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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

लोगों सहित चन्दन देकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी विदायी :-
एक विप्र, एक सेवक, चन्दन वहिते।
पुरी-गोसाञिर सङ्गे दिल सम्बल-सहिते ॥ 152 ॥

**अनुवाद—**श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीजगन्नाथदेवके सभी सेवकों
और महन्तोंको श्रीगोपालका (प्रकट होने और चन्दन
मँगवानेका) सब वृत्तान्त कह सुनाया। 'श्रीगोपालने
चन्दन मँगवाया है'—यह सुनकर श्रीजगन्नाथदेवके सभी
भक्त आनन्दपूर्वक चन्दन संग्रह करनेका प्रयास करने
लगे। राज-कर्मचारियोंके साथ जिन-जिनका परिचय था,
उन्होंने उनसे माँगकर कर्पूर-चन्दन इकट्ठा किया।
उन्होंने एकत्रित चन्दन-कर्पूर श्रीमाधवेन्द्रपुरीको दिया
और उसे उठाकर ले जानेके लिये साथमें एक ब्राह्मण
और एक सेवकको दिया। मार्गमें सबके व्ययके लिये
उन्होंने कुछ धन भी भेंट दिया ॥ 149-152 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'कर्पूर'—श्रीकर्पूर, जिससे
श्रीजगन्नाथदेवकी आरती होती है। श्रीजगन्नाथके सेवकोंने
राजकर्मचारियोंसे उस श्रीकर्पूर और मलयज चन्दनको
संग्रह करके पुरी गोसाईंके साथ एक ब्राह्मण और एक
सेवकको भेजा और सबके लिये रास्तेका खर्चा भी
दिया ॥ 152 ॥

अनुभाष्य—'सम्बल'—मार्गमें होने वाला खर्चा ॥ 152 ॥

**अमृतानुकणिका—**उस समय श्रीकर्पूर श्रीजगन्नाथकी
आरती और चन्दन उनके श्रीअङ्गोंमें लेपन करनेके
लिये प्रयोग किये जाते थे। ये दोनों वस्तुएँ राजाके
अधिकारमें होती थीं और सर्व-साधारणको उपलब्ध
नहीं थीं। इसलिये सब भक्त और श्रीजगन्नाथके सेवक
राजकर्मचारियोंसे मिले और उन्हें सब बात बतलायी
कि ये दोनों वस्तुएँ श्रीगोपालकी सेवाके लिये चाहिये।
इस प्रकार उन्होंने श्रीकर्पूर और चन्दनको नीलाचलसे
बाहर ले जानेकी अनुमति प्राप्त की ॥ 150-152 ॥

विघ्नरहित जानेके लिये अनुमति-पत्र देना :-
घाटी-दानी छाड़ाइते राजपात्र-द्वारे।
राजलेखा करि' दिल पुरी-गोसाञिर करे ॥ 153 ॥

**अनुवाद—**मार्गमें घाटी-दानी उनसे कर न माँगे,
इस उद्देश्यसे राजकर्मचारियोंने राजाका अनुमति-पत्र भी
श्रीमाधवेन्द्रपुरीके हाथमें दिया ॥ 153 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'घाटी'—जो पथका शुल्क (कर)
लेता है। 'दानी'—जो पार करानेका पैसा लेता है। उन
सभीको छुड़ानेके लिये अर्थात् उनको पैसा दिये बिना
ही जानेके लिये राजकर्मचारियोंके द्वारा लिखे गये
राजपत्रको अर्थात् फरमानको पुरी गोसाईंके हाथमें दे
दिया ॥ 153 ॥

रेमुणामें पहुँचना और गोपीनाथके दर्शनसे नृत्य-गीत :-
चलिल माधवपुरी चन्दन लञा।
कतदिने रेमुणाते उत्तरिल गिया ॥ 154 ॥
गोपीनाथ-चरणे कैल बहु नमस्कार।
प्रेमावेशे नृत्य-गीत करिला अपार ॥ 155 ॥
पुरी देखि' सेवक सब सम्मान करिल।
क्षीरप्रसाद दिया ताँरे भिक्षा कराइल ॥ 156 ॥

**अनुवाद—**चन्दन लेकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने नीलाचलसे
गोवर्धनकी ओर प्रस्थान किया। कुछ दिन बाद वे रेमुणा
पहुँचे। वहाँ श्रीगोपीनाथके श्रीचरणोंमें उन्होंने अनेक बार
प्रणाम किया और प्रेममें आविष्ट होकर उन्होंने बहुत
देर तक नृत्य-गान किया। उन्हें देखकर श्रीगोपीनाथके
सभी सेवकोंने उनका बहुत सम्मान किया तथा
श्रीगोपीनाथजीका खीर प्रसाद देकर उन्हें भोजन
कराया ॥ 154-156 ॥

स्वप्नमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीगोपालके द्वारा श्रीगोपीनाथके
श्रीअङ्गमें चन्दन लेपन करनेका आदेश :-
सेइ रात्रे देवालये करिल शयन।
शेषरात्रि हैले पुरी देखिल स्वपन ॥ 157 ॥
गोपाल आसिया कहे,—"शुनह, माधव।
कर्पूर-चन्दन आमि पाइलाम सब ॥ 158 ॥

[ 4/157-167 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कर्पूर-सहित घषि' एसब चन्दन।
गोपीनाथेर अङ्गे सब करह लेपन॥159॥
गोपीनाथ आमार से एकइ अङ्ग हय।
इँहाके चन्दन दिले, आमार ताप-क्षय॥160॥
द्विधा ना भाविह, ना करिह किछु मने।
विश्वास करि' चन्दन देह आमार वचने॥"161॥
प्रभुर आज्ञा हैल,–"एइ कर्पूर-चन्दन।
गोपीनाथेर अङ्गे नित्य करह लेपन॥163॥
इँहाके चन्दन दिले, गोपाल हइबेन शीतल।
स्वतन्त्र ईश्वर,-ताँर आज्ञा से प्रबल॥164॥
ग्रीष्मकाले गोपीनाथ परिबे चन्दन।"
शुनि' आनन्दित हैल सेवकेर मन॥165॥
अनुवाद-उस रात श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपीनाथजीके मन्दिरमें ही शयन किया और रातके अन्तमें उन्होंने एक स्वप्न देखा। श्रीगोपालने स्वप्नमें आकर उनसे कहा,-"सुनो माधवेन्द्र ! मैंने यह सब कर्पूर-चन्दन प्राप्त कर लिया है। अब तुम कर्पूरके साथ इस सब चन्दनको घिसकर गोपीनाथके सभी अङ्गोंपर नित्य लेप करो जब तक वह पूरा समाप्त न हो जाय। मेरा और गोपीनाथका एक ही शरीर है। इनको चन्दन लेप करनेसे मेरे अङ्गोंका ताप दूर हो जायेगा। किसी दुविधामें नहीं पड़ो और मनमें कुछ भी संशय मत रखो, मेरी बातपर विश्वास करके गोपीनाथके अङ्गोंमें चन्दनका लेपन कर दो॥"157-161॥
अनुभाष्य-श्रीगोपालको न लगाकर श्रीगोपीनाथको चन्दन लगानेका तात्पर्य यह है, - श्रीगोपालकी भूमि वृन्दावन है, जो रेमुणासे बहुत योजन दूरीपर है। विशेषतः वहाँ जानेके लिये विधर्मी म्लेच्छोंके द्वारा शासित प्रदेशको पार करके जाना होता है; उसमें बहुत विघ्न-बाधाएँ हैं। इसलिये प्रियतम भक्तश्रेष्ठ पुरी गोस्वामीको कष्ट होगा, ऐसा जानकर भक्तवत्सल भक्तप्रेमके वशीभूत श्रीगोपालने अपनेसे अभिन्न-विग्रह श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंमें ही चन्दनका लेपन करनेके लिये कहकर भक्तके श्रमको सफल और कम किया। परवर्ती 176-177 संख्या देखें॥159-160॥
सेवकोंको श्रीगोपालकी आज्ञा बताना :-
एत बलि' गोपाल गेल, गोसाञि जागिला।
गोपीनाथेर सेवकगणे डाकिया आनिला॥162॥
अनुवाद-इतना कहकर श्रीगोपाल अन्तर्धान हो गये। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उठकर श्रीगोपीनाथके सेवकोंको बुलाया और कहा कि श्रीगोपालकी आज्ञा हुई है,-"इस कर्पूर-चन्दनको घिसकर श्रीगोपीनाथजीके श्रीअङ्गोंपर नित्य लेपन करो। इनको चन्दन लगानेसे श्रीगोपालके अङ्ग स्वतः ही शीतल हो जायेंगे। वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। ग्रीष्मकालमें श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंपर चन्दन लगेगा।" यह सुनकर सभी सेवकोंके मनमें आनन्द हो गया॥162-165॥
अनुभाष्य-'स्वतन्त्र'-स्वेच्छामय॥164॥
साथमें आये दोनों सेवकोंको चन्दन-घिसनेमें लगाना :-
पुरी कहे,-"एइ दुइ घषिबे चन्दन।
आर जना-दुइ देह, दिब ये वेतन॥"166॥
अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कहा,–“(मेरे साथ नीलाचलसे आये) ये दोनों व्यक्ति चन्दन घिसेंगे। आप चन्दन घिसनेके लिये मुझे दो लोग और दे दीजिये, उनका वेतन मैं दूँगा॥”166॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'एइ दुइ'-पुरी गोस्वामीके साथ जो दो लोग आये हैं॥166॥
श्रीमाधवेन्द्रपुरीके वचन अनुसार सेवकोंके द्वारा आनन्दित होकर चन्दन लगाना :-
एइ मत चन्दन देय प्रत्यह घषिया।
पराय सेवक सब आनन्द करिया॥167॥
132 ।

चौथा अध्याय 4/47-177 ]
अनुवाद-इस प्रकार वे चारों लोग प्रतिदिन चन्दन घिसकर देने लगे और श्रीगोपीनाथके सेवक उनके श्रीअङ्गोंमें बड़े आनन्दसे प्रतिदिन चन्दनका लेप करते ॥ 167 ॥
सम्पूर्ण ग्रीष्मकालमें चन्दन समाप्त होनेके तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीका रेमुणामें ठहरना :-
प्रत्यह चन्दन पराय, यावत् हैल अन्त।
तथाय रहिल पुरी तावत् पर्यन्त ॥ 168 ॥
अनुवाद-प्रतिदिन श्रीगोपीनाथके अङ्गों पर चन्दनका लेप किया जाता रहा जब तक वह समाप्त नहीं हो गया। श्रीमाधवेन्द्रपुरी तब तक रेमुणामें ही रहे ॥ 168 ॥
श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा नीलाचलमें चातुर्मास्य-पालन :-
ग्रीष्मकाल-अन्ते पुनः नीलाचले गेला।
नीलाचले चातुर्मास्य आनन्दे रहिला ॥ 169 ॥
अनुवाद-ग्रीष्मकालके अन्तमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी पुनः नीलाचल चले गये और चातुर्मास्यमें वे आनन्दपूर्वक नीलाचलमें रहे ॥ 169 ॥
अनुभाष्य- 'चातुर्मास्य' - आषाढ़ मासके शुक्लपक्षमें शयन एकादशीसे आरम्भ करके कार्तिक शुक्लपक्षकी उत्थान-एकादशी तक चार चन्द्रमास; अथवा आषाढ़ी पूर्णिमासे कार्तिकी पूर्णिमा तक चार चन्द्रमास; अथवा श्रावणसे कार्तिक तक चार सौरमासका समय-चातुर्मास्य-वर्षाकाल है। इन चार मासोंका व्रत चारों आश्रमोंके सभी व्यक्तियोंके लिये पालनीय है। इसका उद्देश्य सभी प्रकारके भोगोंका त्याग है। श्रावणमें साग, भाद्रमें दही, आश्विनमें दूध और कार्तिकमें आमिष (और आमिष-जातीय वस्तुओं) का त्याग करना चाहिये। जड़-भोगयोग्य विषयोंका त्याग ही इस चातुर्मास्यकी शिक्षाका तात्पर्य है।
श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जो यत्न किये, वे कोई सांसारिक विषय भोग नहीं है ॥ 47-169 ॥
महाप्रभुको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्र-वर्णनमें आनन्द :-
श्रीमुखे माधवपुरीर अमृत-चरित।
भक्तगणे शुनाञा प्रभु करे आस्वादित ॥ 170 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनिताइको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेमकी महिमाका वर्णन :-
प्रभु कहे, - "नित्यानन्द, करह विचार।
पुरी-सम भाग्यवान् जगते नाहि आर ॥ 171 ॥
दुग्धदान-छले कृष्ण याँरे देखा दिल।
तिनबारे स्वप्ने आसि' याँरे आज्ञा कैल ॥ 172 ॥
याँर प्रेमे वश हञा प्रकट हइल।
सेवा अङ्गीकार करि' जगत तारिल ॥ 173 ॥
याँर लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि।
अतएव नाम हैल 'क्षीरचोरा' करि' ॥ 174 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु अपने श्रीमुखसे भक्तोंको श्रीमाधवेन्द्रपुरीका अमृतमय चरित सुना रहे थे और स्वयं भी उसका आस्वादन कर रहे थे। महाप्रभुने आगे कहा, - "नित्यानन्द ! विचार करो। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके समान भाग्यवान् जगत्में और कोई नहीं है। दूध देनेके छलसे श्रीकृष्णने जिन्हें साक्षात् दर्शन दिया। तीन बार स्वप्नमें आकर जिन्हें आदेश दिया। जिनके प्रेमके वशीभूत होकर श्रीगोपाल प्रकट हुए और जिनकी सेवा स्वीकार की तथा समस्त जगत्वासियोंका उद्धार किया। जिनके लिये श्रीगोपीनाथने खीरकी चोरी की, जिस कारण उनका नाम 'क्षीरचोरा' हो गया ॥ 170-174 ॥
कर्पूर चन्दन याँर अङ्गे चढ़ाइल।
आनन्दे पुरी-गोसाञिर प्रेम उथलिल ॥ 175 ॥
श्रीगोपालके स्थानपर श्रीगोपीनाथको चन्दन लगवानेका तात्पर्य :-
म्लेच्छदेशे कर्पूर-चन्दन आनिते जञ्जल।
पुरी दुःख पाबे, इहा जानिया गोपाल ॥ 176 ॥
महा-दयामय प्रभु-भकतवत्सल।
चन्दन परि' भक्तश्रम करिल सफल ॥ 177 ॥
। 133

[ 4/175-182 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कर्पूर-चन्दन श्रीगोपीनाथके
श्रीअङ्गोंमें लगवाया और आनन्दसे उनके हृदयमें प्रेमकी
लहरें उठने लगीं। म्लेच्छोंके देशोंसे होकर कर्पूर-चन्दनको
वृन्दावन लाना बड़ा जञ्जाल था। श्रीमाधवेन्द्रपुरीको
इससे बहुत कष्ट होगा—यह जानकर परम दयालु
भक्तवत्सल प्रभुने श्रीगोपीनाथके रूपमें ही चन्दन सेवाको
ग्रहणकर अपने भक्तके परिश्रमको सफल किया॥ 175-177॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'म्लेच्छ देश'—मेदिनीपुर जिलाके
अनेक अंशों तक उत्कल राजाका राज्य था; वह हिन्दु
राजाका देश था। उसके बाद प्रायः सभी देश ही
म्लेच्छ राजाओंके अधीन थे। स्थान-स्थानपर म्लेच्छ
राजाके अनुचर पथिकोंके सामानसे अच्छी-अच्छी
वस्तुओंको निकालकर अपने पास रख लेते थे।
गौड़देशमें कर्पूर और चन्दन दुर्लभ थे। इसलिये कोई
जञ्जाल खड़ा हो जायेगा, इस आशङ्कासे ही कि पुरी
गोसाईंको वृन्दावन तक जाते हुए बहुत कष्ट उठाना
पड़ेगा और उस कष्टको दूर करनेके लिये ही
श्रीगोपालने पुरी गोस्वामीको रेमुणामें विराजमान श्रीगोपीनाथको
चन्दन अर्पण करनेकी आज्ञा प्रदान की थी॥ 176-177॥
श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेम और चरित्रकी महिमा :-
पुरीर प्रेम-पराकाष्ठा करह विचार।
अलौकिक प्रेमे चित्ते लागे चमत्कार ॥ 178 ॥
परम-विरक्त, मौनी, सर्वत्र उदासीन।
ग्राम्यवार्त्ता-भये द्वितीय-सङ्ग-हीन ॥ 179 ॥
अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेमकी पराकाष्ठापर विचार
करो। उनके अलौकिक प्रेमसे तुम्हारे चित्तमें चमत्कार
होगा। वे परम-विरक्त, मौनी (अर्थात् श्रीकृष्ण कथाको
छोड़कर और कुछ भी नहीं बोलते थे) और जड़ीय
विषयोंके प्रति सदैव उदासीन रहते थे। ग्राम्यवार्त्ताके
भयसे वे किसीका सङ्ग नहीं करते थे॥ 178-179 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णविरह अर्थात् चिद्-विप्रलम्भ ही
जीवोंके भजनका एकमात्र साधन है। जड़-विरह अर्थात्
सांसारिक भोग प्राप्त न होनेपर उनसे उत्पन्न निर्वेद
जड़की ही आसक्तिको प्रकाशित करता है। किन्तु
श्रीकृष्णविरहसे उत्पन्न सांसारिक-भोगोंसे वैराग्य
श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकी कामनाका श्रेष्ठ प्रदर्शन है। यहाँपर
मूल-महाजन श्रीपाद माधवेन्द्रपुरीकी अपूर्व श्रीकृष्णेन्द्रिय-
प्रीतिकी कामना श्रीकृष्णसेवा-अभिलाषी जीवोंका एकमात्र
आदर्श और विशेषरूपसे लक्ष्य करने योग्य विषय
है—यही श्रीमन्महाप्रभुने और उनकी अन्तरङ्ग शक्तियोंने
(अन्तरङ्ग परिकरोंने) बादमें आचरण करके दिखाया
है।
'ग्राम्यवार्त्ता'—स्त्री-पुरुषमें होनेवाली बात, ग्राम सम्बन्धीय
सब प्रकारकी बातें। ग्राम—(भाः 11/25/25) श्लोकमें— "ग्रामो
राजस उच्यते"; (भाः 11/25/28 और 29)
श्लोकमें— "राजसञ्चेन्द्रियप्रेष्ठम्", "विषयोत्थन्तु राजसम्"—
अपनी इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाला अथवा विषयभोगोंको
उत्पन्न करनेवाला अर्थात् जागतिक कामोद्दीपक कार्यमात्र
ही राजस अर्थात् ग्राम्य है ॥ 178-179 ॥
सेव्यकी आज्ञा पालनमें असहाय पुरीका अपूर्व उद्यम :-
हेन-जन गोपालेर आज्ञामृत पाञा।
सहस्र क्रोश आसि' बुले चन्दन मागिञा ॥ 180 ॥
भोके रहे, तबु अन्न मागिञा ना खाय।
हेन-जन चन्दन-भार बहि' लञा जाय ॥ 181 ॥
अनुवाद—वे ऐसे व्यक्ति थे जो श्रीगोपालके आज्ञामृतको
पाकर हजार कोस चलकर चन्दनकी भिक्षा माँगने गये
थे। जो भूखे रहकर भी किसीसे अन्न माँगकर नहीं
खाते थे, ऐसे व्यक्ति माँगकर चन्दनका भार उठाकर ले
जा रहे थे॥ 180-181 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भोके रहे'—भूखे रहकर ॥ 181 ॥
स्वयं बहुत दुःख सहन करनेपर भी प्रभुकी सेवासे ही
श्रीमाधवेन्द्रपुरीको आनन्द :-
'मणेक चन्दन, तोला-बिशेक कर्पूर।
गोपाले पराइब',—एइ आनन्द प्रचुर ॥ 182 ॥
134 ।

चौथा अध्याय 4/182-190 ]
उत्कलेर दानी राखे चन्दन देखिञा।
ताँहा एड़ाइल राजपत्र देखाञा॥183॥
म्लेच्छदेशे दूर पथ, जगाति अपार।
केमते चन्दन निब—नाहि ए विचार॥184॥
सङ्गे एक वट नाहि घाटीदान दिते।
तथापि उत्साह बड़, चन्दन लञा याइते॥185॥
अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरी यही विचार करते हुए
परम आनन्दित होकर एक मन चन्दन और बीस तोला
कर्पूर लेकर जा रहे थे कि इनका लेपन श्रीगोपालके
अङ्गोंपर करके उनका ताप दूर करूँगा। उत्कल
प्रदेशके कर-अधिकारीने चन्दनको देखकर उसे रोक
लिया, किन्तु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें राजपत्र दिखाकर
उनसे छुड़ा लिया। (उत्कल देशके राजा तो हिन्दु हैं
और उनका अनुमति पत्र भी साथ है), परन्तु
म्लेच्छोंके देशोंसे होते हुए बहुत दूर चन्दनको ले जाना
है, मार्गमें उनके अनेक पहरेदार हैं और कैसे वहाँसे
चन्दन ले जाऊँगा—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इन सबका कुछ
भी विचार नहीं किया। यद्यपि उनके पास पथ-कर
देनेके लिये एक कौड़ी भी नहीं थी, तथापि श्रीगोपालके
लिये चन्दन लेकर जानेका उनमें प्रबल उत्साह
था॥182-185॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'जगाति'—प्रहरीके छलसे मार्गमें
कर लेनेके बहाने लूटनेवाले। 'वट'—कौड़ी॥184-185॥
अनुभाष्य—'राखे'—रोका था॥183॥
श्रीकृष्णके प्रेमीके लक्षण :—
प्रगाढ़-प्रेमेर एइ स्वभाव-आचार।
निज-दुःख-विघ्नादिर ना करे विचार॥186॥
अनुवाद—श्रीकृष्णमें प्रगाढ़ प्रेमवालोंका स्वाभाविक
आचरण ही ऐसा है कि वे अपने दुःख-विघ्नादिका
कोई विचार नहीं करते॥186॥
अनुभाष्य—प्रगाढ़ प्रेम करनेवालोंके स्वाभाविक
आचरणमें ऐसा ही देखा जाता है कि अपनी कामनाकी
पूर्तिके विपरीत-भाव दुःख-विघ्नादि उन्हें कोई बाधा
नहीं देते; अपितु लाखों विघ्न और निरन्तर दुःखोंके
बीच ही वे पूर्णमात्रामें अपनी प्रीतिका परिचय देते हैं।
“तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणः” यह भागवतीय श्लोक इस
जड़ जगत्की बद्धानुभूति और द्वितीयाभिनिवेशसे मुक्त
होनेकी योग्य पात्रताके विचारका उदाहरण है। भगवान्से
प्रगाढ़ प्रेम करनेवाले इस जगत्के किसी अभाव, विघ्न
और दुःख आदिका विचार नहीं करते। “यत देख
वैष्णवेर व्यवहार-दुःख। निश्चय जानिह सेइ परानन्दसुख॥”
अर्थात् श्रीकृष्णसेवामें जब वैष्णवको बाहरसे दुःख प्राप्त
होता हुआ दिखायी दे, तो भी निश्चित जानो कि उसके
हृदयमें परमानन्द अनुभव हो रहा है। श्रीमन्महाप्रभुके
“आश्लिष्य वा पादरतां” (श्रीशिक्षाष्टक आठवाँ श्लोक)
वचनमें इसी चरम शिक्षाको ही हम लक्ष्य करते
हैं॥186॥
श्रीकृष्णके द्वारा अपने भक्तकी महिमाका प्रदर्शन :—
एइ तार गाढ़ प्रेमा लोके देखाइते।
गोपाल ताँरे आज्ञा दिल चन्दन आनिते॥187॥
बहु परिश्रमे चन्दन रेमुणा आनिल।
आनन्द बाड़िल मने, दुःख ना गणिल॥188॥
अनुवाद—उनके इस प्रगाढ़ प्रेमको जगत्वासियोंको
दिखानेके लिये ही श्रीगोपालने उन्हें चन्दन लानेकी
आज्ञा दी थी। श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत परिश्रमसे चन्दनको
लेकर नीलाचलसे रेमुणा तक पहुँचे, परन्तु उन्होंने
इसमें कोई कष्ट अनुभव नहीं किया, अपितु उनके
हृदयमें आनन्द ही वर्धित होता रहा॥187-188॥
भक्तकी परीक्षा और भक्तका परीक्षामें उत्तीर्ण होना :—
परीक्षा करिते गोपाल कैल आज्ञा दान।
परीक्षा करिया शेषे हैल दयावान्॥189॥
भक्त और भगवान्—परस्पर अलौकिकी रति :—
एइ भक्ति, भक्तप्रिय-कृष्ण-व्यवहार।
बुझितेओ आमा-सबार नाहि अधिकार॥”190॥
। 135

[ 4/189-197 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—अपने भक्तकी परीक्षा लेनेके लिये ही
श्रीगोपालने उन्हें ऐसा आदेश दिया था। परीक्षामें उत्तीर्ण
होनेपर अन्तमें श्रीगोपालने उनपर पूर्ण दया की।
श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी ऐसी भक्ति और भक्तोंके प्रियतम
श्रीकृष्णके व्यवहारको समझनेमें हम सबका अधिकार
नहीं है॥”189-190॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरी रचित
अतुलनीय महिमायुक्त श्लोकका वर्णन :—
एत बलि' पड़े प्रभु ताँर कृत श्लोक।
येइ श्लोक-चन्द्रे जगत् करेछे आलोक ॥ 191 ॥
घषिते घषिते यैछे मलयज-सार।
गन्ध बाड़े, तैछे एइ श्लोकेर विचार ॥ 192 ॥
रत्नगण-मध्ये यैछे कौस्तुभमणि।
रसकाव्य-मध्ये तैछे एइ श्लोक मणि ॥ 193 ॥
एइ श्लोक कहियाछेन राधा-ठाकुराणी।
ताँर कृपाय स्फुरियाछे माधवेन्द्र-वाणी ॥ 194 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीमाधवेन्द्रपुरीके
द्वारा रचित वह श्लोक पढ़ा जो चन्द्रमाकी भाँति
जगत्को प्रकाश प्रदान करनेवाला है। घिसते-घिसते
जैसे मलय-चन्दनकी सुगन्धि बढ़ती है, वैसे ही इस
श्लोकका जितना विचार किया जाय, उतना ही इसका
रसास्वादन होता है। रत्नोंमें जैसे कौस्तुभमणि सर्वश्रेष्ठ
है, वैसे ही समस्त रसकाव्योंमें इस श्लोकको जानो।
श्रीराधा ठाकुराणीने ही यह श्लोक कहा है और
उन्हींकी कृपासे ही यह श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी वाणीमें स्फुरित
हुआ॥ 191-194॥
श्रीराधा, श्रीमाधवेन्द्रपुरी और श्रीगौर—केवल इन तीनोंकी
ही इस श्लोकको आस्वादन करनेकी योग्यता :—
किंवा गौरचन्द्र इहा करे आस्वादन।
इहा आस्वादिते आर नाहि चौठजन ॥ 195 ॥
शेषकाले एइ श्लोक पठिते पठिते।
सिद्धिप्राप्त हैल पुरीर श्लोकेर सहिते ॥ 196 ॥
अनुवाद—[श्रीमती राधिका, श्रीमाधवेन्द्रपुरी और]
श्रीगौरचन्द्र—इन तीनोंने ही इस श्लोकका आस्वादन
किया। इनके अतिरिक्त इस श्लोकका आस्वादन करने
योग्य कोई चौथा व्यक्ति है ही नहीं। अपने प्रकटकालके
अन्तिम समयमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इस श्लोकको पढ़ते-पढ़ते
ही सिद्धि प्राप्त की थी॥ 195-196॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'चौठजन'—चौथा व्यक्ति; अर्थात्
श्रीराधा ठाकुराणी, श्रीमाधवेन्द्रपुरी और महाप्रभु,—इन
तीनोंने ही इस श्लोकका आस्वादन किया है; अन्य
कोई चौथा व्यक्ति इसको आस्वादन करने योग्य नहीं
था॥195॥
पद्यावलीमें चतुःशताङ्क-उद्धृत श्रीमाधवेन्द्रपुरीके वचन :—
अयि दीनदयार्द्रनाथ
हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे।
हृदयं त्वदलोककातरं दयित
भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥ 197 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ओहे दीनदयार्द्रनाथ! ओहे
मथुरानाथ! कब तुम्हारे दर्शन करूँगी? तुम्हारे दर्शनके
अभावमें मेरा कातर हृदय अस्थिर हो गया है। हे
दयित (प्रियतम)! अब मैं क्या करूँ?
तात्पर्य,—शुद्धभक्तिवादी वेदान्तमूलक वैष्णवगण चार
सम्प्रदायोंमें विभक्त हैं; उनमें श्रीमध्वाचार्य-सम्प्रदायको
स्वीकार करके श्रीमाधवेन्द्रपुरीने वैष्णव-संन्यास ग्रहण
किया था। श्रीमध्वाचार्यसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीके गुरु श्रीलक्ष्मीपति
तक इस सम्प्रदायमें शृङ्गार-रसमयी भक्ति नहीं थी।
उनकी जैसी भक्ति थी, वह महाप्रभुके दक्षिण देशमें
भ्रमणके समय तत्त्ववादियोंके साथ हुए विचारसे जानी
जाती है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इस अपूर्व श्लोक-रचनाके
द्वारा शृङ्गार-रसमयी भक्तिके बीजको बोया। इसमें भाव
यह है,—मथुरा गये हुए श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीमती
राधिकाके महाप्रेमका जो उच्छ्वास हुआ था अर्थात्
उनका जो भावोद्गार प्रकट हुआ था, उन्हीं भावोंके
136 ।

चौथा अध्याय 4/197-203 ]
अनुगत होकर जो श्रीकृष्णभजन किया जाता है, वही
सर्वोत्तम है। इस रसके भक्त अपने आपको अत्यन्त
दीन मानकर 'दीनदयार्द्रनाथको' इस भावसे पुकारेंगे।
जीवके लिये श्रीकृष्णसे वियोगका भाव ही स्वाभाविक
भजन है। श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं, उनके दर्शनके
बिना श्रीमती राधिकाका हृदय अत्यन्त कातर होकर
उनके दर्शनके लालसासे कह रहा है, - "हे कान्त,
तुम्हारे दर्शनके अभावमें मेरा हृदय अत्यन्त व्याकुल
है; बताओ, मेरे क्या करनेसे तुम्हारे दर्शन प्राप्त होंगे?
मुझे दीन समझकर तुम दयार्द्र होओ अर्थात् तुम्हारा
हृदय द्रवित हो।" श्रीमाधवेन्द्रपुरीके इस भावके साथ
श्रीमहाप्रभुमें प्रकाशित श्रीमती राधिकाके उद्धव-दर्शनसे
जिस भाव वैचित्र्यका वर्णन (इस ग्रन्थमें) हुआ है,
उसकी समानता अनायास ही दिखायी देती है। इसलिये
महाजनोंने कहा है कि शृङ्गार-रसवृक्षके मूल श्रीमाधवेन्द्र
पुरी हैं, श्रीईश्वरपुरी उसका अङ्कुर और महाप्रभु उसके
मूल स्कन्ध हैं। महाप्रभुके अनुगत भक्तगण-उसकी
शाखा-उपशाखा हैं॥ 197 ॥
चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-
अयि (श्रीवृषभानुराजनन्दिन्याः स्वरमणं प्रति मधुरसम्बोधनं)
हे दीनदयार्द्र (दीनानां कृष्णविरहकातराणां गोपीनां स्वजनानां
सम्बन्धे या दया, तासां विप्रलम्भापनोदिनी साक्षाद्रूपगुणलीला-
स्फूर्तिविधायिनी कृपा, तया आर्द्र, सरसहृदय, - उत्कटविरह-
तापार्त्त-गोपीकृपापरकोमलचित्त) हे नाथ (मादृशगोपीजनैकवल्लभ)
हे मथुरानाथ (माथुरजनेश्वर, चेत् गोपीजनवल्लभाभिमानस्तव
वर्त्तते, तदा अस्मान् गोपीः विस्मृत्य कथम् ऐश्वर्यवासनया
माथुर-साधारणी-कान्तामोदार्थं तत्रावस्थितिः, अतः, गोपीकृपारहित-
कठिनहृदय) कदा त्वं [विरहकातरया गोप्य‍ा तद्भावाश्रितया
मया] अवलोक्यसे? हे दयित (हे प्राणेभ्योऽपि प्रियतम)
त्वदलोककातरं हृदयं (तव दर्शनाय कातरं व्याकुलं
उद्घूर्णाचित्रजल्पादिमयं गोपीजनहृदयं) भ्रामयति (उन्मादयति)
किं करोमि, [तत् कथय]।
श्लोक भावानुवाद-वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिका
श्रीकृष्णके मथुरा चले जानेपर उनको गौरवरहित मधुर
सम्बोधनके द्वारा कह रही हैं-अरे! (मदीय भावके
कारण यह अति गूढ़ सम्बन्धका सूचक है)। हे कृष्ण!
तुम विरहमें कातर हम दीन गोपियोंके विरह-तापको दूर
करनेवाली साक्षात् रूप-गुण-लीला-स्फूर्तिरूपिणी कृपा करते
हो, क्योंकि हमारे विरह तापसे तुम्हारा चित्त विगलित
हो जाता है। तुम तो हम गोपियोंके एकमात्र नाथ
अर्थात् प्राणवल्लभ हो। [किन्तु] हे मथुरानाथ! अर्थात्
हम गोपियोंके वल्लभ होनेका अभिमान होनेपर भी अब
मथुरावासियोंके नाथ बने हो? हम गोपियोंको भूलकर
कैसे ऐश्वर्यभावयुक्त मथुराकी साधारणी कान्ताओंके
आनन्दका विधान कर रहे हो (हम गोपियोंके द्वारा की
जानेवाली सेवासे वञ्चित होनेके कारण तुम कठोर
हृदय हो गये हो)। तुम्हारे विरहमें कातर मैं कब तुम्हारे
दर्शन प्राप्त करूँगी? हे दयित (प्राणोंसे भी प्रियतम)!
तुम्हारे दर्शनके लिये व्याकुल मेरा हृदय उद्घूर्णा-चित्रजल्पादि
अनुभावोंके द्वारा उन्मादित हो रहा है, [तुम ही यह
बतलाओ] ऐसी दशामें मैं क्या करूँ? ॥ 197 ॥
महाप्रभुकी मूर्च्छा और विप्रलम्भ-भावोन्माद :-
एइ श्लोक पड़िते प्रभु हइला मूर्च्छिते।
प्रेमेते विवश हञा पड़िल भूमिते ॥ 198 ॥
आस्ते व्यस्ते कोले करि' निल नित्यानन्द।
क्रन्दन करिया तबे उठे गौरचन्द्र ॥ 199 ॥
प्रेमोन्माद हैल, उठि' इति-उति धाय।
हुङ्कार करये, हासे, कान्दे, नाचे, गाय ॥ 200 ॥
'अयि दीन', 'अयि दीन' बले बारबार।
कण्ठे ना निःसरे वाणी, नेत्रे अश्रुधार ॥ 201 ॥
कम्प, स्वेद, पुलकाश्रु, स्तम्भ, वैवर्ण्य।
निर्वेद, विषाद, जाड्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥ 202 ॥
एइ श्लोके उघाड़िला प्रेमेर कपाट।
गोपीनाथ-सेवक देखे प्रभुर प्रेमनाट ॥ 203 ॥
अनुवाद-इस श्लोकका उच्चारण करते ही प्रेममें
। 137

[ 4/198-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
विवश होकर महाप्रभु मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
हड़बड़ाकर तुरन्त ही श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको
अपनी गोदमें ले लिया और श्रीगौरचन्द्र क्रन्दन करते
हुए उठ बैठे। महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें उन्मादग्रस्त होकर
हुँकार करके, हँसते, रोते, नाचते और गाते हुए
इधर-उधर दौड़ने लगे। वे बार-बार 'अयि दीन', अयि
दीन' बोलने लगे, किन्तु उसके आगे श्लोकका
उच्चारण करनेके लिये उनके कण्ठसे वाणी नहीं
निकली और उनके नेत्रोंसे अश्रुऑंकी धाराएँ बहने
लगीं। कम्प, स्वेद, पुलक, अश्रु, स्तम्भ, वैवर्ण्य, निर्वेद,
विषाद, जाड्य, गर्व, हर्ष और दैन्य आदि अष्ट-सात्त्विक
और सञ्चारी भाव उनके श्रीअङ्गोंमें प्रकाशित होने
लगे। इस श्लोकमें महाप्रभुने प्रेमके कपाट खोल दिये,
तब श्रीगोपीनाथके सेवकोंने महाप्रभुको प्रेमके आवेशमें
नृत्य करते देखा॥ 198-203 ॥
अनुभाष्य- 'जाड्य'-भःरःसिः, दःविः, चतुर्थ लः-
“जाड्यमप्रतिपत्तिः स्यादिष्टानिष्टश्रुतीक्षणैः।
विरहाद्यैश्च तन्मोहात् पूर्वावस्था पराऽपि च॥”
“इष्ट और अनिष्टके श्रवण, दर्शन और विरह
आदिके द्वारा जो विचारशून्यता होती है, उसको 'जाड्य'
कहते हैं। यह मोहके पहले और बादकी अवस्था है।
'प्रेमानाट'—प्रेमके आवेशमें नृत्य ॥ 202-203 ॥
महाप्रभुकी बाह्यदशा और श्रीगोपीनाथकी भोगारति :-
लोकेर संघट्ट देखि' प्रभुर बाह्य हैल।
ठाकुरेर भोग सरि' आरति बाजिल ॥ 204 ॥
अनुवाद-लोगोंके जमघटको देखकर महाप्रभुकी
बाह्य चेतना लौट आयी। तभी श्रीगोपीनाथजीका भोग
लगना समाप्त हुआ और आरतीका घण्टा बजने
लगा ॥ 204 ॥
पुजारीके द्वारा महाप्रभुके लिये
बारह पात्रोंमें खीर लाना :-
ठाकुरे शयन कराञा पूजारी हैल बाहिर।
प्रभुर आगे आनि' दिल प्रसाद बार क्षीर ॥ 205 ॥
अनुवाद-आरतीके बाद श्रीगोपीनाथजीको शयन
कराकर पुजारी बाहर आया और उसने बारहके बारह
खीरके पात्र महाप्रभुको लाकर दे दिये ॥ 205 ॥
अनुभाष्य- 'बार'-बारह खीरसे भरे पात्र ॥ 205 ॥
खीरको देखनेसे महाप्रभुको आनन्द और पाँच पात्रोंको
ग्रहण करके सात पात्रोंको वापिस देना :-
क्षीर देखि' महाप्रभुर आनन्द बाड़िल।
भक्तगणे खाओयाइते पञ्च क्षीर लैल ॥ 206 ॥
सात क्षीर पूजारीके बाहुड़िया दिल।
पञ्चक्षीर पञ्चजने बाँटिया खाइल ॥ 207 ॥
गोपीनाथ-रूपे यदि करियाछेन भोजन।
भक्ति देखाइते कैल प्रसाद भक्षण ॥ 208 ॥
अनुवाद-खीर-प्रसादको देखकर महाप्रभुको बहुत
आनन्द हुआ। उन्होंने भक्तोंको खिलानेके उद्देश्यसे
केवल खीरके केवल पाँच पात्र ही लिये और बचे हुए
सात पात्रोंको पुजारीको लौटा दिया। उन पाँच खीरके
पात्रोंको महाप्रभु और उनके साथ चार भक्तोंने बाँटकर
खा लिया। यद्यपि श्रीगोपीनाथ-विग्रहके रूपमें महाप्रभुने
पहलेसे ही समस्त खीरका भोजन किया था, परन्तु
लोकशिक्षाके लिये भक्ति दिखाते हुए फिरसे महाप्रसादका
सेवन किया ॥ 206-208 ॥
अनुभाष्य- 'बाहुड़िया'-आगे बढ़कर लौटाना। यद्यपि
श्रीमन्महाप्रभुने श्रीगोपीनाथ-विग्रहके रूपमें इस खीरका
पहले ही भोजन किया था, तथापि लोकशिक्षकके रूपमें
उन्होंने श्रीकृष्णभजन प्रदर्शित करनेके लिये
खीर-महाप्रसादका सम्मान किया ॥ 207-208 ॥
प्रातःकाल होनेपर वहाँसे पुरीकी ओर यात्रा :-
नाम-सङ्कीर्त्तने सेइ रात्रि गोङाइला।
मङ्गल-आरति देखि' प्रभाते चलिला ॥ 209 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने भक्तोंके साथ नाम-सङ्कीर्तन
करते हुए वह रात बितायी। प्रभात होनेपर मङ्गल-आरतीका
दर्शन करके आगे चल दिये ॥ 209 ॥
138 ।

चौथा अध्याय 4/209–213 ]
अनुभाष्य—'गोङाइल'—बितायी ॥ 209 ॥
इस आख्यानके द्वारा महाप्रभु और उनके भक्तोंकी अपूर्व
प्रीति और गुणोंकी महिमाका वर्णन :—
एइ त' आख्याने कहिला दोँहार महिमा।
प्रभुर भक्तवात्सल्य, आर भक्तप्रेम-सीमा ॥ 210 ॥
भक्त-सङ्गे श्रीमुखे प्रभु कैला आस्वादन।
गोपाल-गोपीनाथ-पुरीगोसाञिर गुण ॥ 211 ॥
श्रद्धायुक्त हञा इहा सुने येइ जन।
श्रीकृष्ण-चरणे सेइ पाय प्रेमधन ॥ 212 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 213 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीमाधवेन्द्रपुरी-
चरितामृतास्वादनं नाम चतुर्थः परिच्छेदः।
अनुवाद—भगवान्‌का भक्तवात्सल्य और उनके भक्तोंके
प्रेमकी सीमा,—महाप्रभुने इस आख्यानमें इन दोनोंकी
महिमाका वर्णन किया है। इस प्रकार भक्तोंके साथ
महाप्रभुने अपने श्रीमुखसे वर्णन करते हुए श्रीगोपाल,
श्रीगोपीनाथ और श्रीमाधवेन्द्रपुरीके गुणोंका आस्वादन
किया। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस आख्यानको सुनता
है, उसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमधनकी प्राप्ति होती है।
श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा
करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर
रहा है॥ 210-213 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी-
चरितामृतास्वादन नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त।
अनुभाष्य—प्रभु और भक्तोंका, दोनोंका एक-दूसरेके
प्रति जो प्रेम है, वह अतुलनीय है ॥ 210 ॥
चौथे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
। 139

पाँचवाँ अध्याय
कथासार-महाप्रभु याजपुरसे होते हुए कटक नगरमें
पहुँचे। वहाँ वे श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन करने गये और
श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीमुखसे गोपालके प्रसङ्गको श्रवण
किया। विद्यानगर-निवासी दो (एक वृद्ध और दूसरा
युवा) ब्राह्मण बहुतसे तीर्थोंमें भ्रमण करके श्रीवृन्दावन
पहुँचे। वृद्ध ब्राह्मणने युवा ब्राह्मणकी सेवासे सन्तुष्ट
होकर उसको अपनी कन्या देनेकी प्रतिज्ञा की। युवा
ब्राह्मणने वृद्ध ब्राह्मणको वृन्दावनके श्रीगोपालके सामने
यह बात कहलवायी और श्रीगोपालको इसका साक्षी
रखा। स्वदेश लौट आनेपर युवा ब्राह्मणने जब
विवाहका प्रस्ताव रखा, तब वृद्ध ब्राह्मणने अपने
पुत्र-पत्नी आदिके दबावमें आकर कहा, - 'मुझे तो
स्मरण नहीं है कि मैंने ऐसी कोई प्रतिज्ञा की थी।' उस
वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर युवा ब्राह्मण पुनः श्रीगोपालके
पास गया और उसने श्रीगोपालको पूरी बात कह
सुनाकर अपनी भक्तिके द्वारा उन्हें मजबूर करके दक्षिण
देश (विद्यानगर) ले आया। श्रीगोपाल युवा ब्राह्मणके
पीछे-पीछे नूपुरकी ध्वनि करते-करते विद्यानगरके
निकट पहुँचकर स्थित हो गये। युवा ब्राह्मणने विद्यानगरके
सज्जन व्यक्तियोंको, वृद्ध ब्राह्मण और उसके पुत्रको
वहाँ लाकर श्रीगोपालकी साक्षी दिलायी। वे सब बहुत
चमत्कृत हो गये और उन्होंने वृद्ध ब्राह्मणकी कन्याके
साथ युवा ब्राह्मणका विवाह कार्य सम्पन्न किया।
विद्यानगरके राजाने श्रीगोपालके लिये भक्तिभावसे मन्दिर
आदिका निर्माण करवाया। बहुत दिनोंके बाद उत्कल
(उड़ीसा) के राजा पुरुषोत्तमदेवको विद्यानगरके राजाने
श्रीजगन्नाथका झाडूदार कहकर अपमान करके अपनी
कन्या देनेसे मना किया। राजा पुरुषोत्तमदेवने श्रीजगन्नाथकी
सहायतासे उस राजासे युद्ध किया तथा उसको पराजित
करके उसकी कन्या और राज्यको ग्रहण किया। उस
समयसे वैष्णवराज पुरुषोत्तमदेवकी भक्तिकी डोरसे बँधकर
श्रीगोपाल कटकनगरमें आये। इस प्रसङ्गको सुनकर
महाप्रभुने महाप्रेमसहित श्रीगोपालका दर्शन किया। कटकसे
भुवनेश्वर शिवके दर्शन करके कमलपुरमें भार्गी-नदीके
तटपर कपोतेश्वर-शिवके दर्शनके छलसे महाप्रभुने
श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथमें अपने संन्यासका दण्ड दिया।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डके तीन टुकड़े करके उसे
भार्गी नदीमें फेंक दिया। 'आठारनाला'के पास पहुँचकर
जब महाप्रभुको अपना दण्ड नहीं मिला, तब वे अपने
साथियोंको छोड़कर अकेले ही श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये।
-(अमृतप्रवाहभाष्य)
भक्तके वशीभूत साक्षीगोपालको प्रणाम :-
पद्भ्यां चलन् यः प्रतिमा-स्वरूपो
ब्रह्मण्यदेवो हि शताहगम्यम्।
देशं ययौ विप्रकृतेऽद्भुतेहं
तं साक्षिगोपालमहं नतोऽस्मि ॥ 1 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जो ब्रह्मण्यदेव प्रतिमास्वरूप
होकर भी ब्राह्मणके उपकारके लिये उस स्थानपर पैदल
चलते-चलते पहुँचे, जहाँ पहुँचनेमें सौ दिन लग जाते
हैं, उन्हीं अद्भुत चेष्टा करनेवाले श्रीसाक्षी-गोपालको मैं
प्रणाम करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य -
यः (गोपालः) प्रतिमास्वरूपः (अर्च्यश्रितविग्रहः) ब्रह्मण्यदेवः
पद्भ्यां चलन् विप्रकृते (ब्राह्मणस्योपकाराय) हि शताहगम्यं
(शतदिवस-प्राप्यं) देशं (माथुरमण्डलात् विद्यानगरं) ययौ, अहं
तम् अद्भुतेहं (अपूर्वचेष्टासमन्वितं) साक्षिगोपालं नतोऽस्मि
(प्रणमामि)।
। 141

[ 5/1-9 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
तथा श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥
महाप्रभुका याजपुरमें वराहदेवका दर्शन :-
चलिते चलिते आइला याजपुर-ग्राम।
वराह-ठाकुर देखि' करिला प्रणाम ॥ 3 ॥
नृत्यगीत कैल प्रेमे, बहुत स्तवन।
याजपुरे से रात्रि करिला यापन ॥ 4 ॥
अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ चलते-चलते
याजपुर नामक ग्राममें पहुँचे। वहाँ श्रीवराह भगवान्‌के
विग्रहको देखकर प्रणाम किया। भगवान् वराहदेवके
मन्दिरमें महाप्रभुने नृत्य-गीत करते हुए प्रेमसे उनकी
बहुत स्तव-स्तुति कीं। उस रात वे याजपुरमें ही
रहे॥ 3-4 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'याजपुरग्राम'-यह उड़ीसामें वैतरणी
नदीके तटपर स्थित विरजाक्षेत्रमें नाभिगयारूप एक
विशेष तीर्थ स्थान है॥ 3 ॥
अनुभाष्य- 'याजपुर'-कटक जिलेका एक उपमण्डल
है, उसको 'नाभिगया' कहते हैं। यहाँ पर 'ब्राह्मणनगर'
मौहल्लेमें श्रीवराहदेव विराजमान हैं॥ 3 ॥
कटकमें श्रीसाक्षी-गोपालका दर्शन :-
कटके आइला साक्षिगोपाल देखिते।
गोपाल-सौन्दर्य देखि' हैला आनन्दिते ॥ 5 ॥
प्रेमावेशे नृत्यगीत कैल कतक्षण।
आविष्ट हञा कैल गोपाल-स्तवन ॥ 6 ॥
अनुवाद-याजपुरसे महाप्रभु कटकमें आये और
वहाँ श्रीसाक्षी-गोपालके दर्शन किये। श्रीसाक्षी-गोपालका
सौन्दर्य देखकर उनको बहुत आनन्द हुआ। महाप्रभुने
वहाँ प्रेमावेशमें कुछ देर तक नृत्य-गीत किया और
फिर आविष्ट होकर उनकी स्तव-स्तुति करने लगे॥ 5-6 ॥
श्रीनित्यानन्दके मुखसे महाप्रभुके द्वारा
साक्षिगोपालके वृत्तान्तका श्रवण :-
सेइ रात्रि ताँहा रहि' भक्तगण-सङ्गे।
गोपालेर पूर्वकथा सुने प्रभु रङ्गे ॥ 7 ॥
अनुवाद-उस रात महाप्रभु भक्तोंके साथ वहीं रहे
और उन्होंने बड़े आनन्दसे श्रीसाक्षी-गोपालकी पूर्व
कथाका श्रवण किया॥ 7 ॥
पहले तीर्थ-भ्रमण करते श्रीनिताइका श्रवणका सुयोग :-
नित्यानन्द-गोसाञि यबे तीर्थ भ्रमिला।
साक्षिगोपाल देखिबारे कटक आइला ॥ 8 ॥
साक्षिगोपालेर कथा शुनि' लोकमुखे।
सेइ कथा कहेन, प्रभु सुने महासुखे ॥ 9 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु जब तीर्थोंमें भ्रमण कर
रहे थे, तब वे श्रीसाक्षी-गोपालका दर्शन करने कटक
आये थे। श्रीसाक्षी-गोपालकी जो कथा उन्होंने वहाँके
लोगोंके मुखसे सुनी थी, वही कथा अब वे सुनाने लगे
और महाप्रभु सुखपूर्वक उसे सुनने लगे॥ 8-9 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'साक्षिगोपाल'-महानदीके तटपर
कटक एक प्रधान नगर है; उस समयमें श्रीसाक्षी-गोपाल
वहाँ विराजमान थे। श्रीसाक्षी-गोपाल जब दक्षिण
भारतसे लाये गये थे, तब पहले वे कुछ दिनोंतक
कटकमें रहे, उसके बाद कुछ दिनोंतक वे श्रीपुरुषोत्तम
क्षेत्रमें श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें रहे। वहाँ (उनकी श्रीजगन्नाथदेवसे)
किसी प्रकारकी प्रेम कलह होनेपर उड़ीसाके राजाने
पुरुषोत्तमसे तीन कोस दूर 'सत्यवादी'-नामक एक
गाँवको बसाकर वहीं श्रीसाक्षी-गोपालको रखा। अब
उसी गाँवमें एक पक्के मन्दिरमें श्रीसाक्षी-गोपाल विराजमान
हैं॥ 8 ॥
142 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/10-21 ]
श्रीसाक्षी-गोपालका वृत्तान्तः दो ब्राह्मणोंकी कथा :-
पूर्वे विद्यानगरेर दुइ त' ब्राह्मण।
तीर्थ करिबारे दुँहे करिला गमन ॥ 10 ॥
गया, वाराणसी, प्रयाग-सकल करिया।
मथुराते आइला दुँहे आनन्दित हञा ॥ 11 ॥
वनयात्राय वन देखि' देखे गोवर्धन।
द्वादश-वन देखि' शेषे गेला वृन्दावन ॥ 12 ॥
वृन्दावने गोविन्द-स्थाने महादेवालय।
से-मन्दिरे गोपालेर महासेवा हय ॥ 13 ॥
अनुवाद-पूर्वकालमें विद्यानगरमें दो ब्राह्मण थे, वे
दोनों तीर्थ यात्रा करनेके लिये चले। वे गया, वाराणसी,
प्रयाग आदि सभी तीर्थोंके दर्शन करके बड़े आनन्दित
होकर मथुरा पहुँचे। मथुरा आकर व्रजके अनेक वनोंके
दर्शन करते हुए वे गोवर्धन आये। इस प्रकार व्रजके
प्रमुख बारह वनोंका दर्शन करके अन्तमें वृन्दावन आ
पहुँचे। वृन्दावनमें वर्तमान श्रीगोविन्दजीके मन्दिरके
स्थानपर उस समय एक विशाल मन्दिर था जिसमें
श्रीगोपालकी राज-सेवा होती थी ॥ 10-13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'द्वादशवन' - बारह वन, जैसे-
भद्र, बेल, लौह, भाण्डीर और महावन, -ये पाँच वन
यमुनाके पूर्वमें; मधु, ताल, कुमुद, बहुला, काम्य, खदीर
और वृन्दावन, -ये बाकी सात वन यमुनाके पश्चिममें
हैं। इन बारह वनोंको देखकर अन्तमें वे 'पाँच-कोसी
वृन्दावन'-नामक स्थान पर गये। तात्पर्य यह है कि
बारह वनोंमें जो वृन्दावन है, इस वृन्दावनसे आरम्भ
होकर नन्दगाँव, बरसानातक सोलह कोस उसका
विस्तार है; उसमें 'पाँच-कोसी वृन्दावन' नामक एक
ग्राम है ॥ 12 ॥
केशीतीर्थ, कालीय-ह्रदादिके कैल स्नान।
श्रीगोपाल देखि' ताँहा करिला विश्राम ॥ 14 ॥
गोपाल-सौन्दर्य दुँहार मन निल हरि'।
सुख पाञा रहे ताँहा दिन दुइ-चारि ॥ 15 ॥
अनुवाद-केशीतीर्थ और कालीय हृद आदिमें
स्नान करके दोनों ब्राह्मणोंने श्रीगोपालका दर्शन किया।
तत्पश्चात् उन्होंने उसी मन्दिरमें विश्राम किया। श्रीगोपालके
सौन्दर्यने उन दोनोंके मनको हर लिया था, इसलिये
प्रसन्नतापूर्वक वे दो-चार दिन वहीं रह गये ॥ 14-15 ॥
दुइविप्र-मध्ये एक विप्र-वृद्धप्राय।
आर विप्र-युवा, ताँर करेन सहाय ॥ 16 ॥
छोटविप्र करे सदा ताँहार सेवन।
ताँहार सेवाय विप्रेर तुष्ट हैल मन ॥ 17 ॥
अनुवाद-दोनों ब्राह्मणोंमेंसे एक ब्राह्मण लगभग
वृद्ध हो गये थे और दूसरा ब्राह्मण युवा था तथा वह
उनकी सब प्रकारसे सहायता करता था। छोटा ब्राह्मण
उनकी सदा सेवा करता था और उसकी सेवासे वृद्ध
ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ 16-17 ॥
विप्र बले,-"तुमि मोर बहु सेवा कैला।
सहाय हञा आर तीर्थ कराइला ॥ 18 ॥
पुत्रेओ पितार ऐछे ना करे सेवन।
तोमार प्रसादे आमि ना पाइलाम श्रम ॥ 19 ॥
कृतघ्नता हय, तोमाय ना कैले सम्मान।
अतएव तोमाय आमि दिब कन्यादान ॥" 20 ॥
अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणने छोटे ब्राह्मणसे कहा, - "तुमने
मेरी बहुत सेवा की है। मेरे सहायक बनकर तुमने मुझे
तीर्थ यात्रा करवायी है। कोई पुत्र भी अपने पिताकी
ऐसी सेवा नहीं करता। तुम्हारी कृपासे मुझे यात्रामें कोई
भी कष्ट नहीं हुआ। यह मेरी कृतघ्नता होगी यदि मैं
तुम्हारा सम्मान नहीं करूँ, इसलिये मैं तुम्हें अपनी
कन्याका दान करूँगा ॥" 18-20 ॥
छोटविप्र कहे,-"शुन, विप्र-महाशय।
असम्भव कह केने, येइ नाहि हय ॥ 21 ॥
। 143

[ 5/21-28 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाकुलीन तुमि-विद्या-धनादि-प्रवीण।
आमि अकुलीन आर धन-विद्या-हीन ॥ 22 ॥
कन्यादान-पात्र आमि ना हइ तोमार।
कृष्णप्रीतये करि तोमार सेवा-व्यवहार ॥ 23 ॥
ब्राह्मण-सेवाय कृष्णेर प्रीति बड़ हय।
ताँहार सन्तोषे भक्ति-सम्पद बाड़य ॥"24 ॥
छोटविप्र बले,-"तोमार स्त्री-पुत्र सब।
बहु ज्ञाति-गोष्ठी तोमार बहुत बान्धव ॥ 26 ॥
ता'-सबार सम्मति बिना नहे कन्यादान।
रुक्मिणीर पिता भीष्मक ताहाते प्रमाण ॥ 27 ॥
भीष्मकेर इच्छा,-कृष्णे कन्या समर्पिते।
पुत्रेर विरोधे कन्या नारिल अर्पिते ॥"28 ॥
अनुवाद-बड़े ब्राह्मणकी बात सुनकर छोटे ब्राह्मणने
कहा,-"हे ब्राह्मण महाशय! सुनिये, आप ऐसी असम्भव
बात क्यों कर रहे हैं जो कभी हो ही नहीं सकती।
आप उच्च कुलके ब्राह्मण हैं और विद्या-धनादिसे
सम्पन्न भी हैं। मैं छोटे कुलका हूँ, उसपर भी निर्धन
और विद्यासे हीन हूँ। मैं आपके कन्यादानका योग्य
पात्र नहीं हूँ। श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये ही मैंने
आपकी सेवा की है, क्योंकि ब्राह्मणकी सेवा करनेसे
श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं। उनके सन्तुष्ट होनेसे
भक्तिरूपी सम्पत्तिकी वृद्धि होती है॥"21-24 ॥
अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा,-"आपके परिवारमें
स्त्री, पुत्रादि सब लोग हैं और आपके जाति-समाजमें
बहुत बन्धु-बान्धव हैं। उन सबकी सम्मतिके बिना
कन्यादान नहीं हो सकता। रुक्मिणीके पिता भीष्मक
इस बातका प्रमाण हैं। भीष्मककी इच्छा थी कि वे
अपनी कन्याको श्रीकृष्णको समर्पित करेंगे, परन्तु अपने
पुत्र रुक्मीके विरोधके कारण वे अपनी कन्याको
श्रीकृष्णको अर्पण न कर सके॥"26-28 ॥
अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे छोटे
ब्राह्मणने भगवद्भक्त बड़े ब्राह्मणकी सेवा की थी, उसके
फलस्वरूप अपने भक्तके सम्मानकी रक्षा करनेके लिये
श्रीगोपालठाकुरने साक्षी दी थी। अन्यथा छोटे ब्राह्मणके
द्वारा इस प्रकार बड़े ब्राह्मणकी सेवा और उसकी
कन्यासे विवाहकी सम्मति आदि क्रियाएँ इन्द्रिय-
सुखभोगके लिये सांसारिक कर्मकाण्ड होतीं और
श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु कभी भी उनका
आदर नहीं करते ॥ 23-24 ॥
अनुभाष्य-(भाः 10/52/21,25)-
"राजासीद्भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान्।
तस्य पञ्चाभवन् पुत्राः कन्यैका रुचिरानना॥ 21 ॥
बन्धूनाममिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप।
ततो निवार्य कृष्णद्विट् रुक्मी चैद्यममन्यत"॥ 25 ॥
अर्थात् "महाराज भीष्मक विदर्भदेशके अधिपति थे।
उनके पाँच पुत्र और एक कन्या (रुक्मिणी) थी।
रुक्मिणीके भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहनका
विवाह श्रीकृष्णसे हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष
रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और
चेदिराज शिशुपालको ही अपनी बहिनके योग्य वर
समझा।" (भाः 10/53/2)-
बड़विप्र कहे,-"तुमि ना कर संशय।
तोमाके कन्या दिब आमि, इथे कि विस्मय ॥"25 ॥
श्रीभगवानुवाच-
"तथाहमपि तच्चित्तो निद्राञ्च न लभे निशि।
वेदाहं रुक्मिणा द्वेषान्ममोद्वाहो निवारितः॥"
अनुवाद-यह सुनकर बड़े ब्राह्मणने कहा,-"तुम
मेरी बातमें संशय मत करो। मैं तुम्हें अपनी कन्याका
दान करूँगा, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?"॥ 25 ॥
अर्थात् "भगवान् श्रीकृष्णने कहा,-"ब्राह्मणदेवता !
जैसे विदर्भराजकुमारी मुझे चाहती है, वैसे मैं भी उन्हें
चाहता हूँ। मेरा चित्त उन्हींमें लगा रहता है। कहाँ तक
144 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/26-39 ]
कहूँ, मुझे रातमें नींद तक नहीं आती। मैं जानता हूँ
कि रुक्मीने द्वेषवश मेरा विवाह रोक दिया है।”
विदर्भराज भीष्मकके ज्येष्ठपुत्र रुक्मीके द्वारा अपनी
बहन रुक्मिणीके हरणके समय श्रीकृष्णको बुरा-भला
कहनेपर उसका श्रीकृष्णके साथ युद्ध हुआ। वह उस
युद्धमें अवश्य ही मारा जाता, परन्तु अपने भाईकी
रक्षाके लिये श्रीकृष्णसे रुक्मिणीके अनुरोधके कारण
उसको जीवनदान मिला। श्रीकृष्णने तलवारके द्वारा
उसकी मूँछ-दाढ़ीके केशोंको कई जगहसे मूँड़कर तथा
उसका मुण्डन करके उसको कुरूप बनाकर छोड़
दिया॥26-28॥
बड़विप्र कहे,—“कन्या मोर निज-धन।
निज-धन दिते निषेधिबे कोन् जन॥29॥
तोमाके कन्या दिब, सबाके करि' तिरस्कार।
संशय ना कर तुमि, करह स्वीकार॥”30॥
अनुवाद—बड़े ब्राह्मणने कहा,—“कन्या मेरी अपनी
सम्पत्ति है, अपनी सम्पत्ति देनेसे मुझे कौन रोक सकता
है? मैं सबका तिरस्कार करके भी तुम्हें ही अपनी
कन्या दूँगा। मेरी इस बातमें संशय किये बिना तुम मेरे
इस प्रस्तावको स्वीकार करो॥”29-30॥
छोटविप्र कहे,—“यदि कन्या दिते आछे मन।
गोपालेर आगे कह ए सत्य-वचन॥”31॥
अनुवाद—छोटे ब्राह्मणने कहा,—“यदि मुझे अपनी
कन्या देनेका आपने निश्चय कर लिया है, तो आप
श्रीगोपालके सामने यह प्रतिज्ञा कीजिये॥”31॥
गोपालेर आगे विप्र कहिते लागिल।
“तुमि जान, निज-कन्या इहारे आमि दिल॥”32॥
छोटविप्र बले,—“ठाकुर, तुमि मोर साक्षी।
तोमा साक्षी बोलाइमु, यदि अन्यथा देखि॥”33॥
अनुवाद—तब गोपालजीके सामने आकर बड़े
ब्राह्मणने कहा,—“हे प्रभो! आप साक्षीके रूपमें जान
लीजिये कि मैंने अपनी कन्या इसको दान की है।”
तब छोटे ब्राह्मणने गोपालजीकी ओर देखते हुए
कहा,—“हे ठाकुरजी! आप मेरे साक्षी हो। मैं आपको
साक्षी देनेके लिये बुलाऊँगा यदि ये ब्राह्मण अपनी
प्रतिज्ञासे मुकर जायेंगे॥”32-33॥
एत बलि' दुइजने चलिला देशेरे।
गुरुबुद्धये छोटविप्र बहु सेवा करे॥34॥
अनुवाद—इतना कहकर दोनों ब्राह्मण अपने देशकी
ओर चल दिये। मार्गमें पहलेकी ही भाँति छोटे ब्राह्मणने
पूज्य मानकर बड़े ब्राह्मणकी बहुत सेवा की॥34॥
देशे आसि' दुइजने गेला निज-घरे।
कतदिने बड़विप्र चिन्तित अन्तरे॥35॥
'तीर्थे विप्रे वाक्य दिलुँ,—केमते सत्य हय।
स्त्री, पुत्र, ज्ञाति, बन्धु जानिबे निश्चय॥'36॥
अनुवाद—विद्यानगर आकर दोनों ब्राह्मण अपने-अपने
घर चले गये। कुछ दिन बाद वृद्ध ब्राह्मण हृदयमें
चिन्ता करने लगे,—'मैंने तीर्थमें ब्राह्मणको जो वचन
दिया था, वह कैसे सत्य हो? अपने स्त्री, पुत्र तथा
सङ्गे-सम्बन्धियोंको अवश्य ही इस बातको बताना
पड़ेगा॥'35-36॥
एकदिन निज-लोक एकत्र करिल।
ता-सबार आगे सब वृत्तान्त कहिल॥37॥
शुनि' सब गोष्ठी तार करे हाहाकार।
“ऐछे बात मुखे तुमि ना आनिबे आर॥38॥
नीचे कन्या दिले कुल याइबेक नाश।
शुनिञा सकल लोक करिबे उपहास॥”39॥
अनुवाद—वृद्ध ब्राह्मणने एक दिन अपने
सगे-सम्बन्धियोंको बुलाया और उनके सामने सारी बात
खोलकर रख दी। वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर सब
। 145

[ 5/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
लोग हाहाकार करने लगे और कहने लगे, - "ऐसी बात
फिर कभी अपने मुखमें मत लाना। नीच जातिमें
अपनी कन्याको देनेपर हमारे कुलकी मर्यादा नष्ट हो
जायेगी। और इस बातको सुनकर सभी लोग हमारा
उपहास करेंगे॥" 37-39॥
विप्र बले, - "तीर्थ-वाक्य केमने करि आन।
ये हउक्, से हउक्, आमि दिब कन्यादान॥" 40॥
अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणने कहा, - "तीर्थयात्रामें मैंने
जो वचन दिया है, उससे मैं कैसे मुकर सकता हूँ?
अब जो होना हो, सो हो, मैं तो उसे ही अपनी कन्या
दान करूँगा॥" 40॥
ज्ञाति लोक कहे, - "मोरा तोमाके छाड़िब।"
स्त्री-पुत्र कहे, - "विष खाइया मरिब॥" 41॥
अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणके अपने वचनपर दृढ़ रहनेकी
बात सुनकर सगे-सम्बन्धी लोग कहने लगे, - "तब हम
तुमसे सब सम्बन्ध तोड़ देंगे।" और उनकी स्त्री और
पुत्रने कहा, - "हम तो विष खाकर मर जायेंगे॥" 41॥
विप्र बले, - "साक्षी बोलाञा करिबेक न्याय।
जिति' कन्या लबे, मोर व्यर्थ धर्म हय॥" 42॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 42॥
अनुभाष्य-वृद्ध ब्राह्मणने कहा, - "मैं अपनी
प्रतिज्ञानुसार छोटे ब्राह्मणको यदि कन्या प्रदान नहीं
करूँगा, तो वह श्रीगोपाल-विग्रहको साक्षीके रूपमें
बुलाकर (न्याय करवा लेगा और) बलपूर्वक मेरी
कन्याको जय कर ही लेगा। ऐसा होनेपर तब तो मेरा
धर्म निष्फल हो जायेगा॥" 42॥
पुत्र बले, - "प्रतिमा साक्षी, सेह दूर देशे।
के तोमार साक्षी दिबे, चिन्ता कर किसे॥ 43॥
'नाहि कहिं'-ना कहिं' ए मिथ्या-वचन।
सबे कहिबे-'मोर किछु नाहिक स्मरण॥' 44॥
तुमि यदि कह, - 'आमि किछुइ ना जानि।'
तबे आमि न्याय करि' ब्राह्मणेरे जिनि॥" 45॥
अनुवाद-तब उनके पुत्रने कहा, - "इस बातकी
साक्षी तो प्रतिमा है और वह भी बहुत दूर देशमें है।
कौन आकर आपके विरुद्ध साक्षी देंगे? आप क्यों
चिन्ता कर रहे हैं। 'मैंने ऐसा नहीं कहा'-आपको ऐसा
झूठ बोलनेकी आवश्यकता नहीं है। आप केवल इतना
ही कहना, - 'मुझे कुछ स्मरण नहीं है।' यदि आप
केवल यही कहें, - 'मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता',
तब मैं तर्कके द्वारा उस ब्राह्मणको जीत लूँगा॥" 43-45॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं कन्या दूँगा, मैंने ऐसा बोला
ही नहीं'-ऐसे झूठे वचन मत कहना, केवल इतना ही
कहना,-'मुझे यह स्मरण नहीं है॥' 44॥
अनुभाष्य-बड़े ब्राह्मणका पुत्र नास्तिक, स्मार्त्त,
सांसारिक विषयोंमें चतुर था, किन्तु उस मूर्खको यह
विश्वास नहीं था कि श्रीविग्रह भी चेतन और विभु हैं।
कठपुतलीकी भाँति श्रीविग्रहको भी शिला-काष्ठादि
समझते हुए उसने अपने पिताजीसे कहा, - "एक तो
यह कि साक्षी प्रतिमा है, इसलिये वह चेतन वस्तुकी
भाँति बात करेगी-यह बात विश्वास करने योग्य नहीं
है। उसपर भी वह तो बहुत दूर है, इसलिये इतनी
दूरसे यहाँ आकर साक्षी देना उसके लिये सम्भव नहीं
होगा। इसलिये आप किसी प्रकारकी चिन्ता मत
कीजिये। आप स्पष्ट रूपसे झूठ बोलकर अपनी
प्रतिज्ञाको सम्पूर्ण रूपसे अस्वीकार मत कीजिये। राजा
युधिष्ठिरके वाक्य "अश्वत्थामा हत इति गजः" की
भाँति, केवल इतना ही कहना और ऐसे ही हाव-भाव
दिखाना कि आपको ऐसा कुछ भी स्मरण नहीं आता
है, अर्थात् आप इस विषयमें कुछ नहीं जानते। आप
यदि ऐसा कहेंगे, तो मैं छोटे ब्राह्मणको कूटतर्कमें
जालमें फँसाकर उसको हरा दूँगा और आपको भी
कन्यादानरूपी विपत्तिसे सबके सामने छुटकारा दिला
दूँगा। इस प्रकार आपकी प्रतिज्ञाको भी टूटनेसे बचाकर
146 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/43-60 ]
कुलके सम्मानकी रक्षा करूँगा।" 'न्याय'-तर्क ॥ 43-45 ॥
एत शुनि' विप्रेर चिन्तित हैल मन।
एकान्त-भावे चिन्ते विप्र गोपाल-चरण ॥ 46 ॥
'मोर धर्म रक्षा पाय, ना मरे निज-जन।
दुइ रक्षा कर, गोपाल, लइनु शरण ॥ '47 ॥
एइमत विप्र चित्ते चिन्तिते लागिल।
आर दिन लघुविप्र ताँर घरे आइल ॥ 48 ॥
अनुवाद-पुत्रकी बातें सुनकर वृद्ध ब्राह्मण मन-ही-मन
बहुत चिन्तित हो गये। एकान्त भावसे श्रीगोपालजीके
श्रीचरणोंको स्मरण करते हुए ब्राह्मण कहने लगे, - हे
गोपाल ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। मेरे धर्मपालनमें
विघ्न न आये और मेरे परिवार भी न मरे, आप
कृपया इन दोनोंकी रक्षा करो।' इस प्रकार वृद्ध ब्राह्मण
चिन्ता करने लगे। तब अगले दिन वह छोटा ब्राह्मण
उनके घर आया ॥ 46-48 ॥
आसिञा परम-भक्त्ये नमस्कार करि'।
विनय करिञा कहे कर-दुइ जुड़ि' ॥ 49 ॥
“तुमि मोरे कन्या दिते करयाछ अङ्गीकार।
एबे किछु नाहि कह, कि तोमार व्यवहार ॥” 50 ॥
एत शुनि' सेइ विप्र रहे मौन धरि'।
ताँर पुत्र मारिते आइल हाते ठेङ्गा करि' ॥ 51 ॥
“अरे अधम! मोर भगनी चाह विवाहिते।
वामन हञा चन्द्रे येन चाह त' धरिते ॥” 52 ॥
अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने उनको आदरपूर्वक प्रणाम
किया और हाथ जोड़कर विनय करने लगा, - “आपने
मुझे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, परन्तु अब
आप उस विषयमें कुछ नहीं कह रहे। यह कैसा
आपका व्यवहार है?" छोटे ब्राह्मणकी बात सुनकर
वृद्ध ब्राह्मण कुछ नहीं बोले, परन्तु उनका पुत्र उस
छोटे ब्राह्मणको मारनेके लिये हाथमें लाठी लेकर आया
और कहने लगा, - “अरे अधम ! तू मेरी बहनसे विवाह
करना चाहता है? बौना होकर तू चाँदको पकड़ना
चाहता है ॥"49-52 ॥
ठेङ्गा देखि' सेइ विप्र पलाञा गेल।
आर दिन ग्रामेर लोक एकत्र करिल ॥ 53 ॥
सब लोक बड़विप्रे डाकिया आनिल।
तबे सेइ लघुविप्र कहिते लागिल ॥ 54 ॥
“इँहो मोरे कन्या दिते करयाछे अङ्गीकार।
एबे ये ना देन, पूछ इँहार व्यवहार ॥” 55 ॥
तबे सेइ विप्रेरे पृछिल सर्वजन।
“कन्या केने ना देह, यदि दियाछ वचन ॥” 56 ॥
अनुवाद-लाठी देखकर छोटा ब्राह्मण वहाँसे भाग
गया, परन्तु अगले दिन उसने गाँवके सभी लोगोंको
इकट्ठा कर लिया और उन्हें सब बात बतलायी। उसकी
बात सुनकर गाँवके लोग बड़े ब्राह्मणको बुलाकर ले
आये। तब छोटे ब्राह्मणने कहा, - “इन्होंने मुझे अपनी
कन्या देनेका वचन दिया था, परन्तु अब मुझे अपनी
कन्याका दान नहीं दे रहे हैं, आप इनसे पूछिये कि
ये ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?" तब सभी लोगोंने
बड़े ब्राह्मणसे पूछा, - “यदि तुमने इसे अपनी कन्या
देनेका वचन दिया था, तो तुम इसे कन्यादान क्यों नहीं
करते? ॥"53-56 ॥
विप्र कहे, - “शुन, लोक, मोर निवेदन।
कबे कि बलियाछि, मोर नाहिक स्मरण ॥” 57 ॥
एत शुनि' ताँर पुत्र वाक्य-छल पाञा।
प्रगल्भ हइया कहे सम्मुखे आसिञा ॥ 58 ॥
“तीर्थयात्राय पितार सङ्गे छिल बहु धन।
धन देखि' एइ दुष्टेर लैते हैल मन ॥ 59 ॥
आर केह सङ्गे नाहि, एइ सङ्गे एकल।
धुतुरा खाओयाञा बापे करिल पागल ॥ 60 ॥
। 147

[ 5/57-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सब धन लञा कहे,-'चोरे लइल धन।'
'कन्या दिते चाहियाछे'-उठाइल वचन ॥61॥
तोमरा सकल लोक करह विचारे।
मोर पितार कन्या दिते योग्य कि इहारे॥' 62 ॥
अनुवाद-बड़े ब्राह्मणने कहा,-"आप लोग मेरा
निवेदन सुनिये। मैंने कब क्या कहा था, मुझे ठीकसे
स्मरण नहीं है।" यह सुनकर बड़े ब्राह्मणके पुत्रको
वाक्-चातुरी दिखानेका अवसर मिल गया। वह निर्लर्ज
होकर सबसे कहने लगा, - "तीर्थयात्रामें मेरे पिताजीके
पास बहुत धन था। धनको देखकर इस दुष्टको उसे
लेनेकी इच्छा हुई। मेरे पिताजीके साथ उस समय और
कोई भी नहीं था, केवल यही अकेला था। इसने धतूरा
खिलाकर मेरे पिताजीको पागल कर दिया और उनका
सारा धन हड़पकर कहने लगा कि 'चोर सब धन ले
गये।' और अब यह ऐसी बात उठा रहा है कि 'मेरे
पिताजी इसे कन्यादान करना चाहते थे।' आप सब
लोग अब विचार करो कि क्या यह मेरे पिताजीकी
कन्या देने योग्य है?" 57-62॥
अनुभाष्य- 'छल'- वक्ता जिस शब्दका जिस अर्थमें
प्रयोग करता है, उस शब्दके उस अर्थको ग्रहण न
करके उसके विपरीत अर्थकी कल्पना करके प्रतिवादी
जो सब मिथ्या दोषारोपण करता है, वही 'छल'
है॥ 58 ॥
एत शुनि' लोकेर मने हइल संशय।
'सम्भवे,- धनलोभे छाड़े धर्मभय ॥'63 ॥
अनुवाद-बड़े ब्राह्मणके पुत्रकी बात सुनकर लोगोंके
मनमें भी संशय हो गया कि ऐसा सम्भव है, क्योंकि
धनके लोभमें लोग धर्मके भयको छोड़ देते हैं॥'63॥
अनुभाष्य-धनके लोभसे लोगोंका धर्म-अधर्मका
विवेक लुप्त हो जाता है, इसलिये छोटा ब्राह्मण उस
समय धनकी लालसासे बड़े-ब्राह्मणके ऊपर अत्याचार
कर भी सकता था,-लोगोंने इस प्रकार सन्देह किया॥ 63 ॥
तबे छोटविप्र कहे, "शुन, महाजन।
न्याय जिनिबारे कहे असत्य-वचन ॥ 64 ॥
एइ विप्र मोर सेवाय तुष्ट यबे हैला।
'तोरे आमि कन्या दिब' आपने कहिला ॥ 65 ॥
तबे मुञि निषेधिनु, - 'शुन, द्विजवर।
तोमार कन्यार योग्य नहि मुञि वर ॥ 66 ॥
काँहा तुमि पण्डित, धनी, परम-कुलीन।
काँहा मुञि दरिद्र, मूर्ख, नीच, कुलहीन ॥'67॥
तबु एइ विप्र मोरे कहे बार बार।
'तोरे कन्या दिब, तुमि करह स्वीकार ॥'68॥
तबे आमि कहिलाङ,-'शुन, महामति।
तोमार स्त्री-पुत्र-ज्ञातिर ना हबे सम्मति ॥ 69 ॥
कन्या दिते नारिबे, हबे असत्य-वचन।'
पुनरपि कहे विप्र करिया यतन ॥ 70 ॥
'कन्या तोरे दिब, द्विधा ना करिह चित्ते।
आत्मकन्या दिब, केबा पारे निषेधिते ॥ '71 ॥
अनुवाद-तब छोटे ब्राह्मणने कहा, "सुनो, महाजन !
तर्कके द्वारा मुझसे जीतनेके लिये ही यह झूठ बोल
रहा है। मेरी सेवासे सन्तुष्ट होकर इन ब्राह्मणने जब
स्वयं ही कहा था, - 'मैं तुम्हें अपनी कन्याका दान
करूँगा।' तब मैंने मना करते हुए कहा था, - 'हे
ब्राह्मणश्रेष्ठ ! सुनो, मैं आपकी कन्याके लिये योग्य वर
नहीं हूँ। कहाँ तो आप पण्डित, धनवान और परम
कुलीन हैं और कहाँ मैं दरिद्र, मूर्ख, नीच और
कुलहीन हूँ।' किन्तु तब भी इन ब्राह्मणने मुझसे
बार-बार कहा था, - 'मैं तुम्हें ही अपनी कन्या-दान
करूँगा, तुम बस स्वीकार करो।' तब मैंने कहा
था, - 'सुनिये, मान्यवर ! आपके स्त्री, पुत्र और सगे-सम्बन्धी
इस बातसे सहमत नहीं होंगे। आप अपनी कन्या मुझे
नहीं दे पायेंगे और आपका वचन असत्य हो जायेगा।'
किन्तु फिर भी इन्होंने ज़ोर देकर कहा था, - 'मैं तुम्हें
148 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/64-85 ]

अपनी कन्याका दान करूँगा, मनमें कोई दुविधा मत
रखो। मैं अपनी कन्याका दान करूँगा, ऐसा करनेसे
मुझे कौन रोक सकता है?' ॥ 64-71 ॥

तबे आमि कहिलाङ दृढ़ करि' मन।
'गोपालेर आगे कह ए-सत्य-वचन ॥' 72 ॥

तबे इँहो गोपालेर आसिया कहिल।
'तुमि जान, एइ विप्रे कन्या आमि दिल ॥' 73 ॥

तबे आमि गोपालेरे साक्षी करिञा।
कहिलाङ ताँर पदे प्रणत हइञा ॥ 74 ॥

'यदि एइ विप्र मोरे ना दिबे कन्यादान।
साक्षि बोलाइमु तोमाय, हइओ सावधान ॥' 75 ॥

एइ वाक्ये साक्षी मोर आछे महाजन।
याँर वाक्य सत्य करि' माने त्रिभुवन ॥' 76 ॥

अनुवाद-तब मैंने भी निश्चय करके कहा, - 'आप
गोपालजीके सामने यह सत्य प्रतिज्ञा करो।' तब
गोपालजीके सामने इन्होंने कहा था, - 'हे प्रभो! आप
साक्षी हों कि मैंने इस ब्राह्मणको अपनी कन्या दान
की है।' तब मैंने भी गोपालजीको साक्षी बनाकर उनके
चरणोंमें प्रणत होकर कहा था, - 'यदि ये ब्राह्मण मुझे
अपनी कन्यादान नहीं करेंगे, तो मैं आपको साक्षी
देनेके लिये बुलाऊँगा, आप इस बातका ध्यान रखना।'
मेरे इन वचनोंके साक्षी वे परदेवता श्रीगोपाल हैं,
जिनके वचनोंको त्रिभुवन सत्य मानता है ॥' 72-76 ॥

अनुभाष्य- 'महाजन' - देवता ॥ 76 ॥

तबे बड़विप्र कहे, - 'एइ सत्य कथा।
गोपाल यदि साक्षी देन, आपने आसिं' एथा ॥ 77 ॥

तबे कन्या दिब आमि, जानिह निश्चय।'
ताँर पुत्र कहे, - 'एइ भाल बात हय ॥' 78 ॥

अनुवाद-यह सुनकर बड़े ब्राह्मणने कहा,- “यह
बात ठीक है। यदि गोपालजी स्वयं यहाँ आकर साक्षी
देंगे, तब मैं अवश्य ही इस ब्राह्मणको अपनी कन्याका
दान दूँगा।” बड़े ब्राह्मणके पुत्रने भी इसमें सहमति
जताते हुए कहा,- “यही बात ठीक है॥” 77-78 ॥

बड़विप्रेर मने, - 'कृष्ण बड़ दयावान्।
अवश्य मोर वाक्य तँहो करिबे प्रमाण ॥' 79 ॥

पुत्रेर मने, - 'प्रतिमा ना आसिबे साक्षी दिते।'
एइ बुद्धये दुइजन हइला सम्मते ॥ 80 ॥

अनुवाद-बड़े ब्राह्मणके मनमें विश्वास था, - 'श्रीकृष्ण
बड़े दयावान् हैं, वे आकर अवश्य ही साक्षी देकर मेरे
वाक्योंकी सत्यताको प्रमाणित करेंगे।' बड़े ब्राह्मणके
पुत्रके मनमें विचार था, - 'प्रतिमा कभी भी साक्षी देनेके
लिये यहाँ नहीं आयेगी।' इस प्रकार मन-ही-मन विचार
करके दोनों ही इस बातपर सहमत हो गये ॥ 79-80 ॥

छोटविप्र बले,- 'पत्र करह लिखन।
पुनः येन नाहि चले एसब वचन ॥' 81 ॥

तबे सब लोक मेलि' पत्र त' लिखिल।
दुँहार सम्मति लञा मध्यस्थ राखिल ॥ 82 ॥

अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा, - “अपने जो अभी
कहा है, उसे लिखकर दें, जिससे आप फिर अपने
वचनोंसे मुकर न जाँय ।” तब सभी लोगोंने मिलकर
इस आशयका एक पत्र लिखा तथा उन दोनों ब्राह्मणोंके
हस्ताक्षर करवाकर उनकी सहमतिसे गाँवके सभी लोग
बिचौलिये बन गये ॥ 81-82 ॥

तबे छोटविप्र कहे, - 'शुन, सर्वजन।
एइ विप्र - सत्य-वाक्, धर्मपरायण ॥ 83 ॥

स्ववाक्य छाड़िते इँहार नाहि कभु मन।
स्वजन-मृत्यु-भये कहे असत्य-वचन ॥ 84 ॥

इँहार पुण्ये कृष्णे आनि' साक्षी बोलाइब।
तबे एइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥' 85 ॥

अनुवाद-तब छोटे ब्राह्मणने कहा, - “आप सभी

॥ 149

[ 5/83-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
लोग सुनिये ! ये ब्राह्मण सत्यवादी और धर्मपरायण हैं।
अपनी प्रतिज्ञाको तोड़नेकी इनकी कभी इच्छा नहीं थी,
किन्तु अपने स्वजनोंकी मृत्युके भयसे ही इन्होंने
असत्य वचन कहे हैं। मैं इनके पुण्यके प्रभावसे
श्रीकृष्णको साक्षी देनेके लिये यहाँ लाऊँगा, तब इन
ब्राह्मणकी प्रतिज्ञाकी सत्यताकी रक्षा करूँगा॥" 83-85 ॥
एत शुनि' नास्तिक लोक उपहास करे।
केह बोले, 'ईश्वर-दयालु, आसितेह पारे ॥' 86 ॥
अनुवाद-छोटे ब्राह्मणकी बातको सुनकर कुछ
नास्तिक लोग उसका उपहास करने लगे। परन्तु
किसीने कहा, - 'ईश्वर बहुत दयालु हैं, वे आ भी
सकते हैं ॥' 86 ॥
अनुभाष्य- 'नास्तिक' - क्योंकि श्रीकृष्णकी परमेश्वरता
और भक्तवात्सल्यताके ऊपर विश्वास न करके उनकी
अर्च्चाविग्रहमें भौम-बुद्धि थी अर्थात् वे उन्हें एक
पत्थर-काठ आदिसे बनी जड़वस्तु माननेवाले थे ॥ 86 ॥
तबे सेइ छोटविप्र गेला वृन्दावन।
दण्डवत् करि' कहे सब विवरण ॥ 87 ॥
“ब्रह्मण्यदेव ! तुम्मि-बड़ दयामय।
दुइ विप्रेर धर्म राख हञा सदय ॥ 88 ॥
कन्या पाब,-मोर मने इहा नाहि सुख।
ब्राह्मणेर प्रतिज्ञा याय, - एइ बड़ दुःख ॥ 89 ॥
एत जानि' तुमि साक्षी देह, दयामय।
जानि' साक्षी नाहि देय, तार पाप हय ॥” 90 ॥
अनुवाद-तब छोटा ब्राह्मण वृन्दावनकी ओर चल
दिया। वहाँ पहुँचकर गोपालजीके सामने दण्डवत् प्रणाम
करके वह सब वृत्तान्त सुनाने लगा, - "आप ब्राह्मणोंके
रक्षक और परम दयालु हो। कृपा करके हम दोनों
ब्राह्मणोंके धर्मकी रक्षा कीजिये। मेरे मनमें ऐसी बात
नहीं है कि उनकी कन्या पाकर मैं संसार-सुख भोग
करूँगा। उन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञा भङ्ग होगी, यही मेरे
लिये बड़े दुःखकी बात है। हे दयामय ! यह जानकर
आप चलकर साक्षी दीजिये, क्योंकि जो किसी बातको
जानकर भी समय आनेपर जान-बूझकर साक्षी नहीं
देता, उसे पाप लगता है [आपको तो कोई पाप स्पर्श
नहीं कर सकता, परन्तु यदि आप साक्षी नहीं देंगे, तो
उन ब्राह्मणको पाप लगेगा, इसलिये आप अवश्य ही
चलिये]॥" 87-90 ॥
अनुभाष्य-मैं बड़े ब्राह्मणकी कन्यासे विवाह करके
अपने इन्द्रिय-भोगसुख वर्धनकी लालसासे आपको
साक्षी देनेके लिये नहीं कह रहा हूँ, अपितु आपके
भक्त उन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञा-भङ्ग होनेसे उनको लगनेवाले
पापसे उद्धार करके उनके वाक्योंकी रक्षाके लिये ही
आपसे साक्षी देनेके लिये कह रहा हूँ ॥ 89 ॥
कृष्ण कहे, - “विप्र, तुमि याह स्वभवने।
सभा करि' मोरे तुमि करिह स्मरणे ॥ 91 ॥
आविर्भाव हञा आमि ताँहा साक्षी दिब।
तबे दुइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥” 92 ॥
अनुवाद-छोटे ब्राह्मणकी बातको सुनकर श्रीकृष्णने
कहा,- 'हे ब्राह्मण ! तुम अपने घर लौट जाओ। वहाँ
सबको बुलाकर एक सभा करना और तुम मेरा स्मरण
करना। मैं वहाँ सबके सामने आविर्भूत होऊँगा तथा
साक्षी देकर तुम दोनों ब्राह्मणोंकी प्रतिज्ञाकी रक्षा
करूँगा॥" 91-92 ॥
विप्र बले, - “यदि हओ चतुर्भुज-मूर्त्ति।
तबु तोमार वाक्य कारु ना हबे प्रतीति ॥ 93 ॥
एइ मूर्त्ति गिया, यदि एइ श्रीवदने।
साक्षी देह यदि, तबे सर्व लोक सुने ॥” 94 ॥
अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा, - "यदि आप चतुर्भुज
रूपमें प्रकट होकर साक्षी देंगे, तो भी आपके वाक्योंपर
किसीको विश्वास न होगा। परन्तु यदि आप अपने
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पाँचवाँ अध्याय 5/93-105 ]

इसी श्रीगोपालरूपसे वहाँ आयेंगे और श्रीमुखसे साक्षी ब्राह्मण! मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा। परन्तु तुम कभी
देंगे, तभी सब लोग विश्वास करेंगे॥"93-94॥ भी मुझे मुड़कर मत देखना। यदि तुम मुझे पीछे
कृष्ण कहे, — "प्रतिमा चले, कोथाह ना शुनि।" मुड़कर देखोगे, तो मैं उसी स्थानपर ही रह जाऊँगा।
विप्र बले, — "प्रतिमा हञा कह केने वाणी॥95॥ केवल मेरे नूपुरकी ध्वनिको सुनकर समझना कि मैं
प्रतिमा नह तुमि, — साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन। तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ। प्रतिदिन एक सेर
विप्र लागि' कर तुमि अकार्य-करण॥"96॥ (लगभग एक किलो) चावल पकाकर मुझे भोग लगाना,
अनुवाद - श्रीकृष्णने कहा, — "प्रतिमा चलकर जाती उसे खाकर मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलता रहूँगा॥"97-100॥
है, ऐसा तो कहीं नहीं सुना है।" छोटे ब्राह्मणने आर दिन आज्ञा मागि' चलिला ब्राह्मण।
कहा, — "तो प्रतिमा होकर आप बोल कैसे रहे हैं? तार पाछे पाछे गोपाल करिला गमन॥101॥
आप जड़मय प्रतिमा नहीं, बल्कि साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन नूपुरेर ध्वनि शुनि' आनन्दित मन।
हैं। अपने भक्त ब्राह्मणके धर्मकी रक्षाके लिये आप वह उत्तमान्न पाक करि' कराय भोजन॥102॥
कार्य कर सकते हैं जिसे आपने पहले कभी नहीं अनुवाद - अगले दिन श्रीगोपालकी अनुमति लेकर
किया [अर्थात् मेरे साथ चलकर साक्षी दीजिये]॥"95-96॥ ब्राह्मण अपने घरकी ओर चल पड़ा और गोपालजी भी
अमृतप्रवाह भाष्य-ब्राह्मणके उपकारके लिये आप उसके पीछे-पीछे चलने लगे। गोपालजीके नूपुरकी
न करनेवाले कार्योंको भी करते हो॥96॥ ध्वनिको सुनकर ब्राह्मणके मनमें बहुत आनन्द हो रहा
अनुभाष्य-छोटे ब्राह्मणको कोई विष्णुके अर्चाविग्रहमें था और वह प्रतिदिन उत्तम कोटिके चावल पकाकर
पत्थर-काष्ठादि बुद्धि रखनेवाला मूर्तिपूजक न समझ ले, गोपालजीको भोग लगाता॥ 101-102॥
इसलिये इस प्रकारके अपयशसे बचानेके लिये ही एइमते चलि' विप्र निज-देशे आइला।
उसकी परीक्षाके लिये भगवान्ने ऐसा प्रश्न किया। और ग्रामेर निकट आसि' मनेते चिन्तिला॥103॥
ब्राह्मणने भी सर्वेश्वरके ईश्वर विष्णुकी ईश्वरतामें पूर्ण 'एबे मुञि ग्रामे आइनु, याइमु भवने।
विश्वास रखनेवाले भक्तके समान ही उत्तर दिया॥95-96॥ लोकेरे कहिब गिया साक्षीर गमने॥104॥
हासिञा गोपाल कहे, — "शुनह ब्राह्मण। साक्षाते ना देखिले मने प्रतीति ना हय।
तोमार पाछे पाछे आमि करिब गमन॥97॥ इँहा यदि रहेन, तबु नाहि किछु भय॥'105॥
उलटिया आमा ना करिह दर्शने। अनुवाद - इस प्रकार चलते-चलते छोटा ब्राह्मण
आमाके देखिले, आमि रहिब सेइ स्थाने॥98॥ अपने देशमें आ गया। अपने गाँवके निकट आकर
नूपुरेर ध्वनिमात्र आमार शुनिबा। उसने मनमें सोचा,- 'अब मैं अपने गाँवमें आ गया हूँ
सेइ शब्दे आमार गमन प्रतीति करिबा॥99॥ और अपने घरमें जाऊँगा। फिर सभी लोगोंको जाकर
एकसेर अन्न रान्धि' करिह समर्पण। साक्षीके आनेकी बातको कहूँगा। परन्तु लोग यदि
ताहा खाञा तोमार सङ्गे करिब गमन॥" 100॥ गोपालजीको साक्षात् रूपमें नहीं देखेंगे, तो उन्हें
अनुवाद - तब श्रीगोपालने हँसते हुए कहा, — "सुनो विश्वास नहीं होगा। और यदि मेरे मुड़कर देखनेपर

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