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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

उन्नीसवाँ अध्याय
19/24-30 ]

नष्ट कर दिया है। और इधर तुम मेरी समस्त
योजनाओंको नष्ट करनेमें लगे हो॥"24-25॥

श्रीसनातनकी कार्यसे छुटकारा पानेके
लिये दण्डकी प्रार्थना :-
सनातन कहे, – “तुमि स्वतन्त्र गौड़ेश्वर।
ये येइ दोष करे, देह' तार फल ॥" 26 ॥

अनुवाद- श्रीसनातनने कहा,- “आप गौड़देशके बादशाह
और पूर्ण स्वतन्त्र हैं। आपके राज्यमें जो व्यक्ति जो
दोष करता है, आप उसे उसका फल देते हैं॥"26॥

बादशाहकी आज्ञासे श्रीसनातनको बाँधना :-
एत शुनि' गौड़ेश्वर उठि' घरे गेला।
पलाइब बलि' सनातनरे बान्धिला ॥ 27 ॥

अनुवाद-यह सुनकर बादशाह उठकर अपने घर
चला गया। उसने श्रीसनातनको बन्दी बनानेका आदेश
दिया जिससे वे कहीं भाग न जाँय ॥ 27 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-सुना जाता है कि श्रीसनातन
गोस्वामीको बादशाह हुसेनशाह 'छोटा भाई' मानता था।
जब श्रीसनातनने कर्मत्यागकी अत्यन्त दृढ़ता दिखलायी,
तब हुसेनशाहने प्रणय-रोषपूर्वक कहा कि,- “मैं तुम्हारा
'बड़ा भाई' हूँ, मैं बिल्कुल भी राज्यका पालन नहीं
करता हूँ। मैं तो सेनाको लेकर युद्धके द्वारा केवल
देश-विदेशको लूटते हुए घूमता हूँ एवं जातिसे यवन
होनेके कारण गौड़-चाक्लामें शिकार करके बहुतसे
जीव-पशुओंका नाश ही करता हूँ। तुमपर ही मेरा
विश्वास है; तुम्हारा बड़ा भाई, मैं, जब केवल
डाकुओंके जैसे कार्य तथा जीवोंके नाशके कार्यमें ही
लगा हुआ था, और छोटे भाई, तुमने भी तब कार्यका
परित्याग करके सब कार्योंका नाश कर दिया है, अब
राज्य किस प्रकार चलेगा?" श्रीसनातनने छोटे भाईके
नाते परिहास करते हुए कहा, - 'आप गौड़देशके बादशाह
हैं, स्वतन्त्र राजा हैं, आपके पास दण्ड प्रदान करनेकी
पूर्ण सत्ता है; जो जैसा भी दोष करता है, आप उसे
उसका फल प्रदान करते हैं।' इस वचनमें गूढ़ रहस्य
है, - राजा स्वयं डाकुओं जैसा व्यवहार करता है,
इसलिये वह उसका फल ग्रहण करे और मन्त्रीका
(मेरा) जब कार्यमें आलस्य दिखलायी देता है, तब
उसका (मेरा) कार्यसे छुटकारा रूपी फल हो। इससे
श्रीसनातनके अभिलषित विषयको जानकर बादशाह
उठकर चला गया ॥ 24-27 ॥

बादशाहका उड़ीसा जानेका अभियान; श्रीसनातनको साथमें
चलनेके लिये आह्वान :-
हेनकाले गेल राजा उड़िया मारिते।
सनातने कहे, - "तुमि चल मोर साथे ॥"28 ॥

अनुवाद-उसी समय बादशाह उड़ीसापर आक्रमण
करनेके लिये गया। बादशाहने सनातनसे कहा,-“तुम
भी मेरे साथ चलो ॥" 28 ॥

अनुभाष्य-1424 शकाब्दमें हुसेनशाहने उड़ीसाके
सामन्तराज गणोंको [उनके साथ युद्ध करनेके लिये]
बाध्य किया ॥ 28 ॥

विष्णु-विरोधी कार्यमें श्रीसनातनका असहयोग :-
तेँ हो कहे, – “याबे तुमि देवताय दुःख दिते।
मोर शक्ति नाहि, तोमार सङ्गे याइते ॥"29 ॥

अनुवाद- श्रीसनातनने कहा,- “आप श्रीजगन्नाथदेवको
दुःख देने जा रहे हैं। मुझमें आपके साथ जानेकी शक्ति
नहीं है ॥"29॥

बादशाहकी यात्रा, महाप्रभुकी भी पुरीसे वृन्दावन-यात्रा :-
तबे ताँरे बान्धि' राखि' करिला गमन।
एथा नीलाचल हैते प्रभु चलिला वृन्दावन ॥ 30 ॥

अनुवाद- श्रीसनातनको बन्दी बनाकर बादशाह
उड़ीसा युद्धके लिये चला गया। इधर महाप्रभु नीलाचलसे
वृन्दावनकी ओर चल दिये ॥ 30 ॥

175

[ 19/31-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीरूपको उन दो दूतोंके द्वारा महाप्रभुकी
वृन्दावन-यात्राकी बात बतलाना :-
तबे सेइ दुइ चर रूप-ठाञि आइल।
'वृन्दावन चलिला प्रभु'-आसिया कहिल ॥ 31 ॥
अनुवाद-तभी श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा नीलाचल
भेजे गये दो दूत उनके पास लौटकर आये। उन्होंने
बतलाया कि 'महाप्रभु वृन्दावनके लिये चल पड़े
हैं' ॥ 31 ॥
श्रीरूपका छोटे भाईके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये
यात्राके संवादका श्रीसनातनको पत्रके द्वारा ज्ञापन; और
उन्हें जिस-किसी उपायसे चले आनेका आह्वान :-
शुनिया श्रीरूप लिखिला सनातन-ठाञि।
'वृन्दावन चलिला श्रीचैतन्य-गोसाञि ॥ 32 ॥
आमि-दुइभाइ चलिलाङ ताँहारे मिलिते।
तुमि यैछे तैछे छुटि' आइस ताँहा हैते ॥ 33 ॥
अनुवाद-दूतोंकी बात सुनकर श्रीरूपने श्रीसनातनके
पास पत्र लिखकर भेजा, - 'श्रीचैतन्य गोसाईं वृन्दावनके
लिये चल पड़े हैं। हम दोनों भाई उनसे मिलनेके लिये
जा रहे हैं, आप भी वहाँसे जिस किसी प्रकारसे
छूटकर आ जाइये ॥ 32-33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आमि-दुइभाइ'-मैं रूप और
हमारे छोटे भाई अनुपम अथवा वल्लभ ॥ 33 ॥
गौड़देशमें रखी हुई दस हजार मुद्राओंकी सहायतासे
बन्धनसे मुक्त होनेका परामर्श देना :-
दशसहस्र मुद्रा तथा आछे मुदि-स्थाने।
ताहा दिया कर शीघ्र आत्म-विमोचने ॥ 34 ॥
यैछे तैछे छुटि' तुमि आइस वृन्दावन।'
एत लिखि' दुइभाइ करिला गमन ॥ 35 ॥
अनुवाद-गौड़देशमें अमुक व्यापारीके पास दस
हजार मुद्राएँ रखी हैं, उनके द्वारा शीघ्र ही अपने
आपको छुड़ा लीजिये। जिस किसी प्रकारसे छूटकर
आप वृन्दावन आ जाइये।' इतना लिखकर दोनों भाई
महाप्रभुसे मिलनेके लिये चल पड़े ॥ 34-35 ॥
अनुपमका परिचय :-
अनुपम मल्लिक, ताँर नाम-'श्रीवल्लभ'।
रूप-गोसाञिर छोटभाइ-परम वैष्णव ॥ 36 ॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई परम वैष्णव
थे। उनका नाम 'श्रीवल्लभ' था। उनको अनुपम
मल्लिक नाम दिया गया था ॥ 36 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 10/84 संख्या देखें ॥ 36 ॥
दोनों भाइयोंका प्रयागमें आगमन और वहाँ महाप्रभुके
होनेके विषयमें सुनकर आनन्द :-
ताँहारे लञा रूप-गोसाञि प्रयागे आइला।
महाप्रभु ताँहा शुनि' आनन्दित हैला ॥ 37 ॥
अनुवाद-श्रीवल्लभको अपने साथ लेकर श्रीरूप
गोस्वामी प्रयागमें आ पहुँचे। महाप्रभुके भी वहीं होनेके
विषयमें सुनकर वे बहुत आनन्दित हुए ॥ 37 ॥
प्रयागमें महाप्रभुका बिन्दुमाधव दर्शन
और लोगोंकी भीड़ :-
प्रभु चलियाछेन बिन्दुमाधव-दरशने।
लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुर मिलने ॥ 38 ॥
केह कान्दे, केह हासे, केह नाचे, गाय।
'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' केह गड़ागड़ि याय ॥ 39 ॥
अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवका दर्शन करनेके
लिये जा रहे थे। लाखों-लाखों लोग महाप्रभुसे मिलनेके
लिये आ रहे थे। कोई रो रहा था, कोई हँस रहा था,
कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था। कोई तो 'कृष्ण'
'कृष्ण' बोलते हुए भूमिपर लोटपोट खा रहा था ॥ 38-39 ॥
प्रेमकी बाढ़में प्रयाग निमग्न :-
गङ्गा-यमुना प्रयाग नारिल डुबाइते।
प्रभु डुबाइल कृष्णप्रेमेर वन्याते ॥ 40 ॥
176 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/40-50 ]
अनुवाद—गङ्गा तथा यमुना प्रयागको डुबो नहीं
पायीं, किन्तु महाप्रभुने प्रयागको श्रीकृष्णप्रेमकी बाढ़में
डुबो दिया॥40॥
दोनों भाइयोंका थोड़े एकान्त स्थानमें रहना :—
भिड़ देखि' दुइ भाइ रहिला निर्जने।
प्रभुर आवेश हैल माधव-दर्शने ॥ 41 ॥
अनुवाद—भीड़को देखकर दोनों भाई एकान्त स्थानमें
खड़े रहे। महाप्रभु बिन्दुमाधवके दर्शनसे प्रेमाविष्ट हो
गये॥41॥
महाप्रभुकी उस समयकी अवस्था :—
प्रेमावेशे नाचे प्रभु हरिध्वनि करि'।
ऊर्द्धबाहु करि' बले—बल 'हरि' 'हरि'॥42॥
प्रभुर महिमा देखि' लोके चमत्कार।
प्रयागे प्रभुर लीला नारि वर्णिवार ॥ 43 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रेमावेशमें हरिध्वनि करते हुए
नृत्य कर रहे थे और अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर
लोगोंसे 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कह रहे थे।
महाप्रभुकी महिमा देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे
थे। प्रयागमें महाप्रभुने जो लीलाएँ कीं, मैं उनका यथार्थ
रूपमें वर्णन नहीं कर सकता॥42-43॥
दक्षिण-भारतके ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा :—
दाक्षिणात्य-विप्र-सने आछे परिचय।
सेइ विप्र निमन्त्रिया निल निजालय ॥ 44 ॥
अनुवाद—महाप्रभुका दक्षिण भारतके एक ब्राह्मणके
साथ परिचय था। वही ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रित
करके अपने घरपर ले गया॥44॥
निर्जनमें महाप्रभुके साथ दोनों भाइयोंका मिलन :—
विप्र-गृहे आसि' प्रभु निभृते बसिला।
श्रीरूप-वल्लभ दुँहे आसिया मिलिला ॥ 45 ॥
अनुवाद—ब्राह्मणके घरपर आकर महाप्रभु एकान्तमें
बैठ गये। श्रीरूप और श्रीवल्लभ—दोनों वहींपर आकर
महाप्रभुसे मिले॥45॥
दोनोंकी दैन्यपूर्ण उक्ति :—
दुइगुच्छ तृण दुँहे दशने धरिया।
प्रभु देखि' दूरे पड़े दण्डवत् हञा ॥ 46 ॥
नाना श्लोक पड़ि' उठे, पड़े बार बार।
प्रभु देखि' प्रेमावेश हइल दुँहार ॥ 47 ॥
अनुवाद—तृणके दो गुच्छोंको अपने दाँतोंमें दबाकर
दोनों भाइयोंने दूरसे महाप्रभुको देखकर दण्डवत् प्रणाम
किया। महाप्रभुके दर्शन करके उन दोनोंमें प्रेमावेश हो
रहा था। वे अनेक श्लोक पढ़ते हुए बार-बार उठ रहे
थे तथा पुनः भूमिपर गिरकर प्रणाम कर रहे थे॥46-47॥
उन्हें देखकर महाप्रभुका प्रसन्न होना :—
श्रीरूपे देखिया प्रभुर प्रसन्न हैल मन।
“उठ, उठ, रूप, आइस”, बलिला वचन ॥ 48 ॥
श्रीकृष्णकी कृपासे जीवके संसारसे उद्धारका वर्णन :—
“कृष्णेर करुणा किछु ना याय वर्णने।
विषयकूप हैते तोमा काड़िल दुइजने ॥ 49 ॥
अनुवाद—श्रीरूपको देखकर महाप्रभुका मन बहुत
प्रसन्न हो गया और उन्होंने कहा,—“उठो, उठो, रूप,
यहाँपर आओ।” महाप्रभुने आगे कहा,—“श्रीकृष्णकी
करुणाका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उन्होंने तुम
दोनोंको विषयरूपी कुएँसे निकाल लिया है॥48-49॥
जिस किसी भी कुलमें उत्पन्न वैष्णव ही
भगवान्की भाँति सभीके द्वारा सर्वथा पूज्य :—
श्रीहरिभक्तिविलास (10/99)में—
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” 50 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण
होनेपर ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त
। 177

[ 19/50-54 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चण्डाल होनेपर भी मुझे प्रिय है; भक्त ही वास्तवमें
दान-पात्र एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान
पूजनीय है॥"50॥
अनुभाष्य—
अभक्तः (शुद्धभक्तिविहीनः) चतुर्वेदी (चतुर्वेदनिपुणः ब्राह्मणः)
मे (मम) प्रियः न (भवति); मद्भक्तः श्वपचः (सुनीचकुलोद्भवोऽपि)
मे प्रियः (भवति); तस्मै (शुद्धभक्ताय नीचकुलोद्भवाय श्वपचाय)
[अपि चतुर्वेदकुशलैर्ब्राह्मणादिभिः एव सम्मानादिकं] देयम्;
ततः (तस्मात् नीचकुलोद्भूतात् श्वपचात् अपि शुद्धभक्तात्)
ग्राह्यं (तदुच्छिष्टादिकं प्रतिगृह्णीयात्), यथा अहं (सर्वेश्वरेश्वरः
श्रीभगवान् विष्णुः) पूज्यः [तथा] सः (श्वपचकुलजातोऽपि
भक्तः) [तच्छिष्यस्थानीय-ब्राह्मणादिभिः सर्वैः एव पूज्यः च]।
श्लोक-भावानुवाद—शुद्धभक्तिविहीन चतुर्वेदोंमें
निपुण ब्राह्मण मेरा प्रिय नहीं है, सुनीचकुलमें उत्पन्न
मेरा भक्त मुझे प्रिय है। नीचकुलमें उत्पन्न शुद्धभक्त
चतुर्वेदोंमें निपुण ब्राह्मणोंके द्वारा सम्मान दिये जाने
योग्य और शुद्धभक्त होनेके कारण नीचकुलमें उत्पन्न
चण्डालका उच्छिष्ट ग्रहण करनेके योग्य है। वह मेरे
समान ही पूजनीय है [उसके शिष्य-स्थानीय ब्राह्मणादिके
द्वारा भी पूजनीय है]॥50॥
महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन और दोनोंके
मस्तकपर अपने चरणार्पण :-
एइ श्लोक पड़ि' दुँहारे कैला आलिङ्गन।
कृपाते दुँहार माथाय धरिला चरण॥51॥
अनुवाद—महाप्रभुने यह श्लोकका पढ़कर उन
दोनोंका आलिङ्गन किया और कृपापूर्वक अपने
चरणकमल उन दोनोंके सिरपर रख दिये॥51॥
दोनों भाइयोंके द्वारा महाप्रभुका स्तव :-
प्रभु-कृपा पाञा दुँहे दुइ हात युड़ि'।
दीन हञा स्तुति करे विनय आचरि'॥52॥
अनुवाद—महाप्रभुकी कृपाको प्राप्त करके दोनों
भाई दोनों हाथ जोड़कर दीनतापूर्वक विनयका आचरण
करते हुए स्तुति करने लगे॥52॥
स्वरूप-नाम-रूप-गुण-लीलामय और
सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनाधिदेवता श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीरूप-वचन—
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥53॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥53॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महावदान्य, श्रीकृष्णप्रेमप्रदाता,
श्रीकृष्णस्वरूप, श्रीकृष्णचैतन्य नामक श्रीगौराङ्गरूपधारी
प्रभु आपको नमस्कार है॥53॥
अनुभाष्य—
महावदान्याय (अतुलपरमकरुणामयाय) कृष्णप्रेमप्रदाय
(शिवविरिञ्चिदुर्लभकृष्णप्रेमदातृप्रवराय) कृष्णचैतन्यनाम्ने
(कृष्णचैतन्याख्याय) गौरत्विषे (श्रीराधाद्युतिसुवलित-गौरकान्तिमयाय)
कृष्णाय (गोपीजनवल्लभाय गोविन्दाय) ते (तुभ्यं) नमः।
श्लोक-भावानुवाद—अतुलनीय परम करुणामय,
शिव-ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ श्रीकृष्णप्रेमको प्रदान
करनेमें अग्रणी, श्रीकृष्णचैतन्य नामक श्रीराधाकान्तियुक्त
गौरकान्तिमय श्रीगोपीजनवल्लभ-गोविन्द, आपको नमस्कार
है॥53॥
ग्रन्थकारके द्वारा श्रीगौर-प्रणाम—
श्रीगोविन्दलीलामृत (1/2)में ग्रन्थकारके वचन—
योऽज्ञानमत्तं भुवनं दयालुरुल्लाघयन्नप्यकरोत् प्रमत्तम्।
स्वप्रेमम्पत्सृधयाद्भुतेहं श्रीकृष्णचैतन्यममुं प्रपद्ये॥54॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥54॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन दयालु पुरुषने अज्ञानमें
मत्त जगत्को अज्ञानरूपी व्याधिसे मुक्त करके अपनी
प्रेम-सम्पत्तिरूपी अमृतके द्वारा प्रमत्त किया था, मैं उन
अद्भुत-चेष्टायुक्त श्रीकृष्णचैतन्यके शरणागत होता हूँ॥54॥
अनुभाष्य—
यः दयालुः (करुणामयविग्रहः) अज्ञानमत्तं (मायावाद-
कर्मफलभोगादि-मार्ग-कारणे अज्ञाने मत्तं विह्वलं) भुवनं (लोकं)
स्वप्रेमत्सम्पत्सुधया (निजकृष्णप्रीतिरूपा सम्पत् श्रीः सा एव
सुधा अमृतं तया) उल्लाघयन् (तत्तज्ज्ञानादिकं प्रशमयन्) प्रमत्तं
178 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/54-61 ]
(भोगमोक्षादि-प्राकृतविषयाद्यनुसन्धानरहितं निरन्तर- ग्रहण करनेके लिये कहा। श्रीरूप गोस्वामी उस दिन
कृष्णानुशीलनासक्तम्) अकरोत्, अमुं (तं) अद्भुतेहम् वहींपर रहे॥ 58 ॥
(अश्रुतपूर्वचेष्टायुक्तं) श्रीकृष्णचैतन्यम् [अहं] प्रपद्ये (प्रपन्नोऽस्मि)।
दोनोंको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :-
श्लोक-भावानुवाद-जिन करुणामय पुरुषने
मायावाद-कर्मफलभोगादि मार्गोंमें मत्त लोगोंको अपनी भट्टाचार्य दुइ भाइये निमन्त्रण कैल।
श्रीकृष्णप्रीतिरूपी सम्पत्तिकी शोभाके अमृतके द्वारा प्रभुर शेषप्रसाद-पात्र दुइभाइ पाइल॥ 59॥
उन-उन अज्ञानका नाश करके एवं भोग-मोक्षादि
अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने उन दोनों भाइयोंको
प्राकृत विषयोंसे निवृत्त करके निरन्तर श्रीकृष्णानुशीलनमें प्रसाद पानेका निमन्त्रण दिया। दोनों भाइयोंने महाप्रभुके
आसक्त किया है, उन अद्भुत-अपूर्व-चेष्टायुक्त पात्रसे उनके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त किया॥ 59 ॥
श्रीकृष्णचैतन्यके मैं शरणागत होता हूँ॥ 54 ॥
महाप्रभुके वासस्थानके निकट ही दोनोंका रहना :-
श्रीरूपसे श्रीसनातनके विषयमें जिज्ञासा :-
त्रिवेणी-उपर प्रभुर वासा-घर स्थान।
तबे महाप्रभु ताँरे निकटे बसाइला।
दुइभाइ वासा कैल प्रभु-सन्निधान ॥ 60 ॥
'सनातनेर वार्त्ता कह' - ताँहारे पुछिला ॥ 55 ॥
अनुवाद-त्रिवेणीके तटपर ही महाप्रभुका वासस्थान
श्रीरूपके द्वारा श्रीसनातनके कारागारमें
था। दोनों भाइयोंने भी महाप्रभुके वासस्थानके निकट ही
बन्द होनेका संवाद देना :-
अपना वासस्थान बनाया ॥ 60 ॥
रूप कहेन, - "तेँहो बन्दी राज-घरे।
तुमि यदि उद्धार', तबे हइबे उद्धारे ॥" 56 ॥
महाप्रभुके साथ वल्लभ-भट्टका मिलन :-
से-काले वल्लभ-भट्ट रहे आड़ाइल-ग्रामे।
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके बन्धनसे
मुक्त होनेका संवाद देना :-
महाप्रभु आइला शुनि' आइल ताँर स्थाने॥ 61 ॥
प्रभु कहे, - "सनातनेर हञाछे मोचन।
अनुवाद-उस समय श्रीवल्लभ-भट्ट आड़ाइल-ग्राममें
अचिरात् आमा-सह हइबे मिलन ॥" 57 ॥
रहते थे। महाप्रभुके प्रयागमें आनेका समाचार पाकर वे
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपको अपने निकट उनसे मिलने उनके वासस्थानपर आये ॥ 61 ॥
बैठाया और उनसे पूछा- 'सनातनका क्या समाचार
अमृतप्रवाह भाष्य- 'वल्लभ भट्ट' - ये वैष्णव पण्डित
है?' श्रीरूपने कहा,-"वे बादशाहके कारागारमें बन्दी थे। इन्होंने पहले श्रीमन्महाप्रभुके सम्प्रदायमें प्रविष्ट
हैं। यदि आप उनका उद्धार करें, तभी वे मुक्त हो होकर भी अधिक सम्मान नहीं पानेके कारण
सकते हैं।" महाप्रभुने कहा,-"सनातनकी कारागारसे विष्णुस्वामि-सम्प्रदायमें आचार्यत्व प्राप्त किया था। इनको
मुक्ति हो गयी है। अति शीघ्र ही सनातनकी मुझसे भेंट ही लोग 'वल्लभाचार्य' कहते हैं। गोकुल और मुम्बई
होगी॥" 55-57॥ प्रदेशमें इनका बहुत प्रचार है। इनके द्वारा रचित
'अणुभाष्य', 'षोडश ग्रन्थ' आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
उस दिन दोनोंका वहीं रहना :-
'आड़ाइल-ग्राम'-सङ्गमके निकट यमुनाकी दूसरी
मध्याह्न करिते विप्र प्रभुरे कहिला।
पार (प्रायः एक मीलकी दूरीपर) अड़ैली-ग्राम अथवा
रूप-गोसाञि से-दिवस तथाञि रहिला ॥ 58 ॥
आड़ाइल-ग्राम है; (यहाँपर 'वल्लभी' सम्प्रदायका एक
अनुवाद-तब ब्राह्मणने महाप्रभुको दोपहरका प्रसाद प्राचीन विष्णुमन्दिर वर्तमान है।) ॥ 61 ॥
। 179

[ 19/61-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य- 'वल्लभभट्ट'-ये त्रैलङ्गदेशमें
'निडाडाभलु'-रेलस्टेशनसे सोलह मीलकी दूरीपर
'काङ्कड़वाड़' अथवा 'काकूँरपाडु'-नामक ग्रामके निवासी
'लक्ष्मण-दीक्षित'के पुत्र हैं। आन्ध्रके ब्राह्मणोंमें पाँच
विभाग हैं, - वेल्ल-नाटी, वेगी-नाटी, मुरकि-नाटी,
तेलगु-नाटी और काशाल-नाटी; उनमेंसे वेल्ल-नाटी
आन्ध्र-ब्राह्मणकुलमें 1400 शकाब्दमें श्रीवल्लभाचार्यने
जन्म ग्रहण किया। कोई-कोई कहते हैं कि वल्लभके
जन्म होनेसे पहले ही उनके पिताने संन्यास ग्रहणकर
घरका त्याग कर दिया था, बादमें पुनः घर लौटनेके
बाद वल्लभाचार्यको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था।
अन्य मतके अनुसार, - विक्रम सम्वत् 1535 अर्थात्
1400 शकाब्दकी चैत्री कृष्णा-एकादशी तिथिमें त्रैलङ्गदेशीय
वेल्लनाटी-ब्राह्मण-वंशमें उत्पन्न 'खम्पंपाटीवारु' उपाधिधारी
लक्ष्मणभट्ट-दीक्षितके पुत्रके रूपमें वल्लभाचार्य
'चम्पकारण्य'में, मतान्तरमें, - मध्यप्रदेशके अन्तर्गत वि.
एन. आर. लाईनमें राजिम स्टेशनके निकट चाँपाझार-
ग्राममें आविर्भूत हुए थे। ग्यारह वर्षों तक काशीमें वास
करके विद्या अध्ययनके बाद अपने देशमें लौटते समय
मार्गमें शेषाद्रिमें उन्होंने अपने पिताके परलोक-प्राप्तिके
विषयमें सुना। भाई और माताको घरपर छोड़कर
तुङ्गाभद्राके तटपर विद्यानगरमें जाकर बुक्कराजके पौत्र
कृष्णदेवका उल्लास विधान किया। उसके बाद तीन
बार छः-छः वर्षवाली दिग्विजयमें अठारह वर्ष व्यतीत
किये। तीस वर्षकी आयुमें काशीमें स्वजातीय ब्राह्मणकी
'महालक्ष्मी'-नामक कन्याका पाणिग्रहण किया। इन्होंने
गोवर्धन-पर्वतके नीचे श्रीमूर्त्ति स्थापित करके प्रयागके
निकट आड़ाइल ग्राममें वास किया था। इनके दो
पुत्र-श्रीगोपीनाथ और श्रीविट्ठलेश्वर थे। अन्तिम
अवस्थामें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करके 1452 शकाब्दमें
इन्होंने वाराणसीमें परलोक गमन किया। श्रीवल्लभके
'षोडशग्रन्थ', ब्रह्मसूत्रका 'अनुभाष्य', श्रीमद्भागवतकी
'सुबोधिनी'-टीका आदि कुछ ग्रन्थोंके अतिरिक्त और
भी अनेक ग्रन्थ हैं॥ 61 ॥
श्रीवल्लभभट्टका महाप्रभुको प्रणाम, दोनोंमें परस्पर
श्रीकृष्ण-कथाका आलाप :-
तेंहो दण्डवत् कैल, प्रभु कैला आलिङ्गन।
दुइजने कृष्णकथा हैल ततक्षण॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम
किया तथा महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। तभी
दोनों श्रीकृष्णकथाकी चर्चा करने लगे॥ 62 ॥
महाप्रभुमें प्रेमावेश और श्रीवल्लभको बहिरङ्ग-देखकर
आवेशका सङ्कोपन :-
कृष्णकथाय प्रभुर महाप्रेम उथलिल।
भट्टेर सङ्कोचे प्रभु सम्वरण कैल॥ 63 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णकथाकी चर्चामें महाप्रभुमें महा-
प्रेमावेश होने लगा, किन्तु उन्होंने श्रीवल्लभभट्टके
सङ्कोचसे उसे सम्वरण कर लिया॥ 63 ॥
महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर श्रीवल्लभका विस्मय :-
अन्तरे गर-गर प्रेम, नहे सम्वरण।
देखि' चमत्कार हैल वल्लभ-भट्टेर मन॥ 64 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें प्रेमका प्रचण्ड वेग था,
जिसे वे सम्वरण नहीं कर पा रहे थे। श्रीवल्लभ-भट्ट
महाप्रभुमें प्रेमके वेगको देखकर आश्चर्यचकित हो
गये॥ 64 ॥
महाप्रभुको भट्टका निमन्त्रण, भट्टको दोनों
भाइयोंका परिचय देना :-
तबे भट्ट महाप्रभुरे निमन्त्रण कैला।
महाप्रभु दुइभाइ ताँहारे मिलाइला॥ 65 ॥
अनुवाद-तब श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको निमन्त्रण
दिया। महाप्रभुने दोनों भाइयों श्रीरूप और श्रीवल्लभको
उनसे मिलवाया॥ 65 ॥
अमानी होकर दोनोंके द्वारा श्रीवल्लभका सम्मान :-
दुइभाइ दूर हैते भूमिते पड़िया।
भट्टे दण्डवत् कैला अति दीन हञा॥ 66 ॥
180 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/66-75 ]
अनुवाद- श्रीरूप और श्रीवल्लभ, दोनों भाइयोंने
अति दीनतापूर्वक दूरसे ही भूमिपर गिरकर श्रीवल्लभभट्टको
दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 66 ॥
श्रीभट्टकी आलिङ्गनकी चेष्टासे दोनोंका पीछे हटना :-
भट्ट मिलिबारे याय, दुँहे पलाय दूरे।
"अस्पृश्य पामर मुञि, ना छुँइह मोरे ॥"67॥
अनुवाद- श्रीवल्लभभट्ट जैसे ही उनसे मिलनेके
लिये आगे बढ़े, वे दोनों दूर भाग गये और श्रीरूप
कहने लगे, - "मैं अस्पृश्य और महापापी हूँ, आप मुझे
स्पर्श मत कीजिये ॥"67 ॥
कुलीन पण्डिताभिमानी श्रीवल्लभको बहिरङ्ग-मानकर
महाप्रभुके द्वारा उन्हें जड़ीय-प्रतिष्ठा देना या छलना :-
भट्टेर विस्मय हैल, प्रभुर हर्ष मन।
भट्टरे कहिला प्रभु ताँर विवरण ॥68॥
"इँहो ना स्पर्शियह, इँहो जाति अति-हीन !
वैदिक, याज्ञिक तुमि कुलीन प्रवीण ! ॥"69॥
अनुवाद- दोनों भाइयोंके व्यवहारसे श्रीवल्लभ भट्ट
विस्मित हो गये, किन्तु महाप्रभुका मन बहुत प्रसन्न
हुआ। महाप्रभुने श्रीवल्लभभट्टको दोनों भाइयोंका विवरण
देते हुए कहा,- "आप इन्हें स्पर्श मत कीजिये, ये दोनों
छोटी जातिके हैं। आप वैदिक सदाचारका पालन
करनेवाले और यज्ञोंमें प्रवीण व्यक्ति हैं। साथ ही आप
उच्च कुलके ब्राह्मण भी हैं ॥" 68-69 ॥
दोनोंके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनाम सुनकर श्रीभट्टका
विस्मय और दोनोंको सर्वोत्तम मानना :-
दुँहार मुखे निरन्तर कृष्णनाम शुनि' ।
भट्ट कहे, प्रभुर किछु इङ्गित-भङ्गी जानि' ॥70॥
"दुँहार मुखे कृष्णनाम करिछे नर्त्तन ।
एइ दुइ 'अधम' नहे, हय सर्वोत्तम ॥ 71 ॥
अनुवाद- दोनोंके मुखसे निरन्तर कृष्णनाम सुनकर
श्रीवल्लभभट्ट महाप्रभुके वचनोंकी कुछ इङ्गित-भङ्गिमाको
समझ गये। उन्होंने कहा, - "दोनोंके मुखमें कृष्णनाम
नृत्य कर रहा है। ये दोनों 'अधम' नहीं, अपितु
सर्वोत्तम हैं ॥ 70-71 ॥
श्रीमद्भागवत (3/33/7) में-
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराया
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥"72॥
अनुवाद- हे भगवन्, जिनके मुखमें आपका नाम
वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस खानेवाले) होनेपर
भी श्रेष्ठ है। जो आपका नाम-कीर्तन करते हैं, उन्होंने
सब प्रकारकी तपस्या कर ली है, समस्त यज्ञ कर लिये
हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया है एवं अङ्गसहित
समस्त वेदोंका पाठ कर लिया है, इसलिये उनकी
आर्योंमें गणना होती है ॥"72॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 11/192 संख्या देखें ॥ 72 ॥
श्रीभट्टकी सुबुद्धिको देखकर और सुसिद्धान्तको
सुनकर महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा :-
शुनि' महाप्रभु ताँरे बहु प्रशंसिला ।
प्रेमाविष्ट हञा श्लोक पड़िते लागिला ॥ 73 ॥
अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभुने
श्रीवल्लभभट्टकी बहुत प्रशंसा की। प्रेमाविष्ट होकर
महाप्रभु श्लोक पढ़ने लगे ॥ 73 ॥
नीचवंशमें उत्पन्न होनेपर भी हरिभक्त ही पूज्य,
अभक्त होनेके कारण नामका ही ब्राह्मण
वेदज्ञ होनेपर भी घृणाका पात्र :-
हरिभक्तिसुधोदय (3/11-12) में-
शुचिः सद्द्‌भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः ।
श्वपाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः ॥74॥
भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः ।
अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम् ॥ 75 ॥
। 181

[ 19/74-80
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74-75 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सदाचरित्र, सद्‌भक्तिरूप दीप्ताग्निके
द्वारा जिसका दुर्जातिमें उत्पन्न होनेका कल्मष जलकर
समाप्त हो गया है, ऐसा चण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा
सम्मानित होने योग्य है; किन्तु नास्तिक व्यक्ति वेदज्ञ
होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है। भगवद्भक्तिहीन
व्यक्तिके सद्‌जातिमें जन्म, शास्त्र-ज्ञान, जप और तप
मृतदेहके अलङ्कारोंकी भाँति किसी कामके नहीं, केवल
लोकरञ्जन मात्र ही हैं॥ 74-75 ॥
अनुभाष्य—
सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः (सती ऐकान्तिकी कृष्णभक्तिः
एव दीप्ताग्निः तेन दग्धं निःशेषितं दुर्जात्यादिकम् एव कल्मषं
प्रारब्धं पापं यस्य सः, अतः कृष्णभजनादेव) शुचिः (सदाचारः)
श्वपाकः (अति-नीचकुलोद्भवः) अपि बुधैः (विद्वद्भिः) श्लाघ्यः
(वरणीयः), (परन्तु) नास्तिकः (भगवत्-सेवाविमुखः) वेदज्ञः
(वेदशास्त्रपारङ्गतः ब्राह्मणः अपिः) न [पूज्यः, दुःसङ्गत्वात्
परमार्थपथिकेन सर्वथा परित्याज्य एवेत्यर्थः]।
भगवद्भक्तिहीनस्य (कृष्णसेवा-विमुखस्य) जातिः (प्राक्तन-
सुकृतिवशात् उत्तमकुले जन्मादिकं) शास्त्रं (स्वाध्यायादिकं)
जपं (मन्त्रोच्चारणादिकं), तपः (साधनाद्यनुशीलनं)-[एतत् सर्वमेव]
अप्राणस्य (मृतस्य) देहस्य मण्डनम् (अलङ्करणम् इव
व्यर्थमकिञ्चित्करं) लोकरञ्जनं (व्यवहारिकं जड़लोकानां
बहिर्दर्शन-सुखकरमिव निष्फलमित्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद—ऐकान्तिकी श्रीकृष्णभक्तिरूप
दीप्ताग्निके द्वारा जिसका दुर्जातिमें उत्पन्न होनेका
कल्मष और प्रारब्ध पाप जलकर समाप्त हो गये हैं,
श्रीकृष्णभजनके कारण ऐसा चण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा
सम्मानित होने योग्य है; किन्तु भगवद्-सेवा-विमुख
व्यक्ति वेद-शास्त्रोंमें पारङ्गत होनेपर भी सम्मानके योग्य
नहीं है, अपितु दुःसङ्ग जानकर परमार्थ-पथिकको
उसका सर्वथा त्याग करना चाहिये। श्रीकृष्णसेवा-विमुख
व्यक्तिका पूर्व-सुकृतिके कारण उत्तमकुलमें जन्म, शास्त्र-
ज्ञान, जप और तप-ये सभी मृतदेहके अलङ्कारोंकी
भाँति व्यर्थ हैं, केवल सांसारिक लोगोंके बाहिरी
दर्शनके सुखकर होनेपर भी निष्फल ही हैं॥ ॥ 74-75 ॥
महाप्रभुके प्रेम, प्रभाव-सौन्दर्यादि-दर्शनसे
श्रीभट्टको विस्मय :-
प्रभुर प्रेमावेश, आर प्रभाव भक्तिसार।
सौन्दर्यादि देखि' भट्टेर हैल चमत्कार ॥ 76 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके प्रेमावेश, भक्तिसारके ज्ञान और
उनके प्रभाव, सौन्दर्यादिको देखकर श्रीवल्लभभट्ट बड़े
आश्चर्यचकित हुए ॥ 76 ॥
परिकरों सहित महाप्रभुके साथ नौकामें बैठना :-
सगणे प्रभुरे भट्ट नौकाते चड़ाञा।
भिक्षा दिते निज घरे चलिला लञा ॥ 77 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको उनके परिकरों सहित नौकामें
चढ़ाकर श्रीवल्लभ भट्ट उन्हें भिक्षा देनेके लिये अपने
घर ले गये ॥ 77 ॥
यमुनाके नीले जलको देखकर श्रीकृष्णके उद्दीपनके
कारण महाप्रभुका प्रेमावेश :-
यमुनार जल देखि' चिक्वण श्यामल।
प्रेमावेशे महाप्रभु हइला विह्वल ॥ 78 ॥
महाप्रभुका यमुनामें कूदना, सभीका भयभीत होना :-
हुङ्कार करि' यमुनार जले दिला झाँप।
प्रभु देखि' सबार मने हैल भय-काँप ॥ 79 ॥
अनुवाद—यमुनाके चमकदार श्याम वर्णके जलको
देखकर महाप्रभु प्रेमावेशमें विह्वल हो गये। हुङ्कार करते
हुए महाप्रभुने यमुनाके जलमें छलाँग लगा दी। महाप्रभुको
कूदते देखकर सभी भयभीत हो गये और काँपने
लगे ॥ 78-79 ॥
महाप्रभुको उठाकर नौकामें बैठाना, महाप्रभुका नृत्य :-
आस्ते-व्यस्ते सबे धरि' प्रभुरे उठाइल।
नौकार उपरे प्रभु नाचिते लागिल ॥ 80 ॥
अनुवाद—जल्दीसे सभीने पकड़कर महाप्रभुको
जलमेंसे निकाला। नौकाके ऊपर आकर महाप्रभु नृत्य
करने लगे ॥ 80 ॥
182 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/81-88 ]
नृत्यके कारण नौकाका डगमगाना :-
महाप्रभुर भरे नौका करे टलमल।
डुबिते लागिल नौका, झलके भरे जल ॥ 81 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके भारसे नौका डगमगाने लगी।
नौकाके डगमगानेसे उसमें जल भरने लगा और वह
डूबने लगी ॥ 81 ॥
बहिरङ्ग-श्रीभट्टके सामने भावको छुपानेकी चेष्टा
करनेपर भी महाप्रभुकी प्रेम-मत्तता :-
यद्यपि भट्टेर आगे प्रभुर धैर्य हैल मन।
दुर्वार उद्भट प्रेम, नहे सम्वरण ॥ 82 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीवल्लभ भट्टके आगे महाप्रभुने
मनमें धैर्य धारण करनेका प्रयास किया, तथापि
दुर्दमनीय प्रबल प्रेम होनेके कारण वे उसको सम्वरण
नहीं कर पाये ॥ 82 ॥
अनुभाष्य—'दुर्वार'—जिसका प्रकाश रोका अर्थात्
बन्द नहीं किया जा सके; 'उद्भट'—उदार, श्रेष्ठ,
अभिनव, विचित्र, प्रसिद्ध, असाधारण, प्रबल ॥ 82 ॥
महाप्रभुका धैर्य-धारण, दूसरी ओर उतरना :-
देश-पात्र देखि' महाप्रभु धैर्य हइल।
आड़ाइलेर घाटे नौका आसि' उत्तरिल ॥ 83 ॥
अनुवाद—स्थान तथा पात्रको देखकर अन्तमें महाप्रभुने
धैर्य धारण किया। तब नौका स्थिर होकर चलती हुई
आड़ाइल ग्रामके घाटपर आ पहुँची ॥ 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—उस देशमें अधिकांश लोग
प्रेमशून्य हैं और सामने उपस्थित श्रीवल्लभ भट्ट भी
बहुत ही तर्कप्रिय व्यक्ति हैं; ऐसा देखकर महाप्रभुने धैर्य
धारण किया ॥ 83 ॥
अनुभाष्य—देश-पात्र—[जलमें] निमग्न प्रायः नौकाके
ऊपर नृत्यादि सुविधाजनक नहीं है; और फिर,
श्रीवल्लभ-दीक्षितकी भाँति प्रेमरहित पण्डितके समक्ष
सात्त्विकभावका उल्लास नहीं होता ॥ 83 ॥
श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुके स्नान करनेके
बाद उन्हें अपने घरपर लाना :-
भये भट्ट सङ्गे रहे, मध्याह्न कराञा।
निज-गृहे आनिला प्रभुरे सङ्गेते लञा ॥ 84 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी कुशलताके भयके कारण
श्रीवल्लभ भट्ट सब समय उनके साथमें रहे। उन्होंने
महाप्रभुको वहींपर स्नान कराया और उन्हें अपने साथ
ही अपने घरपर ले आये ॥ 84 ॥
श्रीवल्लभके द्वारा अपने हाथोंसे महाप्रभुके श्रीचरणोंको
धोना और सपरिवार चरणामृतका सम्मान :-
आनन्दित हञा भट्ट दिल दिव्यासन।
आपने करिल प्रभुर पादप्रक्षालन ॥ 85 ॥
महाप्रभुको नये वस्त्र प्रदान :-
सवंशे सेइ जल मस्तके धरिल।
नूतन कौपीन-बहिर्वास पराइल ॥ 86 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने आनन्दित होकर महाप्रभुको
बैठनेके लिये दिव्य-आसन प्रदान किया और अपने
हाथोंसे उन्होंने स्वयं महाप्रभुके चरणोंको धोया। फिर
उन्होंने और उनके परिवारने उस जलको अपने-अपने
मस्तकपर धारण किया। तब उन्होंने महाप्रभुको नया
बहिर्वास तथा कौपीन प्रदान किया ॥ 85-86 ॥
महाप्रभुकी पूजा और बलभद्रके द्वारा रसोई बनाना :-
गन्ध-पुष्प-धूप-दीपे महापूजा कैल।
भट्टाचार्ये मान्य करि' पाक कराइल ॥ 87 ॥
अनुवाद—गन्ध, पुष्प, धूप और दीपसे श्रीवल्लभभट्टने
महाप्रभुकी महापूजा की। तब उन्होंने बलभद्र भट्टाचार्यको
सम्मान देते हुए उनके द्वारा भोजन बनवाया ॥ 87 ॥
महाप्रभु और दोनों भाइयोंका श्रीवल्लभके
घरमें भोजन करना :-
भिक्षा कराइल प्रभुरे सस्नेह यतने।
रूपगोसाञि-दुइभाइये कराइल भोजने ॥ 88 ॥
। 183

[ 19/88-96 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीवल्लभभट्टने अति स्नेह और सेवाभावसे
महाप्रभुको भोजन कराया। बादमें उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी
और उनके भाई श्रीवल्लभको भी भोजन कराया॥88॥
श्रीरूप और कृष्णदासको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :—
भट्टाचार्य श्रीरूपे दओयाइल 'अवशेष'।
तबे सेइ प्रसाद कृष्णदास पाइल शेष॥89॥
अनुवाद—बलभद्र भट्टाचार्यने पहले श्रीरूपको
महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया और बादमें बचे हुए
उच्छिष्टको कृष्णदासको प्रदान किया॥89॥
श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुका पाद-सम्वाहन :—
मुखवास दिया प्रभुरे कराइल शयन।
आपने भट्ट करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन॥90॥
भोजन समाप्त करके श्रीवल्लभका पुनः आगमन :—
प्रभु पाठाइल ताँरे करिते भोजने।
भोजन करि' आइला तँहो प्रभुर चरणे॥91॥
अनुवाद—मुखके अच्छे स्वादके लिये श्रीवल्लभ
भट्टने महाप्रभुको लौंग, इलायची आदि देकर उन्हें
विश्राम कराया और स्वयं महाप्रभुके श्रीचरण दबाने
लगे। तब महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको भोजन करनेके
लिये भेजा। भोजन करनेके बाद श्रीवल्लभभट्ट पुनः
महाप्रभुके चरणकमलोंमें लौट आये॥90-91॥
त्रिहुत-पण्डित श्रीरघुपति उपाध्यायका आगमन :—
हेनकाले आइला रघुपति उपाध्याय।
तिरुहिता पण्डित, बड़ वैष्णव, महाशय॥92॥
अनुवाद—उसी समय त्रिहुत नामक स्थानके
श्रीरघुपति उपाध्याय वहाँपर आये। वे बड़े विद्वान, बहुत
बड़े वैष्णव और सम्मानित सज्जन थे॥92॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरघुपति उपाध्यायके द्वारा
रचित कुछेक श्लोक पद्यावलीमें पाये जाते हैं। उनका
निवास—त्रिहुत अथवा मिथिला देशमें था॥92॥
अनुभाष्य—'तिरुटिया' अथवा 'त्रिहुटिया'—वर्तमान
समयमें सारण, चम्पारण, मुज्जफरपुर और द्वारभाङ्गा—ये
चार जिले त्रिहुट् विभागके अन्तर्गत हैं; इस प्रदेशके
अधिवासियोंको 'तिरुटिया' कहते हैं॥92॥
महाप्रभुकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आशीर्वाद :—
आसि' तँहो कैल प्रभुर चरण वन्दन।
'कृष्णे मति रहु' बलि' प्रभुर वचन॥93॥
अनुवाद—श्रीरघुपति उपाध्यायने आकर महाप्रभुके
चरणोंकी वन्दना की और महाप्रभुने उनको आशीर्वाद
देते हुए कहा,—'श्रीकृष्णमें तुम्हारी मति रहे'॥93॥
श्रीउपाध्यायको श्रीकृष्ण-वर्णन करनेका आदेश :—
शुनि' आनन्दित हैल उपाध्यायेर मन।
प्रभु ताँरे कहिल,—“कह कृष्णेर वर्णन॥”94॥
अनुवाद—महाप्रभुके आशीर्वाद वचन सुनकर
श्रीरघुपति उपाध्यायका मन बहुत प्रसन्न हुआ। महाप्रभुने
उनसे कहा,—“श्रीकृष्णके विषयमें कुछ वर्णन करो॥”94॥
श्रीउपाध्यायके द्वारा स्वरचित श्लोकका पढ़ना,
महाप्रभुमें प्रेमावेश :—
निज-कृत कृष्णलीला-श्लोक पड़िल।
शुनि' महाप्रभुर महा प्रेमावेश हैल॥95॥
अनुवाद—तब श्रीरघुपति उपाध्यायने स्वरचित एक
श्रीकृष्णलीला-श्लोक पढ़ा। उसे सुनकर महाप्रभुमें महा
प्रेमावेश उदित हो गया॥95॥
श्रीनन्द-प्रणाम :—
पद्यावली (126)में उद्धृत श्लोक—
श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये भजन्तु भव-भीताः।
अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म॥96॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भवचक्रसे भयभीत सभी
व्यक्तियोंमेंसे कोई श्रुतिओंका, कोई स्मृतिका या कोई
महाभारतका भजन करे; (किन्तु मैं) इस स्थानपर
184 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/96-102 ]
श्रीनन्दकी ही वन्दना करता हूँ, - जिनके आँगनमें
परब्रह्म श्रीकृष्ण लीला करते हैं॥96॥
अनुभाष्य-
भवभीताः (संसार-भयातुराः) अपरे (हरिजनेतराः
मोक्षाभिलाषिणः) श्रुतिं (वेदशास्त्रम्), इतरे (हरिजनेतराः केचन
फलकामि-कर्मिणः) स्मृतिं (लौकिक-प्रयोगानुष्ठानपर-शास्त्रम्),
अन्ये (संसारिणः) भारतं (महाभारतादि-सकलजनसुखपाठ्य-
ग्रन्थादिकं) भजन्तु; अहं तु इह (जगति) [तं] नन्दं (व्रजेन्द्रं)
वन्दे, - यस्य (नन्दस्य) अलिन्दे (बहिर्द्वार-प्राङ्गणे) परंब्रह्म
(श्रीकृष्णः) [विराजते]।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥
'आगे कह', - प्रभु-वाक्ये उपाध्याय कहिल।
रघुपति उपाध्याय नमस्कार कैल॥97॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - 'आगे कहो।' श्रीरघुपति
उपाध्यायने महाप्रभुको नमस्कार किया और महाप्रभुके
वचनानुसार उन्होंने एक और श्लोक पढ़ा॥97॥
यमुनाके तटपर कुञ्जविहारी श्रीकृष्ण :-
पद्यावली (98)में उद्धृत श्लोक-
कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति को वा प्रतीतिमायातु।
गोपति-तनयाकुञ्जे गोपवधूटी-विटं ब्रह्म ॥98॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥98॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसे बतला सकता हूँ, अब
कौन उसपर विश्वास करेगा कि यमुना तटके कुञ्जोंमें
गोपवधुओंके लम्पट परमब्रह्म लीला करते हैं? ॥98॥
अनुभाष्य-
गोपति-तनयाकुञ्जे (गोपतिः सूर्यः तस्य तनया कालिन्दी
तस्याः तटस्थकुञ्जे) गोपवधूटीविटं (गोपवधूच्यः तरुण्यः
स्वल्पवयस्काः गोपरामाः,-क्षुद्रार्थे टीप्, तासां विटं लम्पटं)
[परं] ब्रह्म (श्रीकृष्णः) [विराजते इति] सम्प्रति कं [जनं] प्रति
कथयितुम् ईशे (समर्थो भवामि), कः वा प्रतीतिं (विश्वासम्)
आयातु (स्थापयेत्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥98॥
श्रीरघुपतिके द्वारा श्लोक सुनानेपर महाप्रभुमें प्रेमावेश :-
प्रभु कहेन, - कह, तँहो पड़े कृष्णलीला।
प्रेमावेशे प्रभुर देह-मन आलुयाइला ॥99॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - कुछ और कहो।
श्रीरघुपति उपाध्याय श्रीकृष्णलीला पढ़ने लगे। प्रेमावेशमें
महाप्रभुके देह और मन शिथिल हो गये॥99॥
अनुभाष्य- 'आलुयाइला'-असंलग्न होना; प्राकृत
विचारशून्य होकर मन उदासीन होनेसे दैहिक क्रियाका
भी शिथिल होना॥99॥
श्रीउपाध्यायमें विस्मय और महाप्रभुको
'श्रीकृष्ण' मानना :-
प्रेम देखि' उपाध्यायेर हैल चमत्कार।
'मनुष्य नहे, इँहो- कृष्ण' - करिल निर्द्धार ॥ 100 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर श्रीरघुपति
उपाध्याय आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने निर्णय किया
कि महाप्रभु 'मनुष्य नहीं, ये- श्रीकृष्ण हैं'॥100॥
महाप्रभु और श्रीरघुपतिका संलाप; महाप्रभुके प्रश्न
और श्रीउपाध्यायका उत्तर देना :-
(1) श्रीकृष्णका "श्याम' रूप ही श्रेष्ठ-
प्रभु कहे, - "उपाध्याय, श्रेष्ठ मान' काय ?"
'श्याममेव परं रूपं'- कहे उपाध्याय ॥ 101 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "उपाध्याय, किस रूपको
सबसे श्रेष्ठ मानते हो?" श्रीरघुपति उपाध्यायने
कहा, - 'श्रीश्यामसुन्दर ही परम रूप हैं'॥101॥
अनुभाष्य-महाप्रभुने श्रीरघुपतिसे जिज्ञासा की-
श्रीकृष्ण, श्रीनारायण, राम और नृसिंहादि भगवान्के
असंख्य आकार (रूप) हैं; उनमेंसे आपने किस
आकारको सर्वश्रेष्ठ रूप जाना है? ॥101॥
(2) मथुरा ही श्रेष्ठ धाम :-
" 'श्याम'-रूपेर वासस्थान श्रेष्ठ मान' काय ?"
'पुरी मधुपूरी वरा'- कहे उपाध्याय ॥ 102 ॥
| 185

[ 19/102-108 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - "श्यामसन्दर रूपके किस पद्यावली (82)में उद्धृत माधवेन्द्रपुरीकृत श्लोक :-
वासस्थानको श्रेष्ठ मानते हो?" श्रीरघुपति उपाध्यायने श्याममेव परं रूपं पुरी मधुपुरी वरा।
कहा, - 'श्रीमथुरापुरीको ही श्रेष्ठ मानता हूँ॥' 102 ॥ वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य एव परो रसः ॥ 106 ॥
अनुभाष्य- श्रीकृष्ण कभी मथुरामण्डलमें, कभी अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 106 ॥
द्वारकापुरीमें परव्योममें अवस्थान करते हैं; इन दोनोंमेंसे अमृतप्रवाह भाष्य-श्यामरूप ही सर्वश्रेष्ठ रूप,
मथुरापुरीका ही श्रेष्ठ होना कहा गया है। श्रीरूपपादने मधुपुरी ही श्रेष्ठा पुरी, कैशोर अवस्था ही ध्यान-योग्य
भी 'उपदेशामृत'में- "वैकुण्ठाजनितो वरा मधुपुरी" आदि और आद्य अर्थात् शृङ्गार-रस ही श्रेष्ठ रस है॥106॥
कहा है ॥ 102 ॥
अनुभाष्य-
(3) किशोर-अवस्था ही आराध्य :- [भगवद्रूपाणां वर्णाकाराणां भगवन्मूर्त्तिभेदानां मध्ये] श्यामं
"बाल्य, पौगण्ड, कैशोरे, श्रेष्ठ मान' काय ?" (नन्दनन्दन-श्यामसुन्दरस्य अभ्रवपुः) रूपम् एव परं (श्रेष्ठम्);
'वयः कैशोरकं ध्येयं'-कहे उपाध्याय ॥ 103 ॥ [पुरीणां वैकुण्ठ-मथुरादीनां मध्ये] मधुपुरी पुरी (मथुरा एव)
वरा (श्रेष्ठा); [बाल्य-पौगण्ड-कैशोर-वयसां मध्ये यौवनपूर्वं
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - "श्यामसुन्दरकी बाल्य, धीरदलित-नायकोचितं] कैशोरकं वयः [एव] ध्येयं
पौगण्ड तथा कैशोर अवस्थांमेंसे किसे श्रेष्ठ मानते हो?" (निरन्तरमाराध्यम्); [चिन्मयरसभेदानां मध्ये] आद्यः (मधुरः
श्रीरघुपति उपाध्यायने कहा, - 'कैशोर अवस्था ही ध्यान शृङ्गारः) रसः एव परः (श्रेष्ठः)।
करने योग्य है ॥' 103 ॥ श्लोक-भावानुवाद-पयार संख्या 101-104 का
अनुभाष्य- श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी अवस्थाओंमेंसे अनुवाद और अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 106 ॥
आप किसे श्रेष्ठ मानते हो ? ॥ 103 ॥
महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन, उपाध्यायके द्वारा नृत्य :-
(4) अप्राकृत शृङ्गार-रस ही सर्वोत्तम प्रेमावेशे प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन।
और श्रेष्ठ-आराध्य :- प्रेमे मत्त हञा तेंहो करेन नर्त्तन ॥ 107 ॥
"रसगण-मध्ये तुमि श्रेष्ठ मान' काय?" श्रीवल्लभका विस्मय, पुत्रको महाप्रभुके
'आद्य एव परो रस:' - कहे उपाध्याय ॥ 104 ॥ चरणोंमें समर्पित करना :-
देखि' वल्लभ-भट्ट मने चमत्कार हैल।
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - "रसोंमेंसे तुम किस दुइ (?) पुत्र आनि' प्रभुर चरणे पाड़िल ॥ 108 ॥
रसको श्रेष्ठ मानते हो?" श्रीरघुपति उपाध्यायने
कहा, - 'आदिरस (शृङ्गाररस) ही परम रस है॥' 104 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने प्रेमावेशमें श्रीरघुपति उपाध्यायका
आलिङ्गन किया। श्रीरघुपति उपाध्याय भी प्रेममें मत्त
महाप्रभुको आनन्द :- होकर नृत्य करने लगे। उन दोनोंके प्रेममें मत्त नृत्यको
प्रभु कहे, - "भाल तत्त्व शिखाइला मोरे।" देखकर श्रीवल्लभ भट्ट आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने
एत बलि' श्लोक पड़े गद्गद-स्वरे ॥ 105 ॥ अपने दोनों [(?) इसी पयारका अनुभाष्य देखें] पुत्रोंको
लाकर महाप्रभुके चरणोंमें समर्पित कर दिया ॥ 107-108 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "तुमने मुझे बहुत सुन्दर
तत्त्वकी शिक्षा प्रदान की है।" यह कहकर महाप्रभुने अनुभाष्य- 'दुइपुत्र' - श्रीगोपीनाथ और श्रीविट्ठलेश्वर।
गद्गद स्वरमें एक श्लोक पढ़ा ॥ 105 ॥ महाप्रभु 1434 अथवा 1435 शकाब्दमें प्रयागमें आये थे,
186 |

उन्नीसवाँ अध्याय १९/१०८-११७ ]
उस समय श्रीविट्ठलका जन्म नहीं हुआ था। मध्यलीला
१८/४७ संख्या देखें॥ १०८ ॥
आड़ाइल-ग्रामवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन
और वैष्णवताकी प्राप्ति :-
प्रभु देखिबारे ग्रामेर सब लोक आइल।
प्रभु-दर्शने सब लोक 'कृष्णभक्त' हइल ॥ १०९ ॥
अनुवाद—महाप्रभुके आनेका समाचार पाकर
आड़ाइल-ग्रामके सभी लोग उनके दर्शनके लिये आये।
महाप्रभुके दर्शनसे सभी लोग 'कृष्णभक्त' बन गये॥ १०९ ॥
ब्राह्मणोंका निमन्त्रण, श्रीवल्लभके द्वारा मना करना :-
ब्राह्मणसकल करेन प्रभुर निमन्त्रण।
वल्लभ-भट्ट ताँ सबारे करेन निवारण ॥ ११० ॥
“प्रेमान्मादे पड़े गोसाञि मध्य-यमुनाते।
प्रयागे चालाइब, इँहा ना दिब रहिते ॥ १११ ॥
याँर इच्छा, प्रयागे याञा करिबे निमन्त्रण।”
एत बलि' प्रभु लञा करिल गमन ॥ ११२ ॥
अनुवाद—उस ग्रामके सभी ब्राह्मण महाप्रभुको
निमन्त्रण चाहते थे, किन्तु श्रीवल्लभ भट्टने उन सबको
ऐसे करनेसे रोका और कहा,—“यहाँ आते हुए
प्रेमोन्मादके कारण श्रीचैतन्य गोसाईं बीच यमुनामें कूद
पड़े थे, इसलिये मैं इन्हें प्रयाग ले जाऊँगा, यहाँपर नहीं
रहने दूँगा। जिसकी इच्छा हो, वह प्रयाग जाकर इन्हें
निमन्त्रण करे।” इतना कहकर श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुको
लेकर चल दिये॥ ११०-११२ ॥
महाप्रभुको लेकर नौकासे दूसरी ओर
प्रयागमें श्रीवल्लभका आगमन :-
गङ्गा-पथे महाप्रभुरे नौकाते बसाञा।
प्रयागे आइला भट्ट गोसाञिरे लञा ॥ ११३ ॥
अनुवाद—[यमुनाके मार्गको छोड़कर] श्रीवल्लभ
भट्ट महाप्रभुको नौकामें बैठाकर गङ्गाके मार्गसे प्रयागमें
ले आये॥ ११३ ॥
महाप्रभुके द्वारा दशाश्वमेध-घाटपर एकान्तमें श्रीरूपमें
शक्तिका सञ्चार और शिक्षा-प्रदान :-
लोक-भिड़-भये प्रभु 'दशाश्वमेधे' याञा।
रूप-गोसाञिरे शिक्षा करा'न शक्ति सञ्चारिया ॥ ११४ ॥
अनुवाद—लोगोंकी भीड़के भयसे महाप्रभु दशाश्वमेध
घाटपर गये। वहींपर महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीमें शक्तिका
सञ्चार करके उन्हें शिक्षा प्रदान की॥ ११४ ॥
अनुभाष्य—भगवान् अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं। शक्तिमान्
भगवान्‌से सुकृतिमान् जीव कृपा-शक्ति प्राप्त करता है।
मायाके चङ्गुलमें पड़कर श्रीकृष्ण-विमुखतारूपी अज्ञानके
कारण जीव सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन तत्त्वमें प्रवेश
नहीं कर पाता। भगवान् श्रीगौरहरिने कृपा करके श्रीरूप
गोस्वामीको तत्त्वको समझनेकी शक्ति पहले अर्पण
करके बादमें उन्हें तत्त्व-शिक्षा प्रदान की॥ ११४ ॥
श्रीकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व और रसतत्त्वकी
सीमातक शिक्षा :-
कृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व, रसतत्त्व-प्रान्त।
सब शिखाइल प्रभु भागवत-सिद्धान्त ॥ ११५ ॥
श्रीरामानन्दके द्वारा कहे भक्तिसिद्धान्तोंका
श्रीरूपको उपदेश :-
रामानन्द-पाशे यत सिद्धान्त शुनिला।
रूपे कृपा करि' ताहा सब सञ्चारिला ॥ ११६ ॥
श्रीरूपके हृदयमें सभी तत्त्वोंकी स्फूर्ति :-
श्रीरूप-हृदये प्रभु शक्ति सञ्चारिला।
सर्वतत्त्व-निरूपिया 'प्रवीण' करिला ॥ ११७ ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीको श्रीकृष्णतत्त्व,
भक्तितत्त्व तथा रसतत्त्वकी सीमा तक शिक्षा प्रदान की।
तब उन्होंने श्रीरूप गोस्वामीको श्रीमद्भागवतके चरम
सिद्धान्तके विषयमें बतलाया। महाप्रभुने श्रीरामानन्द
रायसे जितने सिद्धान्त सुने थे, उन्होंने श्रीरूप गोस्वामीपर
कृपा करके उन सब सिद्धान्तोंका उनमें सञ्चार किया।
महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीके हृदयमें शक्ति सञ्चारित की
। 187

[ 19/115-121
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और समस्त तत्त्वोंका निरूपण करके उन्हें उनमें
'प्रवीण' बना दिया॥115-117॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'प्रान्त'—सीमा॥115॥
कविकर्णपूरके स्वकृत-ग्रन्थमें श्रीरूप-शिक्षाका उल्लेख :-
शिवानन्द-सेनेर पुत्र 'कविकर्णपूर'।
'रूपेर-मिलन' स्व-ग्रन्थे लिखियाछेन प्रचुर ॥118॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनके पुत्र 'श्रीकविकर्णपूर'ने
स्वरचित ग्रन्थ (श्रीचैतन्यचन्द्रोदयनाटक)में महाप्रभुसे
'श्रीरूपके मिलन'का विस्तारसे वर्णन किया है॥118॥
श्रीरूप-सनातनके द्वारा महाप्रभुकी
व्रजलीला-कथा-प्रकाश :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/38)—
कालेन वृन्दावनकेलिवार्त्ता
लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य।
कृपामृतेनाभिषिषेच देव-
स्तत्रैव रूपञ्च सनातनञ्च ॥119॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥119॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कालके प्रभावसे वृन्दावनकी
रसक्रीड़ाओंकी कथा लुप्त हो गयी थी, उन कथाओंका
विशेषरूपसे विस्तार करनेके लिये श्रीगौराङ्गदेवने कृपारूपी
अमृतके द्वारा वहाँपर श्रीरूप एवं श्रीसनातनको अभिषिक्त
किया था॥119॥
अनुभाष्य-
कालेन (भगवदिच्छारूप-कालवशेन) वृन्दावनकेलिवार्त्ता
(वृन्दावनसम्बन्धिनी रसक्रीड़ा-कथा) लुप्ता (आच्छन्ना आसीत्)
इति (अतः) तां (कथां) विशिष्य (विशिष्टां कृत्वा) ख्यापयितुं
(प्रकाशयितुं) देवः (श्रीगौरहरिः) तत्रैव वृन्दावने रूपं च
सनातनं च कृपामृतेन (करुणासुधा-वारिणा) अभिषिषेच
(अभिषिक्तवान्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥119॥
श्रीरूपपर कृपा करनेवाले महाप्रभु :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/29)में-
यः प्रागेव प्रियगुणगणैर्गाढबद्धोऽपि मुक्तो
गेहाध्यासाद्रस इव परो मूर्त्त एवाप्यमूर्त्तः।
प्रेमालापैर्दृढतरपरिष्वङ्गरङ्गैः प्रयागे
तं श्रीरूपं सममनुपमेनानुजग्राह देवः॥120॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो पहले प्रियगुणसमूहके
(महाप्रभुके गुणोंके) द्वारा गाढ़-बद्ध होनेके कारण
गृहकार्योंसे मुक्त हो गये थे, उन श्रीरूपके ऊपर, उनके
छोटे भाई श्रीअनुपमके साथ, स्वयं रसके समान अमूर्त्त
होनेपर भी श्रेष्ठ मूर्तिमान् श्रीगौराङ्गदेवने प्रयागमें
प्रेमालाप और दृढ़तर (गाढ़) आलिङ्गनके द्वारा अनुग्रह
किया था॥120॥
अनुभाष्य-
यः (श्रीरूपः) प्रागेव प्रियगुणगणैः (प्रियस्य गौरस्य गुणगणैः
गुणसमूहैः) गाढ़बद्धः (गाढ़म् अतिशयं बद्धः आसक्तः) अपि
गेहाध्यासात् (लीलाभिनीत-गृहासक्तेः) मुक्तः (त्यक्तस्पृहः) आसीत्,
तं (श्रीरूपम्) अनुपमेन (अनुजेन) समं (सार्द्धम्) अमूर्त्तः
अपि परः मूर्त्तः रसः इव (स्वरूपं प्रकटीकृत्य) देवः (गौरः)
प्रयागे (गङ्गायामुनसङ्गमे) प्रेमालापैः दृढ़तरपरिष्वङ्गरङ्गैः
(गाढ़ालिङ्गनविलासैः) अनुजग्राह (अनुकम्पां कृतवान्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
महाप्रभुके द्वितीय स्वरूप, महाप्रभुके सर्वस्व श्रीरूपमें
भक्तिरसतत्त्व-शास्त्रका विस्तार :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/30)में -
प्रियस्वरूपे दयितस्वरूपे
प्रेमस्वरूपे सहजाभिरूपे।
निजानुरूपे प्रभुरेकरूपे
ततान रूपे स्वविलासस्वरूपे ॥ 121 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥121॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अपने प्रियस्वरूप, दयितस्वरूप,
प्रेमस्वरूप, स्वाभाविक मनोज्ञरूपसे युक्त, मुख्य रूप एवं
188 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/121-131
अपने अनुरूप, - ऐसे अपने विलासरूप श्रीरूप गोस्वामीमें
महाप्रभुने (भक्तिरस शास्त्रका) विस्तार किया था ॥ 121 ॥
अनुभाष्य-
प्रियस्वरूपे (प्रियः भक्तः तत्स्वरूपः यः तस्मिन् भक्तरूपे)
दयितस्वरूपे (दत्तम् आत्मस्वरूपं यस्मै तस्मिन्) प्रेमस्वरूपे
(प्रेममय-निजाभिन्न-रूपे) सहजाभिरूपे (सहजं स्वाभाविकम्
अभिरूपं मनोज्ञं रूपं यस्य तस्मिन्) निजानुरूपे (प्रेमप्रकाशकतया
सदृशं रूपं यस्य तस्मिन्) एकरूपे (एकं मुख्यं रूपं यस्य
तस्मिन्) स्वविलासकूपे (स्वस्य स्वस्वरूपस्य विलासः लीलार्थं
रूपं यस्य तस्मिन्) रूपे (श्रीरूप-गोस्वामिनि) प्रभुः (श्रीमन्महाप्रभुः)
ततान (श्रीरूपद्वारेव भक्तिरसशास्त्रं प्रकाशितवान्)।
श्लोक-भावानुवाद-प्रिय भक्त स्वरूप है जिनका,
उन भक्तरूप, जिन्हें महाप्रभुने अपना स्वरूप दे दिया
है, जो प्रेममय महाप्रभुसे अभिन्नरूप हैं, स्वाभाविक
मनोज्ञ रूप है जिनका, प्रेमका प्रकाश होनेके कारण
महाप्रभुके जैसा रूप है जिनका, जो महाप्रभुका ही एक
मुख्य रूप हैं और अपने स्वरूपका विलास करनेके
लिये अर्थात् लीला करनेके लिये जिनका रूप है, ऐसे
श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा महाप्रभुने भक्तिशास्त्रोंको प्रकाशित
करवाया ॥ 121 ॥
एइमत कर्णपूर लिखे स्थाने-स्थाने।
प्रभु कृपा कैला यैछे रूप-सनातने ॥ 122 ॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित ग्रन्थमें
स्थान-स्थानपर महाप्रभुने जिस प्रकार श्रीरूप-सनातनपर
कृपा की थी, उसका वर्णन किया है ॥ 122 ॥
अनुभाष्य- 'स्थाने स्थाने'-श्रीचैतन्यचन्द्रोदय ग्रन्थमें
भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ॥ 122 ॥
श्रीरूप-सनातन-सभी श्रीगौरभक्तोंके सर्वाधिक प्रिय :-
महाप्रभुर यत बड़ बड़ भक्त मात्र।
रूप-सनातन-सबार कृपा-गौरव-पात्र ॥ 123 ॥
अनुवाद-श्रीरूप-सनातन महाप्रभुके सभी बड़े-बड़े
भक्तोंके कृपा तथा गौरवके पात्र थे ॥ 123 ॥
सभीके आदरका दृष्टान्त; वृन्दावन दर्शन करनेवालोंसे
श्रीरूप-सनातनके सम्बन्धमें आग्रहपूर्वक जिज्ञासा :-
केह यदि देशे याय देखि' वृन्दावन।
ताँरे प्रश्न करेन प्रभुर पार्षदगण ॥ 124 ॥
“कह,-ताँहा कैछे रहे रूप-सनातन?
कैछे रहे, कैछे वैराग्य, कैछे भोजन ? ॥ 125 ॥
कैछे अष्टप्रहर करेन श्रीकृष्ण-भजन?”
तबे प्रशंसिया कहे सेइ भक्तगण ॥ 126 ॥
श्रीरूप-सनातनके वैराग्ययुक्त-भक्तिरसके
पानकी मत्तताका वर्णन :-
"अनिकेत दुँहे, वने यत वृक्षगण।
एक एक वृक्षेरे तले एक एक रात्रि शयन ॥ 127 ॥
विप्रगृहे स्थूलभिक्षा, काँहा माधुकरी।
शुष्क रुटी-चाना चिबाय, भोग परिहरि' ॥ 128 ॥
करों या-मात्र हाते, काँथा, छिँड़ा-बहिर्वास।
कृष्णकथा, कृष्णनाम, नर्त्तन-उल्लास ॥ 129 ॥
अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारिदण्ड शयने।
नाम-सङ्कीर्त्तन-प्रेमे सेह नहे कोन दिने ॥ 130 ॥
कभु भक्तिरसशास्त्र करये लिखन।
चैतन्यकथा शुने, करे चैतन्य-चिन्तन ॥ " 131 ॥
अनुवाद-जो कोई भी श्रीवृन्दावनके दर्शन करके
अपने गाँवमें पहुँचता, उससे महाप्रभुके परिकर प्रश्न
करते, - "बतलाओ तो, वहाँ रूप और सनातन कैसे
रहते हैं? वे क्या करते हैं? उनका वैराग्य कैसा है?
वे क्या भोजन करते हैं? वे कैसे अष्टप्रहर श्रीकृष्णका
भजन करते हैं?" तब वृन्दावनसे लौटा भक्त
श्रीरूप-सनातनकी प्रशंसा करते हुए कहता, - "दोनोंका
ही रहनेका कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं है। वे दोनों
एक-एक वृक्षके नीचे एक-एक रात्रि व्यतीत करते हैं।
वे कभी तो ब्राह्मणके घरमें स्थूल भिक्षा ग्रहण करते
हैं और कभी कहींपर माधुकरी माँगकर खा लेते हैं।
। 189

[ 19/124-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भोगका सम्पूर्ण रूपसे त्याग करके कभी सूखी रोटी
और चना चबाते हैं। वे हाथमें केवल जलका पात्र ही
रखते हैं, पुराने वस्त्रोंका बना कम्बल तथा फटा हुआ
बहिर्वास धारण करते हैं। श्रीकृष्णकथा, श्रीकृष्णनाम
और नृत्यमें ही उल्लास प्राप्त करते हैं। वे आठों प्रहर
श्रीकृष्णका भजन करते हैं, केवल चार दण्ड ही शयन
करते हैं। कभी-कभी तो नाम-सङ्कीर्तन और श्रीकृष्ण
प्रेममें आविष्ट होनेके कारण वह भी नहीं होता। वे
कभी भक्तिरससे सम्बन्धित शास्त्रका लेखन कार्य करते
हैं और कभी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कथाका श्रवण करते
हैं और श्रीचैतन्य महाप्रभुका चिन्तन करते हैं॥"124-131 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'करोँया' - संन्यासियोंके हाथमें
रहनेवाला जलका पात्र ॥ 129 ॥
अनुभाष्य- 'स्थूलभिक्षा'-जिस भिक्षाको ग्रहण करनेपर
उदरपूर्तिके लिये अन्य किसी व्यक्तिसे और किसी खाद्य
पदार्थकी भिक्षा नहीं करनी पड़ती।
'माधुकरी' - मधुमक्खी जिस प्रकार अनेक पुष्पोंसे
मधु संग्रह करके अपने छत्तेमें ले जाती है, उसी प्रकार
बहुतसे स्थानोंसे थोड़ा-थोड़ा खाद्य पदार्थ संग्रह करके
जो उदर भरते हैं, उन्हींकी वृत्ति ही 'माधुकरी'के नामसे
जानी जाती है।
'भोग परिहरि'-सुख प्राप्तिकी आशासे इन्द्रियवृत्तिको
वर्द्धित करनेके लिये जो सब उत्तेजक पदार्थ उपयोग
किये जाते हैं, उन सबका त्याग करके वे भजनके
उपयोगी जीवनकी रक्षा करनेके लिये सूखी रोटी और
भुने हुए चनेके द्वारा जीवनका निर्वाह करते थे। ऐसे
वैराग्ययुक्त जीवनमें वे कभी तो भक्तिरस शास्त्र
लिखकर श्रीकृष्णभजन करते थे, कभी नाम-सङ्कीर्तन
और कभी श्रीगौरलीला-स्मरण-मनन आदिके द्वारा
श्रीकृष्णभजन करते थे। प्राकृत सहजियाओंमें यह
विश्वास प्रबल है कि भक्तिशास्त्रोंको लिखना और
पढ़ना तो नये साधकोंके लिये है। इनका परित्याग
करके शास्त्रादिकी चर्चासे विराम प्राप्त करना ही
भक्तिका 'साधन' है। श्रीरूपानुग-भक्तोंकी इस प्रकारकी
बातोंमें आस्था नहीं है। किन्तु यदि साधकका शास्त्रोंके
लिखने-पढ़ने आदिके द्वारा धन-उपार्जन करके इन्द्रिय-
तृप्ति, जड़़ीय प्रतिष्ठा अथवा पूजा, लाभ अथवा अन्य
कोई तुच्छ उद्देश्य हो, जिसे 'उपशाखा' कहा जाता है,
तब उस प्रकारके भ्रष्टाचार-परायण व्यक्तिका कभी भी
मङ्गल नहीं होता। वास्तविक श्रीमद्रूपानुगोंकी ऐसी
तुच्छ फलभोगमूलक कर्मवासना नहीं होती ॥ 128-131 ॥
श्रीरूप-सनातनके भजनके आचरणको
सुनकर भक्तोंको सुख :-
एइकथा शुनि' महान्तेर महासुख हय।
चैतन्येर कृपा याँहे, ताँहे कि विस्मय ? ॥ 132 ॥
अनुवाद-श्रीरूप-सनातनसे सम्बन्धित इन बातोंको
सुनकर महाप्रभुके परिकर बहुत प्रसन्न होते। जिनपर
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपा हो, उनके विषयमें यह सब
सुनकर कैसा विस्मय ? ॥ 132 ॥
स्वरचित 'भक्तिरसामृतसिन्धु'में महाप्रभुकी कृपाका वर्णन :-
चैतन्येर कृपा रूप लिखियाछेन आपने।
रसामृतसिन्धु-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे ॥ 133 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके विषयमें श्रीरूप
गोस्वामीने स्वरचित भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थके मङ्गलाचरणमें
स्वयं यह लिखा है- ॥ 133 ॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/2) :-
हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि।
तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य ॥ 134 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 134 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा
सामान्य कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ
हूँ, उन श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना
करता हूँ॥ 134 ॥
190 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/134-139 ]
अनुभाष्य-
[निज-भागवतसेवा-प्रवर्त्तकं स्वाश्रयचरणकमलं भगवन्तं गौरहरिं
नमस्करोति-] अहं वराकरूपः (क्षुद्र-दीन-रूपः, स्वयं
गोस्वामिकुलचूड़ामणिरपि अतिदैन्यवशादेवेयमुक्तिः) अपि यस्य
(कर्त्तृभूतस्य गौरस्य) हृदि (मनसि) प्रेरणया (हृद्विषयानुज्ञया)
प्रवर्त्तितः (प्रेरितः), तस्य चैतन्यदेवस्य हरेः (गौरहरेः कृष्णचैतन्यस्य)
पदकमलं (चरणारविन्दम्) अहं वन्दे।
श्लोक-भावानुवाद—[अपनी भगवद्भक्तिके प्रवर्तक
भगवान् श्रीगौरहरिको, विशेषरूपसे उनके श्रीचरणकमलोंको
नमस्कार करते हुए कह रहे हैं-] मैं अति दीन (स्वयं
गोस्वामिकुलके चूड़ामणि होनेपर भी अति दैन्यवशतः
ऐसा कह रहे हैं) हृदयमें जिनकी प्रेरणासे भक्तिग्रन्थकी
रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन श्रीकृष्णचैतन्यदेवके
चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥134॥
प्रयागमें दस दिन तक महाप्रभुके द्वारा
श्रीरूपको शिक्षा-प्रदान :-
एइमत दशदिन प्रयागे रहिया।
श्रीरूपे शिक्षा दिल शक्ति सञ्चारिया॥135॥
अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार दस दिन तक
प्रयागमें रहकर श्रीरूपमें शक्ति सञ्चार करके उन्हें
शिक्षा प्रदान की॥135॥
श्रीरूप-शिक्षा; सूत्राकारमें भक्तिरसके लक्षणका वर्णन :-
प्रभु कहे,—“शुन, रूप, भक्तिरसेर लक्षण।
सूत्ररूपे कहि, विस्तार ना याय वर्णन॥136॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–‘हे रूप सुनो! भक्तिरसके
लक्षणका सूत्ररूपमें ही वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका
विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता॥136॥
महाप्रभुकी कृपासे श्रीरूपके द्वारा
भक्तिरसामृतसिन्धुकी एक बूँदका पान :—
पारापार-शून्य गभीर भक्तिरस-सिन्धु।
तोमाय चाखाइते तार कहि एक ‘बिन्दु’॥137॥
अनुवाद—भक्तिरस-सिन्धु ओर-छोररहित है और
इसकी गहराईको भी कोई नहीं जान सकता। तुम्हें
भक्तिरस-सिन्धुको चखानेके लिये इसकी एक बिन्दुकी
व्याख्या कर रहा हूँ॥137॥
अनुभाष्य—‘पारापार-शून्य’–पार (अर्थात्) एक ओर,
अपार (अर्थात्) दूसरी ओर; इसलिये जिसके दोनों
ओरके बीचमें किसी भी ओरकी कोई सीमा नहीं
है॥137॥
सर्वप्रथम ब्रह्माण्डके बद्धजीवोंका वर्णन;
संख्यामें बहुत अधिक :—
एइमत ब्रह्माण्ड भरि’ अनन्त जीवगण।
चौराशी-लक्ष योनिते करये भ्रमण॥138॥
अनुवाद—इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें अनन्त जीव
हैं जो चौरासी लाख योनियोंमें इस ब्रह्माण्डमें भ्रमण कर
रहे हैं॥138॥
अनुभाष्य—‘चौराशी लक्ष्योनि’ (विष्णुपुराणमें)—
“जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः।
कृमयो रुद्रसंख्याकाः पक्षिणां दशलक्षकम्।
त्रिंशल्लक्षाणि पशवः चतुलंक्षाणि मानुषाः॥”
[अर्थात् “जलचरोंकी नौ लाख योनियाँ हैं, बीस
लाख योनियाँ स्थावर पेड़-पौधोंकी हैं, कीट-पतंगोंकी
ग्यारह लाख योनियाँ हैं, पक्षियोंकी दस लाख योनियाँ
हैं, पशुओंकी तीस लाख योनियाँ हैं और मनुष्योंकी
चार लाख योनियाँ हैं।”]॥138॥
जीवात्मा और जीवके स्वरूपका परिमाण :—
केशाग्र-शतैक-भाग पुनः शतांश करि।
तार सम सूक्ष्म जीवेर ‘स्वरूप’ विचारि॥139॥
अनुवाद—केशके अग्रभागको सौ भागोंमें बाँटनेके
बाद, उसके एक भागको पुनः सौ भागोंमें बाँटनेपर, उस
एक भागके समान सूक्ष्म जीवका स्वरूप है॥139॥
। 191

[ 19/139-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य-मुण्डकमें 3/1/9-“एषोऽणुरात्मा” अर्थात्
यह आत्मा अणुके समान सूक्ष्म है ॥139॥
शास्त्र-प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (10/87/30)में श्रुति-स्तव-व्याख्यामें
उद्धृत-श्लोक-
केशाग्रशतभागस्य
शतांशसदृशात्मकः।
जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं
संख्यातीतो हि चित्कणः॥140॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥
अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौ भाग
करनेपर उसके एक भागके पुनः सौवे अंशके सदृश
स्वरूप ही जीवका सूक्ष्म स्वरूप है; जीव चित्कण और
संख्यातीत (असंख्य) हैं॥140॥
अनुभाष्य-
अयं जीवः हि केशाग्रशतभागस्य (अति-सूक्ष्मकेशाग्रायामस्य
शतधा विभक्तस्य, पुनः तादृश-परमसूक्ष्मांशस्य) शतांशसदृशात्मकः
(पुनः शतखण्डांशतुल्यः) सूक्ष्मस्वरूपः (परमाणुचेतनः चित्कणः
सूक्ष्मचिदणुरखण्डः) संख्यातीतः (अनन्तसंख्यः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥
श्वेताश्वतर उपनिषदके मन्त्रानुसार
पञ्चदशी चित्रदीप (81)में :-
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेय इति चाह परा श्रुतिः ॥141॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥
अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौवे भागको
लेकर उसे सौ भागोंमें विभाग करनेसे जो सूक्ष्म भाग
होता है, जीव-वैसा सूक्ष्म है, प्रधान श्रुतिओंने ऐसा
कहा है॥141॥
अनुभाष्य-
[यः] बालाग्रशतभागस्य (केशाग्रस्य शतधा खण्डितस्य,
तस्य पुनः) शतधा कल्पितस्य (विभक्तस्य) च भागः (खण्डः),-
सः [एव] जीवः (जीवस्वरूपाकारः) विज्ञेयः (ज्ञातव्यः) इति
च परा (श्रेष्ठा) श्रुतिः (श्वेताश्वतरप्रमुखा) आह।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥
श्रीमद्भागवत (11/16/11)में :-
सूक्ष्माणामप्यहं जीवः ॥ 142 ॥
अनुवाद-सूक्ष्म वस्तुओं अर्थात् अणुओंके मध्य मैं
जीवात्मा हूँ॥142॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें लिखा हुआ
है,- श्रीमद्भागवतमें उद्धवके प्रति श्रीभगवद् वाक्य-
“गुणिनामप्यहं सूत्रं महताञ्च महानहम्।
सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥”
सूक्ष्मगणोंमें मैं (भगवान्) 'जीव' (भेदाभेद-प्रकाश)
हूँ।॥142॥
अनुभाष्य-भगवान्की विभूतियोंका श्रवण करनेकी
इच्छा करनेपर श्रीउद्धवके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति-
अहं (चिदचिदीश्वरः अद्वयज्ञानात्मकः श्रीभगवान्) सूक्ष्माणां
(अणूनाम् अपि मध्ये) जीवः (जीवात्मा)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥142॥
श्रीमद्भागवत (10/87/30)में :-
अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता-
स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा।
अजनि च यन्मयं तद्विमुच्य नियन्तृ भवेत्
सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥143॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥143॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे ध्रुव (सर्वाश्रय) ! यदि सभी
अनन्त शरीरधारी जीव ध्रुव अर्थात् [आपसे उत्पन्न नहीं
होकर] परम नित्य और सर्वव्यापी होते, तो फिर उनका
आपके शासनके अधीन रहनेका नियम नहीं होता।
यदि जीवको 'अणु', सामान्यतः 'नित्य' कहकर स्वीकार
किया जाय, तभी वे आपके अधीन होते हैं। [अग्निरूप
192 ।

उन्नीसवाँ अध्याय 19/143-148 ]
आपसे चिद्गारीरूप] होकर जिन जीवोंने जन्मग्रहण
किया है, आप उनके अपरित्यज्य नियन्ता हैं। इसलिये
जो जीव और आपको 'एक' मानते हैं, उनका
मत- 'मतवाद'से दूषित है ॥ 143 ॥
अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्र यज्ञमें श्रवण करनेके
इच्छुक मुनियोंके निकट कुमारोंमें अन्यतम ब्रह्मर्षि
सनन्दन श्रुतिओंके द्वारा किये गये भगवद्-स्तवका
वर्णन कर रहे हैं-
हे ध्रुव (सर्वाश्रय, नित्य)! अपरिमिताः (वस्तुतः एव
अनन्ताः) ध्रुवाः (नित्याः) तनुभृतः (शरीरधारिणः जीवाः)
यदि सर्वगताः (विभवः व्यापकाः स्युः), तर्हि शास्यता
(तच्छास्यता) इति यः त्वया नियमः (नियमनं) सः न स्यात्,
इतरथा च [घटेत, नियम्यनियन्तृ-भावावस्थितत्वात्]; यन्मयं
(यत् अग्न्यादिमयं स्फुलिङ्गादिकं कार्यं जीवाख्यं वस्तु) अजनि
(जातं, तेषां जीवानां) नियन्तृ (शास्तु) भवेत्, तत् अविमुच्य
(तान् जीवान् अपरित्यज्य यत् उपादानरूपं परमात्मानं जीवतत्त्वेन)
समम् अनुजानतां (केवलाद्वैतवादिनां) मतदुष्टतया (मतस्य
दुष्टतया अशुद्धत्वेन) अमतम् एव (अज्ञातप्रायम् अविषयत्वात्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥
विरूप-भेदसे जीव दो प्रकारके - 1) स्थावर, 2) जङ्गम;
जङ्गम तीन प्रकारके - जल, स्थल और आकाशके :-
तारे मध्ये 'स्थावर', 'जङ्गम'-दुइ भेद।
जङ्गमे तिर्यक्-जल-स्थलचर-विभेद ॥ 144 ॥
अनुवाद - माया जगत्में अनन्त जीव 'स्थावर' तथा
'जङ्गम' - इन दो प्रकारके हैं। जङ्गम जीवोंमें पक्षी,
जलचर तथा स्थलचर - ये तीन भेद हैं ॥ 144 ॥
अनुभाष्य - 'तार मध्ये' - ब्रह्माण्डके अन्तर्गत
बद्धजीवोंमें ॥ 144 ॥
स्थलचरका श्रेष्ठत्व; उनमेंसे मनुष्य जातिकी सर्वश्रेष्ठता;
उनमेंसे कर्मी, ज्ञानी और भक्तोंमें तारतम्य-तुलना :-
तार मध्ये मनुष्य-जाति अति अल्पतर।
तार मध्ये म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध, शबर ॥ 145 ॥
अनुवाद - इन जङ्गम जीवोंमें मनुष्य-जातिकी संख्या
अति अल्पतर है। और मनुष्य-जातिमें भी म्लेच्छ,
पुलिन्द, बौद्ध तथा शबरादि लोग हैं ॥ 145 ॥
अनुभाष्य - 'तार मध्ये' - वेदोंमें निष्ठा रखनेवालोंके
विपरीत मनुष्य-जातिमें ॥ 145 ॥
वेदनिष्ठ-मध्ये अर्द्धेक वेद 'मुखे' माने।
वेदनिषिद्ध पाप करे, धर्म नाहि गणे ॥ 146 ॥
अनुवाद- वेदनिष्ठ मनुष्योंमें प्रायः आधे तो वेदको
केवल 'मुख'से मानते हैं, किन्तु वेदोंमें निषिद्ध पापोंको
करते हैं। ऐसे लोग धर्मका पालन नहीं करते हैं ॥ 146 ॥
अनुभाष्य-मुखसे स्वयंको 'वेदनिष्ठ'के रूपमें स्वीकार
करके वेदोंके विरुद्ध आचरण करनेवाले - स्वेच्छाचारी
'कुकर्मी' अथवा 'अन्याभिलाषी' हैं ॥ 146 ॥
धर्माचारि-मध्ये बहुत 'कर्मनिष्ठ'।
कोटि-कर्मनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ ॥ 147 ॥
अनुवाद - वेदोंमें वर्णित धर्मका आचरण करने
वालोंमें-से भी बहुत सकाम कर्मोंमें निष्ठा रखनेवाले
हैं। ऐसे करोड़ों सकाम कर्मियोंमेंसे श्रेष्ठ कोई एक
'ज्ञानी' होता है ॥ 147 ॥
मुक्तगणोंमें भी श्रीकृष्णभक्तका सुदुर्लभ होना :-
कोटिज्ञानि-मध्ये हय एकजॅन 'मुक्त'।
कोटिमुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्णभक्त ॥ 148 ॥
अनुवाद - करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे कोई एक व्यक्ति ही
मुक्त होता है। करोड़ों मुक्तोंमें भी एक कृष्णभक्त 'दुर्लभ'
होता है ॥ 148 ॥
अनुभाष्य - 'कर्मनिष्ठ' - अपने सुखकी कामनाओंसे
जो पुण्यादि सत्कर्म करते हैं, उन्हें कर्मनिष्ठ कहते हैं।
'ज्ञानी'-पुनः ऐसे करोड़ों कर्मनिष्ठोंमेंसे निष्काम-कल्पनासे
कोई-कोई ही अपने कर्मफलोंको त्याग करता है। इस
प्रकारके व्यक्तिको भी कर्मनिष्ठ ही कहा जाता है। ऐसे
। 193

[ 19/148-150 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करोड़ों कर्मनिष्ठोंमेंसे जो सत्त्वगुणमें स्थित होकर
रजोगुण और तमोगुणको दूर करनेके लिये, प्राकृत पुण्य
और पाप, दोनों प्रकारकी अवस्थाओंसे हटकर आत्माकी
निर्मलताका अनुसरण करनेके लिये प्रकृतिसे अतीत
अभेद-ब्रह्मानुसन्धानमें रत होता है, वही ज्ञानी है।
करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे कोई-कोई ज्ञानमार्गमें सत्त्वगुणके
आश्रित होकर शम-दमादि छः प्रकारके साधनादिरूपा
मिश्रा और बिद्धा-भक्तिमूलक सत्कर्मोंका अनुष्ठान
करते हैं। फिर द्वैतबुद्धिसे अपने इन उपायोंको भी
असम्पूर्ण मानकर उनका त्याग कर देते हैं। इस प्रकार
अनित्य और असत्य साधनको ही नित्यसिद्धिके
कारणरूपमें जानकर उस साधनके फलसे अन्तमें वे
अभिमान करते हैं कि मैंने अपनी बद्धानुभूतिसे मुक्ति
अर्थात् ब्रह्मभूत स्वरूप प्राप्त किया है। उसीके उद्देश्यसे
वे अद्वैत-विचारसे 'दृष्टा', 'दर्शन' और 'दृश्य' अथवा
'ज्ञाता', 'ज्ञान' और 'ज्ञेय'के वैशिष्ट्यका लोप करते हैं।
वैसे अचित्-मिश्रातीत केवलचिन्मयवादी ज्ञानी ही 'मुक्त'
कहे जाते हैं। ऐसे करोड़ों मुक्तोंमें भी श्रीकृष्णभक्त
विरले हैं॥ 148 ॥
श्रीकृष्ण भक्तके सुदुर्लभ होने और
सर्वश्रेष्ठ होनेका कारण :-
कृष्णभक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त'।
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकलि 'अशान्त'॥ 149॥
अनुवाद—श्रीकृष्णभक्त निष्काम होते हैं, इसलिये वे
'शान्त' होते हैं। भोग, मोक्ष और सिद्धिकी कामना
करनेवाले सभी 'अशान्त' रहते हैं॥ 149॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जीव दो प्रकारके हैं, -नित्यमुक्त
और नित्यबद्ध। नित्यबद्ध जीव स्थावर और जङ्गमके
भेदसे दो प्रकारके हैं। जो—अचल (जैसे, वृक्षादि) हैं,
वे ही 'स्थावर' जीव हैं; जो—सचल हैं, वे ही 'जङ्गम'
हैं। जङ्गम तीन प्रकारके हैं,—तिर्यक् अर्थात् पक्षी,
जलचर और स्थलचर। स्थलचरोंमें मानवजाति अत्यन्त
अल्प संख्यक है। उन अल्पसंख्यक मनुष्योंमें म्लेच्छ,
पुलिन्द, बौद्ध और शबरादिको छोड़ देनेपर वेदनिष्ठ
मनुष्य ही बाकी रहते हैं। वेदनिष्ठ मनुष्य भी दो
प्रकारके हैं,—धर्माचारी और अधर्माचारी। धर्माचारियोंमें
अधिकांश कर्मनिष्ठ हैं; कोई-कोई ज्ञाननिष्ठ हैं। करोड़ों
ज्ञाननिष्ठोंमें वास्तवमें कोई एक व्यक्ति ही 'मुक्त' है;
यहाँ, जो जड़ीयबुद्धिसे मुक्त हैं, उन्हें ही 'मुक्त' कहा
गया है। उन सब मुक्त व्यक्तियोंमें, जो श्रद्धालु होकर
श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त हैं, वे ही 'श्रीकृष्णभक्त' हैं।
श्रीकृष्णभक्तमें कोई कामना नहीं होती। पहले कहे गये
'मुक्त' व्यक्ति तक सभी कामनायुक्त हैं; धर्माचारी और
कर्मनिष्ठ—'भुक्तिकामी' हैं और मुक्त तक ज्ञानी-
'मुक्तिकामी' हैं, उनमेंसे पुनः कोई-कोई योगफलके
'सिद्धिकामी' हैं। जब तक उनके हृदयमें ये तीन
प्रकारकी कामनाएँ रहती हैं, तब तक उन्हें यह सब
कामनाएँ शान्ति प्रदान नहीं करतीं; इसी कारण वे सभी
'अशान्त' हैं। इसलिये एकमात्र निष्काम श्रीकृष्णभक्त ही
शान्त अर्थात् शान्ति प्राप्त किया हुआ है॥ 144-149 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्ण भक्त ही एकमात्र कामनाशून्य
एवं एकमात्र श्रीकृष्णनिष्ठ होनेके कारण शान्त होता है।
स्वर्गादि भुक्तिकामी कर्मी, निर्वाणादि मुक्तिकामी ज्ञानी
एवं अणिमादि अठारह प्रकारकी सिद्धिकामी योगी
अपनी-अपनी कामनाओंके वशीभूत होकर उन्हींकी
प्राप्तिके लिये अशान्त रहते हैं। पुनः, कामनाकी तृप्ति
होनेपर भी वे असत्-प्राप्तिके कारण श्रीकृष्णनिष्ठ नहीं
होनेसे अशान्त ही रहते हैं॥ 149॥
शास्त्रप्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (6/14/5)में—
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ 150 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 150 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे महामुने, करोड़ों-करोड़ों मुक्तों
और सिद्धोंमेंसे नारायण-परायण प्रशान्तात्मा पुरुष अत्यन्त
दुर्लभ है॥ 150 ॥
194 ।