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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 14/21-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तोंके द्वारा राजाके भाग्यकी प्रशंसा :- प्रतापरुद्रेर भाग्य देखि' भक्तगणे। राजारे प्रशंसे सबे आनन्दित-मने ॥ 21 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रके सौभाग्यको देखकर सभी भक्तको बहुत आनन्द हुआ और वे उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ 21 ॥ महाप्रभु और भक्तोंकी वन्दना करके राजाका प्रस्थान :- दण्डवत् करि' राजा बाहिरे चलिला। योड़ हस्त करि' सब भक्तेरे वन्दिला ॥ 22 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने हाथ जोड़कर सभी भक्तोंकी वन्दना की और महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके बाहर चले आये ॥ 22 ॥ सभीके मध्याह्न स्नानके बाद श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रचुर प्रसाद लाना :- मध्याह्न करिला प्रभु लञा भक्तगण। वाणीनाथ प्रसाद लञा करिल गमन ॥ 23 ॥ सार्वभौम-रामानन्द-वाणीनाथे दिया। प्रसाद पाठाल राजा बहुत करिया ॥ 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने भक्तोंको साथ लेकर मध्याह्न स्नान किया। उधर श्रीवाणीनाथ सबके लिये प्रसाद लेने गये। राजा प्रतापरुद्रने श्रीसार्वभौम, श्रीरामानन्द राय और श्रीवाणीनाथके द्वारा बहुतसा प्रसाद भिजवा दिया ॥ 23-24 ॥ विचित्र प्रसाद :- 'बलगाण्डि भोगे'र प्रसाद-उत्तम अनन्त। 'नि-सकड़ि' प्रसाद आइल, यार नाहि अन्त ॥ 25 ॥ छाना, पाना, पैड़, आम्र, नारिकेल, काँठाल। नानाविध कदली, आर बीज-ताल ॥ 26 ॥ नारङ्ग, छोलङ्ग, टावा, कमला, बीजपूर। बादाम, छोहारा, द्राक्षा, पिण्डखर्जूर ॥ 27 ॥ मनोहरा, लाडु आदि शतेक प्रकार। अमृतगुटिका-आदि, क्षीर्सा अपार ॥ 28 ॥ अमृतमण्डा, सरवती, आर कुम्ड़ा-कुरी। रसामृत, सरभाजा आर सरपुरी ॥ 29 ॥ हरिवल्लभ, सेंओति, कर्पूर, मालती। डालि-मरिच-लाडु, नवात, अमृति ॥ 30 ॥ पद्मचिनि, चन्द्रकान्ति, खाजा, खण्डसार। वियरि, कदमा, तिलाखाजार प्रकार ॥ 31 ॥ नारङ्ग-छोलङ्ग-आम्र-वृक्षेर आकार। फूल-फल-पत्रयुक्त खण्डेर विकार ॥ 32 ॥ दधि, दुग्ध, ननी, तक्र, रसाला, शिखरिणी। स-लवण, मुद्गाङ्कुर, आदा खानि खानि ॥ 33 ॥ लेम्बु-कुल आदि नानाप्रकार आचार। लिखिते ना पारि प्रसाद कतेक प्रकार ॥ 34 ॥ अनुवाद—'बलगाण्डि' पर लगनेवाले भोगका प्रसाद उत्तम कोटिका और मात्रामें अनन्त होता है। राजाने 'नि-सकड़ि' अर्थात् जो पकाया न गया हो, वह प्रसाद इतना भेजा जिसका कोई अन्त नहीं था। उस प्रसादमें दही, फलोंका रस, डाब (पानीवाला नारियल), आम, सूखा नारियल, कटहल, अनेक प्रकारके केले और तालके बीज थे। नारङ्गी, मौसमी, गलगल, संतरा, कीनू आदि अनेक प्रकारके नींबू-जातीय फल थे। बादाम, छुहारा, किशमिश, खजूर आदि मेवा थे। मनोहर आदि सैकड़ों प्रकारके लड्डू, अमृत-गुटिका आदि मिठाइयाँ, अनेक प्रकारकी खीर थी। पपीता, मौसमी, पेठेकी मिठाई, मलाई लड्डू, मलाईको घीमें भूनकर बनायी गयी मिठाई और मलाईका मिश्रण देकर बनी एक प्रकारकी पूरी थी। घीमें बनायी गयी मीठी रोटी, सफेद गुलाब, कर्पूर और मालतीके फूलोंसे बनी मिठाइयाँ, मूँग दालके लड्डू, नवात (एक प्रकारकी मिठाई), इमरती, कमलके पुष्पसे बनायी चीनी, उड़दकी दालसे बनी रोटी और पूरी, खाजा, गुड़की मिठाई, चावलको भूनकर गुड़में मिलाकर बनी मिठाई, तिलकी मिठाई, तिलकी गजक आदि अनेक प्रकारके व्यञ्जन थे। संतरा, 532 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/23-38 ] मौसमी, आम आदिके वृक्षके आकारकी फूल-फल-पत्तॉसे 'चन्द्रकान्ति' - उड़दकी दालकी बनी चन्द्राकारकी फुलबड़ी। युक्त चीनीसे बनी मिठाइयाँ (खिलौने) भी थीं। दही, 'वियरि' - विरण धानके चावलको भूनकर बनाये गये दूध, माखन, छाछ, शिकञ्जी, शिखरिणी (दही, चीनी, मिठाईके टुकड़े। 'कद्मा'-चावलोंको पीसकर चीनीके शहद, कर्पूर आदिके मिश्रणसे बनी), अदरकके टुकड़ोंके रसमें बनायी गयी बहुत कठोर अति प्रसिद्ध मिठाई। साथ अङ्कुरित मूँगकी नमकीन दाल भी थी। नींबू तथा 'तिलेखाजा'-खाजाके साथ घीमें भूने हुए तिलसे बनी बेर आदिसे बने अनेक प्रकारके आचार थे। भगवान् मिठाई। 'तक्र'-छाछ। 'रसाला'-शरबत, पाना। श्रीजगन्नाथको कितनी प्रकारका भोग लगा था, मैं उसका 'खानि-खानि'-छोटे-छोटे टुकड़े। नींबूका आचार और वर्णन नहीं कर सकता ॥ 23-34 ॥ बेरका आचार; पूर्वबङ्गालमें चलती भाषामें 'नींबू'को अमृतप्रवाह भाष्य- 'नि-सकड़ि'-दही, दूध, फल, लेम्बू कहते है ॥ 26-34 ॥ मूल आदि जो पकाया नहीं गया है। प्रसादके पात्रोंसे बहुतसे स्थानका घिर जाना :- 'पैड़'-डाब (हरा नारियल); (पाठान्तरमें, 'पैरा'- प्रसादे पूरित हइल अर्द्ध उपवन। खजूर और ताड़के रससे बना शीरा।) देखिया सन्तोष हैल महाप्रभुर मन ॥ 35 ॥ चीनीसे बनाया गये 'नारङ्गी', 'मौसमी', 'कीनू', जगन्नाथकी तृप्तिके स्मरणसे महाप्रभुको हर्ष :- 'संतरा' आदि नींबूजातीय फल और आमके वृक्षके एइमत जगन्नाथ करेन भोजन। आकारकी मिठाई (खिलौने) ॥ 25-32 ॥ एइ सुखे महाप्रभुर जुड़ाय नयन ॥ 36 ॥ अनुभाष्य-ग्रन्थकारका कृष्ण-नैवेद्यका विचित्रता- केयापत्र-द्रोणी आइल बोझा पाँच-सात। विषयक ज्ञान प्रकाशित हो रहा है- एक एक जने दश दोना दिल, -एत पात ॥ 37 ॥ 'बीजताल'-कच्चे ताल का फल। संतरा आदि अनुवाद-आधा उपवन प्रसादके पात्रोंसे ही भर सभी नींबूजातिके फल हैं। 'बीजपूर'-अनार अथवा गया, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत सन्तोष गलगल (?)। 'छोहारा'-छुआरा (सूखी खजूर)। हुआ। श्रीजगन्नाथने इतनी मात्रामें ऐसे स्वादिष्ट व्यञ्जनोंका 'द्राक्षा'-अंगूर। 'मनोहरा'-एक विशेष प्रकारकी बनी भोजन किया है, इस सुखमें ही महाप्रभुके नेत्र शीतल मिठाई, जिसे संदेश कहते हैं। 'क्षीरसा'-पूर्व बङ्गालमें हो रहे थे। पाँच-सात बोरियाँ भरकर केतकी वृक्षके चलती भाषामें 'क्षीर अर्थात् दूध' को ही क्षीरसा कहते पत्ते और दोने आये। एक-एक भक्तके आगे दस-दस हैं। पाठान्तरमें 'अमृतभण्डा'-पपीता; 'सरबती'-एक दोने और एक-एक पत्ता रखा गया ॥ 35-37 ॥ विशेष प्रकारका उत्कृष्ट नींबू। 'सरभाजा' और अनुभाष्य- 'केयापत्र-द्रोणी'-केतकी वृक्षके पत्तोंसे 'सरपुरी'-नदीया जिलेके कृष्णनगर अञ्चलमें विशेषरूपसे बना दोना ॥ 37 ॥ बनायी जानेवाली मिठाई। 'हरिवल्लभ'-घीमें बनायी कीर्त्तन करते-करते थक गये भक्तोंकी गयी विशेष प्रकारकी रोटी (?), 'सेंउति'-विशेष स्वयं भगवान्‌के द्वारा ही सेवा :- सुगन्धित पुष्प। 'कर्पूर'-विशेष पुष्प(?)। कीर्त्तनीयार परिश्रम जानि' गौरराय। 'डाल-मरिच-लाडु'-मूँगकी दालका लड्डू (?) ताँ-सबारे खाओयाइते प्रभुर मन धाय ॥ 38 ॥ 'नवात'-चीनीके रसमें पका विशेष मिष्ठान्न-द्रव्य। अनुवाद-कीर्त्तनकारी भक्तोंके परिश्रमको जानकर 'अमृति'-'जलेबी'-जातीय घीमें पकी मिठाई (इमरती) (पूर्व बङ्गालमें विशेष रूपसे बनती है)। । 533

[ 14/38-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगौररायका मन उन्हें पेट भर प्रसाद खिलानेके लिये उत्कण्ठित हो रहा था ॥ ३८॥ महाप्रभु स्वयं परिवेशान करनेवाले :- पाँति पाँति करि' भक्तगणे बसाइला। परिवेशान करिबारे आपने लागिला ॥ ३९॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको पंक्तियाँ बनाकर बैठा दिया और वे स्वयं प्रसादका परिवेशान करने लगे॥ ३९॥ अनुभाष्य—'पाँति'—पंक्ति बनाकर ॥ ३९॥ महाप्रभुके द्वारा भोजन न करनेसे सभीकी भोजन करनेमें अरुचि :- प्रभु ना खाइले, কেহ ना करे भोजन। स्वरूप-गोसाञि तबे कैल निवेदन ॥ ४० ॥ भक्तोंका पक्ष लेकर श्रीस्वरूपकी प्रार्थना :- “आपने बैस, प्रभु, भोजन करिते। तुमि ना खाइले, কেহ ना पारे खाइते ॥" ४१ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भोजन न करनेसे कोई भी भोजन नहीं कर रहा था। तब श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे निवेदन किया,―"प्रभो ! आप भोजन करनेके लिये बैठिये। जब तक आप भोजन नहीं करेंगे, तब तक कोई भी प्रसाद ग्रहण नहीं करेगा॥" ४०-४१॥ प्रभुके द्वारा प्रसाद सेवन :- तबे महाप्रभु कैसे निजगण लञा। भोजन कराइल सबाके आकण्ठ पूरिया ॥ ४२ ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठ गये और उन्होंने सभी भक्तोंको कण्ठ तक भरकर भोजन कराया॥ ४२ ॥ भोजनके बाद आचमन, बहुत लोगोंको भी अतिरिक्त प्रसादकी प्राप्ति :- भोजन करि' बसिला प्रभु करि' आचमन। प्रसाद उबरिल, खाय सहस्रेक जन ॥ ४३ ॥ दीन-दुःखी-कङ्गालोंको महाप्रभुकी कृपासे प्रसाद-प्राप्ति :- प्रभुर आज्ञाय गोविन्द दीन-हीन जने। दुःखी काङ्गाल आनि' कराय भोजने ॥ ४४ ॥ अनुवाद—भोजन करनेके पश्चात् महाप्रभु आचमन करके बैठ गये। तब उन्होंने देखा कि इतना प्रसाद बच गया है कि अभी और हजारों व्यक्ति भोजन कर सकते हैं। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीगोविन्दने दीन-हीन, दुःखी तथा दरिद्र लोगोंको बुलाकर उन्हें भोजन कराया॥ ४३-४४॥ अनुभाष्य—'उवरिल'—अतिरिक्त (अधिक) हुआ॥ ४३॥ गौरहरिके द्वारा कङ्गालोंको भोजन करते हुए देखना और हरिकीर्त्तन करनेका उपदेश :- काङ्गालेर भोजन-रङ्ग देखे गौरहरि। 'हरिबोल' बलि' तारे उपदेश करि ॥ ४५ ॥ काङ्गालोंको हरिभक्तिकी प्राप्ति :- 'हरिबोल' बलि' काङ्गाल प्रेमे भासि' याय। ऐछन अद्भुत लीला करे गौरराय ॥ ४६ ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने दरिद्रोंको भोजन करते देखकर उन्हें 'हरिबोल' बोलनेका उपदेश दिया। 'हरिबोल' बोलकर दरिद्र व्यक्ति भी प्रेममें डूबे जा रहे थे। श्रीगौरराय ऐसी अद्भुत लीला करते हैं॥ ४५-४६॥ रथ-सञ्चालनमें गौड़ोंका असामर्थ्य :- इँहा जगन्नाथेर रथ-चलन-समय। गौड़ सब रथ टाने, आगे नाहि याय ॥ ४७ ॥ सपरिकर राजाकी व्यग्र भावसे उपस्थिति :- टानिते ना पारे गौड़, रथ छाड़ि' दिल। पात्र-मित्र लञा राजा व्यग्र हञा आइल ॥ ४८ ॥ अनुवाद—इधर जब श्रीजगन्नाथके रथके चलनेका समय हुआ, तब सब गौड़ोंने रथ खींचना आरम्भ किया, परन्तु रथ आगे नहीं चला। गौड़ लोग जब रथको चला नहीं पाये, तो उन्होंने प्रयास करना छोड़ दिया। तब अपने सेवकों और मित्रोंके साथ राजा व्याकुल होकर आये ॥ ४७-४८ ॥ 534 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/49-59 ] बड़े-बड़े बलवान भी रथको चलानेमें असमर्थ :- महामल्लगणे दिल रथ चालाइते। आपने लागिला रथ, ना पारे टानिते ॥ 49 ॥ व्यग्र हञा आने राजा मत्त-हातीगण। रथ चालाइते रथे करिल योजन ॥ 50 ॥ मत्त-हस्तिगण टाने, यत तार बल। एक पद ना चले रथ, हइल अचल ॥ 51 ॥ अनुवाद-राजाने रथको चलानेके लिये बड़े-बड़े पहलवानोंको नियुक्त किया और फिर वे स्वयं भी प्रयास करने लगे, परन्तु वे सब मिलकर भी रथको हिला नहीं सके। अधीर होकर राजाने मतवाले हाथियोंको मँगवाकर उन्हें रथके आगे जोत दिया। मतवाले हाथियोंने भी अपना सम्पूर्ण बल लगाकर खींचनेका प्रयास किया, परन्तु रथ हिला ही नहीं, एक पग भी आगे नहीं बढ़ा ॥ 49-51 ॥ सपरिकर महाप्रभुका रथको खींचनेकी चेष्टाका दर्शन :- शुनि' महाप्रभु आइला निजगण लञा। मत्तहस्ति रथ टाने, — देखे दाण्डाञा ॥ 52 ॥ हाथियोंके द्वारा भी रथको चलता न देख सबका हाहाकार :- अङ्कुशेर घाय हस्ती करये चित्कार। रथ नाहि चले, लोक करे हाहाकार ॥ 53 ॥ अनुवाद - यह सुनकर महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर वहाँ आये और खड़े होकर मतवाले हाथियोंको रथको खींचते हुए देखने लगे। अङ्कुशके प्रहारसे हाथी चिंघाड़ने लगे, परन्तु रथ फिर भी न हिला। लोग भी सब हाहाकार करने लगे ॥ 52-53 ॥ अपने भक्तोंको रथ खींचनेमें नियुक्त करना :- तबे महाप्रभु सब हस्ति घुचाइल। निजगणे रथ-काछि टानिबारे दिल ॥ 54 ॥ महाप्रभुके द्वारा रथके साथ अपने मस्तकको स्पर्श करने मात्रसे रथका चलना :- आपने रथेर पाछे ठेले माथा दिया। हडू हडू करि' रथ चलिल धाइञा ॥ 55 ॥ अनायास ही रथका चलना :- भक्तगण काछि हाते करि' मात्र धाय। आपने चलिल रथ, टानिते ना पाय ॥ 56 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने सभी हाथियोंको हटवा दिया और रथको खींचनेके लिये अपने भक्तोंके हाथोंमें रस्सीको पकड़ा दिया। रथके पीछे जाकर महाप्रभु स्वयं अपने सिरसे रथको ठेलने लगे और तभी रथ हडू हडू शब्द करता हुआ तेजीसे चलने लगा। रथके आगे भक्तगण केवल रस्सीको हाथमें पकड़कर दौड़ रहे थे, रथ तो बिना खींचे ही अपने आप चल रहा था॥ 54-56 ॥ हर्षवशतः सभीके द्वारा जयध्वनि :- आनन्दे करये लोक 'जय' 'जय'-ध्वनि। 'जय जगन्नाथ' बइ आर नाहि शुनि ॥ 57 ॥ अनुवाद-रथको चलते हुए देख लोग आनन्दमें 'जय' 'जय'-कार करने लगे। 'जय जगन्नाथ'के अतिरिक्त और कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था ॥ 57 ॥ महाप्रभुके प्रभावसे रथका गुण्डिचा पहुँचना :- निमेषे त' गेल रथ गुण्डिचार द्वार। चैतन्य-प्रताप देखि' लोके चमत्कार ॥ 58 ॥ अनुवाद-एक निमेष अर्थात् पलक झपकनेके समयमें ही श्रीजगन्नाथका रथ गुण्डिचा मन्दिरके द्वारपर पहुँच गया। श्रीचैतन्य महाप्रभुके ऐसे प्रतापको देखकर सभी लोग चमत्कृत हो उठे ॥ 58 ॥ लोगोंके द्वारा महाप्रभुकी जयध्वनि :- 'जय गौरचन्द्र', 'जय श्रीकृष्णचैतन्य'। एइमत कोलाहल लोके करे धन्य ॥ 59 ॥ । 535

[ 14/59-67 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—'जय गौरचन्द्र', 'जय श्रीकृष्णचैतन्य' का तुमुलनाद लोगोंको अति धन्य कर रहा था ॥ ५९ ॥ महाप्रभुकी महिमाके दर्शनसे राजाको प्रेमावेश :— देखिया प्रतापरुद्र पात्र-मित्र-सङ्गे। प्रभुर महिमा देखि' प्रेमे फुले अङ्गे ॥ ६० ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्र और उनके सेवकों एवं मित्रोंको महाप्रभुकी महिमाका दर्शन करके प्रेमसे रोमाञ्च हो गया ॥ ६० ॥ श्रीजगन्नाथका पाहाण्डि :— पाण्डुविजय तब करे सेवकगणे। जगन्नाथ बसिला गिया निज-सिंहासने ॥ ६१ ॥ सुभद्रा-बलरामका पाहाण्डि, श्रीजगन्नाथका स्नानभोग :— सुभद्रा-बलराम निज-सिंहासने आइला। जगन्नाथेर स्नानभोग हइते लागिला ॥ ६२ ॥ आङ्गनमें महाप्रभुका अपने भक्तोंके साथ कीर्तन :— आङ्गिनाते महाप्रभु लञा भक्तगण। आनन्दे आरम्भ कैल नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ ६३ ॥ महाप्रभुके प्रेममें सभी पागल :— आनन्दे महाप्रभुर प्रेम उथलिल। देखि' सब लोक प्रेम-सागरे भासिल ॥ ६४ ॥ अनुवाद—तब श्रीजगन्नाथके सेवकोंने उनको रथसे नीचे उतारा और श्रीजगन्नाथ गुण्डिचा मन्दिरमें स्थित अपने सिंहासनपर जाकर बैठ गये। तब श्रीसुभद्रा और श्रीबलराम भी अपने सिंहासनपर आकर विराजमान हुए। इसके बाद श्रीजगन्नाथका स्नान हुआ और फिर उन्हें भोग लगा। इधर महाप्रभुने मन्दिरके आङ्गनमें अपने भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक नृत्य-कीर्तन करना आरम्भ किया। नृत्य-कीर्तनके आनन्दमें महाप्रभु प्रेममें विह्वल हो गये, जिसे देखकर सब लोग प्रेमके सागरमें डूबने लगे ॥ ६१-६४ ॥ सन्ध्या आरतिका दर्शन और आइतोटामें विश्राम :— नृत्य करि' सन्ध्याकाले आरति देखिल। आइतोटा आसि' प्रभु विश्राम करिल ॥ ६५ ॥ अनुवाद—नृत्य करनेके बाद महाप्रभुने श्रीजगन्नाथकी सन्ध्या आरतीका दर्शन किया। तब महाप्रभुने आइतोटामें जाकर रात्रिमें विश्राम किया ॥ ६५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आइतोटा'—गुण्डिचा मन्दिरके निकट एक उद्यान ॥ ६५ ॥ श्रीअद्वैतादि नौ भक्तोंके द्वारा नौ रातकी यात्राके नौ दिनों तक महाप्रभुको निमन्त्रण :— अद्वैतादि भक्तगण निमन्त्रण कैल। मुख्य मुख्य नव जन नव दिन पाइल ॥ ६६ ॥ चातुर्मास्यमें प्रत्येक भक्तके द्वारा एक-एक दिन तक महाप्रभुको निमन्त्रण :— आर भक्तगण चातुर्मास्ये यत दिन। एक एक दिन करि' करिल वण्टन ॥ ६७ ॥ अनुवाद—तब श्रीअद्वैतादि भक्तोंने जाकर महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण किया। मुख्य-मुख्य नौ भक्तोंने नौ दिन अपने-अपने स्थानपर निमन्त्रण करनेका सौभाग्य प्राप्त किया। अन्य कुछ मुख्य भक्तोंने चातुर्मास्यके जितने दिन थे, उनको एक-एक दिन करके बाँट लिया ॥ ६६-६७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़देशसे श्रीअद्वैतादि जो सब भक्त आये थे, उन्होंने महाप्रभुको एक-एक दिन निमन्त्रण करके भिक्षा (प्रसाद) दी। गुण्डिचा मन्दिरमें नौ दिन उत्सव होता है,—इसका नाम 'नवरात्र'-यात्रा है। उन नौ दिनोंमें महाप्रभुने भक्तों सहित आइतोटामें वास किया। श्रीअद्वैतादि प्रधान-प्रधान नौ भक्तोंने इन नौ दिन महाप्रभुको निमन्त्रित किया। और-और भक्तोंने चातुर्मास्यका एक एक दिन करके बाँट लिया था ॥ ६६ ॥ 536 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/68-77 ] बाकी भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके सौभाग्यका अभाव :- चारि मासेर दिन मुख्यभक्त बाँटि निल। आर भक्तगण अवसर ना पाइल ॥ 68 ॥ अन्य कोई उपाय न देख 2-3 भक्तोंके द्वारा इकट्ठे मिलकर एक-एक दिन महाप्रभुका निमन्त्रण :- एक दिन निमन्त्रण करे दुइ-तिने मिलि'। एइमत महाप्रभुर निमन्त्रण-केलि ॥ 69 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको भिक्षा करानेके लिये चातुर्मास्यके दिन भी मुख्य-मुख्य भक्तोंने बाँट लिये। अन्य भक्तोंको इसका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये दो-तीन भक्तोंने मिलकर महाप्रभुको एक-एक दिन निमन्त्रण किया। इस प्रकार महाप्रभुकी निमन्त्रण-लीला हुई॥ 68-69 ॥ प्रातःकाल स्नान करके श्रीजगन्नाथके दर्शनके बाद परिकरोंके साथ कीर्त्तन-नृत्य :- प्रातःकाले स्नान करि' देखि' जगन्नाथ। सङ्कीर्त्तने नृत्य करे भक्तगण-साथ ॥ 70 ॥ श्रीनित्ताइ और श्रीअद्वैतादिका नृत्य, गुण्डिचामें तीनों समय कीर्त्तन :- कभु अद्वैते नाचाय, कभु नित्यानन्दे। कभु हरिदासे नाचाय, कभु अच्युतानन्दे ॥ 71 ॥ कभु वक्रेश्वरे, कभु आर भक्तगणे। त्रिसन्ध्या कीर्त्तन करे गुण्डिचा-प्राङ्गुणे ॥ 72 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रातःकालमें स्नान करके श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके बाद अपने भक्तोंके साथ सङ्कीर्त्तनमें नृत्य करते थे। वे सङ्कीर्त्तनमें नृत्य करते हुए कभी श्रीअद्वैताचार्यको नचाते, तो कभी श्रीनित्यानन्द प्रभुको, कभी श्रीहरिदासको नृत्य कराने लगते, तो कभी श्रीअच्युतानन्दको, कभी श्रीवक्रेश्वरको और कभी किसी ओर भक्तको। इस प्रकार महाप्रभु तीन सन्ध्या श्रीगुण्डिचा मन्दिरके प्राङ्गणमें कीर्त्तन करते ॥ 70-72 ॥ श्रीकृष्णका व्रजमें आगमन और श्रीराधाके साथ मिलनसे उनकी दासी-गोपी-अभिमानी महाप्रभुका आनन्द :- वृन्दावने आइला कृष्ण—एइ प्रभुर ज्ञान। कृष्णेर विरह-स्फूर्त्ति हैल अवसान ॥ 73 ॥ राधासङ्गे कृष्णलीला—एइ हैल ज्ञाने। एइ रसे मग्न प्रभु हइला आपने ॥ 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको अनुभव होता कि श्रीकृष्ण वृन्दावनमें आ गये हैं। अतः उनकी श्रीकृष्ण विरह-स्फूर्त्ति शान्त हो गयी। महाप्रभु सदा श्रीकृष्णकी श्रीराधाके साथ विहारलीलाका स्मरण करते हुए स्वयं इस रसमें निमग्न हो गये ॥ 73-74 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी अनेक प्रकारकी जलकेलि :- नानोद्याने भक्तसङ्गे वृन्दावन-लीला। 'इन्द्रद्युम्न'-सरोवरे करे जलखेला ॥ 75 ॥ आपने सकल भक्ते सिञ्चे जल दिया। सब भक्तगण सिञ्चे चौदिके बेड़िया ॥ 76 ॥ कभु एक मण्डल, कभु अनेक मण्डल। जलमण्डूक-वाद्ये सबे बाजाय करतल ॥ 77 ॥ अनुवाद—गुण्डिचा मन्दिरके पास अनेक उद्यान थे और महाप्रभु प्रत्येक उद्यानमें भक्तोंके साथ वृन्दावनकी लीलाएँ करने लगे। 'इन्द्रद्युम्न' नामक सरोवरमें उन्होंने भक्तोंके साथ जल-क्रीड़ा की। महाप्रभु सभी भक्तोंपर सरोवरका जल उलीचने लगे और सब भक्त भी चारों ओरसे महाप्रभुपर जल फेंकने लगे। वे जलमें कभी तो एक घेरा और कभी अनेक घेरे बनाकर जलमें करतल बजाते हुए मेंढ़क जैसी ध्वनि करते ॥ 75-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जलमण्डुक-वाद्य'—पानीमें मेढ़क जिस प्रकार आवाज करता है, उस प्रकार ध्वनिके जैसे बजाते हुए गोलाकारमें जलकेलि होने लगी ॥ 77 ॥ अनुभाष्य—'जलमण्डुक-वाद्य'—पानीमें करतल बजाकर मेढ़क जैसे ध्वनि करना ॥ 77 ॥ । 537

[ 14/78-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

दो-दो भक्तोंके द्वारा जलकेलि करना और महाप्रभुके द्वारा उसका दर्शन :- दुइ-दुइ जने मेलि' करे जल-रण। केह हारे, केह जिने-प्रभु करे दरशन ॥ 78 ॥ अद्वैत-नित्यानन्दे जल-फेलाफेलि। आचार्य हारिया, पाछे करे गालागालि ॥ 79 ॥ विद्यानिधिर जलकेलि स्वरूपेर सने। गुप्त-दत्ते जलकेलि करे दुइ जने ॥ 80 ॥ श्रीवास-सहित जल खेले गदाधर। राघव-पण्डित सने खेले वक्रेश्वर ॥ 81 ॥ सार्वभौम-सङ्गे खेले रामानन्द-राय। गाम्भीर्य गेल दोंहार, हैल शिशुप्राय ॥ 82 ॥

“पण्डित, गम्भीर दुँहे—प्रामाणिक जन। बाल-चाञ्चल्य करे, कराह वर्जन ॥” 84 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्द राय—दोनोंकी चञ्चलताको देखकर मुस्कुराते हुए श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,—“इन्हें बाल-चापल्य करनेसे मना करो, क्योंकि ये दोनों ही विद्वान, गम्भीर और समाजमें प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं॥”83-84॥

श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी कृपा-महिमाका वर्णन :- गोपीनाथ कहे,—“तोमार कृपा-महासिनधु। उछलित करे यबे तार एक बिन्दु ॥ 85 ॥ मेरु-मन्दर-पर्वत डुबाय यथा तथा। एइ दुइ-गण्ड-शैल, इहार का कथा ॥ 86 ॥ महाप्रभुकी कृपासे शुष्कज्ञानी श्रीसार्वभौम भी अब श्रीकृष्णसेवा-रसमें रसिक :- शुष्कतर्क-खलि खाइते जन्म गेल याँर। ताँरे लीलामृत पियाओ,—ए कृपा तोमार ॥” 87 ॥

अनुवाद—कभी दो भक्त एक दूसरेसे जल-युद्ध करने लगते। इस युद्धमें एक हार जाता और दूसरा जीत जाता—महाप्रभु ये सब क्रीड़ा देखते। एक-दूसरेपर जल फेंकनेकी पहली क्रीड़ा श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके बीच हुई। इसमें श्रीअद्वैताचार्य हार गये और बादमें वे श्रीनित्यानन्द प्रभुको (प्रेमपूर्वक) गाली देने लगे। श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि श्रीस्वरूप दामोदरके साथ और श्रीमुरारि गुप्त वासुदेवदत्तके साथ जलकेलि कर रहे थे। श्रीवास पण्डित श्रीगदाधर पण्डितके साथ और श्रीराघव पण्डित श्रीवक्रेश्वर पण्डितके साथ जलकेलि करते एक-दूसरेपर जल फेंक रहे थे। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीरामानन्द-रायके साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे, क्रीड़ा करते हुए उनकी गम्भीरता न जाने कहाँ लुप्त हो गयी और वे बालकोंकी भाँति हो गये॥78-82॥

अनुभाष्य— 'गुप्त'—मुरारि गुप्त; 'दत्त'—वासुदेव दत्त ॥ 80 ॥

श्रीगोपीनाथको श्रीसार्वभौम और श्रीरायके चापल्यको त्याग करवानेकी आज्ञा :- महाप्रभु ताँ दोंहार चापल्य देखिया। गोपीनाथाचार्ये किछु कहेन हासिया ॥ 83 ॥

अनुवाद—श्रीगोपीनाथने कहा,—“आपकी कृपा महासिन्धुकी भाँति है। जब उसकी एक बूँद भी उछलती है, तो वह सुमेरु-मन्दराचल जैसे बड़े पर्वतोंको भी वहीं डुबो सकती है। ये दोनों तो छोटीसी पहाड़ियोंके समान हैं, तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है कि ये आपकी कृपाके सागरमें डूब रहे हैं। जिनका (श्रीसार्वभौमका) समस्त जीवन शुष्कतर्क रूपी खली खाते हुआ व्यतीत हुआ है, उन्हें आप आज अपनी लीलामृतका पान करा रहे हैं—आपकी इनपर यह महान् कृपा है॥85-87॥

अनुभाष्य— 'गण्ड-शैल'—पहाड़ी; यद्यपि 'दुई'—अर्थात् 'दो'—शब्दका उल्लेख है, तथापि विशेष रूपसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको लक्ष्य करके ऐसा कहा गया है। 'खलि'—खली (बीजसे तेल निकालनेके बाद बची हुई खली); महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेसे पहले निर्विशेष-ब्रह्म-ज्ञानी

538 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/86-96 ] तर्कपन्थी श्रीसार्वभौमकी खली खानेवाले 'कोल्हूके बैल'के साथ तुलना की है॥ 86-87॥ तैरते हुए श्रीअद्वैतकी 'शेष' और महाप्रभुकी 'शेषशायी'-लीलाका प्रकाश :- हासि' महाप्रभु तबे अद्वैते आनिल। जलेर उपरे ताँरे शेष-शय्या कैल ॥ 88 ॥ आपने ताँहार उपर करिल शयन। 'शेषशायी-लीला' प्रभु कैल प्रकटन ॥ 89 ॥ अद्वैत निज-शक्ति प्रकट करिया। महाप्रभु लञा बुले जलेते भासिया ॥ 90 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका आइटोटामें आगमन :- एइमत जलक्रीड़ा करि' कतक्षण। आइटोटा आइला प्रभु लञा भक्तगण ॥ 91 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने मुस्कुराते हुए श्रीअद्वैताचार्यको बुलाया और उन्हें जलके ऊपर तैरती शेष-शय्याकी भाँति बना दिया। फिर महाप्रभुने स्वयं उनके ऊपर लेटकर अपनी 'शेषशायी-लीला'को प्रकाशित किया। श्रीअद्वैताचार्य अपनी शक्तिको प्रकट करके महाप्रभुको अपने ऊपर लेकर जलमें तैरते हुए भ्रमण करने लगे। इस प्रकार कुछ समय तक जलक्रीड़ा करनेके बाद महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ आइटोटामें आये॥ 88-91 ॥ मुख्यभक्तोंके द्वारा आचार्यका निमन्त्रण स्वीकार :- पुरी, भारती आदि यत मुख्य भक्तगण। आचार्येर निमन्त्रणे करिला भोजन ॥ 92 ॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती आदि मुख्य-मुख्य भक्तोंने श्रीअद्वैताचार्यका निमन्त्रण स्वीकार करके भोजन ग्रहण किया॥ 92 ॥ महाप्रभुके भक्तोंके द्वारा श्रीवाणीनाथके द्वारा लाया हुआ प्रसाद ग्रहण :- वाणीनाथ आर यत प्रसाद आनिल। महाप्रभुर गणे सेइ प्रसाद खाइल ॥ 93 ॥ अनुवाद—श्रीवाणीनाथ और जितना प्रसाद लाये, महाप्रभुके अन्य भक्तोंने उसे ग्रहण किया॥ 93 ॥ अपराह्नमें दर्शन और नृत्य, रातमें उपवनमें निद्रा :- अपराह्ने आसि' कैल दर्शन, नर्त्तन। निशाते उद्याने आसि' करिला शयन ॥ 94 ॥ अनुवाद—अपराह्न-कालमें महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरमें श्रीजगन्नाथके दर्शन करके नृत्य किया और रातमें उद्यानमें आकर शयन किया॥ 94 ॥ अन्य दिन भगवान्‌का दर्शन और मन्दिरके प्राङ्गणमें नृत्य-गीत :- आर दिन आसि' कैल ईश्वर-दरशन। प्राङ्गणे नृत्य-गीत कैल कतक्षण ॥ 95 ॥ अनुवाद—अगले दिन भी महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरमें आकर श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और प्राङ्गणमें कुछ समय तक नृत्य-गीत आदि किया॥ 95 ॥ भक्तोंके साथ उद्यानमें व्रज-विहार :- भक्तगण-सङ्गे प्रभु उद्याने आसिया। वृन्दावन-विहार करे भक्तगण लञा ॥ 96 ॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ उद्यानमें आ गये और उनके साथ वृन्दावन-विहार लीला करने लगे॥ 96 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने यहाँ वृन्दावन-विहार आरम्भ किया, परन्तु यह श्रीकृष्णकी भाँति उनकी 'पारकीय'-रसमें परस्त्रियोंके साथ विहाररूपी भोक्ताकी लीला नहीं है। स्वयंको श्रीराधाकी दासी समझकर और उनकी सेव्या आश्रय-विग्रह श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्णके मिलनमें आनन्द-सागरमें निमग्न हैं—इस रसमें मत्त अवस्थामें ही महाप्रभुकी भक्तोंके साथ 'वृन्दावन-विहार' लीला हुई थी; (इसी अध्यायकी 74, 75 संख्या देखें)। इसलिये 'गौरनागरी-वाद'का यहाँ कोई भी प्रयोजन नहीं है॥ 96 ॥ । 539

[ 14/97–106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दर्शनसे चारों ओर हर्षका लक्षण :– वृक्षवल्ली प्रफुल्लित प्रभुर दरशने। भृङ्ग, पिक गाय, बहे शीतल पवने ॥ 97 ॥ महाप्रभुका नृत्य, श्रीवासुदेव-दत्तका कीर्तन :– प्रति-वृक्षतले प्रभु करेन नर्त्तन। वासुदेव-दत्त मात्र करेन गायन ॥ 98 ॥ प्रत्येक वृक्षके नीचे नृत्य करनेवाले महाप्रभु :– एक एक वृक्षतले एक एक गान गाय। परम-आवेशे एका नाचे गौरराय ॥ 99 ॥ नृत्यके अन्तमें श्रीवक्रेश्वरको नाचनेका आदेश :– तबे वक्रेश्वरे प्रभु कहिला नाचिते। वक्रेश्वर नाचे, प्रभु लागिला गाइते ॥ 100 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीस्वरूप आदि भक्तोंका गान, सभीमें प्रेम-विह्वलता :– प्रभु-सङ्गे स्वरूपादि कीर्त्तनीया गाय। दिक्विदिक़ नाहि ज्ञान प्रेमेर वन्याय ॥ 101 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका दर्शन करके वहाँके वृक्ष और लताएँ प्रफुल्लित हो गये, भ्रमर और कोयल गान करने लगे तथा शीतल पवन बहने लगी। महाप्रभु प्रत्येक वृक्षके नीचे नृत्य करने लगे और एक मात्र श्रीवासुदेव-दत्त ही गान कर रहे थे। श्रीवासुदेव-दत्त एक-एक वृक्षके नीचे एक-एक गीतका गान कर रहे थे और परमावेशमें महाप्रभु उनके साथ अकेले ही नृत्य कर रहे थे। तब महाप्रभुने श्रीवक्रेश्वर पण्डितसे नृत्य करनेके लिये कहा। श्रीवक्रेश्वर पण्डितने जैसे नृत्य आरम्भ किया, तभी महाप्रभु स्वयं गाने लगे। तब श्रीस्वरूप दामोदर और अन्य कीर्त्तनीया भी महाप्रभुके साथ गाने लगे। प्रेमकी बाढ़में सब इतना डूब गये कि उन्हें समय और परिस्थितिका भी ज्ञान नहीं रहा॥ 97-101 ॥ वनलीलाके अन्तमें नरेन्द्र-सरोवरमें जलकेलि :– एइ मत कतक्षण करि' वन-लीला। नरेन्द्र-सरोवरे गेला करिते जलखेला ॥ 102 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कुछ समय तक वनलीला करनेके बाद सभी नरेन्द्र सरोवर गये और उसमें जल-क्रीड़ाका आनन्द लिया ॥ 102 ॥ स्नानके बाद उद्यानमें भक्तोंके साथ प्रसाद-सम्मान :– जलक्रीड़ा करि' पुनः आइला उद्याने। भोजनलीला कैला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 103 ॥ अनुवाद—जल-क्रीड़ाके बाद महाप्रभु पुनः उद्यानमें आ गये और वहाँ उन्होंने भक्तोंके साथ भोजनलीला की ॥ 103 ॥ गुण्डिचामें श्रीजगन्नाथके नौ दिनों तक रहनेके समय इस प्रकारकी लीलाएँ हुईं :– नव दिन गुण्डिचাতে रहे जगन्नाथ। महाप्रभु ऐछे लीला करे भक्त-साथ ॥ 104 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ नौ दिनों तक श्रीगुण्डिचा मन्दिरमें रहे, उस कालमें महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ इस प्रकारकी लीलाएँ कीं ॥ 104 ॥ जगन्नाथवल्लभमें महाप्रभुकी विश्राम-लीला :– 'जगन्नाथ-वल्लभ'-नाम बड़ पुष्पाराम। नव दिन करेन प्रभु ताहाते विश्राम ॥ 105 ॥ अनुवाद—'जगन्नाथ-वल्लभ'-नामक एक बड़ी पुष्प-वाटिका में ही महाप्रभुने उन नौ दिनों तक विश्राम किया ॥ 105 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जगन्नाथ-वल्लभ'—गुण्डिचा मन्दिर और जगन्नाथ मन्दिरके प्रायः मध्यमें ही 'जगन्नाथ-वल्लभ' नामक एक उद्यान है। इस उद्यान में 'दना'-चोरीलीला होती है अर्थात् श्रीमदनमोहन जाकर दना-नामक सुगन्धित वृक्ष चोरी करके लाते हैं ॥ 105 ॥ अनुभाष्य—'पुष्पाराम'—पुष्पवाटिका ॥ 105 ॥ हेरापञ्चमी-उत्सवके विपुल आयोजनके लिये राजाका काशीमिश्रसे अनुरोध :– 'हेरा-पञ्चमी'र दिन आइल जानिया। काशीमिश्रे कहे राजा सयत्न करिया ॥ 106 ॥ 540 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/106-115 ] “कल्य 'हेरा-पञ्चमी', हबे लक्ष्मीर विजय। ऐछे उत्सव कर, येन कभु नाहि हय ॥107॥ अनुवाद—'हेरा-पञ्चमी' अगले दिन ही है, ऐसा जानकर राजा प्रतापरुद्रने श्रीकाशीमिश्रको ध्यानपूर्वक कहा,—“कल हेरा-पञ्चमी अथवा लक्ष्मी विजय है। इस उपलक्ष्यमें ऐसा उत्सव करो, जैसा पहले कभी न हुआ हो॥106-107॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हेरा-पञ्चमीर दिन'—रथ यात्राके बाद पाँचवें दिनको 'हेरा-पञ्चमी' कहते हैं। लक्ष्मीदेवी श्रीजगन्नाथको ढूँढ़ते हुए गुण्डिचामें जाकर श्रीजगन्नाथको हेरकर (देखकर) आती हैं, इसलिये उड़ीसावासी लोग इस दिनको 'हेरा-पञ्चमी' कहते हैं। इस दिन लक्ष्मी श्रीजगन्नाथको खोई हुई वस्तुकी भाँति ढूँढ़ने जाती है, इसलिये 'अतिबाड़ी' लोग इसे 'हारापञ्चमी' कहते हैं। जो हो, कविराज गोस्वामीने इस पञ्चमीको 'हेरा-पञ्चमी' कहकर ही लिखा है॥106॥ महाप्रभुकी सन्तुष्टिके लिये महोत्सवके आयोजनका आदेश :— महोत्सव कर तैछे विशेष सम्भार। देखि' महाप्रभुर यैछे हय चमत्कार ॥108॥ सुचारू रूपसे सजानेका आदेश :— ठाकुरेर भाण्डारे आर आमार भाण्डारे। चित्रवस्त्र किङ्किणी, आर छत्र-चामरे॥109॥ ध्वजावृन्द-पताका-घन्टाय करह मण्डन। नानावाद्य-नृत्य-दोलाय करह साजन॥110॥ अनुवाद—विशेष आयोजन करके ऐसा महोत्सव करो, जिसे देखकर महाप्रभु आश्चर्यचकित हो जाँय। ठाकुर श्रीजगन्नाथके भण्डार और मेरे भण्डारमें जितने भी रङ्ग-बिरङ्गे वस्त्र, किङ्किणी, छत्र, चामर, ध्वजा, पताका, घण्टा आदि हैं, उन्हें एकत्रित करके पालकीको सजाओ। अनेक प्रकारके वाद्य-यन्त्रों तथा नर्त्तकोंको बुलाकर यात्राकी शोभाको बढ़ाओ॥108-110॥ अनुभाष्य—'चित्रवस्त्र'—रङ्गे हुए वस्त्र; 'किङ्किणी'—छोटी घण्टियाँ॥109॥ रथयात्राकी अपेक्षा बड़े समारोहके लिये आदेश :— द्विगुण करिया कर सब उपहार। रथयात्रा हैते यैछे हय चमत्कार ॥111॥ महाप्रभुके लिये दर्शनकी सुविधाका विधान :— सेइत' करिह,–प्रभु लञा भक्तगण। स्वच्छन्दे आसिया करे यैछे दरशन॥”112॥ अनुवाद—पहलेकी अपेक्षा इस बार दोगुना अधिक उपहारों और प्रसादका आयोजन करो, जिससे यह उत्सव रथ-यात्रासे भी बढ़-चढ़कर हो जाय। और ऐसी व्यवस्था करना जिससे महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ स्वतन्त्ररूपसे आकर उत्सवका दर्शन कर सकें॥”111-112॥ भक्तोंके साथ गुण्डिचामें जगन्नाथका दर्शन :— प्रातःकाले महाप्रभु निजगण लञा। जगन्नाथ-दर्शन कैल सुन्दराचले याञा॥113॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करने सुन्दराचल गये॥113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सुन्दराचल'—श्रीजगन्नाथ मन्दिरको जिस प्रकार 'नीलाचल' कहा जाता है, गुण्डिचा-मन्दिरको उसी प्रकार 'सुन्दराचल' कहते हैं॥113॥ हेरा-पञ्चमीके दर्शनके लिये पुनः नीलाचल आगमन :— नीलाचले आइला पुनः भक्तगण-सङ्गे। देखिते उत्कण्ठा हेरा-पञ्चमीर रङ्गे॥114॥ श्रीकाशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुको उत्तम स्थानपर विराजमान करना :— काशीमिश्र प्रभुरे बहु आदर करिया। स्वगण-सह भालस्थाने बसाइल लञा॥115॥ अनुवाद—महाप्रभु हेरा पञ्चमीके उत्सवको देखनेकी उत्कण्ठासे अपने भक्तोंके साथ नीलाचल (श्रीजगन्नाथ मन्दिर) आये। श्रीकाशीमिश्रने बड़े आदरसे महाप्रभुको । 541

[ 14/114-126 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उनके भक्तोंके साथ ऐसे स्थानपर बैठा दिया जहाँसे हेरा-पञ्चमीकी लीलाको देखनेमें उन्हें कोई भी असुविधा नहीं हो॥ 114-115 ॥ प्रकट करते हैं। वर्षमें एकबार मात्र उनकी वृन्दावन सदृश सुन्दराचलको देखनेके लिये अत्यधिक उत्कण्ठा होती है॥ 117-119 ॥ महाप्रभुकी श्रीस्वरूपसे श्रीजगन्नाथके द्वारा लक्ष्मीके सङ्गको छोड़कर वृन्दावन जानेके कारणकी जिज्ञासा :- रसविशेष प्रभुर शुनिते मन हैल। ईषत् हासिया प्रभु स्वरूपे पुछिल ॥ 116 ॥ “यद्यपि जगन्नाथ करेन द्वारकाय विहार। सहज प्रकट करे परम उदार ॥ 117 ॥ तथापि वत्सर-मध्ये हय एकबार। वृन्दावन देखिते ताँर उत्कण्ठा अपार ॥ 118 ॥ वृन्दावन-सम एइ उपवन-गण। ताहा देखिबारे उत्कण्ठित हय मन ॥ 119 ॥ बाहिर हइते करे रथयात्रा-छल। सुन्दराचले याय प्रभु छाड़ि' नीलाचल ॥ 120 ॥ नाना-पुष्पोद्याने तथा खेले रात्रि-दिने। लक्ष्मीदेवीरे सङ्गे नाहि लय कि कारणे?” ॥ 121 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा इसका कारण बतलाना-व्रजलीलामें गोपियोंका ही अधिकार और लक्ष्मीका अनधिकार :- स्वरूप कहे,—“शुन, प्रभु, कारण इहार। वृन्दावन-क्रीड़ाते लक्ष्मीर नाहि अधिकार ॥ 122 ॥ वृन्दावन-लीलाय कृष्णेर सहाय गोपीगण। गोपीगण बिना कृष्णेर हरिते नारे मन ॥” 123 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“प्रभो! इसका कारण सुनो। वृन्दावनकी लीलाओंमें लक्ष्मीका अधिकार नहीं है। वृन्दावनकी लीलाओंमें गोपियाँ ही श्रीकृष्णकी सहायक हैं। गोपियोंके अतिरिक्त कोई भी श्रीकृष्णके मनको नहीं हर सकता॥” 122-123 ॥ अनुभाष्य—वृन्दावन-लीलामें लक्ष्मी-ठाकुराणीका अधिकार नहीं होनेके कारण सुन्दराचल जाते समय श्रीजगन्नाथ लक्ष्मीको साथ नहीं ले जाते,—यही कारण है॥ 122 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी कुछ विशेष रसके विषयको सुननेकी इच्छा हुई और उन्होंने मन्द मुस्कुराते हुए श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,—“यद्यपि श्रीजगन्नाथ द्वारकामें विहार करते हैं और सहज रूपमें ही परम उदारता प्रकट करते हैं, तथापि वर्षमें एक बार उनकी वृन्दावन देखनेकी तीव्र उत्कण्ठा होती है। यहाँके उपवन वृन्दावनके समान हैं, जिन्हें देखनेकी उनकी उत्कण्ठा होती है। बाहरसे वे रथ-यात्राका बहाना करते हैं, परन्तु वास्तवमें वे नीलाचलको छोड़कर सुन्दराचल जाना चाहते हैं। सुन्दराचलके पुष्प उद्यानोंमें वे दिन-रात लीला करते हैं, परन्तु किस कारणसे वे लक्ष्मीदेवीको अपने साथ नहीं ले जाते?” ॥ 116-121 ॥ महाप्रभुका पुनः प्रश्न-लक्ष्मीके क्रोधके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“यात्रा-छले कृष्णेर गमन। सुभद्रा आर बलदेव, सङ्गे दुइजन ॥ 124 ॥ गोपी-सङ्गे यत लीला हय उपवने। निगूढ़ कृष्णेर भाव केह नाहि जाने ॥ 125 ॥ अतएव कृष्णेर प्राकट्ये नाहि किछु दोष। तबे केने लक्ष्मीदेवी करे एत रोष?” ॥ 126 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पुनः पूछा,—“रथ-यात्राके छलसे श्रीकृष्ण श्रीसुभद्रा तथा श्रीबलदेवको भी अपने साथ वहाँ ले जाते हैं। गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी उपवनमें जो लीलाएँ होती हैं, वे अति रहस्यमयी हैं, उन्हें कोई नहीं जानता है। इसलिये श्रीकृष्णकी लीलाओंमें कोई अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेव जीवोंके प्रति करुण होकर नीलाचल मन्दिरमें बैठकर श्रीकृष्णके द्वारका-विहारको 542 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/124-134 ] भी दोष नहीं है, तो लक्ष्मीदेवी इतना क्रोध क्यों करती हैं?" 124-126 ॥ अनुभाष्य - 'यात्रा' - रथयात्रा । बृहद्भागवतामृतके प्रथम खण्डका सातवाँ अध्याय देखें ॥ 124-126 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा इसका कारण बताना- प्रियकी उदासीनतासे प्रियाका क्रोधाभिमान :- स्वरूप कहे, - "प्रेमवतीर एइ त' स्वभाव। कान्तेर उदास्य-लेशे हय क्रोधभाव ॥" 127 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, - "प्रेमवतीका यही तो स्वभाव ही होता है कि कान्तकी लेशमात्र उदासीनतासे ही उसमें क्रोध उत्पन्न हो जाता है ॥" 127 ॥ विपुल समारोहमें बहुतसी दासियोंके साथ लक्ष्मीका आगमन :- हेनकाले, खचित याहे विविध रतन। सुवर्णेर चौदोला करि' आरोहण ॥ 128 ॥ छत्र-चामर-ध्वजा पताकार गण। नानावाद्य-आगे नाचे देवदासीगण ॥ 129 ॥ ताम्बुल-सम्पुट, झारी, व्यजन, चामर। साथे दासी शत, हार दिव्य भूषाम्बर ॥ 130 ॥ अनेक ऐश्वर्य सङ्गे बहु-परिवार। कृ अनुवाद-महाप्रभु और श्रीस्वरूप दामोदरका वार्त्तालाप चल ही रहा था, उसी समय विविध रत्नोंसे जड़ित सोनेकी पालकीपर बैठीं लक्ष्मीदेवीकी सवारी आयी। उनकी कुछ दासियाँ हाथोंमें छत्र, चामर, ध्वजा तथा पताकाएँ लेकर पालकीको चारों ओरसे घेरकर चल रही थीं। पालकीके आगे वादक अनेक प्रकारके वाद्ययन्त्र बजा रहे थे और देवदासियाँ नृत्य कर रही थीं। कुछ दासियाँ पानकी पेटिका, जलपात्र, पंखा, चामर लेकर चल रही थीं। उनके साथ हार तथा दिव्य परिधान धारण किये और सैंकड़ों दासियाँ थी। इस प्रकार लक्ष्मीदेवी क्रोधित होकर सिंहद्वारपर आयीं। उनके साथ उनके परिवारके अनेक सदस्य थे, उन सबका अपार ऐश्वर्य था ॥ 128-131 ॥ अनुभाष्य - 'सम्पुट' - पेटिका; 'झारी' - नलरहित जलपात्र ॥ 130 ॥ लक्ष्मीकी दासियोंके द्वारा श्रीजगन्नाथके प्रधान सेवकोंको बाँधकर ईश्वरीके पास लाना और प्रहार :- जगन्नाथेर मुख्य मुख्य यत भृत्यगणे। लक्ष्मीदेवीेर दासीगण करेन बन्धने ॥ 132 ॥ बान्धिया आनिया पाड़े लक्ष्मीर चरणे। चोरे दण्ड करे, येन लय नाना-धने ॥ 133 ॥ अचेतनवत् तारे करेन ताड़ने। नानामत गालि देन भण्ड-वचने ॥ 134 ॥ अनुवाद-जब लक्ष्मीदेवी सिंहद्वार पर पहुँचीं, तब उनकी दासियाँ श्रीजगन्नाथके मुख्य-मुख्य दासोंको बाँधने लगीं। उन्हें बाँधकर लक्ष्मीदेवीके चरणोंमें ऐसे पटक दिया जैसे चोरको बहुत धन चुरानेपर दण्ड दिया जाता है। लक्ष्मीदेवीके चरणोंमें गिरकर श्रीजगन्नाथके सेवक प्रायः मूर्च्छित हो गये। लक्ष्मीदेवीकी दासियाँ अनेक प्रकारके अश्लील वचनोंका व्यवहार करके उन्हें गालियाँ देने लगीं ॥ 132-134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - श्रीजगन्नाथ जिस समय रथपर यात्रा करते हैं, उस समय लक्ष्मीको यह कहकर जाते हैं कि 'मैं कल ही लौट आऊँगा'। दो-तीन दिन बीत जानेपर भी श्रीजगन्नाथके न आनेपर, कान्तकी उदासीनताके लेशमात्रके दर्शनसे ही प्रेमवती लक्ष्मीदेवीमें स्वभावतः ही क्रोध उदित होता है। तब वे सज-धजकर पालकीमें विराजमान होकर अपनी सब दासियोंके साथ श्रीमन्दिरसे बाहर निकल पड़ती हैं। इसी समय, श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें एक परम रहस्यमय घटना होती है, लक्ष्मीदेवीकी सेविकाएँ श्रीजगन्नाथके प्रधान-प्रधान सेवकोंको बाँधकर लाकर उनके चरणोंमें पटक देती हैं ॥ 132-133 ॥ । 543

[ 14/135-142 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लक्ष्मीकी दासियोंकी उद्दण्डताको देख भक्तोंका हँसना :- लक्ष्मी-सङ्गे दासीगणेर प्रागल्भ्य देखिया। हासे महाप्रभुर गण मुखे हस्त दिया॥ 135॥ अनुवाद-लक्ष्मीदेवीकी दासियोंकी ढिठाईको देखकर महाप्रभुके भक्त मुँहपर हाथ रखकर हँसने लगे॥ 135॥ श्रीदामोदरके द्वारा लक्ष्मीदेवीके ऐसे अपूर्व असाधारण मानकी व्याख्या :- दामोदर कहे,-"ऐछे मानेर प्रकार। त्रिजगते काँहा देखि, शुनि नाइ आर ॥ 136 ॥ कान्तकी उदासीनतासे मानिनी कान्ताका आचरण :- मानिनी निरुत्साहे छाड़े विभूषण। भूमे बसि' नखे लेखे, मलिन-वदन ॥ 137 ॥ ब्रजगोपियों और सत्यभामाका मान भी इसी प्रकार :- पूर्वे सत्यभामार शुनि एवम्बिध मान। व्रजे गोपीगणेर मान-रसेर निधान ॥ 138 ॥ लक्ष्मीका मान उनसे भी विलक्षण :- इँहो निज-सम्पत्ति सब प्रकट करिया। प्रियेर उपर याय सैन्य साजाञा ॥"139॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“इस प्रकारका मान तो त्रिभुवनमें मैंने न कहीं देखा है और न सुना है। प्रायः मानिनी तो निरुत्साहित होकर अपने आभूषण उतार देती है और मलिन-मुख होकर वह भूमिपर बैठकर अपने नखोंसे लिखने लगती है। पूर्वकालमें श्रीसत्यभामाके इस प्रकारके मानके विषयमें मैंने सुना है और ब्रजमें गोपियोंका मान तो रसका भण्डार है। परन्तु लक्ष्मीके विषयमें तो मैं अलग प्रकारका मान देख रहा हूँ। वे तो अपना सारा ऐश्वर्य दिखाते हुए अपने सैन्य बलके साथ प्रियतम श्रीजगन्नाथके ऊपर आक्रमण करने जा रही हैं॥"136-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीस्वरूप गोस्वामीने लक्ष्मीकी ऐसी ढिठाईको देखकर ब्रजवासियोंकी प्रेम-सम्पत्तिके उत्कर्षको दिखलानेके लिये कहा,- 'प्रभो, लक्ष्मीके इस प्रकारके मानके विषयमें मैंने कभी भी त्रिजगत्में नहीं सुना है। प्रिया मानिनी होनेपर उत्साहहीन होकर भूषणादि परित्याग करके मलिन-मुखसे भूमिपर बैठकर नखसे कुछ-कुछ लिखती है। व्रजमें गोपियोंके इस प्रकारका मान और द्वारकापुरवासिनी सत्यभामाका भी ऐसा मान सुना गया है, किन्तु लक्ष्मीदेवीका मान उसके विपरीत देख रहा हूँ। ये अपने ऐश्वर्यको प्रकट करके सेना सजाकर प्रियके ऊपर आक्रमण करने जा रही हैं॥ 136-139॥ महाप्रभुके प्रश्नोंके उत्तरमें श्रीस्वरूपके द्वारा गोपियोंके मानका वर्णन :- प्रभु कहे,-"कह व्रजेर मानेर प्रकार।" स्वरूप कहे,-"गोपीमान-नदी शतधार ॥ 140 ॥ कान्ताके स्वभाव और प्रीतिके भेदसे मान-भेद :- नायिकार स्वभाव, प्रेमवृत्त्ये बहु भेद। सेइ भेदे नाना-प्रकार मानेर भेद ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "यह बतलाओ कि व्रजका मान कितने प्रकारका होता है।" श्रीस्वरूप दामोदरने उत्तर दिया, - "गोपियोंका मान तो सैकड़ों धाराओंवाली नदीके समान है। ब्रजमें नायिकाओंके स्वभाव और उनकी प्रेमकी वृत्तिके अनुसार बहुत भेद हैं और उस भेदके कारण उनमें उदित होनेवाले मानके भी अनेक भेद हैं॥ 140-141॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नायिकाका स्वभाव और प्रेमवृत्ति- अनेक प्रकारके हैं, उसी भेदके अनुसार ही प्रत्येक नायिकाके (विभिन्न) मानका उदय होता है॥141॥ गोपियोंके अनिर्वचनीय मानका संक्षेपमें वर्णन :- सम्यक् गोपिकार मान ना याय कथन। एक-दुइ-भेदे करि दिग्-दरशन ॥ 142 ॥ अनुवाद-सम्पूर्ण रूपसे गोपियोंके मानका वर्णन तो नहीं किया जा सकता, तो भी एक-दो भेद बतलाकर उसका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥ 142 ॥ 544

चौदहवाँ अध्याय 14/143–153 ] तीन प्रकारकी मानिनी :- माने केह हय 'धीरा', केह त' 'अधीरा'। एइ तिन-भेदे, केह हय 'धीराधीरा' ॥ 143 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मानिनीगण संक्षेपमें तीन भागोंमें विभक्त हैं—'धीरा', 'अधीरा' और 'धीराधीरा' ॥ 143 ॥ 'धीरा' मानिनीका स्वभाव :- 'धीरा' कान्ते दूरे देखि' करे प्रत्युत्थान। निकटे आसिते, करे आसन प्रदान ॥ 144 ॥ हृदये कोप, मुखे कहे मधुर वचन। प्रिय आलिङ्गिते, तारे करे आलिङ्गन ॥ 145 ॥ सरल व्यवहार, करे मानेर पोषण। किम्वा सौलुण्ठ-वाक्ये करे प्रिय-निरसन ॥ 146 ॥ अनुवाद—'धीरा'-मानिनी दूरसे कान्तको आते देखकर उसके स्वागतके लिये खड़ी हो जाती है और कान्तके निकट आनेपर उसे आसन प्रदान करती है। हृदयमें क्रोध होनेपर भी मुखसे मधुर वचन ही बोलती है। प्रियतमके आलिङ्गन करनेपर वह भी उसका आलिङ्गन करती है। वह कान्तके प्रति सरल व्यवहार करते हुए भी हृदयमें मानका पोषण करती है। अथवा बाहरसे परिहासयुक्त मृदु वचनों या व्याज-स्तुतिके द्वारा अपने प्रियतमकी निकट आनेकी चेष्टा आदिका निराकरण करती है ॥ 144-146 ॥ अनुभाष्य—'सौलुण्ठ वाक्य'—मन्दहास-परिहासयुक्त अथवा व्याज-स्तुति वाक्य; 'निरसन'—प्रतिवाद ॥ 146 ॥ 'अधीरा' मानिनीका स्वभाव :- 'अधीरा' निष्ठुर-वाक्ये करये भर्त्सन। कर्णोत्पले ताड़े, करे मालाय बन्धन ॥ 147 ॥ अनुवाद—'अधीरा' नायिका कभी निष्ठुर (कटु) वाक्योंके द्वारा अपने कान्तकी भर्त्सना करती है। कभी उसके कानोंको खींचती है और कभी मालाके द्वारा उसे बाँध भी देती है ॥ 147 ॥ 'धीराधीरा' मानिनीका स्वभाव :- 'धीराधीरा' वक्र-वाक्ये करे उपहास। कभु स्तुति, कभु निन्दा, कभु वा उदास ॥ 148 ॥ अनुवाद—'धीराधीरा' नायिका कभी वक्रोक्ति (कुटिल वचनों) के द्वारा कान्तका उपहास करती है, कभी स्तुति, कभी निन्दा और कभी उसके प्रति उदासीन हो जाती है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/171 संख्या देखें; 'वक्र'—कुटिल, शठतापूर्ण ॥ 148 ॥ तीन प्रकारकी नायिकाएँ; मान-कौशलमें मुग्धाकी अनभिज्ञता :- 'मुग्धा', 'मध्या', 'प्रगल्भा',—तिन नायिकार भेद। 'मुग्धा' नाहि जाने मानेर वैदग्ध्य-विभेद ॥ 149 ॥ मुख आच्छादिया करे केवल रोदन। कान्तेर प्रियवाक्य शुनि' हय प्रसन्न ॥ 150 ॥ अनुवाद—नायिकाओंके तीन भेद हैं—'मुग्धा', 'मध्या' और 'प्रगल्भा'। 'मुग्धा' नायिका मानके चातुर्यकी गहराइयोंको नहीं जानती। वह मान करके मुँहको ढककर केवल रोती रहती है और कान्तके द्वारा कहे गये प्रियवचनोंको सुनकर ही प्रसन्न हो जाती है अर्थात् उसका मान दूर हो जाता है ॥ 149-150 ॥ अनुभाष्य—'वैदग्ध्य-विभेद'—अनेक प्रकारकी कुशलता ॥ 149 ॥ 'मध्य' और 'प्रगल्भा'का ही पूर्वोक्त धीरा, अधीरा और धीराधीरा-भेद; इसीमें श्रीकृष्णका सुख :- 'मध्या' 'प्रगल्भा' धरे धीरादि-विभेद। तार मध्ये सबार स्वभावे तिन भेद ॥ 151 ॥ केह 'प्रखरा', केह 'मृदु', केह हय 'समा'। स्व-स्वभावे कृष्णेर बाड़ाय प्रेम-सीमा ॥ 152 ॥ प्राखर्य्य, मार्द्दव, साम्य—स्वभाव निर्दोष। सेइ सेइ स्वभावे कृष्णे कराय सन्तोष ॥" 153 ॥ । 545

[ 14/141-158 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—'मध्या' और 'प्रगल्भा' नायिकाएँ धीरादिके भेदसे तीन प्रकारकी हैं। फिर इन सबके स्वभावमें भी तीन प्रकारके भेद हैं—कोई 'प्रखरा', कोई 'मृदु' और कोई 'समा' है। ये सब अपने स्वभावके अनुसार श्रीकृष्णके प्रेमको अन्तिम सीमा तक बढ़ाती हैं। यद्यपि कुछ गोपियाँ प्रखरा, कुछ मृदु और कुछ सम हैं, परन्तु तीनों प्रकारकी गोपियाँ अप्राकृत और निर्दोष हैं। वे अपने-अपने विशेष स्वभावसे श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करती हैं॥ 151-153॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नायिकाएँ तीन प्रकारकी हैं,— 'मुग्धा', 'मध्या' और 'प्रगल्भा'। मुग्धागण मान-चातुर्यका किसी प्रकारका भेद (रहस्य) नहीं जानतीं। जो सब नायिकाएँ,—'मध्या' और 'प्रगल्भा' हैं, वे ही धीरादिके भेदसे तीन प्रकारकी हैं॥ 149-151॥ अनुभाष्य—श्रीउज्ज्वलनीलमणिमें नायिका-भेद, यूथेश्वरी-भेद और सखी-भेद-प्रकरण देखें॥ 141-153॥ गोपियोंके नायिका-लक्षणोंको सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :— एकथा शुनिया प्रभुर आनन्द अपार। 'कह, कह, दामोदर',—बले बार बार॥ 154॥ अनुवाद—नायिकाओंके विषयमें सुनकर महाप्रभुको अपार आनन्द हुआ और वे बार-बार कहने लगे,—'दामोदर, और कहो, और कहो ॥ '154॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीकृष्ण और गोपियोंके परस्पर प्रेम-लक्षणका वर्णन :— दामोदर कहे,—“कृष्ण रसिकशेखर। रस-आस्वादक, रसमय-कलेवर॥ 155॥ प्रेममय-वपु कृष्ण—भक्त प्रेमाधीन। शुद्धप्रेमे, रसगुणे, गोपिका—प्रवीण॥ 156॥ गोपिकार प्रेमे नाहि रसाभास-दोष। अतएव कृष्णेर करे परम सन्तोष॥ 157॥

अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“श्रीकृष्ण रसिकशेखर हैं, वे सभी रसोंके आस्वादक हैं और उनका शरीर भी रसमय है। श्रीकृष्णका शरीर प्रेमके द्वारा गठित है और वे भक्तोंके प्रेमके अधीन हैं। गोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध प्रेम है और उन्हें रसका आस्वादन करानेमें प्रवीण हैं। गोपियोंके प्रेममें रसाभास-दोष नहीं है, इसलिये वे श्रीकृष्णको परम सन्तोष प्रदान करती हैं॥ 155-157॥ अनुभाष्य—'रस-आस्वादक'—श्रीकृष्ण ही चिद्-रसके एकमात्र आस्वादक, भोक्ता अथवा विषय हैं, अन्य सभी उनके आश्रय अथवा भोग्य हैं। 'रसाभास'—भः रः सिः, उः विः, नौवीं लहरी,— 'पूर्वमेवानु रसा एव रसाभासा रसज्ञैरनुकीर्त्तिताः॥ स्युस्त्रिधोपरसाश्चानुरसाश्चापरसाश्च ते। उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चेत्यमी क्रमात्॥” पूर्वकथित रस-लक्षणसे विपर्ययता प्राप्त करनेपर उस लक्षणहीन रसको ही रसिकगण 'रसाभास' कहते हैं। रसाभास तीन प्रकारके हैं—उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ अर्थात् उपरस, अनुरस और अपरस्॥ 155-157॥ श्रीकृष्णकी चिन्मयी रासक्रीड़ा :— (श्रीमद्भागवत 10/33/25)— एवं शशाङ्कांशुविराजिता निशाः स सत्यकामोऽनुरताबलागणः। सिषेव आत्मन्यवरुद्ध-सौरतः सर्वाः शरत्काव्यकथारसाश्रयाः ॥ 158॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रकारसे शरत्कालीन और काव्य-सम्बन्धीय समस्त कथाओंके रसाश्रय-रूप, अबलाओंके द्वारा अनुरत, चन्द्र-किरणोंसे सुशोभित उन सब रात्रियोंमें, चिन्मय-भावावरुद्ध सत्यकाम शृङ्गाररसमय पुरुष श्रीकृष्णने रासलीला की थी। तात्पर्य यह है,— सभी गोपियाँ शुद्ध चिन्मयी हैं, श्रीवृन्दावन शुद्ध

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चिन्मयधाम है और वे आनन्दमय सभी रात्रियाँ भी चिन्मय रात्रियाँ हैं; जो रासलीला हुई थी, वह भी सम्पूर्ण रूपसे चिन्मय है; उसमें जड़ीय किसी भी क्रियाका स्पर्शमात्र भी नहीं हुआ। श्रीकृष्ण कभी भी जड़मयी रतिकी ओर देखते नहीं हैं। चिद्-जगत्में ही उनकी समस्त लीलाएँ अवरुद्ध हैं; उनकी कामक्रीड़ा-सब कुछ चिन्मय कार्य-मात्र है॥158॥ अनुभाष्य-शुद्ध हृदयवाले राजा परीक्षितको महाभागवत परमहंस-कुलचूड़ामणि श्रीशुकदेवके द्वारा गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ाका वर्णन- एवं [कथितभावेन] सत्यकामः (नित्यसत्यसङ्कल्पः श्रीकृष्णः) अनुरताबलागणः (अनुरतः आकृष्टः अबलागणः यस्मिन् तादृशः अनुरागि-स्त्रीकदम्बस्थः इत्यर्थः) आत्मनि (एव) अवरुद्धसौरतः (अवरुद्धाः सौरताः सुरतव्यापाराः येन एवम्भूतः सः आत्मारामः अप्राकृत-कामदेवः इत्यर्थः) शरत्- काव्यकथारसाश्रयाः (शरदि भवाः काव्येषु कथ्यमाना ये रसास्तेषामाश्रयभूताः, यद्वा, शरत्कालोचितकाव्यकथारसाः तेषाम् आश्रयभूताः ताः, यद्वा, 'रसाश्रयाः शरत्काव्यकथाः' इत्यन्वये-शृङ्गार-रसाश्रयाः शरदि प्रसिद्धाः काव्येषु याः कथास्ताः) शशाङ्कांशुविराजिताः (शशाङ्कस्य अंशुभिः किरणैः विराजिताः शोभमानाः) सर्वाः एव निशाः सिषेवे (रासक्रीड़या यापयामास)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥158॥ गोपियोंमें नायिकोचित परम-चमत्कार- लक्षणमय गुण-वैचित्र्य :- 'वामा' एक गोपीगण, 'दक्षिणा' एक गण। नाना-भावे कराय कृष्णे रस आस्वादन॥159॥ अनुवाद-एक प्रकारकी गोपियाँ 'वामा' स्वभावकी हैं और दूसरी प्रकारकी 'दक्षिणा' स्वभावकी हैं। ये अनेक भावोंके द्वारा श्रीकृष्णको रसास्वादन कराती हैं॥159॥ सभी गोपियोंमें श्रेष्ठा श्रीकृष्णप्रेष्ठा श्रीराधाके गुण और स्वभाव :- गोपीगण-मध्ये श्रेष्ठा राधा-ठाकुराणी। निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेम-रत्नखनि॥160॥


वयसे 'मध्यमा' तैं हो स्वभावते 'समा'। गाढ़ प्रेमभावे तैं हो निरन्तर 'वामा'॥161॥ वाम्य-स्वभावे मान उठे निरन्तर। तार मध्ये उठे कृष्णेर आनन्द-सागर॥"162॥ अनुवाद-गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठा श्रीराधा-ठाकुराणी हैं, वे निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेमरूपी रत्नोंकी खान हैं। वे आयुमें 'मध्यमा' (पौगण्ड और यौवनके मध्य), स्वभावमें 'समा' (समभाव) हैं। 'समा' होनेपर भी गाढ़ प्रेमभावके कारण निरन्तर 'वामा' अर्थात् वाम्यभाव धारण करनेवाली हैं। वाम्य स्वभावके कारण निरन्तर मानवती होती रहती हैं, जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णको आनन्द सागरमें निमज्जित करती हैं॥160-162॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियाँ दो प्रकारकी हैं,-'वामा' और 'दक्षिणा'। गोपियोंके मध्य निर्मल उज्ज्वल-रस- प्रेमरत्नकी खान-स्वरूपा राधा-ठाकुराणी ही सर्वश्रेष्ठा हैं। वे आयुमें-'मध्यमा', स्वभावमें-'समा' एवं निरन्तर 'वामा' हैं। उनके वाम्य स्वभावसे ही मान उदित होता है॥159-162॥ अनुभाष्य- 'वामा'-उज्ज्वलनीलमणिके सखी प्रकरणमें, 32 संख्या- “मानग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना। अभेद्या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्यते॥” “जो नायिका मानग्रहण करनेमें सदैव चेष्टाशील होती है, मानके शिथिल पड़नेसे अत्यन्त कोप करती है, नायक जिसको सहज ही वशीभूत करनेमें समर्थ नहीं होता तथा नायकके प्रति प्रायः कठोर होती है, वही 'वामा' कहलाती है।” 'दक्षिणा'-उज्ज्वलनीलमणिके सखी प्रकरणमें 38 संख्या- “असह्या माननिर्बन्धे नायके युक्तवादिनी। सामभिस्तेन भेद्या च दक्षिणा परिकीर्तिता॥” “जो नायिका मान करनेमें असमर्थ होती है,

[ 14/159-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नायकके प्रति युक्तिपूर्ण प्रिय वचनोंका प्रयोग करती है, नायकके प्रीतिपूर्ण वचनोंसे प्रसन्न हो जाती है, उसे 'दक्षिणा' कहते हैं॥ 159 ॥ उज्ज्वलनीलमणिमें शृङ्गारभेदकथनमें 102 श्लोक :- अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्। अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥ 163 ॥ अनुवाद-सर्पकी स्वभाव-सिद्ध कुटिलगतिकी भाँति प्रेमकी भी स्वाभाविक वक्रगति होती है। इसलिये कभी कारण और कभी अकारण ही नायक एवं नायिकाका मान उदित होता है ॥ 163 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/110 संख्या देखें ॥ 163 ॥ महाप्रभुकी हर्ष-वृद्धि, दामोदरके द्वारा श्रीराधाके कृष्णप्रेम या महाभाव-सार-पराकाष्ठा-महिमा-व्याख्याका विस्तार :- एत शुनि' बाड़े प्रभुर आनन्द-सागर। 'कह, कह' कहे प्रभु, बले दामोदर ॥ 164 ॥ “अधिरूढ़ महाभाव—राधिकार प्रेम। विशुद्ध, निर्मल, यैछे दग्धवान् हेम ॥ 165 ॥ कृष्णेर दर्शन यदि पाय आचम्बिते। नाना-भाव-विभूषणे हय विभूषिते ॥ 166 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुका आनन्द-सागर वर्धित होने लगा और वे श्रीस्वरूप दामोदरको 'और कहो, और कहो' कहने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर कहने लगे,—“श्रीराधिकाका प्रेम अधिरूढ़ महाभाव है। वह प्रेम विशुद्ध, निर्मल और तपाये हुए सोनेकी भाँति उज्ज्वल है। श्रीराधिकाको यदि अकस्मात् श्रीकृष्णका दर्शन प्राप्त हो जाता है, तो वे अनेक भावरूपी आभूषणोंसे विभूषित हो जाती हैं ॥ 164-166 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दग्धवान् हेम'-ज्वलित अर्थात् तपता हुआ सोना ॥ 165 ॥ अनुभाष्य- 'अधिरूढ़ महाभाव' - उज्ज्वलनीलमणिके स्थायिभाव प्रकरणमें 170 संख्या- “रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम्। यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥” “रूढ़भावके लक्षणमें कहे गये जो सब सात्त्विक अनुभाव अपूर्व विशिष्टताको प्राप्त होते हैं, उस अनिर्वचनीय विशिष्टता-प्राप्त सात्त्विक भावसमूहको 'अधिरूढ़ महाभाव' कहते हैं ॥” 165 ॥ श्रीकृष्णको परिपूर्ण मात्रामें सुख प्रदान करनेवाले सब प्रकारके भावरूपी अलङ्कारोंसे विभूषित श्रीराधिका :- अष्ट 'सात्त्विक', हर्षादि 'व्यभिचारी' याँर। 'सहज प्रेम', विंशति 'भाव' अलङ्कार ॥ 167 ॥ 'किलकिञ्चित', 'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित'। 'विव्वोक', 'मोट्टायित', आर 'मौग्ध्य', 'चकित' ॥ 168 ॥ श्रीकृष्णवाञ्छा पूर्ण करनेवाली श्रीराधाके नाना भाव- अलङ्कार-शोभित रूप-दर्शनसे श्रीकृष्णको असीम सुख :- एत भावभूषाय भूषित श्रीराधार अङ्ग। देखिते उथले कृष्णसुखाब्धि-तरङ्ग ॥ 169 ॥ अनुवाद-आठ सात्त्विकभाव, हर्षादि व्यभिचारी भाव, 'सहज प्रेम', बीस भावरूपी अलङ्कार-'किलकिञ्चित', 'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित', 'विव्वोक', 'मोट्टायित', 'मौग्ध्य' और 'चकित'—इन समस्त भावरूपी अलङ्कारोंसे श्रीराधिकाके अङ्ग विभूषित हैं, जिन्हें देखने मात्रसे ही श्रीकृष्णके सुख-समुद्रमें तरङ्ग उठने लगती हैं॥ 167-169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सात्त्विक' - सात्त्विक विकार आठ प्रकारके हैं—(1) स्तम्भ, (2) स्वेद (पसीना), (3) रोमाञ्च, (4) स्वरभङ्ग, (5) वेपथु (कम्प), (6) वैवर्ण्य (वर्ण परिवर्तन), (7) अश्रु और (8) प्रलय। 'व्यभिचारी'-व्यभिचारी अथवा सञ्चारी भाव तैंतीस प्रकारके हैं, जैसे,— (1) निर्वेद, (2) विषाद, (3) दैन्य, (4) ग्लानि, (5) श्रम, (6) मद, (7) गर्व, (8) शङ्का, (9) त्रास, (10) आवेग, (11) उन्माद, (12) अपस्मार, (13) व्याधि, (14) मोह, (15) मृति, (16) आलस्य, 548 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/167–173 ] (17) जाड्य, (18) व्रीड़ा, (19) अवहित्था, (20) स्मृति, (21) वितर्क, (22) चिन्ता, (23) मति, (24) धृति, (25) हर्ष, (26) औत्सुक्य, (27) औग्र्य, (28) अमर्ष (29) असूया, (30) चापल्य, (31) निद्रा, (32) सुप्ति और (33) प्रबोध। 'भाव' रूप अलङ्कार—बीस प्रकारके हैं; जैसे— [क] अङ्गज (अङ्गोंमें उत्पन्न)— (1) भाव, (2) हाव, (3) हेला; [ख] अयत्नज (बिना प्रयासके उत्पन्न)— (4) शोभा, (5) कान्ति, (6) दीप्ति, (7) माधुर्य, (8) प्रगल्भता, (9) औदार्य, (10) धैर्य; [ग] स्वभावज (स्वभावसे उत्पन्न)— (11) लीला, (12) विलास, (13) विच्छित्ति, (14) विभ्रम, (15) किलकञ्चित, (16) मोट्टायित, (17) कुट्टमित, (18) विब्बोक, (19) ललित और (20) विकृत ॥ 167 ॥ अनुभाष्य—'किलकिञ्चित'—इस अध्यायकी 174 संख्या देखें। 'कुट्टमित'—इसी अध्यायकी 197 संख्या देखें। 'विलास'—इसी अध्यायकी 187 संख्या देखें। 'ललित'—इसी अध्यायकी 192 संख्या देखें। 'विब्बोक'—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें 75 संख्या— “इष्टेऽपि गर्वमानाभ्यां विब्बोकः स्यादनादरः” अर्थात् गर्व और मानके द्वारा प्रियतम अथवा उनके द्वारा दी गयी वस्तुके अनादरको 'विब्बोक' कहते हैं। 'मोट्टायित'—उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव प्रकरणमें— “कान्तस्मरणवार्त्तादौ हृदि तद्भावभावतः। प्राकट्यमभिलाषस्य मोट्टायितमुदीर्यते ॥” अर्थात् हृदयमें प्रियतमकी स्मृति और कथाजनित उनकी भावनासे जो अभिलाषा उत्पन्न होती है, वही 'मोट्टायित' कहलाती है। 'मौग्ध्य',—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें— “ज्ञातस्याप्यज्ञवत्पृच्छा प्रियाग्रे मौग्ध्यमीरितम्” अर्थात् कान्तके सामने नायिका किसी विषयको जाननेपर भी जैसे नहीं जानती है, इस प्रकारके भावको प्रकाश करके जो जिज्ञासा करती है, उसीको 'मौग्ध्य' कहते हैं। 'चकित'—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें— “प्रियाग्रे चकितं भीतेरस्थानेऽपि भयं महत्” अर्थात् कान्तके सम्मुख होनेपर भयभीत नहीं होनेपर भी जब नायिका अत्यन्त भयभीत होनेका प्रदर्शन करती है, उसीको 'चकित' कहते हैं।” आदिलीला 4/243, 250, 256 संख्या देखें ॥ 168–169 ॥ श्रीराधाके 'किलकिञ्चित'-भावके दृष्टान्त-स्थल :— किलिञ्चितादि-भावेर शुन विवरण। ये भाव-भूषाय राधा हरे कृष्ण-मन ॥ 170 ॥ राधा देखि' कृष्ण यदि धुँइते करे मन। दानघाटि-पथे यबे वर्जेन गमन ॥ 171 ॥ याबे आसि' माना करे पुष्प उठाइते। सखी-आगे चाहे यदि गाये हात दिते ॥ 172 ॥ एसब स्थाने 'किलकिञ्चित'-उद्गम। प्रथमे 'हर्ष' सञ्चारी-मूल-कारण ॥ 173 ॥ अनुवाद—अब किलकिञ्चितादि भावोंका विवरण सुनिये जिन भावरूपी भूषणोंसे विभूषित होकर श्रीराधा श्रीकृष्णका मन हरण करती हैं। श्रीकृष्ण जब श्रीराधाको देखकर यदि उन्हें छूनेकी इच्छा करते हैं, अथवा जब दानघाटीका पथ अवरुद्धकर जब श्रीराधाको जानेसे रोकते हैं, अथवा जब श्रीराधाके पास आकर उन्हें पुष्प-चयन करनेसे मना करते हैं, अथवा किसी सखीके सामने श्रीराधाके श्रीअङ्गको छूनेका प्रयास करते हैं—ऐसे समयपर किलकिञ्चित भावका प्राकट्य होता है। पहले हर्ष-नामक सञ्चारी भाव प्रकट होता है और यही इन किलकिञ्चत भावोंका मूल कारण है ॥ 170–173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब श्रीमती राधिकाकी भाव-भूषा देखकर श्रीकृष्णमें उन्हें स्पर्श करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, तब दानघाटीके पथमें, या फिर पुष्पोंके वनमें, । 549

[ 14/171-180 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वैसी लीला सम्पादित करते हैं। दानघाटीके पथपर इस प्रकारकी लीला, — जिस मार्गपर श्रीमती राधिका दूध-दही-घी आदि लेकर जाती हैं, उस रास्ते अथवा दूसरी पार खड़े होकर श्रीकृष्ण कहते हैं, - 'तुम जब तक शुल्क (कर) नहीं दोगी, तब तक इस मार्गसे तुम्हारा जाना मना है'; इस छलसे एक दानकेलिरूप लीलाका उद्गम करते हैं। और जब श्रीराधिका पुष्प चयन करने जाती हैं, तब श्रीकृष्ण पुष्पवनके अधिकारी बनकर 'मेरे पुष्प चोरी कर रही हों' कहकर एक लीलाका उद्गम करते हैं। इन सभी स्थानोंपर ऐसे समयमें श्रीराधाजीका 'किलकिञ्चित' भाव प्रकट होता है ॥ 171-173 ॥ किलकिञ्चित-भावकी संज्ञा :- उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव प्रकरणमें (44 श्लोक)— गर्वाभिलाषरुदितस्मितासूयाभयक्रु सङ्करीकरणं हर्षादुच्यते किलकिञ्चितम् ॥ 174 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गर्व, अभिलाष, रोदन, हास्य, असूया, भय और क्रोध-इन सात भावोंके हर्षके साथ संमिश्रणको 'किलकिञ्चित्' भाव कहते हैं ॥ 174 ॥ अनुभाष्य- हर्षात् (हर्षः एव हेतुः तस्मात्) गर्वाभिलाषरुदितस्मितासूयाभय- क्रुधां (गर्वादीनां सप्तानां भावानां) सङ्करीकरणं (मिश्रणं युगपत्-प्राकट्यं) 'किलकिञ्चितम्' उच्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ गर्वादि सात भावोंका हर्षके साथ युगपत् मिलनके फलसे उक्त 'महाभाव'का उदय :- आर सात भाव आसि' सहजे मिलय। अष्टभाव-सम्मिलने 'महाभाव' हय ॥ 175 ॥ गर्व, अभिलाष, भय, शुष्करुदित। क्रोध, असूया हय, आर मन्दस्मित ॥ 176 ॥ नाना-स्वादु अष्टभाव एकत्र मिलन। याहार आस्वादे तृप्त हय कृष्ण-मन ॥ 177 ॥ मीठे पानेके साथ उपमा :- दधि, खण्ड, घृत, मधु, मरीच, कर्पूर। एलाची-मिलने यैछे रसाला मधुर ॥ 178 ॥ अनुवाद-हर्षके साथ गर्व, अभिलाष, भय, शुष्क- रोदन, क्रोध, असूया और मन्द-मुस्कान-ये सात भाव सहजमें आकर मिल जाते हैं और इन आठ भावोंके मिलनेसे 'महाभाव' होता है। इन आठ भावोंका एक साथ मिश्रण ऐसा स्वादिष्ट होता है कि उसे आस्वादन करके श्रीकृष्णका मन तृप्त हो जाता है; जिस प्रकार दही, चीनी, घी, मधु, काली मिर्च, कर्पूर और छोटी इलायचीके मिलनेपर रस मधुर हो जाता है ॥ 175-178 ॥ अनुभाष्य-मूल कारण हर्षके साथ गर्व आदि सात भाव जब मिलते हैं, तब इन आठ भावोंके सम्मिलनसे 'किलकिञ्चित'-महाभाव होता है ॥ 175 ॥ श्रीराधाके किलकिञ्चित भाव-दर्शनसे श्रीकृष्णका प्रगाढ़तम सुख :- एइ भाव-युक्त देखि' राधास्य-नयन। सङ्गम हइते सुख पाय कोटि-गुण ॥" 179 ॥ अनुवाद-किलकिञ्चित भावसे युक्त श्रीराधाके मुखकमल और नेत्रोंको देखकर श्रीकृष्णको जो सुख होता है, वह श्रीराधाके सङ्गम सुखसे भी करोड़ों गुणा अधिक है ॥ 179 ॥ श्रीराधाके किलकिञ्चित-भावका दृष्टान्त-स्थल :- दानकेलिकौमुदीमें (1) श्लोक और उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभावकथनमें (46) श्लोक- अन्तःस्मेरतयोज्ज्वला जलकणव्याकीर्णपक्ष्मङ्कुरा किञ्चित्पाटलिताञ्चला रसिकतोत्सिक्ता पुरः कुञ्चती। रुद्धायाः पथि माधवेन मधुरव्याभुग्नतारोत्तरा राधायाः किलकिञ्चितस्तबकिनी दृष्टिः श्रियं वः क्रियात् ॥ 180 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 180 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाके गर्वादि सात भावोंसे 550 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/180-184 ] मिलित, हर्षजनित 'किलकिञ्चित' भावोत्थित दृष्टि तुम्हारा मङ्गलविधान करे। दानघाटीके पथपर श्रीकृष्णने आकर जब राधाजीको रोका, तब राधाजीके अन्तःकरणमें हँसीका उदय हुआ; तब उनके नयन उज्ज्वल हो गये; नेत्रोंकी पलकें नव-उदित अश्रुओंसें भर गयीं; नेत्रोंके दोनों कोने कुछ लाल रङ्गके हो गये; रसके उच्छ्वास-हेतु नेत्रोंमें उत्साह उदित हुआ; नयनाश्रु कुछ बन्द होने लगे और दोनों नयनोंकी पुतली अति सुन्दर रूपसे ऊपर हो गयीं ॥ 180 ॥ अनुभाष्य- पथि (दानघट्टमार्गे) माधवेन (शुल्क-ग्रहणच्छलेन) रुद्धायाः राधायाः अन्तःस्मेरतया (अन्तः अव्यक्तया स्मेरतया ईषद्व्रास्ययुक्ततया) उज्ज्वला (दीप्तिविशिष्टा इति 'स्मितं'), जलकणव्याकीर्णपक्ष्माङ्कुरा (जलकणैः व्याकीर्णाः विक्षिप्ताः पक्ष्माङ्कुराः नेत्रलोमाग्रभागाः यस्याः सा इति 'रोदनं'), किञ्चित्पाटलिताञ्चला (श्वेतरक्ताभनयनप्रान्तदेशा, श्वेतिमा स्वाभाविक एव, रक्तिमा क्रोधात् इति 'क्रोधः'), रसिकतोत्सिक्ता (रसिकतया उत्कर्षेण सिक्ता इति 'गर्वः' 'अभिलाषः' वा), पुरः (अग्रतः) एव कुञ्चती (इति 'भयं'), मधुर-व्याभुग्नतारोत्तरा (मधुरा व्याभुग्ना वक्रा या नयनतारा तया उत्तरा श्रेष्ठा इति 'अभिलाषः' 'गर्वः' 'असूया' वा), किलकिञ्चितस्तबकिनी (किलकिञ्चितरूपो यः स्तबकः गाम्भीर्यमयत्वादस्फुटः भावविशेषः नानाभावपुष्पगुच्छः तद्वती) दृष्टिः वः (युष्माकं) श्रियं क्रियात्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 180 ॥ गोविन्दलीलामृतमें (9/18 श्लोक) :- वाष्पव्याकुलितारुणाञ्चलचलन्नेत्रं रसोल्लासितं हेलोल्लासचलाधरं कुटिलभ्रूयुग्मुद्यत्स्मितम्। राधायाः किलकिञ्चिताञ्चितमसौ वीक्ष्याननं सङ्गमा- दानन्दं तमवाप कोटिगुणितं योऽभून्न गीर्गोचरः ॥ 181 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधिकाके अश्रुओके द्वारा आकुलित नेत्र किञ्चित् अरुण और चञ्चल हो गये; रसोल्लास और कन्दर्पभावके कारण अधर कम्पित होने लगे; दोनों भौंहे कुटिल (टेढ़ी) हो गयीं; मुखकमलपर मृदु मन्द मुस्कानकी रेखा दिखायी देने लगी और किलकिञ्चित-भावसे उत्पन्न प्रसन्नताको व्यक्त होते देखकर श्रीकृष्णने राधिकाके मुख दर्शनसे उनके साथ सङ्गमकी अपेक्षा करोड़ों गुणा जिस सुखको प्राप्त किया, उसका वाणीके द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 181 ॥ अनुभाष्य- असौ (श्रीकृष्णः) राधायाः वाष्पव्याकुलितारुणाञ्चलचलन्नेत्रं (वाष्पैः अश्रुजलैः व्याकुलिते अरुणम् अञ्चलं ययोः एवम्भूते चञ्चले नेत्रे यस्मिन् तत्) रसोल्लासितं, हेलोल्लासचलाधरं (भावविशेषातिशयेन कम्पमानोष्ठं) कुटिलभ्रूयुग्मम् उद्यत्स्मितम् (प्रकटन्मन्दहास्यं) किलकिञ्चिताञ्चितं (तद्भावयुक्तम्) आननं (मुखं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) सङ्गमात् कोटिगुणितं तम् आनन्दं अवाप (प्राप्तवान्) - यः आनन्दः गीर्गोचरः (वाक्यविषयः) न (नैव भवति, कदापीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥ श्रीराधाके भाव-श्रवणसे श्रीस्वरूपका महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एत शुनि' प्रभु हैला आनन्दित मन। सुखाविष्ट हञा स्वरूपे कैला आलिङ्गन ॥ 182 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुके मनमें बहुत आनन्द हुआ और उस आनन्दमें आविष्ट होकर उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरका आलिङ्गन किया ॥ 182 ॥ महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीराधाके 'विलास' भावका वर्णन :- “'विलासादि'-भाव-भूषार कह त' लक्षण। येइ भावे राधा हरे गोविन्देर मन ॥" 183 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "विलासादि'-भाव- भूषणोंका लक्षण वर्णन करो, जिनके द्वारा विभूषित श्रीराधा श्रीगोविन्दका मन हरण करती हैं ॥" 183 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा वर्णन आरम्भ; भक्तोंका सुख :- तबे त' स्वरूप-गोसाञि कहिते लागिला। शुनि' प्रभुर भक्तगण महासुख पाइला ॥ 184 ॥ । 551