लोकपितामह ब्रह्माजीने उसके कष्टका निवारण करते हुए स्नेहयुक्त वाणीमें कहा—'वसुधे! इस दैत्यने पूर्वकालमें ऐसी दुष्कर तपस्या की थी, जो दूसरे किसी प्राणीके द्वारा असम्भव थी। अतः मैंने प्रसन्न होकर इसे वरदान दिया। इस दैत्यने यह माँगा था कि 'न दिनमें, न रातमें, न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न सूखेसे, न गीलेसे, न अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे, न मनुष्यसे और न पक्षियोंसे मेरी मृत्यु हो। जो केवल एक थप्पड़ मारकर मन्त्री, सेना और वाहनसमेत मुझे मार डालनेमें समर्थ हो, वही वीर मेरी मृत्युका कारण बने।'

तब मैं 'तथास्तु' कहकर वहाँसे अपने लोकको चला आया। तबसे वह अतुलित बलशाली दैत्य समस्त लोकोंका शासक हुआ है।' पृथ्वीसे ऐसा कहकर ब्रह्माजी सब देवताओंसे बोले—'देवगण! अब तुमलोग महाकाल वनमें जाओ। वहाँ सब तीर्थोंमें उत्तम एक महान् तीर्थ है, जो कर्केराजसे उत्तर और संगमेश्वरके दक्षिण भागमें स्थित है। वैकुण्ठतीर्थके समीप वहाँसे पूर्व भागमें शिप्राके मंगलमय तटपर वह उत्तम तीर्थ प्रतिष्ठित है। उसका नाम है नृसिंहतीर्थ। देवताओ! उसी तीर्थमें जाकर तुम स्नान-दानादि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान

९६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो। इससे तुम्हें शीघ्र ही पुनः अपने लोकोंकी प्राप्ति होगी।'

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्र आदि देवता महाकाल वनमें, जहाँ शिप्रा नदी बहती है, गये। वहाँ उन्होंने नृसिंहतीर्थके समीपवर्ती तटपर दीर्घकालतक निवास किया और स्नान-दान आदि करके भगवान् नृसिंहकी आराधना की। इस प्रकार विधिवत् धर्मानुष्ठान करके सब देवता परम सिद्धिको प्राप्त हुए। दुष्टोंका संहार करनेवाले श्रीहरिने नृसिंहरूप धारण करके उसके सभामण्डपमें प्रकट होकर हाथके एक ही तमाचेसे हिरण्यकशिपुका काम तमाम कर दिया। तदनन्तर सब देवताओंने अपना-अपना अधिकार प्राप्त किया। तबसे लेकर प्रतिदिन सब देवता जहाँ भगवान् नृसिंह विराजमान हैं, उस उत्तम तीर्थमें मध्याह्नकालिक उपासना किया करते हैं। जो पवित्रात्मा पुरुष उस तीर्थमें स्नान-दानादि शुभकर्म करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। वह श्रेष्ठ तीर्थ सदा पुण्यदायक माना गया है। जो कभी नृसिंह चतुर्दशीका शुभ पर्व प्राप्त करके उस तीर्थमें स्नान करनेके अनन्तर देवेश्वर नृसिंहजीका एकाग्रचित्तसे दर्शन और पूजन करता है, लक्ष्मी उसके हाथमें आ जाती है।

उसी तीर्थमें पवनकुमार हनुमान्‌जी परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। वे साधकोंके सब अर्थकी सिद्धि करनेके लिये नित्य वहाँ निवास करते हैं। पूर्वकालमें जहाँ अगस्त्यजीने बड़ी कठोर तपस्या की थी, वह वटवृक्ष न्यग्रोधके नामसे विख्यात है। जो स्त्री या पुरुष वहाँ सावित्री व्रतका आचरण करते हैं, वे परम सौभाग्यको प्राप्त होते हैं। सावित्री व्रतका पालन करनेवाली स्त्री अपने पतिको बहुत प्रिय होती है। वह पतिव्रता और परम सौभाग्यवती होकर कभी वैधव्यका दुःख नहीं भोगती।


कुटुम्बेश्वर, देवप्रयाग तथा कर्करराजतीर्थकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं— व्यास ! प्राचीन कालकी बात है। नारदजीने प्रजापति दक्षके साठ पुत्रोंको वैराग्यका उपदेश देकर गृहत्यागी बना दिया, तब दक्ष प्रजापतिने इस उज्जयिनीपुरीमें आकर कुटुम्बवृद्धिके लिये तपस्या की थी। तभीसे वह तीर्थ कुटुम्बेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र हो सनातन ब्रह्माका जप और ध्यान करते हुए प्रजापति दक्षने दस हजार वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की। उस तीर्थके प्रसादसे उन्होंने बहुत-सी सन्तानें प्राप्त कीं। उन प्रजाओंको पाकर ही प्रतापी दक्ष प्रजापतिके नामसे विख्यात हुए। ब्रह्माजीने भी वहाँ दुष्कर तपस्या की है। आज भी वहाँ चतुर्मुख शिवलिंगका दर्शन होता है। वहीं भद्रपीठपर विराजमान एक देवी हैं, जो भद्रकालीके नामसे विख्यात हैं। वे सदा वहीं क्रीड़ा करती और नियमपूर्वक रहती हैं। उन्हींके द्वारपर क्षेत्रपाल भैरवकी स्थिति है। वे भद्रकाली देवीके द्वारा पुत्रवत् पालित होकर सदा चौतरेपर स्थित रहते हैं। जो मनुष्य सदाचारका पालन करते हुए इस तीर्थमें स्नान करते हैं, उन्हें जन्मभर कोई वस्तु दुर्लभ नहीं होती।

फाल्गुन कृष्ण पक्षमें जो त्रयोदशीयुक्त चतुर्दशी होती है, उसे 'शिवरात्रि' कहते हैं। उस दिन मनुष्य स्नान करके रातभर जागरण करे। साथ ही बिल्वपत्र, जल, उत्तम गन्ध, बहुत-से पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र तथा आभूषण आदिके द्वारा गणोंसहित नित्य अविनाशी शिवकी पूजा करे। जो ऐसा करता है, उसका सब पाप नष्ट हो जाता है और वह मनुष्य भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

व्यासजी ! 'देवप्रयाग' नामक तीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला है, वह शिप्रा नदीके पूर्वभागमें प्रतिष्ठित है। उस तीर्थमें स्नान करके जो सुरेश्वर देवमाधवका दर्शन करता है, उसे देवमाधवजी

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६५ ---|---:

मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें दशमीको बुधवार और हस्त नक्षत्रका योग होनेपर गंगाजीके जलका परम पवित्र पर्व दशहरा होता है*। उस दिन गंगाजी (शिप्रा) में स्नान करके मनुष्य सब तीर्थोंका फल पा लेता है।

ब्रह्माजी मार्कण्डेयजीसे कहते हैं—वत्स ! भूतलपर जो अनुपम शिप्रा नदी है, उसके तटपर कर्कराज नामक विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े पापोंका क्षय हो जाता है और मनके सब विकार दूर होते हैं। कर्कके स्थानमें जब सूर्य आते हैं, तबसे तीन ऋतुतक उनकी गति दक्षिणायनकी ओर रहती है। वह धूम्रमार्ग कहलाता है। ऐसे समयमें मृत्यु होनेपर योगी भी इस संसारमें लौट आते हैं (उनकी मुक्ति नहीं होती)। परंतु जो लोग चातुर्मास्य अथवा दक्षिणायनमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके उद्धार एवं सद्गतिके लिये यह कर्कराजतीर्थ निर्मित हुआ है। सब लोकोंमें इसकी महिमाका गान किया जाता है। भगवान् विष्णु सबको मुक्ति देनेवाले हैं। उनके स्मरणमात्रसे सब पापोंका क्षय हो जाता है। संसारमें मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें जन्म पाना और भी दुर्लभ है, वहाँ भी संयमका होना अत्यन्त दुर्लभ है। संयम होनेपर भी सदा कल्याणमय सत्संग प्राप्त होता रहे यह तो नितान्त दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं मिलता, भगवान् विष्णुकी भक्ति और वैष्णव-व्रतके पालनका अवसर नहीं प्राप्त होता, ऐसे स्थानोंमें विशेषतः चातुर्मास्यके समय भगवान् विष्णुके व्रतका पालन करनेवाला पुरुष उत्तम होता है। चातुर्मास्य आनेपर भगवान् विष्णु सदैव कर्कराजतीर्थमें स्थित होते हैं। हृष्ट-पुष्ट शरीरसे युक्त होकर जीवित रहना उसीके लिये शुभ होता है, जिसने चातुर्मास्य आनेपर श्रीहरिका निरन्तर पूजन किया है। भगवान् विष्णुकी भक्ति दुर्लभ है। द्विजश्रेष्ठ ! चौमासेमें कर्कराजतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब यज्ञोंका फल पाते और स्वर्गलोकमें देवताओंकी भाँति सुख भोगते हैं।

भगवान् विष्णुके चरणके अंगुष्ठसे प्रवाहित होनेवाली गंगाजी भी सदा सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी हैं। विशेषतः चातुर्मास्यमें उनकी यह शक्ति और भी बढ़ जाती है। चौमासेमें भगवान् नारायण जलमें शयन करते हैं, इसलिये जलमात्र उस समय भगवान् विष्णुके तेजके अंशसे व्याप्त रहता है। अतः चौमासेमें जलका स्नान सब तीर्थोंसे अधिक महत्त्व रखता है। भगवान् विष्णुके शयन करनेपर उनके नामोंका कीर्तन करते हुए दस प्रकारका स्नान करना चाहिये, जो महान् फल देनेवाला है। ऐसा करनेवाला मनुष्य देवत्वको प्राप्त होता है। स्नानसे मनुष्य सत्यको और सत्यसे सनातन धर्मको पाता है। फिर धर्मसे मोक्षको पाकर वह कभी दुःख नहीं भोगता। भगवान् विष्णु स्नान किये हुए मनुष्यके शरीरका आश्रय लेकर स्थित रहते हैं और समस्त कार्य-कलापोंमें पूर्ण फल देनेवाले होते हैं। सब कर्मोंमें सूर्यनारायणके दर्शनसे शुद्धिका विधान किया गया है परंतु चौमासेमें विशेषतः जलसे शुद्धि होती है। जो शरीरसे अशक्त है, वह भस्मद्वारा स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। मन्त्र-स्नानसे अथवा भगवान् विष्णुके चरणोदकके स्पर्शरूप स्नानसे भी मनुष्यकी शुद्धि होती है। भगवान् विष्णुके आगे स्नान करना उत्तम है। समस्त क्षेत्रों, तीर्थों और नदियोंमें विशेषतः शिप्रा नदीके जलमें और वहाँ भी सर्वश्रेष्ठ कर्कराजतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह विष्णुधामको जाता है। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके शयन करनेपर जबतक हरिबोधिनी एकादशी नहीं आ जाती, तबतक कर्कराजतीर्थमें ही मुक्ति होती है। चौमासेमें भगवान् विष्णुके शयनकालमें भी यदि मनुष्य वहाँ शरीर छोड़ता है तो उसका यमलोकमें निवास नहीं होता।


* ज्येष्ठे मासे सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः । दशहरा जायते व्यास गंगाजन्म परं शुचि ॥ (स्क० पु०, आव० अव० मा० ७८।७)

९६६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अवन्तीक्षेत्रके महत्त्वपूर्ण तीर्थ, देवता, वहाँकी यात्राके क्रम एवं माहात्यका वर्णन

सनत्कुमारजी कहते हैं—एक समय पार्वतीजीने भगवान् शिवसे कहा—'महेश्वर ! इस क्षेत्रके प्रभावका वर्णन कीजिये।'

महादेवजी बोले—देवि! अवन्ती क्षेत्रमें परम पुण्यमयी शिप्रा नदी, दिव्य नवनदी, नीलगंगा तथा गन्धवती—ये चारों मेरी प्रिय नदियाँ हैं। यहाँ चौरासी लिंगोंके रूपमें उतने ही शिव निवास करते हैं; आठ भैरव रहते हैं; ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और छः गणेश हैं तथा देवियोंकी संख्या चौबीस है। भद्रे! यहीं विष्णु और ब्रह्मा आदि सब देवता निवास करते हैं। यह एक योजनका क्षेत्र देव-मण्डलसे व्याप्त है। यहाँ दस विष्णु प्रसिद्ध हैं। उनके नाम सुनो—वासुदेव, अनन्त, बलराम, जनार्दन, नारायण, हृषीकेश, वाराह, धरणीधर, वामनरूपधारी विष्णु तथा लक्ष्मीजीके आश्रयभूत भगवान् शेषशायी। ये दस विष्णु सब पापोंका अपहरण करनेवाले बताये गये हैं। ऋद्धि-सिद्धिदाता, कामदाता, गणपति, विघ्ननाशक, प्रमोदी तथा चतुर्थी-व्रत-प्रिय—ये छः विनायक इस तीर्थमें निवास करनेवाले कहे गये हैं, जो समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाले हैं। उमा, चण्डी, ईश्वरी, गौरी, ऋद्धिदा, सिद्धिदा, वरयक्षिणी और वीरभद्रा—ये आठ मातृकाएँ कही गयी हैं। महामाया सती, जो कपालमातृका नामसे विख्यात हैं, उनके साथ अम्बिका, शीतला, सिद्धिदायिनी, एकानंशा, ब्रह्माणी, पार्वती, योगशालिनी—योगिनी, भगवती कौमारी, षट्कृत्तिका, चर्पटमातृका, वरमातृका, सरस्वती, महालक्ष्मी, योगिनी मातृका, चतुष्षष्ठियोगिनी, कालिका, महाकाली, चामुण्डा, ब्रह्मचारिणी, वैष्णवी, वाराही, विन्ध्यवासिनी, अम्बा तथा अम्बालिका—ये चौबीस पराशक्तियाँ हैं। हनुमान्, ब्रह्मचारी, कुमारेश और महाबली—ये चार पवनपुत्र हनुमान्‌के स्वरूप बताये गये हैं। दण्डपाणि, विक्रान्त, महाभैरव, बटुक, बालक, बन्दी, षट्पंचाशतक तथा अपरकालभैरव—ये आठ भैरव महापापहारक हैं। कपर्दी, कपाली, कलानाथ, वृषासन, त्र्यम्बक, शूलपाणि, चीरवासा, दिगम्बर, गिरीश, कामचारी तथा सर्पांगभूषण शर्व—ये ग्यारह रुद्र बताये गये हैं, जो सब शत्रुओंका नाश करनेवाले हैं। अरुण, सूर्य, वेदांग, भानु, इन्द्र, रवि, अंशुमान्, सुवर्णरेता, अहःकर्ता, मित्र, विष्णु और सनातन—ये बारह आदित्य सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। इस पुरीके चार द्वारपाल हैं, जो महात्मा पुरुषोंको विदित हैं। पूर्व द्वारपर पिंगलेश्वर, दक्षिण द्वारपर कायावरोहणेश्वर, पश्चिम द्वारपर बिल्वकेश्वर तथा उत्तर द्वारपर उत्तरेश्वर विद्यमान हैं। इन सबके अतिरिक्त अन्यान्य बहुतसे शिवलिंग मनोहर महाकाल वनमें बताये गये हैं, जो सबको पवित्र करनेवाले कहे गये हैं। व्यास! यद्यपि महाकाल वनमें शिवलिंगोंकी कोई संख्या नहीं है—वहाँ असंख्य शिवलिंग हैं—तथापि मैंने यहाँ प्रधान-प्रधान लिंगोंका दिग्दर्शनमात्र कराया है। जिस देवताका जो तीर्थ है, वह उसीके नामसे प्रसिद्ध बताया गया है। उनमें स्नान और दान करके मनुष्य उस तीर्थके फलका भागी होता है। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान करते हैं, उनके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन प्राप्त होता है। ब्राह्मण विद्वान् और क्षत्रिय विजयी होता है। इतना ही नहीं, उसकी सन्तान-परम्परा कभी क्षीण नहीं होती और अन्तमें वह भगवान् शिवके लोकमें पूजित होता है।

व्यासजी बोले—भगवन्! मैं आपसे पुनः यह सुनना चाहता हूँ कि सुन्दर महाकाल वनमें अवन्ती क्षेत्रके भीतर कितने तीर्थ विद्यमान हैं?

सनत्कुमारजीने कहा—द्विजश्रेष्ठ! इस विषयमें

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९६७

परम बुद्धिमान् नारदजी तथा भगवान् उमा-महेश्वरका जो संवाद हुआ है, उसे सुनाता हूँ। नारदजीने भगवान् शंकरजीसे पूछा—'प्रभो! महाकाल वनमें कौन-कौन तीर्थ हैं?'<br><br>तब उमासहित महादेवजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! उत्तम महाकाल वनमें जो तीर्थ हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। भूतलपर पुष्करादि जो कोई भी तीर्थ हैं, वे सब उत्तम महाकाल वनमें वर्तमान हैं। केवल रुद्रसरोवरमें असंख्य सहस्र कोटि-कोटि तीर्थ आकर स्नान करते हैं, इसलिये उसका नाम कोटितीर्थ है। हेमन्त ऋतुमें जब हिमालयगिरि हिमकी वर्षा करने लगता है, उस समय किन्नरगण पिशाचमोचन तीर्थमें दृष्टिगोचर होते हैं। मुनिवर! मैं तीर्थोंकी नियत संख्याको तो नहीं जानता कि कितने तीर्थ और कितने लिंग हैं तथापि जो प्रधान-प्रधान तीर्थ हैं, उनकी चर्चा करूँगा। द्विजश्रेष्ठ! एक वर्षमें जितने दिन होते हैं, उतने दिनतक प्रतिदिन यहाँ मनुष्य नये-नये प्रसिद्ध तीर्थोंका स्नान प्राप्त करता है। एक वर्ष पूरा होनेपर अवन्तीपुरीकी यात्रा सम्पन्न होती है। जो विधिपूर्वक अवन्ती-यात्रा पूर्ण कर लेता है, वह देवताओंमें श्रेष्ठ होता है। इसलिये मोक्ष चाहनेवाले पुरुषको बड़े यत्नसे अवन्तीपुरीकी यात्रा करनी चाहिये। विशेषतः वैशाख मासमें अवन्तीपुरीमें स्नान करना चाहिये। जो वैशाख मास आनेपर अवन्तीपुरीमें जाता और एक वर्षतक वहाँ रहकर प्रतिदिन विधिपूर्वक एक-एक तीर्थमें स्नान करता है और सब प्रकारकी वस्तुएँ दान देता है, वह तीर्थसेवनके पूर्ण फलको पाता है। इहलोकमें अतिशय सुखका उपभोग करके अन्तमें शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।<br><br>सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान् शंकरने परम बुद्धिमान् नारदजीसे अवन्तीपुरीके माहात्म्यका वर्णन किया था।व्यासजी बोले—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमारजी! अब आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये, जिससे मनुष्य थोड़े ही समयमें अवन्तीतीर्थके सेवनका पूरा फल प्राप्त कर ले तथा सिद्ध होकर शिवलोकको जाय।<br><br>सनत्कुमारजीने कहा—अनघ! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर महाकाल वनमें जाय और कोटितीर्थमें स्नान करे। ऐसा करनेवाले मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। वत्स! इस भूतलपर शिप्राके समान दूसरी कोई नदी नहीं है, जिसके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। जो वैशाख मासमें भगवान् पुरुषोत्तमका प्रतिदिन पूजन करता है, वह मोचनतीर्थमें एक बार तर्पण करनेमात्रसे मुक्त हो जाता है। जो अवन्तीपुरीमें अंगपात नामक भगवान् विष्णुका दर्शन करते हैं, उनका इस संसारमें पुनरागमन नहीं होता।<br><br>जो सम्पूर्ण तीर्थोंके फलकी इच्छा रखनेवाला हो, वह पवित्र होकर मन-इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए तीर्थ-स्नानका व्रत ग्रहण करे और अट्ठाईस तीर्थोंमें गोता लगावे। कार्तिक, माघ, आषाढ़ और विशेषतः वैशाख मासमें जब कभी भी इस पुरीमें आकर तीर्थ-स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।<br><br>शिप्रा नदीके तटपर जो प्रधान-प्रधान पुण्य तीर्थ हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो—पापपीड़ित मनुष्य 'विष्णु-विष्णु' का स्मरण करता हुआ स्नातक ब्रह्मचारियोंके पालन करनेयोग्य सभी नियमोंको ग्रहण करे। फिर रुद्र-सरोवरमें स्नान करके श्राद्ध-तर्पण आदि करे। तदनन्तर कर्कराज नामक तीर्थस्वरूप तडागको जाय और उसमें स्नान आदि करके घृत-पात्र दान करे। उसके बाद जो परम उत्तम नृसिंहतीर्थ है, उसमें स्नान करे और काला मृगचर्म दान दे। वहाँसे शिप्रा
९६८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और नीलगंगाके संगमपर जाय। उसमें स्नान करके पवित्र हो संगमेश्वर शिवका दर्शन करके ब्राह्मणोंको विविध वस्तुएँ दान दे। वहाँसे व्रती पुरुष पिशाचमोचन तीर्थकी यात्रा करे। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके दैनिक कृत्य करे। उसके बाद विद्वान् ब्राह्मणको सवत्सा गौ दान दे। उस तीर्थमें सभी महादान करने चाहिये। तदनन्तर पिशाचेश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् व्रतपालक, नियमपरायण पुरुष गन्धर्वतीर्थकी यात्रा करे और उसमें स्नान करके पवित्र हो एकाग्रचित्तसे पितरोंका श्राद्ध करे। फिर षष्टिंजलपेश्वर देवकी विधिवत् पूजा करनेके अनन्तर ब्राह्मणोंको गृहदान आदि करे। वहाँसे केदार नामक उत्तम तीर्थको जाय और उसमें स्नान करके ब्राह्मणोंको दान दे। उस तीर्थमें कम्बल, मृगचर्म और वस्त्र भी देने चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् चक्रपाणिकी भलीभाँति पूजा करे। ऐसा करनेसे वह विष्णुलोकमें पूजित होता है। सोमतीर्थमें स्नान करके सोमेश्वर शिवका दर्शन करनेसे मनुष्यका शरीर निर्मल हो जाता है। उसे कोढ़ आदिका रोग नहीं सताता। वहाँ ब्राह्मणके लिये ईख और गौ आदि दान देना चाहिये। तदनन्तर मनुष्य स्नानके लिये देवप्रयागतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करके पवित्र हो देवमाधवजीकी पूजा करे। फिर विधिपूर्वक ब्राह्मणको गुड़ की बनी हुई गौ दान करनी चाहिये। जो ऐसा करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। व्यासजी ! प्रयागमें अति उत्तम वेणी तीर्थ है। वहाँ तिल और आँवलेके साथ स्नान करना चाहिये। स्नानके पश्चात् प्रयागेश्वरका पूजन करके मनुष्य तीर्थसेवनके सम्पूर्ण फलका भागी होता है। वहाँ ब्राह्मणको विधिपूर्वक तिलकी गौ देनी चाहिये। जो ऐसा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिका वरदान पाकर भगवान् विष्णुके लोकमें आनन्द भोगता है। वहाँसे व्रतका पालन करनेवाला पुरुष परम उत्तम योगतीर्थमें जाय और स्नान करके पवित्र हो योगिनीश्वरका पूजन करे। पूजाके पश्चात् वह जलमयी (बर्फकी बनी हुई) गौ दान करे। इससे मनुष्य दीर्घायु और सुखी होता है। तत्पश्चात् कपिलाश्रमतीर्थमें जाय और स्नान-दानादि करके कपिलेश्वरका पूजन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होकर तपोलोकको जाता है। तदनन्तर शिप्राके पश्चिम तटपर जो घृतकुल्या नामक उत्तम तीर्थ है, वहाँ स्नान करके मनुष्य प्रतिदिन घृतधारयेश्वर शिवका पूजन करे और ब्राह्मणको घृतमयी धेनुका दान करे। ऐसा करके वह पुण्यात्माओंके लोकमें जाता और सब पापोंसे मुक्त होता है। तत्पश्चात् मधुकुल्यातीर्थमें स्नान करके मधुकुल्येश्वर शिवका पूजन करे और मधु एवं इक्षुधेनुका दान करे। उससे आगे सब तीर्थोंका फल प्रदान करनेवाला ऊसर नामक उत्तम तीर्थ है। उसमें स्नान करके मनुष्य ऊसरेश्वर महादेवका दर्शन करे। उस तीर्थमें फल, मूल आदिका दान करना चाहिये। इससे उत्तम मोक्षकी प्राप्ति होती है। जहाँ नरादित्य स्थित हैं, वहाँ भी उत्तम तीर्थ बताया गया है। वहाँ स्नान करनेके पश्चात् मनुष्य क्षेत्रादित्येश्वरका दर्शन करे। दर्शनके पश्चात् रथका दान करे तो भगवान् नरके लोकमें जाता है। भगवान् केशवार्क वहाँके प्रधान देवता हैं। उनका तीर्थ भी बहुत उत्तम बताया गया है। वहाँ स्नान और केशवादित्यका पूजन करना चाहिये। उस तीर्थमें नाना प्रकारके अन्नदानका विधान है। वहाँ स्नान करके पवित्र हो मनुष्य एकाग्रचित्तसे पापनाशिनी भगवती एकानंशाका पूजन करे। तदनन्तर दशाश्वमेधेश्वर शिवकी आराधना करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६९ ---|---

सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वे जो पृथ्वीके पुत्र अंगारक देव (मंगल) हैं, उनका उत्तम तीर्थ सब तीर्थोंका फल प्रदान करनेवाला है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य मंगलेश्वरका पूजन करे। जहाँ गंगा और आकाशगंगाका संगम है, उस तीर्थमें स्नान करके गंगेश्वरका दर्शन करे। इससे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होता और विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ऋणमोचनतीर्थ सब पापोंका अपहरण करनेवाला है। उसमें स्नान करके मनुष्य ऋणर्तेश्वरका पूजन करे। फिर अपनी शक्तिके अनुसार दान करके घृत-श्राद्ध करे। इससे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। ऋणमोचन तीर्थसे चलकर पापरहित शक्तिभेद नामक तीर्थमें जाय। वह सब तीर्थोंमें उत्तम और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर विद्वान् पुरुष समस्त मातृकाओंका दर्शन करे। फिर वहाँ विधिपूर्वक श्राद्ध करके शय्या आदि दान करे। ऐसा करनेवाला पुरुष माताके ऋणसे छूटकर सायुज्य मोक्ष पाता है। पापमोचन नामक जो श्रेष्ठ तीर्थ है, वहाँ श्राद्ध करके मनुष्योंको छायादान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वे शुद्धचित्त हो जाते हैं। तत्पश्चात् विश्वविख्यात प्रेतशिला नामक तीर्थमें जाय, जो प्रेतोंको मोक्ष देनेवाला है। उसमें स्नान करके मनुष्य श्राद्धका दान करे, क्योंकि वहाँ तिलसहित जलद्वारा तर्पण करनेसे पितर उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। वहाँ रस और नमकके साथ अन्नका दान करना चाहिये। यमेश्वरकी पूजा करके मनुष्य कभी नरकमें नहीं पड़ता और उसके पितर प्रसन्न होकर सनातन ब्रह्मपदको प्राप्त होते हैं। जहाँ नवनदीका संगम है, वहाँ त्रिभुवन-वन्दित उत्तम तीर्थ है। वहीं पार्वती माता निवास करती हैं। उसमें स्नान करके पवित्र हो एकाग्रचित्तसे कल्याणमयी भगवती पार्वतीकी विधिपूर्वक पूजा करे, महादान दे। ऐसा करनेसे शुद्धचित्त मानव साक्षात् शिव होता है। नवनदी-संगमसे चलकर मन्दाकिनी तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके पवित्र हो जो मनुष्य भगवान् सदाशिवका पूजन करता है और अन्न आदि देकर एक दोन तिलका दान करता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर कुबेरके समान हो जाता है। तदनन्तर व्रतका पालन करनेवाला पुरुष ब्रह्माजीके उत्तम तीर्थमें जाय। विधिपूर्वक स्नान करे और सब प्रकारके दान दे। तत्पश्चात् यात्रेश्वर शिवका तुलसी, बिल्वपत्र तथा नाना प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंद्वारा पूजन करके उन्हें धूप, दीप, नैवेद्य, मुखशुद्धि तथा उत्तरीय आदि अर्पण करे और व्रतकी पूर्तिके लिये उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे—

यात्रेश्वर नमस्तुभ्यमुमानाथ जगत्पते।
त्वत्प्रसादात्कृतां यात्रां सफलां कुरु मे प्रभो॥

'यात्रेश्वर! उमानाथ! जगत्पते! आपको नमस्कार है। प्रभो! आपके प्रसादसे मैंने यह यात्रा की है। कृपया इसे सफल बनाइये।'

सनत्कुमारजी कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जो अवन्तीकी यात्रा करता है, उसे अवन्तीतीर्थमें निवास करनेका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है। वह इस लोकमें नाना प्रकारके भोग, धन, स्त्री तथा सम्पत्ति आदिका सुख भोगकर सब पापोंसे शुद्धचित्त हो मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके लोकमें जाता है। जो मनुष्य इस पवित्र एवं पापहारिणी कथाको सुनते हैं, उनके लिये इस लोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।

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अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य सम्पूर्ण।

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१६. अवन्तीखण्ड (रेवाखण्ड)

९७०
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रेवाखण्ड

राजा युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा पुरूरवाकी तपस्यासे नर्मदाजीके मर्त्यलोकमें आगमनका वर्णन

सूतजी बोले— तपोधनो! एक समय महातेजस्वी मार्कण्डेयमुनि तीर्थयात्राका फल पाकर नर्मदाके तटपर बैठे हुए थे। वहीं उनका दर्शन करनेके लिये बहुत-से ऋषि-महर्षि आये। पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, क्रतु, भृगु, अत्रि, मरीचि, भारद्वाज, काश्यप, मनु, यम, अङ्गिरा, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, शम्बकाव्य (शुक्राचार्य), कात्यायन मुनि, गौतम, शंख, लिखित, दक्ष, कात्यायन, जामदग्न्य, याज्ञवल्क्य, ऋष्यशृंग, विभाण्डक, गर्ग, शौनक, दाल्भ्य, व्यास, उद्दालक, शुक, नारद, पर्वत, दुर्वासा, उग्रतापस, शाकल्य, गालव, जाबालि, मुद्गल और कौशिक-कुलोत्पन्न विश्वामित्र आदि देवसम्मानित महर्षि तथा धर्म, शतानन्द, वैशम्पायन, वैष्णव, शाकलायन, वार्धक्य, जुहुति, आवसु, भूमण्डल-निवासी महात्मा बालखिल्य आदि भी वहाँ उपस्थित हुए।

उसी समय तीर्थयात्राका फल सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर वेदवेत्ता एवं ज्ञानी ब्राह्मणों तथा अपनी प्रिया द्रौपदीके साथ नर्मदातटपर मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर आये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भाइयोंसहित तीन बार मुनिकी परिक्रमा की और उन्हें साष्टांग प्रणाम करके बैठ गये। राजाको बैठा देख महामुनि मार्कण्डेय बोले—‘नृपश्रेष्ठ! भाइयों और ब्राह्मणोंके साथ कुशलसे तो हो न?’ युधिष्ठिरने हँसकर कहा—‘मुने! आज आपके चरणारविन्दोंका दर्शन पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। मेरे अन्तःकरणका मल नष्ट हो गया। तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगा, यमुना और सरस्वती, गंगाद्वार, हिमालय, कुब्जार्क, ब्रह्मयोनि, उग्रतीर्थ, कनखल, केदार, भैरवक्षेत्र, नैमिषारण्य, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर इत्यादि पवित्र तीर्थोंको छोड़कर आप किस प्रयोजनसे केवल महानदी नर्मदाका ही सेवन करते हैं, इस बातको हम सब लोग सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके इस रहस्यको बतावें।’

मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! पूर्वकालकी बात है, चन्द्रवंशमें पुरूरवा नामसे विख्यात एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। वे स्वर्गलोकका शासन करनेवाले इन्द्रकी भाँति समूची पृथ्वीका पालन करते थे। एक समय राजसभामें उन नृपश्रेष्ठने बड़े-बूढ़े ब्राह्मणोंसे पूछा—‘विप्रवरो! पापमोहित मनुष्य किस उपायसे यज्ञ आदि कर्मोंके बिना ही स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं और हो सकते हैं, यह बताइये।’

ब्राह्मणोंने कहा— महाराज! नर्मदा नदी सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। वे सम्पूर्ण विश्वका पापहरण करनेमें समर्थ हैं। उन्हें स्वर्गलोकसे आप इस पृथ्वीपर उतारें। अपने मनको वशमें रखनेवाले उन ब्राह्मणोंका यह वचन सुनकर राजा पुरूरवाने कन्द, मूल, फल, शाक और जलका आहार करके निर्मल अन्तःकरणसे महादेवजीकी आराधना की। तब महादेवजीने प्रसन्न होकर कहा—‘बेटा! वर माँगो। मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वस्तु प्रदान करूँगा।’

पुरूरवा बोले— महादेव! आप समस्त लोकोंके हितके लिये नर्मदा नदीको पृथ्वीपर उतारिये। आज लाख योजनका विशाल जम्बूद्वीप निराधार हो रहा है। न देवता तृप्त होते हैं, न पितर और न मनुष्योंको ही तृप्ति हो रही है।

महादेवजीने कहा— राजन्! तुम तो अयाच्य वस्तुकी याचना करते हो। ऐसा वर तो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। नर्मदाको छोड़कर दूसरा जो कुछ भी वर माँगो, मैं दूँगा।

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७१

पुरूरवा बोले—महादेव! मैं प्राण जानेपर भी दूसरा वर नहीं माँगूँगा।

राजाका यह निश्चय जानकर तथा उग्र तपस्या-द्वारा उनके किये हुए साधनको देखकर महादेवजीने नर्मदाको आज्ञा दी—सुरेश्वरि! तुम पृथ्वीपर उतरो और पुरूरवाकी तपस्याके फलसे मृत्युलोकके हितका साधन करो।

नर्मदाने कहा—महेश्वर! मैं बिना किसी आधारके स्वर्गलोकसे पृथ्वीपर कैसे जाऊँगी?

नर्मदाकी यह बात सुनकर देवाधिदेव महादेवजीने आठ पर्वतोंको बुलाया और उन सबसे पूछा—'तुममेंसे नर्मदा नदीको धारण करनेमें कौन समर्थ है?' तब विन्ध्यगिरिने कहा—'सुरेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा पुत्र नर्मदाको धारण करनेमें समर्थ है। उसका नाम पर्यंक है।' तत्पश्चात् महादेवजीकी आज्ञा मिलनेपर पर्यंकने कहा—'महेश्वर! आपके प्रसादसे मैं नर्मदा नदीको धारण करूँगा।' तदनन्तर नर्मदादेवी पर्यंकगिरिके शिखरपर स्थित होकर उतरीं। उनकी जलराशिके वेगपूर्वक भ्रमणसे पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी जलसे आप्लावित हो उठी। सम्पूर्ण जगत् अकालमें ही प्रलयकालसे ग्रस्त हो गया। तब सम्पूर्ण देवताओंने मेकलकन्या नर्मदाकी स्तुति की और कहा—'कल्याणि! तुम मर्यादा धारण करो। किसी नियत सीमामें स्थित रहो और इस प्रकार विश्वके लिये हितकारिणी बनो।' देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर महादेवजीकी आज्ञासे नर्मदादेवीने पुनः अपने रूपको संकुचित कर लिया। अब वे संवृतरूपसे बहने लगीं। उस समय नर्मदाजीने पुरूरवासे कहा—'वत्स! तुम अपने हाथसे मेरे जलका स्पर्श करो।' उनकी आज्ञा पाकर पुरूरवाने उनके जलका स्पर्श एवं आचमन करके पितरोंका तिल और नर्मदा-जलसे तर्पण किया। उस जलसे तर्पण करनेपर राजाके समस्त पितर उस परम पदको प्राप्त हो गये, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। समस्त चराचर जगत् सब ओरसे पवित्र हो गया। वे देश, पर्वत, ग्राम और आश्रम भी पवित्र हैं, जहाँ नर्मदाजी विद्यमान हैं। सरस्वतीका जल तीन दिनमें पवित्र करता है। यमुना-जल सात दिनमें पावन बनाता है, गंगा-जल स्नान करनेपर तत्काल पवित्र करता है, परंतु नर्मदा नदी दर्शनमात्रसे ही मनुष्योंको पवित्र कर देती है। नर्मदाके संगममें जहाँ-कहीं भी स्नान, दान, जप, होम, वेदपाठ, पितृपूजन, देवाराधन, मन्त्रोपदेश, संन्यास और देहत्याग आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसके फलका अन्त नहीं है। वैशाख, माघ अथवा कार्तिककी पूर्णिमाको, विषुवयोगमें, संक्रान्तिके समय, व्यतीपात और वैधृतियोगमें, अमावास्यामें, तिथिकी हानि और वृद्धिके दिन, मन्वादि युगादि और कल्पादि तिथियोंमें, माता-पिताके क्षयाहमें नर्मदा-तटवर्ती ॐकार भृगुक्षेत्र तथा विशेषतः संगममें जो सहस्र, शत अथवा एक गोदान एवं सम्पूर्ण महादान करता है तथा जो श्रेष्ठ मनुष्य नर्मदामें स्नान, दान, जप, होम और पूजन आदि करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। युधिष्ठिर! मनुष्य नर्मदामें जहाँ-जहाँ स्नान करता है, वहीं-वहीं उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर नर्मदाका कीर्तन करता है, उसका सात जन्मोंका किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है तथा जहाँ संगम और बाणलिंगसे युक्त नर्मदा नदी स्थित है, वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता और अन्तमें शिवधामको जाता है।

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९७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


राजा हिरण्यतेजाके तपसे नर्मदाका अवतरण

युधिष्ठिरने पूछा— भगवान्! राजा पुरूरवासे पहले महाराज हिरण्यतेजाने नर्मदादेवीको किस प्रकार इस पृथ्वीपर उतारा था, यह बतानेकी कृपा करें।

मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! चन्द्रवंशमें हिरण्यतेजा नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि हो गये हैं, जो समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा प्रजापतिके समान थे। वे पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीका एकछत्र शासन करते थे। उनकी राजधानी चन्द्रपुरी थी, जो इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। एक समय अमावास्याको सूर्यग्रहण लगनेपर इस जम्बूद्वीपमें बावली, कुआँ और सरोवर होनेपर भी कोई नदी नहीं उपलब्ध हो सकी, जहाँ देवताओं और पितरोंका विशेष सत्कार हो सके। उस समयतक जम्बूद्वीपमें कोई नदी थी ही नहीं। राजाने लाखों गौएँ, सुवर्ण, मणि, रत्न, खजाना, घोड़े और अगणित मतवाले हाथी ब्राह्मणोंको दानमें दिये। हव्य और कव्यसे पितरोंको भी तृप्त किया। उस समय उन्होंने देखा, पितरोंको जलपानका बड़ा कष्ट है। वे पितरोंसे बोले—'आपलोग कौन हैं और किस कर्मसे पवित्र हो सकते हैं?'

पितर बोले— महाभाग! यह द्वीप नदियोंसे रहित होनेके कारण यहाँका सब धर्म-कर्म नष्ट हो चुका है। नदीके अभावमें न तो देवता तृप्त होते हैं, न पितर। यदि इस द्वीपमें नर्मदा उतर आवे तो हम सब लोगोंकी मुक्ति हो जायगी। महाराज! यह यथार्थ बात हमने आपसे बता दी है। अब आपकी जैसी रुचि हो, वैसा करें।

हिरण्यतेजाने कहा— अब मुझे पितरोंका उद्धार करना ही उचित प्रतीत होता है। अन्यथा इस राज्यसे क्या काम? यदि मैं पितरोंको तृप्त न कर सका तो मेरा जीवन भी व्यर्थ है।

ऐसा कहकर राजा हिरण्यतेजा उदयाचल पर्वतपर गये और कन्द, मूल एवं फलका भोजन करते हुए भगवान् शिवकी उपासना करने लगे। उन्होंने बड़ी कठोर तपस्या की। उनकी उत्तम भक्ति जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। राजाने देवाधिदेव महादेवके दिव्य रूपका दर्शन पाकर उनकी तीन बार परिक्रमा की और साष्टांग प्रणाम करके उनका स्तवन किया।

राजा बोले— सुरेश्वर! आपको नमस्कार है। शूलपाणे! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, बुद्धि, मन, अहंकार, प्रकृति और उसके तीनों गुण हैं। आप ही सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक, सर्वत्र व्यापक, समस्त कलाओंसे युक्त तथा कलारहित अविनाशी परमेश्वर हैं। ब्रह्मा और विष्णु आदि देवताओंको भी आपके आदि-अन्तका पता नहीं लगता। महातेजाका किया हुआ यह स्तोत्र सुनकर देवदेव जगदीश्वर शिवने कहा—'महाभाग! तुम अपने इच्छानुसार वर माँगो।' तब राजाने कहा—'देवेश्वर! सात कल्पोंतक प्रवाहित होनेवाली नर्मदादेवीको आप मर्त्यलोकमें उतारें। पितर घोर नरकमें डूब रहे हैं। उनका उद्धार हो और वे तृप्त होकर मुक्ति एवं परम गतिको प्राप्त हों, इसके लिये नर्मदादेवीका अवतरण आवश्यक है।'

महादेवजी बोले— तात! नर्मदाजी तो ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं, दैत्यों तथा अन्य अल्पजीवी प्राणियोंद्वारा पृथ्वीपर नहीं उतारी जा सकतीं। अतः तुम कोई दूसरा वर माँगो। उसे अभी दे दूँगा।

तब महाभाग राजा हिरण्यतेजाने कहा— प्रभो! आपके प्रसन्न होनेपर तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं। मैं तो सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी दूसरा वर नहीं माँगूँगा। देवेश्वर! मैं आपके सेवकोंका भी सेवक हूँ। मुझे नर्मदाजीको ही दीजिये।

राजाका यह निश्चय जानकर भगवान् शंकरने लोकपावनी नर्मदादेवीका आवाहन किया। वे मगरके आसनपर आरूढ़ हो दिव्यरूपसे आकर शिवजीके आगे खड़ी हुईं और उमा-महेश्वर दोनोंके चरणोंका

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *९७३
स्पर्श करके नतमस्तक हो बोलीं—‘देवेश! किसलिये मेरा स्मरण किया गया?’<br><br>महादेवजीने कहा—नर्मदे! राजा हिरण्यतेजाने अपना राज्य छोड़कर यहाँ चौदह हजार दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की है; अतः तुम इनकी इच्छाके अनुसार पृथ्वीपर उतरो। शीघ्र जाओ और नरकमें पड़े हुए सब पितरोंका उद्धार करो।<br><br>नर्मदा बोलीं—देव! मैं बिना किसी आधारके जम्बूद्वीपमें कैसे जाऊँगी।<br><br>यह सुनकर महादेवजीने पर्वतोंसे कहा—तुम सब लोग क्षणभर स्थिर हो जाओ, जिससे सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा पृथ्वीपर जाय।<br><br>तब पर्वतोंने कहा—देव! हम नर्मदादेवीको धारण करनेमें असमर्थ हैं। उसी समय उदयाचलने खड़े होकर कहा—‘महादेवजीकी कृपासे मैं नर्मदाको धारण करनेमें समर्थ हूँ।’<br><br>तदनन्तर उदयाचलकी चोटीपर चरण देकर नर्मदादेवी आकाशसे पृथ्वीपर आयीं और वायुके समान वेगसे पश्चिम दिशाको बह चलीं। उस समय तीनों लोकोंमें बड़ा हाहाकार मचा। नर्मदाके जलका वह भयंकर कल-कल नाद सुनकर पाताललोकसे एक तेजोमय प्रज्वलित लिंग प्रकट हुआ और हुंकारपूर्वक बोला—‘सब पापोंको हरनेवाली तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली नर्मदे! मर्यादा धारण करो। तुम्हें धारण करनेके लिये महादेवजीने तीन पर्वतोंकी सृष्टि की है—मेरु, हिमवान् और कैलाश तथा चौथा पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य भी तुम्हें धारण करनेमें समर्थ है। इन पर्वतोंकी लंबाई पूर्वसे पश्चिम दिशाकी ओर बत्तीस हजार योजन है और दक्षिणसे उत्तरकी ओर चौड़ाई पाँच सौ योजनकी है।’<br><br>तत्पश्चात् राजर्षि हिरण्यतेजाने नर्मदासे कहा—देवि! आपने हमारे पितरोंका उद्धार करनेके लिये बड़ा अनुग्रह किया है। नर्मदाने उत्तर दिया—‘राजन्! तुमने मेरे लिये महादेवजीकी आराधना एवं तपस्या की है, इसलिये जो तुम्हारे माता-पिताके वंशके लोग हैं, वे और तुम्हारी रनिवासमें रहनेवाली स्त्रियोंके भी जो सगे-सम्बन्धी हैं, वे सब मेरे प्रभावसे उमा-महेश्वरके लोकमें चले जायँगे।’<br><br>तब राजाने नर्मदामें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा श्राद्ध और पिण्डदान किया। इससे उनके सब पितर नरकसे निकलकर देवयानमार्गपर स्थित हुए। यह नर्मदाका पहला अवतरण आदिकल्पके सत्ययुगमें हुआ था। दूसरा अवतार दक्षसावर्णि मन्वन्तरमें हुआ और तीसरा अवतार राजा पुरूरवाके द्वारा वैष्णव मन्वन्तरमें सम्पन्न हुआ है। राजन्! यह प्राचीन वृत्तान्त जैसा मैंने अपनी आँखों देखा है, वैसा बतलाया। नर्मदामें स्नान करने, गोता लगाने, उसका जल पीने तथा स्मरण और कीर्तन करनेसे अनेक जन्मोंका घोर पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।

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नर्मदाका मर्त्यलोकमें आकर पुरुकुत्सुको अपना पति बनाना तथा नर्मदास्नानकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! क्षत्रियकुलमें उत्पन्न पुरुकुत्सु नामक राजा महान् यशस्वी हो गये हैं। उन्होंने पहले एक सहस्र वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने पूछा—‘राजन्! तुम कौन-सा वर चाहते हो?’ राजाने कहा—‘देव! नर्मदा नामसेप्रसिद्ध परम सौभाग्यशालिनी नदी है, उसे आप इस भूतलपर उतारें।’ महादेवजी बोले—‘राजन्! इसे न माँगकर कोई दूसरा वरदान माँगो।’ इतना सुनते ही वे महाभाग क्षत्रिय पुरुकुत्सु मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। यह देख शिवजीने कहा—‘राजन्! तुम स्वस्थ हो जाओ। मैं सरिताओंमें

९७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


श्रेष्ठ नर्मदाको मर्त्यलोकमें उतारता हूँ।' तदनन्तर महादेवजीके कहनेपर पर्यङ्क नामक पर्वतने महानदी नर्मदाके वेगको धारण करना स्वीकार किया। राजा और देवताओंके साथ देवी नर्मदा बड़े वेगसे चली और पर्यङ्क-पर्वतकी चोटीपर होती हुई उस स्थानपर पहुँची, जहाँ पूर्वकालमें राजा पृथुने अश्वमेध यज्ञ किया था। वहीं एक बाँसके मूलभागसे महानदी नर्मदा निकली। उस समय सब देवता, गन्धर्व, यक्ष, मरुत्, अश्विनीकुमार, पिशाच, राक्षस, नाग और तपोधन ऋषि—सब लोग अर्घ्य और पाद्यसे पूजन करके नर्मदाजीकी शरणमें प्राप्त हुए और बोले—'आज हमलोगोंका जन्म सफल हुआ। हमारी तपस्या भी सफल हो गयी। देवि! यहाँ तुम्हारा दर्शन करके हम सब देवता कृतार्थ हो गये। हम उसीको पुरुष मानते हैं, जिसने नर्मदाजीको यहाँ उतारा है। नर्मदे! तुम अपने हाथसे देवताओंका स्पर्श करो, जिससे हम सब लोग पवित्र हो जायें।'

यह सुनकर नर्मदा बोलीं—मैं अबतक कुमारी हूँ, मेरा पति नहीं है। अतः मैं देवगणोंका स्पर्श नहीं कर सकती। नर्मदाका यह उत्तर पाकर देवता चिन्तासे व्याकुल हो उठे और बोले—'देवि! तुम्हारे समान रूप-गुणसे सम्पन्न उत्तम वर कहाँसे प्राप्त हो सकता है। जिसने तुम्हें इस लोकमें प्रकट किया है, वही तुम्हारा पति हो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके शापसे समुद्र मर्त्यलोकमें जाकर राजा पुरुकुत्सके रूपमें उत्पन्न हुआ है। वह इक्ष्वाकुकुलके आनन्दको बढ़ानेवाला है। वह देवतुल्य क्षत्रिय पुरुकुत्सु तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर हो।'

नर्मदा बोलीं—जिनमें इस प्रकार देवत्व है, जिनकी समस्त प्रजा धर्ममें स्थित है, उन महात्मा पुरुकुत्सुके लिये और क्या कहा जा सकता है। स्वयम्भू ब्रह्माजीके मानसपुत्र जिस प्रकार धर्मनिष्ठ बताये गये हैं, उसी प्रकार ये पुरुकुत्सु भी सब धर्मोंके पालनमें तत्पर हैं। अतः मैं इनको पतिरूपमें स्वीकार करती हूँ।

राजा पुरुकुत्सु बोले—नर्मदे! तुम देवकन्या हो। मुझपर कृपा करो, जिससे मेरे पितर स्वर्गको जायें और मेरा भी महान् यश हो।

नर्मदाने कहा—राजेन्द्र! ऐसा ही हो। आप मुझसे जो-जो चाहते हैं, वह सब मेरे प्रसादसे आपको प्राप्त हो।

ऐसा कहकर देवी नर्मदा पर्यङ्कपर्वतसे निकलकर पश्चिम दिशाकी ओर चली गयीं। वे धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति पृथ्वीको विदीर्ण करती और पर्वत-शिखरोंको तोड़ती-फोड़ती हुई बड़े वेगसे चली जा रही थीं। उस समय विन्ध्य पर्वतके प्रदेशमें वे जहाँ-जहाँ गयीं, वहाँ-वहाँ स्नान किया जाता है। वहाँ तीर्थवर्जित स्थानमें भी स्नान करनेपर सहस्रों गंगास्नानका फल होता है। तदनन्तर वेदज्ञ महर्षियोंने सुखका विस्तार करनेवाली लोकपावनी महादेवी नर्मदाका स्तवन किया। वेद धर्मके मूल हैं, स्मृतियाँ फूल और फल हैं, अग्निहोत्रपरायण पुण्यात्मा द्विज उस फलका उपभोग करते हैं। परंतु वे भी नर्मदाको स्वर्गकी सीढ़ी समझकर उसका सेवन करते हैं। जहाँ-जहाँ भगवान् शिवके शुभ मन्दिरके समीप पुण्यमयी नर्मदा विद्यमान हैं, वहाँ-वहाँ नर्मदा नदीका स्नान एक लाख गंगास्नानके समान होता है। अग्निहोत्रसे जो पुण्य होता है और पितरोंके श्राद्धसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब नर्मदाके जलसे उपलब्ध हो जाता है। नर्मदाके नामका कीर्तन करना और उसके संगमतीर्थमें दान देना, इसके समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो बुद्धिमान् प्रातःकाल उठकर नर्मदा नदीका स्नान करते हैं, उनका पहले जन्मका और इस जन्मका किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। कोई भी मनुष्य यदि नर्मदामें जहाँ-कहीं भी स्नान कर लेता है, उसका किया हुआ सौ जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो नर्मदाके तटपर मृत्युको प्राप्त होता है, वह भगवान् शंकरके स्वरूपको प्राप्त होता है। जहाँ नर्मदा नहीं हैं,

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७५

वहाँ पापोंका प्रायश्चित्त करनेकी प्रेरणा की जाती है; परंतु नर्मदाजल प्राप्त होनेपर तो प्रायश्चित्तकी आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।

विन्ध्यगिरिके आठ मानसपुत्र बताये गये हैं, जिनमें पर्यंक प्रथम है। उसे सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ जानना चाहिये। नर्मदाके डेढ़ सौ स्रोत कहे गये हैं। आधे कोसके तृतीय भाग (पाँच सौ सत्तासी गज)-की चौड़ाईमें उसकी धारा बहती है, ऐसा विज्ञ पुरुषोंने बताया है। युधिष्ठिर! परमेश्वरी नर्मदाने देवताओं और मनुष्योंके हितके लिये स्वयं ही अपने-आपको धारण किया है। वे समस्त सरिताओंमें श्रेष्ठ हैं और सम्पूर्ण जगत्‌को तारनेके लिये ही यहाँ अवतीर्ण हुई हैं। उनके तटपर स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही स्थित हैं।

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नर्मदा-तटवर्ती अनन्तपुर एवं व्यासतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके उत्तर 'अनन्तपुर' नामक एक स्थान है, जहाँ सब पापोंका हरण करनेवाला अनन्तसिद्धि नामक लिंग है। उस अनन्तपुरमें ही वैश्रवण तीर्थ, कौबेरतीर्थ, घनदतीर्थ, मणिभद्रतीर्थ और यज्ञतीर्थ हैं, जो परम पवित्र, सर्वलोकप्रसिद्ध, मनोवांछित फल देनेवाले तथा मोक्षदायक हैं। वहीं ऋषियोंके पवित्र आश्रम भी हैं, जो सर्वदेवमय एवं शुभ हैं। वहाँ सावर्णि, कौशिक, अघमर्षण, शाकल्य, कुशाकर्ण्य, शरभंग, अग्निगर्भ—ये तथा और भी बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि रहे थे, जो तपस्या करके इस नर्मदा तीर्थके माहात्म्यसे स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। ऋषियोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकिजीने भी इसी तीर्थके प्रभावसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न शरीर प्राप्त किया था। इक्ष्वाकु, कुवलयाश्व, दिलीप, नहुष, वेणु, राजा ययाति, अजपाल और हैहय—ये तथा अन्य भी बहुत-से राजाओंने अनन्तपुरमें निवास किया है। इस अनन्तपुरके क्षेत्रमें ही नर्मदाके तटपर जो भगवान् महेश्वर निवास करते हैं, उनका विधिपूर्वक पूजन करके वे सभी नरेश स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। अनन्तपुरमें सप्तर्षितीर्थ, सप्तसारस्वत-तीर्थ, अमर्त्यसम्भव लिंग, अरण्यकेश्वर लिंग, अघौघनाशन तीर्थ, कल्मषापहतीर्थ, पंचब्रह्ममयतीर्थ, सहस्रशीर्षा महादेव, वाराहतीर्थ, वामनतीर्थ, यमतीर्थ, सौरभंगतीर्थ, सहस्राश्वमेधतीर्थ, हिरण्यगर्भतीर्थ, सावित्रीतीर्थ और चतुर्वेदतीर्थ—ये सभी तीर्थ सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले और श्रेष्ठ हैं। पर्यंक पर्वतसे पश्चिम जहाँतक अनन्तपुरका क्षेत्र है, वह परम शुभ है। इसके भीतर जिनकी मृत्यु होती है, वे दान-धर्मसे रहित हों तो भी चौदह इन्द्रोंके समयतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं। तदनन्तर द्वीपेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है, जो व्यासतीर्थ कहलाता है। वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वह इच्छानुसार उत्तम फल देनेवाला श्रेष्ठ तीर्थ है। द्वीपेश्वरमें स्नान करके जो वृषभ-दान करता है, वह सुवर्णमय विमानसे स्वर्गलोकमें जाता है। जो मनुष्य कार्तिकके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए वहाँ भगवान् शिवको स्नान कराता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें सम्मानित होता है। ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता और तपोधन ऋषि, व्यासतीर्थमें जाकर भावितात्मा भगवान् शंकरकी स्तुति करते हैं। दूसरे भी जो सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर और नाग आदि हैं, वे नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे भगवान् शंकरका स्तवन करते हुए कहते हैं कि 'जिनके हाथमें शक्ति है, जिनके समान शक्तिशाली वीर दूसरा कोई नहीं है, वे समस्त देवताओंद्वारा आराधित और पूजित सुरश्रेष्ठ भगवान् भूतनाथ जिसको चाहें ऊँचा उठा सकते हैं और जिसे चाहें अवनतिमें डाल सकते हैं। जिनके एक बाणसे त्रिपुर भस्म कर दिया गया, जिनके ललाटवर्ती नेत्रद्वारा देखनेमात्रसे कामदेव

९७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भस्म हो गया और जिन्होंने अपने श्रेष्ठ त्रिशूलसे अन्धकासुरको चीर डाला, उनके साथ कौन विरोध कर सकता है? जिन्होंने अपनी जटाके अग्र भागमें जलराशिकी उत्ताल तरंगोंसे संयुक्त गंगाजीको धारण कर रखा है, जिनके चरणारविन्दके अंगुष्ठका तनिक-सा दबाव पाकर लंकापति रावण मूर्च्छित होकर गिर पड़ा था, जिन्होंने समस्त देवताओं और असुरोंके समक्ष दक्षके यज्ञका क्षणभरमें विध्वंस कर डाला था, जिनके लिंगमय विग्रहके पूजनसे मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त करता है, उन भगवान् शंकरके समान या उनसे बढ़कर दूसरा कौन देवता है?' जो विधिपूर्वक महादेवजीकी आराधना करके 'यस्यास्ति शक्ति' इत्यादि स्तोत्रका प्रातःकाल प्रयत्नपूर्वक पाठ या स्मरण करता है, वह भगवान् शंकरका पार्षद होता है। जो इस स्तोत्रका महादेवजीके समीप पाठ करता है, उसके ऊपर व्यासेश्वर शिव तथा नर्मदा दोनों ही प्रसन्न होते हैं।

तदनन्तर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियों तथा व्यासजीने नर्मदाके तटपर पितरोंका श्राद्ध किया। यहाँ श्राद्ध करनेसे पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं।


वरांगना-नर्मदा-संगम तथा कपिलातीर्थका माहात्म्य, महाराज मनुकी त्रिपुरीयात्रा और नर्मदासे वरदान पाना

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! व्यासतीर्थके अतिरिक्त एक दूसरा परम पुण्यमय तीर्थ है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ अश्वमेध यज्ञसे प्रकट हुई 'वरांगना' नदी बहती है। वहाँ नर्मदा और वरांगनाके संगममें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है। स्त्री हो या पुरुष—सभी वहाँ स्नान करनेसे रोगमुक्त हो जाते हैं। त्रिपुरीके पूर्वभागमें दक्षिण-दिशाकी ओर सब लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् शंकर विराजमान हैं। अतः विद्वान् पुरुष उसे 'शिवक्षेत्र' कहते हैं। सूर्य-ग्रहणके समय इस शिवक्षेत्रको कुरुक्षेत्रके समान बताया गया है। कुरुक्षेत्रमें पचासी तीर्थ हैं और यहाँ भी उतने ही हैं। इस क्षेत्रमें देवेश्वर भगवान् मधुसूदन भी उत्पलावर्त नामसे निवास करते हैं, जिनके सहस्रों मस्तक हैं। भगवान् श्रीहरि, महादेवजी और तीसरी नर्मदा नदी—ये तीनों इस क्षेत्रके परम आराध्य देवता हैं। राजन्! इन्द्र आदि देवता भी नर्मदा नदीकी महिमाका क्या वर्णन कर सकते हैं? वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। उक्त स्थानमें देवदेव महादेवके पूजनसे मनुष्य गणपति-पदको प्राप्त होता है। उस तीर्थमें प्रकट हुए शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुकी ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंद्वारा उपासना की जाती है। श्रीविष्णुके क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हुए कीट-पतंग आदि भी हरिधामको चले जाते हैं। मनुष्य अपने वशमें हो या परवश, जो संगम-तीर्थमें प्राण-त्याग करता है, वह दस हजार वर्षोंतक विद्याधरलोकमें राजा होता है। युधिष्ठिर! जो यहाँ तिल और जलसे पितरोंका तर्पण और उन्हें पिण्डदान करता है, उसके पितर तृप्त होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। एकादशीको निराहार रहकर गन्ध और पुष्पोंसे भगवान् विष्णुका पूजन करे, रातमें जागकर दीप जलावे; फिर द्वादशीको पंचगव्य लेकर हविष्यान्नसे पारण करे। पारणके पूर्व ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे। जो मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर उस क्षेत्रमें 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, वह फिर गर्भमें नहीं आता और न उसका कभी जन्म ही होता है। वह अपने अनेक जन्मोंके भयंकर पापोंको उसी प्रकार तत्काल भस्म कर देता है, जैसे आग रूईके ढेर और सूखे काठको जला देती है।

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९७७

पूर्वकालमें महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह तथा समस्त देवताओंका हित करनेके लिये पवित्र जलके भवाँरमें अवतार लिया था। उस स्थानमें भगवान् शिवके अट्ठाईस स्वयंभू लिंग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—१ स्थानेश्वर, २ महादेव, ३ शूलपाणि, ४ सप्तेश्वर, ५ कल्पेश्वर, ६ हिरण्य, ७ जातवेदः, ८ प्राजापत्य, ९ सिद्धनाथ, १० शशांकनायक, ११ अनुकेश, १२ स्कन्द, १३ आश्विन, १४ तैजस, १५ ब्रह्मेश्वर, १६ अग्नि-गर्भ, १७ श्रीकण्ठ, १८ उमापति, १९ नीलकण्ठ, २० खट्वांग, २१ महाकाल, २२ घटेश्वर, २३ त्रिलोचन, २४ त्र्यम्बक, २५ देवदेव, २६ महेश्वर, २७ अनंग और २८ कामदेव—ये तथा और भी बहुत-से सिद्ध लिंग वहाँ हैं।

महाभाग युधिष्ठिर! तदनन्तर नर्मदाके उत्तर तटपर परम उत्तम कपिलातीर्थ है जो सब पापोंको हरनेवाला है। पुरुष हों या स्त्रियाँ—यदि वे जितेन्द्रिय होकर उस तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करते हैं, तो तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाते हैं। उस तीर्थमें ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है।

उसके बाद नर्मदाके उत्तर तटपर त्रिपुरी नामक विख्यात एक उत्तम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। भारत! वहाँ सवा लाख तीर्थोंका निवास है। उस तीर्थमें एक सौ आठ स्वयंभू शिवलिंग विद्यमान हैं। यह वही स्थान है, जहाँ त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवने त्रिपुरको मार गिराया था। यहाँ देवदेव महादेवके नाम-कीर्तनसे तथा नर्मदाजीके जलद्वारा उनका स्नान और पूजन करनेसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वैभव-विस्तारसे पूजन करनेपर जो पुण्य होता है, उसकी गणना सहस्रों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती। भगवान् शिवके उद्देश्यसे जब दान किया जाता है, तब उस दानका पुण्य असंख्य हो जाता है। राजन्! वे मनुष्य धन्य हैं जो त्रिपुरीमें स्नान करके महादेवजीका दर्शन करते हैं। जो मानव त्रिपुरीमें निवास करता है, वह साक्षात् कैलाशमें निवास पाता है। जो इच्छा या अनिच्छासे भी त्रिपुरीमें प्राण-त्याग करता है, वह विमानद्वारा महादेवजीके परम धाममें जाकर वहाँके दिव्य विभवका उपभोग करता है। वहाँ देवेश्वर त्रिपुरारि शिव तैंतीस कोटि प्रसिद्ध देवताओंके साथ निवास करते हैं। इसलिये त्रिपुरी क्षेत्रको शिवक्षेत्र कहा गया है। उसकी लम्बाई-चौड़ाई दो कोसकी है। इस बीचमें जिनकी मृत्यु होती है, वे शुभ गतिको प्राप्त होते हैं।

यहीं सब सिद्धियोंको देनेवाले गोकर्ण, महादेव, वटेश्वर, सिद्धलिंग, सुरेश्वर, ईश्वर, कामेश्वर, अश्विनीकुमारेश्वर, अनंगेश्वर, वामदेव, कपोतेश्वर, सर्वेश्वर, सोमनाथ, ऋणमोचन, कपालमोचन, पापनाशन, इन्द्रेश्वर, ब्रह्मेश्वर, शिव, नारायण, भव, विश्वेदेव, सिद्धनाथ, अमरेश्वर, चान्द्रलिंग, सिद्धेश्वर, विद्याधरेश्वर, यज्ञेश्वर, तुलनारहित वासवेश्वर, ईशान, अग्निगर्भ, कुबेर, गायत्रलिंग, सावित्रलिंग तथा रोहिणीतीर्थ हैं। विष्णु, मरीचि, मैत्रेय, विभाण्डपुत्र ऋष्यशृंग, तपस्वी शौनक तथा उग्र तपस्वी दुर्वासा आदि पचास हजार सिद्ध त्रिपुरीमें निवास करते हैं। इस पुरीकी स्तुति सहस्रों वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती।

जिसमें कपिल मुनिका अवतार हुआ था, वह कालसंज्ञक स्वयंभू मन्वन्तर प्राप्त होनेपर अयोध्यापुरीमें महायशस्वी मनु नामक एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। उनका जन्म सूर्यवंशमें हुआ था। उन्होंने भगवान् शंकर और विष्णुकी आराधना करके अयोध्यापुरी प्राप्त की थी। जैसे कुबेरकी अलकापुरी विख्यात है तथा जिस प्रकार इन्द्रकी अमरावतीपुरी बड़ी मनोहर है, अयोध्या भी वैसी ही शोभासम्पन्न थी। वहाँ रहकर महाराज मनु सात द्वीप, नौ खण्ड तथा पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वीका पालन करते थे। एक दिन पूर्णिमाको एक पहर रात व्यतीत होनेके पश्चात् राजाके कानोंमें आकाशमें विचरनेवाले विमानोंकी क्षुद्रघण्टिकाका शब्द सुनायी पड़ा।

९७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उनमें संगीत और वाद्यकी भी ध्वनि हो रही थी। वह सब देख-सुनकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे 'ये विमान किसके हैं, जो मेरे ही भवनके ऊपर खड़े हैं। यह कितना साहसपूर्ण कार्य है?' इस प्रकार सोच-विचारमें पड़े हुए राजाकी वह रात्रि व्यतीत हो गयी। सूर्योदय होनेपर नैत्यिक धर्म-कर्मका अनुष्ठान पूरा करके राजर्षि मनुने वसिष्ठ मुनिसे कहा—'महामुने! यह मेरे महलके ऊपर किसके विमान हैं तथा ये किस कर्मके फलसे या किस-किस दान और नियमके पालनसे प्राप्त होते हैं? क्षत्रियवंशमें उत्पन्न होकर जो पृथ्वीका शासन करता है, वह यज्ञोंका अनुष्ठान करके माता और पिताके कुलको स्वर्गलोकमें पहुँचाता है। वास्तवमें उसी राजाका जन्म लेना सार्थक है, जिसके शासनमें इस भूमण्डलपर किसी प्रकारका पापकर्म नहीं हो पाता। दूसरे लोग तो केवल माता-पिताको क्लेश देनेके लिये ही उनके पुत्ररूपसे जन्मग्रहण करते हैं।'

राजा मनुके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी बोले—महाभाग! पुराण और वेदोंसे बाहर जो कर्म किया जाता है, उसकी साधुपुरुष प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि उसके द्वारा धर्मकी हानि होती है। नर्मदाके तटपर त्रिपुरी नामसे विख्यात एक तीर्थ है। वहाँ जिन लोगोंने यज्ञ, दान और होम आदि सत्कर्म किये हैं, उन्हींके विमान महलोंके ऊपर खड़े थे। महाराज! एकमात्र नर्मदादेवी ही ऐसी हैं, जिन्होंने समस्त पापियों और दुराचारियोंको स्वर्गलोकमें पहुँचाया है। संसार-समुद्रमें डूबे हुए पापसे दूषित चित्तवाले जीवोंको भी स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये यह नर्मदा नदी दिव्य विमानस्वरूप है। महाभाग! ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीको छोड़कर दूसरा कोई एक मुखवाला पुरुष नर्मदा नदीके पुण्योंका वर्णन नहीं कर सकता। नर्मदा तटपर किये हुए तप, दान और सत्कर्मोंके पुण्यकी कोई भी गणना नहीं कर सकता। जम्बूद्वीपमें जो-जो तीर्थ और समुद्र हैं, उनमेंसे कोई भी नर्मदा नदीकी समता नहीं कर सकते। पुण्यक्षेत्रमें किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है। यही बात धर्मके लिये भी है। वहाँ किया हुआ धर्म भी अक्षय होता है। यह जीवन चंचल है—क्षणभंगुर है। इसलिये मनुष्य कभी पाप न करे।

राजा मनुने नर्मदाके सुयशका वर्णन सुनकर अपने मन्त्रियों, सदस्यों तथा सेवकोंको आज्ञा दी—तुम सब लोग राजकीय सामग्री लेकर शीघ्र ही नर्मदाकी यात्रा करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये।

तदनन्तर राजा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ देव दानववन्दित त्रिपुरी पुरीको गये। वहाँ रानियों तथा समस्त परिवारके साथ नर्मदाजीके जलका दर्शन करके वे जन्मभरके पापोंसे मुक्त हो गये। उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् राजाने चन्दन और पुष्प आदिसे महादेवजीकी पूजा की और नर्मदाके तटपर दस योजनका विशाल यज्ञमण्डप निर्माण कराया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, यज्ञकर्ममें कुशल, चारों विद्याओंके ज्ञाता तथा वेदज्ञ महर्षि एवं ब्राह्मण उस यज्ञके लिये निमन्त्रित किये गये। जैसे पुष्करतीर्थ ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवताओंका स्वरूप है, उसी प्रकार यह त्रिपुरीतीर्थ भी है। वहाँ राजाने परमोत्तम अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञमें सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया गया। देवराज इन्द्र भी पधारे थे। मनुने अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और विष्टर आदि देकर सबको सन्तुष्ट किया। वेदोक्त विधिके अनुसार यज्ञका कार्य पूर्ण हुआ। ब्राह्मणोंको वैभवके अनुसार दक्षिणा देकर प्रसन्न किया गया। देवता, पितर और मनुष्य सभी तृप्त होकर परम गतिको प्राप्त हो गये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव राजाको वरदान देकर अपने-अपने लोकमें गये। इस तीर्थमें किया हुआ तप और दान सब कुछ अक्षय होता है।

इस प्रकार महातेजस्वी महाराज मनुका यज्ञ जब पूरा हो गया तब उन्होंने हाथ जोड़कर नर्मदासे कहा—देवि! केवल सहस्रों चान्द्रायण और सैकड़ों

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *९७९

सोमयागका जो फल है, वह तुम्हारे जलका पान करनेमात्रसे होनेवाले पुण्यकी समता नहीं कर सकता। तुमने सम्पूर्ण जगत्‌को तथा समस्त चराचर जीवोंको व्याप्त कर रखा है। जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार तुम्हारा जल स्नान, अवगाहन, पान, स्मरण और कीर्तन करनेसे मनुष्यके अनेक जन्मोंकी पापराशिको भस्म कर देता है। देवि! तुम पितरोंके हितकी कामनासे स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आयी हो। चारों प्रकारके जीवोंको स्वर्गलोकमें पहुँचाओ। नर्मदे! लोकमें जो कोई भी नदियाँ और नाना प्रकारके तीर्थ हैं, उन सबकी जननी तुम्हीं हो। तुम पितरोंका उद्धार करनेवाली पराशक्ति हो। जैसे सूर्य और चन्द्रमाका प्रभाव सब जीवोंपर समानरूपसे पड़ता है, जैसे बादल अन्नके पौधों और घासोंपर समानरूपसे जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण विश्वपर समानरूपसे स्नेह रखनेवाली गौरवमयी माता हो। शुभे! ब्रह्मा और बृहस्पतिजी सहस्रों वर्षोंतक लगे रहनेपर भी तुम्हारे गुणोंका पूर्णतया वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं।

अमिततेजस्वी मनुके द्वारा किये हुए इस स्तवनको सुनकर परम सौभाग्यशालिनी नर्मदादेवी बोलीं—महाभाग! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो। तब महादेवी नर्मदाको नमस्कार करके राजाने कहा—'देवि! तुम सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र करो और अयोध्या प्रदेशमें अनेक नदियाँ प्रकट हो जायँ। देवलोकमें गंगा आदि अनेकों सरिताएँ बहती हैं, ऐसा सुना जाता है। वे सब इस भूलोकमें भी जिस प्रकार उतर आवें, वैसा उपाय करो।'

नर्मदा बोलीं—नृपश्रेष्ठ! त्रेताके प्रथम भागमें तुम्हारे कुलमें भगीरथ नामसे विख्यात एक राजा होंगे। वे इस लोकमें गंगाजीको लावेंगे। त्रेताके द्वितीय भागमें इस भारतवर्षके भीतर कालिन्दी, सरस्वती, सरयू तथा महाभागा गण्डकी आदि नदियाँ भी प्रकट हो जायेंगी। तुम्हारे वंशमें उत्पन्न भगीरथके ही नामपर सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजी 'भागीरथी' कहलायेंगी। भागीरथीके ही समान उनका दूसरा नाम 'जाह्नवी' भी होगा। उक्त सभी नदियाँ कन्या-द्वीपमें प्रसिद्धिको प्राप्त होंगी।


भृगुतीर्थ और भास्करतीर्थका माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! त्रिपुरी क्षेत्रमें ही मर्कटीतीर्थ है और मर्कटीतीर्थके पूर्वभागमें परम उत्तम भृगुतीर्थ स्थित है। कार्तिककी पूर्णिमाको इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहीं नरकेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं। उनके आगे बाँसका वृक्ष दिखायी देता है। उसके पूर्वभागमें त्रिलोचन नामक महादेवजी विराजमान हैं। उनके ललाटमें स्थित तृतीय नेत्रका दर्शन करके मुनिश्रेष्ठ भृगुने पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की।

भृगु बोले—जो सब जीवोंके भीतर उनके आत्मारूपसे विराजमान हैं, समस्त भूतोंके ईश्वर हैं, कल्याण एवं ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, सबका पाप हर लेनेके कारण जिन्हें हर कहते हैं, जो कल्याणस्वरूप, तेजस्वरूप, पशुपति एवं अखिल विश्वके स्वामी हैं, जिनमें दोषमात्रका सर्वथा अभाव है तथा जो नित्य विज्ञानानन्दस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। प्रभो! मैं दूसरोंका तिरस्कार करनेके पापसे पराजित हूँ। मेरी उस पापसे रक्षा कीजिये। परमेश्वर! इस क्षणभंगुर शरीरके प्रति मेरे मनमें आत्माभिमानका उदय हो गया है—मैं देहको ही आत्मा मानने लगा हूँ। अतएव कुमार्गकी ओर दृष्टि रखनेवाले मुझ दीनकी आप रक्षा करें। प्रभो! मुझ दीन ब्राह्मणको ज्ञान देनेके लिये उद्यत होइये। आप तो

९८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सदा सबका कल्याण करनेवाले हैं, फिर मुझे मूढ़ देखकर भी (ज्ञानदानमें) विलम्ब क्यों करते हैं? हर! आप मेरी बढ़ी हुई तृष्णाको हर लें और मुझे स्थिर रहनेवाली लक्ष्मी प्रदान करें। महेश्वर! आपके तीर्थोंमें जानेमात्रसे जो पुण्य होता है, वह सदा ही मोहका उच्छेद, पापोंका विनाश और संसार-सागरसे उद्धार करता है, परंतु मुझ भाग्यहीनने उस पुण्यका संचय भी नहीं किया है।

महर्षि भृगुके द्वारा कहे हुए इस 'करुणाहृदय' नामक स्तोत्रका जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर भगवान् शिवने भृगुसे कहा—'विप्रवर! तुम्हारे मनमें जिस-जिस वरकी अभिलाषा है, वह सब मैं तुझे दूँगा। साथ ही तुम्हें देवदुर्लभ उत्तम सिद्धि भी प्रदान करूँगा।'

भृगुने कहा—देवेश्वर! यदि आप सन्तुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो पृथ्वीपर मेरे ही नामसे इस तीर्थकी प्रसिद्धि हो। महेश्वर! मेरी दूसरी प्रार्थना यह है कि आप अपनेको उस भृगुक्षेत्रमें अवतरित करें, यहाँ सदा ही आपकी स्थिति बनी रहे।

भगवान् शंकर बोले—विप्रवर! ऐसा ही हो। तुम्हारे ही नामसे इस क्षेत्रकी ख्याति होगी।

युधिष्ठिर! इस भृगुक्षेत्रमें आठ रुद्र बताये गये हैं—भृगु, शूली, वेद, चन्द्र, मुख, अट्टहास, काल तथा कराली। इन सबके कारण भृगुक्षेत्र बहुत ही मनोरम और धन्य-धन्य हो गया है। अयन, विषुव, संक्रान्ति, ग्रहण, व्यतीपात, दिनक्षय और गजच्छाया आदि योगोंमें इस तीर्थके भीतर जो स्नान, दान, होम, तर्पण और देवपूजन आदि सत्कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय होते हैं। जो भृगुक्षेत्रमें स्नान करके वहाँ एक रात्रि निवास करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी उपलब्ध होनेवाला नहीं है। संयमी मनुष्य भृगुतीर्थकी प्रदक्षिणा करके तत्काल विशुद्ध होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस तीर्थके माहात्म्यसे मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

प्राचीन कालमें मोहन नामसे प्रसिद्ध एक गन्धर्वराज था। वह ब्रह्माजीकी सभामें स्थित होकर सदा उनकी आराधनामें तत्पर रहता था। एक दिन महर्षि दुर्वासाको वहाँ उपस्थित देख उसने उनकी हँसी उड़ायी। यह देख मुनिने शाप दिया, 'अरे! तुझे अपने सुन्दर रूपका बड़ा अभिमान है, तू जा चित्रकुष्ठ (चितकबरी कोढ़)-से पीड़ित रह।' उस शापसे भयभीत होकर गन्धर्वराजने मुनिसे कहा—'विप्रवर! मुझ अज्ञानीपर प्रसन्न होकर आप अपने शापका अन्त कीजिये।'

दुर्वासा बोले—गन्धर्वराज! तू त्रिपुरीमें नर्मदाके तटपर जा। वहाँ समस्त भयोंका नाश करनेवाले साक्षात् भगवान् सूर्य निवास करते हैं। नर्मदाके उत्तर तटपर उनका स्थान भास्करतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उसमें स्नान करनेसे तुमपर लगा हुआ शाप निवृत्त हो जायगा।

तब वह गन्धर्वराज दुर्वासामुनिको प्रणाम करके नर्मदातटपर गया। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उसने भगवान् भास्करकी आराधना की। तीन राततक आराधना होनेपर चौथे दिन प्रातःकाल भगवान् सूर्यने कहा—'महाभाग! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।' गन्धर्वने कहा—'देवेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा यह चित्रकुष्ठ निवृत्त हो जाय।' भगवान् सूर्य बोले—'एवमस्तु।' तदनन्तर वह शापसे मुक्त होकर अपने लोकको चला गया।

युधिष्ठिर! भास्करतीर्थमें पुत्रकी कामनासे सावित्री-देवीकी आराधना की जाती है। यहाँ स्नान करके सूर्यदेवका पूजन करनेसे मनुष्य पुत्रवान् एवं रोगमुक्त होता है। वहीं दक्षिणभागमें कोटीश्वर महादेव हैं। उनका विधिपूर्वक पूजन करनेसे मनुष्य कोटि लिंगोंकी पूजाका फल पा लेता है। जो स्वाधीन अथवा पराधीन होकर भी वहाँ प्राणोंका त्याग करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

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