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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

4 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/22-32 ]
कुक्कुर नाहि पाय भात, शुनि' दुःखी हैला।
कुक्कुर चाहिते दश-मनुष्य पाठाइला॥ २२॥
अनुवाद—सेवकने जब कहा कि कुत्तेको भोजन नहीं दिया गया, तब श्रीशिवानन्द सेनको बहुत दुःख हुआ और उन्होंने कुत्तेको ढूँढ़नेके लिये दस लोगोंको भेजा॥ २२॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'चाहिते'—खोजने॥ २२॥
चाहिया ना पाइल कुक्कुर, लोक सब आइला।
दुःखी हञा शिवानन्द उपवास कैला॥ २३॥
अनुवाद—बहुत खोजनेपर भी जब वह कुत्ता नहीं मिला, तब सभी लोग लौट आये। श्रीशिवानन्द सेनने दुःखी होकर उस रात्रि उपवास किया॥ २३॥
प्रभाते कुक्कुर चाहि' काँहा ना पाइल।
सकल वैष्णवेर मने चमत्कार हैल॥ २४॥
अनुवाद—प्रातःकालमें भी पुनः सभीने कुत्तेको सर्वत्र ढूँढ़ा, किन्तु उसका कुछ भी पता नहीं चला। ऐसा देखकर सभी वैष्णवोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥ २४॥
उत्कण्ठाय चलि' सबे आइला नीलाचले।
पूर्ववत् महाप्रभु मिलिला सकले॥ २५॥
अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थे, इसलिये वे सब वहाँसे चल पड़े और नीलाचल आ पहुँचे। महाप्रभु पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंसे मिले॥ २५॥
सबा लञा कैला जगन्नाथ-दरशन।
सबा लञा महाप्रभु करेन भोजन॥ २६॥
अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथ ले जाकर श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और फिर उन्होंने सभी भक्तोंके साथ भोजन किया॥ २६॥
पूर्ववत् सबारे प्रभु पाठाइला वासा-स्थाने।
प्रभु-स्थाने आर दिन सबार गमने॥ २७॥
अनुवाद—पूर्व वर्षोंकी भाँति महाप्रभुने सभी भक्तोंको उनके रहनेके स्थानपर भेजा। अगले दिन सभी भक्त महाप्रभुसे उनके वासस्थानपर मिलनेके लिये आये॥ २७॥
आसिया देखिल सबे सेइ त' कुक्कुरे।
प्रभु-पाशे बसियाछे किछु अल्पदूरे॥ २८॥
अनुवाद—वहाँ आकर सभी भक्तोंनै देखा कि वह कुत्ता महाप्रभुके पास उनसे थोड़ी दूरीपर ही बैठा हुआ है॥ २८॥
प्रसाद नारिकेल-शस्य देन फेलाइञा।
'राम' 'कृष्ण' 'हरि' कह', बलेन हासिया॥ २९॥
अनुवाद—महाप्रभु उसे नारियल प्रसादकी गिरि फेंककर दे रहे थे और मुस्कुराते हुए उसे कह रहे थे—'राम', 'कृष्ण', 'हरि' बोलो॥ २९॥
शस्य खाय कुक्कुर, 'कृष्ण' कहे बार बार।
देखिया लोकेर मने हैल चमत्कार॥ ३०॥
अनुवाद—वह कुत्ता नारियलकी गिरि खा रहा था और बार-बार 'कृष्ण' नाम बोल रहा था। उस कुत्तेको 'कृष्ण' नाम बोलते देखकर सभी भक्तोंके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ॥ ३०॥
शिवानन्द कुक्कुर देखि' दण्डवत् कैला।
दैन्य करि' निज अपराध क्षमाइला॥ ३१॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कुत्तेको देखकर उसे दण्डवत् प्रणाम किया और दीनतापूर्वक अपने किये अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना की॥ ३१॥
कुत्तेकी सिद्धि और वैकुण्ठ-प्राप्ति :-
आर दिन केह तार देखा ना पाइला।
सिद्ध-देह पाञा कुक्कुर वैकुण्ठेते गेला॥ ३२॥

[ 1/32-37 पहला अध्याय 5
अनुवाद—अगले दिन वह कुत्ता किसीको दिखलायी
नहीं दिया। वह कुत्ता सिद्ध-देहको प्राप्त करके
वैकुण्ठमें चला गया॥ 32॥
आलौकिक लीलामय महाप्रभु :-
ऐछे दिव्यलीला करे शचीर नन्दन।
कुकुरके 'कृष्ण' कहाञा करिला मोचन॥ 33॥
अनुवाद—शचीनन्दन श्रीगौरहरि ऐसी अनेक दिव्य
लीलाएँ करते हैं। उन्होंने कुत्तेके मुखसे 'कृष्ण'
कहलवाकर उसका उद्धार कर दिया॥ 33॥
श्रीरूपका वृन्दावन आगमन
और नाटक-रचना आरम्भ :-
एथा प्रभु-आज्ञाय रूप आइला वृन्दावन।
कृष्णलीला-नाटक करिते हैल मन॥ 34॥
अनुवाद—इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुकी आज्ञासे
प्रयागसे वृन्दावन आ गये और वहाँ उनकी
कृष्णलीला-विषयक-नाटक लिखनेकी इच्छा हुई॥ 34॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णलीला-नाटक'—कृष्णलीला-
विषयक नाटक॥ 34॥
वृन्दावने नाटकेर आरम्भ करिला।
मङ्गलाचरण 'नान्दी-श्लोक' तथाइ लिखिला॥ 35॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने वृन्दावनमें कृष्णलीला-
विषयक नाटकको लिखना आरम्भ किया। उन्होंने उस
नाटक ग्रन्थका मङ्गलाचरण 'नान्दी-श्लोक' वहीं
लिखा॥ 35॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'नान्दी-श्लोक'—नाटकके आरम्भमें
जिस मङ्गलाचरण-श्लोकका पाठ होता है, उसे
'नान्दी'-श्लोक कहते हैं॥ 35॥
अनुभाष्य—'नान्दी'—नाटकचन्द्रिका में—
“प्रस्तावनायास्तु मुखे नान्दी कार्या शुभावहा।
आशीर्नमस्क्रिया-वस्तुनिर्देशान्यतमान्विता॥
अष्टाभिर्दशभिर्युक्ता किंवा द्वादशभिः पदैः।
चन्द्रनामाङ्किता प्रायो मङ्गलार्थ पदोज्ज्वला।
मङ्गलं चक्रकमलचकोरकुमुदादिकम्॥”
[अर्थात् “प्रस्तावनाके प्रारम्भमें नान्दी-कार्य शुभकारी
होता है। आशीर्वाद, नमस्कार और वस्तुनिर्देशसे संयुक्त
नान्दी आठ, दस अथवा बारह पदोंसे युक्त होता है
और प्रायः चन्द्र नामसे अङ्कित होकर मङ्गलसूचक
पदसे शोभित होता है। चक्र, कमल, चकोर, कुमुद
आदि ही मङ्गल हैं।”] साहित्यदर्पण छठे अध्याय 282
संख्यामें—
“आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते।
देवद्विज-नृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता॥”
[अर्थात् “देव, ब्राह्मण, राजा आदिके जिन
आशीर्वाद-सूचक वचनोंसे संयुक्त स्तुति नटगण प्रयोग
किया करते हैं, उससे आनन्द उत्पन्न होता है, इसलिये
वह नान्दी-नामसे कहा जाता है।”]॥ 35॥
अपने छोटे भाईके साथ श्रीरूपकी गौड़देश यात्रा और
सूत्र-आकारमें नाटककी पाण्डुलिपिकी रचना :-
पथे चलि' आइसे नाटकेर घटना भाविते।
कड़चा करिया किछु लागिला लिखिते॥ 36॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी अपने छोटे भाई
श्रीअनुपमके साथ वृन्दावनसे गौड़देशकी ओर चल पड़े।
श्रीरूप गोस्वामी मार्गमें चलते-चलते नाटकमें वर्णन
होनेवाले घटनाओंका चिन्तन करते जा रहे थे और
उन्होंने मार्गमें ही सूत्ररूपमें नाटककी पाण्डुलिपिकी
रचना की॥ 36॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कड़चा'—प्रारूप अथवा
पाण्डुलिपि॥ 36॥
गौड़में श्रीअनुपमको गङ्गाप्राप्ति :-
एइमते दुइभाइ गौड़देशे आइला।
गौड़े आसि' अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति हैला॥ 37॥
अनुवाद—इस प्रकार दोनों भाई गौड़देशमें आ
पहुँचे। गौड़देशमें आनेपर श्रीअनुपमको गङ्गा-प्राप्ति हुई
अर्थात् उनका वहींपर देहत्याग हुआ॥ 37॥

6 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/37-46 ]
अनुभाष्य- 'दुइ भाइ'—श्रीरूप और उनके छोटे
भाई श्रीअनुपम ॥ 37 ॥
श्रीरूपकी पुरीमें महाप्रभुके दर्शनके लिये यात्रा :-
रूप-गोसाञि प्रभुपाशे करिला गमन।
प्रभुरे देखिते ताँर उत्कण्ठित मन ॥ 38 ॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीका मन महाप्रभुके दर्शनके
लिये उत्कण्ठित हो रहा था, इसलिये वे महाप्रभुके पास
जानेके लिये पुरीकी ओर चल पड़े॥ 38 ॥
श्रीअनुपमकी गङ्गाप्राप्ति हेतु विलम्ब होनेके कारण
महाप्रभुके दर्शनोंके लिये जानेवाले गौड़ीय-यात्रियोंके
साथ श्रीरूपका मिलन नहीं होना :-
अनुपमेर लागि' ताँर विलम्ब हइल।
भक्तगण-पाश आइला, लाग् ना पाइल ॥ 39 ॥
अनुवाद-गौड़देशमें श्रीअनुपमके देहत्यागके कारण
श्रीरूप गोस्वामीको विलम्ब हुआ, तब तक गौड़ीय भक्त
पुरीके लिये प्रस्थान कर चुके थे, इसलिये उनकी उन
भक्तोंके साथ भेंट नहीं हो पायी ॥ 39 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'लाग् ना पाइल'—श्रीशिवानन्दादि
भक्तगण महाप्रभुके पास जा रहे हैं, ऐसा सुनकर
श्रीरूपने विचार किया कि वे भी उनके साथ नीलाचल
जायेंगे, किन्तु वे उनके साथ भेंट नहीं कर पाये,
क्योंकि वे पहले ही नीलाचलके लिये चले गये
थे॥ 39 ॥
सत्यभामापुरमें सत्यभामादेवीके उपदेशकी प्राप्ति ही
ललितमाधवकी रचनाके शुभारम्भका मूल कारण :-
उड़िया-देशे 'सत्यभामापुर'—नामे ग्राम।
एक रात्रि सेइ ग्रामे करिला विश्राम ॥ 40 ॥
रात्रे स्वप्ने देखे, -एक दिव्यरूप नारी।
सम्मुखे आसिया आज्ञा दिला कृपा करि' ॥ 41 ॥
“आमार नाटक पृथक् करह रचन।
आमार कृपाते नाटक हबे विलक्षण ॥ ”42 ॥
अनुवाद-उड़ीसा-देशमें 'सत्यभामापुर'-नामक एक
गाँव है। श्रीरूप गोस्वामीने पुरी जाते हुए उस गाँवमें
एक रात्रि विश्राम किया था। उस रात्रिमें उन्होंने एक
स्वप्न देखा कि एक दिव्य रूपवती नारीने उनके
सम्मुख आकर उन्हें कृपापूर्वक आज्ञा देते हुए कहा, -“तुम
मेरे नाटककी पृथक् रूपसे रचना करना, मेरी कृपासे
तुम्हारे द्वारा रचित वह नाटक विलक्षण (उत्कृष्ट)
होगा ॥ ”40-42 ॥
अनुभाष्य-कटक-जिलेके अन्तर्गत जान्कादेइपुरके
निकटमें ही 'सत्यभामापुर'-ग्राम है ॥ 40 ॥
श्रीरूपका मन-ही-मनमें विचार :-
स्वप्न देखि' रूप-गोसाञि करिला विचार।
'सत्यभामार आज्ञा-पृथक् नाटक करिवार ॥ 43 ॥
एकत्र वर्णित व्रज और पुरकी लीलाको पृथक् नाटकोंके
आकारमें वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा :-
व्रज-पुर-लीला एकत्र करियाछि गठन।
दुइ भाग करि' एबे करिमु रचना ॥ '44 ॥
अनुवाद-उस स्वप्नको देखकर श्रीरूप-गोस्वामीने
मनमें विचार किया, - 'श्रीसत्यभामा देवीने मुझे पृथक्
नाटक रचना करनेकी आज्ञा दी है। मैंने तो व्रज तथा
पुरकी लीलाओंको एक ही साथ लिखा है, किन्तु अब
मैं इस नाटकके दो भाग करके ही उनकी रचना
करूँगा ॥ '43-44 ॥
पुरीमें सिद्धबकुल-मठमें ठाकुर-श्रीहरिदासके
वासस्थानपर पहुँचना :-
भाविते भाविते शीघ्र आइला नीलाचले।
आसि' उत्तरिला हरिदास-वासास्थले ॥ 45 ॥
अनुवाद-ऐसा विचार करते-करते श्रीरूप गोस्वामी
शीघ्र ही नीलाचल आ पहुँचे और वे श्रीहरिदास
ठाकुरके वासस्थानपर आये ॥ 45 ॥
ठाकुरकी स्नेहपूर्ण उक्ति :-
हरिदास-ठाकुर ताँरे बहु कृपा कैला।
“तुमि आसिबे, -मोरे प्रभु ये कहिला ॥ ”46 ॥

[ 1/46-55पहला अध्याय7
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने श्रीरूप गोस्वामीपर
बहुत कृपा की और उनसे कहा—"तुम आओगे, —मुझे
महाप्रभुने यह पहलेसे ही बता दिया था॥" 46॥
अकस्मात् श्रीहरिदासको दर्शन देनेके
लिये महाप्रभुका आगमन :—
'उपल-भोग' देखि' हरिदासरे देखिते।
प्रतिदिन आइसेन प्रभु, आइला आचम्बिते॥ 47॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीजगन्नाथके उपलभोगको देखनेके
बाद प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलने आते थे, किन्तु
उस दिन महाप्रभु अकस्मात् ही वहाँ आ गये॥ 47॥
श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम और
महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :—
"रूप दण्डवत् करे", —हरिदास कहिला।
हरिदासे मिलि' प्रभु रूपे आलिङ्गिला॥ 48॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुसे कहा, —"रूप
आपको दण्डवत् प्रणाम कर रहा है।" महाप्रभुने
श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके बाद श्रीरूप-गोस्वामीका
आलिङ्गन किया॥ 48॥
परस्पर संलाप :—
हरिदास-रूपे लञा प्रभु बसिला एकस्थाने।
कुशल प्रश्न, इष्टगोष्ठी कैला कतक्षणे॥ 49॥
अनुवाद—श्रीहरिदास तथा श्रीरूपको लेकर महाप्रभु
एकस्थानपर बैठ गये और उन्होंने श्रीरूपसे उनका
कुशल-क्षेम पूछा तथा कुछ समय तक इष्टगोष्ठी भी
की॥ 49॥
श्रीसनातनके संवादकी जिज्ञासा और श्रीरूपके द्वारा
श्रीसनातनके साथ भेंट नहीं होनेके विषयमें बतलाना :—
सनातनेर वार्त्ता यबे गोसाञि पुछिल।
रूप कहे, —"ताँर सङ्गे देखा ना हइल॥ 50॥
उसके कारणका निर्देश :—
आमि गङ्गापथे आइलाङ, तिँहो राजपथे।
अतएव आमार देखा नहिल ताँर साथे॥ 51॥
श्रीअनुपमकी गङ्गाप्राप्तिका ज्ञापन :—
प्रयागे शुनिलुँ, —तेंहो गेला वृन्दावने।"
अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति कैल निवेदने॥ 52॥
अनुवाद—महाप्रभुने जब श्रीसनातन गोस्वामीके विषयमें
पूछा, तब श्रीरूपने कहा,—"मेरी उनके साथ भेंट नहीं
हो पायी। मैं गङ्गाके पथसे प्रयागकी ओर आया और
वे राजपथसे प्रयागसे ब्रजकी ओर गये, इसलिये मेरी
उनसे भेंट नहीं हो पायी। मैंने प्रयागमें आकर सुना कि
वे वृन्दावन गये हैं।" तत्पश्चात् श्रीरूपने महाप्रभुको
श्रीअनुपमकी गङ्गा-प्राप्तिके विषयमें भी बतलाया॥ 50-52॥
महाप्रभुका प्रस्थान और उनके सङ्गी
भक्तोंके साथ श्रीरूपका मिलन :—
रूपे ताँहा वासा दिया गोसाञि चलिला।
गोसाञिर सङ्गी भक्त रूपेरे मिलिला॥ 53॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीरूपको श्रीहरिदास ठाकुरके
वासस्थानपर ही रहनेका निर्देश देकर चले गये।
महाप्रभुके सङ्गी भक्त श्रीरूप गोस्वामीसे आकर मिले॥ 53॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'ताँहा'—श्रीहरिदास ठाकुरके
वासस्थान अर्थात् सिद्धबकुलमें॥ 53॥
महाप्रभुके द्वारा अगले दिन भक्तोंको
श्रीरूपका परिचय देना :—
आर दिन महाप्रभु सब भक्त लञा।
रूपे मिलाइला सबाय कृपा त' करिया॥ 54॥
अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु समस्त भक्तोंको
अपने साथ लेकर आये और उन्होंने श्रीरूपपर कृपा
करके उन्हें अपने सभी भक्तोंसे मिलवाया॥ 54॥
श्रीरूपके द्वारा समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना,
सभीके द्वारा श्रीरूपका आलिङ्गन :—
सबार चरण रूप करिला वन्दन।
कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥ 55॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने सभी भक्तोंके चरणोंकी

8 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/55–64 ]
वन्दना की और उन सभी भक्तोंने कृपा करके साथ कुछ देर तक इष्टगोष्ठी करके मध्याह्न कृत्य
श्रीरूपका आलिङ्गन किया ॥ 55 ॥ करनेके लिये चले जाते ॥ 60 ॥
श्रीरूपपर कृपा करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीनिताइ महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिसे श्रीरूपको आनन्द :–
और श्रीअद्वैत–दोनों प्रभुओंसे अनुरोध :– एइमत प्रतिदिन प्रभुर व्यवहार।
“अद्वैत, नित्यानन्द, तोमरा दुइजने।” प्रभुकृपा पाञा रूपेर आनन्द अपार ॥ 61 ॥
प्रभु कहे,—“रूपे कृपा कर काय्मने ॥ 56 ॥
तोमा-दुँहार कृपाते इँहार हउ शक्ति। अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन ऐसा ही व्यवहार करते
याते विवरिते पारेन कृष्णरसभक्ति ॥” 57 ॥ थे। महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करके श्रीरूपको अपार
आनन्द होता था ॥ 61 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल–लीला :–
प्रभुसे कहा,—“आप दोनों श्रीरूपपर काय और मनसे भक्तगण लञा कैला गुण्डिचा-मार्जन।
कृपा कीजिये। आप दोनोंकी कृपासे इसमें ऐसी शक्ति आइतोटा आसि' कैला वन्य-भोजन ॥ 62 ॥
सञ्चरित हो जाय, जिससे यह कृष्णरस-भक्तिका वर्णन
कर सके ॥” 56–57 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने रथयात्राके पूर्व दिन अपने
भक्तोंको साथमें लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया
श्रीरूप—महाप्रभुके समस्त भक्तोंकी ही प्रीतिके पात्र :– और फिर उन्होंने सभी भक्तोंके साथ आइतोटामें आकर
गौड़ीया, उड़िया, यत प्रभुर भक्तगण। उद्यान-भोजन (प्रसाद-सेवन) किया ॥ 62 ॥
सबार हइल रूप स्नेहेर भाजन ॥ 58 ॥
अनुभाष्य—‘आइतोटा’—गुण्डिचा मन्दिरके निकट
अनुवाद—महाप्रभुके गौड़ीय, उड़िया आदि जितने स्थित उपवन ॥ 62 ॥
भी भक्त थे, श्रीरूप उन सभीके स्नेहके पात्र बन
गये ॥ 58 ॥ सभी भक्तोंके आनन्दको देखकर श्रीरूप
और श्रीहरिदासको आनन्द :–
स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको प्रतिदिन प्रसाद खाय, 'हरि' बले सर्वभक्तजन।
दर्शन और प्रसाद देना :– देखि' हरिदास-रूपेर हरषित मन ॥ 63 ॥
प्रतिदिन आसि' रूपे करेन मिलने।
मन्दिरे ये प्रसाद पान, देन दुइ जने ॥ 59 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने प्रसाद ग्रहण किया और
‘हरिध्वनि’ दी, इसे देखकर श्रीहरिदास ठाकुर और
अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन आकर श्रीरूपसे मिलते। श्रीरूपके मनमें हर्ष हुआ ॥ 63 ॥
वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जो प्रसाद पाते, उसे वे
श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीरूपको दे देते ॥ 59 ॥ महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्टकी प्राप्तिसे
दोनोंका प्रेमसे नृत्य :–
श्रीरूपके साथ महाप्रभुकी कृष्णकथा :– गोविन्दद्वारा प्रभुर शेष-प्रसाद पाइला।
इष्टगोष्ठी दुइजने करि' कतक्षण। प्रेमे मत्त दुइजन नाचिते लागिला ॥ 64 ॥
मध्याह्न करिते प्रभु करिला गमन ॥ 60 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूप श्रीगोविन्दसे
अनुवाद—महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूपके महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त करके प्रेममें

[ 1/64-71 पहला अध्याय 9
मत्त होकर नृत्य करने लगे ॥ 64 ॥
अगले दिन श्रीरूपके साथ महाप्रभुका मिलन :-
आर दिन प्रभु रूपे मिलिया बसिला।
सर्वज्ञ-शिरोमणि प्रभु कहिते लागिला ॥ 65 ॥
महाप्रभुका कृपा-आदेश ही विदग्धमाधवकी रचनाके
शुभारम्भका मूल कारण :-
“कृष्णेरे बाहिर नाहि करिह व्रज हैते।
व्रज छाड़ि' कृष्ण कभु ना यान काँहाते ॥ 66 ॥
अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु आकर श्रीरूप गोस्वामीसे
मिलकर वहाँ बैठे। तब सर्वज्ञ-शिरोमणि महाप्रभु उनसे
कहने लगे,–“श्रीकृष्णको व्रजसे बाहर मत करना,
श्रीकृष्ण व्रजको छोड़कर कदापि कहीं भी नहीं
जाते ॥ 65-66 ॥
केवलमात्र व्रजमें ही व्रजेन्द्रनन्दनका अवस्थान :-
लघुभागवतामृत (1/5/461)में उद्धृत यामलवचन-
कृष्णोऽन्यो यदुसम्भुतो यस्तु गोपेन्द्रनन्दनः।
वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति ॥”67॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 67 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-यदुकुमार कृष्ण-वासुदेव-तत्त्व
हैं, इसलिये वे-गोपेन्द्रनन्दनसे पृथक् हैं; वे ही मथुरा
और द्वारकामें लीला करते हैं। जो गोपेन्द्रनन्दन हैं, वे
वृन्दावनका परित्यग करके कहीं भी नहीं जाते ॥”67॥
अनुभाष्य-
यदुसम्भूतः (यदुकुलोत्पन्नः) कृष्णः-अन्यः (व्रजेन्द्रनन्दनात्
अपरः); यः तु गोपेन्द्रनन्दनः (नन्दसुतः) सः तु वृन्दावनं
परित्यज्य (विहाय) क्वचित् (कुत्रापि) नैव गच्छति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 67 ॥
महाप्रभुके वाक्यसे श्रीरूपका मन-ही-मनमें विचार :-
एत कहि' महाप्रभु मध्याह्ने चलिला।
रूप-गोसाञि मने किछु विस्मय हइला ॥ 68 ॥
श्रीसत्यभामा-देवी और महाप्रभु, दोनोंका ही पृथक्
रूपसे यथाक्रम ललितमाधव और विदग्धमाधव
नाटक लिखनेके लिये आदेश देना :-
“पृथक् नाटक करिते सत्यभामा आज्ञा दिल।
जानिलुँ पृथक् नाटक करिते प्रभु-आज्ञा हैल ॥ 69 ॥
पहले एकत्र वर्णित दोनों नाटकोंका
अब पृथक् रूपसे चिन्तन और रचना :-
पूर्वे दुइ नाटक छिल एकत्र रचना।
दुइभाग करि एबे करिमु घटना ॥ 70 ॥
नान्दी, प्रस्ताव और विषय आदि सब
कुछका ही पृथक् रूपसे चिन्तन :-
दुइ 'नान्दी'-'प्रस्तावना', दुइ 'संघटना'।
पृथक् करिया लिखि करिया भावना ॥”71॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु मध्याह्न कृत्य करनेके
लिये चले गये। श्रीरूप गोस्वामीके मनमें कुछ विस्मय
हुआ,–“श्रीसत्यभामा देवीने (अपनी पुरलीलाके लिये)
पृथक् नाटककी रचना करनेकी आज्ञा दी थी। अब
यह जाना कि महाप्रभुने भी (वृन्दावन और पुर
लीलाओंके लिये) पृथक् नाटकोंकी रचना करनेकी
आज्ञा दी है। पहले मैं दोनों नाटकोंकी एकसाथ रचना
कर रहा था, किन्तु अब मैं उसे (श्रीकृष्णकी व्रजलीला
और पुरलीला) इन दो भागोंमें विभक्त कर दूँगा। मैं
दोनों नाटकोंके लिये पृथक्-पृथक् 'नान्दी', 'प्रस्तावना'
और 'लीलाओं'का भली-भाँति विचार करके
लिखूँगा ॥”68-71 ॥
अनुभाष्य- 'दुइ भाग'-विदग्धमाधवमें व्रजलीला एवं
ललितमाधवमें पुरलीला,–ये दो भाग हैं। साहित्यदर्पणके
छठे अध्यायके 287 श्लोकमें-
“नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा।
सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते ॥
चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः।
आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा॥”
अर्थात् “नटी, विदूषक अथवा पार्श्ववर्ती नट,-ये

10 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/69-74 ]
सूत्रधारके साथ जहाँ अपने कर्त्तव्यकार्य-विषयक वास्तविक
वृत्तान्तको उठाकर मधुर वचनोंके द्वारा परस्पर सम्पूर्ण
रूपसे आलाप करते हैं, उसीको 'आमुख' जानना होगा,
वही 'प्रस्तावना' (अभिनयके आरम्भ करनेका प्रस्ताव)
है॥ 70-71॥
अमृतानुकणिका-श्रीयुत रूप गोस्वामीने वृन्दावनमें
सेवाकुञ्जके अन्तर्गत श्रीराधा-दामोदर मन्दिरमें अपनी
भजनस्थलीमें 'ललितमाधव' नामक एक नाटक लिखना
आरम्भ किया। वे उस नाटकमें वृन्दावनकी लीला और
पुरकी लीला अर्थात् द्वारकाकी लीलाको मिलाकर एक
साथ लिख रहे थे। श्रीभागवतमें श्रीकृष्णके मथुरा और
द्वारका गमनके पश्चात् व्रजमें लौटकर श्रीराधिका आदि
गोपियोंसे मिलनका कोई वर्णन नहीं है। श्रीरूप गोस्वामी
विरहके बाद मिलन अर्थात् दोनोंका संयोग कराना
चाहते थे और यह बतलाना चाहते थे कि श्रीरुक्मिणी,
श्रीसत्यभामा आदि श्रीराधिका और उनकी सखियोंके ही
प्रकाश विग्रह हैं, पृथक् नहीं है। यह दिखलाकर वे
दोनोंका मिलन करवाना चाहते थे। इसलिये दोनोंका
मङ्गलाचरण-नान्दी श्लोक आदि सबको एक ही करके
लिखते जा रहे थे। जब श्रीरूप गोस्वामी उड़ीसाकी
सीमापर सत्यभामापुरमें आये, तो रात्रिमें विश्राम करते
हुए उन्होंने एक स्वप्न देखा। उस स्वप्नमें श्रीसत्यभामाजीने
उनसे कहा कि तुम पुरकी लीला और वृन्दावनकी
लीलाको एक साथ मिलाकर नहीं लिखना। पुरकी
लीलाको पृथक् रूपमें लिखना। महाप्रभुने भी उनको
कुछ ऐसी ही प्रेरणा दी कि दोनों लीलाओंको एक नहीं
करना अर्थात् व्रजेन्द्रनन्दन कृष्णको व्रजसे बाहर मत
निकालना।
“कृष्णोऽन्यो यदुसम्भूतों यस्तु गोपेन्द्रनन्दनः।
वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति॥”
“यदुकुमार कृष्ण-वासुदेव-तत्त्व हैं, इसलिये
वे-गोपेन्द्रनन्दनसे पृथक् हैं; वे ही मथुरा और द्वारकामें
लीला करते हैं। जो गोपेन्द्रनन्दन हैं, वे वृन्दावनका
परित्याग करके कहीं भी नहीं जाते।”
इसलिये उन गोपेन्द्रनन्दनको द्वारका या मथुरामें
मत ले जाना और मथुरा-द्वारकावाले वासुदेव कृष्णको
व्रजमें मत पहुँचाना।
यह सुनकर श्रीरूप गोस्वामी बहुत प्रसन्न हुए और
उन्होंने ललितमाधव और विदग्धमाधव, उसको दो
खण्डोंमें करके लिखा। उन्होंने वृन्दावनमें सेवाकुञ्जके
अन्तर्गत श्रीराधा-दामोदर मन्दिरमें अपनी भजनस्थलीमें
जहाँसे एक नाटकके रूपमें आरम्भ किया था, वहीं इन
दोनों नाटकोंको पूर्ण किया।-“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण
गोस्वामी महाराज” ॥ 69-71 ॥
विप्रलम्भ-भावमें निमग्न महाप्रभुके मुखसे श्लोकको
सुनकर श्रीरूपके द्वारा उस भावको सूचित
करनेवाले एक श्लोककी रचना :-
रथयात्राय जगन्नाथ-दर्शन करिला।
रथ-अग्रे प्रभुर नृत्य-कीर्त्तन देखिला ॥ 72 ॥
प्रभुर नृत्य-श्लोक शुनि' श्रीरूप-गोसाञि।
सेइ श्लोकार्थ लञा श्लोक करिला तथाइ ॥ 73 ॥
अनुवाद-श्रीरूपने रथयात्रामें भगवान् श्रीजगन्नाथके
दर्शन किये तथा रथके सामने महाप्रभुके नृत्य-कीर्तनको
भी देखा। नृत्य करते समय महाप्रभुके द्वारा एक
श्लोकके पाठको श्रीरूपने सुना और उसी श्लोकके
भावोंके अनुरूप उन्होंने वहीं एक नये श्लोककी रचना
कर दी॥ 72-73 ॥
मध्यलीलाके पहले अध्यायमें वर्णित होनेपर
भी अब पुनः संक्षेपमें वर्णन :-
पूर्वे सेइ सब कथा करियाछि वर्णन।
तथापि कहिये किछु संक्षेपे कथन ॥ 74 ॥
अनुवाद-यद्यपि मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज
गोस्वामीने) पहले मध्यलीलामें इस प्रसङ्गका वर्णन किया
है, तथापि मैं संक्षेपमें इस विषयमें कुछ लिख रहा
हूँ॥ 74 ॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (transcription) दिया गया है:

[ 1/75-80 पहला अध्याय 11

[बायाँ स्तम्भ]
श्रीराधाभावमें निमग्न महाप्रभुके द्वारा उच्चारित
गूढ़-श्लोकका मर्मार्थ एकमात्र श्रीस्वरूप-दामोदरके
अतिरिक्त सभीके लिये दुर्बोध्य :-
सामान्य एक श्लोक प्रभु पड़ेन कीर्तने।
केने श्लोक पड़े—इहा केह नाहि जाने॥ 75॥
अनुवाद—महाप्रभुने कीर्तन करते हुए एक सामान्य
श्लोक पढ़ा। महाप्रभु किस भावसे उस श्लोकको पढ़
रहे थे—इसे कोई भी नहीं जानता था॥ 75॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'केने'—किस भावसे॥ 75॥
उस श्लोकके भावकी द्योतक पदावलीका गान करके
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुका सन्तोष-विधान :-
सबे एका स्वरूप श्लोकेर अर्थ जाने।
श्लोकानुरूप पद करान आस्वादने॥ 76॥
अनुवाद—उस श्लोकका अर्थ एकमात्र श्रीस्वरूप
दामोदर ही जानते थे। वे महाप्रभुके द्वारा उच्चारित
श्लोकोंके भावोंके अनुरूप पदोंका गान करके महाप्रभुको
उनका आस्वादन करवाते थे॥ 76॥
श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके मनके भावोंके
अनुसार श्लोककी रचना :-
रूप-गोसाञि प्रभुर जानिया अभिप्राय।
सेइ अर्थे श्लोक कैला प्रभुरे ये भाय॥ 77॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके द्वारा उस
श्लोकके पाठके अभिप्रायको जान गये। उन्होंने उस
श्लोकके भावके अनुरूप, महाप्रभुके मनभावन एक नये
श्लोककी रचना की॥ 77॥
महाप्रभुके द्वारा उच्चारित श्लोक :-
काव्यप्रकाश (1/4) में, साहित्यदर्पण (1/10)में और
पद्यावली (382)में—
यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा-
स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः।
सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ
रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते॥ 78॥

[दायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती
है,—“जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था,
अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके
साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी
ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका
ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी
भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर
सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित
हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके
तटपर निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम
मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय
विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है॥” 78॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 1/58 संख्या देखें॥ 78॥
पद्यावली (383)में श्रीरूपगोस्वामिकृत-श्लोक :-
प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित-
स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्।
तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे
मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति॥ 79॥
अनुवाद—हे सहचरी! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण
मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही राधा
हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है;
तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमसुरके
आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी
स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है॥ 79॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 1/76 संख्या देखें॥ 79॥
तालपत्रे श्लोक लिखि' चालेते राखिला।
समुद्रस्नान करिवारे रूप-गोसाञि गेला॥ 80॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने श्लोककी रचना करके
उसे एक तालपत्रपर लिखकर अपने वास स्थानपर
फूसकी छतमें उसे फंसाकर रख दिया और समुद्रमें
स्नानके लिये चले गये॥ 80॥

12 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/81-90 ]
महाप्रभुका श्रीरूपकृत श्लोकके पाठसे प्रेमावेश :-
हेनकाले प्रभु आइला ताँहारे मिलिते।
चाले श्लोक देखि' प्रभु लागिला पड़िते ॥ 81 ॥
श्लोक पड़ि' प्रभु सुखे प्रेमाविष्ट हैला।
हेनकाले रूप-गोसाञि स्नान करि' आइला ॥ 82 ॥
अनुवाद-उसी समय महाप्रभु श्रीरूपसे मिलनेके
लिये आये। महाप्रभुने झोपड़ीकी छतमें रखे तालपत्रको
देखा और उसे निकालकर उसपर लिखे श्लोकको
पढ़ने लगे। श्लोकको पढ़कर महाप्रभु आनन्दसे प्रेमाविष्ट
हो गये। तभी श्रीरूप-गोस्वामी स्नान करके आ
गये॥ 81-82 ॥
श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी अकृत्रिम स्नेह-कृपा :-
प्रभु देखि' दण्डवत् प्राङ्गुणे पड़िला।
प्रभु ताँरे चापड़ मारि' कहिते लागिला ॥ 83 ॥
श्रीरूपको गाढ़ आलिङ्गन :-
“गूढ़ मोर हृदय तुमि जानिला केमने?”
एत कहि' रूपे कैला दृढ़ आलिङ्गने ॥ 84 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको देखकर श्रीरूपने प्राङ्गणमें ही
दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभु श्रीरूपको प्रेमसे एक
हल्केसे चपत लगाकर कहने लगे,-“हे रूप! तुमने मेरे
हृदयके गूढ़भावको कैसे जान लिया?” यह कहकर
उन्होंने श्रीरूपका दृढ़ आलिङ्गन किया॥ 83-84 ॥
महाप्रभुके द्वारा अज्ञ होनेका अभिनय करते हुए
श्रीरूपके द्वारा रचित श्लोक दिखलाकर
रहस्यपूर्वक श्रीस्वरूपसे श्रीरूपके द्वारा उनके
मनोभावोंको जाननेके कारणकी जिज्ञासा :-
से-श्लोक लञा प्रभु स्वरूपे देखाइला।
स्वरूपेर परीक्षा लागि' ताँहारे पुछिला ॥ 85 ॥
“मोर अन्तर-वार्त्ता रूप जानिल केमने?”
स्वरूप कहे,-“जानि, कृपा करियाछ आपने ॥ 86 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीरूपकी महाप्रभुकी
कृपा प्राप्तिका अनुमान :-
अन्यथा ए अर्थ कार नाहि हय ज्ञान।
तुमि पूर्वे कृपा कैला, करि अनुमान ॥” 87 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस तालपत्रपर लिखे श्लोकको
लाकर श्रीस्वरूप दामोदरको दिखलाकर उनकी परीक्षा
करनेके लिये उनसे पूछा,-“रूपने मेरे हृदयकी गूढ़
बातको कैसे जान लिया?” श्रीस्वरूप दामोदरने
कहा,-“अवश्य ही आपने रूपपर कृपा की है, अन्यथा
उस श्लोकके अर्थको कोई भी नहीं जान सकता।
इसलिये मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि आपने पूर्वकालमें
इसपर कृपा की होगी॥” 85-87 ॥
स्वरूपसे महाप्रभुके द्वारा प्रयागमें
रूपशिक्षा-वृत्तान्तका वर्णन :-
प्रभु कहे,-“इँहो आमाय प्रयागे मिलिल।
योग्यपात्र जानि मोर कृपा त' हइल ॥ 88 ॥
तबे शक्ति सञ्चारि' आमि कैलुँ उपदेश।
तुमिह कहिओ इँहाय रसेर विशेष ॥” 89 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“यह (रूप) मुझसे प्रयागमें
मिला था। इसे योग्यपात्र जानकर मैंने इसपर कृपा की
थी। तब मैंने इसमें अपनी शक्तिका सञ्चार करके इसे
उपदेश दिया था। हे स्वरूप ! तुम भी इसे उपदेश देना
और विशेषकर रसत्तत्वके विषयमें बतलाना॥” 88-89 ॥
श्रीस्वरूपके अनुमानकी यथार्थता :-
स्वरूप कहे,-“याते एइ श्लोक देखिलुँ।
तुमि करियाछ कृपा, तबँहि जानिलु ॥ 90 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे कहा,-“मैंने
जैसे ही इस श्लोकको देखा, मैं तभी जान गया कि
आपने इसपर कृपा की है॥ 90 ॥

[ 1/91–98 पहला अध्याय 13
फलके द्वारा उसके कारणका अनुमान :-
न्याय-वचन-
“फलेन फलकारणमनुमीयते॥” 91 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 91 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-फलके द्वारा ही फलके कारणका अनुमान होता है॥ 91 ॥
जैसा कारण वैसा कार्य :-
नैषधी (3/17)में दमयन्तीके प्रति हंसवाक्य-
स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां
नाना-मृणालाग्रभुजो भजामः।
अन्नानुरूपां तनुरूपऋद्धिं
कार्यं निदानाद्धि गुणानधीते॥” 92 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 92 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-स्वर्ग-गङ्गाके सुवर्ण-कमलके अग्र भागोंका भोजन करके ही हम उनके समान शरीरके सौन्दर्यको प्राप्त हुए हैं; क्योंकि मूलकारणके अनुरूप ही गुणगण उदित होते हैं॥” 92 ॥
अनुभाष्य-
[हे दमयन्ति,] स्वर्गापगा-हेममृणालिनीनां (स्वर्गाप-गायाः स्वर्गङ्गायाः मन्दाकिन्याः हेममृणालिनीनां स्वर्णतुल्यपद्मानां) नानाम्ॄणालाग्रभुजः (विविध-कोमल-पद्माग्रभोजनशीलाः वयम्) अन्नानुरूपां (भुक्तसदृशीं) तनुरूपऋद्धिं (देहलावण्य-समृद्धिं) भजामः (प्राप्नुमः); हि (यतः) कार्यं (फलं) निदानात् (आदिकारणात्) गुणान् अधीते (प्राप्नोति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 92 ॥
चातुर्मास्यके अन्त होनेपर गौड़ीयगणोंका गौड़में लौटना :-
चातुर्मास्य रहि' गौड़े वैष्णव चलिला।
रूप-गोसाञि महाप्रभुर चरणे रहिला॥ 93 ॥
अनुवाद-गौड़ीय भक्त चातुर्मासके अन्त तक श्रीजगन्नाथ पुरीमें रहकर गौड़देश लौट गये। किन्तु श्रीरूप-गोस्वामी महाप्रभुके चरणोंमें वहीं रह गये॥ 93 ॥
एकदिन श्रीरूपके नाटक लिखते समय महाप्रभुका अकस्मात् आगमन :-
एकदिन रूप करेन नाटक-लिखन।
आचम्बिते महाप्रभुर हैल आगमन॥ 94 ॥
अनुवाद-एकदिन श्रीरूप-गोस्वामी नाटक लिख रहे थे कि अकस्मात् महाप्रभुका वहाँ आगमन हुआ॥ 94 ॥
श्रीरूप और श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका बैठना :-
सम्भ्रमे दुँहे उठि' दण्डवत् हैला।
दुँहे आलिङ्गिया प्रभु आसने बसिला॥ 95 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीरूपने शीघ्रतासे उठकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभु दोनोंको आलिङ्गन करके आसनपर बैठ गये॥ 95 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप-लिखित एक पत्रको उठाना और श्रीरूपकी लिखावटको देखकर सन्तोषकी प्राप्ति :-
'क्या पुँथि लिख?' बलि' एकपत्र निला।
अक्षर देखिया प्रभु मने सुखी हैला॥ 96 ॥
अनुवाद-'कौन-सा ग्रन्थ लिख रहे हो?'—यह कहकर महाप्रभुने एक तालपत्र हाथमें ले लिया। श्रीरूपकी लिखावटको देखकर महाप्रभुका मन बहुत प्रसन्न हुआ॥ 96 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपकी लिखावटकी प्रशंसा :-
श्रीरूपेर अक्षर-येन मुकुतार पाँति।
प्रीत हञा करेन प्रभु अक्षरेर स्तुति॥ 97 ॥
अनुवाद-श्रीरूपके द्वारा लिखे अक्षर मानों मुक्ताओंकी पंक्ति हो। प्रसन्न होकर महाप्रभुने श्रीरूपके द्वारा लिखे अक्षरोंकी बहुत प्रशंसा की॥ 97 ॥
एक श्लोकको देखकर महाप्रभुमें प्रेमावेश :-
सेइ पत्रे प्रभु एक श्लोक देखिला।
पड़ितेइ श्लोक, प्रेमे आविष्ट हइला॥ 98 ॥

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

14 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/98-104 ]
अनुवाद-महाप्रभुने उस पत्रपर लिखे एक श्लोकको
देखा। उस श्लोकको पढ़ते ही महाप्रभु प्रेममें आविष्ट
हो गये॥ 98 ॥
कृष्णनाम-माधुर्यका आस्वादन-सूचक श्लोक :-
विदग्धमाधव (1/15)में नान्दीके प्रति पौर्णमासीका वाक्य-
तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये
कर्णक्रोडकड़म्बिनी घटयते कर्णाबुदेभ्यः स्पृहाम्।
चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं
नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥ 99 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 99 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'कृष्ण' ये दो वर्ण कितने
अमृतके साथ उत्पन्न हुए हैं, मैं उसे नहीं जानती; -देखो,
जब (नर्तकीकी भाँति) वे मुखमें नृत्य करते हैं, तब
बहुतसे मुख प्राप्त करनेके लिये रतिका विस्तार
(अर्थात् आसक्ति वर्धित) करते हैं; जब कर्णकुहरोंमें
प्रवेश करते हैं (अङ्कुरित होते हैं), तब अरबों कानोंके
लिये स्पृहा उत्पन्न होती है; जब चित्तके प्राङ्गणमें
(सङ्गिनीरूपमें) उदित होते हैं, तब समस्त इन्द्रियोंकी
क्रियाओंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं [अर्थात् अपनेमें
आविष्ट करके उन्हें चेष्टाशून्य कर देते हैं] ॥ 99 ॥
अनुभाष्य-
कृष्णः इति वर्णद्वयी कियद्भिः (कियत्परिमितैः) अमृतैः
[सह] जनिता (उत्पादिता), [तत् अहं] नो जाने (न वेद्मि),
[यतः सा हे नान्दीमुखि], तुण्डे (मुखे) ताण्डविनी (ताण्डवं-'पुंनृत्यं
ताण्डवं प्रोक्तं' इति वाक्यात् 'नाट्यं', तत् कुर्वती सती)
तुण्डावली-लब्धये (बहुवदनश्रेणीनां प्राप्तये) रतिं (स्पृहां) वितनुते
(प्रकाशयति); कर्णक्रोडकड़म्बिनी (कर्णपदव्यां कड़म्बिनी अङ्कुरिता
सती) कर्णाबुदेभ्यः (अर्बुदसंख्यामित-कर्णलाभाय) स्पृहां (वाञ्छां)
घटयते; चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी (चेतः एव प्राङ्गणं तस्मिन् सहचरी
सती) सर्वेन्द्रियाणाम् (इन्द्रियसमुहानां) कृतिं (व्यापारं) विजयते
(पराजयते, तदाविष्टं कारयित्वा चेष्टाशून्यं करोति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 99 ॥
श्लोकको सुनकर नामाचार्यका आनन्दसे नृत्य :-
श्लोक शुनि' हरिदास हइला उल्लासी।
नाचिते लागिला श्लोकेर अर्थ प्रशंसि' ॥ 100 ॥
श्लोककी अद्वितीय कृष्णनाम-माहात्म्यकी सूचना :-
“कृष्णनामेर महिमा शास्त्र-साधु-मुखे जानि।
नामेर महिमा ऐछे काँहा नाहि शुनि ॥” 101 ॥
अनुवाद-उपरोक्त श्लोकको सुनकर श्रीहरिदास
ठाकुर उल्लसित होकर नाचने लगे और श्लोकके
भावार्थकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“मैंने शास्त्रोंसे
और साधुओंके मुखसे कृष्णनामकी महिमाको जाना है,
किन्तु आज तक नामकी ऐसी महिमा कहींपर भी नहीं
सुनी ॥” 100-101 ॥
महाप्रभुका मध्याह्न स्नानके लिये गमन :-
तबे महाप्रभु दुँहे करि' आलिङ्गन।
मध्याह्न करिते समुद्रे करिला गमन ॥ 102 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभु दोनोंको (श्रीहरिदास ठाकुर
और श्रीरूपको) आलिङ्गन करके मध्याह्नके स्नानके
लिये समुद्रकी ओर चल दिये ॥ 102 ॥
अन्य एकदिन श्रीस्वरूप-रामानन्द-भट्टादिके साथ
महाप्रभुका श्रीरूपके समीप आगमन :-
आर दिन महाप्रभु देखि' जगन्नाथ।
सार्वभौम-रामानन्द-स्वरूपादि-साथ ॥ 103 ॥
मार्गमें स्वयं अपने श्रीमुखसे श्रीरूपकी प्रशंसा करना :-
सबे मिलि' चलि आइला श्रीरूपे मिलिते।
पथे ताँर गुण सबारे लागिला कहिते ॥ 104 ॥
अनुवाद-अन्य एकदिन महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन
करके श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय तथा
श्रीस्वरूप दामोदर आदिको साथ लेकर श्रीरूपसे मिलनेके
लिये चल पड़े। मार्गमें महाप्रभु सबको श्रीरूपके गुणोंकी
प्रशंसा करने लगे ॥ 103-104 ॥

[ 1/105-111 पहला अध्याय 15
श्रीरूपके द्वारा रचित "प्रियः सोऽयं" और
"तुण्डे ताण्डविनी" श्लोककी प्रशंसा :-
दुइ श्लोक कहि' प्रभुर हैल महासुख।
निज-भक्तेर गुण कहे हञा पञ्चमुख ॥ 105 ॥
श्रीराय और श्रीभट्टसे स्वयं महाप्रभुके
द्वारा श्रीरूपके गुणोंका वर्णन :-
सार्वभौम-रामानन्दे परीक्षा करिते।
श्रीरूपेर गुण दुँहारे लागिला कहिते ॥ 106 ॥
अनुवाद- महाप्रभुको श्रीरूपके द्वारा रचित 'प्रियः
सोऽयं' और 'तुण्डे ताण्डविनी'- इन दो श्लोकोंका पाठ
करके ऐसा आनन्द हुआ कि वे मानो पाँच मुखवाले
होकर अपने भक्तके गुणोंका वर्णन करने लगे। महाप्रभु
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और श्रीरामानन्द रायके द्वारा
श्रीरूपकी परीक्षा करवानेके लिये उन्हें अपने साथ
श्रीरूपके पास लेकर जा रहे थे। महाप्रभु उन दोनोंसे
श्रीरूपके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ 105-106 ॥
भगवान्का भक्तवात्सल्य :-
ईश्वर-स्वभाव'-भक्तेर ना लय अपराध।
अल्पसेवा बहु माने आत्मपर्यन्त प्रसाद ॥ 107 ॥
अनुवाद- ईश्वरका स्वभाव ही ऐसा होता है कि
वे अपने भक्तके अपराधोंको ग्रहण नहीं करते। अपितु
अपने भक्तके द्वारा की गयी थोड़ी-सी सेवाको भी बहुत
मानकर उन्हें स्वयं तकको भी प्रदान कर देते
हैं॥ 107 ॥
अनुभाष्य - 'आत्मपर्यन्त प्रसाद'- आत्माको अर्थात्
स्वयंको प्रदान करने रूपी अनुग्रह तक करते हैं॥ 107 ॥
भक्तके प्रति भगवान्का व्यवहार :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/138) में-
भृत्यस्य पश्यति गुरून्नपि नापराधान्
सेवां मनागपि कृतां बहुधाभ्युपैति।
आविष्करोति पिशुनेष्वपि नाभ्यसूयां
शीलेन निर्मलमतिः पुरुषोत्तमोऽयम् ॥ 108 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ये भगवान् पुरुषोत्तम - अपनी
निर्मल-मति तथा अपने शीलता धर्मके द्वारा इन
सेवकोंके भारी सब अपराधोंको भी नहीं देखते; अति
अल्प सेवाको भी बहुत मानते हैं और स्वयंकी निन्दा
करनेवाले दुर्जनके प्रति भी असूया (दोष-दृष्टि) आविष्कार
(प्रकाश) नहीं करते ॥ 108 ॥
अनुभाष्य -
अयं निर्मलमतिः (निर्मला नैसर्गिक-रागद्वेषादिवर्जिता मतिः
यस्य सः) पुरुषोत्तमः (कृष्णः, - 'कमलेक्षणः' इति पाठान्तरे)
शीलेन (सत्स्वभावेन) भृत्यस्य (किङ्करस्य) गुरून् (महतः)
अपि अपराधान् न पश्यति; मनाक् (ईषत्) अपि कृतां
(अनुष्ठितां) सेवां बहुधा (बहुप्रकारतया) अभ्युपैति (अङ्गीकरोति);
पिशुनेषु (खलेषु दुर्जनेषु वा) अपि अभ्यसूयात् (दोषदृष्टिं) न
आविष्करोति (न प्रकाशयति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥
श्रीरूप और श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुको
उनके गणोंके सहित प्रणाम :-
भक्तसङ्गे प्रभु आइला, देखि' दुइ जन।
दण्डवत् हञा कैला चरण-वन्दन ॥ 109 ॥
अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंके सङ्ग आये हैं,
यह देखकर श्रीरूप और श्रीहरिदास ठाकुरने दण्डवत्
होकर उनके श्रीचरणोंकी वन्दना की ॥ 109 ॥
भक्तोंसे घिरे हुए महाप्रभुके सामने उनसे निम्न
आसनपर दोनोंका दीनतापूर्वक बैठना :-
भक्तसङ्गे कैला प्रभु दुँहारे मिलन।
पिण्डात बसिला प्रभु लञा भक्तगण ॥ 110 ॥
रूप, हरिदास दुँहे बसिला पिण्डातले।
सबार अग्रे ना उठिला पिँड़ार उपरे ॥ 111 ॥
अनुवाद - महाप्रभु अपने भक्तों सहित श्रीरूप और
श्रीहरिदास ठाकुरसे मिले। महाप्रभु भक्तोंको अपने साथ
लेकर चबूतरेके ऊपर बैठ गये। श्रीरूप और श्रीहरिदास

16 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/111-118 ]
ठाकुर-ये दोनों चबूतरेके नीचे बैठे, महाप्रभु और
उनके भक्तोंके साथ ये लोग चबूतरेके ऊपर नहीं
बैठे ॥ 111॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको "प्रियः सोऽयं" श्लोकका पाठ
करनेका आदेश, श्रीरूपकी लज्जा और मौन :-
“पूर्वश्लोक पड़, रूप", प्रभु आज्ञा कैला।
लज्जाते ना पड़े रूप मौन धरिला ॥ 112 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीको आज्ञा दी, - “हे
रूप ! पूर्वश्लोक ('प्रियः सोऽयं') श्लोकका पाठ करो।"
श्रीरूपने लज्जाके कारण उसका पाठ नहीं किया,
केवल मौन धारण करके रहे ॥ 112 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा श्लोकका पाठ, उसके
श्रवणसे सभीको विस्मय :-
स्वरूप-गोसाञि तबे सेइ श्लोक पड़िल।
शुनि' सबाकार चित्ते चमत्कार हैल ॥ 113 ॥
अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने उस
श्लोकका पाठ किया, जिसे सुनकर सभीके चित्तमें
चमत्कार हुआ ॥ 113 ॥
पद्यावली (383) में श्रीरूपगोस्वामी-रचित श्लोक :-
प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित-
स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्।
तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे
मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति ॥ 114 ॥
अनुवाद-हे सहचरी ! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण
मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही राधा
हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है;
तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमस्वरके
आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी
स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है ॥ 114 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 1/76 संख्या देखें ॥ 114 ॥
श्रीरामानन्दादि भक्तोंका अनुमान- महाप्रभुकी कृपाके फलसे
ही श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके भावको जानना :-
राय, भट्टाचार्य बोले, - “तोमार प्रसाद बिना।
तोमार हृदय एइ जानिबे केमने ॥ 115 ॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द राय तथा श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
महाप्रभुसे कहा, - “आपकी कृपाके बिना यह (श्रीरूप)
आपके हृदयके भावको कैसे जान सकता है ?”115 ॥
आमाते सञ्चारि' पूर्वे कहिला सिद्धान्त।
ये-सब सिद्धान्ते ब्रह्मा नाहि पाय अन्त ॥ 116 ॥
ताते जानि-पूर्वे तोमार पाञाछे प्रसाद।
ताहा बिना नहे तोमार हृदयानुवाद ॥” 117 ॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुसे कहा, - “आपने
पहले [गोदावरीके तटपर] मुझमें अपनी शक्तिका सञ्चार
करके मेरे मुखसे उन सब सिद्धान्तोंको कहलवाया था,
जिन्हें ब्रह्मा तक भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते। इसके
द्वारा मैं जान गया कि रूपने भी पूर्वकालमें आपकी
कृपाको प्राप्त किया है, उसके बिना यह आपके
हृदयके गूढ़ भावोंको नहीं कह सकता ॥”116-117 ॥
अनुभाष्य- 'पूर्वे' - [श्रीरायके ऊपर कृपाके लिये]
मध्यलीलाका आठवाँ अध्याय देखें। 'हृदयानुवाद'-मनके
भावोंको कहना ॥ 116-117 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको "तुण्डे ताण्डविनी"
श्लोकका पाठ करनेका आदेश :-
प्रभु कहे, - कह “रूप, नाटकेर श्लोक।
ये श्लोक शुनिले लोकेर याय दुःख-शोक ॥”118 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरूप गोस्वामीसे कहा,- “हे
रूप, तुम अब नाटकके उस श्लोकका पाठ करो, जिसे
सुननेसे लोगोंके दुःख और शोक दूर हो जाते
हैं ॥” 118 ॥

[ 1/119-126 पहला अध्याय 17
[बायाँ स्तम्भ]
पहले स्वरचित श्लोकके पाठ करनेमें
लज्जा, बादमें उसका पाठ :-
बार बार प्रभु ताते आज्ञा यदि दिला।
तबे सेइ श्लोक रूप कहिते लागिला ॥ 119 ॥
अनुवाद—जब महाप्रभुने बार-बार श्रीरूपको उस
श्लोकका पाठ करनेका आदेश दिया, तब श्रीरूप उस
श्लोकको कहने लगे ॥ 119 ॥
विदग्धमाधव (1/15) में—
तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये
कर्णक्रोडकड़म्बिनी घटयते कर्णाबुदेभ्यः स्पृहाम्।
चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं
नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥ 120 ॥
अनुवाद—'कृष्ण' ये दो वर्ण कितने अमृतके साथ
उत्पन्न हुए हैं, मैं उसे नहीं जानती;—देखो, जब
(नर्तकीकी भाँति) वे मुखमें नृत्य करते हैं, तब बहुतसे
मुख प्राप्त करनेके लिये रतिका विस्तार (अर्थात्
आसक्ति वर्धित) करते हैं; जब कर्णकुहरोंमें प्रवेश
करते हैं (अङ्कुरित होते हैं), तब अरबों कानोंके लिये
स्पृहा उत्पन्न होती है; जब चित्तके प्राङ्गणमें (सङ्गिनीरूपमें)
उदित होते हैं, तब समस्त इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर विजय
प्राप्त कर लेते हैं [अपनेमें आविष्ट करके उन्हें
चेष्टाशून्य कर देते हैं] ॥ 120 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला 1/99 संख्या देखें ॥ 120 ॥
श्लोकको सुनकर रामानन्दादि भक्तोंमें
विस्मय और सुख :-
यत भक्तवृन्द आर रामानन्द राय।
श्लोक शुनि' सबार हइल आनन्द-विस्मय ॥ 121 ॥
अनुवाद—श्रीरूपके मुखसे उक्त श्लोकको सुनकर
समस्त भक्तों और श्रीरायरामानन्दको बहुत आनन्द तथा
विस्मय हुआ ॥ 121 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अद्वितीय कृष्णनामकी माधुरीका प्रकाशक श्लोक :-
सबे बोले,—“नाम-महिमा शुनियाछि अपार।
एमन माधुर्य केह वर्णे नाहि आर ॥” 122 ॥
अनुवाद—सभी कहने लगे,—“हमने नामकी अपार
महिमाका श्रवण किया है, किन्तु नामके ऐसे माधुर्यका
वर्णन अन्य किसीने भी नहीं किया ॥” 122 ॥
श्रीराय-रूप-संलाप-वर्णन; श्रीरायके द्वारा
मूल-ग्रन्थके परिचयकी जिज्ञासा :-
राय कहे,—“कोन् ग्रन्थ कर हेन जानि ?
याहार भितरे एइ सिद्धान्तेर खनि ??” 123 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने पूछा,—“तुम ऐसे कौनसे
ग्रन्थकी रचना कर रहे हो जिसके भीतर ऐसे
सिद्धान्तकी खान है?” 123 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा दोनों नाटकोंका परिचय देना :-
स्वरूप कहे,—“कृष्णलीलार नाटक करिते।
व्रजलीला-पुरलीला एकत्र वर्णिते ॥ 124 ॥
आरम्भिया छिला, एबे प्रभु-आज्ञा पाञा।
दुइ नाटक करियाछेन विभाग करिया ॥ 125 ॥
व्रजलीलात्मक-विदग्धमाधव और
पुरलीलात्मक-ललितमाधव :-
विदग्धमाधव आर ललितमाधव।
दुइ नाटके प्रेमरस अद्भुत सब ॥” 126 ॥
अनुवाद—[श्रीरूपके उत्तर नहीं देनेपर] श्रीस्वरूप
दामोदरने कहा,—“रूपने कृष्णलीलापर एक नाटककी
रचना करना आरम्भ किया जिसमें ब्रजलीला और
पुरलीलाका एक साथ वर्णन किया था। किन्तु अब
महाप्रभुकी आज्ञाको प्राप्त करके रूपने उस नाटकके
दो भाग कर दिये हैं। विदग्धमाधव और ललितमाधव—इन
दोनों नाटकोंमें अद्भुत प्रेमरस भरा है ॥” 124-126 ॥
अनुभाष्य—'विदग्धमाधव' 1454 शकाब्दमें और
'ललितमाधव' 1459 शकाब्दमें रचित हुआ। 1437

18 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/126-131 ]
शकाब्दमें इन दोनों ग्रन्थोंके प्रसङ्गमें श्रीराय-रामानन्दके
साथ श्रीरूपगोस्वामीका आलाप हो रहा है॥ 126 ॥
श्रीरूपको श्रीरायके द्वारा विदग्धमाधवके नान्दी
श्लोकके पठनका अनुरोध :-
राय कहे,—“नान्दी-श्लोक पड़ देखि, शुनि ?”
श्रीरूप श्लोक पड़े प्रभु-आज्ञा मानि' ॥ 127 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने श्रीरूपसे कहा,—“तुम
विदग्धमाधव नाटकके नान्दी-श्लोकको पढ़ो जिससे मैं
भी सुनकर देखूँ कि उसमें क्या लिखा है?” इसे
महाप्रभुकी आज्ञा मानकर श्रीरूपने नान्दी-श्लोकका
पाठ किया॥ 127 ॥
अनुभाष्य—अब श्रीरामानन्द श्रीरूपके द्वारा रचित
'विदग्धमाधव' नाटकके विषयकी जिज्ञासा कर रहे
हैं॥ 127 ॥
जगत्के मङ्गलका विधान करनेवाली कृष्णलीला :-
विदग्धमाधवके मङ्गलाचरण (1/1) में—
सुधानां चान्द्रीणामपि मधुरिमोन्माद-दमनी
दधाना राधादिप्रणयघनसारैः सुरभिताम्।
समन्तात् सन्तापोद्गम-विषमसंसार-सरणी-
प्रणीतां ते तृष्णां हरतु हरिलीला-शिखरिणी ॥ 128 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 128 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—यह हरिलीलारूपी श्रीखण्ड
सन्ताप-उत्पादक विषमसंसार-मार्गमें भ्रमणसे जनित आपकी
असत् तृष्णाका सम्पूर्णरूपसे हरण करे। यह हरिलीलारूपी
श्रीखण्ड चन्द्र-सुधाकी मधुरिमासे उत्पन्न मत्तताका दमन
करती है और श्रीराधादिके प्रणयरूपी कर्पूरके द्वारा
विशेष सौरभको धारण किये हुए है॥ 128 ॥
अनुभाष्य—
चान्द्रीणां (चन्द्रसम्बन्धिनीनां) सुधानाम् अपि मधुरिमोन्माददमनी
(मधुरिमोन्मादनाहेतु यः उन्मादः—'अहमेव सर्वतो माधुर्यशालिनी'
इति योऽहङ्कारः तं दमयितुं शीलं यस्याः सा) राधादिप्रणयघनसारैः
(राधादीनां प्रणयाः एव घनसाराः कर्पूराः तैः) सुरभितां
(सौगन्ध्यं, पक्षे मनोहारित्वं) दधाना हरिलीला-शिखरिणी
(हरिलीलारूपा रसाला) समन्तात् (सर्वतः) ते (तव) सन्तापोद्गम-
विषमसंसार-सरणीप्रणीतां (सन्तानाम् आध्यात्मिकादीनाम् उद्गमो
यस्याम् एवम्भूता या विषमा देवनरस्थावरात्व-प्रापक-लक्षणा
संसाररूपा सरणी पन्थाः तत्प्रणीतां तत्पर्यटनजनितां) तृष्णां
हरतु (दूरीकरोतु)।
श्लोक-भावानुवाद—चन्द्र-सुधाके अहङ्कार कि मैं
तो सबसे अधिक माधुर्यशालिनी हूँ, इसको दमन
करनेवाली श्रीराधादिके प्रणयरूपी कर्पूरके द्वारा विशेष
सुगन्ध अथवा मनोहारित्वको धारण किये हुए
हरिलीला-शिखरिणी (हरिलीलारूपी श्रीखण्ड) आप सबकी
आध्यात्मिकादि सन्तापका उत्पादन करनेवाली विषम
(देव-नर-स्थावरादि योनियोंको प्राप्त करानेवाले) संसार-मार्गमें
भ्रमणसे जनित असत् तृष्णाको सम्पूर्णरूपसे दूर करे॥ 128 ॥
श्रीरायके द्वारा श्रीरूपको अपने अभीष्ट देवके
वर्णनका अनुरोध, श्रीरूपकी लज्जा :-
राय कहे,—“कह इष्टदेवेर वर्णन।”
प्रभुर सङ्कोचे रूप ना करे पठन ॥ 129 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“इष्टदेवकी महिमा
वर्णन करनेवाले श्लोकका पाठ करो।” महाप्रभुके
सामने श्रीरूप सङ्कोचवशतः उस श्लोकका पाठ नहीं
कर रहे थे॥ 129 ॥
महाप्रभुका अनुरोधपूर्वक आदेश :-
प्रभु कहे,—“कह ना केने, कि सङ्कोच-लाजे?
ग्रन्थेर फल शुनाइबा वैष्णव-समाजे??” 130 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“बोलते क्यों नहीं, इसमें
कैसा सङ्कोच और लज्जा? ग्रन्थकी रचनाका फल
वैष्णव-समाज भी क्यों न सुने?” 130 ॥
श्रीरूपके द्वारा आशीर्वाद-श्लोकका पाठ, उसे सुनकर
महाप्रभुका बाहरसे कृत्रिम असन्तोष प्रकाशित करना :-
तबे रूप-गोसाञि यदि श्लोक पड़िल।
शुनि' प्रभु कहे,—'एइ अति स्तुति हैल॥' 131 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके ऐसा कहनेपर श्रीरूप-गोस्वामीने

[ 1/131-134
पहला अध्याय
19
जब उस श्लोकको पढ़ा तो उसे सुनकर महाप्रभुने
कहा,—'यह तो अतिस्तुति हो गयी है॥' 131 ॥
विदग्धमाधव (1/2) में—
अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ
समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्।
हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः
सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः ॥ 132 ॥
अनुवाद—सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान्
शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें
स्फूर्ति हो। उन्होंने जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरसका दान
कभी जगत्को नहीं किया, उसी निजभक्तिरूपी सम्पत्तिका
दान करनेके लिये वे परमकुरुणावशतः कलियुगमें
अवतीर्ण हुए हैं॥ 132 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/4 संख्या देखें। श्रीमद्
विश्वनाथ चक्रवर्त्ति-कृत विदग्धमाधव-टीका—
“महाप्रभोः स्फूर्त्तिं बिना हरिलीलारसास्वादानुपपत्तेरिति भावः।
वः युष्माकं हृदयरूपगुहायां शचीनन्दनो हरिः, पक्षे, सिंहः
स्फुरतुः। यः शचीनन्दनः कलौ स्वभक्तिश्रियं स्वभजनसम्पत्तिं
करुणया समर्पयितुमवतीर्णः। कथम्भूताम्?—अनर्पितचरीं केनापि
न अर्पितपूर्वाम्। ननु कपिलादिवादिभिः स्वमात्रादिभ्यो भगवद्भजनं
पूर्वं किं नोपदिष्टम्? तत्राह—सकलरससद्भावेऽपि उन्नत उज्ज्वलः
रसो यस्यां तां भक्तिश्रियम्; तथा चोज्ज्वलरसप्रधाना भक्तिर्नोपदिष्टेति
भावः। कथम्भूतः?—पुरटात् सुवर्णादपि सुन्दरद्युतिसमूहेन सन्दीपितः।
एवं सति पर्वतकन्दरायाम् उदितः सिंहो यथा तत्रस्थान् हस्तिनो
नाशयति, तथा युष्माकं हृदयकन्दरायामुदितः शचीनन्दन-स्वरूपसिंहः
हृद्रोगरूपहस्तिनो नाशयतीति ध्वनिः॥”
[अर्थात् “श्रीचैतन्य महाप्रभुकी स्फूर्तिके बिना
हरिलीलाका रसास्वादन सिद्ध नहीं होता—यही अभिप्राय
है। 'वः' अर्थात् तुम्हारी, हृदयरूपी गुफामें शचीनन्दनरूपी
श्रीहरि, पक्षान्तरमें शचीनन्दन-रूपी सिंहकी स्फूर्त्ति प्राप्त
हो—जो शचीनन्दन कलिकालमें 'स्वभक्तिश्रियम्' अर्थात्
निजभजन-सम्पत्तिको करुणावशतः समर्पण करनेके लिये
अवतीर्ण हुए हैं; वह सम्पत्ति किस प्रकारकी है?
'अनर्पितचरीं' अर्थात् वह किसीके भी द्वारा पहले
अर्पित नहीं की गयी है। यदि कहो, कपिलदेवादिने क्या
अपनी माताको भगवद्भजनका उपदेश नहीं दिया था?
उसके लिये कह रहे हैं कि समस्त रसोंके विद्यमान
होनेपर भी जिसमें उन्नत-उज्ज्वल रस है, वह भक्तिसम्पत्ति
तथा उज्ज्वलरस-प्रधाना भक्ति उपदिष्ट नहीं हुई—यह
भाव है। वे शचीनन्दन कैसे हैं? वे पुरट अर्थात्
सुवर्णकी अपेक्षा भी सुन्दरकान्ति-समूहके द्वारा सम्पूर्ण
रूपसे दैदीप्यमान हैं। इस प्रकारके होकर पर्वतकी
गुफामें उदित सिंह जिस प्रकार वहाँ उपस्थित हाथियोंका
नाश करता है, उसी प्रकार तुम्हारी हृदयगुफामें
श्रीशचीनन्दनरूपी सिंह हृदरोगरूपी हाथीका नाश करें—यही
अभिप्राय है।"]॥ 132 ॥
श्लोकके श्रवणसे भक्तोंके द्वारा प्रशंसा :—
सब भक्तगण कहे श्लोक शुनिया।
कृतार्थ करिला सबाय श्लोक शुनाञा ॥ 133 ॥
अनुवाद—उपरोक्त श्लोकको सुनकर सभी उपस्थित
भक्तोंंने कहा कि तुमने यह श्लोक सुनाकर हम सबको
कृतार्थ कर दिया है॥ 133 ॥
श्रीरायके द्वारा विदग्धमाधवके विविध अङ्गों और
परिचयकी जिज्ञासा, श्रीरूपके द्वारा नाटकमें लिखित
श्लोकोंका पाठ करके उत्तर देना :—
राय कहे,—“कोन् आमुखे पात्र-सन्निधान?”
रूप कहे,—“कालसाम्ये 'प्रवर्त्तक' नाम॥” 134 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने पूछा,—“कौन सी
प्रस्तावनाको उपलक्ष्य करके पात्रकी सर्वप्रथम रङ्गमञ्चपर
उपस्थिति हुई है?” श्रीरूपने कहा,—“कालसाम्यमें अर्थात्
'प्रवर्त्तक'–नामक प्रस्तावनाको उपलक्ष्य करके पात्रका
रङ्गमञ्चपर प्रवेश हुआ है॥” 134 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अभिनयकारी नायकादिके (नाटकमें
उल्लिखित व्यक्तियोंके) नाम—'पात्र' कहलाते हैं; जैसे,
साहित्यदर्पणके छठे अध्यायके 283 (27) श्लोकमें—
“दिव्यमर्त्यं स तद्रूपो मिश्रमन्यतरस्तयोः।
सूचयेद्वस्तु बीजं वा मुखं पात्रमथापि वा॥”

20 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/134-136 ]
[अर्थात् “यदि नाटक देवताके विषयमें होता है,
तब वह नट देवताके रूपमें, मनुष्य-विषयक होनेपर
मनुष्यके रूपमें और स्वर्ग-मर्त्य दोनों-विषयक होनेपर
देवता और मनुष्य, जिस-किसी एक रूपमें वस्तुबीज
अथवा आमुख या फिर पात्रकी सूचना करेगा।”]
'आमुख'-शब्दका अर्थ, -जैसे, नाटकचन्द्रिका (20) में-
“सूत्रधारो नटी ब्रूते स्वकार्यं प्रतियुक्तितः।
प्रस्तुताक्षेपिचित्रोक्त्या यत्तदामुखमीरितम्॥”
[अर्थात् “सूत्रधार चतुरायीसे प्रस्तुत-विषयकी विचित्र
उक्तिके द्वारा जो अपना कार्य नटीको बतलाते हैं, वही
'आमुख' कहलाता है।"]
श्रीरामानन्द रायकी जिज्ञासाका तात्पर्य यह है कि
इस नाटकमें अभिनेता पात्रादिका सन्निधान (रङ्गमञ्चमें
उपस्थिति) कौनसे 'आमुख'से ('प्रस्तावना'से) हुआ है?
श्रीरूपका उत्तर, - कालसाम्ये (उपस्थित उस समयमें)
'प्रवर्त्तक'-रूपी (रङ्गमञ्चमें प्रवेश-रूपी) आमुखमें ही
पात्रकी उपस्थिति हुई है ॥ 134 ॥
अनुभाष्य - अन्त्य-लीलाके प्रथम अध्यायकी 71
संख्या [एवं उसका अनुभाष्य] देखें। आमुख अथवा
प्रस्तावना-पाँच प्रकारकी होती है; जैसे, साहित्य
दर्पणके छठे अध्यायके 288 (33) वें श्लोकमें,-
“उद्घात्यकः कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा।
प्रवर्त्तकावलगिते पञ्च प्रस्तावना-भिदाः॥”
अर्थात् (1) उद्घात्यक, (2) कथोद्घात, (3)
प्रयोगातिशय, (4) प्रवर्त्तक, (5) अवलगित, - इन पाँच
प्रकारसे नाटकका 'आमुख' अथवा 'प्रस्तावना' होती है।
नाटकचन्द्रिका (21-22) में,-
“त्रीण्यामुखाङ्गान्युच्यन्ते कथोद्घात-प्रवर्त्तकम् ॥ 21 ख ॥
प्रयोगातिशयश्चेति तथा वीथ्यङ्गयुग्मकम्।
उद्घात्यकावलगितसंज्ञकं मुनिनोदितम् ॥”22 ॥
[अर्थात् “आमुखके तीन अङ्ग-(1) कथोद्घात,
(2) प्रवर्त्तक, (3) प्रयोगातिशय एवं (4) उद्घात्यक
और (5) अवलगित-ये दो वीथ्यङ्ग होते हैं। भरत
मुनिने आमुखके ये ही पाँच अङ्ग बतलाये हैं।"]
श्रीरामानन्दने जिज्ञासा की, - “इन कई प्रकारकी
प्रस्तावनाओंमें-से कौन-से प्रकारसे नाटककी प्रस्तावना
लिखी गयी है?” उसके उत्तरमें श्रीरूप गोस्वामीने
कहा, - “उक्त कई प्रकारकी प्रस्तावनाओंमें 'प्रवर्त्तक'-प्रकारको
ग्रहण किया गया है।” साहित्य-दर्पणके छठे अध्यायके
292 (37) वें श्लोकमें,-
“कालं प्रवृत्तमाश्रित्य सूत्रधृग्यत्र वर्णयेत्।
तदाश्रयश्च पात्रस्य प्रवेशस्तत् प्रवर्त्तकम् ॥”
अर्थात् “सूत्रधार उपस्थित जिस कालको आश्रय
करके वर्णन करते हैं, यदि उसी कालके आश्रयमें
नटरूपी पात्रका प्रवेश होता है, तब उसे 'प्रवर्त्तक'
कहते हैं॥” 134 ॥
नाटकचन्द्रिका (24) में-
आक्षिप्तः कालसाम्येन प्रवेशः स्यात् प्रवर्त्तकः ॥ 135 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 135 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- उपयुक्त (उपस्थित) कालके
द्वारा आक्षिप्त (प्रेरित) होकर (नटरूपी पात्रके) रङ्गमञ्चपर
प्रवेशको 'प्रवर्त्तक' कहते हैं॥ 135 ॥
अनुभाष्य-
कालसाम्येन (प्रवृत्तकालाश्रयेण) आक्षिप्तः (प्रेषितः सन्
उपस्थितं कालम् आश्रित्येत्यर्थः) पात्रस्य (नटस्य) प्रवेशः
(एव, 'प्रवृत्तिः' इति वा पाठः) 'प्रवर्त्तक' स्यात्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 135 ॥
उसका उदाहरण जैसे :-
विदग्धमाधव (1/10) में पारिपार्श्विकके
प्रति सूत्रधारकी उक्ति-
सोऽयं वसन्तसमयः समियाय यस्मिन्
पूर्णं तमीश्वरमुपोढ-नवानुरागम्।
गूढ़ग्रहा रुचिरया सह राधयासौ
रङ्गाय सङ्गमयिता निशि पौर्णमासी ॥ 136 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 136 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वसन्तकाल उदित हुआ है;

[ 1/136-138 पहला अध्याय 21

पौर्णमासी [देवी] रात्रिमें इस समय नव-अनुरागको प्राप्त
पूर्णतम ईश्वर श्रीकृष्णको लीला-सौन्दर्यके सम्वर्धन
करनेके उद्देश्यसे परम सुन्दरी श्रीराधिकाके साथ
मिलायेंगी। इस श्लोकका अर्थ दो प्रकारका है-अर्थात्,
चन्द्रपक्षमें एवं श्रीकृष्णपक्षमें, इनमेंसे श्रीकृष्णपक्षवाला
अर्थ ही मुख्य है॥ 136 ॥
अनुभाष्य-
यस्मिन् (वसन्त-समये) असौ गूढ़ग्रहा (चन्द्रज्योत्स्ना-
तिशयेन गूढ़ाः आवृतरश्मयः ग्रहाः यस्यां सा) पौर्णमासी
(तिथिः) निशि उपोढ़नवानुरागम् (उपोढ़ः प्राप्तः नवः अनुगतः
रागः रक्तिमा येन तं) पूर्णं तमीश्वरं (तम्याः रजन्याः ईश्वरं
चन्द्रं) रुचिरया (शोभनया) राधया (विशाखा-नक्षत्रेण सह)
रङ्गाय (शोभार्थं) सङ्गं (सङ्गमम्) अयिता (प्रापयिता), सः
अयं वसन्तसमयः समियाय (समुपागतः-एतेन कालवैशिष्ट्यमुक्तम्;
पक्षे-गूढ़ः ग्रहः आग्रहः यस्याः सा भगवती पौर्णमासी, तं
प्रसिद्धं पूर्णम् ईश्वरं श्रीकृष्णं रुचिरया शोभनया राधया सह
रङ्गाय कौतुकरहस्यम् आविष्कर्त्तुं सङ्गमयिता)।
श्लोक-भावानुवाद-[चन्द्रपक्षीय अर्थ-] जिस
वसन्त-कालमें चन्द्रकी अतिशय गाढ़ ज्योत्स्नाने अन्य
ग्रहसमूहकी रश्मिको आवृत कर लिया है, वह पौर्णमासी
(पूर्णिमा तिथि) नवीन रक्तिमाको प्राप्त परिपूर्ण रजनीके
ईश्वर अर्थात् चन्द्रको अत्यन्त सुन्दर विशाखा नक्षत्रके
साथ सुशोभित करनेके लिये उनका सङ्गम करवायेगी,
वह वसन्तकाल उपस्थित हुआ है।
[श्रीकृष्णपक्षीय अर्थ-] यह वही वसन्तकाल उपस्थित
हुआ है, जिसमें नवीन-अनुराग प्राप्त परिपूर्ण ईश्वर
श्रीकृष्णचन्द्रका शोभा-सम्पन्ना श्रीराधाके साथ
कौतुक-रहस्यको प्रकट करनेका अतिशय आग्रह रखनेके
कारण स्वयं भगवती पौर्णमासी रात्रिकालमें मिलन
करवायेंगी॥ ॥ 136॥
राय कहे,-"परोचनादि कह देखि, शुनि?"
रूप कहे,-"महाप्रभुर श्रवणेच्छा जानि॥" 137 ॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा,-"कहो, तुमने
परोचना आदिके विषयमें क्या लिखा है? मैं उसे सुनना
चाहता हूँ।" महाप्रभुकी भी श्रवणकी इच्छा जानकर
श्रीरूप कहने लगे॥ 137 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'परोचना' - देश, काल, नायक,
उपस्थित लोगों आदिकी प्रशंसाके द्वारा श्रोताओंको
श्रवणका इच्छुक बनानेकी प्रथा ही 'परोचना' है॥ 137 ॥
अनुभाष्य-परोचना,- (नाटकचन्द्रिका 19में) -
“देशकालकथा-वस्तु-सभ्यादीनां प्रशंसया।
श्रोतॄणामुन्मुखीकारः कथितयेयं परोचना॥”
[अर्थात् “देश-काल-कथा, वस्तु और उपस्थित
श्रोताओंकी प्रशंसाके द्वारा श्रोताओंको उन्मुख कराना ही
परोचना कहलाता है।”]
साहित्यदर्पणके छठे अध्यायके 286 (30)वें श्लोकमें-
“तस्याः परोचना वीथी तथा प्रहसनामुखे।
अङ्गान्यत्रोन्मुखीकारः प्रशंसातः परोचना॥”
[अर्थात् "परोचना, वीथी, प्रहसन और आमुख-इन
चारों अङ्गोंमें-से कविके काव्य और उपस्थित श्रोताओं
आदिकी प्रशंसा करके श्रोताओंको अभिनयके विषयमें
आकृष्ट करनेको परोचना कहा जाता है।"]
“प्रस्तुताभिनयेषु प्रशंसातः श्रोतॄणां प्रवृत्त्युन्मुखीकरणं परोचना”
अर्थात् “प्रशंसाके द्वारा श्रोताओंकी प्रवृत्तिको [प्रस्तुत
अभिनयकी ओर] उन्मुख करनेका नाम ही 'परोचना'
है॥" 137 ॥
विदग्धमाधव (1/8)में सूत्रधारके
प्रति पारिपार्श्विककी उक्ति :-
भक्तानामुद्गादनर्गलधियां वर्गो निसर्गोज्ज्वलः
शीलैः पल्लवितः स वल्लववधूबन्धोः प्रबन्धोऽप्यसौ।
लेभे चत्वरताञ्च ताण्डवविधेर्वृन्दाटवीगर्भभू-
र्मन्ये मद्ध्विपुण्यमण्डलपरीपाकोऽयमुन्मीलति ॥ 138 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 138 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अनर्गल-बुद्धि (चतुर) और
उज्ज्वल स्वभावके भक्तगण उपस्थित हुए हैं; गोपवधुओंके
प्राणनाथ श्रीकृष्ण-विषयक यह प्रबन्ध भी अनेक गुणोंसे
पल्लवित है; दूसरी ओर, यह रङ्गमञ्च भी वृन्दावनमें

22 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/138-140 ]
स्थित रासमण्डलकी नृत्यविधिका आङ्गन स्वरूप है;
इसलिये मैं सोचता हूँ कि मेरे जैसे व्यक्तियोंकी
सुकृतिसमूहकी यह परिपक्व-अवस्था प्रकाशित हुई
है॥138॥
अनुभाष्य—
अनर्गलधियाम् (अप्रतिहतबुद्धीनां चतुराणां) भक्तानां
निसर्गोज्ज्वलः (स्वरूपतः एव उज्ज्वलः) वर्गः (समूहः)
उद्गात् (उदयं प्राप्तवान्—एतेन पात्रवैशिष्ट्यमुक्तम्); [एवं]
वल्लववधूबन्धोः (श्रीकृष्णस्य) सः असौ (विदग्धमाधवस्वरूपः)
प्रबन्धः अपि शीलैः (स्वभावोक्त्यलङ्कारैः) पल्लवितः (विस्तारितः);
[तथा च अत्र ग्रन्थे सर्वमेव वर्णनं स्वभावोक्त्यलङ्कारमयम्—
एतेन वस्तुवैशिष्ट्यमुक्तम्], वृन्दाटवीगर्भभूः (वृन्दाटव्याः
रासपीठस्वरूपा गर्भभूमिः) ताण्डवविधेः (नृत्यविधेः) चत्वरताम्
(अङ्गनतां, नृत्यस्थलतां वा) लेभे (प्राप्तवती,—एतेन
देशवैशिष्ट्यमुक्तम्; अतः) अयं मद्विधपुण्यमण्डलपरीपाकः (मद्विधानां
मादृशजनानां पुण्यमण्डलस्य सुकृतिनिचयस्य परीपाकः उत्कर्षः)
उन्मीलति (प्रकाशते)।
श्लोक-भावानुवाद—चतुर और उज्ज्वल स्वभावके
भक्तगण उपस्थित हुए हैं [यह पारिपार्श्विकके द्वारा श्रोता
भक्तोंके वैशिष्ट्य सम्बन्धी उक्ति है]; गोपवधुओंके
प्राणनाथ श्रीकृष्ण-विषयक यह प्रबन्ध (विदग्धमाधव
स्वरूप) भी स्वभावोक्ति अलङ्कारसे विस्तारित है [इस
ग्रन्थका वर्णन सम्पूर्णरूपसे स्वभावोक्ति-अलङ्कारमें ही
है—यह वस्तु-वैशिष्ट्यकी उक्ति है]; यह रङ्गमञ्च भी
वृन्दावनमें स्थित रासमण्डलकी नृत्यविधिका आङ्गन
स्वरूप है अर्थात् ऐसी नृत्यस्थली प्राप्त हुई है [यह
स्थानके वैशिष्ट्यकी उक्ति है]; मेरे जैसे व्यक्तियोंकी
सुकृतिसमूहकी यह परिपक्व-अवस्था प्रकाशित हुई
है॥138॥
विदग्धमाधव (1/6)में पारिपार्श्विकके
प्रति सूत्रधारकी उक्ति :—
अभिव्यक्ता मत्तः प्रकृतिलघुरूपदपि बुधा
विधात्री सिद्धार्थान् हरिगुणमयी वः कृतिरियम्।
पुलिन्देनाप्यग्निः किमु समिधमुन्मथ्य जनितो
हिरण्यश्रेणीनामपहरति नान्तःकलुषताम्॥139॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥139॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे पण्डितगण, स्वभावतः ही
मुझ जैसे लघु व्यक्तिके द्वारा भी यह हरिगुण वर्णन
करनेवाली रचना अभिव्यक्त (प्रकटित) होकर आपके
मनोरथकी सिद्धिका विधान करे। (अति नीचजाति)
पुलिन्दके द्वारा लकड़ीके सङ्घर्षणसे उत्पन्न अग्नि क्या
स्वर्ण जातीय धातुओंके भीतर स्थित मैलका नाश नहीं
कर सकती? 139॥
अनुभाष्य—
भोः बुधाः (सभ्याः) प्रकृतिलघुरूपात् (प्रकृत्या स्वभावेन
लघुस्वरूपात् वराकात्; सरस्वती तु ग्रन्थकर्तुः तद् दैन्यमसहमाना
तं रूपगोस्वामिनं स्तौति—प्रकृष्टां कृतिं लघु शीघ्रं रूपयति
निरूपयति इति निवध्नाति इत्यर्थः) मत्तः (सकाशात्) अभिव्यक्ता
(प्रकाशिता) इयं हरिगुणमयी (तद् वर्णनमयीत्यर्थः) कृतिः
(विदग्धमाधवनाटकरूपिणी कविता) अपि वः (युष्मान्) सिद्धार्थान्
(सिद्धमनोरथान् अभिलषितान्) विधात्री (विधातुं शीलं अस्याः
इति विधानं कुर्यात् इत्यर्थः, यतः) पुलिन्देन (अतिनीचास्पृश्य-
जातिना) अपि समिधं (काष्ठम्) उन्मथ्य जनितः (मथनेन
सङ्घर्षणेन वा जातः) अग्निः अपि हिरण्यश्रेणीनां (सुवर्णसमूहानाम्)
अन्तःकलुषतां किमु न अपहरति (दूरीकरोति?—तथा च
युष्माकमप्यन्तर्विरहदुःखमेषा कृतिर्पहरत्येवेत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद—हे पण्डितगण! स्वभावसे लघु
(ऐसा मानकर श्रीरूप गोस्वामी ग्रन्थकी रचनाके लिये
सरस्वतीदेवीसे दीनतापूर्वक स्तुति कर रहे हैं कि हरिगुण
वर्णनकी उत्तम रचनाको मैं शीघ्र और भली-भाँति पूर्ण
कर पाऊँ) मेरे द्वारा प्रकाशित यह हरिगुणमयी कृति
विदग्धमाधव नाटकरूपिणी कविता आपकी अभिलाषा
पूर्ण करनेका विधान करे। अतिनीच-अस्पृश्य-जातिके
पुलिन्दके द्वारा लकड़ीके सङ्घर्षणसे उत्पन्न अग्नि क्या
स्वर्ण जातीय धातुओंके भीतर स्थित मैलका नाश नहीं
कर सकती?—[उसी प्रकार यह कविता आपके अत्यन्त
विरहजनित दुःखको दूर करे—यह अर्थ है]॥139॥
राय कहे,—“कह देखि प्रेमोत्पत्ति-कारण ?
पूर्वराग, विकार, चेष्टा, कामलिखन ?? ” 140 ॥
अनुवाद—श्रीरायने कहा,—“कहो, तुमने प्रेमोत्पत्तिके

[ 1/140-142 पहला अध्याय 23 ]
कारण जैसे पूर्व्वानुराग, विकार, चेष्टा तथा काम-लिखन
आदिके विषयमें क्या लिखा है?॥"140॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पूर्व्वानुराग'—पूर्वराग; 'विकार'—
प्रणयविकार (दिव्योन्माद-जनित व्याधि); 'चेष्टा'—प्रेमसे
उत्पन्न दैहिक क्रिया; 'कामलिखन'—गोपियोंके प्रेम-प्रकाशिका
लिपि। श्रीराय-रामानन्द प्रभुके द्वारा उस प्रेमकी उत्पत्तिके
कारणकी जिज्ञासा करनेपर श्रीरूपने इन सबका वर्णन
किया॥140॥
अनुभाष्य—'कामलिखन'—(उज्ज्वलनीलमणिमें विप्रलम्भ
प्रकरणमें 26 वाँ श्लोक)—
“स लेखः कामलेखः स्यात् यः स्वप्रेमप्रकाशकः।
युवत्या यूनि यूना च युवत्यां संप्रहीयते॥”
[अर्थात् “अपने प्रेमको ज्ञापन करते हुए वह लेख
या पत्र जो नायक नायिकाको और नायिका नायकको
भेजती है, उसे कामलेख कहते हैं।”]॥140॥
क्रमे श्रीरूप-गोसाञि सकलि कहिल।
शुनि' प्रभुर भक्तगणेर चमत्कार हैल॥141॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने क्रमशः सभीका वर्णन
किया। उसे सुनकर महाप्रभुके सभी भक्तोंको बहुत
आश्चर्य हुआ॥141॥
उसमें रतिकी उत्पत्तिका हेतु जैसे :—
विदग्धमाधव (2/9)में श्रीललिता और
श्रीविशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति—
एकस्य श्रुतमेव लुम्पति मतिं कृष्णेति नामाक्षरं
सान्द्रोन्माद-परम्परामुपनयत्यन्यस्य वंशीकलः।
एष स्निग्धघनद्युतिर्मनसि मे लग्नः पटे वीक्षणात्
कष्टं धिक् पुरुषत्रये रतिरभून्मन्ये मृतिः श्रेयसी॥142॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥142॥
अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वरागप्राप्त श्रीराधिका कह रही
हैं,—किसी एक परपुरुषका 'कृष्ण' नामाक्षर श्रवण
करके मेरी मति लुप्त हो गयी है; अन्य किसी एक
पुरुषकी वंशीध्वनि मेरे हृदयमें घन उन्मादको उदित
करा रही है; और चित्रपटमें अन्य एक पुरुषकी स्निग्ध
घनकान्ति देखनेके समयसे ही, वह मेरे हृदयमें ही बस
गयी है। हा धिक्कार, मेरी क्या तीन पृथक् पुरुषोंमें ऐसी
रति हो गयी है? मेरा मर जाना ही अच्छा है॥142॥
अनुभाष्य—
[हे सखि,] एकस्य (परपुरुषस्य) 'कृष्ण' इति नामाक्षरं
श्रुतम् एव [मम राधायाः] मतिं (स्त्रीजनोचितां पातिव्रत्यबुद्धिं)
लुम्पति (छिनत्ति,—प्रथमं कृष्णनामाक्षर-मात्रं श्रुत्वा परम-
मधुरत्वेनानुभूय तन्नामिनि कृष्णे रतिमुवाहेत्यर्थः); अन्यस्य
(द्वितीयस्य पुरुषान्तरस्य) वंशीकलः (मुरलीध्वनिः) [श्रुतः
सन्] सान्द्रोन्मादपरम्परां (घनीभूत-दिव्योन्मादधाराम्) उपनयति
(प्रापयति,—ततश्च वंशीनादं परम-मधुरत्वेनास्वाद्य तद्वंशीवादिनि
रतिमुवाहेत्यर्थः); पटे वीक्षणात् हेतोः एषः (अपरः तृतीय-
पुरुषान्तरः) स्निग्धघनद्युतिः (प्रीतिप्रदमेघप्रभः) मे (मम) मनसि
(हृदये) लग्नः (एकीभूतः संसक्तः, सङ्गतः भवति; ततश्च
कृष्णाकारं चित्रं नेत्राभ्यां सकृदेवास्वाद्य तद्भेद्रेन तस्मिन्
रतिमुवाहेत्यर्थः); धिक् कष्टं भोः, पुरुषत्रये (कृष्णाभिधे,
मुरलीनिनादकारिणि, इन्द्रनील-घनश्यामरूपिणि नायकत्रये
कुलाङ्गनायाः मम प्रथमं तावत् परपुरुषे रतिरेवायोध्या, किमुत
तत्तत्रये) मम रतिः अभूत्; [अतः हेतोः] मृतिः (मृत्युः एव)
श्रेयसी (कल्याणास्पदम् इति) मन्ये [मृत्युं बिना दुष्परिहरेयं
रतिर्धिक्कारिणीयेवेति भावः]।
श्लोक-भावानुवाद—[हे सखि,] परपुरुषके 'कृष्ण'
इस नामाक्षरको श्रवण करके ही [मुझ राधाकी] स्त्रियोंके
लिये उचित पातिव्रत्य धर्म पालनकी बुद्धि लुप्त हो गयी
(सर्वप्रथम कृष्णनाम अक्षर-मात्र श्रवणसे ही उसकी
परम मधुरताको अनुभव करके उस नामवाले कृष्णमें
मेरी रति उत्पन्न हो गयी—यह अर्थ है); दूसरे अन्य
पुरुषकी मुरलीध्वनिको श्रवण करके मैंने
घनीभूत-दिव्योन्माद-धाराको प्राप्त किया (और तब
वंशीनादको परम-मधुरतासे आस्वादन करते हुए उस
वंशीवादकमें मेरी रति उत्पन्न हो गयी—यह अर्थ है);
चित्रपटमें देखकर ही प्रेमप्रद इस मेघकी कान्तिवाले
अन्य तीसरे पुरुषकी कान्ति देखते ही मेरे हृदयमें बस