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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

अठारहवाँ अध्याय 18/114-116 ]
'सम्बित्' जो उनकी अद्वयज्ञानस्वरूपभूता शक्ति है, इन
दोनोंके द्वारा सदैव आलिङ्गित रहते हैं। किन्तु जीव
सदा अपनी (आरोपित) भगवान्‌की जीवको बाँधनेवाली
अविद्यारूपी मायासे पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह
तीन प्रकारके क्लेशों (पाप, बीज और अविद्या) की
निधिकी खान है॥114॥
जीव और श्रीनारायणको समान समझना ही पाखण्ड :–
येइ मूढ़ कहे,–जीव ईश्वर हय 'सम'।
सेइत 'पाषण्डी' हय, दण्डे तारे यम॥' 115 ॥
अनुवाद—जो मूर्ख कहता है,–जीव और ईश्वर
एक समान हैं, वह पाखण्डी है और यमराजके दण्डका
भागी बन जाता है॥'115॥
अनुभाष्य—'पाषण्डी'—आदिलीला 3/78 संख्या देखें।
मायावश जीवके अथवा मायिक जड़वस्तुके साथ
मायाधीश शुद्धसत्त्व चेतन-विग्रह श्रीविष्णुको 'एक'
अथवा समान माननेवाला 'पाखण्डी' है। श्रीभक्तिसन्दर्भके
(255 संख्या)—'नामापराध-वर्णन-प्रसङ्ग'में एक अपराध
'श्रुति-शास्त्रनिन्दा'के वर्णनमें—
“यथा पाषण्डमार्गेण दत्तात्रेयर्षभदेवोपासकानां पाषाण्डिनाम्”
[अर्थात् “दत्तात्रेय और ऋषभदेवके पाखण्डी उपासक-
गण पाखण्डमार्गके अनुसार वेदादि शास्त्रनिन्दक हैं।"]
पुनः अन्य एक अपराध 'अहं-मम-बुद्धि' अथवा
'देहात्मबुद्धि'के वर्णनमें—
“देह-द्रविणादि-निमित्तक-'पाषण्ड'-शब्देन च दशापराधा एव
लक्ष्यन्ते, पाषण्डमयत्वात् तेषाम्”
[अर्थात् “पुनः, 'मैं और मेराकी बुद्धि'के वर्णनमें—
'नामैकं यस्य वाचि'—श्लोकमें देह-धनादि निमित्त
'पाखण्ड'-शब्दके द्वारा भी दसों नामापराध लक्षित हुए
हैं, क्योंकि ये समस्त अपराध ही पाखण्डमय हैं।"]
पुनः (223 संख्यामें)—
“उद्दिश्य देवता एव जुहोति च ददाति च।
स पाषण्डीति विज्ञेयः स्वतन्त्रो वापि कर्मसु॥'
इति पाषण्डित्वञ्च वैष्णव-मार्गाद्भ्रष्टत्वमित्यर्थः।”
[अर्थात् “जो व्यक्ति दूसरे देवताओंके उद्देश्यसे ही
दान और होमादि करता है, उसको पाखण्डी अथवा
कर्मविषयमें स्वेच्छाचारी समझना चाहिये। इसलिये 'पाखण्ड'
वैष्णवमार्गसे भ्रष्ट होना है।"]
पुनः (179 संख्या)में “विष्णुधर्म-ग्रन्थमें विष्णुभक्त
उपरिचर-वसुके द्वारा पाखण्डी असुरोंके उद्धार करनेके
वृत्तान्तका उल्लेख करते हुए कहा गया है—दैत्यगुरु
शुक्राचार्यके आदेशसे दैत्य उपरिचर-वसुको पाखण्ड
मार्गका उपदेश करने लगे। परन्तु ऐसा करनेपर भी
दैत्यगण उनकी कृपासे भगवद्भक्त बन गये। पुनः (153
संख्यामें) हरिनााममें अर्थवाद तथा वैष्णव-अपराधके
वर्णनमें—
“तादृशापराधे भक्तिस्तम्भश्च श्रूयते।
×× देहादिलोभार्थं ये पाषण्डा गुर्ववज्ञादिदशापराधयुक्ताः”
[अर्थात् “इस प्रकारके अपराधोंके कारण भक्ति
स्तम्भित हो जाती है—ऐसा शास्त्रोंमें सुना जाता है।
देह-सम्पत्तिके लोभके उद्देश्यसे नाम ग्रहण करनेका
पाखण्ड करनेवाले और गुरु-अवज्ञादि दस नामापराध
युक्त व्यक्तियोंको श्रीनाम-कीर्तनका फल बहुत देरसे
प्राप्त होता है।"]
इस प्रकार अनेक स्थानोंपर 'पाखण्ड' शब्दका
उपयोग हुआ है। भाः 4/2/28, 30, 32, 5/6/9 एवं
12/2/13, 43 आदि बहुतसे श्लोकोंमें पाखण्डियोंके
पाखण्डका वर्णन है॥115॥
शास्त्र-प्रमाण :—
वैष्णवतन्त्र-वाक्य, पाद्मोत्तर-खण्ड (23/12)में और
हरिभक्तिविलास (1/73)में –
यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः।
समतवेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम्॥116॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥116॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके
साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय
ही 'पाखण्डी' हैं॥116॥
। 155

[ 18/116-123 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—
यः (भाग्यहीनो जनः) तु (गर्हणार्थे) देवं नारायणं (ब्रह्मरुद्रोपास्यं
तयोरीश्वरं भगवन्तं विष्णुं) ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः (चतुर्मुख-पञ्चमुखादि-
नारायणदासभूतैः देवैः जीवरूपैः सह) समत्वेन (नित्यप्रभुणा
सह देवाख्यनित्यदासैः समानतया) वीक्षेत (पश्येत्) सः ध्रुवं
(निश्चितम् एव) 'पाषण्डी' भवेत्—“अर्च्ये विष्णौ शिलाधीर्गुरुषु
नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धिर्विष्णोर्वा वैष्णवानां कलिमलमथने
पादतीर्थेऽम्बु बुद्धिः। श्रीविष्णोर्नाम्नि मन्त्रे सकल-कलुषहे शब्द-
सामान्यबुद्धिर्विष्णौ सर्वेश्व रेशे तदितरसमधीर्यस्य वा नारकी
सः।” इति पद्मपुराणवचनात्।
श्लोक-भावानुवाद—जो [निन्दाके अर्थमें-] भाग्यहीन
लोग ब्रह्म-रुद्रके उपास्य और उनके अधीश्वर भगवान्
विष्णुको जीवरूप चतुर्मुख-पञ्चमुखादि नारायणदास
देवताओंके साथ समान अर्थात् नित्यप्रभुके साथ उनके
नित्यदास देवोंको समान देखता है, वह निश्चित ही
'पाखण्डी' होता है। पद्मपुराणवचन,—“जो व्यक्ति
श्रीमूर्तिमें शिला बुद्धि, वैष्णव और गुरुदेवमें मरणशील
मानव बुद्धि, वैष्णवोंमें जाति बुद्धि, विष्णु और वैष्णवोंके
चरण धौतजलमें जल बुद्धि तथा सर्वपाप नाशक
विष्णूनाम, मन्त्रमें सामान्य शब्द बुद्धि एवं सर्वेश्वर
विष्णुको अन्य देवताओंके साथ समान बुद्धि रखता है,
वह नारकीय है।”॥ 116॥
लोगोंका महाप्रभुके 'श्रीकृष्ण' होनेका
दृढ़ विश्वास और स्तुति :-
लोक कहे,—“तोमाते कभु नहे ‘जीव’-मति।
कृष्णेर सदृश तोमार आकृति-प्रकृति ॥ 117 ॥
‘आकृत्ये’ तोमारे देखि' ‘व्रजेन्द्रनन्दन’।
देहकान्ति पीताम्बर कैल आच्छादन ॥ 118 ॥
प्रियभक्तोंके सामने भगवद्-स्वरूपका स्वतःप्रकाश :-
मृगमद वस्त्रे बान्धे, तबु ना लुकाय।
‘ईश्वर-स्वभाव’ तोमार ढाका नाहि याय ॥ 119 ॥
अनुवाद—लोगोंने कहा,—“आपको कोई भी 'जीव'
नहीं मान सकता, क्योंकि आपकी आकृति तथा प्रकृति
सभी प्रकारसे श्रीकृष्णके समान ही है। यद्यपि पीतवर्णने
आपकी अपनी उस श्यामल कान्तिको ढक रखा है,
तथापि 'आकृति'से हम आपको साक्षात् 'व्रजेन्द्रनन्दन'
ही देख रहे हैं। जैसे कस्तूरीको वस्त्रमें बाँधकर रखनेपर
भी उसकी गन्धको छिपाया नहीं जा सकता, वैसे ही
आपका 'ईश्वर-स्वभाव' छिपानेपर भी छिपाया नहीं जा
सकता॥ 117-119 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/85-89 संख्या देखें। जिस
प्रकार कस्तूरीके वस्त्रमें बँधे होनेपर भी उसकी गन्ध
सभी दिशाओंमें फैल जाती है, उसी प्रकार आपके द्वारा
भक्तजीवरूपी आवरणसे अपनेको गोपन करनेपर भी
आपका भगवत् स्वभाव छिपता नहीं है॥ 119 ॥
अधोक्षज होनेपर भी जगत्के आकर्षक :-
अलौकिक ‘प्रकृति’ तोमार—बुद्धि-अगोचर।
तोमा देखि' कृष्णप्रेमे जगत् पागल ॥ 120 ॥
अनुवाद—आपकी अलौकिक 'प्रकृति' हमारी बुद्धिके
अगोचर है। आपका दर्शन करके समस्त जगत्
श्रीकृष्णप्रेममें पागल हो रहा है॥ 120 ॥
भगवद्दर्शन अथवा शुद्धनाम-श्रवणमात्रसे बालक-वृद्ध-स्त्री,
यहाँ तक कि अन्त्यज्य भी 'आचार्य' बनकर जगत्का
उद्धार करनेमें समर्थ :-
स्त्री-बाल-वृद्ध, आर ‘चण्डाल’, ‘यवन’।
येइ तोमार एकबार पाय दरशन ॥ 121 ॥
कृष्णनाम लय, नाचे हञा उन्मत्त।
आचार्य हइल सेइ, तारिल जगत ॥ 122 ॥
अनुवाद—स्त्री, बालक, वृद्ध और यहाँ तक कि
'चण्डाल' और 'यवन'—जो कोई एकबार भी आपका
दर्शन करता है, वह श्रीकृष्ण नामका कीर्तन करता है,
उन्मत्त होकर नृत्य करता है तथा आचार्य बनकर
जगत्का उद्धार करता है॥ 121-122 ॥
दर्शनेर कार्य आछुक, ये तोमार ‘नाम’ शुने।
सेइ कृष्णप्रेमे मत्त, तारे त्रिभुवने ॥ 123 ॥
156 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/123-130 ]
तोमार नाम शुनि' हय श्वपच 'पावन'।
अलौकिक शक्ति तोमार ना याय कथन ॥ 124 ॥
अनुवाद-दर्शनकी तो बात दूर रहे, जो कोई
आपका 'नाम' भी सुनता है, वही श्रीकृष्णप्रेममें मत्त
होकर त्रिभुवनको तार देता है। आपके नामको सुनकर
कुत्तेके माँसको खानेवाला भी 'पवित्र' हो जाता है।
आपकी अलौकिक शक्तिका वर्णन नहीं किया जा
सकता ॥ 123-124 ॥
श्रीमद्भागवत (3/33/6) में :-
यन्नामधेय-श्रवणानुकीर्त्तनाद्-
यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्।
श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते
कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥ 125 ॥
अनुवाद-हे भगवन्, जिनके नाम श्रवण, अनुकीर्तन,
प्रणाम और स्मरण करने मात्रसे चण्डाल और यवन
कुलमें जन्मा व्यक्ति भी तत्क्षणात् सवन-यज्ञ (सोमयज्ञ)
करनेके योग्य हो जाता है, ऐसे वे प्रभु आप हैं, आपके
दर्शनसे क्या नहीं हो सकता ? ॥ 125 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 16/186 संख्या देखें ॥ 125 ॥
उक्त समस्त ही महाप्रभुके 'तटस्थ' लक्षण, स्वरूपतः
महाप्रभु-साक्षात् स्वयंरूप श्रीकृष्ण :-
एइत' महिमा-तोमार 'तटस्थ'-लक्षण।
'स्वरूप'-लक्षणे तुमि-व्रजेन्द्रनन्दन ॥"126 ॥
अनुवाद-यह महिमा तो आपका 'तटस्थ'-लक्षण
है, 'स्वरूप'-लक्षण तो आपका व्रजेन्द्रनन्दन होना
है॥"126 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अन्य वस्तुके साथ तुलना नहीं
करके जिन 'स्वतःसिद्ध-लक्षणों'से वस्तु परिचित होती
है, वही उसके 'स्वरूप'-लक्षण हैं। अन्य वस्तुके साथ
तुलना करके जिन लक्षणोंसे वस्तुका अपना परिचय
साधित होता है, उन लक्षणोंको 'तटस्थ' कहते हैं।
पूर्वोक्त महिमासमूहने तटस्थ लक्षणके रूपमें ही आपको
'व्रजेन्द्रनन्दन' कहकर स्थिर किया है। पुनः आपको
देखनेमात्रसे ही 'व्रजेन्द्रनन्दन'के रूपमें जो बोध उदित
होता है, यही आपका 'स्वरूप'-लक्षण है; स्वरूप-लक्षणके
द्वारा ही आपको 'श्रीकृष्ण' कहकर स्थिर किया
है॥ 126 ॥
सभीपर ही महाप्रभुकी कृपा; उनका अपने घर जाना :-
सेइ सब लोके प्रभु प्रसाद करिल।
कृष्णप्रेमे मत्त लोक निज घरे गेल ॥ 127 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उन सब लोगोंपर कृपा की। वे
लोग श्रीकृष्णप्रेममें मत्त हो गये और अन्तमें अपने
घरोंमें लौट गये ॥ 127 ॥
अक्रूरतीर्थमें रहकर लोगोंका उद्धार :-
एइमत कतदिन 'अक्रूरे' रहिला।
कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥ 128 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कुछ दिन तक
अक्रूरतीर्थमें रहे। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-नाम और प्रेम
प्रदान करके लोगोंका उद्धार किया ॥ 128 ॥
सनोड़िया-विप्रका मथुरामें सभी सज्जनोंको ही महाप्रभुकी
सेवाका सुयोग प्रदान करके उनका उद्धार करना :-
माधवपुरीर शिष्य सेइत' ब्राह्मण।
मथुरार घरे-घरे करा'न निमन्त्रण ॥ 129 ॥
मथुरार यत लोक ब्राह्मण-सज्जन।
भट्टाचार्य-स्थाने आसि' करे निमन्त्रण ॥ 130 ॥
अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य वे सनोड़िया ब्राह्मण
मथुराके घर-घरमें जाकर उन्हें महाप्रभुको निमन्त्रण
करनेके लिये उत्साहित कर रहे थे। मथुराके जितने
भी सज्जन ब्राह्मण थे, वे सभी बलभद्र भट्टाचार्यके पास
आकर महाप्रभुके लिये निमन्त्रण देने लगे ॥ 129-130 ॥
अनुभाष्य-'सेइत' ब्राह्मण'-सनोड़िया (मध्यलीला
17/179 संख्या देखें) ॥ 129 ॥
। 157

[ 18/131-138 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
एकसाथ बहुतसे व्यक्तियोंके द्वारा निमन्त्रण करनेपर भी,
भट्टके द्वारा एक-एक व्यक्तिका ही निमन्त्रण-स्वीकार :-
एकदिन 'दश' 'बिश' आइसे निमन्त्रण।
भट्टाचार्य एकेर मात्र करेन ग्रहण ॥ 131 ॥
अनुवाद-एक ही दिनमें दस-बीस निमन्त्रण आने
लगे, परन्तु बलभद्र भट्टाचार्य केवल किसी एकके ही
निमन्त्रणको स्वीकार करते ॥ 131 ॥
सभीके द्वारा एक ही साथ महाप्रभुको भिक्षा
देनेकी इच्छा करनेके कारण लोगोंके लिये
महाप्रभुकी सेवाके अवसरका अभाव :-
अवसर ना पाय लोक निमन्त्रण दिते।
सेइ विप्र साधे लोक निमन्त्रण निते ॥ 132 ॥
अनुवाद-क्योंकि सभी लोगोंको महाप्रभुको निमन्त्रण
करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं हो रहा था, इसलिये
वे सनोड़िया ब्राह्मणसे ही निवेदन करते कि महाप्रभु
उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लें ॥ 132 ॥
वैदिक सद्ब्राह्मणोंका दीनतापूर्वक महाप्रभुको निमन्त्रण :-
कान्यकुब्ज-दाक्षिणात्येर वैदिक ब्राह्मण।
दैन्य करि', करे, महाप्रभुर निमन्त्रण ॥ 133 ॥
अक्रूरतीर्थमें आकर स्वयं ही रसोई
बनाकर महाप्रभुको भिक्षा-दान :-
प्रातःकाले अक्रूरे आसि' रन्धन करिया।
प्रभुरे भिक्षा देन शालग्रामे समर्पिया ॥ 134 ॥
अनुवाद-कान्यकुब्ज, दक्षिण-भारत आदि स्थानोंके
वैदिक ब्राह्मणोंने अत्यधिक दीनतापूर्वक महाप्रभुको
निमन्त्रण दिया। वे ब्राह्मण प्रातःकालमें अक्रूरतीर्थ
आकर रसोई बनाते और शालग्रामको भोग समर्पित
करके उसे महाप्रभुको समर्पित करते ॥ 133-134 ॥
अनुभाष्य-'कान्यकुब्ज', 'सारस्वत', 'गौड़', 'मैथिल'
और 'उत्कल' - ये पाँच गौड़-ब्राह्मण एवं 'आन्ध्र',
'कर्णाट', 'गुर्जर', 'द्राविड़' और 'महाराष्ट्र
दक्षिण-भारतके ब्राह्मण, - इन दस प्रकारके वैदिक शुद्ध
ब्राह्मण, जो वैदिक आचारका पूर्णरूपसे पालन करते थे
अर्थात् तान्त्रिक-दुराचारके द्वारा जिन्होंने अपने वैदिक
अनुष्ठानका त्याग नहीं किया, सभीने दैन्यपूर्वक
महाप्रभुको निमन्त्रण किया था ॥ 133 ॥
महाप्रभुके द्वारा अक्रूर घाटपर बैठकर ऐश्वर्य-पूजक
अक्रूरके और माधुर्य-सेवक व्रजवासियोंके अपने-अपने
अधिकारसे धाम दर्शनका विचार :-
एकदिन सेइ अक्रूर-घाटेर उपरे।
बसि' महाप्रभु किछु करेन विचारे ॥ 135 ॥
'एइ घाटे अक्रूर वैकुण्ठ देखिल।
व्रजवासी लोक 'गोलोक' दर्शन कैल ॥' 136 ॥
अनुवाद-एकदिन उस अक्रूर घाटपर बैठकर
महाप्रभु कुछ विचार कर रहे थे, - 'इसी घाटपर अक्रूरने
वैकुण्ठका दर्शन किया था और यहींपर व्रजवासी
लोगोंने 'गोलोक'का दर्शन किया था ॥ 135-136 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अक्रूरघाट'- वृन्दावन और
मथुराके बीचमें आधे रास्तेपर यह घाट है। यहाँ रथको
खड़ा करके अक्रूरने श्रीबलराम-कृष्णको साथ लेकर
यमुना-स्नान किया था। स्नानके समय अक्रूरने जलमें
'वैकुण्ठ'का दर्शन किया था एवं व्रजवासी लोगोंने उस
घाटके जलमें गोलोकका दर्शन किया था ॥ 135 ॥
महाप्रभुके द्वारा जलमें कूदना और डूबना :-
एत बलि' झाँप दिला जलेर उपरे।
डुबिया रहिला प्रभु जलेर भितरे ॥ 137 ॥
अनुवाद-अक्रूर कैसे जलमें रहे, यह विचार
करते हुए महाप्रभुने जलमें छलाँग लगा दी और वे
जलके अन्दर ही डूबे रहे ॥ 137 ॥
कृष्णदासके रोने-चिल्लानेको सुनकर भट्टके द्वारा उसी
समय आकर महाप्रभुको निकालना :-
देखि' कृष्णदास कान्दि' फुकार करिल।
भट्टाचार्य शीघ्र आसि' प्रभुरे उठाइल ॥ 138 ॥
158 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/138-147 ]
अनुवाद-ऐसा देखकर कृष्णदास रोते-रोते बहुत
जोरसे सहायताके लिये पुकारने लगे। बलभद्र भट्टाचार्यने
जल्दीसे आकर महाप्रभुको बाहर निकाला ॥ 138 ॥
भट्ट और ब्राह्मणका परामर्श :-
तबे भट्टाचार्य सेइ ब्राह्मणे लञा।
युक्ति करिला किछु निभृते बसिया ॥ 139 ॥
“आजि आमि आछिलाङ, उठाइलूँ प्रभुरे।
वृन्दावने डुबेन यदि, के उठाबे ताँरे ? ॥ 140 ॥
लोगोंकी भीड़, भिक्षाकी परेशानी और महाप्रभुके
सदैव प्रेमावेशसे भयभीत भट्टकी वृन्दावनसे
महाप्रभुको अन्य स्थानपर ले जानेकी इच्छा :-
लोकेर संघट्ट, आर निमन्त्रणेर जञ्जाल।
निरन्तर आवेश प्रभुर, – ना देखिये भाल ॥ 141 ॥
वृन्दावन हैते यदि प्रभुरे काड़िये।
तबे मङ्गल हय, – एइ भाल युक्ति हय ॥” 142 ॥
अनुवाद-तब बलभद्र भट्टाचार्यने सनोड़िया ब्राह्मणको
अपने साथ लेकर एकान्तमें बैठकर कुछ विचार-विमर्श
किया,–“आज तो मैं यहाँ था, मैंने महाप्रभुको जलसे
बाहर निकाल लिया। यदि वे वृन्दावनमें डूबने लगें,
वहाँ उन्हें कौन बाहर निकालेगा ? वैसे भी यहाँ लोगोंकी
इतनी भीड़ है और उसपर निमन्त्रणका जञ्जाल है।
साथमें महाप्रभु भी निरन्तर आवेशमें रहते हैं। मुझे
यहाँकी स्थिति अच्छी नहीं लग रही है। यदि महाप्रभुको
वृन्दावनसे बाहर ले जा सकें, तभी अच्छा होगा। मुझे
तो यही उचित लग रहा है॥” 139-142 ॥
अनुभाष्य- 'काड़िये'-ले जाँय ॥ 142 ॥
ब्राह्मणके द्वारा माघस्नानके उपलक्ष्यमें गङ्गा तटके पथसे
प्रयागमें ले जानेका परामर्श :-
विप्र कहे, – “प्रयागे प्रभु लञा याइ।
गङ्गातीर-पथे याइ, तबे सुख पाइ ॥ 143 ॥
'सोरोक्षेत्रे' आगे याञा करि' गङ्गास्नान।
सेइ पथे प्रभु लञा करिये पयान ॥ 144 ॥
माघ-मास लागिल, एबे यदि याइये।
मकरे प्रयाग-स्नान कत दिन पाइये ॥ 145 ॥
अपने दुःखका निवेदन और सामयिक परामर्श देना :-
आपनार दुःख किछु करि' निवेदन।
'मकरे' पँछिते प्रयागे करिह सूचन ॥ 146 ॥
महाप्रभुसे भट्टके द्वारा भिक्षाके लिये अनुरोध करनेवालोंकी
असुविधाका वर्णन करनेके बाद माघ-स्नानके लिये
प्रयागमें जानेका अनुरोध :-
गङ्गातीर-पथे सुख जानाइह ताँरे।”
भट्टाचार्य आसि' तबे कहिल प्रभुरे ॥ 147 ॥
अनुवाद-सनोड़िया ब्राह्मणने कहा, – “मेरा विचार
है कि महाप्रभुको प्रयागमें ले चलें। यदि गङ्गातटवाले
मार्गसे जायेंगे, तो उसमें बड़ा आनन्द होगा। पहले
'सोरोक्षेत्र'में जाकर गङ्गास्नान करके उसी मार्गसे महाप्रभुको
लेकर आगे बढ़ेंगे। माघ-मास अभी आरम्भ हुआ है,
यदि अभी यहाँसे जायेंगे, तो प्रयागमें मकर-सक्रान्तिके
समय कुछ दिनके लिये वहाँ स्नान कर सकेंगे। आप
महाप्रभुसे अपने दुःखका भी निवेदन करना और
कहना कि यदि अभी चलेंगे तो हम लोग माघी-पूर्णिमा
तक प्रयाग पहुँच जायेंगे। आप महाप्रभुसे कहना कि
गङ्गातटवाले पथसे जानेपर यात्रा सुखप्रद होगी।” तब
बलभद्र भट्टाचार्यने आकर महाप्रभुसे कहा, – ॥ 143-147 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'सोरोक्षेत्रे' - मथुरासे सबसे
निकटवर्ती गङ्गा-तटपर ही 'सोरोक्षेत्र' है ॥ 144 ॥
अनुभाष्य - कर्मनिष्ठ व्यक्तियोंके लिये माघमासमें
प्रयाग-स्नान विशेष फल प्रदान करनेवाला है;
“माघे मासि गमिष्यन्ति गङ्गायामुनसङ्गमम्।
गवां शतसहस्रस्य सम्यक् दत्तञ्च यत्फलम्।
प्रयागे माघमासे वै त्र्यहं स्नातस्य तत्फलम् ॥”
[अर्थात् “यदि कोई प्रयागमें जाकर गङ्गा-यमुनाके
सङ्गमपर माघ-मासमें स्नान करता है, तो उसे लाखों
गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। केवल तीन दिन
वहाँ स्नान करनेसे उसे इतना पुण्य प्राप्त होता है।”]
। 159

[ 18/145-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
एवं “तुमि आमाय आनि' देखाइला वृन्दावन।
“सर्वाधिकारितां माघस्नानस्य व्रतता यतः” एइ 'ऋण' आमि नारिब करिते शोधन ॥ 153॥
अर्थात् “माघस्नानके व्रतका सबसे अधिक ये तोमार इच्छा, आमि सेइत करिब।
फल होता है” याँहा लञा याह तुमि, ताँहाइ याइब ॥ ” 154 ॥
आदि व्यवस्था देखी जाती है॥145॥
अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुकी वृन्दावनको छोड़कर
“सहिते ना पारि आमि लोकेर गड़बड़ि। जानेकी बिलकुल भी इच्छा नहीं थी, तथापि भक्तकी
निमन्त्रण लागि' लोक करे हड़ाहूड़ि ॥ 148 ॥ इच्छाको पूर्ण करनेके लिये उन्होंने मधुर वचन
कहे,—“अपने साथ लाकर तुमने मुझे वृन्दावनके दर्शन
प्रातःकाले आइसे लोक, तोमारे ना पाय। कराये हैं, मैं तुम्हारे इस 'ऋण'को कभी भी नहीं चुका
तोमारे ना पाञा लोक मोर माथा खाय ॥ 149॥ पाऊँगा। तुम्हारी जैसी इच्छा है, मैं वैसा ही करूँगा।
तबे सुख हय यबे गङ्गापथे याइये। तुम मुझे जहाँ ले जाओगे, मैं वहीं जाऊँगा॥”152-154॥
एबे यदि याइ, 'मकरे' गङ्गास्नान पाइये ॥ 150 ॥ प्रातः स्नानके बाद भावि-विच्छेदके स्मरणसे प्रेमावेश :-
उद्विग्न हइल प्राण, सहिते ना पारि। प्रातःकाले महाप्रभु प्रातःस्नान कैल।
प्रभुर ये आज्ञा हय, सेइ शिरे धरि ॥”151 ॥ 'वृन्दावन छाड़िब' जानि' प्रेमावेश हैल ॥ 155 ॥
अनुवाद—“लोगोंकी भीड़ आकर जो गड़बड़ी करती अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने प्रातःकालमें उठकर
है, मुझसे वह सहन नहीं होती। निमन्त्रण देनेके लिये स्नान किया। 'वृन्दावनको छोड़कर जाऊँगा'-यह सोचकर
लोग एकके बाद एक आते रहते हैं। वे लोग ही वे प्रेमाविष्ट हो गये॥155॥
प्रातःकालमें ही आ जाते हैं, जब आप यहाँ नहीं होते।
महाप्रभुको गोकुल जानेके लिये नौकामें
और आपको नहीं पाकर लोग मेरा दिमाग खाते हैं। बैठाकर दूसरी पार गमन :-
मुझे तो तभी प्रसन्नता होगी, जब हम यहाँसे चलें और बाह्य विकार नाहि, प्रेमाविष्ट मन।
गङ्गातटके मार्गसे जाँय। यदि हम अभी जायँगे, तब हम भट्टाचार्य कहे,—चल, याइ महावन ॥ 156 ॥
मकर-सक्रान्तिमें प्रयागमें गङ्गास्नान कर पायेंगे। मेरा
मन बहुत उद्विग्न हो रहा है और मैं इसे सहन नहीं एत बलि' महाप्रभुरे नौकाय बसाञा।
कर पा रहा हूँ, परन्तु आपकी जो आज्ञा होगी, मैं पार करि' भट्टाचार्य चलिला लञा ॥ 157 ॥
उसीको शिरोधार्य करूँगा॥”147-151॥
अनुवाद-बाहरसे महाप्रभुमें कोई विकार दिखायी
अनुभाष्य- 'गड़बड़ि'-लोगोंके आने-जानेसे होनेवाली नहीं दे रहा था, परन्तु उनका मन प्रेममें आविष्ट था।
गड़बड़ी ॥ 148 ॥ बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—चलिये, हम लोग
वृन्दावनको छोड़नेकी इच्छा नहीं होनेपर भी भट्टकी महावन चलें। यह कहकर बलभद्र भट्टाचार्यने महाप्रभुको
इच्छाकी पूर्ति और भट्टकी प्रशंसा :- नौकामें बैठाया। नदी पार करनेके बाद वे महाप्रभुको
यद्यपि वृन्दावन-त्यागे नाहि प्रभुर मन। साथ लेकर चल पड़े॥ 156-157॥
भक्त-इच्छा पूरिते कहे मधुर वचन ॥ 152 ॥ अनुभाष्य-'महावन'-गोकुल ॥ 156 ॥
160 |

अठारहवाँ अध्याय 18/158-167 ]
राजपूत कृष्णदास और मथुराके सनोड़िया ब्राह्मण-दोनों अनुवाद-उसी समय वहाँपर दस घुड़सवार
ही मार्गको जाननेवाले :- म्लेच्छ-पठान सैनिक आये और महाप्रभुको मूर्च्छित
प्रेमी कृष्णदास, आर सेइत ब्राह्मण। पड़े देखकर वे घोड़ोंसे उतरकर उनके पास आ
गङ्गातीरे-पथे याइवार विज्ञ दुइजन ॥ 158 ॥ गये॥ 163 ॥
अनुवाद-प्रेमी कृष्णदास और सनोड़िया ब्राह्मण-दोनों अनुभाष्य- 'आशोयार'-घुड़सवार सैनिक ॥ 163 ॥
ही गङ्गातटवाले मार्गको भली-भाँति जानते थे॥158॥
महाप्रभुके साथी चारों लोगोंको ही
मार्गमें एक वृक्षके नीचे सभीका 'महाप्रभुकी हत्या करनेवाले डाकू' समझकर
विश्रामके लिये बैठना :- सरदारके द्वारा उनको मारनेका प्रयास :-
याइते एक वृक्षतले प्रभु सबा लञा। प्रभुरे देखिञा म्लेच्छ करये विचार।
बसिला, सबार पथ-श्रान्ति देखिया ॥ 159 ॥ 'ऐइ यति-पाश छिल सुवर्ण अपार ॥ 164 ॥
अनुवाद-चलते हुए महाप्रभुने देखा कि उनके एइ चारि बाटोयार धुतुरा खाओयाञा।
सङ्गी सब थक गये हैं, तो उनको साथमें लेकर वे एक मारि' डारियाछे, यतिर सब धन लञा ॥' 165 ॥
वृक्षके नीचे बैठ गये॥ 159 ॥ तबे सेइ पाठान चारि जनेरे बाँधिल।
काटिते चाहे, गौड़िया सब काँपिते लागिल ॥ 166 ॥
गैयाओंको घूमते देखकर व्रजलीलाका स्मरण :-
सेइ वृक्ष निकटे चरे बहु गाभीगण। अनुवाद-महाप्रभुको मूर्च्छित देखकर म्लेच्छ विचार
ताहा देखि' महाप्रभुर उल्लसित मन ॥ 160 ॥ करने लगे, - 'इस संन्यासीके पास अवश्य ही बहुत
अधिक सोना था। इन चारों डकैतोंने संन्यासीका सब
अनुवाद-उस वृक्षके निकट ही बहुत सी गायें कुछ लूटकर उसे धतूरा खिलाकर मार डाला है।' तब
घास चर रही थीं। उन्हें देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत उन पठानोंने उन चारों लोगोंको बाँध दिया और उनको
उल्लास हुआ॥ 160 ॥ मारनेका निश्चय किया। दोनों बङ्गाली भयसे काँपने
लगे॥ 164-166 ॥
हठात् एक वंशीध्वनिके श्रवणसे महाप्रभुकी प्रेम-मूर्च्छा :- अमृतप्रवाह भाष्य- 'बाटोयार'- मार्गमें जो डकैती
आचम्बिते एक गोप वंशी बाजाइल। कर लेते हैं; 'मारि' डारियाछे' - मार डाला है॥ 165 ॥
शुनि' महाप्रभुर महा-प्रेमावेश हैल ॥ 161 ॥ अनुभाष्य- 'बाटोयार' - असहाय पथिकोंको लूटनेवाले
अचेतन हञा प्रभु भूमिते पड़िला। डाकू। 'चारिजनेर' - 1) कृष्णदास राजपूत, 2)
मुखे फेना पड़े, नासाय श्वास रुद्ध हैला ॥ 162 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य 'सनोड़िया'-ब्राह्मण, 3) बलभद्र
अनुवाद-अचानक एक गोपने वंशी बजायी, उसे भट्टाचार्य, 4) बलभद्रके साथी ब्राह्मण ॥ 165-166 ॥
सुनते ही महाप्रभुमें अत्यधिक प्रेमावेश आ गया और
वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। उनके मुखसे झाग कृष्णदास और मथुराके ब्राह्मणके द्वारा निर्भय होकर
निकलने लगी तथा उनकी सांस रुक गयी ॥ 161-162 ॥ पठानको अपना परिचयादि देना :-
उसी समय वहाँ दस घुड़सवार पठानोंका आगमन :- कृष्णदास-राजपुत, निर्भय से बड़।
हेनकाले ताँहा आशोयार दश आइला। सेइ विप्र-निर्भय, से-मुखे बड़ दड़ ॥ 167 ॥
म्लेच्छ-पाठान घोड़ा हैते उत्तरिला ॥ 163 ॥
। 161

[ 18/167-176 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—कृष्णदास तो राजपूत होनेके कारण
बिलकुल निडर थे। सनोड़िया ब्राह्मण भी निडर और
बोलनेमें निपुण थे॥ 167 ॥
अनुभाष्य—'मुखे बड़ दड़'—अति निपुण वक्ता,
बातचीत-परिचयमें पटु॥ 167 ॥
विप्र कहे,—“पाठान, तोमार पातसार दोहाइ।
चल तुमि, आमि सिक़्दार-पाश याइ ॥ 168 ॥
अनुवाद—सनोड़िया ब्राह्मणने कहा,—“पठान, बादशाह
तुम्हारा स्वामी है। तुम हमें अपने सरदारके पास लेकर
चलो॥ 168 ॥
अनुभाष्य—'सिक़्दार'—शान्तिरक्षक विशेष कर्मचारी,
अथवा पदपर विराजमान सेनाका अध्यक्ष, अथवा
सिक्का (बादशाही मुद्रा)-दार (भारप्राप्त कर्मचारी) ॥ 168 ॥
एइ यति—आमार गुरु, आमि—माथुर ब्राह्मण।
पातसार आगे आमार आछे 'शत जन' ॥ 169 ॥
अनुवाद—ये संन्यासी हमारे गुरु हैं और मैं
मथुराका ब्राह्मण हूँ। मैं ऐसे सैकड़ों लोगोंको जानता हूँ,
जो बादशाहकी नौकरी करते हैं॥ 169 ॥
एइ यति व्याधिते कभु हयेन मूर्च्छित।
अबँहि चेतन पाइबे, हइबे सम्वित ॥ 170 ॥
अनुवाद—ये संन्यासी रोगके कारण कभी मूर्च्छित
हो जाते हैं। थोड़ी देर प्रतीक्षा करके देखो, इनमें
चेतनता आ जायेगी और इनकी सामान्य दशा हो
जायेगी ॥ 170 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अबँहि'—अभी ॥ 170 ॥
अनुभाष्य—'सम्वित्'—ज्ञान ॥ 170 ॥
क्षणेक इँहा बैस, बान्धि' राखह सबारे।
इँहाके पुछिया, तबे मारिह आमारे ॥” 171 ॥
अनुवाद—थोड़ी देर तक यहीं बैठो और हम
सबको भले ही बँधा ही रहने दो। जब इनकी चेतनता
लौट आये, तब इनसे ही सब कुछ पूछना। उसके बाद
ही चाहे हमें मार डालना ॥” 171 ॥
पठानके द्वारा क्रोधपूर्वक सभीको 'डाकू' कहना :—
पाठान कहे,—“तुमि पश्चिमा माथुर दुइजन।
'गौड़िया' ठक् एइ काँपे दुइजन ॥” 172 ॥
अनुवाद—पठानने कहा,—“तुम सभी ठग हो, तुम
दोनों पश्चिम भारतके मथुराके रहनेवाले हो और ये
जो भयसे काँप रहे हैं, दोनों बङ्गालके हैं॥” 172 ॥
उसके उत्तरमें कृष्णदासके द्वारा पठानको भय दिखाना
और कड़वे वचन कहना :—
कृष्णदास कहे,—“आमार घर एइ ग्रामे।
दुइशत तुर्की आछे, शतेक कामाने ॥ 173 ॥
अखनि आसिबे सब, आमि यदि फुकारि।
घोड़ा-पिड़ा लुटि' लबे तोमा-सबा-मारि' ॥ 174 ॥
गौड़िया—'बाटपाड़' नहे, तुमि—'बाटपाड़'।
तीर्थवासी लुठ', आर चाह' मारिवार ॥” 175 ॥
अनुवाद—कृष्णदासने कहा,—“इसी ग्राममें मेरा घर
है। मेरे पास दो सौ तुर्की सैनिक और एक सौ तोपें
हैं। यदि मैं उन्हें वंशी बजाकर बुलाऊँगा, तो वे सभी
अभी आ जायेंगे। फिर वे तुम सबको मारकर तुम्हारे
घोड़े, काठी और सब सामान ले लेंगे। गौड़ीय ठग नहीं
हैं, बल्कि तुम ही ठग हो। तुम लोग तीर्थयात्रियोंको
लूटते हो और उन्हें मारना चाहते हो॥” 174-175 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'घोड़ा-पिड़ा'—घोड़ा तथा उसकी
पीठपर रखी काठी आदि वस्तुएँ॥ 174 ॥
अनुभाष्य—'फुकारि'—वंशीध्वनि करके॥ 174 ॥
पठानोंको भय :—
शुनिया पाठान मने सङ्कोच हइल।
हेनकाले महाप्रभु 'चैतन्य' पाइल ॥ 176 ॥
162 ।

अठारहवाँ अध्याय 18/176-186 ]
अनुवाद—कृष्णदासकी बात सुनकर पठानोंके मनमें कुछ सङ्कोच हुआ। उसी समय अचानक महाप्रभुमें चेतनता आ गयी॥ 176॥
महाप्रभुकी बाह्यदशा और नृत्य-कीर्तन :-
हुङ्कार करिया उठे, बोले 'हरि' 'हरि'।
प्रेमावेशे नृत्य करे ऊर्ध्वबाहु करि'॥ 177॥
अनुवाद—महाप्रभु हुङ्कार करके उठ खड़े हुए और जोरसे 'हरि' 'हरि' बोलने लगे। तब महाप्रभु हाथ उठाकर प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ 177॥
पापी म्लेच्छोंको हरिनाम्-श्रवण करनेसे कष्ट :-
प्रेमावेशे प्रभु यबे करेन चित्कार।
म्लेच्छेर हृदये येन लागे शेलधार॥ 178॥
अनुवाद—प्रेमावेशमें जब महाप्रभु चीत्कार कर रहे थे, तब म्लेच्छोंको ऐसा लग रहा था मानो कोई उनके हृदयको बाणकी नोकसे बेध रहा हो॥ 178॥
अनुभाष्य—'लागे शेलधार'—बाणकी नोककी भाँति बेधना (छेदना)॥ 178॥
म्लेच्छोंके द्वारा तत्क्षणात् चारों लोगोंको खोल देना; महाप्रभुके लिये भक्तद्रोहके दर्शनके अवकाश नहीं :-
भय पाञा म्लेच्छ छाड़ि' दिल चारिजन।
प्रभु ना देखिल निज-गणेर बन्धन॥ 179॥
अनुवाद—भयभीत होकर पठानोंने उसी समय चारों लोगोंको खोल दिया। इसलिये महाप्रभुने अपने साथियोंको बँधे हुए नहीं देखा॥ 179॥
म्लेच्छको देखकर महाप्रभुके द्वारा भावको छिपाना :-
भट्टाचार्य आसि' प्रभुरे धरि' बसाइल।
म्लेच्छगण देखि' महाप्रभुर 'बाह्य' हैल॥ 180॥
अनुवाद—तब बलभद्र भट्टाचार्यने आकर महाप्रभुको पकड़कर बैठाया। म्लेच्छोंको देखकर महाप्रभुको बाह्यज्ञान हुआ॥ 180॥
म्लेच्छोंके द्वारा महाप्रभुकी वन्दना और चारोंके विरुद्ध शिकायत :-
म्लेच्छगण आसि' प्रभुर वन्दिल चरण।
प्रभु-आगे कहे,—"एइ ठक् चारिजन॥ 181॥
एइ चारि मिलि' तोमाय धुतुरा खाओयाञा।
तोमार धन लैल, तोमाय पागल करिया॥" 182॥
अनुवाद—म्लेच्छोंने आकर महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की और उनसे कहा,—"ये चारों लोग ठग हैं। इन चारोंने मिलकर आपको धतूरा खिलाकर पागल करके आपका सारा धन ले लिया है॥" 181-182॥
चारों लोगोंको ही 'अपना' कहकर महाप्रभुके द्वारा उनका परिचय देना :-
प्रभु कहेन,—"ठक् नहे, मोर 'सङ्गी' जन।
भिक्षुक संन्यासी, मोर नाहि किछु धन॥ 183॥
मृगी व्याधिते आमि कभु हइ अचेतन।
एइ चारि दया करि' करेन पालन॥" 184॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"ये लोग ठग नहीं, बल्कि मेरे साथी हैं। मैं एक भिक्षुक संन्यासी हूँ, मेरे पास कोई धन नहीं है। मैं मिरगीकी बीमारीके कारण कभी-कभी मूर्च्छित हो जाता हूँ। ये चारों लोग कृपा करके मेरा पालन करते हैं॥" 183-184॥
पठानोंमेंसे एक व्यक्ति 'मौलाना' :-
सेइ म्लेच्छ-मध्ये एक परम गम्भीर।
कालवस्त्र परे सेइ,—लोके कहे 'पीर'॥ 185॥
अनुवाद—उन म्लेच्छोंमें-से एक व्यक्ति बहुत गम्भीर था। उसने काले वस्त्र पहने थे और लोग उसे 'पीर' (साधु) कहते थे॥ 185॥
महाप्रभुके दर्शनसे उसमें नम्रभाव और निर्विशेष-ब्रह्मको स्थापित करनेकी चेष्टा :-
चित्त आर्द्र हैल ताँर प्रभुरे देखिया।
'निर्विशेष-ब्रह्म' स्थापे स्वशास्त्र उठाञा॥ 186॥
। 163

[ 18/186-194 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—महाप्रभुको देखकर उस 'पीर'का चित्त
द्रवीभूत हो गया। वह अपने शास्त्रके (कुरानके) द्वारा
'निर्विशेष-ब्रह्म'की स्थापना करनेके लिये महाप्रभुसे बात
करना चाहता था॥ 186॥
अनुभाष्य—'निर्विशेष-ब्रह्म'—अज्ञेय, परिचयरहित
'ईश्वर'। 'खुदा' (ईश्वर) और 'बन्दा' (जीव)—इन दो
नित्यभावोंसे रहित चिद्विलासहीन पारलौकिक
अवस्थान॥ 186॥
मुस्लिम-शास्त्रकी युक्तिके द्वारा ही महाप्रभुके द्वारा
उसके मतका खण्डन :—
'अद्वैत-ब्रह्मवाद' सेइ करिल स्थापन।
ताँर शास्त्रयुक्त्ये ताँरे प्रभु कैला खण्डन॥ 187॥
येइ येइ कहिल, प्रभु सकलि खण्डिल।
उत्तर ना आइसे मुखे, महास्तब्ध हैल॥ 188॥
अनुवाद—उस म्लेच्छाचार्यने कुरानके आधारपर
'अद्वैत-ब्रह्मवाद'की स्थापना की, परन्तु महाप्रभुने उसका
खण्डन कर दिया। उसने जो-जो तर्क या विचार रखे,
महाप्रभुने उस सबका खण्डन कर दिया। अन्तमें वह
म्लेच्छाचार्य बिलकुल स्तब्ध हो गया और कुछ भी
नहीं बोल सका॥ 187-188॥
मुस्लिम-शास्त्रोंमें सर्वप्रथम निर्विशेषत्वको स्थापित करनेके
बाद अन्तमें सविशेष-ब्रह्मका ही स्थापन :—
प्रभु कहे, —"तोमार शास्त्र स्थापे 'निर्विशेषे'।
ताहा खण्डि' 'सविशेष' स्थापियाछे शेषे॥ 189॥
कुरानमें सबसे अन्तमें सविशेष-ब्रह्म
श्रीकृष्णका परिचय :—
तोमार शास्त्रे कहे शेषे 'एकइ ईश्वर'।
'सर्वैश्वर्यपूर्ण' तैं हो—श्याम-कलेवर॥ 190॥
सच्चिदानन्द-देह, पूर्णब्रह्म-स्वरूप।
'सर्वात्मा', 'सर्वज्ञ', नित्य सर्वादि-स्वरूप॥ 191॥
सृष्टि, स्थिति, प्रलय ताँहा हैते हय।
स्थूल-सूक्ष्म-जगतेर तैं हो समाश्रय॥ 192॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —"पहले तो तुम्हारे शास्त्र
'निर्विशेष'की स्थापना करते हैं, किन्तु अन्तमें उसीका
खण्डन करके 'सविशेष'की स्थापना करते हैं। तुम्हारे
शास्त्रमें अन्तमें 'एक ही ईश्वर'की बात कही गयी है।
वे ईश्वर सब प्रकारके ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं और उनका
शरीर श्याम वर्णका है। उनकी देह सच्चिदानन्द है, वे
पूर्ण ब्रह्म स्वरूप हैं, वे सर्वात्मा, सर्वज्ञ, नित्य और
सबके आदि-स्वरूप हैं। उन्हींके द्वारा सृष्टि, स्थिति
और प्रलय होता है। वे स्थूल और सूक्ष्म जगत्के
वास्तविक आश्रय हैं॥ 189-192॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वशास्त्र'—कुरान; मुसलमानोंमें
'सूफी' नामक एक सम्प्रदाय है, इनका मत ही 'निर्विशेष
ब्रह्म' अथवा 'अद्वैत ब्रह्मवाद' है, इनका महावाक्य—
“अनलहक्” है। यह सूफी-मत शाङ्कर मतसे उत्पन्न
हुआ है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
तुम्हारे मोहम्मदके शास्त्रमें मोहम्मदके सप्तम स्वर्गमें
ईश्वरके दर्शनके वर्णनमें ईश्वरका पूर्ण विग्रह स्वीकार
किया गया है॥ 186-190॥
उन भगवान्की प्रीति अथवा भक्ति ही संसार-बन्धनसे
मुक्त करनेवाली और परम-पुरुषार्थ :—
सर्वश्रेष्ठ, सर्वाराध्य, कारणेर कारण।
ताँर भक्त्ये हय जीवेर संसार-तारण॥ 193॥
ताँर सेवा बिना जीवेर ना याय 'संसार'।
ताँहार चरणे प्रीति—'पुरुषार्थ-सार'॥ 194॥
अनुवाद—वे ईश्वर सर्वश्रेष्ठ, सभीके आराध्य तथा
सभी कारणोंके भी कारण हैं। उनकी भक्तिसे जीव
संसारसे तर जाता है। उनकी सेवाके बिना बद्धजीवोंका
संसार क्षय नहीं होता। उन्हीं ईश्वरके चरणोंमें प्रीति ही
सभी पुरुषार्थोंका सार है॥ 193-194॥
अमृतप्रवाह भाष्य—उन ईश्वरकी 'एबादत्' अर्थात्
पाँच समय नमाज आदि सेवा नहीं करनेसे जीवको
पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती। तुम्हारे शास्त्रमें प्रीतिको ही
पुरुषार्थ कहा गया है; उसमें कर्म-योग-ज्ञानादिको
164 |

अठारहवाँ अध्याय 18/194–201 ]
स्थापित करके अन्तमें उसका खण्डन करके ईश्वरकी
'एबादत्' अर्थात् सेवाकी श्रेष्ठता ही स्थापित हुई
है॥ 194॥
भगवद्-प्रेमकी महिमा :-
मोक्षादि आनन्द यार नहे एक 'कण'।
पूर्णानन्द-प्राप्ति ताँर चरण-सेवन॥ 195॥
अनुवाद— ईश्वरमें सायुज्य मोक्षका आनन्द उनके
चरणोंकी सेवासे प्राप्त पूर्णानन्दके एक कणके समान
भी नहीं है॥ 195॥
कुरानमें पहले 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग'के विषयमें बतलाकर
अन्तमें भगवद्भक्ति ही संस्थापित :-
'कर्म', 'ज्ञान', 'योग' आगे करिया स्थापन।
सब खण्डि' स्थापे 'ईश्वर', 'ताँहार सेवन' ॥ 196॥
अनुवाद— तुम्हारे शास्त्र कुरानमें पहले 'कर्म', 'ज्ञान',
'योग'की स्थापना की गयी है, परन्तु अन्तमें इन सबका
खण्डन करके सविशेष 'ईश्वर' और उनकी सेवाकी ही
स्थापना की गयी है॥ 196॥
साधारणतः मुस्लिम-पण्डितोंमें कुरानके वास्तविक तात्पर्यके
ज्ञानका अभाव; पूर्वमें वर्णित कर्म और ज्ञानकी विधिकी
अपेक्षा बादमें वर्णित भक्तिकी विधि ही बलवान :-
तोमार पण्डित-सबार नाहि शास्त्र-ज्ञान।
पूर्वापर-विधि-मध्ये 'पर'-बलवान् ॥ 197॥
मौलानाको कुरानके वास्तविक-निर्णय
करनेका अनुरोध :-
निज-शास्त्र देखि' तुमि विचार करिया।
कि लिखियाछे शेषे कह निर्णय करिया॥" 198॥
अनुवाद— तुम्हारे पण्डितोंको शास्त्र-ज्ञान नहीं है।
वास्तवमें 'पूर्व' (पहलेवाली) और 'पर' (बादवाली)
विधिमें-से 'पर' विधि ही बलवान् होती है। अपने
शास्त्र कुरानको देखकर उसमें अन्तमें क्या लिखा है,
उसपर विचार करके तुम मुझे अपना निर्णय
बतलाओ॥" 197-198॥
मौलानाके द्वारा महाप्रभुके वचनोंकी 'सत्यता'का अनुमोदन;
मुस्लिम पण्डितोंके हृदय-दौर्बल्यको स्वीकार करना :-
म्लेच्छ कहे,—“येइ कह, सेइ 'सत्य' हय।
शास्त्रे लिखियाछे, केह लइते ना पारय॥ 199॥
अनुवाद— उस म्लेच्छाचार्यने कहा,—“आप जो कह
रहे हैं, वही 'सत्य' है। कुरानमें तो ऐसा ही लिखा है,
किन्तु हमारे कोई भी पण्डित लोग न तो उसे समझते
हैं और न ही उसे स्वीकार करते हैं॥ 199॥
उनकी निर्विशेषत्वमें ही दृढ़ आस्था, चिन्मय
सविशेषत्वकी सेवामें आस्था नहीं :-
'निर्विशेष-गोसाञि' लञा करेन व्याख्यान।
'साकार-गोसाञि'-सेव्य, कारो नाहि ज्ञान॥ 200॥
अनुवाद— निर्विशेष ईश्वरको लेकर ही सभी
कुरानकी व्याख्या करते हैं, किन्तु ईश्वर साकार तथा
सेव्य हैं, इसका किसीको भी ज्ञान नहीं है॥ 200॥
अमृतप्रवाह भाष्य— पीरके जैसे काले वस्त्रधारी
म्लेच्छाचार्यने कहा,—हमारे शास्त्रकी गूढ़ बात साधारण
पण्डित नहीं समझ सकते; इसलिये वे हमारे अल्लाके
'निराकार भाव'को लेकर ही लोगोंको व्याख्या करते हैं।
इस बातको अधिकांश लोग नहीं जानते कि चरम
अवस्थामें ईश्वरका सच्चिदानन्द आकार ही सेव्य
है॥ 199-200॥
अठारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य— 'गोसाञि'—आराध्य वस्तु भगवान्;
'साकार'—मनुष्यके अपने जड़ीय ज्ञानका अतिक्रम
करके त्रिगुणातीत अप्राकृत सविशेष विग्रह अथवा
चिन्मय आकारसे युक्त विग्रह॥ 200॥
महाप्रभुको 'परमेश्वर' मानना और कृपाकी याचना :-
सेइत 'गोसाञि' तुमि—साक्षात् 'ईश्वर'।
मोरे कृपा कर, मुञि—अयोग्य पामर॥ 201॥
अनुवाद— आप साक्षात् वही ईश्वर हैं। मुझपर
कृपा कीजिये, मैं अयोग्य तथा पतित हूँ॥ 201॥
। 165

[ 18/202–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मौलानाके द्वारा स्वयं साधन और साध्य वस्तुकी
मीमांसाकी चेष्टामें असमर्थताको मानना :-
अनेक देखिनु मुञि म्लेच्छ-शास्त्र हैते।
'साध्य-साधन-वस्तु' नारि निर्द्धारिते ॥ 202 ॥
अनुवाद-मैंने मुस्लिम-शास्त्रोंमें बहुत ढूँढ़ा है,
किन्तु साध्य-वस्तु क्या है और उसे पानेका साधन
क्या है, मैं इसको निर्धारित नहीं कर पाया हूँ ॥ 202 ॥
महाप्रभुके दर्शनसे मौलानाकी जिह्वापर स्वतः ही
श्रीकृष्णनामकी स्फूर्ति और जड़ीय अभिमान दूर होना :-
तोमा देखि' जिह्वा मोर बले 'कृष्णनाम'।
'आमि-बड़ ज्ञानी'-एड़ गेल अभिमान ॥ 203 ॥
महाप्रभुको प्रणाम करके साध्य-साधनकी जिज्ञासा :-
कृपा करि' बल मोरे 'साध्य-साधने'।"
एत बलि' पड़े महाप्रभुर चरणे ॥ 204 ॥
अनुवाद-आपको देखकर मेरी जिह्वा श्रीकृष्णनाम
बोल रही है। 'मैं बहुत बड़ा ज्ञानी हूँ'-मेरा यह
अभिमान भी दूर हो गया है। आप कृपा करके मुझे
परम 'साध्य' और उसे पानेके 'साधन'के विषयमें
बतलाइये।" इतना कहकर वे महाप्रभुके चरणोंमें गिर
पड़े॥ 203-204 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसे आश्वासन, श्रीकृष्णनामके
आभाससे ही उसके पापपुञ्जका विनाश :-
प्रभु कहे,-“उठ, कृष्णनाम तुमि लइला।
कोटि जन्मेरे पाप गेल, 'पवित्र' हइला ॥"205 ॥
महाप्रभुके आदेशसे सभीके द्वारा श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :-
'कृष्ण' कह, 'कृष्ण' कह, -कैला उपदेश।
सबे 'कृष्ण' कहे, सबार हैल प्रेमावेश ॥ 206 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "उठो, तुमने कृष्णनामका
उच्चारण किया है, इसलिये तुम्हारे करोड़ों जन्मोंके पाप
नष्ट हो गये हैं। अब तुम 'पवित्र' हो गये हो।" 'कृष्ण'
बोलो, 'कृष्ण' बोलो-महाप्रभुने यह उपदेश उन सब
पठानोंको दिया। जैसे ही वे 'कृष्ण'का उच्चारण करने लगे, सभीमें प्रेमका आवेश हो गया ॥ 205-206 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसका 'रामदास'-नाम-संस्कार प्रदान :-
'रामदास' बलि' प्रभु ताँर कैल नाम।
आर एक पाठान, ताँर नाम - 'बिजली-खाँन' ॥ 207 ॥
पठानोंके सरदार बिजली खाँका परिचय :-
अल्प वयस ताँर, राजार कुमार।
'रामदास' आदि पाठान-चाकर ताँहार ॥ 208 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस म्लेच्छाचार्यको परोक्षरूपसे
हरिनामकी दीक्षा देते हुए उसे 'रामदास' कहकर उसका
नामकरण किया। उन लोगोंमें-से एक 'बिजली खाँन'
नामका पठान था। उसकी आयु बहुत कम थी और
वह राजाका पुत्र था। 'रामदास' आदि पठान उसके दास
थे॥ 207-208 ॥
उसके द्वारा भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण,
महाप्रभुका उसके मस्तकपर पदार्पण :-
'कृष्ण' बलि' पड़े सेइ महाप्रभुर पाय।
प्रभु श्रीचरण दिल ताँहार माथाय ॥ 209 ॥
अनुवाद-वह बिजली-खाँन भी 'कृष्ण' बोलते हुए
महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गया। महाप्रभुने अपने
श्रीचरणकमलको उसके मस्तकपर रख दिया ॥ 209 ॥
महाप्रभुकी यात्रा, उन सब पठानोंके द्वारा
वैराग्यधर्मको ग्रहण करना :-
ताँ-सबारे कृपा करि' प्रभु त' चलिला।
सेइत पाठान सब 'वैरागी' हइला ॥ 210 ॥
अनुवाद-उन सबपर कृपा करके महाप्रभु तो चल
दिये। वे सब पठान वैरागी बन गये ॥ 210 ॥
उनकी 'पठान-वैष्णव'के रूपमें ख्याति और उनके द्वारा
सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान :-
'पाठाम-वैष्णव' बलि' हैल ताँर ख्याति।
सर्वत्र गाहिया बुले महाप्रभुर कीर्त्ति ॥ 211 ॥
166

अठारहवाँ अध्याय 18/211-220 ]
अनुवाद—वे सब 'पठान-वैष्णव'के नामसे प्रसिद्ध
हो गये। वे सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान करते हुए
भ्रमण करने लगे॥ 211 ॥
सर्वत्र महाभागवत बिजली खाँकी महिमाका विस्तार :—
सेइ बिजली-खाँन हैल 'महा-भागवत'।
सर्वतीर्थे हैल ताँर परम-महत्त्व॥ 212 ॥
अनुवाद—वे बिजली-खाँन महाभागवत बन गये
और सभी तीर्थोंमें उनकी महिमा फैल गयी॥ 212 ॥
पश्चिम-भारतमें आकर महाप्रभुके द्वारा
म्लेच्छोंका उद्धार :—
ऐछे लीला करे प्रभु श्रीकृष्णचैतन्य।
'पश्चिमे' आसिया कैल यवनादि धन्य॥ 213 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु ऐसी लीलाएँ करते
हैं। पश्चिम भारतमें आकर उन्होंने यवनोंको भी धन्य
कर दिया॥ 213 ॥
सोरोक्षेत्रमें गङ्गास्नान और गङ्गातटक
पथसे प्रयागमें गमन :—
सोरो क्षेत्रे आसि' प्रभु कैला गङ्गास्नान।
गङ्गातीर-पथे कैला प्रयागे पयान॥ 214 ॥
अनुवाद—सोरोक्षेत्रमें आकर महाप्रभुने गङ्गास्नान
किया और फिर गङ्गातटके मार्गसे उन्होंने प्रयागकी
ओर यात्रा की॥ 214 ॥
सनोड़िया-ब्राह्मण और कृष्णदासको
विदायी देनेकी इच्छा :—
सेइ विप्रे, कृष्णदासे, प्रभु विदाय दिला।
मोड़-हाते दुइजन कहिते लागिला॥ 215 ॥
अनुवाद—सोरोक्षेत्रमें महाप्रभुने सनोड़िया ब्राह्मण
तथा कृष्णदासको घर लौट जानेके लिये कहा, तब वे
दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे॥ 215 ॥
अनुभाष्य—'सेइ विप्रे, कृष्णदासे'—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके
शिष्य सनोड़िया ब्राह्मणको और कृष्णदास-राजपूतको
सोरोसे विदायी दी॥ 215 ॥
उनकी प्रयाग तक अनुगमनकी प्रार्थना :—
“प्रयाग पर्यन्त दुँहे तोमा-सङ्गे याब।
तोमार चरण-सङ्ग पुनः काँहा पाब?॥ 216 ॥
म्लेच्छदेश, केह काँहा करये उत्पात।
भट्टाचार्य-पण्डित, कहिते ना जानेन बातू॥” 217 ॥
अनुवाद—“हम दोनों प्रयाग तक आपके साथ
जायेंगे। आपके चरणकमलोंका सङ्ग पुनः हमें कहाँ
प्राप्त होगा? म्लेच्छ देश है, कौन कहाँ क्या उत्पात
खड़ा कर दे? बलभद्र भट्टाचार्य यद्यपि पण्डित हैं,
किन्तु वे यहाँकी भाषा नहीं जानते हैं॥” 216-217 ॥
महाप्रभुका मन्द-मुसकाना और उनका
महाप्रभुके पीछे-पीछे चलना :—
शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिते लागिला।
सेइ दुइजन प्रभुर सङ्गे चलि' आइला॥ 218 ॥
अनुवाद—उन दोनोंकी बात सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द
मुस्करा दिये। वे दोनों महाप्रभुके साथ चले आये॥ 218 ॥
मार्गमें महाप्रभुका दर्शन करनेवाले प्रत्येक
व्यक्तिके द्वारा ही श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :—
येइ येइ जन प्रभुर पाइल दरशन।
सेइ प्रेमे मत्त हय, करे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन॥ 219 ॥
उससे किसी दूसरे व्यक्तिको श्रवण करनेका
सुयोग, इस प्रकार श्रवण-कीर्त्तनधाराकी
परम्परासे सभी देशोंका उद्धार :—
ताँर सङ्गे अन्योन्ये, ताँर सङ्गे आन।
एइमत 'वैष्णव' कैला सब देश-ग्राम॥ 220 ॥
अनुवाद—जिस-जिस व्यक्तिको महाप्रभुके दर्शन
प्राप्त हुए, वही प्रेममें मत्त हो गया और श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन
करने लगा। महाप्रभुके दर्शनसे जो व्यक्ति वैष्णव बना,
उसका जिसने सङ्ग किया, वह भी वैष्णव बन गया।
। 167

[ 18/219–228 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इस प्रकार सभी नगरों और गाँवोंके लोग एकके बाद
एक वैष्णव बन गये॥ 219-220॥
दक्षिणकी भाँति पश्चिमदेशका भी उद्धार करना :-
दक्षिण याइते यैछे शक्ति प्रकाशिला।
सेइमत ‘पश्चिमदेश’ प्रेमे भासाइला॥ 221॥
अनुवाद—दक्षिण भारतमें जाते समय महाप्रभुने
जैसे अपनी शक्तिको प्रकाशित किया था, उसी प्रकार
उन्होंने 'पश्चिम-भारत'को भी श्रीकृष्णप्रेममें डुबो
दिया॥ 221॥
अनुभाष्य—'पश्चिम'-देश'-कोई-कोई कहते हैं कि
उस समय श्रीमन्महाप्रभु वृन्दावनसे कुरुक्षेत्र जाकर फिर
प्रयाग गये थे। कुरुक्षेत्रमें भद्रकाली-मन्दिरके निकट
श्रीगौरविग्रह आज भी विराजमान है॥ 221॥
अठारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका प्रयागमें आगमन; दस दिन
त्रिवेणी-दर्शन और स्नान :-
एइमत चलि' प्रभु 'प्रयाग' आइला।
दशदिन त्रिवेणीते मकर-स्नान कैला॥ 222॥
अनुवाद—इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु 'प्रयाग'में
आ गये। दस दिनों तक उन्होंने त्रिवेणीमें मकर-स्नान
किया॥ 222॥
महाप्रभुका चरित्र अगाध; वृन्दावनके प्रेम-वर्णनमें
साक्षात् शेषकी भी असमर्थता :-
वृन्दावन-गमन, प्रभु-चरित्र अनन्त।
'सहस्र-वदन' याँर नाहि पा'न अन्त॥ 223॥
अनुवाद—महाप्रभुका वृन्दावनमें गमन तथा वहाँपर
उनकी लीलाएँ अनन्त हैं, 'सहस्र-मुखवाले' अनन्त-शेष
भी उनकी लीलाओंका अन्त नहीं पाते॥ 223॥
ग्रन्थकारका दैन्य और दिग्दर्शनमात्र वर्णन :-
ताहा के कहिते पारे क्षुद्र जीव हञा।
दिग्दर्शन कैलुँ मुञि सूत्र करिया॥ 224॥
अनुवाद—तब क्षुद्र जीव होकर कौन उनका वर्णन
कर सकता है? मैंने तो सूत्रके रूपमें उनका दिग्दर्शन
मात्र करवाया है॥ 224॥
दुर्भागे व्यक्तियोंका ही श्रीचैतन्यलीलामें अविश्वास :-
अलौकिक-लीला प्रभुर अलौकिक-रीति।
शुनिलेओ भाग्यहीनेर ना हय प्रतीति॥ 225॥
अनुवाद—महाप्रभुकी लीलाएँ और उनकी रीतियाँ,
सब अलौकिक हैं। किन्तु भाग्यहीन व्यक्तियोंको उन
लीलाओंको सुनकर भी उनके प्रति विश्वास नहीं
होता॥ 225॥
सभी श्रोताओंको ही श्रीचैतन्यलीलामें
दृढ़-श्रद्धा और वास्तविक सत्यवस्तुके
ज्ञानमें विश्वास करनेका अनुरोध :-
आद्योपान्त चैतन्यलीला—'अलौकिक' जान'।
श्रद्धा करि' शुन इहा, 'सत्य' करि' मान'॥ 226॥
अनुवाद—आदिसे अन्त तक श्रीचैतन्यलीलाओंको
अलौकिक जानो। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक उनका श्रवण
करो और उन्हें 'सत्य' मानो॥ 226॥
अविश्वासी और तार्किकके द्वारा
अपने ही अमङ्गलको बुलाना :-
येइ तर्क करे इँहा, सेइ—'मूर्खराज'।
आपनार मुण्डे से आपनि पाड़े बाज॥ 227॥
अनुवाद—जो इसमें तर्क करता है—वह 'महामूर्ख'
है। वह अपने ही सिरपर जान-बूझकर वज्रपात करता
है॥ 227॥
चैतन्यचरितामृत-रसामृतसिन्धुके जलमें जगत् प्लावित :-
चैतन्य-चरित्र एइ—'अमृतेर सिन्धु'।
जगत् आनन्दे भासाय यार एकबिन्दु॥ 228॥
अनुवाद—यह श्रीचैतन्यचरित 'अमृतका सिन्धु' है,
जिसकी एक बूँद भी समस्त जगत्को आनन्दमें डुबो
सकती है॥ 228॥
168 |

अठारहवाँ अध्याय 18/229 ]
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 229 ॥ वर्णन कर रहा है ॥ 229 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीवृन्दावनदर्शन-विलासो
नाम अष्टादश-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीवृन्दावनदर्शन-विलास
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी नामक अठारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 169

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
170 |

उन्नीसवाँ अध्याय
कथासार—श्रीरूप-सनातन रामकेलिग्राममें महाप्रभुके
दर्शन करनेके बाद विषयोंके त्यागके उपायोंको कार्यान्वित
करने लगे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय
प्राप्त करनेके लिये 'कृष्णमन्त्र'के दो पुरश्चरण करवाये।
श्रीरूपगोस्वामी अपनी सम्पत्तिमें-से दस हजार मुद्राएँ
गौड़देशमें एक व्यापारीके पास रखकर बाकी धनको
नौकामें चढ़ाकर बाकला-चन्द्रद्वीपमें गये। उस धनको
उन्होंने ब्राह्मणों, वैष्णवों और कुटुम्बियोंमें बाँट दिया
और एक भाग किसी विपत्तिसे बचनेके लिये अलग
रख दिया। महाप्रभु वनके पथसे किस दिन वृन्दावन-यात्रा
करेंगे, इसे जाननेके लिये उन्होंने अपने दो सेवकोंको
पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें भेजा। दूसरी ओर श्रीसनातन गोस्वामी
रोगके छलसे पण्डितोंको लेकर भागवतादिकी चर्चा
करने लगे। गौड़ेश्वर बादशाह हुसेनशाहने पहले वैद्यके
द्वारा, बादमें स्वयं अपने नेत्रोंसे देखकर सनातनके
राजकार्यको छोड़नेके छलको जानकर उन्हें कारागारमें
बन्द करके उड़ीसा देशपर आक्रमण करनेके लिये
यात्रा की।
महाप्रभुने जब वृन्दावन जानेके लिये वनपथसे
यात्रा आरम्भ की, तब श्रीरूप गोस्वामीने गृहत्याग कर
दिया। उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको यह सन्देश भिजवाया
कि वे गृहत्याग करके अपने भाई अनुपम मल्लिकके
साथ महाप्रभुसे मिलने जा रहे हैं। श्रीरूप गोस्वामी
प्रयागमें पहुँचकर महाप्रभुके पास दस दिन तक रहे।
इसी बीच श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको निमन्त्रण करके
महाप्रभुका विशेष सम्मान किया। महाप्रभुने श्रीरूपका
श्रीवल्लभभट्टके साथ परिचय करा दिया। उसके बाद
श्रीरघुपति उपाध्यायके वहाँ पहुँचनेपर उनका महाप्रभुके
साथ बहुत रस-आलाप हुआ। इस स्थानपर श्रीकविराज
गोस्वामीने श्रीरूप और श्रीसनातनके व्रजजीवनके विषयमें
कुछ वर्णन किया है। प्रयागमें दस दिन रहकर
महाप्रभुने श्रीरूपको भक्तिरसतत्त्वकी सूत्ररूपमें शिक्षा
देकर रसामृतसिन्धुकी रचना करनेकी आज्ञा दी।
श्रीरूपको वहाँसे वृन्दावन भेजकर महाप्रभु काशीमें
जाकर श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहे।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीरूपके द्वारा व्रजरसकेलि-तत्त्वको प्रकट
करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :-
वृन्दावनीयां रसकेलिवात्ताँ
कालेन लुप्तां निजशक्तिमुक्तः।
सञ्चार्य रूपे व्यतनोत् पुनः स
प्रभुर्विधौ प्रागिव लोकसृष्टिम् ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरने सृष्टिसे पहले ब्रह्माके
हृदयमें जिस प्रकार (सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक
भगवत्तत्त्वकी) प्रेरणा की थी, उसी प्रकार श्रीरूप
गोस्वामीमें अत्यधिक उत्सुक होकर निज-शक्तिका
सञ्चार करके कालधर्मसे (कालके प्रभावसे) लुप्त हुई
वृन्दावनकी रसकेलिवात्र्ताका विस्तार किया था ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
सः प्रभुः (श्रीगौरः) उत्कः (उत्कण्ठितः सन्) लोक-सृष्टिं
प्राक् (विश्व-सृष्ट्यादेः पूर्वं) विधौ (विधातरि ब्रह्मणि) इव रूपे
(श्रीरूपगोस्वामिनि) निजशक्तिं सञ्चार्य (निधाय) कालेन
(कालधर्मेण) लुप्ताम् (अन्तर्हितामिति) वृन्दावनीयां रसकेलिवार्त्तां
(वृन्दावनसम्बन्धिनीं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन-विलास-कथां) पुनः व्यतनोत्
(प्रकाशितवान्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
171

[ 19/2-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो,
सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥
महाप्रभुके दर्शनके बाद श्रीरूप-सनातनका
अपने घरमें लौटना :—
श्रीरूप-सनातन रहे रामकेलि-ग्रामे।
प्रभुरे मिलिया गेला आपन-भवने॥३॥
अनुवाद—महाप्रभुसे रामकेलि ग्राममें मिलनेके बाद
श्रीरूप और श्रीसनातन अपने घर लौट गये थे॥३॥
विषय-त्याग और महाप्रभुकी प्राप्तिके
लिये दोनोंका पुरश्चरण :—
दुइभाइ विषय-त्यागेर उपाय सृजिल।
बहुधन दिया दुइ ब्राह्मणे वरिल॥४॥
कृष्णमन्त्रे कराइल दुइ पुरश्चरण।
अचिरात् पाइबारे चैतन्य-चरण॥५॥
अनुवाद—दोनों भाइयोंने विषय-त्यागका उपाय सोच
निकाला। इस कार्यके लिये उन्होंने बहुत-सा धन देकर
दो ब्राह्मणोंको वरण किया। उन ब्राह्मणोंने तीनों सन्ध्या
श्रीकृष्णमन्त्रका जप, श्रीकृष्ण-अर्चर्नादि पुरश्चरण
नियमपूर्वक दो बार किये जिससे दोनों भाइयोंको
श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी अतिशीघ्र प्राप्ति
हो॥४-५॥
अनुभाष्य—‘पुरश्चरण’—मध्यलीला 15/108 संख्या
देखें॥५॥
श्रीरूपका फतेहाबादमें अपने घरपर आगमन :—
श्रीरूप-गोसाञि तबे नौकाते भरिया।
आपणार घरे आइला बहुधन लञा॥६॥
अनुवाद—उसके बाद श्रीरूपगोस्वामी बहुत-सा धन नौकामें भरकर अपने घरमें लेकर आये॥६॥
ब्राह्मण-वैष्णवोंको आधा, स्वजनोंको
एक-चौथाई धनका वितरण :—
ब्राह्मण-वैष्णवे दिला तार अर्द्ध-धने।
एक चौठि धन दिला कुटुम्ब-भरणे॥७॥
अनुवाद—उन्होंने उस धनका आधा भाग तो
ब्राह्मणों और वैष्णवोंमें बाँट दिया तथा उन्होंने एक
चौथाई धन अपने कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये दे
दिया॥७॥
भावी-विपत्तिसे उद्धारके लिये धनको बचाकर रखना :—
दण्डबन्ध लागि' चौठि सञ्चय करिला।
भाल-भाल विप्र-स्थाने स्थाप्य राखिला॥८॥
अनुवाद—भविष्यमें आनेवाली किसी विपत्तिसे
उद्धारके लिये बचा हुआ एक चौथाई धन एक अच्छे
ब्राह्मणके पास रखवा दिया॥८॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘दण्डबन्ध’—उपस्थित विपत्ति,
राजदण्ड और बन्धनादिसे उद्धारके लिये॥८॥
गौड़में श्रीसनातनके लिये दस हजार मुद्राका रक्षण :—
गौड़े राखिल मुद्रा दश-हाजारे।
सनातन व्यय करे, राखे मुदि-घरे॥९॥
अनुवाद—श्रीरूपने गौड़देशमें श्रीसनातनके खर्च
करनेके उद्देश्यसे दस हजार मुद्राएँ एक व्यापारीके
घरपर रख दीं॥९॥
महाप्रभुके पुरी-गमन और वृन्दावनमें जानेके लिये तैयार
होनेकी वार्त्ताका श्रवण :—
श्रीरूप शुनिल प्रभुर नीलाद्रि-गमन।
वनपथे याबेन प्रभु श्रीवृन्दावन॥१०॥
उसके लिये दो दूतोंको भेजना :—
रूप-गोसाञि नीलाचले पाठाइल दुइजन।
प्रभु यबे वृन्दावन करेन गमन॥११॥
172 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/10-17 ]
"शीघ्र आसि' मोरे ताँर दिबा समाचार।
शुनिया तदनुरूप करिब व्यवहार॥" 12 ॥
अनुवाद—श्रीरूपने सुना कि महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं और वे वनमार्गसे श्रीवृन्दावन जानेकी तैयारी कर रहे हैं। श्रीरूप गोस्वामीने नीलाचलमें दो लोगोंको यह पता करनेके लिये भेजा कि महाप्रभु कब श्रीवृन्दावनके लिये प्रस्थान करेंगे। श्रीरूप गोस्वामीने उनसे कहा,—"तुम लोग शीघ्र आकर मुझे उनका समाचार देना, मैं उसके अनुरूप अपना कार्यक्रम बनाऊँगा॥" 10-12 ॥
श्रीसनातनका राजकार्यसे छुट्टी लेनेका सुयोग खोजना :-
एथा सनातन-गोसाञि भावे मने मन।
"राजा मोरे प्रीति करे, से—मोर बन्धन॥ 13 ॥
राजा उनसे रुष्ट हो, इसके लिये प्रयत्न :-
कोन मते राजा यदि मोरे क्रुद्ध हय।
तबे अव्याहति हय, करिलुँ निश्चय॥" 14 ॥
अनुवाद—इधर रामकेलि ग्राममें श्रीसनातन अपने मनमें सोचने लगे,—"राजा मुझसे प्रीति करता है, यह मेरे लिये बन्धन है। यदि किसी प्रकारसे राजा मुझसे रुष्ट हो जाय, तभी मेरा छुटकारा होगा। यही मेरा निश्चय है॥" 13-14 ॥
रोगका छल :-
अस्वास्थ्येर छद्म करि' रहे निज-घरे।
राजकार्य छाड़िला, ना याय राजद्वारे॥ 15 ॥
अपने घरपर भागवतका विचार :-
लोभी कायस्थगण राजकार्य करे।
आपने स्वगृहे करे शास्त्रेर विचारे॥ 16 ॥
भट्टाचार्य पण्डित बिश त्रिश लञा।
भागवत-विचार करेन सभाते बसिया॥ 17 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन अस्वस्थ होनेका छल करके अपने घरपर ही रहने लगे। उन्होंने राजकार्य करना छोड़ दिया और राज-दरबारमें जाना भी बन्द कर दिया। लोभी कायस्थ (राजकीय लेखा और खाता लिखनेवालोंके अधिकारी) लोग राजकार्य देखने लगे तथा श्रीसनातन गोस्वामी अपने घरपर शास्त्रोंपर विचार-विमर्श करने लगे। वे बीस-तीस भट्टाचार्य पण्डितोंको अपने घरपर ही बुलाकर सभा करके भागवतपर विचार करने लगे॥ 15-17 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—छद्म'-छल। जिस समय श्रीसनातन गोस्वामी राजमन्त्री थे, उस समय उनके अधीन कुछ 'कायस्थ' कर्मचारी थे। श्रीसनातनके वैराग्यभावको देखकर उनमेंसे कुछ व्यक्ति श्रीसनातनके पदको प्राप्त करनेके लोभसे राजकार्यमें विशेष निपुणता दिखलाने लगे। लोगोंका कहना है कि श्रीसनातन गोस्वामीके पद त्याग करनेके बाद उनके अधीन कार्य करनेवाले कर्मचारी प्रसिद्ध पुरन्दर खाँनको यह पद प्राप्त हुआ था॥ 15-16 ॥
अनुभाष्य—'भागवत-विचार'-विद्या 'दो' प्रकारकी है; (मुः उः 1/1/4-5)—
"द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म
यद् ब्रह्मविदो वदन्ति-परा चैवापरा च।
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः
शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।"
[अर्थात् "ब्रह्मविद् लोग कहते हैं,—विद्या परा और अपराके भेदसे दो प्रकारकी होती है। उनमें-से ऋक्, यजुः, साम, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-ये अपरा विद्या हैं। और जिसके द्वारा अक्षर-ब्रह्मको जाना जाता है, वह परा विद्या है।"]
पराविद्याकी बात ब्रह्मसूत्र अथवा वेदान्तमें ही कही गयी है। मुक्तिकामी वेदान्तिक लोग भी धर्म-अर्थकामियोंकी भाँति छलसे युक्त होते हैं। इसलिये अपरा-विद्यापरक अथवा परा-विद्यापरक शास्त्रोंमें जहाँ शुद्धभक्तिविरोधी मोक्षकी महिमाका गान हुआ है, वे
। 173

सभी बातें छलपूर्ण हैं; किन्तु श्रीमद्भागवत शास्त्रमें ऐसा
छल नहीं है। यमदण्डके भागी कर्मी लोग अथवा
अहंग्रहोपासकगण श्रीमद्भागवतके विचारसे सम्पूर्ण अयोग्य
हैं; वैष्णवगण ही एकमात्र भागवतका विचार करके
भक्तिबलसे संसारसे विमुक्त होते हैं; (भाः 12/13/18)—
“श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं,
यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।
यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं,
तच्छृ
[अर्थात् “श्रीमद्भागवत निर्मल पुराण है। यह
वैष्णवोंका प्रिय ग्रन्थ है। इसमें एक अमल पारमहंस्य-
ज्ञान वर्णित हुआ है। इसमें ज्ञान-वैराग्य-भक्तियुक्त
नैष्कर्म्य-ज्ञान आविष्कृत (प्रकाशित) हुआ है। मनुष्य
भक्तिपूर्वक इसका श्रवण, पाठ और विचार करके
विमुक्ति प्राप्त करते हैं।”] ॥ 17 ॥
एकदिन अचानक बादशाहका आगमन :—
आर दिन गौड़ेश्वर, सङ्गे एकजन।
आचम्बिते गोसाञि-सभाते कैल आगमन ॥ 18 ॥
सभीके द्वारा आदरपूर्वक बादशाहकी अगवानी :—
पात्साह देखिया सबे सम्भ्रमे उठिला।
सम्भ्रमे आसन दिया राजारे बसाइला ॥ 19 ॥
अनुवाद—जब श्रीसनातन गोस्वामीकी विद्वान ब्राह्मणोंके
साथ गोष्ठी चल रही थी, तब एक दिन अचानक
बादशाह एक व्यक्तिको अपने साथ लेकर वहाँ आ
पहुँचे। बादशाहको देखकर सभी ब्राह्मण और श्रीसनातन
उठकर खड़े हो गये और उन्होंने आदरपूर्वक आसन
देकर राजाका सम्मान करते हुए उन्हें बैठाया ॥ 18-19 ॥
अनुभाष्य—'गौड़ेश्वर'—आलाऊद्दीन सैयद हुसेन शाह
सेरिफ मक्का 1420 शकाब्दसे 1443 शकाब्द तक
गौड़के सिंहासनपर अधिष्ठित थे। इसलिये 1424 शकाब्दमें
यही हुसेन शाह ही श्रीसनातनकी सभामें उपस्थित
हुए ॥ 18 ॥
बादशाहकी उक्ति, श्रीसनातनके अभिप्रायकी जिज्ञासा :—
राजा कहे,—“तोमार स्थाने वैद्य पाठाइलुँ।
वैद्य कहे,—व्याधि नाहि, सुस्थ ये देखिलुँ ॥ 20 ॥
आमार ये किछु कार्य, सब तोमा लञा।
कार्य छाड़ि' रहिला तुमि घरेते बसिया ॥ 21 ॥
मोर यत कार्य-काम, सब कैला नाश।
कि तोमार हृदये आछे, कह मोर पाश ॥” 22 ॥
अनुवाद—बादशाहने कहा,—“मैंने तुम्हारे घरपर
वैद्यको भेजा था। वैद्यने मुझसे कहा कि तुम्हें कोई भी
बीमारी नहीं है, उसने अच्छी तरहसे जाँचकर तुम्हें
पूर्णतया स्वस्थ पाया है। मैं राज-काजके समस्त कार्योंमें
तुमपर निर्भर करता हूँ और तुम कार्यको छोड़कर
घरपर बैठे हुए हो। तुमने मेरे सब कार्योंका नाश कर
दिया है। तुम्हारे हृदयमें क्या विचार है, वह मुझे स्पष्ट
रूपसे बतलाओ ॥” 20-22 ॥
श्रीसनातनकी राजकार्यमें अनिच्छा बताना :—
सनातन कहे,—“नहे आमा हैते काम।
आर एकजन दिया कर समाधान ॥” 23 ॥
अनुवाद—श्रीसनातनने कहा,—“अब मुझसे कोई
काम नहीं होगा। अन्य किसी एक व्यक्तिको नियुक्त
करके अपने कार्य करवा लीजिये ॥” 23 ॥
बादशाहकी क्रोधपूर्ण उक्ति :—
तबे क्रुद्ध हञा राजा कहे आरबार।
“तोमार ‘बड़ भाई’ करे दस्यु-व्यवहार ॥ 24 ॥
जीव-पशु मारि' कैल चाक्ला सब नाश।
एथा तुमि कैला मोर सर्व कार्य नाश ॥” 25 ॥
अनुवाद—तब क्रोधित होकर बादशाहने पुनः
कहा,—“तुम्हारा ‘बड़ा भाई’ अर्थात् मैं डाकुओं जैसा
कार्य अर्थात् लूट-पाट करता हूँ। शिकारमें बहुतसे
पशुओंको मारकर मैंने चाक्ला नामक स्थानको प्रायः